आदम : देख माँ तेरी उमर अभी हुई ही कितनी है तू अपने ससुराल में भी सब औरतों से जवान है ये सब विचार तेरे अंदर नही आने चाहिए तू मेरी है और सिर्फ़ मेरी तुझे अब भी मांसिक होते है...तू कहाँ से बुढ़िया है?
माँ : अर्रे बेटा नाराज़ क्यूँ होता है? अच्छा ठीक है मैं नही रहूंगी तुझसे दूर
आदम : इसी लिए तो कहा कि एक मज़बूरी के चलते क्या हम एक पराई औरत के लिए ऐसे दूर हो जाए
माँ आदम को समझाने का प्रयत्न कर र्रही थी....उसने बेटे से कहा कि इसमें क्या बुराई है? बस थोड़ा फासला ही तो बनाके रखना है फिर जब वो चाहेगा तब तब माँ उसके करीब होगी बेटे ने कुछ ना कहा....अंजुम ने बेटे की नाराज़गी को दूर करने के लिए उसके लिंग को उसके पाजामे के उपर से ही पाँव से घिस्सना शुरू कर डाला...
बेटे का क्रोध ज़्यादा देर तक नही रहा माँ उसके बदन से जैसे लिपट गयी बेतहाशा उसके चेहरे को चूमने लगी....आदम ने माँ की तरफ देखा...वो गरम हो चुका था...उसने माँ को खुद अपने बदन से खीचके लिपटा लिया और उसकी पीठ को नाइटी के उपर से ही सहलाने लगा...गले को चूमते हुए माँ की ज़ुल्फो में अपने चेहरे को सटाते हुए कान में उसको फुसफुसाया "क्या माँ तू मुझे छोड़के तो नही जाएगी ना कही?"..........
माँ ने बेटे के कंधे पे अपना सर रखके उसे लिपटे हल्की सी हँसी दी फिर कहा जब तक सास है तब तक तेरी ही रहूंगी मैं.....आदम जैसे भावुकता से माँ और कस कर लिपट गया और माँ भी....मन ही मन में अंजुम को ये बात छेड़ रही थी कि कही सच में उसका फासला बेटे से दूरिया ना बन जाए...पर ये तो रीत चली आ रही है...माँ के बाद बीवी ही घर को संभालती है....
माँ ने बेटे के पाजामे को खीचके नीचे कर दिया....और उसके लंड को मुँह में भर के एक बार चूस लिया....उसके इर्द गिर्द बाल उग चुके थे...शायद बेटे ने अपनी झान्टे इतने दिनो तक काम में व्यसत रहने से फारिग होके सॉफ नही की थी...उसने उन अंडकोषो को भी चूमा...फिर बेटे के सामने ही अपनी नाइटी का नाडा खोला...
डोरी के खुलते ही....वो मदरजात नंगी बेटे के सामने प्रस्तुत हो गयी....बेटे ने उसे पीठ से थामते हुए मज़बूती से अपने बाजुओं में उसे सीधा बिस्तर पे लेटा दिया....टांगे उसकी चौड़ी की और थूक उसकी चूत पे मला....लंड को चूत के मुआने पे हल्का प्रेशर देके अंदर घुसाया....तो माँ ने चीखके के बेटे के सीने को और कस कर सहलाया....आदम ने भीतर तक लंड घुसा दिया...
फिर उसकी दोनो टांगे अपनी कमर से लिपटा ली फिर हल्के 12-20 धक्के आगे पीछे करते हुए अपना कुल्हा हिलाया....लंड सतसट अंजुम की गीली सख़्त चूत की भीतरी दीवारो से घिस्सते हुए अंदर बाहर हो रही थी....माँ की चूत फाछ्ह फ़च की आवाज़ करते पानी छोड़ रही थी...
लंड जैसे उसने अपनी चूत में जकड लिया...और बेटे के सर को अपनी चुचियो पे जैसे भर लिया बेटे ने दोनो छातियो को बारी बारी से मसला....फिर उसे एक एक करके उनके ब्राउन निपल्स को चखते हुए चूस लिया..माँ मारे उत्तेजना में सर इधर उधर मार रही थी....और बेटा उसकी आहों के शोर से उसका दीवाना बनके उसकी चुदाई करने में मशगूल था..
"आहह बेटा और ना कर देरी बॅस अब और नही सहा आजाता इस्शह".......
.चूत में बेटे के लंड की घिसाई बढ़ गयी.....चुबन जैसे उसे किसी खुन्टे की अपने भीतर लगी....बेटे ने मारे उत्तेजना में उसे मिशनरी पोज़िशन में कुछ 10 मिनट तक और नियंत्रण पाते हुए अंदर बाहर करके चोदा....और उसी बीच माँ ने कस कर टांगे बेटे के कमर में जकड ली...बेटे ने भी माँ को पीठ से लिए अपनी गोदी में उठा लिया
अब तो जैसे माँ उसके कंधे और सीने पे सर रखके जैसे उसकी गोदी में काँप रही थी....मुँह से इसस्सह इस्सह की आवाज़ निकाल रही थी....दाँतों पे दाँत रखके चढ़ाए थे उसने तो इस बीच बेटे ने सख्ती से उसके पीठ से उसे जकड़ा और उसका लंड वीर्य की पिचकारिया उसकी चूत में लबालब भरता चला गया..."उहह उग्घ".......अपनी उखड़ती साँसों पे नाकाम कोशिश पाए दोनो माँ-बेटे थक्के चुर्र एकदुसरे पे जैसे ढह गये....चादर हो गयी फिर खराब और माँ और बेटे वैसे ही नंगे एकदुसरे से लिपटे सो गये....
माँ की नाभि को सहलाते हुए बेटे ने जब चूत के मुआने से अपना लंड बाहर खीचा तो उसे हल्की सी जलन हुई माँ की चूत उसके सुख चुके वीर्य से लगी हुई थी और उसके लंड पर भी वीर्य के सूखे धब्बे लगे हुए थे...नींद नही आ रही थी
आदम उस रात बस माँ से लिपटा हुआ सोच रहा था कि अब आनेवाले कल पे ही पूरा फोकस करूँगा.....अब माँ की खुशी और उसके आराम के लिए एक मनपसंद बहू घर में लाउन्गा...इस बीच कब आँख लगी पता नही चला
उठी तो अंजुम सुबह 3:30 बजे जब उसे कस कर पेशाब लगी उसने एक बार हाथ से अपने चूत के मुआने को टटोला जहाँ कल भी शायद बेसवरी और बदखयाली में दोनो ने सावधानी जैसे मिस कर दी...चूत वीर्य से चिपचिपी थी....अंजुम उठी और पहले वो पेशाब करने गयी वहाँ से आके उसने अपने तौलिए से गीले बदन को पोछा..फिर नंगी ही पलंग पे बेटे के पास बैठी उसने एक ग्लास पानी भरा और गोली खाई....एक बार उसने अपने खुले बाल को समेटते हुए बेटे की तरफ मूड के देखा उसकी निगाह उसके नंगे बदन पे हुई अब भी वो नंगा सो रहा था....अंजुम कुछ देर वैसे ही बैठी रही बेटे की शादी की सोच में डूबी सी...फिर उठी और बेटे के साथ लेटते हुए उसने चादर अपने और आदम दोनो के उपर ढक ली उसने एक हाथ पेट के बल लेटे बेटे के पीठ पे फेरते हुए उसके कुल्हो पे रखते हुए सहलाया उसकी पीठ को चूमा और उसे प्यार करके उसके बदन से जैसे लिपटके सो गयी...
वक़्त के साथ साथ इंसान को भी अपने आपको बदलना पड़ता है...हालत चाहे जैसे भी हो...इंसान खुद पे खुद अपने ज़ज़्बातो पर काबू पाना सीख जाता है....लेकिन कुछ घाव और दर्द चाहे दिल के हो या शरीर के वो कभी कभार तो अपने कभी होने की मज़ूद्गी का अहसास तो करा ही जाते है...कुछ वैसा ही हाल था मेरा....बीते कल को भूलके आज में जी रहा था मैं...अब ज़िंदगी को फॉर्वर्ड तरीके से ही चलानी थी...ना पिछला आ सकता था और ना ही उसे याद करके कोई पछतावा कर सकता था....जो हाथ से बीत चुका सो बीत गया....ज़िंदगी और मौत पे भी इंसान का बस नही चलता.....चंपा की मौत महेज़ एक दुर्घटना ही मानके मैं उसे भी धीरे धीरे अपने यादों से मिटा चुका था.....अब मैं एक जिन्दादिल खुशकिस्मी मिज़ाज़ खुद को बना रहा था....
अब मैं कोई लड़का नही एक ज़िम्मेदार मर्द बन चुका था....जिसने पिता से वादें किए और माँ को उनसे दूर करके उन्हें अपने संग लेके जी रहा हो....ज़िंदगी की मौज मस्ती जिसे मैं कामवासना का खेल कहता हूँ...उसका भी खूब लुफ्त उठाया मैने....हर ठोकर से ये अनुभव किया कि चाहे वो रिश्ता किसी के साथ बेपनाह प्यार करने में हो या व्याबचार रिश्तो का मज़ा लेने में उसमें मज़ा भी है तो सज़ा भी....
व्याबचार रिश्ते क्या होते है? ये मैं अनुभव कर चुका था आज इसी हसरत ने मुझे मेरी माँ के साथ संबंध बनाने में मज़बूर किया...वरना मैं जिस माँ की कल कोई इज़्ज़त नही करता था आज उससे बेपनाह मुहब्बत करने लगा था....अज़ीबो ग़रीब प्यार हो या लोगो की नज़रो में हवस या गुनाहगारी मेरे नज़र में ये वो मीठा मज़ा था....जिसकी लज़्ज़त के खातिर मैं क्या कुछ नही करने से गुज़ारा? ये हसरत ये नशा ये लुफ्त ये मज़ा हाहाहा
आदम अपने होमटाउन माँ को लेके वापिस आया भी और उसने साबित किया कि वो किसी काबिल है उसने माँ के लिए फ्लॅट लिया उसे ऐशो आराम दिया खुद को ज़िमेद्दार काबिल सबकी नज़रों में बनाया जो उसे कल नाकामयाब और नाउम्मीदी से बिगड़ता गाली गलोच करता लड़का समझते थे जिसके बाप को कल यहाँ से शर्मिंदा होके अपनी करतूतो के चलते जाना पड़ा आज उस बेज़्ज़ती का बदला आदम ने सबको अपने अहंकार और रुतबे से दिया...वो थुक्ता भी नही था उन ददिहाल वालो की तरफ जिनकी निगाहो में उसके और उसके परिवार की कोई औकात नही थी...आज वो किसी लायक हो चुका था....
हमारी रोज़ मरा की ज़िंदगी अच्छी ही बीत रही थी ऐसा लग रहा था दुख के बदल अब छन्ट चुके....धीरे धीरे खुशिया फिर हमारे जैसे घरो में दस्तक देने लगी....काम में मेरी उन्नति हो रही थी...तो राजीव दा के साथ रोज़ हँसी मज़ाक करने की एक बैठक बैठती थी साथ में ज्योति भाभी होया करती थी जिनसे मैं बिल्कुल नही शरमाता था...पीने के बाद तो राजीव दा इतने बोल्ड हो जाते थे कि वो ये तक अपनी बीवी को कह देते थे...क्या पता मैं नशे में हो जाउ? और आदम तुझे भगा ले जाए? वैसे भी अपना आदम हॅंडसम जो ठहरा और सिंगल भी ....ज्योति भाभी मज़ाक मज़ाक में कयि बार राजीव दा को कस कर लगा भी देती थी और मैं ठहाका लगाए उनका ये मज़ाक सुनके हंसता था..सच में लज्जा मुझे भी आ जाती थी
वक़्त बीतता गया और माँ की खुशी के लिए मैने लड़की ढूँढना शुरू किया गाओं वाली लड़की लेने का मेरा कोई मन नही था...इसलिए शहर में ही कोई काबिल पढ़ी लिखी सुशील लड़की ढूँढ रहा था....बस फरक इतना था कि इस बार अपनी हवस के लिए नही अपने निक़ाह के लिए कोई औरत तलाश करूँ.....बेंतिहा खूबसूरत लड़किया जैसे मुझे आस पास दिखने लगी...सोचा किसी से बात आगे शुरू की जाए..लेकिन दिल एक पे भी ना आया...हार पछताके मैने उम्मीद छोड़ दी....
उस दिन घर आया तो पाया माँ एक औरत के साथ बात कर रही थी....खुले बाल थे उसके जैसा बताया हूँ यहाँ की उम्रदराज औरत कामवासना की जैसे मूरत है बाल एकदम खुले हुए नाइटी पहनी हुई थी जो आमतौर पे यहाँ की घरेलू महिलाओ की पोशाक है...मुझे देखते ही उसने मुस्कुराया मैने भी उन्हें सलाम किया...माँ ने बताया कि यह पास में ही रहती है..हम बातचीत करने लगे...तो माँ को आंटी ने कहा कि क्या बात है लड़का तो आपका बड़ा सुंदर है? माँ ने कहा ऐसा कुछ नही है....आंटी ने कहा नही नही पूरा आप पर गया है हाहाहा हँसी मज़ाक का दौर था और मैं कपड़े बदलने लिविंग रूम से अपने कमरे चला आया
मुझे नही मालूम फिर क्या बात हुई? जब वापिस लौटा तो माँ ने जैसे एक खुशख़बरी सुनाई उसने अपने फोन पे किसी लड़की की तस्वीर दिखाई मालूम चला कि वो फोटो अभी कुछ देर पहले आई उस औरत की भांजी का है नाम निशा है और अभी अभी कॉलेज ग्रॅजुयेट हुई है....मैने तस्वीर दिखी आमतौर पे तो एफेक्ट लगा क्यूंकी हद से ज़्यादा गोरी दिख रही थी माँ ने बताया कि उसने कबकि ये तस्वीर ब्लूटूथ से ले ली बात आंटी ने ही छेड़ा था मुझे देखते हुए...उन्हें भी तलाश थी अपने बेटी के लिए किसी नौजवान की
आदम : माँ ये सब तो ठीक है खूबसूरत भी है बेंगल की लड़कियो से थोड़ा हटके है ना साँवली है और ना ही कही से लगे की गवार काफ़ी स्मार्ट है पर तू जानती है ना की मैं क्या कहना चाहता हूँ?
माँ : हाँ बेटा चल के देख लेते है एक बार तू मिल ले ना...इसे खाना बनाना भी आता है घर यही संभालती है अपना इसलिए तो देख माँ बौराई घूमती है इधर उधर
यक़ीनन अब सीरत पढ़ना तो आसान नही...कैसी है? क्या कोई ज़िंदगी में है या सिंगल है? आजकल की बंदी है क्या मालूम कैसा रवैया हो? नखरेबाज़ ना हो? यही सब आमतौर पे सवालात के घेरे में माँ ने मेरी खामोशी को तोड़ा और कहा कि आज शाम को चलेगा देख भी लेना इस बहाने...उसकी माँ ने तुझे देखने की इच्छा जताई है...मैने कहा तो कह दे उनसे कि आज हम आ रहे है इस बात पे मुलाक़ात भी कर लूँगा उनकी बेटी निशा से..माँ खुशी से मेरे गले लग गयी...जब उसने मुझे गले लगाया तो मुझे उसके निपल्स अपने सीने पे चुभते महसूस हुए मैने उसे अलग किया वो एक चुम्मा मेरे गाल पे देते हुए किचन चली गयी खाना बनाने...
मैं खुश तो था नही ना ही मैं दिल फेक आशिक़ था कि उसे देखके फ्लॅट हो गया था...बस सवालातो के घेरे में था जो मेरे मन में चल रहे थे...माँ की ही फिकर थी क्यूँ चाहती है कि मैं दूरिया बनाऊ? शायद यही खुदा की मर्ज़ी है किसे मालूम?
माँ ने मुझे तय्यार किया कहा कि अच्छे से बनके चल..ऑफीस के पसीनेदार कपड़ों में मैं नही गया..ये मेरा पहला अनुभव था माँ के साथ रिश्ता देखने जाना....माँ और मैं उसके घर पहुचे....तो उनके पिता ने मेरा स्वागत किया बड़े हाशमुख थे बड़े बेचैन.....मुझे बिठा कर बीवी को ज़ोर ज़ोर से चिल्लाते हुए कहे कि अर्रे आओ ना मेहमान आ गये है....आज सिर्फ़ मेरी माँ ही मेरी गार्जियन बनके लड़की देखने आई थी मेरे साथ....हम दोनो चुपचाप बैठे हुए थे पिता तो माँ से गॅप करने लगा और मेरा प्रोफेशन और दिल्ली के घर बार के बारे में जानना चाहा...मैं सवालो का जवाब बड़ी सहेजता से दे ही रहा था...कि इतने में ट्रे में दो ग्लास शरबत भर लिए.....उन हाथो में निशा शरमो हया का जैसे लिबास ओढ़े बड़ी बड़ी पर झुकी निगाहो से मेरे सामने झुकी वो कोई गवार नही थी आते ही उसने मुझसे हल्की सी नज़र मिलाई फिर मुस्कुराइ....फिर सोफा के पीछे अपने चाचा चाची के पीछे खड़ी हो गयी...हँसी मज़ाक चलने लगा बातों बातों में परिवार की बात छिड़ी....माँ ने कहा पिता है पर दिल्ली रहते है बेटे की नौकरी के चलते हम यहाँ है...तो उन्होने भी बताया कि निशा उनकी अपनी सग़ी बेटी तो ना सही पर दिलो जान से वो उनकी एक मात्र घर की चिराग थी...जिसके लिए उन्होने अपनी सारी ज़िंदगी लगाई...ज़ज़्बातो भरी बातों में मैं जैसे खामोश रहा....बीच बीच में उठती निगाहो से निशा को देखा तो वो भी मुझे ही बड़े गौर से देख रही थी
मुझे अहसास हुआ इस बीच कि जैसे मुझे देखके उसे शरम नही बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे मैं उसे पसंद आ रहा हूँ...क्यूंकी उसकी उंगलिया अब भी ट्रे थामे हुए जो थी उस पर अपने नाख़ून जैसे खुरच रही थी..उसकी आँखे एक टक मेरी ओर देखी तो मैं मुस्कुरा दिया तो उसने भी मुस्कुराया..ऐसा लगा देख ले आदम अभी से ही
उसके चाचा ने उसे आगे बुलाया और फिर उसे मेरे साथ अंदर के कमरे में जाके बात करने को कहा..कि बेटा तुम कुछ बोलो और एकदुसरे से कुछ देर बात करो....माँ सोफे पे ही बैठी रह गयी उसने मुझे जैसे जाने की इच्छा जताई...मैं उसके साथ उठा..तो उसने हल्के से कहा "आओ ना"......बांग्ला में उसने कहा
तो मैं उसके पीछे पीछे उसके कमरे में दाखिल हुआ गुलाबी रंग की दीवारें थी सजी धजी चीज़ें आसपास मज़ूद थी बिस्तर एकदम मुलायम गद्देदार था उस पर बैठते ही वो नज़ाकत से अपने बाल खोले और मुझे एकटक देखा....वहाँ तो मैं ही थोड़ा शरमा सा गया....उसने धीरे धीरे मुझसे खुलना शुरू किया मैं नोटीस कर रहा था कि कहीं वो पहले से चुदि चुदाई तो नही थी...फिर मैने अपने गंदे दिमाग़ को झटका और सोचा फ्रॅंक्ली होना भी कोई बुराई है क्या?
//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg तीन लाख व्यूज क्रॉस करने के लिए सभी मित्रो को थॅंक्स //cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f.svg
मैं कुछ देर तक उससे बात करते रहा और वो भी....उसने बताया कि वो बी.ए ग्रॅजुयेट थी और वो एक प्रोफेशनल बिंगाली डॅन्सर है पास रखे उसने अपने घूंघुरे दिखाए...बातचीत फिर अँग्रेज़ी भाषा में होने लगी...उसे मेरी अँग्रेज़ी बड़ी पसंद आई उसे यकीन नही हो रहा था कि दिल्ली का रहने रहा लड़का ऐसे छोटे टाउन में आके बस सकता है...मेरी संघर्ष भरी कहानी को सुनके वो काफ़ी जैसे इंप्रेस हुई...फिर बातों ही बातों में जैसे उसने टाँग खीची कि कोई गर्लफ्रेंड कभी बनाई? ऐसा लग रहा था जैसे उसे मेरे फ्रॅंक्ली और शांत स्मार्ट होने से झिझकना कम हो रहा था...वो एकदम खुलके मुझसे सबकुछ जान रही थी....मैने कहा नही...झूठ ही कहूँगा ना भाई क्या यह कह दूं है ना माँ है भाभी है मौसी है दीदी है तीन बच्चो का बाइयोलॉजिकल फादर भी हूँ
ऐसा डिस्क्रिप्षन बताके तो माँ और मुझे लात मारके वहाँ से निकाल दिया जाता...और बेज़्ज़ती होती सो अलग बाप रे ये दिमाग़ क्या कुछ नही सोच उमड़ देता है ऐसे वक़्त में....मैं उस वक़्त एक कुँवारा भोला भाला लड़का था...और वहीं मेरा वजूद था....करीब आधे घंटे बात ही की थी कि हम एकदम एकदुसरे से जैसे फ्रॅंक हो गये उसने बताया कि उसके पिता काफ़ी सख़्त है इसलिए कोई लड़का देखने नही देते थे और ना ही उसे कोई इच्छा थी वो इस होमटाउन के लड़को को दोष दे रही थी की ऐसे होते है वैसे होते है? फिर इस बीच माँ आ गयी और तपाक से बोली जिससे मैं हड़बड़ाया और वो भी..."क्या बातें हो रही है?".......माँ ने हम दोनो को प्यार से कहा....
"अर्रे ना ना काकी आइए ना"........निशा ने माँ को अपने साथ बिठाया इस बीच मैने गौर किया कि उसका पाजामा जो उसने पहना था वो उसके घुटनो तक सरकता आ गया था..और मैने गौर किया कि हमारे आने से पहले ही उसने वॅक्स कराया था....फिर उसने बताया कि उसे मेक अप का बहुत शौक है और वो माँ से साज़ सिंगार की बात करने लगी
फिर माँ ने मेरी टाँग खीची और उससे मज़ाक किया..."बहुत गुस्सैला है सोच लो इसके साथ रहना मतलब आग के साथ रहना"..........
."ऐसा नही काकी मुझे तो ये बहुत चार्मिंग लगा और ऐसा लग रहा है जैसे कितने दिनो की मुलाक़ात हो"......
."ओह हो अभी से हाहाहा"......माँ उसके खुले विचारो से इंप्रेस होते हुए हंस पड़ी
मैने निशा की मुस्कुराहट नोटीस की वाक़ई काफ़ी हसीन उसकी मुस्कान थी....मैं शरमा गया
कुछ देर और बातचीत हुई फिर बाहर आके माँ आंटी से बात करने लगी तो मैं उनके पिता के पास बैठके बात करने लगा....पिता मुझे बोले कि देखो मेरी इकलौती ही बेटी है तुमसे बहुत उम्मीदी जुड़ गयी है मेरी तुम मुझे बहुत पसंद आए हो ये बात मैं दिल पे हाथ रखके कहता हूँ जो लड़का अपनी माँ को इतनी सारी खुशिया दे सकता है वो अपनी होने वाली बीवी को भी उतनी खुशी देगा".....मैं मुस्कुराया शायद माँ ने ज़ज़्बातो के सैलाब में शायद मेरे आब्सेन्स में सबकुछ जैसे बताया उनका दिल हल्का था अपना दुख सुख बताना उनके लिए आम था....
मेरी बहुत प्रशंसा हुई उन दोनो को मैं बहुत अच्छा लगा....फिर हमारी मंज़ूरी पूछी गयी खासकरके मुझसे..निशा भी जैसे इसी आस में खड़ी शरमाते लहज़े में मुझे देख रही थी शायद उसे डर हो कि मैं उसे ना पसंद करू...शादी से इनकार कर दूं...लेकिन मैने कहा कि मुझे ये बात जानके खुशी हुई कि आपने उसका इतना ख्याल रखा मेरी माँ का जो फ़ैसला वो मेरा है....माँ ने मेरी तरफ देखके मुस्कुराया फिर उसने कहा मुझे तो बहुत ही पसंद है...और मैं जानती हूँ मेरा दिल जानता है मेरा बेटा आदम भी निशा को खूब पसंद कर रहा है हाहहाहा....हम सब हंस पड़े...
मैने शादी के लिए फ़ौरन हां कह दिया...तो निशा भी हंस पड़ी...उसकी राय माँ ने ही पहल करके पूछा...तो वो सिर्फ़ शरमाई और फिर कहा कि मैं उसे बहुत पसंद हूँ....उसके चाचा चाची हंस पड़े....फिर एकदुसरे से मुबारकबाद हुई....ये मेरा पहला अनुभव था मैं एक रिश्ते में बँधने जा रहा था....
निशा तो जैसे फूली नही समाई लेकिन मैं हल्का सा उदास था...बस तसव्वुर में ना जाने क्यूँ चंपा याद आई? क्या पता निशा उसकी जगह ले सके?.यही सोच ही रहा था कि इतने में इस खुशी में उसके पिता मेरे गले लगे तो मुझे होशो हवास में होने का अहसास हुआ...
हमारे घर में अभी से जैसे उनके घर का संबंध जैसे जुड़ गया था....हम वहाँ से विदा लिए तो जाते जाते भी निशा अपने चाचा के साथ हमे बाहर छोड़ने आई....फिर उन्होने कहा कि अब हमे तारीख पक्की करने दीजिए अगर आपको कोई ऐतराज़ ना हो...तो माँ ने भी कहा कि कोई जल्दबाज़ी नही सबकुछ आराम से होना चाहिए...फिर माँ और मैं उन्हें सलाम किया घर लौटे....मैने जब मूड कर एक बार देखा तो निशा ने जैसे मुझे अज़ीब सी मुस्कुराहट दी...मैं समझ नही पाया शायद मैं कुछ ज़्यादा ही उसे भा गया था...
पूरे रास्ते हम माँ-बेटे बात चीत करते हुए घर लौटे...पेट भरा हुआ था उनके घर से खा पीके आए थे इसलिए एक एक ग्लास दूध लिए हम बिस्तर पे आके थकावट से ढेर हो गये...आधी रात का समय था माँ मेरे खुले बदन से चिपकी चाँदनी रात की फीकी रोशनी जो बाहर पड़ रही थी खिड़की से उधर ही देख रही थी...मैं चुपचाप था
माँ : बेटा
आदम : ह्म
माँ : तुझे कैसी लगी?
आदम : अब भी पूछ रही हो अगर हां कहा है तो अच्छी लगी होंगी ना
माँ : नही तू माँ की कसम ख़ाके कह तेरी सही इच्छा जाननी है मुझे
आदम : वैसे देखा जाए तो हटके है थोड़ी छटपटिया है थोड़ी चुलबुली है पर सुशील भी है और स्मार्ट भी
माँ : वैसे दिखावा तो नही लगा मुझे कि वो लोग हमसे कुछ छुपा रहे थे
आदम : ह्म वरना उसकी निगाहो में शरमो हया का लिबास होता..या फिर रज़ामंदी में लरखड़ाहट
माँ : ह्म सच कहा तूने मुझे तो बेहद पसंद आई है सोच ले कल उसके साथ तुझे सारी ज़िंदगी बितानी है
आदम : मुझे पसंद है माँ और मैं चाहता हूँ कि अब मैं दो औरतो को संभालू वाक़ई परिवार बड़ा ज़ज़्बाती है
माँ : हो भी क्यूँ? भांजी है और आजकल कोई किसी अनाथ घर की लड़की अपने यहाँ बहू बनाके भी नही लेता हमारी बात तो जुदा है कि हमे अच्छी लड़की चाहिए हमे परिवार नही देखना जात औकात नही देखनी हमे लड़की देखनी है
आदम : तुमने इनकार कर दिया ना कि दान दहेज में कुछ ना दे
माँ : हां बेटा मैं जानती हूँ तू ये सब पसंद नही करता अब ये तेरा पहला एक्सपीरियेन्स है तो होता है पर एक बात कहूँ तुझे एक नज़र में पसंद कर लिया उसने
आदम : आपको क्या लगता है लड़की चालू है?
माँ : मुझसे ज़्यादा परख तो तुझे है कुँवारी तो होगी ही
आदम : अगर ज़िंदगी में उसके कोई था भी तो मुझे फरक नही पड़ता पर वो बीता कल होना चाहिए आज नही
माँ : मैं जानती हूँ बेटा ऐसा होता तो उसी वक़्त रिश्ता तोड़ देती और तुझे साथ ले आती
आदम : वैसे झेल पाएगी मुझे (माँ समझ रही थी मैं क्या कहना चाह रहा था मैं अपने औज़ार की बात कर रहा था )
माँ : मैं भी तो औरत हूँ मैने कैसे दी तुझे? बस उमर का फरक है तो उसे भी धीरे धीरे आदत हो जाएगी अब पहली ही बारी में वाय्लेंट ना हो जाना तू
आदम : हाहहा (तू भोली क्या जाने? कि ज़िंदगी में आदम ने कितनी औरतो के साथ रात गुज़ारी है? वो तो बस इस लिए कह रहा था कि अगर कुँवारी रही तो झेल भी सकेगी कि नही और ये सच था उसके हथ्यार को झेलना पेशेवर औरतो का ही काम होता)
माँ बेटे के गले लग्के सो गयी.....बेटे ने जब ये अहसास किया तो वो भी सो गया....खुशी जैसे इस महोत्सव में आने सा लगा था धीरे धीरे रिश्ता अब पक्का होने सा लगा था....अब तो आना जाना जैसे होने लगा किसी को खबर नही थी सिवाय आदम के ननिहाल के की उसकी शादी तय हो चुकी थी...खबर रूपाली तक पहुचि तो दुख नही बल्कि उसे खुशी हुई कि ज़िंदगी में कुछ तो आदम ने फ़ैसला लिया..वरना उसे यही लगता कि अब भी वो रूपाली के लिए ही चिंतित है...थोड़ा सा दुख हुआ था उसे...लेकिन अब यही किस्मत की रीत थी...
खुशिया दस्तक दे उठी तो रिश्ते नाते जुड़ने शुरू हुए....करीब करीब 1 महीने के अंदर दोनो की मँगनी तय कर दी गयी....आदम ने साफ खुले तौर पे उसके पिता को कह दिया कि उसकी माँ के साथ उसके पिता अब नही रहते इसलिए उनके आने की गुज़ारिश ना करे....पर निशा के चाचा ने कहा कि अगर बुलवा दे देते तो ठीक रहता...पर आदम नही माना..एंगेज्मेंट होते ही जैसे निशा आदम को किसी गर्लफ्रेंड की तरह कॉल कर करके तंग करने लगी दोनो इस बीच घूमने भी बाहर गये...जहाँ आदम ने अपनी ज़िंदगी का हर एक पन्ना व्यभाचार रिश्ते और सबसे बढ़ कर अपनी माँ के साथ संबंधो को छोड़के उससे सब ज़ाहिर किया उसे समझाया...तो निशा ने भी वादा किया कि उसे भी ऐसे ही दुख का अपने परिवार के साथ सामना एक दिन करना पड़ा था उनका भी कोई अपना कहने को नही हर कोई उसे अनाथ बोल बोलके उसके घर नही आता उसके चाचा ने उसे पाला था उनको कोई संतान नही थी इसलिए चाचा और चाची ने उसे कभी अपने सगे माँ बाप की कमी महसूस होने नही दी....इंसान ज़ज़्बातो में ही किसी पे आँखे मूंदके यकीन कर लेता है वहीं हाल मेरा था पर सच कहूँ तो वो मुझे कही से भी धोखेबाज़ जालसाज़ नही लगी..वो जीन्स और टॉप पहन्के ही अक्सर मुझसे मिलती थी उसका परिवार फ्रॅंक्ली किसम का था इसलिए उस पर रोक टोक नही थी और मेरे से इंग़ेज़मेंट होने के चलते उन्हें कोई रुकावट या किसी भी तरीके की झिझक नही थी....क्यूंकी मैं खुद खुले विचारो वाला इंसान था...और मुझे वैसी ही लड़की चाहिए थी..
धीरे धीरे खुशिया जैसे आने लगी....और उस दिन माँ का कॉल आया...इस बीच माँ की तबीयत में काफ़ी सुधार आ गया था उनकी भी दवाइयाँ चल रही थी...वो आवाज़ में काफ़ी भारीपन लिए बोल रही थी पर धीमे से जैसे किसी की मज़ूद्गी का अहसास हो.....मैं ऑफीस से लंच ब्रेक लेके दफ़्तर से घर की ओर निकला....जब घर पहुचा तो पाया वो शक्स दरवाजे पे ही खड़ा था और माँ उसे एकटक घुरते हुए मेरी मज़ूद्गी का अहसास पाकर मेरी तरफ देखने लगी कि जैसे मेरा क्या रिक्षन होगा उस शक्स को देखके...वो शक्स भी जैसे पीछे मुड़ा तो मेरे माथे की शिकन एकदम से गायब हो गयी और आँखे बड़ी बड़ी किए मैं उसे देखने लगा कि ये यहाँ कैसे?
सामने खड़े अपने पिता को देखके मेरी तो जैसे ज़मीन खिसक गयी....ये इंसान यहाँ? अब क्यूँ आया इतना कुछ होने के बाद फिर से? ....कल तक तो बड़े बड़े फिल्मी डाइलॉग्स मारे डर डर की ठोकरें खाएगा निकल जा यहाँ से कुछ नही कर पाएगा कटोरा लेके भीक माँगेगा...आज ये कमीना यहाँ क्या कर रहा है? जिसने मेरी माँ को हर वक़्त बस रुलाया ग़रीबी और मोहताजीयत भरी ज़िंदगी दी...फिर किस मुँह से यहाँ आया? वो भी मेरे घर
आज माँ को लेके मैं अकेला रह रहा था कितने खुश थे हम? बस माँ की ही मज़बूरी से मैने शादी के लिए हां कही और एक जान को और घर में बढ़ाने के लिए स्वीकार किया..तो फिर ये किसलिए यहाँ? दिन फिर गये इसलिए या फिर धक्के मारके जो बात मैने कही थी उन्हें क्या वहीं हुआ? क्या ददिहाल वालो ने संपत्ति नही दी और लात मार दिया इसी काबिल ही हो साले तुम
मेरे मन में पिता को देखते जैसे गुस्सा उबल उठा...लेकिन मेरे कदम वहीं ठहर गये..मैं अंदर नही आया....मैं वहीं थोड़ा ज़ोर की आवाज़ में कहा...क्या हुआ आप यहाँ कैसे? क्यूँ आए हो अब? और क्या बचा है ?
माँ आगे आके मुझे शांत करने लगी मुझे उनसे थोड़ा दूर करने लगी...उन्हें डर था कि बात बिगड़ ना जाए..पिता शर्मिंदा भरे चेहरे को लिए मेरी बातें सुन रहे थे...मैं भी कब तक उन्हें गाली गलोच करता रहता....उनकी खामोशी से मैं चुपचाप हो गया लेकिन बस उन्हें घृणा भरी नज़रो से देखता रहा
माँ : अब आए है तो कुछ कह मत
पिता जी मेरे पास आए मेरे कंधे पे हाथ रखा और मुझे समझाने लगे कि हमारे जाने के बाद उन्हें बेहद ठेस पहुचि हमारी कमी उन्हें खली इसलिए वो वापिस हमारी ज़िंदगी में लौट आए थे भला हमे अकेला कैसे छोड़ते? तो मैने कहा इतने दिनो बाद अहसास हुआ अब तक तो अगर मर गये होते तो क्या तब भी आते? पिता ने कुछ नही कहा...फिर माँ ने मुझे बाँह से पकड़ा और उन्हें भी इशारा किया अंदर आए
मैं अंदर आ गया साथ में पिता भी हम लिविंग रूम में बैठे...माँ ने मेरे बॅग को मेरे हाथ से लिया और मुझे बैठ जाने को कहा..पिता चुपचाप सोफे पे बैठ गये मेरे सामने....फिर पिता ने अपने ज़ज़्बातो भरी आवाज़ में मुझसे माँफी माँगी उन्होने बहुत बड़ा इरादा किया नही मेरी ज़िंदगी सवारी आज मैं किसी लायक हुआ तो उन्हें जानके खुशी हुई उन्हें मेरी किसी बात का बुरा नही लगा बल्कि उन्हें गर्व है कि मैं कुछ काबिल बना....फिर बताया कि वो हमारे हालातों का जायेज़ा लेने आए थे
तो मैने कहा क्यूँ? देखके आह भरना था कि हम ग़रीब तो नही कि चलो चार और ताने यहाँ आके मार दूं...तो माँ ने कस कर मेरे कंधे को हाथो से दबाया....मैं चुपचाप हो गया...फिर पिता ने शर्मिंदे लहज़े में कहा जो हुआ वो उनकी ग़लती है इसलिए वो यहाँ हमे वापिस ले जाने को आए थे दरअसल उनकी नौकरी छूट चुकी थी और उनका वहाँ दिल नही लगा वो खुद दूसरी नौकरी ना तलाशे बल्कि सीधा हमारे पास आए....बहुत मुस्किल से घर का पता मिला वो भी उनकी बहन यानी मेरी बड़ी बुआ ने हमारा पता उन्हें दिया...
वो जैसे मुझसे नज़र नही मिला पा रहे थे...उन्होने माँ से भी काफ़ी माँफी माँगी कि वो उनके लायक नही....इतनी उमर बढ़ भी वो उन्हें खुशी नही दे पाए कभी....मैं भी क्या कहता? बस चुपचाप ही रहा मैने बस इतना कहा कि मैं उस लायक नही जो आपको मांफ या ना मांफ करू वो आपकी भूल थी और मेरे लिए कोई चुनौती था बस वहीं कामयाबी ही मेरी सफलता है बस और मुझे कुछ नही चाहिए....पिता ने कहा कि संपत्ति का पैसा उन्होने ले लिया है दादी ने जायदाद मेरे नाम की है तो मैने कोई हैरानी नही जाहिर की मुझे उन पैसो से कोई मतलब नही था...
फिर पिता ने पूछा कि कितना लोन लिया? वग़ैरा वग़ैरा...तो मैने सब उन्हें बताया फिर उसके बाद उन्हें खुशी हुई जानके कि मेरा रिश्ता तय हो गया माँ और पिता एकदम एकदुसरे से हंस हंस के बात करने लगे....अब उनके रिश्तो में वो कड़वाहट नही रही थी शायद उमर के साथ साथ उनका गुस्सा कम हो गया हो या उनका गरम खून जैसे ठंडा पड़ सा गया हो...मैं भी क्या कहता अपना लिया? कोई बात नही चाहे हम जितना भी गुस्सा हो उनकी ही बदौलत मेरी माँ को मैं नसीब हुआ था हमारे रिश्ते जुड़े थे....
पिता जी हमारे साथ रहने लगे फिर माँ ने उन्हें ज्योति भाभी और राजीव दा से भी परिचय कराया...राजीव दा उन्हें अपने पिता की तरह मानने लगे साथ में मुझे अकेले में ज्योति भाभी के संग जहाँ माँ भी मज़ूद थी समझाया देखो पिता है कितना भी गुस्सा करे? अब इस मोड़ पे उनको ऐसे मत ठुकराओ ना निकल जाने को कहो अब उनका आगे पीछे कौन है? तुम्हारी और तुम्हारी माँ के सिवा...मैं भी कुछ नही कहा मैने पिता को अपना लिया...पिता मुझे मानने लगे थे...बोले कि कोई ज़्यादा भाग दौड़ वाला काम मत कर कोई और धंधा जमाने की इसी फील्ड में कोशिश कर...मैं भी यही विचार कर रहा था..
पिता के आने से माँ और मेरे बीच जैसे खुद ब खुद पहले जैसा दायरा बन गया था...पहले तो हम यहाँ अकेले थे 24 घंटे एकदुसरे से मिल लेते थे पर अब जैसे बंदिशे सी थी....पिता को यकीन नही हुआ कि मेरी शादी तय कर दी गयी थी....पिता ने मेरी मंगेतर उर्फ निशा से मुलाक़ात की उन्हें वो काफ़ी सुंदर और अच्छी लगी...वो भी काका काका करके जैसे उनके दिल में जगह बनाने लगी....पिता ने कहा कि तुम बस जल्द से जल्द घर आओ...इस बीच मैं थोड़ा कम बातचीत करता था अपने ससुर से क्यूंकी उन्हें मैने पर्सनली बताया था कि मेरे पिता हमारे साथ नही रहते मेरी माँ को छोड़ चुके हैं पर एकदम से उनके आने से यक़ीनन उनका मिलना भी मेरे होने वाले ससुराल वालो से वाजिब था....उनका तो पिता के साथ एकदम रिश्ता जुड़ गया....पिता जी निशा के चाचा से खूब हँसी ठट्ठा (मज़ाक) लहज़े में बात करते थे बिंगाली माहौल जैसे क्रियेट हो गया माँ तो हिन्दी बोलती थी मेरी....मैं ही बिंगाली बोलता था बस पर अब तो पिता जी भी थे...
जल्द ही रिश्तो की नीव और गहरी होती गयी....और फिर मेरे खानदान वालो को मेरी शादी के बारे में मालूम चला...वो लोग भी हमारे घर इस बीच आए काफ़ी खुश भी हुए और जले भी कि उनके परिवार से हम इतना डिस्टेन्स बनाए हुए थे और आज पिता की ही बदौलत उनका हमारे यहाँ आना जाना हुआ मैं तो बस टालमटोली करता था किसी से ठीक मुँह बात भी नही करता था अदब से बात का अदब से जवाब देता था...
माँ पिता जी के साथ दूसरे कमरे में सोती थी...मैं जानता था ऐसा क्यूँ था ताकि उन्हें हमारे रिश्ते को एक दायरा दे सके....वो मुझे आँख से ही इशारा कर देती थी कि तुम कमरे में जाओ मैं आती हूँ बाद में...पिता जी तो सो जाते थे...उनका तो अब पूरे दिन घर बैठा रहना होता था जो सनडे भी छुट्टी होती थी तो बोरियत और वक़्त नज़दीकियो का ना मिलने की वजह से मैं माँ के संग बाहर कही घूमने फिरने निकल जाता था...पिता जी कोई आपत्ति करते भी नही थे...भला एक माँ से उसके बेटे के प्रति क्या सोचेंगे?
कुछ रात को बड़ी मुस्किल से गुज़री पर कब तक अपने पे काबू रख पाता? शादी की डेट नज़दीक आ रही थी....खरीदारी और काम के प्रेशर में काफ़ी थकावट हो जाती थी जिससे सेक्स क्रीड़ा में बिल्कुल मेरी रूचि नही उठती थी....उस रात शादी ब्याह के चोच्ले से फारिग होके मैं घर पहुचा माँ ने बताया कि मेरी होने वाली सास और ससुर ने हमारे लिए वेंटकेश हॉल बुक किया है वहीं मेरा निक़ाह है मैने कहा माँ शादी थोड़ी सिंपल होती थी तो चलता ना....माँ ने कहा कौन सा तुझे बार बार शादी करनी है? बस तुझे नाच गाने से थोड़ी चिड है तो ठीक है कोई वैसा माहौल नही होगा ज़्यादा रिश्तेदार भी नही है हल्का सा सेरेमनी सा है बस...चुनिंदा लोग आएँगे
मेरा मन भी नही था कि किसी को ज़्यादा मालूम चले? खासकरके मेरी औरतों को जिनके साथ मैने किसी दिन रात गुज़ारी थी लेकिन माँ को कैसे समझता इस वजह से....माँ ने कहा कि बस तू एक आध दिन के लिए छुट्टी ले....तो मैने कहा ठीक है...ऑफीस से शादी की डेट सुनने के बाद ही मुझे सबने मुबदकबाद दी और खुद बॉस ने छुट्टी दी मुझे दो-तीन दिन की...उसके बाद मैं ऑफीस से घर लौटा उस रात...
देखा कि माँ किचन में बैठी साग को धो रही है...तो पापा कमरे में टीवी देख रहे है ....मैने पास जाके बैठी अपने माँ की नाइटी में हाथ घुसा दिया तो माँ की नरम छाती पे हाथ टच हुआ उफ्फ माँ ने ब्रा पहनी हुई थी शायद पिता की वजह से उन्होने टोका होगा तो मैने माँ के चुभते निपल सहित एक चुचि को दबाया तो माँ ने अपने स्तनों से मेरे हाथ को नाइटी के भीतर से बाहर निकालते हुए मुझे आँख दिखाई
माँ : ये क्या तरीका है बेटा
आदम : बस मन कर रहा है तूने कहा था फ़ासले जितने भी हो तू मेरे करीब जब जी करेगा आएगी
माँ : तू देख नही रहा काम कर रही हूँ तेरे पिता कमरे में मज़ूद है
आदम : अर्रे यार बोलो ना दढ़ियल जाए
माँ : हुहह वहाँ कौन सी तेरी चाची उन्हें खाना देंगी मेरे जैसा तू जा मुँह हाथ धो ले अभी नही बाद में
आदम : बाद में कब?
माँ : अब बोलो ना बाद में अभी तेरी शादी इतनी नज़दीक है वो सब छोड़के तू मेरे पीछे पड़ गया भला मैं अभी फारिग नही हूँ जा तू
मैं मुँह बनाए वापिस कमरे में लौटा...तो पिता जी ने कहा आ गये बेटे मैने कहा हां पिता जी...मैने और कुछ नही जवाब दिया हम फिर नॉर्मल हो गये क्यूंकी पिता की मज़ूद्गी में हमे नॉर्मली ही बिहेव करना होता था.... रात हो गयी थी मैं अपने कमरे में खाना वाना ख़ाके फारिग होके लेटा हुआ था उफ्फ कल तक मेरी माँ यहाँ सोती आई अब यहाँ मेरी बीवी सोएगी यही सब सोच रहा था और चादर पे हाथ फेर रहा था.....माँ की कमी मुझे खल रही थी...बेटा अभी यह हाल है तो आगे क्या होगा? इस बीच दरवाजा चर चरर करके खुला तो पाया कि माँ आई थी उन्होने अपनी पसीनेदार नाइटी को झाड़ते हुए कहा कि अफ बहुत गर्मी है
मैने कहा हां पिता जी आ गये इसलिए काम में घुसी पड़ी हो वो ना होते तो अभी ही तुम्हें बिस्तर पे पटक देता...
.माँ ने कमरे का दरवाजा लगाया और मुझे कहा अच्छा बच्चू तेरी इतनी हिम्मत तू तो बहुत ज़्यादा मुझपे चढ़ने लगा है कैसे चिड रहा है? अभी से यह हाल तो जब शादी होगी तो....
."तो क्या? निशा को साइड करूँगा और तुझे पकडूंगा ....
पकडूंगा अर्थ से माँ समझ गयी कि मैं चुदाई की बात कर रहा था..माँ ने मेरी तरफ हैरत से देखा और कहा हाए अल्लाह इसकी दीवानगी का क्या करूँ जो मेरे प्रति है? .....
मैने सिर्फ़ उसे आँख मारी तो उसने मुझे आँख दिखाई और मुस्कुरा कर झट से अटॅच बाथरूम में घुस गई...
वहाँ से जब वो लौटी तो उसने आल्मिराह से अपनी मेरी दिलाई हुई जिसे रात को अक्सर जो पहनके मेरा साथ सोया करती थी वो नाइटी डाली हुई थी उसके दोनो फिते आज़ु बाज़ू थे उसके...वो काफ़ी पतली चादर जैसी नाइटी थी तो मैने सॉफ पाया माँ ने ब्रा और पैंटी दोनो में से कुछ नही पहना हुआ था...
माँ मेरे साथ . लेट गयी...तो मैं उसके थोड़ा करीब आया तो उसने हाथ मेरी कमर पे रखा...फिर फुसफुसाया ना जाने क्यूँ? मुझे ये सब अभी करना ठीक नही लग रहा तेरे पिता की मज़ूद्गी में
आदम : माँ ऐसी बात है तो फिर चलो मेरे साथ
माँ : कहाँ?
आदम : घर से कहीं दूर और यहाँ तो कुछ कर नही पाएँगे ना
माँ : पागल हो गया है तू मुझे इतनी रात गये कहाँ ले जाएगा? पागल है तेरे पिता क्या कहेंगे?
आदम : देखो पिता का तुम मस्का मुझे मत लगाओ कि उसकी मज़ूद्गी में तुझे ये सब करना ठीक नही लग रहा या डर लग रहा है मेरा मूड बन रहा है बहुत ज़्यादा और मैं जब ज़िद्दी होता हूँ तो किसी की नही सुनता या जाके कह दूं उनको कि आप ददिहाल जाओ
माँ : पागल हो गया है पिता है तेरे और तेरे मोहताज है वो अब ऐसा कुछ ना करना पहले पते की बात सुन पिता तेरे यही एक दुकान ले रहे है दिल्ली से ही सोचके आए थे कुछ जमापूंजी अपनी लगाएँगे वो खाली बैठना नही चाह रहे
आदम : हां पिताजी तो वैसे ऐसे बैठते ही नही खैर अभी (मैने धीरे धीरे माँ की नाइटी के उपर ही उनकी छातियो के उभार पे हाथ रखा और उन्हें मज़बूती से मसला तो माँ हल्की सी चिल्लाई)
माँ : उफ्फ छोड़ ना बेटा अभी ठीक नही है करना आवाज़ें अगर सुन ली तो ग़ज़ब हो जाएगा
मैं थोड़ा सा चिड गया था तो मैने कहा कि ठीक है तुम्हें तो बहाना मिल गया जाओ बात नही करता तुमसे....एक तो पूरे दिन काम का प्रेशर और उपर से तन्हाई काटना कितना मुस्किल हो रहा था कि माँ समझ नही रही थी...उसे क्या मालूम कि मेरी कितनी तलब उठ रही थी चुदाई करने को...बस हालातों को देख रही थी यहाँ मेरी हालत जानने को परे थी
मैं अपने फ्लॅट से बाहर आया उपर सीढ़ियाँ जाती थी मैं धीरे धीरे उपर गया तो राजीव दा के फ्लोर से गुज़ारा शायड सो रहे होंगे दरवाजा लगाया हुआ था बत्तिया भुजी हुई थी...मैं सीडिया वैसे ही अंधेरो में चढ़ता हुआ मोबाइल की टॉर्च जलाए छत पे पहुचा....वहाँ काफ़ी हो हो करके हवाए चल रही थी छत ऐनी टाइम टंकी चेक करने के लिए खुला रहता था....
मैं थोड़ी देर खड़ा चारो तरफ की खामोशी और रोशनदान इमारतो से भरे इलाक़े को देख ही रहा था अपने आस पास कि इतने में मुझे किसी का साया लगा वो आके मेरे पेट से होते हुए कंधे से मुझे जकड़ा मैने पाया माँ मेरी पीठ को चूमते हुए मुझे नज़ाकत भरे चेहरे से देख रही थी....
आदम : क्या माँ? तुम भी ना डरा दिया मुझे
माँ : और अकेला रहना चाहता है डरफोक कहीं का
आदम : मैं जानता था तुम आओगी पर अगर पिता जी ने हमारी मज़ूद्गी का अहसास नही पाया तो
माँ : कभी गहरी नींद से उठे है देख मेरा भी दिल बहुत करता है पर काबू में रखा कर ऐसे दिल को , अब परिवार बढ़ेगा अब तो तेरे पिताजी का भी खाना वाना बनाना पड़ेगा रोज़ वरना दोपहर तो जैसे तैसे खा लिया करती थी अब कुछ दिन में बहू आ जाएगी तो बस
आदम : उफ्फ माँ तू और तेरी सोच धन्य है
माँ मेरी नाक से नाक रगड़ते हुए हँसी...तो मैने उसके होंठ अपने होंठो से जैसे सटा लिए...हम दोनो मुँह की गर्मी एकदुसरे के मुँह में महसूस कर रहे थे..एकदुसरे की ज़ुबान को चूस्ते हुए एक दूसरे के होंठो को प्यासो की तरह चूस रहे थे....मैने माँ को खुद से अलग किया और दरवाजा लगाया..
फिर वापिस हम एकदुसरे से लिपट गये....छत में घना अंधेरा था और काफ़ी खुला और लंबा छत था आस पास की इमारत भी हमारे काफ़ी दूर ही पड़ती थी....आगे मैन रोड था जिससे ट्रक्स गुज़र रहे थे...वो भी काफ़ी दूरी पे....और पीछे औरो के फ्लॅट्स थे...इतनी रात गये कोई हमे देख भी नही पाता..हम वहीं फर्श पे लेट गये...टँकियो के पास फिर एकदुसरे के होंठो को बेतरतीब से चूसने लगे....
माँ : उम्म म्बेटा उफफफ्फ़ कमरे में कर लेते तो पकड़े जाते
आदम : आख़िर कब तक उम्म्म माँ कब तक? (माँ के उपर मैं सवार हम दोनो एकदुसरे को चूमते हुए बात कर रहे थे इस बीच मैने माँ के गले और नाइटी के कपड़े को हल्का सा फाँक किए माँ की गोल गहरी नाभि को चूम लिया)
माँ ने मुझे रोका और कहा कि उसे उपर अच्छा नही लग रहा जी घबरा रहा है उसका...तो मैने माँ को उठाया फिर माँ ने अपनी नाइटी ठीक की....हम दरवाजा लगाए कमरे में लौटे....फिर माँ ने एक बार जायेज़ा लिया पिता जी गहरी नींद में सो रहे थे...फिर हम दोनो अपने कमरे में लौटे और फिर अटॅच बाथरूम में घुसे जो काफ़ी छोटा था...हम दोनो जो भी करते खड़े होके ही कर सकते थे....माँ ने अपनी नाइटी उतार दी और मदरजात नंगी होके मुझे अपने छातियो से चिपका लिया
मैं उसकी छातियो में साँस भरता हुआ उन दोनो पे अपना मुँह रगड़ने लगा....फिर उनपे ज़ुबान भी चलाने लगा तो माँ ने मेरी ठुड्डी से मेरे सर को उपर किया और फिर मेरे होंठ चुस्स डाले उसकी साँसें एकदम भारी थी
मैने उसे अपने तरफ पलट दिया फिर उसे एकदम झुका दिया....अपना मोटा मूसल जैसा लंड उसकी फांको में घुसाते हुए आहिस्ते से अपनी एडी पाओ की उपर किए उसके छेद के भीतरी मुंहाने में डालने लगा..इससे माँ ने गान्ड ढीली छोड़ी लॉडा अंदर सरक गया....इससे माँ का शरीर हल्का सा काँपा उन्होने पूरी ताक़त अपने कुल्हो में भरी और मेरा लंड खा लिया...
उनके छेद में मेरा लंड अंदर तक जैसे ही सरका मैने उसके दोनो बाजुओं को मज़बूती से पकड़े उसके नितंबो में स्ट्रोक्स देने शुरू किए हर चुदाई की थापि से उसके कूल्हें हिल जाते...वो मज़े से आहें दबी आवाज़ में लिए अपनी चुदाई का आनंद प्राप्त कर रही थी...मैने उसे इस बीच खड़ा किया और उसकी गान्ड में अपना लंड घुसाए उसकी चुदाई करता रहा...उसे काफ़ी हिकच हिकच के मैं चोदता रहा...माँ के स्वर में आहों की आवाज़ बढ़ती गयी शायद इस बात का उसे डर था...
माँ तो नोटीस नही करती क्यूंकी चुदाई में हम दोनो मलीन थे...इसलिए जब चरम सीमा का वक़्त आया तो मैने खुद ही खुद पे काबू पाते हुए अपने लंड को माँ की दरार से बाहर खीचा.....और उसी पल टाय्लेट की पिट पे मेरा रस उगलता हुआ गिरने लगा...मैं काँपते हुए वहीं दीवार पे ठिठक गया...माँ इस बीच साँस भरते हुए हान्फ्ते मुझे झड़ते देखने लगी फिर उसने खुद मेरे लंड को आगे पीछे हिलाया और निचोड़ते हुए आखरी बूँद भी मेरे लंड से खीचके निकाल ली...जब मैं शांत पड़ गया तो उसने अपनी उसी नाइटी से ही मेरे लंड को सॉफ किया उसे पोन्छा फिर नाइटी को टाँगगके खुन्टी में फिर शवर ऑन कर दिया हम कुछ देर शवर के नीचे खड़े अपने गुप्तांगो को सॉफ करने लगे...
फिर माँ ने उसी नाइटी के सूखे हिस्से से मेरे गीले बदन को पोछते हुए सॉफ किया और फिर अपना बदन भी पोंच्छा और कहा चल अब तू जा मैं पेशाब करके आती हूँ...मैं बाहर निकल आया तो माँ टांगी चौड़ी किए टाय्लेट पिट के पास अपनी चूत फैलाए पेशाब करने की मुद्रा में बैठ गयी...प्स्स से उसके छेद ने पेशाब की मोटी धार छोड़ी...मैं कमरे में आके सुस्त हो गया कुछ देर बाद माँ ने दूसरी नाइटी पहनी और मेरे बगल में आके सो गयी
पर सच पूछो तो गुपचुप तरीक़ो में चुदाई उतनी रास नही आती जितना हम माँ-बेटे खुलके पूरे घर में चुदाई किया करते थे...अब तो पिता की मज़ूद्गी भी थी...मैं ही सोच रहा था कि शायद माँ अब इसके बाद मुझे अवसर ना दे एक तो शादी की तारीख नज़दीक थी उनकी भी हल्की फुल्की तय्यारियाँ करनी थी जैसे मुझे शेरवानी ये सब दिलाना वग़ैरा वग़ैरा