"लगे रह बहनचोद! रगड़ मेरी चूत !"
कामुक किशोरी सोनिया से अब तड़प सही नहीं जाती थी।
आनन्द के शिखर के करीब पहुंच चुकी थी।
| भाई भी अब शिखर से दूर न था।
एक तरफ़ बहन की चूत मे हो अपनी उंगली और
दूसरी तरफ़ बहन के हाथ मे ऐंठता लन्ड।
ऐसे मे सब्र का बाँध कैसे न टूटता।
एक बार तो मन में खयाल आया कि दे घुसा दू चूत मे लन्ड।
पर वर्जित सैक्स की इस हद को पार करने की हिम्मत अभी उसकी नहीं हुई थी।
जय! रुका नहीं जाता, अब बस झड़ने वाली हूँ मैं"
राक्षसी जैसे झुमते हुई भाई के लन्ड
को खेंचती और उसकी पूरी लम्बाई पर उंगलियां मसलती हुई चीखी।
"मैं भी! मैं भी! क्या मुठ मारती है मेरी लाडली बहन !"
वीर्य को अपने टटतों में खौलता महसूस कर
अब जय का हाथ भट्टी की तरह बहन की टपकती चूत पर चल रहा था।
"जय भैया! चोदो मुझे! उंगलियों से चोदो! लन्ड से चोदो! ओ ओ ओ ओ! मैया रे ! बापू रे! मैं तो चुदी !"
सोनिया आनंद के शिखर पर पहुंच चुकी थी
और उसने दाँतों से होंठ दबा कर चीख को दबाया।
सैक्स के अलौकिक सुख की लहरें उसके सुलगते बदन को बहाए ले जाती थीं।
जय तो अपने ही जिस्म मे फूटते ज्वालामुखी में इतना मगन था,
बहन की तड़पति आहों को क्या सुनता।
उसका लन्ड दुलत्ती मारते गधे की तरह बहन के हाथ मे झटके मार रहा था।
दो पल में ही उसके वीर्य की मोटी धार उसके लन्ड से फूट कर सोनिया के
पेट पर पिच्कारी की तरह फाच - फाच - आधा दर्जन बार गाढ़े गरम वीर्या की बौछार हुई।
सैक्स - सटुष्टी की प्रबल लहरें थमने तक सोनिया ने अपने हाथों से लन्ड को खेंचना चालू रखा था।
थमने के बाद उसके जिस्म में सुख की मन्द-मन्द मिठास फैलने लगी।
अपने पेट से गरम चिपचिपे वीर्य को बह कर चत से रिसते उसके मादा
दुवों से घलते-मिलते वो देख रही थी।
अपने जिस्म में शांत होती काम - लहरों के दर्मयान जय ने लपक कर
बहन को अपने मजबूत सीने से लगा लिया।
कमाल की बात थी कि वीर्य की नदियां बहा देने पर भी उसक लन्ड खास सख्त था।
लन्ड का सिरा अब सोनिया की चूत पर दस्तक देने लगा।
सोनिया की कंपकंपाती उंगलियां अब भी उसके मोटे लन्ड पर लिपटी हुई थीं।
सैक्स पृथ्वी के हर प्राणी की प्रकृति में है।
तो सोनिया का अपने भाई के लन्ड को पकड़ कर चूत के होंठों पर
छुआना उसी मासूम प्रकृति का अलौकिक नतीजा था।
नरम चूत के अचानक स्पर्ष से दोनों काम- पुजारी अनयास ही रोमंच से कराह पड़े।
जय के अन्दर वासना का साँप फिर फ़न उठा रहा था।
बहन- वहन गई भाड़ में। चुदना वो भी चाहती है,
तो क्यों न चोदू सोनिया को।
पता था - भूखे लन्ड को कोई और चूत तो मिलने नहीं वाली।
फिर घुमते रहना शहर में लटकाते हुए।
जय अपनी मन की बात पूरी करने ही वला था की अचानक
बाथरूम के दरवाजे पर खटखटाहट ने दोनों की सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी।
"बच्चों जल्दी आओ! नाश्ता तैयार है!" बाहर मम्मी पुकार रही थी।
दोनो फ़ौरन ठिठक कर अलग-अलग खड़े हो गए।
जय ने फटाफट पजामा पहना और बाहर निकल आया।
सोनिया ने पानी के नल खोल कर नहाना फिर शुरू कर दिया।
अपने भैया के जमे हुए वीर्य को धोते हुए उसके होंठों पर शैतानी मुस्कान थीरक रही थी।
अब आया है लाईफ़ में ट्विस्ट !
कामुक किशोरी सोनिया से अब तड़प सही नहीं जाती थी।
आनन्द के शिखर के करीब पहुंच चुकी थी।
| भाई भी अब शिखर से दूर न था।
एक तरफ़ बहन की चूत मे हो अपनी उंगली और
दूसरी तरफ़ बहन के हाथ मे ऐंठता लन्ड।
ऐसे मे सब्र का बाँध कैसे न टूटता।
एक बार तो मन में खयाल आया कि दे घुसा दू चूत मे लन्ड।
पर वर्जित सैक्स की इस हद को पार करने की हिम्मत अभी उसकी नहीं हुई थी।
जय! रुका नहीं जाता, अब बस झड़ने वाली हूँ मैं"
राक्षसी जैसे झुमते हुई भाई के लन्ड
को खेंचती और उसकी पूरी लम्बाई पर उंगलियां मसलती हुई चीखी।
"मैं भी! मैं भी! क्या मुठ मारती है मेरी लाडली बहन !"
वीर्य को अपने टटतों में खौलता महसूस कर
अब जय का हाथ भट्टी की तरह बहन की टपकती चूत पर चल रहा था।
"जय भैया! चोदो मुझे! उंगलियों से चोदो! लन्ड से चोदो! ओ ओ ओ ओ! मैया रे ! बापू रे! मैं तो चुदी !"
सोनिया आनंद के शिखर पर पहुंच चुकी थी
और उसने दाँतों से होंठ दबा कर चीख को दबाया।
सैक्स के अलौकिक सुख की लहरें उसके सुलगते बदन को बहाए ले जाती थीं।
जय तो अपने ही जिस्म मे फूटते ज्वालामुखी में इतना मगन था,
बहन की तड़पति आहों को क्या सुनता।
उसका लन्ड दुलत्ती मारते गधे की तरह बहन के हाथ मे झटके मार रहा था।
दो पल में ही उसके वीर्य की मोटी धार उसके लन्ड से फूट कर सोनिया के
पेट पर पिच्कारी की तरह फाच - फाच - आधा दर्जन बार गाढ़े गरम वीर्या की बौछार हुई।
सैक्स - सटुष्टी की प्रबल लहरें थमने तक सोनिया ने अपने हाथों से लन्ड को खेंचना चालू रखा था।
थमने के बाद उसके जिस्म में सुख की मन्द-मन्द मिठास फैलने लगी।
अपने पेट से गरम चिपचिपे वीर्य को बह कर चत से रिसते उसके मादा
दुवों से घलते-मिलते वो देख रही थी।
अपने जिस्म में शांत होती काम - लहरों के दर्मयान जय ने लपक कर
बहन को अपने मजबूत सीने से लगा लिया।
कमाल की बात थी कि वीर्य की नदियां बहा देने पर भी उसक लन्ड खास सख्त था।
लन्ड का सिरा अब सोनिया की चूत पर दस्तक देने लगा।
सोनिया की कंपकंपाती उंगलियां अब भी उसके मोटे लन्ड पर लिपटी हुई थीं।
सैक्स पृथ्वी के हर प्राणी की प्रकृति में है।
तो सोनिया का अपने भाई के लन्ड को पकड़ कर चूत के होंठों पर
छुआना उसी मासूम प्रकृति का अलौकिक नतीजा था।
नरम चूत के अचानक स्पर्ष से दोनों काम- पुजारी अनयास ही रोमंच से कराह पड़े।
जय के अन्दर वासना का साँप फिर फ़न उठा रहा था।
बहन- वहन गई भाड़ में। चुदना वो भी चाहती है,
तो क्यों न चोदू सोनिया को।
पता था - भूखे लन्ड को कोई और चूत तो मिलने नहीं वाली।
फिर घुमते रहना शहर में लटकाते हुए।
जय अपनी मन की बात पूरी करने ही वला था की अचानक
बाथरूम के दरवाजे पर खटखटाहट ने दोनों की सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी।
"बच्चों जल्दी आओ! नाश्ता तैयार है!" बाहर मम्मी पुकार रही थी।
दोनो फ़ौरन ठिठक कर अलग-अलग खड़े हो गए।
जय ने फटाफट पजामा पहना और बाहर निकल आया।
सोनिया ने पानी के नल खोल कर नहाना फिर शुरू कर दिया।
अपने भैया के जमे हुए वीर्य को धोते हुए उसके होंठों पर शैतानी मुस्कान थीरक रही थी।
अब आया है लाईफ़ में ट्विस्ट !