• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

incest -ना भूलने वाली सेक्सी यादें complete

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
यह कहना कि उज्ज्वल भविष्य की कल्पनाओं ने मुझे अतिउत्तेजित कर दिया था, अति कथनी नही होगा. मुझमे अविश्वसनीय जोश था. अपनी जिंदगी में कुछ हासिल कर लेने के ख़याल से मुझमे जोश के साथ साथ कामोत्तजना भी आ गयी थी. मेरे दिमाग़ में एक उद्देश्य पल रहा था, जिसने 'मुझे इस हद तक आनंदित कर दिया था कि यह आनंद धरती पर मौजूद दुनिया की सबसे सुंदर, मनमोहक और प्यारी युवती के साथ संभोग से प्राप्त होने वाले आनंद से भी बढ़कर था. उस रात जब मैने अपनी बेहन को अपनी बाहों में थमा हुआ था तो मेरे जिस्म और मेरा दिमाग़ दोनो अलग अलग जाँघो पर थे. मैने उसके अंदर दाखिल होने की कोई जल्दबाज़ी नही की. मैने खुद को कंट्रोल करते हुए उसके पूरे जिस्म को प्यार से सहलाया, उसके हर अंग को चूमा. शुरुआत में मैने हल्के हल्के धक्के लगाए मगर जब दिन भर के ख़याली पुलाबों की खुशी और उफनता जोश मेरे दिमाग़ से निकलकर मेरे लंड में घुस गया तो मैं उसे तेज़ तेज़ और प्रचंड धक्कों से जड़ तक चोदते हुए अपना सारा जोश अपने लंड के ज़रिए उसकी चूत में पहुँचने लगा . जब तक मेरे स्खलन का समय आया, तो मेरे उस आवेश, उस जोश के कीड़े ने उसे भी काट लिया था. मेरे प्रचंड धक्कों का ज्वाब उसने भी पूरे जोश से अपने कूल्हे उछाल उछाल कर दिया.

अगले दिन मैने दुकान से एक नोट बुक और कुछ पेन उधार लिए जिसे मैं भविष्य में खेतो से दुकान को होने वाली सप्लाइ से चुकता करने वाला था. मैं पूरी गंभीरता से योजनाएँ बनाने लगा.

सबसे पहले मैने खेतों के हर हिस्से हर कोने मे घूमकर यह पता लगाया कि हमारी ज़मीन लगभग कितनी है और किस हालत में है. यह देखकर मुझे अत्यंत खुशी हुई कि हमारे पास इतनी ज़मीन थी जिसमे ना सिरफ़ मैं अपनी योजनाओं अनुसार फसलें उगा सकता था, बल्कि गायों के अलावा दूसरे जानवरों के एक बड़े झुंड को भी पाल सकता था. मगर निराश करने वाली बात यह थी कि ज़मीन का ज़्यादातर हिस्सा घनी गहरी घास और कंटीली झाड़ियों से भरा पड़ा था. मगर कुछ छोटे छोटे हिस्से ऐसे थे जिनमे थोड़ा घास था या जहाँ तहाँ कुछ पेड़ उगे हुए थे. मैं उन कुछ हिस्सों को सॉफ करके बारिश आने से पहले फसल बीजने के लिए तैयार कर सकता था. समय मेरे पास था, कठोर परिश्रम करने के लिए मैं तैयार था मगर बारिश के बारे मे पूर्व अनुमान लगाना बेहद मुश्किल था, बारिश का मौसम मन्मोजि था.

हमारे इलाक़े में लगभग सभी लोग बारिश के समय खेतीबाड़ी करते थे. जब बारिश होती तो वो बीज धरती मे डाल देते और फिर और बारिश का इंतज़ार करते जिससे बीज से पोध निकलकर फलफूल सके. सिंचाई का और कोई साधन मौजूद नही था और अगर बारिश समय पर ना आए तो धरती में डाला बीज या उससे निकले छोटे छोटे पोधे मर जाते. अगर कुछ पोधे बच जाते और फसल काटने तक बढ़ते रहते तो उनका पूरा रखरखाव ना होता. केयी बार सिरफ़ पोधे बढ़ जाते मगर उनमे कुछ ही पोधे अनाज देने लायक होते. जो ज़्यादातर मामलो में एक दो महीने तक चलता और फिर लोगों को पेट भरने के लिए दूसरे साधनो की ओर देखना पड़ता. असल बात यह थी कि श्रम शक्ति नही थी इतने लोग नही थे जो खेतों को अच्छे से खोदकर उन्हे तैयार कर सके या फिर उनकी बिजायी कर सके और इस बात ने हालातों को बुरी तरह से बिगड़ दिया था. कुछेक बार कई लोगों ने ट्रॅक्टर किराए पर लेकर खेतों की अच्छे से जुताई की और बीज बोया मगर उस साल के भयंकर सूखे के कारण वो प्रयास भी असफल हो गया. ज़्यादातर लोग अपने बेटे बेटियों की कमाई पर निर्भर थे जो गाँव को अलविदा कह चुके थे और सहरों में रहकर अच्छी कमाई कर रहे थे या कुछ अपने रिश्तेदारों पर जो उनपर तरस खाकर उनको कुछ मदद या अनाज दे देते.

हमारा परिवार आमतौर पर दुकान से होने वाली आमदनी पर निर्भर था. लोग दूध, परचून और पेट्रोल तक हमारी दुकान से खरीदते थे. हम कुछ कपड़े और हार्डवेर का समान भी बेचते थे मगर उन वस्तुओं की उस गाँव में कोई ज़्यादा ज़रूरत नही थी. जहाँ तक खेतीबाड़ी का संबंध है, हमारी माँ चाह कर भी कुछ नही कर सकती थी और मुझे तो याद भी नही पड़ता था आख़िरी बार हमारी ज़मीन में बीज कब बोया गया था. अतीत में मैं सिर्फ़ जानवरों की देखभाल करता था मगर अब जब मेरा इरादा अपने खेतों में फ़ासले उगाने का था तो सिंचाई के पानी की मुश्किल मुँह बाएँ सामने खड़ी थी. मैं अपनी सारी ऊर्जा और मेहनत को बेकार नही करना चाहता था कि इतनी मेहनत से फसले उगाकर बाद में उन्हे पानी के अभाव में मिट्टी में मिलते हुए देखूं.

खेतों में एक हिस्सा एसा भी था जो बाकी ज़मीन से उँचा था और जिस पर बड़े बड़े पेड़ उगे हुए थे. वो पेड़ उस हिस्से में एक गोलाकार घेरा बनाते थे जिसके अंदर काफ़ी ज़मीन थी जिस पर बड़ी बड़ी हरी घास उगी हुई थी. उस हिस्से के विपरीत दिशा में हमारा एक बड़ा सा शेड था या यूँ कहिए एक छोटा सा टूटा फूटा ज़रज़र शेड था जिसमे एक कमरा कुछ अच्छी हालत में था और बाकी हिस्सा पूरा खुला हुआ था यानी स्तंभों पर केवल छत थी. यह शायद मेरे दादा ने या परदादा ने या उनके पिता ने किसी पिछले युग में बनवाया था. कमरा इसलिए था कि बारिश या किन्ही बदतर हालातों में आदमी वहाँ आराम कर सकता था हालाँकि वो शायद कभी इस्तेमाल में नही आया था.

मेरे पिताजी उस बाडे के गिर्द अपना समय काम करने का बहाना करके ब्यतीत करते थे या यूँ कहें कि आवारगार्दी करते हुए समय नष्ट करते थे. अब वो बाड़ा मेरी माँ के टहलने या समय नष्ट करने के काम आता था जब वो कुछ समय के लिए खेओं में आती थी. खेर अब तो उसने आना भी बंद कर दिया था. मैं अपना जायदातर समय उस पेड़ों वाले उँचे हिस्से मे ब्यतीत करता था और शेड से दूर रहता था. अब उस दूबिधा में फंसकर जो मेरे कुछ कर दिखाने के सपने को बड़ी आसानी से चकनाचूर कर सकती थी, मैने शेड मे छान बीन करने का फ़ैसला किया.

मैने बड़ी शेड में छानबीन करने का फ़ैसला किया, प्रार्थना करते हुए इस उम्मीद से वहाँ से मुझे कुछ एसा उपयोगी समान मिल जाएगा जिससे मैं अपनी ज़मीन में कुछ कर सकूँ. कम से कम वहाँ से मुझे कोई पुराना हल या खेतीबाड़ी के कुछ दूसरे औज़ार मिलने की आशा थी जिनसे मैं घास की सफाई कर सकूँ या कुछ बेल्चे, कुल्हाड़ी या फावडे जैसा, कुछ भी जिससे मैं झाड़ियों को उखाड़ सकूँ.

मैने कुछ पुराने जंग लगे औज़ार ढूँढ निकाले जिनके हॅंडल टूटे हुए थे, बाड़ करने की कंटीली तार थी, कुछ इंट थी और कुछ सीमेंट के बोरे थे जो जम चुके थे और अब पूरी तरह से बकार थे. एक छोटी बैलगाड़ी का ढाँचा था जो किसी समय में बहुत उपयोगी रहा होगा. लगभग सभी चीज़ों की काफ़ी मरूमत करने की ज़रूरत थी, इससे पहले कि मैं उनसे कुछ काम कर पाता. क्योंकि वो सब चीज़ें आपस में मिक्स हुई पड़ी थी, मैने उन्हे एक एक कर बाहर निकालने का फ़ैसला किया ताकि काम लायक समान का निरीक्षण कर सकूँ इससे पहले कि औज़ारों के अभाव मे मैं अपने प्रयास को बीच में अधूरा छोड़ दूं.

मुझे लगभग डेढ़ हफ़्ता लगा सब कुछ वर्गीकृत करने में. इस समय के दौरान मैने पूरी शेड की अच्छे से सफाई की और जितनी मरम्मत मैं कर सकता था, मैने की जैसे जितने होल वग़ैरहा भरने की ज़रूरत थी, मैने भर दिए. जीतने उपयोगी औज़ार मैने ढूँढे थे मैं उन सब को उस पेधों वाली उँची जगह पर ले गया और जो चीज़ें अब किसी काम की नही थी या जिनकी मरम्मत संभव नही थी, मैने फेंक दिए. इतना काम निपटाने के बाद अब मेरे पास एक पूरी सॉफ सुथरी बड़ी सी शेड थी, कुछ औज़ार थे जिनके हॅंडल नये थे और जिनको मैने खूब नुकीला कर दिया था, मेरे पास एक बैलगाड़ी थी जिसको नये पहियों की ज़रूरत थी और तीन हल थे जिनके हत्थे लगाने की ज़रूरत थी.

सबसे अच्छी चीज़ जो मुझे शेड की सफाई के दौरान मिली वो एक डीजल जेनरेटर था जिसकी एक बेल्ट गुम थी मगर वो बेहद अच्छी हालत में था क्यॉंके वो शेड मे एकलौते कमरे मे ढक कर रखा हुआ था. मेरे लिए जैसे वो मुझे मेरे पिता जी का छोड़ा हुआ उपहार था, जो उनकी जुए की कभी ना ख़तम होने वाली रातों से ना जाने कैसे बच गया था, शायद उन्होने उसे इसलिए जुए में इस्तेमाल किया हो क्यॉंके उसके बाद तो उनका जुआ खेलना ही रुक जाता.

बहरहाल, जेनरेटर ने मुझे एक नयी आशा बँधा दी थी, अब शायद मेरी सिंचाई की मुश्किल का हलनिकल सकता था.

 
हमारे घर मे एक छोटा बोरहॉल था जो हमारे नहाने और घर के दूसरे कामो के लिए पर्याप्त पानी मुहैया करवाता था जैसे रसोई के कामकाज के लिए, टायिलेट्स फ्लश करने के लिए या फिर घर में लगाए हुए फूलों और कुछ छोटे पेड़ों की सिंचाई के लिए. उस बोरहॉल को चलाने के लिए बिजली की ज़रूरत थी जो हमारे घर में थी मगर खेतों के लिए बिजली का इंतज़ाम करना लगभग नामुमकिन था क्यॉंके उसके लिए एक बड़ी, बहुत बड़ी रकम की ज़रूरत थी जो हमारे पास नही थी. यह जेनरेटर घर से काफ़ी बड़े बॉरेहोल को चला सकता था. शायद इसीलिए, मेरे पिता ने उस जेनरेटर को खरीदा होगा ता कि वो उससे ज़मीन मे ट्यूबेल चला कर सिंचाई की समस्या से निजात पा सके. यह योजना मेरे दिमाग़ मे आकर लेने लगी जब मैने कल्पना की अपने पिता की, उस शेड मे उस फोल्डिंग बेड पर लेटे हुए कैसे वो मेरी तरह अच्छे दिनो की कामना करते होंगे, मेरी तरह, बस फरक इतना था मैं अभी तक जुए और शराब जैसी उनकी लतो से दूर था जिसने उनके और मेरी माँ के बीच कभी ना मिटने वाली दूरी पैदा कर दी थी और जिसका अंत उनकी मौत के साथ हुआ था. अगर मैं कोई छोटा बॉरेहोल भी चलाने मे कामयाब हो गया तो बॉरेहोल और बारिश दोनो के पानी के साथ मेरी सिंचाई की दिक्कत आसानी से दूर हो सकती थी और मैं अपनी योजनाओं में सफल हो सकता था. मैने अपने खेतों मे एक ऐसी जगह भी ढूँढ निकाली जहाँ मैं बारिश का पानी जमा कर सकता था और उसे सिंचाई के काम ला सकता था.

मैने अपनी बहन से अपनी योजनाओं के बारे में चर्चा की तो उसने पूरे दिल से मेरा अनुमोदन किया और अपनी स्वीकृति दी. उसने मुझे यह भी बताया कि उसके पास कुछ रकम पड़ी है जिसे उसने बड़ी मेहनत से जोड़ा था, उस रकम को वो मुझे ज़रूरत के वक़्त इस्तेमाल करने के लिए देना चाहती थी. क्योंकि अगर जैसा मैने सोचा था वैसे ही सब कुछ हुआ तो हम दोनो को ही इसका फ़ायदा होने वाला था. मगर मैं उसका पैसा इस्तेमाल नही करना चाहता था, इसलिए मुझे अपना इंतज़ाम खुद करना था. मैने अपनी जानवरों के झुंड का इस्तेमाल करने की सोची, उस वक़्त वोही एक ज़रिया था जिससे मैं अपनी ज़रूरत के समान को खरीदने के लिए पैसा इकट्ठा कर सकता था. मैने झुंड में से एक एक जानवर पैसे की ज़रूरत के हिसाब से बेचना सुरू कर दिया. मैं उनसे उतना पैसा तो नही कमा सका जितना कोई अनुभवी किसान कमा लेता, मगर मैं सीख रहा था और अपने ज्ञान के लिए मुझे वो रकम तो चुकानी ही थी.

मैने सबसे पहले बाड की मरम्मत की और फिर एक नया बढ़िया वाला हल खरीदा, बैलगाड़ी को नये पहिए लगा कर इस्तेमाल करने लायक बनाया और एक तगड़ा बैल खरीदा जो हल और बैलगाड़ी दोनो को खींच सकता, जेनरेटर की मरम्मत करके उसे मध्यम आकार के बॉरेहोल पर लगाया. उसके बाद मैने पेड़ो वाली उँची जगह के एक हिस्से को कंटीली बाड़ लगा कर बंद कर दिया जिससे मैं अपने जानवरों को वहाँ रख सकूँ और वो इधर उधर पूरी ज़मीन पर ना भटके. बाड़ लगाने का फ़ैसला बहुत सही रहा जिससे मुझे अब अपने झुंड की रखवाली से निजात मिल गयी थी और मेरे पास खेतीबाड़ी के काम के लिए काफ़ी अतिरिक्त समय निकल आया था.

मैने लगभग आधी ज़मीन को सॉफ किया, उसमे से घड़ियों और घास की सफाई की, उसमे हल चलाकर जुताई की और बीज बिजने के लिए तैयार कर दिया. पूरी ज़मीन को इतने औज़ारों से तैयार करना लगभग नामुमकिन था, इसलिए मैने शुरुआत आधी ज़मीन से की. क्यॉंके जानवर अब छोटे हिस्से में रहते थे इसलिए उनका गोबर इकट्ठा कर मैं खाद के इस्तेमाल मे ला सकता था. बॉरेहोल ने अपना जादू दिखाया और उसके पानी से सिंचाई कर मैने वीज डाल दिया. जब बरसात की पहली बारिश आई तब तक मेरे पास मेरे तैयार की ज़मीन का आधा हिस्सा धान के छोटे छोटे पोधो से भरा पड़ा था और बारिश के पानी से मैं बाकी तैयार ज़मीन में भी फसल बीजने वाला था. मेरी बेहन मेरी मेहनत का फल देखने के लिए आई और मेरी योजनाओं को फलते फूलते देख बहुत खुश बहुत उत्तेजित हुई.

मगर कोई भी, और मेरा मतलब कोई भी उतना खुश नही हुआ, उतना उत्तेजित नही हुआ जितना मेरी माँ हुई जब उसकी नज़र प्रचुर, हरे-भरे धान के पोधो पर पड़ी. मैने तो ज़मीन के एक छोटे हिस्से में सब्जियाँ भी उगाई हुई थी जिसे मैं और मेरी बेहन दुकान में बेचना चाहते थे, इसके अलावा कुछ फलों के पोधे थे जिनसे कुछ अतिरिक्त आमदनी हो सकती थी.

जब बारिश का समय आया तो मेरी माँ एक दिन खेतों में आई जैसे वो पहले आया करती थी. मुझे उसके आने का मालूम चला तो मैने अपने अथक परिश्रम को बंद किया जिसकी अब मुझे आदत पड़ चुकी थी और शेड के नज़दीक एकदम निठल्ला होकर बैठ गया और उसके आने का इंतज़ार करने लगा. उसने आते ही शेड में हुए बदलावों को सफाई को और मरम्मत को भाँप लिया मगर वो मुख से कुछ नही बोली. उसे अभी मालूम नही चला था कि झुंड पहले से काफ़ी छोटा रह गया है क्योंकि मैने पशुओं को अपनी उगाई हुई फसल से दूर खुले में चरने के लिए छोड़ दिया था. जब उसने मुझे ऐसे निठल्ले बैठे रहने को जी भर कर कोस लिया और कुछ काम करने की नसीहत दी तो मैं उसे ज़मीन के उस हिस्से में ले गया जहाँ धान की फसल अपने जोबन पर थी

माँ आँखे फाडे अविश्वास से अपने सामने देख रही थी. जितनी ज़मीन में उसने कभी बीज नही बोया था उससे कहीं ज़यादा मैं फसल उगाने में कामयाब हो गया था और अभी इतनी ही ज़मीन और पड़ी थी, बीज बोने के लिए बिल्कुल तैयार. वो बहुत उत्तेजित थी और वार वार दोहरा रही थी “मुझे अपनी आँखो पर यकीन नही होता”. जब उसकी नज़र बॉरेहोल पर पड़ी जो पानी की एक मध्यम मगर लगातार धारा फेंक रहा था तो वो खुशी से चिल्ला पड़ी.

माँ भागकर मेरे पास आई और मुझे अपनी बाहों मे कसकर ज़ोर से जाकड़ लिया. “आख़िरकार हमारे परिवार में कोई दिमाग़ रखने वाला मर्द पैदा हुआ है” उसके बोलों से उसकी खुशी झलक रही थी.

फिर वो खेतों में इधर उधर घूमने लगी. वो पत्तों को महसूस करती, दांतलों को छूती उस उत्तेजना और जोश में पूरी आनंदित हो रही थी. जब वो वापस आई तो उसने मुझे फिर से आलिंगन में लिया और ज़ोर से चूमा और बोली “बेटा मैं ना जाने कितने सालों से प्रार्थना कर रही थी कि कहीं से कोई मर्द आए और इस ज़मीन में कुछ करके दिखाए. मुझे तो मालूम ही नही था कि मैने वास्तव में अपनी कोख से एक ऐसा मर्द पैदा किया है जो मेरे सपनो को साकार कर सकता है”

मैं कितना अभिभूत हो उठा था, कितना खुश था. मैं बहुत कड़ी मेहनत कर रहा था और जो उन्नति जो खुशहाली उसने वहाँ आकर पहले दिन देखी थी वो मेरी आँखो के सामने लगातार हुई थी इसलिए मुझ पर उसका प्रभाव इतना जबरदस्त नही हुआ था, बल्कि मेरे लिए तो वो मेरे अथक परिश्रम का नतीजा थी जो होनी ही थी. मगर माँ के लिए तो वो बिल्कुल अप्रत्याशित था, ज़मीन के उस हिस्से में लहलहाती फसल उसके लिए तो कोई चमत्कार ही था. और सिर्फ़ इतना ही नही, बारिश का मौसम अभी शुरू ही हुआ था और हम दोनो मिलकर जितनी फसल मैने उगाई थी उसे दुगनी तिगुणी फसल उगा सकते थे.

 
बंधुओ जिंदगी की कशमकश जारी है
 
खेतों में घूमते हुए जब मैं उसे अपनी योजनाओं के बारे में बता रहा था तो वो जैसे उमंग में बार बार मुझे आलिंगंबध कर लेती. लेकिन झुंड में गायों की गिनती बहुत कम देखकर वो थोड़ा उदास हो गयी मगर जब उसने नया मोटा टगडा बैल देखा, बैलगाड़ी देखी, हल और दूसरे औज़ार जो मैने जमा किए थे तो उसका चेहरा चमक उठा. फिर मैं उसे शेड में लेकर गया जहाँ मैने लंबी झाड़ियों को लकड़ियों पर बाँध तीन वनावटी दीवारें तैयार की थी और चौथी पक्की दीवार थी जिससे वहाँ एक मध्यम आकार का कमरा बन गया था और उस कमरे के अंदर सौ से ज़्यादा मुर्गियों के चूजे पल रहे थे,

वो मेरा छोटा सा पोल्ट्री फार्म था मगर उसने माँ के होंटो की मुस्कान को बहुत बढ़ा दिया था. जब उसने शेड का कमरा देखा जिसे मैने अपने घर के कमरे जैसा सॉफ, हवादार रहने लायक बना दिया था, तो उसने मुझे फिर से ज़ोर से चूमा. कमरे के अंदर मैने उसका फोल्डिंग वाला बेड एक कोने में रखा था जिससे वो जब पहले वहाँ आया करती थी, तो इस्तेमाल करती थी. उस बेड की मैने अच्छे से सफाई और मरम्मत कर दी थी और अब चाहे वो उसका इस्तेमाल कर सकती थी. मैने शेड के उस कोने मे उस कमरे और उसके आस पास का थोड़ा हिस्सा बिल्कुल रहने लायक बना दिया था और कमरे मैं ज़रूरत की कुछ चीज़ें जैसे खाना पकाने और खाना खाने के बर्तन, एक छोटा सा लकड़ी का चूल्हा और एक चादर और एक कंबल रखा था. अगर कभी बारिश ज़्यादा तेज़ हो या मुझे ज़्यादा समय तक काम करना हो या फिर झुंड पर नज़र रखनी हो तो मैं उस कमरे का इस्तेमाल रुकने के लिए कर सकता था.

माँ ने बेड कमरे से बाहर निकाला और खुली छेद के बीचोबीच खोल कर रख दिया. उसने मुझे पास बुलाया और अपने साथ बैठने के लिए कहा और जब मैं उसके साथ बैठा तो उसने अपनी एक बाँह मेरी कमर पर लपेटी और मेरे कंधे पर सर रखकर मुझसे सट कर बैठ गयी और खेतों में दूर तक देखने लगी, उसका चेहरा खुशी और उत्तेजना से चमक रहा था. जब मैने उसके चेहरे की प्रसन्नता देखी, उसकी आँखो मे आश्चर्य और उम्मीदों के सपने देखे और जब मेरा ध्यान इस ओर गया कि कैसे वो मुझे कस कर ज़ोर से आलिंगंबध किए थी तो अचानक मुझे ख़याल आया. मुझे एहसास हुआ कि मेरी माँ महसूस कर रही थी कि उसका बेटा अब बड़ा हो गया है और मरद बन गया है. मुझे ये भी एहसास हुआ कि मेरी ज़िंदगी में एक नही बल्कि दो दो औरतें थी

मेरी माँ का वो उत्साह वो खुशी पूरे दिन बनी रही, जब उसने जानवरों को इकट्ठा कर उनके बाडे में पहुँचाने मे मेरी मदद की, जब उसने बाकी का पूरा दिन मेरे साथ खेतों में काम किया, और तब भी जब शाम को हम ने सभी काम निपटाकर सभी औज़ार वापस शेड में रखकर खेतों से चल पड़े. वो तब भी उतनी ही खुश थी जब हम घर पहुँचे. मेरी बेहन माँ को मेरे साथ घर लौटते देख अचंभित हो जाती है. माँ आज बहुत चंचलता दिखा रही थी. बेहन और मैं तब और भी असचर्यचकित रह जाते हैं जब मेरी माँ शोभा के घर जाने की बजाए हमारे साथ समय बिताती है. वो चहकते हुए मेरी बेहन को बताती है कि कैसे मैने ज़मीन में फसल उगाने का चमत्कार कर दिखाया था और उसको मुझ पर कितना गर्व है.

हम ने बड़े उतावलेपन से उसके सोने का इंतज़ार किया, और उसके सोते ही मैं अपनी बेहन पर चढ़ गया. आज मैं अपने अंदर एक अलग ही जोश और उत्तेजना महसूस कर रहा था. बहन मुझे इतने आवेश में देखकर दंग रह जाती है. मैं उसको बस इतना कहता हूँ कि माँ को इतने अरसे बाद इतना खुश और जोश मैं देखकर मुझे भी थोड़ा जोश आ गया है और मैं अपने अंदर आज नयी ऊर्जा महसूस कर रहा हूँ. वो मेरी तारीफ करती है और सुबह मुझे मज़ाक करते हुए बोलती है कि रात को उसे जो इतना मज़ा आया था वो उसके लिए माँ को शुक्रिया बोलेगी. वो माँ को लगभग एक दशक की अंतहीन उदासी के बाद इतनी जिन्दादिल देख कर बहुत खुश थी.

मेरे जोश की, आवेश की कुछ और वजह थी. जब मैने अपनी बेहन को चूमा था तब भी मेरे होंठो पर माँ के चुंबनो का भाव था. मेरी माँ को शायद उत्साह में एहसास नही हुआ था मगर वो बार बार मेरे होंठो पर चूम रही थी. खुशी में, जोश में चीखते, चिल्लाते हुए जब वो अपना उत्साह प्रकट करती तो चुंबन के समय उसका मुख कई बार थोड़ा सा खुल जाता जितना उस सूखे चुंबन को गीला कर देने के लिए काफ़ी होता. मैने ना सिरफ़ उसका मुख रस चखा बल्कि अपने बाजुओं और छाती पर उसके मम्मों को भी महसूस किया था. अब तक मेरी ज़िंदगी में सिर्फ़ एक औरत आई थी जो मेरी बेहन थी, मैं नही जानता था कि अगर किसी और औरत से मेरा जिस्मानी संपर्क बनेगा तो उसका मुझ पर क्या असर पड़ेगा. अब तक मैं अपनी माँ के उस अर्ध अंतरंग संपर्क में आया था और इसका प्रभाव बहुत उत्तेजित और कामनीय था.

माँ के चुंबनो और आलिंगनो ने मुझे उत्तेजित कर दिया था और मेने वो उत्तेजना बेहन की ज़ोरदार चुदाई कर निकली थी. मेरी माँ ने जाने अंजाने, मेरे और मेरी बेहन के बीच उस ज़ोरदार आवेशित चुदाई में अपना योगदान दिया था. मुझे वो बहुत अच्छा लगा था, चित्ताकर्षक लगा था और मुझे यह एहसास भी हुआ कि मैं इसे अपनी बेहन के साथ नही बाँट सकता था. बेहन के उस रात सो जाने के बाद मैं काफ़ी देर तक जागता रहा. मेरा ध्यान बार बार माँ के आलिंगनो और चुंबनों की ओर चला जाता इसके बावजूद कि मैने बड़ी तसल्ली से बेहन को चोदा था और मेरा स्खलन बहुत संतुष्टि प्रदान करने वाला था. जिस तरह माँ के साथ ने मुझे उत्तेजित कर दिया था और उसके उस प्रभाव ने बेहन के प्रति मेरा प्यार मेरी उत्तेजना बढ़ा दी थी वो मुझे बड़ा अजीब लगा.

बरबस मेरा ध्यान दोनो के जिस्मो में अंतर पर गया. मेरी माँ का जिस्म बेहन के मुक़ाबले ज़यादा ताकतवर और ज़्यादा बड़ा था. उसके मम्मे ज़्यादा बड़े और कोमल थे, उसके चूतड़ ज़्यादा विशाल थे और बेहन के मुक़ाबले उसकी कमर थोड़ी सी बड़ी थी. हर अनुपात से हर नज़रिए से मेरी बेहन माँ के मुक़ाबले ज़्यादा खूबसूरत थी. और यही वजह थी दोनो के प्रति मेरी भावनाओं में अंतर की. कुछ समानताएँ मौजूद थी मगर आसमानताएँ बहुत बड़ी थी. यह बात नही थी कि मैं अपनी माँ को बेहन से ज़्यादा चाहता था या चाहता भी था या नही. मेरे दिल में उसके साथ वास्तव में संभोग का कोई विचार नही था. यह तो बस उसके मम्मों के स्पर्श का एहसास था जिसने मेरे पूरे जिस्म में गर्माहट भर दी थी और वो गर्माहट पूरे जिस्म से होते हुए मेरे लंड में पहुँच गयी थी जिसने मेरे रोम रोम में उत्तेजना का संचार कर दिया था.

हालाँकि वो माँ के चुंबन और आलिंगन थे जिन्होनो मुझे उत्तेजित कर दिया था मगर मैं अपनी माँ के लिए उत्तेजित नही था. मैं अभी भी सिर्फ़ और सिर्फ़ बेहन को ही प्यार करना चाहता था. यहाँ एक पल के लिए मेरे दिमाग़ में एक विचार कोंधा था. मैं अपनी माँ के उत्साह के बारे में सोच कर अचंभित था. वो इतने जोश में थी, इतनी उत्तेजित थी, खुशी के मारे उछल रही थी मैं यह सोचकर थोड़ा अचंभित था कि अगर वो दूसरी तरह से उत्तेजित होगी तो क्या करेगी. अगर वो कामवासना में इतनी ही उत्तेजित होगी तो क्या ऐसे ही जोशो खरोष में चिल्लाएगी, क्या वो ऐसे ही खुशी से मदहोशी में उछलेगी? जैसे ही वो विचार मेरे मस्तिष्क में कोंधा मैने मेरे साथ लेटी हुई अपनी बेहन पर नज़र डाली तो मैने अपने अंदर अपराधबोध महसूस किया जैसे वो जानती हो कि मैं क्या सोच रहा था और मुझे वैसा नही सोचना चाहिए था क्योंकि वो अब मेरी औरत थी. मैने महसूस किया जैसे उसके प्रति अपनी वफ़ा और अपनी ईमानदारी के लिए मुझे उसको आस्वश्त करना चाहिए था.

मेरी बेहन सच में बहुत असचर्यचकित हुई जब मैने उसे जगाया और दोबारा पूरे जोश से उसे चोदने लगा. उसके चेहरे पर एक अंजानी शंका का भय का भाव था जिसे मैं समझ नही सकता था मगर मुझे उस समय इसकी कोई परवाह भी नही थी. मैं बस कुछ साबित करना चाहता था और हमारे बीच संबंध बनाने के बाद उस रात पहली दफ़ा ऐसा हुआ था जब मैने उसे अपने लिए, अपने मज़े के लिए ज़्यादा चोदा था ना कि जितना उसके मज़े के लिए जैसा मैं पहले करता था और जैसे ही मेरा स्खलन हुआ मेरा सारा दम निकल गया. उसके हाव भाव से जाहिर था वो थोड़ी असमंजस में थी, उलझन में थी मगर मुझे अब थोड़ी देर सोना था क्यॉंके सवेरा होने में ज़्यादा वक़्त नही बचा था

 
अगले दिन सुबह मेरे खेतों में पहुँचने के कुछ ही समय बाद माँ ने वहाँ आकर मुझे चकित कर दिया. वो मेरे साथ मिलकर खेतों को तैयार कर उसमे बीज बोने, जानवरों को चारा डालने और जो फसल अब तैयार हो रही थी उसको पानी देने जैसे कामो में मेरी मदद करने लगी. मैने अपनी जिंदगी में माँ को कभी भी इतनी मेहनत करते नही देखा था जितनी वो उस दिन कर रही थी या आने वाले दिनो में करने वाली थी.

और जब हम पेड़ों वाली उँची जगह जिसे मैं टीला बोलता था, पे बैठकर आराम करते हुए नीचे अपने दिन भर के निपटाए काम को देख रहे थे तो वो मेरी पीठ थपथपाते बोली "बेटा तुमने वो कर दिखाया है जो तुम्हारे पिता के बाद असंभव ही था बल्कि उनके रहते भी असंभव ही था. अब मुझे यकीन है कि ज़मीन की तरह तुम हमारी ज़िंदगी में भी खुशली ला दोगे"

"चिंता मत करो माँ, अगर किस्मत ने साथ दिया तो समझो हमारे बुरे दिनो की लंबी रात ख़तम होने वाली है और ख़ुसीयों की नयी सुबह उगने वाली है" मैने माँ को हॉंसला दिया इस उम्मीद से कि या तो वो मुझे आलिंगन में ले लेगी या कल की तरह ही चूमेगी. मगर उस दिन उसका आचरण बहुत सही था उसने एसा कुछ नही किया जिसकी मैं उम्मीद लगाए बैठा था.

मेरी माँ के खेतों में काम करने का नकारात्मक पहलू ये था कि अब उसके पास मेरी बेहन को दुकान से राहत देने का समय नही मिलता था. उस दिन जब हम घर पहुँचे तो कोई खाना तैयार नही था. मेरी माँ ने घर के बॉरेहोल के पानी से जल्दी से स्नान किया और फिर हम सब के लिए खाना बनाया. ये मेरी बेहन के लिए एक और ताज्जुब की बात थी क्योंकि माँ ने कब का घर के काम काज में दिलचपसी लेना छोड़ दिया था. मेरी माँ दिन भर के कठिन परिश्रम के बाद बुरी तरह से थक गयी थी इसलिए खाने के बाद जल्द ही सो गयी. मैने अपनी बेहन को बताया कि कोई और भी है जिसे माँ के उस जबरदस्त बदलाव ने असचर्यचकित कर दिया होगा; सोभा. वो ज़रूर सोच रही होगी कि माँ या तो बीमार है या किसी और वजह से उससे लगातार दो दिन मिलने नही गयी.

मैने और मेरी बेहन ने उस रात कुछ बुझे हुए अनमने मन से प्यार किया. वो इस बात से नाखुश थी कि उसे दुकान में ज़्यादा समय काम करना पड़ा और जिसकी वजह से हम दोनो को आपस में कम समय मिला. अपनी बाहों में लेते हुए मैने उसे धृड़तापूर्वक बताया कि मुझे उसका इस तरह परेशान और व्याकुल होना बिल्कुल अच्छा नही लगता. यह एक और बदलाव था जिसकी हम दोनो को आदत डालनी थी और उस हिसाब से खुद को व्यवस्थित करना था. उसे मेरी बात समझ आ गयी थी शायद इसीलिए इसके बाद उसके चुंबनो में फिर से गर्माहट लौट आई थी. जब तक उसके सोने का समय होता वो अपनी व्यथा भूलकर वापस अपने रंग में आ गयी थी.

अगले दिन मेरी माँ हम तीनो मे सबसे पहले जागी और उसने मुझे जगाने के लिए सबसे पहले मेरे कमरे का दरवाजा खटखटाया. मेरी बेहन मेरे कंधे पर सर रखे गहरी नींद मे डूबी हुई थी. मैं एकदम से घबरा गया मुझे लगा जैसे वो अंदर आने वाली है और हम दोनो रंगे हाथों पकड़े जाने वाले हैं. मगर माँ दरवाजा खटखटा कर चली गयी. मैने बहन को हिला कर जगाया और उसे जल्दी से रूम से जाने के लिए कहा क्योंकि उस समय रास्ता सॉफ था. उस दिन हमारा बचाव हो गया था, मैने बहन को समझाया कि अब हमें ज़्यादा सावधानी रखनी होगी. यह भी एक एसा बदलाव था जिसकी हमें अब आदत डालनी थी.

लगभग एक हफ्ते बाद जब हम रोज की तरह टीले पर बैठे दिन भर के ख़तम किए काम को देखते हुए अपनी मेहनत के नतीजे से खुश हो रहे थे तो मैने माँ के गिर्द अपनी बाँह लपेटने का फ़ैसला किया. उसने अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया तो मैने उसके कंधे पर हाथ रख उसे हल्का सा दबा कर खेती के काम में मेरी मदद के लिए उसका आभार प्रकट किया. यह वो आलिंगन नही था जिसकी मुझे चाह थी मगर ना होने से तो ये कहीं ज़्यादा अच्छा था.

उस समय मुझे इसका एहसास नही हुआ, मगर मेरे उस इशारे या भाव ने माँ को मेरे प्रति थोड़ा ज़्यादा सनेही बना दिया था. अब वो मुझे पहले की तुलना में थोड़ा खुल कर छू लेती थी. अब यह हमारे लिए नित्य का रीति रिवाज बन गया था कि दिन भर का काम ख़तम कर हम टीले पर एक दूसरे के साथ बैठते थे, उसका सर मेरे कंधो पर होता और मेरी बाँह उसके कंधो के गिर्द, कभी मैं प्यार से उसके कंधे को छू कर दुलार्ता और कभी कभी दबा देता. कभी कभी वो अपनी बाँह मेरी कमर के गिर्द सहारे के लिए लपेट लेती.

मेरी बेहन और मुझे अब इकट्ठे होने का निकटता का उतना समय नही मिलता था जितना हम दोनो एक दूसरे को प्यार करने के लिए चाहते थे इसलिए हम को झटपट जल्दी जल्दी संभोग से संतोष करना पड़ता जिसका मतलब होता मुझे जल्दी से अंदर डालकर जल्दी से स्खलित होना पड़ता, नतीजतन वो कयि बार स्खलित भी नही होती थी. केयी बार हमे सिर्फ़ चूमने-चिमटने का मौका मिलता और कयि बार हम प्यार करना शुरू भी नही कर पाते और दिन भर की थकान हमें सोने को मजबूर कर देती और जब आँख खुलती तो सुबह हो चुकी होती.

नतीजतन हमारा रिश्ता बुरी तरह प्रभावित होने लगा.

जल्दबाजी की आत्मीयता बहुत असंतोषजनक थी. हम वो सब कुछ एक दूसरे को कह नही सकते थे जो हम कहना चाहते थे, हम वो सब एक दूसरे के साथ कर नही सकते थे जो हम करना चाहते थे. मैं उसके साथ दिन भर का विवरण नही बाँट सकता था, उसे अपनी प्रगति के बारे में उतना खुल कर विस्तार से नही बता सकता था जितना मैं बताया करता था. हमारी कामक्रीड़ा से पहले एक दूसरे के अंगो को चूमने, चूसने, सहलाने जैसी गतिविधियाँ दिन भर दिन कम होती जा रही थी जिसकी वजह से स्नेह भी कम होता जा रहा था. हमारे अंदर एक दूसरे के लिए स्नेह पहले जैसा ही मौजूद था मगर यह कम होता इसलिए महसूस हो रहा था क्योंकि हम एक दूसरे को पहले जैसे प्यार नही कर पा रहे थे. इस मामले मे समझिए कम गिनती का मतलब कम गुणवत्ता भी था.

मैं उसकी आँखो में उसके स्वाभाव मे उस निराशा को बल्कि उस गुस्से को भी देख सकता था जो हमारी आत्मीयता का समय कम होने के कारण था. अब, क्योंकि इसमे मेरा कोई दोष नही था, इसलिए मुझे उसका इस तरह निराश होना या गुस्सा करना जायज़ नही लगा. हम पहले जितना या पहले जैसा समय एक साथ नही बिता सकते थे इसलिए नही कि चाहत में कोई कमी आ गयी थी बल्कि असलियत में अब मैं उसे पहले से ज़यादा चाहता था. समस्या सिर्फ़ यही थी कि मेरे पास समय ही नही बचता था कि मैं उसे दिखा सकता, मैं उसे कितना प्यार करता हूँ. मुझे यह बात भी अच्छी नही लगती कि मैं पूरा दिन इतना कठोर परिश्रम करता था ता कि हमारा भविष्य उज्ज्वल बन सके और वो हमारे मिलन के समय की कमी को हमारे बीच एक दरार का रूप दे रही थी. और यह दरार आने वाले हर दिन के साथ गहरी होती जा रही थी

 
कुछ दिन बीतने के बाद मुझे अहसास हुआ कि बहन के साथ बढ़ती दूरी और आत्मीयता की कमी के कारण जो स्थान मेरे हृदय मे रिक्त हो रहा था उसे मैं माँ से नज़दीकियाँ बढ़ा कर पूरा करने की कोशिस कर रहा था. मैं बहन के साथ बहुत कम समय बिता रहा था मगर मैं तन्हा नही था. अगर मेरी बहन मेरे पास नही होती तो मेरी माँ ज़रूर होती. अगर एक औरत मेरी ज़िंदगी से दूर होती जा रही थी तो दूसरी उतनी ही पास आती जा रही थी. मैं हमेशा अपनी बहन के जिस्म को सराहता था, उसकी खूबसूरती से मोहित हो उठता था. मगर अब मेरी आँखे माँ के बदन का मुयायना करने लगी थी और जिस नज़र से मैं बहन को देखता था वो नज़र अब माँ के गदराए अंगो का जायज़ा लेती थी. माँ मुझे बहुत आकर्षक, बड़ी मनमोहक और कामुक लगने लगी थी. वो हमेशा वैसी ही थी बस उसे देखने की मेरी नज़र बदल गयी थी. मगर अब मेने ध्यान देना सुरू कर दिया था. जब मैं किताब के उन आसनो में माँ और खुद की कल्पना करता था तब भी वो मुझे इतनी कामुक, आकर्षक, गदराई नही लगती थी जितनी अब लगने लगी थी, उसका हुश्न तब भी मुझे इस तरह तरसता नही था जितना अब तरसाने लगा था. अचेतना में मैं अपनी बहन का स्थान अपनी माँ को दे चुका था. अब जब भी मैं और मेरी बहन एक साथ हमबिस्तर होते तो मुझे वो बड़ी अटपटी अपराध भावना का अहसास होता जैसे मैं अपनी माँ को दगा दे रहा होता हूँ. कहने का मतलब जल्द ही मेरा और बहन का अब कभी कभार होने वाला मिलन भी पूरी तेरह बंद हो गया था. मैं जैसे खो गया था. जो औरत मेरी थी वो अब दूर चली गयी थी, और जो मेरे पास थी वो शायद मेरी किस्मत मे नही थी.

ऐसा ही उदासी और अकेलेपन से भरा एक दिन था जब मैं टीले पर खड़ा मकयि और धान की फसल को देख रहा था, मकयि को भुट्टे निकलने सुरू हो गये थे. मुझे इस बात से बहुत दुख महसूस हो रहा था कि मैं और मेरी बहन दोनो हमारी इतनी बढ़िया फसल होने का आनंद भी नही ले सकते थे. मुझे उन दिनो की याद आ रही थी जब हम दोनो पूरी पूरी रात प्यार और कामक्रीड़ा में गुज़ारते थे. अचानक मैने अपनी कमर पर किसी की बाँह कस्ति महसूस की. वो मेरी माँ थी जो अपने बदन की एक तरफ मेरे बदन से दबाते हुए बोली "देखो इस सबको बेटा! तुम्हारी कड़ी मेहनत का फल आज तुम्हारे सामने है"

मैने अपनी बाहें छाती से खोल कर अपना बाया हाथ उसके कंधे के गिर्द लपेट दिया. उसने जैसे मेरे इशारे को समझते हुए अपने बदन की दाई साइड थोड़ी और मेरे बदन से सटा दी. उसका बाया मम्मा मेरे कंधे के नीचे मेरी छाती को छू रहा था. मुझे उसके मम्मे का कोमल अहसास बहुत सुखद महसूस हुआ.

"हमारी कड़ी मेहनत का फल माँ!" मैने माँ को दुरूष्ट किया.

वो थोड़ा बेढंग सी खड़ी थी इसलिए वो थोड़ा सा मेरी और घूम गयी. उसने बहुत धीरे से बहुत आराम से मुझे आलिंगन मैं लिया. अब उसके दोनो मम्मे मेरी बाईं ओर चुभ रहे थे. मैने उसके कंधे को थोड़ा सा दबाया और उसे कोमलता से थामे वहाँ खड़ा रहा. उसे ज़रूर अहसास रहा होगा के मैं उस दिन उदास था शायद इसीलिए उसने समझदारी दिखाते हुए कुछ ना बोलना ही उचित समझा होगा और मेरे साथ उस अर्ध आलिंगन मे बिल्कुल स तरीके से खड़ी रही जब तक कि मैने हिलने का फ़ैसला ना किया. उसकी इतनी समाझदारी और कोमलता को देख मेरा मन उसकी तारीफ से भर उठा.

एक बार जब हमारे बीच ऐसा संपर्क बन गया तो आगे ऐसा संपर्क बनाना आसान हो गया. मैं हर शाम थोड़ा उदास सा टीले पर खड़ा होता और वो अपनी बाँह मेरी कमर के गिर्द लपेट देती और फिर मेरा हाथ पकड़ कर अपने कंधे पर रख देती. मैं अपनी बाँह उसके कंधे के गिर्द लपेटता तो वो मुझसे सटते हुए अपने बदन का बयान हिस्सा मेरे दाएँ हिस्से में दबाती. लगभग एक हफ्ते तक हमें इसकी आदत पड़ गयी थी और ये हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था. हमारा यह संपर्क इतना सामान्य सी बात बन गया था कि एक दिन जब मैने थोड़ी उज्जडता दिखाते हुए अपनी बाँह कंधे की बजाए उसकी कमर के गिर्द लपेटकर उसको अपने सामने खींचा तो वो मेरे सामने आ गयी और मैने अपनी दूसरी बाँह भी उसकी कमर में डाल कर कर उसके पेट पर अपने हाथों को बाँध दिया और उसे पीछे से आलिंगन में लिए ऐसे ही खड़ा रहा. उसने अपने हाथ मेरे हाथों पर रख दिए और अपने बदन को थोड़ा पीछे को झुकाया तो उसके कंधे मेरे सीने से लग गये. कंधो से नीचे उसका पूरा जिस्म मेरे जिस्म से थोड़ा सा दूर था. मैं ऐसे ही उसके पेट पर हाथ बाँधे उसे लेकर कुछ समय तक खड़ा रहा और फिर उसे छोड़ते हुए कहा कि अब हमे घर चलना चाहिए, अंधेरा हो रहा था.

उसे मालूम था या नही मालूम था, उसे अहसास हुआ था या नही हुआ था, मगर मैने हमारे बीच आत्मीयता बढ़ाने की, रिश्ते मैं खुलापन लाने की कोशिस की थी और उसने अपनी सहमति जताई थी.

मैने वोही कोशिस अगले दिन और आने वाले कई दिनो तक जारी रखी जिसका नतीजा पहले दिन जैसा ही था. उसकी कमर में बाहें डाले, उसके पेट पर हाथ बाँधे में उसके साथ खड़ा होता और वो अपनी कमर पीछे को झुकाए अपने कंधे मेरे सीने पर टिका देती, उसका सर मेरे बाएँ कंधे पर आराम करता और उसके लंबे बाल मेरे गालों पर खेलते मगर वो भी इत्तेफ़ाक़न ही होता.

धीरे धीरे लगातार उसकी कमर और मेरे जिस्म के बीच का फासला कम होने लगा और एक दिन आख़िरकार मैं उसे अपनी बाहों में लेकर खड़ा था और उसकी पीठ मेरे बदन से स्पर्श कर रही थी. जहाँ तक कयि बार उसके चुतड भी मेरी जाँघो से सटे होते.

माँ और मैं सारा दिन साथ साथ काम करते, जानवरों की देखभाल करना, फसलों से खर पतवार निकालना, खाद डालना, बारिश के पानी को ज़रूरत के हिसाब से फसल में पहुँचाना और बाकी के काम या यूँ कहिए भूमि के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक हम सारा काम इकट्ठे करते. यहाँ तक कि हम दोनो ने मिलकर गाय का प्रसव करवाया और एक नई बछिया के जनम से हमारा पशु धन फिर से बढ़ने लगा. हम मिलकर गाय का दूध दोहते. धीरे धीरे हमने बछिया को दूध पिलाना कम कर दिया, दूध बस घर के गुज़ारे लायक ही होता इसलिए हमने उसे बेचने के बारे में सोचा भी नही.

हम दोनो अब एक जोड़े की तरह मिलकर काम करते थे. वो मेरी औरत थी और मैं उसका मरद, कम से कम मेरी सोच तो ऐसी ही थी. हम दोनो एक दूसरे की हल्की फुल्की चोटों का इलाज करते क्यॉंके किसानी जीवन बहुत कठोर होता है इसलिए कुछ चोटें लगना स्वाभाविक ही था. एक के बदन में किसी अंग में दर्द होता या किसी मांसपेशी में खींचाव होता तो दूसरा मालिश करके उसका दर्द कम करने में मदद करता. इस सबसे हमारी घनिष्टता, हमारी आत्मीयता इतनी प्रगाढ़ हो गयी थी कि अगर कभी कभार हमारे बीच कोई ऐसा संपर्क बन जाता जो आम हालातों में माँ बेटे के बीच अनुचित माना जाता तो हम उसकी परवाह किए बगैर फिर से अपने काम इन जुट जाते.

 


मुझे इस बात का अहसास ही नही था कि हम दोनो एक दूसरे के साथ कितना खुल गये थे. एक दिन जब मकयि की फसल पूरी तैयार हो गयी थी और भुट्टे सूखने सुरू हो गये थे तो मेरा दिल में एक विचार आया और मैं मकयि के खेत के बीचो बीच जाकर लेट गया, मैं बस सफलता के अहसास को महसूस करना चाहता था. मेरे गायब होने के काफ़ी समय बाद मा मुझे ढूँढते हुए मेरे पीछे पीछे वहाँ आ गयी और मुझे लेता देख वो भी मेरे साथ ही लेट गयी. हम दोनो लंबे समय तक वहाँ साथ साथ लेटे हुए फसल काटने, संभालने और बेचने की योजनाएँ बना रहे थे. हम वहाँ कुछ एक घंटे लेटे रहे और उतने समय में लेटने से, करवटें बदलने से हमारी पीठें और बाल धूल से भर गये थे. आख़िर मे जब हमने उठने और बाकी के काम निपटने का फ़ैसला किया तो माँ ने मेरी पीठ मिट्टी और सूखे पत्तों से भरी देखी तो उसे सॉफ करने लगी. उसे काफ़ी समय लगा मेरी कमीज़, पेंट और बालों से मिट्टी निकालने में. और पेंट से धूल निकालते समय उसको मेरे चुतड़ों को झाड़ना था ता कि पेंट से धूल निकल सके जिसे करने मे उसने लेश मात्र भी हिचकिचाहट नही दिखाई. उसके हाथ मेरे चुतड़ों पर घूमते हुए मुझे बहुत आनंदित कर रहे थे और मैं अपने जंघीए मैं थोड़ी हलचल महसूस कर रहा था. एक बार जब उसका काम निपट गया तो उसने मेरी और अपनी पीठ घुमाई और बोली,

"अब तुम्हारी वारी है. देखना अच्छे से सॉफ करना. मैं नही चाहती गाँव वाले सोचे हम दोनो खेतों में काम करने की बजाए एक दूसरे का काम कर रहे थे"

उसने वो बोल भोलेपन से कहे थे और उनमे उन शब्दों का मतलब क्या हो सकता है या क्या निकाला जा सकता था ये सोच विचार नही था मगर उन लफ़्ज़ों को सुन मेरा दिल ज़ोरों से धड़क उठा. पहले तो मेरे मन मे एक तस्वीर उभरी जिसमे मेरी माँ मकयि के खेत के बीचो बीच लेटी हुई थी और मैं उसके उपर चढ़ा हुआ था. मेने खुद को अपनी माँ की चूत मे गहराई तक कस कस कर धक्के लगाते हुए कल्पना की, मेरे धक्कों से मिट्टी मेने उसके मचलते, तड़फटे जिस्म की कल्पना की. उन कल्पनाओं से, उन ख़यालों से पहले से कड़े हो रहे मेरे लंड में हाइ वोल्टेज करेंट सा दौड़ने लगा जिससे वो और भी कड़ा होने लगा. और जब मेरे हाथ उसकी पीठ पर धूल साफ करने का काम रहे थे तो वो करेंट और भी तेज़ होता जा रहा था. सर के बालों से सुरू होकर नीचे आते हुए गर्दन पर, कंधो पर, कमर पर, उसकी टाँगो पर और अंत में उसकी गान्ड पर मेरे हाथ धूल सॉफ करने के बहाने उस मनमोहक, कामुक देह का आनंद ले रहे थे. मेरे हाथ बुरी तरह कांप रहे थे जब मैं उसके नरम, कोमल कुल्हों से धूल सॉफ कर रहा था. उसके पिछवाड़े का स्पर्श बहुत सुखद और आनंदमयी था और मैने स्थिति का लाभ उठाते हुए उसके कुल्हों से मिट्टी झाड़ने के बहाने उसके कुल्हों को सहलाना सुरू कर दिया ख़ासकर दोनो कुल्हों के बीच के हिस्से पर मेरे हाथ बहुत कोमलता से घूम रहे थे. मुझे यह देखने के लिए कि मिट्टी कहीं रह तो नही गयी है नीचे झुकना पड़ा, एक तरह से यह अच्छा था क्योंकि मैं अब अपने पूरे खड़े लंड को अपनी जाँघो के बीच दबाकर छुपा सकता था. मगर जब उसने देखा कि उसके कुल्हों से धूल सॉफ करने के लिए मैं ज़रूरत से कहीं ज़्यादा समय ले रहा हूँ तो उसने कंधे के उपर से सर घूमाकर मेरी ओर देखा कि मैं क्या कर रहा हूँ. मैने जल्दी से थोड़ा बहुत हाथ उसकी टाँगो पर चलाया और उसे बताया कि धूल पूरी सॉफ हो गयी है. वो मेरी और मूडी और उठने मे मेरी मदद करने के लिए मेरी ओर अपना हाथ बढ़ाया. मगर मैं उठना नही चाहता था क्यॉंके उस समय मेरी पेंट मेरे कठोर लंड की वजह से आगे से पूरी फूली हुई थी. मगर ना चाहते हुए भी मुझे उठना पड़ा क्योंकि नीचे बैठे रहने का मेरे पास कोई बहाना नही था. मालूम नही उसका ध्यान मेरे खड़े लंड पर गया या नही गया मगर मेरे घुटनो पर लगी धूल पर उसका ध्यान चला गया जो मेरे नीचे बैठने के कारण लग गयी थी. वो मेरे घुटनो को सॉफ करने के लिए झुकी और ऐसा करने से उसका सर मेरे लंड के एकदम सामने आ गया. घुटनो से धूल सॉफ करने के पश्चात उसने सर उठाकर मेरी ओर देखा तो उसके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान थी, मगर जब उसकी नज़र पेंट में स्टील की रोड की तरह अकडे और उठक बैठक कर रहे मेरे लंड से टकराई तो उसकी मुस्कान उसके होंटो से एकम से गायब हो गयी.

माँ के चेहरे का रंग उड़ गया और वो तेज़ी से दूसरी ओर घूम गयी. वो मकयि के खेत से निकल जल्दी जल्दी मुझसे दूर भाग गयी. मैं कह नही सकता था कि वो घबरा गयी है या शर्मिंदा है मगर मैने इतना ज़रूर देखा था कि बाकी पूरा दिन वो जब भी मेरे नज़दीक आती या जब भी मैं उसके पास जाता तो वो अपनी आँखे फेर लेती थी. उसके रवैये में किसी बढ़ाव की बात उस समय पक्की हो गयी जब वो उस दिन शाम को टीले पर भी नही आई जो हमारी दिनचर्या का अटूट हिस्सा बन चुकी थी.

असलियत मैं हमारा टीले पर बैठ कर हर रोज शाम को होने वाला सर्वेक्षण पूरी तरह से बंद हो गया था. हम अब भी इकट्ठे काम करते थे मगर फिर भी हमारे व्यबहार में या यूँ कहिए उसके व्यबहार में फरक आ गया था. और कारण मुझे समझ नही आ रहा था. वैसे तो उसे इतना तो मालूम था ही कि मेरे पास एक लंड भी है. और उसके खड़े होने से ऐसा क्या पहाड़ टूट पड़ा था जिससे उसका रवैया एकदम से इतना बदल गया था.?

इस सवाल का जबाब मुझे भारी मूसलाधार बरसात के आने से मिला. जैसा हमारे कभी कभार होता था, यकायक बादल फट पड़ते थे और इतनी ज़ोरदार बारिश होती थी कि उसमे कुछ भी करना नामुमकिन होता. एक दिन दोपहर को एसी ही बरसात आई और हम दोनो उसमे फस गये. जब तक हम जानवरों को उनके बाडे में पहुँचाते हुए हम पूरी तरह से भीग चुके थे, हमारे कपड़े कीचड़ से भर गये थे. हमारे पास अब कपड़े उतारने के सिवा और कोई चारा नही था. इतनी तेज़ बरसात और तूफ़ानी हवा में गीले कपड़े पहने रहना निमोनिया को बुलावा देने जैसा था. मैने माँ को कंबल दिया और बिना कुछ बोले मकयि के खेत की ओर चल दिया. माँ को कुछ बोलने की ज़रूरत नही थी वो खुद समझ सकती थी मैने उसे कंबल क्यों पकड़ाया था. मैने जल्द से जल्द मकयि के खेत से आठ दस भुट्टे तोड़े और वापस शेड की ओर चल दिया. माँ ने कंबल ओढ़ा हुआ था और एक तार पर अपने कपड़े बरसात के पानी से धोकर डाल रही थी. मैने भी कपड़े उतार चादर ओढ़ ली और उन्हे थोड़ा बहुत बरसात के पानी से सॉफ कर दिया. उसके बाद शेड में रखी हुई सुखी लकड़ी से आग जलाई और अपने और माँ के कपड़े आग के पास एक लकड़ी पर रख दिए ताकि आग की गर्मी से सुख जाएँ. मैने खाने के लिए आग पर चार पाँच भुट्टे भुन लिए.

माँ कंबल ओढ़े फोल्डिंग बेड पर बैठी थी. जब मैं भुट्टे सेंक रहा था और कपड़े सूखा रहा था तो मैने उसे बेड से उठकर खिड़की के पास जाते देखा, खिड़की में खड़ी वो बाहर खेतों की ओर देख रही थी. वहाँ खड़ी वो बहुत समय से बाहर देख रही थी. उसकी मुद्रा एन कुछ ऐसा था जिसे देखकर मुझे लगा कि वो बाहर खेतों को नही बल्कि बहुत दूर किसी और समय को किसी और स्थान को देख रही थी. मैं एक भुना हुआ भुट्टा लेकर उसके पास गया और उसके पीछे खड़ा होकर वो क्या देख रही है, देखने की चेस्टा करने लगा. वहाँ खड़े हम दोनो चुपचाप भुट्टा खा रहे थे जब उसने लंबे इंतज़ार के बाद अपनी चुप्पी तोड़ी.

"मुझे एसी बारिश बहुत अच्छी लगती है" वो धीरे से बुदबुदाई थी.

मुझे उसका मतलब नही समझ में आया क्यॉंके इतनी तेज़ बरसात फसल के लिए अच्छी नही थी, हमारे खेतों में पानी ही पानी हो गया था.

"जिस तरह यह बारिश हो रही है हम वास्तव में बाकी पूरी दुनिया से कट गये हैं" वो फिर से धीरे से बोली " कितनी शांति है यहाँ. कितना सुकून है इस बात में कि यहाँ तुम बिल्कुल अकेले हो, कि कोई भी तुम्हारी शांति भंग करने यहाँ नही आ सकता, कि कोई भी यह नही जान सकता कि तुम क्या कर रहे हो. यहाँ सिरफ़ तुम और तुम हो; और कोई नही"

वो मुझसे ज़्यादा खुद से बात कर रही थी क्योंकि उसके वाक्यों में मेरा कोई सन्दर्भ नही था.

"मैं हमेशा से ऐसे तेज़ ग़रज़ने, बरसने वाले तूफान के बारे में सोचती थी. मैं हमेशा से चाहती थी कि कोई ऐसा तूफान सा आए और कयि दिनो तक यू ही चलता रहे ताकि मैं इससे होने वाली तन्हाई को महसूस कर सकूँ. ज़रा सोचो; कोई भी नही जानता हो कि तुम कहाँ हो, क्या कर रहे हो, तुम्हारे साथ क्या हो रहा है. तूफान चलने तक तुम बिल्कुल गुमनाम हो जाओगे!"

 
प्यारे बंधुओ आज का अपडेट दे दिया है
 
धन्यवाद बंधुओ अपडेट अगली ही पोस्ट मे
 
Back
Top