मैने उसकी साड़ी कमर तक उठाई पेटिकोट की डोरी खोलते ही उसे अटका दिया और उसे लपेटते हुए माँ के गजरे पे हाथ रखके उसके बालों को समेटते हुए उसके माथे और होठों को चूमा और फिर उसे अपने उपर चढ़ा लिया...अब मैं उसे दोनो हाथो से नितंबो को कस कर जकड़े हुए गोदी में लिए खड़ा हो गया पलंग के किनारे और उसकी चूत में अपना लंड घुसाने लगा जिससे माँ ने दोनो टांगे और ज़्यादा फैला ली..
और मैं माँ को हिच हिच के चोदने लगा...उसके बाल हवा में खुल गये और लहराते हुए कंधो के इर्द गिर्द लपट गये... में उसे गजरा और अधखुली साड़ी में चोदते हुए अपनी गोदी में देख मेरे लंड ने तो लगभग पानी छोड़ ही डाला था....क्यूंकी वो मंज़र काफ़ी सेक्सी था....उसकी खनकती चूड़िया और उसकी आहों की आवाज़ मेरे कानो में गूँज़ रही थी....मैने पिस्टल की तरह लंड उसकी चूत के मुंहाने से अंदर बाहर करते हुए उसे लगभग उछलते उछलते अपनी गोद में ही 1-2 इंच जैसे उसकी चुदाई दबा कर करे जा रहा था...
वो मुझसे लिपटी जैसे असल मर्द के सुख का आनंद प्राप्त कर रही थी...कुछ ही पल में वो मुझे कस कर जकड़ी और मुझे अपने अंडकोषो और लंड पे गरम वीर्य की धार महसूस हुई वो पानी छोड़ चुकी थी...तो मैने फिर रफ़्तार बढ़ाई वो मेरे बदन से लिपटी एकदम लाश की तरह ढेर चुदे जा रही थी...कुछ ही पल में मैने उसके नितंबो को कस कर पकड़ा और उसे अपने बाज़ू में कस कर जकड़ा और इसी बीच मैं उसकी चूत में ही अपना रस उगलने लगा वो तो अच्छा हुआ कि मार्केट में केमिस्ट शॉप से कॉंडम ले लिया था...
मैने माँ को अपने गोद से उतारते हुए उसे आज़ाद किया और बिस्तर पे उसके शरीर को रख उसकी चूत के बीच की फाको से अपना कॉंडम चढ़ा लंड बाहर निकाला जो स्ररर से निकल गया उसमें सना मेरा लथपथ वीर्य से भरा लॉडा दबा हुआ था जैसे...मैने खीचके कॉंडम को चुटकी से निकाला और फिर लपेटते हुए डस्टपिन में फ़ैक् डाला वॉशबेसिन में थोड़ा उचकते हुए अपने लंड को साबुन से धोया इस बीच माँ एकदम बदहवास लेटी हुई थी....
जब हम अंदर आए तो कुछ देर पहले हुई हमारी भीषण चुदाई की गर्मी भरे पसीने हमारे शरीर ए सी की ठंडी हवाओं ने सोख लिए थे...हम माँ-बेटे एकदुसरे से लिपटे बिस्तर पे ही एकदुसरे के अंगो से खेल रहे थे माँ मेरे सर के बालों को समेटते हुए मेरे चेहरे पे एक चुम्मा देती है..उसके हाथ अब भी मेरे चेहरे को सहला रहे थे...तो मैने उसकी दोनो कलाईयों की चूड़ियो पे हाथ रखते हुए कहा माँ जाएगी ना तू शादी में समीर और आंटी के? माँ ने मुस्कुराते हुए कहा उसने सोफीया से वादा किया है अगर नही जाएँगे तो उन्हें बुरा लगेगा तो मैने कहा ठीक है फिर अगली 13 तारीख की टिकेट मैं निकलवा लेता हूँ....माँ ने मुस्कुराया
मैने एजेंट को फोन किया और उसे उड़ीसा टू मालदह की टिकेट जो कहा था निकलवाने को कहा....तो उसने तुरंत ही 2 घंटे में मेरे लिए 2न्ड एसी की ट्रेन की टिकेट सेंड की मैं नहाने चला गया और फिर रूम से निकल गया इस बीच माँ ने दरवाजा लॉक कर लिया था नंगे ही खड़े हुए....शायद फिर वो भी नहाने धोने चली गयी होगी
क्यूंकी मैने नीचे आके कंप्यूटर से प्रिंट आउट निकलवा लिया....मॅनेजर को कह दिया कि हम कल सुबह 10 बजे ही चेक आउट कर रहे है..वापिस कमरे में आया तो पाया माँ अब सजी धजी नही थी अब उसका चेहरे से मेक अप सॉफ हो चुका था और वो फिर घरेलू औरत बन सी गयी थी मैने कहा कि टिकेट आ चुका है कल दोपहर को वापिस बेंगल पहुच जाएँगे उसने कहा कि उसे ये ट्रिप हमेशा याद रहेगी...मैने उसे गले लगाया क्यूंकी मैं तो खुद इन दिनो के इन्तिजार में ना जाने कब से बैठा था?
हम अगले दिन चेक आउट कर लिए होटेल से....टॅक्सी ने हमे रेलवे स्टेशन छोड़ा...तो मैने माँ को लिए वेटिंग रूम में कोई आधा घंटा इन्तिजार किया जब ट्रेन प्लॅटफॉर्म में लग गयी तो हम अपने ट्रेन में सवार हुए...इस बीच मैने बोरियत मिटाने के लिए दो सुरेन्द्र मोहन पाठक की हिन्दी थ्रिल किताबें खरीद ली माँ जानती थी कि मैं नॉवेल्स पड़ने का शौकीन मिज़ाज़ हूँ
हमारी ट्रेन कुछ ही देरी में उड़ीसा राज्य से निकल गयी..रात का जब अंधेरा हुआ तो मैने उपन्यास छोड़ते हुए माँ को देखा जो बिस्तर लगा रही थी....हमने रात का डिन्नर कबका कर लिया था ट्रेन इस बीच काफ़ी तेज़ थी मैने कॅबिन रूम लिया था इसलिए दरवाजा लॉक्ड किया और माँ के पास आया और उसके गुदास पेट पे हाथ फेरा उसने मुझे मना किया कि सफ़र में ये सब करना ठीक ना रहेगा....लेकिन मैं नही माना
हम दोनो ने लाइट्स ऑफ की और जब तक बेंगल में ट्रेन नही घुसी तब तक पूरी रात ए सी की ठंडी हवा और बंद कॅबिन में सीट्स के भीतर ही चुद्दम चुदाई करते रहे...वाक़ई 1स्ट 2न्ड क्लास ए सी रूम्स की ट्रेन में बात ही जुड़ा है..जहाँ महेज़ दो ही सीट्स और एक रूम जैसा कॅबिन जिसके दरवाजा लगाते ही इतनी प्राइवसी
इस बीच माँ ने चादर उतार ली थी और वो करीब आधी नंगी ही खड़ी थी मैने अपनी सीट पे बैठते हुए उसकी दोनो टाँगों को फैलाया और झुकते हुए उसकी चूत में मुँह लगाके चूसा ट्रेन हिल रही थी काफ़ी तेज़ चल रही थी इसलिए माँ ने दीवारो का सहारा ले रखा था खड़े होने को और मैं उसकी चूत की अच्छी चुसाइ कर रहा था उसके फांको में मूँहघूसाते हुए जीब से उसे कुरेद रहा था...इस बीच मैने अपनी तीसरी उंगली माँ के छेद में करनी शुरू की तो माँ काँप उठी उसने मेरे हाथ में अपनी चूत का फवारा छोड़ दिया
इस बीच माँ की चूत को टिश्यू पेपर से पोंछते हुए मैने उसे सीट पे लेटा दिया फिर चादर आधी ओढ़ते हुए एक कॉंडम चढ़ा कर उसकी चुदाई करने लगा....माँ ने मुझे कस कर पकड़ लिया बाहर शायद हल्की हल्की बारिश की बूँदें पड़ रही थी इसलिए कमरे का माहौल काफ़ी ठंडा सा हो गया था लेकिन मेरी गरमी को कौन निकाल सकता था? माँ ने इस बीच टांगे लपेटे हुए मेरी कमर पे मुझे अपने आगोश में भर लिया...
जब कोई स्टेशन आके ट्रेन थमी थी तब हमे अहसास हुआ उस बीच ना जाने किस चूतिए ने दरवाजे पे दस्तक दी तो मैं और माँ हड़बड़ा उठे....मैने जीन्स कसी शर्ट पहना और फिर माँ ने तो सीधे चादर ओढ़ ली डर के मारे मैने आधा दरवाजा खोला और कहा क्या है? तो मालूम चला कि ग़लत बौगी में दो मियाँ बीवी घुस आए थे मैने उन्हें कहा कि आगे वाला कॅबिन हो सकता है आपका? वो आगे चले गये....मेरा मूड खराब हो गया था फिर मैने दरवाजा लगाया और एक बोतल पानी पीके सामने वाली सीट पे बैठ गया माँ ने पहले पूछा कि कौन थे? फिर जानते हुए कि को-पॅसेंजर्स थे उन्हें शांति मिली जल्दी जल्दी साड़ी पहनी और मुझे बोली कि अब सो जा....मैं भी बहुत थक गया सोया नही था ढंग से इसलिए हम दोनो कुछ घंटो के लिए सो गये....
जब आँखे खुली तो हमारा स्टेशन आ चुका था सुबह 9 बज चुके थे जिसकी तेज़ रोशनी कमरे में पड़ी...हम दोनो ने अपने सफ़र में खूब मज़े किए थे...हम जागे और अपना बॅग हाथो में लिए कॅबिन से निकले ट्रेन कुछ ही पल में स्टेशन पे आके रुकी...उसी बीच हम दोनो भी ट्रेन से उतरे सामान लिए कुली किए रिक्क्षा पकड़ा और फिर घर आए....राजीव दा उस वक़्त घर पे थे नही शायद इसलिए हमे अहसास नही हुआ...क्यूंकी उनकी वाइफ ने दरवाजा लॉक्ड रखा था श्याद अब भी सो रही हो...
वाक़ई ये सफ़र मेरे सबसे यादगार लम्हो में था इस सफ़र ने माँ और मुझे कितना नज़दीक ला खीचा था....उस दिन मैं फारिग होकर अपने नये फ्लॅट से एजेंट के पास गया क्यूंकी मुंबई की टिकेट निकलवा लेनी थी...उसने बताया कि सीट्स एकदम खाली नही है तो मैने कहा कि यार जैसे भी करके कर दो...पर उसने सॉफ इनकार कर दिया अगर होगा तो तारीख से बहुत आगे का..
मैने फ़ौरन समीर को कॉल लगाके बताना चाहा पर दिल नही माना मैने घर में माँ को आके ये बात सुनाई तो उन्हें बड़ा दुख हुआ... और संजोग देखो कि समीर का उसी दिन कॉल भी आ गया की टिकेट्स हुए कि नही? पर जैसे ही माँ ने उसे कारण बताया तो उसने निश्चिंत हो जाने को कहा...आज ऑफीस की छुट्टी कर ली थी इसलिए मैं पूरे दिन सोया आराम करता रहा...
माँ घर के काम काज में लग गयी थी..माँ फिर ज्योति भाभी से मिलने चली गयी और मैं पीसी पे ब्लूफिल्म देखने लगा....माँ वापिस लौटी तो बताया कि राजीव दा ड्यूटी के सिलसिले में कोलकाता गये है कोई केस आ पड़ा है अर्जेंट जिस वजह से गये है...मैने कहा अच्छा...तो माँ ने कहा कि अब क्या करेंगे? तो मैने कहा देखेंगे मैं और ट्रेन की कोशिश करता हूँ क्यूंकी घूमने के चक्कर में थोड़ा खर्चा हो गया है माँ मांयूस सी हुई एक तो नये फ्लॅट में हम शिफ्ट हुए और लग्ले लग्ले घूमने उड़ीसा चले गये...मुझे तो यही लग रहा था कि कहीं समीर को बुरा ना लग जाए...
अगले दिन ऑफीस में माँ का कॉल आया....माँ काफ़ी खुश लग रही थी उसने बताया कि तुझे समीर ने ईमेल किया है उसमें हम दोनो के लिए उसने दो एर टिकेट्स भेजा है...मैं ये सुनके चकित हो गया अब क्या कहूँ ये दोस्त था ही कुछ ऐसा
माँ बर्तन मांझ रही थी...और मुस्कुराते हुए किचन से मेरी और समीर की बात सुन रही थी...दरअसल शाम को ऑफीस से लौट आने के बाद माँ की खुशी का तो कोई ठिकाना नही रहा..इसलिए मैने तुरंत समीर को कॉल लगाया और एर टिकेट्स टेबल पे रखते हुए उससे बात करने लगा....समीर ने मुझे कहा था कि वो मुझे एक मात्र दोस्त मानता है चूँकि हम एक ही कश्ती के जैसे सवार थे हम एकदुसरे से अलग अलग कोई भी खुशी कैसे मना सकते थे
समीर : बस भाई बस इतना थॅंक्स कहने की ज़रूरत नही है मैं चाहता हूँ कि आंटी और तू जल्द से जल्द पहुच और देख मैने टिकेट भी तेरे 13 तारिक़ की निकलवा दी है बस 2 घंटे में यहाँ पहुच जाएगा बाकी कोलकाता तक तो पहुच जइयो
आदम : हन बिल्कुल यार पर कसम से इतना खर्चा करने की क्या ज़रूरत थी? कम से कम एक बार मुझे तो कह देता फ़ौरन टिकेट काट लिए तूने
समीर : साले तेरे आने के चान्सस ट्रेन से तो नाही ही थे अच्छा हुआ आंटी ने मुझे इनफॉर्म कर दिया सुबह सुबह बस दौड़ा गया ट्रॅवेल एजेन्सी और बस काट आया
आदम : फिर भी यार थॅंक यू सो मच
समीर : मुझसे ज़्यादा सोफीया चाहती है कि आंटी उनके पास हो उस टाइम
आदम : हाहाहा सही सोचा है उन्होने मैं भी यही चाहता हूँ अच्छा सुन हनिमून में माँ को कहाँ ले जाने का प्लान बनाया है?
समीर : भाई हनिमून तो बहुत काट आए इसलिए अब हमे कोई जल्दी नही है सोच रहे है एक बार माँ स्विट्ज़र्लॅंड लेके जाउ
आदम : ह्म ये तो बहुत अच्छा आइडिया है चल ठीक है फिर मुंबई में ही मिलते है
समीर : अच्छा आदम चल रख बाइ फिर और हां अब नो बहाना
आदम : हा हा हा हा हां बिल्कुल अब नो बहाना चलेगा
समीर ने फोन कट कर दिया...मैने फोन रखते ही माँ को चाइ और मेरे लिए हॉट नूडल्स लाते देखा जो कि मेरे शाम के वक़्त खाने का नाश्ता ज़्यादातर हुआ करता था...मैने माँ को हाथ से खीचते हुए अपने बगल में बिठाया तो हँसने लगी...फिर मैने उसके चेहरे को सहलाते हुए उसकी बातें सुनने लगा...माँ काफ़ी एग्ज़ाइटेड थी जाने को
अंजुम : पता है आदम मेरा तो दिली अरमान था कि मैं हवाई यात्रा करूँ और देख अब ये भी अरमान पूरा होने को है
आदम : हाहाहा अगर ना भी होता तो मैं किसी ना किसी दिन तेरी ये मुराद भी पूरी कर देता
अंजुम : फिर भी बेटा मैं तो कम पढ़ी लिखी हूँ कैसे ट्रॅवेलिंग करना होता है? मतलब तू भी तो कभी गया नही फ्लाइट में
आदम : अर्रे माँ मेरी ये कौन सा इंटरनॅशनल फ्लाइट है डोमेस्टिक ही होंगी इतना संकोच कैसा लेकिन सच में समीर ने बड़ा खर्चा किया है यार बुलाके ही माना साले ने
अंजुम : हट पागल उसे क्यूँ कोस रहा है? अच्छा ही तो किया इस बहाने मेरा मुंबई में भी तेरी माँसी के पास भी जाना हो जाएगा और हम फ्लाइट भी अटेंड कर लेंगे
आदम : ह्म ये तो है क्या करे माँ? ये सब तो सपने से देखे थे हमने और आज सबकुछ इतना हक़ीक़त में तब्दील हो गया
माँ मेरे सीने पे सर रखके मुस्कुराने लगी...मैं उसके ज़ुल्फो पे हाथ फेरते हुए...यही सोच रहा था कि कैसा ये ख्वाब सा हमारी ज़िंदगियो में हो रहा है...अब ज़िंदगी में क्या कुछ नही है हमारे पास? पैसा घर मुहब्बत लेकिन अभी भी मुझे जिस चीज़ की हसरत थी वो थी माँ के साथ अपना रिश्ता बनाना मैने माँ के चेहरे को अपनी तरफ उठाया और उसे सवाली निगाहो से फिर पूछा
आदम : अच्छा छोड़ तूने मेरा जवाब उड़ीसा में नही दिया था...पर आज तो दे सकती है कम से कम
माँ : कैसा जवाब बेटा? (माँ ने मेरी तरफ सवाली निगाहो से ही पूछा)
आदम : अर्रे माँ तेरे सामने एक बेटे और माँ पवित्र बंधन में बँधने जा रहे है और तू है कि मेरे प्रपोज़ल को अब भी नही समझ पाई
माँ जैसे होंठो पे ज़ुबान फेरते हुए शरमाई....उसने मेरे चेहरे को सहलाते हुए मेरे नज़दीक थोड़ा और पास आते हुए कहा देख बेटा मैं उस वक़्त इसलिए कुछ नही कही कि क्या मालूम वाकेशन में तेरा मूड थोड़ा खराब हो जाता...मैं ये फ़ैसला ले नही सकती हूँ मैने एकदम से कहा आख़िर क्यूँ माँ? माँ ने जवाब ढूँढने के आसार से नज़र झुका ली फिर उसने जब नज़र उठाई तो एक साँस में बोलना शुरू किया मैं चुपचाप सुनता रहा...माँ थी वो मेरी उसकी रज़ामंदी मेरे लिए अहम थी अगर वो राज़ी नही थी तो उसकी वजह जानना चाहता था...
अंजुम : देख आदम तू मेरी औलाद है माँ-बेटे का रिश्ता एक पवित्र रिश्ता होता है...तू मेरी एक मेल है मेरे माँस का एक टुकड़ा है जो कि मेरे शरीर से अलग होके एक नौजवान इंसान बना है...इसलिए तू मेरा खून है...लेकिन हमारे बीच जो रिश्ता बना है वो रिश्ता इन सारी मर्यादाओ से पार हो चुका है देख तू ग़लत ना समझ....कहीं ना कहीं ये हमारी ज़ाररूरत थी? तो कहीं ना कहीं हमारी मुहब्बत मैं जानती हूँ तू मुझसे अटूट प्यार करता है और तेरा प्यार कभी नापाक हो नही सकता लेकिन ये सारी सीमा लाँघ चुका है...मैं नही चाहती कि तू मेरे लिए अपनी ज़िंदगी ज़ाया करे मैं जानती हूँ तू नही समझेगा तू मेरा दीवाना है पर बेटा ज़िंदगी सिर्फ़ मेरी और तेरी कब तक कटेगी? ये एक ज़िमेदारी भरा फ़ैसला है कोई बचकाना फ़ैसला नही जहाँ बिना सोच समझ के बिना सूझ बुझ के हम ये तय कर लें क़ि हम एकदुसरे से शादी कर सकते है
तू कोई गैर मर्द नही मेरी औलाद है....मानती हूँ कि हमारे बीच मियाँ बीवी जैसे ही रिश्ते संबंधो में जुड़े है पर हम उन माँ-बेटों की तरह नही सोफीया और समीर की तरह ज़िंदगी जी रहे है एक लवर्स की तरह एक कपल की तरह....मैं नही कहती कि तू मुझसे संबंध ना बना बना बेशक बेझिझक बना इसमें मुझे भी अच्छा लगता है पर शादी मैं किसी की सोच से नही घबराती तो जो होगा सो होगा पर तू जानता है कि ये तेरा फ़ैसला दो ज़िंदगी बदल देगा...मैं कब तक यूँ जवान रहूंगी मानती हूँ तूने मुझे दिल से माना है प्यार किया है साथ रहने का ज़िंदगी भर का वचन दिया है...
पर क्या सच में? हम दोनो शादी कर सकते है तुझे पता है शादी के बाद क्या होता है? ज़िम्मेदारिया बढ़ती है कल को तेरी जो औलाद होगी वो बड़ा होगा जब उसे कल को बदनाम किया जाएगा या फिर उसे ही मालूम चले तो कितना ठेस पहुचेगा उसको क्या उसकी नज़र में माँ-बेटे का रिश्ता रिश्ता रहेगा नही वो इस रिश्ते से घिन करेगा क्यूंकी ये रिश्ता उसके लिए कोई अहमियत नही रखेगा....सोफीया और समीर की बात अलग है क्यूंकी सोफीया को उसके दिल में बेटे को छोड़ किसी के लिए फीलिंग्स नही है...मेरा भी सिर्फ़ तुझसे ही खिचाव है मुहब्बत है पर ये रिश्ता यही तक ठीक है बेटा उतना आगे पहुचना ये बस की नही हमारे हाथो में नही....हम कब तक मुँह छुपाए फिरेंगे कोई ना कोई जानेगा ही कि तू कौन है हमारा रिश्ता क्या था? कल को अगर मालूम चल गया तो कितनी बेज़्ज़ती होगी हमारी जानता है...
मैं चुपचाप खामोश माँ को सुन रहा था....माँ घबरा भी रही थी कि कहीं उस दिन की तरह मैं माँ पे ना बर्सू पर सच में उसकी मिचयोर्ड बातों ने मेरे अंदर भी समझदारी जैसे फूँकी...मैं चुपचाप माँ की बात सुनता रहा कोई गुस्सा कोई नफ़रत भरी बात कुछ ऐसा नही कहा कि माँ को चोट पहुचे...माँ ने मेरे चेहरे को अपनी तरफ खीचते हुए पाया कि मैं ज़ज़्बाती सा हो रहा था....माँ मुस्कुराइ
अंजुम : तूने मुझे वो सब दिया है जो कोई गैर भी अपनी औरत को ना दे...तूने वो खुशिया दी है जिनसे मैं सालो तक वंचित रही हूँ...आज तूने मुझे ज़िंदगी की सारी ऐश दी
आदम : पर माँ मेरी ये एक ख्वाहिश ही तो थी!
अंजुम : ख्वाहिश का क्या है? आज मैं और तू अकेले ही सारी ज़िंदगी क्या बिता लेंगे? हम समीर जैसे अमीर तो नही ना ही उसके जैसा तू उतना दीवाना है जो हालत की परवाह ना करता हो बोल ना क्या तू अपनी माँ पे व्याबचार रिश्तो की बेज़्ज़ती किसी के मुँह से सहन कर पाएगा
आदम : कतई नही
अंजुम : तो फिर मैं बस इतना चाहती हूँ कि तू खुश रह और मेरे साथ हमेशा रह जैसा तूने मुझसे वादा किया था....पर शादी करना ये सीमा मैं कभी नही लाँघ सकती हूँ ना तुझे लाघने दे सकती हूँ आजतक तेरी हर ख्वाहिश मैने मानी है और आज तुझे मेरी इस ख्वाहिश में रज़ामंद होना होगा अगर तू नही हुआ तो कर ले अपने मन की मैं नही रोकूंगी पर कल के भविश्य में तुझे सिर्फ़ और सिर्फ़ यही डर लगा रहेगा कि कल को हमारा भेद ना खुल जाए....मैं गैरो की बात नही कर रही अपनो की बात कर रही हूँ सोच जो हमारे बीच तीसरा ग़लती से भी आएगा तो क्या रिश्ता रहेगा उसका हमसे? सोच ज़रा ज़िंदगी ऐसे ही नही कंटति कि जिससे प्यार हुआ उससे शादी हुई कभी कभी प्यार किसी और से और शादी किसी और से हो जाती है यही ज़िंदगी की रीत है क्यूंकी प्यार और शादी एक संग कभी टिकती नही ये हक़ीक़त है
आदम : तो तू चाहती क्या है? (मैने माँ से ये आख़िरी सवाल किया)
अंजुम : देख कल तक तुझे मेरे लिए कोई मुहब्बत नही थी फिर तेरे अंदर की हवस मेरे लिए सच्ची मुहब्बत में तब्दील हुई बस यही चाहती हूँ कि ये संभव नही हो सकता क्यूंकी हमारा संबंध कही तक भी पहुच जाए हम माँ और बेटे ही रहेंगे उस अनमोल रिश्ते को टूटने मत दे मत दे
इतना कहते हुए माँ भावुक हो उठी....मैं माँ के आँसू देख नही सकता था इसलिए उसे अपने गले लगा लिया...वो मेरे बाजुओं को सहलाते हुए मेरे शर्ट पे अपना सर रखके रोती रही...मेरे भी आँखो से जैसे आँसू छलक गये....काश काश ये रिश्ता हमारे बीच ना एग्ज़िस्ट करता लेकिन इसमें हमारा बस नही था...
हम फिर नॉर्मल हुए...तो मैने माँ को हंसते हुए कहा कि जो तू कह वहीं होगा चल मैं एर-टिकेटिंग वेरिफाइ करता हूँ नेट पे तू जल्दी काम निपटा....माँ मुझे जाते देख बेहद खुश हुई....ऐसा लगा जैसे अंजुम अपने बेटे को नही किसी समझदार इंसान को देख रही थी जो उसकी हर शरतो और इरादो पे इतना आँखे मुन्दे हां से हां मिलाता था...यही तो मुहब्बत थी...
कुछ वक़्त लगा मुझे नॉर्मल होने में....रात को ज्योति भाभी माँ से मिलने आ गयी तो माँ उससे गप्पे लड़ाने लगी....इस बीच ज्योति भाभी को मैने नमस्ते किया और पूछा राजीव दा कहाँ है? तो वो बोली आ गये वो सो रहे थे तुम जाओ मिल लो ना उनसे...मैं चला आया...पीछे पीछे सुनता गया कि ज्योति भाभी मेरी खूबसूरती और हॅंडसम पने की तारीफ़ कर रही थी माँ से मेरी शादी की बात कर रही थी कि मैं इतना बड़ा हो गया और इतना ज़िमीद्दार हो गया जवान हूँ तो लड़की क्यूँ नही देखती इसके लिए? माँ ने सिर्फ़ हँसी में ये बात टाल दिया...पर मुझे ये बात अच्छी नही लगी अगर माँ नही तो फिर कोई नही
राजीव : चियर्स बडी चियर्स
आदम : चियर्स राजीव दा
मैने और राजीव दा ने बियर की एक एक चुस्की लेते हुए कहा....राजीव दा काफ़ी थके हारे लग रहे थे वो पश्त पड़े आदम की तरफ देखते हुए मुस्कुराए...."और राजीव दा क्या हुआ आज? आप काफ़ी थके थके से ?
........राजीव दा मुस्कुराए
राजीव : हा हा हा हा तुम्हारी भाभी सोने देगी तब ना कोलकाता में एक हाफ मर्डर केस के सिलसिले में जाना पड़ा जब वापिस लौटा तो तो भाभी ने तो जैसे हुक्का पानी सर पे उठा लिया असल में खुजली होती है ना उसे
आदम : खुजली : ? (जब तक समझ आया मेरे दोनो गाल शरम से लाल हो गये )
राजीव : अब आई ना शरम हहहे
आदम : क्या राजीव दा भाभी के बारे मे में ऐसा ना कहो
राजीव : अच्छा जी उसके भाई को शरम आ रही है (राजीव दा ने टाँग खींचते हुए कहा)
आदम : नही ऐसी बात नही
राजीव : हाहाहा मज़ाक कर रहा हूँ यार मैं झूठ नही कहता जबसे तेरी भाभी से शादी की है हर वक़्त उसके नीचे खुजली होती रहती है अब तुम तो घर के हो यार तुम से क्या शरमाना? घर आते ही सोचा 2 घंटे की नींद मार लूँ हुहह नींद बेटा लेटने तक को नही दिया तेरी भाभी ने
आदम : मतलब पलंग पे ही पूरे टाइम बैठना पड़ गया
राजीव : हां यार उफ्फ मेरा तो लंड दर्द कर रहा है (राजीव दा ने आँख मारते हुए कहा)
आदम : क्या राजीव दा? (मैने बियर गटकते हुए कहा तो राजीव दा हँसे)
राजीव : अच्छा तुम भी आज चुप चुप से हो?
आदम : नही तो कोई बात नही
मुझे लगा राजीव दा को अहसास हो गया कि आज माँ और मेरे बीच ज़ज़्बातो का क्या सैलाब बहा था? माँ ने मुझे सॉफ इनकार कर दिया शादी के प्रस्ताव से....मैने कहा बस कुछ नही राजीव दा ऐसे ही किसी की याद आ गयी
राजीव : किसकी?
आदम : हाहाहा अर्रे ज़िंदगी में इतने औरतो का सामना किया हूँ कि किस का नाम कहूँ?
मैने उन्हें क्या कहता? कि कौन कौन? किन किन व्याबचार रिश्तो को जनम दिया था मैने....अपने ही सग़ी संबंधियो से रिश्ता बनाया था पहले ताहिरा फिर रूपाली फिर तबस्सुम दीदी फिर अधेड़ उमर की वो काकी लगी रिश्तें मे सुधिया काकी.मैने बस बातों को गोल गोल घुमाते फिराते हुए यही कहा कि थी कोई? लेकिन राजीव दा छोड़ने वालो में से नही थे इसलिए मेरी हवस भरी हसरतों को जगाने वाली मेरी माँ की तरफ मेरा रुख़ करने वाली उस औरत का नाम मज़बूरी में ले डाला जिसका नाम था चंपा वहीं धंधे वाली जिसका मैं एक समय था कि आशिक़ बन गया था उसकी खूबसूरती का उसके गोरे चिकने जवान काटीले बदन का
राजीव : ह्म ये चंपा कौन थी?
आदम : बस थी यही रहती थी आपको बताया था ना कि मैं यहाँ पहले भी रह चुका हूँ अभी वापिस से शिफ्ट किया
राजीव : ओह हां हां
आदम : बस ऐसे ही संबंध बन गये थे उससे पर हमारा रिश्ता कुछ अलग ही मोड़ पे था
राजीव : क्यूँ?
आदम : बस वो एक प्रॉस्टिट्यूट थी और मैं एक घरेलू घर का लड़का
राजीव दा ने चौंकते हुए मुझे देखा ऐसा लग रहा था जैसे कह उठेंगे कि कोई नही मिली तो रंडी मिली तुम्हें चोदने को...जिससे इश्क़ लगा बैठे..पर सच पूछो तो चंपा के लिए फीलिंग्स थी दिल में वो सबसे पहली औरत थी मेरी लाइफ में और आज भी मैं उसे मिस करता हूँ कहा था उसने मुझसे कि भूलिएगा नही सरकार एक वहीं थी जो माँ और मेरे रिश्ते से वाक़िफ़ थी राजीव दा ने मुस्कुराते कहा ह्म नाइस पर भाई रंडी से संबंध तक ठीक था पर शादी कैसे करते ? सबसे पहली बात उसका तुम्हारा कोई मेल नही रहता तुम पढ़े लिखे समझदार लड़के सिर्फ़ तारक की हसरत थी तुम्हारी पर प्यार नही यार यहाँ तक कहानी ठीक नही लगती
आदम : प्यार अँधा होता है राजीव दा वाक़ई बेहद अँधा नही देखता जात पात रिश्ते नाते बस हो ही जाता है (माँ के चेहरे को सोचते हुए मैने कहा)
राजीव : ह्म सही तो कहा तुमने अब मुझे ही देख लो जिसको कल तक बहन कहा आज उसके साथ कितनी बार सोया हूँ अर्रे बीवी बन गयी वो मेरी पर देख यार माँ है तेरे पास तुझे काये को ऐसे लफडो में पड़ना जानता है रंडी के चक्कर में पड़ता तो एड्स हो जाता तुझे
आदम : रंडी तो हमने ही उसे बनाया है ना राजीव दा उसकी मज़बूरियो ने एक से नही दस से चुदवाती है सोती है उनके साथ उन्हें मज़ा देती है चाहे खुद कितने ही दर्द से ले....लेकिन ये फॅक्ट है कि आज घरो घर की लड़किया आमतौर पे इतने बाय्फरेंड्स बनाती है कि जितने धंधे वालियों के कस्टमर्स नही होते
राजीव : भाई दुनिया ही खराब हो चुकी है
आदम : ठीक है चलो मान लिया जाए कि ऐसा की जिस लड़की की ज़िंदगी में 3-4 लड़के बाय्फरेंड्स रहे हो उसकी शादी तय कर दी जाए तो फिर भी उसे घर की ही बहू माना जाता है पर अगर किसी कोठे में किसी लड़की के साथ एक मर्द भी सो जाए तो उसके पास्ट को जानते हुए भी उसका हाथ ना थामे बताइए ऐसा क्यूँ?
राजीव : क्यूंकी घरेलू औरतें कोई रंडी नही होती और ज़रूरी नही कि हर घरेलू औरत ऐसी हो
आदम : माना ना आपने वैसे ही एक रंडी भी किसी की बेटी होती है किसी की कोई लगती है फिर क्यूँ उसे शादी का हक़ नही सिर्फ़ इसलिए की वो धंधा करती थी या फिर किसी गैर मर्द से मिल ली सिर्फ़ इसलिए की वो एक धंधे वाली थी उसकी मज़बूरी थी या कोठे पे उसे रंडी बना दिया गया क्या ये उसका हक़ नही वो भी तो कल माँ बन सकती है
राजीव : पॉइंट में तो दम है दोस्त लेकिन कौन इतना बड़ा देवता होगा जो जाने सुनके ऐसा कदम उठाए लोग तो उसी से शादी करेंगे ना जिसे वो सुशील संस्कारी या घरेलू ही समझे
आदम : शायद इस सोच को कोई ना समझे पर प्यार को समझना ज़रूर है कि प्यार अँधा होता है
राजीव दा चुपचाप हो गये उन्होने मेरी तरफ मुस्कुराते हुए देखा फिर कंधे पे थापि मारते हुए कहा मुझे यकीन है कि तेरी मुहब्बत उसके लिए भाग्यशाली होती पर यार मेरी मान भूल जा उसे...मैं सिर्फ़ मुस्कुराया और फिर कुछ देर बातचीत किए वापिस घर लौटा...ज्योति भाभी फिर उपर चली गयी...बोली राजीव दा को लेट ना हो जाए पर मैं जानता था राजीव दा से दूर होने का उनका कोई मन नही था..
मैं जब कमरे में लौटा तो मेरे उपर उदासी छा गयी खुदा से यही नाराज़गी थी कि क्यूँ तूने ऐसे रिश्ते बनाए जिसमें अँधा प्यार डाला अगर आज प्यार ना होता तो मुझे इतनी तक़लीफ़ नही होती माँ के इनकार से मुझे तक़लीफ़ हुई नही थी पहले रूपाली भाभी जो मुझ बेपनाह प्यार करती थी फिर मेरी माँ की तरफ बढ़ती हसरतें जिसने मुझे सारी हदें पार करने पे मज़बूर किया और चंपा जिसका मैं आशिक़ बन गया आज मैने अपने दिल को टटोला तो सच में उसे मैं सच में प्यार करने लगा था लेकिन राजीव दा ने ये बात सही की थी उसे भूल जाना ही मेरी समझदारी है...
अब मेरे जीवन में कुछ नही रहा था सबकुछ था मेरे पास माँ का प्यार भी...मेरे मूड को दुखी देख माँ ने भाँपा की शायद उसके ही लवज़ो से मैं हर्ट हुआ हूँ लेकिन मैं आज अपने व्याबचार रिश्ते और अपने कुछ नापाक रिश्तो के वजह से दुखी था....माँ ने मेरे कंधे पे हाथ रखते हुए मेरी चुप्पी तोड़ी
आदम : क्या हुआ माँ?
माँ नज़ाकत से मुझे देखते हुए बोली कि आज उसे एक सीडी मिली है क्या मैं उसकी खातिर वो सीडी प्लेयर में चला सकता हूँ? मैने सोचा ये माँ शायद लगता है फिर प्यार करने के मूड में थी....हाहहाहा मैं वापिस बहेक गया उसकी बातों से...वो सीडी मेरी लाई हुई थी और वो एक पॉर्न फिल्म की सीडी थी
जब हमने उसे ऑन किया . माँ हैरानी भरी नज़रों से पोर्न्स्टार की चीख और उसके शरीर पे लाल लाल निशानो को घूर्र रही थी....."उफ्फ कितना बेदर्दी है यह रस्सियो से बाँधके उसे लटका दिया और ऐसे बेल्ट से मार रहा है ये सब तो ग़लत है".......
.."माँ ये भी एक मज़ा है".......
."वो कैसे? कोई सनकी पागल है क्या तू?".........
मैं मुस्कुराया
आदम : माँ तेरी समझ से परे है ये सब छोड़ ये सब देखना
अंजुम : नही तू बता क्या कहा था तूने बेड्सम ये क्या होता है ?
आदम : इसमें पार्ट्नर्स के साथ एंजाय करते है इसमें जैसे एक औरत मालकिन बनती है और अपने पार्ट्नर को टॉर्चर करती है उसे बेल्ट से मारती है या उसे पाओ की उंगलिया चाटने कहती है या फिर उसे कोई नीच काम करने को कहती है वैसे ही मर्द भी अपनी पार्ट्नर के साथ कोई ऐसी ही नीच हरकत करता है उसे बाँधके उसे बेतरतीब से चोदता है और ना जाने क्या क्या उसके साथ करता है तू ये फिल्म देख लेगी तो समांझ जाएगी मेरे कहने की बस की नही इसलिए कह रहा हूँ मत देख ये सब मुझे अच्छा नही लगता उस चूतिए सीडी वाले ने ग़लत पकड़ा दी
अंजुम : तो क्या मिया बीवी में ऐसा खेल होता है?
आदम : ह्म दुनिया में अज़ीबो ग़रीब फॅंटेसी होती है लोगो की हाथो को रस्सी से बाँध देना उन्हे हल्का हल्का हर्ट करना उन्हें रफ चुदाई का मज़ा देना यही सब रोल प्ले में होता है
मैं सोचते सोचते मेरा ध्यान आया कि मैने तो एक बार ताहिरा मौसी को स्ट्रेंजर बना कर चोदा था वो काला मास्क जो मैने दर्ज़ी से सिलाया था क्या वो मास्क मैं माँ के साथ उपयोग करूँ तो कैसा रहेगा?
आदम : चल माँ आज हम भी एक खेल खेलते है मज़ा आएगा
माँ : कैसा खेल?
माँ की भवे उठी उसे लगा कि मैं उसके साथ बेड्सम वाला कुछ हरकत करूँगा पर मैने कहा मैं उसे बाँधूंगा ज़रूर पर कोई वैसी गिरी हुई हरकत नही करूँगा बस हल्के हल्के से थोड़ा बहुत
माँ : तो कैसे खेलेगा? (माँ की भी उत्सुकता जैसे बढ़ गई)
मैने उसे कहा कि हम एक रोल प्ले करेंगे मैं तेरा दीवाना प्रेमी हुंगा तुझे मैं अगवा कर लूँगा तू किसी की पत्नी होगी मैं तेरे साथ प्यार से ही पर ज़बरदस्ती करूँगा तू पहले मानेगी नही फिर मैं तुझे उन दर्द में मीठा मज़ा दूँगा तू धीरे धीरे खुद ब खुद मेरी आगोश में आ जाएगी....
माँ : बाप रे क्या क्या फॅंटेसी सोचता है तू?
आदम : करके देखते है ना सबकुछ तो कर ही लिया अब ये फॅंटेसी भरी हसरत भी पूरी कर ले
माँ : ठीक है तो क्या करना होगा?
उसके बाद जो मैने उसे कहा एका एक उसकी दृष्टि में परिवर्तन हुआ और वो थोड़ी सेहेम उठी
माँ काफ़ी सहम उठी थी क्यूंकी जो तरीका मैने उसे करने को कहा था उन हरकतों को करना उसके बस की बात नही थी एक घरेलू समांजिक औरत जिसे सिर्फ़ बिस्तर पे चुदाई का मतलब ही पता था उस भला मासूम औरत को क्या पता? कि सेक्स भी एक कला है और उसे कैसे फॅंटसाइज़ किया जाता है .....जब उसने मेरी तरफ देखा तो मैने उसके बालों की चोटी को लपेटते हुए एक हाथ से दूसरे हाथ से उसके चेहरे पे वहीं दर्जी का सिला काला मास्क पहनाने लगा मास्क पहनने के बाद माँ की सिर्फ़ दो आँखे और मुँह के छेद से नाक का निचला हिस्सा और होंठ दिख रहे थे..माँ मुझे बोली कि सास लेने में थोड़ी सी तक़लीफ़ हो रही है....मैं मुस्कुराया कहा कि तूने कभी ये सब पहना नही है ना थोड़ा आराम से धीमे एक गहरी साँस ले और कंफर्टबल हो जा अभी मैं जो करने जा रहा हूँ वो एक तेरे लिए नया अनुभव होगा समझ कि ये एक नाटक चल रहा है मैं वादा करता हूँ तुझे ज़रा सी भी दर्द नही पहुचाउन्गा.....माँ तो जानती ही थी इसलिए वो चुपचाप ब्लूफिल्म देखते हुए मुझे बाहर जाता देखती रही...
मैने जीन्स पहनी हुई थी शर्ट एक ओर उतार दिया....फिर स्टोर रूम के पास रखी उस रस्सी को सॉफ करते हुए कमरे में ले आया...माँ की ये देखते ही उसके आँखे बड़ी बड़ी हो गयी....मैने उसी बीच पहले उसे खड़ा किया और उसकी साड़ी उतारने लगा...उसकी साड़ी खीचके उतारने के बाद उसने खुद ही पेटिकोट की मज़बूत डोरी को खोला फिर खुद ही अपनी ब्लाउस भी उतार फैकि..
माँ कुछ ही देर में मेरे सामने नंगी खड़ी थी...मैं उसकी टाँगों के बीच की चिकनी चूत पे हाथ फेरता हुआ...उसकी छातियो पे हाथ रखके उसे जैसे नींबू निचोड़ते है ठीक वैसे ही अपने मज़बूत हात्थो से कस लिया तो वो हल्की सी सिसक उठी...मैने उसके मोटे ब्राउन निपल्स पे अपनी जीब एक आध बार फिराई फिर उसे शैतानी मुस्कुराहट दी....
आदम : हाथ सीधे कर (मैने खुद ही माँ की चूड़िया उतार दी और उसके दोनो कलाईयों में रस्सी बाँध दी) टाइट तो नही हो रहा (मैने फिर सवाल किया तो माँ ने कहा नही हल्का है)
फिर मैं निश्चिंत होता हुआ उसे हाथ बँधे हुए नंगा ही खड़ा किया कुछ देर तक उसके बदन का जायेज़ा लिया...इस बीच मेरे हाथ पीछे उसकी पीठ पर फिरते हुए कुल्हो पे आए...वहाँ माँ के चूतड़ काफ़ी मोटे और फैल से गये थे...बेटे की मेहनत का असर था
मैने माँ को एक ही झटके में अपने कंधे में उठा लिया...उसकी दोनो नंगी जांघें मेरे सीने पे लटक रही थी...उसका पेट मेरे कंधो पे दब रहा था...आयने में देखा कि उसकी छातिया भी हवा में लटक गयी थी...वो उचाई से घबराती थी इसलिए हंस पड़ी कहने लगी कि प्ल्स मुझे उतार दो....मैने कहा अभी कहाँ मेरी जान अभी तो खेल शुरू हुआ है...मैने उसके नितंबो पे हाथ फेरते हुए कहा....माँ ने कहा बेटा मुझे चक्कर आ जाएगा....मैने कहा तो आने दे....मैं उसके चुतड़ों को सहलाते हुए जो मेरे चेहरे के करीब थे उस पर हाथ फेरते हुए मैं कमरे का एक गोल चक्कर काटा...माँ इस बीच मेरे कंधो पे जैसे बोझ की तरह लटकी हुई थी....मैने दरवाजा खोल कर उसे लिविंग रूम में लाया फिर उसे गुसलखाने की तरफ लाते हुए बल्ब जलाया एक हाथ से
हम दोनो गुसलखाने में आए...मैने उसे तुरंत ही ज़मीन पे उतार दिया इससे वो मेरा सहारा लिए ही फर्श पे जैसे बैठ गयी....उसने मेरी तरफ नाटकिया तौर से ख़ौफ्फ से सहम्ते हुए देखा...मैं उसे इस बीच बड़े वाहियात तरीके से घूर्र रहा था...
माँ : क्या चाहिए तुम्हें? मुझे यहाँ अगवा करके क्यूँ लाए हो?
आदम : हाहहा जानेमन तूने मुझसे बेवफ़ाई की मेरे ही दोस्त के साथ शादी रचा कर उसके साथ मौज उड़ाएगी ऐसा कतई मैं होने नही दूँगा....सिर्फ़ मेरा हक़ बनता है तुझपे मेरी मलाई अब तो आज मैं तुझसे अपनी सारी हसरत मिटाउंगा मेरी जान (मैं देख रहा था माँ का शरम से चेहरा लाल हो उठा जिस लहज़े में मैं उसे कभी बात नही किया वो ऐसा कभी उम्मीद नही की होगी )
माँ : ना..ही तुम मुझे छोढ़ दो देखो ये तुम ठ..ईक नही कर रहे?
आदम : हा हा हा हा अब तो कोई नही तुम्हें मुझसे छुड़वा सकता कोई माई का लाल नही
माँ : देखो मेरा पति मुझे ढूँढते हुए आ जाएगा
आदम : तो आने दो उसे वो भी देखेगा कि मैं उसकी पत्नी का क्या हाल कर रहा हूँ...सोचो आज ही तुम्हारी शादी हुई और आज के ही दिन मैं तुम्हें उठा ले आया जानेमन अब तो सुहागरात मेरे साथ ही मनानी होगी
माँ एकदम शर्मा उठी...ये उसका बेटा आदम है? या कोई गैर मर्द...वाक़ई गंदी गंदी फिल्में और विलेन्स के डाइलॉग अच्छे ही बोल रहा था मैं....इस बीच मैने उसकी चुचि पे अपना एक पाँव रखा....वैसे तो मुझे ये ठीक नही लगा पर मैं उस वक़्त रॉल्प्ले कर रहा था इसलिए थोड़ा झिझकते हुए मैने माँ की एक चुचि पे पाँव की एडी रखते हुए उसे रगड़ना शुरू किया
माँ : देखो प्लस्स मैं तुम्हारे जोड़ती हूँ मैं कुँवारी हूँ मेरा सुहाग मुझसे छिन जाएगा प्ल्स मुझे जाने दो मैं तुम्हारी हर बात मानुगी पर मुझे बक्श दो
आदम : हाहहाहा नही मेरी प्यारी अंजुम तुझे तो मैं किसी भी कीमत में कुँवारा नही छोड़ूँगा तेरे दोनो छेदों में अपना लंड डालके पेलुँगा तेरे ज़ुबान पे मेरे वीर्य का स्वाद होगा और तेरे चेहरे पे हमारी चुदाई का दर्द
माँ और मैं काफ़ी अच्छी आक्टिंग कर रहे थे...इस बीच उसने मेरा नाम लेते हुए मुझे गुस्से भरी निगाहो से कहा आगे मत बढ़ना वरना मैं अपने आपको ख़तम कर लूँगी.......मैं मुस्कुराया माँ किसी विलेन के चंगुल में फसि मज़बूर हेरोयिन का रोल अदा कर रही थी...मैने झटके से उसके बाल जो मास्क के नीचे से लटक रहे थे उन्हें समेटते हुए जकड़ा और उसके चेहरे पे अपना चेहरा नज़दीक लाया....माँ तो जैसे मेरे छूने के स्पर्श से ही काँप उठी...
मैने उसकी एक चुचि को अपने हाथो में लेके मसला....तो माँ काँप उठी मैने महसूस किया उसका कलेजा आगे पीछे हो रहा था उफ्फ लगता है मेरे छूने से ही उसकी दिल की धड़कन इतनी तेज़ हो गयी थी ...मैने उसके चेहरे को अपनी ओर किया और अपनी जीन्स की बेल्ट निकाली उसके हाथ बँधे थे तो मैने उसे कुतिया की मुद्रा में झुका डाला...
माँ : मुहब्बत वासना से नही प्यार से होता है आहह ससस्स
आदम : जानेमन ये तो खुमारी है मेरी अब देखती जाओ (मैने मन ही मन माँ को इशारा कर रहा था कि मेरे उसके चूतड़ पे कस कर थप्पड़ मारने से दर्द तो नही हुआ तो उसने एकदम से ना में अपना सर झटका)
मैने उसके उभरे हुए चुतड़ों पे दो तीन कस कर थप्पड़ मारे और उसे हाथो में लेके भीचा....हाथो में लेके मसलते ही उसके दोनो नितंबो को मैने थोड़ा आहिस्ते पर कस कर पिंच किया...माँ चीख उठी...."आहह दर्द होता है"........
."दर्द होता है हाहहाहा मेरी जान अभी तो तुझे दर्द सहना बाकी है"....मैने और कस कर उसकी नितंबो को पिंच किया तो माँ के चूतड़ पे लाल लाल निशान से आ गये...मुझे अच्छा नही लगा तो मैने नितंबो को सहलाते हुए उस पर दो-तीन थप्पड़ और जड़ दिए फिर उसकी गान्ड की फांको को फैलाए उसके निचले गुलाबी चूत के सिरे से देखते हुए उसकी गान्ड के सिकुडे खुलते छेद को घूरा...
माँ को अहसास नही था कि अब मेरा अगला वार क्या होगा?...मैने अपना चेहरा उसके नितंबो के ठीक बीच लाया फिर उसके छेद पे अपना मुँह लगाया इस बीच मेरे हाथ उसकी चूत के हिस्से को भी अंगुल कर रहे थे...और मेरी ज़बान उसके छेद को चाट रहे थे....स्लूर्र्रप्प एम्म्म स्लूर्रप्प्प म्म....माँ इस अहसास से किसी खाँसी की तरह हिल गयी तो उसके चूतड़ भी हिल गये...मैने कस कर उसके नितंबो को हाथो से फैलाया और छेद पे ज़ुबान लगाए रखा...माँ हल्की हल्की आह भर रही थी...
मैं उसके गुदा द्वार को ज़ुबान से जैसे छेड़ रहा था....उसके बाद जब मैने अपना चेहरा उसके छेद से अलग किया तो उसके गान्ड पे ढेर सारा थूक लगा हुआ था...मैने इस बीच अपनी दो उंगली उसमें घुसा दी तो माँ का बदन काँप उठा मैने एक हाथ से माँ की पीठ को जकड़ा और उसके छेद में उंगली करता रहा....उस बीच मैने एक दो बार ज़ुबान फिर छेद पे लगाते हुए उसे खोला...माँ को अपनी गान्ड में उंगली का मज़ा लग रहा था....वो अब खुद गान्ड ढीली छोड़ मेरी उंगलियो को अपनी गहराई तक ले जाने की प्रक्रिया कर रही थी..
इस बीच मैने उसके दोनो छेदों को चाटना शुरू किया उंगली करना छोड़ दिया...जब सूजी चूत को चूसने और फांको में जीब फेरी तो माँ का बदन सिहर उठा...वो ओह्ह्ह्ह की आवाज़ निकाले फिर खामोश हो गयी...मैने फिर उसकी चूत में सीधे तीन उंगलिया डालने की कोशिश की इस बार जब काम ना बना तो पास रखा ल्यूब ही हाथो में लगाया और चूत के अंदर उंगलिया पेल दी...
इससे माँ की चूत में 4 उंगली आराम से सरक उठी अब तो उसकी चूत एकदम गीली और बार बार चुदने से खुल ही चुकी थी...वो कुतिया की मुद्रा में अपनी चूत में हो रही उंगलियो के अंदर बाहर होने से काँप उठी थी...उईईई...मैने कस कर उंगली गहराई तक डालनी चाही जिस बीच माँ सिसक उठी...इससे माँ का पूरा बदन काँप उठा....मैने फिर हाथ बाहर निकाला और उन उंगलियो को चाटा जिसपे कुछ सफेद पदार्थ लगा हुआ था...उफ्फ वो सफेद सफेद माँ की चूत से निकला रस उसे मैं माँ को दिखा कर एक एक उंगली चुस्स रहा था जैसे कितना स्वादिष्ट उसका स्वाद हो....माँ शरम से आँखे नीचे कर लेती है
मैं उठा और अपनी लेदर बेल्ट निकाली...माँ ने किरदार को भंग करते हुए कह दिया कि ज़ोर ज़ोर से नही प्ल्ज़्ज़...मैने सिर्फ़ उसे हाथ दिखाया...फिर हल्के हल्के उसकी चुतड़ों पे बेल्ट मारने लगा.
."अफ अहः आहह हाहह आहह सस्स आह आहह नहिी आहह आहह आहह".....माँ के चुतड़ों पे बेल्ट के लगते ही माँ सिसक उठती उसकी चीख निकल जाती उसे शायद हल्का हल्का दर्द हो रहा होगा लेकिन मैं इतना ज़ोर ज़ोर से उसे मार तो नही रहा था शायद वो जानबूझ के हर बार बेल्ट के चूतड़ को छूटे ही दर्द से सिसक उठ रही थी...
चुतड़ों पे लगातार बेल्ट मारने के बाद मैने फिर उन्हें हाथो में लिए दबोचा फिर माँ को उठाया वाक़ई दोनो चूतड़ लाल लाल हो गये थे.."चलो अंजुम अब थोड़ा नहा लिया जाए".......इतना कहते हुए मैने नल चलाया तो शवर का ठंडा तेज़ पानी माँ के नंगे शरीर पे गिरने लगा....मैने माँ को कस कर जकड़ा हुआ था मैने उसका मास्क हल्का उसके होंठो से उपर तक उठा लिया था...माँ का पूरा बदन भीगें जा रहा था...मैं उसे गीला करता रहा...और वो गीली होती रही...
जब वो पूरी गीली हो गयी तो मैने वैसे ही रेज़र उठाया और पास पड़ी मेरी शेविंग क्रीम उठाई और उसके आर्म्पाइट्स और चुतड़ों के बीचो बीच कस कस कर मल दिया....
"नहिी मैने सॉफ किए हुए है प्ल्ज़्ज़".........
"मुझे निश्चिंत करना है डार्लिंग ......
माँ कुछ समझ ना सकी एक तो वैसे ही ठंडे पानी से ठिठुर रही थी और अब मैं उसकी दोनो बगलो को उठाए उसकी बगलो पे मेरी दाढ़ी बनाने वाले शेविंग क्रीम पे रेज़र चला रहा था...."सस्स ससस्स आह"....माँ को हल्की हल्की जलन हो रही थी...
मैने आहिस्ते आहिस्ते दोनो बगलो को एक एक कर सॉफ कर दिया फिर चिकनी चूत पे शेविंग क्रीम का झाग और बनाते हुए मुंहाने के भीतर तक रेज़र हल्का सा चला दिया फिर चूतड़ के पीछे नितंबो के निचले हिस्से पे भी रेज़र चलाया...माँ जलन से सिहर उठती फिर मैने उसे घोड़ी बनाए वैसे ही झुकाए रखा फिर उसके चुतड़ों को धोया फिर आगे उसे खड़ा किए उसकी चूत को फिर उसकी बगलो पे भर के मग पानी का डाला और उसके तीनो जगह को चिकना कर दिया...माँ को फिर मैने बाहों में उठाया घर में ले आया और सीधे बिस्तर पे ही पटका..
मैने उसके दोनो टांगे फैलाई...और उसकी चिकनी चूत पे एक बार ज़ुबान लगाई..."उफ्फ बस करो ना मैं से नही पाउन्गी"........मेरा पूरा मुँह माँ की चूत पे उस वक़्त जुड़ा हुआ था मैं उसे मुस्कुराए उसकी चूत चुसते हुए सुन रहा था...मैं उठा और उसकी चूत पे हाथ रगड़ते हुए अपना मूसल जैसा लंड बाहर निकाला
फिर उसके भीतर में ही कुछ ही सेकेंड में मेरा लंड फ़च से उसकी गीली चूत की दीवारो को फाड़ता हुआ अंदर अपनी जगह बनता चला गया....माँ का इस बीच पूरा बदन मैने दोनो हाथो से जकड़ा हुआ था इसलिए उसके हिलने की कोई गुंज़ाइश नही थी....
जब उसकी बच्चेदानी को छूती मेरा लंड का अहसास हुआ...तो मैने जड़ तक लंड घुसाए रखा उसकी चूत के भीतर....वो मुझे खुद ही धकेलने लगी कि उससे सवर नही हो पाएगा....मैने बस वैसे ही ठिठका रहा और फिर झट से ताबड़तोड़ धक्के अंदर बाहर करने शुरू किए.
."नहिी नहिी आहह ससस्स"....माँ इस बीच दाँतों पे दाँत रखते हुए अपने दर्द को झेलने लगी
क्यूंकी मैने इससे पहले उसकी ऐसी भीषण चुदाई नही की थी...मेरा लंड फ़च फ़च निकालती उसकी चूत की आवाज़ो के साथ अंदर बाहर किसी ड्रिल मशीन की तरह हो रहा था और उसकी छातिया उसके हिलने से आपस में एकदुसरे से टकरा रही थी जब मैने उनपे हाथ रखके उन्हें थामा तो उनके निपल्स काफ़ी सख़्त और कठोर हो चुके थे...
माँ के शरीर में ऐंठन को महसूस करते ही मैने कस्स कस कर उसे चोदना शुरू कर दिया अब रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि मालूम ना चलता कि लंड अंदर जा रहा है कि बाहर मैं मशीन की तरह चूत के अंदर बाहर अपने लंड को कर रहा था मुझे लगा कि कही मेरा ही ना निकल जाए इसलिए झट से अपने लिंग को बाहर निकाल खीचा...
इससे माँ तड़प उठी और उसकी चूत ने एक पानी का जैसे फवारा छोड़ दिया इस बीच माँ खुद ही अपने दाने को हाथो से रगड़ने लगी...."आहह आआआआअहह".......माँ दहेक उठी और उसकी चूत ने बेतहाशा पानी छोड़ दिया...जो उसकी जांघों चूत और फर्श को गीला करते चला गया उसके बाद वो शिथिल पड़ गयी और उसकी टांगे काँप उठी..जैसे उसमें जान ना हो...
वो वैसे ही पश्त पड़े हाफने लगी....मैने उसकी चूत को मुट्ठी में लिए दबाए रखा और फिर उसे दो तीन बार कस कर मसला...तो माँ मेरे सीने पे पाँव रखके मुझे जैसे धकेलने लगी कि बस बहुत हो गया अब और सहने की उसकी शक्ति नही...पर मैं रुका नही चूत को दबाए मुट्ठी में...मैं उसे तडपाता रहा जब वो फिर ऐंठी तब मैने उसकी चूत पर से हाथ हटाया माँ फिर पश्त पड़ गयी..
मैं उसकी चूत से बहते सफेद पानी में अपना मुँह लगाके उसे चाटने लगता हूँ जब उस नमकीन स्वाद को चख लेता हूँ तो चूत को हाथो से ही सॉफ किए उठ खड़ा होता हूँ इस बीच मैं माँ को दोनो हाथो के सहारे उठाता हूँ फिर उसके मास्क के छेद से ही उसके होंठो को चूसने लगता हूँ माँ को मेरे मुँह में अपनी चूत के रस का स्वाद लगता है पर उस वक़्त वो मदहोश होती है हम दोनो एकदुसरे को स्मूच कर रहे थे...मेरी ज़ुबान माँ के मुँह में होती है जिसे वो चुस्के फिर मेरे दोनो होंठो को चुस्ती है...फिर मैं उसके चेहरे से खुद के चेहरे को अलग करता हूँ
फिर अपने वज्र जैसे खड़े लंड को उसके मुँह में दाखिल करा देता हूँ...उसे थोड़ा समय लगा मेरे मोटे लंड को चूसने में लेकिन मैं उसके सर को पकड़े जैसे मैने अपने लंड को उसके हलक तक डाल रहा था जिससे वो परेशन होके छटपटाने लगी...उसकी आँखे आँखे बड़ी बड़ी सी हो गई..
आदम : दिस ईज़ कॉल्ड डीपतरट बेबी
इतना कहते हुए मैने लंड उसके मुँह से बाहर निकाला तो उसने साँस भरी...फिर खुद ही मुझे देखते हुए मेरे लंड को मुँह में लेके चूसा..."ऐसे नही जान ज़ोर से कस कर".......माँ एकदम कस कस के गुस्से में ही जैसे मेरे लंड को चूसने लगी इतनी ज़ोर ज़ोर से जल्दी में कि मेरा लंड जैसे उसके दाँतों से घिसने लगा मैं खुद ऐंठ गया उसे रोकना चाहा पर वो साथ साथ मेरे अंडकोष को भी जैसे मसल रही थी...
माँ मेरे लंड को बराबर चुसते हुए अपने मुँह से अलग करती है..."अब थुको"....माँ अपने होंठो पे लगे थूक को पोंछते हुए मेरे थूक से सने लंड पे और अपना थूक डालती है और उसे चिकना करती है फिर बेतरतीब ढंग से आगे पीछे मसल्ति है..."उफ़फ्फ़ आहह एसस्स येस्स लाइक दट वे ओह्ह येअह्ह्ह".......माँ मुझे सिसकते हुए देख लंड को और ज़ोर ज़ोर से चूसने लगती है इस बीच उसकी ज़ुबान मेरे सुपाडे के इर्द गिर्द चल रही होती है जिस अहसास से मैं काँप उठता हूँ....कि अब निकला कि तब?...माँ मेरे लंड को अपने मुँह से बाहर उगल देती है जिससे माँ के मुँह का लार गिर रहा होता है..
मैं माँ को बिस्तर पे सीधा ही सही पर अपनी तरफ उल्टा लेटा देता हूँ और अपने भारी भारी चूतड़ उसके चेहरे के नज़दीक लाता हूँ वो हंसते हुए मेरे चुतड़ों को धकेलने लगती है पर मैं नही मानता...."कर ना".......
"नही हो पाएगा छी".......
"मैने भी तो तेरे साथ किया".........
"पर तेरी बात जुदा है ना".....
."चल फिर चूम ही ले"........
"ठीक है"....माँ हंसते हुए मेरे दोनो चूतड़ पे अपने दाँत गढ़ाती है तो मैं आहह भरके हंसता हूँ
माँ फिर दोनो चुतड़ों पे एक एक चुंबन देते हुए मेरे...मेरे छेद में एक उंगली डाल देती है जिस अहसास से मैं रोमांचित हो उठता हूँ उफ्फ कभी किसी औरत ने मेरे वहाँ अपनी उंगली नही प्रवेश की थी..वो कस कर डालती है तो मुझे दर्द होता है....तो मैं उसे ठहरने को कहता हूँ फिर उंगली करने को बोलता हूँ ऐसा करते हुए वो आराम से मेरे छेद से उंगली अंदर बाहर करने लगती है फिर मेरे छेद पे डालते हुए वहाँ हल्का सा अपनी नाक रगड़ती है...फिर मेरे चुतड़ों को भीचने लगती है....
कुछ देर में ही मैं माँ को उसी पोस्चर में अपने बाज़ुओ में जकड़ते हुए उठा लेता हूँ अब स्टॅंडिंग 69 पोज़िशन जैसा कुछ माहौल था....माँ के हाथ तो बँधे हुए थे इसलिए मैं उसे वैसे ही उल्टा लटकाए रखता हूँ वो अपना मास्क खींच कर उतार देती है फिर मेरे अंडकोष पे अपनी ज़ुबान फेरते हुए उन दोनो को बारी बारी से चाट्ती है फिर उन्हें सूंघते हुए उन्हें चूस भी लेती है
मैं इस बीच माँ का चूत जो मेरे मुँह के एकदम सामने प्रस्तुत था उस पर अपनी नाक रगड़ते हुए उस पर ठूकते हुए उसे चाटने लगता हूँ "वाहह क्या छूट है माँ की?"......मैं बड़बड़ाता हुआ माँ की छूट को चाटते चुसते कहता हूँ तो माँ काँप उठती है...वो फिर हँसके मेरे लंड को भी हाथो में लेने की कोशिश करती है पर मेरे ज़्यादा हिलने से उसके चेहरे मेरे लंड पे घिस रहा होता है....
जब मैं उसे उठाए थक जाता हूँ तो उसे वापिस बिस्तर पे गिरा देता हूँ..इस बार माँ के कलाईयों से रस्सिया उतार फैंकता हूँ फिर उसकी लाल कलाईयों के निशानो पे चूमता हुआ उसके बगल में लेट जाता हूँ
"तुझे दर्द नही दे पाउन्गा मैं माँ कभी नही"........माँ इस बात को सुनती और मेरी आँखो में आँसू देख भावुक हो उठती है
"तो बेटा कर दे अपनी हसरत पूरी मैं खुद इजाज़त देती हूँ"...कहते हुए वो मुझसे लिपट जाती है अपनी टांगे खोल देती है एक टाँग मेरे जाँघ पे लपेट लेती है फिर नीचे से मैं चूत के मुंहाने में लंड को घिसते हुए घुसाने की जगह बना लेता हूँ
माँ मुझसे से लिपट जाती है...और उसके बाल मेरे चेहरे पे बिखर जाते है...उसके बाद चुदाई फिर शुरू हो जाती है...और माँ हिच हिच के मुझसे चुदने लगती है मैं नीचे से कुल्हो में ताक़त भरे उसकी चुदाई करने लग जाता हूँ...माँ इस बीच मेरी पीठ पे नाख़ून गाढ़ने लगती है मुझे खुद से लिपटा लेती है...
मैं उसकी गर्दन गाल गले चेहरे होंठ नाक माथा...जहाँ भी मन कर रहा था चुंबन लेते जा रहा था...माँ मुझसे लिपटे काम आलिंगन में जकड़ी मेरी दोनो जांघों पे अपनी टाँग फेरते हुए मुझे अपने कलेजे से लगा लेती है.."आहह आहह बेटा"......
."आहह मेरी अंजूमम्म मैन्न्न मॅर जौउू अगर तूऊ ना मिले तेरे लिए ही तो मैं हर दम दीवाना सा रहा हूँ तेरी जगह कोई नहिी ले सकता"........
"उफ़फ्फ़ उहह एम्म्म मैं भी तेरी बिना नही जी सकती जब तक साँसें है बॅस तूऊ उफ़फ्फ़".......माँ हन्फते हुए अपनी चूत के दर्द को बर्दाश्त किए मेरे से एक दम लिपट जाती है मैं उसकी टांगे हाथो से जकड़े धक्के तेज़ कर देता हूँ
और कुछ ही पल में अपना लंड बाहर निकाले उसके पेट पे अपने वीर्य की बूँदें छोड़ने लगता हूँ...माँ को अपने पेट पे बेटे के गरम वीर्य का अहसास होता है उसके बाद मैं खुद ही माँ से लिपट जाता हूँ मेरा वीर्य उसके पूरे बदन पे कयि जगह लग जाता है..हम दोनो कुछ देर तक वैसे ही हान्फ्ते रहे
आदम : और मेरी जान कैसा लगा?
अंजुम : उफ़फ्फ़ बहुत मज़ा आया अफ जान निकाल दी मेरी तूने
आदम : लेकिन माँ मुहब्बत प्यार से होती है आहिस्ते से ये सब तो दीवानगी है
हम कुछ देर तक एकदुसरे से चिपके रहे उसके बाद माँ फिर मेरी शादी के बारे में मज़ाक करने लगी तो मैने कहा कि बस माँ इस बारे में कोई बात चीत नही मैं कोई शादी वादी नही करने वाला...माँ जानती थी मेरी किसी भी पराई औरतो से कोई मुहब्बत नही हो सकती थी अगर होती भी तो मुझे मालूम था कि वो ज़रूरत तक होती और ऐसा हुआ भी....
माँ मेरे ज़ोर से उसे डाटने से सेहेम उठी फिर मुझे पुचकार्ते हुए मनाने लगी...मैं भी क्या कहता अब जब बाहें फैलाए एक खूबसूरत औरत तुम्हें अपने नंगे बदन से लिपटाना चाह रही हो और तुम रेस्पॉन्स ना दो तो तुम नमर्द के ही श्रेणी में आओगे लेकिन मैं तो माँ का दीवाना था उसका मर्द था मैं मैं माँ से लिपटके सो गया....
हम सोए पड़े रहते अगर ज्योति भाभी ने दरवाजे पे दस्तक देते हुए हमे आवाज़ ना लगाई होती.....मन ही मन सोचा "राजीव दा तो लगता है मुझसे पहले पास आउट हो गये इसलिए ज्योति भाभी इतनी जल्दी फारिग होके नीचे आई ये भी कम नही इन्हें भी माँ से कोई ना कोई काम पड़ जाता है ...अपने मन में हंसता मुस्कुराता खुश होता माँ के हड़बड़ाते हुए मैं ढीला पाजामा पहन लेता हूँ और माँ वो तो किसी चोर की तरह फुरती से गुसलखाने अपनी साड़ी लिए नंगी ही अवस्था में भाग उठती है हड़बड़ा हम दोनो ही गये थे
दरवाजे के खुलते ही...ज्योति भाभी ने मुझे खुले बदन पाया...मैं जैसे तैसे अपनी उखड़ी साँसों पे काबू पाए एक पाजामा झट से डाल लिया था...पर अंदर कुछ ना पहनने की वजह से मेरा लंड अकडा हुआ था जो अब भी वीर्य की बूँदें हल्की हल्की निकाल रहा था..ज्योति भाभी की नज़र मेरे पसीने से तरबतर बदन और पाजामे में मेरे खड़े लंड के उभार पे पड़ी....तो मारे शरम से उन्होने मेरे चेहरे की तरफ अपनी नज़रें की...और मुस्कुराइ
ज्योति : क्या कर रहे थे तुम आदम? इतने पसीने पसीने क्यूँ हो?
आदम : उम्म्म जी वो दरअसल अभी अभी ऑफीस से आया ना तो कपड़े चेंज कर रहा था
ज्योति भाभी शादी शुदा थी भला वो मेरी हालत को लगभग जान ही सकती थी..लेकिन उन्होने इतना गौर नही किया...मैने देखा कि उनके हाथ में एक कटोरी थी जो कि खाली थी....
आदम : अच्छा ज्योति भाभी कुछ चाहिए था?
ज्योति : हां ओह देखो भूल गयी मैं भी ना...असल में तुम्हारे राजीव दा कयि दिन से राशन लाए नही जिस वजह से दिक्कतें हो रही है वो थोड़ा नमक चाहिए था एकदम ख़तम हो गया है तुम भी सोचते होगे कि मैं बार बार आ जाती हूँ
आदम : अर्रे नही भाभी ऐसा नही है अभी दे देता हूँ दीजिए (मैने हाथ से कटोरी लेते हुए आगे बढ़ा)
ज्योति भाभी वहीं खड़ी रही तो मैं उन्हें अंदर आने को कहते हुए रसोईघर की तरफ जाने लगा.....ज्योति भाभी की नज़र बिस्तर के खराब चादर ना पड़ गयी हो..यही सोच सोचके नमक कटोरी में डाले जा रहा था....फिर बाहर आया...तो पाया जिस बिस्तर पे माँ और मैने कुछ पल पहले चुदाइ की थी उसी सिलवट पड़े बिस्तर पे वो बैठी हुई थी...वो तो अच्छा हुआ कि किनारे पे बैठी हुई थी वरना उन्हें पीछे की चादर पे लगा वीर्य दिख जाता :ऊप्स:
आदम : य..ये लीजिए भाभी
ज्योति : हाँ हां दो थॅंक यू सो मच आदम
आदम : अच्छा भैया कहाँ है? सो गये क्या ?
ज्योति : जबसे आए है तबसे बिस्तर पे ही तो पसरे हुए है
आदम : हां हां आप उन्हें उठने नही देती होगी ना
ज्योति : हट पगोल कुछ भी हां बदमांश
ज्योति भाभी मेरे हाथ से नमक की कटोरी लिए जाने लगी उन्होने जाते वक़्त पूछा भी माँ कहाँ है? क्यूंकी कमरे में घुसने के वक़्त भी वो यही इधर उधर झाँक रही थी सोचते हुए....मैने कहा असल में माँ की साड़ी पे खाना बनाते वक़्त दाल कपड़े पे लग गया था तो वही उतारने बाथरूम गयी है..
ज्योति : अच्छा पर शाम को तो तेरी माँ कही थी कि उन्होने खाना जल्दी बना लिया मैं आई भी थी कहाँ गंदी हुई थी साड़ी?
आदम : उम्म्म हो सकता है ध्यान ना दिया हो साड़ी के एक साइड लग गया था माँ भी थोड़ी केर्लेस वुमन है ना हाहाहा बाद में ख्याल करती है? (मेरी गान्ड फॅट गयी कि कही उन्हें कोई शक़ ना हो जाए)
ज्योति भाभी मुस्कुराइ फिर बोली चलो तुम गेट लगा लो मैं जा रही हूँ...मैने उन्हें गेट तक छोड़ा फिर झट से दरवाजा लगाया...गनीमत थी कि माँ बाथरूम में घुसने के साथ नल चला दी थी...मैं जब वहाँ पहुचा तो माँ ने पर्दे से सर निकालते हुए कहा कि क्यूँ आई थी?...
.मैने कहा कि वो नमक लेना था उन्हें....माँ फिर कुछ नही बोली नहाने लग गयी उसके नहाने के बाद मैने भी नहा लिया...फिर हमने साथ डिन्नर किया और एकदुसरे से चिपक कर सो गये....माँ ने वो दर्जी की सीलि मास्क को फ़ैक् दिया...बोली कि ये सब की दरकार नही फालतू चीज़ें घर में अच्छी नही लगती...कोई देखेगा तो क्या सोचेगा? मैं भी क्या कहता इसलिए कोई आपत्ति नही की...वरना बार बार वो मास्क देखके माँ की ब्द्स्म वाली चुदाई का ही ख्याल आता
अगले दिन ऑफीस में काम काज से निपटा रहा था...तो इतने में मोबाइल फोन बज उठा...मैं दफ़्तर से बाहर निकला फिर फोन रिसीव किया..."हेलो?".....अननोन नंबर देखके ही मैं चौंक उठता था..इसलिए मैने थोड़े कड़े स्वर में कहा...उधर से आवाज़ आई किसी औरत की...उन्होने जैसे ही बिंगाली में अपना परिचय दिया...तो मैं खुश हुआ क्यूंकी कॉल मेरी बुआ का था बड़ी बुआ का....वहीं तबस्सुम दीदी की माँ और मोरतुज़ा काका की बीवी
आदम : हां काकी बोलिए
बुआ : अर्रे बेटा कैसा है तू? काम कैसा चल रहा है माँ कैसी है ? आजकल तो बस एकदम किनारे हो गया है तू..
आदम : हाहाहा ऐसा नही है काकी मैं बहुत याद करता हूँ आप लोगो को असल में माँ को अकेले भेजता नही हूँ ना आप तो जानती है कि बाहर का माहौल और उपर से मुझे एकदम वक़्त नही मिलता हाथ में
बुआ : ओह्ह्ह अर्रे बेटा तुम्हारी तबस्सुम दीदी आई है अपने पति के साथ...तुम माँ को लेके आओ तबस्सुम दीदी तुमसे मिलने की बड़ी ज़िद्द कर रही है
आदम : अच्छा अच्छा जी बिल्कुल काकी
इतना कहते हुए कुछ देर बात किए काकी ने फोन कट किया...तो मैने सोचा उफ्फ तबस्सुम दीदी अब तक तो वो काफ़ी निखर गयी होगी....मुझे फिर अपने और तबस्सुम दीदी के बीच हुए वो मीठे मीठे वाक़या नज़र में घूमने लगे जैसे....तबस्सुम दीदी आज बच्चेदार हो गयी थी...उनके दो बेटे हुए थे और तबस्सुम दीदी के साथ लुत्फ़ उठाने के बाद ही तो मैं शहर लौट आया वो कोलकाता चली गयी थी अपने पति के साथ...फिर तो उसके बाद भेंट ही नाही हुई थी...सच में माँ को यहाँ लाने के बाद मैं अपनी किस औरत से मिला था?
मैं तबस्सुम दीदी से मिलने के लिए एग्ज़ाइटेड था इसलिए दुकान से ही कुछ बच्चों के लिए चीज़ें खरीद ली...जैसे खिलोने वग़ैरा...जब मोरतुज़ा काका के घर पहुचा तो वहाँ बुआ ने मेरा स्वागत किया...गनीमत थी कि काका मुझे मिले नही वो काम के पर्पस में आउट ऑफ टाउन थे आने ही वाले थे पर सुना कि शहर और हाइवे के बीच हेवी जाम में अटके हुए थे...
तबस्सुम दीदी ने मुझे देखते ही मुझे गले लगाया उफ्फ उनकी छातिया तो मेरी शर्ट में ही जैसे दब गयी....काफ़ी मोटी मोटी छातिया हो गयी थी...खूब निखर गयी थी मोटी भी हो गयी थी और चूतड़ एकदम उठे हुए थे....जीजा जी मुझसे मिले और हम दोनो ने हाथ मिलाया फिर वो मुझसे बातें करने लगे...इस बीच मेरी नज़र पास झूले में उन दो नवजात शिशु पे पड़ी....मैने उन्हें आगे बढ़के एक एक कर गोद में उठाया
वाहह कितने खूबसूरत थे?....हम तीनो बैठके बातें करने लगे इस बीच तबस्सुम दीदी दूसरे वाले बच्चे को अपने साथ ले गयी...हम मर्दो से परदा किया..जान ही सकते है क्यूँ? तो उनका दूसरा बच्चा भी रोने लगा...जीजा ने एकदम से बात काटते हुए आवाज़ दी तबस्सुम दीदी को पर वो उठने की उस हालत में नही थी....
"अर्रे तबस्सुम्म देखो रोशन रो रहा है इसे भी दूध पिला दो".......हालात को देखते हुए जीजा जी बच्चे को लिए अंदर चले गये फिर वो वापिस बाहर लौटे
जीजा : और बताओ कैसे हो?
आदम : ठीक हूँ सर आप बताइए
जीजा : हाहाहा बस हम भी अच्छा ही चल रहे है मैं तो बेहद खुश हूँ मेरी तो जैसे आस ही छूट गयी थी लेकिन तबस्सुम के प्रेग्नेंट होने से घर में जैसे रौनक आ गयी और तुम कब कर रहे हो शादी?
आदम : हाहाहा फिलहाल तो नही और ना शायद करूँ?
जीजा : अर्रे कर लो कब तक यू जवानी जाया करोगे?
मैं जानता था जीजा साला काफ़ी ठरकी था...इसलिए मैने भी डबल मीनिंग लहज़े में मुस्कुराते हुए कहा कि जब किसी की मिल जाएगी तो पर्मनेंट्ली उसी से ही कर लेंगे .......जीजा ने मेरे हाथ पे हाथ मारते हुए टहाका लगाया.....जीजा इतना खुश था और इतना अहंकार कर रहा था जैसे वहीं अपनी औलादो का बाप हो...साले को क्या खबर? पी पीके तो खुद ही सेक्षुयल ड्राइव अपनी खराब कर ली ......और उसकी बीवी की कोख को तो उसके अपने भाई ने ही हरा किया अगर वो 7 दिन वो ना आई होती तो आज ये खुशिया ये माहौल होता ही नही
जीजा से बोरियत हुई बात करने में पर बात करना पड़ा....तो बुआ आके बैठ गयी तो मुझे कंपनी मिली हमने थोड़ा रेफ्रेशमेंट लिया तो इतने में तबस्सुम दीदी दोनो बच्चों को सुलाते हुए हमारे साथ आके गॅप करने लगी...इतने में पेशाब करने का इशारा किए जीजा बाथरूम चले गये तो बुआ भी झूठे बर्तनो को लिए अंदर किचन में चली गयी बोली बातें करो तुम लोग
तबस्सुम दीदी काफ़ी सजी धजी लग रही थी...तो मैने उनसे ही बात करना शुरू किया...वो बीच बीच में मुझसे शरमा भी रही थी शरमाये भी क्यूँ ना उसे मुझे देखके वहीं बीती बात याद आ रही होगी वो दिन याद आ रहे होंगे जब उसने मेरे साथ बिस्तर गरम किया था....
आदम : और ठीक हो ना ?
तबस्सुम : बहुत ही ठीक हो गये है हम नही तुम्हारे जीजा जी अब देखो कैसे लट्तू की तरह हमारे पीछे नाचते है
आदम : ह्म अच्छा दीदी अब तो तक़लीफ़ नही देते ना किसी भी तरह की
तबस्सुम : नहिी तुम्हारे से मिलने के बाद मैने उनके साथ यहाँ भी किया था (मेरे पास चेहरा लाए धीरे लहज़े से बोलते हुए कही)
आदम : ह्म चलो अच्छा है अब आप खुश तो रहोगी
तबस्सुम : तुम बताओ वापसी कब हुई दिल्ली से?
आदम : बस हो गया करीब 1 साल होने को है
तबस्सुम : ह्म ठीक ही किया जो माँ को साथ ले आए और बाबा वहीं है
आदम : नही वो नोएडा शिफ्ट हो गये (मैं तो पिता की बात करना ही नही चाहता था इस बीच वो अपनी साड़ी ठीक करने लगी)
तो मैने पाया कि उन्होने लाल रंग की ब्लाउस पहनी थी और उनके साथ निपल्स दिख रहे थे....ब्लाउस थोड़े गीले थे समझ आया कि उनसे दूध निकल रहा था...उफ्फ मेरी तो देखके ही हालत खराब हो गयी काश माँ के भी ऐसे दूध निकलते तो सेक्स करने में दुगना मज़ा आता पर माँ नयी नयी माँ थोड़ी बनी थी
तबस्सुम दीदी ने नोटीस कर लिया कि मेरी निगाह उनके छातियो पे गुज़री तो वो हल्का शरमाई और मुस्कुराइ....कही कि अब नही आदम वरना तुम्हारे जीजा जी को शक़ हो जाएगा...मैने कहा हाए दीदी आप इतनी निखर ही गयी हो किसी भी गैर मर्द का दिल आपके प्रति फिसल जाए ....तो तबस्सुम दीदी मुस्कुराइ....इस बीच बुआ ने आवाज़ देते हुए कहा कि माँ नही आई? मैने कहा आ जाती पर मैं सीधे ऑफीस से यहाँ आ गया फिर कभी ले आउन्गा...इस बीच तबस्सुम दीदी ने शरारत भरे लहज़े में कहा कि अब अकेले नही माँ के साथ ही आना समझे
आदम : हां हां बिल्कुल (सच पूछो तो मेरा मन भी अब माँ से अलग किसी पराई औरतों पे नही हो पा रहा था और वैसे भी तबस्सुम दीदी को चोदना अब ना मुमकिन के ही बराबर था घर पे सब प्रस्तुत रहते हर वक़्त मेरे घर में तो चान्स नही हो पाता माँ का डर अलग)
तबस्सुम : अब कर लो ना शादी इतने जवान हो गये हो
आदम : मर्द ज़िम्मेदारियो से मर्द बनता है शादी से नही
तबस्सुम : वो तो ऑलरेडी बन ही चुके हो तुम ज़िम्मेदारियो से भी और किसी और चीज़ से भी
आदम : हां वो तो है अभी भी बिस्तर पे आपकी आहों की आवाज़ सुनाई देती है (तबस्सुम दीदी एकदम झेंप सी होके मुझे घूर्रने लगी)
मैं हंस पड़ा :लोटपोट....तबस्सुम दीदी ने मुझे धीरे धीरे लहज़े में ही बताया कि यहाँ से जाने के बाद वो अपने पति से भी एक आध बार दिखावे के लिए चुदि थी...जिससे उन्हें ये लगे कि उनकी खोख सुनी से हरी उनके पति की वजह से हो गयी है....सुधिया काकी ने क्या पैतरा आज़माने को दिया था उन्हें? एक तरफ उनका उजड़ता सुहाग और दूसरी तरफ मेरी ज़रूरत दोनो के ही मक़सद पूरे हो गये एकदुसरे से मिलते ही ....फिर तबस्सुम दीदी मेरी प्रशंसा करने लगी मेरी तारीफ किए ही जा रही थी कि अगर मैं ना होता तो उनका सुहाग....उन्होने उन बच्चों की तरफ निगाह डाली फिर मेरी ओर....दिल ही दिल में कहा जैसे तुम ही तो इनके बाप हो....और ये सच ही तो था