दुकानदार मुझे एक बोतल निकाल कर देता है और बोलता है सर इसी बोतल के बारे में बात कर रहे हो क्या आप...
में वो बोतल देखते ही पहचान जाता हूँ ...
में--हाँ भैया यही वाली ....कितने पैसे दूं...
दुकानदार--भैया 310 र्स...
में--कितने...310र्स...बस
इन दिनो जो मैने शराब पी थी उसका एक पेग 2000 से कम का नही था और 310 रुपये की बात ने मुझे सचमुच चौका दिया था...
मैने दुकानदार को वो पैसे दे दिए और उसने खुले पैसे के बदले मुझे एक ग्लास और पानी की बोतल और एक नमकीन का पाउच पकड़ा दिया...
में--भैया ये अच्छी तो है ना
दुकानदार--ये सिर्फ़ मजबूत दिल वालो के लिए है...इसको अधिकतर आर्मी वाले ही यूज़ करते है...
उसके बाद में वहाँ से निकल कर अपनी कार के पास पहुँच गया और बोतल को और सारे सामान को मेरी बगल वाली सीट पर रख दिया...
कार में बैठ के सब से पहले उस पानी की बोतल को खोल कर उसमें से थोड़ा पानी पिया और फिर इस शराब की बोतल को उठा कर देखने लग गया...फिर उसका ढक्कन खोल कर साथ में लाए हुए ग्लास में आधा भर देता हूँ और उपर से थोड़ा सा पानी मिला देता हूँ...
पहला सीप लेते ही मेरे पूरे बदन में झुरजुरी आ जाती है...में उस में थोड़ा पानी और मिला देता हूँ...और फिर पीने लगता हूँ अब उसका टेस्ट मुझे थोड़ा मीठा मीठा लग रहा था. उसके बाद में वो ग्लास ख्तम करके कार आगे बढ़ा देता हूँ....में काफ़ी आगे निकल कर एक गाँव को क्रॉस करता हुआ एक तालाब के किनारे पहुँच जाता हूँ अंधेरा हो चुका था लेकिन चाँद की चाँदनी में वो झील चमक रही होती है.
सामने हरे भरे पहाड़ इस हल्के से उजाले में बिल्कुल सॉफ दिखाई दे रहे थे...में अपनी गाड़ी वही लगा देता हूँ और कार के बोनट पर बैठ कर ग्लास में शराब भरने लग जाता हूँ...तभी एक ग्रामीण वहाँ पहुँच कर मुझे बोलता है....बेटा यहाँ ज़्यादा देर मत रहना यहाँ पानी पीने के लिए पन्थेर आते रहते है...इस लिए जल्दी ही यहाँ से निकल जाना......
में उस ग्रामीण की बातो से घबराया नही क्योकि अगर कोई बाहर का आदमी होता तो तुरंत वहाँ से चला जाता....उसने सच बोला था वहाँ पेंथर्स आते है लेकिन वो इंसानो पर आम तौर पर हमला नही करते...
में कार के बोनट पर बैठा बैठा शराब पीने लग गया .....और सोचता जा रहा था अब कैसे क्या करना है....कैसे इस परिवार को संभालना है...लेकिन मुझे कोई रास्ता दिखाई नही दे रहा था...तभी मेरे मन में पता नही क्यो सुहानी की याद आ गयी...मैने तुरंत उसे फोन लगा दिया...
सुहानी--हेलो सर कैसे है आप अब...
में--सुहानी में ठीक हूँ लेकिन किन्ही बातो से थोड़ा परेशान भी हूँ...
सुहानी--सर आपकी आवाज़ से ऐसा लग रहा है जैसे आपने काफ़ी ड्रिंक कर ली है....
में--तुमने सही पहचाना सुहानी ....मैने आज काफ़ी ड्रिंक कर ली है...
सुहानी--ठीक है सर पी लीजिए लेकिन अपने होश में रहो तब तक ही पीना...क्योकि आपको इस हाल में देख कर आपके घर वाले दुखी हो जाएँगे...
में--सुहानी मुझे कुछ समझ नही आ रहा में अब क्या करूँ....कैसे अपने परिवार को खुश रखू...कैसे उन लोगो के चेहरो पर मुस्कुराहट फिर से ले आउ...
सुहानी--जवाब बड़ा सिंपल है सर....सब से पहले आपको खुश रहना सीखना होगा उसके बाद ही आप किसी को खुश रख सकते है...
में सुहानी की इस बात से प्रभावित हुए बिना नही रह सका ...
में--सुहानी तुमने बिल्कुल ठीक कहा अब से में खुद को पूरी तरह से बदल लूँगा....
सुहानी--सर आपको बदलने की कोई ज़रूरत नही है...आपको आपके परिवार वाले इसी रूप में पसंद करते है...खुद को बदल लेने से आप उनको और दुख पहुचाओगे...
में--सुहानी तुम्हारी इन्ही बातो के कारण मैने तुम्हे फोन लगा दिया...तुम मेरे सारे सवालो का जवाब बड़ी आसानी से दे देती हो....
सुहानी--ठीक है सर आप अपना ख्याल रखिए मेरा भाई और बहन आने ही वाले है में उनके लिए कुछ बना रही थी....
में--लेकिन तुमने तो बताया था कि तुम्हारा बस छोटा भाई है...
सुहानी--मेरे पापा ने दो शादिया करी थी उनकी दूसरी शादी से उनको एक बेटी भी थी...लेकिन उस दुर्घटना में पापा और उनकी दूसरी वाइफ की डॅत हो गयी थी और रीना बच गयी थी...
में--क्या नाम लिया तुनने रीना???
सुहानी--हाँ सर क्या आप उसे जानते है....
में--कल ही एक रीना से मिला था जो एर होस्टेस्स थी...वो बिल्कुल तुम्हारी तरह बाते किया करती है....
सुहानी--सर आप उसी रीना से मिले थे जो मेरी बहन है में आपको बताना भूल गयी थी जिस फ्लाइट से आप जा रहे थे उसकी जानकारी मैने रीना से ही ली थी...
में--देखो ना सुहानी ये दुनिया भी कितनी अजीब है जब भी मुझे किसी की ज़रूरत पड़ी तुम किसी ना किसी रूप में मुझे सम्भालने के लिए मिल ही गयी....पहले रिजोर्ट में...फिर फ्लाइट में...और अब फोन पर...पता नही तुम्हारा ये क़र्ज़ में कैसे चुका पाउन्गा....रीना आए तो उसको मेरी तरफ़ से शुक्रिया कहना क्योकि में उसको कुछ बोल भी नही पाया...
सुहानी--सर आप अपना ध्यान रखिए और आप जहाँ भी है वहाँ से घर जाइए आप का वेट कर रहे होंगे सभी...
और उसके बाद सुहानी ने दुबारा कॉल करने का बोलकर फोन काट दिया.
मैने अपने हाथ में रखा हुआ ग्लास एक साँस में ख्तम किया.
वो बोतल अब ख्तम हो गयी थी में उस बोतल को हाथ में लेकर देख ही रहा था के मेरी नज़र मुझ से कुछ ही दूर खड़े एक पेंथर से टकरा गयी.
उसकी आँखे किसी छोटे बल्ब की तरह चमक रही थी मैने हाथ में पकड़ी हुई बोतल उसके उपर फेकि और फुर्ती से कार का दरवाजा खोल कर कार के अंदर घुस गया.
रूही--भैया ये कैसी विपदा आ गयी इस घर पर...क्या हो गया ये सब...और आप भी अकेले ही इस तूफान का सामना करने निकल पड़े...कम से कम मुझे तो बता देते भैया.....
में--रूही अपने आप को संभाल सब ठीक हो जाएगा...अब हम लोगो को ही इस घर को फिर से हँसता खेलता घर बनाना है...
उसके बाद में रूही के आँसू पोछ कर उसके माथे पर एक किस कर देता हूँ तभी वहाँ कोमल और दीक्षा भी आजाती है और एक तरफ खड़ी हो जाती है हम दोनो का एक दूसरे के प्रति प्यार देख कर उनकी रुलाई फूट जाती है...में उन दोनो की तरफ़ अपनी बाहे फैला देता हूँ और वो दोनो किसी मासूम बच्ची की तरह मुझ से लिपट जाती है...
दीक्षा--भैया हम दोनो बहने हमेशा एक भाई के प्यार के लिए तरसती रही...हमे तो ये पता ही नही था कि हमारा कोई भाई भी है...और में अपने भाई से मिली भी तो ऐसे समय जब वो खुद टूटा हुआ है...
में--मेरी बहना अगर मुझे पता होता कि मेरी और भी कोई बहन है तो में कब का तुम लोगो से मिल चुका होता....तुम लोगो ने कुछ खाया या अभी तक बिना खाए पिए ही हो...
कोमल--भैया हम लोगो को अभी भूक नही लगी है लेकिन आपको देख कर लगता है आपने काफ़ी दिनो से कुछ नही खाया है...
में--नही कोमल मुझे भी भूक नही है...अब में थोड़ा काम कर लेता हूँ चाचा जी अकेले कितना काम संभालेंगे.
और ये कह कर में वहाँ से बाहर निकल जाता हूँ....बाहर मुझे चाचा जी भी मिल जाते है
चाचा--बेटा अब हम लोगो को थोड़ा जल्दी करना पड़ेगा पंडित जी भी आ गये है और अंतिम यात्रा के लिए अर्थी भी तैयार हो चुकी है...अब तुम ही इस घर के बड़े बेटे हो इसलिए तुम्हे ही इजाज़त देनी होगी किशोर और राज की अंतिम यात्रा के लिए...
में--चाचा जी इस घर के बड़े आप है में तो आपके नाख़ून के बराबर भी नही हूँ...आप जैसा उचित समझे वेसा करे...मुझे आप बस ये बता दीजिए कि मुझे क्या करना है...
चाचा--बेटा तुम्हारी माँ और भाभी के पास भी जाकर इस अंतिम यात्रा के लिए इजाज़त ले लो...
में--चाचा में कैसे सामना कर पाउन्गा उन दोनो का ....कैसे मुझे वो इजाज़त दे देंगी .
चाचा--वो दोनो समझदार है उन्हे इस बात की पूरी समझ है...बस तू वहाँ जा और उनसे बात कर...
में फिर भाभी के रूम की तरफ़ चल देता हूँ और वहाँ मम्मी के सामने बैठ जाता हूँ...अपना सिर नीचे झुकाए हुए ...
में---मम्मी में आपसे और भाभी से ...पापा और भैया की अंतिम यात्रा की इजाज़त माँगने आया हूँ...
भाभी--लेजाओ राज को में नही रोकूंगी तुझे...मुझे मेरा राज हँसता बोलता हुआ पसंद था...मम्मी देखो ना कैसे रूठ गये है अब मुझ से बात भी नही कर रहे....कैसे जियूंगी में इनके बिना इन्होने ज़रा भी फिकर नही करी मेरी....सब कुछ ख्तम हो गया लेजा जय इस लाश को मेरी आँखो के सामने से...
मम्मी--जय बेटा जो होना था वो हो गया अब हम तेरे पापा और भाई की अंतिम यात्रा में बाधक बनके उनकी आत्मा को शांति नही दे सकते...इसीलिए जैसा परंपरा कहती है सारे काम वैसे ही होंगे...ले जा तू में इजाज़त देती हूँ...
उसके बाद मैने बाहर आकर चाचा जी को इजाज़त दे दी...चाचा जी और कॉलोनी के कुछ अनुभवी लोगो ने आर्थिया पहले ही बाँध दी थी फिर ...पूरे विधि विधान के हिसाब से अंतिम यात्रा शुरू हो गयी....उस समय घर में एक कोलाहल मच चुका था माँ और भाभी किसी के संभाले नही सम्भल रही थी और में अपने दोनो कंधो पर अपने भाई और अपने पापा की आर्थियो को ढो रहा था.....
हम वापस घर आ गये थे अंतिम संस्कार करके.
में अब एकांत चाहता था...मैने चाचा से बात करी.
में--चाचा जी में थोड़ी देर बाहर जाना चाहता हूँ ...क्या अभी मेरी कोई ज़रूरत है यहाँ.
चाचा--बेटा वैसे तो कोई काम नही है लेकिन पहले कुछ खा ले फिर चले जाना .
में--चाचा जी भूक नही है मुझे...में वापस आकर कुछ खा लूँगा.
उसके बाद मैने अपनी कार बाहर निकाली और आगे बढ़ गया....में लगातार कार चलाए जा रहा था..तभी मुझे एक दुकान दिखी जिस पर लिखा था इंग्लीश वाइन शॉप...
मैने अपनी कार वहाँ रोकी और शॉप की तरफ़ आगे बढ़ गया ...मुझे नही पता था कौनसी शराब कैसी होती है ....मैने बस इन दो तीन दिनो में ही पी थी आज तक उस से पहले कभी नही...हाँ पापा को ज़रूर पीते हुए देखा था एक दो बार....पापा कौनसी शराब पीते थे ये मुझे याद नही आ रहा था...बस उसका कलर याद था कुछ रेड रेड सा...और बोतल का डिज़ाइन याद था...
दुकान पर जाकर....
में--भैया शराब की बोतल चाहिए...
दुकानदार--कौनसी बोतल चाहिए सर आपको...
में--भैया वो जिस में रेड कलर की शराब आती है और जिसकी बीटल थोड़ी मोटी और चौकोर होती है...
दुकानदार--सर आपको उसका नाम नही पता है क्या...
में--नही भैया बस इतना ही पता है .....और हाँ उसकी बोतल पर एक खुरदूरी सी उभरी हुई डिज़ाइन बनी होती है जैसे कोई पत्थर की दीवार हो...
तभी उसका एक साथी दुकान दार बोल पड़ता है....ये ओल्ड मॉंक की बोतल माँग रहा है इसको वो दे दे...
लेकिन वो दुकानदार दूसरे वाले को बोलता है ये बीएमडब्ल्यू कार लेकर आया है ये ओल्ड मॉंक कैसे झेलेगा...
दूसरा दुकानदार--तू इसको एक बार ओल्ड मॉंक की बोतल निकाल कर तो दिखा हो सकता है ये उसे पहचान जाए.
वो दोनो आपस में जिस भाषा में बात कर रहे थे वो एक आदिवासी भाषा थी जो नोर्मली बांसवाड़ा और डूंगरपुर आँचल के लोग बोला करते थे इस भाषा को बागड़ी कहा जाता है जोकि मुझे समझ में नही आती.
उसके बाद हम दोनो वहाँ से उतर कर घर के अंदर आ जाते है...माँ होश में आ चुकी थी और आस पास की औरतों के साथ वही बैठ कर रोने लग गयी थी...
वो मुझे देखते ही उठ के मेरे पास आकर खड़ी हो जाती है और एक टक मुझे बस घुरे ही जा रही थी...और तभी वो मेरे सीने पर मुक्के बरसाते हुए रोने लग जाती और मेरे सीने से लगते हुए कहने लगती है...
मम्मी--तूने खुद को कैसे अकेला कर लिया इस दर्द में....कैसे सह गया तू अपने आँसू क्यो नही बताया हम लोगो को....क्यो बिना बताए चला गया हम लोगो को वहाँ हँसता बोलता हुआ छोड़कर....कैसे सांभाला तूने अपने पापा और भाई की जुदाई का दर्द...
में--मम्मी में कैसे सामना करता आप सभी का....कैसे. में अपने हँसते खेलते परिवार में खुद ही दुख की आग लगा देता ...और में भी अब रोने लगता हूँ...
हम दोनो माँ बेटे एक दूसरे के सीने से ऐसे ही काफ़ी देर तक रोते रहे तभी वहाँ किसी औरत ने मम्मी से कहा...
रजनी--भाभी....नेहा के आँसू नही निकल रहे...उसका रोना बहुत ज़रूरी है वो इस दर्द को अपने दिल से बाहर नही आने दे रही...
मम्मी मुझे छोड़ कर तेज़ी से भाभी के रूम की तरफ़ बढ़ जाती है और भाभी को इस हालत से निकालने की कोशिश करने लगती है ...
भाभी की आँखे बिल्कुल पथरा गयी थी वो बिल्कुल उस समय एक ज़िंदा लाश की तरह उस कुर्सी पर बैठी थी और एक टक दरवाजे को घुरे जा रही थी....
मम्मी से उनकी ये हालत बर्दास्त नाही हुई और वो उनके गालो पर चान्टे मारने लग जाती है लेकिन शायद चान्टो का दर्द कुछ भी नही था उनके दिल में दबे उस दर्द के आगे...
में मम्मी को इस तरह से मारता देख भाभी से लिपट जाता हूँ...और मम्मी को उन्हे मारने से मना करता हूँ.
मम्मी--जय तू हट जा यहाँ से...इसका रोना बहुत ज़रूरी है वरना ये ऐसे ही पागल हो जाएगी...
में--मम्मी आप लोग यहाँ से जाओ में भाभी को होश में लाने की कोशिश करता हूँ...आप मुझ पर भरोसा रखो में इन्हे किसी भी कीमत पर होश में ले आउन्गा...
मम्मी--बेटा अब तू ही कुछ कर इसका होश में आना बहुत ज़रूरी है...
उसके बाद वो लोग वहाँ से चले जाते है...
में भाभी से कहता हूँ..
में--भाभी आपको याद है उस दिन जब आपने मुझे नदी पर किस किया था तो उसके बाद आपने क्या कहा था....
आपने कहा था में तेरे भैया से अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करती हूँ...
आपका वो प्यार मर गया है उठो और होश में आओ ....
मर चुका है आपका वो प्यार जो आपको आपको जान से भी प्यारा था....
मर चुका है आपकी माँग का सिंदूर....
तोड़ डालो अपने हाथ की ये चूड़िया...(मैने भाभी की चूड़िया अपने हाथो से दबाकर तोड़ दी)
तोड़ डालो ये मंगलसूत्र जिसकी याद में आपने पहन रखा है...
मैने जैसे ही भाभी के मंगलसूत्र की तरफ़ अपना हाथ बढ़ाया .....टदाअक्कक ......एक ज़ोर दार थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ गया...
भाभी--हा .....हा....हा..... मर चुका है मेरा प्यार मर चुका है मेरी माँग का सिंदूर....लेकिन मेरे मंगलसूत्र को हाथ मत लगाना कभी भी वारना में जान ले लूँगी तेरी...
और इसी के साथ वो फूट फूट कर रोने लगती है उनका रोने की आवाज़ इतनी तेज थी कि घर की दीवारे भी थर्रा उठी थी उनको रोता हुआ देख कर मैने उनको अपनी बाहो में भर लिया...तब तक मम्मी भी भाभी के रोने की आवाज़ सुनकर रूम में आ चुकी थी......
भाभी को मम्मी के साथ छोड़कर में रूम से बाहर निकल जाता हूँ...
बाहर नीरा और उसके साथ 2 और लड़किया खड़ी थी ...नीरा मुझे देखते ही मेरे गले से लिपट गयी...
नीरा--भैया अगर आज आप ना होते तो पता नही भाभी कैसे अपने दर्द से बाहर आती ....
में--नीरा रूही कहाँ है...और ये दोनो लड़किया कौन है जो तेरे साथ खड़ी है...
नीरा--भैया ये चाचा जी की लड़कियाँ है हमारी बहने है. बड़ी वाली दीदी दीक्षा और छोटी का नाम कोमल है....और जो वहाँ ब्लू साड़ी में आंटी बैठी है वो हमारी सग़ी चाची है....आपके यहाँ आने से थोड़ी ही देर पहले ये सब यहाँ आए थे...और रूही दीदी शायद किचन में है.....
में --अच्छा तू इन सब का ख्याल रख में रूही से मिलकर आता हूँ .,,,
में किचन में पहुँच कर देखता हूँ रूही खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश का रही थी....पता नही कैसे वो अपनी आँखो से आँसू बहने से रोक पा रही थी...में लगातार उसको वहाँ काम करते हुए देख रहा था....लेकिन उसने मुझे देख कर भी अनदेखा कर दिया....
लेकिन जब में काफ़ी देर तक ऐसे ही उसे देखता रहा तो वो सारे काम छोड़कर भागती हुई मेरे गले से लग गयी और रोना शुरू कर दिया....
तभी घर के बाहर आंब्युलेन्स की आवाज़ गूंजने लग जाती है और चाचा जी और नीरा और रूही भाग कर घर का दरवाजा खोल कर बाहर आजाते है ...उस आंब्युलेन्स में से जय को निकलता देख सब की रुलाई फूट जाती है...
में अपने आँसू किसी तरह संभाले हुए वो दोनो ताबूत घर के अंदर रखवा देता हूँ...उसके बाद नीरा मेरे सीने से लग कर रोने लग जाती है....और अपने हाथो से मेरे सीने पर मारने लग जाती है....
नीरा--ये क्या हो गया भैया....सब कुछ ख्तम हो गया भैया....अब कैसे जियेंगे हम सभी...और बेसूध होकर मेरी बाहो में झूल जाती है ....
अंदर भाभी अभी भी वैसे ही खड़ी थी...उनके हाथो ने अभी भी मेरा लिखा हुआ लेटर पकड़ रखा था...उधर रूही उन दोनो ताबूतो को खोल चुकी थी और वो कभी भैया से कभी पापा की बॉडी से लिपट लिपट के रोने लग गयी थी...
एक औरत रोते रोते अभी माँ को संभालने की कोशिश कर रही थी.
और वहाँ खड़ा एक आदमी रूही को उन ताबूतो से दूर हटाने की कोशिश करते करते खुद भी रोने लग गया था......
घर का महॉल पूरी तरह से बदल चुका था...जहाँ थोड़ी देर पहले पूरा घर खुशियो से भरा हुआ था....वहाँ अब मातम का सन्नाटा छाया हुआ था....कोई किसी से कुछ नही कह पा रहा था...कोई किसी के आँसू पोछ नही पा रहा था....ये कैसी मनहूसियत सी छाइ है मेरे घर के उपर...कैसे में सब का दर्द बाटू...कैसे में संभालू अपने आप को....कैसे सम्भालू...अपने परिवार को...
वो आदमी मेरे पास आकर बोलता है.
रजत--जय बेटा में तेरा चाचा हूँ...देख ना किसकी नज़र लग गयी मेरे भाई को ...और राज तो अभी बच्चा था....कैसे जिएगी नेहा उसके बिना...
उनके मुँह से चाचा शब्द सुनते ही में उनके गले लग कर रोने लगता हूँ अपने सारे बाँध में उनसे गले लगने के बाद तोड़ देता हूँ...वो खुद भी मेरे साथ रोए जा रहे थे...और कहे जा रहे थे...
चाचा--बेटा अपनी माँ और भाभी को संभाल...उनको दूसरे कमरे में लेकर जा और होश में लाने की कोशिश कर ...जब तक में इन दोनो की अंतिम यात्रा की तैयारी करता हूँ...
में--चाचा जी कुछ देर मुझे अपने सीने से लग कर रोने दो इन दो दिनो में दिल खोल कर रोना चाहता था लेकिन मुझे सहारा देने वाला कोई कंधा मुझे नही मिला जहाँ में सिर रख के रो सकूँ...
चाचा--बेटा हम मर्द है...और हम लोगो की ये बदक़िस्मती है कि हम अपनो के जाने पर रो भी नही सकते...क्योकि पूरे परिवार का ध्यान हमे ही रखना होता है...कुदरत ने इसीलिए आदमी का दिल सख़्त बनाया है और औरत का दिल इतना नाज़ुक क्योकि वो औरत भी हमारे दिल के आँसू अपनी आँखो से बहा देती है...
में--पर चाचा में कैसे संभालू इन सब को कैसे दे पाउन्गा में इन लोगो को वो खुशिया जो सिर्फ़ पापा और भैया ही दे सकते थे.
चाचा--बेटा अब तुम घर के सब से बड़े मर्द हो यानी इस परिवार के मुखिया...और परिवार के मुखिया का बस एक ही फ़र्ज़ होता है...अपने परिवार को हमेशा हँसता खेलता वो रख पाए...अब अपने आँसू पोछो और सम्भालो उन सभी को जिन्हे तुम्हारे पापा और भाई तुम्हारे भरोसे छोड़ कर गये है...
इतना कह कर वो घर से बाहर अपनी गाड़ी लेकर निकल जाते है...अब कुछ पड़ोसी भी हमारे घर में आ चुके थे जो मम्मी भाभी और रूही को संभाल रहे थे....तभी अचानक....नीराअ कहाँ गयी...
ये सोचते ही मेरा कलेजा धाड़ धाड़ बजने लगता है...में पूरे घर में बदहवासों की तरह उसे भागते हुए ढूँढने लग जाता हूँ..किसी को उसके बारे में कुछ पता नही होता.....
में बाहर गार्डन में आजाता हूँ लेकिन नीरा यहाँ भी नज़र नही आती...तभी मेरी नज़र गार्डन के एक पेड़ पर बने ट्री हाउस पर पड़ती है...नीरा जब भी बिना बताए गायब होती थी तब वो हम लोगो को इसी ट्री हाउस में मिलती थी...
मुझे लगा शायड होश में आने के बाद वो उस ट्री हाउस में चली गयी हो....
में तुरंत उस ट्री हाउस पर चढ़ जाता हूँ और अंदर जाकर देखता हू वहाँ नीरा अपना सिर अपने घुटनो पर रख कर लगातार रोए जा रही थी.....उसको इस तरह से रोता देख....मुझे अपनी खाई हुई वो कसम याद आ गई.... तेरी कसम... में तेरे सारे दर्द अपने उपर ले लूँगा...........,
में नीरा के पास जाकर बैठ गया और उसको अपनी बाहो में भर लिया...वो मुझ से किसी लता की तरह बिल्कुल चिपक गयी और उसके रोने की रफ़्तार लगातार बढ़ती ही जा रही थी में प्यार से उसको चुप करने की कोशिश करने लग गया...लेकिन वो तो बस रोए ही जा रही थी.
रोते रोते उसकी साँस भी उखड़ने लग गयी थी...उसको हिचकिया भी आने लग गयी थी रोते रोते...
मुझे समझ में नही आया कैसे में नीरा को चुप कराऊ....तभी मुझे याद आ गया भाभी ने मुझे किस तरह नदी के पास चुप करवाया था...
मैने अपने होंठ नीरा के होंठो से जोड़ दिए और उसे कस कर अपनी बाहो में भर कर उसके होंठ चूसने लगा .....नीरा मेरे इस तरह से करने से एक दम से हड़बड़ा जाती है और मुझ से दूर हट जाती है..
नीरा--भैया ये क्या कर रहे हो आप...
में--तू रोना बंद नही कर रही थी तो मुझे ऐसा करना पड़ गया...मुझे माफ़ कर देना नीरा.
नीरा--नही भैया आप माफी मत माँगो...में ही रोते रोते कैसे यहाँ पहुँच गयी मुझे खुद भी परा नही चला...आपने बल्कि अच्छा किया जो मुझे उस अंधेरे से निकाल दिया...
और उसके बाद वो मेरे सीने से लग कर सूबकने लगती है...
नीरा--भैया अब क्या होगा??कैसे इस परिवार में फिर से खुशिया वापस आएँगी...
में--तू चिंता मत कर तेरा भाई अभी ज़िंदा है में अपने परिवार की खुशी के लिए कुछ भी कर जाउन्गा...चल अब घर में चल और सबको संभालने में मेरी मदद कर....
नीरा--भैया मुझे यहीं रहने दो में वहाँ किसी का सामना नही कर पाउन्गि ....कैसे देखूँगी में माँ की आँखो में आँसू और भाभी तो बस पत्थर की तरह हो गयी है...कैसे संभालूगी में उन सब को....कैसे???
में--यही सवाल मेरे मन मे भी था जब में दुबई गया था, पापा और भैया को लेकर आने के लिए....अब तू खुद को मजबूत कर और चल मेरे साथ हम दोनो को मिलकर इस घर की खुशिया वापस लानी है...
नीरा--ठीक है भैया अब में नही रोउंगी ....
उसके बाद हम दोनो वहाँ से उतर कर घर के अंदर आ जाते है...माँ होश में आ चुकी थी और आस पास की औरतों के साथ वही बैठ कर रोने लग गयी थी.
घर में बड़ी खुशी फैली हुई थी....मम्मी अपनी देवरानी से मिलकर फूली नही समा रही थी...
मम्मी नीरा के बर्तडे का फोटो आल्बम उन्हे दिखाते हुए सब के बारे में बता रही थी....
एक चेहरे पर रजनी की नज़र टिक गयी....
रजनी--भाभी ये लड़का कौन है....ये आपकी लगभग सभी तस्वीरों में है...
मम्मी--ओहूऊ में भी कितनी पागल हूँ....ये जय है मेरा बेटा और आपका भतीजा...
रजनी--ये कहाँ है अभी ....बाहर रहता है क्या.
मम्मी--नही बाहर नही उसके किसी दोस्त का आक्सिडेंट हो गया है तो वो वहाँ गया हुआ है...
रजनी--ओह्ह्ह कब तक आएगा मेरा बड़ा मन कर रहा है अपने भतीजे को गले से लगाने का..
तभी....घर की बेल बजती है..
मम्मी उठ कर दरवाजा खोलने के लिए जाती है जैसे ही सामने देखती है...
वहाँ वही ड्राइवर खड़ा होता है जो उन्हे और उनकी गाड़ी को घर तक छोड़ने आता है...
मम्मी--अरे ड्राइवर साहब आप....आप अभी तक उदयपूर में ही हो????आप गये नही वापस..कोई परेशानी है क्या.??
ड्राइवर--मेडम ये चिट्ठी देनी थी आपको इसीलिए यही रुका हुआ था...
मम्मी--कैसी चिट्ठी....?? किसकी है ये चिट्ठि...??
ड्राइवर-- ये मुझे रिजोर्ट वालो ने दी थी आपको देने के लिए....अब में चलता हूँ मेरी ज़िम्मेदारी अब ख्तम हो गयी है...
उसके बाद वो ड्राइवर वहाँ से चला जाता है..
और मम्मी दरवाजा बंद करके जैसे ही उस लेटर को पढ़ने लगती है...उनकी आँखो से आँसुओ की धारा निकलने लगती है जैसे जैसे वो उस लेटर में आगे पढ़ती जाती है...वैसे वैसे उनकी आँखे बस फैलती ही चली जाती है.
तभी अचानक मम्मी लहरा कर ज़मीन पर गिर जाती है...उनको गिरता देखा रजनी और रजत भाग कर उनको संभाल ने पहुँच जाते है
रजनी--भाभी क्या हुआ आँखे खोलो अपनी...नेहा....रूहीी....नीराअ...वो ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगती है सभी वहाँ भागकर पहुँच जाते है सभी लोग मम्मी को घेर कर खड़े होते है....नीरा मम्मी के हाथ में से वो लेटर निकाल कर उसे पढ़ने लगती है....
और ज़ोर ज़ोर से रोते हुए सब को उस लेटर की सच्चाई बता देती है...
नेहा ज़ोर ज़ोर से चीखने लग जाती है वो नीरा से वो लेटर छीन कर नीरा को एक थप्पड़ तक मार देती है...और नीरा नेहा से चिपक्कर रोने रोने लग जाती है...
नेहा को तो जैसे कोई होश ही नही रहता वो एक पत्थर की तरह हो जाती है उस लेटर को पढ़ने के बाद...
उधर उदयपूर में एक बोलेरो किशोर गुप्ता के बंगले के सामने रुकती है....और वॉचमन दरवाजा खोल देता है..गाड़ी अंदर लेजाने के बाद रजत और उसकी फॅमिली बंगले की तरफ बढ़ जाते है....
रजत घर की बेल बजाता है और अंदर से नीरा दरवाजा खोल कर बाहर आजाती है
नीरा--जी बोलिए किस से मिलना है आपको.
रजत--बेटी हम किशोर भाई साहब से मिलने आए है....
नीरा--माफ़ करना अंकल आपको पहचाना नही मैने और पापा तो दुबई गये है....
रजत--क्या तुम उनकी बेटी हो...
नीरा--जी अंकल
रजत---बेटा में तुम्हारे पापा का छोटा भाई हूँ तुम्हारा रजत चाचा....
नीरा--चाचा....लेकिन पापा ने तो कभी कुछ बताया नही...एक मिनट आप अंदर आइए फिर बैठ कर बात करते है...
कोमल अपने पिता को इस तरह फँसता देख मुस्कुराने लग गयी थी...
नीरा--अंकल आप यहाँ बैठिए में मम्मी को बुलाकर लाती हूँ...
नीरा भागकर मम्मी के रूम की तरफ़ चली जाती है...
नीरा--मम्मी कोई अंकल आए है अपनी वाइफ और दो लड़कियो को लेकर और वो अपने आप को मेरा चाचा बता रहे है...
मम्मी--चाचा...
और फिर मम्मी लगभग भागते हुए हॉल में बैठे हुए रजत की तरफ़ बढ़ जाती है....
मम्मी गौर से रजत के चेहरे को देखने लगती है...
मम्मी--आप रजत भैया है ना.
रजत--जी भाभी में आपका एक्लोता देवर और ये आपकी देवरानी रजनी और ये दोनो शैतान आप ही की है...
मम्मी रजत भैया से मिलकर बहुत खुश हो जाती है वो रजनी से गले मिलती है और कोमल और दीक्षा को आशीर्वाद भी देती है....
और फिर वो सब को आवाज़ लगा लगा कर बोलाने लगती है नेहा....रूही...नीरा जल्दी यहाँ आओ देखो कौन आया है...
नेहा --कौन आया है मम्मी...
मम्मी--कौन क्या आया है ये तुम्हारे चाचा जी... हैं चल पैर छु इनके...
रजत भैया ये राज की पत्नी नेहा है रजनी नेहा भाभी को अपने गले से लगा लेती है...तभी रूही और नीरा भी वहाँ आ जाती है वो दोनो भी सब से बड़े प्यार से मिलती है उसके बाद नेहा और रूही किचन में घुस जाती है...इतने में रजनी भी उठकर उनलोगो की मदद करने के लिए किचन की तरफ जाने लगती है तो मम्मी उनका हाथ पकड़कर उन्हे वही रोक लेती है...
रजनी--भाभी घर का ही तो काम है और हम कौन्से. यहाँ मेहमान बनकर आए है..
मम्मी--नही रजनी तुम यहीं बैठो वो दोनो काम कर लेंगी..
रजनी--कोमल..दीक्षा जाओ अंदर रसोई में भाभी और दीदी की मदद करो ...
मम्मी--रहने दे ना रजनी क्यो बच्चो को परेशान कर रही है
रजनी--नही भाभी जी आप इनको जाने से मत रोको वरना मुझे बुरा लगेगा...
मम्मी--ठीक है नीरा तुम अपनी बहनो को लेकर भाभी के पास ले जाओ अगर ये आराम करना चाहे तो अपने साथ रूम में ले जाना.
नीरा--मेरे पास पहले तंग करने के लिए बस एक बड़ी बहन ही थी अब तो मेरे पास 2 बड़ी बहन है तंग करने के लिए और एक छोटी बहन भी आ गयी.... और फिर वो दोनो का हाथ पकड़कर किचन के अंदर ले जाती है..
मम्मी--बताइए रजत भैया गाँव के हाल कैसे है में तो कभी आ नही पाई गाव आप लोगो को यहाँ देख कर सच में दिल खुश होगया..
रजत--भाभी गाव में सब बढ़िया है मुझे दो दिन से भाई साहब की बहुत याद आरहि थी इसीलिए मैने आज यहाँ आ गया और इन लोगो को भी यहाँ ले आया ...
मम्मी--अब आप यहाँ आगये होंठो अब कुछ दिन जाने का नाम मत लेना मुझे थोड़ी तो सेवा करवाने दो अपनी देवरानी से...आपने तो कभी भाभी का ध्यान रखा नही ...
रजत--नही नही भाभी आप सब तो हम लोगों के दिल में हमेशा रहते हो.....
किशोर--मैने आप सभी को इस लिए यहाँ बुलाया है कि आप मेरी इस काम में मदद करे...हम दोनो का जीवन अब आप लोगो के हाथ में है...
आहूजा--किशोर भाई कैसी बाते करते हो...भला हम आपके रास्ते में रोड़े क्यो अटकाएंगे...
कंबले--हमे तो खुशी होगी जब आप अपना बिज़्नेस अच्छे से एस्टॅब्लिश कर लेंगे...
किशोर--में भी यही चाहता हूँ...आप लोग मेरा साथ दे और मार्केट में मेरा माल जाने दे.
प्रधान--किशोर भाई साहब आप हमे दो दिन का टाइम दीजिए ताकि हम कुछ सोच विचार करके...प्यार मोहब्बत से इस मामले को निपटा सके...आख़िर हम भी चाहेंगे कि मार्केट में अच्छी क्वालिटी का माल आए...
संध्या--भाई साहब आप सभी लोगो का शुक्रिया....हम लोगो को बर्बाद होने से बस आप ही लोग बचा सकते है....
और उसके बाद हम सभी उठ जाते है ....
किशोर को कुछ बात करने के बहाने से आहूजा अपने साथ ले जाता है और कंबले प्रधान और संध्या एक दूसरी टेबल पर जाकर बैठ जाते है...
प्रधान--भाभी जी सिर्फ़ आपकी वजह से हम उसे ये काम करने दे सकते है...
संध्या--मेरी वजह से कैसे भाई साहब??
कंबले--अगर आप हम लोगो को खुश कर दें तो ये मान लीजिए आपके पति को दुनिया की कोई ताक़त मुंम्बई पर राज करने से नही रोक सकती....और हमारा क्या है भगवान की दया से हमारा बिज़्नेस लगभग सभी देसो में है...हम आपके लिए मुंम्बई जैसा छोटा सा नुकसान सह ही सकते है...
संध्या--ये आप लोग कैसी बाते कर रहे है...में वेसी औरत नही हूँ जो अपने आप को बेच दूं काम के बदले में...
प्रधान--भाभी जी ये मेरा कार्ड आप रख लीजिए जब कभी भी आपको लगे ...आप मुझे फोन कर देना...
संध्या वो कार्ड अपने पर्स में डाल कर बोलती है...
संध्या--ऐसा दिन कभी नही आएगा प्रधान साहब...लेकिन फिर भी में आपका कार्ड रख लेती हूँ...और फोन में उस दिन आपको करूँगी जब मेरे पति मुंबई पर राज कर रहे होंगे.
कांबले--हमारी बेस्ट विशस आप लोगो के साथ है भाभी जी....
उसके बाद संध्या वहाँ से उठ कर चली जाती है...
जब वो लोग घर पहुँच जाते है तो संध्या उसे वहाँ हुई सारी बाते बता देती है...किशोर ये बाते सुनकर माथा पीट लेता है अपना....
संध्या--हम लोग किसी दूसरे शहर में चलकर ये बिज़्नेस फिर से शुरू कर सकते है...
किशोर--ये उतना आसान नही है संध्या...किसी दूसरी जगह पर जाने का मतलब है फिर से शुरूवात करनी पड़ेगी...और क्या पता वहाँ भी प्रधान जैसे लोग अपना कब्जा जमाए बैठे हो...
करते करते वो दोनो सो गये थे...अगले दिन सवेरे सवेरे घर का लॅंडलाइन बजने लगता है...ये कॉल किशोर के असिस्टेंट का था... जिन्हे किशोर काका कह के बुलाता था...
काका--सर ग़ज़ब हो गया...हम लोगो ने जिन भी छोटे छोटे व्यापारियो को अपना माल दिया था उन सभी ने एक एक करके वो माल वापस भिजवा दिया है...
किशोर--काका ये सब कैसे हो गया...हमारा माल नही बिकेगा तो हम सड़क पर आजाएँगे.
काका--सर पता नही क्या होगा ये माल अब हम उस पार्टी को भी नही दे सकते जिस से हमने ये माल लिया था बड़े व्यापारी तो पहले ही हम से माल नहीं ले रहे थे और अब ये छोटे व्यापारियो ने भी माल वापस भिजवा दिया है.
ये सुनकर किशोर फोन रख कर सारी बाते संध्या को बता देता है..
संध्या--अब क्या होगा...ये लोग तो हमे बर्बाद करके ही दम लेंगे...
किशोर--में देखता हूँ...कुछ करने की कोशिश करता हूँ...
और उसके बाद किशोर नहा धो कर बाहर निकल जाता है...
संध्या भी सोच सोच कर एक फ़ैसला ले ही लेती है...वो अपने पर्स में से प्रधान का कार्ड निकालती है और उसे फोन कर देती है...
प्रधान--हेलो कौन??
संध्या--प्रधान साहब आप जीत गये...बोलिए मुझे कहाँ आना है...
और प्रधान उसे एक फार्म हाउस पर बुला लेता है...
फार्म हाउस पर प्रधान कांबले और आहूजा के अलावा उनका एक पार्ट्नर और होता है जिसका नाम दामोदर होता है...वो चारो मिलकर संध्या को हर जगह से नोचते खसोटते है...एक तरह से उसका रेप ही कर देते है...
जब वो संध्या को जाने के लिए बोलते है तो कल दुबारा आने के लिए बोल देते है...
संध्या अपने घर पहुँच कर अपने सारे कपड़े उतार कर शवर के नीचे खड़ी हो जाती है...और ज़ोर ज़ोर से रोते हुए अपने बदन से उन भेड़ियो के निशान मिटाने लग जाती है...
जब शाम को किशोर घर आता है तो वो काफ़ी खुश होता है...उन सभी छोटे व्यापारियो ने माल वापस मंगवा लिया होता है...और किशोर इसे चमत्कार मान कर मिठाई का डिब्बा अपने साथ लेकर आता है...
लेकिन जब वो घर के अंदर घुसता है तो संध्या बिल्कुल नंगी बेड पर रोती हुई मिलती है...
संध्या--सब ख़तम हो गया मेरा...कुछ नही बचा उन लोगो ने कल फिर मुझे बुलाया है.....
किशोर को समझते देर नही लगी संध्या की हालत देख कर....
किशोर--संध्या मुझे माफ़ कर देना....लेकिन तुम्हे उन लोगो को कल यहाँ बुलाना होगा .....ये आख़िरी बार है इसके बाद तुम्हे कभी भी मेरी वजह से किसी के आगे झुकना नही पड़ेगा...
संध्या--में अब मरना चाहती हूँ में अब तुमहरे लायक नही रही....
किशोर--तुम नही मरोगी संध्या मरेंगे वो लोग जिन्होने हमारे जीवन में आग लगा दी है...बस कल कल का दिन और निकाल लो...
किशोर ने पूरे घर में सीसीटीवी कॅमरास लगवा दिए थे....रात भर में ही...
किशोर--संध्या मुझे तेरी कसम है में उन सब को सड़क पर ले आउन्गा....वो तेरे सामने खुद को बख्सने की भीख माँगे गे लेकिन उन्हे वो भी नसीब नही होगी....
संध्या--मुझे कुछ नही चाहिए ....बस किसी तरह से हम लोग उनके चंगुल से निकल जाए इसके अलावा मुझे कुछ और नही चाहिए...
उसके बाद संध्या और किशोर कल के लिए प्लान करने लग जाते है...
अगले दिन संध्या प्रधान को फोन करके घर पर ही सब को बुलवा लेती है...और अपने साथ बलात्कार का वीडियो रकौर्ड़ कर लेती है...
संध्या और किशोर उस वीडियो में से संध्या का चेहरा धुँधला करके उस वीडियो को पूरे मीडीया में डाल देते है....इस से होता ये है कि दामोदर , प्रधान कांबले और आहूजा चारो पूरी तरह से बेनक़ाब हो जाते है...बाज़ार में उनकी साख पूरी तरह से मिट जाती है...इस मोके का फ़ायदा उठाते हुए किशोर पूरे मार्केट पर अपना क़ब्ज़ा जमा लेता है....
वर्तमान में
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मम्मी--उसके बाद मैने अपनी ज़िंदगी ग़रीब बच्चो की देखबाल में लगा दी....में अपना सब कुछ खो चुकी थी...इस गम में मैने शराब भी पीनी शुरू कर दी....जब मुझ से बलात्कार हुआ मेरी उमर ज़्यादा नही थी लेकिन मेरे जिस्म में सेक्स की चींतिया रह रह कर काटने लगी....शराब के नशे में...मुझ से वो ग़लती हो गयी जो नही होनी चाहिए थी...मैने अपना संबंध राज से बना लिया...और जब तक में खुद को संभाल पाती तू मेरी कोख में तू आ चुका था....राज को बस इतना पता था कि कुछ ग़लत हुआ है लेकिन उसे ये पता नही था तू उसका ही बेटा है ये बात सिर्फ़ तेरे पापा और रूही जानते थे....रूही को इस लिए पता पड़ गया क्योकि में अधिकतर उसी के साथ डॉक्टर के पास जाया करती थी....मुझे गर्व है रूही पर उसने मेरा साथ कभी नही छोड़ा...वो हमेशा मेरे सुख और दुख में एक परच्छाई की तरह मुझ से चिपकी रही....
मेरे होश उड़ चुके थे....मुझे समझ नही आ रहा था के में क्या करूँ....ऐसा लग रहा था किसी ने मेरे शरीर से सारा खून निचोड़ लिया हो....
मम्मी--हो सके तो मुझे माफ़ करदेना जो कुछ भी हुआ...वो या तो वक़्त की मजबूरी थी या शराब के नशे में बहकते हुआ मेरा जिस्म.....मुझे माफ़ कर देना मेरे बच्चो में तुम लोगो की माँ कहलाने लायक नही हूँ...
नीरा--मम्मी मुझे माफ़ कर दो .....आपकी इन्ही कुर्बानियों की वजह से हम सभी एक अच्छा जीवन जी रहे है मम्मी मुझे माफ़ कर दो....में अब कभी आपसे कोई सवाल नही करूँगी....
में अपनी कुर्सी से बिना कुछ बोले उठ जाता हूँ...और घर से बाहर निकल कर अपनी कार में बैठकर अंजाने रास्ते की तरफ़ बढ़ने लगता हूँ......
मेरी आँखो से आँसू थमने का नाम नही ले रहे थे....और में अपनी कार तेज़ी से भगाए जा रहा था....में नही जानता था मुझे कहाँ जाना था....बस एक जुनून सा हावी हो गया था मुझ पर...में मरना चाहता था....घिंन आ रही थी अपने आप से...मानो सारे जहाँ की गंदगी मुझ पर ही आ गिरी हो....में अब वापस नही लौटना चाहता था.....
में अभी जिस रोड पर गाड़ी भगा रहा था वो एक पहाड़ी एरिया था जिसे महादेव के घाटा के नाम से जाना जाता है....पता नही कौनसी अद्भुत शक्ति ने....मुझे उन ख़तरनाक घाटियो में भी संभाले रख रखा था....घाटी क्रॉस करने के बाद मुझे एक मंदिर दिखा जो कि महादेव का काफ़ी प्राचीन मंदिर है....मैने अपनी गाड़ी साइड में लगाई और मंदिर की तरफ़ अपने कदम बढ़ा दिए....
मंदिर के बाहर ही कुछ साधु आग जला कर बैठे थे और दम भर रहे थे...
मुझे मंदिर की तरफ जाते देख एक साधु बोला...
साधु--बेटा अभी महादेव के दर्शन नही कर सकते तुम इस समय मंदिर के पट बंद है...
मेरी आँखो में भरे हुए आँसू उन से छिप ना सके...
साधु--लगता है जीवन की जंग में हार कर आरहा है तू....तेरी आँखे तेरी कायरता का सबूत दे रही है...तेरा तो स्वयं महादेव भी उद्धार नही कर पाएँगे...
में--बाबा में कायर नही हूँ...लेकिन कभी कभी ज़िंदगी कायर बनने पर मजबूर कर देती है...
साधु--ज़िंदगी तुम्हे लड़ना सिखाती है...या तो जीवन के संघर्षो से डरो मत....या फिर महादेव की भक्ति में लीन हो जा...लेकिन बिना संघर्ष के तो भक्ति भी नही होती बेटा...
में--बाबा मुझे कुछ समझ में नही आ रहा में क्या करूँ...
वो साधु अपनी जगह से उठता है....और मुझे एक छोटे से चबूतरे के पास ले जाता है.
साधु--ले सब से पहले इस चिलम का एक दम लगा उसके बाद अपने दिल की बात खोल कर मुझे बता...
में--बाबा में ये सब नही पीता...
साधु--में तुम्हे हमेशा पीने की सलाह नही दे रहा बस आज मेरे कहने पर एक दम लगा....और उसके बाद तेरे सारे बंद दरवाजे खुल जाएँगे....
में बाबा से वो चिलम ले कर उसे खिचने की कोशिश करता हूँ...लेकिन कुछ भी नही होता....ये देख कर साधु बोलता है...
साधु--बेटा एक माँ भी अपने बच्चे को दूध तब पिलाती है जब वो भूख के कारण संघर्ष करते हुए रोने लग जाता है....इसलिए इस चिलम का दम अगर तुझे लगाना है तो कर संघर्ष.....में देखना चाहता हूँ...तू वास्तव में वीर है या जैसा मैने सोचा कि तू कायर है....
में उनकी ये बात सुनकर काफ़ी ज़ोर लगा कर उसे खिचने की कोशिश करता हूँ लेकिन इस बार मुझे खाँसी आजाती है...
साधु--एक चिलम तुझ से नही खीची जा रही तो तू कैसे इस दुनिया से लड़ेगा. कायर...
बाबा की ये बात सुनकर अचानक मुझे क्या हुआ मैने उस चिलम के 2 -3 लंबे लंबे दम अपने फेफड़ो मे भर लिए....
साधु--हाँ ये हुई ना बात आज तू सही मायनो में एक मर्द बन गया है....अब बैठ यहाँ कुछ देर और याद कर तूने क्या किया और तेरे सगो ने क्या किया...जब तक मुझे एक हवन का निर्माण करना होगा ....
में बिल्कुल स्थिर हो चुका था...दिमाग़ बिल्कुल ऐसे शांत हो गया जैसे उसमें कोई परेशानी कोई अनतर्द्वंद अब बचा नही था...एक लहर मेरे पूरे बदन में उठती हुई सी महसूस हो रही थी....में अपने आप ही बड़बड़ाते हुए साधु को जोभी मेरे साथ हुआ वो बताता चला गया...
साधु ने अब एक हवन कुंड बना कर उसमें आग जला दी थी उस हवन कुंड के आस पास दो साधु और बैठ गये थे....साधु ने मुझे अपने पास बैठने को कहा ...और कुछ चावल के दाने देकर उसे उस हवन में डालने को कहा...में बिल्कुल साधु के कहे अनुसार ही कर रहा था...
साधु--सब से पहले तो ये बात जान ले तेरा जन्म जिसे तू तेरा भाई बोलता है उसके बीज से नही हुआ है....
वो फिर से मेरे हाथ में कुछ चावल के दाने देते है और मेरे उंगली में एक हल्का सा कट लगाकर उस में से निकला खून उन चावलो पर मसल देते है...और मुझे वो उस हवन कुंड में डालने को कहते है..में उनके कहे अनुसार वो रक्तरंजित चावल के दाने उस हवन में डाल देता हूँ...
साधु--मुस्कुराते हुए....ले एक खुश खबरी और सुन...जिसे तू अपना बाप बोलता है तू उसी की संतान है....
में--बाबा ये कैसे हो सकता है....मेरी माँ ने मुझे खुद ही बताया था में किसका खून हूँ.
साधु--तेरी माँ ने बिल्कुल ठीक बताया था...लेकिन महादेव की लीला को कोई समझ नही सकता ....अगर तुझे मेरी बात पर यकीन नही है तो तू वापस जब घर जाए तो तेरी माँ से पुकछना...कि जब तेरा बाप घर से कुछ दिनो के लिए बाहर गया था तब उसने संभोग कब और कितनी बार तक किया था ...
में बाबा की इन बातो से एक बार फिर से सवालो में उलझ चुका था...जब बाबा ने मुझे कुछ सोचते हुए देखा...तब वो मुझे बोले...
साधु--ये चिलम ले और इसके दो दम और मार ले...अभी सोचने का सही वक़्त नही है...तेरी एक परेशानी का इलाज तो मैने कर दिया है...अगर तुझे मेरी बातो पर यकीन नही आता तो....वो क्या कहते है अँग्रेज़ी में....हाँ वो डी एन ए वाला टेस्ट करवा लेना तेरे सारे सवाल वही ख़तम हो जाएँगे...
अब तेरी दूसरी परेशानी का इलाज करते है...
साधु--तू कौन है....?
में--बाबा में इंसान हूँ...
साधु--तुझे इंसान किसने बनाया....??
में--बाबा भगवान ने बनाया...
साधु--ग़लत....भगवान ने सिर्फ़ जानवर बनाया ...भगवान ने अलग अलग प्रकार के जानवर जोड़ो के रूप में बनाए नर और मादा.....तेरे और मेरे पूर्वज भी एक जानवर ही थे...जब हमारे पूर्वाजो ने अपना दिमाग़ विकसित करना शुरू किया...उसके बाद ही उन्होने अपने लिए हथियार बनाए...दूसरे जानवरो का शिकार करना शुरू किया...अपने दिमाग़ के विकसित होने पर उसने खुद से ज़्यादा शक्ति शालि जानवारो का शिकार शुरू कर दिया...लेकिन रहते तब भी वो जानवरो की तरह से थे..उनका बस यही रोज का काम था शिकार करना ....अपना पेट भरना और बच्चे पैदा करना...उस समय जब एक मादा परिपक्व हो जाती थी तो वहाँ ये सवाल नही होता था कि ये बेटी है या माँ है या बहन है...वो बस नर और मादा के रूप में ही रहा करते थे...धीरे धीरे उन्होने अपने अपने कबीले बनाए...उसके बाद वो सभी सुरक्षा के कारण अलग अलग परिवारो के रूप में अलग हो गये...उसके बाद धर्म बना...समाज बना...खुद को अलग अलग वर्गो में बाँट लिया उस जानवर ने अपने आप को...लेकिन ये सब कुछ होने से पहले वो बस एक नर और एक मादा ही थे....
साधु--इंसान को किसने बनाया....?
में--बाबा इंसान को किसी ने नही बनाया उस जानवर ने ही खुद को इंसान रूपी कपड़ो के आवरण से ढक लिया......
साधु--तुमने बिल्कुल ठीक कहा ...सारे रिश्ते नाते,सारे धर्म बस सांसारिक है असली रिश्ता और असली धर्म प्रेम ही है...अब वो तुम पर निर्भर करता है तुम उस प्रेम को कौनसी संगया देते हो...
में--बाबा...जब में घर से निकला था तब में मर जाना चाहता था...लेकिन महादेव ने मुझे आप से मिलवा दिया...और मेरी सभी समस्याओ को सुलझा दिया...
साधु--तेरे जीवन में कठिनाइया अभी ख़तम नही हुई है....जैसे जैसे तू अपनी राह पर चलता जाएगा वैसे वैसे कठिनाइया भी तेरे साथ बढ़ती चली जाएँगी....लेकिन जब तू इन कठिनाइयो को पार कर लेगा उसके बाद तेरा जीवन सुख और प्रेम से भरपूर होगा...
में--बाबा में इन सभी कठिनाइयो को पार करके ही दम लूँगा...
.--चल तुझे में तेरे जीवन से जुड़ी एक बात और बता देता हूँ....तेरी कठिनाइयाँ उसके मिलने के बाद ही ख़तम होंगी...
में--किसके मिलने के बाद बाबा....
साधु--तेरी तीन बहनें और भी है...तेरी 2 बहने तेरी माँ के गर्भ से निकली है...और तेरी 2 बहने तेरी चाची के गर्भ से...लेकिन तेरी एक बहन और भी है...वो बिचारी बेहद दुख पूर्ण वातावर्ण में रह रही है...वो हर रोज महादेव की उपासना करती है उस नरक से निकालने के लिए जहाँ वो रहती है....में तुझे ये तो नही बताउन्गा कि वो कहाँ है लेकिन तू उसे देख चुका है...और मुझे पता है तू उसे ढूँढ भी लेगा....जिस पल वो तेरे जीवन में आ जाएगी उसी पल से तेरे दिन फिर जाएँगे सारे दुख तकलीफे खुशी और प्यार में बदल जाएँगी...
में--बाबा मुझे कैसे पता चलेगा जो चाची की संताने है वो मेरी ही बहने है....
साधु--जिसने उन्हे जन्म दिया है जब तू उस से पुछेगा वो सारे सच बता देगी....तुझे बस अपनी खो चुकी बहन को ढूँढना है इसे तू अपने जीवन का लक्ष्य समझ ले....
ये ले चिलम और एक जोरदार दम लगा....
में वो चिलम लेकर दम लगाता हूँ दम लगाने के बाद में जैसे ही अपनी आँखे खोलता हूँ...
मुझे वहाँ कोई नज़र नही आता सिवाए उस मंदिर के पुजारी के जो मुझे देखे ही जेया रहा था...मेरा दिमाग़ फिर से चलने लगा था ....किसी भी तरह का नशा मेरे दिमाग़ में अब नही था कुछ पल पहले जहाँ में नशे में मस्त हो रखा था वो अब बिल्कुल गायब हो चुका था...