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Incest माँ को पाने की हसरत

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1 मास तक यही चलता रहा...निशा इस बीच नॉर्मल हुए परिवार के सामने बस संजीब को किसी तरह से कॉल करने के इन्तिजार में थी....कि उस पर क्या कुछ नही बीत रहा....उधर संजीब भी कयि दिनो से निशा को कॉल पे कॉल करता पर जब भी कॉल करता तो ऐसे वक़्त में जब निशा अपने पति के नीचे चुद रही होती...पति की निगाह एक आध बार पड़ी तो निशा पे जैसे आसमान से सीधा उस पर कहेर टूटा..उस रात चीखें कुछ ज़्यादा ही निकलती इतनी बुरी तरीके से आदम उसकी चुदाई करता कि कॉंडम फॅट जाता तो एक बार कॉंडम अंदर रह गया था...एक बार तो खून निकल गया था.....संजीब चिड गया उसे लगा शायद निशा उसे इग्नोर कर रही है पर कुत्ते के मुँह में खून लगा हुआ था...बस उसने इन्तिजार ही करना मुनासिब समझा..क्यूंकी अगर निशा आदम के आब्सेंट में उससे बात करती तो नंबर रिसीव्ड कॉल से वो डेलीट कर सकती थी पर उस बीच हर 1 घंटे में आदम कॉल किया करता था अगर नंबर बिज़ी देखता तो सोचो उसका कितना बुरा हाल करता?

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सलाखो के पीछे से वो लंबी दाढ़ी वाला बाहर निकला...शकल से ही गुंडा था....राजीव दा ठीक वर्दी पहने हुए उसके सामने खड़े थे...दोनो ने एकदुसरे को घूरा...."सलाम साहेब".....

"देख जमशेद आज तेरी सज़ा पूरी हो गयी इसका ये मतलब नही कि तू फिर किसी के यहाँ धाँधली करे".......

"मांफ कर दो साब आगे से अपुन याद रखेगा"......

"ह्म लेकिन जाते जाते तुझे मेरे लिए एक फेवर करना होगा".......

"अरे बोल के देखो साहेब हमारी सज़ा तो आप ने ही कम करवाई वरना तो कमिशनर साहेब का तो था कि हमे लंबा खीचते वो तो आपने ही हमे"...

."बस बस मैने सिर्फ़ तुझे एक मौका दिया है सुधरने का ना कि तुझे बचाने का".......

"तुम काम बोलो ना साहेब"

राजीव : संजीब नाम का एक लड़का रहता है बसबदी में उसका घर है पता तो होगा वहीं आड्वोकेट पाटिल का बेटा

जमशेद : अरे उसको तो जानता है अपुन साब बोलो क्या काम करना है?

राजीव : उसका पीछा किससे मिलता है? किससे फँसा हुआ है? पहले बॅकग्राउंड क्या था

जमशेद : हाहहाहा बस इतनी सी बात हहा आप तो खुद ही अपुन से फिर वहीं लफडा करवाना चाहता है वैसे साला एक नंबर का ठरकी और अय्याश है नयी नयी कॉलेज की लड़की से लेके भाभी यहाँ तक कि आंटी लोगो को भी घर लाता है एक आध बार गया उसकी पार्टी में वैसे आप जानता है उसका बाप बहुत अमीर!

राजीव : अमीर है पर क़ानून से बढ़ कर नही

राजीव ने गुंडे जमशेद को समझा दिया कि उसे क्या क्या करना है? जमशेद सिर्फ़ हां हां में जवाब देता रहा...उसके बाद राजीव ने उसे जाने को कहा और ये बात गुप्त रखने को.....उसके जाते ही राजीव ने मन ही मन सोचा कि ये बहुत ही शातिर गुंडा है एक बार किसी की गान्ड के पीछे पड़ा तो कुछ ना कुछ करके ही दम लेगा...उसने जमशेद पे सिर्फ़ ये ज़िम्मेदारी नही छोड़ी की वो संजीब की पॉल पट्टी खोले...

वो खुद संजीब के आज़ु बाज़ू के मकान के मालिको से मिला...जिनका साफ कहना था..कि संजीब ज़्यादातर शराबी जुआरी और अय्याश मंद इंसान है बाप उससे आज़ीज़ आ चुका एक बार किसी अपने ही घर की कामवाली को प्रेग्नेंट कर दिया था उसने...तो एनजीओ के हेड ने उस पर ग़रीब के साथ सोशण करने का केस ठोक दिया था...पिता ने बड़ी जद्दो जेहेद से उसे बचाया था....उस रात पार्टी में आई निशा की सहेलियो से भी राजीव ने कॉंटॅक्ट करना चाहा तो उसने बताया वो नशे में थी उसके बाद कुछ मालूम नही क्यूंकी बाद में वो वहाँ से रुखसत हो गयी...पर इस बीच निशा की सहेली ने बताया कि आदम ने उस रात निशा का पीछा किया था और उससे ये सच उगलवाया था हार पछता के रानी को बताना पड़ा...राजीव ने आदम वाली बात छुपा तो ली पर बाकी की सारी इन्फ़ॉर्मेशन जानके पुष्टि तो हो गयी राजीव दा को कि निशा और संजीब का चक्कर तो पक्का होगा....वो जो भी पता करे अंजुम को डाइरेक्ट कॉल करके बता देते....जिससे अंजुम का शक़ दिन ब दिन यकीन मे बदलते जा रहा था...लेकिन राजीव दा को एक बात खली आदम निशा का पीछा करते हुए उस पार्टी हाउस तक आया आख़िर क्यूँ? रानी के बताए अनुसार उन्हें ये मालूम चला कि संजीब और निशा का कॉलेज डेज़ से चक्कर चल रहा था सुनके जैसे राजीव दा को शक़ हुआ कि कही आदम को सब मालूम तो नही अगर मालूम है तो चुप क्यूँ है?

उधर अंजुम ने निशा को इन बातों की कोई भनक तक लगने नही दी....ना वो जानती थी कि आदम को सबकुछ मालूम चल गया था..

कुछ ही दिनो में...राजीव दा के हाथ में जमशेद गुंडे ने सारे संजीब के सबूत तथा मोबाइल उसके पास लाके दिया....राजीव ने उससे पूछा कि वो ये मोबाइल कहाँ से उठा लाया?.....तो जमशेद ने बताया कि संजीब के घर उसको चोरी छुपे दाखिल होना पड़ा..उसके बाद वो सीधा घर की तलाशी लेने लगा...

 
संजीब गुसलखाने में नहा रहा था तो तब तक उसने पूरे कमरे की जैसे तैसे छानबीन शुरू की...उसे छानबीन में ना सिर्फ़ उसके खिलाफ सबूत मिले...बाल्की कुछ ऐसा भी मिला जिससे वो सकते में पड़ गया..

राजीव ने उन सीडीज़ को घुर्रा जो आल्मिराह से जमशेद ने निकाली थी...साथ में जमशेद ने अपने फोन से उसे दीवार के ठीक उपर गोपनीय तौर से लॅंप के पास लगा छोटा सा कॅम दिखाया....

राजीव ने तुरंत लॅपटॉप पे सीडीज़ डाल डालके चेक की तो उसके जैसे कान से धुआ निकलने लगा....एक एक सीडी इतनी अश्लील और गंदी थी उसमें संजीब के कमरे का पूरा वीडियो फुटेज था कि वो बिस्तर पे कयि कयि लॅडीस को लाके उन्हें चोद रहा है...राजीव ने झट से सीडी'स निकाली और फिर अपने सीडी डिस्क प्लेट पे रखी और लॅपटॉप में डाला...हर सीडी में वो बस ये पुष्टि करना चाहता था कि किसी में तो उसे आदम की वाइफ दिखेगी....और वहीं हुआ करीब 3 सीडी में निशा की चुदाई संजीब के साथ दिखी राजीव को...उसका तो जैसा माथा फॅट गया हो...

उसने जमशेद की मज़ूद्गी पे लॅपटॉप से सीडी निकाली

जमशेद मुस्कुराया.."अपुन ने पूरी रात वॉच किया साब साला बड़ा चुड़दकड़ आदमी है बिगड़े बाप की औलाद है ना मैने ये भी सुना है कि साला धोबन उमर दराज़ यहाँ तक कि कयि शादी शुदा औरत को ब्लॅकमेल करके चोद भी रखा है ये सीडी'स वो अपने मज़े के लिए रेकॉर्ड किए रखता है साहब".......जमशेद को राजीव ने जाने को बोला जाने से पहले उसने उसके हाथ में दो हज़ार के नोट भी थमा दिए

फिर मोबाइल में की निशा को सारी कॉल्स डीटेल नंबर्स पे भी राजीव को संजीब के मोबाइल से मिली..अब उसका शक़ यकीन में बदल चुका था..लेकिन दूसरे ही पल उसे डर भी सताया कि ना जाने आदम के परिवार पे क्या गुज़रेगी?.....

__________

"निशा निशा".....तभी लाज्जो गेट के पास आई उसने पाया कि संजीब आज फिर आदम के घर आया है उसकी गैरमज़ूद्गी में....लाज्जो को मालूम था निशा ने ही फोन करके बुलाया होगा या फिर अपने मर्ज़ी से आया होगा...इस वक़्त तो घर पे कोई था नही...

उसने झट से दरवाजा खोला और संजीब को पहचानते हुए मुस्कुराइ...संजीब भी चश्मा निकाले आज उसे बारीकी से घुरते हुए पहचान रहा था..

लाज्जो : अरे बाबू तुम यहाँ?

संजीब : अरे तू तो वहीं है ना कांता की सहेली एक बार आई थी ना मेरे घर (संजीब पहचान गया उसे उसकी ही तो सहेली को उसने पेट से किया था)

लाज्जो : हां बाबू पर यहाँ किससे मिलने आए हो?

संजीब : तुझे इससे क्या? तेरी निशा मेडम से मिलना है ? (ज़्यादा बात नही छेड़ा संजीब ने जैसे अपनी चोरी को छुपा रहा था उसे यही डर सता रहा था कि कही इस लाज्जो ने उसकी निशा को सबकुछ बता तो नही दिया)

लाज्जो : हाहः आइए ना हमे काहें को मतलब होगा मालकिन से मिलना है तो अंदर जाइए वैसे भी घर पे कोई नही है

संजीब एका एक शैतानी मुस्कुराहट उसे देता हुआ अंदर आया...फिर लाज्जो ने गेट लगा दिया..."मैं इधर ही हूँ अगर कोई आया तो आवाज़ दे दूँगी".....

."देख लज्जो तूने निशा को तो नही बताया ना कि मैने तेरी उस काता को".....

."नही नही संजीब बाबू भला आपसे क्यूँ दगा करेंगे? आप जैसे अमीर रहीस आदमी पे उंगली उठाने वाले हम कौन होते है?".......

."समझदार है तू ऐसे ही मुँह बंद रखना"......एका एक संजीब मुस्कुरा कर उसके स्तनो के बीच को ब्लाउस के उपर से घूर्रता हुआ अंदर दाखिल हुआ...

.लाज्जो बरामदे के रसोईघर में चली गयी...

 


निशा ने जैसे ही आहट पाई तो वो उठके संजीब को दरवाजे पे प्रस्तुत पाई....वो झट से दौड़ते हुए उसके गले से लिपट गयी...संजीब ऐसे ही लज्जो के बदन को घुर्रे गरमाया हुआ था और उपर से कयि दिनो की ठरक निशा से ना मिलने को हो रही थी....वो बेढंगे तरीके निशा की पीठ और ज़ुल्फो को सहलाता हुआ उसके नितंबो को साड़ी के उपर से ही दबाने लगा...तो निशा ने उसे अपने से दूर किया..

निशा : संजीब ये क्या कर रहे हो? मुझे तुम्हें कुछ बताना है

संजीब : हाहाहा बस कयि दिनो की जैसे प्यास लगी हुई है..

निशा : नही संजीब पहले तुम्हें मेरी बात सुननी होगी (संजीब को कमरे में खीचते हुए दरवाजा बंद करते हुए)

संजीब : अरे जब घर पे कोई नही है तो दरवाजा लगाने की क्या ज़रूरत? और तुम्हारे चेहरे का रंग उतरा उतरा सा क्यूँ है? कयि दफ़ा कॉल भी करना चाहा तो तुमने रिसीव तक नही किया

निशा : मुझे प्ल्ज़्ज़ बचा लो संजीब मेरा जीना मुहाल हो गया है इस घर में...मेरा पति जानवर है जानवर मुझे दिन रात टॉर्चर कर रहा है वो (संजीब ने उसे शांत किया फिर ना चाहते हुए भी उस मतलबपरस्त इंसान ने पूछा कि आख़िर बात क्या है?)

एका एक निशा उसे बताने लगी कि आदम को सबकुछ मालूम चल चुका है..उन दोनो के नाजायेज़ संबंध के बारे में....कयि दफ़ा तो दोनो को उसने रंगे हाथो भी मिलते हुए पकड़ा था...जैसे जैसे संजीब को मालूम चलता गया वैसे वैसे उसके पाँव जैसे काँप उठे...उसकी फॅट गयी ये सुनके कि पति को सबकुछ मालूम चल गया है...बेरहाल अब उसका निशा के पास रुकना ख़तरे से खाली नही था...अब उसकी वो क्या मदद कर सकता था? उसने तो सोचा ऐसे ही संबंध बनाउन्गा और उसके पति को कुछ मालूम नही चल पाएगा...फिर भी संजीब ने सोचा कि चलो निशा को आश्वासन देके एक आखरी ही बार क्यूँ ना उसके साथ चुदाई की जाए...

संजीब उसे हाथ लगाने लगा फिर अपने मनिप्युलेटिव बातों में निशा को फिर फँसाने लगा..."देखो निशा जो हुआ सो हुआ तुम इतना फिकर क्यूँ करती हो? मुझसे संजीब पाटिल से तुम्हे दूर करने की उसकी इतनी ताक़त नही...एक कॉल घमाउन्गा ना तो साले को डोमेस्टिक वाय्लेन्स के तेहेत अपनी बीवी को पीटने के जुर्म में अंदर हो जाना पड़ेगा तुम फिकर मत करो"........

."नही संजीब तुम बस मुझे अब यहाँ से निकाल लो"......

"देखो निशा मैं ऐसा नही कर सकता हमारी सिचुयेशन ठीक नही है पर मैं वादा करता हूँ कि मैं तुम्हें उस जानवर से दूर कर लूँगा".......संजीब वादा करने पे भी जैसे लड़खड़ा रहा था...वो आख़िर एक शादी शुदा औरत को अपने सर क्यूँ बांधना चाहेगा?...उसकी ज़रूरत तो निशा से सिर्फ़ संबंध बनाने तक ही थी या तो अपनी ज़रूरत पूरी करवाने पर...

निशा ने उसे बताया कि उसे किस तरह आदम ने सज़ा दी है..किस तरह उसके साथ ज़बरदस्ती की? उसे कितना दर्द झेलना पड़ा....संजीब तो मज़े ले रहा था....निशा ने अपनी साड़ी उतारी और फिर ब्लाउस...तो संजीब ने उसकी ब्रा को खीचके नीचे किया तो पाया उसकी छातियाँ लटक चुकी थी और चुचियो पे लाल लाल निशान थे....यही नही उसकी नाभि के नीचे भी संजीब ने जब हाथ फिराया तो वहाँ भी उसे दाग दिखे ये सब चुदाई के वक़्त की निशानिया थी जो निशा ने सही थी...

संजीब : जाने दो उस कमीने की बात छोड़ो फिलहाल इतने दिनो बाद हम मिले है कम से कम इस कुछ पॅलो को तो एक साथ बिताए

निशा : पर संजीब तुम पक्का मुझे निजात दिला दोगे ना प्ल्ज़्ज़

संजीब : अरे मेरी जान सस्शह डरो मत मैं हूँ ना चलो अब घूम जाओ

निशा पलट गयी और साथ ही साथ संजीब ने उसे झुका दिया तो जैसे वो झुकी तो उसके नितंबो पे हाथ फेरते हुए जैसे ही संजीब ने एक उंगली गान्ड की गहराइयो में दाखिल करनी चाही...तो छेद ने घपप से उंगली को अंदर सरका लिया वो अस्चर्य से निशा की नितंबो को घूर्र रहा था और उसने हाथ से जैसे ही निशा की चूत भी उंगली डालना चाही तो महसूस हुआ कि चूत का भोसड़ा बन चुका था...उसकी एक उंगली नही बल्कि पाँचो की पाँच उंगली आसानी से अंदर बाहर हो रही थी...निशा की ढीली चूत और गान्ड का भोसड़ा बना देख संजीब खिजला गया

 
उसे ऐसा लगा जैसे किसी कोठे की रंडी या किसी उमर दराज़ आंटी की ढीली चूत में वो उंगलिया पेल रहा था...उसे अहसास ही नही हुआ कि उंगली कब अंदर जा रही थी और कब बाहर आ रही थी....चोद चोद के निशा की भोसड़ी बन चुकी थी....संजीब खिजलाए स्वर में निशा से दूर हो गया...

संजीब : रहने दो अब क्या मारु? अब तो बिल्कुल मज़ा नही आएगा

निशा : क्या कहा तुमने मज़ा? संजीब ये तुम क्या कह रहे हो?

संजीब : आइ थिंक मुझे अब जाना चाहिए

निशा : संजीब ऐसा क्यूँ कह रहे हो? प्लस्स मेरी बात तो सुनो कुछ तो मेरी मदद करो तुमने अभी तो कहा था कि!

संजीब : ह..हां निशा मैं आता हूँ ना मैं फिर आता हूँ तुम कॉल कर देना ओके अभी शायद मुझे यहाँ रुकना ठीक नही लग रहा कभी भी तुम्हारा पति आ सकता है

संजीब का असल बदला रूप देख निशा जैसे हैरान हो गयी....उसने संजीब को कस कर थाम लिया और उससे पूछा कि क्यूँ वो ऐसा बर्ताव कर रहा है? क्या हुआ उसके वादें का उसने तो जीवन भर साथ निभाने की कसम खाई? खुद ही तो उस दिन मुलाक़ात बनाई उसी के चलते उसने कॉंप्रमाइज़ किया उन पाँच बूढ़ो के साथ नशे के हालत में चुर्र भी उसने अपना उन्हें अपना जिस्म सौंप दिया.....केवल उसी के चलते...

.संजीब मन ही मन खुद को कोसने लगा कि साला क्यूँ यहाँ आ गया? ये तो गले पड़ने लगी...अब भला उसमें उसे क्या मज़ा आता? वो तो कुँवारी और सख़्त चूत का दीवाना था....पर यहाँ तो उसके नसीब में फँसना ही था...वो जैसे तैसे निशा को शांत किए वहाँ से जाना अभी चाह ही रहा था...

कि इतने में दरवाजे पे दस्तक हुई...दोनो कठुआ गये...एकदुसरे का मुँह देखने लगे....अभी दोनो खामोश थे दस्तक दरवाजे पे होती ही जा रही थी....

."लगता है तुम्हारे घर से कोई आ गया अब क्या करें?"......एका एक संजीब सहमे हुए अंदाज़ में बोला...तो निशा ने दरवाजे के पास जाके पूछा "कौन है?".........कुछ देर बाद आवाज़ आई

लाज्जो : निशा दीदी दरवाजा खोलिए मैं हूँ असल में अंजुम काकी का कॉल आया है वो लोग आ रहे है तो सोचा आपको बता दूं अंजुम काकी आपसे कुछ बात करना चाहती है

जान में जान जैसे निशा के आई उसने आगे बढ़के झट से दरवाजा खोला...तो सामने सिर्फ़ लाज्जो नही वहाँ उसका पति आदम बगल में उसकी माँ अंजुम...साथ में उसका पति यानी आदम के पिता जी....दूसरी ओर निशा के चाचा-चाची पीछे ज्योति भाभी और राजीव दा भी खड़े थे सब एकटक उसे और पीछे पलंग पे बैठे संजीब की ओर देख रहे थे...संजीब सकपकाई नज़रों इधर उधर फैरने लगा...निशा जिसे अहसास ही नही हुआ कि उसके बदन पे साड़ी का पल्लू नही था वो झट से गिरी साड़ी को उठाए पल्लू चढ़ाने लगी बौखलाई नज़रों से सबको एकटक देखने लगी....सब उसे जैसे खा जाने वाली नज़रों से घूर रहे थे उसके चाचा चाची भी घृणा भरी नज़रो से उसे देख रहे थे अंजुम की भी निगाहो में जैसे हीन-भावना भरी हुई थी....

अंजुम : तो ये कार्य क्रम चल रहा है अंदर परिवार की गैर मज़ूद्गी में ये कर रही है आपकी बेटी और जिसे आप हमारे घर की बहू कहते हो समधी जी देखिए किस तरह से घर की इज़्ज़त को घर में ही नीलाम की जा रही है क्यूँ निशा? अब बोल क्यूँ नही फुट रहा कहो कि मैं तुम्हारे साथ बुरे बर्ताव से पेश आती हूँ कहो कि ये सब झूठ है रानी का पति संजीब है कहो की साड़ी का पल्लू ग़लती से गिर गया संजीब तो यहाँ बस मिलने आया था...

आदम : अरे माँ ये क्या कहेगी ये तो है ही बेशरम बेहया औरत जो कहेगा अब ये कुत्ता कहेगा मादरचोद निकल बाहाररर (जैसे आदम संजीब पे टूट पड़ा)

निशा उसे छुड़ाने लगी आदम ने कस कर दो तीन थप्पड़ तो संजीब को झाड़ दिए और उसके गले को कस कर दबोच लिया "मादरचोद आज तू मरेगा बहेन के चोद तूने मेरे घर में आग लगाया है मादरचोद"........

."आदम प्ल्ज़्ज़ छोड़ दो उसे बेटा प्लज़्ज़्ज़ छोड़ो उसे".......

."आदम बेटा छोड़ो उसे छोड़ो"......राजीव दा अंजुम और उसके पिता तीनो मिलके आदम को संजीब से अलग करने लगे...उसकी पकड़ काफ़ी मज़बूत थी राजीव दा ने ही पूरी ताक़त से संजीब से आदम को अलग किया...लगे हाथो पोलीस वाले का भी एक तमाचा खाए जैसे संजीब वहीं गश ख़ाके गिर पड़ा...

वो जैसे उठना चाहा तो अंजुम ने उसे एक उल्टे हाथ का थप्पड़ मारा...निशा जो संजीब को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी अंजुम ने आगे बढ़के उसे भी एक कस कर तमाचा लगाया...निशा गाल पकड़े वहीं रोने लगी...

 
राजीव : आदम आदम तुम कुछ मत करो शांत हो जाओ अब इसका हिसाब थाने में होगा...

आदम को ज्योति भाभी और लाज्जो दोनो शांत करने लगे...सब कमरे में घुस चुके थे.....निशा के चाचा चुपचाप खड़े हुए थे...उसकी बीवी ही आगे बढ़के निशा को झींझोरते हुए थप्पड़ मारे जा रही थी...

."पूछिए इससे ज़रा क्या कमी रह गयी थी मेरे बेटे के प्यार में? पूरी रज़ामंदी से शादी करवाई थी दोनो की क्या चाहिए इसे? जबसे आई मेरे बेटे की ज़िंदगी में उसके नाक में दम करके रखा है इस कुतिया ने हम तो इसके लिए बेटे से अलग भी होना चाह रहे थे इसलिए सोचा कि अपने ससुराल जाके बात करूँ लेकिन हमे नही मालूम था कि ये इतनी बड़ी धोखेबाज़ औरत निकलेगी अरे जब संजीब ही चाहिए था तो मेरे बेटे के गले क्यूँ पड़ी? बोल ना रे हरामजादि बोल".........

.आदम आगे बढ़के माँ के गुस्से को शांत करने लगा...

"मिस्टर संजीब अब तुम यही अपना ब्यान दोगे या फिर थाने ले जाके यहाँ से भी ज़्यादा सूताई करूँ वो तो वैसे भी होगा तो इसलिए चुपचाप इनस्पेक्टर राजीव के आगे सबकुछ उगल दो".....राजीव दा ने उसे धमकाते हुए कहा...एका एक उनकी आवाज़ में सख्ती की बदलाव आई संजीब वैसे ही डर से कांपें जा रहा था होंठ से खून निकल रहा था उसके...

फिर संजीब ने अपना गुनाह काबुल किया कि कैसे वो हर औरत के पीछे अपनी हसरत को पूरा करने के लिए उनके साथ हमबिस्तर होने के लिए घिनोने से भी घिनोना काम करता है....ताकि वो या तो पट जाए या धमकी से मान जाए....निशा उसके कॉलेज से ही प्रेमिका थी.....निशा का कुँवारापन उसी ने ही तोड़ा था...साथ ही साथ संबंध शादी से पहले तक था..उसके बाद निशा से उसका जी भर गया जब सुना कि उसकी शादी होने को है...

इस बीच निशा के चाचा चाची ने संजीब को अपनी तरफ भी दो-तीन जड़ दिए...और सबको बताया कि ये उसकी बेटी के हाथ धोके पीछे पड़ा हुआ था...राजीव दा ने बीच में उन्हें रोका और कहा कि अब आप लोगो को कुछ कहने की ज़रूरत नही आप लोग अंजान थे और आपके अंजानेपन ने मेरे छोटे भाई आदम की ज़िंदगी खराब कर दी....वो दोनो चुपचाप खामोश हो गये

राजीव : कंटिन्यू कर चल (संजीब फिर ब्यान देने लगा सबके सामने)

संजीब ने अब तक हुए सारे वाक़ये बताए...उसने बताया निशा तो उसकी हवस मिटाने की एक ज़रिया थी वो तो सोच रहा था कि ऐसे ही वो आदम की पत्नी बनी रहेगी और जब तक उसका जी ना भर जाए तब तक निशा के साथ प्यार का नाटक करता रहेगा और उसे अपने घर या फिर उसके घर आके अपनी हसरत को मिटाता रहेगा उसकी जैसे उसे लत लगी हुई थी.....उसने ये बताया कि 4 बूढ़ो के साथ निशा ने जो चुदाई की वो उसकी प्रमोशन के लिए उसने की थी ताकि उसके बिज़्नेस में उसे वृधि हो...कोई लड़की तय्यार नही हो रही थी इसलिए निशा को ही झूठ मूट का उसने अपने अपना बीवी बनाया और उसके राज़ी ना होने के डर में दो गोलिया नशे की मिला डाली जिससे निशा उस पार्टी की रात बदहवास हो गयी तो सबने मिलके उसके साथ! (कहते कहते संजीब रुक गया)

हर कोई जैसे निंदा कर रहा था खुलेआम निशा के कुकर्म और उसके किए कारनामे सब का एक एक चिट्ठा ब्यान करता जा रहा था संजीब....निशा तो जैसे उसे घृणा भरी नज़रो से घुरते हुए मुँह फाडे हुई थी उसके साथ धोखा हुआ और उसे मालूम तक नही

उसके बाद राजीव ने पूरा ब्यान लिया फिर मुस्कुरा कर सबको बताना शुरू किया

राजीव : ये सब अंजुम आंटी को क्रेडिट जाता है कि उन्होने अपने बेटे की ज़िंदगी बचाने के लिए इतना बड़ा फ़ैसला लिया...ना ही सिर्फ़ निशा जैसी बेवफा और मतलबी औरत का राज सबके सामने उठाया...बल्कि आदम की ज़िंदगी को भी नेस्ता नाबूद से बचाया और यही नही अंजुम आंटी आदम को आपसे पहले हमसे पहले सब मालूम चल गया था क्यूंकी जिस दिन मैने रानी से पूछताछ की जो निशा की सहेली थी तो उसने सॉफ बताया कि पार्टी की उस रात आदम संजीब के घर तक आया था...(एका एक अंजुम जैसे बेटे की तरफ देखने लगी और आदम भी नज़रें झुकाए हुए था संजीब का तो जैसे दिमाग़ खराब हो गया ये सब सुनके) क्यूँ संजीब अब ये फोन जो तुम्हारे यहाँ से तुम्हारे पर्सनल एमएमएस बनाए सीडीज़ के साथ चोरी की गयी थी वो मेरे पास है देखना चाहते है तो देखो

संजीब : प..पर आपके पास! ?(संजीब आँखे बड़ी किए कह उठा)

राजीव : जी तुझपे शक़ था इसलिए मैने तेरे घर पे चोरी करवाई ताकि तेरी चोरी को सरेआम सबूतो के साथ पेश कर सकूँ

 
संजीब एक टक राजीव को से घूर्र रहा था.....राजीव खामोश हुआ तो आदम ने आगे आके निशा की तरफ देखा..

आदम : आज घर का हर कोई सामने खड़ा है कह डालो सबसे कि मैने तुम्हें 1 महीने तक टॉर्चर किया कह डालो कि सबकुछ सुनने के बाद जैसे खौलता तेज़ाब अपने गले से अंदर घोंटता रहा....कह डालो सबसे कि तुम मुझपे घरेलू हिंसा का केस करवाओगी अभी कुछ देर पहले कमरे में यही बात चीत हो रही थी ना बोलो ?(निशा से बोल ना फूटा वो अपने सितमो को बताके करती भी क्या? अब तो सारे सबूत और उसका परिवार भी उसके खिलाफ हो चुका था)

आदम : लाज्जो यक़ीनन मेरे घर की कामवाली है पर हमारी सदस्य की तरह है इसने उस दिन मुझे बताया ना होता कि रोज़ की तरह इस बार भी देर रात को नही बल्कि अगले दिन निशा घर लौटी पार्टी से इसने तो बताया ही साथ ही साथ मेरे पूछने पे इसने मुझे सबकुछ बता दिया कि इस संजीब से ये निशा अह्मेद कयि दिनो से फसि हुई है जिसने लाज्जो की सहेली को प्रेग्नेंट तक किया (लाज्जो अपनी तारीफ सुने जैसे शरम से लाल हो गयी आदम के मुँह से अपनी तारीफ सुनी)

राजीव : ये एक बार तो अंदर गया लेकिन लगता है फिर जाने का मन बनाया जो इसने फिर ऐसी नीच हरकत की...

आदम ने तुरंत निशा के चाचा चाची और अपने माँ बाप की मज़ूद्गी में सबके सामने निशा को डाइवोर्स देने का एलन किया....उसने अपने साथ डाइवोर्स पेपर जो दो दिन पहले से उसने बनवा लिए थे निशा के सामने फैका निशा जैसे कठोर सी बुत बनी खड़ी जैसे आदम की तरफ देख रही थी....

उसके चाचा चाची आदम को कुछ कह ना सके क्यूंकी आदम ने उन दोनो को खामोश कर दिया...उसी बीच राजीव ने संजीब को घँसीटते हुए कॉन्स्टेबल को बुलाया और उसे गिरफ्तार किए थाने ले गया....निशा को उसी वक़्त अंजुम ने घर से निकाल दिया....लाख बहसा बहसी के बावजूद उसके चाचा चाची को उसी वक़्त अपनी बेटी निशा को ले जाना पड़ा....दो परिवार में दरार जैसे पड़ गयी....

निशा को तलाक़ दिए आदम को 3 महीने हो चुके थे....वो कठोर सा हो गया था...प्यार मुहब्बत शादी इन सबसे उसका विश्वास उठ चुका था...वो अब पहले जैसा हो चुका था....निशा के जाने के बाद से ही आदम ऑफीस से घर देर रात को ही आता और अपने कमरे में ही खा पीके सो जाता ना ढंग से अंजुम से बात करता ना पिता से....अंजुम बेटे को समझने की कोशिश कर रही थी पर बेटे के दिल में उसके प्रति वैसा ही गुस्सा उमड़ सा गया था जो गुस्सा उसके अंदर पहले था माँ बाप से जुदा होने के बाद...

अंजुम इसी वजह से बेटे को फिर नॉर्मल करने की कोशिश करने लगी...लेकिन वो हँसी मज़ाक बिल्कुल नही पसंद करता था...माँ उसके लिए चिंता में व्यस्त रहने लगी....पिता जी ने देखा कि घर का माहौल अब शांत है तो वो अपने बड़े भाई के साथ कुछ महीनो के लिए कोलकाता चले गये....पर अंजुम बेटे को छोड़ कर नही गयी...राजीव दा भी आदम को लाख समझाए उसे कहा कि अब भूल जाए सब और जिंदगी को हँसी खुशी जिए अब उसे फिकर नही करनी किसी के लिए....बड़ी मुस्किल से कोर्ट केस हुआ और ठीक तलाक़ के 1 महीने बाद ही निशा को उसके परिवार वाले बढ़ती बदनामी से बचाने के लिए घर बैचकर किसी ग्रामीण क्षेत्र मे उसे अपने साथ लिए चले गये...सुना था कि उसे गर्भ ठहर गया था...लेकिन आदम किसी भी सूरत में उसे स्वीकार नही करना चाह रहा था उसने सॉफ कह दिया था कि वो उसका नही उसके यार से हुआ होगा...उसका परिवार कुछ कर नही पाया और तब तक वो लोग वहाँ से जाने की तय्यारी कर चुके थे....संजीब को उसका बाप बचा ना सका और उसे जैल हो गयी...

एक बार फिर अकेलेपन की तन्हाई में आदम अपनी माँ के साथ बिताए उन हसीन पलों को याद कर रहा था....काश वो दिन वो वक़्त वापिस आ पाते....उस दिन अंजुम को सब्ज़िया लाने के लिए मार्केट जाना पड़ गया....लाज्जो शाम को जाती थी...उसने अंजुम की अनुपस्थिति में आदम के पास आई उसने पाया आदम बियर पी रहा था...

 
लज्जो : आदम बाबू आप इतना नशा ना कीजिए ऐसे कब तक दुख में डूबे से रहेंगे

आदम : तुम मुझे लगा कि तुम चली गयी

लाज्जो : आपकी अम्मा ने कहा कि जब तक ना लौटू तुम घर पे रहना तो इसलिए मैं यही ठहर गयी और किनके घरो का काम होता है? बस आप ही के घर तो कम बच जाता है (लाज्जो पास ही फर्श पे टांगे चौड़ी किए उसके सामने बैठ गयी)

आदम : पता है लाज्जो मैं तेरा शुक्रियादा कैसे अदा करू? तूने ना ही सिर्फ़ मुझे उस कुतिया से वाक़िफ़ कराया बल्कि मेरी माँ को भी तूने आराम दिया

लज्जो : हाहाहा बाबू जब तक गौना नही होगा हमरा पति हमको लेने आएगा नही तब तक तो हम आपकी और इस घर की सेवा कर ही सकते है ना

आदम : ह्म्म्म्म

लाज्जो ने देखा कि मौका अच्छा है...उस दिन आदम को निशा की रफ और हार्डकोर चुदाई उसने अपनी आँखो से साकी थी...अफ तबसे ही उसके मन में आदम के लिए बुरे ख्यालात आने लगे थे उसका झूलता वो 8 इंच का लंड उसके ज़हन में अब भी जैसे घूम रहा था..एका एक नशे में आदम को देख लाज्जो की नज़र उसके पैंट के उपर थी

लज्जो : काश हम बेकवर्ड के ना होते बाबू तो आपकी जिंदगी भर सेवा करते (जिंदगी भर का मतलब शादी करके पत्नी बनके सेवा करना )

आदम : हाहहा लाज्जो मुझे अब शादी ब्याह में कोई इंटेरेस्ट नही जाने दे वो सब बात आज तू बड़ा मेरे पास बैठी पैसा चाहिए क्या

लाज्जो : हाए राम हम से आप ऐसी उम्मीद करते है क्या हम आपके साथ दो मिनट बैठके बतिया भी नही सकते अगर ऐसा है तो अभी उठके हम जावत है

आदम : अरे नही नही लाज्जो बैठ जाओ प्ल्ज़्ज़ मैं बहुत अकेला हूँ आज तू नही जानती मुझपे क्या गुज़र रही है?

लाज्जो : आप भूल जाओ ना उसे क्यूँ खुद को दर्द पहुचा रहे हो आपकी ज़िंदगी कितनी पड़ी हुई है ऐसे यूँ अपने जवानी को शराब और दुख में खराब ना करो

आदम : मैं उस रांड़ को तो कबका भूल गया हूँ लाज्जो दरअसल माँ से दूरिया जैसे बन गयी है बस उसी के लिए तू तो दिल में सब बात रखी है तुझसे छुपाउंगा नही अपने ज़िंदगी की हर बात तुझसे शेर करूँगा

लज्जो : तो कहिए ना बाबू

आदम : लेकिन क्या तू पक्का वादा करती है कि जो मैं कहूँगा वो किसीसे नही कहेगी

लज्जो : आप कह कर तो देखिए

आदम : तो ठीक है सुन (आदम बताता चला गया उसे अपने पास्ट के बारे में अपने उन व्याबचार रिश्तो के बारे में जब उसे नया नया सेक्स करने का चस्का लगा हुआ था किस तरह उसने अपने ही परिवार में औरतो को पटाना शुरू किया और फिर कैसे चंपा नाम की रंडी के साथ फस गया था...फिर कैसे उससे दिल भी दे बैठा और आज भी उसके मौत के गम में शोक में डूबा रहता है....फिर उसने बताया वो बात जिसे सुन लज्जो हैरत में हो उठी)

 
लज्जो : क्या ? अंजुम काकी के साथ आपका संबंध

आदम : हां ठीक ही सुना अंजुम मेरी माँ ही नही इस घर में मेरी औरत की तरह मेरे साथ रहती थी हमारे अटूट प्यार की कीमत कोई ना जाने

लाज्जो : ये बात तो मैने सिर्फ़ सुनी थी कि व्याबचारी रिश्ता कुछ ऐसा ही होता है...लेकिन आज जैसे असलियत में एक बेटे और माँ की प्रेम भरी कहानी जैसे सुनी वाक़ई आदम बाबू आपका दिल बहुत बड़ा है दुनिया चाहे ये बात सुनके हँसी मज़ाक उड़ाए या फिर घिन करे...लेकिन सच में किस्मतवालो का होता है ऐसा संबंध

आदम : अब तू बता क्या तू ये सब बात कभी किसी के आगे?

लज्जो : अगर कहूँ तो आपका जूता मेरा सर हम कभी आपको अपना मुँह ना दिखाए भला जिस थाली में खाए उसी में छेद करे..अगर आपकी परवाह ना होती तो हम काहे को आपकी और परिवार की मदद करते...

आदम खामोश हो गया तो लाज्जो शर्मा उठी जैसे मन ही मन सोच रही हो कि अब तो कह डाल.....दुखी का आलम है आदम बाबू ऐसे में शोक में डूबे हुए है अगर उन्हें खुश किया तो अपने दिल की बढ़ास पूरी हो जाएँगी जो 2000 की तनख़्वाह मिलती है वो 2000 से ज़्यादा देंगे साथ में अपने मन की हसरत भी

लाज्जो वैसे ही आदम के सामने साड़ी नही पहनी थी ज़्यादातर ब्लाउस और पेटिकोट में होती कभी कभी पसीने से इतना तरबतर हो जाती थी की उसके निपल्स सॉफ झलकते थे ब्लाउस से...तो कभी ब्लाउस से तो उच्काये चुचियो को जैसे प्रस्तुत उसके सामने झुक झुक के दिखाने की कोशिश करती थी ताकि वो बढ़के और उसने एक आध बार अपने नितंबो के बीच फसे पेटिकोट को घुरते आदम को देखा भी था तो कभी अपनी छातियो को भी घुरते पर उस वक़्त तो निशा थी अब तो वो अकेले थे....और ऐसे में उनके मुँह से कामुक भरी व्याबचारी रिश्तो की दास्तान सुन उसकी टाँगों के बीच का हिस्सा वैसे ही गरमा गया था...

लाज्जो उठ खड़ी हुई एका एक आदम के पास आई उसके कंधे को सहलाई और जैसे झुकी तो ब्लाउस के एक बटन टूटा होने से चुचियाँ सॉफ आदम के चेहरे के करीब...आदम उन्हें देखते हुए मुँह फैरने लगा पर धीरे धीरे पजामे से ही उसका लॉडा अकड़ गया....लाज्जो की निगाह तंबू बने पाजामे पे हुई तो एका एक वो और भी ज़्यादा झुक गयी आदम के पास....आदम को उसके बदन की पसीने की महेक लगने लगी नाक में...तो उसने उसके चेहरे को घूरा एक तक लाज्जो भी उसे ही घूर्र रही थी

लाज्जो : एक बात कहे बाबू (वैसे ही झुकी अवस्था में)

आदम : बोल

लज्जो : हम एक बात सदियो से हम में जैसे दबाए हुए है माँ ने हमसे ये बात छुपाई थी पर बाबूजी से अक्सर लड़ाई के बीच मालूम चलता था हमे जब छोटे थे

आदम : क्या ? (उसके बदन की महेक और उसके आँखो में झाँकते हुए)

लाज्जो : हम आपके भाई बिशल की सौतेली बहन है

आदम : क्या ?

लाज्जो : ह्म सुनके चौंक उठे ना ये हमारे तरफ से भी आपको एक वादा है कि आप ना कहे

आदम : पर कैसे?

लाज्जो : हाहाहा हमारी माँ ताड़ी पिलाती थी आपके मौसा जी को (रूपाली भाभी के ससुर यानी आदम के मौसा जी ) वो गुंडे मवाली है ना तो आया करते थे ठेले पे माँ ही अक्सर उनको ताड़ी पिलाती थी उस पल माँ हमारी उनके करीब आ गयी और फिर! देखिए ये सब बात बताईएएगा नही वरना बवाल हो जाएगा

आदम : लगता है तू भी हालत की मारी है नही बताउन्गा तूने भी तो मेरा राज़ अभी कुछ देर पहले सुना तो इसका मतलब मेरे मौसा जी ने तेरी माँ के साथ

 
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