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Incest एक बार ऊपर आ जाईए न भैया

अब विभा उठी और नंगे ही हम सब को कोल्ड-ड्रिंक सर्व की, फ़िर बाथरूम में जा कर नहा कर नंगी ही आई और हम सव के सामने ही कपड़े पहने। हम सब भी बारी-बारी से नहाए और अपने-अपने कपडे पहने और फ़िर सब साथ में करीब ५.३० बजे बाहर घुमने निकल पड़े। इसके बाद हमने ६-९ के शो में फ़िल्म देखी और फ़िर एक होटल में खाना खाया और एक-दूसरे को अपना-अपना नम्बर दिया। इसके बाद मैं और विभा अपने कमरे में आ गये।

अगले दिन शाम में हमारी वापसी की टिकट थी, और हम थक भी गए थे सो बिना सेक्स की बात भी किये हम सो गए। सुबह करीब ७ बजे हम दोनों सो कर उठे और आरम से नहा-धोकर करीब ९ बजे नाश्ता करके शाम को लौटने से पहले बाजर से कुछ ऐसे ही सामान वगैरह खरीदने का प्लान करने लगे

। बाजार वैसे भी ११ बजे के पहले खुलने वाला नहीं था तो कमरे में ही टीवी चला कर हम दोनों लेट गए। तभी मेरे किरायेदार अंकल का फ़ोन आया। वो जानना चाह रहे थे कि मेरा आज वापस जाना हो रहा है कि नहीं। अगले दिन रविवार था सो छुट्टी के दिन वो हमें खाने पर बुलाने के लिए फ़ोन किए थे। मुझे यहाँ आए आज एक सप्ताह हो गया था और अब मेरा वापस जाना जरूरी हो गया था, बिजनेस को ऐसे बहुत दिन नहीं छोडा जा सकता है। मैंने उन्हें मना कर दिया।

मुझे उनके बात से लगा कि वो थोडा निराश हो गए हैं। उन्होंने कहा, "वोह... कोई बात नहीं... मुझे लगा शायद इस बार विभा बेटा से मिलूँ तो कुछ और चीज मिल जाए। पिछली बार रुमाल मिला था। आज तक वैसे हीं है, बिना धुले... मेरे कपड़ों की आलमारी में सबसे नीचे"। मैं उनके इस ठरकीपने को समझ सकता था। करीब ६० साल की उम्र थी, सो साठा तो पाठा वाली बात थी उनके साथ। अचानक मुझे जाने क्या सुझा तो मैं कहा, "आज तो अंकल दिन में बाजार से कुछ ऐसे भी सामान खरीदने का प्रोग्राम है, बाकि कुछ खास नहीं। आप अगर आज अपनी छुट्टी कर सकें तो होटल ही आ जाईए, हम सब साथ में बाजार चल चलेंगे और आपको भी विभा का साथ कुछ घंटों के लिए मिल जाएगा। अगर आपलोग का मन गप्पे मारने का होगा तो आप दोनों यहीं रुक जाना और मैं बाजार से दो घंटे में घुम आउँगा"। मेरी बात सुन कर अंकल खुश हो गए और बोले, "ठीक है, मैं करीब ११ बजे तक आता हूँ, एक बार औफ़िस जाकर सब को काम समझाने के बाद। हम सब साथ में बाजार चलेंगे, मेरी गाड़ी है हीं, परेशानी नहीं होगी"।

विभा पास बैठी हम दोनों की बातें सुन रही थी। वो बोली, "अब जब अंकल गाड़ी ले कर आ रहे हैं तो आराम से दोपहर में निकलेंगे, बाजार में भीड़ कम मिलेगा दोपहर में"।

मैंने उसको बताया कि अंकल यहाँ उससे मिलने हीं आ रहे हैं, उनको उस दिन का रुमाल आज तक मस्त किए हुए हैं, तो विभा हँस पड़ी, "अजीब हाल है मर्द सब का, अब इस उम्र में भी उनका यह हाल है तो मैं समझ सकती हूँ कि आप क्यों ऐसे सेक्स के लिए बेचैन रहते हैं"।

मैंने अब उसको बताया कि मर्द कभी बुढा नहीं होता, और अगर वो अपना फ़िटनेस ठीक रखे तो किसी भी उम्र में लडकी चोद सकता है।

वो बोली, "हाँ, दिख रहा है मुझे... आपका बस चले तो आप आज मुझे अंकल से भी चुदवा दीजिए, राजन और विजय से तो चुदा ही दिए यहाँ ला कर"।

मैंने उसकी बात पकड़ ली, "क्यों नहीं... बहुत मजा आएगा, तुम एक बार कोशिश कर ही लो, अगर अंकल चाहे तो कर लेना उनके साथ सेक्स"।

वो मुझे झिडकते हुए बोली, "हट्ट... आप भी न, अंकल बेचारे इतने बुजुर्ग आदमी... वो यह सब क्यों करेंगे... ऐसे बात कर लेना, मजाक कर लेना अलग बात है और सेक्स करना अलग बात"।

मैंने भी उसको उसकाया कि वो बस हल्के से थोडा अंग-प्रदर्शन करे और उनको थोड़ा उकसाये, जरा मैं भी तो देखूँ कि इस ठरकी में कितना जिगर है...वैसे भी तुम यहाँ पर अब तक सब कुछ मेरी मर्जी से की हो तो यह भी एक बार कर लो ना।

विभा बोली, "ठीक है, अंग प्रदर्शन में क्या है... वो तो उस दिन भी उनके सामने ही पैन्टी पहनी ही थी तो मेरा असली अंग तो वो देखे हुए हैं, अब इसमें क्या लाज... अभी तक आपकी बात मानी हूँ से आज भी वही करुँगी जो आप कहेंगे"।

मैंने उसको बाँहों में बह कर चुम लिया, "मेरी डार्लिंग विभा, तुम बहुत अच्छी हो"।

वो मुझे जोर से अपने बाहों में भींचती हुई बोली, "चलिए न किशनगंज उसके बाद आपको बताती हूँ, यहाँ तो मैं आपकी बात मानने का कसम खाई हुई हूँ, पर एक बार किशनगंज पहुँची कि मैं आजाद हुई और तब आपसे सब बदला लुँगीं"।

हम दोनों अब हँसने लगे। फ़िर विभा हटी और जल्दी से अपने कपडे उतारने लगी,

"भैया, जल्दी से मेरा काँख और चूत पर का बाल साफ़ कर दीजिए न। जब अंकल को यह सब दिखाना ही है तो ठीक से साफ़ ही आज दिखाती हूँ, उस दिन तो सब कुछ बाल से भरा हुआ था।"

मुझे भी उसका आइडिया पसंद आया सो मैं भी पानी और रेजर ले कर आ गया और फ़िर रेजर को सीधा और फ़िर उल्टा चला कर अपनी छोटी बहन विभा की काँख और चूत को एक दम चिकनी सफ़ाचट बना दिया। पिछले सप्ताह भर की लगातार चुदाई से उसकी चूत की फ़ाँक बहुत सुन्दर तरीके से खुल गई थी और भीतर के होठ अब थोडा सा बाहर लटक रहे थे, क्योंकि म्रेरे द्वारा उसके बदन को छुने से वो गर्म हो रही थी। वो अब एक सेक्सी वाली लाल माईक्रो-पैन्टी और गुलाबी ब्रा पहनने के बाद एक बिल्कुल शुद्ध देसी घरेलू लड़की की तरह सफ़ेद सलवार सूट पहन लिया और सज्जन की तरह एक दुपट्टा भी ले लिया। बाल वगैरह भी सेट करके हल्का सा काजल और लिपस्टिक लगा कर बहुर सुन्दर तरीके से सज गई।

समय बीताने के लिए हमने चाय और पकौडे का आर्डर कर दिया और रूम सर्विस वाला वही लड़का यह सब लाया जो उस दिन लाया था जिस दिन मैंने विभा की झाँट पहली बार बनाई थी। वो कनखियों से विभा को बार-बार देख रहा था पर आज कि विभा एक दम घरेलू लड़की थी। वो बेचारा चला गया तो हम दोनों पिछली बार को याद करके जोर से हँस पडे। हम अब टीवी देखते हुए उस ठरकी किरायेदार का इंतजार करने लगे।

विभा अब आराम से बोली, "भैया, आप इस एक सप्ताह में मुझे क्या से क्या बना दिए, सोचने पर कैसा लगता है"।

मैंने बात की गंभीरता को समझा पर बात को हल्का करते हुए बोला, "क्या बना दिए क्या... तुम लडकी थी, जवान हो गई थी तो औरत बना दिए। इसमें ऐसा-वैसा लगने वाली क्या बात है?"

विभा बोली, "हाँ सो तो है, पर यहाँ पर मुझे आपके अलावे और भी उन दोनों लडकों के साथ सेक्स करना पड़ा सो... शुरु होने के एक सप्ताह के भीतर ऐसा नहीं होता है", वो मुस्कुरा रही थी।

मैंने भी कहा, "अरे तो तुम किस्मत वाली हो जो इतनी जल्दी अलग-अलग टाईप के लन्ड का स्वाद लेने को मिला... और अगर भगवान ने चाहा तो अब तुम्हें एक सिनियर सिटिजेन का भी स्वाद मिलेगा। देख लेना, वो ठरकी तुम्हें चोदे बिना रहेगा नहीं, अगर तुम ने जरा सा भी उसको ढ़ील दे दी"।

वो मुझसे पूछी, "आप सलाह दीजिए न भैया, उसके साथ कर लूँ कि उसी दिन की तरफ़ सिर्फ़ बदन दिखा कर रह जाऊँ?"

मैंने अब उसकी आँखों में झाँकते हुए पूछा, "तुम्हारा क्या मन है?"

वो फ़िर बोली, "यह मैं आप पर छोडती हूँ..."।

मैंने कहा, "मुझे तो तुम्हें चुदाते हुए देख कर बहुत मजा आता है। तुम्हारे चेहरे पर जो भाव आता है जब तुम चुद रही होती हो, वो देखने लायक होता है। मेरे से भी जब चुदाती हो तब भी... पर जब तुम दुसरे से चुदाते हुए मुझसे नजर मिलाती हो तो मेरा दिल धक्क से कर जाता है। एक भाई को अपनी सगी छोटी बहन को ऐसे दुसरे से चुदाते देखना नसीब नहीं होता।"

विभा मुस्कुराई, "मतलब, उस बुढ़े से मैं अब चुदा हीं लूँ ताकि आपको मजा आए... ठीक है देख लीजिए आज, कैसे उस बुढे का मैं भुर्ता बनाती हूँ"।

मैंने भी जोड दिया, "बुढे का नहीं, उसके लन्ड का भुर्ता बनाना वो भी अपनी चूत से, और देखना कहीं वो बुढ़ा ही तुम्हारी चूत का भोंसडा न बना दे"।

विभा बोली, "चुप बहेनचोद...", फ़िर उठी और कमरे के फ़्रीज में से एक सेव निकाल कर लाई और उसमें से दो पतली फ़ाँक काटी। फ़िर जल्दी से अपनी सलवार नीचे ससार कर चट पैन्टी भी नीचे की और मेरे सामने सोफ़े पर बैठ कर अपने जाँघ को खोल कर उन सेव के फ़ाँकों को अपने चूत में घुसा ली। मैं यह देख कर दंग था, और विभा आराम से तीनों टुकडों को चूत में डालने के बाद उठी और अपना पैन्टी और सलवार पहन ली। सेव की फ़ाँकें उसके चूत में चुभ रही थी सो थोड़ा कमर नचा कर और पैर को हिला-डुला कर उन फ़ाँकों को अपने चूत में आराम से सेट करके चल कर देखी और फ़िर आराम से बैठी, "हाँ अब ठीक से सेट हो गया है छेद में"। उसकी इस तैयारी को देख मेरा लन्ड फ़नफ़ना गया कि तभी रूम की कौलबेल बज गई।
 
मैंने उठ कर दरवाजा खोला तो जनाब हाजिर थे। नमस्कार के बाद मैंने बैठने को कहा, तो अंकल ने हाथ के पैकेट को टेबुल पर रखा, "यह पेस्ट्री है, लेता आया हूँ, डार्क-फ़ैरेस्ट...तुम लोग के लिए"।

विभा ने उनको गले से लगाया और फ़िर उनके गालों को चुमती हुई बोली, "वाह अंकल, मुझे डार्क-फ़ैरेस्ट बहुत पसंद है, थैंक्यु"।

अंकल ने कहा, "इसमें थैंक्स की क्या बात है, बल्कि तुम्हारा जो अहसान है इस बुढ्ढे पर उसके आगे तो यह कुछ भी नहीं है"।

विभा ने सब समझते हुए भी अनजान की तरह पूछा, "अह्सान... कैसा अहसान, क्या बात कर रहे हैं आप अंकल?"

वो बिना किसी लाग-लपेट के बोले, "उस दिन जो तुम मुझे अपना प्राईवेट अंग दिखाई थी और फ़िर मेरे रुमाल को जो इज्जत बख्शी... मैं उसकी बात कर रहा हूँ"।

विभा मुस्कुराते हुए बोली, "ओह, तो वो बात है... अच्छा, आज मैं आपको अपनी पैन्टी ही दे दुँगी, आप चिन्ता मत कीजिए।"

अंकल खुश हो गए, तब वो बोली, "लेकिन एक शर्त पर... आपको मेरे बदन से पैन्टी अपने हाथ से उतारनी होगी"। यह कहते हुए एक पेस्ट्री निकाली और फ़िर अपने मुँह में एक बडा सा कौर ले कर अपना चेहरा मेरी तरफ़ कर दिया और मैंने उसके मुँह के बाहर के हिस्से की पैस्ट्री अपने मुँह से खाई `और फ़िर विभा के अंदाज को देख कर गर्म हुआ मैं, उसके होठ चुसने लगा।

वो पेस्ट्री खाना चाह रही थी पर मेरे चुम्मा की वजह से खा नहीं पा रही थी तो मुझे दूर करके वो पेस्ट्री खाई और बोली, "अभी तो अंकल को भी खिलाना है"। फ़िर उसने वैसे ही एक बडा टुकड़ा फ़िर से मुँह में लिया और फ़िर अंकल के पास जा कर उनके मुँह को खोलने का इशारा किया और जब अंकल ने मुँह खोला तो अपने मुँह की पेस्ट्री उनके मुँह में डाल दी और वो जब खाने लगे तो उनका होठों का चुम्बन ली।

अंकल की हालत अब देखने लायक थी। हम सब के मुँह की पेस्ट्री जब खत्म हो गई तो विभा बोली, "आईए अंकल, आज आपको कुछ ज्यादा दे देती हूँ, और वो उनके गोदी में उनके चेहरे की तरफ़ अपना चेहरा करके अपने दोनों घुटनों के बल बैठ गई। सोफ़े पर बैठे अंकल के लन्ड के ठीक उपर अब विभा की चूत थी।

मैंने देखा कि मुझे वहाँ देख कर अंकल थोडा असहज हो रहे हैं तो मैंने कहा, "विभा मैं अब दो घन्टे सो लेता हूँ, तुम अंकल को बोर मत करना... ठीक है। हमलोग करीब दो बजे बाजार चलेंगे"।

विभा नाजों के साथ बोली, "ठीक है बाबा, जब उठना तो अंकल से ही पूछ लेना कि वो बोर हुए कि खुश हुए मेरे साथ", और यह कहते हुए वो अपने कमर को चलाते हुए अपना चूत उनके लंड पर रगड रही थी।

मैं अब लेटने और आँख बन्द करने का नाटक करते हुए अपना ध्यान उनकी तरफ़ किये हुए था।

विभा ने उनको फ़िर कहा, "लीजिए अंकल मैं अपना दुपट्टा खुद हटा देती हूँ, बाकी कपडा आप अपने हाथ से उतार कर मेरा बदन देखिए आज", और वो अपना दुपट्टा अपने छाती से हटा कर सोफ़े पर डाल दी। वो अब अपने बदन को अंकल के बदन से रगड़ रही थी और अंकल बेचारा हक्का-बक्का इस जवान लौंडिया के जलवे से भौंचक हुआ बैठा कुछ सोच रहा था।

अंकल जी थोडा मेरे सामने सकुचा रहे थे, सो मैंने अपने आँख को बन्द करने का नाटक किया।

विभा भी उनका संकोच समझ गई और फ़िर हिम्मत बढ़ाने के लिए खुद अपने हाथ से उनके हाथों को पकड़ कर अपने चुचियों पर रख दी और दबाई। अंकल भी अब इशारा समझ कर विभा की चुचिओं से खेलते हुए उसको चुमने लगे, जबकि किसी पोर्न-स्टार की तरह अपने कमर को हिला-हिला कर अपने चूत से उनके लन्ड को रगड़ रही थी, हालाँकि उन दोनों के बदन पर अभी भी कपड़ा था। फ़िर विभा उठी और उनकी तरफ़ पीठ करके उनकी गोदी में बैठी और अपने बालों को अपने हाथों से सामने की तरफ़ करके इशारा किया कि वो उसके कुर्ते की चेन(जिप) खोलें। अं

कल ने उसकी कुर्ती की चेन खोल दी तो विभा आराम से अपने बदन से कुर्ता उतार दी। अब सलवार और ब्रा में वो फ़िर से उनके सामने चेहरा करके गोदी में बैठ गई और दोनों पुनः चुम्मा-चाटी करने लगे। अब अंकल थोडा रस ले कर चुम्मी ले रहे थे और अपना हाथ विभा के बदन पर घुमाने लगे थे, कभी पीठ तो कभी पेट, तो कभी कमर...। जल्दी ही उनके हाथ नीचे खिसक कर सलवार पर से ही विभा की जाँघ और सामने से उसकी चूत को भी सहलाने लगे थे।

विभा अब उनके हाथ को पकड कर अपने सलवार के गाँठ पर रख दी। यह इशारा था कि वो अब उसकी सलवार खोलें। अंकल ने भी बिना समय गवाँए उसके सलवार की डोरी खींच दी और तब विभा थोड़ा सा उठी तो वो सलवार को नीचे खिसकाए। विभा के उस सेक्सी माइक्रो-पैन्टी की झलक पा कर अंकल एक बारगी सन्न रह गए तो विभा खुद सामने खड़ा हो कर अपने सलवार को अपने बदन से अलग कर दी।

अंकल की नजर उसकी पैन्टी पर से हट ही नहीं रही थी। बस इसी समय विभा ने कमाल कर दिया।
 
उसने अपने पैन्टी में हाथ डाला और फ़िर चूत में से सेव का एक टुकडा निकाला, जो उसकी चूत की रस से भींगा हुआ था, और अंकल के मुँह की तरफ़ बढ़ाया।

अंकल ने एक बार विभा को देखा तो वो बोली, "खाइए न, आपके लिए ही इसको दो घन्टा से अपने चूत में डाल कर पका रही थी। खा कर बताइए कि सही से पका है कि नहीं"।

अब तो अंकल जैसे ठरकी को खाना ही था, वो बिना देर किए सेव का वो टुकडा खा गए, और विभा को खींच कर अपने गोदी में गिरा पर बेतहाशा चुमने लगे। उस सेव ने तो जैसे कमाल कर दिया था।

विभा किसी तरह हँसते हुए उनसे दूर हुई और फ़िर वैसे ही पन्टी में हाथ डाल कर सेव का दुसरा टुकडा निकाल कर खाने के लिए दिया। इस टुकडे को खाने के बाद वो उम्मीद में थे कि विभा उनको और सेव खिलाएगी, पर विभा बोली, "बहुत हो गया, अब दूध पी लीजिए"।

अंकल ने उसका इशारा समझा और फ़िर उसकी ब्रा उतार कर उसकी चुचियों को मसलते हुए मुँह में ले कर चुसने लगे।

विभा के मुँह से सिसकी निकलने लगी थी और वो अब उसने बाहों में मचल रही थी, पर अपने कमर को उनके लन्ड पर नचाना बन्द नहीं किया था। बेचैन हो कर विभा अब उठी और फ़िर अंकल को साईड में करके सोफ़े पर खुद लेट गई और फ़िर अंकल को कहा, "मेरी पैन्टी खोलिए न अपने हाथ से, और फ़िर मेरी चूत को चूसिए, खुब जोर से।"

अंकल ने भी जैसा वो बोली वो करने लगे।

विभा ने अपने कम ऊपर उठा दिया तो उनको उसके बदन से पैन्टी उतारने में जरा भी परेशानी नहीं हुई और फ़िर एकटक विभा की साफ़, चिकनी चूत को निहारने लगे।

विभा बोली, "कैसा लगा, यह नया रूप, उस दिन तो खुब सारे बाल थे, आज सिर्फ़ आपके लिए इसको साफ़-सुथरा की हूँ..., अब जल्दी से इसको चुम्मी लीजिए और चुसिए"।

अंकल ने जैसे ही विभा की चूत से अपना मुँह सटाया, विभा ने अपने चूत को सिकोड़-फ़ैला कर भीतर से सेव का अंतिम टुकड़ा बाहर धकेला, और जैसे ही, हल्का सा वो बाहर दिखा, अंकल ने अपने जीभ से उसको सहलाते हुए बाहर निकाला और सीधे अपने मुँह में ले कर खाने लगे।

विभा पूछी, "ऐसा नास्ता कभी किए थे पहले?"

बेचारा ठरकी बोले तो क्या बोले... वो तो विभा से यही कहता जा रहा था कि आज तो उसने उसको अपने एहसान से खरीद लिया है"।

विभा बोली, "आइए अंकल अब चोदिए मुझे, अब मेरे से बर्दास्त नहीं हो रहा है"। वो चट से अपना पैन्ट खोला कि विभा अपना जाँघ फ़ैला दी और अंकल का ७" का लन्ड विभा की चूत में घुस कर कहीं मस्त हो किलकारी मारने लगा।

अंकल अब किसी कुत्ते की तरह हाँफ़ते हुए उसको चोदे जा रहे थे।

विभा भी आँख बन्द करके अब अपनी चुदाई का लुत्फ़ लेने में मगन थी। करीब दस मिनट के धक्कमपेल चुदाई के बाद अंकल जब खलास होने को आए तो बोले, "अब मेरा निकल जाएगा विभा बेटा..., अब और नहीं रुको निकालने दो बाहर"।

विभा ने उनके कमर के गिर्द अपनी टांगे लपेट दी और कहा, "मेरी चूत में ही निकाल लीजिए अंकल, समझ लीजिए कि आज आपकी सुहागरात है"।

अंकल बेचारा पूरी तरह से सुना भी नहीं और हाँफ़ते हुए उसके ऊपर औंधे मुँह गिर पडा, उसका लन्ड अब विभा की चूत में ठुनकी ले रहा था और अपना माल से उसकी चूत को भर रहा था।

विभा भी अब शान्ति से नीचे लेट कर उसके लन्ड की टनक का मजा ले रही थी, जब लन्ड ने ठनकना बन्द कर दिया तब विभा अपने चूत को सिकोड़-सिकोड़ कर लन्ड का सारा रस निकाल ली।

अंकल का लन्ड अब सिकुडने लगा था सो वो अब विभा की चूत से बाहर फ़िसल गया।

अंकल अब विभा पर से हट गए और उसकी खुली हुई चूत में ने निकल रहे सफ़ेद वीर्य को देख रहे थे, जो अब विभा की गाँड़ की छेद की तरफ़ बह चला था।

विभा ने हाथ बढ़ा कर अपनी माईक्रो-पैन्टी उठाई और फ़िर उससे अपना चूत पोछने के बाद उस नन्ही सी पैन्टी को अपनी ताजा चुदी चूत के भीतर पूरी तरह से घुसा दिया और फ़िर दो-तीन बार चूत को भींच कर फ़िर आराम से धीरे-धीरे अपनी पैन्टी को बाहर निकाली और फ़िर नंगे ही टहलते हुए बेड के नीचे से एक पौलिथीन निकाल कर उस पैन्टी को उसमें पैक करके अंकल को दी।

अंकल तब तक अपना कपड़ा पैन्ट पहन चुके थे, वैसे भी उन्हेंने तो सिर्फ़ अपना नीचे का ही कपडा खोला था और विभा को चोदे थे। विभा अब ब्रा पहन रही थी तो वो बोले, "वो ब्रा भी दे दो न, आज मार्केट में तुमको दुसरा खरीद दूँगा, पर इस वाले में तो तुम्हारे बदन की खुश्बू बसी हुई है, अनमोल है"।

विभा मुस्कुराई और फ़िर उस ब्रा को भी अंकल को दे दिया और नंगी ही मेरे पास आ कर मुझे उठाने का नाटक की। उसको पता था कि मैं सोया नहीं हूँ, बस एक्टिंग कर रहा हूँ। मैं भी अब उठा और फ़िर उसके तरफ़ अधखुली नजरों से देखा तो वो बोली, "पूछ लीजिए अंकल से कि उनको मजा आया कि नहीं"।

मैंने भी अब पूरी तरह से जगने का नाटक करते हुए कहा, "तुम्हारी हालत से पता चल रहा है कि अंकल को आज क्या सब मिला है", और मैंने अंकल की तरफ़ देखा जो कपड़े पहने हुए होने के बाद भी शर्म से लाल हुए जा रहे थे।

विभा अब बोली, "मैं नहाने जा रही हूँ, अब तुम अंकल से बातें करो" और वो तौलिया ले कर नंगी ही बाथरूम में घुस गई।

मैंने अब अंकल को छेडते हुए कहा, "क्यों अंकल, कैसा रहा... मजा आया"? वो बेचारे शर्माए हुए से चुप-चाप बैठे थे तो मैंने फ़िर से छेडा, "अरे कुछ तो बोलिए न अंकल... कैसा लगा विभा को चोद कर?"

अब बेचारे के मुँह से निकला, "हाँ, बहुत अच्छा लगा। ऐसा कुछ होगा, कभी सोचा ही नहीं था। विभा बहुत अच्छी लड़की है"।

मैंने कहा, "वही तो..., अब समझ में आया, क्यों मैं उसपर जान छिडकता हूँ। आप उसको जब मन तब चोद सकते हैं, कभी ना नहीं कहेगी। बहुत बोल्ड और बिंदास किस्म की चीज है"।

अंकल भी अब उसकी तारीफ़ करते हुए बोले, "हाँ बहुत अच्छी है, खुब मन से सेक्स करती है और पार्टनर को भी खुश करने का ख्याल रखती है..."।
 
विभा अब नहा कर नंगी ही बाहर आ कर हम लोग के सामने कपडा पहनते हुए हमारी बात-चीत सुन रही थी और मुस्कुरा रही थी।

मैंने कहा, "अरे पार्टनर की खुशी के लिए नहीं मेरी खुशी के लिए कहिए, मेरी प्यारी विभा कुछ भी कर लेती है। अभी आपने देखा कि कैसे बिंदास हो कर आपसे चुदा ली। ऐसे ही उस दिन पर बिना दुबारा सोचे कि आप भी घर पर हैं, आपने देखा कि कैसे आराम से बिना ना-नुकुर किए आपके घर पर चुदवा ली। फ़िर समुन्दर के किनारे भी कई लोगों के रहते सिर्फ़ मेरी खुशी के लिए चुदी, जबकि सब तरफ़ से लोग उसको ऐसे चुदाते हुए देख रहे थे।"

विभा अब बोली, "चलिए अब देर मत कीजिए, उठिए... आपको तो केवल अपने मजे की पड़ी है, यहाँ मुझे अपनी टाँग को ऐसे फ़ैला कर लेटना पडता है और तब कितना दर्द होता है जाँघ में आपको थोडे ना पता चलेगा। बस पाँच-सात सेकेन्ड का आपके बदन के थरथराहट को अपने भीतर महसूस करने के लिए यह सब झेल लेती हूँ"।

मैंने उठते हुए उसको अपने बाहों मे पकड़ लिया और फ़िर उसके होठ चुम लिए। अब उसने मुझे अपने से दूर करते हुए कहा, "हटिए अब और नहीं, देर हो जाएगा... वैसे भी, अंकल को मेरी चुदाई देख कर शर्म आ जाएगी। बेचारे भले आदमी को क्यों यह सब आप दिखा रहे हैं?"

अकंल उसकी बात सुन कर झेंप गए फ़िर बोले, "विभा बेटी, असल में कभी मेरे कल्पना में भी नहीं था कि ऐसे कभी तुम जैसी किसी लडकी से यह स्ब करने का मौका मिलेगा"।

मैंने अब अपने शर्ट का बटन लगाते हुए कहा, "मेरी वाली को तो चोद लिए... अब अपनी वाली को कब मेरे साथ सुला रहे हो?"

अंकल भी अब अपनी बीवी के बारे में सोचते हुए ठरकी हो कर बोले, "वो बुढिया तो बीस साल से मेरे साथ नहीं सोई तो तुम्हारे साथ क्या सोएगी। अब तो कोई बेटी भी नहीं है मेरी कि तुम्हारा एहसान चुका सकूँ..."।

विभा बीच में ही बोली, "वाह रे... मैंने आपको अपना बदन दिया चोदने के लिए और एहसान इस हरामी का हो गया आप पर... मेरा कोई एहसान नहीं हुआ? मेरा भी तो कर्ज आपको चुकाना है।"

अंकल सकपकाते हुए बोले, "हाँ बेटा, यह बात तो है... बताओ कैसे चुकाउँ तुम्हारा एहसान..."।

विभा अब मेरी तरफ़ देखी कि मैंने बिना कुछ सोचे कह दिया, "अरे अंकल होटल में रंडी चोदे हैं बस यही समझ कर कर दीजिए पेमेन्ट... क्यों विभा, रंडी के रूप में आज पहली बार क्या लोगी?"

विभा मेरे इन शब्दों को सुन कर थोड़ा चौंकी पर फ़िर बोली, "रंडी तो आप लोग चोदते होंगे, मुझे क्या मालूम..."।

अंकल बोले, "तुम तो अनमोल हो बेटी... फ़िर भी आज ग्यारह साल बाद किसी लडकी के बदन को भोगने के एवज में तुम्हें आज ११ हजार का शगुन दुँगा। पेमेन्ट नहीं शगुन... तुम जैसी अच्छी लड़की को भगवान कभी ऐसे रंडी न बनाए", वो भावुक हो गए थे। इसके बाद मेरी छोटी बहन विभा पहली बार अपनी चुदाई के एवज में ११ हजार कमाई।

इसके बाद हमलोग बाजार की तरफ़ चल दिए। इधर-ऊधर कुछ-कुछ खरीदने के बाद बाहर ही लंच किया गया और करीब दो घन्टे के बाद ६ के करीब अंकल हमें हमारे होटल ड्रौप करके चले गए। हमने अब जल्दी-जल्दी अपना सामान पैक किया और वापसी के लिए तैयार हो गए।

अपने दो बहनों को इस तरह से अब तक मैं चोद चुका था, और विभा को तो दुसरों से चुदा भी चुका था। फ़िर अब मुझे ख्याल आ रहा था कि काश प्रभा की शादी न हुई होती तो मैं उसकी भी कुँवारी चूत की सील तोडने का मजा लेता। अब मेरे दिमाग में हमेशा घुमता रहता कि अब कैसे प्रभा को चोदूँ। विभा से इस विषय में बात भी नहीं कर पाता क्योंकि उसको तो यही पता था कि मैंने प्रभा को भी चोदा है।

हमें किशनगंज आए चार महिने हो गए थे और अब विभा और मैं फ़िर से अपने शहर में एक अच्छे भाई- बहन की तरह रहने लगे थे, क्योंकि विभा की यही शर्त थी कि वो घर पर मुझसे नहीं चुदाएगी। मेरे पास भी उसकी बात मानने के आलावा कोई चारा नहीं था। एक अच्छी बात यह हुई थी कि स्वीटी का टर्म ब्रेक होने वाला था १५ दिन का और वो कुछ दिन के लिए घर आ रही थी।

मैंने स्वीटी को बता दिया था कि विभा भी अब चालू हो गई है। मेरी बात सुन कर स्वीटी के आश्चर्य का ठिकाना न था, जिस तरह की विभा को स्वीटी देख कर गई थी वो सोच भी नहीं सकती थी कि वो विभा अब तक मुझसे और दूसरों से चुदवा रही है। मैंने उसकी बात विभा से करवाई और उसने उसको बधाई दी कि उसको कई प्यार करने वाले मिले, जबकि यहाँ कौलेज में बदनामी न हो के डर से स्वीटी को एक छुईमुई लडकी की तरह रहना पड़ रहा है। बस जब बहुत गर्मी चढ़ जाती है तो गुड्डी के साथ चुम्मा-चाटी और फ़िर एक-दूसरे के साथ ऊँगली से संतुष्ट होना पडता है।

विभा ने उसको पहले ही बता दिया था कि वो घर जा कर फ़िर यह सब नहीं करेगी और किशनगंज में जैसे वो पहले रहती थी वैसे ही रहेगी। स्वीटी कई बार उसको मेरा खयाल करने को बोली पर विभा टस से मस न हुई। खैर स्वीटी ने मुझे भरोसा दिया था कि वो घर पर मेरे से खुब चुदाएगी और मेरी सब तमन्ना पूरी कर देगी जो अब किशनगंज में विभा पूरी नहीं कर रही है। मैं अब बेसब्री से स्वीटी के आने के दिन गिनने लगा था। इसी बीच में प्रभा के पति का फ़ोन आया कि उसको उसकी कंपनी औस्ट्रैलिया भेज रही है एक साल के लिए और वो अगले सप्ताह प्रभा को हमारे घर छोड कर औस्टैलिया जाएगा और फ़िर वहाँ घर वगैर का इंतजाम करके प्रभा को भी साथ ले जायेगा। इस सब के बीच करीब १५ दिन वो हमलोगों के साथ रह लेगी। अब मेरी इच्छा पूरी होने का समय आ रहा था, अब देखना था कि प्रभा का क्या रूख रहता है।

अगले सप्ताह स्वीटी पहले आई और बिना नहाए धोये मेरे साथ कमरे में बन्द हो गई। करीब एक घन्टे बाद जब मैं बाहर आया तो विभा मुझे देख कर मुस्कुराई, "अब ठीक है न, मजे कीजिए उसी के साथ और अब मुझे परेशान मत कीजिएगा इस सब के लिए"।

पीछे से स्वीटी भी कमरे से निकली और बोली, ’अरे दीदी, तुम क्या जानो कि किसी मर्द के लिए कितना तडपी हूँ मैं कौलेज में। अभी तो रात में भी भैया के साथ हीं सोना है। तुम तो खुब अलग-अलग टाईप का ले ली हो इसी से ऐसे शान्त हो। अभी तो जीजू आएँगे तो उनके साथ भी सोना है। वो हमेशा मुझसे बोलते हैं, "साली आधी घरवाली होती है..." अब उनको भी घरवाली का मजा दे दुँगी। उस रात स्वीटी मेरे साथ सोई और रात में दो बार चुदाई। यह रोज का नियम सा हो गया था।
 
स्वीटी के आने के तीन दिन बाद प्रभा भी अपने पति के साथ आ गई। उसके पति प्रभात और प्रभा के चेहरे से खुशी चमक रही थी। बात ही ऐसी थी कि अब दोनों साल भर के लिए विदेश जा रहे थे वो भी प्रोमोशन के साथ।

प्रभा ने मेरे पैर छुए और फ़िर अपनी बहनों से गले मिली। स्वीटी को देख कर प्रभात ने फ़िर कहा, "और मेरी आधी घरवाली, कैसा चल रहा है सब?’ तब उसने तो प्रभात को जोर से पकड़ कर उसको चुम लिया और कहा, "अब समझ में आया?"

जवाब में प्रभात ने भी उसको पकड कर खुब प्यार से चुमा और बोला, "वाह... आज तो तुम्हारा होठ मेरी पूरी घरवाली के होठ से मीठा लग रहा है।"

प्रभा उनको ऐसे देख कर बोली, "चल हट स्वीटी अब उसके पास से, नहीं यह और ज्यादा बदमाशी करेगा... पता नहीं वहाँ जा कर य्ह कैसे रहेगा अभी से इतना जोश में है।"

दोनों हँसते हुए अलग हुए और प्रभात बोला, "अरे खुले समाज में जीने का मौका मिलेगा तो मर्दाना मजा तो लूँगा, तुम्हें भी तो छुट दे रहा हूँ अगले साल भर तक मजा लो फ़िर बच्चे पैदा कर लेना और बीजी रहना दिन भर उसकी देख भाल में..."। उसकी बात सुन कर हम सब हँस पड़े।

मेरी नजर लगातार प्रभा को घुर रही थी। शादी के बाद के छः महिने में उसका सारा रंग ढंग ही बदल गया था। लडकियाँ जब चुदाने लगती है तो मस्त हो जाती हैं, यह मुझे पता था और प्रभात उसे रोज दो बार चोदता था, यह बात मुझे प्रभात ने ही बताई थी। प्रभात मेरा बचपन का दोस्त था और अक्सर मेरी बहनों के बारे में चुटकी लेता रहता था। वो अक्सर मुझसे कहता था कि यार तुम्हारी एक बहन से मैं शादी करुँगा, कम-से-कम बाकी दोनों मेरी साली तो बनेगी न। उसको स्वीटी विशेष पसन्द थी पर उसकी शादी की उसके माँ-बाप को जल्दी थी तो उसको प्रभा से शादी करनी पडी। उसने तो मुझे सुहागरात के पूरे वर्णन को सुनाया था और तब न चाहते हुए भी मैं अपने दोस्त की बात सुनता रहा था।

उसने हीं मुझे बताया कि प्रभा बहुत ही मस्त हो कर चुदवाती है और वो उसको दो बार जरुर चोदता है, एक बार रात में सोने के पहले और फ़िर दुबारा सुबह में जागने के बाद उसको चोदने के बाद ही वो बिस्तर से निकलता है। वो कभी-कभी प्रभा के सहारे बात को मेरी बाकी बहनों की तरफ़ ले जाता और उनके बारे में भी खुब सारी गंदी बातें कहता पूछता। उसके साथ के बातों का ही असर था कि मैंने खुब आराम से अपनी दोनों बहनों को चोदा बिना दो बार यह सोचे कि वो मेरी सगी बहने हैं। वो मुझसे अक्सर कहता था कि कभी मौका देख कर अपनी बहनों को चोदो, सब की सब बहुत मस्त माल हो गईं हैं।

मैंने उसको बताया नहीं था कि मैं अपनी दोनों छोटी बहनों को चोद चुका हूँ। प्रभात को अलगे दिन वापस लौटना था कुछ कागजात संबंधी कामों के लिए। रात के खाना खाने के बाद हम सब सोने चले, प्रभा और प्रभात एक कमरे में, विभा और स्वीटी एक कमरे में और मैं अकेला एक कमरे में। तभी अचानक प्रभात स्वीटी से बोला, "तब आधी घरवाली, आज रात के बाद तो जब तुम घर आओगी तो हम विदेश रहेंगे और फ़िर तुम्हारी शादी भी हो जाएगी। तो आज रात आ जाओ न हमारे साथ। पूरा काम तो पूरी घरवाली के साथ करुँगा, तुम्हारे साथ आधा ही करुँगा..." फ़िर मेरी तरफ़ देख कर कहा, "क्यों दोस्त, इजाजत है... साली को ले जाऊँ साथ में।"

मैंने जवाब दिया, "तुम्हारी साली है तुम जानो... वैसे प्रभा से पूछो"।

वो बोला, "प्रभा को कोई फ़र्क नहीं पड़नेवाला... मैंने उसको हमलोगों की सारी कमीनापंती की कहानी सुना दी है, उसको पता है कि उसका भैया कैसा है"।

प्रभा मुस्कुराई तो मैं जरा घबडाया, पर तब स्वीटी ही चहकी, "चलिए न जीजू... आज आपको पूरी घरवाली का मजा देती हूँ"।

प्रभा बोली, "बाप रे, यह तो प्रभात का सपना है। रोज एक न एक बार पक्का तुम्हारी चर्चा जरुर करेगा स्वीटी। ऐसी बाते करोगी तो यह कमीनापंती किए बिना मानेगा नहीं"।

स्वीटी बोली, "अरे नहीं दीदी... सच में जीजू को इनाम दे रही हूँ। आज के बाद फ़िर न जाने कब भेंट होगी। वैसे भी जीजू प्रोमोशन के साथ जा रहे हैं विदेश तो कुछ तो खास होना चाहिए न"।

प्रभा ने आँखें घुमाई, "मेरे सामने बोल रही है लडकी...प्रभात मेरा पति है"।

मैं जानता था कि स्वीटी को प्रभात से चुदाने का मन है तो मैंने कहा, "अरे प्रभा तो तुम विभा के साथ सो जाओ न, आज जाने दो स्वीटी को प्रभात के साथ। वैसे भी मुझे पता है कि प्रभात को स्वीटी कितना पसन्द है, शादी के पहले से वो उसके नाम की (मूठ बोलने का मन हुआ पर मैंने कहा नहीं) निकालता रहा है। एक रात सो लेने दो बेचारे को स्वीटी के साथ।"

प्रभात अब बोला, "यार प्रौब्लम यह नहीं है, असल में तुम्हारी बहन प्रभा जो है उसको पिछले छः महिने में एक बीमारी हो गयी है, जब तक बेचारी चुदा ना ले उसको नींद ही नहीं आती है, उसके चक्कर में मुझे रात १२ बजे भी टूर से लौटना पडता है उसको चोदने के लिए। तो उसको तो विभा के साथ नींद आएगी ही नहीं। वो बिना किसी लाज-शर्म के चुदाई शब्द बोल रहा था, वैसे भी हम आपस में ऐसे बात करते रहते थे। वो अब बोला, "ऐसा करो यार तुम उसको अपने साथ सुला लो... यार अपनी बहन नहीं मेरी बीवी समझ कर प्रभा को सुला लो साथ में... तब शायद उसको नींद आ जाए।"

इसके बाद प्रभात...बाय...गुड नाईट... कह कर स्वीटी का हाथ पकड कर अपने कमरे में चला गया। विभा तो पहले ही जा चुकी थी सो अब वहाँ मैं और प्रभा ही थे। मैंने अब एक बार गौर से प्रभा को देखा और फ़िर कहा, "आ जाओ मेरे साथ..." वो मेरे नजरों के अपने बदन पर फ़िसलते देख कर थोडा असहज हुई और मैं अपनी किस्मत पर खुश हुआ। वो थोडा हतप्रभ थी तो मैंने उसको सहज करते हुए कहा, "आओ न... अभी प्रभात ने कहा था न कि मैं उसकी बीवी को अपने साथ सुला लूँ, तो तुम भी भैया के साथ नहीं अपने पति के दोस्त के साथ सो जाओ"।

प्रभा अब मुस्कुराई, "आप सच में बहुत कमीने हैं भैया। प्रभात कहता था तो मुझे लगता था कि वो ऐसे ही बात बना रहा है... पर आप तो.... चलिए फ़िर।" हम दोनों अब मेरे कमरे में आ गए।

कमरे में आते हुए वो बोली, "सच में ... सेक्स के बाद न नींद बहुत अच्छी आती है।"

मैंने कहा, "जरा सा पहले चूस दो न मेरा लन्ड...।" अब किसी पर्दे की जरुरत तो थी नहीं सो मैंने कहा, "एक बार चूस कर निकाल दो फ़िर तुम्हारी चुदाई करेंगे"।

बिना हिचक प्रभा मेरा लन्ड मुँह में ली और चुसने लगी। वो मेरे लन्ड से खुब अच्छी तरह से खेल रही थी। मैंने उसके लन्ड चुसने की कला की तारीफ़ की तो वो बोली, "ब्लू फ़िल्म दिखा-दिखा कर प्रभात यही सब सिखाता रहता है"।

मैंने उसको कहा, "बहुत किस्मत वाली हो जो ऐसा पति मिला है, बीवी को खुश रखने वाला। जवान लडकी को अगर ठीक से मसलने वाला पति ना मिले तो लडकी की जिन्दगी नरक हो जाती है"।

उसने मेरे लन्ड को हाथ से जोर-जोर से हिलाते हुए कहा, "हाँ भैया सो तो है। गजब का मसलता है मेरे बदन को प्रभात। सारे दिन की थकान उतार देता है जब ऊपर से दबा कर चोदता है मुझे। सुबह को खुब चोदता है हल्के-हल्के। सच में... वो बहुत अच्छा है। उम्मीद है वो स्वीटी को सुबह वाले तरीके से प्यार से करेगा। रात में तो वो जैसे जानवर बन कर बदन को मसल देता है।"

तभी बगल के कमरे से स्वीटी की एक जोर की कराह, आआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह.... सुनाई पडी। इसके साथ ही मेरी पिचकारी छुटी और मैं बोला, "लगता है कि अब घुसाया है भीतर"।

मैं अब प्रभा को बिस्तर पर लिटा कर उसकी चूत को चाटने लगा था। झाँट की एक इंच चौड़ी पट्टी से मेरी बहन प्रभा की मस्त चूत सजी हुई थी। अगल-बगल से झाँट छिल कर साफ़ कर दिया गया था। मैं जब झाँटों को सहला रहा था तो प्रभा बोली, "प्रभात को ऐसा ही पसन्द है"। मेरा लन्ड कड़ा हो गया था और अब मैं सोच रहा था कि प्रभा को चोद लूँ। बगल के कमरे से स्वीटी की हल्की-हल्की आह आह आह सुनाई दे रही थी।

प्रभा बोली, "लगता है प्रभात धीरे-धीरे कर रहा है... अब आधा घन्टा लगाएगा, बेचारी स्वीटी को टाँग फ़ैलाये-फ़ैलाये दर्द न होने लगे"।

मेरे मन में एक शैतानी ख्याल आया, "प्रभा, क्यों न चल कर हमलोग देखें कि प्रभात कैसे स्वीटी को चोद रहा है। मैंने स्वीटी को कभी चुदाते नहीं देखा है। तुम देखी हो प्रभात को किसी लडकी को चोदते हुए?"

प्रभा बोली, "नहीं.... पर हमारे जाने से कहीं स्वीटी को शर्म न आ जाए"।

मैंने कहा, "वो क्या शर्माएगी...., हमारे सामने ही गई थी चुदाने। उसको भी पता है कि हमलोग भी यही कर रहे हैं। चलो न उसी कमरे में हम भी सेक्स करेंगे खुब मजा आएगा, सब साथ में सेक्स करेंगे।"

मुझे उम्मीद नहीं थी पर वो मान गई। और हम दोनों नंगे ही अपने कमरे से बाहर आ गए और बगल के कमरे की तरफ़ बढ़ गए।
 
मैंने कहा, "वो क्या शर्माएगी...., हमारे सामने ही गई थी चुदाने। उसको भी पता है कि हमलोग भी यही कर रहे हैं। चलो न उसी कमरे में हम भी सेक्स करेंगे खुब मजा आएगा, सब साथ में सेक्स करेंगे।"

मुझे उम्मीद नहीं थी पर वो मान गई। और हम दोनों नंगे ही अपने कमरे से बाहर आ गए और बगल के कमरे की तरफ़ बढ़ गए।

दरवाजा बन्द था नहीं तो हम अंदर चले आए। कमरे में बत्ती जली हुई थी और हमारे सामने स्वीटी बिस्तर पर झुकी हुई थी और प्रभात पीछे से उसकी चुदाई कर रहा था। हमें देख प्रभात मुस्कुराया। मैंने अब प्रभा से कहा कि वो भी वैसे ही झुक जाए। प्रभा मेरा मतलब समझ कर झुक गई और मैंने पीछे से उसकी चूत में अपना लन्ड घुसा दिया। इसके साथ ही मेरी अपनी तीनों बहनों को चोदने की हसरत आज पूरी हो गई।

प्रभा के मुँह से निकलने वाली आह सुन कर स्वीटी अपना आँख खोली तो देखा कि सामने ही उसकी दीदी को मैं चोद रहा हूँ। करीब बीस धक्के के बाद मैंने प्रभा को नीचे लिटा दिया और फ़िर ऊपर से उस पर चढ़ गया। अपनी दोनों हाथों से उसकी छाती को दबा कर अब मैं गचागचा उसकी चूत को अपने लन्ड से चोद रहा था।

-प्रभा भी मस्ती में भर कर चीख रही थी। जल्दी ही मैं थक गया तो प्रभा से कहा कि अब मैं नीचे लेटता हूँ और वो ऊपर से धक्के लगाए। मैं नीचे सीधा लेटा तो प्रभा मेरे ऊपर चढ़ कर बैठ गई और बैठते हुए उसके मेरे कडे लन्ड को अपनी चूत में घुसा लिया था।

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तभी मैंने देखा कि प्रभात प्रभा के पीछे आया और फ़िर जब तक हम कुछ समझें वो प्रभा की गाँड में अपना-- लन्ड घुसा दिया। प्रभा मस्ती से चीख उठी। अब उसकी चूत में मेरा लन्ड था और उसकी गाँड़ में प्रभात का लन्ड। हमदोनों ने मिल कर उसको पूरा संतुष्ट कर दिया और जब हम सब अलग हुए तो सब थक कर निढ़ाल थे।

केवल पास बैठी स्वीटी फ़्रेश दिख रही थी जो हम दोनों को प्रभा को चोदते देख रही थी। मैंने घडी देखी, सवा बारह हो रहा था।

मैंने कहा, "स्वीटी अब तुम विभा के पास चली जाओ.. और प्रभा तुम यही रुक जाओ सुबह का डोज प्रभात से ले लेना, वो बेचारा भी अब तुमसे कुछ दिन दूर रहने वाला है। मेरे साथ तो तुम अभी १५ दिन और हो हीं"।

प्रभा बोली, "हाँ सो तो है..., पर स्वीटी यहां बिस्तर पर कुछ दाग-धब्बा नहीं है?" स्वीटी मुस्कुराई तो मैंने कह दिया, "तुम नहीं आई थी तो स्वीटी मेरे साथ सोती थी न, समझा करो..."।

हम हँस पडे और प्रभात बोला, "तुमको भी तो नहीं निकला था सुहागरात को, याद नहीं है।" यह मेरे लिए नई बात थी और प्रभात हमें सुनाते हुए बोला, "यार ये जो तेरी बहन है न वो एक बुढे साठ साल के प्रोफ़ेसर से अपना सील तुडवाई थी, जिसने इसको कौलेज में टौप करवाया था।"

स्वीटी बोली, "हाँ मेरे कौलेज में भी यह बात होती है कि फ़लाँ प्रोफ़ेसर ने फ़लां लडकी को अपने साथ सुला कर उसको टौप करवा दिया।" मैं तो खुद सोच रही हूँ कि फ़ाईनल साल में दो-एक के साथ सो लूँगी, कुछ ग्रेड सुधर जाएगा"।

मैंने अब कहा, "अब बहुत समय हुआ चलो सो जाओ, बाकी बात कल करेंगे। मुझे तो अब यह भी सोचना है कि कल से प्रभा को नींद कैसे आएगी। और अगर मैं प्रभा को नींद दिलाने लगुँगा तो मेरी प्यारी गुडिया स्वीटी का क्या होगा?"

स्वीटी उठते हुए बोली, "अरे भैया, हम दोनों बहनें मिल-बाँट कर काम चला लेंगे आपके साथ..."।

हम सब हँस दिये और फ़िर अपने-अपने कमरे में चल दिये सोने, मतलब प्रभा-प्रभात एक साथ, विभा और स्वीटी एक साथ और मैं अकेला अपने कमरे में। पर आज मैं पूरी तरह से संतुष्ट था और मैं अब अपनी तीनों बहनों को चोद चुका था और मेरा बहनचोद बनने का सपना पूरा हो गया था।

कुछ समय बीते और प्रभा अपने पति के पास चली गई, स्वीटी अपने कौलेज। अब फ़िर मैं और विभा हीं अब घर पर रह गए। जब तक प्रभा थी, तब तक मैं कभी प्रभा को चोदता, और कभी विभा को। वो दोनों मेरे साथ हीं सोती और हम सब नंगे ही सोते। अब विभा मेरी बीवी की तरह रहती थी मैं भी उसको बिल्कुल वही दर्जा देता था और नियम से उसकी चुदाई करता। वो भी मस्त हो कर मेरे इशारे पर चुदाने के लिए तैयार हो जाती।

प्रभा को गाँड मराने से कोई परेशानी नहीं थी पर विभा को अभी भी गाँड़ मरवाना पसंद नहीं था। मुझे अक्सर स्वीटी की याद आती, जो घर तो आई पर प्रभा और विभा के रहते मुझसे कम ही चुदी। उसको ज्यादा प्रभात ने ही चोदा।

स्वीटी एक सप्ताह रही और इसमें से चार दिन प्रभात भी था। एक रात जब विभा को चोद रहा था तब अन्य बहनों की बात शुरु हो गई और विभा ने कहा, "भैया, सबसे मजेदार स्थिति दीदी की है। हम लोग चाहे जो कहें-करें, पर असल में सेक्स का लाईसेन्स तो दीदी के पास ही है। एक कानूनी पति है और वो भी ऐसा जो सेक्स को पसन्द करता है। अब जब वो विदेश चली गई है तो और आजाद हो कर सेक्स करेंगे दोनों।"

मैंने भी उसकी बात से सहमति जताई, "हाँ, सो तो है। प्रभात तो शुरु से कमीना है साला और अब तो प्रभा भी उसी के रंग में रंग गई है। सुबह बात हुई थी उससे तो कह रहा था कि वो अब कोई न्युडिस्ट क्लब की सदस्यता लेने के चक्कर में है, पर अभी वो क्लबों की खासियतों का मिलान कर रहा है कि किसमें ज्यादा मस्ती हो सकता है।" मैं अब अपना लंड विभा की चूत से बाहर निकाल कर उसकी खुली हुई चूत को चुसने-चाटने लगा था।

विभा अब सिसिया रही थी वो पूछी, "नाम तो क्लब का मजेदार है, कैसा होता है यह क्लब, कुछ आईडिया है भैया?"

मैंने अब उसके बगल में सो कर उसकी चूचियो मे खेलते हुए कहा, "हाँ... प्रभात बता रहा था कि इन क्लबों में स्दस्यों को १००% नंगे ही रहना होता है। आमतौर पर सप्ताह के अंत या छुट्टी के मौसम में ये क्लब खुब भर जाते हैं और यहाँ कई तरह की खेल प्रतियोगिताएँ भी होती हैं। कुछ में सेक्स खुले आम किया जा सकता है तो कुछ में सेक्स पर प्रतिबंध होता है। सब क्लबों की सदस्यता शुल्क अलग-अलग है और जो सेक्स की छुट देते हैं वो महंगे होते हैं।"

विभा बोली, "काश कि यहाँ भी ऐसा क्लब होता!"

मैं अब फ़िर से उसके उपर चढ़ते हुए कहा, "चल अब फ़ाईनल चुदाई करते हैं, आज भीतर निकालुँगा। ऐसा क्लब तुम खोल देना... मेम्बर्शीप फ़ी में लन्ड लेना, लाईन लग जाएग तुम्हारे क्लब में"।

उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया और मैं हँसते हुए उसकी चूत में अपना लन्ड घुसा कर उसकी जोरदार चुदाई करने लगा।

वो अब आअह... आह्ह्ह... आअह्ह्ह्ह कर रही थी और आँख बन्द करके मुझसे चुद रही थी। करीब दस मिनट की जबर्दस्त चुदाई के बाद मैंने उसकी चूत के भीतर ही अपना माल डाल दिया। हम दोनों जैसा की हमेशा होता था, चुदाई खत्म करने के बाद आराम से लिपट कर अब सोने की कोशिश करने लगे। पर विभा बोली, "भैया, मेरी शादी भी न आप किसी जीजाजी जैसे लडके से ही करवा दीजिएगा। अब तो मेरी भी आदत खराब हो गई है, जब तक एक बार जोर से आपके साथ न करवा लूँ, नींद ही सही से नहीं आती है"।

मैंने विभा को प्यार से चूम लिया और बोला, "असल में न प्रभा की किस्मत अच्छी है और मुझे पता था कि प्रभात लाईन मारता है मेरी बहनों पर। सो प्रभात से बात करना आसान था"।

विभा बोली, "हाँ, किस्मत वाली तो जरुर है दीदी। वैसे और भी तो लडके होंगे जो हमलोग पर लाईन मारते होंगे?"

मैंने जवाब दिया, "हाँ, पक्का होंगे... कई लड़के होंगे जो तुम्हारे नाम की मूठ मारते होंगे, पर प्रभात के बारे में जैसे मुझे पता था वैसे बाकी के बारे में सीधे कह तो नहीं सकता न। मैं कोशिश करुँगा कि किसी लडके से बात फ़ाईनल करने से पहले उसको थोडा जाँच लूँ कि वो तुम्हें सही से खुश रखेगा या नहीं"।

विभा यह सुन कर खुसी से चहकते हुए मेरे होठ चुमते हुए बोली, "ओह... मेरे प्यारे भैया, थैंक्यु।"

मैंने भी उसके चुम्बन का जवाब चुम्बन से दिया और फ़िर बोला, "अच्छा अब सो जाओ..." और फ़िर जब वो दुसरी करवट बदल ली तो मैं भी सोने की कोशिश करते हुए सोचने लगा कि अब विभा की यह चाहत कैसे पूरी करूँ। धीरे-धीरे मुझे भी नींद आ गई।
 
अगली सुबह विभा से पहले मैं ही जागा और लुंगी लपेट कर अपने बरामदे पर आ कर अखबार पढने लगा। विभा सामने वाले कमरे में नंगी ही सोई हुई थी।

मेरे घर के सामने वाले मकान में रहने वाले सलीम जी भी मेरे बरामदे पर ही आ गए और हम बातें करने लगे। सलीम जी बैंक में काम करते थे और अपनी पत्नी और दो जवान बेटियों के साथ रहते थे। उनके साथ उनका भतीजा भी रहता था जो बी०ए० करने के बाद बैंक में नौकरी के लिए तैयारी कर रहा था। हमदोनों ही अखबार में छपी एक खबर पर चर्चा कर रहे थे जिसमें लिखा था कि हमारे शहर की एक पौश कौलोनी के एक घर में कौल-गर्ल रैकेट का पर्दाफ़ाश हुआ है और उस रेड में पाँच लड़कियाँ पकड़ाई हैं जो शहर के आसपास के गाँवों से शहर पढ़ने आईं थी और फ़िर पैसे के लिए इस धन्धे में आ गई। दो तो शहर के एक मशहूर स्कूल की ग्यारह्वीं और बारहवीं की छात्रा थी जबकि बाकी तीनों कौलेज में पढ़ती थी और ये सब दिन में दो घन्टे के लिए वहाँ चल रहे ट्युशन-सेंटर में आती और फ़िर वहीं पर मर्दों से चुदा कर चली जाती।

हमारे शहर के लिए यह एक बड़ी खबर थी। बात-चीत घुमते-घुमते अब लडकियों में हो रहे बदलाव पर आ गई। सलीम जी कह रहे थे, "अब के समय में लडकियाँ भी कम उम्र में हीं जवान हो जाती है। मुझे याद है कि मेरी बहनों को इंटर से ही साड़ी या सलवार-सूट पहनने को कहा जाता था और वो सब कैसे घर पर रहती थी। सिनेमा देखती बहुत-से-बहुत, वो भी घर से कोई जाता तब। और अब देखिए मेरी बेटियों को बिना बताए, कभी किसी दोस्त के घर तो कभी सिनेमा आदि चली जाएगी। अच्छा बात यही है कि वो रास्ते से फ़ोन कर देती है। मुझे बताए न बताए, कम से कम अपनी मम्मी को सो बात बताती है। जमाना ही ऐसा हो गया है और इसी चक्कर में लडकी सब भी इसमें शुरु हो जाती है। लडके लोग तो हमारे समय में भी ऐसे ही थे, पर तब कोठा पर जाना होता था और बहुत से लोग बदनामी के डर से अपने को काबू में कर लेते थे।"

मैं हाँ-हूँ कर रहा था और उनकी बात सुनते हुए यह सोच रहा था कि अगर अब धूप गर्म हो गया तो घर के भीतर जाते हुए कहीं उनकी नजर मेरे कमरे में नंगी सोई विभा पर ना पड जाए। तभी मुझे लगा कि विभा जाग गई है, और मैंने उसको आवाज लगाई कि विभा दो कप चाय बना देना, सलीम चाचा भी आये हुए हैं और मुझे विभा की एक लम्बी "हाँआआ..." सुनाई दी। वो अब आराम से जमाने को दोष देने में लगे हुए थे।

मैंने उनको रंग में देख कर टोक दिया, "अच्छा चाचा, बताईए तो सच-सच, आप भी कोठे पर गये थे कभी"।

वो अब अपनी आवाज नींचे करते हुए बोले, "हाँ... चार-पाँच बार... ज्यादा नहीं। तब हमलोग के पास इस सब के लिए फ़ालतू पैसा ही नहीं रहता था। कई दोस्त चन्दा करके जाते थे"।

विभा तभी तीन कप चाय ले कर आ गई और उनकी कही बात का अंतिम आधा हिस्सा सुनते हुए बोली, "किस चीज के लिए चन्दा हो रहा है?" सलीम जी को विभा के आने की उम्मीद नहीं थी और वो सकपका गए।

मुझे अब उनसे बात करते हुए मजा आ रहा था तो मैंने बात को आगे बढ़ाने के लिए बोला, "चन्दा हो नहीं रहा है... चाचा बता रहे हैं कि अपने टाईम में कैसे वो और उनके दोस्त चन्दा करके कोठे पर जाया करते थे।"

सलीम जी की बड़ी बेटी सायरा, विभा के कौलेज में उससे एक साल नीचे थी जबकि छोटी बेटी नूर ग्यारहवीं में पढती थी। सलीम जी का परिवार मुहल्ले में अकेला मुसलमान परिवार था और वो खुब हिलमिल कर रहते थे। जब हम सब चाय पीने लगे तो मैंने कहा, "कितना पैसा लगता था तब कोठे पर तब के टाईम में?"

विभा की उपस्थिति से सलीम जी थोडा परेशान थे सो बोले, "छोडो, अब यह सब बात, बहुत पुरानी हो गई"।

विभा बोली, "हाँ, चाचा अब तो न कहीं कोठा रहा नहीं, अब तो सब मुहल्ले में होने लगा है...", वो भी अब अखबार में छपी खबर पढ रही थी।

मैंने फ़िर कहा, "चाचा, बताईए न ... विभा किसी को कुछ नहीं बताएगी, क्यों विभा...?"

विभा भी अब मेरे इशारे को समझ कर बोली, "यह सब बात कहीं किसी को बताया जाता है... हाँ चाचा बताईए न कुछ कोठे के बारे में, हमलोग तो सिर्फ़ कुछ पुरानी फ़िल्मों में ही देखें है यह सब"।

हम दोनों भाई-बहन अब उनसे जिद पर उतर आए थे। सलीम चाचा ने अब हम दोनों पर नजर डाली और बोले, "नहीं, कहीं तुम लोग के मुँह से कुछ निकल गया, विभा को तो सायरा से कौलेज में भी भेंट होता है, अगर कहीं कुछ बोल दी तो...?"

विभा अभी एक पतला सा स्लीव-लेस नाईटी पहने थी जो उसके घुटनों तक ही लम्बा था। करीब महिने भर से बाल साफ़ नहीं की थी तो काँख में काले बाल दिख रहे थे। वो अब अपने हाथ ऊपर करके अपने बालों का जुडा बनाने की कोशिश करते हुए और अपने बदन की नुमाईश करते हुए बोली, "अरे चाचा, आप बेफ़िक्र रहिए। सायरा को कुछ भी नहीं कहुँगी, बल्कि किसी को कुछ नहीं कहुँगी"।

मैं देख रहा था कि सलीम चाचा की नजर अब विभा की चुचियों पर से सरकते हुए उसके काँख की तरफ़ थी और वो हसरत से मेरी बहन के बदन को घूर रहे थे।

विभा मुस्कुराई और बोली, "बताईए न प्लीज..."।

जवान लडकी अगर ऐसे बिंदास हो कर अपना प्रदर्शन करे तो कौन मर्द है जो नहीं पिघलेगा..."।

सलीम जी शुरु हो गए..., "मेरे कौलेज टाईम की बात है। हमलोग तीन दोस्तों का ग्रुप था और हमलोग पैसे बचा-बचा कर कभी कभार महिने-दो महिने में कोठे पर हो आया करते थे। ऐसे कम पैसे में तब लदकी तो मिलती नहीं थी, सो औरत से काम चला लेते थे।"

मैंने कहा, "मतलब आपके जीवन की पहली लडकी चाची ही थी। अपने कोठे के अनुभव के बाद तो आप सुहागरात को उनकी जान निकाल दिये होंगे?"

वो विभा को देख अब भी थोडा हिचक रहे थे, पर बोले..."ऐसा नहीं है, बेचारी से निकाह तो हड़बड़ी में हो गया। असल में जुल्का (चाची का नाम है) की बडी बहन के साथ मुझे उनकी अम्मी ने पकड़ लिया। वो अपनी बड़ी बेटी की शादी अरब में नौकरी कर रहे एक इंजीनियर से तय कर दीं थी, पर वो मेरे साथ इश्क करती थी। जब निकाह में तीन दिन बचा तो एक दोपहर वो भाग कर मेरे रूम पर आ गयी और उसके करीब दो घन्टे बाद उनकी अम्मी भी पहुँच गई।

बदनामी ना हो सो उसने मुझे जुल्का से निकाह करने को कहा और मैं भी घबड़ाहट में मान गया और इस तरह से हमारा निकाह हुआ। जुल्का मेरे खाला (मौसी) की बेटी है, सो सब बात दब गई। पर जुल्का को पता था यह सब सो उसके साथ हमारे संबंध तो निकाह के करीब सप्ताह भर बाद ही सामान्य हुए, और तुम सुहाग-रात की बात कर रहे हो। अब छोडो यह सब बात..., तुम लोग बच्चे हो, तुम लोगों ज्यादा क्या कहूँ।" उनकी नजरें विभा की गदराई जवानी को घूर रही थी।

विभा सब समझ रही थी और वो अब उठ कर चाय की प्याली ले कर चली गई और फ़िर हाथ में झाड़ू ले कर बाहर आ गई। विभा अब बरामदे पर झाडू लगाने लगी थी। उसके झुकने से उसकी छाती लगभग पूरी तरह से सलीम चाचा को दिख रहा था। ब्रा तो वो पहनी नहीं थी और वो सब समझ कर अपना बदन उनको दिखा रही थी। जब वो खडा हो कर छत से मकड़ी का जाला साफ़ करने लगी तो मुझे भी लगा कि यह कुछ ज्यादा ही है। धूप निकल आने से उसकी पतली नाईटी लगभग पारदर्शी हो गई थी और धूप की वजह से उसका पूरा बदन ही एक तरह से अब दिख रहा था।

सलीम चाचा उसको अब बिचैन की तरह घूर रहे थे और मैंने भी अब विभा को कह दिया, "विभा, यह क्या तुम पतला सा नाईटी पहन कर ऐसे बाहर खड़ी हो, तुमको पता भी है धूप के कारण तुम्हारा सारा बदन दिख रहा है, चलो छाया में आओ पहले"।

वो मुझे नाराज देख कर थोडा घबराई और चट से एक तरफ़ हो कर नाईटी को अपनी छाती पर ठीक से पकड़ लिया। फ़िर नीचे बैठ कर वो झाड़ू लगाने लगी।

सलीम चाचा भी अब जाने के लिए उठ गए और तभी मैंने विभा को आँख मारी। वो अब अपने नाईटी को समेट कर अपने गोद में रख कर बैठ गई जमीन पर इस तरह से बैठी की जब वो धीरे-धीरे नीचे झुक रही थी उसकी चूत करीब १० सेकेन्ड के लिए मुझे और चाचा को दिख गई। उसकी फ़ाँक और चारों तरफ़ के बाल भी।

हमें अपने चूत की तरफ़ देखते हुए वो शर्मा गई और चट से अपनी चूत को सही तरीके से ढक लिया। सलीम चाचा अब बिना देर किए हम दोनों को शाम की चाय का निमंत्रण दे कर लौट गए और हम दोनों एक-दूसरे की तरफ़ देख कर मुस्कुरा दिए।

मैं विभा से बोला, "तुम भी न बहुत कुत्ती चीज हो गई हो पिचले कुछ महिने में। बेचारे भले आदमी का जान चली जाएगी ऐसे अगर तुम अपना बदन दो-चार बार और दिखा दी तो।"

वो हँस दी और बोली, "भैया, आप जब मुझे पुरी के होटल में बिगाडे तो मेरे साथ बेशर्मी का हद पार कर दिए और अब आपको ही बूरा लग रहा है जब मैं सलीम चाचा को जरा सा एक बार बदन झलका दी। अरे थोडा टेस्ट बदल जाएगा और क्या, अगर सलीम चाचा पट गए तो..."।

मैंने भी कहा, "तुम तो अपना टेस्ट बदल लोगी और मेरा क्या?"

अब वो मुझे समझाई, "अरे भैया, सब सोच कर ही तो मैं ऐसे की हूँ। उनके घर में दो-दो मर्द है और तीन-तीन औरत, आपके लिए तो १६ साल की चूत से ले कर ४६ साल की अनुभवी का इंतजाम हो जाएगा अगर इस घर से रिश्ता हो गया तो"।

मैंने शक जताया, "सो तो ठीक है, पर अभी तक यह पता नहीं है न कि उन चूत-वालियों के मिजाज में क्या है..., वैसे सलीम चाचा तो फ़ँस गए तुम्हारे जाल में और उनके भतीजे जमाल के साधु होने की तो उम्मीद हीं नहीं है"।

विभा के साथ मै अब घर में आ गया था और वो अब अपने नाईटी को उतारते हुए बोली, "सायरा के बारे में तो कोई शक ही नहीं है, वो तो पहले से चालू है जमील के साथ करीब एक साल से घर-वालों से छुप कर। मुझे वो बताई थी एक बार, क्या पता नूर भी जमील के साथ शुरु हो गई हो अब तक। मुस्लिम लडकियाँ तो जरा कम उमर में हीं यह सब समझने लगती हैं और उनके यहाँ तो घर में ही सब रिश्ते तय हो जाते हैं"।

मैंने अब विभा के नंगे बदन को अपने बाहों में खींचा, "और हम क्या अपने घर में सही हैं जो मुस्लिमों को दोष दें। तुम्हारा रिश्ता तो मेरे साथ - घर में सैंया, बाहर भैया - वाला है।"

वो हँसी और फ़िर नहाने के लिए भाग गई। मैं भी अब अपना टुथ-ब्रश ले कर बेसिन की तरफ़ बढ़ गया। दिन में विभा की तीन सहेलियाँ घर आ गई थीं और घर गुलजार हो गया।
 
शाम करीब पाँच बजे सलीम जी का फ़ोन आ गया और हम उनके घर जाने को तैयार होने लगे।

विभा आज एक लो-वेस्ट डेनिम कैप्री पहनी और एक स्लीव-लेस टाईट टी-शर्ट बिना ब्रा जिससे उसके निप्पल झलक रहे थे। वो जब झुक कर अपने हाई हील सैंडल पहन रही थी तो मैंने देखा कि उसने आज कई दिन बाद अपना वो सेक्सी वाला पैन्टी पहना था जिसमें कपडा कम धागा ज्यादा था और उसके झुकने से उसके कमर पर उसकी जी-स्ट्रिंग पैन्टी के डिजाईन का पूरा अंदाजा होने लगा था।

मुझे अपनी तरफ़ देखते हुए देख कर वो मुस्कुरा कर बोली, "आज ही तो मौका है, पूरे घर का मूड समझने का। आप तो कुछ मेरे साथ कर नहीं पाईएगा यहाँ भैया तो मुझे हीं सब करना होगा"।

मैंने कहा, "ठीक है, पर याद रहे... हम यहाँ भाई-बहन हीं है मुहल्ले में। मुझे बे-ईज्जत मत करना ध्यान रहे।"

मुझे आँख मारते हुए वो बोली, "जब चोदते हैं तब मैं बहन नहीं होती हूँ क्या?" और कमरे से बाहर निकल गई और मैं भी पीछे-पीछे चल दिया। पीछे से विभा की गोल-गोल चुतड़ों को देख कर मैं ललच गया, पर अभी इसका टाईम नहीं था...।

सलीम चाचा ने बहुत गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। वो अब ललचाई नजरों से विभा के टी-शर्ट से झाँकती निप्पल को देख रहे थे पर दिखा ऐसे रहे थे कि वो विभा को नहीं देख रहे हैं। जुल्का चाची ४६ साल की महिला थीं और वो एक सफ़ेद सलवार सूट पहने हुए थी। पाँच फ़ीट दो ईंच लम्बी चाची का फ़ीगर ३६-३२-४० रहा होगा। विभा चाची के पैर छुने के लिए झुकी और पीछे से लो-वेस्ट कैप्री से उसकी सेक्सी पैन्टी की झलक दिखी। चाची यह नजारा नहीं देख पाईं पर बाकी हम सब यह देखे। टी-शर्ट भी काफ़ी ऊपर हो गया था वो विभा की पीठ लगभग आधा नंगा दिखने लगी।

विभा उठी और फ़िर अदा से अपने टी-शर्ट को नीचे की। मैंने गैर किया कि चाचा की दोनों बेटियाँ भी विभा के इस अदा को देख कर भौंचक थी। मैं अब उनकी बडी बेटी सायरा को घूरा। मुझे पता था कि यह लौंडिया लंड से खेल चुकी है। सायरा करीब २० साल की भरे बदन की लडकी थी, मेरी बहन स्वीटी की तरह। पाँच फ़ीट दो ईंच, बिल्कुल अपनी मम्मी की कार्बन कौपी, सब अपनी मम्मी से दुबली थी। उसकी फ़ीगर होगी, ३६-२८-३८। बदन थोड़ा भरा हुआ था पर रंग से गजब की गोरी थी। वो पीला प्रिन्ट वाला सलवार-सूट पहने हुए थी।

मुझे अपनी तरफ़ देखते हुए देख वो मुझे सलाम की। अब मैंने अपना ध्यान कमरे की सबसे कम उम्र चूत की तरफ़ किया। चुलबुली नूर पतली दुबली १६ साल की लड़की थी। छोटी छातियों वाली नूर को ब्रा पहनने की जरुरत ही नहीं थी। वो अपने मम्मी और दीदी से लम्बी भी थी, करीब पाँच फ़ीट चार ईंच, और रंग भी सायरा से थोडा कम था, पर गोरी थी। वो एक फ़्लोरल प्रिन्ट वाला फ़्रौक पहने थी। उसने भी मुझे सलाम किया और हम सब बैठ गए।

मैंने सलीम चाचा से जमील के बारे में पूछा तो वो बोले कि जरा बाजार गया है कुछ सामन लेने, आता ही होगा।

चाची चाय बनाने चली गई और सायरा विभा को अपने कमरे में ले गई। नूर भी उन दोनों के पीछे-पीछे चली गई। मैं देख रहा था कि सलीम चाचा की नजर पीछे से मेरी बहन विभा की मटकती चुतड़ों पर गडी हुई थी। मुझे पता था कि बेचारा अब तरस रहे हैं।

गले से थूक गटकते हुए चाचा बोले, "एक बात कहूँ बेटा... बूरा मत मानना... प्लीज"।

मैं समझ तो गया पर बोला, "नहीं-नहीं, आप चाचा कहिए, क्या कहना चाहते हैं?"

सलीम चाचा धीमी आवाज में बोले, "विभा कितनी बदल गई है..., पहले कैसे शर्मा कर रहती थी और अब पिछले करीब चार-छः महीने से देख रहा हूँ, वो भी जमाने के साथ ढ़ल गई है। लड़की को थोड़ा पर्दा तो करना चाहिए"।

मैंने कहा, "कह तो आप ठीक रहे हैं, पर अब कपड़े ही ऐसे-ऐसे आने लगे हैं फ़ैशन में कि क्या किया जाए। प्रभा आई थी तो वो ही ये सब फ़ैशनेबल कपडे लाई थी। बहुत समझाई विभा को कि ऐसे छुईमुई सी न बनी रहे, कल को उसकी शादी किसी ऐसे घर में हो गई जहाँ सब ऐसे हीं हों तो उसको नये घर के माहौल में मिलने में परेशानी होगी। अब हमारे शहर में तो वो ऐसे घुमने जा नहीं सकती तो वो मुझसे पूछी कि क्या आज वो आपके घर आते हुए ये पहन ले।

मैंने ही कहा कि ठीक है... चाचा के घर में कैसी शर्म...। वैसे विभा है अच्छी लड़की..., पर क्या कीजिएगा। दुनिया इस तरह बदल गई है कि क्या कहा जाए। प्रभा बता रही थी कि वहाँ औस्टैलिया का महौल ऐसा खुला हुआ है कि कुछ पूछिए मत"।

वो अब मेरी हाँ में हाँ मिलाए और बोली, "हाँ, जमाना तेजी से बदल गया है, पर विभा जैसी थी उस हिसाब से वो जमाने से भी ज्यादा तेजी से बदली है, अच्छा है जमाने के लिए"। यह कहते हुए वो मुस्कुराने लगे

तो मैंने भी मुस्कुराते हुए कह दिया, "हाँ, देख रहा हूँ चाचा सुबह से आपकी नजर तो उसी पर लगी रहती है अगर वो आस-पास हो तो"।

मुझे ऐसे मुस्कुरा कर बात करते देख कर उनको हिमात आया और बोले, "झूठ नहीं बोलुँगा, पर कसम से... सुबह वो जैसे मिली, मेरी तो तब से बोलती बन्द है।"

मैंने भी जवाब दिया, "अरे चाचा, वो तो मेरी भी सिट्टि-पिट्टि गुम कर देती है कभी कभी। सोचिए तो जब वो आज ही मुझसे पूछी होगी कि यह सब पहन लूँ चाचा के घर जाने के लिए, तब मेरा क्या हाल हुआ होगा?"

सलीम चाचा मुसकुरा कर बोले, "अभी तो फ़िर भी सही है, पर सुबह का सोचो न गुड्डू, वो नाईटी कैसा था और जब धूप में वो रखी थी तब...तुम ठीक टोके थे उसको। वो नाईटी रात में, कम रोशनी में पहन कर सोने के लिए ठीक है, पर ऐसे धूप में तो वो पहनो न पहनो सब बराबर ही था।"

मैं भी अब बोला, "हाँ सच में सुबह तो बहुत गंदा लग रहा था जब वो खडी हो कर जाले साफ़ करने लगी थी, और वो थोडा अल्हड़ भी है आप देखे हीं होंगे जब वो जमीन पर बैठ कर झाड़ू लगाने लगी तब कैसे नाईटी समेटी थी। बताईए तो, ऐसे कोई समझदार लड़की अपने बदन का सबसे प्राईवेट अंग को दिखाएगी। हालाँकि वो जल्दी ही समझ गई।"

सलीम चाचा बोले, "हाँ, यह तो है... असल में माँ नहीं है न, इसीलिए उसको इस सब का एहसास नहीं है, माँ ही तो लडकी को ऊठने-बैठने का सलीका सीखा देती है टोक-टोक कर। सायरा तो ठीक है पर मेरी नूर को देखोगे तो वो भी ऐसे ही अल्हड है, अब तो बहुत सुधरी है... पर फ़िर भी।"

मैंने थोड़ा अफ़सोस से कहा, "हाँ आप बिल्कुल सही बात कह रहे हैं, लडकी को पालने के लिए माँ जरूरी है। अगर आज मम्मी होती तो यह सब परेशानी नहीं होती। असल में विभा कभी लडकों से ज्यादा हिलि-मिलि भी नहीं, नहीं तो लडके हीं उसको घूर-घूर कर सब समझा देते कि क्या कैसे छुपाना है। अब अभी की बात ही देख लीजिए, जब वो मुझसे अपने ड्रेस के बारे में सलाह ले रही थी। वो जो अपने पैन्ट के नीचे पहनी है, उसका क्या मतलब है, और बताई जरा मैं क्या जवाब दूँ, जब छोटी बहन... उस चीज को ऐसे सामने ले कर खड़ी हो जाए कि इसको पहनूँ क्या?"

हम दोनों हँसने लगे और वो बोले, "हा हा हा.... सच में तुम्हारी हालत अब मुझे समझ में आ रहा है।"

तभी चाची चाय ले कर आ गई और वो चाची की तरफ़ इशारा करके चुप हो गए।
 
मैंने थोड़ा अफ़सोस से कहा, "हाँ आप बिल्कुल सही बात कह रहे हैं, लडकी को पालने के लिए माँ जरूरी है। अगर आज मम्मी होती तो यह सब परेशानी नहीं होती। असल में विभा कभी लडकों से ज्यादा हिलि-मिलि भी नहीं, नहीं तो लडके हीं उसको घूर-घूर कर सब समझा देते कि क्या कैसे छुपाना है। अब अभी की बात ही देख लीजिए, जब वो मुझसे अपने ड्रेस के बारे में सलाह ले रही थी। वो जो अपने पैन्ट के नीचे पहनी है, उसका क्या मतलब है, और बताई जरा मैं क्या जवाब दूँ, जब छोटी बहन... उस चीज को ऐसे सामने ले कर खड़ी हो जाए कि इसको पहनूँ क्या?"

हम दोनों हँसने लगे और वो बोले, "हा हा हा.... सच में तुम्हारी हालत अब मुझे समझ में आ रहा है।"

तभी चाची चाय ले कर आ गई और वो चाची की तरफ़ इशारा करके चुप हो गए।

चाय पीते हुए हम इधर-ऊधर की बातें करने लगे। चाची प्रभा के बारे में पूछी और मेरे यह बताने पर कि वो विदेश में मजे कर रही है, वो खुश हो कर बोली, "गुड्डू बेटा... तुम ने अपने बहनों को बहुत अच्छे से पाला और अपना फ़र्ज अदा किया है।"

मैंने भी एकदम से भला बनता हुआ उन्हें धन्यवाद दिया।

थोडी देर में चाची खाली कप ले कर भीतर चली गई और तब सलीम चाचा फ़िर मेरी तरफ़ झुक कर धीमी आवाज में बोले, "गुड्डू, पर वो चीज क्या थी, जो दिखा वो तो सिर्फ़ एक धागा जैसा था, एक बार तो लगा कि वो धागा ही है, पर बीच से जो डोरी नीचे गई तब लगा कि यह कोई अंडर्वीयर है लडकी का"।

मैं मन ही मन खुश हो रहा था कि अब सलीम चाचा एक अलग लेवेल पर बात करने लगे थे। मैंने उनको जवाब दिया, "हाँ वो एक तरफ़ से पैन्टी ही है पर बहुत पतली सी है"।

वो मुझसे और खुल कर बोलने की उम्मीद कर रहे थे सो फ़िर से पूछे, "पर यार तुम तो देखे होगे न उस पैन्टी को, क्या वो ऐसा था कि वो लड़की के अंग को ढँके?"

मैंने गौर किया कि वो मुझे जैसे यार बोले थे, वो चाहते थे कि मैं अब उनके साथ बराबरी पर बात करूँ। मैंने अपना दिल थोडा कडा किया और कहा, "क्या ढँकेगा वो किसी लडकी का अंग। बस एक छोटा सा त्रिकोण करीब दो ईंच का है, जालीदार कपड़े का जो अपने तीनों कोनें से डोरी से जुड़ा हुआ है। त्रिकोण के ऊपर की डोरी विभा के कमर में है जो आप देखे हीं, और जो त्रिकोण के तीसरे कोण से जुड़ी डोरी है वो विभा के अंग के नीचे से, उसकी जाँघों के बीच से होते हुए पीछे कमर के साथ की डोरी से जुड़ी हुई है, वो ही नीचे की तरफ़ जाती हुई डोरी आप देखे।" मैं अब इस बात-चीत में विभा का जिक्र भी ले आया था।

सलीम चाचा ने अपने गले को थोडा खखार कर साफ़ किया और फ़िर बोले, "अगर दो ईंच ही कपडा है तो वो क्या ढँकेगा विभा जैसी किसी लडकी के प्राईवेट पार्ट को। ऐसे दो ईंच कपडे से तो पाँच साल की लडकी का भी पूरा नहीं ढ़ँकेगा।"

मैंने अब उनको बताया कि प्रभा ने ऐसी तीन-तीन पैन्टी का एक-एक सेट भेजी है दो दिन पहले विभा और स्वीटी दोनों के लिए। स्वीटी का तो अभी पैक ही है, वो छुट्टी में आएगी तो अपना खोलेगी। विभा आज पहली बार अपना खोली है। पैकेट के ऊपर फ़ोटो तो देखे थे, पर इतना छोटा होगा का मुझे भी उम्मीद नहीं था"।

सलीम चाचा बोले, "चलो गुड्डू, तुम्हारी किस्मत है कि ऐसा ड्रेस भी देखे और किस्मत साथ देगा तो कौन जाने तुम्हारी बीवी भी ऐसे हीं पैन्टी की शौकीन हो जाए। फ़िर तो लड़की के बदन पर भी इसको देखने का मौका मिल जाएगा तुम्हें। हमारी बीवी के जमाने में तो ऐसी चीज के बारे में कोई कल्पना भी नहीं थी। ऐसा तो किसी प्राईवेट रूम में ही किसी लडकी के बदन पर दिखेगा"।

मैंने अब मुस्कुराते हुए कहा, "आपको अगर इतना ही देखने का मन है तो अभी विभा को बुला कर कह्ता हूँ कि वो अपना कैप्री खोल कर आपको दिखा दे वो पैन्टी"।

वो बेचारे घबड़ा गए और बोले, "नहीं-नहीं ऐसे घर पर नहीं... और फ़िर विभा बच्ची है, पहन ली है... पर ऐसे उसको कैसे कहा जा सकता है...। तुम हो सके तो एक बार कभी विभा से छुपा कर मुझे दिखाना, कैसा है यह पैन्टी"।

मैंने हाँ में सर हिला कर उनको इसका आश्वासन दिया और फ़िर बोला, अब जब ऐसा ही फ़ैशन चलने लगा है दुनिया में तो कौन जाने कल को कहीं आपका दामाद हीं आपकी बेटियों को ऐसी ही पैन्टियाँ पहनाए...।"

मैंने जब उनकी बेटियों का जिक्र किया तो उनका चेहरा थोड़ा खींचा, तो मैंने आगे कहते हुए बात संभाली, "लड़कियों की किस्मत तो समय के साथ बदलता रहता है। अब देख लीजिए, प्रभा जब ऐसा अपनी बहनों को गिफ़्ट करती है तो वो क्या पहनती होगी। औस्ट्रेलिया में तो समुद्र किनारे सब के बीच में यह पहन कर घुमने के लिए हमारे शहर की लड़की के लिए बहुत हिम्मत की बात है। हालाँकि वो जो भी फ़ोटो भेजी है वहाँ का उसमें वो अपने कमर में एक कपडा लपेटे रहती है, पर फ़िर भी समझा तो जा ही सकता है फ़ोटो में आस-पास के महौल को देख कर।"

वो भी अब उत्साह से बोले, "हाँ सो तो हैं, गोरों के लिए तो नंगापन एक फ़ैशन है। हमारे समय में तो कुछ पत्रिका होती थी जिसमें चार-छः नंगी औरतों की फ़ोटो होता था और उसको हम-सब दोस्त लोग मिल बाँट कर देखा करते थे, सबसे छुप कर।"

मैंने कहा, अब तो बात पत्रिका से बहुत आगे चली गई है, आराम से ब्लू-फ़िल्म मिल जाता है। भारत में तो कम ही बनता है, पर विदेशी ब्लू-फ़िल्म को देख लीजिए तो ऐसे लगेगा कि सबसे जरुरी काम सिर्फ़ सेक्स है सब के लिए"।

वो हँस पड़े, "इसमें क्या शक है, वो तो है ही सबके लिए सबसे जरुरी काम"।

मैंने कहा, "इसीलिए मैं अभी कुछ दिन शादी नहीं करना चाहता, और यह काम अलग-अलग लडकियों के साथ करना चाहता हूँ। शादी करने के बाद यह काम ठीक से करने में परेशानी होगी"।

वो अब चुटकी लेते हुए बोले, "कितनी के साथ किये हो अभी तक?"

मैंने उनको ही आगे रखते हुए कहा, "आप बड़े हैं तो आपसे तो कम ही होगा मेरा स्कोर, आपको तो अब अपनी उम्र का लाभ भी मिलता होगा और जैसा ब्लू-फ़िल्मों मे होता है, विदेशी लड़कियाँ अनुभवी मर्दों से ज्यादा मजे करती हैं।"

मेरी बात पर वो थोडा मायूस हो कर बोले, "क्या स्कोर रहेगा मेरा... जमाना हो गया.. आखिरी नई लडकी मिले भी करीब तीन साल होने चला अब तो।"

मैंने उनको थोडा हिम्मत देते हुए कहा, "क्यों..., क्या लडकी की कमी हो गई है या आप अब रूचि नहीं ले रहे?"
 
वो बोले, "नहीं, अब की लड़की भी चालाक हो गई है, और हम भी अब बुढे दिखने लगे हैं। अब की मौडर्न लडकियाँ मुझ जैसे पुराने मर्द को क्यों घास डालेगी"।

मैंने कहा, "आप लाईन मारते रहिए न... कोई न कोई तो लाईन दे ही देगी। लड़कियों को कई बार आप जैसे अनुभवी मर्द पसन्द आते हैं"।

वो अब थोडा उत्साह से बोले, "कहाँ लाईन मारने जाऊँ अब... तुम ही कोई सेट कर दो न... जरा इस चाचा के लिए"।

मैंने अब असल बात शुरु कर दिया, "क्या चाचा आप भी... अभी भी घर में तीन जवान लडकी है और आप कह रहे हैं कि कहाँ जाऊँ लाईन मारने"।

वो बोले, "श्श्श्श्श्श्श्श्श.... सब घर की ही है... एक तुम्हारी बहन है यह मत भूलो"।

मैंने भी कहा, "घर की है, इसीलिए तो बेहतर है, अगर एक बार सेट हो गई तो फ़िर जब मन तब काम हो जाएगा। रही बात मेरे बहन की, तो आप तो मुस्लिम है... बहन में औरत कैसे देखी जाए यह आपको मेरे से बेहतर आता होगा"।

वो अब सोचने लगे और फ़िर बोले, "सो तो तुम ठीक कह रहे हो... तो तुम मुझे विभा के साथ छुट लेने दोगे...?", उनकी नजरों में चमक आ गया था।

मैंने कहा, "हाँ... क्यों नहीं, और बदले में मुझे भी अपनी बेटियों पर लाईन मारने दीजिए। अब तो दोनों ही जवान हो गई है"।

वो अब बोले, "यार, बाप हूँ... किस मुँह से तुम्हें कह दूँ कि तुम मेरी बेटियों पर लाईन मारो..."?

मैंने उनको समझाते हुए कहा, "कौन जाने आपको पता ही न हो और आपकी बेटियाँ शुरु हो गई हों कहीं बाहर... तब? अब के समय में लडकियाँ कपडे खोलने में ज्यादा समय नहीं लगाती अगर वो फ़ैसला कर लेती है... और जमाने भर के मर्द लोग तो इसी काम में मदद के लिए सब जगह हैं हीं...। सोच कर देखिए.... जिन लड़कियों को हम चोदे हैं, क्या उन सब के बाप को पता भी होगा कि उनकी बेटियाँ घर के बाहर जा कर हम जैसे लोगों से चुदवा रहीं हैं"। मैंने अब गन्दे शब्द बोलने शुरु कर दिये थे।

मैंने आगे कहा, "उन लड़कियों के बाप से पूछने पर वो सब तो यही कहेंगे कि उनकी बेटी बिल्कुल शरीफ़ है..., पर हम सच समझ रहे होते हैं, जानते हैं पर उनके बापों को कुछ पता नहीं होता। मेरा ही उदाहरण लीजिए, विभा के बारे में मैं कैसे जान सकता हूँ या फ़िर आप ही कैसे गारंटी कर सकते हैं कि सायरा अभी तक कुँवारी होगी। अब जब स्कूल की लड़कियों को लोग चोदने लगे हैं और वो सब भी जल्दी जवान होने लगी है... तब सायरा और विभा जैसी सेक्सी फ़ीगर वाली लड़की २० साल की उम्र तक कुँवारी बची रहे, मुझे तो बहुत शक है। यही सब सोच कर तो विभा को अब मैंने रोकना-टोकना छोड दिया है।

अब जिस उम्र में वो है, अगर सख्ती से मैंने उसको सेक्स से रोका तो भी वो अगर चाहेगी तो मुझसे छुप कर कहीं भी सेक्स कर ही लेगी। स्वीटी को ही देखिए... वो वहाँ सात बजे शाम में अभी अपने होस्टल में है कि किसी लड़के के साथ होटल में... यह कैसे पक्का किया जाए। इसीलिए घर की लडकियों को एक उम्र के बाद थोड़ी आजादी दे दीजिए तो बेहतर है। जवान होने के बाद शरीर तो सेक्स खोजेगा हीं। ऊँगली से ये लडकियाँ आधा-अधुरे तरीके से अपने शरीर की जरुरत पूरी करे और असंटुष्ट रहे उससे तो बेहतर है कि हमारे जानते हुए सप्ताह या महीने में एक-दो बार सही तरीके से अपने शरीर की भूख को पूरा करे।

मेरा तो यही मानना है और इसीलिए मैने अपनी बहनों को सेक्स के मामले में कभी नहीं टोका, और जब प्रभा की उम्र हुई तो प्रभात का रिश्ता आ गया। वो दोनों तो शादी से पहले से सेक्स करते थे और यह मेरी जानकारी में था। प्रभात भी मेरा स्कूल का दोस्त था, आप तो जानते हैं। वो ही बताया था जब वो प्रभा के साथ पहली बार सेक्स किया।"

वो मेरी बात सुन कर भौंचक थे, "मतलब तुम्हें प्रभा के पहले सेक्स के बारे में पता है?"

मैंने आराम से कहा, "हाँ, और मुझे पता है कि उस दिन वो घर पर ही सेक्स की थी, जब घर खाली था"।

वो अब बोले, "बात तो तुम एक तरह से ठीक ही कह रहे हो... अपने घर की लड़कियों का तो सच में हमें कुछ पता नहीं होता है और हम यह भूल जाते हैं कि ऐसे ही उन लड़कियों के घरवाले भी अनजान होंगे जिनके साथ हम यह सब कर रहे होते हैं"।

मैंने अब अंतिम कील ठोका, "मान लीजिए कि सायरा को सेक्स की लत हो और वह अब रेगुलर तरीके से किसी से चुदवाती हो तो आप अब क्या कर सकते हैं..., ज्यादा से ज्यादा गुस्सा ही न। पर अगर वो जिद में आ गई और घर से भाग गई तो कौन जाने किस कोठे पर मिलेगी। अभी तो सप्ताह-दस दिन में एक बार वो चुदा रही होगी... पर अगर एक दिन भी कोठे पर चली गई तो वहाँ उसके जैसी लडकी को घन्टा में हिसाब लगा कर लगातार चोदा जाएगा। अब तो मोबाईल से चट वीडियो बन जाता है और लडकी को पता भी नहीं होता। कल्पना कीजिए कि आपको अचानक किसी दिन अपनी बेटी किसी ब्लू-फ़िल्म में दिख जाए तब...? इससे तो बेहतर है कि उनके शरीर की भूख का भी ख्याल रखा जाए और हमें पता हो कि वो कब और किससे चुदा रही हैं। इसीलिए मैं कह रहा था कि आप विभा पर लाईन मारिए और मैं सायरा पर। अगर वो हम लोगों से पट गई तो हमें मजा मिलेगा ही हमें उनके बारे में भी पता रहेगा। अब तो हमारा रिश्ता ऐसा हो ही गया है कि मैं सायरा के बारे में आपको सब बता सकूँ"।

वो अब मुस्कुरा कर बोले, "ठीक है.... बेस्ट औफ़ लक..., पर कोई बदनामी ना हो यह ख्याल रखना। और हाँ... एक बार प्लीज विभा की उस पैन्टी को दिखाना उससे छुपा के। मेरे तो दिमाग में बस यही चल रहा है कि वो विभा के अंग को कितना ढँका होगा..."।

मैंने गौर किया कि वो अभी भी ’विभा का अंग’ बोल रहे थे, ’विभा की चूत’ नहीं तो मैंने कहा, "आप ठीक अंदाजा लगाए हैं, वो सिर्फ़ पाँच साल की लडकी का बूर ही ढँक सकती है। विभा जैसी लडकी की चूत तो अब इतना फ़ूली हुई होगी कि वो दोँ ईंच में सिर्फ़ उसकी चूत की फ़ाँक को ढँकी होगी। अगर अभी विभा का पैन्ट खोल कर देखा जाए तो उसका फ़ूला हुआ चूत और सारा झाँट साफ़ दिखेगा, बशर्ते की वो अपना झाँट साफ़ न की हो"।
 
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