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Incest माँ को पाने की हसरत

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माँ की सेक्सी सेक्सी बातों को सुन मैं अपना आपा खो बैठा था...मैने भी कहा हां अधिकार तो मेरा संपूर्ण तुझपे है अब तू चाह कर भी मुझसे दूर नही जा सकती माइ सेक्सी डार्लिंग......माँ शरमाई तो मैने उसे खीचके उठाया और उसकी कमर पे अपने हाथ लपेट लिए माँ ने कहा चल अब बस भी कर तू मुझे लगता है कुछ करने ना देगा लेकिन अब तुझे मेरे मुताबिक चलना होगा तू अपना काम धंधा संभाल और मुझे घर का काम काज और हां अब कोई बहाना नही महीने की तनख़्वा मेरे हाथ में लाके देगा....इतना कह कर माँ हंस पड़ी तो मैने भी कमर पे हाथ की पकड़ कस ली और उसे अपने से चिपकते हुए कहा अर्रे तू तो मेरी घरवाली है तेरा पूरा अधिकार भी मुँह पे बनता है तू बस कह कर तो देख नोटो की गॅडी तुझपे बर्साउन्गा तुझे नहला दूँगा जेवर पैसा ऐशो आराम की हर चीज़ का तुझे भो दूँगा जो तेरा पति तुझे दे ना सका वो मैं दूँगा......माँ शरम से लाल हो गयी

अंजुम : तू बस मुझे दो रोटी और तंन ढकने के लिए कपड़ा और सर छुपाने के लिए छत भी देगा तो मेरे लिए बहुत है कोई भी औरत बस यही तो चाहती उसके बेटे की खुशी ही उसकी खुशी है मुझे ये ऐशो आराम की चीज़ नही बस तेरा साथ चाहिए और तेरा सुख

माँ भावुक हो गयी मैने उसके आँखो के आँसू पोछे....और कहा बस इसी लिए तो मैं तुझ इतना प्यार करता हूँ मुझे नही परवाह लड़कियो की बस जैसे मेरी इच्छा अब जाके तृप्त हुई है खैर ये सब छोड़ बहुत रो लिया तूने अब तेरे सुख लेने के दिन हैं...

माँ मुस्कुराइ

आदम : अच्छा अब भी दर्द है (मैने कल रात की चुदाई के बाद उनकी चूत का हाल जाना सुबह तो सिकाई कर ही दी थी तो माँ ने सिर्फ़ सर हां में हिलाया)

अंजुम : ज़्यादा नही है हल्का दर्द है तेरा वो काफ़ी मोटा है इसलिए दर्द हुआ

आदम : हाहाहा वो तो बस मेरे हाथो की मालिश और वैद्य जी की दवाई का कमाल है

अंजुम : वैद्य जी कौन वैद्य जी?

आदम : हाहाहा अभी जाने दे वो बात वो किस्सा तुझे बाद में बताउन्गा फिलहाल ये राशन ले तेरी बताई सारी चीज़ें ले आया हूँ तू चादर छोड़ मैं उसे निचोड़ दूँगा बाकी खाना लगा भूक लगी है

अंजुम मुस्कुराइ राशन का सामान लेते हुए मेरे हाथ से रसोईघर चली गयी मैं जब गुसलखाने में आया तो बाल्टी में भरे पानी मे चादर को पाया उसे पानी से निकालके झाड़ा और देखने लगा कि उस पर माँ की चूत से निकले खून का हल्का दाग लगा हुआ था..मैं मुस्कुराया क्यूंकी कल उस चादर के उपर ही हमने अपनी पहली सुहागरात मनाई थी....माँ ने दाग को रगड़ रगड़ कर निकालके सॉफ करने का खूब प्रयास किया था...

नहा धोके फारिग होके मैने निचोड़ी चादर को बाहर लॉन में सुखाने को फैलाक़े टाँग दिया...अंदर आया तो माँ खाना परोस रही थी...मैने एक ही थाली मे दोनो का खाना डालने को कहा फिर माँ को अपनी जाँघ पे काफ़ी उनकी ना नुकुर के बाद बिठाया उफ्फ मेरा लंड प्यज़ामे के अंदर से ही खड़ा होके उनकी नाइटी के कपड़े में कुल्हो के बीच की दरार के मुंहाने में दब गया...माँ शरमाते हुए मुझे अपने हाथो से खिलाने लगी और मैं भी उसे खिलाने लगा झुँटन से तो हम घिन नही मानते थे आपस में

 
खाने से फारिग होके माँ झूठे बर्तन धोने चली गयी फिर फारिग होके गुसलखाने मूतने चली गयी पेशाब करने के बाद जैसे ही बिस्तर पे आके मेरे साथ लेटी तो मैने तेल की डिब्बी निकाली और उसकी मालिश की इच्छा जताई माँ पहले तो मना करने लगी फिर मान गयी...मैने माँ को नंगा होने कहा तो उसने शरमाते हुए अपनी नाइटी खोली तो

मेरा लंड एकदम सख़्त हो गया उसने अंदर कोई कपड़े नही पहने थे वो एकदम नंगी हो गयी मैने उसे पेट के बल लिटाया और मुट्ठी में तेल लेके दोनो हाथ में रगड़ते हुए उसकी पीठ की मालिश शुरू कर दी पीठ से होते हुए फिर नितंबों के बीच की उसकी नितंबो की गोलाइयाँ काफ़ी उभरी और मोटी हो गई थी

मैने माँ के नितंबों की मालिश की फिर उसकी कमर को अच्छे से हाथो से मला फिर हाथ में थोड़ा तेल लिया और टाँगों आर्मपार्ट्स और पिंदलियो की मांलीश की माँ को जब पूरा पीछे तेल लगा दिया तो उसे उठाया और उसकी चुचियो पे तेल मलने लगा उसके निपल्स एकदम सख़्त थे वो आँखे मुन्दे हुए थी...

आदम ने दोनो चुचियो की मालिश करते हुए कहा कि वो इन्हें और भी बड़ा कर देगा तो माँ खिलखिला कर हंस पड़ी..बेटे ने एक चुचि पे दोनो हाथो से मुट्ठी के लिए उसे काफ़ी मसला और दूसरी चुचि की भी वैसी ही मांलीश की...फिर उसे सीधा लिटाया और उसकी झान्टेदार चूत पे हाथो ए मालिश करने लगा उसे मुट्ठी में मसल्ते उसे अहसास हुआ कि माँ की चूत उसके मालिश से एकदम गीली हो चुकी थी

उसने माँ को तड़पाना चाहा .....और उसकी नाभि पे उंगली तेल से गीली की फिर पेट की तोंद को दबाए अच्छे से पेट की फिर छातियो की मालिश की मालिश पूर हो गयी तो बेटे ने फिर उसे उल्टा लिटाया और उसकी गान्ड की फांको को हाथो में दबोचते हुए चढ़ाई करने लगा फैलाने से उसे छेद दिखा...उसने जीब छेद पे लगाई और उसे अपनी नुकीले ज़ुबान से चाटने लगा माँ अपनी गान्ड के छेद पे बेटे की ज़ुबान पाकर उत्तेजित हो गयी वो सिसकने लगी...पर बेटा ज़ुबान से हौले हौले माँ की गुदाज़ गान्ड के छेद को चाट्ता गया जब तक वो थूक से पूरी गीली ना हो गयी फिर उसने गान्ड पर से हाथ हटाए फिर दुबारा उसे दबोचा मसला और उस पर कस कर दो-तीन थप्पड़ मारे माँ के नितंब हिल गये नितंबो पे मारी हर थापि से माँ के.स्वर में आआह निकली उसने पलटके बेटे की तरफ तीखी नज़रो से देखा तो पाया कि बेटा उसे फिर चोदने की इच्छा लिए उसे गुलाबी आँखो से देख रहा है

माँ पेट के बल लेटी हुई थी और उसका पूरा बदन तेल की मांलीश करने से तरबतर गीला और चमक रहा था....मेरे खड़े 8 इंच के लंड को देख उसकी आँखे बड़ी बड़ी सी हो गयी.....मैं मुस्कुरा रहा था उसे प्यार भरी निगाहो से नंगा खड़ा आमंत्रित कर रहा था...वो कभी मुझे तो कभी मेरे टेढ़ी मुद्रा में अकडे लंड को घूर्र रही थी...

"चल आज एक राउंड और हो जाए".......मैने चुप्पी तोड़ते हुए कहा

"अब अपनी औरत से ही इज़ाज़त माँग रहा है? .....माँ ने मुस्कुराहट भरे लहज़े में कहा

"अर्रे इजाज़त तो दोनो की होनी ही चाहिए ना".........मैने नज़ाकत भरे लव्ज़ में कहा

"अर्रे रिश्तो में इज़ाज़त का क्या वजूद?....अपना तो बना ही चुका अब किसलिए पूछ रहा है सबकुछ तो मेरा तेरा ही है रे".......माँ ने प्यार भरी मुस्कान देते हुए बोला

तो मैं बिना कहे माँ के पास आया और उसके तेल से गीले बदन पे हाथ फेरते हुए उसकी विशाल नितंबो की गोलाईयों को हाथो में लेके नापने लगा...फिर उसे मसल्ते हुए माँ को एग्ज़ाइटेड करने लगा....माँ जैसे चरम सुख का आनंद ले रही थी उसने एक मीठी सी पर हल्की सी सिसकी लेते हुए आँखे मूंद ली....

मैं पलंग पे चढ़ा और उसके गीले चिकने नितंबो के बीच अपना मोटा लंड घिसने लगा....गान्ड की फाकों में मेरे लंड की हौले हौले रगड़ा रगड़ी से ही माँ उत्तेजित होने लगी....मैने हाथ ले जाते हुए नीचे उसके गुदाज़ पेट पे हाथ रखते हुए उसे सहारा देके कुतिया की मुद्रा में झुकाया फिर उसने घुटने खुद ही मोड़ लिए और सर लगभग अपना तकिये पे दाई ओर करवट लिए मेरी तरफ एक निगाह डाली...

उसके कुतिया मुद्रा में आने से ही उसके भारी गोल गोल नितंब उभरके मेरे सामने प्रस्तुत हो गये....मैने दोनो नितंबो को अपने हाथो में लिए फैलाया और उसकी बीच में अपना मुँह डालने लगा...मैं फिर उसके छेद को अपनी ज़ुबान से छेड़ने लगा...उफ्फ क्या नमकीन पसीनेदार स्वाद था उपर से उसमें से गंध आ रही थी....मुझसे सवर नही हो पा रहा था...जो बदन की मालिश का तेल लाया था जिससे माँ की पूरे बदन की मांलीश की थी उसी बॉटल को उठाए मैने उसमें से 2-3 बूँद माँ की गान्ड के छेद में डाल दिया...फिर एक अंगुल करके उसे अंदर तक लगा दिया...ताकि माँ का छेद एकदम चिकना और गीला हो जाए

अंगुली करने से माँ का गुदा द्वार पूरा खुल सा गया था....मैने अपने लंड पे थूक डाला अपने लंड को चिकना किया....आज बिना निरोधक चढ़ाए माँ की चुदाई करने का मन था....माँ के दोनो तरफ टांगे रखके उस पर सवार हो गया फिर धीरे धीरे झुकते हुए अपना लंड उनके गान्ड की दरार में घिस्सने लगा...माँ ने कस कर चादर पकड़ ली दोनो हाथो से...

मैने थोड़ा सा पुश किया तो सुपाडा छेद के भीतर प्रवेश कर गया...कुछ और थोड़ा सा गया था कि माँ को फिर तेज़ जलन सी होने लगी....माँ का मुँह तकिये पे था इसलिए उनकी घुट्त्ती दर्द भरी आवाज़ आने लगी उसके हाथ एकाएक अपने गुदा द्वार के पास आए और मेरे लंड को अपनी गान्ड की दरारों से निकालने की कोशिशें करने लगे....लेकिन मैने माँ की कलाई कस कर पकड़ी आज उस पर रहम नही कर सकता था...क्यूंकी शुरुआती दर्द तो हर औरत को झेलना ही पड़ता है अगर बीच में रोक दिया तो सारा मज़ा खराब पर माँ को मज़ा भी देना था मैं उसकी आँखो में आँसू नही देख सकता था इसलिए मैं वैसी ही मुद्रा में माँ के उपर खड़ा कुछ देर सुस्टाते हुए गान्ड में लंड फँसे रहने ही दिया....

कुछ क्षण बाद माँ ने जब आवाज़ निकालना बंद किया तो मैने दोनो नितंबो को और भी कस कर चौड़ा किया और अपने लंड पे दबाव देते हुए अंदर डालने लगा ज्यो ज्यो मैं माँ के भीतर अपना लंड घुसाता गया माँ की चीख भी तेज़ होती गयी दर्द में जैसे उसका गला फटने को हुआ वो रोने लगी...मैने कस कर एक और करारा धक्का मारा तो लंड पूरा अंदर तक फँस गया....अब मेरा पूरा 8 इंच का लंड माँ की गान्ड की दरारों को फाड़ कर उसके छेद में पूरा का पूरा अंदर तक घुस चुका था...माँ गान्ड को ढीली छोड़ रही थी और कभी सिकुड रही थी...वो सर इधर उधर मारने लगी जैसे चूत चुदाई से भी उसे ज़्यादा दर्द हुआ था..

आदम : ओह्ह्ह माँ गान्ड ढीली ही छोड़ ना तेरी गान्ड की भीतरी सख़्त दीवार मेरे लंड को दबोच चुकी है मेरा लंड छिल जाअएगा सस्स

अंजुम : बेटा तू निकाल ले निकाल ले ना बड़ा दर्द कर रहा है आहह (माँ छटपटाते हुए रोनी सूरत में कहे जा रही थी)

आदम : माँ थोड़ा सह ले उसके बाद तुझे मज़ा आएगा

अंजुम : नही तू बस निकाल दे दर्द बर्दाश्त से बाहर है

आदम : शुरू शुरू में होता है फिर धीरे धीरे आदत पड़ जाती है एक दो बार तेरी गान्ड में डालूँगा तो अपनेआप दर्द छू मंतर हो जाएगा तुझे फिर मज़ा आएगा खुद कुल्हो को उछाल उछाल के चुदवाएगी

 
अंजुम को मैं शांत करने लगा मैं उसके चेहरे के पसीने को पोंछते हुए उसके माथे पे हाथ फैरने लगा उसके बालों को सहलाने लगा वैसी ही मुद्रा में कुछ देर रुका रहा पर लंड बाहर नही निकाला...इन सब हालातों के बीच मेरा लंड धीरे धीरे छोटा होने लगा तो मैने फिर से कुल्हो में ताक़त भरते हुए माँ की टाइट गान्ड को चोदना शुरू किया...इस बार थोड़ा आहिस्ते से अंदर बाहर कर रहा था पर करारे धक्के 3-4 धक्को के बाद गहराई तक मारता तो माँ के मुँह से आअहह का स्वर फुट पड़ता और उनका पूरा बदन काँप जाता उनके नितंब भी हिल जाते...

समय बहुत बर्बाद किया माँ को चुप करने समझाने और गान्ड मरवाने तक के लिए...ऐसा लग रहा था जैसे किसी कुँवारी बीवी की चुदाई कर रहा हूँ..उफ्फ इतना मज़ा तो किसी औरत को चोदते वक़्त भी नही आया था....खुशी थी कि माँ पूरी अब मेरी हो चुकी थी..

मैने माँ के पेट को सहलाते हुए नीचे से माँ की कमर पे ज़बरदस्त हाथो की पकड़ बिठाई रखी ताकि माँ मेरी पकड़ से छुट ना जाए...वो हांफें जा रही थी और मेरे लंड की रगड़ाई को अपनी गान्ड के भीतर अंदर बाहर महसूस करते हुए चुद रही थी..."ओह्ह ओह्ह हॅम आहह उःम्म्म आहह"........उस आवाज़ में दर्द और मज़ा दोनो बराबर था...उफ्फ माँ का यूँ कॉपरेट करना किसी आग्यकारी बीवी की तरह मुझे बहुत भाया और मेरी हसरतों का सैलाब लंड की अकड़न के साथ लावा बनके फुट पड़ा और माँ की गान्ड में फारिग होता चला गया...

माँ को अपनी गान्ड के भीतर गरम गरम बेटे के वीर्य का अहसास होने लगा..वो इस चुदाई से बहुत थक चुकी थी....वो काँपते हुए बिस्तर पे ढेर हो गयी मेरी पकड़ की ढीली होते ही...और फिर मैं भी उस पर ढेर हो गया...जब धीरे धीरे अपने गीले वीर्य से भरे लंड को गान्ड की दरारों से बाहर खींचा तो छेद मेरा गाढ़ा वीर्य उगलने लगा...माँ की गान्ड का छेद एकदम ओ शेप में एकदम खुल सा गया था उफ्फ ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसमें ड्रिल मशीन घुसा दी हो माँ का पूरा बदन काँप रहा था...

कुछ देर सुसताने के बाद उठा पेशाब किया अंदर आया फिर गरम पानी किया उसे गुनगुना होने दिया....फिर उसमें कपड़ा डालके उस गीले कपड़े से माँ की गान्ड के छेद को सॉफ करने लगा हल्का सा माँ का खून निकल गया था...माँ की गान्ड को बिल्कुल सॉफ करने के बाद मैने उसकी गान्ड पे एक हल्का सा चुंबन लिया फिर फारिग होके उसके बगल में आके लेट गया...वो कस कर मुझसे लिपट गयी....शाम को जब नींद खुली थी तो बेहद नाराज़ थी मैने उसे बहुत मनाया पर ना मानी बहरहाल उसे अपने साथ ले गया और उसकी पसंद की एक महेंगी बनारसी साड़ी खरीदके दी....वो इस साड़ी के लिए ना जाने कितने सालो से . थी....

उसकी चाल थोड़ी धीमी थी वो टाँग खोल खोल कर चल रही थी इसलिए मैने मार्केट से लेके घाट तक के लिए ऑटो ले लिया था..ताकि उसे कोई दिक्कत ना हो...हम घर आ गये आज बाहर से रात का खाना ले आए थे मिलके दोनो माँ-बेटों ने खाया फिर माँ ने मेरे सामने ही अपने कपड़े पहने फिर आयने की तरफ बार बार खुद को निहारा वाक़ई उस बनारसी साड़ी में माँ कहर ढा रही थी...ऐसा लगा अभी उसे अपने आगोश में भर लूँ पर काबू पाना था अपनी ज़ज़्बातो पे...

उसने एक बार मेरी तरफ देखा तो मैने पाया कि उसके दिल की जैसे खुशी उसके चेहरे में सिमटी हुई सी थी उसने पास आके मेरे चेहरे को चूमा....और माँ मेरे सीने से लग लग गयी....हम दोनो फिर प्यार भरी बातें करने लग गये

आदम : मैने कहा था ना तुझे कि मैं दुनिया की तुझे सारी खुशिया दूँगा बस अब तुझे ऐसे ही खुश रहना है

अंजुम : मैं बहुत खुश हूँ सोची थी कि तेरे साथ कैसे यहाँ बंगाल में अड्जस्ट करूँगी पर तूने तो मुझे इतनी खुशी दी की अब दिल्ली जाने का भी मेरा कोई मन नही कर रहा

आदम : हाहाहा अब तुझे मैं जाने भी नही दूँगा अब तुझे मेरी बनके रहना है सिर्फ़ मेरी (उसने मेरे कंधे पे अपने दोनो बाज़ू रखे वो साड़ी पहनी थी और मेरी गोदी में बैठी हुई थी)

अंजुम : लेकिन वाक़ई तू मुझे संतुष्ट करता है आदम तूने मुझे फिज़िकली और फाइनेन्शली वो खुशिया दी है जो मैने कभी अपनी ज़िंदगी में कभी उम्मीद भी नही की

आदम : हाहाहा एक बेटे का धरम होता है कि वो अपनी माँ को खुश रखे और माँ का हक़ पराई औरतो से पहले बीवी से पहले यहाँ तक बहनों से भी पहले अपने बेटे पे होता है और मैं तो तेरा मर्द हूँ अब इसलिए क्यों इतना सोचा

अंजुम : अच्छा बाबा अब ये कहो कि आप मुझसे क्या चाहते है?

आदम : मेरी फरमाइश तो तू पूरी कर ही देती है अब मैं तुझसे क्या और क्यूँ चाहूं

अंजुम : फिर भी

आदम : ह्म सोचने दो आजसे तू अपने आर्म्पाइट्स के बाल सॉफ नही करेगी मैं चाहता हूँ कि तू साड़ी के अंदर कोई ब्रा पैंटी ना पहने अगर पहने भी तो तब जब मैं तेरे साथ रोमॅन्स करूँ तू घर से बाहर कही नही जाएगी और अगर जाएगी तो मुझे कह कर ऐसे बिल्कुल नही और हफ्ते में तुझे जो कुछ ब्यूटी पार्लर से करना है करना समझी मुझे तू एकदम मस्त आइटम दिखनी चाहिए

अंजुम : अजी और कोई फरमाइश जहांपनाह?

आदम : बस इतना ही

अंजुम : हाहाहा लेकिन बगलो के बाल से तुझे क्या है?

आदम : तेरे बगलो में जब पसीना आता है तो मुझे अच्छा लगता है मुझे उसमे नाक डालके सूंघने का दिल करता है और ये सब निशानिया देसी औरतो की होती है तभी तो मज़ा आता है और मुझे ये पुरानी अदायें ही भाती है मेरी नयी बोतल पुरानी शराब

अंजुम : हाए अल्लाह तू मुझे शराब कह रहा है छी छी कैसी गंदी बात कहता है हाहहाहा (माँ लगभग शरमाते हुए मुँह पे हाथ रखके हंस पड़ी)

 
मैने उसकी ज़ुल्फो पे अपनी उंगली फिराई तो वो सिहर गयी मैने उसके गाल को हल्के से चूमा फिर उसकी साड़ी को एक झटके में उसके बदन से खींच लिया तो वो हिल गयी मैने धीरे धीरे उसे खड़ा खारके उसे लगभग राउंड घुमाते हुए उसकी साड़ी उसके पेटिकोट की गाँठ खोलते हुए अलग कर दी...माँ अब ब्लाउस और पेटिकोट में थी......माँ जानती थी मेरी हसरतों की आग फिर सुलगने लगी है और अब मैं उसे बकशने वाला नही...

मैने उसे पलटा और उसकी पीठ पे फसि ब्लाउस की डोरियो को खोल दिया फिर हुक भी....फिर पेट पे हाथ ले जाते हुए नाभि को सहलाते हुए पेटिकोट का नाडा भी खोल कर पेटीकोट को कमर तक उठा दिया और उसे लगभग गोदी में उठा लिया वो हड़बड़ा सी उठी...मैने उसे पलंग पे जाके लेटा दिया उसकी गोरी गोरी टाँगों को चूमा फिर मुँह नाभि के पास आते हुए उस पर हल्के से दाँत गढ़ाए माँ चीख उठी उसने हल्की सी मेरे चेहरे पे चपत लगाई फिर नज़ाकत से मेरी ओर देखने लगी...

मैने उसे उल्टा लिटाया और उसकी पीठ को चूमता रहा...पेटिकोट अब तक जो कमर पे थी वो पेट तक आके इकट्ठी हो गयी थी लपेटे लपेटे एक टाँग माँ ने टाँग पे चढ़ाया मैने उसकी टाँगों के बीच अपना मूसल जैसा लंड फिराया और उसकी झान्टेदार पानी छोड़ती चूत में एक ही बार में घुसा दिया तो माँ बदहवास मेरे बदन पे ढेर हो गयी...जैसे वो सुध बुध खो बैठी सिसकते हुए बस अधखुली आँखो से चुदाई का अहसास पा रही थी...मैने उसे अपनी बाहों में समेट लिया और उसकी गर्दन और गाल को चूमने लगा...

उसके बाद बिस्तर जैसे हमारी चुदाई से चर्चर आवाज़ निकलने लगी पूरा बिस्तर हिल रहा था....और मैं माँ की चुदाई करने में मशगूल हो गया....मैने उस रात माँ की गान्ड को फिर एक बार चोदा था....ऐसे 2-3 दिन माँ की गान्ड मारने से माँ को हल्का दर्द उठा फिर उसे मेरा लंड खाने में आदत सी पड़ गयी...इस बार एजेंट ने मामलों में ल्यूब की डिब्बी और कयि ब्रॅंडेड कॉनडम्स के सॅंपल्स लाए थे उनमें से कुछ मैने रख लिया था सोचा था माँ को प्युरे सुरक्षा से निरोध चढ़ा कर ही चोदुन्गा क्यूंकी माँ को बिना निरोधक के चुदवाने से ऐतराज़ था....हम माँ-बेटे अपनी ज़िंदगी ऐसे ही काट रहे थे

मैने मोरतुज़ा काका के कारोबार को छोड़ दिया कारण उनकी वजह से मुझे अपनी माँ के साथ समय बिताने का वक़्त तक नही मिलता था और वो अपने दामाद की मुझसे जी हुजूरी कराने में लगे रहने लगे माँ ने मुझे समझाया कि हर कोई फ़ायदा तो उठाता ही है तू कुछ और कोशिश कर...मैने एजेंट को अपने साथ में कर रखा था और जल्द ही मैं एक डिपार्ट्मेनल स्टोर में ऐज आ पर्चेस ऑफीसर की नौकरी पा गया....हम उतने अमीर तो नही हुए लेकिन हमारे पास कोई पैसो की कमी नही थी ज़रूरत की हर चीज़ थी हामरे पास हम माँ-बेटे अपने ज़िंदगी को ऐसे ही काट रहे थे....माँ अब मुझसे इजाज़त नही मांगती अब हम यहाँ बहुत महीनो से है तो माँ घाट में कपड़े धोने काकी के साथ तो कभी टाउन में सब्ज़ी की खरीदारी खुद करने निकल जाती है....

एक दिन ऑफीस की छुट्टी थी और माँ को घाट पे कपड़े धोने ले जाना चाहता है चूँकि आज काकी जो कि हमारी पड़ोसन जिसके साथ माँ बातें करती थी और उसी के साथ घाट जाती थी वो बीमार थी इसलिए माँ ने फ़ैसला किया कि वो खुद जाएगी पर मैं घर में था और शाम होने को था घाट पूरा सुनसान हो जाता था इस वक़्त इसलिए उसे संकोच हो रहा था अकेले जाने को लेकिन डर की कोई बात नही थी क्यूंकी आस पास कोई नही होता था....मैने माँ का कारण जाना तो माँ के साथ खुद ही कपड़ों से भरा टब लिए उनके साथ घाट की ओर चलने लगा

माँ आगे थी और मैं पीछे तो मुझे उसकी गोल गोल हिलते चूतड़ नाइटी के बाहर से दिख रहे थे...वो आज लेट हो गयी थी नहाई भी नही थी उसने सोचा था कि शाम को कपड़े धोके घर लौट आएगी पर आज मौसम का मिज़ाज भी कुछ ठीक नही लग रहा था लेकिन फिर भी माँ के गंदे कपड़े बहुत मज़ूद थे इसलिए उसे जाना पड़ा...मैं उसके पीछे था और उसके हिलते चूतड़ और उसकी गोलाईयों के उभार को नोटीस करने लगा मुझे अहसास हुआ माँ ने अंदर कोई कपड़ा नही पहना मैने माँ से जब इशारो में ही सवाल किया कि माँ तूने आज अंदर कुछ नही पहना तो उसने बस पलटके कहा अब जब तूने मुझे मना किया है तो मैं काहे को पहनु और घाट कौन सा टाउन में है आस पड़ोस तो औरतें है..और उन्हें क्या फरक पड़ता है? यहाँ तो पल्लू भी किए औरत नंगी चुचियाँ लेके घूमती है

मैं मुस्कुराया और हल्के से माँ के चूतड़ पे छपत लगाई चारो तरफ देखते हुए तो माँ ने मुझे आँख दिखाई फिर मुस्कुराइ मैं माँ के पीछे चले ही जा रहा था और उसकी हिलते नितंबो के उभार को नाइटी के बाहर से ही घूर्र रहा था....और माँ आगे आगे उसे सब मालूम था पर उसे भला क्यूँ आपत्ति होती मर्द जो था उसका...

रास्ते भर माँ को घुरते हुए मैं उसके साथ कुछ ही देर में घाट पहुचा...पीछे मूड के देखने पे घर सबका दूरी पे था मुझे मालूम नही था कि घाट हमारे घर से इतने नज़दीक भी हो सकता है....घाट की सीडिया कुल 40-50 के लगभग थी जो सीधे नीचे की ओर जाते हुए पानी की आती किनारों पे ख़तम हो रही थी फिर बीच में दाई और बाई ओर जाती एक बड़ी सी तालाब जैसी नदी थी....उस पार बड़े बड़े पेड थे सुना था उस साइड जंगल पड़ जाता था...और उसके थोड़े आगे नॅशनल हाइवे...मैने पाया कि शाम का वक़्त था और कोई वहाँ मज़ूद था भी नही दाई और बाई ओर कच्ची सड़क थी जो ना जाने किस ओर जा रही थी....पर वहाँ कोई आस पास घर नही था जिस रास्ते से हम आए थे बस वोई चार पाँच घर काफ़ी दूरी पे दिख रहे थे...

माँ ने मुझे आवाज़ लगाई तो वो धीरे धीरे सीडियो पे उतरते हुए काफ़ी नीचे जा चुकी थी...मैं उसके पीछे उतरा...जल्द ही हम दोनो पानी जहाँ से शुरू होता है वहाँ पे बैठ गये माँ तो टब से निकाले बड़े बड़े कपड़ों को एक साइड रखके उसे तालाब के पानी में डुबो डुबॉके निकाल रही थी...वो घुटनो के बल संडास करने की मुद्रा में बैठ गयी थी....उसने अपनी टांगे इतनी खोल ली कि उसके नाइटी के अंदर टाँगों के बीच की झलक मैं आराम से देख सकता था मैं सीडी पे बैठा था...मुँह धोने के बहाने सर जैसे ही नीचे झुकाया...

तो माँ की नाइटी के भीतर उसकी टांगे फैली होने से झाका..उफ्फ झान्टेदार फूली हुई चूत दिखी...जब मैं उपर उठा तो माँ को मुस्कुराता पाया मेरी चोरी पकड़ी गयी थी ..

अंजुम : तू इसलिए मेरे साथ आया है क्या? कम से कम यहाँ तो बाज़ आजा

आदम : तू ही तो बोली कोई आस पास नही है...

अंजुम : तो इसका मतलब तू मुझे अकेला पाके फायेदा उठाएगा

आदम : हा हा हा मैं ऐसा तो नही

अंजुम : क्या भरोसा तेरा? अच्छा चल छोड़ तू मुझे काम कर लेने दे

आदम : मैं तेरी मदद करूँ ?

अंजुम : नही रहने दे तू खामोखाः थक जाएगा

आदम : काम करने में कैसी थकान? तेरे काम से ज़्यादा थकावट तो इस काम में नही होगी

माँ शरमा गयी उसने मेरी तरफ तीखी निगाहो से देखा...फिर कपड़े, कपड़े धोने वाले बल्ले से पीटने लगी...मैं माँ को काम में मलिन देख मैं भी उसके नाइटी पहने जिस्म को ताड़ने लगा...एक बात तो तय थी माँ यहाँ की देहातन औरतो की तरह बाल खुले रखा करती थी कोई आँचल नही करती थी....मुझे अच्छा लगता था...खैर मैने सोचा कि मैं भी नहा धो लूँ तो अपने कपड़े उतारने लगा तो माँ ने मेरी ओर देखते हुए ज़ोर से कहा "अर्रे पागल सारे कपड़े क्यूँ उतार रहा है? कम से कम कच्छा तो उतार मत"........माँ की बातों को सुन मैं एक पल के लिए ठिठक गया पाजामा उतारते हुए उसकी तरफ मुस्कुराया..उसे अहसास हुआ मेरे कच्छे के उभार का...वो चुपचाप कपड़े धोते हुए मुझे देख रही थी...

अंजुम : ज़्यादा आगे तक मत जाना पानी गहरा है और तू ठहरा शहरी लौंडा डूब जाएगा (माँ ने फिर मुझे टोका)

आदम : हाहाहा तू है ना तैरके निकाल लेना मुझे

अंजुम : देख ऐसी जगहो पे मुझे मज़ाक मस्ती पसंद नही यहाँ की औरतें तो डेली नहाती है वो तो पेशेवर तैराक है मैं थोड़ी मैं तो बिहार से हूँ हालाँकि वहाँ पे भी गंगा नदी है पर कभी तैरि नही हूँ

आदम : तू फिकर मत कर बस घुटनो तक पानी में जाउन्गा

अंजुम : अच्छा संभाल के

 
मैने उसकी ज़ुल्फो पे अपनी उंगली फिराई तो वो सिहर गयी मैने उसके गाल को हल्के से चूमा फिर उसकी साड़ी को एक झटके में उसके बदन से खींच लिया तो वो हिल गयी मैने धीरे धीरे उसे खड़ा खारके उसे लगभग राउंड घुमाते हुए उसकी साड़ी उसके पेटिकोट की गाँठ खोलते हुए अलग कर दी...माँ अब ब्लाउस और पेटिकोट में थी......माँ जानती थी मेरी हसरतों की आग फिर सुलगने लगी है और अब मैं उसे बकशने वाला नही...

मैने उसे पलटा और उसकी पीठ पे फसि ब्लाउस की डोरियो को खोल दिया फिर हुक भी....फिर पेट पे हाथ ले जाते हुए नाभि को सहलाते हुए पेटिकोट का नाडा भी खोल कर पेटीकोट को कमर तक उठा दिया और उसे लगभग गोदी में उठा लिया वो हड़बड़ा सी उठी...मैने उसे पलंग पे जाके लेटा दिया उसकी गोरी गोरी टाँगों को चूमा फिर मुँह नाभि के पास आते हुए उस पर हल्के से दाँत गढ़ाए माँ चीख उठी उसने हल्की सी मेरे चेहरे पे चपत लगाई फिर नज़ाकत से मेरी ओर देखने लगी...

मैने उसे उल्टा लिटाया और उसकी पीठ को चूमता रहा...पेटिकोट अब तक जो कमर पे थी वो पेट तक आके इकट्ठी हो गयी थी लपेटे लपेटे एक टाँग माँ ने टाँग पे चढ़ाया मैने उसकी टाँगों के बीच अपना मूसल जैसा लंड फिराया और उसकी झान्टेदार पानी छोड़ती चूत में एक ही बार में घुसा दिया तो माँ बदहवास मेरे बदन पे ढेर हो गयी...जैसे वो सुध बुध खो बैठी सिसकते हुए बस अधखुली आँखो से चुदाई का अहसास पा रही थी...मैने उसे अपनी बाहों में समेट लिया और उसकी गर्दन और गाल को चूमने लगा...

उसके बाद बिस्तर जैसे हमारी चुदाई से चर्चर आवाज़ निकलने लगी पूरा बिस्तर हिल रहा था....और मैं माँ की चुदाई करने में मशगूल हो गया....मैने उस रात माँ की गान्ड को फिर एक बार चोदा था....ऐसे 2-3 दिन माँ की गान्ड मारने से माँ को हल्का दर्द उठा फिर उसे मेरा लंड खाने में आदत सी पड़ गयी...इस बार एजेंट ने मामलों में ल्यूब की डिब्बी और कयि ब्रॅंडेड कॉनडम्स के सॅंपल्स लाए थे उनमें से कुछ मैने रख लिया था सोचा था माँ को प्युरे सुरक्षा से निरोध चढ़ा कर ही चोदुन्गा क्यूंकी माँ को बिना निरोधक के चुदवाने से ऐतराज़ था....हम माँ-बेटे अपनी ज़िंदगी ऐसे ही काट रहे थे

मैने मोरतुज़ा काका के कारोबार को छोड़ दिया कारण उनकी वजह से मुझे अपनी माँ के साथ समय बिताने का वक़्त तक नही मिलता था और वो अपने दामाद की मुझसे जी हुजूरी कराने में लगे रहने लगे माँ ने मुझे समझाया कि हर कोई फ़ायदा तो उठाता ही है तू कुछ और कोशिश कर...मैने एजेंट को अपने साथ में कर रखा था और जल्द ही मैं एक डिपार्ट्मेनल स्टोर में ऐज आ पर्चेस ऑफीसर की नौकरी पा गया....हम उतने अमीर तो नही हुए लेकिन हमारे पास कोई पैसो की कमी नही थी ज़रूरत की हर चीज़ थी हामरे पास हम माँ-बेटे अपने ज़िंदगी को ऐसे ही काट रहे थे....माँ अब मुझसे इजाज़त नही मांगती अब हम यहाँ बहुत महीनो से है तो माँ घाट में कपड़े धोने काकी के साथ तो कभी टाउन में सब्ज़ी की खरीदारी खुद करने निकल जाती है....

एक दिन ऑफीस की छुट्टी थी और माँ को घाट पे कपड़े धोने ले जाना चाहता है चूँकि आज काकी जो कि हमारी पड़ोसन जिसके साथ माँ बातें करती थी और उसी के साथ घाट जाती थी वो बीमार थी इसलिए माँ ने फ़ैसला किया कि वो खुद जाएगी पर मैं घर में था और शाम होने को था घाट पूरा सुनसान हो जाता था इस वक़्त इसलिए उसे संकोच हो रहा था अकेले जाने को लेकिन डर की कोई बात नही थी क्यूंकी आस पास कोई नही होता था....मैने माँ का कारण जाना तो माँ के साथ खुद ही कपड़ों से भरा टब लिए उनके साथ घाट की ओर चलने लगा

माँ आगे थी और मैं पीछे तो मुझे उसकी गोल गोल हिलते चूतड़ नाइटी के बाहर से दिख रहे थे...वो आज लेट हो गयी थी नहाई भी नही थी उसने सोचा था कि शाम को कपड़े धोके घर लौट आएगी पर आज मौसम का मिज़ाज भी कुछ ठीक नही लग रहा था लेकिन फिर भी माँ के गंदे कपड़े बहुत मज़ूद थे इसलिए उसे जाना पड़ा...मैं उसके पीछे था और उसके हिलते चूतड़ और उसकी गोलाईयों के उभार को नोटीस करने लगा मुझे अहसास हुआ माँ ने अंदर कोई कपड़ा नही पहना मैने माँ से जब इशारो में ही सवाल किया कि माँ तूने आज अंदर कुछ नही पहना तो उसने बस पलटके कहा अब जब तूने मुझे मना किया है तो मैं काहे को पहनु और घाट कौन सा टाउन में है आस पड़ोस तो औरतें है..और उन्हें क्या फरक पड़ता है? यहाँ तो पल्लू भी किए औरत नंगी चुचियाँ लेके घूमती है

मैं मुस्कुराया और हल्के से माँ के चूतड़ पे छपत लगाई चारो तरफ देखते हुए तो माँ ने मुझे आँख दिखाई फिर मुस्कुराइ मैं माँ के पीछे चले ही जा रहा था और उसकी हिलते नितंबो के उभार को नाइटी के बाहर से ही घूर्र रहा था....और माँ आगे आगे उसे सब मालूम था पर उसे भला क्यूँ आपत्ति होती मर्द जो था उसका...

रास्ते भर माँ को घुरते हुए मैं उसके साथ कुछ ही देर में घाट पहुचा...पीछे मूड के देखने पे घर सबका दूरी पे था मुझे मालूम नही था कि घाट हमारे घर से इतने नज़दीक भी हो सकता है....घाट की सीडिया कुल 40-50 के लगभग थी जो सीधे नीचे की ओर जाते हुए पानी की आती किनारों पे ख़तम हो रही थी फिर बीच में दाई और बाई ओर जाती एक बड़ी सी तालाब जैसी नदी थी....उस पार बड़े बड़े पेड थे सुना था उस साइड जंगल पड़ जाता था...और उसके थोड़े आगे नॅशनल हाइवे...मैने पाया कि शाम का वक़्त था और कोई वहाँ मज़ूद था भी नही दाई और बाई ओर कच्ची सड़क थी जो ना जाने किस ओर जा रही थी....पर वहाँ कोई आस पास घर नही था जिस रास्ते से हम आए थे बस वोई चार पाँच घर काफ़ी दूरी पे दिख रहे थे...

माँ ने मुझे आवाज़ लगाई तो वो धीरे धीरे सीडियो पे उतरते हुए काफ़ी नीचे जा चुकी थी...मैं उसके पीछे उतरा...जल्द ही हम दोनो पानी जहाँ से शुरू होता है वहाँ पे बैठ गये माँ तो टब से निकाले बड़े बड़े कपड़ों को एक साइड रखके उसे तालाब के पानी में डुबो डुबॉके निकाल रही थी...वो घुटनो के बल संडास करने की मुद्रा में बैठ गयी थी....उसने अपनी टांगे इतनी खोल ली कि उसके नाइटी के अंदर टाँगों के बीच की झलक मैं आराम से देख सकता था मैं सीडी पे बैठा था...मुँह धोने के बहाने सर जैसे ही नीचे झुकाया...

तो माँ की नाइटी के भीतर उसकी टांगे फैली होने से झाका..उफ्फ झान्टेदार फूली हुई चूत दिखी...जब मैं उपर उठा तो माँ को मुस्कुराता पाया मेरी चोरी पकड़ी गयी थी ..

अंजुम : तू इसलिए मेरे साथ आया है क्या? कम से कम यहाँ तो बाज़ आजा

आदम : तू ही तो बोली कोई आस पास नही है...

अंजुम : तो इसका मतलब तू मुझे अकेला पाके फायेदा उठाएगा

आदम : हा हा हा मैं ऐसा तो नही

अंजुम : क्या भरोसा तेरा? अच्छा चल छोड़ तू मुझे काम कर लेने दे

आदम : मैं तेरी मदद करूँ ?

अंजुम : नही रहने दे तू खामोखाः थक जाएगा

आदम : काम करने में कैसी थकान? तेरे काम से ज़्यादा थकावट तो इस काम में नही होगी

माँ शरमा गयी उसने मेरी तरफ तीखी निगाहो से देखा...फिर कपड़े, कपड़े धोने वाले बल्ले से पीटने लगी...मैं माँ को काम में मलिन देख मैं भी उसके नाइटी पहने जिस्म को ताड़ने लगा...एक बात तो तय थी माँ यहाँ की देहातन औरतो की तरह बाल खुले रखा करती थी कोई आँचल नही करती थी....मुझे अच्छा लगता था...खैर मैने सोचा कि मैं भी नहा धो लूँ तो अपने कपड़े उतारने लगा तो माँ ने मेरी ओर देखते हुए ज़ोर से कहा "अर्रे पागल सारे कपड़े क्यूँ उतार रहा है? कम से कम कच्छा तो उतार मत"........माँ की बातों को सुन मैं एक पल के लिए ठिठक गया पाजामा उतारते हुए उसकी तरफ मुस्कुराया..उसे अहसास हुआ मेरे कच्छे के उभार का...वो चुपचाप कपड़े धोते हुए मुझे देख रही थी...

अंजुम : ज़्यादा आगे तक मत जाना पानी गहरा है और तू ठहरा शहरी लौंडा डूब जाएगा (माँ ने फिर मुझे टोका)

आदम : हाहाहा तू है ना तैरके निकाल लेना मुझे

अंजुम : देख ऐसी जगहो पे मुझे मज़ाक मस्ती पसंद नही यहाँ की औरतें तो डेली नहाती है वो तो पेशेवर तैराक है मैं थोड़ी मैं तो बिहार से हूँ हालाँकि वहाँ पे भी गंगा नदी है पर कभी तैरि नही हूँ

आदम : तू फिकर मत कर बस घुटनो तक पानी में जाउन्गा

अंजुम : अच्छा संभाल के

 
माँ कपड़ों को खंगालने के लिए उठ खड़ी हुई उसने अपनी नाइटी को नीचे घुटनो तक लपेट लिया इससे अगर थोड़ा सा भी कोई आदमी झुकके देखे तो उसके झान्टेदार चूत आराम से उसे दिख जाए....लेकिन उस वक़्त मैं धीरे धीरे पानी में उतरने लगा था....जब घुटनो तक पानी आया तो ऐसा लगा जैसे एक एक कदम और आगे रखना कितना मुस्किल हो रहा था? मुझे डर हो गया तो मैं ठहर गया...वहीं पानी में आहिस्ते आहिस्ते डुबकी लगाने लगा...मैने सिर्फ़ कच्च्छा पहना था जो कि पानी में डूबते ही गीला हो गया जब बाहर निकला तो माँ को इस बार अपनी तरफ झुका हुआ पाया उफ्फ वो पानी में आधी दूर तक उतर चुकी थी इसलिए जब वो कपड़े को झाड़ते हुए बाहर टब में रखने को सीडिया उठी तो उसकी पीछे से चूतड़ की शेप गीले कपड़े में दिखने लगी उसकी नाइटी चुतड़ों के बीच धँस गयी थी उसने अंदर कुछ पहना भी नाही था इसलिए उसकी गोल गदराई गान्ड मुझे आराम से नाइटी के बाहर से भी दिख रही थी उसे इस बात का ख्याल नही था....ये देख देखके मैं एग्ज़ाइटेड हो रहा था कि उसने और सोने पे सुहागा किया...

और मेरे सामने झुक गयी शायद टब में कपड़े रखने के चक्कर में उसके ऐसा करने से उसकी नाइटी का कपड़ा जो घुटनो तक था वो उसके नितंबो के उपर तक आ गया और उसकी गोल गोल गदराई साँवली गान्ड मेरे सामने उभरके प्रस्तुत हो गयी..अफ उसके नितंबो के बीच का छेद जिसमें कल मैने अपना लॉडा ठुसा था..उफ्फ वो भी कितना खुला खुला सा लग रहा था उसकी गान्ड के आस पास हल्के रोयेदार बाल थे जो कि नीचे झान्टो में तब्दील होते हुए चूत के हिस्सो को नाकाम छुपा रहे थे...मेरी ये दृश्य देखके हालत बुरी हो गयी...

और मेरा लंड मेरे कच्छे में ही अकड़ कर एकदम सख़्त खड़ा हो गया....माँ जब पीछे मूड के अपने बेटे को देखती है तो वो भी बड़ी बड़ी निगाहो से बेटे की टाँगों के बीच उसके गीले कच्छे मे लंड को अकड़ा और खड़ा पाती है..जो कि ऐसा लग रहा था जैसे अभी कच्छे को फाड़ कर निकलके उसे सलामी देगा..माँ एकदम से खिलखिलाके हंस पड़ी...तो मुझे उसका कारण समझ आया....मैने अपने कच्छे में अपने लौडे को खड़ा और एकदम दिखता पाया तो माँ को देखते ही अपनी टाँगों के बीच हाथ रख लिया...माँ ने टब एक साइड रख दिया और मेरे करीब पानी में उतरी...

उसने पाओ आगे रखा ही था कि वो फिसलते फिसलते बची मैने उसे कस कर थाम लिया तो उसने मेरे कंधे और कमर पे अपने हाथ को मज़बूती से रखा..."उफ्फ तेरा सहारा ना मिलता तो अभी पानी में डूब जाती"......

."और तू इस घाट पर रोज आना चाह रही थी अभी कुछ हो जाता तो".......

"तूने लालच दिया नहाने का तो मैं भी आ गयी"......

"तूने अंदर कुछ पहना नही उपर से तेरी नाइटी गीली हुई तो नाइटी एकदम झिल्लिदार ट्रॅन्स्परेंट हो जाएगी और अंदर का सारा दृश्य हर कोई देख लेगा...माँ एकदम से शरमाई उसे अपनी ग़लती का अहसास हुआ उसने ज़ुबान पे दाँत रखके हल्का सा काटा...

मैं और माँ दोनो घाट के पानी में घुटनो तक उतरे हुए थे...इतने में माँ और मुझे कड़कती बिजलियो का शोर सुनाई दिया..हमने आसमान की तरफ देखा जिसमें काले बादल सिमटते हुए चारो तरफ के वातावरण को अंधकार में तब्दील कर रहे थे....मैं और माँ फ़ौरन हड़बड़ाते हुए पानी से किसी तरह से बाहर आए...सीडिया चढ़े माँ ने टब उठाया तो उसे मैने एक हाथ में कर लिया और एक हाथ में माँ का हाथ पकड़ लिया....माँ ने मुझे जल्दी जल्दी घर पहुचने की इच्छा जताई....और हम दोनो धीरे धीरे सीडिया चढ़ते हुए उपर आए...तब तक बारिश एकदम टॅप टॅप करते हुए होने लगी....

अंजुम : उफ्फ बेटा ये अचानक से तूफान भरी बारिश कैसे स्टार्ट हो गयी?

आदम : कोई बात नही माँ हम जल्दी घर पहुच जाएँगे इस्सह काश बाइक ले आता अब तो पैदल चलते गये तो पूरे कपड़े गीले हो जाएँगे

अंजुम : हां रे ग़लती की उफ्फ संभाल के ये धुंल इतनी उड़ रही है कि अँधा कर देगी

मैने माँ का हाथ कस कर पकड़ा हुआ था...सच में मौसम का मिज़ाज़ एकदम से बिगड़ गया था इतनी तेज़ मुसलाधार बारिश शुरू हो गयी कि मालूम ही नही चला..माँ की पूरी नाइटी गीली होने लगी...मैं और माँ हाथ थामे एकदुसरे का जल्दी जल्दी सड़को पे लगभग भीगते भागते घर की तरफ बढ़ रहे थे.....घर पहुचते पहुचते हम पूरे भीग चुके थे....गनीमत थी कि बरसात की वजह से कोई बाहर मौजूद नही था वरना माँ की नाइटी जो एकदम गीली होके ट्रॅन्स्परेंट सी बन चुकी थी उन्हें उभार के साथ माँ की चुचियाँ और पीछे के नितंब भी आराम से दिख जाते...नाइटी एकदम गीली होके माँ के बदन से चिपकी हुई थी...जो कपड़े धोने लेके गये थे वो भी गीली हो चुकी थी..

घर के सामने वाला रास्ता एकदम कीचड़ से सारॉबार था....मैने अपने जैसे तैसे पहने प्यज़ामे को घुटनो तक मोड़ा और माँ का हाथ पकड़े आहिस्ते आहिस्ते किचॅड भरे रास्ते मे चलने लगा....लेकिन माँ का बॅलेन्स बिगड़ते जा रहा था वो मुझे कस कर पकड़े हुई थी....मैने ना आँव देखा ना तांव सीधे उसे अपनी बाहों में उठा लिया...ऐसा करने से माँ एकदम से हड़बड़ा गयी...थोड़ा सा झुका और माँ ने पास रखा टब उठा लिया...अब मैं माँ को अपने गोदी में लिए पूरी ताक़त भरता हुआ घर के द्वार तक पहुचा...उसे अपनी गोद से उतारा फिर जल्दी जल्दी ताला खोला...हम अंदर आए और झट से दरवाजा लगाए...माँ तुरंत टब लिए गुसलखाने की तरफ दौड़ पड़ी तो मैने वहीं दरवाजे के पास ही अपने सारे गीले कपड़े उतार दिए...

आदम : माँ माँ तू अंदर है क्या?

अंजुम : बेटा लाइट चली गयी है तू झट से मोमबत्ती रसोईघर से जला के ले आना

आदम : ठीक है माँ

मैं जब रसोईघर से मोमबत्ती गुसलखाने के पास लाया तो माँ ने पर्दे के बाहर हाथ लाते हुए उस मोमबत्ती को पकड़े अंदर किया....मैने अपने गीले कपड़े भी गुसलखाने के अंदर एक ओर फ़ैक् दिए...जिसे माँ ने समेटते हुए टब में रख दिया..जब मोमबत्ती की रोशनी अंदर से बाहर की ओर आई...तो पाया कि पर्दे में माँ की परछाई दिख रही थी उसके सख़्त निपल्स और उसकी छातियो का उभार दिख रहा था वो अंदर नंगी खड़ी हुई थी....मैने जब थोड़ा झुकके झाँका तो पाया गीली नाइटी को वो कबका उतार चुकी थी जो उसकी टाँगों में फसि हुई थी जिसे उसने एक एक पाँव से निकालते हुए टब में डाल दिया...फिर उन कपड़ों को धोने लगी...

 
जब अंजुम को अहसास हुआ कि उन कपड़ों में बेटे का कच्छा भी है तो वो शरमाई उसे लगा बेटे ने अपने सारे कपड़े उतारके उसे दे दिए थे लेकिन वो ये ना जान पाई...कि बाहर उसका बेटा भी एकदम नंगा खड़ा अपने मोटे लंबे लंड को हाथो में लिए पर्दे के अंदर झाँकता हुआ अपनी माँ के यौवन को घूर्र रहा है..

जब तक अंजुम को कुछ अहसास होता तब तक उसे अपनी नाभि के नीचे बेटे के हाथ की सरसराहट हुई..उसने देखा उसके बेटे ने कस कर उसके पेट पे अपने हाथ लपेट लिए थे और एक हाथ उसकी दाई छाती पे रख चुका था....उसने अपने कपड़े वैसे ही रख दिए...बेटे ने उसे अपनी तरफ मोड़ा....उसने उसकी आँखो में वासना देखी..प्यार भी वासना उसने हाथ नीचे ले जाते हुए मोमबत्ती की रोशनी में अपने बेटे के उत्तेजित लंड को एकदम सख़्त पाया उसे अपने हाथो में लिया और उसे मुट्ठी में कस कर आगे पीछे उसकी चॅम्डी को करने लगी...

बेटे ने उसके बदन से खेलना शुरू कर दिया और उसकी दोनो छातियो को दबाने लगा...साथ में उसके सख़्त निपल्स को भी उंगलियो से सहला रहा था.....माँ सुध बुध खोके एकदम बेटे के बाज़ू में टूट गयी...बेटे ने उसकी नंगी पीठ पे हाथ लपेटते हुए अपनी उंगलिया कस ली फिर उसकी गर्दन और गाल को चूमते हुए उसके सर को उपर उठाया...उसने उसकी ठुड्डी को चूमा फिर उसके दोनो गाल पे हाथ रखके उसके चेहरे को अपने तरफ किया माँ और बेटे दोनो एकदुसरे के होंठो से होंठ मिलाए चुंबन प्रक्रिया करने लगे...

एकदुसरे को पागलो की तरह किस करते हुए एकदुसरे में जैसे समाने लगे...एकदुसरे के बदन को सहलाते हुए उत्तेजित करने लगे...आदम ने माँ के लबों पे चूमते हुए उसके निचले उपरी होंठ को चूसा फिर मुँह में ज़ुबान दी फिर उसकी पीठ को अपनी तरफ मोड़ ते हुए झुकाया....माँ ने दीवार पे अपने हाथो का सहारा किया...वो घोड़ी की मुद्रा में झुक गयी...

बेटे ने उसके नितंबो को हाथो से भरपूर मसल्ते हुए उसके छेद में अंगूठा घुसा दिया...अंगूठा अंदर बाहर करने से ही माँ उत्तेजित होने लगी...आदम ने अपने सख़्त खड़े लंड को माँ के नितंबो के बीच घिसते हुए उसकी चूत की गहराई तक डाला...जो धीरे धीरे माँ की गीली चूत होने से अंदर प्रवेश होने लगा....माँ ने कस कर बेटे के हाथो पे अपनी हाथ कस लिए...

और आदम ठीक उसी मुद्रा में माँ को पीछे से चोदने लगा...माँ एकदम तबीयत से चुद रही थी...उसकी छातियो के ज़्यादा आपस में टकराते हुए हिलने से आदम ने उसे अपने दोनो हाथो की गिरफ़्त में लिया और उसे बड़े ही प्यार से मसलना शुरू किया...माँ अपनी ज़ूलफें हटाते हुए बेटे को देखें जा रही थी...बेटा वासना पुर्न निगाहो से माँ की चुदाई करता उसे निहार रहा था...

आदम : उफ्फ माँ मैं गया माँ मैं गया आहह उम्म आहह

अंजुम : उफ़फ्फ़ आहह उहम्म आहह हां ऐसी ही वाहह आहह आहह आईससे हिी आहिस्त्ते आहिस्स्ते ससस्स तेरा लंड मेरी चूत के भीतर घिस रहा है...उफ्फ बहुत मोटा है तेरा बहुत लंबा है तेरा आहहामम्म

माँ चीखते हुए साँस भरते हुए बेटे की चुदाई का आनंद ले रही थी.....कुछ देर घोड़ी मुद्रा की चुदाई के बाद आदम ने अपना लंड उसकी चूत की गहराईयो से बाहर खींचा और फिर उसे अपनी तरफ झुकाते हुए नल के पानी से अपने लंड को धोया और उसके मुँह में डाल दिया....माँ बेटे के लंड को मुँह में भरे बड़ी बड़ी निगाहो से उसे देख रही थी

उसने बड़ी ही मुस्किल से बेटे का लंड मुँह में भर लिया था उसे प्यार से अपने मुँह के भीतर अंदर बाहर करते हुए चूस रही थी....बेटा माँ को चुस्वाते हुए चरम सुख का आनंद प्राप्त कर रहा था...उम्म्म उम्म्म एम्म स्लूर्रप्प एम्म.....माँ बड़े ही चाव से बेटे के मोटे लंड को चुसते हुए उसे अपने हाथो से भी हिला रही थी...कुछ ही देर में जब उसे बेटे के स्खलन होने का अहसास हुआ तो उसने अपने मुँह से बेटे के लंड को बाहर किया और उसे कस कर मुत्ठियाने लगी...जब बेटे को माँ के मूठ मारने का दर्द बर्दाश्त नही हुआ तो वो लगभग अकड़ता हुआ माँ के चेहरे पे झड़ने लगा...

आदम : ऑश मामा आहह उहह उफ़फ्फ़ आहह

माँ के होंठो पे चेहरे पे हर तरफ बेटे के गरम गरम वीर्य की धार छूटती चली गयी....जब उसे अहसास हुआ कि आखरी पिचकारी भी निकल गयी तो उसने लंड को कस कर मुट्ठी में लेके निचोड़ा और उस पर अपनी ज़ीब लगाई जिससे आदम काँप उठा....

उसने बेटे को हांपता हुआ पाया..उसे अपनी ज़ीब पे बेटे के वीर्य के नमकीन स्वाद का अहसास हुआ उसने कभी मर्द का दूध चखा नही था आज उसका टेस्ट उसे लाज़मी तौर पे हुआ..वो मुस्कुराइ और फिर झुके झुके ही नल खोल कर उसके पानी से अपने चेहरे को धोने लगी...

अंजुम : बेटा ज़रा साबुन तो देना

आदम : हां माँ ये लो

अंजुम ने साबुन लेते हुए घुटनो के बल बैठे अपने चेहरे पे साबुन लगाया और नल के पास चेहरा लाके उसे धोने लगी.....उसने फिर बेटे के गीले लंड को भी पानी से गीला करते हुए उस पर साबुन मला....दोनो एक साथ एकदुसरे के साथ नहाने लगे...माँ ने आज खुद आदम को साबुन लगाके नहलाया...दोनो एक ही तौलिया से पोंछते हुए बाहर आए...फिर आदम ने पास पड़ी लूँगी पहन ली और बिस्तर पे ढेर हो गया....माँ ने अपने कपड़े अलमारी से निकाले उसे पहना और रसोईघर चली गयी कुछ ही देर में उसके हाथ में दो गरम चाइ की प्याली थी...

दोनो बैठके चाइ की चुस्किया लेते हुए बातें करने लगे...शाम रात में तब्दील हो चुकी थी...."अच्छा बेटा उस दिन तूने वैद्या का क्या कहा था? कौन सा वैद्या से तूने क्या लिया था?".........

आदम शरमा गया उसने चाई ख़तम करते हुए माँ की तरफ मुस्कुराया

आदम : बस माँ ऐसे ही

अंजुम : क्या ऐसे ही बताना आज तो बता सकता है?

आदम ने कुछ सोच विचार किया...जानता था माँ को कहीं मालूम ना पड़ जाए उसके पास्ट के बारे में..फिर उसने काफ़ी सच का झूंट कहते हुए अपने पुराने संबंधो को छुपाते हुए कुछ इस तरह ब्यान किया कि उसे धात निकलने लगा था और वो काफ़ी कमज़ोरी महसूस करता था उसे गॅस भी बनती थी जो कि उसके पिछले सप्प्लिमेंट्स यूज़ करने से हुई थी उसने बॉडी बिल्डिंग करना छोड़ दिया था...इसलिए ताहिरा मौसी के ज़रिए उसे सुधिया काकी मिली और फिर उसे वैद्या के बारे में बताया....वो वहाँ गया और उसी से ही आदम ने ऐसी दवा माँगी...माँ ये सब बड़े गौर से सुनते हुए आख़िर में मुस्कुराइ....

आदम ने कहा कि तू फिकर ना कर तेरी छातियो के लिए भी मैं दवा लाउन्गा ताकि उनके साइज़ भी बढ़ जाए

अंजुम : छी तौबा मुझे ऐसी कोई दवाई नही चाहिए जैसे मैं हूँ खुश हूँ

आदम : पर फिर भी माँ?

अंजुम : कहा ना यह सब रहने दे तू भी ना...यहाँ आके तू पूरा खराब हो गया मुझे तो पहले से पता था

आदम : हा हा हा

आदम ने माँ के पास बैठते हुए उसके कंधे पे हाथ रख दिया...दोनो कुछ देर प्यार भरी बातें करने लगे...उसके बाद माँ किचन में खाना बनाने चली गयी तो आदम लाइट के आ जाने के बाद पीसी पे व्यस्त हो गया....जब माँ खाना से फारिग होके अंदर लौटी तो पाया बेटे ने एक सेक्सी सी फिल्म पीसी पे लगाई हुई थी

 
माँ और मेरी ज़िंदगी काफ़ी हँसी खुशी कट रही थी....ना उसकी ज़िंदगी में कोई दुख था ना दर्द अब वो जैसे कष्टमुक्त थी...अभी उसे प्यार करने वाला उसका बेटा हरदम उसके साथ था उसके पास था...उसने कभी ख्वाबो में भी ये ना सोचा होगा कि बेटा कुछ इस तरह उसका यूँ दीवाना हो जाएगा...उसकी चाहत का जुनून सारी हदों को पार कर देगा और सारे रिश्तो की सीमा लाँघ देगा...

मैने माँ को हर मुमकिन वो खुशिया दी थी कि जिससे उसकी झोली भर जाए...जो ज़िंदगी उसने सुहागन होने के बाद बाद भी ना जी थी...उन ख्वाहिशो को मैने एक ही झटके में उसके कदमो पे लाके दिया था...उसे हर सुख प्राप्त था...कोई कमी बाकी नही थी उसके बेटे के प्यार में....वो भी अपने बेटे को तंन मन से अपना सबकुछ मान चुकी थी....जिसे उसने नौ महीने तक कोख में रखा था आज वोई बेटा उसकी ज़िंदगी भर का साथ देने के लिए उसका हाथ थामें था....ये अटूट रिश्ता ये प्यार किसी के समझने की बात नही थी..

माँ मेरी बीवी थी और बीवी पे उसके मर्द का पूरा हक़ होता है कि चाहे वो जैसे भी उसे रखे....माँ को मैने हर सुख के साथ रखा हुआ था....अब वो सुहागनो की तरह तय्यार रहती थी महेंगी से महेंगी साड़ी,साज शृंगार का सामान सबकुछ था उसके पास....हर दिन नये नये रंगो की कलाईयों में चूड़ियाँ डाले रखती थी तो बेटे के दफ़्तर से पहले ही तय्यार होके अच्छे कपड़ों में उसका इंतजार करती थी.....जब मुझे माँ का सुख मिलना प्राप्त हुआ और उसके जिस्म के भोग लेने का आनंद भी तो धीरे धीरे मेरे अंदर भी बदलाव आने लगा और मैं अब काफ़ी सेहतमंद एकदम तंदुरुस हो गया...

माँ मुझे अच्छी खुराक देती थी...मैं माँ के हाथो से ही खाना ख़ाता था...और रात को ऑफीस से आने के बाद उसे अपने हाथो से डिन्नर करवाता था....सनडे को हम किसी मिया बीवी की तरह एक साथ निकालने जाते थे.....मैं माँ को घर में काफ़ी तय्यार रखता था...रंग बिरंगी हाथो में चूड़ियाँ साड़ी पहनाने की आदत डलवा दी थी की अक्सर वो घर में बहुत ही खुले गले तो कभी बाज़ू कट ब्लाउस वाली के साथ मॅचिंग या ट्रॅन्स्परेंट एकदम सेक्सी सी साड़ी पहना करती थी....अब तो उसका बदन एकदम निखर गया था...बाल एकदम घूंघुराले जो थे उसे बार बार ब्यूटी पार्लर जाके माँ ने सीधा करवा लिया था....बाकी टाँगों के और हाथो के बालो की वॅक्स वो घर में कर लिया करती थी ये उसके बेटे का उसे ऑर्डर था

बाकी कांख के बाल को मैने कैची से एक रात चुदाई से पहले छांट के एकदम छोटे छोटे कर दिए थे अब उनके उगने से पहले मैं अक्सर ऐसा ही कर दिया करता था...बाकी उसकी झान्टेदार चूत को सॉफ मैं खुद करता था....मैने बॉडी शेविंग ब्लेड सॅंपल से मंगवा ली थी मैं खुद माँ की टांगे चौड़ी किए उसकी बालों से भरी चूत को खुद सॉफ करता था...क्यूंकी अक्सर चुदाई के वक़्त वो मुझे बड़े चुभते थे....अब माँ की गुलाबी चूत एकदम सॉफ और चिकनी नज़र आया करती थी....कभी कभी जब मैं नोटीस कर लेता था कि चूत में फिर हल्के हल्के रोयेदार बाल उग रहे है तो तुरंत उन्हे झान्ट बनने से पहले ही सॉफ कर दिया करता था....एकबार एजेंट ने बताया कि बांग्लादेश से कुछ फॉरिन प्रॉडक्ट्स आए है उनमे से एक ब्रेस्ट मसाज क्रीम भी आई है...मैने उसका एक सॅंपल टेस्ट करने के लिए अपने पास रख लिया था...

और लगभग 10-15 दिन माँ की मालिश करते वक़्त मैं उसकी नंगी छातियो पे वो क्रीम लगाके माँ की चुचियो को भरपूर उनसे मालिश करता था...करीब कुछ एक महीने में ही माँ को फरक पड़ गया...और उसकी चुचियाँ करीब 37 इंच तक की हो गयी उफ्फ अब माँ एकदम भर जवानी औरत लगती थी साड़ी में तो मैं खुद पे काबू नही कर पता था इसलिए अक्सर उसे दिन के वक़्त सूट ही पहने रहने को कहता था....माँ भी मेरी हां में हां मिलाए रहती थी...हमारे यहाँ से नानी होके गयी मामा मामी भी होके गये थे वो बेहद खुश थे की हम माँ-बेटे कितनी खुशी से एक दूसरे के साथ वक़्त बिता रहे थे...सच पूछो तो उन्हें अपनी अंजुम के बारे में कुछ मालूम ही नही था और ना ही अपने नाती के बारे में

उनकी वजह से कुछ दिन तन्हाई में गुज़ारने पड़ते और उनके जाने के बाद हम दोनो के बीच फिर वोई चुदाई का खेल शुरू हो जाता...हम एकदुसरे के बगैर रह नही पाते थे..हमे किसी चीज़ की ज़रूरत नही थी..धीरे धीरे मैने टाउन में ही एक फ्लोर खरीदने का सोचा और माँ को ये खुशख़बरी सुनाई वो तो पहले से ही काफ़ी खुश थी हमेशा मेरे लिए खुदा से दुआ मांगती थी...मैने बताया कुछ दिन यहाँ आराम से रह ले फिर उसके बाद वहाँ प्युरे तस्सली के साथ खरीदके हम माँ-बेटे वहाँ शिफ्ट हो जाएँगे....माँ ने हामी भरी.....लेकिन मेरे दिल में एक और बात घूम सी रही थी...और वो बात थी माँ से शादी की इच्छा प्रकट करना..लेकिन क्या माँ तय्यार नही होगी? क्यूँ नही होगी? अब हमारे बीच फ़ासले और रह कितने गये? पिताजी को छोड़े माँ को करीब 1 साल होने को है...अब तो पिता जी का इतने सालो के बीच एक कॉल भी ढंग से नही आया....अब उन्हें क्या परवाह? भला वो हमारी ज़िंदगी में झाँकने क्यूँ आएँगे? लेकिन जो भी रहे माँ को पहले रज़ामंद करना होगा फिर उसके बाद ही मैं अपनी इच्छा जाहिर कर सकता हूँ ताकि माँ की मंज़ूरी मिल जाए...मैं बेहद खुश था नये नये सपने सॅंजो रहा था.....

आदम और अंजुम की ज़िंदगी का ये वो मोड़ था कि जहाँ खुशियो ने उनकी ज़िंदगियो पे दस्तक दी थी इस तरह उनकी दास्तान में ऐसा पड़ाव आया कि वो सारे रिश्ते नाते लाज़ शरम पाप पुन्य की बात सबकुछ भूलके सिर्फ़ एकदुसरे के हो गये....आस पड़ोस की औरतें छोटी सोच वालियाँ थी इसलिए उन्हें बेटे का हर दम माँ के पीछे पीछे रहना अज़ीब लगता था हैरत होती थी पर कोई उनपे उंगली नही उठा सकता था....बस मन में यही विचार आता..."इस्सह कैसा ये रिश्ता है? माँ के पीछे ऐसे घूम रहा है जैसे उसका ख़सम हो".......और ये सच भी था क्यूंकी दोनो अगर कहीं जाते भी थे तो इकट्ठे किसी कपल की तरह.....इसी बीच आदम ने काफ़ी सेक्सी सेक्सी ड्रेसस समीर के एक बार बताए ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट से माँ के लिए खरीद ली....उफ्फ उन कपड़ों में माँ कितनी हॉट लग रही थी....

आदम ने माँ की हर पोज़ में एक एक तस्वीर निकाली थी....और उन्हें बड़े संभालके अपने पास रखा था....वो जब भी ऑफीस भी जाता तो उन तस्वीरो को अपने स्मार्ट्फोन पे देखके आहें भरता था जिसमें माँ छोटी लाल मिनी स्कर्ट पहनी घुटनो तक...तो कही फिते वाली टॉप नीली रंग की...तो कही उसने बॅकलेस पूरी पीठ खुली एक सेक्सी सी ड्रेस पहनी पॉज़ दी हुई थी...38 साल की उमर हो चुकी थी लेकिन अदायें एकदम कातिल एकदम 22 साल की लड़की की तरह उनका फिगर था...बस अगर कोई पेट पे गौर करे तो स्ट्रेच मार्क्स को देखने से ही उसे एक बच्चेदार शादी शुदा औरत आराम से समझ जाए....गले में उमर होने से हल्की सी झुरिया दिखती थी वरना उनकी उमर में धोका खा जाए ....आदम को अपने से बड़ी उमर की औरतें जिन्हें अँग्रेज़ी में मिलफ कहाँ जाता है काफ़ी पसंद थी...क्यूंकी उसने नोटीस किया कि उसके आस पास की रहने वाली औरतें जो साड़ी में टहलते हुए आया जाया करती थी रोड से उन लोगो के ज़्यादातर बाल खुले ही रहते थे वो लोग कोई आँचल नही करती थी...उनके ब्लाउस से ही उनकी छातियो का उभरापन सॉफ दिखता था....आदम उन्हें हरपल घूर्रता रहता था...और फिर घर आके अपनी पर्सनल मिलफ को एकबार निहारता था कोई भी ऐसी रात नही थी कि जब दोनो अकेले हो और एकदुसरे से तन्हा रह जाए....हर सुबह गंदी चादर उनके प्रेम प्रसंग का सबूत देता था ....

 
बारिश तेज़ हो रही थी....और सिगरेट सुलगाए वो शक्स चाइ के ठेले के पास खड़ा छप्पाड़ी के नीचे आसमान की तरफ देखता किसी गहरी सोच में डूबा सा था....बार बार जब वो होंठो के बीच से अपना धुआ छोड़ता...तो धुआ ही धुआ पास टँगे बल्ब की रोशनी में फैलते हुए दिख जाता...उसने अपनी मूछो पे हल्की सी उंगली फेरते हुए गंभीर सोच में जैसे करवट मूडी...अभी वो ऐसे चुपचाप तेहरा कशमकश की गहराइयो में उलझा सिगरेट का कश ले ही रहा था कि इतने में एक लौंडा 23-24 साल का टपोरी सा उसके पास आया...उसका हुलिया ही उसकी औकवाड़ को दर्शा रहा था....उसके बाल बिखरे हुए थे और गले में रुमाल बाँध रखी थी उसने कोट पॅंट पहने उस आदमी के कंधे पे जैसे ही हाथ रखा...उसी पल नज़रों में परिवर्तन लाता हुआ सोच को तोड़े वो पीछे मूड कर उस टपोरी लौन्डे को देखते हुए माथे पे शिकन लिए देखने लगा

टपोरी लौंडा एक खबरी था जो कोई और नही उस टोपी और कोट पॅंट पहने शक्स उसी टीटीई राज़ौल का हाइयर किया खबरी था जिसे तलाश थी अंजुम की....लेकिन उस दिन के बाद जब वो काफ़ी डीटेल्स रेलवे एंक्वाइरी से निकाला तो उसने पाया कि अंजुम और उसका बेटा दिल्ली में रहते थे...वो झट से दिल्ली पहुचा वहाँ उसके छोड़े किराए के घर में पहुचा वहाँ मकान मालिक से पूछताछ की तो उसके बाद उसे मालूम चला कि बेटा माँ को लेके वापिस होमटाउन चला गया और उसका पति नोएडा शिफ्ट हो चुका था दोनो के बीच बनती नही थी मिया बीवी में अक्सर झगड़े होते थे बेटा होमटाउन में नौकरी करता था इतना कुछ उसे मालूम चला वो जैसे तड़प उठा अंजुम से मिलने के लिए और जब वो उन दोनो के उतरे उस शहर पहुचा उसके होमटाउन में...

तो यहाँ उन्हें रेत में से सुई ढूँढने के बराबर उसका मक़सद हो गया उन्हें ढूँढना...हालाँकि राज़ौल ने सिर्फ़ महेज़ खुद को एक रिश्तेदार बताया और काफ़ी रिक्वेस्ट की थी मकान मालिक से जिस बाबत आदम के मकान मालिक ने उसे ये सारी इन्फो दे दी थी उसके परिवार के बारे में....जिस बिनाह पे वो उसके होमटाउन आ पहुचा..उसने खबरी को वो तस्वीर दिखाई..जिसे मकान मलिक के बेटे ने आदम की तस्वीर संभाले रखी थी..खबरी ने आज मुआयना करके बताना शुरू किया

खबरी : उसे मैं टाउन में देखा हूँ डिपार्ट्मेनल स्टोर का पर्चेस ऑफीसर है एक आध बार बात भी करी तो बस इतना पता लगा कि माँ के साथ रहता है ये नही बताया कि कहाँ? अपुन ने आदमियो से टाउन का जायेज़ा करवाया पर मिला नही वो छोकरा अपुन को कहीं अब इससे ज़्यादा क्या इन्फो डून साहब

राज़ौल : ह्म इसका मतलब कि वो टाउन से बाहर रहता है?

खबरी : हो सकता है

उम्मीद ना मिल पाने के बाद राज़ौल ने उसे पैसे दिए और जाने को कहा....उसका काम ख़तम था....अब राज़ौल खुद ही ठान लेता है कि वो आदम का पीछा करेगा? लेकिन इस टीटी राज़ौल का अंजुम से क्या नाता था? जो वो इन माँ-बेटों के पीछे दिल्ली से लेके होमटाउन तक उनके आ गया?....जिस बात से अभी तक दोनो माँ-बेटे बेख़बर थे ....और सबसे बड़ी बात कि राज़ौल को आदम और अंजुम से क्या चाहिए था? क्या रिश्ता था उसका? और किस मक़सद से वो दोनो के ज़िंदगियो में दस्तक देना चाह रहा था....

आदम : माँ जल्दी नाश्ता दो यार उफ्फ आज लेट हो गया? (आदम अपने पाओ में मोज़ा पहनते हुए कहता है)

अंजुम : अर्रे बेटा ठहर जा ज़रा (माँ रसोईघर में अपने बेटे के लिए नाश्ता बनाते हुए उसे आवाज़ देती है)

आदम : सॉरी माँ आज काम की वजह से थोड़ा टाउन से बाहर जाना पड़ रहा है अगर सही टाइम पे नही गया तो माल मिस हो जाएगा एजेंट भी गाड़ी लिए मेन रोड पे इंतजार कर रहा होगा उफ़फ्फ़

अंजुम गरमा गरमा पूडीयाँ थाली में लाते हुए साथ में आलू की सब्ज़ी बेटे के आगे रखते हुए मुस्कुराती है...."अर्रे आराम आराम से जाना और तू आजकल बहुत आलसी हो गया सुबह जल्दी उठना चाहिए ना".........तो आदम मुस्कुराया

आदम : माँ तू तो जानती है हम रात को देरी से सोते है और तू मुझे सोने ही कब देती है

आदम के आँख मारते ही माँ सकपकाते हुए उसे झूठे गुस्से भरे भाव से देखते हुए फिर हंस पड़ी..."अच्छा जी हमारी वजह से और आप जो अपनी मोम को हर वक़्त तंग करते रहते है कि चलो ना माँ छोड़ो ना काम चलो ना फिल्म देखते है चलो ना थोड़े देर आराम करते है और पटा सटा के बिस्तर पे लेटा देता है मुझे .....

..आदम मन ही मन शरमाता हुआ माँ का हाथ पकड़ लेता है

आदम : अच्छा मेरी माँ बस बस

अंजुम : अब चल जल्दी नाश्ता कर तुझे देरी हो जाएगी (अंजुम भी मुस्कुराइ)

आदम नाश्ता करने लगा...वो माँ की बनाए पूडियों की तारीफ़ करने लगा और उसे बड़े चाव से खाने लगा...उसने माँ को बताया कि जब वो अकेला रहता था तो इस तरह से कभी नाश्ता नही कर पाता था क्यूंकी उसे देने वाली कोई औरत जो नही थी...माँ उसे प्यार भरी निगाहो से उसे खाते हुए देख रही थी....अचानक अंजुम बेटे के लिए जूता सॉफ करने का ब्रश ढूँढने लगी...जब उसकी नज़र कोने पे पड़ी तो वहाँ दिल्ली से लाए उसके पुराने सामानो के बॉक्स थे..उसने सोचा पहले जल्दी से बेटे को फारिग करू फिर देखूँगी...उसने ब्रश लाते हुए जूते सॉफ करने शुरू किए तो आदम ने उसके हाथ से ब्रश छीना

आदम : अर्रे माँ क्या करती है तू? छी ये सब काम मेरे सामने मत किया कर

अंजुम : अर्रे क्या तेरे स्कूल के दिनो में मैं तेरे जूते सॉफ नही करती थी?

आदम : अर्रे बाबा उन दिनो मैं छोटा था पर अब नही दीजिए अर्रे दीजिए ना लाओ

आदम ने अंजुम के हाथ से ब्रश लिया और खुद सॉफ करते हुए बात करने लगा "ह्म्म्म्म ये सब चीज़ें बड़ों से नही कराया जाता...और तुझे ये सब करते हुए देख मुझे अच्छा नही लगता सेवा मुझे करनी चाहिए तेरी ना कि तुझे वो दिन अब गये".......अंजुम मुस्कुराते हुए बेटे की तरफ एकटक देखने लगी....उसे नाज़ था कि आदम जैसा उसे बेटा मिला जो उसका कितना ख्याल रखता है? और एक उसका पति था जो रात गये भी उसे बाहर सामान खरीदने को भेज देता था...ना कभी उसके लिए परवाह करता था और ना ही कब उस पर ध्यान देता था इन्ही वजहों से अंजुम खुद को जैसे अकेला महसूस करती थी...

अंजुम की जब सोच टूटी तो आदम को एक बार गुसलखाने जाता पाया...अंजुम उसके जुते पलंग के ही पास रखके उस बक्से को खोलने लगती है...जब उसे खोलती है तो उसपर से मिट्टी हटाते हुए अंदर के सामानो का जायेज़ा लेती है..सबकुछ वैसे ही रखा था जैसा पॅकिंग के वक़्त था शायद आदम इस बॉक्स को खुलना भूल गया था....इतने में अंजुम के हाथ में एक ईद कार्ड आया ये उसके दूसवी कक्षा का पहचान कार्ड था उसमें अंजुम की एक ब्लॅक आंड वाइट फोटो थी....उस तस्वीर में अंजुम कमसिन कच्ची कली सी लग रही थी..उसके बालों में दो चोटियाँ थी और जैसा 90'स के दशक में घुंघराले बालो जैसा बीच का कट होता है ठीक वैसा स्टाइल उसके बालों का था....उसका चेहरा निहायत खूबसूरत था और बड़ी बड़ी आँखे थी...ये तस्वीर शादी से पहले की थी उसके बाद उसे याद आया कि 10थ पास करने के बाद ही जब उसका दाखिला 11थ में हुआ तो उसे किन परिस्थितियों से गुज़रते हुए पिता की मौत के बाद बेसहारा और ग़रीबी और लाचारी का सामना करना पड़ा था उसकी पढ़ाई पूरी भी नही हो सकी और उसकी माँ ने बढ़ती लाचारी और ग़रीबी से तंग आके उसकी शादी आदम के पिता से करवाई थी...उसके कुछ 3-4 साल बाद बड़ी ही मुस्किल से आदम उसे पेट ठहरा था....एक तो उसे शादी से ऐतराज़ था और उपर से उसके पति की ही हठधर्मी में उसे गर्भ ठहरा था....आज भी वो उन वाक़यो को कोस्ती थी जब उसकी ज़िंदगी एक नामर्द बुज़दिल कमीने इंसान के हाथो में दे दी गयी थी...

अभी कशमकश का घेरे से अंजुम निकली ही थी...की पीछे से बेटे ने उसके कंधे पे हाथ रखा और वो झुकके माँ के साथ माँ की तस्वीर को देखते हुए मुस्कुराया...वाक़ई उसने इससे पहले ये तस्वीर एक ही बार माँ के दिखाए में देखी थी...वाक़ई क्या कमसिन कच्ची उमर और मासूम खूबसूरत सी उसकी माँ लग रही थी....काश उस वक़्त आदम उसके ज़िंदगी में आता..पर ये मुमकिन तो नही क्यूंकी उसे अंजुम से ही तो इस दुनिया में आना था

आदम : अर्रे माँ तू कितनी खूबसूरत लग रही है?

अंजुम : ह्म इस वक़्त मैं 10थ में थी उसके बाद अनिश्चिंत काल पड़ गया था फिर तेरे होमटाउन आ गयी यानी यहाँ जहाँ तेरे नाना जी रहा करते थे उसके बाद कुछ 1 साल में ही उनकी मौत और फिर मेरा वापिस बिहार जाना नही हुआ...ये बिहार बोर्ड के स्कूल का है

आदम : ह्म जो भी हो माँ जिन परिस्थितिओ से तू गुज़री है उसे अब भूल जा अब तुझे गीला शिकवा करने का कोई ज़रूरत नही..जो बीत गया सो बीत गया

अंजुम : तू नही जानता तेरे पिता ने शादी से पहले मुझे रिझाने के लिए बड़े से बड़े वादे किए थे...और जब शादी कर लिया तो ज़बरदस्ती करने लगे हमे मुझे क्या पता था कि उनकी नज़र मेरी दौलत पे थी जो मेरे झूठी शान चाचा ने दिखाई जिसने मुझे पाला था तेरे नाना तो शुरू से ही ग़रीब ही रहे बस बच्चे पैदा किए और मारके सबको बेसहारा छोड़ दिया

आदम : जाने दो माँ लेकिन वो सब छोड़ो ये तस्वीर मुझे बड़ी अच्छी लगी इसे बाहर ही रखो ना

अंजुम : अच्छा ठीक है ये ले....अर्रे तू अभीतक गया नही जा जल्दी चल जल्दी कर देरी हो जाएगी तुझे

 
आदम : हाहाहा बस आपके ये हाथ में देखा तो मैं भी बातों में लग गया चलो चलता हूँ शायद रात को देरी से आउ घर आने से पहले मिस कॉल दे दूँगा ठीक है

अंजुम : अच्छा बेटा चल जा

आदम : हा हा हा हा

आदम हंसता हुआ माँ से गले मिलते हुए अपना बॅग उठाए जल्दी जल्दी घर से रवाना होता है...वाक़ई कितना ख्याल रखता था वो अपनी माँ का?.....अंजुम फिरसे उस तस्वीर को देखने लगी और उसे दराज़ में रखते हुए काम में जुट गयी....दोपहरी उसे ख्याल आया कि फ्रिड्ज में सब्ज़िया काफ़ी कम पड़ी थी...उफ्फ अगर सब्ज़ी खरीदी नही गयी तो रात को बेटे को क्या खाने में दूँगी? और उसने कहा भी था कि बैगन का भरता खाना है......माँ बुदबुदाते हुए उठ खड़ी हुई....

उसने दोपहर को खाना खाया फिर बालों में तेल लगाने और कंघी करने के बाद वो तय्यार होके शाम को सब्ज़ी मंडी के लिए निकल गयी....अकेले निकलने में उसे संकोच नही होता था....सब्ज़ी मंडी टाउन में थी वहाँ मेन रोड से भीढ़ बहुत थी उसे रोड क्रॉस करने में काफ़ी दिक्कत हुई भी....क्यूंकी बड़े बड़े ट्रक लगभग उससे एक हाथ दूर ही गुज़र रहे थे फिर वो सब्ज़ी मंडी में घुसी....सब्ज़िया खरीदने में मलिन झोला में भरते हुए अंजुम अपने ही गफलत में थी....वो सब्ज़ी वाले को पैसे देते हुए आगे बढ़ रही थी....

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राज़ौल को इस शहर में अभी चौदहवाँ दिन ही हुआ था अभीतक कोई सुराग उसके हाथ नही लगा था उन माँ-बेटे का...सोच की गहराइयो में आस पास की औरतो को ताड़ते हुए वो लस्सी पी रहा था...अचानक उसने देखा कि ठीक रोड के उस पार सब्ज़ी मॅंडी में खड़ी अंजुम सूट शलवार पहने सब्ज़ियो का मोल भाव कर रही थी....उसकी आँखे अंजुम को देखके जैसे एकदम बड़ी बड़ी हो गयी वो अपनी होंठो पे ज़ुबान फेरता हुआ जल्दबाज़ी में ही लस्सी वाले को पैसा दिए ग्लास वैसे ही अधूरा छोड़ उसकी तरफ आने लगा....

इधर अंजुम आलू लेते हुए बैगन की तरफ गौर से देखने लगी एक बैगन कुछ 8 इंच के लगभग मोटा और लंबे से गठन का उसे लगा....वो दिल ही दिल में बेटे के लंड को उससे तस्सवर करने लगी....अचानक जब उसे होश आया तो वो मुँह पे हाथ रखके शरमाने लगी बेटे का भी तो उस बैगन जैसा ही तो दिखता था..."ये कैसे दिए भैया बैगन".....

."40 रुपी किलो"....."

ये भी दे दो".....झोले में सब्ज़िया भरते हुए जब उसे वो भारी लगने लगी तो उसने झोला रखके सब्ज़ी वाले को पैसे दिए और वहाँ से चल पड़ी..

राज़ौल फुर्ती से रोड क्रॉस किसी तरह किए लोगो को ठेलता हुआ आगे बढ़ रहा था...हर कोई उसे अचंभित नज़रों से देख रहा था...कुछ लोग उसके धकेले जाने से उसे गाली दे रहे थे...वो इतनी भीढ़ भाड़ को धकेलते हुए बस बेसवरी से अंजुम के पास पहुचने की नाकाम कोशिशें कर रहा था...जब तक वो ठेले के पास पहुचा तो अंजुम फिर भीड़ में आगे बढ़ गयी...."अंजुमम अंजुमम".......राज़ौल ने ज़ोर से चिल्लाया

लेकिन इतनी भीड़ थी कि अंजुम को सुनाई नही दिया बस उसे अहसास सा हुआ तो उसने पीछे मूड कर देखा फिर मुस्कुराते हुए अपना वेहेम मानी भला कोई उसका नाम यहाँ क्यूँ पुकारेगा ? अंजुम तेज़ कदमो से आगे बढ़ रही थी क्यूंकी भीढ़ बहुत ज़्यादा थी और पीछे राज़ौल उसके बेहद करीब लोगो को ठेलते हुए पहुच चुका था....उसने एक बार फिर आवाज़ दी तो अंजुम ने पीछे मूड के देखा तो पाया कि वोई आदमी उसके पीछे तेज़ी से आ रहा था जिसे उसने ट्रेन में देखा था

"अर्रे ये तो वोई टीटी है? वोई आदमी ये यहाँ?".....अंजुम को ये देख हैरत हुई तो वो कुछ समझ ना सकी राज़ौल उसे रुकने का इशारा कर रहा था....लेकिन अंजुम को डर सा लगा वो उसे जानती थी और ना जाने क्यूँ उसका पीछा करते हुए वो यहाँ तक आया था? वो कुछ समझ नही पा रही थी वो रुकी नही बल्कि दुगने कदमो से तेज़ भागने सी लगी

"अर्रे रूको अंजुमम अंजुम वेट".........राज़ौल चीखते हुए उसके पीछे भागा

दोनो मेन रोड पे थे गाड़िया एकदम तेज़ी से दोनो को क्रॉस कर रही थी....लेकिन गनीमत थी कि अंजुम रोड क्रॉस कर चुकी थी एक तो उसके हाथ में भारी झोला था....वो उसे जैसे तैसे थामें हुई थी इतने में उसकी साँस भारी होने लगी तो हान्फ्ते हुए मेन रोड के बीच के फाटक को पकड़े वहीं ठहर गयी....वो जैसे ही आगे बढ़ी तो इतने में उसे महसूस हुआ कि उल्टे साइड से एक ट्रक उसकी तरफ आ रहा है....एक तो भारी सब्ज़ियो का झोला उपर से ट्रक के हॉर्न की आवाज़ को सुन एकदम से अंजुम हिल पड़ी वो बड़ी बड़ी आँखो से लगभग मैन रोड पे ही खड़ी होकर ट्रक को घूर्र रही थी...जो उसकी तरफ बढ़ रहा था....अभी ट्रक उसके और करीब आ ही पाता कि उस हाथ ने उसे एकदम से पकड़ते हुए झट से मेन रोड से सीधा किनारे पे लाते हुए खींच लिया "काकी बेचो (काकी बचिए)"...ये आवाज़ एक लड़की की थी...अंजुम को ख्याल आया कि उस लड़की ने ही उसे मेन रोड के बीच ट्रक के सामने से खींच लिया था वरना ट्रक तो उसके उपर चढ़ ही जाता...आज एक बहुत बड़ा हादसा होने से बच गया था....

अंजुम ने गौर किया उसने साड़ी पहन रखी थी और माथे पे सिंदूर था...उसे जानने में देर नही लगी कि वो एक शादी शुदा थी....उसने हान्फ्ते हुए अंजुम को थोड़ा सा ज़ोर से कहा "क्या काकी आप तो अभी ट्रक के नीचे आ जाती? ऐसे कोई रोड क्रॉस करता है वो तो मेरी नज़र पड़ गयी आप पर"........

.अंजुम ने उसका शुक्रियादा किया...बातों में अंजुम को खुशी हुई कि ये कोई और नही उसकी जानने वाली थी उसकी ख़ास में से....उसकी बहन की बहू यानी आदम की रूपाली भाभी

उधर अंजुम को किसी औरत के साथ देख राज़ौल वहीं ठिठक गया...उसने पाया कि अंजुम पीछे पलटके उसकी तरफ देख रही थी....साथ में रूपाली भी थी तो वो गाड़ी की आड़ में हो गया...उसने पाया कि दोनो एकदुसरे के साथ थ्री वीलर में बैठी और वहाँ से चली गयी.....राज़ौल के हाथ आते आते अंजुम रह गयी उफ्फ काश वो उसका पीछा कर पाता पर बीच में ही ये आफ़त उसे अपने किस्मत पे खुन्नस सी हुई ...

रात 9:30 बज चुके थे....बाइक खड़ी किए आदम झट से जैसे ही घर के द्वार पे आया तो पाया कि ताला लगा हुआ था...उसने ताले को टटोला "अर्रे माँ कहाँ गयी वो भी इतने रात गये? इस वक़्त तो वो घर पे होती थी ......आदम को बहुत धक्का सा लगा..भला इतनी रात गये माँ गयी किधर? उसने पास की राशन की दुकान मे जाके देखा और वहाँ पूछा तो दुकानदार ने कहा कि माँ तो उसकी यहाँ सुबह से नही आई...आदम को थोड़ी फिकर होने लगी....माँ यहाँ तो किसी को जानती तक नही वो है कहाँ? कही मार्केट में तो नही चली गयी..अर्रे यार कम से कम बताके तो जाती....बेटे को माँ की फिकर होने लगी उसका दिल धक धक करने लगा

उसने माँ को फोन लगाया....माँ ने फोन तुरंत उठाया

माँ : हेलो हां बेटा?

आदम : अर्रे माँ कहाँ हो तुम? मैं अभी पहुचा तो पाया दरवाजे पे ताला लगा है?

माँ : ओह हो बेटा मुझे मांफ कर दे मैने सोचा तुझे मेरी फिकर ना हो जाए तू प्लीज़ जल्दी से ताहिरा के यहाँ पहुच

आदम : ताहिरा मौसी के यहाँ? (आदम को लगा शायद माँ ताहिरा मौसी के यहाँ मिलने गयी होगी)

माँ : हां तू यहाँ जल्दी पहुच फिर सबकुछ बताउन्गी

आदम : ठीक है माँ मैं अभी वहीं पहुचता हूँ

आदम वापिस बाइक पे बैठा और उसे रोड की तरफ मोड़ते हुए स्टार्ट किया..वो फुरती से टाउन की तरफ रवाना हो जाता है....उसके मन में ख्याल आता है कि अचानक से माँ ताहिरा मौसी के यहाँ क्या करने गयी? फिर उसे अहसास हुआ कि ताहिरा मौसी के घर में और लोग भी तो मज़ूद होंगे जो उसके बेहद करीब है

जब ताहिरा मौसी के यहाँ पहुचा तो पाया कि घर में कोई तब्दीलियत नही हुई थी सबकुछ जैसे छोड़के गया था वैसे के वैसा ही लगा वही घर वही गली वही माहौल...

 
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