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अंकित के होश उड़े हुए थे ,,जिस तरह का नजारा उसने अपनी आंखों से देखा था उसे तरह का नजारा तो वह कई बार देख चुका था लेकिन इस बार के नजारे में एक अद्भुत आकर्षण था मादकता भरी हुई थी,,, एक निमंत्रण भी था जिसे अंकित समझ नहीं पाया था बस ललचाया आंखों से उसे नजारे का रसपान अपनी आंखों से करता रहा जबकि अगर वह इशारे को समझ पाता तो शायद आंखों से ज्यादा होठों से रसपान कर पाता लेकिन शायद उसकी किस्मत में अभी इतना मदहोश कर देने वाला सुख नहीं लिखा था,,,,।
घर के पीछे का नजारा इतना उत्तेजक हो जाएगा इसका अंदाजा अंकित को बिल्कुल भी नहीं था,,, अंकित की हालत पल-पल खराब होती जा रही थी,,,,, रात को तो वह अपनी मां का खूबसूरत पिछवाड़ा और उसकी मुस्कान देख कर पूरी तरह से अपने जवान को पिघला कर सो गया था,,, लेकिन सुबह-सुबह भी उसकी हालत पूरी तरह से खराब थी सुबह जब वह अपने बिस्तर पर से उठा तब भी उसका लंड पूरी तरह से अपनी अकड़ दिखा रहा था मानो के जैसे अंकित को कह रहा हो कि,,, तेरी वजह से सब कुछ हो रहा है तुझे जब औरतों का इशारा समझ में नहीं आता तो क्यों उनके पीछे पड़ता है,,, रात को इतना अच्छा मौका था पीछे-पीछे अगर चला गया होता तो तेरा क्या बिगड़ जाता मेरी तो हालात सुधर जाती एक खूबसूरत बुर में जाकर मैं भी डुबकी लगा लेता,,, तो मुझे इस समय झेलना नहीं पड़ता चल अब बाथरूम चल बस वही एक ठिकाना तेरा रह गया है अपनी हवस मिटाने का,,,,,।
अंकित हैरान था अपने लंड की अंगड़ाई को देखकर वह जानता था कि इसका इलाज किए बिना अब वह मानने वाला नहीं है इसलिए वह धीरे से अपनी बिस्तर पर से उठा और बाथरूम में चला गया और बाथरूम में जाते ही अपने सारे वस्त्र उतार कर निर्वस्त्र हो गया पूरी तरह से नंगा और दीवार पर दोनों हाथ दिखाकर अपनी दोनों टांगों के बीच खड़े अपने हथियार को देखने लगा जो कि आज कुछ ज्यादा ही मोटा और लंबा लग रहा था,,, अंकित को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें रात को जो कुछ भी हुआ वह उसकी समझ के बिल्कुल पड़े था हालांकि ऐसा नजारा हुआ पहले भी देख चुका था लेकिन अब वह सोचने पर मजबूर हो गया था कि उसकी मां जानबूझकर उसे इशारा तो नहीं कर रही है वरना पेशाब करने के लिए जब वह घर के पीछे जा रही थी तो उसकी तरफ देखने की क्या जरूरत थी उसकी तरफ देखकर मुस्कुराने की क्या जरूरत थी,,,,,।
अपनी मां की इस हरकत को देखकर उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मां क्या चाहती है सब कुछ जानबूझकर हो रहा था या अपने आप ही सब कुछ होते जा रहा था और ना चाहते हुए भी अंकित उठकर घर के पीछे की तरफ जाकर उसी जगह पर खड़ा हो गया जहां पर वहां पहले भी खड़ा होकर अपनी मां के पिछवाड़ा के दर्शन करके धन्यवाद ऐसा लग रहा था कि उसका इंतजार कर रही थी क्योंकि उसकी मां के जाने के बाद तकरीबन तीन-चार मिनट बाद में उठकर वहां गया था अगर सच में उसकी मां वहां पेशाब करने ही गई होती तो शायद वह तब तक पेशाब करने के लिए नीचे बैठ गई होती लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था अंकित जब वहां पहुंचा तब भी उसकी मां खड़ी थी और धीरे-धीरे अपनी साड़ी को ऊपर की तरफ उठा रही थी बिल्कुल भी सहज नहीं था इसने बिल्कुल भी औपचारिकता नहीं थी जिस तरह से सामान्य तौर पर औरतें पेशाब करने के लिए अपनी साड़ी झट से कमर तक उठाकर बैठ जाती है ऐसा कुछ भी नहीं था,,, यही सब सोच कर तो अंकित का दिमाग पूरी तरह से खराब हुआ जा रहा था वह सोचने पर मजबूर हुआ जा रहा था कि आखिरकार उसकी मां चाहती क्या है,,,?
अंकित के दिमाग में बार-बार यही सब सवाल घूम रहा था कि उसके पहुंचने के बाद ही उसकी मां अपनी साड़ी को क्यों ऊपर उठाना शुरू की और वह भी धीरे-धीरे मानव के जैसे अपनी जवानी का दर्शन उसे ही करने के लिए वह वहां पर खड़ी हो धीरे-धीरे साड़ी के उठते ही अंकित की हालत किसी तरह से खराब हो रही थी यह शब्दों में बयां करना बड़ा मुश्किल है ऐसा लग रहा था कि जैसे खूबसूरत नाटक की शुरुआत पर्दे के उठने से हो रही हो और देखते ही देखते पूरी तरह से उठकर कमर तक आ गया था जिसे सुगंधा की नंगी बड़ी-बड़ी गांड एकदम से चांदनी रात में चमकने लगी थी इस नजारे को देखकर अंकित का हाथ खुद को खुद उसके लंड पर आ गया था और फिर वह पेशाब करने बैठ गई थी,,,,, यह सब बिल्कुल भी सामान्य नहीं था अंकित को हमेशा लग रहा था क्योंकि थोड़ी ही देर में उसकी मां अपनी नजर घुमा कर उसकी तरफ देखने लगी थी अगर सामान्य होता तो उसकी मां को कहां पता था कि उसके पीछे-पीछे अंकित भी आया है उसके नंगे पन का दर्शन करने के लिए,,,।
यह सोचकर तो उसका दिमाग पूरी तरह से झन्नाने लगा,,,, और वह सोचने लगा कि उसकी मां को मालूम था कि वह पीछे-पीछे आएगी तभी तो मुस्कुरा कर उसकी तरफ देखी थी और इस समय पेशाब करते समय भी उसे ही देख रही थी दोनों की आपस में नजर भी टकरा गई थी अगर सामान्य होता तो उसकी मां शर्मा जाति और अपनी नजर को नीचे कर लेती अपना मुंह घुमा लेती लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था ऐसा लग रहा था कि वह खुद यह सब जानबूझकर दिख रही है और फिर उसके बाद बिना कुछ बोले उसके पास से गुजर जाना और वह भी उसकी आंखों में आंखें डालकर मुस्कुराते हुए यह सब क्या था यह सब कुछ समझ में नहीं आ रहा था,,,, यह सब याद करके अंकित बाथरूम में पूरी तरह से उत्तेजना के सागर में डुबकी लगाने को तैयार हो गया था,,,।
अंकित अभी औरतों को ठीक तरह से समझ नहीं पाया था बस उनके अंगों की झलक उनका मुस्कुराना उनकी मादक अदा बस यही सब पर वह फिदा था लेकिन उनके इशारों को उनके व्यवहार को अभी तक समझ नहीं पाया था अगर समझ पाता तो शायद वह अपनी मां के पीछे-पीछे कमरे में चला जाता है और फिर रात भर अपनी मां के साथ-साथ अपनी जवानी की प्यास बुझा कर ही बाहर लौटता,,, लेकिन नादान अंकित अपनी मां के इशारों को नहीं समझ पाया था यह नहीं समझ पाया था कि जितना वह अपनी मां को पाने के लिए तरस रहा है उससे ज्यादा उसकी मां उसके साथ एकाकार होने के लिए तड़प रही है,,, ।
यही सब सोचता हुआ अंकित अपने लोहे से भी ज्यादा कड़क लंड को अपनी मुट्ठी में भर लिया और मूठ मारना शुरू कर दिया,, और वह भी रात की ही कल्पना करते हुए कि जब उसकी मां उसके पास से मुस्कुराते हुए गुजर रही थी तब वह अपनी मां का हाथ थाम लिया था और वह अपनी मां के पीछे-पीछे उसके कमरे तक पहुंच गया था और कमरे में जाते ही खुद अपने हाथों से दरवाजा बंद कर दिया था एक नई रात की शुरुआत के लिए अपनी जवानी की प्यास बुझाने के लिए अपनी मां को संतुष्ट करने के लिए वह उसे अपनी बाहों में भर लिया था,,,,।
जैसे-जैसे उसका हाथ आगे पीछे हो रहा था वैसे-वैसे उसकी कल्पना भी अग्रसर होती जा रही थी वह कल्पना में अपनी मां के कंधों को पड़कर उसे दूसरी तरफ घुमा दिया था और उसे पीछे से पड़कर अपनी बाहों में भर लिया था और उसकी चूचियों को दोनों हाथ से दबाते हुए उसके पिछवाड़े पर अपने लंड पर रगड़ रहा था जो कि अभी भी पजामे के अंदर था और उसकी मां की गांड साड़ी के लिबास में छिपी हुई थी,,, अब उसकी कल्पना बड़ी तेजी से आगे बढ़ने लगी और अपनी आंखों को बंद करके मुठ मारते हुए अपने मन में कल्पना करने लगा कि कमरे के अंदर उसकी मां उससे क्या कह रही है,,,,।
क्या रे मेरा इशारा समझने में ईतनी देर क्यों कर दिया,,,
इशारे में समझता था लेकिन मुझे डर लगता था कहीं कुछ गड़बड़ हो गया तो,,,,(चूचियों को जोर-जोर से दबाते हुए)
कैसी गड़बड़,,,,
यही की कही तुम एन मौके पर पीछे हट जाओ तो,,,
तुझे लगता है मैं पीछे हटने वाली हूं मेरी बुर में आग लगी हुई है जो कि तेरे लंड से ही बुझेगी,,,, तुझे तो पहले ही मेरी जवानी की प्यास बुझा देना चाहिए था महीनो से तु तड़पा रहा है मुझे,,,,।
जितनी ज्यादा तड़प होगी मजा उतना ही आएगा,,,(और ऐसा कहने के साथ ही धीरे-धीरे अपने हाथों से ब्लाउज का बटन खोलने लगा और देखते ही देखते ब्लाउज के सारे बटन खोलकर अपनी मां की नंगी चूची को जोर-जोर से दबाना शुरू कर दिया,,,, उसकी हरकत से उसकी मां की सिसकारी की आवाज निकलने लगी,,,)
सहहहहह आहहबबह ऊमममममम,,, अंकित मेरे बेटे मेरी गांड में कुछ चुभ रहा है,,,।
यह और कुछ नहीं मेरा लंड है जो की थोड़ी देर में तुम्हारी बुर में जाने वाला है,,,।
तो जल्दी करना देर किस बात की है,,,,।
बहुत जल्दी है मेरा लंड लेने की,,,,।
तो क्या मुझसे रहा नहीं जा रहा है,,,।
मुझे भी तो कहां रहा जा रहा है,,,,(पर इतना कहने के साथ ही पीछे से अपनी मां की साड़ी को कमर तक उठा दिया और उसकी नंगी गांड देखकर एकदम मदहोश हो गया और दो-चार चपत अपनी मां की गांड पर लगाते हुए बोला,,,)
तेरी गांड देखकर करने ना जाने कितनी बार हिला हिला कर काम चलाया हूं लेकिन आज हीलाऊंगा नहीं बल्कि डालूंगा,,,।
तो डालना ,,,,कि सिर्फ बात ही करता रहेगा,,,।
अब मेरी जुबान नहीं बल्कि जवाब मेरा लंड देगा,,,(और इतना कहने के साथ ही कल्पना में अंकित अपनी मां को झुका कर घोड़ी बना दिया और पीछे से अपनी लैंड को उसके गुलाबी छेद में डालकर कमर हिलाना शुरू कर दिया उसका हाथ बड़ी तेजी से अपने लंड पर घूम रहा था उसकी आंखें बंद थी उसकी कल्पना रंगीन होती जा रही थी,,, कमरे में उसकी मां की शिसकारी की आवाज गुंज रही थी,,, अंकित की कमर बड़ी तेजी से कल्पना में आगे पीछे हो रही थी लेकिन हकीकत में उसका हाथ बड़ी तेजी से चल रहा था और देखते ही देखते उसके लंड से वीर्य का फवारा फूट पड़ा और वह गहरी गहरी सांस लेने लगा,,,।
नहा धोकर अंकित तैयार हो चुका था आज उसे घर पर नहीं रुकना था उसे पढ़ने जाना था क्योंकि दो-तीन दिन के लिए उसकी बहन के कॉलेज में छुट्टी थी,,, और वह दो-तीन दिन तक सुगंधा की सेवा करने वाली थी इस बात से सुगंधा के साथ-साथ अंकित को भी बहुत गुस्सा आया था मन ही मन वह दोनों तृप्ति की बात सुनकर गुस्सा भी हुए थे लेकिन कल कह सकते थे उन दोनों को ऐसा ही था कि दो-तीन दिन इसी तरह से दोनों मजा लेंगे लेकिन सब कुछ तृप्ति ने खराब कर दी थी,,,, नाश्ता करके अंकित घर से बाहर निकल गया था,,,, स्कूल में पहुंचने के बाद भी उसका मन बिल्कुल भी नहीं लग रहा है बार-बार उसकी आंखों के सामने उसकी मां का मुस्कुराना है आंख से आंख मिलाना और मुस्कुराते हुए उसके सामने से गुजर जाना यही सब किसी फिल्म की तरह नजर आ रहा था यह उसकी मां की तरफ से कोई इशारा था या युं ही महज औपचारिकता थी यही अंकित समझ नहीं पा रहा था,,,,।
छुट्टी होने के बाद वह अपने घर नहीं गया बल्कि उसके मन में आया कि चलो राहुल के घर चलते हैं क्योंकि उससे भी मिले काफी दिन हो गया था उसके घर जाकर ही तो उसे पता चला था की मां बेटे के बीच भी अलग प्रकार का रिश्ता होता है हालांकि,,, अंकित ने अभी कुछ अपनी आंखों से देखा नहीं था बस उसके घर पर पहुंचकर जिस तरह का वेशभूषा राहुल की मां का था उसे देखकर ही उसे शंका हो रही थी कि उसके और उसके बेटे के बीच जरूर चल रहा है,,,, कुछ देर इधर-उधर घूमने के बाद वह राहुल के घर की तरफ निकल गया,,,,,,।
थोड़ी देर में वह राहुल के घर पहुंच गया था और दरवाजे पर पहुंच कर बेल बजाने लगा,,, थोड़ी देर में दरवाजा खुला तो दरवाजे को खोलने वाली राहुल की मां थी जो की अंकित को दरवाजे पर खड़ा देकर प्रसन्न मुद्रा में नजर आ रही थी लेकिन अंकित की हालत खराब हो गई थी क्योंकि वह एक गाउन पहनी थी जो उसके घुटने के थोड़ा सा नीचे तक आ रहा था और गांव में से उसकी चूचियां भी एकदम बाहर निकली हुई नजर आ रही थी ना चाहते हुए भी अंकित की नजर नूपुर की छाती पर पहुंच गई थी और अनुभव से भरी हुई नूपुर अंकित के नजरिया को समझ गई थी इसलिए वह अंदर ही अंदर और प्रसन्न हो रही थी बात की शुरुआत नूपुर नहीं की क्योंकि नूपुर की जवानी देखकर अंकित की बोलती बंद हो गई थी,,,।
अरे अंकित तुम बैग भी लिए हो इसका मतलब है कि घर नहीं है सीधा यही आ रहे हो,,,।
जी हां आंटी मैं सोचा राहुल से मिलूं यहीं से गुजर रहा था,,,,।
चलो कोई बात नहीं अच्छा हुआ इसी बहाने मिलने तो आ गए आओ अंदर आओ,,,,।
(नूपुर की बात सुनकर अंकित धीरे से कमरे में प्रवेश कर गया वह घर में अकेली है इस बात की जानकारी होते ही एक अजीब सी उलझन उसके बदन में होने लगी,,,, नूपुर अपने हाथों से दरवाजा बंद कर दी अंकित को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या बोल कैसे बात की शुरुआत करें लेकिन फिर भी वह हिम्मत जुटाकर बोला,,)
कहां गया है राहुल,,,?
वह तो लाइब्रेरी गया है,,,,
कब लौटेगा,,,,
यह तो पता नहीं बेटा लेकिन जब भी लाइब्रेरी जाता है दो-तीन घंटे बाद ही आता है और अभी उस घर से निकले 15 मिनट ही हुआ है 15 मिनट पहले आते तो शायद उससे मुलाकात हो जाती,,,,।
चलो कोई बात नहीं मैं फिर कभी मिलेगा अच्छा तो आंटी में चलता हूं,,,,,(इतना कहने के साथ ही वह जाने के लिए अपना कदम उठाया इधर की नूपुर जल्दी से अपना हाथ आगे बढ़कर उसकी कलाई थाम ली और उसे रोकते हुए बोली,,,।)
अरे यह क्या बात हुई राहुल नहीं है तो उसकी मां से भी नहीं मिलोगे क्या,,,!(मादक मुस्कान बिखरते हुए नूपुर एक मदहोशी भरे अंदाज में राहुल की तरफ देखते हुए बोली राहुल तो उसका ही अंदाज देखकर पूरी तरह से अंदर ही अंदर हिल गया था ऐसा लग रहा था कि मानो जैसे उसका हाथ कोई फिल्म की हीरोइन ने पकड़ रखा है उसकी पकड़ से अंकित के बदन में हलचल हो रही थी,,, पहली बार कोई गैर औरत उसका हाथ जो पकड़ी थी इसीलिए वह एकदम हड़बड़ा भर स्वर में बोला,,,)
मममममम,,, मेरा मतलब यह नहीं था आंटी खामखा में आपको परेशान नहीं करना चाहता,,,,।
अरे इसमें परेशानी की कौन सी बात है तुम यहीं बैठो मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर लाती हूं,,,,,,,(इतना कहकर नूपुर अंकित को कुर्सी पर बिठा दिए और किचन की तरफ जाने लगी लेकिन किचन की तरफ जाते हुए भी वह अपनी चाल को पूरी तरह से बदल दी थी उसकी बड़ी-बड़ी गांड गाऊन में से बाहर निकलने को आतुर नजर आ रही थी,,, जिस पर नजर पड़ते ही अंकित का इमान डोलने लगा और अनुभव से भरी हुई नूपुर अच्छी तरह से जानती थी कि अंकित इस समय क्या देख रहा होगा उसकी नजर उसके कौन से अंक पर होगी और यही निश्चित करने के लिए हुआ है रसोई घर के दरवाजे पर पहुंचकर एकदम से नजर घूमर अंकित की तरफ देखने लगी और अंकित वाकई में उसकी बड़ी-बड़ी गांड को ही खोल रहा था यह देखकर वह एकदम से मारे हो गई अंदर ही अंदर प्रसन्न हो गई और मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखकर बोली,,,,)
अभी लाइ गर्मा गरम चाय,,,,।
घर के पीछे का नजारा इतना उत्तेजक हो जाएगा इसका अंदाजा अंकित को बिल्कुल भी नहीं था,,, अंकित की हालत पल-पल खराब होती जा रही थी,,,,, रात को तो वह अपनी मां का खूबसूरत पिछवाड़ा और उसकी मुस्कान देख कर पूरी तरह से अपने जवान को पिघला कर सो गया था,,, लेकिन सुबह-सुबह भी उसकी हालत पूरी तरह से खराब थी सुबह जब वह अपने बिस्तर पर से उठा तब भी उसका लंड पूरी तरह से अपनी अकड़ दिखा रहा था मानो के जैसे अंकित को कह रहा हो कि,,, तेरी वजह से सब कुछ हो रहा है तुझे जब औरतों का इशारा समझ में नहीं आता तो क्यों उनके पीछे पड़ता है,,, रात को इतना अच्छा मौका था पीछे-पीछे अगर चला गया होता तो तेरा क्या बिगड़ जाता मेरी तो हालात सुधर जाती एक खूबसूरत बुर में जाकर मैं भी डुबकी लगा लेता,,, तो मुझे इस समय झेलना नहीं पड़ता चल अब बाथरूम चल बस वही एक ठिकाना तेरा रह गया है अपनी हवस मिटाने का,,,,,।
अंकित हैरान था अपने लंड की अंगड़ाई को देखकर वह जानता था कि इसका इलाज किए बिना अब वह मानने वाला नहीं है इसलिए वह धीरे से अपनी बिस्तर पर से उठा और बाथरूम में चला गया और बाथरूम में जाते ही अपने सारे वस्त्र उतार कर निर्वस्त्र हो गया पूरी तरह से नंगा और दीवार पर दोनों हाथ दिखाकर अपनी दोनों टांगों के बीच खड़े अपने हथियार को देखने लगा जो कि आज कुछ ज्यादा ही मोटा और लंबा लग रहा था,,, अंकित को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें रात को जो कुछ भी हुआ वह उसकी समझ के बिल्कुल पड़े था हालांकि ऐसा नजारा हुआ पहले भी देख चुका था लेकिन अब वह सोचने पर मजबूर हो गया था कि उसकी मां जानबूझकर उसे इशारा तो नहीं कर रही है वरना पेशाब करने के लिए जब वह घर के पीछे जा रही थी तो उसकी तरफ देखने की क्या जरूरत थी उसकी तरफ देखकर मुस्कुराने की क्या जरूरत थी,,,,,।
अपनी मां की इस हरकत को देखकर उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मां क्या चाहती है सब कुछ जानबूझकर हो रहा था या अपने आप ही सब कुछ होते जा रहा था और ना चाहते हुए भी अंकित उठकर घर के पीछे की तरफ जाकर उसी जगह पर खड़ा हो गया जहां पर वहां पहले भी खड़ा होकर अपनी मां के पिछवाड़ा के दर्शन करके धन्यवाद ऐसा लग रहा था कि उसका इंतजार कर रही थी क्योंकि उसकी मां के जाने के बाद तकरीबन तीन-चार मिनट बाद में उठकर वहां गया था अगर सच में उसकी मां वहां पेशाब करने ही गई होती तो शायद वह तब तक पेशाब करने के लिए नीचे बैठ गई होती लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था अंकित जब वहां पहुंचा तब भी उसकी मां खड़ी थी और धीरे-धीरे अपनी साड़ी को ऊपर की तरफ उठा रही थी बिल्कुल भी सहज नहीं था इसने बिल्कुल भी औपचारिकता नहीं थी जिस तरह से सामान्य तौर पर औरतें पेशाब करने के लिए अपनी साड़ी झट से कमर तक उठाकर बैठ जाती है ऐसा कुछ भी नहीं था,,, यही सब सोच कर तो अंकित का दिमाग पूरी तरह से खराब हुआ जा रहा था वह सोचने पर मजबूर हुआ जा रहा था कि आखिरकार उसकी मां चाहती क्या है,,,?
अंकित के दिमाग में बार-बार यही सब सवाल घूम रहा था कि उसके पहुंचने के बाद ही उसकी मां अपनी साड़ी को क्यों ऊपर उठाना शुरू की और वह भी धीरे-धीरे मानव के जैसे अपनी जवानी का दर्शन उसे ही करने के लिए वह वहां पर खड़ी हो धीरे-धीरे साड़ी के उठते ही अंकित की हालत किसी तरह से खराब हो रही थी यह शब्दों में बयां करना बड़ा मुश्किल है ऐसा लग रहा था कि जैसे खूबसूरत नाटक की शुरुआत पर्दे के उठने से हो रही हो और देखते ही देखते पूरी तरह से उठकर कमर तक आ गया था जिसे सुगंधा की नंगी बड़ी-बड़ी गांड एकदम से चांदनी रात में चमकने लगी थी इस नजारे को देखकर अंकित का हाथ खुद को खुद उसके लंड पर आ गया था और फिर वह पेशाब करने बैठ गई थी,,,,, यह सब बिल्कुल भी सामान्य नहीं था अंकित को हमेशा लग रहा था क्योंकि थोड़ी ही देर में उसकी मां अपनी नजर घुमा कर उसकी तरफ देखने लगी थी अगर सामान्य होता तो उसकी मां को कहां पता था कि उसके पीछे-पीछे अंकित भी आया है उसके नंगे पन का दर्शन करने के लिए,,,।
यह सोचकर तो उसका दिमाग पूरी तरह से झन्नाने लगा,,,, और वह सोचने लगा कि उसकी मां को मालूम था कि वह पीछे-पीछे आएगी तभी तो मुस्कुरा कर उसकी तरफ देखी थी और इस समय पेशाब करते समय भी उसे ही देख रही थी दोनों की आपस में नजर भी टकरा गई थी अगर सामान्य होता तो उसकी मां शर्मा जाति और अपनी नजर को नीचे कर लेती अपना मुंह घुमा लेती लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था ऐसा लग रहा था कि वह खुद यह सब जानबूझकर दिख रही है और फिर उसके बाद बिना कुछ बोले उसके पास से गुजर जाना और वह भी उसकी आंखों में आंखें डालकर मुस्कुराते हुए यह सब क्या था यह सब कुछ समझ में नहीं आ रहा था,,,, यह सब याद करके अंकित बाथरूम में पूरी तरह से उत्तेजना के सागर में डुबकी लगाने को तैयार हो गया था,,,।
अंकित अभी औरतों को ठीक तरह से समझ नहीं पाया था बस उनके अंगों की झलक उनका मुस्कुराना उनकी मादक अदा बस यही सब पर वह फिदा था लेकिन उनके इशारों को उनके व्यवहार को अभी तक समझ नहीं पाया था अगर समझ पाता तो शायद वह अपनी मां के पीछे-पीछे कमरे में चला जाता है और फिर रात भर अपनी मां के साथ-साथ अपनी जवानी की प्यास बुझा कर ही बाहर लौटता,,, लेकिन नादान अंकित अपनी मां के इशारों को नहीं समझ पाया था यह नहीं समझ पाया था कि जितना वह अपनी मां को पाने के लिए तरस रहा है उससे ज्यादा उसकी मां उसके साथ एकाकार होने के लिए तड़प रही है,,, ।
यही सब सोचता हुआ अंकित अपने लोहे से भी ज्यादा कड़क लंड को अपनी मुट्ठी में भर लिया और मूठ मारना शुरू कर दिया,, और वह भी रात की ही कल्पना करते हुए कि जब उसकी मां उसके पास से मुस्कुराते हुए गुजर रही थी तब वह अपनी मां का हाथ थाम लिया था और वह अपनी मां के पीछे-पीछे उसके कमरे तक पहुंच गया था और कमरे में जाते ही खुद अपने हाथों से दरवाजा बंद कर दिया था एक नई रात की शुरुआत के लिए अपनी जवानी की प्यास बुझाने के लिए अपनी मां को संतुष्ट करने के लिए वह उसे अपनी बाहों में भर लिया था,,,,।
जैसे-जैसे उसका हाथ आगे पीछे हो रहा था वैसे-वैसे उसकी कल्पना भी अग्रसर होती जा रही थी वह कल्पना में अपनी मां के कंधों को पड़कर उसे दूसरी तरफ घुमा दिया था और उसे पीछे से पड़कर अपनी बाहों में भर लिया था और उसकी चूचियों को दोनों हाथ से दबाते हुए उसके पिछवाड़े पर अपने लंड पर रगड़ रहा था जो कि अभी भी पजामे के अंदर था और उसकी मां की गांड साड़ी के लिबास में छिपी हुई थी,,, अब उसकी कल्पना बड़ी तेजी से आगे बढ़ने लगी और अपनी आंखों को बंद करके मुठ मारते हुए अपने मन में कल्पना करने लगा कि कमरे के अंदर उसकी मां उससे क्या कह रही है,,,,।
क्या रे मेरा इशारा समझने में ईतनी देर क्यों कर दिया,,,
इशारे में समझता था लेकिन मुझे डर लगता था कहीं कुछ गड़बड़ हो गया तो,,,,(चूचियों को जोर-जोर से दबाते हुए)
कैसी गड़बड़,,,,
यही की कही तुम एन मौके पर पीछे हट जाओ तो,,,
तुझे लगता है मैं पीछे हटने वाली हूं मेरी बुर में आग लगी हुई है जो कि तेरे लंड से ही बुझेगी,,,, तुझे तो पहले ही मेरी जवानी की प्यास बुझा देना चाहिए था महीनो से तु तड़पा रहा है मुझे,,,,।
जितनी ज्यादा तड़प होगी मजा उतना ही आएगा,,,(और ऐसा कहने के साथ ही धीरे-धीरे अपने हाथों से ब्लाउज का बटन खोलने लगा और देखते ही देखते ब्लाउज के सारे बटन खोलकर अपनी मां की नंगी चूची को जोर-जोर से दबाना शुरू कर दिया,,,, उसकी हरकत से उसकी मां की सिसकारी की आवाज निकलने लगी,,,)
सहहहहह आहहबबह ऊमममममम,,, अंकित मेरे बेटे मेरी गांड में कुछ चुभ रहा है,,,।
यह और कुछ नहीं मेरा लंड है जो की थोड़ी देर में तुम्हारी बुर में जाने वाला है,,,।
तो जल्दी करना देर किस बात की है,,,,।
बहुत जल्दी है मेरा लंड लेने की,,,,।
तो क्या मुझसे रहा नहीं जा रहा है,,,।
मुझे भी तो कहां रहा जा रहा है,,,,(पर इतना कहने के साथ ही पीछे से अपनी मां की साड़ी को कमर तक उठा दिया और उसकी नंगी गांड देखकर एकदम मदहोश हो गया और दो-चार चपत अपनी मां की गांड पर लगाते हुए बोला,,,)
तेरी गांड देखकर करने ना जाने कितनी बार हिला हिला कर काम चलाया हूं लेकिन आज हीलाऊंगा नहीं बल्कि डालूंगा,,,।
तो डालना ,,,,कि सिर्फ बात ही करता रहेगा,,,।
अब मेरी जुबान नहीं बल्कि जवाब मेरा लंड देगा,,,(और इतना कहने के साथ ही कल्पना में अंकित अपनी मां को झुका कर घोड़ी बना दिया और पीछे से अपनी लैंड को उसके गुलाबी छेद में डालकर कमर हिलाना शुरू कर दिया उसका हाथ बड़ी तेजी से अपने लंड पर घूम रहा था उसकी आंखें बंद थी उसकी कल्पना रंगीन होती जा रही थी,,, कमरे में उसकी मां की शिसकारी की आवाज गुंज रही थी,,, अंकित की कमर बड़ी तेजी से कल्पना में आगे पीछे हो रही थी लेकिन हकीकत में उसका हाथ बड़ी तेजी से चल रहा था और देखते ही देखते उसके लंड से वीर्य का फवारा फूट पड़ा और वह गहरी गहरी सांस लेने लगा,,,।
नहा धोकर अंकित तैयार हो चुका था आज उसे घर पर नहीं रुकना था उसे पढ़ने जाना था क्योंकि दो-तीन दिन के लिए उसकी बहन के कॉलेज में छुट्टी थी,,, और वह दो-तीन दिन तक सुगंधा की सेवा करने वाली थी इस बात से सुगंधा के साथ-साथ अंकित को भी बहुत गुस्सा आया था मन ही मन वह दोनों तृप्ति की बात सुनकर गुस्सा भी हुए थे लेकिन कल कह सकते थे उन दोनों को ऐसा ही था कि दो-तीन दिन इसी तरह से दोनों मजा लेंगे लेकिन सब कुछ तृप्ति ने खराब कर दी थी,,,, नाश्ता करके अंकित घर से बाहर निकल गया था,,,, स्कूल में पहुंचने के बाद भी उसका मन बिल्कुल भी नहीं लग रहा है बार-बार उसकी आंखों के सामने उसकी मां का मुस्कुराना है आंख से आंख मिलाना और मुस्कुराते हुए उसके सामने से गुजर जाना यही सब किसी फिल्म की तरह नजर आ रहा था यह उसकी मां की तरफ से कोई इशारा था या युं ही महज औपचारिकता थी यही अंकित समझ नहीं पा रहा था,,,,।
छुट्टी होने के बाद वह अपने घर नहीं गया बल्कि उसके मन में आया कि चलो राहुल के घर चलते हैं क्योंकि उससे भी मिले काफी दिन हो गया था उसके घर जाकर ही तो उसे पता चला था की मां बेटे के बीच भी अलग प्रकार का रिश्ता होता है हालांकि,,, अंकित ने अभी कुछ अपनी आंखों से देखा नहीं था बस उसके घर पर पहुंचकर जिस तरह का वेशभूषा राहुल की मां का था उसे देखकर ही उसे शंका हो रही थी कि उसके और उसके बेटे के बीच जरूर चल रहा है,,,, कुछ देर इधर-उधर घूमने के बाद वह राहुल के घर की तरफ निकल गया,,,,,,।
थोड़ी देर में वह राहुल के घर पहुंच गया था और दरवाजे पर पहुंच कर बेल बजाने लगा,,, थोड़ी देर में दरवाजा खुला तो दरवाजे को खोलने वाली राहुल की मां थी जो की अंकित को दरवाजे पर खड़ा देकर प्रसन्न मुद्रा में नजर आ रही थी लेकिन अंकित की हालत खराब हो गई थी क्योंकि वह एक गाउन पहनी थी जो उसके घुटने के थोड़ा सा नीचे तक आ रहा था और गांव में से उसकी चूचियां भी एकदम बाहर निकली हुई नजर आ रही थी ना चाहते हुए भी अंकित की नजर नूपुर की छाती पर पहुंच गई थी और अनुभव से भरी हुई नूपुर अंकित के नजरिया को समझ गई थी इसलिए वह अंदर ही अंदर और प्रसन्न हो रही थी बात की शुरुआत नूपुर नहीं की क्योंकि नूपुर की जवानी देखकर अंकित की बोलती बंद हो गई थी,,,।
अरे अंकित तुम बैग भी लिए हो इसका मतलब है कि घर नहीं है सीधा यही आ रहे हो,,,।
जी हां आंटी मैं सोचा राहुल से मिलूं यहीं से गुजर रहा था,,,,।
चलो कोई बात नहीं अच्छा हुआ इसी बहाने मिलने तो आ गए आओ अंदर आओ,,,,।
(नूपुर की बात सुनकर अंकित धीरे से कमरे में प्रवेश कर गया वह घर में अकेली है इस बात की जानकारी होते ही एक अजीब सी उलझन उसके बदन में होने लगी,,,, नूपुर अपने हाथों से दरवाजा बंद कर दी अंकित को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या बोल कैसे बात की शुरुआत करें लेकिन फिर भी वह हिम्मत जुटाकर बोला,,)
कहां गया है राहुल,,,?
वह तो लाइब्रेरी गया है,,,,
कब लौटेगा,,,,
यह तो पता नहीं बेटा लेकिन जब भी लाइब्रेरी जाता है दो-तीन घंटे बाद ही आता है और अभी उस घर से निकले 15 मिनट ही हुआ है 15 मिनट पहले आते तो शायद उससे मुलाकात हो जाती,,,,।
चलो कोई बात नहीं मैं फिर कभी मिलेगा अच्छा तो आंटी में चलता हूं,,,,,(इतना कहने के साथ ही वह जाने के लिए अपना कदम उठाया इधर की नूपुर जल्दी से अपना हाथ आगे बढ़कर उसकी कलाई थाम ली और उसे रोकते हुए बोली,,,।)
अरे यह क्या बात हुई राहुल नहीं है तो उसकी मां से भी नहीं मिलोगे क्या,,,!(मादक मुस्कान बिखरते हुए नूपुर एक मदहोशी भरे अंदाज में राहुल की तरफ देखते हुए बोली राहुल तो उसका ही अंदाज देखकर पूरी तरह से अंदर ही अंदर हिल गया था ऐसा लग रहा था कि मानो जैसे उसका हाथ कोई फिल्म की हीरोइन ने पकड़ रखा है उसकी पकड़ से अंकित के बदन में हलचल हो रही थी,,, पहली बार कोई गैर औरत उसका हाथ जो पकड़ी थी इसीलिए वह एकदम हड़बड़ा भर स्वर में बोला,,,)
मममममम,,, मेरा मतलब यह नहीं था आंटी खामखा में आपको परेशान नहीं करना चाहता,,,,।
अरे इसमें परेशानी की कौन सी बात है तुम यहीं बैठो मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर लाती हूं,,,,,,,(इतना कहकर नूपुर अंकित को कुर्सी पर बिठा दिए और किचन की तरफ जाने लगी लेकिन किचन की तरफ जाते हुए भी वह अपनी चाल को पूरी तरह से बदल दी थी उसकी बड़ी-बड़ी गांड गाऊन में से बाहर निकलने को आतुर नजर आ रही थी,,, जिस पर नजर पड़ते ही अंकित का इमान डोलने लगा और अनुभव से भरी हुई नूपुर अच्छी तरह से जानती थी कि अंकित इस समय क्या देख रहा होगा उसकी नजर उसके कौन से अंक पर होगी और यही निश्चित करने के लिए हुआ है रसोई घर के दरवाजे पर पहुंचकर एकदम से नजर घूमर अंकित की तरफ देखने लगी और अंकित वाकई में उसकी बड़ी-बड़ी गांड को ही खोल रहा था यह देखकर वह एकदम से मारे हो गई अंदर ही अंदर प्रसन्न हो गई और मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखकर बोली,,,,)
अभी लाइ गर्मा गरम चाय,,,,।