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Incest माँ को पाने की हसरत

एक तरफ रूपाली भाभी मेरे बीज से माँ बनी और दूसरी तरफ तबस्सुम दीदी अपनी राज़ी खुशी से अपने घर को उजाड़ने से बचाने के लिए अपने पति का रिश्ता तोड़ देने के डर से ही तो मुझसे हमबिस्तर हुई थी वो...पर रूपाली भाभी को तो भूल से गर्भ ठहरा था ....तबस्सुम दीदी ने कहा कि खाना ख़ाके जाओ....और वहीं हुआ मुझे जीजा जी और उनके साथ ही रात का भोजन करना पड़ा बुआ ने खाना भी पॅक किए दिया कहा कि माँ को भी खिलाना इस बीच माँ के मेरे देर हो जाने से एक आध बार कॉल्स भी आए...एक तो माँ उपर से मेरी घरवाली उसे तो मेरी फिकर होनी ही थी मैने उसे कहा कि मैं तबस्सुम दीदी के यहाँ आया हूँ तुमसे आके बात करूँगा तो वो फिर निश्चिंत हुई....

एक बार फिर रोशन और राहुल को अपनी गोद में लिए खिलाया वाक़ई चेहरा मुझसे ना मिलता जुलता हो पर एक खिचाव सा था उनके प्रति मेरा...तबस्सुम दीदी की गोद में बच्चा देते हुए मैं वहाँ विदा हुआ और घर लौटा..माँ ने खाना तक नही खाया था...इसलिए बुआ की दी सब्ज़ी और तरकारी उनके सामने खोल दी...माँ ने कहा तू कुछ खा ले मैने कहा ख़ाके आया हूँ पर फिर भी माँ का दिल रखने के लिए मैने उनके साथ थोड़ा सा रात्रि भोजन और कर लिया....फिर हम वापिस बिस्तर पे आके लेटे कुछ देर माँ मुझसे बतियाती रही तबस्सुम दीदी के बारे में उनके ससुराल के बारे में पूछने लगी मैने बताया सब हँसी खुशी में चल रहे है...तबस्सुम दीदी ने दो बेटों को जो जनम दिया वो दिखने में निहायती हसीन है (तारीफ मेरे खुद के बच्चो की मैं कर रहा था जिससे माँ अंजान थी)

पूरी रात तबस्सुम दीदी और खुद की चुदाई के वाक़यो को सोचते हुए ही मुझे नींद आई....अगले दिन जब मेरी नींद खुली तो माँ ने ही मुझे जगाया वरना ऑफीस के लिए लेट हो जाता.....इस बीच माँ और मैने मुंबई जाने के लिए तय्यारी भी पुरज़ोर कर ली थी...इसलिए माँ ने तारीख पास आते आते सारी पॅकिंग कर ली थी....मैने माँ से कहा चल इस बीच कुछ महँगा गिफ्ट समीर भाई और उसकी होने वाली बीवी के लिए खरीद लेते है....तो माँ ने मेरे गाल खीचे...."अर्रे तेरी सोफीया आंटी है वो रे बाबा "...........

."हाहाहा आंटी थी पर अब भाभी जो बनने जा रही है"......

."हाए रे ये लड़के क्या से क्या बना देंगे अपनी माँ को .....माँ शरमाते हुए हंस पड़ी...मेरी भी हँसी छूट गयी..

हम शहर के बड़े महँगे दुकान गये पहले तो सेलेक्षन में ही साला काफ़ी टाइम पास हुआ उसके बाद ही मैने एक महँगी तस्वीर खरीदी जो माँ को भी जची साथ ही साथ में माँ ने एक बहुत ही महेंगी काम की हुई साड़ी सोफीया आंटी के लिए खरीदी....दो-तीन तोफो को निक़ाह के लिए खरीदने के बाद हमने उन्हें अच्छे से पॅक करवा लिया...

"पर बेटा ये सब हम फ्लाइट में ले जा सकेंगे? ........

."अर्रे हां माँ सब तो चला जाएगा पर ये तस्वीर इसका कॉच ना टूट जाए मैं एक काम करता हूँ समीर को इत्तिला करके ये उसके घर शिपमेंट करवा देता हूँ पार्सल में भी क्या मालूम टूट जाए? मेरे बहुत जानने वाले है जो डेलिएवेरी आउट ऑफ टाउन करते है संभाल के ले जाएँगे".........माँ को मेरा ये आइडिया अच्छा लगा

मैने समीर को सर्प्राइज़ देने के लिए वो तस्वीर भिजवा दी....साथ में एक वेड्डिंग कार्ड में भी लिख के दिया..."तो बिलव्ड समीर आंड फॉर हर वाइफ सोफीया शादी की ढेरो मुबारक"......ये लिखते हुए मैने वो तस्वीर वाला तोहफा ऑफीस में दिया जिन्होने मेरे रेफरेन्स पे उन्हें मुंबई भेज दिया बोला कुछ दिन में ही पहुच जाएगा....अब चलो देखते है समीर कितना खुश होता है? कही वो ये बुरा ना मान ले कि हम आ नही रहे पर पहले तोहफा ही फॉरमॅलिटी के लिए भेज दिया....

समीर का 4-5 दिन हमारे फ्लाइट छोड़ने से एक दिन पहले कॉल आया वो काफ़ी खुश हुआ उसे पैंटिंग काफ़ी अच्छी लगी उसने कहा कि सोफीया को भी वो पैंटिंग काफ़ी पसंद आई है अब मैं जल्द से जल्द बस निक़ाह में शरीक़ हो जाउ....मैं बस मुस्कुराया और उसे शादी की ढेरो बधाई दी....उसे ये सर्प्राइज़ तो माँ ने बताने से मना किया जो सोफीया आंटी जानती थी कि माँ भी उन माँ-बेटों के निक़ाह में शामिल होने वाली थी मेरे साथ

सोफीया : अर्रे पगले तूने आदम की माँ अपनी अंजुम आंटी का ज़िक्र किया (सोफीया ने अपने बेटे की तरफ हैरत से देखते हुए कहा उसे तो लगा जैसे सोफीया और अंजुम दोनो ही उनके शादी में आके उसके बेटे को सर्प्राइज़ देने वाली थी)

समीर : हाहाहा अब जितना हमसे छुपा लो तुम अपने राज़...उतना ही जानूँगा मैं वो सब तेरी बातें (माँ शरम से लाल हो गयी उसकी चोरी पकड़ी गयी )

समीर : हाहाहा असल में उस दिन मैने टेबल पे दोनो माँ-बेटे यानी कि आदम और अंजुम आंटी को एकदुसरे से छेड़ करते हुए देखा और वो जिस तरीके का छेड़ कर रहे थे उससे मुझे तो सॉफ हो गया कि दोनो के बीच कुछ तो पुआ पक रहा है क्यूंकी एक माँ और बेटे वैसे तो एकदुसरे को छेड़ते नही वो छेड़ तो मिया बीवी के ही बीच होता है ...पर मैं कन्फर्म नही था...और शक़ तो तभी से था जब आदम खुद अपना जॉब बसा बसाया सबकुछ छोड़ होमटाउन से वापिस दिल्ली आया था...उस वक़्त उसके दिल-ओ-दिमाग़ पे लस्ट छाया हुआ था अपनी माँ के प्रति...

 
सोफीया : हाए अल्लाह तुम्हे तो सबकुछ पता चल गया

समीर : ह्म शातिर हूँ मैं मेरी जान मेरा दोस्त जितना भी छुपा रुस्तम रहे उसकी असलियत तो मैं पहचान ही लेता हूँ...हाहाहा दरअसल मैं खुद पहले घबराया कि कही आंटी को हमारे रिश्ते के बारे में मालूम ना चल जाए लेकिन उस दिन एर टिकेट्स निकालते वक़्त न जाने क्यूँ मन हुआ एक बार आदम से बात कर ही लूँ...अब जब टिकेट्स निकाली थी तो वो सॉफ कह देता कि मैं तो माँ को लेके आउन्गा नही...पर वो तो एकदम खुश हो गया आंटी ने मुझे जब इनफॉर्म किया तभी मेरा शक़ यकीन में तब्दील हो गया....कि बेटा एक तरफ मुझसे झूठ बोल रहा है कि माँ को उसकी कुछ नही मालूम फिर एकदम से उसकी माँ ही मुझे कॉल की बड़ा कन्फ्यूज़्ड हो गया था मैं..

तब आयने की तरह सॉफ मुझे मालूम चल पड़ा कि बेटे आदम मियाँ तुम तो हमसे भी बड़े वाले मजनू निकले...गुपचुप दोनो माँ-बेटे होमटाउन शिफ्ट भी हो गये जहाँ जाने से भी आंटी को इतना नफ़रत और देखो किस्मत का खेल सच खुद ही सामने आ गया है

सोफीया : हाहाहा बेटा तू अपने दोस्त को ग़लत मत समझ वो तो बस तुझे सर्प्राइज़!

समीर : अर्रे मेरी जान इसी लिए तो मैने कुछ नही कहा अब तक चुप रहा ताकि आदम खुद मुझे ये राज़ बताए मैं जानता हूँ आंटी को निक़ाह में लाने का मतलब है मुझे सर्प्राइज़ ही देना लेकिन एक बात बताओ तुम्हें आंटी की मज़ूद्गी चाहिए निक़ाह में वो भी आना चाहती है तो इस बीच आदम ने बेवकूफी ना की यह कह कर कि हां अंजुम आंटी तो बिल्कुल आएँगी बोलो बोलो

सच में समीर जितना व्यभाचरी था उतना ही उसकी सोच भी ऐसे रिश्तो को पकड़ लेती थी...समीर को थोड़ा बुरा लगा कि शायद आदम ने उसे गैर ही समझा जो आजतक अपनी माँ और खुद के रिश्ते को छुपाते आया था....लेकिन वो जानता था आदम ऐसा नही है...शायद उस वक़्त जब उनके घर आखरी बार आए थे दिल्ली में तो पहेल कर रहे हो...लेकिन आदम ने सॉफ इनकार किया उसका अपनी माँ के प्रति कोई ऐसा सोच विचार नही...और समीर को भी लगा सोफीया हुई तो क्या? सोफीया जैसी हर माँ तो नही हो सकती

समीर शक़ के घेरे में ही रहता अगर उस रात आदम ने उसे फिर कॉल ना किया होता...वो चुपचाप बियर की चुस्की ले ही रहा था कि इतने में आदम का कॉल आया....समीर ने फिर अंजान बनके पहले आदम को सलाम किया फिर हंस के खुशी लहज़े में बात करने लगा.....

आदम : भाई हमारी माँ हमे सर्प्राइज़ देना चाह रही थी कि तेरे निक़ाह में माँ शामिल होगी तू सोचेगा उस वक़्त अबे ये क्या हो रहा है? हाहहहा

समीर : अबे मैं जानता हूँ साले तू बड़ा छुपा रुस्तम निकाला कोई नही कोई नही

आदम : हाहाहा सॉरी यार मैं उस वक़्त कुछ नही कह पाया जानता है क्यूंकी उस वक़्त माँ और मेरे बीच टालमटोल जैसे रिश्ते चल रहे थे....अब हम इकट्ठे है एक साथ है और तू तो जानता है एक साथ का मतलब

समीर : ह्म पर यार सोफीया ने मुझे बताया कि आंटी को कोई ऐतराज़ नही हमारे निक़ाह से :कन्फ्यूज़2:

आदम : बिल्कुल भी नही बल्कि जबसे उसे व्यभिचारी रिश्तो में ढाला है तबसे वो ऐसी हो गयी है कि अब उन्हें ये रिश्ता पाक दिखता है

समीर : तू भी साला सच बताना झूठ तो नही कह रहा चल माँ को तेरी मालूम चल ही गया हमारे रिश्ते के बारे में तो भी क्या सच में वो तेरे साथ रोज़ रात हमबिस्तर होती है ह्म

आदम समीर के मन की जिग्यासा बखूबी पढ़ सकता था...इसलिए उसने सिर्फ़ मुस्कुराए लहज़े में हल्का सा हंसा...तो समीर खुद पे खुद समझ गया कि आदम सच कह रहा था....फिर दोनो भाई एकदुसरे को अपने रिश्ते की मुबारकबाद देते हुए बात करने लगे....जब आदम ने फोन कट किया तो उसने पाया माँ उसके सामने पीठ किए बैठके झुककर फ्रिड्ज के पॉट से सब्ज़िया निकाल रही थी....माँ की लचकदार कमर बेटे के सामने थी....आदम ने अपने प्यज़ामे में अपने उभार को सहलाया....इस्शह क्या माँ का पिछवाड़ा दिख रहा है पेटिकोट के खिचाव से उफ्फ कितने उभरी हुई नितंब है माँ की....

आदम : माँ (बेटे ने आवाज़ दी तो अंजुम ने गले को आँचल से पोंछते हुए मूड कर बेटे की तरफ देखा)

अंजुम : क्या हुआ?

आदम : लगता है धक्के थोड़े हल्के हल्के मारने पड़ेंगे तेरी कमर और गान्ड दोनो उभर के उठ रही है

अंजुम : हाए अल्लाह कैसी बातें करता है अपनी माँ से तू? (मन ही मन अंजुम शरमा भी रही थी)

अंजुम : इसी लिए तो कहती हूँ तेरा कद्दू मुझे बहुत चुभता है आहिस्ते ही करा कर वरना पेटिकोट मेरा किसी दिन तेरी ही हरकतों की वजह से फॅट जाएगा

आदम : उफ़फ्फ़ माँ ऐसी बात ना कहो मैं तो चाहता हूँ कि इस्पे सिर्फ़ मेरी ही नज़र पड़े

अंजुम : ओह हो आज अपनी माँ को ही लाइन मार रहा है पहले तो नही देखता था ऐसे वैसे भी वक़्त के साथ साथ ढलती उमर में शरीर में चर्बी बढ़ ही जाती है

आदम : अर्रे ये तो मेरी मेहनत का कर्म है माँ जो तुझे मेरा खानपान लग रहा है वरना पिता जी के टाइम में तो तू एकदम सुखी हड्डी थी

अंजुम ने शरमाते हुए बेटे की तरफ देखा....आदम ने चाहा आगे बढ़के माँ के नितंबो को सहलाए पर उसे देरी ही किस बात की थी? पूरा वक़्त था उसके पास दो जने ही तो घर में उपस्थित हुआ करते थे और था ही कौन? जब चाहे गेट लगाओ और शुरू हो जाओ माँ भी तो हर टाइम राज़ी थी चाहे किचन में थामो उसे या किसी भी वक़्त बिस्तर पे लेटके टाँग खोलने का वक़्त वो ज़्यादा नही लेती थी...

 
आदम ने बताया कि समीर को सब मालूम चल गया तो उसे थोड़ा गुस्सा आया आदम पे...कि तू सर्प्राइज़ सर्प्राइज़ नही रख सका...तो आदम ने कहा कि वो तो मुझसे भी शातिर है हमारे रिश्ते को टटोल ना ले इसलिए उसका पता चलना वाजिब ही था.....माँ ने कुछ नही कहा बस माँ को रह रहके शरम आ रही थी....हो भी क्यूँ ना? देसी औरत थी शर्मो लिहाज का परदा रखना चाहती थी...किसी को मालूम ना चले ईवन अपनो तक को नही कि हम कैसे रिश्ते में बँधे है....अब समीर को मालूम चलना मतलब सोफीया आंटी को भी पता लगना था फिर उनके पास जाके वो उन्हें छेड़ती यही सब माँ ने मुझे कहा...मैने कहा कोई फिकर की बात नही है दोनो अपने ही घर के लोग है....तो माँ कुछ ना बोली खाना बनाने चली गयी...

हमारा शेड्यूल भी काफ़ी बिगड़ गया था...माँ और मैं रात गये बिस्तर पे देरी से सोते थे क्यूंकी ज़्यादातर वक़्त हमारी गंदी आदतों में ही गुज़रता था...खाना से फारिग होते है 10 बजे साडे दस बजे...माँ बिस्तर पे लेट जाती थी...फिर मैं टीवी में कोई मस्त ब्लुफिल्म लगा लेता था...और उसके बाआड़ हम अपना बिस्तर गरम करने लग जाते थे...गनीमत थी कि माँ और मेरे इतने दिनो के हमबिस्तर के दौरान माँ की भीषण चुदाई के बाद भी उन्हें गर्भ नही ठहरा था...क्यूंकी मैं काफ़ी सावधानियाँ बरतता था...सुबह 9 10 बजे आँख खुलती झटपट जैसे तैसे हालत में नाश्ता किए ऑफीस के लिए भागना पड़ता था...पूरे टाइम ऑफीस में उबासी लेते हुए काम करता था....और यही चिड मची रहती कि कब घर को निकलूंगा?

उस दिन माँ को सब्ज़ी मार्केट लेकर गया था...अब तो माँ बेफिक्री से सब्ज़िया ख़रीदती थी उसे अब किसी का डर नही था....मैने माँ से कहा कि चलो तबस्सुम दीदी से भी मिल लो वरना सोचेंगी कि हम घमंड कर रहे है....माँ ने कहा बच्चो को कुछ पैसे भी तो हाथ में पकड़ाना होगा ये तो घर की रसम है...मैने कहा कोई बात नही आप चलो तो....हम तबस्सुम दीदी से एक बार फिर मिले मोरतुज़ा काका भी वहाँ थे...मेरे स्टेटस की तारीफ किए जा रहे थे कि जितना तुमने उन्नति यहाँ रहके हासिल की उतना तुम्हारे पिता ने कभी ऐसा मोक़ां नही पाया...माँ को तो मुझपे गर्व हो रहा था....फिर तबस्सुम दीदी और उनके और मेरे बच्चों से मिलके माँ काफ़ी खुश हुई...जीजा जी भी माँ से आदर प्रणाम करके उनसे मिलके काफ़ी खुश हुए वो बार बार माँ की खूबसूरती की तारीफ कर रहे थे जो मुझे अच्छा नही लग रहा था....पर गनीमत थी कि वो माँ को काकी की ही नज़र से देख रहे थे सबसे विदा लेने के बाद हम वापिस घर को लौटे...माँ बेहद खुश थी...हमारे कोई 1 दिन बाद ही सुना कि तबस्सुम दीदी जीजा जी के साथ कोलकाता वापिस अपनी ससुराल निकल गयी सुनके अच्छा लगा कि गृहस्थी दीदी की पूरी अच्छी गुज़र रही थी और अच्छे से बस भी चुकी थी....

तारीख एकदम पास आ चुकी थी परसो की फ्लाइट थी तो हमने रात की ट्रेन कोलकाता जाने वाली का दो टिकेट लिया था....होमटाउन से कोलकाता जाने में कोई 8 घंटे ट्रेन में लगते है... अगले दिन.हम भीढ़ भाढ़ भरे कोलकाता शहर पहुचे...रेलवे स्टेशन से निकलने के बाद मैने माँ से कहा कि यहाँ से सीधा एरपोर्ट की तरफ निकलेंगे पहले कुछ खा पी ले....खाना वाना ख़ाके फारिग हुए एरपोर्ट जल्दी ही हम पहुच गये...माँ बेहद खुश थी ये उनका पहला सफ़र था...मैने माँ को अच्छी अच्छे सूट्स और साड़ी दिलाई थी साथ में निक़ाह में पहनने के लिए माँ के काफ़ी ज़िद्द देने पे एक शेरवानी खरीद ली थी....

एरपोर्ट में घुसने के एंट्रेन्स से दाखिल होने के बाद मैने माँ का बोरडिंग पास अपने पास ही रखा...फिर हम प्लेन में दाखिल हुए माँ और मेरा बोरडिंग पास दिखाए फिर उसके बाद हमारी फ्लाइट कुल मुक़रर वक़्त पे ही उड़ पड़ी...

उफ्फ टेक ऑफ के वक़्त माँ ने मेरे हाथो को कस कर पकड़ा हुआ था...उनकी तो जैसे जान अटक गयी थी....प्लेन अब 40,000 फ्ट उचाई पे उड़ रहा था पीछे छोड़ता चला गया वेस्ट बेंगल को...वाक़ई मैने कभी सोचा नही था कि समीर ने इतने बढ़िया एकॉनमी सीट्स का इंतेज़ाम किया था...एर होस्टेस्स के रेफ्रेशमेंट देने के बाद माँ से मैने कहा कि बस 2-3 घंटे में हम पहुच जाएँगे तब तक खिड़की से बाहर का जायेज़ा ले

माँ तो बस किसी छोटे बच्चों की तरह बाहर के नज़ारे को देख रही थी बीच बीच में मुझे उंगली दिखाते बोल रही थी देख कितना सुहाना सा व्यू लग रहा है...मैं भी काफ़ी उत्सुकता से देख रहा था...हमारी पहली फ्लाइट जो था ये तो एक ख्वाब ही था मेरे लिए....जब 2 घंटे बाद हमारी नींद टूटी तो हम लॅंडिंग कर चुके थे....मुंबई एरपोर्ट हमारी फ्लाइट पहुच चुकी थी...

कुछ देर बाद अनाउन्स्मेंट के होते ही हम बाहर निकले....माँ को ये सफ़र बेहद बढ़िया लगा....हम एकदुसरे के हाथ पकड़े एरपोर्ट से फिर बाहर निकले....टॅक्सी हाइयर की और समीर के यहाँ पहुचे इस बीच समीर ने दो-तीन बार कॉल किया मैने बताया कि मैं पहुच चुका तो उसने आने की इच्छा ज़ाहिर की मैने कहा कि हमने तेरे घर के लिए टॅक्सी भी ले ली....समीर ने फिर जानके फोन कट कर दिया...

वाक़ई समीर के बताए पाते के उस फ्लॅट के चौथे माले पे हम पहुचे लिफ्ट से...फ्लॅट काफ़ी आलीशान थी....आसपास के लोग भी काफ़ी मॉडर्न रहने वाले थे....वाक़ई समीर शौहरत मंद था....हमने दरवाजे की घंटी बजाई...दरवाजा खुलते ही समीर और आंटी ने हमारा स्वागत किया....समीर तो मेरे गले लग गया फिर माँ से सलाम किया....

समीर माँ को देखके शरमा रहा था....तो माँ ने उसके गाल खीचे.."बस बहुत शरमा लिया मैं जानती हूँ तू सब जानता है हां क्यूँ सोफीया? तुम बेटे को झूठ नही बोल सकती थी ........

."अर्रे ये इससके आगे कोई बहाना चल सकता है भला".............सोफीया आंटी और माँ भी हंसते हुए मज़ाक किए अपने बेटे की एकदुसरे के गले मिली...

फिर सोफीया आंटी ने मेरे चेहरे पे हाथ रखके मुझे गले लगाते हुए मेरा हाल चाल पूछा..."बेटा तू कैसा है?".......

."आंटी मैं बहुत अच्छा हूँ और आज आप बेहद हसीन और खूबसूरत लग रही है"..........सोफीया आंटी और माँ दोनो ही हंस पड़े....समीर भी मुस्कुराया

फिर हम अंदर आए झट से समीर ने हमारे लिए शरबत दिया और कहा कि अब कुछ दिन रुकना होगा आप दोनो को इसलिए वन वे टिकेट कटवाया था ..

.मैने कहा यार नौकरी का सवाल है....

समीर झल्लाया और कहा नही अभी आया और फिर जाने की बात कह रहा है .....नही ना आंटी कहीं जाएगी और ना तुझे कही जाने दूँगा? अर्रे यार इतने महीनो बाद मिले हो और अभी कैसे?

माँ : अर्रे समीर बेटा आदम नौकरी करता है ना थोड़े दिन की छुट्टी लेके ही आया है इसलिए कह रहा है ऐसा और अब तो मुंबई फिक्स हो ही गया हम सबका अब तो आना जाना होते ही रहेगा

समीर : हां आंटी ये तो है चलो आप लोग आप लोगो की भेजी जो तस्वीर थी वो दिखाए....

सोफीया : हां अंजुम देखो तो ये देखो (समीर और आंटी हमे अपने बेडरूम ले गये और वहाँ वो दीवार के टॉप मे लगी पैंटिंग दिखाई जो तस्वीर हमने भेजवाई थी)

 
वाक़ई वो तस्वीर काफ़ी खूबसूरत और थोड़ी बोल्ड थी....उसमें एक मटका लिए औरत जा रही थी और उसने सिर्फ़ एक साड़ी पहन रखा था इससे उसका बदन सॉफ नगन दिख रहा था....उसकीए बगल भी दिख रही थी....मैं जानता था दोनो शादी करने वाले है कुछ इस अंदाज़ की तस्वीर ही दोनो को भाएगी और ये तो माँ की भी पसंद थी फिर हमने उन्हें बॅग से निकालके तोहफे दिए जिनमें एक लॅंप था और कुछ घर में टाँगने वाली रिलिजियस तस्वीरें

उन्हें ये सब चीज़ें देखके काफ़ी खुशी हुई.....फिर समीर हमे हमारा कमरा दिखाते हुए बोला कि आप लोग अब आज से यही ठहरना....कमरा काफ़ी खूबसूरत था...और बिस्तर भी गद्देदार यक़ीनन साला हम दोनो को प्राइवसी देना चाह रहा था

माँ और सोफीया आंटी तो बातों में लग गये....फिर माँ ने समीर को समझाया भी कि जो कुछ उन दोनो के बीच होने वाला है इससे रिश्ता एक दूसरे रिश्ते में तब्दील हो जाएगा...ये सोफीया आंटी का ज़िम्मा है उस पर कि वो उसे हरपल खुश रखे मैं भी वहाँ मौज़ूद था इसलिए समीर के कंधे पे हाथ रखके उसे प्रोत्साहन दे रहा था....

समीर ने माँ से वादा किया कि वो अपनी माँ को अपनी बीवी के रूप में पूरी तरीके से अपनाने को राज़ी है और आख़िर तक उसका साथ निभाएगा...सोफीया आंटी इस बीच थोड़ी भावुक हो उठी तो माँ उन्हें समझाने लगी....इस बीच मज़ाकिया माहौल बना जब समीर मेरी टाँग खीचने लगा पर उसने एकदम से माँ और मेरे सामने ही कहा कि उसे मालूम है हमारे रिश्ते के बारे में और वो काफ़ी खुश भी है ये जानके कि वो इस कश्ती में अकेला नही माँ इससे शरमा उठी...और मैं भी

कुल 2 दिन तक हम समीर के यहाँ रहे थे...इस बीच हम लोगो ने साथ में तीनो टाइम का खाना खाया साथ में वक़्त बिताया मरीन ड्राइव में बारिश के सुहाने मौसम में घूमने गये काफ़ी तस्वीरें निकाली उसके बाद 15 तारिक़ को माँ सुबह सुबह ही आंटी को लेके ब्यूटी पार्लर चली गयी....समीर और मैं दोनो ही बेसवरे हो रहे थे....इस बीच हम भी तय्यार हुए तो एकदुसरे की तारीफ करने लगे...मैने कहा दूल्हा तू है इसलिए तारीफ तेरी ज़्यादा होनी चाहिए....समीर हंस पड़ा

घर को सज़ा धज़ा दिया था आदमियो ने...फिर गद्देदार बैठक के लिए क़ाज़ी के लिए लिविंग रूम भी सज़ा दिया....उसके बाद मैने खुद अपने हाथो से समीर का कमरा सजाया था सुहाग रात के लिए .....समीर इस बीच तय्यार होने अपने कमरे में चला गया था...जब वो बाहर निकला तो बहुत ही हॅंडसम लग रहा था...वाक़ई उस क्रीम कलर की शेरवानी में वो काफ़ी जच रहा था दूल्हे का सेहरा भी उसे मैने सर पे पहना दिया...और उसे बिठा दिया...आस पास किसी को मालूम नही था कि इस फ्लॅट में गुपचुप निक़ाह होने जा रहा है...

उसके बाद माँ आंटी को लिए आई.....वाक़ई वो काफ़ी खूबसूरत लग रही थी बोली कि कैसे बच बचके तय्यार करके लाई हूँ सब पूछ ही लेते वो तो बच बच के लिफ्ट से झट से अंदर आए...फिर मैने सोफीया आंटी को देखा उफ्फ कितनी सजी धजी दुल्हन के लाल जोड़े में वाक़ई उनके जैसी कोई हसीन दिख ही नही पाएगी...माँ ने इस बीच खुद को तय्यार कर लिया था इसलिए वो भी काफ़ी खूबसूरत लग रही थी....

फिर सोफीया को बिठाते हुए मैं सीधा सामने का कॅमरा ऑन कर एक जगह रखकर निक़ाह को शंट करने लगा....हम दो ही तो जान थे वहाँ और था ही कौन इस अज़ाब शादी में शारीक़ बीच में क़ाज़ी बैठ गया फिर उसने निक़हनामा शुरू किया...पहले समीर से पूछा गया...माँ उस तरफ दुपट्टे की आड़ में जो उन्होने कर रखी थी..सोफीया के साथ बैठी हुई थी...क़ाज़ी ने समीर और आंटी दोनो से रज़ामंद माँगी तो दोनो ने निक़ाह में क़बूल है कहा उसके बाद दोनो तरफ के लोगो की वालिदा का नाम जानना चाहा तो समीर ने सिर्फ़ पिता का नाम तो आंटी ने उसके नाना का नाम लिया....क़ाज़ी को कुछ मालूम नही था...वो तो सोच रहा था एक अधेड़ उमर की औरत एक यंग लड़के से शादी कर रही है.....उसने मुझसे पर्सनली पूछा भी कि क्या सोफीया आंटी का पहले निक़ाह हुआ था...मैने कहा जी नही ये पहला है बात हमने छुपा ली थी...

निक़ाह पूरा हुआ और समीर ने सोफीया के साथ निक़ाह कर लिया..दोनो की साइन लिए गये और निक़हनामा पूरा करने के बाद क़ाज़ी ने समीर को बधाई दी....वाक़ई ये दृश्य बेहद अज़ीब था मेरे लिए पर सच पूछो तो यही दिन एक मेरा भी होता..अगर माँ ने इनकार ना किया होता....कितने क़िस्से सुने थे मैने ऐसे शादियो के आपस में खूनी रिश्तो में और आज पूरे होते हुए भी देख लिए

 
क़ाज़ी के जाने के बाद हमने दावत का खाना खाया फिर शाम को माँ ने मुझे रोका और दोनो को बोला कि अब वो अपने कमरे में जाए और गुफ्तगू करे मैं तो समझ ही चुका कि शादी से पहले ही कितनी सुहागरात समीर ने सोफीया के साथ मनाई थी ये तो बस एक रसम निभा रहा था

दोनो अंदर चले गये उसके बाद कमरा बंद....माँ ने मुझसे कहा उफ्फ बहुत थकान भरा दिन था चल हम भी थोड़ा आराम कर ले दोनो को अकेला छोड़े....रात को भी मैने उन्हें डिस्टर्ब नही किया...समीर निकला ज़रूर था अपने रूम से और उसने फ़ौरन खाना ऑर्डर कर लिए मैने पूछ आंटी कहाँ है तो बोला सोफीया सो रही है अंदर ....मैं समझ गया ये तो चुदाई की थकान थी

मैने फिर भी चोरी निगाहो से झाकना चाहा तो पाया कि आंटी के बिस्तर पूरे गुलाब के पत्तो से बिखरे हुए थे चादर पूरी बिगड़ चुकी थी और आंटी के बदन पे सिर्फ़ उनकी शादी का जोड़ा वाली साड़ी ही धकि हुई थी वो अंदर से शायद नंगी थी....उफ्फ ये दृश्य देखके ही मेरे तन बदन में आग लग गई....समीर फिर हांफता हुआ बोला कि खाना आ गया है तू ले लेना और कुछ अंदर कमरे में नॉक करके भिजवा देना मैं जा रहा हूँ इतना कह कर वो अंदर चला गया....

खाना आते ही मैने उसे प्लेट में सजाया कमरे पे नॉक किया तो आंटी ने उठके लिया वो मुझे देखके शरमाई तो मैने नज़रें इधर उधर करते हुए शरम से कहा आंटी समीर तंग तो नही कर रहा ना....तो सोफीया आंटी ने मेरे गाल खीचे कहा जा बदमाश यहाँ से चल....मैं वापिस मुस्कुराता दरवाजा लगाते हुए उनके कमरे से अपने रूम में आया....तो माँ ने मुझे मुस्कुरा के पूछा अंदर का क्या माहौल है? मैने कहा वहीं जो हर सुहागरात के बाद होता है

हमने साथ डिन्नर किया और एक राउंड चुदाई की....माँ ने मना किया था कि अभी समीर के यहाँ आए हुए है मत कर...पर मेरा दिल नही माना....मैने माँ के दोनो छेदों में लंड खूब दबा दबके उनकी चुदाई की ऐसा लग रहा था शादी दोस्त की थी और सुहागरात मेरी ...हम भी फारिग हुए एकदुसरे से लिपटे सो गये....आधी रात को पानी लेने जब फ्रिड्ज के पास आया तो पाया कमरे के अंदर से आंटी की आहों की आवाज़ें और चूड़ियो का खनकता शोर सुनाई दे रहा था....ऐसा लग रहा था जैसे समीर अब तक सोफीया से फारिग नही हुआ था मैं मुस्कुराते हुए कमरे में आया क्यूंकी मुझे बड़ी नींद आ रही थी....

अगले दिन जब नींद खुली तो सोफीया आंटी और समीर दोनो टेबल पे नाश्ता करने आए दोनो ही नहा धोके चेयर पे बैठे थे हमारा स्वागत किया फिर हमने साथ नाश्ता किया....माँ ने सोफीया आंटी से कहा कि अब होनमून का क्या प्लान करोगे? ना जाने क्यूँ समीर फिर झिझका उसने कोई जवाब नही दिया माँ से शायद शरमा रहा था....तो आंटी ने कहा कि समीर मुझे स्विट्ज़र्लॅंड लेके जाना चाह रहा है

मैने कहा बहुत खुंब तो फिर कब जा रहे है आप लोग...तो समीर ने उत्तर दिया बस चले जाएँगे फिलहाल काम काज निपटा लू तो हम हंस पड़े

कोई 5-6 दिन ठहरे थे काफ़ी मज़ा किया काफ़ी घमाई फिराई की...लेकिन इस बीच माँ और मेरे शारीरिक संबंध ना के बराबर ही बने शायद माँ को झिझक हो रही थी....हम एकात मे नही थे वहाँ...पर समीर तो माँ से जुड़ा हुआ था हर पल...मज़ाक मज़ाक में उसने बात तक छेड़ी थी शादी की मेरी...तो मैने साफ इनकार कर दिया कि..अब ऐसा कुछ नही होने वाला माँ और मैने ये फ़ैसला अभीतक नही किया....बाद में माँ ने मुझे बताया कि उन्होने सोफीया आंटी को पर्सनली समझाया था कि हम ऐसा इरादा क्यूँ किए थे? पर उन्हें बुरा ना लगे इसलिए माँ ने बस इतना कहा कि वो तय्यार नही..सोफीया आंटी ने फिर कुछ नही कहा वो जानती थी माँ समझदार है वो अपने आगे के अच्छे बुरे को देखते हुए ही अपना रिश्ता वैसे तय कर चुकी थी अपने बेटे आदम के साथ....

समीर और आंटी से विदा लेकर हम वापिस होमटाउन पहुचे....समीर ने जाते जाते कहा था कि अब हमे आते रहना है...तो माँ और मैने दोनो ने वादा किया था उनसे कि हम ज़रूर हमेशा आएँगे और उन्हें भी हमारे यहाँ आना है...इतना कहते हुए समीर हमे रेलवे स्टेशन इस बार माँ के संग छोड़ने तक आया....हम एकदुसरे के गले मिले थोड़ा भावुक हुए फिर हमारी ट्रेन छूट पड़ी....पीछे आंटी और समीर हाथ दिखाते रह गये और उनके परिवार से दूर होते हम माँ-बेटे एकदुसरे से चिपके दरवाजे पे ही खड़े उन्हें बाइ बाइ कर रहे थे....

होमटाउन पहुचते ही माँ और मैं हम दोनो फिर रोज़ की तरह ज़िंदगी जीने लगे ऑफीस से घर घर से ऑफीस मैं निभाता अपनी ड्यूटी तो माँ को घर का कामकाज संभालना होता या फिर सब्ज़ी मॅंडी जाना यही सब ग्रहणी का काम माँ संभाल रही थी...और फारिग हुए वक़्त में ज्योति भाभी के साथ गपशप करती इस बीच राजीव दा के साथ भी मैं गप्पे मारता ड्यूटी से आने के बाद फिर रात को अपने घर आके माँ के साथ रात का भोजन करता और सो जाता

हमारी यही ज़िंदगी थी यही हमारा आज था और कल भी शायद होने वाला था....माँ-बेटे के सिवाय इस घर में और कोई नही था हालाँकि बीच में माँ से थोड़ा झगड़ा भी हुआ और मन मुटाव भी पर दो प्यार करने वाले एकदुसरे से कितना अलग रह सकते थे? माँ ने शादी के इनकार करने के बाद साफ कह दिया कि वो मुझे किसी जवान लड़की से शादी करवाना चाह रही थी...जो सुशील हो अच्छी हो जो हर माँ अपने बेटे के लिए तलाशती है पर मैने भी कहा कि घर आके वो तुमसे मुझे अलग कर देगी..तो माँ ने कहा कि हर औरत एक जैसी नही होती....सच में माँ की परख और समझ ने ही हमारे रिश्ते को इतना मज़बूत किया था....एक आध रिश्ते भी आए थे मेरे लिए पर माँ ने साफ इनकार कर दिया क्यूंकी उसमें मेरी हां नही थी

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लेकिन जैसे खुशिया आती है वैसे ही दुख जैसे कहानी आगे बढ़ाते है वैसे ही मोड़ आते है....कुछ इस क़दर ऐसा मोड़ इन माँ-बेटे की ज़िंदगियो में आने वाला था जिससे दोनो अंजान थे जिसके आने से घर एक अलग ही तरीक़ो में बदल जाता...क्या था वो वजह जानें अगली कड़ी में.....

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ट्रिंग ट्रिग......पॉकेट में रखा मेरा फोन बज उठा....मैं मेडिकल फर्म जा ही रहा उठके दफ़्तर से कि माँ का कॉल आया...मैने झट से फोन उठाया

आदम : क्या हुआ माँ? हेलो?

ज्योति : अर्रे ये मैं हूँ आदम

आदम : हाँ ज्योति भाभी बोलिए

ज्योति : दरअसल तुम्हारे घर जब आई तो किचन में माँ को मैने तुम्हारी बेहोश आया

आदम : क..कैसे? माँ ठीक तो है ना ?

ज्योति : फिकर करने की कोई बात नही है तुम आराम से घर आओ अभी मैने उन्हें लेटा दिया है वो थोड़ी निढाल पड़ गयी है शायद कमज़ोरी से ऐसा हुआ हो

आदम : ठ..ईक़ है भाभी मैं आने की घर कोशिश करता हूँ

ज्योति : ठीक मैं यही तुम्हारी माँ के पास ही बैठी हूँ

उफ्फ एक तो काम का इतना प्रेशर था और उपर से ये माँ की खबर सुन मेरी तो बेचैनी जैसे बढ़ गयी सच में आँख फड़कना भी कितना अशुभ होता है? मैं जैसे तैसे काम निपटाए हाफ-डे करके घर लौटा....एक तो मैने अनगिनत बीच में छुट्टी कर ली थी और उपर से अब नये फ्लॅट का लोन चुकाना था इसलिए अभी मेरा काम से फारिग होना ना के बराबर ही था..मैं घर पहुचा

ज्योति भाभी माँ के पास पलंग पे लेटी हुई थी और माँ सर पकड़े बातें कर रही थी...मैं माँ के पास आया...और उनके हाथ पाओ को दबाते हुए जैसे उनकी तबियत जानी....ज्योति भाभी ने कहा कि शायद मौसम बदलने से तुम्हारी माँ की तबीयत खराब हुई है

आदम : माँ तू ठीक तो है ना?

माँ : हां बेटा फिकर की बात नही है...

आदम : कैसे फिकर की बात नही है? तू चक्कर ख़ाके गिर गयी अगर भाभी ना होती तो मुझे तो कुछ मालूम ही नही चलता ना

माँ : उफ्फ बस आँखो के सामने अंधेरा छा गया और एकदम से ऐसा लगा जैसे शरीर में जान ना हो उफ्फ खाना भी नही बनाया है और कोई काम काज में हाथ भी नही लगाया अब तक

ज्योति : रहने दो अभी आंटी पहले आप ठीक तो हो जाइए और रही बात खाने की मैं आपको और आदम को अभी दोपहर का खाना लाके देती हूँ हमारे होते हुए आप लोगो को फिकर की कोई बात नही करनी

चलो ये तो अच्छा था की राजीव दा और उनकी पत्नी का सपोर्ट था हमारे संग...पर मैने देरी नही की मुझे बार बार कॉल्स आ रहे थे इसलिए मैने भाभी से कहा कि हो सके तो खाना जल्दी दे दीजिए मुझे जाना पड़ रहा है...भाभी तुरंत अपने घर से गरमा गरम रोटी और तरकारी लाई झोल वाली....हम माँ-बेटे ने भाभी के साथ ही खाना खाया....खाने से फारिग होते ही मुझे मजबूरन जाना पड़ गया माँ भी काफ़ी हद तक ठीक हो चुकी थी...

रात को जब घर लौटा तो माँ बिस्तर पे अब भी सो रही थी...ना जाने कब से नींद के आगोश में थी मैने फिर जाचा कि उसकी तबीयत खराब तो नही....पर माँ की तबीयत मुझे ठीक ही लग रही थी...रात 8 बाज़ चुके थे इस वक़्त माँ खाना वाना सब बनाके फारिग हो जाती थी पर ना आज उसने कंघी की थी और ना ही खाना बनाया था....मैं खुद जब किचन गया तो झूठे बर्तन पाया उफ्फ क्या हो गया मेरी अंजुम को सोचते ही दिल को जैसे दुख सा हुआ अकेले रहना भी यही गम का सबब है कि आप कब तक अपने घर में ध्यान दोगे अगर ज्योति भाभी ना होती तो शायद माँ और मैं भूके ही रह जाते...क्यूंकी माँ को बाहर का खाना एकदम सूट नही होता था...

मैने माँ को जगाया और हमने एक एक कप कॉफी ली...फिर मैने माँ को बाइक पे किसी तरह बिठाया और उसे क्लिनिक लेके गया....वहाँ डॉक्टर ने माँ की ट्रीटमेंट के बाद मुझे बताया कि उनका बी.पी लो हुआ था ये इसलिए कि वो इस कदर काम की थी कि जिस वजह से उन्हें चक्कर आ गये थे मैने माँ को खूब डांटा...पर डॉक्टर ने कहा कि सिर्फ़ बी.पी लो नही है माँ को कमर का दर्द भी है इसलिए इनका अकेले घर का काम काज इनके कंधो पे डालना ठीक नही रहेगा....फिर हमे कुछ दवाइयाँ दी फिर हम घर लौटे...मैने माँ को कामवाली बाई रखने के लिए इन्सिस्ट किया पर वो नही मानी कही कि चोर होती है...तो मैने कहा कि तुझे कंप्लीट रेस्ट की ज़रूरत है तू ये सब घर का काम काज छोड़ और कुछ दिन रेस्ट ले...माँ ने कहा कि ऐसा नही हो सकता? अगर मैं काम काज नही करूँगी तो कौन करेगा? तू तो पूरे दिन ऑफीस में होता है उपर से तुझपे इतनी ज़िम्मेदारिया है ऐसे में मेरा बीमार पड़ना ठीक नही है बेटा

आदम : माँ मैं कुछ नही सुन सकता डॉक्टर ने मना किया है ज़्यादा मेहनत करने को इसलिए आप छोड़ो मैं मेश लगा लेता हूँ (खाने का इंतजामात)

अंजुम : बेटा बहुत खर्चे हो जाएँगे और जितना करेगी नही उतना राशन खर्चा होगा कुछ भी ले जाएगी उठाके

आदम : तो किसे बुलाउ रूपाली भाभी को तो बुला नही सकता वो तो पूरे दिन मेहनत करती है बाहर भी और घर में ताहिरा मौसी वो तो खुद ही बीमार है ऐसे में किसी कामवाली को हाइयर करना ही होगा

अंजुम : देख बेटा मैं ठीक हो जाउन्गी

 
मैने माँ की बात नही सुनी उसकी मुझे बेहद फिकर थी....माँ ने दवाइयाँ लेना शुरू किया तो उसे कुछ राहत मिली लेकिन जब भी वो किचन में ज़्यादा काम कर लेती या बर्तन वर्तन या ज़्यादा कपड़े ही धो लेती तो बस उसे कमज़ोरी आ जाती...इस वजह से दिन भर नौकरी की थकान के बाद जब घर लौटता तो माँ ढंग से खाना नही परोस पाती थी....ज्योति भाभी और राजीव दा दोनो ने कहा कि या तो क़ामवाली हाइयर कर लो या अगर ज़्यादा कोई चिंता की बात है तो फिर किसी लड़की से शादी करके उसे घर ले आओ ताकि घर की सेवा भी हो जाएगी और तुम्हारा अकेलपन भी कट जाए

पर मैं नही माना मुझे अपनी माँ को छोड़ किसी भी पराई औरत से संबंध नही बनाना था...माँ के इनकार के बाद मेरा नज़रिया पहले जैसा ही हो चुका था लेकिन माँ की मुहब्बत में कोई कमी नही थी पर यहाँ बात माँ का ध्यानरखने की थी इसलिए सच में मुझे किसी औरत की तो ज़रूरत थी ही...मैने फिर भी एक बुढ़िया सी कामवाली को हाइयर किया...लेकिन वो छुट्टिया बड़ी करने लगी तो मुझे उस पर सख़्त गुस्सा आया एक तो टाइम से पहले तनख़ाह की फरमाइश और बहुत छुट्टियाँ करती थी...

मेरी ज़िद्द के कारण ही माँ ने उसे काम पे रख रखा था वरना उसे तो कोई मन नही था....वो कपड़े धोना बर्तन मान्झ्ना तक कर देती थी उसके बाद माँ ही खाना बनाती थी जिस्दिन वो ना आए तो माँ मुझे फोन करके कहती थी...मैं भी तंग आ गया कि यार एक तो मिल नही रही? और ऊपर से इस कामवाली के नखरे...चाहता तो किसी भरपूर जवान औरत को रख लेता पर साली के भी नखरे ज़्यादा होते और राजीव दा ने तो सख़्त कहा कि इस शहर की ज़्यादातर कामवालियाँ बहुत खराब है तुम्हें लूट लेंगी या फँसा देंगी अकेला देखके....मैं बहुत डरता था इन सब चीज़ो से

उस दिन लॅपटॉप पे हिसाब कर रहा था....इतने दिनो तक माँ और मेरे बीच कोई संबंध नही बने थे....फिर भी मेरे अंदर की हवस जाग जाती थी और हम बिस्तर पे जितने भी हालात खराब हो एकदुसरे के करीब आने की कोशिश करते थे माँ ने मेरे बाज़ू को सहलाया और कहा कि उन्हें मुझसे कुछ बात करनी है

मैने लॅपटॉप बंद किया और माँ के साथ लेट गया....माँ ने नाइटी पहन रखी थी नीले रंग की जो कोलकाता से खरीदी थी उसके लिए...."बेटा मैं कह रही थी? कि देख मैं जानती हूँ तेरा किसी पराई औरत पे कोई खिचाव नही पर मेरे दिल के लिए ये बात मान ले और किसी से शादी कर ले ताकि इस घर में अकेलापन थोड़ा कम हो तू तो चला जाता है काम पे फिर मेरा क्या होगा अकेले बोल ज़रा"........माँ समझाने का प्रयत्न कर रही थी उसे सच में किसी जवान लड़की की ज़रूरत थी शायद वक़्त काटने और अपनी मज़बूरियो के चलते...मैं इतना अमीर तो नही कि 4-5 नौकर रख लून लेकिन मेरी तो यही कोशिश की थी कि हम जितने अकेले होंगे एकदुसरे के उतने ही दरमियाँ नज़दीक होंगे

आदम : देख माँ पहले भी कह चुका हूँ मुझे शादी करने का कोई मान नही

माँ : देख आदम तू एक मर्द है जवान है तेरे पास नौकरी है सबकुछ तो है तेरे पास अच्छे से अच्छी लड़की तुझे मिलेगी तेरी लाइफ में तू एक बार कोशिश तो कर

आदम : माँ तुम जानती हो? कल को अगर उस पराई लड़की ने हमारे और तेरे रिश्ते पे उंगली उठाई तो क्या होगा?

माँ : मैं सब जानती हूँ उसे पता चलने हम नही देंगे हम कुछ फ़ासले कर लेंगे अपने दरमियाँ और मेरी ये इच्छा भी तो है कि इस घर में एक सुलझी सुशील पढ़ी लिखी तुझसे मुझसे भी ज़्यादा मुहब्बत करने वाली कोई बिंगाली बहू आए देख मुझे चाहिए कि तू भी उससे मुहब्बत करे

आदम : माँ ये नही हो सकता भला तुझे छोड़के मैं किसी और से कैसे?

माँ : अपने दिल पे हाथ रखके तो सोच मेरी इस इच्छा को तू पूरी नही कर सकता बोल ज़रा मैं कब तक जवान रहूंगी अभी से तो काम करके थक जाती हूँ बीमारी हो गयी जैसे कब तक मैं तुझे संभालूंगी मैं चाहती हूँ कि मेरे बाद कोई तेरा ध्यान रखे

आदम : मामा (माँ के मेरे बाद कहने से मुझे जैसे दुख हुआ)

माँ ने मेरे चेहरे पे हाथ फेरते हुए मुझे पूचकारा मुझे लाख समझाया कि ये ज़िद्द छोड़ दे जो संभव नही वो कैसे हो सकता है?...मैने काफ़ी सोच विचार किया एक तरफ तो दिल ने कहा कर ले कब तक यूँ माँ को तरसाए रखेगा उसकी मज़बूरी तो देख....मैने माँ की तरफ निहारा...फिर मैने अपनी सहमति ज़ाहिर की...माँ ने मुझे अपने गले लगाया उसने कहा कि मुझे अगर कोई पसंद आए तो मैं उसे ज़रूर दिखाऊ एक तरह से एक माँ ने अपने बेटे को किसी पराई औरत को डेट करने का अवसर दिया था

अगले दिन राजीव दा को मैने ये बात कही वो मुझे मेन मार्केट के पोलीस थाना चौक पे चेक पोस्ट करते हुए मिले थे..."अर्रे कर ले भाई बहुत मज़े करेगा ज़िंदगी में कभी पर्मनेंट भी होना माँगता है दोस्त बस एक बार किसी औरत पे पर्मनेंट मोहर मार दे तो दिल की सारी हसरतें पूरी हो जाएगी बस जान सुनके शादी करना".........राजीव दा भी जैसे माँ की बातों से सहमत थे वो तो उल्टे यही चाह रहे थे कि मैं उनकी तरह घर बसा लूँ

मैं काफ़ी सोच विचार किए था...क्या मालूम जो माँ सोच रही है वैसा ना हो क्या मालूम घर पे आते ही उनकी बहू उन्हें कष्ट देने लगे? या फिर हमारे बीच की मुहब्बत में फासला होते होते कहीं दरार ना पड़ जाए....यही सब दिमाग़ में उल्जुलुल बातें आ रही थी मेरे और मैं अपने इरादे से लगभग मुक़रने के फिराक में था...समीर को कुछ कहा नही क्यूंकी वो सोफीया से शादी करके हँसी खुशी ज़िंदगी बिता रहा था खामोखाः वो यूँ परेशान हो जाता मेरे हालातों के चलते इसलिए उसे कुछ नही बताया...

उस दिन बाइक से घर की ओर जा रहा था....मैने पाया कि मैं लालपाड़ा से गुज़र रहा था...उफ्फ वहीं याद मुझे खीच रही थी.....मैं जानता था यहाँ सब पेशेवर रंडिया रहती थी...मुझे गुज़रते वक़्त याद आया कि वो एरिया पड़ने वाला था जहाँ मेरे दिल में बसी वो कातिल हसीना रहती थी....जिसका नाम था चंपा उफ़फ्फ़ उसकी अदा उसके पान चबाते वो होंठ वो मदमस्त अधखुली साड़ी में दिखता उसका यौवन जो अक्सर मुझे उसके घर पे खीच लाता था....

सोचते ही मेरा पूरा बदन सिहर उठा....मैने बाइक रोकी और उस गली की तरफ झाँका इतने दिनो से वापिस अपने होमटाउन आया पर एक बार भी उससे बात नही की...सोचा कि उसे कॉल भी कर लूँ पर ना जाने मन उस वक़्त क्यूँ नही माना? वो औरत जिसने मुझे सेक्स करना सिखाया...जिसके साथ कयि रातें गुज़ारी? जिसने माँ के प्रति मेरा नज़रिया बिल्कुल बदल डाला था....जिस माँ से कलतक नफ़रत करता आया? आज उसके आगोश में रहता था...उससे बेपनाह मुहब्बत करने की जो इच्छा मुझमें बसाई वो कोई और नही चंपा ही तो थी....जो मेरे दिल के इतने करीब थी उस जैसी खूबसूरत लड़की मैने अपनी पूरी ज़िंदगी में नही पाई थी काश वो उसका पेशा ना होता तो उसे ही अपने घर की बहू बना लेता मैं नही करता जात की परवाह ना ही हालातों की...

मेरे कदम अपने ही मन की कशमकशो में उलझे उस गली की तरफ बढ़ चले...जब वहाँ गया तो पाया कि कुछ नही बदला था...गली एकदम तंग हो चुकी थी भला इस बदनाम रास्ते पे अयाशों को छोड़के कदम ही कौन रखने वाला था? मैं जैसे ही चंपा के ठिकाने पे पहुचा...तो पाया वहाँ एक बड़ा सा ताला झूल रहा था..."अर्रे यार आज भी यह यहाँ नही है?"........मैं अपनी सोच में ही चुपचाप वहाँ खड़ा दरवाजे के सामने ताले को घूर्र रहा था

अभी दो कदम पीछे हटा ही था कि एक औरत को सामने खड़ा पाया...ये वहीं औरत थी जिसे चंपा काकी काकी कहती थी जिससे उसकी दोस्ती थी...उस औरत ने एक साड़ी साड़ी पहन रखी थी पेशे से तो वो भी रंडी ही थी....शायद मज़बूरी में उसने ये कदम उठाया था क्यूंकी उसके बातों में बड़ी कोमलता और मुलायमित थी...उसने मुझे आश्चर्य से घुर्रा फिर कहा

"तुम तो वहीं हो ना जो उस रात चंपा के पास आया था?".........

.मैने मुस्कुरा कर सर हां में हिलाया...

आदम : आंटी वो चंपा कहाँ है? सोचा इतने दिनो बाद यहाँ से गुज़ारा तो उससे मिलता चलूं कही कोई कस्टमर के साथ तो!

औरत : तुम्हें क्या नही पता? कि अब वो यहाँ नही रहती?

आदम : क्या? पर क्यूँ ऐसा क्यूँ हुआ? कहाँ चली गयी वो (मैने एका एक सवाली और परेशानी दोनो निगाहो से पूछा)

तो उस औरत के चेहरे पे दुख के भाव आए और फिर दुख रोने में तब्दील हो गया...मैने साफ पाया वो अपने आँसू पोंछते हुए मुझे देखके मुस्कुरा रही थी जैसे अपने दुख पर काबू करना चाह रही हो

 
आदम : क्या हुआ आंटी? आप रो क्यूँ रही है? चंपा कहाँ है? क्या उसने ये शहर छोड़ दिया (जानने को मेरा दिल बेताब था एक वहीं तो मेरे दिल के इतने पास थी)

औरत : अब वो कभी नही आएगी बाबू वो अब इस दुनिया में ही नही रही वो छोड़के चली गयी हमेशा हमेशा के लिए इस ज़ालिम दुनिया को....लेकिन गम इस बात का है कि मरी भी तो कैसी मौत? कौन था उसकी माँ और बहन के सिवाय उसका ज्सिके लिए वो अपने जिस्म को बैच बैचके पैसा इकट्ठा करती थी काश तुम होते उस वक़्त उसके बुरे वक़्त में तो शायद उसे कुछ सहनभूति तो मिलती तुम्हारा अक्सर ज़िक्र किया था उसने मुझसे कि तुम उसके लिए थे सबसे ख़ास थे उसके कस्टमर....पर थे उसके एक सच्चे दोस्त जिसे वो हर्पल याद करती थी

मैं एकदम खामोश था...चुपचाप जैसे ठहर सा गया ऐसा लगा जैसे कुछ ऐसा हो गया कि मैं होशो हवास खो बैठा था मेरी सबसे करीबी जानने वाली एक दोस्त मुझे छोड़के इस दुनिया से जा चुकी थी....मैं जानने को उत्सुक था कि आख़िर ऐसा क्या हुआ था उसके साथ? तो उस औरत ने बताया कि उसे गंदी बीमारी ने जकड लिया था जो अक्सर इस पेशे की औरतों को हो जाती है....उसकी बीमारी कब इतनी बढ़ गयी उसकी लापरवाही के चलते कि वो अपने आख़िरत को नही रोक पाई....औरत ने बताया कि उसने उसे काफ़ी सावधानी बरतने को कहा पर थी तो वो भी लापरवाह इस चलते उसे एड्स हो गया था....जो उसकी मौत का कारण बना..

मिला तो मैं भी था उससे कयि बार लेकिन कभी इस मुसीबत को मैने दावत नही दी थी.....हम दोनो एकदुसरे के बेहद इतने करीब आए थे कि जितना करीब मैं अपनी ज़िंदगी में किसी औरत के साथ भी नही कुछ ऐसा किया था...वो पल वो दृश्य वो याद सब मेरे ज़हन में बिताए उसके साथ घूम रहे थे....मुझे उसके मौत की खबर ने जैसे झींझोड़ दिया था....

आदम : इतना सबकुछ हो गया और मुझे कोई खबर भी नही लगी उफ्फ चंपा ये तू कैसा दर्द देके गयी? (मन ही मन मैं खुद को कोस्ता सा बोला)

औरत ने जब मेरी आँखो में उसके खोने के गम को देखा तो उसे आश्चर्य हुआ मैं लगता ही उसका कौन था? था तो उसके चाहने वालो में से ही एक...लेकिन मेरे उमड़ते आँसुओं को देख उसने मुझे शांत होने कहा इस बीच मैने उसे अपने आँसुओं को भी पोंछते देखा

औरत : बेटा ज़िंदगी और मौत पे किसी का बस नही...और ये तो होना ही था क्या कहा जाए? ये तो उसकी ख़ुशनसीबी कि मरने के बाद भी उसके चले जाने पे भी कोई आँसू बहा रहा है वरना हमारे लिए आँसू बहाता ही कौन है?

आदम : ऐसा नही है काकी मेरी ज़िंदगी में चंपा बहुत अहमियत रखती थी काश काश मैं वापस शहर आते ही उससे भेंट करता....पर सच पूछिए तो वक़्त की नज़ाकत ही कुछ ऐसी थी कि मैं चाह कर भी यहाँ ना आ सका मुझे बहुत दुख हुआ उसकी मौत का मुझे बेहद अफ़सोस है एक वहीं तो थी जिससे दिल-ए-हाल ब्यान करता था बस गम है इस बात का कि उसके लिए कुछ कर ना सका इतने दुख को समइते हुए भी उसने कभी उफ्फ तक नही किया मेरे सामने अगर कह कर देखती एक बार तो पक्का मेरा साथ उसे नसीब होता हर मुमकिन हर कोशिश उसकी मदद करता

औरत : बहुत देर हो चुकी है बेटा वो अब जा चुकी अब मेरी मानो तो यहाँ आना अब तुम्हारा फ़िज़ूल है शायद तुम ही रहे होंगे एक जो यहाँ आके उसके लिए इतना दुख प्रकट कर रहे हो वरना आजतक जीतनों के साथ भी वो सोई थी उनमें से किसी ने भी आके हमसे ठीक तरीके से उसके बारे में जाना तक नही मौत की खबर सुनते ही किसी और रंडी के पास चले गये होंगे भ्डवे क्यूंकी अब दिल बहलाने वाली जो नही रही

आदम : काकी प्ल्स ऐसा ना कहिए ये उसका पेशा था ज़रूरत नही...उसकी ज़रूरत तो वो पैसे थे जो मैं अक्सर उसे दिया करता था पर अफ़सोस मेरे वो पैसे भी उसके जान नही काम आए...एनीवे उनकी मदर और बहन जो थी वो कहाँ गयी?

औरत : करीब 2 महीने पहले जब वो बेहद बीमार थी तो उसने बताया कि उसकी माँ के पास उसे कॉल करने तक के लिए बॅलेन्स नही था और वो इतनी ज़्यादा कमज़ोर पड़ चुकी थी कि उस काबिल नही थी कि पैसे भेज सके उसी के पैसो पे ही तो उसकी बीमार माँ भी निर्भर थी...उसके ही पैसो पे उसकी बहन कॉलेज में पढ़ रही थी...जो करीब उसी की हम उमर थी चंपा का असल नाम तंज़िमा था...वो पस्चिम दीनयजपुर की थी बेचारी उसने इस पेशे को क्यूँ चुना? मैने मना भी किया हमारी तो मज़बूरी है तेरा क्या है तू जवान है तुझपे तो लोग पैसे बरसाएँगे पर जब कल को साथ थामने वाला कोई नही होगा....

आदम : अच्छा तो वो लोग यहाँ नही आए

औरत : आएँगे कैसे? एक माँ और बहन ही तो थी उसे हॉस्पिटल ले गयी थी डॉक्टर ने सॉफ कह दिया था इसे अड्मिट करना होगा अड्मिट करके भी क्या उखाड़ लेते वो लोग क्या उसकी बीमारी ठीक कर पाते जनरल वॉर्ड में उस सरकारी हॉस्पिटल में उसने दम तोड़ दिया कोई देखने नही आया उसे वो शूकर है मेरी सहेलियो का जो उसे काफ़ी मानती थी घर में भी उसके ये मेसेज भी हमने छोड़े थे पर वहाँ से कोई नही आया...और आते भी तो क्या मुझे तो डर है कि उसके मौत के बाद उसके परिवार का क्या हाल हुआ होगा?

मन ही मन में सच में आज मूड इतना खराब हो गया था कि कुछ कहने को नही...औरत ने बताया कि ये कमरा खाली हो चुका जो कुछ सामान भी था वो मकान मालिक ने ज़ब्त कर लिया....सुनके बेहद दुख हुआ मेरे अब वहाँ ठहरने की कोई उमीद नही थी बस अपने आँसू पोछते हुए इतना कहा

आदम : काश एक बार वो कह कर देखती बस एक फोन कॉल कर देती तो उसे कह पाता कि मुझे उसकी कितनी परवाह है? उसे हर मुमकिन मदद की कोशिश करता उसका इलाज मैं करता लेकिन शायद किस्मत में हमे जुदा होना ही लिखा था

 
मैं जाने लगा तो औरत ने मुझे रोका मैं पीछे मूड कर उनकी तरफ पलटा....तो उसने मुस्कुरा कर कहा क्या तुम उससे प्यार करते थे? ये जानते हुए कि उसकी क्या हैसियत थी वो क्या थी?....मैं भी मुस्कुराया अपने आँसू पोंछते हुए कहा बस दिल लग गया था उससे और प्यार किसी की इज़ाज़त लेके नही होता इसलिए तो प्यार अँधा होता है अब वो नही तो मेरा यहाँ क्या काम? चलता हूँ....इतना कहते हुए मैं आगे बढ़ चला वो औरत वहीं खड़ी रह गयी कशमकश में घिरी....हैरत से दूर जाते मुझे मन में आया होगा? कि कितनी खुशनसीब थी वो कि उसके पास कोई तो था उसकी परवाह करने वाला लेकिन बदनसीब थी वो जिसने अपने पेशे के चलते अपनी ज़िंदगी ही कुर्बान कर दी

खुद को कोसते हुए मैने खुदा से जैसे नाराज़गी जताई कि क्यूँ तूने ये सिला दिया मुझे एक बार तो रूपाली भाभी का दिल तोड़ा ही था...फिर माँ के इनकार के बाद ये क्या सिला मिला मुझे? क्या उस लड़की के रहने का कोई हक़ नही था मेरे जीवन में मैं उसे बदल देता काश मैं उसके लिए कुछ कर पाता? कैसा दुख दिया है तूने? कि हम एक जगह होके भी एकदुसरे से इतने दूर हो गये....मुहब्बत भी हुई तो उस पल जब साथ उसने मेरा छोड़ दिया वो मुझसे दूर हो गयी काश काश ये पेशा उसका ना होता? काश ये हालत हमारे क़ाबू में होते काश मैं कुछ कर पाता उस मासूम के लिए कुछ . क्या खुदा क्या ज़िंदगी तूने दी है? पर ये तो सच्चाई एक कड़वी सच्चाई कि क्या हाल होता है ऐसे पेशो में उतरी औरतों का ये तो शायद मेरी बदनसीबी थी जो मैं उसके लिए कुछ कर ना सका.....मैं बस अपने आँसू पोंछते हुए चुपचाप खामोश सा बुत बनके उसके बंद घर जिसके दरवाजे पे ताला झूल रहा था जहाँ हर पल मेरे खातिर वो दरवाजा खोले मेरा इंतजार कि जैसे घड़ी में ठहरी रहती थी...आज वहाँ जैसे कितनी खामोशी थी...

सच में ग़रीबी मोहताजपान किसी गाली से कम नही...ये जानते हुए कि वो कितनो के साथ सोई थी? भला मैं उसे कैसे आक्सेप्ट कर सकता था? माँ को अगर मालूम चलता कि मैं एक रंडी के लिए आँसू बहा रहा हूँ तो वो क्या सोचती? कि मुहब्बत करने को चंपा जैसी ही औरत मिली थी...मैं बाइक पे सवार हुआ और उस बदनाम गली से निकलता हुआ वापिस अपने घर लौटा...आज दिल बेहद टूट गया था...चंपा के साथ ऐसा कुछ बीत जाएगा इस्सह सोचा नही था ख्वाबो में भी... एक एक पल मैने जो उसके साथ गुज़ारे थे वो सब दिमाग़ में घूम रहे थे....

घर जब आया तो माँ गुनगुना रही थी...आज उसकी गुनगुनहट भी मुझे भा नही रही थी मूड जो इतना खराब था...मैं बहुत देर तक सोचता रहा बियर की चुस्किया लेता रहा..तो माँ नाराज़ हुई..

माँ : घर आया नही और पीने लगा..छि हाथ मुँह धोके इंसान कुछ खाता पीता है और तू इस नापाक चीज़ को पी रहा है और तो और अब तो घर लाने का सुरूर बना लिया तूने

मैने माँ की तरफ गुलाबी निगाहो से देखा वो नशा नही चंपा की मौत के दुख में हुआ था...माँ ने मेरी तरफ देखा फिर मुझे कंधे पे हाथ रखके कहा क्या बात है? मैने कहा कुछ नही बस ऐसे ही क्सिी की याद आ गयी....माँ ने मुस्कुराया और कहा मेरे बगैर भी तुझे किसकी याद आती है? कोई पसंद आ गयी क्या? मैं हँसके अपने दुख को समेटे हुए क्या कहता? कि माँ पसंद आई भी तो तुम कौन सा उसको अपना लेती? उसका हाथ पकड़ने से पहले ही वो खुदा को प्यारी हो गयी अब क्या उसका ज़िक्र करू तुझसे? मैं टालता रहा माँ मुस्कुराती रही..

मैने बियर की बोतल उठाई और उसे बाहर रखता हुआ अंदर आया...माँ आश्चर्य से मुझे देख रही थी.."आज से इन नापाक चीज़ो को हाथ लगाना बंद करता हूँ आज मैं एक तुझसे वादा करता हूँ आज से ये सब बंद आज से मैं एक भला इंसान बनके दिखाउन्गा".......मैने माँ की तरफ मुस्कुराते हुए कहा

आदम : गुस्सा थूक दूँगा ना कोई लफडा करूँगा ना झगडूँगा बस यही दुआ करूँगा कि तेरे साथ सारी ज़िंदगी बिता दूँगा अब तू जो चाहती है वो खुशिया मैं तुझे लाके दूँगा....माँ मैं राज़ी हूँ तू जिससे बोल मैं उससे शादी कर लूँगा

माँ ये सोचके मुस्कुरा उठी उसने मुझे अपने गले लगाया...फिर मेरी पीठ को सहलाया...भला कौन माँ अपने बेटे की खुशिया नही चाहती? मैं माँ के गले लगे ही रहा फिर उसे खुद से अलग किया....हमने एकदुसरे को देखके मुस्कुराया

माँ : बेटा मैं नही चाहती कि तू कोई जज़्बातो में बहके या क्सिी दबाव में आके बिना अपनी पसंद की किसी लड़की से शादी करे

आदम : नही माँ पसंद का क्या है? जो पसंद था उसे क्या अप्नाऊ अब? (चंपा के चेहरे को याद करते हुए माँ के इनकार को सोचते हुए) जब वहीं नही मिली मैं देखूँगा अगर कोई अच्छी लड़की मिली तो उसी से शादी करूँगा मुझे वक़्त दे मैं खुद तलाश करूँगा

 
माँ : वाहह मेरे लाल यही तो मैं चाहती हूँ कि तू अब अकेलेपन में कब तक जीता रहेगा? मैं जानती हूँ तू गृहस्थी और ज़िम्मेदारी संभालना नही चाहता पर संभाल तो रहा है ना मेरा बोझ

आदम : माँ खुद को बोझ ना कहना कभी तू मेरी हमदर्द मेरा सहारा मेरा सबकुछ है तू मेरी औरत है ?(माँ मेरे सीने से लग गयी तो मैने उसके माथे को चूमा फिर उसके बालों को सहलाते हुए अपने आँसुओ को पोछा)

आदम : चल खाना लगा दे मैं गुसलखाने से फारिग होके आता हूँ

माँ : अच्छा बेटा (अंजुम ने अपने बेटे पे गर्व महसूस किया अब वो भी चाहती थी कि इस घर में बहू आए और उसके बेटे को कोई उससे भी ज़्यादा मुहब्बत करे उसके साथ जीवन भर रहे और उसके बाद इस घर को संभाले )

आदम दुखी था दिल से टूटा अब तो उसे अपने आनेवाले कल में ही जीना था...शवर के नीचे भीगते उसके बदन के साथ आँसू भी जैसे छलक रहे थे...दिल और दिमाग़ पर चंपा की जैसे हँसी गूँज़ रही थी उसकी हर वो नज़ाकत से भरी बात....मन ही मन उसे चाह बैठूँगा सोचा नही था...कभी नही सोचा था....अब बस जो थी माँ थी और उसकी खुशिया जो चाह रही थी वहीं करना ठीक था...जब नहा कर फारिग होके आदम कमरे में लौटा

तो आज माँ उसकी पसंद के नमकीन चावल परोस रही थी झुक झुक के देने से उसके छातियो के कटाव सॉफ उसकी उस सेक्सी सी लाल नाइटी से दिख रहे थे...आदम ने ग्लास को होंठो से लगाया और पानी पिया तो माँ ने उसे डांटा...अभी खाना नही खाया और पानी पी लिया बेवकूफ़ लड़का माँ ने मुस्कुराते कहा तो आदम भी हंस पड़ा...

खाने से फारिग होने के बाद झींगुर की किर किर आवाज़ को सुन मैने खिड़की लगाई..."बेटा आज खिड़की खुला रहने दे बहुत गर्मी पड़ रही है"........आँगन की खिड़की को खोले आदम अंदर आया हो हो करती तेज़ सर्द हवाए जैसे घर में दाखिल हो रही थी..उसके शोर को दोनो खामोशी से सुनते हुए एकदुसरे के साथ बिस्तर पे लेटे हुए थे नींद दोनो में से किसी को ना थी...

एक हाथ आदम का माँ के कंधे पे था जो उसकी बाज़ू को सहला रहा था तो माँ की चूड़ियो वाली कलाई बेटे के खुले बदन पे थी...उसने अपने हाथ से बेटे के बालों से भरे सीने को सहलाया और उसकी तरफ मुस्कुराया...एक टाँग उसने खुद बेटे के जाँघो पे सटाया और बीच बीच में हल्का सा रगड़ भी दिया जिससे आदम का लंड फ़ौरन ही अकड़ गया....

माँ : क्या हुआ आज तू कुछ परेशान दिख रहा है?

आदम : न..नही तो

माँ : देख मुझसे झूठ मत बोल तेरी माँ हूँ तेरा सबकुछ जान सकती हूँ तुझे परेशान देखके मुझे ऐसा क्यूँ लगता है? कि क्या तू खुश नही कि तू शादी करे

आदम : नही माँ ऐसी बात नही बस फिकर है कि तू मुझसे दूरिया ना बना लेना (बात तो ज़हन में ये भी आदम के घर कर गयी थी माँ की चिंता थी उसे)

माँ : बेटा फ़ासले तो होते ही है तेरी होने वाली बीवी कल को होगी और तू अपनी माँ के साथ क्या संबंध बनाएगा? क्या उसे तू धोका देगा?

मन ही मन आदम ने बुद्बुदाया धोका तो तुझे भी तो दिया कि अपने व्याबचार रिश्तो के आड़े तेरी बहन उसकी बहू अपनी जिसे रूपाली भाभी कहता आया उसे गर्भ तेहरा मेरी वजह से उसके साथ सोया...उसकी भतीजी तबस्सुम दीदी के साथ सोया...क्या ये सब धोखा नही था जिससे वो अब तक अंजान थी?

आदम : नही माँ पर क्या मैं तुझे धोका दे सकता हूँ ?

माँ : वो तेरी बीवी है और बीवी पे हक़ उसके पति का लाज़मी तौर पे होता ही है तो फिर धोखा कैसा?

आदम : मतलब तू मुझसे दूर दूर रहेगी

माँ : बस उसे ना पता लग जाए सिर्फ़ इसलिए और मैं भी यही चाहती हूँ देख मैं अब तुझे कितना और झेल पाउन्गि मेरा शरीर भी तो साथ छोड़ देगा कल को क्या बुढ़िया नही हूँगी?

 
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