बाबा : जानता हूँ क्यूंकी तुम दोनो की आत्माओ का मिलन जो एकदुसरे से था....वो यक़ीनन तुम्हें अपने कोख से जन्मी ताकि तुम्हें ज़िंदा हो जाओ और उसी के खून से बनो और उसके ही बन जाओ चंपा तुम्हारी ज़िंदगी में तुम्हारी माँ के बाद अहमियत रखती है आज भी जैसे उसकी मौत का गम जैसे तुम्हारे दिल-ओ-दिमाग़ पे छाया हुआ है आज भी तुम उससे जैसे मिलने के लिए छटपटाते हो
आदम अपने आँसुओं को पोंछ रहा था....
बाबा : उस जनम में तुम माँ-बेटों की आत्मा एकदुसरे से अलग हुई तो उसी ने ही ये प्रण लिया था कि वो तुम दोनो को एक करेगी लेकिन भगवान से उसने एक ये भी इच्छा माँगी कि चाहे उसका दूसरा भी जनम क्यूँ ना हो? वो तुम्हारी ही बनके रहे चाहे तुम उसे अपनी घर की दासी ही क्यूँ ना बना लो? या फिर एक सौतन बनके ही उसे क्यूँ ना अपना लिया जाए?
आदम : लेकिन ऐसा कैसे मुमकिन है? मैं उसके प्रति आकृषित हुआ ज़रूर था...पर माँ को उसके बारे में तो क्या किसी भी मेरे रिश्तो के बारे
रत्तिभर नही मालूम
बाबा : ह्म और ना मालूम चलेगा....लेकिन जो सच है वहीं मैं तुम्हें बता रहा हूँ...अपना हाथ सीधा करो और मेरी तरफ लाओ
आदम ने ठीक वैसे ही अपना एक हाथ सीधा किया उनकी तरफ़ बढ़ाया...बाबा ने उस हाथ पे आँखे मुन्दे कस कर उसके थामा....
"आँखे मूंद लो अब तुम उस सदी में जाओगे जिसकी कड़ी तुम्हारे इस जनम से ताल्लुक रखती है".......सुनके पहले तो आदम मन ही मन
हैरत में पड़ गया...क्या पिछला जनम ऐसा हो सकता है? जब इतना कुछ उन्होने बता दिया तो फिर शायद ये भी.....
कह ना पाया आदम और उसने अपना हाथ सीधा रखा बाबा ने झट से उसे कस कर दबाया और कुछ पढ़ने लगे...आदम आँखे मूंद चुका था..ऐसा लग रहा था जैसे कानो के आस पास हवाओ का शोर जैसे कितना तेज़ हो रहा हो....और एकदम से अचानक जैसे वो किसी गहरी
अंधेरी खाई में गिरता जा रहा हो उसे कुछ होश नही आ रहा था जैसे सपना देख रहा हो...उसका बदन सिहर उठ रहा था...
और ठीक उसी पल उसे सफेद सा कुछ चमकता हुआ दिखा और फिर !
चारो तरफ जहाँ नज़र दौड़ाओ तो दूर दूर में उचे पैड थे....एक नहेर ठीक बीच में से बह रही थी...उनपे उधर से इधर आने के लिए मानो बड़े बड़े पत्थर जैसे एक दूसरे के फास्लो से कुछ ही दूरी पे स्थित थे..और उनके बीच से जैसा बहता पानी जो दूर कही किसी नदी से मिल रहा था...
और ठीक उसी नहेर के बगल में एक सड़क जा रही थी....कच्ची सी सड़क....एक औरत महेज़ एक लाल रंग की साड़ी अपने बदन से जैसे लिपटाये पहनी हुई थी कमर में उसके फँसा एक मटका पानी से भरा हुआ था जिससे मज़बूती से पकड़े हुए वो आँचल किए हुए उस सड़क पे चल रही थी...
कुछ ही दूरी पे चलते चलते खेत शुरू हो गया....वो औरत वहाँ ठहर कर दूर खेत में एक लड़के को काम करते हुए देखने लगी....जो कुल्हाड़ी से काम कर रहा था चिलचिलाती धुंप की गर्मी में जैसे उसका बदन पसीने पसीने हो रहा था...उसका कठोर बदन इस बात का गवाह था की उसने ये कसरती बदन इस कड़क धुंप में इन खेतो में काम करके बनाया है...
वो औरत जब उस लड़के के पास पहुचि तो उसने कमर से अपना मटका खेत के पास बनी मचान के वहाँ रखा और चलते हुए पास की उस गड्ढो में भरे पानी से अपना मुँह धोते हुए अपने बाज़ू और कलाईयों को भी जैसे गीला करने लगी....उसने सिर्फ़ साया कर रखा था जो मुस्किल से सिर्फ़ उसके दोनो छातियो को छुपाए हुए था जब उसने बगल उठाए तो उसके कांख के उगते बाल दिखे....
इस बीच उस लड़के ने कुल्हाड़ी फैकि और हांफता हुआ जब उस ओर देखा तो पाया कि वो औरत अपने मुँह को पानी से धो रही थी अपने बदन को पानी से गीला कर रही थी...लड़के के चेहरे पे एक मुस्कुराहट आई और उसने आवाज़ दी
"मम्मी मम्मी"........इस आवाज़ को सुन वो औरत सामने खड़े उस लड़के को पुकारते देखती है
लड़का उसे इशारे से आने की बात कहता है..फिर अपना गमछा पास से उठाके अपना पसीने से गीला चेहरा और हाथ पोंछते हुए खेतो के बीच से बाहर निकलते हुए मचान की तरफ आता है....
लड़का अपनी धोती को ठीक करता हुआ जैसे अपने उभरे हुए लंड को धोती के उपर से ही खुजा रहा था...इस बीच उसने मज़बूती से अपने
लंड को धोती के उपर से ही दबाना शुरू किया और फिर जब औरत के तरफ आया तो एक दम से अपना हाथ अपने धोती से हटा लिया...
औरत हूबहू दिखने में अंजुम थी...उसने एक बार पलटके लड़के की ओर देखा और मुस्कुराते हुए उसे बैठने को बोली....लड़का अपने साथ एक पोटली लाया हुआ था उसे खोलते हुए उसने कुछ रोटिया और सब्ज़िया निकाली....लड़का उसका बेटा था और वो हूबहू जैसे आदम ही था....
"अरे बेटा अर्जुन तूने खाना अब तक क्यूँ ना खाया?".......
"हमको पता था माँ कि तुम आओगी इसलिए हम तुम्हारा ही इन्तिजार में बैठे हुए थे"........
."अरे पगले अगर हमे देरी हो जाती तो .......
."हम जानते है तू देरी नही करती और हम ये भी जानते है कि तेरे गले से एक नीवाला भी मुझे खिलाए बगैर नही जाता"........दोनो माँ-बेटे जैसे एकदुसरे को देखके मुस्कुराए
अर्जुन की नज़र अपनी माँ की लपेटी हुई उस पसीने पसीने साड़ी पे पड़ी जिससे उसकी माँ की छातियो का उभार और निपल्स सॉफ दिख रहे थे....जब बेटे को माँ ने नीवाला दिया तो उसके नज़रों का पीछा करते हुए उसे अहसास हुआ कि बेटा उसके छातियो को घूर्र रहा है...उसने झिझकते हुए अपने साड़ी से जैसे और कस कर छातियो को लपेट लिया....
"बेटा ले खा लेना क्या घूर्र घूर्र के देख रहा है??".......अर्जुन जैसे सकपकाया..उसने नज़रें झुका ली
"क...कुछ नही"......माँ जैसे मन ही मन मुस्कुरा पड़ी
अर्जुन : माँ तू इतना दूर गाओं से यहाँ आती है सिर्फ़ हमरे खाने के लिए तू जानती भी है कि गाओं का माहौल कितना खराब है? तू जवान औरत है और अधिखतर गाओं के मर्द तुझे घुरते है आगे से भी और पीछे से भी
अर्जुन के ऐसा कहने पे माँ शरमाई नही बल्कि उसे जैसे सुनके अच्छा ना लगा...."अब हम का करे बिटवा? जिस औरत का मर्द स्वरगवास सिद्धार ले उसके पीछे तो आने मर्द ऐसे ही पड़ते रहते है ये तो इस गाओं की रीत जैसे चली आ रही है"..........माँ ने उदासी सा मुँह बनाया
अर्जुन : मेरी प्यारी माँ तू उदास काहे होती है अगर तुझे कोई इस निगाहो से देखे तो हम उसकी आँखे ना नोच ले (माँ के चेहरे को सहलाते हुए)
माँ : हम जानते है तू हमरी बहुत परवाह करता है....पर लोग ज़ालिम है हम माँ-बेटों पे भी जैसे शक़ करते है उस दिन तू नदी में डुबकी लगा रहा था तो हमरे साथ जो औरातिया थी वो मज़ाक करते हुए हमको क्या बोली पता है? कहती है कि भर जवान बेटा घर में पाली हुई हो बहू ना लाने के बजाय खुद जवान बैठी हुई हो
आदम जैसे हंस पड़ा.....माँ भी मुस्कुरा पड़ी...."हम जानते है माँ हमपर ये गाओं तरह तरह का लांक्षन लगाता है....अब क्या करे? इसी में तो हमे जीना है ये खेत ये गाओं ही तो हमारा सबकुछ है..पिता जी का तो साया जबसे सर से उठ गया है तबसे तू और मैं ऐसे ही तो बस खुद में जीवन व्यतीत कर रहे है..."....एक पल को माँ अपने बेटे अर्जुन की तरफ मुस्कुराइ देखने लगी
माँ : तू अगर ना होता तो हमारा क्या होता? आज तू है तो हमे अपने इज़्ज़त का कोई भय नही वरना मुखिया जो है गाओं का तू तो जानता है वो कितना गिरा हुआ नीच आदमी है गाओं की किसी भी औरत को वो नही बखसता बस तू किसी तरह से पैसे इकट्ठा कर तो हम किसी और
राज्य में जा पाए
अर्जुन : हां माँ मैं ऐसा ही करूँगा
इस बीच अर्जुन उठके मुँह हाथ धोने के लिए उठा...तो माँ ने पास रखे लोटे से उसके हाथ को धुल्वा दिया फिर अपने साड़ी के आँचल से
उसके हाथ और फिर मुँह को पोंच्छा....अर्जुन ने भी लोटे के पानी से माँ के मुँह को धोया....उन दोनो का प्यार जैसे अटूट था....
अर्जुन अपनी माँ अरुणा के साथ गाओं में ज़िंदगी बसर कर रहा था....कहने को पिता का दिया खेत और छत था....लेकिन उस छत और उस खेत पर मुखिया की नज़र थी जिससे किसी ज़माने में अर्जुन के पिता ने उधार लिया हुआ था....मुखिया को पता था कि जब तक अरुणा के साथ उसका बेटा अर्जुन है तब तक उसके पास फटकने के भी उसकी हिम्मत नही क्यूंकी अर्जुन से गाओं का हर मर्द घबराता था....एक बार
उसकी माँ अरुणा ऐसे ही दोपहरी में खेत आ रही थी जब गाओं के हरामी मदिरा पिए हुए मर्दो ने उसका रास्ता रोका...लेकिन वो उसके आबरू पे हाथ डाल ही पाते कि अर्जुन ने आके उन चारो को छटी का दूध याद दिला दिया...तबसे लेके आजतक किसी का साहस ना हुआ की अर्जुन के घर की औरत अरुणा को कोई छेड़ दे....
अर्जुन अपनी माँ अरुणा सा अटूट प्यार करता था....उसने अपनी माँ की झोली में जैसे सारी खुशिया लाके दी थी....उसकी माँ और वो उस ग़रीबी हालत में अपना जीवन गुज़र कर रहे थे.....अर्जुन भर जवान लड़का था.....और उसकी माँ अरुणा भी 38 वर्षीए हो गयी थी....जब पति ज़िंदा था तो उसे काफ़ी दुख उठाने पड़े...लेकिन जब से अर्जुन ने होश संभाला तबसे वो अरुणा से दूर दूर रहने लगा...यही वजह थी कि
बढती मदिरा की लत और उधारी ने उसे अपनी बीवी और बेटे से अलग कर दिया....कुछ ही दिन बाद उनका देहांत हो गया और फिर अर्जुन ही पूरे खेत को संभालने लगा....उसने पिता की उधारी को पाई पाई करके लौटा दिया....
माँ अरुणा के साथ रहते रहते उसने कभी किसी गैर लड़की को आँख उठाके भी ना देखा था हालाकी उसके बदन पे सिर्फ़ उसके कमर से टाँगो तक सिर्फ़ एक सफेद धोती ही बँधी हुई होती थी...और वो कुछ नही पहनता था....गाओं की लड़किया उसे काफ़ी घूर्रती थी पर वो किसी को भाव नही देता था....वो तो जब खेत से थका हारा घर लौटता था तो उसे तो सिर्फ़ अपनी माँ ही पे ध्यान एकत्रित रहता था....वो उसके बदन को लिपटी साड़ी में जैसे हरपल घूर्रता रहता था....अरुणा इस बात को समझ सकती थी...वो विधवा होने के इतने दिनो बाद भी जैसे अपने
दिल को काबू किए हुई थी...उसके अंदर भी तंन की गर्मी जैसे ज्वाला बनके निकलना चाह रही थी...लेकिन उसे किसी भी पुरुष की तरफ
कोई लगाव नही था...एक तो विधवा होने से सबने उससे किनारा कर लिया था और दूसरी ओर बदनामी का डर उसे हरपल सताए रहता था...
लेकिन धीरे धीरे बेटे की नियत में बदलाव देखते हुए वो समझ रही थी कि उसका बेटा अब जवान हो चुका है...उसने बेटे की धोती को कयि बार उतरते वक़्त उसके मोटे लंबे झूलते लिंग को देखा भी था....पर वो उसका बेटा था जिसकी वजह से वो खुद को जैसे कोस्ती थी...
लेकिन बेटे के अंदर की ज्वाला उससे कहीं ज़्यादा उठ रही थी और उसने अपनी माँ अरुणा को अपने दिल की हसरत बना लिया था....माँ विधवा होने के बाद भी आज इतने सालो बाद भी कितनी जवान और सुंदर दिखती थी..मिट्टी का घर था इसलिए बीच में परदा डाले जब वो
नहाया करती थी...तो उस वक़्त बेटा अपनी माँ को चोर नज़रों से झाँकके देखता था वो उसे केयी बार नंगा नहाते वक़्त देख चुका था इसलिए उसके दिल की हसरतें काई ज़्यादा उसपर हावी हो रही थी...
उस दिन सुबह 5 बजे का वक़्त था.....गीली साड़ी को जैसे अपने बदन से अलग करते हुए अरुणा भर भर मटके का पानी अपने बदन पे
उडेल रही थी....इतने में मोमबत्ती की रोशनी में बेटे ने देखा कि माँ परदा किए नहा रही है पर्दे से ही उसकी नगन परछाई बेटे की तरफ थी जो की परछाई में उसके छातियो को घूर्र घूर्र के देख रहा था....
अर्जुन ने दबे पाओ जैसे तैसे पर्दे के आड़े अपना सर अंदर की ओर किया...तो देखा कि उसकी माँ एकदम मदरजात नंगी भीगे बदन नहा रही थी....वो अपनी बगलो पे हाथ मलते हुए अपने झान्टेदार चूत में भी जैसे हाथ घुसा रही थी...अर्जुन ये सब देखके अपने धोती के उपर से
ही अपने लंड को दबाने लगा.....अरुणा हमेशा की तरह उसके सोते वक़्त वो इसी बेला (वक़्त) नहाया करती थी...
एक पल में जैसे ही वो एकदम से अपने बेटे को खुद को घुरते हुए पाई तो चिल्ला उठी....
.अर्जुन ने आगे बढ़के माँ के मुँह पे हाथ रखा और उसे चुप किया माँ ने उसे पीछे धकेला और कस कर उसके चेहरे पे थप्पड़ मारा
"तुझे शरम नही है अपनी माँ को ऐसे देख रहा है"............अर्जुन की आँखो से आँसू जैसे बह निकले वो उठा और पर्दे से बाहर निकल गया....
उसी वक़्त अर्जुन खेत चला गया....अरुणा को बाद में अपनी ग़लती का अहसास हुआ लेकिन उसे ये भी लगा कि वो उसका सगा बेटा है . वो अपनी माँ को ऐसी नंगी क्यूँ नहाते वक़्त देख रहा था? एक पल को उसे लगा कि शायद जवान लड़का है कदम तो उसके भी बहेक रहे है.....सुबह का निकला बेटा अभी तक घर लौट कर नही आया था....उसने आज फिर पोटली बाँधी और उसकी चिंता करते हुए खेत पर पहुँची
जहाँ खेत में हल ज़ोर ज़ोर से चलाते हुए जैसे चुपचाप कठोर बना अर्जुन काम किए जा रहा था...माँ ने दूर से ही उसे कयि बार आवाज़ दी पर उसने पीछे मूड कर भी ना देखा....अरुणा को चिंता हुई और वो मचान की तरफ लौटी की शायद बेटा आए...पर वो नही आया वो काम करते ही रहा...
जब अरुणा से सवर् ना हो सका तो वो खेतो पे चलते हुए बेटे के पास आई और कस कर उसे पकड़ा..."क्या कर रहा है तू? ना सुबह कुछ खाया ना दोपहर का भोजन किया आख़िर मैं पूछती हूँ ये कैसा क्रोध है तेरा?"........
..अर्जुन जैसे मुँह फैरे मांयुसी से कुल्हाड़ी वहीं फ़ैक् मचान के पास आया
"देख बाबू अगर तू ऐसे ही मुझसे नाराज़ रहेगा तो मैं मर जाउन्गी"......जैसे अरुणा ने ज़ज़्बाती होते हुए कहा
"ना माँ हमे कुछ भी हो जाए पर ग़लती से भी ये बात तू अपने मुँह से निकाल ना हम शर्मिंदा है कि आज हमने जो हरकत तेरे साथ की शायद हम खुद पे काबू ना कर सके कयि दिनो से हमारे अंदर तेरे प्रति अज़ीब अज़ीब विचार पनप रहे थे उनके चलते आज हमने".........एका एक अर्जुन ने जैसे माँ को ब्यान देते हुए कहा
अरुणा कुछ देर खड़ी बेटे की बातों को सुनती रही फिर उसने उसके दोनो कंधो को थामा...."देख अर्जुन तू मेरी औलाद है और तू ग़लत कभी हो नही सकता पर तुझे ऐसे विचार कैसे आने लगे? तू जानता है कि ये घोर पाप है"............
."हम जानते है माँ लेकिन हम तुझसे मुहब्बत करने लगे है तेरे बिना एक पल भी जी नही पाते और तो और ना जाने क्यूँ तेरी तरफ आकर्षित हो रहे है"........
."अर्जुन्न हम तेरी माँ है हम जैसी बुढ़िया में तुझे कैसी दिलचस्पी? ये हसरत नही ये वासना है अर्जुन".........
"हम खाना नही खाएँगे तू जा".....
."बेटा गुस्सा थूक डाल".........
."तू जा माँ"...........
."बेटा मेरे खातिर अच्छा ठीक है हम्का मांफ कर जो हम तुझसे ऐसे पेश आए".........एक पल को अर्जुन खामोश हो गया और वहीं वक़्त था
जब अरुणा को एक झटके में जैसे अपनी बाहों की गिरफ़्त में लिए लिपटाया
अरुणा की छातिया बेटे के जैसे सीने से दब गयी..उसने माँ को बड़ी मज़बूती से गले लगाए रखा....अरुणा रोती हुई जैसे उसके कान को चूमते हुए ऐसा महसूस कर रही थी जैसे वो अपने बेटे के नही बल्कि किसी ऐसे मर्द की बाहों में लिपटी हो जो उससे बेपनाह प्यार करता
है....अरुणा को ये सब शुरू शुरू में ठीक ना लगा उसने बेटे का दिल रखने के लिए उसे कुछ ना मालूम चलने दिया....उसने बेटे को अपने
बदन से अलग किया और उसे बिठा कर अपने हाथो से खिलाने लगी....
दोनो शाम तक वापिस घर पहुचे....लालटेन की रोशनी फूकते हुए साया को ठीक किए अरुणा बेटे के बगल में जैसे उससे थोड़ा फ़ासले दूर लेट गयी....वो जैसे कशमकश के घेरॉन में थी..कि अचानक उसके बेटे का हाथ उसे अपनी नाभि में महसूस हुआ...इस अहसास से ही वो सिहर उठी....
उसने एक बार अर्जुन की तरफ देखा अंधेरे में वो जगा हुआ था ये मालूम नही चला उसे....एक पल को अरुणा ने हाथ हटाया फिर दूसरे ही पल वो हाथ धीरे धीरे सरकते हुए उसके ब्लाउज के उपर छातियो के उभार पे जैसे आ गया....अरुणा चाहती थी तो उसके हाथ को दूर झटक देती लेकिन उस वक़्त उसके दिल में ना जाने कैसा तूफान चल रहा था? वो तूफान जो एक अकेली औरत के दिलो में चलता है जिस वक़्त वो
बेसहारा किसी के साथ को पाने में होती है....उस वक़्त उसे किसी की ज़रूरत होती है? ना जाने क्यूँ दिल बार बार उसके ज़मीर को
झिंजोड़ते हुए कह रहा था की बदल जा अरुणा बदल जा छोड़ दे अपनी ज़िद्द और अपनी खुशी भरी एक ज़िंदगी बिता.....ये मर्यादा लाँघ दे अब तू....
अरुणा जैसे खामोशी से लेटी हुई थी और ठीक उसी पल साया के अंदर जैसे हाथ घुस्सने लगा....तो अरुणा ने कस कर बेटे के हाथ को पकड़ लिया....उसने एक बार बेटे की तरफ पलटके देखा...अर्जुन जगा हुआ था उसने उठते ही लालटेन की रोशनी को धीमा किया और उसे जलाए सिरहने में छोड़ दिया अब दोनो एकदुसरे को स्पष्ट रूप से देख पा रहे थे....
अरुणा : बेटा ये ग़लत! (अर्जुन ने माँ के होंठो पे उंगली रखी)
अर्जुन : माँ मुझे मालूम है कि मैं तेरा बेटा हूँ और हमारे बीच एक हद है लेकिन माँ मेरा मुहब्बत उन हदों को पार करना चाह रहा है हम
जानते है की गावंवालो की बदनामी का तुझे डर है पर ना जाने क्यूँ माँ? मैं अपनी पूरी ज़िंदगी तेरे नाम करना चाहता हूँ सिर्फ़ तेरे नाम
अरुणा : तू मेरा खून है अर्जुन भला तू मुझ जैसी विधवा के लिए अपनी ज़िंदगी क्यूँ बर्बाद करना चाह रहा है? (एका एक अरुणा की आँखो मे
आँसू घुल गये)
अर्जुन : माँ सबने तेरा साथ छोड़ दिया तुझे पति से कभी प्यार ना मिला पिताजी तो वैसे भी सिर्फ़ तुझे हवस की निगाहो से ही देखते आए
लेकिन माँ मैं वचन देता हूँ इस जनम में तो क्या मैं हर जनम में तेरा ही रहूँगा सिर्फ़ तेरा
अरुणा खुद के ज़ज़्बातो पे काबू ना कर पाई और वो कस कर बेटे से लिपट गयी...दोनो कुछ देर तक जैसे ज़ज़्बातो में डूबे रहे....फिर जब एकदुसरे से अलग हुए तो अर्जुन की आँखें एकदम सख़्त गुलाब थी अरुणा एकदम खामोशी से उसे घुर्रें जा रही थी....अर्जुन ने हाथ बढ़ाते हुए उसके साया को उसके बदन से अलग करना चाहा लेकिन अरुणा ने एक आखरी बार बेटे को ना करने की कोशिश की अर्जुन ने उसके हाथ को दूसरे हाथ से हटाते हुए धीरे धीरे साड़ी उसके बदन से जैसे अलग कर दी....
अरुणा का नंगा बदन जैसे अर्जुन के आँखो में सवार हो गया....अर्जुन ने अपनी धोती को खोल कर उतार दिया एक झटके में...और फिर माँ की झान्टेदर चूत पे हाथ रखते हुए उसके दोनो टाँग फैला दिए....अरुणा जानती थी कि अब क्या होने वाला है? वो उसी पल ज़ोर से चीख उठी....तो अर्जुन ने उसे कस कर अपने आलिंगन में जकड लिया..अर्जुन को माँ की चूत की सख्ती का पूरा पूरा अहसास हुआ....
माँ अरुणा उसके कुल्हो पे अपनी जांघों को रगड़ते हुए उसके दोनो तरफ अपनी टांगे फँसा चुकी थी..अर्जुन कस्स कस कर चूत के अंदर बाहर लंड को किए कुल्हो में जैसे ताक़त भरे उसे चोद रहा था..."सस्स हह आहह आहह"......लज़्ज़त से अरुणा ने आँखे मूंद ली उसे ये अहसास कभी मिला नही था इसके लिए दिन रात उसके पति से उसका झगड़ा होता आया था....आज अपने सगे बेटे से चुदते हुए उसे जैसे वो लज़्ज़त वो मज़ा मिल रहा था...
अर्जुन : माँ तेरा भीतरी क्षेत्र कितना सख़्त है उफ़फ्फ़ सस्स ऐसा लग रहा है जैसे हमरा छिल गया (अरुणा के उपर नीचे होते हुए)
अरुणा क्को कहने का मौका भी ना मिला और उसके बेटे के होंठ उसके तपते सूखे होंठो से जैसे जुड़ गये..दोनो ने आँखे मूंद ली और एकदुसरे को पागलो की तरह एकदुसरे के मुँह में जीब डाले एकदुसरे को किस करने लगे....थूक की आवाज़ जैसे दोनो के जुड़े मुँह के भीतर से बाहर सुनाई दे रही थी...
लालटेन की रोशनी फीकी पड़ती जा रही थी और इधर अर्जुन तबीयत से अपनी माँ की चुदाई लगातार करता जा रहा था....उसके बाद जैसे उसका शरीर आकड़ा सा हो
अर्जुन : आहह उम्म्म सस्स आहह म्म्माम ओह्ह्ह माँ ससस्स (धक्के तेज़ करते हुए जैसे वो चुचियो को चूसने लगा और उपर नीचे जल्दी जल्दी होने लगा अरुणा के जिस्म से रगड़ते हुए)
अरुणा को अहसास हुआ तो उसने लंड को अपने भीतर सख्ती से कस्स लिया तो अर्जुन दहाड़ उठा और वो अकड़ता हुआ जैसे अपनी माँ पे ढेर हो गया उसकी छातियो पे अपना सर रखके हाफने लगा....अरुणा उसके पसीने पसीने बदन पे हाथ फेरते हुए उसे कस कर अपने से
लिपटाये हुई थी....उसे अपने भीतर प्रथम बार बेटे के गरम वीर्य का अहसास हुआ
उसने चूत से तब तक लंड ना बाहर खींचा जब तक चूत की गहराईयो में उसका बीज पूरा ना चला गया...फिर उसने चूत की सख्ती से ही बेटे के लंड को निचोड़ते हुए उसे बाहर अपनी गुप्तांगो से खीचा....पुकच्छ की आवाज़ आई और उसी पल बेटे को अपने से दूर धकेलते हुए अरुणा हाफने लगी....उसे अहसास हुआ कि उसकी चूत से बेटे का रस लबालब निकल रहा है....उस रात अरुणा सोई नही उसने अपने गुप्तांगो को
सॉफ किया फिर पेशाब किए उठी और सारी रात बस बैठी बैठी बेटे की तरफ घूरते हुए उसे पंखा करती रही....वो ऐसी कशमकश में घिरी
हुई थी की उसे मालूम ही ना चला ये सब अचानक कैसे हो गया? उसके मन ने चाहा बेटे कि ये सिर्फ़ वासना है पर वो जानती थी अगर वो
वासना भी थी तो उसे वो स्वीकार है क्यूंकी उसका बेटा दिलो जान से चाहता था
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ये तो जैसे सिर्फ़ हर रात की ही नही..हर दिन की बात हो....धीरे धीरे प्यार की हसरत अर्जुन की इतनी हद तक बढ़ गयी थी कि उसने माँ के साथ खेतों में भी अपनी शहवत पूरी की....उस रात के बाद से दोनो अर्जुन और अरुणा का प्यार जैसे और भी गहरा होता चला गया.....दोनो
के बीच किसी भी किसम की दूरिया ना रही....रात भर थका हारा जब खेतों से गाओं जब अर्जुन लौटता तो माँ उसे रात्रि भोजन देती उसके बाद मुँह हाथ धोके जब वो बिस्तर पे आता....
तो दरवाजे को लगाते हुए नंगी खड़ी अरुणा को देखता....हर रात दोनो की कुछ इस कदर ही कंटति थी....अब तो जैसे अर्जुन ने कसम खा ली थी कि वो माँ के बिना कभी किसी की तरफ आख उठाके भी ना देखेगा वो अपनी माँ अरुणा को महेज़ अपनी माँ नही बल्कि अपनी बीवी समझने लगा था उसी की तरह उस पर हक़ जताता रहता था....दोनो माँ-बेटे सबसे दूर ऐसे ही अपनी ज़िंदगी काट रहे थे....लेकिन जैसे इस व्यभाचरी रिश्ते को नज़र लगने वाली थी....
मुखिया रामसिंघ की बेटी तपोती अर्जुन को केयी बार खेतों में और गाओं में गुज़रते देखी थी...और उसे दिल ही दिल चाह बैठी थी वो उसके कसरती बदन और धोती के भीतर के उस औज़ार को जैसे हमेशा देखने के लिए तरसती थी..वो कच्ची उमर से भर जवान हो रही थी लेकिन
ज़िद्द उसकी वैसी की वैसी थी...जिसे पाना चाहे उसके पा के ही दम ले....
मुखिया रामसिंघ को उसके कयि रिश्ते आने लगे थे...लेकिन वो हर रिश्ता ठुकरा देती पिता नाराज़ ज़रूर होता लेकिन कुछ कर नही पाता....क्यूंकी बेटी की ज़िद्द के आगे जैसे वो उसका गुलाम था..रोज़ मटका भरने बहाने से नहेर जाती थी और वहीं से सीधा अपने पिता जी के
खेत की ओर जाते वक़्त ठहराती और अर्जुन को घूर्रती....पायल की छान्न छानन्न आवाज़ को अर्जुन हमेशा सुनता तो रास्ते से गुज़रती खुद की
तरफ मुस्कुराती तपोती को घूर्रता पाता..लेकिन उसने कभी पहेल ना की...उसे उसमें रत्तिभर का जैसा दिलचस्पी ना था..
एक दिन खेत से घर लौट रहा था...अर्जुन और ठीक उसी पल मचान पैड की टहनियो पे बैठी तपोती ने उसे गुज़रते हुए पाया तो चिल्लाते हुए जैसे गिरने का नाटक करने लगी....अर्जुन की उस पर जैसे नज़र पड़ी तो उसने लगभग गिरती तपोती को अपने मज़बूत बाहों में जैसे थाम लिया...और उसे घुरते हुए जल्दी से उतार भी दिया
अर्जुन : ये सब क्या हरकत है तपोती?
तपोती : हरकत नही है प्यार है
अर्जुन : क्या प्यार? तुम्हारा दिमाग़ तो ठीक है
तपोती : हमरा दिमाग़ तो ठीक ना ही जबसे तुझको देखे है बस इस दिल में तुझे ही जैसे समाए हुए है
अर्जुन : देख तपोती मुझे ये सब खिलवाड़ कभी नही पसंद आता....और ना ही मुझे तुझसे कोई प्यार व्यार करना हम्का जाने दे
तपोती ने अर्जुन का रास्ता रोका...."अगर हम ना जाने दे तो तू क्या करेगा?".......
."देख तपोती तोरे पिता को अगर मालूम चल गवा कि तू हमरे साथ ई प्यार का खेल खेल रही है तो हम्का जान से मार देगा उई वैसा भी हमरे परिवार से नफ़रत करता है"...........
."देख अर्जुंँ हमे तू ही पसंद और ये खेल नही हमारा प्यार है जब तक तू ना हमसे शादी के लिए हां कहेगा तब तक हम यूँ ही तेरा रास्ता रोके रहेंगे"........अर्जुन ने जैसे उसे धकेल दिया और वहाँ से चला गया..
तपोती गुस्से में तिलमिलाए वहीं गिरी रह गयी...
तपोती देखने में 22 वर्ष की थी और हूबहू जैसे चंपा थी....उसके इरादे दिन पे दिन जैसे अर्जुन के ज़िंदगी में तूफान लाने को इच्छुक थे....उसकी माँ ये सब गौर किए उसके पिता को बता देती है....तो उसके पिता बेटी को गुस्से से झाड़ते है लेकिन बेटी का दिल तो जैसे अर्जुन पे ही टीका हुआ था....
मुखिया रामसिंग : हरगिज़ नही वो लड़का हमारे घर का दामाद हर गिज़ नही बन सकता कह रहे है तुझको
तपोती : ठीक है अगर नही बना सकते तो हमे जान से मार दीजिए
मुखिया : तपोती ये कैसी ज़िद्द है तोरी? कह दिया ना तो बस कह दिए वो दो कौड़ी का जिसका पिता हमसे उधारी लेता हुआ आया उसके घर
हम तुझे ब्याह दे हरगिज़ नही नाक कट जाएगी हमरी
तपोती : तो ठीक है हम भी किसी से शादी ना करेंगे और यही ज़िद्द है हमरी या तो वो या तो कोई नही
तपोती अनसुना किए जैसे अपने कमरे का दरवाजा लगाए बंद हो गयी.....चिंतित मुखिया सोच में पड़ गया....उस रात शराब की घुट लगाता हुआ वो अपनी बेटी के लिए सोचता रहा....फिर ना जाने क्यूँ उसके मन में ये ख्याल आया? कि अगर अर्जुन की वो अपनी बेटी से शादी करवा देता है तो उसका घर और वो खेत वो दोनो उसका हो जाएगा....एक पल को उसकी निगाह में शैतानी सोच उमड़ी उसने एक बार उसकी
बेवा माँ अरुणा का ख्याल किया फिर जैसे उसके अंदर की वासना भड़क उठी दिखने में जवान खूबसूरत गाओं की सबसे सुंदर महिला थी
अरुणा जिसपे हर मर्द मरता था...लेकिन उसके इज़्ज़तदार और विधवा होने से सबने किनारा कर रखा था....
बेटी की ज़िद्द के आगे जैसे मुखिया रामसिंग ने हार मान ली थी....पर उसने अपने मन से भी कुछ ऐसा इरादा कर लिया था जिससे वो अर्जुन का सबकुछ उससे छीन लेना चाहता था...उस दिन अर्जुन उसके घर के द्वार पे खड़ा उसके मेज़ पर पैसो का बंड्ल रख देता है
अर्जुन : ये हमरे पिता जी का कर्ज़ा सूद समित आज हम आपको चुका दे रहे है काका जो पिता जी ने आपसे उधारी ली वो इस आखरी कीमत के साथ चुकता होती है
मुखिया : ह्म्म्म्म देखो अर्जुन हम जानत है कि तू बड़ा मेहनती लड़का है तूने दिन रात एक करके खेतो में काम कर करके इन पैसो को जुटाया और अपने घर के दामन में बेज़्ज़ती के दाग को पोछ भी दिया लेकिन हम तुझसे कुछ और भी चाहते है कि जो तू दे सके
अर्जुन : क्या मतलब काका?
मुखिया : हम चाहते है कि हम अपनी बेटी तुझसे ब्याह दे काफ़ी सोच के हम ये फ़ैसला ले रहे है क्यूंकी तेरे पास तो सिर्फ़ खेत है और तेरे पास मेरी बेटी को देने के लए कुछ नही और उसकी ज़िद्द है की वो तुझसे ही ब्याह रचाए
अर्जुन ने जैसे गुस्से में आग बाबूला होके मुखिया की तरफ देखा....उसने एक बार ऊपर खड़ी आँगन से झाँक रही तपोती की ओर गौर
किया....
"तुझे हम दौलतमंद कर देंगे अगर तू ये प्रस्ताव लेता है तो"..........
."हरगिज़ नही"..........एकदम से जैसे मुखिया रामसिंग को झटका लगा
मुखिया : क्या कहा? (खड़े होते हुए)
अर्जुन : हमने कहा हरगिज़ नही...ईया खेत और घर ही हमारी दौलत है और हमे आपसे कुछ नही चाही ना आपकी बेटी ना आपकी दौलत अपने पास रखिए
मुखिया : अर्जुन तुझे पता है तू किससे इतनी ऊँची आवाज़ में बात कर रहा है ग्यात भी है तुझे
अर्जुन : पूरा ग्यात है काका कि आपकी वजह से मेरी माँ विधवा हुई आपने मेरे पिता जी को ना सिर्फ़ नशाखोर बनाया बल्कि उससे उसका हंसता खेलता परिवार भी छीन लिया कम उमर से ही खेत संभालते मैं आया और अपने भविश्य को कुचल दिया मेरे पिता ने सिर्फ़ आपकी वजह से और आप चाहते है मैं इस घर के रिश्ता जोड़ू हरगिज़ नही