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Guest
काफ़ी अपनापन सा लगा उनके बीच....रूपाली भाभी ने बताया कि उनकी एक बहन भी है पर वो बर्दमान में ब्याह दी गयी है इसलिए उनका वहाँ से आना जाना बेहद कम होता है....फिर रूपाली का बाप ताहिरा मौसी के घर के लोगो के बारे में पूछने लगा....मैने कहा कि वो लोग भी सही है बिशल दा आए भी थे लेने पर रूपाली भाभी गयी नही....रूपाली अंदर चली गयी थी शायद माँ का हाथ बटाने
खैर दोपहर तक भोजन ख़तम करके रूपाली के पिता ने मुझे सोने और आराम करने को कहा.....लेकिन मेरी आँखो में नींद कहाँ थी...लेकिन इसी बीच रूपाली ने पिता से इजाज़त लेते हुए मुझे आम के बागान दिखाने की बात कही...उसके पिता ने बिना आपत्ति जताते हुए कहा हां पहली बार आया है तो उन्हें भी दिखाओ कि हमारी कितनी बड़ी खेती है? जाओ तुम दोनो देवर भाभी....उन्हें जब कोई आपत्ति नही हुई तो मुझे आश्चर्य हुआ...मैने रूपाली भाभी की तरफ सवालिया निगाहो से देखा...लेकिन वो मुझे ले जाने को ज़्यादा उत्सुक थी...मेरा लगभग हाथ पकड़े मुझे वो अपने घर से बाहर ले आई
आदम : अर्रे तुम्हारे माँ बाबूजी तो बड़े फ्रॅंक है उन्हें कोई ऐतराज़ भी नही हुआ कि तुम मेरे साथ यूँ अकेले
रूपाली : हां और नही तो क्या? तुम कौन से बाहरी आदमी हो जो ऐतराज़ करते....हमे बच्चे ही समझते हैं वो..और देखा नही कैसे बाबूजी मुझे और तुम्हें बाहर भेजने को उत्सुक थे
आदम : ह्म पर इसका कारण क्या है? कही तुम्हारे आने से तुम्हारे माँ बाबूजी की प्राइवसी तो नही भंग हो गयी
रूपाली : ह्म कुछ कुछ ऐसा ही पर अभी दोपहर का वक़्त है ना यहाँ दोपहर के वक़्त आराम करने का रिवाज़ है जब तक शाम के 6 नही बज जाएगे लोग अपने घरो से नही निकलेंगे बस बच्चे लोग ही बाहर कंचे खेलते हुए दिखेंगे और हमारे बाबूजी को तो माँ को बस चोदने की इच्छा हर पल रहती है देखा नही दोनो हमारे सामने कैसे शरमा से रहे थे
आदम : तुम्हारे पिताजी बड़े ठरकी है रूपाली और अगर ठरकी ना होते तो इतनी उमर के बावजूद भी उनका औज़ार कैसे काम कर रहा होता?
रूपाली : ह्म सो तो है रोज़ दोपहर और रात को माँ की जमके चुदाई करते है देखा नही जवान बेटी का भी लिहाज़ नही और ना रिश्तेदारो का (मेरी तरफ उंगली करते हुए) कैसे हम दोनो को बाहर भगा रहे थे
आदम : ह्म लेकिन कसम से तुम उनपे गयी हो तभी तो मेरे भाई के साथ साथ मुझे भी थका देती हो
रूपाली : अच्छा जी (रूपाली ने मुझे ज़ोर से पिंच किया) भाभी से मज़े अच्छा मैं बहुत नाराज़ हूँ कि तुम कल आए नही
आदम : अर्रे सॉरी बाबा वो क्या है ना? कि कल मैं रेलवे स्टेशन गया हुआ था एक तो नौकरी छूट गयी और उपर से माँ से मिलने की तलब उठ रही है
सुनके रूपाली का चेहरा थोड़ा भारी हो गया..."फिर कब आओगे? 1 महीने में लौट आओ ना".......ऐसा लग रहा था जैसे उसका मेरे बिना मन नही लग रहा हो
आदम : देखो रूपाली मुझे जाना तो होगा और वैसे भी यहाँ दूसरी नौकरी मिलने का जल्दी तो कोई चान्स नही पर तुम फिकर मत करो मैं बहुत जल्द लौटूँगा (मैने रूपाली के चेहरे को सहलाते हुए कहा)
रूपाली : अर्रे इधर चेहरे पे हाथ मत रखो (रूपाली ने इधर उधर देखते हुए मेरे हाथ को अपने चेहरे से हटाते हुए जल्दी जल्दी कहा) गाओं है ना लोग बातें बनाएँगे सब जानते है मैं शादी शुदा हूँ
आदम : तो चलो बागान ले चलो वहाँ के आम खा भी लूँगा
रूपाली : चलो फिर हम यहाँ क्यूँ रुके हुए हैं?
रूपाली ने नज़ाकत से मेरे हाथो को पकड़ा और हम कुछ ही देर में रोड क्रॉस करते हुए रूपाली के पिता के बागान पहुचे.....वहाँ कुछ औरत मज़दुरान थी....जिन्हें रूपाली ने गाओं की भाषा में घर चले जाने को कहा...वो लोग वैसे भी शाम तक घर लौट जाते थे....अब हम खुले मैदान जैसे बागान में अकेले खड़े थे....हवा तेज़ चल रही थी....
हम धीरे धीरे काफ़ी अंदर पहुचे....वहाँ पेड़ों पे आम ही आम लटके हुए थे....बागान इतना घना था कि दूर सड़क दिख भी नही रही थी पेड़ और उनकी टहनियों से....सामने एक मचान जैसा बना हुआ था जो कि 4 लंबी लकड़ियो पे टिका हुआ था...उस मचान के उपर एक झोपड़ा जैसा बना हुआ था....रूपाली ने बताया कि यहाँ साँप बहुत होते है इसलिए कभी कभार मज़दूर चौकसी या रखवाली करने के लिए उपर सो जाता है....झोपडे के दरवाजे से सटी एक लकड़ी की सीडी बनी हुई थी...हम दोनो उस पर चढ़ते हुए उपर पहुचे
सीडी चढ़ते वक़्त मुझे रूपाली के हिलते चूतड़ एका एक पाजामे के बाहर से दिख रहे थे...हम दोनो उपर आए उसने दिखाया कि वहाँ दायि ओर से महेज़ झाकने से दूर उसका घर दिखता है..अगर बाबूजी जाग भी जाएँगे तो हमे इत्तिला हो जाएगी...मैं काफ़ी खुश था कि रूपाली का बड़ा इंतज़ाम था उसने तो मुझे जैसे निश्चिंत सा कर दिया था....हम सुखी घास से भरी उस फर्श पे लेट गये....ना जाने इतने दिनो से ना मिले पाने से रूपाली भाभी के तन बदन में आग लगी हुई थी ठरक से वो मुझसे कुछ ज़्यादा चिपक रही थी
आदम : क्या करूँ रूपाली बस कोशिश तो यही रहेगी कि वापिस आ जाउ भला मेरा तुम्हारे बगैर दिल कैसे लगेगा? पर प्लीज़ तुम बिशल दा के परिवार को मालूम मत चलने देना कुछ वरना अगर उन्हें मालूम चला कि मैं अकेला तुमसे मिलने आया तो खामोखाः तुमपे शक़!
रूपाली : क्यूँ सोचते हो इतना तुम? पहले ही मुझे अपना बना चुके तो अब डर कैसा? निसचिंत रहो तुम मेरे घर में हो मेरे ससुराल में नही जो ताहिरा काकी या सुधिया काकी या मेरा पति आके इंटर्फियर करेगा....और वैसे भी उस दिन तुमने सच में बहुत ज़ोर से किया था
आदम : आइ आम सॉरी (रूपाली के हाथो को चूमते हुए जिसपे महेन्दि का रंग चढ़ा हुआ था)
आदम : आज मन है
रूपाली : मन नही है होता तो हम यहाँ क्या सिर्फ़ दिल का बोझ हल्का करने आते
आदम : ह्म ये तो है पर कसम से मेरा भाई बहुत लकी है
रूपाली : तुम्हारे लिए भी लकी हो सकती हूँ उसे तलाक़ देके तुमसे शादी कर लूँगी
मैं और रूपाली ठहाका लगा कर हँसने लगे.....मैने फ़ौरन रूपाली भाभी के होंठो को मुँह में लेके चूसना शुरू कर दिया...रूपाली भी मेरा सहयोग करते हुए मुझे किस करने लगी....इतने दिनो से लगी आग जैसे आज भड़क उठी थी रूपाली के तन बदन में....मैने रूपाली की गर्दन गाल गले को हर जगह चूमा...रूपाली भी पागलो की तरह मुझे किस करने लगी....लगभग मेरे कपड़े उतारने लगी...मैने फट से घुटनो के बल बैठते हुए अपनी शर्ट के बटन्स जैसे तैसे खोले और उसे उतार दिया.....साथ ही रूपाली ने मेरे जीन्स की बेल्ट ढीली की और टॉप का बटन खोलते हुए मेरी ज़िप खोल दी....उसने कच्छे के साथ मेरे जीन्स को घुटनो तक उतार दिया....उसके सामने मेरा झूलता लिंग प्रस्तुत था
जिसे हाथो में लिए रूपाली ने गॅप से मुँह में ले लिया...ऐसा लग रहा था उसे मेरे लंबे मोटे लिंग को लेने की कितनी चाहत उमड़ी हुई थी....अपने पति से भी ज़्यादा उसका देवर के लंड की भूक थी....जिस चाव से वो उसे चूस रही थी उसे बड़ी ही गहराई से मुँह के भीतर तक लेके चूस रही थी...रूपाली बड़े गौर से मुझे देखते हुए मेरे लिंग को कस कस कर चुस्सने लगी...फिर उसने लिंग मुँह से बाहर निकाला और उस पर थुक्ति हुई उस पर मलने लगी फिर मुठियाते हुए दुबारा मुँह में भर लिया...
खैर दोपहर तक भोजन ख़तम करके रूपाली के पिता ने मुझे सोने और आराम करने को कहा.....लेकिन मेरी आँखो में नींद कहाँ थी...लेकिन इसी बीच रूपाली ने पिता से इजाज़त लेते हुए मुझे आम के बागान दिखाने की बात कही...उसके पिता ने बिना आपत्ति जताते हुए कहा हां पहली बार आया है तो उन्हें भी दिखाओ कि हमारी कितनी बड़ी खेती है? जाओ तुम दोनो देवर भाभी....उन्हें जब कोई आपत्ति नही हुई तो मुझे आश्चर्य हुआ...मैने रूपाली भाभी की तरफ सवालिया निगाहो से देखा...लेकिन वो मुझे ले जाने को ज़्यादा उत्सुक थी...मेरा लगभग हाथ पकड़े मुझे वो अपने घर से बाहर ले आई
आदम : अर्रे तुम्हारे माँ बाबूजी तो बड़े फ्रॅंक है उन्हें कोई ऐतराज़ भी नही हुआ कि तुम मेरे साथ यूँ अकेले
रूपाली : हां और नही तो क्या? तुम कौन से बाहरी आदमी हो जो ऐतराज़ करते....हमे बच्चे ही समझते हैं वो..और देखा नही कैसे बाबूजी मुझे और तुम्हें बाहर भेजने को उत्सुक थे
आदम : ह्म पर इसका कारण क्या है? कही तुम्हारे आने से तुम्हारे माँ बाबूजी की प्राइवसी तो नही भंग हो गयी
रूपाली : ह्म कुछ कुछ ऐसा ही पर अभी दोपहर का वक़्त है ना यहाँ दोपहर के वक़्त आराम करने का रिवाज़ है जब तक शाम के 6 नही बज जाएगे लोग अपने घरो से नही निकलेंगे बस बच्चे लोग ही बाहर कंचे खेलते हुए दिखेंगे और हमारे बाबूजी को तो माँ को बस चोदने की इच्छा हर पल रहती है देखा नही दोनो हमारे सामने कैसे शरमा से रहे थे
आदम : तुम्हारे पिताजी बड़े ठरकी है रूपाली और अगर ठरकी ना होते तो इतनी उमर के बावजूद भी उनका औज़ार कैसे काम कर रहा होता?
रूपाली : ह्म सो तो है रोज़ दोपहर और रात को माँ की जमके चुदाई करते है देखा नही जवान बेटी का भी लिहाज़ नही और ना रिश्तेदारो का (मेरी तरफ उंगली करते हुए) कैसे हम दोनो को बाहर भगा रहे थे
आदम : ह्म लेकिन कसम से तुम उनपे गयी हो तभी तो मेरे भाई के साथ साथ मुझे भी थका देती हो
रूपाली : अच्छा जी (रूपाली ने मुझे ज़ोर से पिंच किया) भाभी से मज़े अच्छा मैं बहुत नाराज़ हूँ कि तुम कल आए नही
आदम : अर्रे सॉरी बाबा वो क्या है ना? कि कल मैं रेलवे स्टेशन गया हुआ था एक तो नौकरी छूट गयी और उपर से माँ से मिलने की तलब उठ रही है
सुनके रूपाली का चेहरा थोड़ा भारी हो गया..."फिर कब आओगे? 1 महीने में लौट आओ ना".......ऐसा लग रहा था जैसे उसका मेरे बिना मन नही लग रहा हो
आदम : देखो रूपाली मुझे जाना तो होगा और वैसे भी यहाँ दूसरी नौकरी मिलने का जल्दी तो कोई चान्स नही पर तुम फिकर मत करो मैं बहुत जल्द लौटूँगा (मैने रूपाली के चेहरे को सहलाते हुए कहा)
रूपाली : अर्रे इधर चेहरे पे हाथ मत रखो (रूपाली ने इधर उधर देखते हुए मेरे हाथ को अपने चेहरे से हटाते हुए जल्दी जल्दी कहा) गाओं है ना लोग बातें बनाएँगे सब जानते है मैं शादी शुदा हूँ
आदम : तो चलो बागान ले चलो वहाँ के आम खा भी लूँगा
रूपाली : चलो फिर हम यहाँ क्यूँ रुके हुए हैं?
रूपाली ने नज़ाकत से मेरे हाथो को पकड़ा और हम कुछ ही देर में रोड क्रॉस करते हुए रूपाली के पिता के बागान पहुचे.....वहाँ कुछ औरत मज़दुरान थी....जिन्हें रूपाली ने गाओं की भाषा में घर चले जाने को कहा...वो लोग वैसे भी शाम तक घर लौट जाते थे....अब हम खुले मैदान जैसे बागान में अकेले खड़े थे....हवा तेज़ चल रही थी....
हम धीरे धीरे काफ़ी अंदर पहुचे....वहाँ पेड़ों पे आम ही आम लटके हुए थे....बागान इतना घना था कि दूर सड़क दिख भी नही रही थी पेड़ और उनकी टहनियों से....सामने एक मचान जैसा बना हुआ था जो कि 4 लंबी लकड़ियो पे टिका हुआ था...उस मचान के उपर एक झोपड़ा जैसा बना हुआ था....रूपाली ने बताया कि यहाँ साँप बहुत होते है इसलिए कभी कभार मज़दूर चौकसी या रखवाली करने के लिए उपर सो जाता है....झोपडे के दरवाजे से सटी एक लकड़ी की सीडी बनी हुई थी...हम दोनो उस पर चढ़ते हुए उपर पहुचे
सीडी चढ़ते वक़्त मुझे रूपाली के हिलते चूतड़ एका एक पाजामे के बाहर से दिख रहे थे...हम दोनो उपर आए उसने दिखाया कि वहाँ दायि ओर से महेज़ झाकने से दूर उसका घर दिखता है..अगर बाबूजी जाग भी जाएँगे तो हमे इत्तिला हो जाएगी...मैं काफ़ी खुश था कि रूपाली का बड़ा इंतज़ाम था उसने तो मुझे जैसे निश्चिंत सा कर दिया था....हम सुखी घास से भरी उस फर्श पे लेट गये....ना जाने इतने दिनो से ना मिले पाने से रूपाली भाभी के तन बदन में आग लगी हुई थी ठरक से वो मुझसे कुछ ज़्यादा चिपक रही थी
आदम : क्या करूँ रूपाली बस कोशिश तो यही रहेगी कि वापिस आ जाउ भला मेरा तुम्हारे बगैर दिल कैसे लगेगा? पर प्लीज़ तुम बिशल दा के परिवार को मालूम मत चलने देना कुछ वरना अगर उन्हें मालूम चला कि मैं अकेला तुमसे मिलने आया तो खामोखाः तुमपे शक़!
रूपाली : क्यूँ सोचते हो इतना तुम? पहले ही मुझे अपना बना चुके तो अब डर कैसा? निसचिंत रहो तुम मेरे घर में हो मेरे ससुराल में नही जो ताहिरा काकी या सुधिया काकी या मेरा पति आके इंटर्फियर करेगा....और वैसे भी उस दिन तुमने सच में बहुत ज़ोर से किया था
आदम : आइ आम सॉरी (रूपाली के हाथो को चूमते हुए जिसपे महेन्दि का रंग चढ़ा हुआ था)
आदम : आज मन है
रूपाली : मन नही है होता तो हम यहाँ क्या सिर्फ़ दिल का बोझ हल्का करने आते
आदम : ह्म ये तो है पर कसम से मेरा भाई बहुत लकी है
रूपाली : तुम्हारे लिए भी लकी हो सकती हूँ उसे तलाक़ देके तुमसे शादी कर लूँगी
मैं और रूपाली ठहाका लगा कर हँसने लगे.....मैने फ़ौरन रूपाली भाभी के होंठो को मुँह में लेके चूसना शुरू कर दिया...रूपाली भी मेरा सहयोग करते हुए मुझे किस करने लगी....इतने दिनो से लगी आग जैसे आज भड़क उठी थी रूपाली के तन बदन में....मैने रूपाली की गर्दन गाल गले को हर जगह चूमा...रूपाली भी पागलो की तरह मुझे किस करने लगी....लगभग मेरे कपड़े उतारने लगी...मैने फट से घुटनो के बल बैठते हुए अपनी शर्ट के बटन्स जैसे तैसे खोले और उसे उतार दिया.....साथ ही रूपाली ने मेरे जीन्स की बेल्ट ढीली की और टॉप का बटन खोलते हुए मेरी ज़िप खोल दी....उसने कच्छे के साथ मेरे जीन्स को घुटनो तक उतार दिया....उसके सामने मेरा झूलता लिंग प्रस्तुत था
जिसे हाथो में लिए रूपाली ने गॅप से मुँह में ले लिया...ऐसा लग रहा था उसे मेरे लंबे मोटे लिंग को लेने की कितनी चाहत उमड़ी हुई थी....अपने पति से भी ज़्यादा उसका देवर के लंड की भूक थी....जिस चाव से वो उसे चूस रही थी उसे बड़ी ही गहराई से मुँह के भीतर तक लेके चूस रही थी...रूपाली बड़े गौर से मुझे देखते हुए मेरे लिंग को कस कस कर चुस्सने लगी...फिर उसने लिंग मुँह से बाहर निकाला और उस पर थुक्ति हुई उस पर मलने लगी फिर मुठियाते हुए दुबारा मुँह में भर लिया...