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Incest मर्द का बच्चा

फिर लल्लू वहाँ जो कोई भी सोया हुआ था उसको पीछे से झप्पी डाल कर खुद भी आँखे बंद कर के सोने की कोसिस करने लगा.

सुबह 4 बजे लल्लू की नींद खुली.

वो उठ कर बाहर आ गया ओर चल दिया नदी की और वहाँ जा कर फ्रेश हुआ और वही नदी किनारे बैठ गया.

काफ़ी देर बैठे रहने के बाद लल्लू देखा की उधर लोग आने लगे है तो फिर लल्लू उठ कर घर की ओर चल दिया.

दालान पर आ कर नालका पर पहले हाथ पैर धोया और दालान पर आ जाइ.

दालान पर दादू और सुनील काका बैठे थे.

काका- कहा से आ रहा है लल्लू बेटा.

लल्लू- ऐसे ही सुबह बाहर घूमने गया था काका. कोई काम था क्या.

दादू- हा, आ यहाँ बैठ.

लल्लू जा कर अपने दादू के साथ उन क बेड पर बैठ गया.

दादू- हम कुंभ मेला में स्नान करने जा रहे है.

लल्लू- कब जा रहे है. और कौन कौन जा रहा है.

सुनील- तुम्हारे दादू, बड़े काका और काकी, और में. हम कल जा रहे है.

लल्लू- में भी चलूँगा.

काका- फिर यहाँ घर पर कौन रहेगा.

लल्लू- ये मुझे क्या पता. पापा रहेंगे और छोटे काका रहेगे.

सुनील अपने पिता की और देखने लगे.

दादू- तुम यही रहो बेटा. वहाँ से तुम जो बोलॉगे में ला दूँगा.

लल्लू- नही..नही..नही. में भी जाउन्गा तो जाउन्गा.

लल्लू कूद कर उठ खड़ा हुआ और तमतमाता हुआ वहाँ से आँगन में चला गया.

दादू- अब क्या करे. इसे नही ले जांगे तो ये जब तक याद रहेगा हंगामा खड़ा किए रहेगा.

सुनील- हा ये तो है. ऐसा करते है फिर. आप भैया भाभी और लल्लू चले जाइए.

दादू- ठीक है फिर उसे बोल दे अपना तैयारी कर ले आज ही क्यू की कल सुबह ही निकलना है हमें.

सुनील उठ कर आँगन में चला गया जहा लल्लू खटिया पर लेता था गुस्से में.

सुनील- लल्लू बेटा. ऐसे गुस्सा नही होते. अपना तैयारी कर ले. कल सुबह निकलना है. और अपने दादू और काका काकी का ख़याल रखना. वहाँ भीर बहुत होता है तो थोड़ा संभाल कर जहा.

ऋतु- कहा जाने की बात हो रही है. पता नही कहा से आया है. मूह फुलाए लेता है कब से.

सुनील- अरे भाभी, अभी हम बात कर रहे थे. कल पिता जी कुंभ स्नान करने जा रहे है आप और भैया के साथ तो वही पिताजी लल्लू बेटा से बोले की यहाँ सब का ख़याल रखना. बस फिर वहाँ से गुस्से में भाग आया है. ये भी जाना चाहता है.

ऋतु- ओो बेटा. तुम हमारे साथ चले जाओगे तो फिर यहाँ सब का ख़याल कौन रखेगा.

लल्लू- नही में तो दादू के साथ जाउन्गा. वहाँ उनका ख़याल रखूँगा.

सुनील- ठीक है ठीक है. तुम भी जाना. भाभी आप अपना तैयारी कर लीजिए साथ में भैया और लल्लू का भी कर दीजिएगा. सुबह सुबह ही निकलना पड़ेगा आप लोगो को.

ऋतु- ठीक है.

लल्लू खुशी से खटिया से उठ कर सुनील को गले से लगा लिया.

लल्लू- आप सब से बेस्ट काका हो.

सुनील- हा हा. पता है मुझे. वहाँ सब का ख़याल रखना. किसी को तंग मत करना और इधर उधर कही जाना नही. सब के साथ ही रहना.

लल्लू- बिल्कुल काका. में सब के साथ ही रहूँगा.

यू ही तैयारी में वो दिन बीत गई.

रात में लल्लू खाना खा कर खटिया आँगन में लगा कर सो गया.

सुबह उसे दादू और काका काकी के साथ कुंभ में जाना है तो वहाँ क्या क्या करेगा यही सब सोचते सोचते सो गया.

सुबह हर रोज की तरह 4 बजे उसे नींद खुल गया.

उठ कर नालका पर जा कर पानी पिया और नदी किनारे चला गया.

वहाँ फ्रेश हो कर बैठ गया.

नदी की और से ठंढी ठंढी हवा आ रहा था जो बहुत अच्छा लग रहा था.

आज नदी पर ज़्यादा देर नही रुका और जल्दी ही घर आ गया वहाँ आ कर नाल्ले पर हाथ पैर धोया. फिर दालान पर आ गया.

वहाँ सब बैठे थे. दादू और काका स्नान कर चुके थे और जाने की तैयारी कर रहे थे.

अनिल- जा भाई जल्दी तैयार हो जा. हम सब को निकलना भी है.

लल्लू जल्दी से आँगन गया और जा कर स्नान कर के नया कपड़ा पहन लिया.

मा- देख बेटा. वहाँ जा रहा है तो सब का ख़याल रखना और किसी को तंग मत करना. सब के साथ ही रहना. इधर उधर घूमना नही.

लल्लू- मुझे सब पता है. तुम चिंता मत करो.

कोमल- ओये गधा तू मत जा वहाँ. कही कोई उल्टी हरकत कर दिया तो सब परेशान हो जाएँगे. वो अपना गाँव नही है.

लल्लू- तू वापस क्यू आ गई. कविता के साथ ही चली जाती.( कविता जिस की अभी शादी हुई है.)

कोमल- आहा में चली जाती तो तुम्हारा कान कौन उखाड़ता. (मूह चिढ़ाती कोमल बोली)

मा- अब अभी तुम दोनो लड़ना मत सुरू कर दो.

सुनील- सब तैयर हो गये तो चलो. गाड़ी आ गई है.

फिर लल्लू और ऋतु आँगन से दालान पर आ गये जहा बाहर एक कार खड़ी थी.

लल्लू जा कर कार में आगे बैठ गया.

फिर दादू काका और काकी भी आ गये और कार में बैठ गये. सारा समान पहले ही ला कर सुनील गाड़ी में रख दिया था.

सुनील- ये ले कुछ पैसे रख ले. वहाँ काम आएँगे. सब का ख़याल रखना. अपने काकी का हुमसे हाथ पकड़े रहना.

फिर गाड़ी चल पड़ी.

स्टेशन आ कर सब उतर गये. लल्लू सारे बॅग्स ले कर चल दिया.

ट्रेन लगी हुई थी तो सब जल्दी से अपने डब्बे में बैठ गये जा कर.

थोड़ी देर में ट्रेन चल पड़ी.
 
अपडेट 8.

शाम क समय ये सभी ट्रेन से प्रयाग पहुच गये.

वहाँ से ऑटो कर के ये लोग कुंभ के स्थान पर पहुचे.

वहाँ पहुच कर अनिल सब को एक जगह खड़ा कर के खुद एक धरमसाला में रूम के लिए चले गये.

ये चार लोग थे और ऋतु काकी साथ थी तो दो रूम लिए अनिल ने.

वहाँ से आ कर सब को ले कर अपने कमरे में पहुच गये.

सब पहले फ्रेश हुए फिर कमरे में जा कर आराम करने लगे.

दादू और अनिल काका एक कमरे में रह रहे थे और लल्लू ऋतु के साथ.

ऋतु घर से नाश्ता बना कर लाई थी तो सब ने वही खाना खा कर सोने का फ़ैसला किया कि कल सुबह जल्दी उठ कर उन्हे कुंभ स्नान्न् करना था.

तो दादू और अनिल काका सो गये.

दूसरे कमरे में लल्लू और ऋतु रुके थे.

ये दोनो साथ में खाना खा रहे थे.

खाना हो जाने के बाद हाथ मूह धो कर दोनो अपने कपड़े बदल लिए.

लल्लू सोने के लिए बेड पर आ गया. उस ने सिर्फ़ एक धोती पहना था. ऊपर से नंगा ही था.

ऋतु- तू ऊपर क्यू नही पहना कुछ.

लल्लू- काकी यहाँ बहुत गर्मी है. में तो कहता हूँ आप भी मत पहनो ये इतना सारा.

ऋतु- हा गर्मी तो है लेकिन क्या में तेरे साथ नंगी सो जाऊ.

लल्लू- नही नही. आप सब कुछ खोल कर सिर्फ़ सारी लपेट कर सो जाओ.

ऋतु- ना बाबा ना. मेरे से ऐसे नींद नही आएगी.

लल्लू- में लॉरी गा कर सुला दूँगा ना.

ऋतु- पता नही तू लॉरी गा कर सुलाएगा या लॉरा डाल कर सुलाएगा ( धीरे से बड़बड़ाती बोली) लेकिन लल्लू सुन लिया था.

लल्लू का लुल्ली तो ऋतु की बात सुन कर ही खड़ा हो गया.

लल्लू- काकी यहाँ कौन दूसरा है. खोल कर लपेट लो सारी. मुझ से क्या शर्माना .

ऋतु का भी मन कर रहा था लेकिन वो घबरा रही थी. दो दिन पहले बच गई नही तो उसी दिन चुद जाती लेकिन आज पता नही क्या हो सुबह तक.

लल्लू उठ कर ऋतु के पास आ गया.

लल्लू और ऋतु दोनो की धड़कन बढ़ गई.

लल्लू ऋतु को पकड़ कर खड़ा कर दिया.

ऋतु के बदन के सारे रोए खड़े हो गये.

लल्लू ऋतु को प्यार से देखते हुए उसके सारी को पकड़ कर खोलने लगा.

ऋतु कसमसा कर लल्लू का हाथ पकड़ ली.

ऋतु चाहती थी की ये जो हो रहा है वो अपने अंजाम तक पहुच जाये लेकिन एक शर्म थी एक घबराहट थी.

बगल वाले कमरे में उसके ससुर और पति दोनो सो रहे थे.

लल्लू हाथ छुड़ा कर ऋतु की सारी उसके बदन से निकल कर अलग रख दिया.

ऋतु- पहले लाइट बंद कर. फिर में खोल कर सारी पहन लूँगी.

लल्लू- में पहना देता हूँ ना. लाइट बंद कर दूँगा तो आप अंधेरे में कैसे पहनेगी.

ऋतु- नही पहले लाइट बंद कर और तू बेड पर जा. में आ रही हूँ.

लल्लू- में करता हूँ ना. आप क्यू मेहनत करोगी.

ऋतु- फिर छोड़ दे में ऐसे ही सो जाउन्गी. मुझे गर्मी नही लग रहा है.

लल्लू- अच्छा अच्छा. में लाइट बंद कर देता हूँ.

लल्लू लाइट बंद कर दिया और बेड पर जा कर बैठ गया.

ऋतु- मुआ कितना बेचैन है मेरे लिए. पता नही क्या दिखता है इसे मुझ बूढ़ी में. अब तो शादी भी कर ली है इस हरामी ने. पति बन गया है मेरा अब तो.

ऋतु सारे कपड़े खोल कर सारी उठाती मन में बोल रही थी.

तभी लल्लू आगे हो कर ऋतु को बाहों में ले लिया और बेड पर लेट गया.

ऋतु पूरी नंगी थी. वो घबरा गई. ये अचानक क्या हुआ.

लल्लू ऋतु के चेहरे को पकड़ कर अपना होंठ ऋतु के होंठो पर लगा दिया.
 
ऋतु लल्लू को अब अपना पति मान चुकी थी.

ऋतु ने विरोध करना छोड़ दिया. अपने आप को वो लल्लू के हवाले कर दी.

लल्लू ऋतु के होंठो को चूस्ता हुआ अपने एक हाथ से ऋतु के चुचे को सहलाने लगा.

ऋतु मज़े से अपना चुचे मिचवा रही थी लल्लू से.

लल्लू ऋतु के पूरे चेहरे को चाटने लगा जीभ निकाल कर.

ऋतु लल्लू के नीचे लेटी उसकी पीठ पर हाथ से सहला रही थी. कभी बालो में उंगली घुसा कर घुमा रही थी.

लल्लू आज रुकने क बिल्कुल मूड में नही था. वो चहरे को चाटता हुआ ऋतु के कान में अपना जीभ घुसा दिया.

ऋतु के पूरे बदन के रोए खड़े हो गये.

लल्लू ऋतु के कान के लाउ को अपने मूह में ले कर चूसने लगा. काटने लगा.

ऋतु मज़े से आँखे बंद किए. लल्लू के बालो को पकड़ कर उसे पलट दी और खुद उसके ऊपर आ गई.

ऊपर आ कर ऋतु लल्लू के पूरे चेहरे को चुंम्मी से गीला कर दिया फिर उसके होंठो को अपने मूह में ले कर चूसने लगी.

लल्लू ऋतु के नीचे लेटा ऋतु के नितंब को दोनो हाथो में ले कर मसलने लगा ज़ोर ज़ोर से.

ऋतु मज़े से अपनी चुचियो को लल्लू के छाती में रगड़ती हुई लल्लू के होंठो को चूस रही थी.

लल्लू एक हाथ से ऋतु का एक चुचि पकड़ कर उसे गुठने लगा.

ऋतु सस्सीीइसस्सीई करती हुई अपना जीभ निकाल कर लल्लू के मूह में डाल दी.

लल्लू गप से ऋतु के जीभ को लपक कर मूह में ले कर चूसने लगा.

अब लल्लू दोनो हाथो से ऋतु के एक चुचे को मिच रहा था.

बहुत कसे हुए थे ऋतु के चुचे और बहुत बड़े भी थे. लल्लू के एक हाथ में नही आ रहा था.

लल्लू- आअहह काकी मेरी जान… कितने बड़े है तेरे दूध.

ऋतु- मुआअ अब काकी तो मत बोल…

तेरी लुगाई हूँ में. अकेले में ऋतु ही बोला कर.

लल्लू- ऋतु.. मेरी रानी.. क्या माल है तू. कितनी गद्देदार है तेरी ये चुचे और गान्ड.

ये मेरी रातो की नींद उड़ा दी है.

ऋतु काकी- अब ये सब तेरा है लेले जितना मज़ा लेना है इनका.

लल्लू अब दूसरे चुचे को मथ रहा था.

लल्लू फिर ऋतु को ले कर पलट गया.

बिच्छवान नीचे ही लगा हुआ था. दोनो उठा पटक में बेड से बाहर नंगे फर्श पर आ गये थे.

ऋतु की पीठ में ठंढा ठंढा नंगा फर्श और ऊपर लल्लू ऋतु के एक चुचे का चूचुक मूह में ले कर चूस रहा था और दूसरे को हाथ से गूत रहा था.

ऋतु की बुर से नदिया बह रही थी.

लल्लू ऋतु के चुचे को मिच कर काट कर बिल्कुल लाल गुब्बारे की तरह कर दिया था.

लल्लू बारी बारी दोनो चुचे को पी रहा था.

फिर लल्लू चुचे को छोड़ कर नीचे ऋतु के पेट पर आ गया.

अपना जीभ निकाल कर लल्लू ऋतु के पूरे पेट को चाट रहा था.

पूरा पेट चाट कर लल्लू ऋतु के गहरी नाभि में अपना जीभ डाल कर उस में घूमने लगा.

ऋतु कमर उठा उठा कर पटकने लगी.

वो एक बार झड़ गई थी.

लल्लू नाभि से फ्री हो कर उस से नीचे आ गया और एक हाथ से दूध दबाता हुआ और एक हाथ से दोनो मोटी जाँघो को फैला कर लल्लू ऋतु के जाँघो को चाटने काटने लगा.

ऋतु उठ कर बैठ गई और लल्लू के बालो में उंगली घुसा कर उसे खिचने लगी.

ऋतु इस मज़े से तड़प रही थी.

ऋतु को हाथ से धक्का दे कर लेटा दिया और दोनो जाँघो को हाथ से उठा कर मोड़ दिया लल्लू ने.

ऋतु तकिये से मूह को दबाए अपने सिर को दाएं बाए पटक रही थी मज़े से.
 
लल्लू ऋतु की चूत के पास नाक ले जा कर उस में से आती सुगंध को सूंघने लगा.

ऋतु की चूत से बहुत मादक खुश्बू आ रही थी.

अभी अभी ऋतु एक बार झारी थी तो खुश्बू थोड़ी ज़्यादा ही आ रही थी.

लल्लू से अब बर्दास्त करना मुस्किल हो गया था.

लल्लू मूह खोल कर ऋतु की चूत को पूरा एक बार में ही मूह में भर लिया.

ऋतु- आअहह. ये क्या कर रहा है. वो गंदी जगह है. वहाँ से मूह हटा मुआअ. ( ऋतु लल्लू के सिर पर हाथ से सहलाती बोली)

लल्लू तो अभी बहरा हो गया था. वो तो किसी और दुनिया में पहुच गया था. वो मज़े से ऋतु की चूत को पूरा मूह में भरे चूसे जा रहा था और दोनो हाथो से ऋतु के दूध को मिच रहा था.

ऋतु- आहह. ज़रा धीरे बेटा. बहुत मज़ा आ रहा है. कहा था अब तक तू. मुझे पता होता की इतना मज़ा आएगा तो कब का तुम से चुदवा लेती.

ऋतु का पूरा बदन थरथरा रहा था मज़े से.

लल्लू अब चूत में अपना जीभ निकाल कर घुसा ए जा रहा था.

ऋतु दूसरी बार झरने वाली थी.

ऋतु- आहह, मुआअ क्या कर दिया तूने. ये कैसा आग लगा दिया. मुझे ये क्या हो रहा है.

मार जाउन्गी में. प्लस्स छोड़ दे मुझे…

आहह…. मेणिी.. गैइइ रे… मुआअ..

ऋतु दूसरी बार झरने लगी…

ऋतु का पूरा शरीर कांप रहा था.

लल्लू अपना मूह लगाए चूत रस पीने में लगा हुआ था. बड़ा मजेदार लग रहा था.

ऋतु अभी तक कांप रही थी.

लल्लू ऋतु को पकड़ कर अपने आगोश में ले लिया.

थोड़ी देर में जब संभली ऋतु तो लल्लू की पीठ पर दो मुक्का लगा दी.

ऋतु- ये कर दिया था मुझे तू मुआ. मुझ से सास ही नही लिया जा रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे में किसी और ही दुनिया में पहुच गई हूँ.

लल्लू- एक बार फिर जाना चाहेगी उस दुनिया में.

ऋतु- ना बाबा ना. अब मेरे में इतनी ताक़त नही बची. अब में मर ही जाउन्गी.

लल्लू- कुछ नही होता. अभी मारी क्या तुम. मज़े से भी कोई मरता है क्या.

ऋतु- तू ही कर ऐसा मज़ा. मुझे नही करना.

लल्लू- जब तू नही करेगी तो में क्या अकेले मज़े करू.

ऋतु लेटी हुई लल्लू के मूह को पकड़ कर उसके पूरे चेहरे को चूमने लगी.

ऋतु- कहा से सीखा ये सब.

लल्लू- बस तुम्हे देख कर अपने आप आ गया रानी.

लल्लू ऋतु का एक हाथ पकड़ कर उसे अपने लंड पर रख दिया.

लल्लू- बहुत दर्द कर रहा है अब इसका कुछ कर दे ना.

ऋतु- क्या कर दूँ.

लल्लू- ज़्यादा कुछ नही तो कम से कम जैसे उस रात की थी वैसे ही कर दे.

ऋतु- तू चुप चाप यू ही लेटा रह.

ऋतु लल्लू के ऊपर आ कर उसके पूरे चेहरे को चाटने लगी फिर उसके छाती पर आ कर लल्लू के एक चूचुक को अपने जीभ क नोक से सहलाने लगी.

लल्लू सिसक उठा.

लल्लू अपने हाथ से ऋतु के गान्ड को पकड़ कर दबाने लगा.

ऋतु एक चूचुक से खेलने के बाद ऐसे ही दूसरे के साथ भी की.

फिर ऋतु उस से नीचे आ कर लल्लू के छाती को चाटती हुई उसके पेट को चाटने लगी.

पेट से होता हुआ ऋतु लल्लू के कमर से नीचे आ कर उसके बॉल्स को मूह में ले कर चूसने लगी.

फिर मूह हटा कर काफ़ी सारा थूक लल्लू के लंड पर थूक कर उसे हाथ से मलने लगी.

और फिर एक बार लल्लू के बॉल्स को मूह में ले ली.

लल्लू का लंड ऋतु के एक हाथ में पूरा समा नही रहा था तो ऋतु दोनो हाथो से उसके लंड को मालिश दे रही थी.

लल्लू से अब बर्दास्त करना मुस्किल हो रहा था.

लल्लू उठ कर ऋतु के कमर को पकड़ कर अपनी और घुमा लिया और अपने ऊपर खिच लिया अब दोनो 69 पोज़िशन में आ गये थे.

लल्लू ऋतु के गान्ड को दोनो हाथो से फैला कर उस में अपना मूह घुसा दिया.

ऋतु की आँखे मज़े से बंद गई वो मूह हटा कर लल्लू के लोले को अपने मूह में ले ली.

लल्लू का लोडा ऋतु के मूह के हीशब से मोटा ज़्यादा था लेकिन जितना जा रहा था ऋतु उतने को ही मूह में ले कर चुभला रही थी जीभ चला रही थी लोडा के टोपे पर.
 
लल्लू ऋतु के गान्ड क फलो को फैलाए उस क गुलाबी छेड़ में जीभ घुमा रहा था.

फिर लल्लू जीभ को ऋतु के पानी छोड़ती चूत में लगा कर चाटने लगा.

अब लल्लू के बॉल्स फूलने पिछकने लगा था.

जैसे कुछ निकलने वाला है.

लल्लू ऋतु को हटा दिया और उसे पलट कर उसके चुचे को मूह में ले कर काटने लगा.

ऋतु अचानक इस हमले से घबरा गई और लल्लू को मुक्के से मारने लगी.

लल्लू को इस से क्या होने वाला था.

फिर लल्लू मूह उठा कर ऋतु के होंठो को मूह में भर कर चूसने लगा.

ऋतु अपने दोनो पैरो को उठा कर कैची बना कर लल्लू को अपने से पूरा जकड ली

लल्लू होंठो को चूस्ता हुआ ऋतु के दूध को मिच रहा था.

ऋतु- उउउहह अब मुझे बर्दास्त नही होगा. अब कुछ कर कब तक तड़पाता रहेगा. चोद दे मुझे ये डंडा डाल कर मार मुझे.

लल्लू उठ कर ऋतु के पैरो को पास आ गया और ढेर सारा थूक निकाल कर अपने लंड पर लगा लिया.

लल्लू ऋतु के दोनो पैर को उठा कर अपने दोनो हाथो में ले कर अपना लोला ऋतु की चूत के छेद पर लगा दिया.

ऋतु तकिया उठा कर अपने मूह पर रख लिया दबा कर.

लल्लू एक हल्का धक्का लगाया.

ये लल्लू का पहली बार था तो उसे सही अंदाज़ा भी नही था.

लल्लू का लोला फिसल कर ऋतु के पेट पर जा पहुचा.

ऋतु- मुआअ इतना बड़ा लोला रखा है और कैसे चोदते है ये भी नही पता.

ऋतु लल्लू के लौड़े को पकड़ कर अपने बर के छेद कर लगा दिया और पकड़े रही.

ऋतु- मार हल्के से धक्का.

लल्लू कमर पीछे कर एक धक्का लगा दिया.

लल्लू का लोला फिसलता हुआ ऋतु की चूत को फैला कर टोपा तक अंदर चला गया.

ऋतु अपने हाथ से अब तकिये को दबा कर पकड़ लिया.

लल्लू को लग रहा था जैसे अंदर उसका लोला पिघलता जा रहा है. इतनी गर्मी थी अंदर चूत में . भट्टी की तरह गर्मी था अंदर.

लल्लू मज़े से बहाल था.

लल्लू कमर पीछे किया और एक धक्का लगा दिया. उसे ज़्यादा पता तो था नही धक्का थोड़ा ज़ोर का लग गया.

ऋतु कराहती हुई छटपटाने लगी.

लल्लू का लोला आधे से ज़्यादा घुश गया था ऋतु की चूत को फैला कर.

ऋतु को ल्ग रहा था जिसे किसी ने गर्म सरिया उसकी चूत में घुसा दिया है.

ऋतु- मुआअ आराम से कर. मरेगा क्या. आ फट गई मेरी चूत . हाय्यी कहा फस गई हे भगवान. फट गई मेरी चूत .. गधे का लोला है हरामी का.

लल्लू को अब बर्दाश्त करना मुस्किल हो रहा था.

वो अब रुक नही पा रहा था. ऋतु के चुचे को मीसता हुआ लल्लू जितना लॉडा अंदर गया था इतने से ही ऋतु की चुदाई सुरू कर दी.

लल्लू सटासट अपना लोला निकाल कर पेले जा रहा था.

ऋतु को बहुत दर्द कर रहा था.

अनिल अब ऋतु के साथ सोना कई सालो से छोड़ दिया था.

ऋतु की कई साल से ठुकाई नही हुई थी तो अभी उसका चूत की झिल्ली छोटी हो गई थी.

ऋतु- आराम आराम से चोद मुआ.. बहुत दर्द कर रहा है.

ऋतु लल्लू को पकड़ कर अपने ऊपर खिच ली.

लल्लू का पूरा लॉडा ऋतु की गहराई में घुस गया.

ऋतु- आहह ये तो पेट फाड़ देगा. आ मा रीि. हाय्यी आज तो मॅर गैइइ… हे माआ. बचा ली.. रे..

लल्लू ऋतु पर लेटा अब घचा घच चोदे जा रहा था.

लल्लू अब अपने आप को रोक नही पा रहा था वो पूरा लॉडा निकाल निकाल कर ऋतु की चूत में पेले जा रहा था.

ऋतु- मररर.. गाइ.. अया आ क्या करते रहहाअ है.. आराम्म से.

लल्लू तो सातवे आसमान पर अर रहा था. उसका लोला किसी पिस्टन की तरह ऋतु की चूत में अंदर बाहर हो रहा था.

लल्लू- आअहह ऋतु. कितना गर्मम्म अंदर.. में पिघल्ल्ल रहा हूँ…

लल्लू बैठ कर ऋतु के गान्ड के नीचे दोनो हाथ दे कर उठा लिया और सटसट पेलने लगा.

ऋतु- अया.. आहह.. आहह. धीरे… कर ना मरे गया. क्या…

ऋतु दो बार इस बीच झड़ चुकी थी.

ऋतु की चूत से अब फूच...फ्फूच्च की आवाज़े आ रही थी..

लल्लू भी अब अपने चरम पर पहुच चुका था.

लल्लू एक हाथ से गान्ड उठाए एक हाथ से ऋतु के चुचे को ज़ोर ज़ोर से दबाता पूरी गहराई में अपना लॉडा उतरता झरने लगा.

ऋतु- आअहह.. मेनीी गैइइ री माइईइ.. करती हुई लल्लू के लावे को महसूस कर वो भी झड़ गई.

लल्लू जड़ तक अपना लॉडा थोक कर ऋतु के ऊपर ढेर हो गया.

दोनो पसीने से पूरा भीग गये थे. बिस्तर तो अब बचा ही नही था इन दोनो के मल्लयुद्ध में.

दोनो वही नंगे एक दूसरे से चिपके ही ऐसे ही सो गये.
 
अपडेट 9.

सुबह के चार बजे लल्लू की नींद खुल गई.

थकावट बहुत हो रखी थी लेकिन इस समय उठने का एक आदत हो गया था तो नींद खुल गई लल्लू की.

उठ कर बैठ गया. देखा तो वो और ऋतु दोनो रात में नंगे ही सो गये थे. लल्लू उठ कर पहले लाइट जला दिया.

लाइट जलते ही कमरे में उजाला फैल गया जहा बेड से नीचे दोनो सोए पड़े थे अभी बिस्तर तो सारा सिमट क एक जगह इक्कथा हो गया था.

ऋतु अभी भी सोई हुई थी.

लल्लू ऋतु की गदराई गोरी बदन को खा जाने वाली नज़रो से देख रहा था.

इस समय ऋतु पीठ के बल लेटी हुई थी.

साष लेने से उसकी चुचिया ऊपर नीचे हो रहा था.

बड़ा मनमोहक दृश्य था.

भरे हुए गाल. पतले होंठ जो रात की चूसाई से अभी फूल गया था.

लंबी गर्दन और उस से नीचे एवरेस्ट चोटी की तरह सर उठाए मोटे मोटे चुचे जो रात क मर्दन से लाल हुआ पड़ा था. कही कही काटने के निशान भी था.

डेढ़ दो इंच लंबे चूचुक जिस पर खून सी लाली आ गई थी.

फुल्ली हुई चिकनी मखमली पेट, गहरी नाभि और उस से नीचे वो जन्नत का द्वार जिस के दर्शन के लिए ही ना जाने कितने खून बहा दिए जाते है

ऋतु की बुर का तो क्या कहना. छोटी छोटी बाल ट्रिम किया हुआ बहुत सुंदर था. बुर की हालत बहुत दयनीय थी अभी लेकिन अभी तो पता नही चलता था की पहले कैसी थी क़्की अभी उसके होंठ फुल कर दोनो तरफ से चिपक कर ऐसा परतीत हो रहा था जैसे यहाँ कोई सुराख ही नही है.

लल्लू और ऋतु दोनो के वीर्य जो सुख गया था अभी साथ में थोड़ा खून भी निकला था सयद क़्की चारो और वीर्य के साथ लाली फैली थी.

मोटे मोटे मंशाल जंघे. देख कर लल्लू का मन कर रहा था की इन जाँघो को जीभ निकाल कर चाट ले दांतो से खूब काटे.

ऐसे मनमोहक दृश्य देख कर लल्लू का लॉडा अपना सर उठा चुका था.

वो आगे बढ़ कर ऋतु के चुचे को मुट्ठी में भर कर दबाने लगा.

तभी दूसरे कमरे में आवाज़ आई.

लल्लू का मन नही कर रहा था छोड़ने का लेकिन अभी अब वक्त नही था तो वो कपड़े पहन कर पहले ऋतु के गालो को अपने दाँतों से काट कर उठा दिया.

ऋतु- हाय्यी माआ. ये जालिक नीरा पागल है. सोए हुए को कैसे उठाते है ये भी नही पता इसे

ऋतु अपने गाल को सहलाती हुई उठ कर बैठ गई तब उसे एहसास हुआ की वो किस हाल में है अभी.

ऋतु- हाय्यी रामम… में ऐसे ही कैसे सो गई.

ऋतु झपट कर चादर उठा कर अपने बदन पर ओढ़ ली.

ऋतु- मुआ खड़ा खड़ा हस रहा है. ऐसे भी कोई करता है क्या.

लल्लू- मैने क्या किया है.

ऋतु- मैने क्या किया है.( नकल उतारती हुई.)

अब क्या बाकी रह गया है मुआ. और क्या करना चाहता है.

लल्लू- फिलहाल तो एक मीठी सी चुम्मि दे दो मेरी प्यारी लुगाई. बाकी आज रात में में खुद ले लूँगा.

लल्लू आगे बढ़ कर ऋतु के होंठो को अपने होंठो से लगा कर चूसने लगा.

थोड़ी देर चूसने के बाद लल्लू ऋतु से अलग हो गया.

लल्लू- जल्दी से कपड़े पहन लो. किसी भी वक्त काका आ सकते है.

लल्लू ऋतु को उसका कपड़ा पकड़ाती बोली.

ऋतु झपट कर कपड़े ली और जल्दी से पहन ली.

फिर एक एक कर दोनो वॉशरूम जा कर फ्रेश हुए.

तब तक दादू और काका भी उठ कर फ्रेश हो गये थे.

फिर चारों एक बॅग में कपड़ा ले कर चल दिए स्नान के लिए.

बहुत भीर था वहाँ. दादू सब से आगे चल रहे थे. वो यहाँ कई बार आ चुके थे तो उन्हे पता था यहाँ का.

उनके साथ काका चल रहे थे.

दोनो के पीछे ऋतु का हाथ पकड़े लल्लू ऋतु का पति की तरह उसके साथ चल रहा था.
 
अभी शाही स्नान का समय था तो सभी आखाड़ो क महंत, महामंडलेश्वर, और नागा साधु लोग अभी स्नान के लिए जैकारा लगाते हुए जा रहे थे.

रोड के दोनो और पोलीस और आर्मी के सिपाही कोई पैदल तो कोई घोड़े पर बैठे एक घेरा बना कर आम लोगो से दूरी बनाए हुए इन साधु महात्माओ को रास्ता बना रहे थे. कोई हाथी पर तो कोई घोड़ा और कोई तो सोने चाँदी की पालकी पर शाही स्नान के लिए जा रहे थे.

पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया था.

बहुत अजीब भेष भूषा के भी कई साधु बाबा थे वहाँ. कोई पूरे शरीर पर भस्म लगाए हुए. सिर पर जाता, गले में कई तरह क माला, किसी के हाथ में डमरू तो किसी के हाथ में त्रिशूल, किसी के हाथ में गाड़ा, तो किसी के हाथ में चिमटा. कोई आँखो में काजल लगाए तो कोई शॅप को गले में लपेटे.

कई के तो कमर में भी तरह तरह की चीज़े बँधी थी.

सब अपने प्रभु की मस्ती में मस्त झूमते हुए जा रहे थे.

आम लोग रोड के साइड में या तो खड़े हो कर देख रहे थे या आहिस्ता आहिस्ता से स्नान के स्थल की और बढ़ रहे थे.

ये चारो भी इन सभी के पीछे सब देखते हुए आगे बढ़ रहे थे.

तभी एक साधु बाबा जो घोड़े पर चले जा रहे थे.

उनका घोड़ा बिदक कर रोड के साइड में जहा लल्लू खड़ा था उधर आ गया.

लल्लू आवाज़ सुन कर उधर देखा तो सामने एक काले घोड़े पर बिल्कुल नंगा साधु बाबा बैठे है. एक हाथ में डमरू और दूसरे हाथ से घोड़े का लगाम पकड़े हुए अपनी लाल लाल आँखो से लल्लू को घूर रहे थे.

लल्लू उस नागा साधु बाबा की आँखो का तब सह नही पाया और घबरा कर अपना सर दूसरी और घुमा लिया.

नागा साधु बाबा की वो लाल आँखे लल्लू को अपने शरीर के भीतर तक महसूस हो रहा था.

तभी दो फ़ौजी आ कर उस नागा साधु के घोड़े को पकड़ कर बीच रोड में कर दिया.

फिर वो साधु बाबा सब साधुओं के साथ गुम हो गये.

लल्लू अपने दादू और काका काकी के साथ सब तरफ के दृश्य देखता हुआ आगे बढ़ रहा था.

शाही स्नान पूरा होने के बाद आम लोगो को स्नान की इजाज़त मिल गया तो सभी स्नान के लिए चल पड़े.

लल्लू के दादू अपने बेटे अनिल के साथ एक और स्नान करने चले गये और वहाँ से थोड़ा हट कर ऋतु लल्लू के साथ स्नान करने चली गई.

स्नान कर लेने के बाद सब अपने कपड़े पहन कर तैयार हो गये चलने को.

अभी हम लोग वहाँ से निकल कर रोड पर आ गये थे और जिस तरफ हम ठहरे थे उधर ही बढ़ रहे थे.

दादू- अनिल बेटा में सोच रहा था अभी स्नान कर लिया है तो भगवान की पूजा और दर्शन भी कर ले. क्या कहते हो.

अनिल- उचित बिचार है पापा. फिर कब आएगे यहाँ. अभी आए है तो सभी देवी देवता का पूजा अर्चना तो कर ही लेना चाहिए.

दादू- चलो फिर…..

अभी दादू की बाते भी पूरी नही हुई थी की वहाँ भगदड़ मच गया.

लल्लू झपट कर दादू और काकी को पकड़ कर एक गली में घुस गया वही और दीवाल के सहारे खड़ा हो गया.

भगदड़ बढ़ती ही जा रही थी.

जिसको जहा जगह मिलता गिरता पड़ता भगा जा रहा था.

ये चारो दीवार से पीठ लगाए चिपके हुए थे.

लोगो का हुजूम भगा जा रहा था.

कितने बूढ़े औरत वहाँ गिरते फिर उठते और तब तक लोगो का हुजूम से धक्का लग जाता तो फिर गिर पड़ते.

किसी को किसी की फ़िकर नही था. सब बस अपनी जान बचा कर भागे जा रहे थे.

लाउडस्पिकर पर बार बार चिल्ला कर सब से शांति बनाए रखने को कहा जा रहा था लेकिन कौन सुनता है.

लल्लू काकी और दादू का हाथ पकड़ कर उस गली में दीवार क सहारे से आगे बढ़ने लगा.

थोड़ा आगे जा कर वो गली मूड गया था.

लल्लू- काका हम जहा रुके है वो धर्मशाला का नाम क्या है. और अंदाज कितना दूर होगा यहाँ से.

अनिल- बेटा नाम तो याद नही. दूरी यही कोई 2 किमी होगा.

लल्लू- काका, अभी हम मेन सड़क से अब नही जा सकते है तो ऐसे ही गली से होता हुआ आगे बढ़ते है. अंदाज से 2 किमी आगे चलते है. फिर अपना धर्मशाला ढूंढ़ेंगे.

दादू- हा बेटा. अभी मेन रोड से अब जाना ख़तरनाक होगा. यही से आगे बढ़ता रह.

लल्लू तीनो के साथ अंदाज से ही आगे बढ़ता रहा.

कई गलियो को पार करता हुआ अंदाज़ा तीन किमी चलने के बाद वो लोग एक जगह रुक गये.

लल्लू- काका क्या ख़याल है एक बार अब मेन रोड में निकल कर देखे अब.

दादू- नही नही अभी नही. अभी ऐसा कर किसी भी धर्मशाला में चल. बाद में जब शांत हो जायगा सब तब फिर अपने वाले में चलेंगे.

लल्लू- आप सब यहाँ रुकिये ना में एक बार देख कर आता हूँ. वैसे भी अभी मुझे नही लगता किसी भी धर्मशाला में जगह होगा.

अनिल- तू यही रह पापा और काकी के साथ. में दूर से ही देख कर आता हूँ.
 
अनिल वहाँ से मेन रोड की और चला गया और ये लोग उस गली में इंतजार करने लगे.

आधे घंटे बाद अनिल आता हुआ दिखा.

दादू- कहा चला गया था. इतना देर लगता है क्या.

अनिल- अपना धर्मशाला यही दो गली बाद है. चल आगे.

फिर सब चल दिए. थोड़ी देर में ये लोग अपने धर्मशाला में पहुच गये.

अपने कमरे में आ कर सभी बेड पर बैठ गये.

दादू- आज तो लल्लू ने बचा लिया. अगर आज ये नही होता तो गये थे हम लोग.

अनिल- हा पिता जी. मुझे तो कुछ समझ ही नही आया की ये हो क्या गया है.

ऋतु- मेरा बेटा है ही बहुत होसियार. ( काकी लल्लू के माथे को चूमती बोली)

लल्लू उठ खड़ा हुआ.

दादू- अब कहा जा रहा है. खाना खा ले अब. भगवान के दर्शन अब आज नही हो पायगा.

लल्लू- दादू बस नीचे से आता हूँ.

अनिल- ठीक है खाना का बोलता हुआ आ जाना. बाहर बिल्कुल मत जाना. भगदड़ अभी भी हो रहा है.

लल्लू वहाँ से उठ कर नीचे आ गया और धर्मशाला से बाहर चला गया.

मेन रोड पर आ कर देखा तो जगह जगह पोलीस वाले खड़े है और जो घायल हो गया है उसे गाड़ी में बैठा कर उपचार के लिए भेज रहे है.

अब भगदड़ ख़त्म हो गया था.

लल्लू चारो और देखता हुआ आगे बढ़ रहा था.

तभी थोड़ी दूर एक टेंट के पास एक साधु बाबा नीचे गिरे हुए दिखे.

लल्लू दौड़ कर उस और चला गया.

पास जा कर लल्लू उस साधु बाबा को उठा कर अपने गोद में ले लिया.

साधु बाबा के शरीर में कई जगह से हल्की हल्की खून बह रहा था.

लल्लू उस साधु बाबा को उठा कर अपने कंधे पर ले लिया और एक तरफ दौड़ पड़ा.

साधु बाबा- बेटा इधर नही. उधर बाए उस गली में मेरा ठिकाना है तुम वहाँ छोड़ दो.

लल्लू- आप को अभी उपचार की ज़रूरत है. पहले आप उपचार करवा लीजिए.

साधु बाबा- बेटा मुझे मेरे टेंट में दे आओ. मेरे चेले मेरा उपचार कर देंगे.

लल्लू साधु बाबा के बताए दिशा में ले कर चल दिया.

करीब दो किमी आगे आ कर एक टेंट के पास साधु बाबा बोले अंदर चलने को.

लल्लू साधु बाबा को ले कर उस टेंट में आ गया.

टेंट पूरा खाली था. वहाँ कोई नही था.

लल्लू- बाबा यहाँ तो कोई नही है.

साधु बाबा- बेटा वो मेरा झोला है. वो ला दो.

लल्लू साधु बाबा के बताए झोले को उठा कर उनको पकड़ा दिया.

साधु बाबा उस झोले से एक मुट्ठी भस्म ले कर अपने पूरे शरीर में लेप लिए.

जहा जहा खून बह रहा था सब जगह लगा लिए उस भस्म को.

फिर साधु बाबा उस झोले से एक जड़ी बूटी निकाल कर लल्लू को पकड़ा दिए.

साधु बाबा- ये लो बेटा. इसे प्रणाम कर ग्रहण करो.

लल्लू- ये क्या है बाबा. ( लल्लू) हाथ जोड़ कर बोला.

साधु बाबा- बेटा ये एक जड़ी बूटी से बना औषधि है जिस से असीम ताक़त मिलता है.

इसे ग्रहण करने के बाद तुम अपने अंदर बहुत ताक़त पाओगे.

लल्लू- बाबा मेरे पास जो अभी मेरा शारीरिक ताक़त है वो मेरे लिए पर्याप्त है. ये ले कर में क्या करूँगा. आप इस जड़ी बूटी को किसी कमजोर को दे दीजिएगा जिसे इसकी ज़रूरत मुझ से ज़्यादा होगा.

साधु बाबा- बेटा जो इस लायक होता है ये जड़ी बूटी उसके पास खुद पहुच जाता है. जैसे अभी तुम तक पहुच रहा है.

इस जड़ी बूटी में मेरी तपस्या का कुछ फल भी मिला हुआ है. तुम मेरी बहुत मदद की उस के परिणाम स्वरूप में तुम्हे ये दे रहा हूँ. लो पुत्र अब देर ना करो इसे ग्रहण करो.

लल्लू दोनो हाथ जोड़ कर हाथ आगे बढ़ाया और उस जड़ीबूटी को ले लिया साधु बाबा के हाथ से.

साधु बाबा- इस जड़ी बूटी को अपने मूह में ले कर यहाँ सिर झुका कर बैठ जाओ.

लल्लू डरता हुआ ऐसा ही किया.

लल्लू के बैठते ही साधु बाबा लल्लू के सिर पर हाथ रख कर कोई मंत्र पढ़ने लगे.

मंत्र पूर्ण होने के बाद साधु बाबा अपना हाथ लल्लू के सिर से हटा लिए.

साधु बाबा- बेटा अब तुम अपने घर चले जाओ. वहाँ सब तुम्हारा इंतजार कर रहे होंगे.

लल्लू- लेकिन बाबा आप के कोई चेले तो यहाँ है ही नही आप को चोट लगी है. आप का उपचार कौन और कैसे होगा.

साधु बाबा - बेटा यहाँ आ कर जो में भस्म लगाया है उस मैं अब बिल्कुल ठीक हूँ. तुम मेरी फ़िकर बिल्कुल मत करो. तुम्हारे धर्मशाला में सब तुम्हे ढूँढ रहे होंगे. तुम अब जाओ.

लल्लू साधु बाबा को प्रणाम करता वहाँ से निकल कर अपने धर्मशाला में आ गया.
 
अपडेट 10.

धर्मशाला पहुच कर खाने का ऑर्डर दे दिया और बता दिया कि रूम में भेज दे.

लल्लू आ कर ऋतु वाले रूम में चला गया.

ऋतु- कहा था इतनी देर से. पता है हम कितने परेशान हो गये थे. ( लल्लू को गले लगाती ऋतु बोली.)

लल्लू- यही नीचे थोड़ा बाहर खड़ा था. देख रहा था किसी को कोई मदद की ज़रूरत तो नही है. ( लल्लू ऋतु के होंठो को चूम कर बोला)

ऋतु- अभी तेरे काका तुझे सभी जगह से ढूँढ कर आए है. जा जा कर बता आ की तू आ गया है नही तो दोनो परेशान होते रहेंगे तेरे लिए.

लल्लू वहाँ से निकल कर दूसरे कमरे में आ गया. वहाँ दोनो बैठे लल्लू को ले कर बहुत परेशान थे. लल्लू को देखते ही अनिल उठ खड़े हो गये.

अनिल- कहा चला गया था. पता में कितना घबरा गया था.

लल्लू- इतना क्यू घबरा जाते हैं काका. में यही पास में ही तो था. में खाने को बोल आया हूँ वो लता होगा आप लोग फ्रेश हो जाइए.

लल्लू वहाँ से फिर ऋतु के पास आ गया.

लल्लू- आप को फ्रेश होना है तो हो जाओ खाना आ रहा है.

ऋतु- में पहले ही फ्रेश हो गई हूँ. तू चला जा. फ्रेश हो ले और ये कपड़े पर खुल कैसा लगा है कहा चोट लगा लिया. दिखा ज़रा.

ऋतु कपड़े पर लगे खून को देख कर हडबडा कर बेड से उठ कर लल्लू के कपड़े को उठाती बोली.

लल्लू- अरे मेरी रानी कुछ नही हुआ मुझे. वो एक घायल बाबा को उठा कर उसके टेंट तक ले गया था लगता है उसी का खून लग गया है. अभी में कपड़ा बदल लेता हूँ.

ऋतु काकी- तू सच कह रहा है ना. देख मुझ से झूठ मत बोल. अगर तुझे कही चोट लगा है तो बता दे. तुझे कुछ हो गया तो में भी नही जिंदा रहूंगी. में भी खुद को मार लूँगी.

लल्लू- अरे बाप रे इतना प्यार. तुम तो बिल्कुल मेरी लुगाई जैसे बात कर रही हो.

ऋतु- चुप कर मुआ हमेशा परेशान करता रहता है मुझे. चल दिखा तुम झूठ बोल रहा है या सच.

लल्लू कपड़ा खोल कर निकाल दिया.

लल्लू- लो देख लो. और भी कुछ करने का मन हो तो बता दो में नीचे का भी खोल देता हूँ.

ऋतु- शरमाती हुई. चुप कर हरामी. मार खाएगा मेरे से. चल दूसरा कपड़ा पहन ले जा.

लल्लू बाग से दूसरा कपड़ा निकाल कर पहन लिया और फ्रेश होने चला गया.

तब तक खाना भी आ गया था.

सब मिल कर खाना खा लिए.

लल्लू ऋतु के कमरे में आ गया आराम करने. दूसरे कमरे में अनिल और दादू भी आराम करने लगे.

लल्लू ऋतु के कमरे में आ कर दरवाजा लगा दिया और ऋतु को अपने बाहों में भर लिया.

लल्लू- मेरी जान तुम्हे देख कर पता नही मुझे क्या होने लगता है. में अपने आप पर काबू क्यू खोता चला जाता हूँ.

ऋतु- शरमाती हुई. छोड़ अभी दिन है. कोई सुन लेगा तो क्या कहेगा.

लल्लू- तो ऐसा करते है हम लोग चुप चाप प्यार करते है. मूह को कोई लास्ट देने की ज़रूरत नही है. हाथ और हथियार अपना प्यार कर लेंगे.

ऋतु- मुआ अभी मुझे च्छुआ तो पिटाई लगा दूँगी. अभी चुप चाप सो जा. मुझे भी बहुत नींद आ रही है. सारी रात तंग किया है तुम ने.

लल्लू- ऐसा ज़ुल्म तो ना करो अपने दीवाने पर.

ऋतु- बड़ा आया मेरा दीवाना. ( मुस्कुराती हुई.) मूह देखा है अपना.

लल्लू- तुम्हारे बापू ने जिस से तुम्हारा ब्याह कराया है उस से तो सुंदर ही हूँ.

ऋतु- हाहाहा… चल चल बड़ा आया सुंदर वाडी….

चुप चाप सो जा नही तो में भगा दूँगी दूसरे कमरे में. वहाँ अकेले सोता रहना.

लल्लू ऋतु को झप्पी डाल कर लेट गया उसके साथ.

लल्लू- प्लीज़ प्यार करने दो ना. बड़ा मन कर रहा है.

ऋतु- नही. बिल्कुल नही. अभी तक दुख रहा है मुझे. वहाँ फूल भी गया है. सूजन आ गई है आज बिल्कुल नही.

लल्लू- देखो ना इसका क्या हाल है. इसको कैसे सुलौऊ. ( अपने खड़े लौड़े को पकड़ कर दिखाता बोला.)

ऋतु- बोला ना नही. तुम्हे एक बार में समझ नही आता है क्या.( ऋतु गुस्से में बोली.)

लल्लू मूह लटका कर अलग हो कर सो गया.
 
अपडेट 11.

दोपहर बाद लल्लू की नींद खुली.

उठ कर फ्रेश हुआ. देखा तो सभी अभी तक सो रहे थे.

लल्लू बाहर जा कर सब के लिए चाय और हल्का नाश्ते के लिए कुछ ले आया.

सब को उठा कर चाय नाश्ता दिया.

लल्लू- दादू अब क्या करना है. यहाँ संगम तट पर गंगा आरती होता है वहाँ चले क्या.

दादू- नही बेटा. आज जाना ठीक नही होगा. आज ही तो उस हंगामे से तुम्हारे कारण बाल बाल बचे है. अगर तुम नही होते तो आज तो हम लोगो का चटनी बन गई होती.

लल्लू- क्या दादू में नही होता तो क्या हुआ बड़े काका थे. और मेरे बदले मझले काका भी तो आने वाले थे.

अनिल- नही बेटा. तेरे दादू सही कह रहे है. में तो था ही लेकिन मुझे तो कुछ पता भी नही चला था तब तक तू हम लोगो को सेफ कर चुका था.

दादू- सही बात है. अगर सुनील भी होता तो वो भी इतना आक्टिव नही है की हम लोगो को यू बचा कर सुरक्षित यहाँ तक ले आता.

लल्लू- अच्छा अच्छा अब आप लोग मेरा गुणगान करना बंद कीजिए. अगर आप लोग नही जांगे तो में घूम आऊ क्या कुछ देर बाहर से.

दादू- नही बेटा. तू ही तो हमारा सहारा है. में कही नही जाने दूँगा तुम्हे.

लल्लू- क्या दादू. कमरे में बंद कितना देर बैठा रहूँ. उऊब गया हूँ में.

अनिल- बेटा, दादू हमारे भले के लिए कह रहे है. तू ऊपर छत पर चला जा वहाँ से बहुत अच्छा नज़ारा दिखता है.

फिर लल्लू वहाँ से उठ कर छत पर चला गया.

सच में वहाँ से बहुत सुंदर नज़ारा दिख रहा था.

वही रेलिंग पर बैठ कर लल्लू दूर दूर ट्के छोटे छोटे कॅंप और संगम मंदिर लोगो की भीर सब देखता हुआ टाइम पास करने लगा.

कब रात क 10 बज गये पता ही नही चला.

वो तो अनिल काका खाने के लिए बुलाने आए तब जा कर लल्लू को होश आया.

फिर नीचे आ कर फ्रेश हुआ और सब बैठ कर रात का खाना खाए.

खाना खाने के बाद दादू और अनिल तो सोने लगे लेकिन लल्लू को अभी नींद नही आ रही थी और ऋतु से तो वो सुबह से ही नाराज़ था तो उस से तो बात भी नही किया. ऋतु के तरफ देख भी नही रहा था.

ये सब ऋतु भी नोट कर रही थी.

लल्लू खाना खा कर एक बार फिर छत पर चला गया और रात 1 बजे तक वही छत पर बैठा रहा.

रात 1 बजे ऋतु लल्लू को ढूँढती हुई छत पर आई.

ऋतु- और कितना यहाँ बैठा रहेगा. चल चलकर सो जा.

लल्लू कुछ बोला ही नही.

ऋतु आगे बढ़ कर लल्लू का हाथ पकड़ कर उस से चिपक गई.

ऋतु- नाराज़ है ना मुझ से. बात समझ बाबू. मुझे बहुत दुख रहा था. तब तुझे नही गुस्सा करती तो तू मानता नही.

लल्लू चुप था अभी भी कुछ नही बोला.

ऋतु हाथ बढ़ा कर उसके लौड़े को पकड़ ली.

ऋतु- हाय्यी रामम ये हमेशा तैयार ही रहता है.

चल इसका इलाज करती हूँ.

लल्लू ऋतु का हाथ पकड़ कर वहाँ से हटा दिया और थोड़ा दूर जा कर खड़ा हो गया.

ऋतु एक बार फिर खुशल कर लल्लू के पास आई.

ऋतु- मेरा सोना, मेरा सैया नाराज़ है. अभी मनाती हूँ इसे में.

ऋतु पीछे से लल्लू से चिपक कर उसके गर्दन कंधे जो भी खुली जगह थी वहाँ छोटी छोटी चुम्मि लेने लगी और एक हाथ से लल्लू के सीने पर सहलाने लगी तो दूसरे हाथ से फिर से लल्लू के लौड़े को पकड़ ली.

ऋतु लल्लू को पीछे से चूमती जाती थी और एक हाथ से उसके रोड की तरह सख़्त गर्म लौड़े को मुठिया भी रही थी.

लल्लू से अब बर्दास्त करना मुस्किल हो रहा था.

लल्लू के मन में उथल पुथल मची थी.

एक मन कहता हटा दूं ऋतु को. अभी भी नाराज़ बना रहूँ. तो दूसरा मन कहता की अच्छा मौका है खुले में पटक कर चोद दे तो एक फॅंटेसी भी पूरी हो जाएगी.

लल्लू समझ नही पा रहा था की क्या करे.

इधर ऋतु बदस्तूर अपना चुचे लल्लू की पीठ पर रगड़ती जा रही थी और उसके लौड़े को मुठिया ती भी जा रही थी.

लल्लू अपने दिल को काबू कर के एक बार फिर ऋतु को अपने आप से दूर हटा दिया ओर चल दिया सीढ़ियो की ओर .
 
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