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Incest अनैतिक संबंध

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मैं अभी आधे रस्ते पहुँचा था की आशु का फ़ोन आ गया, वो पूछने लगी की मैं कबतक आ रहा हूँ? मैंने उसे कहा की मैं अभी रास्ते में हूँ तो उसने कॉल काट दिया. मैंने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और बाइक स्टार्ट कर फिर से चल पडा. जैसे ही मैं घर पहुँचा और दरवाजा खटखटाने लगा की दरवाजा अपने आप खुल गया, मैं धीरे से अंदर आया और सोचा शायद की कहीं आशु दरवाजा बंद करना तो नहीं भूल गई?! पर जब नजर सामने खिड़की पर पड़ी तो मैं अपनी आँख झपकना ही भूल गया.

अब मुझे समझ आ गया की आशु ने वो पैसे क्यों मांगे थे? आशु इठला कर चलते हुए मेरे पास आई और बोली; "क्या देख रहे हो जानू?!" मेरे मुंह से बस; "वाव!!!" निकला और आशु मुस्कुराने लगी. "ये मैंने उसी दिन आर्डर किया था जब आपने मुझे बताया था की थर्टी फर्स्ट को पार्टी में जाना हे. आज अगर मुझे देख कर आपके सारे कलिग आपसे जलने ना लगें तो कहना?" मैं हैरानी से आशु की बात सुनता रहा, कहाँ तो ये लड़की इतनी शर्मीली थी और कहाँ ये आज इस कदर मॉडर्न हो गई है? मुझे आशु वाक़ई में सूंदर लग रही थी पर मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी की वो इस कदर के कपड़े भी पहन सकती हे. मैं अपने ख्यालों में गुम था की आशु ने मुझे वो शादी वाला ब्लैज़र और शर्ट उठा के दी; "और ये आप पहनोगे? मेरे हबी को देख आज उन सारी लड़कियों की जलनी चाहिए." अब मरते न क्या करते मुझे वो पहनना ही पड़ा क्योंकि अगर मैं वो कपडे न पहनता तो सब कहते हूर के संग लंगूर! मैं जानता था की कल ऑफिस में मेरी बहुत खिचाई होगी! पर आशु ये भूल गई थी की ये दिसंबर का महीना है और बाहर ठंड है, उसने इस ड्रेस के चलते कोई गाउन तो आर्डर किया नहीं था! "मैडम जी! बाहर की ठंडी हवा में ये पहन के जाओगी तो 'कुक्कड़' बन जाओगी!" ये सुन कर आशु सोच में पड़ गई. मैंने फ़ोन निकाला और कैब बुक करी और अपना ब्लैज़र उसे उतार के दिया. "पर ये इसके साथ कैसे चलेगा?" आशु ने मायूस होते हुए कहा. "अरे बुद्धू! ये बस कैब आने तक अपने कन्धों पर रख ले और वहाँ पहुँच कर मुझे दे दिओ, वापसी में फिर ऐसे ही करेंगे." ये सुन कर उसका चेहरा फिर से खिल गया.

आखिर कैब आई और हम बारबेक्यू नेशन पहुँचे और जैसा की होना चाहिए था सब आशु को देख कर ताड़ने लगे. सब के सब मुझे आँखों से इशारे कर के पूछने लगे की ये कौन है? "माई गर्लफ्रेंड आशु!" ये कहते हुए मैंने उसका इंट्रो एक-एक कर सबसे कराया.तभी पीछे से सर और मैडम आये और उन्होंने भी आशु से हाई-हॅलो की! वहाँ पर कोई बड़ा फॅमिली टेबल नहीं था बल्कि चार लोगों के लिए बैठने वाले छोटे बूथ थे. मैंने फटाफट आशु का हाथ पकड़ा और खाली बूथ में बैठ गया, सब ने फटफट बूथ पकडे और सर के साथ उसी चटक गधे को अपनी बंदी के साथ बैठना पडा. सारे लौंडे अपनी-अपनी बंदियों को साथ बैठ गए, मेरे सामने वही लड़का बैठा जो मेरे साथ एकाउंट्स में था. उस हरामी की नजर आशु पर उसकी बंदी की नजर मुझ पर थी. मेरा बायाँ हाथ और आशु का दायाँ हाथ टेबल के नीचे था और हम एक दूसरे के हाथ को सहला रहे थे. खाने के लिए जब वेटर आया तो उसने हम से पुछा की हम वेज या नॉन-वेज लेंगे? हमने तीन नॉन-वेज और एक वेज का आर्डर दिया. फिर दूसरा बंदा एक मिनी तंदूर ले कर आया और हमारे सामने टेबल के बीचों बीच बने छेड़ में फिट कर दिया. ये आशु के लिए फर्स्ट टाइम था और वो हैरानी से देख रही थी. फिर एक-एक कर 'सीकें' लगनी शुरू हो गईं फिर मैं और वो लड़का बारी-बारी से उन सीकों को रोल करते और उस पर चटनी लगाने लगे. मैंने वहाँ रखे झंडे को ऊँचा कर दिया; "ये क्यों किया?" आशु ने पूछा. "अब जबतक हम इस झंडे को नीचे नहीं करते ये लोग तंदूरी आइटम सर्व करते रहेंगे." ये सुन कर मेरे सामने बैठी लड़की बोली; "मतलब हम अनलिमिटेड खा सकते हैं?"

"हाँ जी! पर इसी से पेट न भर लीजियेगा, वहाँ मेन कोर्स का बुफे लगा है और वो भी अनलिमिटेड हे." ये सुन कर वो लड़की और आशु एक को देखने लगे और उनके चेहरे से वही लड़कियों ख़ुशी झलकने लगी. ये वही ख़ुशी है जो लड़कियों को फ्री के खाने को देख कर होती हे. वेटर फिर से आया और ड्रिंक्स के लिए पूछने लगा पर मैंने मना कर दिया. उन दोनों ने बहुत फाॅर्स किया पर मैं और आशु अड़े रहे की हम नहीं पीयेंगे.शायद आशु जान गई थी की मेरा खींचाव नशे की तरफ कुछ ज्यादा है! मैं अपनी लिमिट जानता था पर पिछले कुछ महीनों में ये दारु मेरी आदत बनने लगी थी. वैसे भी थर्टी फर्स्ट को ड्रिंक्स बहुत ज्यादा ही महंगी थीं तो ना पीना ही इकोनोमिकॅल था! खेर अच्छे से दबा कर खाना पीना हुआ और समय हुआ विदा लेने का तो सब को हॅपी न्यू इअर कह कर हम दोनों कैब कर के घर लौट आये.

रात के ग्यारह बजे थे और हम अपने कपडे बदल रहे थे. आशु ने हमेशा की तरह मेरी टी-शर्ट पहनी और नीचे उसने सिर्फ अपनी पैंटी पहन राखी थी.मैं पजामा और टी-शर्ट पहन कर रजाई में घुस गया.फिर मुझे याद आया की आशु को दवाई लगा देता हूँ तो मैं वापस उठा और आशु की कमर पर आयोडेक्स लगा दिया. आशु सेधी लेटी थी पीठ के बल, और मैं उसकी तरफ करवट ले कर लेटा था. आशु ने मेरा बायाँ हाथ अपने हाथ में पकड़ रखा था और वो छत की तरफ देखते हुए कुछ सोच रही थी.

"क्या हुआ? क्या सोच रही है?" मैंने आशु से पूछा.

"गाँव में रहते हुए ना तो कभी मुझे ये पता था की क्रिसमस क्या होता है और ना ही की थर्टी फर्स्ट दिसंबर की पार्टी क्या होती है! आप की वजह से मैं यहाँ आई और ये सब देखने को मिला, एक नई जिंदगी जीने का मौका मिला. वरना अब तक तो मेरी शादी हो गई होती और मैं वहां तिल-तिल मर रही होती!"

"बस! नए साल का आगाज इस तरह रोते हुए नहीं करना!" ये कहते हुए मैंने आशु के गाल को चूम लिया. आशु मेरी तरफ पलटने लगी तो उसकी कमर का दर्द उसे परेशान करने लगा, मैं उठ कर पानी गर्म करना चाहता था पर आशु ने मुझे रोक दिया और मेरा सर अपने सीने पर रख कर मेरे बालों में उँगलियाँ फेरने लगी. मैं आशु के दिल की बेकाबू धड़कनें सुन पा रहा था और उसके मन में उठ रहे प्यार को महसूस कर पा रहा था. "कल सुबह पहले डॉक्टर के चलेंगे फिर मैं तुम्हें कॉलेज छोड़ दूँगा और वहाँ से मैं ऑफिस निकल जाऊंगा." मैंने कहा और आशु ने बस 'हम्म्म' कहा. घडी ने टिक-टिक कर रात के बारह बजाये और मैं उठ कर बैठा, पर आशु की आँखें बंद थी. मैंने झुक कर आशु के होठों को बड़ा लम्बा किस किया और कहा; "हॅपी न्यू इअर मेरी जान!" आशु ने अपने दोनों हाथ मेरी गर्दन के पीछे ले जाकर लॉक कर दिया और मुस्कुराते हुए बोली; "हॅपी न्यू इअर जानू! आई लव यू!!!" पर उसे मेरा जवाब सुनने की जरुरत नहीं थी. उसने मुझे अपने ऊपर झुका लिया और मेरे होठों को अपने मुँह में भर कर चूसने लगी.हम इसी तरह एक दूसरे को चूमते हुए सो गये.

सुबह उठ कर मैंने आशु के माथे को चूमा और उसे नए साल की नई सुबह की मुबारकबात दी. आशु अब भी लेटी हुई थी. मैंने उठ कर सबसे पहले उसके लिए बेड टी बनाई और फिर उसे प्यार से जगाया. आशु आँखें मलते हुए उठी और उसने जब मेरे हाथ में चाय का कप देखा तो मुस्कुराने लगी. "मुझे लगा था की ये सब आप शादी के बाद करोगे!" आशु ने कहा. "अरे हम तो साल के पहले दिन से ही आपके गुलाम हो गए!" मैंने हँसते हुए कहा. "इस गुलाम को तो मैं अपने दिल में बसा कर रखुंगी.!" आशु ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा. आशु उठ कर फ्रेश होने चली गई और मैं उसके लिए ऑमलेट बनाने लगा. आशु ऑमलेट की खुशबु सूंघ कर फटाफट बाहर आ गई और कुर्सी पर बैठ गई. मैंने उसे गर्म-गर्म ऑमलेट परोस कर दिया और उसके सर को चूम कर मैं बाथरूम फ्रेश होने चला गया.तैयार हो कर, खा-पी कर हम दोनों निकले.मैंने बाहर से ऑटो किया और पहले आशु को एक डॉक्टर के पास ले गया.डॉक्टर ने बताया की कोई गंभीर बात नहीं है, मोच ही है पर चूँकि सर्दी है इसलिए ज्यादा दर्द कर रही हे. उसने एक पैन किलर दी और गर्म पानी की सिकाई करने को कहा. फिर आशु को मैंने उसके कॉलेज छोड़ा और मैं ऑफिस निकल गया.ऑफिस मैं पहले ही कॉल कर के बता चूका था की में थोड़ा लेट होजाऊंगा इसलिए बॉस ने कुछ नहीं कहा.

समय बीतने लगा और मार्च आ गया... कुछ दिन बाद कॉलेज का एनुअल डे था! आशु को जैसे ही ये पता चला उसने मुझे तुरंत फ़ोन किया; "जानू! नेक्स्ट वीक हमारा एनुअल डे है!" मैंने थोड़ा मजाक करते हुए कहा; "हमारा एनुअल डे?" ये सुन कर रितु की भी हँसी निकल गई; "मेरा मतलब...कॉलेज का एनुअल डे! तो नेक्स्ट वीक आप छुट्टी ले लेना." अब चूँकि मैंने अभी तक एक भी छुट्टी नहीं ली थी तो मुझे पता था की बॉस छुट्टी दे देंगे, उसी दिन मैंने शाम को सर से बात की तो उन्होंने हाँ कह दिया. इधर आशु ने अपने लिए और मेरे लिए ड्रेस सेलेक्ट करना शुरू कर दिया और मुझे मैसेज करना शुरू कर दिया. ऑफिस में हर कुछ मिनट मेरा फ़ोन बजता रहता और सब कहते की 'क्या बात है? गर्लफ्रेंड बड़ी बेचैन हो रही हे.' आशु ने अपनी ड्रेस फाइनल करने से पहले मेरे कपडे फाइनल कर दिए और मुझे बता कर आर्डर भी कर दिये. उसने अपना आर्डर अपने फ़ोन से किया ताकि मुझे पता न चल जाए की उसने क्या आर्डर किया है, लेकीन डिलीवरी एड्रेस मेरा घर ही था. रविवार को उसका आर्डर डिलीवर हुआ पर मेरे वाले में और टाइम लगना था. आशु ने मुझे अपने कपडे दिखाए भी नहीं और शाम को अपने साथ हॉस्टल ले गई.

आखिर एनुअल डे का दिन आ ही गया, मैं रेडी हो कर आशु के हॉस्टल पहुँचा क्योंकि मुझे उसे वहीँ से पिक करना था. आशु जब मेरे सामने आई तो मैं हाथ बाँधे प्यार से उसे देखने लगा.

उसकी वो लट जो उसके चेहरे पर आ गई थी. वो उसकी साडी.... हाय मन करने लगा की आशु को अभी मंदिर ले जाऊँ और उससे अभी शादी कर लु. इधर आशु की नजर मुझ पर जम गई थी और मुँह खोले मुझे देखते हुए नजदीक आई.

“यार अभी मेरे साथ भागना है?" मैंने आशु से पुछा तो उसने एक दम से अपनी मुंडी हाँ में हिलाई, उसका ये उतावलापन देख मैं हँसने लगा. "आज तो आप मुझे जहाँ कहो वहाँ चलने को तैयार हूँ?" आशु ने इतराते हुए कहा. आशु को पीछे बिठा कर आज मानो ऐसा लग रहा था की एक नव-विवाहित जोड़ा किसी शादी में जा रहा हो. जैसे ही हम कॉलेज के नजदीक पहुँचे तो हमें लाऊड म्युजिक की आवाज आने लगी. बाइक पार्क कर के हम दोनों अंदर आये तो मेरी नजर सबसे पहले सिद्धू भैया पर पडी. सबसे पहले उनसे जा कर गले लगे और हाई-हॅलो हुई! उन्हीं के पास मेरे साथ के सभी दोस्त मिले और तब मुझे ध्यान आया की यहाँ तो सुमन भी आई होगी! मैं मन ही मन तैयारी करने लगा की उससे क्या कहूँगा? आशु को समझ नहीं आया की मैं अचानक से इतना गंभीर क्यों हो गया.फिर वही हुआ जिसका मुझे डर था. सुमन जो की हम दोनों से पहले ही आ चुकी थी वो प्रसाद के मुँह से मेरे और आशु के बारे में सब सुन चुकी थी. हमारी ही तरफ चल कर आ रही थी.

आशु अब भी समझ नहीं पाई थी की भला मैं क्यों परेशान हूँ?!

आज पहलीबार मैं किसी शक़्स के चेहरे को नहीं पढ़ पा रहा था! शायद ये घबराहट थी या फिर आशु को खो देने का डर! सुमन मेरे सामने आकर खड़ी हुई और कुछ बोलने को हुई पर उसे एहसास हुआ की हमारे इर्द-गिर्द बहुत से लोग हैं इसलिए उसने मेरा और आशु का हाथ पकड़ा और हमें एक कोने में ले आई. अभी उसने कुछ कहा नहीं था और इधर मेरा दिल कह रहा था की आज रात ही मैं आशु भगा कर ले जाऊंगा.

"राज जी! ये सच है की आप डॉली से प्यार करते हो?" सुमन की बात सुन आशु घबरा गई और जल्दीबाजी में बीच-बचाव करने को कूद पडी.

"हाँ दीदी...ये...ये तो सब जानते हैं!"

"मैं उस प्यार की बात नहीं कर रही?" सुमन ने गंभीर होते हुए कहा. सुमन का ये रूप देख आशु का सर झुक गया तो मैंने एक गहरी साँस ली और पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा; "हाँ! बहुत प्यार करता हूँ मैं आशु से?"

"ये जानते हुए की आपका उससे रिश्ता क्या है?" सुमन की आँखों मुझे अब एक चिंगारी नजर आने लगी थी.

"खून के रिश्ते से बड़ा प्यार का रिश्ता होता है!" मैंने कहा.

"और आगे क्या करोगे?" सुमन ने पूछा.

"शादी और क्या?!" मैंने सरलता से जवाब दिया.

"रियली? भाग कर? क्योंकि यहाँ तो ये सुनने के बाद आप दोनों को कोई जिन्दा नहीं छोड़ेगे" सुमन ने ताना मारते हुए कहा.

"हम दोनों यहाँ से दूर अपनी नई जिंदगी बसायेंगे" आशु ने भी आत्मविश्वास दिखते हुए कहा.

"रहोगे तो इसी दुनिया में ना? भूल गए आपने ही बताया था की आपके गाँव वाले प्रेमियों को जिन्दा जला देते हैं!" सुमन ने आशु को डाँटते हुए कहा.

"सब याद है, वो आशु की ही माँ थी जिन्हें खेत के बीचों बीच जिन्दा जला दिया गया था." मैंने सुमन की आँखों में देखते हुए कहा. अब ये सुन कर तो सुमन के होश ही उड़ गए!

"क्या? और फिर भी आप?" सुमन ने हैरान होते हुए कहा.

"प्यार होना था. हो गया कोई इसे जमाना माने या ना माने हम तो इस प्यार पर विश्वास करते हैं ना?! जानता हूँ ये लड़ाई बहुत लम्बी है और शायद भागते-भागते जमीन भी कम पड़े पर हम अलग होने से रहे! ज्यादा से ज्यादा हमें मार ही देंगे ना? इससे ज्यादा तो कुछ नहीं कर सकते?"

"आपको ये इतना आसान लग रहा है? दिमाग-विभाग है या इसके (आशु के) प्यार में पड़ कर सब खो दिया आपने? तुझमें (आशु में) अक्ल नहीं है क्या? क्यों अपनी अच्छी खासी जिंदगी ख़राब करना चाहते हो? क्या अच्छा लगता है तुम्हें एक दूसरे में? रोमांस करो खत्म करो! ये शादी-वादी का क्या चक्कर है?!" सुमन की ये बात मुझे बहुत बुरी लगी. ऐसा लगा मानो उसने मेरे प्यार को गाली दी हो.
 
मैंने उसकी कलाई पखडी और उसे गुस्से से दिवार के सहारे खड़ा करते हुए उसकी आँखों में आँखें डालते हुए कहा; "तुझे क्या लगता है की मैं इसके जिस्म का भूखा हूँ? या फिर ये सिर्फ मेरे साथ रोमांस करना चाहती है और इसलिए हम शादी कर रहे हैं? शादी हम इसलिए नहीं कर रहे ताकि दिन रात बस रोमांस कर सकें, शादी हम इसलिए कर रहे हैं ताकि ताउम्र हम एक दूसरे के साथ गुजार सके. अपना परिवार बसा सकें, जहाँ हमें एक साथ देख कर कोई हमारे रिश्ते को नहीं प्यार की तारीफ करे. अगर रोमांस ही करना होता तो ये प्यार नहीं वासना होती! हमारे अंदर वासना कतई नहीं, सिर्फ एक दूसरे के लिए प्यार हे.हम दोनों एक घर में पैदा हुए क्या ये मेरी गलती है? या फिर ये मेरी भतीजी बन कर पैदा हुई ये इसकी गलती है? हम अपनी मर्जी से अपने माँ-बाप नहीं चुनते और अगर चुन सकते तो कभी एक परिवार में पैदा नहीं होते.आई डोन्ट गिव फक .... व्हॉट दिस सोयाईटी थिंक ऑफ दिस रिलेशनशिप...व्हॉट मॅटर टू मी इज व्हॉट शी थिंक ऑफ दिस रिलेशनशिप..... अँड शी इज ब्लडी ड्याम प्राउड ऑफ इट!!!!!. थरूआऊट हर चाइल्डहुड शी ह्याज सफर अ लॉट, यू ह्याव नो आईडिया व्हॉट इट फील टू बी दीं अनवॉन्टेड चाइल्ड इन अ फॅमिली. जब ये अपना दर्द भरा बचपन काट रही थी तब तो किसी ने आ कर इसके दिल पर मरहम नहीं लगाया. अगर मेरे प्यार से इसके जख्मों को आराम मिलता है तो दुनिया को कोई हक़ नहीं की वो हमें अलग करे. मेरा प्यार सच्चा है और तुझे कोई हक़ नहीं की मेरे प्यार को गाली दे!” मेरी बातें सुन कर सुमन हैरान थी और जब वो बोली तो बातें बहुत हद्द तक साफ़ हो गई.

“आई एम सॉरी! मेरा वो उदेश्य नहीं था.....मैं बस जानना चाहती थी की आप कितना प्यार करते हो आशु को....आई एम हॅपी फॉर यू गाईज!” सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा और फिर आशु का हाथ पकड़ कर उसे अपने गले लगा लिया. आशु रउवाँसी हो गई थी और उसे ये चिंता सता रही थी की अगर ये राज सुमन ने खोल दिया तो क्या होगा? पर उसकी चिंता का निवारण सुमन ने खुद ही कर दिया; "डॉली रो मत! योवर सिक्रेट इज सेफ विद मी. पर हाँ शादी में जरूर बुलाना!” सुमन ने हँसते हुए कहा. आशु की आँख से आँसू की एक धार बह निकली थी. सुमन ने खुद उसके आँसू पोछे और उसे वाशरूम जाने को कहा. आशु के जाने के बाद सुमन बोली; "वैसे मैंने आज एक बहुत बड़ा सबक सीखा है! अगर किसी से प्यार करो तो उसे बता देना चाहिए, ज्यादा इंतजार करने से वो शक़्स आपसे बहुत दूर चला जाता है!" वो इतना कह कर जाने लगी.

मुझे ऐसा लगा जैसे उसके अंदर कोई दर्द छुपा है और वो उसे छुपा रही हे. मैंने उसका हाथ थामा और उसे अपनी तरफ घुमाया तो पाया की उसकी आँखें नम हैं! मुझे उससे पूछना नहीं पड़ा की उसकी बात का मतलब क्या है क्योंकि उसके आँसू सब बयान कर रहे थे. पर सुमन अपने मन में कुछ रखना नहीं चाहती थी इसलिए बोल पड़ी; "कॉलेज के लास्ट ईयर मुझे आपसे प्यार हुआ पर कहने की हिम्मत नहीं पडी. फिर हमारा साथ छूट गया और शायद मैं भी आपको भूल गई थी. फिर उस दिन आपने मेरे दिल में दुबारा एंट्री ली और क्या एंट्री ली! वो सोया हुआ प्यार फिर जाग गया पर फिर हिम्मत नहीं हुई आपसे कहने की और जब कहना चाहा तो आपने ये बोल कर डरा दिया की आपके गाँव में प्यार करने वालों को मार दिया जाता हे. जैसे-तैसे खुद को संभाल लिया ये सोच कर क्या पता की आगे चल कर हालात सुध जाएं और तब मैं आपसे अपने प्यार का इजहार करूँ! पर सच्ची मैंने बहुत देर कर दी!!!"

"प्यार तो फर्स्ट ईयर से मैं तुम्हें करता था पर लगता था की तुम्हारा कोई बॉयफ्रेंड होगा ही. फिर जब टूशन पढ़ाने आया तो पता चला की तुम तो वेल्ली हो पर कुछ कह पाता उससे पहले ही मुझे मेरे ही घर की ये बात पता लगी और फिर रही सही हिम्मत भी टूट गई! फिर आशु से प्यार हुआ और मैंने ये रिस्क लेने की सोची!" मैंने सुमन को सब सच बता दिया.

"तो ये सब आपके गाँव वालों की वजह से हुआ! कोई बात नहीं ....शायद मेरे नसीब में प्यार था ही नहीं!" सुमन ने नकली हँसी हँसते हुए कहा. मेरे आगे कुछ कहने से पहले ही आशु आ गई और ठीक उसी समय स्टेज पर से सिद्धू भैया ने मेरे नाम की अनाउंसमेंट की और मुझे स्टेज पर बुलाया. हम तीनों स्टेज की तरफ चल दिए; "भाई आज तक हमारे वो गुमनाम शायर जिन्होंने आजतक हमारे कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर टोपर की शोभा बढाई है उनसे दरख्वास्त करूँगा की वो कुछ लाइन आपको सुनायें.मैं स्टेज पर चढ़ा और सिद्धू के कान के पास जा कर बोलै; "कहाँ फँसा दिया भैया आपने!" मैंने ये ध्यान नहीं दिया की उनके हाथ में जो माइक है वो ऑन हे. जब सब ने मेरी ये बात सुनी तो सब लोग हँसने लगे.

"दोस्तों एक शायर की चंद लाइन्स याद आती हैं.....

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,

कहीं ज़मीं कहीं आसमान नहीं मिलता.

तमाम शहर में ऐसा नहीं खुलूस न हो,

जहाँ उम्मीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता.

कहाँ चिराग जलाएं कहाँ गुलाब रखें,

छतें तो मिलती हैं लेकिन माकन नहीं मिलता.

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं,

ज़बान मिली है मगर हम-ज़बान नहीं मिलता.

चिराग जलते ही बिनाई बुझने लगती है,

खुद अपने घर में ही घर का निशान नहीं मिलता......

ये लाइन्स सिर्फ और सिर्फ सुमन के लिए थीं ताकि उसे उसकी कही बात का जवाब मिल जाये. तालियों की गड़गड़ाहट और सीटियों से सब ने अपनी ख़ुशी जाहिर की. मैं स्टेज से उतरा और अब मेरा मन शांत था और कोई डर नहीं था पर शायद आशु को अब भी घबराहट थी. मैं उसके और सुमन के पास पहुंचा और तभी सुमन हम दोनों को छोड़ कर अपनी किसी दोस्त के पास चली गई. "वो किसी से कुछ नहीं कहेगी! मुँह-फ़ट है पर चुगली करना उसकी आदत नही." मैंने कहा और फिर आशु को सारी बात बता दी. वो सब सुन कर उसे इत्मीनान हुआ और वो मुस्कुरा दी. कुछ देर में गाने फिर से बजने लगे, हम दोनों एक चाट वाले स्टाल के पास खड़े थे की तभी वहाँ रक्षित नाम का एक लड़का आया. ये आशु की क्लास में कुछ महीने पहले ही ट्रांसफर ले कर आया था. साल के बीचों बीच आया है मतलब जरूर कोई नामी बाप की औलाद होगा. पहनावा उसका बिलकुल अमीरों जैसा पर वो अक्षय की तरह बावला नहीं था. स्टाइलिश था और जब से हम आये थे उसकी नजर आशु पर ही टिकी थी. रक्षित ने आते ही आशु से पुछा; "शाल वी डांस?" पर आशु ने एक दम से जवाब दिया; "नहीं!" वो हैरानी से उसकी तरफ देखने लगा और इससे पहले की कुछ बोलता आशु ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे डांस फ्लोर पर ले आई.

"क्या हुआ?" मैंने पूछा.

"आई हेट दॅट गाय! ये उसी मंत्री का बेटा है जो उस दिन हमारे घर पर आया था." आशु ने चिढ़ते हुए कहा. अब पहले से ही उसका मूड थोड़ा ऑफ था और मैं उसे और ख़राब नहीं करना चाहता था. मैंने आशु को उसकी कमर से पकड़ा और अपने जिस्म से सटा कर थिरकने लगा.

"जानू! अगर दीदी (सुमन) ने आपसे पहले इजहार किया होता तो?" आशु ने पूछा. अब मैं उससे इस बारे में बात नहीं करना चाहता था. शायद आशु खुद समझ गई; "तो आज आप उनके साथ होते .... और मैं अपनी किस्मत को कोस रही थी!" मैंने आशु के सर को चूमा और कहा; "जान! हमारी किस्मत में एक होना लिखा था. इसलिए आज हम यहाँ हैं." आशु को मेरी बात से इत्मीनान हुआ और अब वो फिर से मुस्कुराने लगी. उस दिन मुझे इस बात का एहसास हुआ की मेरे अंदर इस जमाने से लड़ने की कितनी शक्ति है और आशु भी जान गई की मैं उससे कितना प्यार करता हु. प्रोग्राम खत्म हुआ तो मैं और आशु बाहर आये और अभी मैं बाइक को किक कर ने वाला था की आशु के कुछ दोस्त आये और मुझे हाई बोल कर उससे कुछ बात करने लगे. उनकी बात होने तक मैंने बाइक घुमा ली थी. फिर आशु को हॉस्टल छोड़ कर मैं अपने घर आ गया.

समय का चक्का घूमने लगा और आशु के एक्झाम आ गए, मुझे कहने की जरुरत नहीं की उसने फर्स्ट ईयर में टॉप किया. घर वाले उसकी इस उपलब्धि से बहुत खुश थे और रिजल्ट ले कर हम घर पहुँचे तो उसे इस बार बहुत प्यार मिला. परिवार के प्यार की खुशियाँ देर से ही सही पर उसे अब मिलने लगीं थी.

रिजल्ट की ख़ुशी मना कर मैं और आशु शहर वापस जा रहे थे की रास्ते में मेरी बाइक ख़राब हो गई. बाइक को धक्का लगाते-लगाते हम एक मैकेनिक तक पहुँचे और मैं वहाँ उससे बाइक बनवाने लगा.आशु बोर हो रही थी और ऐसे ही चलते-चलते कुछ आगे चली गई. वहाँ उसने एक झोपडी देखि जहाँ एक बच्चा धुल में खेल रहा था. उसके पास ही उसकी माँ बैठी थी जो सर झुका कर कुछ सोच रही थी. उसका ध्यान जरा भी अपने बच्चे पर नहीं था. उसका पति कहीं मजदूरी करने गया था. चूल्हा ठंडा था और शायद उन बेचारों के पास खाने को भी कुछ नहीं था. आशु वहीँ खडी उस बच्चे और उसकी माँ को देख रही थी. माँ की उम्र आशु से कुछ १-२ साल ही ज्यादा थी और बच्चा करीब १ साल का होगा. बाइक ठीक होने के बाद मैं आशु को ढूँढता हुआ आया तो मैंने देखा की आशु वहाँ उस बच्चे की माँ से बात कर रही हे. मुझे वहाँ खड़ा देख उसने मुझसे पैसे मांगे और उस औरत को देने लगी. कुछ न-नुकुर के बाद उसने पैसे ले लिए उसके बाद जब आशु मेरे पास चल के आई तो उसकी आँखें नम थी. वो मेरा हाथ पकड़ कर मुझे कुछ दूर लाई और आ कर मेरे गले लग गई. आज पहली बार उसने गरीबी देखि थी. गाँव में उसका घर से निकलना कम होता था और जो गरीबी उसने गाँव में देखि थी वो थी मिटटी के घर और हमारे खेतों में काम करने वाले मजदूर!! आशु के लिए तो जिसका घर मिटटी का है या जो दूसरों के खेतों में काम करता है वही गरीब और जिसका घर पक्का बना है या जो अपने खेतों में दूसरों से काम करवाता है वो अमीर.शहर आ कर उसने जब लोगों को भीख मांगते हुए देखा तो उसने सोचा की शायद ये गरीबी होती है पर जब उसे पता चला की इनमें से ज्यादातर एक 'रैकेट' का हिस्सा हैं तो उसके मन के विचार बदलने लगे. भला कोई काम न कर के जानबूझ कर भीक मांगे तो वो काहे का गरीब? पर आज जब उसने उस औरत से उसकी कहानी सुनी तो उसे एहसास हुआ की गरीबी क्या होती हैं!

उसका नाम फुलवा है, वो एक बंजारन हे. उसे एक दूसरे कबीले के लड़के से प्यार हुआ और जब उसने ये बात अपने घर में बताई तो उन्होंने उसे और उस लड़के को कबीले से निकाल दिया. तब से दोनों दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं, इसी बीच उसका ये बेटा पैदा हुआ और अब इन दोनों की जिंदगी तबाह हो गई. उसका पति काम के तलाश में रोज निकलता है और शाम को खाली हाथ लौटता हे. क्या प्यार करने वालों के साथ ऐसा ही होता है? क्यों ये लोग उन्हें चैन से जीने नहीं देते? और हमारा क्या होगा? अगर हमारे साथ ऐसा हुआ तो?" आशु ने रोते-रोते पूछा.

"हमारे साथ ऐसा कुछ नहीं होगा! मैंने सब कुछ प्लान कर रखा हे. मैं ये जॉब क्यों कर रहा हूँ? इसीलिए ना की जब हम घर से भागें तो हम एक नई जिंदगी शुरू कर सके. हाँ मैं मानता हूँ की ये इतना आसान नहीं होगा पर फेलर इज नॉट अन ऑप्शन फॉर अस! वी हॅव टू फाइट टील दीं लास्ट ब्रीथ अँड वी विल् सक्सिड! तुझे बस मुझ पर विश्वास रखना हे." मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा. उस टाइम तो आशु ने मेरी बात मान ली पर अब उसके मन में ये चिंता पैदा हो चुकी थी.

उस दिन के बाद से आशु में अचानक ही बहुत बदलाव आने लगे, उसने बिना मुझे पूछे-बताये एक जॉब ढूँढी और रविवार को मुझे चौंकाते हुए बोली; "जानू! मैंने एक पार्ट टाइम जॉब ढूँढ ली है! नेक्स्ट शनिवार से ज्वाइन कर रही हु." अब ये सुन कर मैं चौंक गया; "क्या? क्या जरुरत है तुझे जॉब करने की?"

"जरुरत है.... बहुत जरुरत है!" आशु ने कुछ सोचते हुए कहा.

"किस बात की जरुरत है?" मैंने आशु से प्यार से पूछा.

"आप कहते हो ना की हमें फ्यूचर के बारे में सोचना चाहिए, तो मैं भी वही कर रही हु. इस पार्ट टाइम जॉब से मुझे ऑफिस का एक्सपीरियंस मिलेगा, कल को जब मैं फुल टाइम जॉब के लिए जाऊँगी तो ये एक्सपीरियंस वहाँ मेरे काम आयेगा." जो वो कह रही थी वो सही भी था.

"पर कॉलेज और जॉब कैसे मैनेज करेगी?" मैंने चिंता जताते हुए कहा.

"वो सब मैं देख लूँगी! आपको कोई शिकायत नहीं मिलेगी." आशु ने आत्मविश्वास से कहा.

"अच्छा एक बात बता, तेरे जॉब ज्वाइन करने के बाद हम शनिवार-रविवार कैसे मिलेंगे?" मैंने पूछा. आशु के पास मेरी इस बात का कोई जवाब नहीं था!

“वी विल फिगर आऊट समथिंग?” आशु बोली.

“नो यू हॅव टू फिगर आऊट समथिंग!” मैंने हँसते हुए सारी बात आशु पर डाल दी, आशु भी मुस्कुराने लगी और उसने जिम्मेदारी ले ली.

मैंने आशु का माथा चूमा और उसने मुझे कस कर अपनी बाहों में जकड़ लिया. मैं खुश था की वो अब जिम्मेदारी उठाना चाहती है, पर वो ये नही जानती थी की ये फैसला इतना आसान नहीं जितना वो सोच रही हे. पिछली बार जब उसने नितु मैडम का प्रोजेक्ट ज्वाइन किया था तब वहाँ मैं भी काम करता था और आशु के लिए मैं सहारा था. पर नए ऑफिस में नए लोगों के साथ एडजस्ट करना इतना आसान नहीं था. कम से कम आशु के लिए तो बिलकुल आसान नहीं होगा, मैं चाहता तो ये बात मैं आशु को समझा सकता था पर वो शायद इस बात को नहीं मानती.जब खुद एक्सपीरियंस करेगी तब मानेगी!

उसके ऑफिस का पहले दिन मैं उसे खुद छोड़ने गया, मेन गेट पर उसे 'ऑल दीं बेस्ट' कहा और आशु मुस्कुराते हुए अंदर चली गई. उस दिन आशु ने मुझे १०० बार फ़ोन किया, कुछ न कुछ पूछने के लिए. वो बहुत नर्व्हस थी और छोटी-छोटी चीजें जैसे की फाईलकैसे सेव्ह करते हैं पूछने लगी. मैं उसकी नर्व्हसनेस समझ सकता था और मैं उससे आज बहुत ज्यादा ही प्यार से बात कर रहा था. ४-५ दिन लगे आशु की नर्व्हसनेस खत्म होने में, पर अब हमारा शनिवार-रविवार मिलने का प्रोग्राम कम होने लगा था. आशु कई बार वीकडेज में भी ऑफिस जाने लगी थी. हमारा प्यार बस फ़ोन कॉल और वीडियो कॉल तक ही सिमट कर रह गया था. अब इसका कोई न कोई इलाज तो निकालना ही था तो मैंने सर से रिक्वेस्ट की ओवरटाइम करने की. पर उन्होंने साफ़ मना कर दिया.
 
इधर महीना भर हुआ की आशु का मन मुझे मिलने के लिए बेचैन होने लगा था. एक दिन की बात थी हम दोनों रात को वीडियो कॉल कर रहे थे, आशु अचानक से रो पडी. "जानू! मुझसे नहीं हो रहा ये सब! आपके बिना मेरा हाल बहुत बुरा है... काम करने का मन नहीं कर रहा. मैं सच में इडियट हूँ, आपने कहा था की हम नहीं मिल पाएंगे पर फिर भी मैंने जिद्द की! प्लीज जानू!....मुझे ये जॉब नहीं करनी....प्लीज......"

"अरे जान तो छोड़ दो ना!" मैंने कहा.

"पर....?" आशु कुछ सोच में पड़ गई.

"यार कोई भी बहाना बना दे और रिजाइन कर दे!" मैंने सरलता से कहा और आशु का चेहरा फिर से खिल गया.अगले ही दिन उसने ऑफिस में ये कह दिया की उसकी शादी तय हो गई है और इसलिए उसे जॉब छोड़ने पड़ रही हे. शाम को जब उसने मुझे ये बात बताई तो मुझे बड़ी हँसी आई. चलो आशु को ये बात समझ आ गई की जिंदगी में कोई भी फैसला लेने से पहले उसके नफा और नुकसान सोच लेने चाहिए. उस दिन के बाद से आशु ने अपना ध्यान पढ़ाई में लगा दिया. शनिवार-रविवार हम दोनों के लिए होते थे. इस डेढ़ दिन में हम एक दूसरे को खूब प्यार करते और दिन बस एक दूसरे की बाहों में ही बीतता.

दीन महिने बीतते गए और फिर आशु का जन्मदिन आ गया.मैंने तो छुट्टी के लिए पहले से ही बोल चूका था इसलिए कोई दिक्कत नहीं हुई. इस बार हम लॉन्ग ड्राइव पर निकले और फिर बाहर ही खाना-पीना हुआ, फिर घर वालों से बात कराई और सब ने इस बार बड़े प्यार से उसे आशीर्वाद दिया. अगले दिन चूँकि ऑफिस था तो इसलिए हम वो रात साथ नहीं गुजार पाए पर आशु को इसका जरा भी गिला नहीं था क्योंकि उसने पूरा दिन बहुत एन्जॉय किया था.

कुछ महीने और बीते फिर मेरा जन्मदिन आया और इस दिन की तैयारी आशु ने करनी थी. रात को ठीक बारह बज कर एक मिनट पर उसने मुझे कॉल किया और बर्थ डे विश किया, फिर अगली सुबह मैं उसे लेने पहुँचा और आशु ने सीधा शॉपिंग जाने को कहा. आशु ने अपनी पूरी एक महीने की सैलरी बचाई थी. थी तो वो चिल्लर ही पर उसका मन था मेरे लिए कुछ खरीदने को इसलिए हम दोनों मॉल आ गये. शर्ट की प्राइस देख कर आशु को उसकी सैलरी पर हँसी आ गई और वो बोली; "इतने में तो मुश्किल से एक शर्ट-पैंट आयेगी."

"वो भी नहीं आएगी!" मैंने हँसते हुए कहा. आशु ने पर्स से एक लॉलीपॉप निकाली और उसे चूसते हुए बोली; "हाँ पर एक तरीका है? आप मुझे उधार दे दो, मैं आपको उसके बदले कुछ देकर कर्जा वापस कर दूँगी!" आशु ने मुझे आँख मारते हुए कहा.

मैं आशु का मतलब समझ गया की घर जा कर मुझे कर्जे के बदले में क्या मिलेगा उसने मुझे २ शर्ट और पैंट ट्राय करने को दीए.इधर मेरा ध्यान उसके लॉलीपॉप चूसते होठों से हट ही नहीं रहा था. आशु भी समझ गई थी की मैं क्या देख रहा हूँ.उसने जबरदस्ती मुझे ट्रायल रूम में धकेल दिया और शर्ट ट्राय कर के दिखाने को कहा. मैंने पहले एक शर्ट और पैंट ट्राय कर के आशु को दिखाई तो वो लॉलीपॉप चूसते हुए नॉटी तरीक से बोली; "हाय!!!!" अब मुझसे उसका ये रूप बर्दाश्त नहीं हो रहा था. मैंने इधर-उधर देखा की कोई हमें देख तो नहीं रहा और फिर आशु का हाथ पकड़ कर उसे अंदर खींच लिया. आशु ने अपने मु से लॉलीपॉप निकाल दी और मैंने अपने दोनों हाथों से उसका चेहरा थामा और उसके गुलाबी होठों को चूम लिया. आशु के मुंह से मुझे स्ट्रॉबेर्री की खुशबु आ रही थी. मैंने अपनी जीभ को आशु के मुंह में दाखिल किया और स्ट्रॉबेर्री फ्लेवर को चखने लगा. पर मेरा लिंग नीचे बेकाबू होने लगा और उसमें दर्द हो रहा था. आशु का हाथ अपने आप ही उस पर आ गया और वो उकडून हो कर नीचे बैठ गई. उसने पैंट की ज़िप खोली और मैंने पैंट का बटन खोला. फिर आशु ने अपनी पतली-पतली उँगलियों से मेरे लिंग को कच्छे से आजाद किया और चमड़ी पीछे खींच कर सुपाडे को मुँह में भर लिया. जैसे ही सुपाडे ने आशु के मुँह में प्रवेश किया और वो आशु के ऊपर वाले तालु से टकराया मेरी सिसकारी निकल गई; "स्स्सस्स्स्स....आशु!!!" और इधर आशु ने अपने मुँह को आगे-पीछे करना शुरू कर दिया. मैं अपने दोनों हाथ पीछे बांधे अपनी कमर आगे-पीछे करने लगा. मैं और आशु बिलकुल एक लय के साथ काम में लगे थे. जब आशु अपना मुँह पीछे खींचती ठीक उसी समय मैं अपनी कमर पीछे खींचता और फिर जैसे ही आशु अपना मुँह आगे लाती मैं भी अपनी कमर उसके मुँह की तरफ धकेल देता. फिर आशु को क्या सूझा की उसने मेरा लिंग अपने मुँह से निकाला और उसके हाथ में जो लॉलीपॉप थी उसे चूसने लगी. फिर अगले ही पल उस लॉलीपॉप को निकाल उसने फिर से मेरा लिंग अपने मुँह में भर लिया. अब वो मेरे लिंग को चूसने लगी जैसे की वो लॉलीपॉप हो, अब मेरी हालत ख़राब होने लगी थी. मैंने अपना लिंग उसके मुँह से निकला और हिलाते हुए अपना सारा माल उसके मुँह में उतार दिया.

घी सा गाढ़ा मेरा माल उसकी जीभ पर निकला और साथ-साथ थोड़ा उसके होठों और नाक पर फ़ैल गया.आशु सब चाट कर पी गई और फिर अपने पर्स से टिश्यू निकाल कर अपना मुँह साफ़ किया.

"नाऊ वी आर एवन!" आशु ने मुस्कुराते हुए कहा. मैंने आशु के गाल पर प्यार से चपत लगाईं और फिर वो मेरे गले लग गई. अपने कपडे दुरुस्त कर हम दोनों बाहर आये, वो तो शुक्र है किसी ने हमें देखा नही. वो शर्ट और पैंट खरीद कर हम दोनों घर आ गये.

घर पहुँचे ही थे की आशु ने किसी को फ़ोन कर के बुला लिया. "कुछ नहीं, बस आपके लिए एक सरप्राइज है!" आशु ने मुझसे पर्स लिया और उसमें से ५०० रूपए निकाल कर पर्स वापस दे दिया. इतने में घर से फ़ोन आ गया और सब ने बड़े बधाइयाँ दी और ऊपर से ताई जी ने शादी की भी बात छेड़ दी! जैसे-तैसे उन्हें टाल कर मैंने कॉल काटा की दरवाजे पर दस्तक हुई. आशु ने खुद दरवाजा खोला और पैसे दे कर कुछ बॉक्स जैसा ले लिया. फिर उस बॉक्स को टेबल पर रख कर बोली; "हॅपी बर्थ डे जानू!" उस बॉक्स में केक था और केक पर भी हैप्पी बर्थडे जानू लिखा था! मैंने कैंडल बुझा कर एक पीस काटा और आशु को खिलाया, आशु ने केक के ऊपर की क्रीम अपनी ऊँगली से निकाली और मेरे होठों पर लगा दी और उचक कर मेरी गोद में चढ़ कर मेरे होठों को चूसने लगी. केक का स्वाद अब मुझे आशु के मुँह से आ रहा था.

आशु की योनी की हालत अब खराब होने लगी थी. मैंने आशु को नीचे उतारा और हम दोनों ने अपने-अपने कपडे निकाल फेंके! आशु पलंग पर अपनी टांगें खोल कर

बैठ गई और तब मुझे उसकी योनी से रस टपकता हुआ दिखाई दिया.

इससे पहले की मैं आगे बढ़ कर वो रस चख पाता, आशु पलट गई और अपनी नितंब मेरी ओर घुमा दी. अब उसकी नितंब देख कर तो लिंग नाचने लगा और ठुमके मार के मुझे उस तरफ चलने को कहने लगा. इधर आशु नीचे को झुक गई और अपनी नितंब ओर ऊपर की तरफ उठा दी.

अब तो मुझे उसकी नितंब और भी बड़ी दिखने लगी. मैंने पीछे से अपना लिंग उसकी योनी में पेल दिया ओर पूरे-पूर धक्के मारने लगा. हर धक्के के साथ लिंग जड़ समेत पूरा अंदर उतर जाता, मेरे हर धक्के से आशु की कराह निकलने लगी थी. "आह...जानू!...उम्म्म...आअह्ह्ह!!!!" दस मिनट की दमदार ठुकाई और आशु के साथ मैं उसकी योनी में ही झड़ गया.

"थैंक यू जान! ये वाला बर्थडे सबसे बेस्ट था!" मैंने सांसें कण्ट्रोल करते हुए कहा. आशु उठी और मेरे पास आ कर मेरे ऊपर चढ़ कर लेट गई. हम घंटे भर तक ऐसे ही पड़े रहे और तब उठे जब पेट में 'गुर्र्ररर' की आवाज आई. आशु ने कुछ खाने के लिए आर्डर किया और हम दोनों मुँह-हाथ-लिंग-योनी धो कर, कपडे पहन कर फिर से एक दूसरे के आगोश में बैठ गये. कुछ देर बाद आशु बोली; "जानू! आपकी 'नितु' का फ़ोन आया था?" मैं ये सुन कर थोड़ा हैरान हुआ क्योंकि वाक़ई में इतने महीनों में उन्होंने मुझे कोई कॉल या मैसेज नहीं किया था. मैं चुप रहा क्योंकि उस टाइम मैं क्या कहता?!

"यही दोस्ती होती है क्या? जब उनकी इज्जत उस ट्रैन के डिब्बे में खतरे में थी तब आप उनके साथ थे ना? उनके डाइवोर्स के वक़्त में आप उनके साथ थे ना? उनके कारन ही आपका नाम कोर्ट केस में घसींटा गया और उन्हीं के कारन आपने वो जॉब छोड़ी और उन्होंने आज तक आपको कभी कॉल या मैसेज किया? वो तो बैंगलोर चली गईं और वहाँ मजे कर रहीं हैं, ते देखो..." ये कहते हुए आशु ने अपने फ़ोन में उनकी फेसबुक प्रोफाइल दिखाई जिसमें वो कहीं घूमने गईं थीं और अपने दोस्तों के साथ 'चिल' कर रहीं थी. "जब इंसान का काम निकल जाता है तो वो उस इंसान को भूल जाता है जो उसके बुरे वक़्त में उसके साथ था." आशु ने बहुत गंभीर होते हुए मुझे कहा ऐसा लगा जैसे वो मुझे जिंदगी का पाठ पढ़ा रही हो!

"यार! मैं मानता हूँ जो तुम कह रही हो वो सही है पर मैंने सिर्फ दोस्ती निभाई थी उसके बदले में अगर उन्होंने मुँह मोड़ लिया तो इसमें मेरी क्या गलती है?" मैंने कहा

पर आशु आज मेरी क्लास लेने के चक्कर में थी; "इसका मतलब ये तो नहीं की लोग आपका फायदा उठाते रहे? मिस्टर कुमार को एक बलि का बकरा चाहिए था तो उन्होंने आपको चुना, इनको अपने पति से प्यार नहीं मिला तो आपसे दोस्ती कर ली और जब दोनों का काम निकल गया तो आप को छोड़ गए! ये कैसी दोस्ती?" आशु की बात सुन मैं मुस्कुरा दिए और मेरी ये मुस्कराहट देखते ही आशु पूछने लगी; "आप क्यों मुस्कुरा रहे हो?"

"जान! मैंने सिवाय तुम्हारे कभी किसी से कुछ एक्सपेक्ट् ही नहीं किया! राखी, सुमन, नितु सब जानती थीं की आज मेरा जन्मदिन है पर मुझे इनके कॉल नहीं आने का जरा भी दुःख नही. हाँ तुमने जो कहा वो सही है और मैं मानता हूँ की मैं लोगों की कुछ ज्यादा ही मदद कर देता हूँ या ये कहूँ की मैं उन्हें ना नहीं कह पाता. आज से मैं खुद को चेंज करूँगा और किसी की भी मदद करने से पहले देख लूँगा की कहीं उसके चक्कर में मेरा नुकसान ना हो जाये." ये सुन कर तो जैसे आशु को लगा की उसका पढ़ाया हुआ सबक मेरे पल्ले पड़ गया और वो खुश हो गई. तभी खाना आ गया और हमने पेट भर के खाया और शाम को मैं आशु को हॉस्टल छोड़ आया.

कुछ दिन बीते और फिर पता चला की कुमार की कंपनी बंद हो गई और मेरे दो कलिग मोहित और प्रफुल की जॉब छूट गई. प्रफुल ने तो नई जॉब जुगाड़ से ढूँढ ली थी पर मोहित के पास अब भी जॉब नहीं थी. मैंने अपनी कंपनी में बात की और सर से उसकी थोड़ी सिफारिश की और सर मान गए पर उसे पोस्टिंग बरेली में मिली.

फिर एक दिन पता चला की सुमन की शादी तय हो गई है, शायद अब उसने मुव्ह ऑन करने का तय किया था. उसकी शादी बड़े धूम-धाम से हुई, पता नहीं मुझे ऐसा लगा की कहीं मेरे सामने जाने से सुमन का जख्म हरा न हो जाये. पर चूँकि शादी का बुलावा हमारे पूरे घर को गया था तो मजबूरन मुझे भी सब के साथ जाना ही पडा. अब सब के सब सबसे पहले मेरे घर आने वाले थे तो एक दिन पहले मुझे और आशु को मिल कर ढंग से सफाई करनी पडी. आशु की सारी चीजें मैंने उसे दे दी, उसकी पैंटी, ब्रा, टॉप्स, एयरिंग्स, कंघी, मंगलसूत्र, चूड़ियाँ, साड़ियाँ सब! पूरे घर को इस कदर साफ़ किया की वहाँ आशु का एक डी एन ए तक नहीं बचा. "हाय! मेरे जिस्म की पूरी महक आपने भगा दी!" आशु मुझे छेड़ते हुए बोली. मैंने आशु को बाहों में भरा और कहा; "घर से ही गई है ना? मेरे जिस्म से तो तेरी महक नहीं गई ना?" ये सुन कर आशु शर्मा गई और मेरे सीने में अपना सर छुपा लिया. जब सब लोग घर आये तो चकाचक घर को देख कर सब ने बड़ी तारीफ की, माँ और ताई जी तो घूम-घूम कर निरक्षण करने लगीं की कहीं कोई गलती निकाल सके. फिर वहाँ से सब आशु के हॉस्टल पहुँचे और वहाँ आंटी जी ने बड़े अच्छे से सब का स्वागत किया. वो पूरा दिन ना तो मैं सुमन से मिल पाया ना ही कोई मौका मिला था.

रात को जब बरात आई और खाना-पीना हुआ उसके बाद सब लोग एक-एक कर अपनी फोटो खिंचवाने स्टेज पर चढ़ने लगे. अब हमें भी चढ़ना था और शगुन देना था. मैं सबसे आखिर में खड़ा था पर सुमन ने फोटो खींचने के बाद मुझे आवाज दे कर बुलाया; 'अरे राज जी! आप कहाँ जा रहे हो? मेरे हस्बैंड से तो मिल लो?" ये कहते हुए उसने मेरा इन्ट्रो अपने हस्बैंड से करवाया| "ये हैं मेरे गुरु जी! कॉलेज में यही मुझे 'एकाउंट्स की शिक्षा देते थे!!!'" सुमन ने हँसते हुए कहा. उसके पति को लगा की मैं उसका टीचर हूँ; "यार इतना भी बुड्ढा मत बना, अभी तो मेरी शादी भी नहीं हुई?" ये सुन कर हम तीनों हँस दिये.

"एनीथिंग स्पेशल दॅट आई शुड नो?" सुमन के पति ने पूछा.

"बहुत बोलती है ये... प्लीज इसे बोलने मत देना वरना ये ऐसा रेडियो है जो शुरू हो जाए तो बंद नहीं होता." मैंने सुमन का मजाक उड़ाते हुए कहा. सुमन ने मुझे प्यार से एक घूँसा मारा. "देख लिया मारती भी है! इन्शुरन्स करवाया है ना अपना? कहीं टूट-फूट जाओ तो!" हम तीनों खूब हांसे और मुझे ये जान कर ख़ुशी हुई की सुमन इस शादी से बहुत खुश हे. पूरी शादी में आशु मुझसे दूर रही थी और माँ और ताई जी के साथ बैठी रहती. एक पल के लिए तो मैं भी सोच में पड़ गया की इतनी समझदार कैसे हो गई?
 
शादी अच्छे से निपट गई और घर वाले अगले दिन वापस गाँव चले गये. फिर वही त्योहारों की झड़ी और इस बार घर वालों ने जबरदस्ती हमें घर पर बुला लिया तो सारे त्यौहार उन्हीं के साथ हँसी-ख़ुशी मनाये गये. अब घर पर थे तो अकेले में बैठने का समय नहीं मिलता था. इसलिए मैं कई बार देर रात को आशु के पास जा कर बैठ जाता और वो कुछ देर हम एक साथ बैठ कर बिताते. घर से बाजार जाने के समय मैं कोई बहाना बना देता और आशु को साथ ले जाता. दिवाली की रात हम सारे एक साथ बैठे थे तो ताऊ जी ने मुझे अपने पास बैठने को बुलाया;

ताऊ जी: वैसे मुझे तेरी तारीफ तेरे सामने नहीं करनी चाहिए पर मुझे तुझ पर बहुत गर्व हे. इस पूरे परिवार में एक तू है जो अपनी सारी जिम्मेदारियाँ उठाता हे. मुझे तुझ में मेरा अक्स दिखता है....!

ये कहते हुए ताऊ जी की आँखें नम हो गई.

पिताजी: भाई साहब सही कहा आपने.पिताजी के गुजरने के बाद सब कुछ आप ने ही तो संभाला था.

ताऊ जी: राज बेटा, जब तूने घर लेने की बात कही तो मैं बता नहीं सकता की मुझे कितना गर्व हुआ तुझ पर.तू अपनी मेहनत के पैसों से अपना घर लेना चाहता है, सच हमारे पूरे खानदान में कभी किसी ने ऐसा नहीं सोचा.

मेरी तारीफ ना तो नारायण भैया के गले उतर रही थी और ना ही भाभी के और वो जैसे-तैसे नकली मुस्कराहट लिए बैठे थे. पर मेरे माता-पिता, ताई जी और ख़ास कर आशु का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था.

पिताजी: बेटा थोड़ा समय निकाल कर खेती-किसानी भी सीख ले ताकि बाद में तुम और नारायण भैया ये सब अच्छे से संभाल सके. तेरी और डॉली की शादी हो जाए तो हम सब तुझे और नारायण भैया को सब दे कर यात्रा पर चले जायेंगे.

ताई जी: बेटा मान भी जा हमारी बात और कर ले शादी!

मैं: माफ़ करना ताई जी मैं कोई जिद्द नहीं कर रहा बस घर खरीदने तक का समय माँग रहा हु.

ताऊ जी: ठीक है बेटा!

तो इस तरह मुझे पता चला की आखिर घर वाले क्यों मुझे अचानक इतनी छूट देने लगे थे. अगले दिन मैं और आशु वापस शहर लौट आये.......

फिर दिन बीतने लगे. मे अपनी नौकरी में व्यस्त था. ऐसे ही समय बितता गया. दिसंबर का महिना आ चुका था. शहर के चर्च मे क्रिसमस की तयारी जोरदार थी.क्रिसमस पर हम दोनों सुबह चर्च गए और वो पूरा दिन हम ने घूमते हुए निकाला. पर अगले दिन घर से खबर आई की ताऊ जी की तबियत ख़राब है, ये सुन कर आशु ने कहा की उसे घर जाना हे. उसकी अटेंडेंस का कोई चक्कर नहीं था तो मैं उसे घर छोड़ आया. उसके यहाँ ना होने के कारन मैंने थर्टी फर्स्ट दिसंबर नहीं मनाया और घर पर ही रहा. जब मैं उसे लेने घर पहुँचा तो आशु बोली; "जानू! जब से मैं पैदा हुई हूँ तब से हमने कभी होली नहीं मनाई|"

"जान! दरअसल वो .... 'काण्ड' होली से कुछ दिन पहले ही हुआ था. इसलिए आज तक इस घर में कभी होली नहीं मनाई गई. पर कोई बात नहीं मैं बात करता हूँ की अगर ताऊ जी मान जाये."

"ठीक है! पर अभी नहीं, अभी उनकी तबियत थोड़ी सी ठीक हुई है और वैसे भी अभी तो दो महीने पड़े हैं." आशु ने कहा. ताऊ जी की तबियत ठीक होने लगी थी इस लिए उन्होंने खुद आशु को वापस जाने को कहा था.

जनवरी खत्म हुआ और फिर कॉलेज का एनुअल डे आ गया.पर मुझे दो दिन के लिए बरेली जाना था. जब मैंने ये बात आशु को बताई तो वो रूठ गई और कहने लगी की वो भी नहीं जाएगी. मैंने बड़ी मुश्किल से उसे जाने को राजी किया ये कह कर की; "ये कॉलेज के दिन फिर दुबारा नहीं आयेंगे." आशु मान गई और मैंने ही उसके लिए एक शानदार ड्रेस सेलेक्ट की. आशु ये नहीं जानती थी की मेरा प्लान क्या है! मोहित चूँकि पहले से ही बरेली में था तो मैंने उससे मदद मांगी की वो काम संभाल ले और मैं एक ही दिन में अपना बचा हुआ काम उसे सौंप कर वापस आ गया.एनुअल डे वाले दिन आशु कॉलेज पहुँच गई थी. मैंने गेट पर से उसे फ़ोन किया और पुछा की वो गई या नहीं? आशु ने बताया की वो पहुँच गई हे. ये सुनने के बाद ही मैं कॉलेज में एंटर हुआ और आशु को ढूंढता हुआ उसके पीछे खड़ा हो गया.मैंने उसकी आँखे मूँद लीं और वो एक दम से हड़बड़ा गई और कहने लगी; "प्लीज... कौन है?... प्लीज…छोड़ो मुझे!" मैंने उसकी आँखों पर से अपने हाथ उठाये और वो मुझे देख कर हैरान हो गई.

हैरान तो मैं भी हुआ क्योंकि आशु आज लग ही इतनी खूबसूरत रही थी. मैं उम्मीद करने लगा की वो आ कर मेरे गले लग जाएगी पर ऐसा नहीं हुआ. मुझे लगा शायद आशु शर्मा रही है पर तभी रक्षित अपने दोनों हाथों में कोल्ड-ड्रिंक लिए वहाँ आ गया.उसने एक कोल्ड ड्रिंक आशु की तरफ बढ़ाई और आशु ने संकुचाते हुए वो कोल्ड-ड्रिंक ले ली. मुझे देख कर रक्षित बोला; "हाई!" पर मैंने उसकी बात को अनसुना कर दिया.

तभी आशु ने मेरा हाथ पकड़ा और रक्षित को 'एक्स्क्युज अस' बोल कर मुझे एक तरफ ले आई.

"आज तो बड़े ड्याशिंग लग रहे हो आप?" आशु बोली.

"थैंक यू ... बट .... आई थोट यू दिडंत लाईक हिम!” मैंने कहा क्योंकि फर्स्ट ईयर के एनुअल डे पर आशु ने यही कहा था.

“आई…रिअलाईज दॅट वी शुड नोट ब्लेम चीलड्रन बिकाज ऑफ देअर प्यारेंट. इट वाजंट हिज फॉल्ट?” आशु ने सोचते हुए कहा.

“फेयर इनफ…. एनी वे यू आर लूकिन फ्याबुलास टूडे!” मैंने आशु को कॉम्पलिमेंट देते हुए कहा.

“शुक्रिया! वैसे आपने तो कहा था की आपको बहुत काम है और आप नहीं आने वाले?" आशु ने मुझसे शिकायत करते हुए कहा.

"भाई अपनी जानेमन को मैं भला कैसे उदास करता?" मैंने आशु का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.

"मैंने सोच लिया था की मैं आप से बात नहीं करुँगी!" आशु ने कहा.

"इसीलिए तो भाग आया!" मैंने हँसते हुए कहा और आशु भी ये सुन कर मुस्कुरा दी. इस बार कुछ डांस पर्फॉर्मन्सेस थीं तो मैं और आशु खड़े वो देखने लगे और लाउड म्यूजिक के शोर में एन्जॉय करने लगे. आशु की कुछ सहेलियाँ आई और वो भी हमारे साथ खड़ी हो कर देखने लगी. ये देख कर मैंने सोचा की चलो आशु ने नए दोस्त बना लिए हैं. निशा के जाने के बाद आशु की जिंदगी में दोस्त ही नहीं थे!

खेर दिन बीते और होली आ गई....

हर साल की तरह इस साल भी हम दोनों होली से एक दिन पहले ही घर आ गये. शाम को होलिका दहन था. जिसके बाद सब घर लौट आये. रात का खाना बन रहा था और आंगन में मैं, नारायण भैया, पिताजी और ताऊ जी बैठे थे.

मैं: ताऊ जी...आप बुरा ना मानें तो आपसे कुछ माँगूँ? (मैंने डरते हुए कहा.)

ताऊ जी: हाँ-हाँ बोल!

मैं: ताऊ जी ... इस बार होली घर पर मनाएँ?

मेरे ये बोलते ही घर भर में सन्नाटा पसर गया, कोई कुछ नहीं बोल रहा था और मैं मन ही मन सोचने लगा की मैंने कुछ ज्यादा ही माँग लिया क्या? ताऊ जी उठे और छत पर चले गए और पिताजी मुझे घूर कर देखने लगे और फिर वो भी ताऊ जी के पीछे छत पर चले गये. कुछ देर बाद मुझे ताऊ जी ने ऊपर से आवाज दी, मैं सोचने लगा की कुछ ज्यादा ही फायदा उठा लिया मैंने घर वालों की छूट का. छत पर पहुँच कर मैं पीछे हाथ बांधे खड़ा हो गया.

ताऊ जी: तुझे पता है की हम क्यों होली नहीं मनाते?

मैंने सर झुकाये हुए ना में गर्दन हिलाई, कारन ये की अगर मैं ये कहता की मुझे पता है तो वो मुझसे पूछते की किस ने बताया और फिर जय और उसके परिवार के साथ हमारे रिश्ते बिगड़ जाते.

ताऊ जी: तुझे नहीं पता, नारायण भैया की पहली बीवी डॉली जिससे हुई वो किसी दूसरे लड़के के साथ घर से भाग गई थी. उस टाइम बहुत बवाल हुआ था. गाँव में हमारी बहुत थू-थू हुई. उस समय गाँव के मुखिया जो आजकल हमारे मंत्री साहब है उन्होंने ......फरमान सुनाया की दोनों को मार दिया जाये. इसलिए हम ....होली नहीं मनाते.(ताऊ जी ने मुझे बडी नैतिकता पूर्ण तरीके से बात बताई.

मैं: तो ताऊ जी हम बाकी त्यौहार क्यों मनाते हैं?

पिताजी: ये घटना होली के आस-पास हुई थी इसलिए हम होली नहीं मनाते. (पिताजी ने ताऊ जी की बात ही दोहराई और 'होली नहीं मनाते' पर बहुत जोर दिया.)

मैं: जो हुआ वो बहुत साल पहले हुआ ना? अब तो सब उसे भूल भी गए हैं! गाँव में ऐसा कौन है जो हमारी इज्जत नहीं करता? हम कब तक इस तरह दब कर रहेंगे? ज़माना बदल रहा है और कल को मेरी शादी होगी तो क्या तब भी हम होली नहीं मनाएँगे?

शायद मेरी बात ताऊ जी को सही लगी इसलिए उन्होंने खुद हा कहा;

ताऊ जी: ठीक है...लड़का ठीक कह रहा हे. कब तक हम उन पुरानी बातों की सजा बच्चों को देंगे. तू कल जा कर बजार से रंग ले आ.

मैं उस समय इतने उत्साह में था की बोल पड़ा; "जी कलर तो मैं शहर से लाया था." ये सुन कर ताऊ जी हंस दिए और मुझे पिताजी से डाँट नहीं पडी.

मुझे उस रात एक बात क्लियर हो गई की मुझ पर और आशु पर जो बचपन से बंदिशें लगाईं गईं थीं वो भाभी (आशु की असली माँ) की वजह से थी. आशु को तो उसकी माँ के कर्मों की सजा दी गई थी. उसकी माँ के कारन ही आशु को बचपन में कोई प्यार नहीं मिला. घर वालों को डर था की कहीं हम दोनों ने भी कुछ ऐसा काण्ड कर दिया तो? पर काण्ड तो होना तय था. क्योंकि ताऊ जी के सख्त नियम कानूनों के कारन ही मैं और आशु इतना नजदीक आये थे.

जब ताऊ जी का फरमान घर में सुनाया गया तो सबसे ज्यादा आशु ही खुश थी. इधर भाभी को मुझसे मजे लेने थे; "मेरी शादी के बाद इस बार मेरी पहली होली है, तो राज भैया मुझे लगाने को कौन से रंग लाये हो?"

"काला" मैंने कहा और जोर से हँसने लगा. आशु भी अपना मुँह छुपा कर हँसने लगी. ताई जी की भी हंसी निकल गई और माँ ने हँसते हुए मुझे मारने के लिए हाथ उठाया पर मारा नही.

"तो राज , पहले से प्लानिंग कर के आया था लगता है?" नारायण भैया ने खीजते हुए कहा.

"मैंने कोई प्लानिंग नहीं बल्कि रिक्वेस्ट की है ताऊ जी से, जो उन्होंने मानी भी हे. कलर्स तो मैं इसलिए लाया था की अगर ताऊ जी मान गए तो होली खेलेंगे वरना इन से हम दिवाली पर रंगोली बनाते" ये सुन कर वो चुप हो गये. अब मुझे कोई और बात छेड़नी थी ताकि माहौल में कोई तनाव न बने. "ताई जी ये कलर्स प्रकर्तिक हैं, इनमें जरा सा भी केमिकल इस्तेमाल नहीं हुआ हे. हमारे त्वचा के लिए ये बहुत अच्छे हैं." मैंने कलर्स की बढ़ाई करते हुए कहा.

"हे राम! इसमें भी मिलावट होने लगी?" ताई जी ने हैरान होते हुए कहा.

"दादी जी आजकल सब चीजों में मिलावट होती है, खाने की हो या पहनने की." आशु ने अपना 'एक्सपर्ट ओपिनियन' देते हुए कहा.

"सच्ची ज़माना बड़ा बदल गया, लालच में इंसान अँधा होने लगा हे." माँ ने कहा. घर की औरतों को बात करने को एक टॉपिक मिल गया था इसलिए मैं चुप-चाप वहाँ से खिसक लिया. मैं छत पर बैठ कर सब को होली के मैसेज फॉरवर्ड कर रहा था की नारायण भैया ऊपर आ गया और मुझसे बोला; "अरे रंग तो ले आये! भांग का क्या?"

"ताऊ जी को पता चल गया ना तो कुटाई होगी दोनों की!" मैंने कहा.

"अरे कुछ नहीं होगा? सब को पिला देते हैं थोड़ी-थोड़ी!" नारायण भैया ने खीसें निपोरते हुए कहा.

"दिमाग खराब है आपका ?" मैंने थोड़ा गुस्सा करते हुए कहा.

"अच्छा अगर पिताजी ने हाँ कर दी फिर तो पीयेगा ना?" नारायण भैया ने कुछ सोचते हुए कहा.

मैंने मना कर दिया क्योंकि एक तो मैं आशु को वादा कर चूका था और दूसरा कॉलेज में एक बार पी थी और हम चार लौंडों ने जो काण्ड किया था की क्या बताऊँ.पर नारायण भैया के गंदे दिमाग में एक गंदा विचार जन्म ले चूका था.
 
अगले दिन सब जल्दी उठे और जैसे मैं नीचे आया तो सब से पहले ताऊ जी ने मेरे माथे पर तिलक लगाया और मैंने उनके पाँव छुए.फिर पिताजी, उसके बाद ताई जी और फिर माँ ने भी मुझे तिलक लगाया और मैंने उनके पाँव छुए.नारायण भैया घर से गायब थे तो भाभी भी मुट्ठी में गुलाल लिए मेरे सामने खड़ी हो गई. पर इससे पहले वो मुझे रंग लगाती आशु एक दम से बीच में आ गई और फ़टाफ़ट मेरे दोनों गाल उसने गुलाल से चुपड़ दिये. वो तो शुक्र है की मैंने आँख बंद कर ली थी वरना आँखों में भी गुलाल चला जाता. मुझे गुलाल लगा कर वो छत पर भाग गई. मैंने थाली से गुलाल उठाया और छत की तरफ भागा.आशु के पास भागने की जगह नहीं बची थी तो वो छत के एक किनारे खड़ी हुई बस 'सॉरी..सॉरी...सॉरी' की रट लगाए हुए थी. मैं बहुत धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा और दोनों हाथों को उसके नरम-नरम गालों पर रगड़ कर गुलाल लगाने लगा. मेरे छू भर लेने से आशु कसमसाने लगी थी और उसकी नजरें नीचे झुकी हुई थी. छत पर कोई नहीं था तो मेरे पास अच्छा मौका था आशु को अपनी बाहों में कस लेने का.मैंने मौके का पूरा फायदा उठाया और आशु को अपनी बाहों में भर लिया. आशु की सांसें भारी होने लगी थी और वो मेरी बाहों से आजाद होने को मचलने लगी. तेजी से सांस लेते हुए आशु मुझसे अलग हुई, मानो जैसे की उसके अंदर कोई आग भड़क उठी हो जिससे उसे जलने का खतरा हो. मैं आशु की तेज सांसें देख रहा था की तभी भाभी ऊपर आ गईं; "अरे राज भैया! हम से भी गुलाल लगवा लो!" पर मेरा मुँह तो आशु ने पहले ही रंग दिया था तो भाभी के लगाने के लिए कोई जगह ही नहीं बची थी. "तुम्हारे ऊपर तो डॉली का रंग चढ़ा हुआ है, अब भला मैं कहाँ रंग लगाऊँ?" भाभी ने मेरी टाँग खींचते हुए कहा.

"माँ ...गर्दन पर लगा दो?" आशु हंसती हुई बोली और ये सुन कर भाभी को मौका मिल गया मुझे छूने का.उन्होंने मेरी टी-शर्ट के गर्दन में एकदम से हाथ डाला और उसे मेरे छाती के स्तनाग्रों की तरफ ले जाने लगी. मुझे ये बहुत अटपटा लगा और मैंने उनका हाथ निकाल दिया. भाभी समझ गई की मुझे बुरा लगा है और आशु भी ये सब साफ़-साफ़ देख पा रही थी. मैं उस वक़्त कहने वाला हुआ था की ये क्या बेहूदगी है पर आशु सामने खड़ी थी इसलिए कुछ नहीं बोला. मैं वापस नीचे जाने लगा तो भाभी पीछे से बोली; "अरे कहाँ जा रहे हो? मुझे तो रंग लगा दो? आज का दिन तो भाभी देवर से सबसे ज्यादा मस्ती करती है और तुम हो की भागे जा रहे हो?" मैंने उनकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और जय से मिलने निकल पडा. उसके खेत में जमावड़ा लगा हुआ था और वहां सब ठंडाई पी रहे थे और पकोड़े खा रहे थे. मुझे देखते ही वो लड़खड़ाता हुआ आया और गले लगा फिर तिलक लगा कर मुझे जबरदस्ती ठंडाई पीने को कहा. अब उसमें मिली थी भाँग और मैं ठहरा वचन बद्ध! इसलिए फिर से घरवालों के डर का बहाना मार दिया. कुछ देर बाद ताऊ जी और पिताजी भी आ गए और वो ये देख कर खुश हुए की मैंने भाँग नहीं पि! पर ताऊ जी और पिताजी ने एक-एक गिलास ठंडाई पि और फिर हम तीनों घर आ गये. नारायण भैया का अब भी कुछ नहीं पता था. घर पहुँच कर सबसे पहले भाभी मुझे देखते हुए बोली; "सारे गाँव से होली खेल लिए पर अपनी इकलौती भाभी से तो खेले ही नहीं?"

"छत पर आशु के सामने मेरी पूरी गर्दन रंग दी आपने और कितनी होली खेलनी है आपको?" मैंने जवाब दिया. फिर मैंने अचानक से झुक कर उनके पाँव छूए और भाभी बुदबुदाते हुए बोली; "पाँव की जगह कुछ और छूते तो मुझे और अच्छा लगता!" मैं उनका मतलब समझ गया पर पिताजी के सामने कहूँ कैसे? इसलिए मैं नहाने के लिए जाने को आंगन की तरफ मुड़ा तो भाभी ने लोटे में घोल रखा रंग पीछे से मेरे सर पर फेंका. ठंडा-ठंडा पानी जैसे शरीर को लगा तो मेरी झुरझुरी छूट गई. "अब तो गए आप?" कहते हुए मैंने ताव में उनके पीछे भागा, भाभी खुद को बचाने को इधर-उधर भागना चाहती थी पर मैंने उनका रास्ता रोका हुआ था. इतने में उन्होंने आशु का हाथ पकड़ा और उसे मेरी तरफ धकेला, मैंने आशु के कंधे पर हाथ रख कर उसे साइड किया और भाभी का दाहिना हाथ पकड़ लिया और उन्हें झटके से खिंचा. भाभी को गिरने को हुईं तो मैंने उन्हें गिरने नहीं दिया और गोद में उठा लिया. उनका वजन सच्ची बहुत ज्यादा था ऊपर से वो मुझसे छूटने के लिए अपने पाँव चला रही थीं तो मेरे लिए उन्हें उठाना और मुश्किल हो गया था. आंगन में एक टब में कुछ कपडे भीग रहे थे मैंने उन्हें ले जा कर उसी टब में छोड़ दिया. जैसे ही भाभी को ठन्डे पानी का एहसास अपनी नितंब और कमर पर हुआ वो चीख पड़ी; "हाय दैय्या! राज तुम सच्ची बड़े खराब हो! मर गई रे!" उन्हें ऐसे तड़पता देख मैं और आशु जोर-जोर से हँसने लगे और भाभी की चीख सुन माँ और ताई जी भी उन्हें टब में ऐसे छटपटाते हुए देख हँसने लगे. इससे पहले की माँ कुछ कहती मैंने खुद ही उन्हें सारी बात बता दी; "शुरू इन्होने किया था मेरे ऊपर रंग डाल कर, मैंने तो बस इनके खेल अंजाम दिया हे." इधर भाभी उठने के लिए कोशिश कर रहीं थीं पर उनकी बड़ी नितंब जैसे टब में फँस गई थी. आखिर मैंने और आशु ने मिल कर उन्हें खड़ा किया और भाभी की चेहरे पर मुस्कराहट आ गई क्योंकि आज जिंदगी में पहली बार मैंने उन्हें इस कदर छुआ था.

मैंने उनकी इस मुस्कराहट को नजरअंदाज किया और अपने कपडे ले कर नहाने घुस गया.करीब पाँच मिनट हुए होंगे की नारायण भैया घर आया और उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा था. उसने सब को डिब्बे से लड्डू निकाल कर दिए और मुझे भी आवाज दी की मैं भी खा लूँ पर मैं तो बाथरूम में था तो मैने कह दिया की आप रख दो मैं नहा कर खा लुंगा. मेरे नहा के आने तक सबने लड्डू खा लिए थे और पूरा डिब्बा साफ़ था. जैसे ही मैं नहा के बाहर आया तो पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था.... आंगन में चारपाई पर ताई जी और माँ लेटे हुए थे, भाभी शायद अपने कमरे में थीं और आशु रसोई के जमीन पर बैठी थी और दिवार से सर लगा कर बैठी थी. ताऊ जी और पिताजी अपने-अपने कमरे में थे और नारायण भैया आंगन में जमीन पर पड़ा था. सब की आँखें खुलीं हुईं थीं पर कोई कुछ बोल नहीं रहा था. ये देखते ही मेरी हालत खराब हो गई. मुझे लगा कहीं सब को कुछ हो तो नहीं गया? मैंने एक-एक कर सब को हिलाया तो सब मुझे बड़ी हैरानी से देखने लगे. अब मुझे शक हुआ की जरूर सब ने भाँग खाई है और खिलाई भी उस कुत्ते नारायण भैया ने है!!! मैं पिताजी के कमरे में गया तो उन्हें भी बैठे हुए पाया और उन्हें जब मैंने हिलाया तो वो शब्दों को बहुत खींच-खींच कर बोले; "इसमें.....भांग.....थी.....!!!" अब मैं समझ गया की नारायण भैया ने भाँग के लड्डू सब को खिला दिए हैं! मैंने पिताजी को सहारा दे कर लिटाया और वो कुछ बुदबुदाने लगे थे. मैं ताऊ जी के कमरे में आया तो वो पता नहीं क्यों रो रहे थे, मैं जानता था की इस हालत में मैं उन्हें कुछ कह भी दूँ तब भी उनका रोना बंद नहीं होगा. मैंने उन्हें भी पुचकारते हुए लिटा दिया. इधर जब मैं वापस आंगन में आया तो माँ और ताई जी की आँख लग गई थी और नारायण भैया भी आँख मूंदें जमीन पर पड़ा था. मैंने भाभी के कमरे में झाँका तो वहां तो अजब काण्ड चल रहा था. वो अपनी योनी को पेटीकोट के ऊपर से खुजा रही थीं और मुँह से पता नहीं क्या बड़बड़ा रही थी. मैंने फटाफट उनके कमरे का दरवाजा बंद किया और कुण्डी लगा कर मैं आशु के पास आया, तो पता नहीं वो उँगलियों पर क्या गिन रही थी? मैंने उसे हिलाया तो उसने मेरी तरफ देखा और फिर पागलों की तरह अपनी उँगलियाँ गिनने लगी. "जानू! I लव ......"इतना बोलते हुए वो रुक गई. अब मेरी फटी की अगर किसी ने सुन लिया तो आज ही हम दोनों को जला कर यहीं आंगन में दफन कर देंगे. मैंने उसे गोद में उठाया और ऊपर उसके कमरे में ला कर लिटाया. मैं उसे लिटा के जाने लगा तो उसने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया और इशारे की आकृति बना कर मुझे किस करना चाहा. मैं उसके हाथ से अपना हाथ छुड़ा रहा था क्योंकि मैं जानता था की अगर कोई ऊपर आ गया तो हम दोनों को देख कर सब का नशा एक झटके में टूट जायेगा! पर आशु पर तो प्यार का भूत सवार हो गया था. पता नहीं उसे आज मेरे अंदर किसकी शक्ल दिख रही थी की वो मुझे बस अपने ऊपर खींच रही थी. "आशु मान जा...हम घर पर हैं! कोई आ जाएगा!" मैंने कहा पर उसने मेरी एक न सुनी और अपने दोनों हाथों के नाखून मेरे हाथों में गाड़ते हुए कस कर पकड़ लिए. आशु के गुलाबी होंठ मुझे अपनी तरफ खींच रहे थे और अब मेरा सब्र भी जवाब देने लगा था. मैंने हार मानते हुए उसके होठों को अपने होठं से छुआ पर इससे पहले की मैं अपनी गर्दन ऊपर कर उठता आशु ने झट से अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन के पीछे लॉक कर दिया और अपने होठों से मेरे होंठ ढक दिये. आशु पर नशा पूरे शबाब था और वो बुरी तरह से मेरे होंठ चूसने लगी. मेरे हाथ उसके जिस्म की बजाये बिस्तर पर ठीके थे और मैं अब भी उसकी गिरफ्त से छूटने को अपना जिस्म पीछे खींच रहा था.

मुझे डर लग रहा था की अगर कोई ऊपर आ गया तो, इसलिए मैंने जोर लगाया और आशु के होठों की गिरफ्त से अलग हुआ. पर ये क्या आशु ने "आई लव यू" रटना शुरू कर दिया. वो तो अपनी आँख भी नहीं झपक रही थी बस लेटे हुए मुझे देख रही थी और आई लव यू की माला रट रही थी. मैंने उस के कमरे को बाहर से कुण्डी लगाईं और रसोई में गया और वहाँ से कटोरी में आम का अचार निकाल लाया. आशु के कमरे की कुण्डी खोली तो छत पर देखते हुए अब भी आई लव यू बड़बड़ा रही थी. मैंने कटोरी से एक आम के अचार का पीस उठाया और आशु के सिरहाने बैठ गया.मुझे अपने पास देखते ही उसने मुझे अपनी बाहों में कस लिया. मैंने आम का पीस उसकी तरफ बढ़ाया तो अपने होंठ एक दम से बंद कर लिए. पर मैंने भी थोड़ा उस्तादी दिखाते हुए पीस वापस कटोरी में रखा और अपनी ऊँगली आशु को चटा दी. ऊँगली में थोड़ा अचार का मसाला लगा था. आशु ने खटास के कारन अपना मुँह खोला और मैंने फटाफट अचार का टुकड़ा उसके मुँह में डाल दिया. आशु एक दम से मुँह बनाते हुए उठ बैठी और उसने वो अचार का पीस उगल दिया. मुझे उसका ऐसा मुँह बनाते हुए देख बहुत हँसी आई पर वो मेरी तरफ सड़ा हुआ मुँह बना कर देखने लगी. "सो जा अब!" मैंने आशु को कहा और उठ कर नीचे आ गया.बारी-बारी कर के सब को अचार चटाया और सब के सब आशु की ही तरह मुँह बना रहे थे और मुझे बहुत हँसी आ रही थी. सबसे आखिर में मैंने नारायण भैया को अचार चटाया तो उस पर जैसे फर्क ही नहीं पड़ा, वो तो अब भी बेसुध से पड़ा था. अब मैं इससे ज्यादा कुछ कर नहीं सकता था तो उसे ऐसे ही छोड़ दिया. बाकी सब के सब नशा होने के कारन सो रहे थे, इधर मुझे भूख लग गई थी. वो तो शुक्र है की घर पर पकोड़े बने थे जिन्हें खा कर मैं अपने कमरे में आ कर सो गया.

शाम को चार बजे उठा तो पाया की घर वाले अब भी सो रहे हे. मैंने अपने लिए चाय बनाई और फिर रात के लिए खाना बनाने लगा. मैं यही सोच रहा था की हरामी नारायण भैया ने ऐसी कौन सी भाँग खिला दी की सब के सब सो रहे हैं? पर फिर जब मुझे अपने कॉलेज वाला किस्सा याद आया तो मुझे याद आया की जब पहली बार मैंने भाँग खाई थी तो मैंने सुबह तक क्या काण्ड किया था! खेर खाना बन गया था और मेरे उठाने के बाद भी कोई नहीं उठा था. सब के सब कुनमुना रहे थे बस.एक बात तो तय थी की कल नारायण भैया की सुताई होना तय है!
 
मैंने अपना खाना खाया और ऊपर आ गया, रात के १ बजे होंगे की मुझ नीचे से आवाज आई; "राज !" मैं फटाफट नीचे आया तो देखा ताई जी और माँ चारपाई पर सर झुकाये बैठे हे. मैंने उन्हें पानी दिया और फुसफुसाते हुए पुछा; "ताई जी भूख लगी है?" उन्होंने हाँ में सर हिलाया तो मैं माँ और उनके लिए खाना परोस लाया. फिर मैंने पिताजी और ताऊ जी को उठाया और उन्हें भी खाना परोस कर दिया. इधर आशु भी नीचे आ गई और उसे देखते ही मैं मुस्कुराया और उसे माँ के पास बैठने को कहा. उसका खाना ले कर उसे दिया और मैं सीढ़ियों पर बैठ गया.तभी भाभी ने दरवाजा खटखटाया, क्योंकि उनके कमरे का दरवाजा मैंने बंद कर दिया था इस डर से की कहीं ताऊ जी और पिताजी उठ गए और उन्हें ऐसी आपत्तिजनक हालत में देख लिया तो! भाभी बाहर आईं और सीधा बाथरूम में घुस गई. वो वापस आईं तो उन्हें भी मैंने ही खाना परोस के दिया. सब ने फटाफट खाना खाया और कोई एक शब्द भी नहीं बोला. खाना खाने के बाद ताऊ जी अपने कमरे से बाहर आये और उन्होंने नारायण भैया को जमीन पर पड़े हुए देखा तो उनका खून खौल गया.उन्होंने ठन्डे पानी की एक बाल्टी उठाई और पूरा का पूरा पानी उस पर उड़ेल दिया. इतना पानी अपने ऊपर पड़ते ही नारायण भैया बुदबुदाता हुआ उठा और ताऊ जी ने उसे एक खींच कर थप्पड़ मारा. नारायण भैया जमीन पर फिर से जा गिरा; "हरामजादे! तेरी हिम्मत कैसे हुई सब को भाँग के लड्डू खिलाने की? वो तो राज यहाँ था तो उसने सब को संभाल लिया वरना यहाँ कोई घुस कर क्या-क्या कर के चला जाता किसी को पता ही नहीं चलता. तुझे जरा भी अक्ल नहीं है की घर में औरतें हैं, तेरी बीवी है, बच्ची है?” पर नारायण भैया को तो जैसे फर्क ही नहीं पड़ रहा था. मैंने भाभी को कहा की इन्हें अंदर ले कर जाओ, तो भाभी ने उन्हें सहारा दे कर उठाया और कमरे में ले गई. इधर पिताजी ताऊ जी की गर्जन सुन कर बाहर आये और मुझे इशारे से अपने पास बुलाया. मैं उनके पास गया और पिताजी का शायद सर घूम रहा था इसलिए मैंने उन्हें सहारा दे कर बैठक में बिठा दिया. सब के सब बैठक में आ कर बैठ गए और मुझसे पूछने लगे की आखिर हुआ क्या था? मैंने उन्हें सारी बात विस्तार से बता दी और अचार वाली बात पर सारे हँसने लगे. पर तभी पिताजी ने पुछा; "तुझे कैसे पता की अचार चटाना है?" अब ये सुन कर मैं फँस गया था. पहले तो सोचा की झूठ बोल दूँ, फिर मैंने सोचा की मेरा किस्सा सुन कर सब हंस पड़ेंगे और घर का माहौल हल्का हो जायेगा इसलिए मैंने अपना किस्सा सुनाना शुरू किया.....

"कॉलेज फर्स्ट ईयर था और होली पर घर नहीं आ पाया था क्योंकि असाइनमेंट्स पूरे नहीं हुए थे. होली के दिन सुबह दोस्त लोग आ गए और मुझे अपने साथ कॉलेज ले आये जहाँ हमने खूब होली खेली! फिर दोपहर को हम वापस हॉस्टल पहुँचे और नाहा धो कर खाना खाने आ गये. आज हॉस्टल में पकोड़े बने थे जो सब ने पेट भर कर खाये. जब वापस कमरे में आये तो मेरा एक दोस्त कहीं से भाँग की गोलियाँ ले आया था. उसने सब को जबरदस्ती खाने को दी ये कह कर की ये भगवान का प्रसाद हे. अब प्रसाद को ना कैसे कहते, जब सब ने एक-एक गोली खा ली तो वो सच बोला की ये भाँग की गोली हे. हम टोटल ४ दोस्त थे, अमन, मनीष और कुणाल. कुणाल को छोड़ कर बाकी तीनों डर गए थे की अब तो हम गए, पता नहीं ये भाँग का नशा क्या करवाएगा.हम ने सुना था की भाँग का नशा बहुत गन्दा होता है और आज जब पहलीबार खाई तो डर हावी हो गया. १५ मिनट तक जब किसी ने कोई उत-पटांग हरकत नहीं की तो हम तीनों ने चैन की साँस ली! हमें लगा की किसी ने बेवकूफ बना कर कुणाल को मीठी गोलियाँ भाँग की गोलियाँ बोल कर पकड़ा दी. ये कहते हुए अमन ने हँसना शुरू किया और उसकी देखा-देखि मैं और मनीष भी हँसने लगा. कुणाल को ताव आया की हम तीनों उसे बेवकूफ कह रहे हैं तो उसने हमें चुनौती दी; 'हिम्मत है तो एक-एक और खा के दिखाओ|' हम तीनों ने भी जोश-जोश में एक-एक गोली और खा ली. और फिर से उस पर हँसने लगे. हम तीनों ये नहीं जानते थे की भाँग का असर हम पर शुरू हो चूका था. तभी तो हम हँसे जा रहे थे. उधर कुणाल बिचारा छोटे बच्चे की तरह रोने लगा था और उसे देख कर हम तीनों पेट पकड़ कर हँस रहे थे. १५ मिनट तक हँसते-हँसते पेट दर्द होने लगा था और बड़ी मुश्किल से हँसी रोकी और तब मनीष ने सब को डरा दिया ये कह कर की हमें भाँग चढ़ गई हे. अब ये सुन कर हम चारों एक दूसरे की शक्ल देख रहे थे की अब हम क्या करेंगे? अमन तो इतना डर गया था की कहने लगा मुझे हॉस्पिटल ले चलो, मैं मरने वाला हु. तो कुणाल बोला की कुछ नहीं होगा थोड़ी देर सो ले ठीक हो जायेगा, पर मनीष को बेचैनी सोने नहीं दे रही थी. इधर मनीष को गर्मी लगने लगी और वो सारे कपडे उतार कर नंगा हो गया और उसने पंखा चला दिया. मुझे भी डर लगने लगा की कहीं मैं मर गया तो? इसलिए मैंने सोचा की ये हॉस्पिटल जाएँ चाहे नहीं मैं तो जा रहा हु. अभी मैं दरवाजे के पास पहुँचा ही था की कुणाल ने हँसते हुए रोक लिया और बोला; 'कहाँ जा रहा है? बड़ी हँसी आ रही थी ना तुझे? और खायेगा?' मैं उस हाथ जोड़ कर मिन्नत करने लगा की भाई माफ़ कर दे, आज के बाद कभी नहीं खाऊँगा ये भाँग का गोला! मैं जैसे-तैसे बाहर आया और घडी देखि ये सोच कर की कहीं हॉस्पिटल बंद तो नहीं हो गया? उस वक़्त बजे थे रात के २, यानी हम चारों शाम के ४ बजे से रात के दो बजे तक ये ड्रामा कर रहे थे. अब हमारा कमरा था चौथी मंजिल पर, इसलिए मैं हमारे कमरे के दरवाजे के सामने लिफ्ट और सीढ़ियों के बीच खड़ा हो कर सोचने लगा की नीचे जाऊँ तो जाऊँ कैसे? अगर लिफ्ट से गया और दरवाजा नहीं खुला तो मैं तो अंदर मर जाऊँगा? और सीढ़ियों से गया तो पता नहीं कितने दिन लगे नीचे उतरने में? मैं खड़ा-खड़ा यही सोच रहा था की हमारे हॉस्टल के वार्डन का लड़का आ गया और मुझे ऐसे सोचते हुए देख कर मुझे झिंझोड़ते हुए पुछा की मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? मैंने उसे बताया की मैं हिसाब लगा रहा हूँ की सिढीयोंसे जाना सही है या लिफ्ट से? ये सुन कर वो बुरी तरह हँसने लगा. क्योंकि वहाँ लिफ्ट थी ही नहीं और जिसे मैं लिफ्ट समझ रहा था वो एक पुरानी शाफ़्ट थी जिसमें बाथरूम की पाइपें लगी थी. पर मैं अब भी नहीं समझ पाया था की हुआ क्या है और ये क्यों हँस रहा है? वो मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे कमरे में ले आया और अंदर का सीन देख कर हैरान हो गया.मनीष पूरा नंगा था और उसने अपने गले में तौलिया बाँध रखा था जैसे की वो सुपरमैन हो और एक पलंग से दूसरे पर कूद रहा था. अमन बिचारा एक कोने में बैठा अपना सर दिवार में मार रहा था और बुदबुदाए जा रहा था; 'अब नहीं खाऊँगा....अब नहीं खाऊँगा....अब नहीं खाऊँगा...' कुणाल फर्श पर उल्टा पड़ा था और चूँकि उसे मछलियां बहुत पसंद थी तो वो खुद को मछली समझ कर फड़फड़ा रहा था और मैं रात के २ बजे से सुबह के ६ बजे तक बाहर खड़ा हो कर हिसाब लगा रहा था की सीढ़यों से जाऊँ या फिर लिफ्ट से!

उसी लड़के ने एक-एक कर हमें आम चटाया और हमारा नशा उतारा.इसलिए उस दिन से कान पकडे की कभी भाँग नहीं खाऊँग.|"

मेरी पूरी राम-कहानी सुन कर सारे घर वाले खूब हँसे और शुक्र है की किसी ने मुझे भाँग खाने के लिए डाँटा नहीं! बात करते-करते सुबह के चार बज गए थे इसलिए ताऊ जी ने कहा की सब कुछ देर आराम कर लें पर मुझे तो सुबह ही निकलना था. पर ताऊ जी ने कहा की आराम कर लो और ७ बजे उठ जाना, इसलिए सारे लोग सो गए और सुबह सात बजे जब मैं उठा तो ताई जी, भाभी और माँ रसोई में नाश्ता बना रहे थे. फ्रेश हो कर नाश्ता किया और ताई जी ने रास्ते के लिए भी बाँध दिया की भूख लगे तो खा लेना. शहर हम ११ बजे पहुँचे और पहले आशु को कॉलेज छोड़ मैं ऑफिस पहुंचा. सर ने थोड़ा डाँटा ... फिर जाने दिया क्योंकि आधा दिन लेट था मैं!

दिन गुजरते गए और आशु के एक्झाम आ गए और उसने फिर से क्लास में टॉप किया! ये ख़ुशी सेलिब्रेट करना तो बनता था. तो रविवार को मैं उसे लंच पर ले जाना चाहता था पर उसके कॉलेज के दोस्त भी साथ हो लिए और सब ने कॉन्ट्री कर के लंच किया.कुछ महीने और बीते और आशु का जन्मदिन आया, मैंने उसे पहले ही बता दिया था की एक दिन पहले ही मैं उसे लेने आऊंगा पर आशु कहने लगी की उसके असाइनमेंट्स पेंडिंग हैं और अपने दोस्तों के साथ उसने कुछ क्लास बंक की थीं तो वो भी कवर करना है उसे! तो मेरा प्लान फुस्स हो गया! पर वो बोली की शाम को उसके सारे दोस्त उसके पीछे पड़े हैं की उन्हें ट्रीट चाहिए तो हम शाम को मिलते हे. अब कहाँ तो मैं सोच रहा था की उसका बर्थडे हम अकेले सेलिब्रेट कर्नेगे और कहाँ उसके दोस्त बीच में आ गये. पर मैं ये सोच कर चुप रहा की कॉलेज के दोस्त कभी-कभी करीब होते हैं और मुझे आशु को थोड़ी आजादी देनी चाहिए वरना उसे लगेगा की मैं पजेसिव हो रहा हूँ! अब मैं भी इस दौर से गुजरा था इसलिए दिमाग का इस्तेमाल किया और आशु के बर्थडे को खराब नहीं किया, बल्कि उसी जोश और उमंग से मनाया जैसे मनाना चाहिए. आशु के चेहरे की ख़ुशी सब कुछ बयान कर रही थी और मेरे लिए वही काफी था.

दिन बीतने लगे और आशु के कॉलेज के दोस्तों ने कोई ट्रिप प्लान कर लिया, मुझे लगा की शायद मुझे भी जाना है पर मुझे तो इनवाईट ही नहीं किया गया क्योंकि वैसे भी मैं कॉलेज वाला नहीं था. आशु ने मुझसे मिन्नत करते हुए जाने की इज्जाजत मांगी तो मैंने उसे मना नहीं किया. इस ट्रिप पर बनने वाली यादें उसे उम्र भर याद रहेगी. जितने दिन वो नहीं थी उतने दिन मैं रोज उसे सुबह-शाम फ़ोन करता और उसका हाल-चाल लेता रहता.जब वो वापस आई तो बहुत खुश थी और मुझे उसने ट्रिप की सारी पिक्चर दिखाईं और वो रविवार मेरा बस आशु की ट्रिप की बातें सुनते हुए निकला. दिन बीत रहे थे और काम की वजह से कई बार मुझे शनिवार को बरेली जाना पड़ता और इसलिए हम शनिवार को मिल नहीं पाते पर रविवार मेरा सिर्फ और सिर्फ आशु के लिए था. उस दिन वो आती तो मेरे लिए खाना बनाती और कॉलेज की सारी बातें बताती और कई बार तो हम रविवार को पढ़ाई भी करते!

दिन बीते...महीने बीते...और सब कुछ सही चल रहा था...... कम से कम मुझे तो यही लग रहा था! मेरे अकाउंट में लाख रुपये कॅश और बाकी के ४ लाख की मैंने एफ डी करा दी थी जो अगले साल मार्च में म्याचूअर होने वाली थी. इधर मैंने बैंगलोर में लोकैलिटी फाइनल कर ली थी. आशु के डाक्यूमेंट्स जैसे पॅन कार्ड, आधार कार्ड और इलेक्शन कार्ड सब मेरे ही एड्रेस से तैयार हो गए थे. आशु का बैंक अकाउंट भी खोला जा चूका था जिसके बारे में मेरे और आशु के आलावा किसी को कोई भनक नहीं थी. हमारे गायब होते ही सब मेरा अकाउंट चेक करते पर किसी को तो पता नहीं की आशु का भी कोई बैंक अकाउंट है! मुझे बस भागने से कुछ दिन पहले अपने अकाउंट से सारे पैसे निकाल कर आशु के बैंक में कॅश जमा करने थे. बस एक ही काम बचा था वो था ट्रैन की टिकट, जिसे मैंने पहले बुक नहीं कर सकता था. कारन ये की जिस दिन हम भागते उस दिन के चार्ट में हमारा नाम होता और सब को पता चल जाता की ये दोनों कहाँ भागे हे. इसलिए जिस दिन भागना था उससे एक दिन पहले मुझे तत्काल टिकट लेनी थी. वो भी कुछ इस तरह की लखनऊ से वाराणसी पहुँचने के बाद आधे घंटे के अंदर ही दूसरी ट्रैन चाहिए थी जो हमें मुंबई उतारती और वहाँ से फिर आधे घंटे में दूसरी टिकट जो बैंगलोर छोड़ती! मैंने एक बैक-आप प्लान भी बना रखा था की अगर ट्रैन लेट हो गई तो हमें बस लेनी होगी. लखनऊ में कहाँ से ट्रैन पकड़नी थी वी जगह भी तय थी. स्टेशन से ट्रैन पकड़ना खतरनाक था क्योंकि सब सबसे पहले हमें ढूंढते हुए वहीँ आते.इसलिए मैंने रेलवे फाटक देख रखा था. इस फाटक पर हमेशा जाम रहता था और हरबार ट्रैन यहाँ स्लो होती और फिर करीब मिनट भर बाद ही आगे जाती थी. किसी भी हालत में कोई भी हमें ढूंढता हुआ यहाँ नहीं आ सकता था! मतलब प्लान बिलकुल सेट था और मैंने उसमें कोई भी लूपहोल नहीं छोड़ा था!!!!

खेर ये तो रही प्लान की बात, पर अब तो मेरा जन्मदिन आ ने वाला था और क्योंकि इस बार जन्मदिन वीकडे पर पड़ना था तो मैंने पहले ही छुट्टी ले ली थी. प्लान तो था की आशु को में एक दिन पहले ही उसके हॉस्टल से ले आऊंगा पर जब उसने बताया की उसके असाइनमेंट्स पेंडिंग हैं और कुछ लेक्चर भी हैं तो मैंने उससे कहा की अगले दिन वो हाल्फ डे में इधर भाग आये.

दो तारिख आई.मेरा जन्मदिन अगले दिन था और घडी में रात के साढ़े बारह बजने को आये थे पर अभी तक आशु ने मुझे कॉल करके विश नहीं किया था. हर साल वो ठीक बारह बज कर एक मिनट पर मुझे काल किया करती थी पर इस बार इतनी लेट कैसे हो गई?! फिर मैंने सोचा की शायद कॉलेज से थक कर आयी होगी और सो गई होगी, कोई बात नहीं कल विश कर देगी ये सोचते हुए मैंने फ़ोन को तकिये के नीचे रख दिया और तभी मेरे फ़ोन पर बर्थडे के विश वाला मैसेज आया जिसे देख कर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई और मैंने जवाब में उसे ढेर सारी चुम्मियों वाली स्माइली के साथ थैंक यू का मैसेज भेजा पर उसके बाद वो ऑफलाइन हो गई. मैंने बात को दरगुज़र किया और मुस्कुराते हुए सो गया.

सुबह से ऑफिस के सभी दोस्तों के मैसेज आने लगे थे, घर से भी फ़ोन पर बधाइयाँ आने लगी थी. आशु के आने तक मैं बस यही सोच रहा था की घर से भागने से पहले ये मेरा आखरी जन्मदिन होगा और फिर अगले जन्मदिन पर मैं और आशु एक साथ बैंगलोर में अपनी नई जिंदगी शुरू कर रहे होंगे.मोहित और प्रफुल ने इस बार जरूर कहा था की पार्टी करते हैं पर मैंने उन्हें ये कह कर टाल दिया की अगर आशु को पार्टी दिए बिना तुम्हारे साथ पार्टी की तो वो नराज हो जायेगी. दोनों ने मिल कर मेरा बड़ा मजाक उड़ाया की देखो शादी से पहले ये हाल है तो शादी के बाद क्या होगा?!

मैं फ्रेश हो कर नाश्ता बना रहा था की तभी आशु का मैसेज आया की वो बारह बजे आएगी और मैं इस ख़ुशी में अपने फोन पर गाने लगा कर कुछ ख़ास बनाने की तैयारी करने लगा और नाचता हुआ इधर से उधर घर में घूम रहा था. साढ़े बारह बजे दरवाजे पर दस्तक हुई, तो मैंने मुस्कुराते हुए दरवाजा खोला और आशु को प्यार से घर के अंदर आने का निमंत्रण दिया. आशु भी अंदर आ गई और उसने मेरे फ़ोन में बज रहे गानों को एकदम से बंद कर दिया. मैंने आगे बढ़ कर उसे गले लगाना चाहा तो उसने अपने हाथ को मेरी छाती पर रख के रोक दिया. मुझे उसका ये व्यवहार बड़ा अजीब लगा पर जब उसके चेहरे पर नजर गई तो वो बहुत सीरियस थी.

"आपसे कुछ बात करनी हे." इतना कह कर उसने मेरे दोनों हाथ पकड़ कर मुझे पलंग पर बिठाते हुए कहा. वो ठीक मेरे सामने खड़ी हो गई और मेरी आँखों में देखते हुए बोली;

आशु: मैंने बहुत सोचा… ह....हमारा ये....घर से भागने .....का प्लान सही नहीं!

आशु ने बहुत डरते-डरते कहा, पहले तो मुझे बहुत गुस्सा आया पर फिर मुझे एहसास हुआ की जब हम कोई खतरनाक कदम उठाते हैं तो दिल में एक डर होता है और मुझे आशु के इसी डर का निवारण करना होगा.

मैं: अच्छा पहले ये बता की तुझे क्यों लगता है की ये फैसला गलत है? (मैंने बहुत प्यार से पूछा.)

आशु: कोई स्टेबल लाइफ नहीं होगी हमारी.... दरबदर की ठोकरें खाना... और फिर हर पल डर के साये में जीना....

मैं: जान! थोड़ा स्ट्रगल है पर वो हम मिल कर एक साथ करेंगे! लाइफ में हर इंसान को थोड़ा-बहुत स्ट्रगल तो करना ही पड़ता है ना? फिर तु अकेली नहीं हो, मैं हूँ ना तुम्हारे साथ.

आशु: पर मुझसे ये स्ट्रगल नहीं होगा! एक महीने की जॉब में मेरा मन ऊब गया और मैं ही जानती हूँ की ये पार्ट टाइम जॉब मैंने कैसे किया, तो फुल टाइम जॉब कैसे करुँगी?

मैं: तुझे कोई जॉब करने की जरुरत नहीं हे. मैंने तुम्हें जब शादी के लिए उस दिन प्रोपोज़ किया था. तब तुमसे वादा किया था की मैं तुझे पलकों पर बिठा कर रखूँगा, कभी कोई तकलीफ नहीं होने दूँगा! ये देख ४ लाख की एफ डी और आज की डेट में मेरे पास १ लाख रुपया कॅश में है, हमारे भागने तक अकाउंट में कम से कम ७ लाख होंगे! इतने पैसों से हम नै जिंदगी शुरू कर सकते हैं!

मैंने आशु को एफ डी की रिसीप्ट और बैंक की पास बुक दिखाई पर उसे तसल्ली अब भी नहीं हुई थी.

मैं: अच्छा ये देख, बैंगलोर में हमें किस लोकैलिटी में रहना है, वहाँ तक कैसे पहुँचना है और जॉब ऑफर्स सब लिखे हैं इसमें.

ये कहते हुए मैंने आशु को अपनी डायरी दिखाई जिसमें मैंने सब कुछ फाइनल कर के रेडी कर रखा था. पर मुझे ये जानकर हैरानी हुई की आशु का डायरी देखने में जरा भी इंटरेस्ट नहीं था. मतलब की बात कुछ और थी और अभी तक वो बस बहाने बना रही थी.

मैं: देख आशु, तो कुछ छुपा रही है मुझसे.यूँ बहाने मत बना और सच-सच बता की बात क्या है? (मैंने आशु के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थामते हुए कहा.)

आशु की नजरें झुक गई और उसने सच बोलने में पूरी शक्ति लगा दी;

आशु: मैं किसी और को चाहने लगी हूँ?

अब ये सुनते ही मेरा खून खोल गया और मैंने आशु के चेहरे पर से अपने हाथ हटाए और एक जोरदार तमाचा उसके बाएँ गाल पर मारा.

मैं: कौन है वो हरामी?

मैंने गरजते हुए कहा, पर आशु डर के मारे सर झुकाये रोने लगी और कुछ नहीं बोली. मैंने आशु के दोनों कन्धों को पकड़ कर उसे झिंझोड़ा और उससे दुबारा पुछा;

मैं: बोल कौन है वो?

आशु सहम गई और डरते हुए बोली;

आशु: र....रक्षित

ये नाम सुन कर मैंने उसके कन्धों को अपनी पकड़ से आजाद कर दिया और सर झुका कर बैठ गया.मेरा मन मान ही नहीं रहा था की ये सब हो रहा है! तभी आशु ने हिम्मत बटोरी और बोली;

आशु: वो भी मुझसे बहुत प्यार करता है और शादी करना चाहता है!

ये सुन कर मैंने आशु की आँखों में देखा तो मुझे उसकी आँखों में वही आत्मविश्वास नजर आया जो उस दिन दिखा था जब आशु ने मुझसे अपने प्यार का इजहार किया था. मेरी आँखों में आँसू आ गए थे क्योंकि मेरे सारे सपने चकना चूर हो चुका था. और रह-रह कर मेरे दिल में गुस्सा भरने लगा था. ऐसा गुस्सा जो कभी भी फुट सकता था. पर आशु इस बात से अनजान और मेरी आँखों में आँसू देख उसमें हिम्मत आने लगी थी. आज तो जैसे उसने इस रिश्ते को हमेशा से खत्म कर देने की कसम खा ली थी इसलिए वो आगे बोली; "कॉलेज ट्रिप पर हम बहुत नजदीक आ गए! उसने मुझसे ना केवल अपने प्यार का इजहार किया बल्कि मुझे शादी के लिए भी प्रोपोज़ किया! मैं उसे मना नहीं कर पाई क्योंकि वो मुझे एक स्टेबल लाइफ दे सकता है! फिर आप ये भी तो देखो की आपकी और मेरी उम्र में कितना फासला है?!
 
आशु को एहसास नहीं हुआ की जोश-जोश में वो असली सच बोल गई जिसे सुनते ही मेरा गुस्सा फुट पड़ा और मैंने एक जोरदार झापड़ उसके गाल पर मारा और उसे जमीन पर धकेल दिया. मैं बहुत जोर से उस पर चिल्लाया; "ये था ना तेरा प्यार? तुझे सिर्फ ऐशों-आराम की जिंदगी जीनी थी ना? मन भर गया न तेरा मुझसे? तो साफ़-साफ़ बोल देती ये उम्र का फासला कहाँ से आ गया? ये तब याद नहीं आया था जब मुझसे पहली बार अपने प्यार का इज़हार किया था तूने?हरामी! मैं ही बावला था जो तेरे चक्कर में पड़ गया.” आशु का बायाँ हाथ उसके गाल पर था और वो सर झुकाये वहीँ खड़ी थी. पर उसे देख कर मेरा गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था. मैंने एक आखरी बार कोशिश की और अपने दोनों हाथों से उसके चेहरे को थामा, उसकी आँखों में झांकते हुए कहा: "प्लीज बोल दे तू मजाक कर रही थी? प्लीज .... प्लीज .... मैं तेरे आगे हाथ जोड़ता हु." पर उसकी आँखों में आँसूँ बह निकले थे और उसकी आंखें सब सच बता रहीं थी की अब तक जिस दिल पर मेरा नाम लिखा था उसे तो वो कब का अपने जिस्म से निकाल कर कचरे में डाल चुकी हे. "तू...तू जानती है वो लड़का किसका बेटा है? और उसके बाप ने तेरे....." मेरे आगे कहने से पहले ही आशु ने हाँ में सर हिलाया और अपने आँसूँ पोछते हुए बोली; "जानती हूँ... उसके पापा ने पंचायत में मेरी माँ को मौत की सजा सुनाई थी."

"और ये जानते हुए भी तू उससे प्यार करती है?"

"गलती मेरी माँ की थी. उसने शादीशुदा होते हुए भी किसी और से प्यार किया." आशु ने सर झुकाये हुए कहा, जैसे की उसे अपनी माँ के किये पर शर्म आ रही थी.

"गलती? और जो तूने की वो क्या थी?" मेरा मतलब हम दोनों के प्यार से था.

"उसी गलती को तो सुधारना चाहती हु." उसका जवाब सुनते ही मेरे तन बदन में आग लग गई और मैंने उसके गाल पर एक और तमाचा जड़ दिया.

"तो ये प्यार तेरे लिए गलती था? उस टाइम तो तू मरने के लिए तैयार थी और अब तुझे वही प्यार गलती लग रहा है?" आशु फिर चुप हो गई थी. अब मेरे अंदर कुछ भी नहीं बचा था. मैं हार मानते हुए अपने घुटनों के बल आ गिरा और अपने दोनों हाथों से अपने सर को पकड़ा. मेरी आँखों से खून के आँसूँ बह निकले थे; "क्यों? .... क्यों किया तूने ऐसा मेरे साथ? क्यों मुझ जैसे पत्थर दिल को प्यार करने पर मजबूर किया और जब तेरा दिल भर गया तो मुझे छोड़ दिया. मैंने मना किया था...कहा था ....पर..." मैंने फूटफूटकर रोते हुए कहा.

आशु खड़ी होकर मेरे पास आई मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोली; "हम अच्छे दोस्त तो रह सकते हैं?" ये सुनते ही मैंने उसका हाथ झिड़क दिया; "फक यू अँड फक योवर दोस्ती! नाऊ गेट दीं फक आऊट ऑफ माई हाऊस! अँड आई कर्स यू…. आई कर्स यू दॅट यू विल बी नेवर बी हॅपी… यू विल सफर… सो ब्याड दॅट एवरी डे… एवरी फकिंग डे विल् बी लाईक हेल फॉर यू! यू विल बिग फॉर दिस मिजरी टू एंड बट इट विल गेट वॉर्स ….वॉर्स टील एवरीथिंग यू लव इज लॉस्ट फॉरएवर!” इतना सुन के आशु रोती-बिलखती हुई दरवाजा जोर से बंद कर के चली गई.

उसके जाने के बाद तो जैसे मेरे जिस्म में अब जान ही नहीं बची थी और मैं निढाल होकर उसी जमीन पर गिर पड़ा और रोता रहा. रह-रह कर आशु की सारी बातें याद आने लगी जिससे दिमाग में और गुस्सा आता और गुस्से में आ कर मैं जमीन में मुक्के मारने लगता पर मेरे दिल का दर्द बढ़ता ही जा रहा था. शाम ५ बजे तक मैं जमीन पर पड़ा हुआ यूँ ही रोता रहा, पर जब फिर भी दिल का दर्द कम नहीं हुआ तो मैं उठा और अपने दिल के दर्द को कम करने के लिए दारु लेने निकल पडा.

जेब में जितने पैसे थे सबकी दारु खरीद ली और घर लौट आया. जैसे ही दारु की बोतल खोलने लगा तो वो दिन याद आया जब आशु से वादा किया था की मैं कभी शराब को हाथ नहीं लगाऊँगा. जैसे ही आशु की याद आई अंदर गुस्सा भरने लगा और जोश में आ कर मैंने बोतल सीधा मुँह से लगाईं और एक बड़ा घूँट भरा, जैसे ही घूँट गले से निकला तो गला जलने लगा. पर ये जलन उस दर्द से तो कम थी जो दिल में हो रहा था. अगला घूँट भरा तो वो दिन याद आने लगा जब आशु से मैंने अपने दिल की बात की कही, वो हमारा रोज फ़ोन पर बात करना ... उसका बार-बार मेरी बाहों में सिमट जाना.... उसका बार-बार मुझे किस करना और बेकाबू हो जाना.... वो हर एक पल जो मैंने उसके साथ बिताया था उसे याद कर के मैं पूरी की पूरी बोतल गटक गया और फिर बेसुध वहीँ जमीन पर लेट गया.मुझे कोई होश-खबर नहीं थी की मैं कहाँ पड़ा हूँ, सुबह कब हुई पता ही नहीं चला. सुबह के ग्यारह बजे मेरे फ़ोन की घंटी ताबड़तोड़ बजने लगी और मैं कुनमुनाता हुआ उठा और बिना देखे ही फ़ोन अपने कान पर लगा लिया;

मैं: हम्म्म...

बॉस: कहाँ पर है?

मैं: ममम...

बॉस: ग्यारह बज रहे हैं! तू अभी तक घर पर पड़ा है? शर्मा जी की फाइल कौन देगा? जल्दी ऑफिस आ!

ये सुनकर मुझे थोड़ा होश आया पर सर दर्द से फटा जा रहा था और बॉस की जोरदार आवाज कानों में दर्द करने लगी थी. इसलिए मैंने उनका फ़ोन ऐसे ही जमीन पर रख दिया और अपनी ताक़त बटोर के उठने को हुआ तो लड़खड़ा गया.फिर मैंने दुबारा उठने की कोशिश नहीं की और फिर से सो गया.करीब १ बजे फिर से बॉस का फ़ोन आया पर मैं ने फ़ोन नहीं उठाया और फ़ोन ही बंद कर दिया. उस समय मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था बस मुझे नशे में सोना था और ये भी होश नहीं था की मैं फर्श पर ही नींद में पेशाब रहा हु. ५ बजे आँख खुली और मैं उठा, कमर से नीचे के सारे कपडे मेरे ही पेशाब से गीले थे. मैं उठा और जैसे-तैसे खड़ा हुआ और बाथरूम में गया और अपने सारे कपडे उतार दिए और बाल्टी में फेंक दिए और नंगा ही कमरे में आया. अलमारी की तरफ गया और उसमें से एक कच्छा निकाला और एक बनियान निकाली और उसे पहन के किचन से वाइपर उठा के फर्श पर पड़े अपने पिशाब को बाथरूम की तरफ खींच दिया और वाइपर वहीँ पटक दिया. कमरे की खिड़कियाँ खोली और तभी याद आया की आशु वहीँ खड़ी हो कर बाहर झाँका करती थी. फिर से मन में गुस्सा भरने लगा और शराब की दूसरी बोतल निकाली पर इससे पहले की उसे खोलता बाजु वाले अंकल ने घंटी बजाई. मैंने दरवाजा खोला तो उन्होंने मुझसे अपने घर की चाभी माँगी और मेरी हालत देख कर समझ गए की मैंने बहुत पी रखी हे. उनहोने कुछ नहीं कहा बस 'एन्जॉय' कहते हुए निकल गये. मैंने दरवाजा ऐसे ही भेड़ दिया पर दरवाजा लॉक नहीं हुआ.

मैं आकर उसी खिड़की के सामने जमीन पर बैठ गया, पीठ दिवार से लगा कर दारु की बोतल खोली और सीधा ही उसे अपने होठों से लगाया और एक बड़ा से घूँट पी गया.आज मुझे उतनी जलन नहीं हुई जितनी कल हुई थी. पास ही फ़ोन पड़ा था उसे उठाया, फिर याद आया की सुबह बॉस ने कॉल किया था और फिर फ़ोन वापस स्विच ऑफ ही छोड़ दिया. अगला घूँट पीते ही दरवाजा खुला और मेरे ऑफिस का कलिग मोहित अंदर आया और मुझे जमीन पर बैठे दारु पीते देख बोला; "अबे साले! बॉस की वहाँ जली हुई है तेरी वजह से और तू यहाँ दारु पी रहा है?" मैंने उसकी तरफ देखा पर बोला कुछ नहीं.बस दारु का एक और घूँट पिया."अबे दिमाग ख़राब हो गया है क्या तेरा?" उसने मुझे झिंझोड़ते हुए कहा पर मैं अब भी कुछ नहीं बोल रहा था बस एक-एक घूँट कर के दारु पिए जा रहा था. मोहित मुझे बहुत अच्छे से जानता था की मैं कभी इतनी नहीं पीता, हमेशा लिमिट पि है मैंने और आज इस तरह मुझे बिना रुके पीता हुआ देख वो भी परेशान होगया.मेरे हाथ से बोतल छीन ली और बोला; "अबे रुक जा! हरामी पिए जा रहा है, बता तो सही क्या हुआ?" मैंने अब भी उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया बस उससे बोतल लेने लगा तो उसने बोतल नहीं दी और दूर खिड़की के पास खड़ा हो कर पूछने लगा. जब मैं कुछ नहीं बोला तो वो समझ गया की ये दिल का मामला हे. इधर मैं भी ढीठ था तो मैं उठ के उससे जबरदस्ती बोतल छीन के ले आया और वापस नीचे बैठ के पीने लगा. "यार पागल मत बन! उस लड़की के चक़्कर में ऐसा मत कर! बीमार पढ़ जायेगा."उसने फिर से मेरे हाथ से बोतल खींचनी चाही तो मैं बुदबुदाते हुए बोला: "मरूँगा तो नहीं ना?"

"पागल हो गया है तू?" उसने गुस्से से मुझे डाँटते हुए कहा. "ये सब छोड़... ये बता ... माल है तेरे पास?" मैंने मोहित से पूछा तो वो गुस्सा करने लगा. "यार है तो दे दे वरना मैं बाहर से ले आता हु." ये कह कर मैं उठा तो मोहित ने मुझे संभाला. वो जानता था ऐसी हालत में मैं बाहर गया तो पक्का कुछ न कुछ काण्ड हो जायेगा. "ये ले" इतना कह कर उसने मुझे एक गांजे की पुड़िया दी और मैंने उसी से सिगरेट माँगी और लग गया उसे भरने.पहला कश लेते ही मैं आँखें बंद कर के सर दिवार से लगा कर बैठ गया."बॉस को कह दियो की मैं तुझे घर पर नहीं मिला." मैंने आँखें बंद किये हुए ही कहा.

"अबे तेरी सटक गई है क्या? साले एक लड़की के चक्कर में आ कर कुत्ते जैसे हालत कर ली तूने अपनी! हरामी पूरे घर से बदबू आ रही है और तू चढ्ढी में बैठा शराब पिए जा रहा है? अबे होश में आ साले गधे?!" वो सब गुस्से में कहता रहा पर मेरे कान तो ये सब सुनना ही नहीं चाहते थे, वो तो बस उसी की आवाज सुन्ना चाहते थे जिसने मेरा दिल तोडा था. अगर अभी वो आ कर एक बार मुझे आई लव यू कह दे तो मैं उसे फिरसे सीने से लगा लूँगा और उसके सारे गुनाह माफ़ कर दूँगा, पर नहीं.... उसे तो अब कोई और प्यारा था! जब मोहित का भाषण खत्म हुआ तो उसने मेरे हाथ से सिगरेट ले ली और कश लेने लगा; "तू साले....छोड़ हरामी! अच्छा ये बता कुछ खाया तूने?" मैंने अभी भी उसकी बात का जवाब नहीं दिया और वो दिन याद किया जब वो मेरे कॉल न करने से नाराज हो जाया करती थी और मैं उसे कॉल कर के पूछता था की कुछ खाया?" ये याद करते हुए मेरी आँख से आँसूँ बह निकले, उन्हें देखते ही मोहित को मेरे दिल के दर्द का एहसास हुआ और उसने मेरे कंधे पर थपथपाया और मुझे ढांढस बँधाने लगा.मैंने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया और बोला; "थैंक्स भाई!!!" फिर अपने आँसूँ पोछे; "अब तू घर जा, भाभी चिंता कर रही होंगी.कल मैं ऑफिस आ जाऊंगा." उसे मेरी बात पर भरोसा हो गया पर जाते-जाते भी वो मेरे लिए खाना आर्डर कर गया.
 
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