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Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

ससुराल की पहली होली-3

" क्यों देवर जी तुम्हे ऐसा ही विदा कर दें "

लेकिन अबकी चमेली भाभी रवी की और से बोल उठीं।

" अरे ऐसा गजब मत करियेगा। इतना चिकना माल , ऐसी कसी कसी गांड ( और अपनी बात सिद्ध करने के लिए रवी के दोनों चूतड़ों को फैला के गांड का छेद दिखाया भी , वास्तव में खूब कसा था। )

और इंहा इतने लौंडेबाज रहते हैं , फिर होली का दिन ,… मार मार के इनकी गांड फुकना कर देंगे। महीना भर गौने के दुल्हिन कि तरह टांग फैला के चलेंगे। "

" फिर तो ,… यही हो सकता है की हम लोग इनको अपने कपडे पहना दें , साडी , चोली। कम से कम इज्जत तो बच जायेगी। " भोली बन के मैंने सुझाव दिया , जिसे सर्वसम्मति से मान लिया गया।

फिर देवर जी का श्रृंगार शुरू हो गया।

और साथ में गाना भी

" अरे देवर को नार बनाओ रे देवर को "

सबसे पहले मैंने अपनी पैंटी में उस तन्नाये खूंटे को बंद किया। फिर कपडे पहनाने का काम चमेली और नीरा भाभी ने सम्हाला , और श्रृंगार का काम मेरे जिम्मे।

चमेली भाभी ने अपना पेटीकोट उतार के उन्हें पहना दिया तो एक पुरानी गुलाबी साडी , नीरा भाभी ने उन्हें पहना दी।

मैंने पैरों में महावर लगाया , घुँघर वाली चौड़ी पायल पहनायी , बिछुए पहनाये , और फिर हाथ में कुहनी तक हरी हरी चूड़ियाँ। कान नाक में छेद नहीं होने की परेशानी नहीं थी।

मेरे पास स्प्रिंग वाली छोटी सी नथ थी और बड़े बड़े झुमके , बस वो पहना दिए। गले में मटर माला। होंठो पे गाढ़ी लाल लिपस्टिक , आँखों में काजल , मस्कारा , और सब मेकअप खूब गाढ़ा , जैसे मेरे ससुराल की रेड लाइट एरिया , कालीनगंज में बैैठने वाली लग रही हों।

चमेली भाभी ने ब्रा और चोली पहनायी लेकिन मुझे कुछ 'मिसिंग' लग रहा था और ऩीने दो रंग भरे गुबारे , ब्रा के अंदर ऐडजस्ट कर दिए।

बाल भी फिर से काढ़ के मैंने औरतों की तरह सीधी मांग निकाल दी।

मस्त रंडी लग रही है , मुस्करा के नीरा भाभी ने बोला। फिर उन्हें कुछ याद आया ,

" एक कसर बाकी है " उन्होंने आँख नचा के मुझसे कहा।

" क्या भाभी ," मैंने पूछा।

" सिन्दुरदान " वो बोलीं।

छुटकी भौजी मैं थी तो ये काम भी मैंने कर दिया और नीरा भाभी से कहा , "

" भाभी , सिन्दुरदान तो हो गया , अब सुहागरात भी तो मनानी चाहिए "

" एकदम निहुरा साली को " अबकी जवाब चमेली भाभी ने दिया और जबरन पकड़ा के निहुरा भी दिया और पेटीकोट भी उठा दिया।

नीरा भाभी ने पैंटी घुटने तक सरका दी और मुझसे कहा ,

" मार लो साल्ली की , सिन्दुरदान तूने किया पहला हक़ तेरा है "

और मेरे कुछ समझने के पहले , चमेली भाभी ने एक गुलाल भरा मोटा कम से कम ७ इंच लम्बा कंडोम मेरे हाथ में थमा दिया।

और मेरे कुछ समझने के पहले , चमेली भाभी ने एक गुलाल भरा मोटा कम से कम ७ इंच लम्बा कंडोम मेरे हाथ में थमा दिया।

बस क्या था , घचाघच , घचाघच, पूरी ताकत से मैंने पेल दिया।

एक बात तो अब तक मैं सीख ही चुकी थी की बुर चोदने में भले कोई रहम दिखा दे , गांड मारने में कतई रहम नहीं दिखाना चाहिए।

न मारने वाले को मजा आता है और न मरवाने वाले को।

और सबसे बड़ी बात ये थी की चमेली और नीरा भाभी ने जिस तरह से उनसे निहुरा रखा था , वो एक सूत भी हिल डुल नहीं सकता था।

गुलाल से भरा कंडोम का डिल्डो आलमोस्ट ७ इंच अंदर था। और अब मैं उसे गोल गोल घुमा रही थी।

" कल मैंने क्या कहा था , आज देखेंगे कौन डालता है , कौन डलवाता है। " नीरा भाभी , मेरी जेठानी ने देवर को छेड़ा।

गुलाल भरा कंडोम आलमोस्ट बाहर निकाल के एक धक्के में पूरा अंदर डाल के मैंने पूछा , " बोल भेजेगा न , शाम को अपनी उस रंडी बहन को "

" हाँ भाभी , हाँ " रवी बोला और मैंने अब डिल्डो , अपनी जेठानी के हाथ में पकड़ा दिया।

लेकिन सबसे हचक के गांड मारी चमेली भाभी ने , पूरी ताकत से। और फिर उसे अंदर ठेल के पैंटी पहना के खड़ा कर दिया।

हम तीनो ने उन्हें नारी वेश में बाहर कर के दरवाजा बंद कर लिया।

"जाके अपनी बहन से निकलवाना इसे " पीछे से नीरा भाभी बोलीं।

हमने थोड़ी देर सांस ली होगी , अपने कपडे ठीक किये होंगे ,बाल्टी में फिर से रंग घोला होगा की दरवाजे पे फिर से खट खट हुयी।

रेहन और नितिन थे , दोनों इनके लंगोटिया यार , इसलिए मेरे 'स्पेशल ' देवर।

हमने थोड़ी देर सांस ली होगी , अपने कपडे ठीक किये होंगे ,बाल्टी में फिर से रंग घोला होगा की दरवाजे पे फिर से खट खट हुयी।

रेहन और नितिन थे , दोनों इनके लंगोटिया यार , इसलिए मेरे 'स्पेशल ' देवर।

रिसेप्शन में इनके सामने ही दोनों ने कहा था , " साले इत्ता मस्त माल ले आया है , हम छोड़ेंगे नहीं" और मुझसे बोला " भौजी , आने दो होली , बचोगी नहीं आप। "

मैं कौन मजाक में पीछे रहने वाली थी , मैंने भी बोला।

" अरे फागुन में देवर से बचना कौन चाहता है , "

पिछली होली मायके में मनी इसलिए मैं बच गयी थी। और मैं जानती थी अबकी ये दोनों छोड़ने वाले नहीं।

दोनों कि निगाह इनके सामने भी मेरे चोली फाड़ जोबन पे रहती थी , और मैं भी कभी झुक के कभी उभार के ललचाती रहती थी।

हम तीन थे और ये दो , लेकिन अमिन समझ गयी की वो पक्का प्लान बना के आये हैं।

नितिन ने चमेली भाभी और नीरा भाभी को उलझाया और बची मैं और रेहन।

मैंने समझती थी कि उससे अकेले पर पाना मुश्किल है , इसलिए मैंने भागने में ही भलाई समझी।

आगे आगे मैं पीछे रेहन।

और मैं स्टोर रूम में घुस गयी.

और यही मेरी गलती थी। ( लेकिन एक मीठी सी गलती)

स्टोर रूम घर के ऐसे कोने में था , जहाँ कुछ भी हो , पूरे घर में उसका अंदाज भी नहीं लग सकता था।

छोटा सा कमरा , वहाँ कुछ पुराने फर्नीचर पड़े थे। आलमोस्ट अँधेरा , बस एक बहुत छोटा सा रोशनदान।

दौड़ते भागते मैं थक गयी थी , कुछ सांस भी फूल गयी थी। मैं एक पुरानी मेज का सहारा लेके झुक के खड़ी थी।

और तब तक दरवाजा बंद होने कि आवाज हुयी , रेहन। वो ठीक मेरे पीछे था।

और जब तक मैं कुछ करती , उसके रंग लगे हाथ मेरे गोरे मुलायम गालों पे थे।

 


गालों पे लाल रंग रगड़ते , रेहन ने चिढ़ाया।

" भाभी मैंने बोला था न की , इस होली में नहीं छोडूंगा। "

" वो देवर असली देवर नहीं है , जो भाभी को होली में छोड़ दे " मैंने भी होली के मूड में जवाब दिया।

वो इस तरह मुझसे पीछे से चिपका था की मैं हिल डुल भी नहीं सकती थी। मेरे दोनों हाथ अभी भी मेज पे थे।

और रेहन का एक हाथ मेरे गोरे चिकने पेट पे था जहाँ वहा काही नीला रंग लगा रहा था।

मेरा आँचल कब का ढलक चूका था और चोली फाड़ जोबन लो कट ब्लाउज से खुल के झाँक रहे थे , रेहन को ललचा रहे थे।

लेकिन रेहन ने ब्लाउज में हाथ डालने की कोशिश नहीं की। पेटे पे रंग रहे उसके हाथ ने बस ब्लाउज के सारे बटन खोल दिए। बड़े बड़े जोबन के चलते ऊपर के दो बटन तो बंद ही नहीं थे , रवी से होली के चक्कर में एक बटन गायब हो चूका था , बस तिन बचे जो रेहन ने खोल दिए

और साथ ही फ्रंट परं ब्रा का हुक भी।

मेरी दोनों रसीली चूंचिया , छलक कर बाहर आ गयीं।

" भाभी जान , होली के दिन भी इन्हे बंद कर के , देवरों से छुपा के रखना एकदम गलत है। "

दोनों जोबन को कस के रगड़ते मसलते वो बोला।

बड़ी बेरहमी से वो मेरी चूंची मसल रहा था। राजीव भी रगड़ते थे लेकिन प्यार से।

पूरी ताकत से , मेरी चूंची वो दबा रहा था , कुचल रहा था , पीस रहा था।

दर्द हो रहा था मुझे मैं हलके हलके चीख भी रही थी।

लेकिन ये मैं भी जानती थी और रेहन भी की अगर में खूब जोर से चिलाउं तो भी घर में नहीं सुनायी पड़ने वाला था और इस समय तो होली का हंगामा , बाहर से लाउड स्पीकर पे होली के गानो की आवाज

, कोई सवाल ही नहीं था।

और अब मुझे उस दर्द में भी एक नया मजा मिलने लगा। एक ऐसा मजा , जिसे मैं आज तक जानती भी नहीं थी।

और उसी समय , रेहन ने पूरी ताकत से मेरे खड़े निपल्स को पुल कर दिया।

दर्द से मैं चीख उठी। " नहीं देवर जी ऐसे नहीं प्लीज लगता है " मैंने बोला।

" " तो क्या भाभी जान ऐसे " उसने दूसरा निपल पहले से भी ज्यादा जोर से पुल किया , और मेरी आँखों से आंसू का एक कतरा , मेरे गालों पे छलक पड़ा

रेहन ने पहले तो उसे चाटा , फिर कचकचा के काट लिया।

" अरे देवर जी क्या करते हो निशाँ पड़ जाएगा। " मैं बोली।

" अरे भाभी जान यही तो मैं चाहता हूँ की आपके इस देह पे आपके देवर रेहन का निशान हर जगह पड़ जाये , जिससे आपको अपने इस प्यारे देवर की याद आती रहे "

और उसी के साथ कचकचा के एक चूंची पे उसने पूरी ताकत से काट लिया और दूसरी पे अपने सारे नाखूनों के निशान गोद दिए।

मजे की बात ये थी कि अब मुझे ये सब बहुत अच्छा लग रहा था।

और साथ उसने एक हाथ से मेरा पेटीकोट और साडी कमर तक उठा दी और अब मैंने ऊपर और नीचे दोनो ओर से नंगी थी।

" अरे होली भाभी से खेलनी है , भाभी के कपड़ों से थोड़े ही खेलनी है। " रेहन बोला।

रंग अब आगे पीछे दोनों और लग रहा था। उसका बल्ज मेरे नंगे चूतड़ों से रगड़ खा रहा था। और रेहन ने मेरा हाथ खीच के अपने बल्ज पे रख के जोर से दबाया ,

" भाभी जान देखिये , कितना रंग है आपके देवर की पिचकारी में ".

मस्ती से मेरी भी हालत ख़राब थी। तब तक रेहन कि जींस सरसराती नीचे गिर गयी और उसका मोटा खूंटा ,

मैंने उसे पकड़ने में थोड़ी आनाकानी कि उसने चार जबरदस्त हाथ मेरे चूतड़ों पे जड़ दिए। फूल खिल आये गुलाबी वहाँ।

मैंने फिर लंड हाथ में पकड़ने की कोशिश की। इतना मोटा था कि मुश्कल से हाथ में समां रहा था , और लम्बा भी खूब।

थोड़ी देर तक वो चूतड़ और चूत के बीच रगड़ता रहा , मस्ती से मेरी आँखे मुंदी जा रही थीं। बस मन कर रहा था चोद दे हचक कर ,

रवी मेरे देवर के साथ मस्ती से हालत खरा ब हो रही थी। उसके पहले सुबह जान का बम्बू देख चुकी थी।

रेहन भी न , अब वो जोर जोर से मेरे बूब्स और क्लिट साथ साथ रगड़ रहा था , बस मन कर रहा था की , लेकिन रेहन को तड़पाने में मुझे मजा आ रहा था।

अंत में उसने मेरे मुंह से कहलवा ही लिया की मैं उससे चुदना चाह रही हं।

लेकिन उसने मुझे नीचे बैठाया और बोला ,

"भाभी जरा पिचकारी को चूम चाट तो लो और लंड से ही जोर से एक बार मेरे गाल पे , चांटे कि तरह लगा.

और मैंने मुंह खोल के उसका सुपाड़ा अंदर ले लिया , और जोर जोर से चूसने लगी।

कुछ ही देर में वो मेरा सर पकड़ के जोर जोर से मेरा मुंह चोद रहा था।

मैं लाख गों गों करतीं रही लेकिन वो हलक़ तक धकेल के ही माना।

मैं भी जोर जोर से चूसतीं रही , और जो वो झडने को हुआ , तो लड पूरा बाहर निकालकर , सारी की सारी मलायी , मेरे चेहरे , बालों पे और रस लगे सुपाड़े को मेरी चूंचियों पे जोर जोर से मसल के लगाया।

"मैंने ये तय किया था कि आप से पहली होली लंड के रंग से ही खेलूंगा " मुस्करा के रेहन ने बोला।

तब तक रोशनदान से मैंने देखा की कुछ औरतों का झुण्ड हमारे घर की ओर आ रहा है।

मैंने रेहन को बोला चलो निकलो लगता है ये सब यही आ रही हैं और फिर मुझे ढूँढ़ेंगीं।

निकळते निकलते रेहन बोला भाभी ये होली का ट्रेलर था , असली होली चुन्मुनिया के साथ खेलनी है , मेरी चूत मसलते हुए बोला।

" अरे देवर जी , अभी तो शाम को होली होनी है , यहाँ तो होली रंगपंचमी तक चलती है , मैं ही कौन छोड़ने वालीं हूँ , आपकी पिचकारी को पिचका के ही दम लुंगी। "

मैंने भी जोर से उसके लंड को दबाते हुए जवाब दिया।

बाहर निकल कर उसका दोस्त मिला , और जिस तरह उसने इशारा किया लग रहा था की , नीरा भाभी के साथ वो 'एक राउण्ड खेल 'चूका है।

इतने देवर आये मैंने गिन नहीं सकती थी।

पड़ोस के लड़के , इनके दोस्त , दूर दराज के रिश्तेदार , बस एक चीज कामन थी ,शायद ही कोई ऐसा देवर बचा हो जिसने मेरे ब्लाउज के अंदर हाथ डाल के जोबन का रस न लिया हो और अपना खूंटा न पकड़वाया हो।

और जो थोड़े बहुत हिम्मती होते थे , वो रामप्यारी को भी सहला देते ऊँगली कर देते। लेकिन मैं , चमेली भाभी और नीरा भाभी के साथ मिल के बराबर का मुकाबला कर रही थी , कितनो के कपडे फटे , अगवाड़े पिछवाड़े हर जगह रंग ही नहीं लगा , कई देवर चमेली भाभी के ऊँगली के भी शिकार हुए।

और देवरों के लंड मुठियाने में नीरा भाभी भी हम लोगों से पीछे नहीं थी।

एक बिचारा छोटा देवर , ८-९ में पढता होगा , नीरा भाभी ने उसकी हाफ पैंट सरका के नीचे कर दी और मुठियाने के साथ उसी से उसकी बहनो को एक से एक गालियां दिलवायी और फिर बोला , " खड़ा मैने कर दिया है , झड़वाना चुन्नी से जा के "

लेकिन उस के निकलने के पहले चमेली भाभी ने उसे निहुरा दिया और मुझसे बोला ,

" कोमल देख , अभी इस साल्ले ने गांड मरवाना शुरू किया है कि नहीं। "

मैं क्यों पीछे रहती , इतना चिकना देवर था। मैंने भी घचाक से एक ऊँगली अंदर की , और बोला

नहीं भाभी अभी तो एकदम कच्ची कली है। "

नीरा भाभी ने मुझे ललकारा , " अरे तो कर दे न निवान साल्ले काओ , अच्छा मुहूरत है। होली के दिन गांड मरवाना शुरू करेगा तो उमर भर के लिए गांडू बनेगा। कितने लौण्डेबाजों का भला करेगा।

अपनी जिठानी कि बात भला मैं कैसे टालती।

लेकिन जो मजा औरतों कि होली में आया वो इससे भी १० गुना था।

न कोई रिश्ते का बंधन , न कोई उमर का लिहाज।

चमेली भाभी की भाषा में बोलूं तो कच्चे टिकोरे वालियों से लेकर बड़े रसीले आमों वाली तक।

ननदों की जो टोली आयी उसमें कुछ फ्राक में थी , कुछ टॉप स्कर्ट में और कुछ शलवार कुर्ते वाली। ज्यादातर कुँवारी थी लेकिन कुछ शादी शुदा भी , साडी में।

एक ननद कि शादी अभी कुछ महीने पहले ही हुयी थी। उसके हस्बेंड कल आने वाले थे। चमेली भाभी ने उसी को धर दबोचा और साडी उठा के सीधे अपनी चूत से चूत रगड़ते हुए बोलीं

" अरे ननदोई नहीं है तो क्या चल भौजी से मजा ले ".

नीरा भाभी ने मुझे एक टिकोरे वाली की और इशारा किया , लाली पड़ोस की थी अभी दसवें में गयी थी।

मैंने उसे पीछे से धर दबोचा और एक झटके में फ्राक का ऊपर का हिस्सा फाड़ के अलग , सफेद ब्रा मेरे लाल रंग के रंगे हाथों से लाल हो गयी और थोड़ी देर में जमीन पे थे।

कस कस के मैंने उसकी चूंची मलते पूछा ,

" क्यों मेरे देवरों से दबवाना अभी शुरू किया कि नहीं "

" नहीं भाभी " शर्मा के वो बोली।

" अरे मैंने तो सूना था कि मेरी सारी ननदें , चौदह की होते ही चुदवाना शुरू कर देती है , और तू ,…चल मैं ही अपने किसी देवर से तेरी सेटिंग कराती हूँ। " और ये कह के मैंने उसकी चड्ढी भी खींच दी।

 
ससुराल की पहली होली-4

झांटें बस आना शुरू ही हुयी थीं। मैंने थोड़ी देर तक तो उस कच्ची कली की मक्खन सी चूत को सहलाया फिर एक झटके में उंगली अंदर पेल दी।

लेकिन तब तक खूब जोर का शोर हुआ , और मैंने देखा की चमेली भाभी के यहाँ बाजी पलट चुकी थी। ५-६ ननदें एक साथ , और अब चमेली भाभी नीचे थीं।

एक शलवार वाली उनकी खुली जांघो के बीच धीमे धीमे एक पूरी लाल रंग कि बाल्टी उड़ेल रही थी। " भाभी अब तोहार चूत की गरमी कुछ शांत होई।

एक शादी शुदा ननद , अपनी बुर उनके मुंह में रगड़ रही थी और दो चार कम उम्र कि ननदे भाभी की चूंचियों पे रंग लगा रहै थी।

और मेरी भी खूब दूरगत हुयी , आखिर नयकी भौजी जो थी।

लेकिन मुझे मजा भी बहुत आया। कोई ननद नहीं बची होगी , ज्सिकी चूत में मैंने उंगली न की हो। और कोई ननद नहीं होगी जिसने मेरी चूंचियों पे रंग नहीं लगाया और चूत नहीं मसली।

लेकिन तबक तक कालोनी से भाभियों की एक टोली आयी और फिर बाजी पलट गयी।

और भाभियों की टोली में एक ग्रूप , ' इन्हे ' ढूंढते हुए , मेरे कमरे में पहुंचा।

बिचारे निर्वस्त्र घेर लिए गए। बस मेरी ब्रा पैटी थी उसी में उन्हें पहना कर भाभियाँ उनके हाथ पैर पकड़ के , घर के पीछे बने एक चहबच्चे में ले जा के डाल दिया। वहाँ पहले से ही रंग कीचड़ सब भरा था।

चार पांच भाभियाँ उसी में उतर गयी और उनकी वो रगडयाइ हुयी कि पूछिए मत। बड़ी देर के बाद जब वो निकल पाये , और मुश्किल से नीरा भाभी ने उन्हें कपडे दिए और साथ में रंग की एक बड़ी सी ट्यूब।

" भौजाइयों के साथ बहुत होली खेल लिए अब जरा अपनी बहन के साथ भी अपनी पिचकारी की ताकत जा के दिखाओ और हाँ ये पेंट की ट्यूब ले जाओ उस मीता छीनार की चूंचियों पे जम के लगाना और बोलना शाम को जरूर आये। "

उनकी जान बची और वो भागे।

मैं भी छत पे ऊपर चली गयी।

करीब बारह बज रहा था और चार घंटे से लगातार , होली चल रही थी। थोड़ी देर के अल्प विराम के लिए मैं छत पे चली गयी

और छत पहुँच के घर के बाहर का होली का हंगामा देखने को मिला।

क्या नजारा था।

बगल कालोनी लड़कियों औरतो की होली चल रही थी। रंग से सराबोर कपडे , देह से चिपके , सारे कटाव उभार दिखातीं , ललचाती।

जो कभी जरा सा दुपट्टे के सरकने पे परेशान हो जाती थीं , वो आज जवानी के सारे मंजर दिखा रही थीं। उभरती चूंचिया , भरे भरे चूतड़ , सब कुछ शलवार , साडी से चिपक के जान मार रहा था। लेकिन एक तेज शोर ने मेरा ध्यान सड़क की खींचा।

ढेर सारे हुरियारे , एक ठेले पे माइक लगाए शोर मचाते , टीन , कनस्तर , ढोल बजाते , कबीर गाते , गन्दी गन्दी गालियां , और वो भी मोहल्ले की औरतों का नाम ले ले के , और बीच बीच में जोर जोर से नारे लगाते ,

ये भी बुर में जायेंगे लौंडे का धक्का खायँगे

होलिका रानी ज़र गयीं , बुर चोदा , ई कह गयीं।

और सबसे मजेदार था एक आदमी जो सबसे आगे था और गधे पे बैठा था और जोर जोर से गालियां दे रहा था।

कुछ औरतें घर की छतों पर से उन पर बाल्टी , पिचकारी से रंग फ़ेंक रही थी और उन औरतों का नाम ले ले के वो एक से एक गन्दी गालियां दे रहे लेकिन वो सब मजे ले रही थीं

अचानक की उस हुजूम ने मुझे उन्हें देखते हुए देख लिया। फिर तो तुफान मच गया।

ले गाली ले गाली ,

अरे कोमल भौजी , खोला केवाड़ी , उठावा तू साडी ,

तोहरी बुर में चलायब हम गाडी

और फिर कबीर,…

चना करे चुरमुरुर , चिवड़ा मचामच अरे चिवड़ा मचामच ,

अरे कोमल भौजी टांग उठावा , अरे चोदब घचागच , अरे चोदब गचागच।

हो कबीरा सारर साररर , खूब चली जा हो खूब चली जा

एक पल के लिए मैंने सोच हट जाऊं , लेकिन होली की मस्ती मुझे भी पागल कर दे रही थी।

जैसे ही वो गधे वाला मेरी छत के सामने से निकला , मैंने रंग भरे गुब्बारे एक के बाद एक उन सबो पे मारे और उधर से भी पिचकारी की बौछार सीधे मेरी चोली पे ,

जाते जाते वो बोला , " अरे भौजी , तानी चोली का गुब्बारा दा न

औ दो गुबारे भीगे देह से एकदम चिपके ब्लाउज से रगड़े और उस के पिछवाड़े दे मारा

" हे भौजी , तनी चोली क गुब्बरवा हमहुँ के दे देती न " पीछे से जोरदार बाहों ने सीधे मेरे कहा।

मुड़ कर देखा तो और कौन, मेरा फेवरिट देवर जान

स्ट्रांग , मैनली , मस्क्युलर , जिम टोंड सिक्स पैक्स ,

जोर से उसने अपनी बांहो के नागपाश में भींच लिया और मेरे गालो पे चुम्बन के गुलाब खिलाता बोला ,

मैंने सोचा आज तो पास से हैप्पी होली बोल दूँ।

कुछ नाराजगी , कुछ मुस्कान के साथ मैंने उसे मुड़ के देखा।

सिर्फ एक टी शर्ट और छोटे से बाक्सर शार्ट में वो ,

" हे कोई देख लेगा तो और आये कैसे "

' अरे भौजी घबड़ाओ मत , छत का दरवाजा मैंने बंद कर दिया है , और वैसे भी नीचे आँगन में जो उधम है आधे एक घंटे तक किसी को आपको सध लेने की फुरसत नहीं होगी। और जहाँ तक आने का सवाल है , सिम्पल छत लांघ के "

 


मैंने मुड़ के देखा। सच में सीढ़ी से छत का दरवाजा बोल्ट था , और छत पे आने का यही रास्ता था। नीचे आँगन से होली के उधम की जोरदार आवाजें आ रही थीं / कालोनी के औरतों लड़कियों की टोली आ गयी थी और आधे घंटे से ज्यादा ही धमाल होना था।

राजीव भी एलवल गए थे , मीता के यहाँ होली खेलने। उन्हें भी एकघंटे तो लगना ही था।

फिर मैंने जान की बालकनी की और देखा , इतना आसान भी नहीं था। देवर ने बड़ी हिम्मत दिखायी थी फगुए का नेग बनता ही था।

मैं मुस्करा दी।

बस इससे बड़ा ग्रीन सिग्नल और क्या हो सकता था।

जान के ताकतवार हाथो का प्रेशर मेरे ब्लाउज से छलकते बूब्स पे दूना हो गया।

और होली चालू हो गयी।

मेरा ब्लाउन वैसे ही बहुत टाइट लो कट था , उपर के दो बटन मैंने खोल रखे थे , मेरी बड़ी बड़ी चूंचियों को उसमे समाने के लिए।

एक बटन रवि से होली खेलने के समय टूट गया और अब सिर्फ नीचे के दो बटनो के सहारे मेरे गद्दर जोबन थोडा बहुत ढंके थे।

और वैसे भी मेरी ब्रा और पेटीकोट दोनों नीचे ननदो से होली खेलते समय ही उतर गए थे।

अब मैंने सिर्फ साडी ब्लाउज में थी और दोनों देह से चिपके रंगो से भीगे।

जान की मरदाना , तगड़ी उंगली मेरे भीगे उरोजो से चिपकी हुयी थी , उसे दबोच रही थी दबा रही थी

और साथ ही उसका मोटा खूंटा , शार्ट फाड़ता , मेरी गीली बड़े बड़े चूतड़ों से चिपकी साडी के बीच गांड की दरार में धक्के मार रहा था।

नीचे मेरी ननदों ने जो भांग पिला दी थी , कुछ उस का असर और कुछ जो सड़क पे हुरियारे गालियां दे रहे थे उनका असर ,

मैं भी सीधे गालियों पे उतर आयी।

जान का एक हाथ अब ब्लाउज के अंदर था , वो मेरी चूंची दबा रहा था , मसल रहा था , निपल पिंच कर रहा था।

अपना मोटा लंड मेर्री गांड पे रगड़ते उस ने पूछा , " क्यों भाभी डाल दूँ " और मैं चालु हो गयी।

" अरे साल्ले , हरामी के जने , छिनार के , भोंसड़ी के , होली में भौजाई के वो तो वैसे नहीं डालेगा , तो क्या अपनी, … मेरी सास ननद की बुर में डालेगा , भँड़वे , वो तो वैसे ही रोज शाम को कालीनगंज ( रेड लाइट ऐरिया मेरी ससुराल का ) वहाँ जोबन की दूकान लगा के बैठती हैं "

इसका नतीजा वही हुआ जो मैंने सोचा था , अगले झटके में ब्लाउज के बाकी दोनों बटन खुले और ब्लाउज छत पे था।

और जान के हाथों पे लगा गाढ़ा लाल रंग जोर जोर से मेरी चूंचियो पे

अब तक सुबह से दरजन भर से ज्यादा देवर मेरी चूंची मर्दन कर चुके थे , लेकिन जो जबदस्त रगड़ाई ये कर रहा था , दोनों हाथो से , लग रहा था जैसे कोई चक्की चल रही हो जो मेरे उभारों को कुचल के रख दे ,

ताकत के साथ तरीके का का भी अद्भुत मिश्रण था ,

होली में मैं मैं क्यों पीछे रहती , और रंग भरे गुब्बारे तो रखे ही थे ,

मैंने झुक के एक उठाया , पीछे हाथ कर के जान की शार्ट सरकाई और सीधे लाल रंग का गुब्बारा उसके 'खूंटे ' पे फोड़ दिया।

लाल भभूका, और शार्ट पैरों पे। देवर भाभी की होली हो और देवर का काम दंड कैद रहे यह कोई भाभी कैसे देख सकती है।

लेकिन जान भी तो मेरे देवर था उसने साडी उठा के बस मेरे कमर में छल्ले की तरह फंसा दिया और अब एक हाथ मेरे फेवरट देवर का मेरी चूंची रगड़ रहा था और दूसरा मेरा चूतड़।

असल में मेरे सारे देवर मेरी चूंचियों के साथ मेरे भरे भरे चूतड़ों के भी दीवाने थे और इसे तो मैंने ललचाने , चिढ़ाने के लिए अक्सर इसे दिखा के अपने नितम्ब मटका देती थी।

एक गुब्बारे से तो मेरे देवर का काम चलता नहीं , इसलिए झुकी हुयी मैंने दूसरा बैंगनी रंग का गुब्बारा उठाया और फिर उसके लंड पे सीधे दबा के और अबकी जो रंग बहा तो वो हाथो में पॉट के मैंने देवर के लंड को मुठियाना शुरू कर दिया।

कित्ती मुश्किल से मेरी मुट्ठी में आ पाया वो।

आज होली में जोनाप जोख की थी मैंने , उसमें मेरे इस देवर का साइज २० नहीं बैठता था। बल्कि पूरा २२ था।

रंग लगाते हुए एक झटके में मैंने सुपाड़ा खीच के खोल दिया , मोटा , पहाड़ी आलू ऐसा , एकदम कड़ा।

मैंने छज्जे पे झुकी थी ही , जान ने टाँगे फैलायीं और सीधे सुपाड़ा मेरी चूत के मुंह पे .

सुबह से चूत में आग लगी थी।

एक तो मैंने राजीव को रात में एक बार मुंह से झाड़ दिया था और उसके बाद सुबह से पहले तो रवी के साथ मस्ती , फिर रेहन और देवर नन्द , लेकिन चूत की खुजली बढती ही जा रही थी। कितने देवरों ननदों ने उंगली की लेकिन झड़ने के पहले ही,…

मस्ती से मेरी आँखे बंद थी , चूंचियां पत्थर हो रही थीं , निपल भी एकदम कड़े हो गए थे ,… और मैंने अपनी चूत उस के सुपाड़े पे रगड़ना शुरू कर दिया।

जान भी न , बजाय आग बुझाने के और आग भड़काने में लगा था , एक हाथ जोर जोर से चूंची मसल रहे थे , दूसरा क्लिट रगड़ रहा था।

मैंने फिर गालिया बरसानी शुरू कि ,

" अरे डालो न क्या मेरी ननदो के लिए बचा रखा है "

और एक झटके में मेरे देवर ने मूसल पेल दिया , पूरा सुपाड़ा अंदर और मैं बड़ी जोर से चिल्लाई

" साल्ले अपनी, .... भोंसड़ा समझ रखा है क्या , जरा आराम से कर न "

जिस तरह से लंड रगड़ता , दरेरता , घिसटता मेरी बुर में घुसा , दर्द से जान निकल गयी लेकिन मजा भी खूब आया।

जान ने सुपाड़े तक लंड निकाला और फिर गदराये चूतड़ों को पकड़ के ऐसा हचक के धक्का मारा की फिर जान निकल गयी।

मेरे निपल्स उमेठते उसने छेड़ा ,

" अरे भौजी होली में जब तक भाभी क बुर भोंसड़ा न बन जाय तब तक चुदाई का कौन मजा "

जिस तरह से लंड रगड़ता , दरेरता , घिसटता मेरी बुर में घुसा , दर्द से जान निकल गयी लेकिन मजा भी खूब आया।

जान ने सुपाड़े तक लंड निकाला और फिर गदराये चूतड़ों को पकड़ के ऐसा हचक के धक्का मारा की फिर जान निकल गयी।

मैं छज्जे को खूब जोर से पकड़ के झुकी थी।

मेरी साडी बस एक पतले से छल्ले की तरह मेरे कमर में फँसी , अटकी थी। ब्लाउज तो कब का साथ छोड़ चूका था मेरे दोनों मस्त कड़े कड़े रंगों से रँगे , पुते उरोज भी झुके थे और मेरा पडोसी देवर , एक के बाद एक धक्के पे धक्के मारे जा रहा था। और थोड़ी ही देर में सुपाड़ा सीधे मेरी बच्चेदानी पे ठोकर मार रहा था। हर ठोकर के साथ मैं गिनगिना उठती।

मैं चीख रही थी , सिसक रही थी , सिहर रही थी , अपने देवर के पूरे खानदान को एक से के गालियाँ दे रही थी।

लेकिन उससे और जोश में आके उसके चोदने की रफ्तार दुगुनी हो रही थी।

मेरे दोनों हाथ तो छज्जे को पकडे हुए थे , उसे जोर से भींच रहे थे , लेकिन , मैं ,कभी चूतड़ से धक्के का जवाब धक्के से , और कभी कसी संकरी बुर में उसके मोटे मूसल को निचोड़ के , जवाब दे रही थी।

चुदाई की रफ्तार खूब तेज हो गयी थी और तभी , उसने मेरे क्लिट को जोर से पकड़ के रगड़ दिया , और मैं पत्ते की तरह कांपने लगी।

मैं तेजी से झड रही थी। जैसे कोई खूब बड़ी सी पिचकारी में रंग भर के एक झटके में छोड़ दे ,…छ्र्र्र्र्र छ्र्र्छ्र्र्र्र,… बस उसी तरह

और उपर से मेरे दुष्ट देवर ने आग में धौंकनी चला दी। झुक के वो मेरे निपल्स जोर ज्जोर से चूसने लगा , हलके से बाइट कर दिया ,

मस्ती से मेरी आँखे मुंदी जा रही थी बिना रुके मैं बार बार झड़ रही थी।

धीरे धीरे उसने फिर से धक्के की रफ्तार बढ़ायी , मेरी थकान कम हुयी और मैं फिर पूरे जोश में चुदाई का मजा ले रही थी , उसी तरह छज्जे पे झुके डागी पोज में

तब तक सड़क पे फिर कुछ हुरियारों का शोर सुनायी पड़ा और लंड अंदर घुसेड़े , मुझे उठा के वो छज्जे से दूर छत पे ले गया और मुझे दुहरा कर के फिर चुदाई शुरू कर दी.
 
ससुराल की पहली होली-5

तब तक सड़क पे फिर कुछ हुरियारों का शोर सुनायी पड़ा और लंड अंदर घुसेड़े , मुझे उठा के वो छज्जे से दूर छत पे ले गया और मुझे दुहरा कर के फिर चुदाई शुरू कर दी.

मुझे उसने आलमोस्ट दुहरा कर दिया था और हुमक हुमक कर चोद रहा था।

उसका घोड़े जैसा लंड चूत फाड़ते , चीरते सीधे बच्चेदानी पे धक्का मार रहा था। साथ ही लंड का बेस क्लिट पे रगड़ खा रहा था।

" पह्ले तो मैं सोचती थी सिर्फ मेरी सास ने ही , लेकिन अब लगता है की मेरी ससुराल की सारी औरतों ने गदहों , घोड़ों से घूम घूम के चुदवाया है , तभी तो ये गदहे , घोड़े जैसे लंड वाले लड़के जने । "

देवर की चौड़ी छाती पे अपनी चूंची पे लगा सारा रंग लपेटते , लगाते , जोर से उसकी पीठ पकड़ कर अपनी भींचते हुए मैंने चिढ़ाया।

जवाब जॉन के बित्ते भर के लंड ने दिया। आलमोस्ट निकाल के उसने एक ही धक्के में पूरा पेल दिया।

मेरी जान आलमोस्ट निकल गयी और देवर ने बोला "

अरे भाभी न होता तो आपको होली का मजा कैसे देता "

बात उसकी एकदम सही थी।

मैं भी मस्ती में चूतड़ उठा उठा के चुदा रही थी , बिना इस बात का ख्याल किये की मैं नीले गगन के खुली छत पे चुदा रही हूँ।

साथ में उसने फिर जोर जोर से मेरी चूंची मसलनी शुरू कर दी और एक निपल उसके मुंह में था।

मैं एक बार फिर झड़ने के कगार पे थी।

हाँ देवर जी और जोर से उह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह आह क्या मजा, जॉन प्लीज ,…ऱुको मत ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह "

और जैसे ही मैं झड़ने लगी , उसने चुदायी और तेज कर दी। उसकी भी आँखे मुंदी जा रही थी।

और थोड़ी देर में मेरे उछलते गिरते चूतड़ों की थाप पर , सुर ताल पे ,

उसकी मोटी लम्बी पिचकारी ने रंग फेकना शुरू कर दिया।

गाढ़ा थक्केदार , रबड़ी , मलायी की तरह सफेद बिना रुके ,

और मैं चूतड़ उठा उठा के रोपती रही , लीलती रही , घोंटती रही ,… और फिर थक के लेट गयी।

लेकिन तब भी मेरे देवर कि पिचकारी ने रंग फेकना जारी रखा , होली का असली रंग जिसकी प्यास मेरी बुर को सुबह से थी।

और जब उस ने लंड बाहर निकाल तो भी , खूब मोटा कड़ियल ,

मैंने साडी ठीक की। छत पर गिरा ब्लाउज उठा के पहना , बटन तो सारे टूट गए थे , लेकिन तभी उसने रोक दिया ,

और मेरी खुली चूंचियों पे चेहरे पे अपने सुपाड़े पे लगे वीर्य को रगड़ मसल दिया। क्या मस्त महक थी।

मैंने उसे साफ करने की कोशिश की तो उसने मन कर दिया , नहीं भाभी , होली कि निशानी।

लाल , बैंगनी , नीले , रंगो के ऊपर गाढ़ा सफेद थक्केदार ,…

देवर की बात ,… मैं कौन होती थी टालने वाली। चून्चियों के ऊपर ब्लाउज बस लपेट लिया।

मैं ने आंगन की और देखा तो वहाँ होली का हंगामा ख़तम हो चूका था। बस दो चार लड़कियां बची थी , वो भी अब जा रही थीं।

मैं चलने को हुयी तो जान ने एक बार फिर पीछे से पकड़ लिया ,

" भाभी , आप को पीछे से देखता हूँ तो बस यही मन करता है इस कसर मसर करती गांड को मार लूँ "

मैंने अपनी गांड उसके शार्ट से झांकते , मोटे लंड पे कस के रगड़ दिया और मुस्करा के बोली ,

" अरे देवर जी अभी कौन सी होली ख़तम हुयी है। होली कि शाम बाकी है , फिर यहाँ तो होली पांच दिन चलती है। और मैं कौन सा गांड में ताला डाल के

रखूंगी। भौजाई तुम्हारी तो उसकी सब चीज तुम्हारी। "

और उसे दिखा के एक एक बार जोर से गांड मटकाई , और सीढ़ियों से धड़ धडाती हुए नीचे चल दी।

मैं सोच रही थी अभी , थोड़ी देर पहले मेरी एक ननद आयी थी , उसकी शादी भी मेरे साथ ही हुयी थी। उसकी पिछले साल पहली होली ससुराल में मनी।

वो बोल रही थी ,

" भाभी , पहली होली में ही मैंने 'हैट ट्रिक ' कर ली। सुबह सबसे पहले मेरे नंदोई ने होली खेलते हुए ही नंबर लगा दिया। फिर इनका एक कजिन देवर , छोकरा सा , इंटर में पढता था , और शाम को इनके एक फ्रेंड ने। रात में तो ये इन्तजार में थे ही "

मैं सोच रही थी चलो मेरा भी ससुराल की पहली होली का खाता तो खुल ही गया।

गनीमत थी नीरा भाभी किचेन में थी और , चमेली एक बार फिर से बाल्टी में रंग घोल रही थी।

मैं चुपके से आँगन में पहुँच गयी।

चमेली भाभी मुझसे कुछ पूछतीं , उसके पहले दरवाजा खुला और रंगे पुते ,मेरे 'वो ' राजीव दाखिल हुए , अपनी ममेरी बहन मीता के यहाँ से होली खेल कर।

' क्यों डाल आये मीता की बिल में , मजा आया " नीरा भाभी , मेरी जेठानी ने अपने इकलौते देवर को चिढ़ाया।

वो कुछ जवाब देते उसके पहले उनके कान में मैं फुसफुसाई ," नीरा भाभी और चमेली भाभी को छोड़ियेगा मत। देवर के रहते , होली में भाभी अनचुदी रह जाय बड़ी नाइंसाफी है। और फिर पिछले साल आप ने मेरी भाभी का भी तो अगवाड़ा पिछवाड़ा , कुछ भी नहीं छोड़ा था। "

मुस्करा के उन्होंने नीरा भाभी को पकड़ा और जब तक नीरा भाभी कुछ समझे उनका आन्चल , राजीव के हाथ में था और अगले झटके में पूरी साडी।

कुछ ही देर में चोली और ब्रा का भी वही हश्र हुआ।

लेकिन चमेली भाभी थी न , मेरी जेठानी का साथ देने। उन्होंने पल भर में राजीव के कपडे उतार फेंके।

लेकिन मैं थी न अपने पति का साथ देने वाली।

मैंने चमेली भाभी की साडी खींच दी और अगला झपट्टा ब्लाउज पे मारा। ब्रा उन्होंने पहना ही नहीं था और पेटीकोट ननदो ने न सिर्फ उतारा था बल्कि चिथड़े चिथड़े कर के फ़ेंक दिया था।

और जब मैंने मुड़ के नीरा भाभी की ओर देखा तो वो रंगो के बीच गिरी पड़ी थी और मेरे पति और उनके देवर , अपनी भौजाई के दोनों गदराये , बड़े बड़े खुले उरोजों को रंग से , रंगने में लगे थे।

अगले ही पल मेरी जेठानी की लम्बी गोरी टाँगे उनके कंधे पे , और उनकी फैली दूधिया जांघो के बीच में वो,… .एक धक्के में उनका बित्ते भर का लंड उनकी भाभी की रसीली बुर में ,…

और उधर चमेली भाभी अब मेरे पीछे पड़ गयीं। पल भर में मेरी साडी उनके हाथ में थी। पेटीकोट ब्रा तो ननदो ने कब का उतार दिया था , और ब्लाउज के बटन जान ने तोड़ दिए थे। मैं भी अब नीरा भाभी और चमेली भाभी की हालत में आ गयी थी। उन्होंने मुझे ललकारा

" जब तक तेरा साजन नीरा भाभी पे चढ़ाई कर रहा है , मैं तुम्हे मजा चखाती हूँ। "

चमेली भाभी से जितना आसान नहीं था। जल्द ही मैं उनके नीचे थी। उनकी 38 डी डी साइज की बड़ी बड़ी छातियाँ मेरी चूंचियों को रगड़ रही थी और बुर मेरे चूत पे घिस्से मार रही थी। मैं कौन पीछे रहने वाली थी।

कैंची मार के अपनी लम्बी टांगो से मैंने चमेली भाभी की पीठ जोर से दबोच ली और मैं भी नीचे से अपनी चूत उनकी बुर से रगड़ने लगी। और हम लोगों की 'लेस्बियन रेस्लिंग' देख के ' उनका जोश और बढ़ गया।

अपनी भौजाई को आँगन में हुमच हुमच कर चोदते हुए वो बोले ,

" भाभी आपका तो पिछले साल का भी उधार चुकाना है " ( पिछले साल की होली में वो मेरे मायके में थे )

और मेरी जेठानी भी कम नहीं थी। उनके हर धक्के का जवाब चूतड़ उठा उठा के दे रही थी जैसे न जाने कितनी बार उनसे चुद चुकी हों।

नीचे से जोर से धक्का लगाते वो बोली ,

" अरे देवर जी आपके लिए एक बढ़िया इनाम है ", .

खुश होके उत्सुकता से उन्होंने पूछा

" क्या है भाभी , बताइये न "

" एक मस्त माल है , एकदम कच्ची कली , उठता हुआ अनछुआ जोबन , जांघो के बीच गुलाब की पंखुड़िया "

" नाम तो बताइये न " सोच के ही उनका मन खराब हो रहा था।

" सिर्फ इस शर्त पे नाम बताउंगी , की तुम ना सिर्फ उसकी लोगे बल्की खूब हचक हचक के चोदोगे। " मेरी जेठानी ने और आग लगायी।

" हाँ भाभी हाँ पक्का , नेकी और पूछ पूछ " वो बोले।

" मेरी ननद , तेरी ममेरी बहन और जिल्ला टॉप माल , मीता। एक बार चोद लोगे तो बार बार मांगोगे " हँसते हुए उनके साइन पे अपनी चूंचियों को रगड़ते मेरी जेठानी ने चिढ़ाया।

फिर तो ऐसी धकापेल चुदाई उन्होंने शुरू की…

उसी बीच मैंने चमेली भाभी साथ बाजी पलट दी थी।

अब मैं ऊपर थी और वो नीचे।

और मेरे हाथ में गुलाल भरा एक बड़ा सा कंडोम था जो , जब तक चमेली भाभी सम्हले , घचाक से मैंने उनकी बुर में पेल दिया।

मैंने राजीव ओर देखा और हम दोनों मुस्कराये।

अब हम दोनों जैसे बद कर , एक टेम्पो में हचक हचक चोद रहे थे थे।

वो अपनी भौजाई और मेरी जेठानी , नीरा भाभी को और मैं चमेली भाभी को , गुलाल भरे कंडोम डिल्डो से।

चमेली भाभी भी चूतड़ उछाल उछाल के मजे ले रही थीं और थोड़ी देर में वो तेजी से झड़ने लगी।

और यही हालत बगल में नीरा भाभी की हुयी। उनके झड़ने के साथ ही उनके देवर और मेरे ' वो ' भी तेजी से झड़ने लगे। मेरी जेठानी की बुर गाढ़ी सफेद थक्केदार , मलायी से भर गयी। यही नहीं राजीव का सफेद वीर्य , बुर से निकल कर उनकी दोनों जांघो पर भी बह रहा था।

दोनों निशचल पड़े थे।

मैंने राजीव से कहा ,

" अरे मेरी जेठानी की चूत को साफ कौन करेगा ".

राजीव से दूबारा बोलने कि जरूरत नहीं पड़ी। अपनी रसीली भाभी की दोनों जांघो को उन्होंने फैलाया और सेंटर में मुंह लगा के

लप लपालप , लप लपालप वो चाटने लगे। जैसे कोई मस्त रसमलाई चाट रहे हों। वो चाट रहे थे चूस रहे थे और बीच बीच में अपनी भाभी की गीली बुर में जीभ की नोक डाल के जुबान से चोद भी रहे थे।

मस्ती से चूर नीरा भाभी , नीचे से चूतड़ उछाल रही थीं , सिसक रही थी और उनका सर अपनी बुर पे पकड़ जोर जोर से रगड़ रही थीं।

और इस का असर राजीव के मस्त खूंटे पे भी हुआ। वो फिर से अंगड़ाई लेने लगा।उ

सका गोल मटोल , थोडा सोया थोडा जागा , लीची सुपाड़ा देख के मुझसे नहीं रहा गया और मेरे मुंह में भी पानी आने लगा।

उधर चमेली भाभी , वो भी उठ के बैठ गयी थीं। उन्होंने मुझे आँख मारी , अपनी मझली ऊँगली , तर्जनी के ऊपर रखी और अचानक दोनों ऊँगली , राजीव की गांड में पेल दी

मैं चमेली भाभी का तरीका ध्यान से देख रही थी। दोनों ऊँगली एक के ऊपर एक आराम से घुस गयीं , और अब उन्होंने दोनों उँगलियों को अलग किया गोल गोल गांड में घुमाया और फिर कैंची की फाल की तरह फैला दिया और सटासट आगे पीछे करने लगी।

इस का असर सीधे राजीव के लंड पे पड़ा और अब वो पूरी तरह तन के खड़ा हो गया।

मेरे लिए अपने को रोकना अब मुश्किल हो रहा था। मैंने उनके मोटे सुपाड़े को मुंह में भर लिया और लगी चुभलाने , चूसने।

थोड़ी देर तक ऐसे ही चलता रहा।

चमेली भाभी अब तीन उंगली से अपने देवर की गांड मार रही थी। उनके देवर और मेरे वो , अपनी भाभी की बुर चूस चाट रहे थे और मैं उनका लंड चूस रही थी।

चमेली भाभी ने पैंतरा बदला और फिर मेरी बुर पे हमला किया। उँगलियों से उन्होंने मेरी बुर को फैला रखा था और जोर जोर से चूस चाट रही थी। साथ में हलके से क्लिट को भी वो बाइट कर लेतीं।

लेकिन मैं भी , हाईस्कूल से बोर्डिंग में थी और ११वी से लेकर कालेज तक इस खेल में चैम्पियन थी।

थोड़ी देर में हम दोनों फिर 69 कि पोजिशन में थे , मैं ऊपर और वो नीचे.

और अपनी मस्ती में हम लोगो ने ध्यान नही दिया की नीरा भाभी , मेरे उनके चूत चाटने से कब झड गयीं।

वो और राजीव मेरे और चमेली भाभी के बगल में आके बैठ गए। राजीव का लंड एकदम तना , टनटना रहा था।

चमेली भाभी की चूत चाटते , चूसते मैंने दोनों हाथों से चमेली भाभी की जांघो को फैलाया और राजीव को इशारा किया।

बस फिर क्या था। राजीव का मोटा लंड चमेली भाभी की चूत में था और ऊपर से मैं चमेली भाभी की क्लिट चूस , चाट रही थी।

वो पहले ही एक बार मेरी जेठानी की बुर में झड़ चुके थे , इसलिए उन्हें टाइम तो लगना ही था।

जैसे कोई धुनिया रुई धुनें , बस उस तरह वो चमेली भाभी की चूत चोद रहे थे। और चमेली भाभी भी चूतड़ उठा उठा के जवाब दे रही थीं।

बहुत देर कि चुदायी के बाद दोनों देवर भाभी साथ झड़े।

 
ससुराल की पहली होली-6

फिर हम लोग नहा धो के फ्रेश हुए , होली का रंग तो एक दिन में छूटने वाला नहीं था।

खाना खाते समय मैने अपनी जेठानी से पुछा ,

" क्यों भाभी , होली हो ली। "

" अभी कहाँ , शाम की होली तो और जबरदस्त होगी। और अभी तो इनका मस्त माल , हमारी छिनार ननद मीता शाम को आएगी। जम के लेनी है उसकी। "

फिर मेरी जेठानी ने राजीव को छेड़ा ,

" क्यों देवर तो होली में उद्घाटन करवा दूँ , आपसे। आखिर कोई न कोई तो लेगा ही। "

वो बिचारे झेंप के रह गए।

थोड़ी देर की नींद के बाद मैं शाम को उठी।

और थोड़ी देर में हमारी ननद और इनकी मस्त माल कम ममेरी बहन , मीता आयी।

मस्त खूब टाइट चिपका , सारे उभार कटाव दिखाता पीला टॉप , छोटी सी काली स्कर्ट ,

मक्खन सी चिकनी गोरी गोरी जांघ दिखाती , ललचाती। काली कजरारी बड़ी बड़ी सी आँखे , गोरे गुलाबी भरे भरे गाल , रसीले होंठ , और सबसे बढ़कर टाइट टॉप में मुश्किल से बंद , टेनिस बॉल्स के साइज के किशोर बूब्स जिसमें सिर्फ उभार और कटाव ही नहीं दिख रहा था , बल्कि निपल्स भी हलके हलके दिख रहे थे।

चेहरे पे एक भोलापन लेकिन साथ में आँखों में एक निमंत्रण ,…और देह पे आती हुयी जवानी के सारे निशान ,

मैंने उसे जोर से से अपनी बाँहों में भींच लिया और अपनी बड़ी 36 डी साइज जोबन से उसके छोटे छोटे किशोर उभारों को दबाने , रगड़ने लगी, और छेड़ा ,

" रास्ते में कुछ छैले मिल गए थे क्या ननद रानी , जो इतना टाइम लग गया। "

" अरे हमारी ननद को देख के तो इसके मोहल्ले के गदहों का लंड खड़ा हो जाता है , तो बिचारे छैलों कि बात ही क्या है "

चमेली भाभी ने चिढ़ाया।

मेरा एक हाथ उसकी पीठ पे ब्रा स्ट्रैप को सहला , हलके से खीच रहा था और उसके कंधे पे हाथ रख के मैंने उसे ऊपर छत पे बेडरूम में सीधे ले गयी , और समझाया

" सुन यार नीचे अभी थोड़ी भीड़ है , वो कालोनी की ,… तो जरा मैं उनको निपटा के आती हूँ। तब तक तुम जरा ,....'

" एकदम भाभी , मैं कहीं जाने वाली नहीं हूँ। हाँ मैंने सूना है सुबह होली में आप लोगों ने खूब कपडे फाड़े सबके " मुझे बांहो में ले , वो किशोर सुनयना , मुस्करा के बोली।

चमेली भाभी को तो मौका चाहिए था , उन्होंने उसके गाल पे पिंच कर के कहा ,

" अरे ननद रानी , उनके तो कपडे ही फाड़े थे , आपका देखिये क्या क्या फटता है "

" भाभी , आप भी न , अरे ये बिचारी तो आयी ही डलवाने है। पहले जरा ननद रानी को कुछ खिलाइये , पिलाइये , फिर डालने डलवाने का काम तो होता ही रहेगा। " मैंने चमेली भाभी को बोला।

कुछ ही देर में , मेरा इशारा समझ के चमेली भाभी , गुझिया की प्लेट और ठंडाई का ग्लास ले आयीं। ये कहने की जरूरत नहीं की दोनों में भांग की डबल डोज पड़ी थी।

मैंने एक गुझिया अपने हाथ से उसके मुंह में डाला और बोला , " ये ठंडाई भी पी ले साथ में सट से गटक जायेगी। "

चमेली भाभी नीचे पडोसिनो को सम्हालने चली गयी थीं।

बिस्तर पे कुछ मस्तराम की किताबें पड़ी थी, सचित्र। मीता की निगाहें बार बार वहीँ जा रही थीं।

मैंने उसे उठा के एक किताब दे दिया और बोली " असल में तुम्हारे भैया की ये फेवरिट किताबे हैं , हम साथ साथ पढ़ते है और प्रैक्टिस भी करते है। अब तू भी बड़ी हो गयी है ले पढ़। "

किताब खोलते ही जो उसने पढना शुरू किया , उसके आँखों की चमक बता रही थी की क्या असर हो रहा है।

मैंने टीवी भी खोल दिया , उसमें पहले से ही एक ब्ल्यू फ़िल्म की सीडी लगी हुयी थी।

"तू य किताबे पढ़ , टी वी देख बस मैं १० मिनट में उन सब को निपटा के आती हूँ " मैंने बोला।

तब तक फ़िल्म शुरू हो गयी। एक जोड़ा चुम्मा चुम्मी कर रहा था। फिर लड़की के होंठ धीरे धीरे नीचे आये और पहले तो उसने बल्ज को होंठो से रगड़ा , और जिपर खोल दिया। स्प्रिंग कि तरह बड़ा लम्बा और मोटा लंड झटके से बाहर निकल आया। मीता की आँखे टी वी स्क्रीन पे चिपकी थीं।

लड़की ने पहले तो एक हाथ में पकड़ के लंड को आगे पीछे किया और फिर अपने होंठो के जोर से सुपाड़ा खोल दिया।

क्या मस्त मोटा सुपाड़ा था , मुश्किल से के मुंह में घुस पाया। लेकिन वो सपड़ सपड़ उसे चाटे चूसे जा रही थी।

तभी एक और लड़की आयी और उसने पहली वाली की स्कर्ट उठा के उसकी गुलाबी चूत चूसनी शुरू कर दी। यहाँ तक की उसकी चूत की दोनों फांको को फैला के अपनी जुबान अंदर घुसेड़ दी और जीभ से ही चोदने लगी।

मैं कनखियों से मीता पर उसका असर देख रही थी। उसके किशोर उरोज और पथरा रहे थे। अब टॉप से उस के कबूतरों की चोंचें झाँकने लगी थी। मेरी सेक्सी ननद की साँसे भी लम्बी हो रही थी।

वो हलके से बोली , " भाभी ".

मैं उठी और उससे कहा ,

" अरे अभी तो फ़िल्म शुरू हुयी है है। , तू ये गुझिया भी ख़तम कर दे तो मैं प्लेट ले जाऊं। निगाहें उसकी अभीः भी टीवी पर थीं , चेहरे से मस्ती झलक रही थी। बिना कुछ सोचे उसने गुझिया उठा के खा ली और मैं प्लेट ले के बाहर निकल आयी। मैंने बाहर से दरवाजा न सिर्फ बंद किया बल्कि बोल्ट भी कर दिया।
 


दो गुझिया और ठंडाई यानी स्ट्रांग भांग की तीन बड़ी बड़ी गोलियां अंदर , और साथ में मस्तराम और ब्ल्यू फ़िल्म में , दस मिनट में ननद रानी की चुन्मुनिया में चींटे रहे होंगे , मैंने सोचा।

कुछ देर बात करके पडोसिनो को मैंने टरकाया। राजीव , मेरी जेठानी के साथ कुछ यहाँ होली मिलने जा रहे थे। उनके जाने के बाद मैंने दरवाजा बंद किया।

चमेली भाभी ऊपर चलने के लिए बेताब थीं लेकिन मैंने उन्हें रोका और बोली ,

" अरे , जरा ननद रानी पे भांग ठीक से चढ़ तो जाने दीजिये। "

हँसते हुए वो बोली," ठीक कह रही है , उस के बाद हम लोग चढ़ेंगे। "

दस क्या पंद्रह मिनट के बाद हम लोग धड़धड़ाते हुए ऊपर चढ़े और चमेली भाभी के हाथ में स्पेशल गुलाल की एक प्लेट थी ( अंदर गाढ़े रंग और ऊपर पतली परत गुलाल की )

मैंने धीरे से दरवाजा खोला।

मीता की हालत खराब थी।

हलकी गुलाबी आँखे बता रही थीं , भांग का असर पूरा चढ़ चूका है। उसकी आँखे टीवी पे चिपकी थीं , जहाँ एक लड़की पे दो दो चढ़े थे ,एक का मोटा लंड इंजन के पिस्टन की तरह चूत में आगे पीछे हो रहा था। और दूसरा सटासट , गांड मार रहा था।

मेरी ननद की काली छोटी सी स्कर्ट आलमोस्ट पूरा ऊपर तक उठी थी और उसकी उँगलियाँ जाँघों के बीच थी।

"घबड़ाइए मत ननद रानी आपको भी एक साथ दो दो मिलेंगे ऐसे ही मोटे लम्बे। "

मैंने चिढ़ाया , और मेरी आवाज सुन के वो झटके से खड़ी हो गयी।

चमेली भाभी ने गुलाल की प्लेट टेबल पे रखी और मेरी ननद के छोटे छोटे उभारों को ललचायी निगाह से देखते , उन्होंने छेड़ा ,

" क्यों ननद रानी , पहले डालोगी , की डलवाओगी। "

" अरे भाभी , ये छोटी है पहले इसका हक़ बनता है। " मैं मीता, अपनी किशोर ननद की ओर से बोली।

और हिम्मत कर के एक चुटकी गुलाल , उस ने उठाया , और चमेली भाभी के गालों पे लगा दिया।

जब उसने हाथ उठाये , तो साइड से टाइट टॉप से , उसके किशोर उरोजों का उभार और साफ झलक रहा था और जानमारू लग रहा था।

फिर थोडा गुलाल , उसने मेरे गालों पे भी मला।

उन किशोर गदोरियों के गाल पे स्पर्श से ही मेरा शरीर दहक उठा। मेरी निगाहें उसके उठते उभारों को सहला रही थी।

अब बारी , हम भाभियों की थी। मैंने चुटकी में गुलाल लिया और सीधे उसकी मांग में , फिर मीता के रसीले गालो पे , जिसपे , सारे शहर के छैले दीवाने थे , काटते बोली ,

" ननद रानी , सिंदूर दान तो हो गया। अब सुहाग रात भी हो जाय। "

लाज से उसके गालों पे कितने पलाश खिल उठे।

और उसके कुछ बोलने से पहले ही ढेर सारा गुलाल अपने हाथों में ले के मैंने उसके गुलाब से गाल पे , रगड़ने , मसलने लगी।

" अरे ननद रानी , जब छैलन से ई गाल मसलवइबू , रगड़वइबू , तब जवानी का मजा मिले असली। " चमेली भाभी ने छेड़ा।

वो बार बार अपने हाथों से मेरे हाथों को पकड़ने की कोशिश कर रही थी। पर हम दो थे और वो भी खाये।

चमेली भाभी ने उसके दोनों हाथ पकड़ के उसकी पीठ के पीछे , मोड़ दिये। अब उसकी दोनों कलाइयां , चमेली भाभी के कब्जे में थी।

मेरे पास खुला मौका था। उसके उड़ने के लिए बेताब कबूतरों को टॉप के ऊपर से सहलाते , हलके से छेड़ते , मैंने चिढ़ाया ,

" ननद रानी , कब तक इन्हे छिपा के रखोगी। " और आराम से टॉप के बटन खोल दिए।

वो कसमसाती रही , मचलती रही , लेकिन चमेली भाभी की सँड़सी ऐसी पकड़ से आज तक कोई ननद निकल पायी है क्या ,जो वही निकलती।

और अब मैंने फिर एक मुट्ठी गुलाल उठाया और मेरे हाथ सीधे मीता मेरी ननद के टॉप के अंदर थे। मैं पहले तो हलके हलके छू रही थी , सहला रही थी , फिर मैंने जोर से रुई के फाहो की तरह , बस आ रहे , उन मुलायम उरोजों को पकड़ के दबाना , मसलना शुरू कर दिया।

" क्या मस्त जोबन आये हैं ननद रानी तेरे , जिन छैलों को मिलेगा , रगड़ मसल के मस्त हो जायेंगे " मैंने उसे छेड़ा।

चमेली भाभी क्यों पीछे रहतीं। ऐसे नयी बछेड़ी की दोनों कलाइयां पकड़ने के लिए उनका एक हाथ बहुत था। और अब उनका दूसरा हाथ खाली हो गया। पीछे से मीता के टॉप के अंदर हाथ ड़ाल के उसकी टीन ब्रा के हुक उन्होंने खोल दिए।

बस फड़फाते हुए कबूतर कैद से बाहर हो गए और मुझे और मौका मिल गया। अब मैं खुल के अपनी ननद के दनो जोबन मसल , रगड़ रही थी।

वो सिसक रही थी , मचल रही थी।

तब तक चमेली भाभी ने ढेर सारा गुलाल लेके टॉप को अच्छी तरह खोल के ऊपर से डाल दिया।

मेरे तो मजे हो गए।

गुलाल की नयी सप्लाई के साथ , मेरे हाथ दूने तेजी से मेरी ननद मीता के उभारों को रगड़ने मसलने लगे। गोरे , दूधिया कबूतरों के पंख , लाल , गुलाबी , हरे हो गए। और तभी मैंने जोर से उसके निपल रगड़े और चिढ़ाया ,

" अरे ननद रानी , अब जरा खुल के हार्न बजवाना शुरू करो। कब तक बिचारे छैलों को ललचाती रहोगी , अरे ये तो हैं ही दबवाने , मसलवाने , रगड़वाने के लिए। "

मैंने जोर से निपल पिंच किया तो सिसकियों के साथ चीख भी निकल गयी और वो बोली ,

" भाभी , प्लीज। "

गोल गोल निपल को रोल करती मैं बोली

" अरे मेरी प्यारी ननदिया , तेरे भैया तो इससे दूने जोर से मसलते हैं , ऐसे " फिर जैसे चक्की चले मेरी दोनों हथेलियां , उसके जोबन को मसल रगड़ रही थीं बिना रुके फूल स्पीड से।

" उयीईईईईईई ओह्ह्ह , आह्ह्ह , ओह्ह्ह , नहींईईईईईई भाभी। " मस्ती से उसकी हालत खराब हो रही थी।

" अरे अभी तो ये मेरे हाथ हैं , ही एक दिन तेरे दिन में भैया , रात में सैयां से मसलवाऊंगी तेरे जोबन , तब असली मजा आएगा। " मैंने छेड़ा।

उधर चमेली भाभी ने पीछे से मीता का स्कर्ट उठा दिया था और उसके छोटे छोटे चूतड़ पे गुलाल मसल रही थीं। लगे हाथ चमेली भाभी की एक उंगली पिछवाड़े से पैंटी के अंदर घुस गयी और उन्होंने छेड़ा ,

" अरे नन्द रानी , जब ये मस्त चूतड़ मटका के चलती होगी तो छैलों की तो जान ही निकल जाती होगी।

इस दुहरे हमले से बिचारी की हालत खराब हो गयी।

और मैंने मीता की उठती चूंचियों को और जोर से से दबाना शुरू किया , और वो चिंचियाने लगी ,

" भाभी , छोडो न लगता है। "

जवाब में मैंने निपल की घुन्डियाँ और जोर से दबोचीं। मस्ती और दर्द दोनों से वो जोर से सिसकी और बोली ,

" भाभी , प्लीज छोडो न "

" क्या छोडूं , मेरी बांकी हिरनिया , एक बार अपने मुंह से दे बोल दे छोड़ दूंगी , जानु। " मैंने प्यार से उसे उभार दबाते हुए कहा।

छाती , सीना , ब्रेस्ट , जोबन वो सब बोल चुकी लेकिन जब तक उसने चूंची नहीं कहा , मैं उसके प्यारे प्यारे तने खड़े , निपल पिंच करती रही।

लेकिन चमेली भाभी इतनी आसानी से थोड़ी छोड़ने वाली थीं।

उन्होंने जोर से उसके चूतड़ दबोचते कहा ,

" जोर से बोल न मैंने नहीं सूना "

और खूब जोर जोर से मीता से हम दोनों ने चूंची बुलवाया।

और फिर इन गदराई टीन बूब्स का मजा , चमेली भाभी ने भी लेना शुरू कर दिया लेकिन अपनी स्टाइल से।
 
ससुराल की पहली होली-7

उन्होंने उसका टॉप पीछे से उठाया और मैंने आगे से , चमेली भाभी ने मीता की टीनेजर ब्रा निकाल कर, पलंग पे फ़ेंक दी। और टॉप उठा था ही , बस पीछे से मर्द की तरह जोर जोर से उसकी अब खुली हुयी चूंची दबा रही थीं।

मीता की पैंटी भी उन्होंने खींच के उतार दी थी और उसे भी ब्रा के पास , पलंग पे फ़ेंक दी थी।

मैंने भी एक नया मोर्चा खोल दिया था। नीचे की ओर।

मेरी हथेली अब दोनों जांघो के बीच थी और थोड़ी ही देर में सीधे उसकी गुलाबी परी पर।

बोर्डिंग से लेकर यूनिवर्सिटी तक लड़कियां मेरी उँगलियों की कायल थी , तो बिचारी ये कच्ची कली,…

और कुछ ही देर में मेरी हथेलियों ने मसल मसल कर , रगड़ रगड़ कर उसकी बुलबुल को पागल बना दिया।

और जब उँगलियों की हरकत चालु हुयी , बहुत कसी थी कुँवारी कली लेकिन मेरी अनुभवी उंगली, …तर्जनी की टिप्स घुस ही गयी और जैसे ही वो गोल गोल घूमने लगी , थोड़ी देर में रस मलायी का रस निकलने लगा और वो बिचारी बोली ," भाभी , निकाल लो न। प्लीज , निकाल लो ना "

बस यही तो मैं चाहती थी। फिर मैंने वही बात पूछी ,

" अरे कहाँ से निकाल लूँ ननद रानी "

थोड़ी देर तक तो वो ना नुकुर करती रही लेकिन जब अंगूठे ने क्लिट को रगड़ना शुरू किया तो वो चिं बोल गयी।

पहले तो वो योनि , फिर वैजायना ,

लेकिन जब तक उसने चूत नहीं बोला। मैंने ऊँगली बाहर नहीं की , वो भी पांच बार जोर जोर से।

उसके बाद तो एक बार धड़क खुल गयी तो गांड , लंड , चुदाई सब उससे बुलवाया ही और कसम भी खिलायी की अब आगे से हम सब के साथ इसी तरह बोलेगी।

लेकिन ये सिर्फ शुरुआत थी , उसकी रगड़ाई की।

चमेली भाभी ने ऊपर का मोर्चा सम्हाला और मैंने नीचे का।

क्या गौने की रात दुल्हन की रगड़ाई होती होगी , जैसे उसकी हुयी। चमेली भाभी , कभी उसके निपल खींचती , कभी फ्लिक करतीं , कभी दो उँगलियों में ले के रोल करतीं तो कभी. पिंच करती।

जितने खेली खायी औरतों ने न लिए होंगे वो चमेली भाभी ने उस नयी बछेड़ी को दिए और साथ में मैं नीचे।

अब मेरी तर्जनी का एक पोर अच्छी तरह उसकी रामपियारी में घुस चूका था। बस। मैं जोर जोर से गोल घुमाती , कभी उंगली मोड़ के उसके नकल ( kncukle ) से चूत की अंदुरनी दीवाल रगड़ती और साथ में अंगूठा , क्लिट को सहला , दबा रहा था।

वो बार बार झड़ने के कगार पे पहुंचती , और हम रुक जाते और थोड़ी देर में फिर , चमेली भाभी ने उससे सब कुछ कबूलवा लिया की उसकी चूत को लंड चाहिए , वो बहुत चुदवासी है , छिनार है।

वो कुछ भी बोलने के लिए तैयार थी , बस हम उसे झाड़ दें।

तब तक नीचे घर में कुछ आवाजाही सुनायी दी। मुझे लगा की मेरी जेठानी और ' ये ' लौट आये हैं

फिर मुझे याद आया की मैं एक चीज तो भूल गई गयी , वो कुल्हड़ , 'स्पेशल डिश ' जो मैंने ननद जी के लिए बनायी थी। मैंने चमेली भाभी को इशारा किया और अब नीचे का मोर्चा ही उनके हवाले था।

मैं वो कुल्हड़ निकाल के ले आयी ( जी हाँ , वही , जिसमें मैंने उनकी रात में दो बार गाढ़ी मलायी इकट्ठी की थी ).

उधर चमेली भाभी को भी लग गया था की राजीव लौट आये हैं और उन्होने चूत मंथन की रफ्तार बढ़ा दी।

" मीता देख , तेरे लिए स्पेशल , रबड़ी गुलाब जामुन मैंने रखा है , मुंह खोल "

मैंने ननद से बोला।

और कुल्हड़ में 'उनके रस ' में ड़ूबे , दो गुलाब जामुन में से एक उसके मुंह में , और उसने गड़प कर लिया।

तब सीढ़ियों पे पैरों की आवाज सुनायी पड़ी और मैंने कुल्हड़ उसे पकड़ा दिया , और बोला बड़ी स्पेशल रबड़ी है एक बूँद भी बचनी नहीं चाहिए।

जी भाभी वो बोली

और फिर बस एक नदीदी की तरह उसने पहले तो गुलाब जामुन और फिर कुल्हड़ उठा के सीधे होंठो से लगा लिया और सब गड़प। फिर जीभ कुल्हड़ में डालके बचा खुचा वो चाट गयी।

मैं चमेली भाभी के साथ अपनी कुँवारी ननद की चूत सेवा में लगी थी , चमेली भाभी की मोटी ऊँगली तूफान मेल की तरह मीता की चूत में अंदर बाहर हो रही थी और मैं साथ में क्लिट को जोर जोर से रगड़ना शुरू कर दिया।

मीता बहुत जोर से झड़ने लगी। वो तेजी से सिसक रही थी , चूतड़ आगे पीछे कर रही थी , चूंचिया उसकी पत्थर हो रही थीं और निपल कांच के कंचे की तरह गोल और कड़क।

तभी दरवाजे पे खट खट हुयी और इनकी आवाज सुनायी पड़ी।

लेकिन चमेली भाभी की ननद की बिल में ऊँगली तेजी से आती जाती रही , औ फिर से मेरी छोटी ननद झड़ने लगी।

उसकी चूत एकदम रस से गीली हो गयी थी , चमक रही थी।

मैं दरवाजा खोलने गयी और मीता को इशारा किया , ब्रा पैंटी फिर से पहनने का समय तो था नहीं , बस उसने झट से अपनी टॉप और स्कर्ट नीचे कर ली।

,

अंदर घुसते ही उनकी नजर मीता पे पड़ी , बल्कि सच कहूं तो बिना ब्रा के टॉप फाड़ती , मीता की गुदाज गोलाइयों पे जो साफ साफ दिख रही थीं। यहाँ तक की कबूतर की चोंचे भी साफ नजर आ रही थी।

और हम सब ने उनकी निगाह पकड़ ली और मुस्कराने लगे।

बात बदलने के लिए उन्होंने चमेली भाभी की ओर देखा।

उनकी तर्जनी चमक रही थी और उसमें कुछ गाढ़े शीरे जैसा लगा था। वो चमेली भाभी से बोलेजाती ,

" क्यों कुछ खाया पिया जा रहा था क्या "

" हाँ देवर जी जबरदस्त रसमलाई , अब आप लेट हो गए तो चलिए चासनी चाट लीजिये "

और पिछले १० मिनट से मीता की चूत में आती जाती , उसकी रस से गीली अँगुली , उन्होंने राजीव के मुंह में डाल दी और राजीव नदीदों की तरह उसे जोर जोर से चूसने , चाटने लगे।
 


शर्म से मीता के गाल दहक उठे। उसे तो मालुम ही था की वो ऊँगली अभी क्या कर रही थी और उस में क्या लगा है।

उंगली निकाल के चमेली भाभी ने पुछा ,

" क्यों देवर जी मीठ था न "

"एकदम भौजी , " अपने होंठो पे लगी 'चासनी ' का रस चाटते वो बोले।

" अउर चाहिए तो सीधे , रस मलायी से ही ले लो " ये बोलते हुए चमेली भाभी ने मीता की स्कर्ट दोनों हाथों से उठा दी।

अबकी मेरी ननद मीता के दोनों हाथ मैंने पीछे से पकड़ रखे थे। पैटी तो हमारे बेड पे पड़ी थी।

होली की शाम उनको 'रस मलायी ' के दरशन हो गए , चिकनी , रस से लिपटी , गुलाबी।

और तभी उनकी निगाह खाली कुल्हड़ पे पड़ी और वो समझ गए , और खिसिया के वो चमेली भाभी के पीछे पड़े।

" हम तो आपकी रस माधुरी का रस लेंगे " वो बोले।

इधर मीता ने हाथ छुड़ा कर कहा , भाभी मैं नीचे चलती हूँ।

जब तक मैं रोकूँ रोकूँ , वो हिरनी दरवाजे के पार।

और मैं उसके पीछे , सीढ़ियों पे भागती ,

कमरे में से इनकी आवाज सुनायी पड़ी ,

" भौजी , लगता है दुपहरिया को मन नहीं भरा "

" एकदम नहीं एक बार में मन भर जाय तो भौजी कौन ," चमेली भाभी कौन थी अपने देवर से।

और फिर मेरे कमरे के दरवाजे बंद होने की आवाज।

मैं मुस्करायी , इसका मतलब देवर भाभी की होली शुरू।

मैं पीछे रह गयी थी और मीता आखिरी सीढ़ी पे , लेकिन तभी मैं मुस्करायी , वो आलमोस्ट कैच हो गयी। मेरा कजिन संजय वहीँ खड़ा था।

मेरे मन में फिर 'कुल्हड़ ' वाली बात आयी और मैं मुस्कराये बिना नहीं रह सकी। ये ट्रिक मेरे मायके में गांव् की एक भाभी ने बतायी थी ,

" लाली , होली के दिन कौनो कुँवारी के लंड की मलायी खिलाय दो तो शर्तिया , तीन दिन के अंदर उसका भरतपुर लूट जायेगा। और उसके बाद ओकरे चूत में अस चींटी काटी , की दिन रात चुदवासी रही उ , नंबरी छिनार बन जाई। और जेकर मलायी खायी ओसे तो शर्तिया चुदवाई "

"भाभी , ओहमे हमार कौन फायदा होई " मुस्कराकर मैंने भौजी से पुछा था।

" अरे कुवांरी चूत को मजा देवाय से बड़ा पुण्य का काम कौन है , और जो पुण्य का काम करिहे तो तो फायदा होगा ही। " वो बोलीं।

एक बात तय थी कि मेरी ननद और मेरे उनका तो फायदा होना तय था.

मेरी निगाह मेरी ननद मीता और कजिन संजय पे पड़ी दोनों में छेड़छाड़ शुरू हो गयी थी।

संजय मीता से दो -तीन साल बड़ा होगा। और मेरी शादी के बाद से ही दोनों को में खूब जम क छनती थी।

मेरी शादी में मेरी बहनो ने मीता को सारी गालियां , संजय के साथ ( हमरे खेत में सरसों फुलाये , मीता साल्ली संजय से चुदवाये , हमरे भैया से चुदवाये ), लगा के दी और शादी के बाद मीता ने खुद जब वो चौथी में आया तो उसे सूद ब्याज के साथ गालियां सुना के सारी कसर पूरी की।

मीता उसे हमेशा साले कह के बुलाती थी , ( आखिर वो था भी तो उस के भाई का साला) और वो भी बजाय बुरा मानने के साथ उसी टोन में उसे जवाब देता था।

संजय को देख के मीता रुक गयी और बोली ,

" क्यों साल्ले , मन नहीं माना , आ गए अपनी बहन से होली खेलने। "

" एकदम होली में मन कैसे मानता , लेकिन बहन नहीं बहन की ननद से होली खेलने " वो उसके ब्रा विहीन टॉप से झांकते बूब्स को घूरते , छेड़ कर बोला।

" अच्छा , बड़ी हिम्मत हो गयी है साल्ले की। पहले पकड़ो , फिर आगे देखा जाएगा " और ये कह के मीता भाग खड़ी हुयी , हिरणी की तरह।

आगे आगे वो , पीछे पीछे संजय।

बिना ब्रा के उसके उरोज कसे टॉप में लसर पसर कर रहे थे।

मैं देख रही थी दोनो का खेल।

दौड़ने में मीता भी बहुत तेज थी , लेकिन संजय भी कम नहीं था।

घर के कोने में बने एक बाथ रूम में मीता घुस गयी और अंदर से दरवाजा बंद करने की कोशिश में लगी थी की संजय भी अंदर घुस गया और दरवाजा उसने बंद कर लिया।

पीछे पीछे मैं, एक छोटा सा छेद था उससे अंदर का हालचाल देख रही थी , साथ में चौकीदारी भी कर रही थी , की कहीं कोई आ ना जाये , और मेरी ननद की मेरी मेरी भाई के साथ चल रही होली में बाधा न पड़े।

और उन दोनों कि होली शुरू हो गयी थी।

मीता खिलखला रही थी , चिढ़ा रही थी और संजय मेरा भाई उस के टॉप में हाथ डाल के उस के किशोर उभारों में पेंट लगा रहा था ,

" हे जा के अपनी बहन के सीने पे रंग लगा , साल्ले , उन का मुझ से बड़ा है " वो बोल रही थी।

" मुझे तो तेरा ही पसंद है , एक बार दिखा न " वो बोला और जब तक वो कुछ टोकती , उस ने टॉप भी उठा दिया।

( ब्रा , पैंटी तो हम पहले ही उतार चुके थे )

और मेरी ननद के छोटे छोटे गदराते , जोबन सामने थे। और जब तक वो रोकती , निपल संजय के मुंह में।

संजय का रंग लगा हाथ अब स्कर्ट के अंदर उसकी चिड़िया को रंग रहा था।

तब तक कुछ खड़बड़ हुयी और मैंने आँख हटा लिया।

और बाथरूम के सामने जा के खड़ी होगयी।

कोई आ रहा था लेकिन मुझे देख के वापस चला गया। .

मैंने फिर छेद पे आँख लगा लिया।

मीता नखड़े दिखा रही थी , बार बार न न कर रही थी।

और संजय का औजार , पैंट से बाहर निकला हुआ था। मस्त मोटा , एकदम तना।

और उसने वही किया जो मेरे भाई को मेरे ननद के साथ करना चाहिए , जबरदस्ती।

थोड़ी देर तक तो उसने मीता के गुलाब के पंखुड़ी की तरह होंठों पे अपना सुपाड़ा रगड़ा , और फिर एक हाथ से अपना लंड पकड़ा और दुसरे हाथ से जोर से मीता के गोरे भरे भरे गाल दबाये , और चिड़िया की तरह मीता ने होंठ खोल दिए , और सटाक से सुपाड़ा अंदर।

थोड़ी ही देर में नखड़ा भूल के मजे से वो मेरे भाई के लंड को चूम चाट रही थी , जोर जोर से चूस रही थी।

और मेरे भाई ने भी उसका सर पकड़ के जोर जोर से उसका मुंह चोदना शुरू कर दिया।

" तेरे भाई , को भी साल्ला न बनाया तो कहना " मुंह चोदते हुए सन्जय बोला

" कैसे ," मीता से नहीं रहा गया , और पल भर के लिए लंड मुंह से बाहर निकाल के उसने पुछा।

" अरे जानु , उस साल्ले की बहन को हचक के चोदुंगा तो वो साल्ला, मेरा साल्ला होगा कि नहीं। "

मीता खिलखिला उठी जैसे चांदी की हजार घंटियाँ बज उठी हों और हंस के बोली " बना देना न " और फिर दुबारा लंड चूसने लगी।

जिस तरह संजय उसके मुंह में धक्के मार रहा था , लग रहा था बस अब वो झड़ने वाला है। और वही हुआ।
 
ससुराल की पहली होली-8

मीता ने लाख सर पटका , लेकिन मेरा भाई उसके मुंह में ही झड़ा , झड़ता रहा और जब निकाला , तो सुपाड़े में लगी मलायी , उसके गालों और चूंचियों पे पोत दी।

"अब हुयी असली होली ननंद रानी की " मैंने सोचा।

वीर्य का एक बड़ा सा थक्का उसके होंठो पे था। शीशे में उसने देखा तो जीभ निकाल के उसे भी चाट लिया।

मुझे लगा कि अब घुसने का समय हो गया है , और मैंने दरवाजा खटखटाटाया.

संजय , चुपके से निकल गया।

लेकिन मैंने मीता को पकड़ लिया और टॉप के ऊपर से उसके मम्मो को दबाती बोली , " क्या खाया पिया जा रहा था "

उसका चेहरा १००० वाट के बल्ब की तरह चमक उठा , वो जोर से मुस्करायी और मुझे सीधे मुंह खोल के दिखा दिया।

उसकी जीभ पे अभी भी मेरे भाई की गाढ़ी थक्केदार मलायी थी।

और मुझे दिखा के वो नदीदी उसे भी गटक गयी।

मैंने उससे पुछा , क्यों स्वाद कैसा था , मेरी ननद रानी।

हम दोनों एक दूसरे के कंधे पे सहेलियों की तरह जा रहे थे की मीता ने मुझे चिढ़ाते बोला ,

" बहुत स्वादिष्ट , भाभी , एकदम यम्मी। आपको खाना है बुलाऊँ साल्ले को ,अभी गया नहीं होगा। "

मैं कौन पीछे रहने वाली थी , मैंने भी छेड़ा " अच्छा पहले ये बोल , किसका ज्यादा स्वादिष्ट था , मेरे भैया का या तेरे भैया का। "

" मतलब " वो ठिठक के रुक गयी।

" अरे अब तो तूने स्वाद ले ही लिया , तो , ,…वो कुल्हड़ में जो रबड़ी थी गुलाब जामुन के साथ , वो तेरे भैया की ,… "

मेरे बात पूरा करने के पहले ही वो बात समझ कर बड़ी जोर से चीखी " भाभी :" और मुझे मारने दौड़ी।

मैं आगे आगे भागी , आखिर उसी कि तो भाभी थी, दौड़ने में तेज।

लेकिन कुछी देर में पकड़ी गयी , …मै नहीं वो मेरी ननद। मीता।

कालोनी की भाभियाँ आयी थी और सब एक से एक हुड़दंगी।

मीता उधर से निकली मेरा पीछा करती और धर ली गयी।

यही तो मैं चाहती थी , उसे देख के मैं आँखों ही आँखों में उसे चिढ़ा रही थी।

सारी भाभियाँ एक से एक खेली खायी , कन्या खोर , और मीता के देख के उन की आँखों में एक आदमखोर भूख चमक उठी।

मीता उधर से निकली मेरा पीछा करती और धर ली गयी।

यही तो मैं चाहती थी , उसे देख के मैं आँखों ही आँखों में उसे चिढ़ा रही थी।

सारी भाभियाँ एक से एक खेली खायी , कन्या खोर , और मीता के देख के उन की आँखों में एक आदमखोर भूख चमक उठी।

एक ने मीता का हाथ पकड़ के रोक लिया और बोली , "

ननद रानी , अरे सुबह की होली तो तुम अपने भाइयों , और यारों से खेल रही थी , कम से कम शाम की होली तो भाभियो के साथ खेल लो। "

बिचारी मीता।

खूब खुल के होली के मस्त गाने हो रहे थे , और ये हुआ की अगले गाने में मीता नाचेगी. मीश्राईन भाभी ने ढोलक सम्हाली और` बाकी ने गाना शुरू किया। मैंने भी मजीरे से ताल देने शुरू की , आखिर मेरी ननद जो नाच रही थी ,

जैसे ही उसने एक दो ठुमके लगाए होंगे , किसी ने कमेंट मारा ,

" अरे कोठे पे बैठा दो तो इतना मस्त मुजरा करेगी ,… "

" अरे जरा ये जोबन तो उचका ,… " ये नीरा भाभी और की आवाज थी मेरी जेठानी। वो और चमेली भाभी भी अब आ गयी थीं।

गाना शुरू हुआ ,

" अरे नकबेसर कागा ले भागा , मोरा सैयां अभागा न जागा।

अरे उड़ उड़ कागा मोरे होंठवा पे बैठा , उड़ उड़ कागा मोरे होंठवा पे बैठा

होंठवा के सब रस ले भागा , अरे मोरा सैयां अभागा न जागा। "

इत्ती मस्त एक्टिंग मीता ने लुटने की कि , की मजा आ गया।

अगली लाइन गाने की मैंने शुरू की ,और डांस में साथ देने मेरे मोहल्ले के रिश्ते से , देवरानी रूपा उठी शादी पिछले साल ही हुयी थी।

अरे नकबेसर कागा ले भागा , मोरा सैयां अभागा न जागा।

अरे उड़ उड़ कागा मोरे चोलिया पे बैठा , उड़ उड़ कागा मोरे चोलिया पे बैठा

जुबना के सब रस ले भागा , अरे मोरा सैयां अभागा न जागा।

और डांस के दौरान , उसने मीता को पकड़ लिया , पीछे से और बाकायदा , जोबन मर्दन कर के जोबन लुटने का हाल बताया

बिचारी मीता लाख कोशिश करती रही लेकिन रूपा ने सबके सामने न सिर्फ टॉप के ऊपर से बल्कि अंदर भी खूब चूंचियां रगड़ी और बोला ,

" अरे ननद रानी तेरे भैया तो दिन रात हमारा जोबन लूटते हैं , आज हमारा दिन है ननदों का जोबन लूटने का।

गाना आगे बढ़ा और नीरा भाभी ने गाना शुरू किया

अरे नकबेसर कागा ले भागा , मोरा सैयां अभागा न जागा।

अरे उड़ उड़ कागा मोरे साया पे बैठा , उड़ उड़ कागा मोरे साया पे बैठा

बुरिया के सब रस ले भागा , अरे मोरा सैयां अभागा न जागा।

अरे बुरिया के सब रस ले भागा , अरे मोरा सैयां अभागा न जागा।

और इस बार तो अति हो गयी। रूपा अभी भी डांस में साथ दे रही थी और जैसे ही नीरा भाभी ने बोला बुरिया के सब रस ले भागा , अरे मोरा सैयां अभागा न जागा। उसने मीता का स्कर्ट उठा दिया और पीछे से चमेली भाभी ने उसका साथ दिया।

सब लोगो ने दरसन कर लिया।

और उसके साथ ही रुपा ने मीता की चूत पे वो घिस्से लगाये ,

गनीमत थी की तब तक ये आगये , और सब लोग हट गए।

कालोनी की औरते अपने घर निकल गयीं। चमेली भाभी भी रूपा के साथ चली गयी।

नीरा भाभी , मेरी जेठानी और ये मीता को छोड़ने उसके घर गए और अब मैं अकेली बची।

जाने से पहले मैंने मीता को अंकवार में भरा और जोर से भींचते हुए बुलाया

" हे कल जरूर आना , और शाम को नहीं दिन में ही "

जितना जोर से मैं अपनी बड़ी बड़ी चूंचियो से उसके जोबन रगड़ रही थी , उअतने ही जोर से वो भी जवाब दे रही थी।

" एकदम भाभी , पक्का आउंगी " वो बोली और तीनो चले गए।

 
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