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मैं अभी आधे रस्ते पहुँचा था की आशु का फ़ोन आ गया, वो पूछने लगी की मैं कबतक आ रहा हूँ? मैंने उसे कहा की मैं अभी रास्ते में हूँ तो उसने कॉल काट दिया. मैंने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और बाइक स्टार्ट कर फिर से चल पडा. जैसे ही मैं घर पहुँचा और दरवाजा खटखटाने लगा की दरवाजा अपने आप खुल गया, मैं धीरे से अंदर आया और सोचा शायद की कहीं आशु दरवाजा बंद करना तो नहीं भूल गई?! पर जब नजर सामने खिड़की पर पड़ी तो मैं अपनी आँख झपकना ही भूल गया.
अब मुझे समझ आ गया की आशु ने वो पैसे क्यों मांगे थे? आशु इठला कर चलते हुए मेरे पास आई और बोली; "क्या देख रहे हो जानू?!" मेरे मुंह से बस; "वाव!!!" निकला और आशु मुस्कुराने लगी. "ये मैंने उसी दिन आर्डर किया था जब आपने मुझे बताया था की थर्टी फर्स्ट को पार्टी में जाना हे. आज अगर मुझे देख कर आपके सारे कलिग आपसे जलने ना लगें तो कहना?" मैं हैरानी से आशु की बात सुनता रहा, कहाँ तो ये लड़की इतनी शर्मीली थी और कहाँ ये आज इस कदर मॉडर्न हो गई है? मुझे आशु वाक़ई में सूंदर लग रही थी पर मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी की वो इस कदर के कपड़े भी पहन सकती हे. मैं अपने ख्यालों में गुम था की आशु ने मुझे वो शादी वाला ब्लैज़र और शर्ट उठा के दी; "और ये आप पहनोगे? मेरे हबी को देख आज उन सारी लड़कियों की जलनी चाहिए." अब मरते न क्या करते मुझे वो पहनना ही पड़ा क्योंकि अगर मैं वो कपडे न पहनता तो सब कहते हूर के संग लंगूर! मैं जानता था की कल ऑफिस में मेरी बहुत खिचाई होगी! पर आशु ये भूल गई थी की ये दिसंबर का महीना है और बाहर ठंड है, उसने इस ड्रेस के चलते कोई गाउन तो आर्डर किया नहीं था! "मैडम जी! बाहर की ठंडी हवा में ये पहन के जाओगी तो 'कुक्कड़' बन जाओगी!" ये सुन कर आशु सोच में पड़ गई. मैंने फ़ोन निकाला और कैब बुक करी और अपना ब्लैज़र उसे उतार के दिया. "पर ये इसके साथ कैसे चलेगा?" आशु ने मायूस होते हुए कहा. "अरे बुद्धू! ये बस कैब आने तक अपने कन्धों पर रख ले और वहाँ पहुँच कर मुझे दे दिओ, वापसी में फिर ऐसे ही करेंगे." ये सुन कर उसका चेहरा फिर से खिल गया.
आखिर कैब आई और हम बारबेक्यू नेशन पहुँचे और जैसा की होना चाहिए था सब आशु को देख कर ताड़ने लगे. सब के सब मुझे आँखों से इशारे कर के पूछने लगे की ये कौन है? "माई गर्लफ्रेंड आशु!" ये कहते हुए मैंने उसका इंट्रो एक-एक कर सबसे कराया.तभी पीछे से सर और मैडम आये और उन्होंने भी आशु से हाई-हॅलो की! वहाँ पर कोई बड़ा फॅमिली टेबल नहीं था बल्कि चार लोगों के लिए बैठने वाले छोटे बूथ थे. मैंने फटाफट आशु का हाथ पकड़ा और खाली बूथ में बैठ गया, सब ने फटफट बूथ पकडे और सर के साथ उसी चटक गधे को अपनी बंदी के साथ बैठना पडा. सारे लौंडे अपनी-अपनी बंदियों को साथ बैठ गए, मेरे सामने वही लड़का बैठा जो मेरे साथ एकाउंट्स में था. उस हरामी की नजर आशु पर उसकी बंदी की नजर मुझ पर थी. मेरा बायाँ हाथ और आशु का दायाँ हाथ टेबल के नीचे था और हम एक दूसरे के हाथ को सहला रहे थे. खाने के लिए जब वेटर आया तो उसने हम से पुछा की हम वेज या नॉन-वेज लेंगे? हमने तीन नॉन-वेज और एक वेज का आर्डर दिया. फिर दूसरा बंदा एक मिनी तंदूर ले कर आया और हमारे सामने टेबल के बीचों बीच बने छेड़ में फिट कर दिया. ये आशु के लिए फर्स्ट टाइम था और वो हैरानी से देख रही थी. फिर एक-एक कर 'सीकें' लगनी शुरू हो गईं फिर मैं और वो लड़का बारी-बारी से उन सीकों को रोल करते और उस पर चटनी लगाने लगे. मैंने वहाँ रखे झंडे को ऊँचा कर दिया; "ये क्यों किया?" आशु ने पूछा. "अब जबतक हम इस झंडे को नीचे नहीं करते ये लोग तंदूरी आइटम सर्व करते रहेंगे." ये सुन कर मेरे सामने बैठी लड़की बोली; "मतलब हम अनलिमिटेड खा सकते हैं?"
"हाँ जी! पर इसी से पेट न भर लीजियेगा, वहाँ मेन कोर्स का बुफे लगा है और वो भी अनलिमिटेड हे." ये सुन कर वो लड़की और आशु एक को देखने लगे और उनके चेहरे से वही लड़कियों ख़ुशी झलकने लगी. ये वही ख़ुशी है जो लड़कियों को फ्री के खाने को देख कर होती हे. वेटर फिर से आया और ड्रिंक्स के लिए पूछने लगा पर मैंने मना कर दिया. उन दोनों ने बहुत फाॅर्स किया पर मैं और आशु अड़े रहे की हम नहीं पीयेंगे.शायद आशु जान गई थी की मेरा खींचाव नशे की तरफ कुछ ज्यादा है! मैं अपनी लिमिट जानता था पर पिछले कुछ महीनों में ये दारु मेरी आदत बनने लगी थी. वैसे भी थर्टी फर्स्ट को ड्रिंक्स बहुत ज्यादा ही महंगी थीं तो ना पीना ही इकोनोमिकॅल था! खेर अच्छे से दबा कर खाना पीना हुआ और समय हुआ विदा लेने का तो सब को हॅपी न्यू इअर कह कर हम दोनों कैब कर के घर लौट आये.
रात के ग्यारह बजे थे और हम अपने कपडे बदल रहे थे. आशु ने हमेशा की तरह मेरी टी-शर्ट पहनी और नीचे उसने सिर्फ अपनी पैंटी पहन राखी थी.मैं पजामा और टी-शर्ट पहन कर रजाई में घुस गया.फिर मुझे याद आया की आशु को दवाई लगा देता हूँ तो मैं वापस उठा और आशु की कमर पर आयोडेक्स लगा दिया. आशु सेधी लेटी थी पीठ के बल, और मैं उसकी तरफ करवट ले कर लेटा था. आशु ने मेरा बायाँ हाथ अपने हाथ में पकड़ रखा था और वो छत की तरफ देखते हुए कुछ सोच रही थी.
"क्या हुआ? क्या सोच रही है?" मैंने आशु से पूछा.
"गाँव में रहते हुए ना तो कभी मुझे ये पता था की क्रिसमस क्या होता है और ना ही की थर्टी फर्स्ट दिसंबर की पार्टी क्या होती है! आप की वजह से मैं यहाँ आई और ये सब देखने को मिला, एक नई जिंदगी जीने का मौका मिला. वरना अब तक तो मेरी शादी हो गई होती और मैं वहां तिल-तिल मर रही होती!"
"बस! नए साल का आगाज इस तरह रोते हुए नहीं करना!" ये कहते हुए मैंने आशु के गाल को चूम लिया. आशु मेरी तरफ पलटने लगी तो उसकी कमर का दर्द उसे परेशान करने लगा, मैं उठ कर पानी गर्म करना चाहता था पर आशु ने मुझे रोक दिया और मेरा सर अपने सीने पर रख कर मेरे बालों में उँगलियाँ फेरने लगी. मैं आशु के दिल की बेकाबू धड़कनें सुन पा रहा था और उसके मन में उठ रहे प्यार को महसूस कर पा रहा था. "कल सुबह पहले डॉक्टर के चलेंगे फिर मैं तुम्हें कॉलेज छोड़ दूँगा और वहाँ से मैं ऑफिस निकल जाऊंगा." मैंने कहा और आशु ने बस 'हम्म्म' कहा. घडी ने टिक-टिक कर रात के बारह बजाये और मैं उठ कर बैठा, पर आशु की आँखें बंद थी. मैंने झुक कर आशु के होठों को बड़ा लम्बा किस किया और कहा; "हॅपी न्यू इअर मेरी जान!" आशु ने अपने दोनों हाथ मेरी गर्दन के पीछे ले जाकर लॉक कर दिया और मुस्कुराते हुए बोली; "हॅपी न्यू इअर जानू! आई लव यू!!!" पर उसे मेरा जवाब सुनने की जरुरत नहीं थी. उसने मुझे अपने ऊपर झुका लिया और मेरे होठों को अपने मुँह में भर कर चूसने लगी.हम इसी तरह एक दूसरे को चूमते हुए सो गये.
सुबह उठ कर मैंने आशु के माथे को चूमा और उसे नए साल की नई सुबह की मुबारकबात दी. आशु अब भी लेटी हुई थी. मैंने उठ कर सबसे पहले उसके लिए बेड टी बनाई और फिर उसे प्यार से जगाया. आशु आँखें मलते हुए उठी और उसने जब मेरे हाथ में चाय का कप देखा तो मुस्कुराने लगी. "मुझे लगा था की ये सब आप शादी के बाद करोगे!" आशु ने कहा. "अरे हम तो साल के पहले दिन से ही आपके गुलाम हो गए!" मैंने हँसते हुए कहा. "इस गुलाम को तो मैं अपने दिल में बसा कर रखुंगी.!" आशु ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा. आशु उठ कर फ्रेश होने चली गई और मैं उसके लिए ऑमलेट बनाने लगा. आशु ऑमलेट की खुशबु सूंघ कर फटाफट बाहर आ गई और कुर्सी पर बैठ गई. मैंने उसे गर्म-गर्म ऑमलेट परोस कर दिया और उसके सर को चूम कर मैं बाथरूम फ्रेश होने चला गया.तैयार हो कर, खा-पी कर हम दोनों निकले.मैंने बाहर से ऑटो किया और पहले आशु को एक डॉक्टर के पास ले गया.डॉक्टर ने बताया की कोई गंभीर बात नहीं है, मोच ही है पर चूँकि सर्दी है इसलिए ज्यादा दर्द कर रही हे. उसने एक पैन किलर दी और गर्म पानी की सिकाई करने को कहा. फिर आशु को मैंने उसके कॉलेज छोड़ा और मैं ऑफिस निकल गया.ऑफिस मैं पहले ही कॉल कर के बता चूका था की में थोड़ा लेट होजाऊंगा इसलिए बॉस ने कुछ नहीं कहा.
समय बीतने लगा और मार्च आ गया... कुछ दिन बाद कॉलेज का एनुअल डे था! आशु को जैसे ही ये पता चला उसने मुझे तुरंत फ़ोन किया; "जानू! नेक्स्ट वीक हमारा एनुअल डे है!" मैंने थोड़ा मजाक करते हुए कहा; "हमारा एनुअल डे?" ये सुन कर रितु की भी हँसी निकल गई; "मेरा मतलब...कॉलेज का एनुअल डे! तो नेक्स्ट वीक आप छुट्टी ले लेना." अब चूँकि मैंने अभी तक एक भी छुट्टी नहीं ली थी तो मुझे पता था की बॉस छुट्टी दे देंगे, उसी दिन मैंने शाम को सर से बात की तो उन्होंने हाँ कह दिया. इधर आशु ने अपने लिए और मेरे लिए ड्रेस सेलेक्ट करना शुरू कर दिया और मुझे मैसेज करना शुरू कर दिया. ऑफिस में हर कुछ मिनट मेरा फ़ोन बजता रहता और सब कहते की 'क्या बात है? गर्लफ्रेंड बड़ी बेचैन हो रही हे.' आशु ने अपनी ड्रेस फाइनल करने से पहले मेरे कपडे फाइनल कर दिए और मुझे बता कर आर्डर भी कर दिये. उसने अपना आर्डर अपने फ़ोन से किया ताकि मुझे पता न चल जाए की उसने क्या आर्डर किया है, लेकीन डिलीवरी एड्रेस मेरा घर ही था. रविवार को उसका आर्डर डिलीवर हुआ पर मेरे वाले में और टाइम लगना था. आशु ने मुझे अपने कपडे दिखाए भी नहीं और शाम को अपने साथ हॉस्टल ले गई.
आखिर एनुअल डे का दिन आ ही गया, मैं रेडी हो कर आशु के हॉस्टल पहुँचा क्योंकि मुझे उसे वहीँ से पिक करना था. आशु जब मेरे सामने आई तो मैं हाथ बाँधे प्यार से उसे देखने लगा.
उसकी वो लट जो उसके चेहरे पर आ गई थी. वो उसकी साडी.... हाय मन करने लगा की आशु को अभी मंदिर ले जाऊँ और उससे अभी शादी कर लु. इधर आशु की नजर मुझ पर जम गई थी और मुँह खोले मुझे देखते हुए नजदीक आई.
“यार अभी मेरे साथ भागना है?" मैंने आशु से पुछा तो उसने एक दम से अपनी मुंडी हाँ में हिलाई, उसका ये उतावलापन देख मैं हँसने लगा. "आज तो आप मुझे जहाँ कहो वहाँ चलने को तैयार हूँ?" आशु ने इतराते हुए कहा. आशु को पीछे बिठा कर आज मानो ऐसा लग रहा था की एक नव-विवाहित जोड़ा किसी शादी में जा रहा हो. जैसे ही हम कॉलेज के नजदीक पहुँचे तो हमें लाऊड म्युजिक की आवाज आने लगी. बाइक पार्क कर के हम दोनों अंदर आये तो मेरी नजर सबसे पहले सिद्धू भैया पर पडी. सबसे पहले उनसे जा कर गले लगे और हाई-हॅलो हुई! उन्हीं के पास मेरे साथ के सभी दोस्त मिले और तब मुझे ध्यान आया की यहाँ तो सुमन भी आई होगी! मैं मन ही मन तैयारी करने लगा की उससे क्या कहूँगा? आशु को समझ नहीं आया की मैं अचानक से इतना गंभीर क्यों हो गया.फिर वही हुआ जिसका मुझे डर था. सुमन जो की हम दोनों से पहले ही आ चुकी थी वो प्रसाद के मुँह से मेरे और आशु के बारे में सब सुन चुकी थी. हमारी ही तरफ चल कर आ रही थी.
आशु अब भी समझ नहीं पाई थी की भला मैं क्यों परेशान हूँ?!
आज पहलीबार मैं किसी शक़्स के चेहरे को नहीं पढ़ पा रहा था! शायद ये घबराहट थी या फिर आशु को खो देने का डर! सुमन मेरे सामने आकर खड़ी हुई और कुछ बोलने को हुई पर उसे एहसास हुआ की हमारे इर्द-गिर्द बहुत से लोग हैं इसलिए उसने मेरा और आशु का हाथ पकड़ा और हमें एक कोने में ले आई. अभी उसने कुछ कहा नहीं था और इधर मेरा दिल कह रहा था की आज रात ही मैं आशु भगा कर ले जाऊंगा.
"राज जी! ये सच है की आप डॉली से प्यार करते हो?" सुमन की बात सुन आशु घबरा गई और जल्दीबाजी में बीच-बचाव करने को कूद पडी.
"हाँ दीदी...ये...ये तो सब जानते हैं!"
"मैं उस प्यार की बात नहीं कर रही?" सुमन ने गंभीर होते हुए कहा. सुमन का ये रूप देख आशु का सर झुक गया तो मैंने एक गहरी साँस ली और पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा; "हाँ! बहुत प्यार करता हूँ मैं आशु से?"
"ये जानते हुए की आपका उससे रिश्ता क्या है?" सुमन की आँखों मुझे अब एक चिंगारी नजर आने लगी थी.
"खून के रिश्ते से बड़ा प्यार का रिश्ता होता है!" मैंने कहा.
"और आगे क्या करोगे?" सुमन ने पूछा.
"शादी और क्या?!" मैंने सरलता से जवाब दिया.
"रियली? भाग कर? क्योंकि यहाँ तो ये सुनने के बाद आप दोनों को कोई जिन्दा नहीं छोड़ेगे" सुमन ने ताना मारते हुए कहा.
"हम दोनों यहाँ से दूर अपनी नई जिंदगी बसायेंगे" आशु ने भी आत्मविश्वास दिखते हुए कहा.
"रहोगे तो इसी दुनिया में ना? भूल गए आपने ही बताया था की आपके गाँव वाले प्रेमियों को जिन्दा जला देते हैं!" सुमन ने आशु को डाँटते हुए कहा.
"सब याद है, वो आशु की ही माँ थी जिन्हें खेत के बीचों बीच जिन्दा जला दिया गया था." मैंने सुमन की आँखों में देखते हुए कहा. अब ये सुन कर तो सुमन के होश ही उड़ गए!
"क्या? और फिर भी आप?" सुमन ने हैरान होते हुए कहा.
"प्यार होना था. हो गया कोई इसे जमाना माने या ना माने हम तो इस प्यार पर विश्वास करते हैं ना?! जानता हूँ ये लड़ाई बहुत लम्बी है और शायद भागते-भागते जमीन भी कम पड़े पर हम अलग होने से रहे! ज्यादा से ज्यादा हमें मार ही देंगे ना? इससे ज्यादा तो कुछ नहीं कर सकते?"
"आपको ये इतना आसान लग रहा है? दिमाग-विभाग है या इसके (आशु के) प्यार में पड़ कर सब खो दिया आपने? तुझमें (आशु में) अक्ल नहीं है क्या? क्यों अपनी अच्छी खासी जिंदगी ख़राब करना चाहते हो? क्या अच्छा लगता है तुम्हें एक दूसरे में? रोमांस करो खत्म करो! ये शादी-वादी का क्या चक्कर है?!" सुमन की ये बात मुझे बहुत बुरी लगी. ऐसा लगा मानो उसने मेरे प्यार को गाली दी हो.
अब मुझे समझ आ गया की आशु ने वो पैसे क्यों मांगे थे? आशु इठला कर चलते हुए मेरे पास आई और बोली; "क्या देख रहे हो जानू?!" मेरे मुंह से बस; "वाव!!!" निकला और आशु मुस्कुराने लगी. "ये मैंने उसी दिन आर्डर किया था जब आपने मुझे बताया था की थर्टी फर्स्ट को पार्टी में जाना हे. आज अगर मुझे देख कर आपके सारे कलिग आपसे जलने ना लगें तो कहना?" मैं हैरानी से आशु की बात सुनता रहा, कहाँ तो ये लड़की इतनी शर्मीली थी और कहाँ ये आज इस कदर मॉडर्न हो गई है? मुझे आशु वाक़ई में सूंदर लग रही थी पर मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी की वो इस कदर के कपड़े भी पहन सकती हे. मैं अपने ख्यालों में गुम था की आशु ने मुझे वो शादी वाला ब्लैज़र और शर्ट उठा के दी; "और ये आप पहनोगे? मेरे हबी को देख आज उन सारी लड़कियों की जलनी चाहिए." अब मरते न क्या करते मुझे वो पहनना ही पड़ा क्योंकि अगर मैं वो कपडे न पहनता तो सब कहते हूर के संग लंगूर! मैं जानता था की कल ऑफिस में मेरी बहुत खिचाई होगी! पर आशु ये भूल गई थी की ये दिसंबर का महीना है और बाहर ठंड है, उसने इस ड्रेस के चलते कोई गाउन तो आर्डर किया नहीं था! "मैडम जी! बाहर की ठंडी हवा में ये पहन के जाओगी तो 'कुक्कड़' बन जाओगी!" ये सुन कर आशु सोच में पड़ गई. मैंने फ़ोन निकाला और कैब बुक करी और अपना ब्लैज़र उसे उतार के दिया. "पर ये इसके साथ कैसे चलेगा?" आशु ने मायूस होते हुए कहा. "अरे बुद्धू! ये बस कैब आने तक अपने कन्धों पर रख ले और वहाँ पहुँच कर मुझे दे दिओ, वापसी में फिर ऐसे ही करेंगे." ये सुन कर उसका चेहरा फिर से खिल गया.
आखिर कैब आई और हम बारबेक्यू नेशन पहुँचे और जैसा की होना चाहिए था सब आशु को देख कर ताड़ने लगे. सब के सब मुझे आँखों से इशारे कर के पूछने लगे की ये कौन है? "माई गर्लफ्रेंड आशु!" ये कहते हुए मैंने उसका इंट्रो एक-एक कर सबसे कराया.तभी पीछे से सर और मैडम आये और उन्होंने भी आशु से हाई-हॅलो की! वहाँ पर कोई बड़ा फॅमिली टेबल नहीं था बल्कि चार लोगों के लिए बैठने वाले छोटे बूथ थे. मैंने फटाफट आशु का हाथ पकड़ा और खाली बूथ में बैठ गया, सब ने फटफट बूथ पकडे और सर के साथ उसी चटक गधे को अपनी बंदी के साथ बैठना पडा. सारे लौंडे अपनी-अपनी बंदियों को साथ बैठ गए, मेरे सामने वही लड़का बैठा जो मेरे साथ एकाउंट्स में था. उस हरामी की नजर आशु पर उसकी बंदी की नजर मुझ पर थी. मेरा बायाँ हाथ और आशु का दायाँ हाथ टेबल के नीचे था और हम एक दूसरे के हाथ को सहला रहे थे. खाने के लिए जब वेटर आया तो उसने हम से पुछा की हम वेज या नॉन-वेज लेंगे? हमने तीन नॉन-वेज और एक वेज का आर्डर दिया. फिर दूसरा बंदा एक मिनी तंदूर ले कर आया और हमारे सामने टेबल के बीचों बीच बने छेड़ में फिट कर दिया. ये आशु के लिए फर्स्ट टाइम था और वो हैरानी से देख रही थी. फिर एक-एक कर 'सीकें' लगनी शुरू हो गईं फिर मैं और वो लड़का बारी-बारी से उन सीकों को रोल करते और उस पर चटनी लगाने लगे. मैंने वहाँ रखे झंडे को ऊँचा कर दिया; "ये क्यों किया?" आशु ने पूछा. "अब जबतक हम इस झंडे को नीचे नहीं करते ये लोग तंदूरी आइटम सर्व करते रहेंगे." ये सुन कर मेरे सामने बैठी लड़की बोली; "मतलब हम अनलिमिटेड खा सकते हैं?"
"हाँ जी! पर इसी से पेट न भर लीजियेगा, वहाँ मेन कोर्स का बुफे लगा है और वो भी अनलिमिटेड हे." ये सुन कर वो लड़की और आशु एक को देखने लगे और उनके चेहरे से वही लड़कियों ख़ुशी झलकने लगी. ये वही ख़ुशी है जो लड़कियों को फ्री के खाने को देख कर होती हे. वेटर फिर से आया और ड्रिंक्स के लिए पूछने लगा पर मैंने मना कर दिया. उन दोनों ने बहुत फाॅर्स किया पर मैं और आशु अड़े रहे की हम नहीं पीयेंगे.शायद आशु जान गई थी की मेरा खींचाव नशे की तरफ कुछ ज्यादा है! मैं अपनी लिमिट जानता था पर पिछले कुछ महीनों में ये दारु मेरी आदत बनने लगी थी. वैसे भी थर्टी फर्स्ट को ड्रिंक्स बहुत ज्यादा ही महंगी थीं तो ना पीना ही इकोनोमिकॅल था! खेर अच्छे से दबा कर खाना पीना हुआ और समय हुआ विदा लेने का तो सब को हॅपी न्यू इअर कह कर हम दोनों कैब कर के घर लौट आये.
रात के ग्यारह बजे थे और हम अपने कपडे बदल रहे थे. आशु ने हमेशा की तरह मेरी टी-शर्ट पहनी और नीचे उसने सिर्फ अपनी पैंटी पहन राखी थी.मैं पजामा और टी-शर्ट पहन कर रजाई में घुस गया.फिर मुझे याद आया की आशु को दवाई लगा देता हूँ तो मैं वापस उठा और आशु की कमर पर आयोडेक्स लगा दिया. आशु सेधी लेटी थी पीठ के बल, और मैं उसकी तरफ करवट ले कर लेटा था. आशु ने मेरा बायाँ हाथ अपने हाथ में पकड़ रखा था और वो छत की तरफ देखते हुए कुछ सोच रही थी.
"क्या हुआ? क्या सोच रही है?" मैंने आशु से पूछा.
"गाँव में रहते हुए ना तो कभी मुझे ये पता था की क्रिसमस क्या होता है और ना ही की थर्टी फर्स्ट दिसंबर की पार्टी क्या होती है! आप की वजह से मैं यहाँ आई और ये सब देखने को मिला, एक नई जिंदगी जीने का मौका मिला. वरना अब तक तो मेरी शादी हो गई होती और मैं वहां तिल-तिल मर रही होती!"
"बस! नए साल का आगाज इस तरह रोते हुए नहीं करना!" ये कहते हुए मैंने आशु के गाल को चूम लिया. आशु मेरी तरफ पलटने लगी तो उसकी कमर का दर्द उसे परेशान करने लगा, मैं उठ कर पानी गर्म करना चाहता था पर आशु ने मुझे रोक दिया और मेरा सर अपने सीने पर रख कर मेरे बालों में उँगलियाँ फेरने लगी. मैं आशु के दिल की बेकाबू धड़कनें सुन पा रहा था और उसके मन में उठ रहे प्यार को महसूस कर पा रहा था. "कल सुबह पहले डॉक्टर के चलेंगे फिर मैं तुम्हें कॉलेज छोड़ दूँगा और वहाँ से मैं ऑफिस निकल जाऊंगा." मैंने कहा और आशु ने बस 'हम्म्म' कहा. घडी ने टिक-टिक कर रात के बारह बजाये और मैं उठ कर बैठा, पर आशु की आँखें बंद थी. मैंने झुक कर आशु के होठों को बड़ा लम्बा किस किया और कहा; "हॅपी न्यू इअर मेरी जान!" आशु ने अपने दोनों हाथ मेरी गर्दन के पीछे ले जाकर लॉक कर दिया और मुस्कुराते हुए बोली; "हॅपी न्यू इअर जानू! आई लव यू!!!" पर उसे मेरा जवाब सुनने की जरुरत नहीं थी. उसने मुझे अपने ऊपर झुका लिया और मेरे होठों को अपने मुँह में भर कर चूसने लगी.हम इसी तरह एक दूसरे को चूमते हुए सो गये.
सुबह उठ कर मैंने आशु के माथे को चूमा और उसे नए साल की नई सुबह की मुबारकबात दी. आशु अब भी लेटी हुई थी. मैंने उठ कर सबसे पहले उसके लिए बेड टी बनाई और फिर उसे प्यार से जगाया. आशु आँखें मलते हुए उठी और उसने जब मेरे हाथ में चाय का कप देखा तो मुस्कुराने लगी. "मुझे लगा था की ये सब आप शादी के बाद करोगे!" आशु ने कहा. "अरे हम तो साल के पहले दिन से ही आपके गुलाम हो गए!" मैंने हँसते हुए कहा. "इस गुलाम को तो मैं अपने दिल में बसा कर रखुंगी.!" आशु ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा. आशु उठ कर फ्रेश होने चली गई और मैं उसके लिए ऑमलेट बनाने लगा. आशु ऑमलेट की खुशबु सूंघ कर फटाफट बाहर आ गई और कुर्सी पर बैठ गई. मैंने उसे गर्म-गर्म ऑमलेट परोस कर दिया और उसके सर को चूम कर मैं बाथरूम फ्रेश होने चला गया.तैयार हो कर, खा-पी कर हम दोनों निकले.मैंने बाहर से ऑटो किया और पहले आशु को एक डॉक्टर के पास ले गया.डॉक्टर ने बताया की कोई गंभीर बात नहीं है, मोच ही है पर चूँकि सर्दी है इसलिए ज्यादा दर्द कर रही हे. उसने एक पैन किलर दी और गर्म पानी की सिकाई करने को कहा. फिर आशु को मैंने उसके कॉलेज छोड़ा और मैं ऑफिस निकल गया.ऑफिस मैं पहले ही कॉल कर के बता चूका था की में थोड़ा लेट होजाऊंगा इसलिए बॉस ने कुछ नहीं कहा.
समय बीतने लगा और मार्च आ गया... कुछ दिन बाद कॉलेज का एनुअल डे था! आशु को जैसे ही ये पता चला उसने मुझे तुरंत फ़ोन किया; "जानू! नेक्स्ट वीक हमारा एनुअल डे है!" मैंने थोड़ा मजाक करते हुए कहा; "हमारा एनुअल डे?" ये सुन कर रितु की भी हँसी निकल गई; "मेरा मतलब...कॉलेज का एनुअल डे! तो नेक्स्ट वीक आप छुट्टी ले लेना." अब चूँकि मैंने अभी तक एक भी छुट्टी नहीं ली थी तो मुझे पता था की बॉस छुट्टी दे देंगे, उसी दिन मैंने शाम को सर से बात की तो उन्होंने हाँ कह दिया. इधर आशु ने अपने लिए और मेरे लिए ड्रेस सेलेक्ट करना शुरू कर दिया और मुझे मैसेज करना शुरू कर दिया. ऑफिस में हर कुछ मिनट मेरा फ़ोन बजता रहता और सब कहते की 'क्या बात है? गर्लफ्रेंड बड़ी बेचैन हो रही हे.' आशु ने अपनी ड्रेस फाइनल करने से पहले मेरे कपडे फाइनल कर दिए और मुझे बता कर आर्डर भी कर दिये. उसने अपना आर्डर अपने फ़ोन से किया ताकि मुझे पता न चल जाए की उसने क्या आर्डर किया है, लेकीन डिलीवरी एड्रेस मेरा घर ही था. रविवार को उसका आर्डर डिलीवर हुआ पर मेरे वाले में और टाइम लगना था. आशु ने मुझे अपने कपडे दिखाए भी नहीं और शाम को अपने साथ हॉस्टल ले गई.
आखिर एनुअल डे का दिन आ ही गया, मैं रेडी हो कर आशु के हॉस्टल पहुँचा क्योंकि मुझे उसे वहीँ से पिक करना था. आशु जब मेरे सामने आई तो मैं हाथ बाँधे प्यार से उसे देखने लगा.
उसकी वो लट जो उसके चेहरे पर आ गई थी. वो उसकी साडी.... हाय मन करने लगा की आशु को अभी मंदिर ले जाऊँ और उससे अभी शादी कर लु. इधर आशु की नजर मुझ पर जम गई थी और मुँह खोले मुझे देखते हुए नजदीक आई.
“यार अभी मेरे साथ भागना है?" मैंने आशु से पुछा तो उसने एक दम से अपनी मुंडी हाँ में हिलाई, उसका ये उतावलापन देख मैं हँसने लगा. "आज तो आप मुझे जहाँ कहो वहाँ चलने को तैयार हूँ?" आशु ने इतराते हुए कहा. आशु को पीछे बिठा कर आज मानो ऐसा लग रहा था की एक नव-विवाहित जोड़ा किसी शादी में जा रहा हो. जैसे ही हम कॉलेज के नजदीक पहुँचे तो हमें लाऊड म्युजिक की आवाज आने लगी. बाइक पार्क कर के हम दोनों अंदर आये तो मेरी नजर सबसे पहले सिद्धू भैया पर पडी. सबसे पहले उनसे जा कर गले लगे और हाई-हॅलो हुई! उन्हीं के पास मेरे साथ के सभी दोस्त मिले और तब मुझे ध्यान आया की यहाँ तो सुमन भी आई होगी! मैं मन ही मन तैयारी करने लगा की उससे क्या कहूँगा? आशु को समझ नहीं आया की मैं अचानक से इतना गंभीर क्यों हो गया.फिर वही हुआ जिसका मुझे डर था. सुमन जो की हम दोनों से पहले ही आ चुकी थी वो प्रसाद के मुँह से मेरे और आशु के बारे में सब सुन चुकी थी. हमारी ही तरफ चल कर आ रही थी.
आशु अब भी समझ नहीं पाई थी की भला मैं क्यों परेशान हूँ?!
आज पहलीबार मैं किसी शक़्स के चेहरे को नहीं पढ़ पा रहा था! शायद ये घबराहट थी या फिर आशु को खो देने का डर! सुमन मेरे सामने आकर खड़ी हुई और कुछ बोलने को हुई पर उसे एहसास हुआ की हमारे इर्द-गिर्द बहुत से लोग हैं इसलिए उसने मेरा और आशु का हाथ पकड़ा और हमें एक कोने में ले आई. अभी उसने कुछ कहा नहीं था और इधर मेरा दिल कह रहा था की आज रात ही मैं आशु भगा कर ले जाऊंगा.
"राज जी! ये सच है की आप डॉली से प्यार करते हो?" सुमन की बात सुन आशु घबरा गई और जल्दीबाजी में बीच-बचाव करने को कूद पडी.
"हाँ दीदी...ये...ये तो सब जानते हैं!"
"मैं उस प्यार की बात नहीं कर रही?" सुमन ने गंभीर होते हुए कहा. सुमन का ये रूप देख आशु का सर झुक गया तो मैंने एक गहरी साँस ली और पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा; "हाँ! बहुत प्यार करता हूँ मैं आशु से?"
"ये जानते हुए की आपका उससे रिश्ता क्या है?" सुमन की आँखों मुझे अब एक चिंगारी नजर आने लगी थी.
"खून के रिश्ते से बड़ा प्यार का रिश्ता होता है!" मैंने कहा.
"और आगे क्या करोगे?" सुमन ने पूछा.
"शादी और क्या?!" मैंने सरलता से जवाब दिया.
"रियली? भाग कर? क्योंकि यहाँ तो ये सुनने के बाद आप दोनों को कोई जिन्दा नहीं छोड़ेगे" सुमन ने ताना मारते हुए कहा.
"हम दोनों यहाँ से दूर अपनी नई जिंदगी बसायेंगे" आशु ने भी आत्मविश्वास दिखते हुए कहा.
"रहोगे तो इसी दुनिया में ना? भूल गए आपने ही बताया था की आपके गाँव वाले प्रेमियों को जिन्दा जला देते हैं!" सुमन ने आशु को डाँटते हुए कहा.
"सब याद है, वो आशु की ही माँ थी जिन्हें खेत के बीचों बीच जिन्दा जला दिया गया था." मैंने सुमन की आँखों में देखते हुए कहा. अब ये सुन कर तो सुमन के होश ही उड़ गए!
"क्या? और फिर भी आप?" सुमन ने हैरान होते हुए कहा.
"प्यार होना था. हो गया कोई इसे जमाना माने या ना माने हम तो इस प्यार पर विश्वास करते हैं ना?! जानता हूँ ये लड़ाई बहुत लम्बी है और शायद भागते-भागते जमीन भी कम पड़े पर हम अलग होने से रहे! ज्यादा से ज्यादा हमें मार ही देंगे ना? इससे ज्यादा तो कुछ नहीं कर सकते?"
"आपको ये इतना आसान लग रहा है? दिमाग-विभाग है या इसके (आशु के) प्यार में पड़ कर सब खो दिया आपने? तुझमें (आशु में) अक्ल नहीं है क्या? क्यों अपनी अच्छी खासी जिंदगी ख़राब करना चाहते हो? क्या अच्छा लगता है तुम्हें एक दूसरे में? रोमांस करो खत्म करो! ये शादी-वादी का क्या चक्कर है?!" सुमन की ये बात मुझे बहुत बुरी लगी. ऐसा लगा मानो उसने मेरे प्यार को गाली दी हो.