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Incest माँ को पाने की हसरत

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मुखिया को हुई ये बेज़्ज़ती ना भाई उसने अर्जुन को उंगली दिखा कर जैसे कहा की ये उसने भूल की जो उसके घर में आके उसकी बेज़्ज़ती की उसने.....

अर्जुन ने कुछ ना कहा और उसने बिना पीछे मूड कर देखे वहाँ से चला गया...

उस दिन मुखिया को बड़ा गुस्सा आया अपने घर में हुई सरेआम बेज़्ज़ती को वो झेल नही पा रहा था उसने निश्चय कर लिया कि वो अर्जुन से उसका सबकुछ छीन कर ही रहेगा यहाँ तक कि उसकी माँ अरुणा को भी

उधर लड़ाई के बावजूद तपोती अर्जुन के खेत आके उससे जैसे बात करना चाहती थी...लेकिन वो उसे भाव तक ना देता था...उसे बेहद बुरा लगा था और उसे अपना ज़िद्द चकना चूर होता दिख रहा था.....उसने धीरे धीरे खेतों मे आकर अर्जुन माँ अरुणा से आगे आगे बात चीत करना शुरू कर दिया.....

अरुणा उसे कुछ नही बोलती थी बल्कि उसे बेटी की तरह प्यार करती थी उसने बेटे को समझाया भी कि वो तपोती से ऐसे ना पेश आया करे...लेकिन अर्जुन ने सॉफ इनकार कर दिया उसने बताया कि उसके पिता का उसे हर पल ख़ौफ़ सताए रहता है कि कब उसे कोई मौका मिले और वो हमसे हमारा सबकुछ छीन ले...अरुणा को मालूम था कि तपोती के पिता का उस पर जैसे नज़र था.....

हर दिन की तरह उस दिन भी अर्जुन खेतो से घर आ रहा था...अपना मुँह हाथ धोए जैसे वो पलटा उसने तपोती को आते पाया...तपोती उसके

पास आके उसे फिर टोकने लगी.....

अर्जुन : देख तपोती तुझे यहाँ नही बार बार आना चाहिए तेरे पिता जी को मालूम चल गया तो तुझे खूब मारेंगे

तपोती : देख अर्जुन तू चाहे मुझसे जितना भी दूर हो जाए मैं तुझे खुद से दूर नही कर पाती मैं चाहती हूँ कि तू मुझे अपनी बना ले

अर्जुन : जो संभव नही उसकी बात क्यूँ करती है? जा यहाँ से मेरे दिल में तेरे प्यार के लिए कोई जगह नही मेरे दिल में मेरे ख्यालो में मेरे

ज़िंदगी में सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी माँ का वजूद है जिसके लिए मैं साँसें लेता हूँ

तपोती : देख अर्जुन बहुत ज़्यादा हो रहा है तेरा तू मान जा वरना

अर्जुन : वरना क्या कर लेगी ?

तपोती ने जाते अर्जुन को एकदम से कस कर अपने आगोश में जकड़ा और अर्जुन उसे छुड़ाने अपने बदन से दूर करने लगा...."हट तपोती ये क्या कर रही है तू? छोड़ हम्का छोड़ सस्स छोड़ उम्म्म"......

.तपोती ने कस कर जैसे अर्जुन के होंठो को कस कर चूसना शुरू कर ईदया उसने कस्स कस कर अर्जुन के होंठो से होंठ जोड़े उसके होंठो को बहुत बेतरतीब ढंग से चुस्सा...तो एक पल को तपोती को कस कर अर्जुन ने अपने से दूर धकेलके उसे गिरा दिया और हान्फ्ते हुए हैरत से उसे देखने लगा

 
तपोती अपने होंठ पे लगे थूक को पोंछते हुए मुस्कुराइ...उसने अपनी एक टाँग पत्थरो पे रखा और दूसरे हाथ से अपना ल़हेंगा झट से उपर

उठाया....अर्जुन की नज़र उसकी चिकनी साँवली सी चूत पे गयी जिसपर एक भी बाल नही था....

तपोती : अर्जुन हम तुझे पाने के लिए कुछ भी कर सकते है आ अर्जुन हमरे पास आ

अर्जुन के जैसे पैर वहीं ठहर गये और उसे सोचने का वक़्त भी ना मिला....कि तपोती ने उसकी धोती के उपर से ही उसके मोटे लंड को कस कर अपने मुट्ठी में ले लिया..और उसे कस्स के आगे पीछे हिलाने लगी....अर्जुन जैसे अपनी वासना पे काबू नही कर पा रहा था एक पल को

वो कशमकश के घेरे में जैसे चला गया उस वक़्त उसे अरुणा का ज़रा सा भी ख्याल ना आया उसने चाह कर उसे अपने से दूर करना चाहा

पर उसे दर्द उठने लगा क्यूंकी तपोती उसकी धोती को कबका उतारे उसके लंड को अपने हाथो में लेके कस कर कस कर भीच रही थी...

तपोती : हाए दायया इतना मोटा लंबा कैसे हो गया? शायद खेतो में हल् चलते चलते तूने औरत की खेती पे चलाने के लिए ये हल जैसे छोड़ रखा है ? (लंड को मुत्ठियाते हुए)

अर्जुन ने उसके दोनो कंधो को कस कर जकड़ा पर चाह कर भी इतना बलशाली होने के बावजूद उससे अपने से दूर ना कर सका....तपोती ने इस बीच अपने तपते होंठ जैसे अर्जुन के होंठो पे रख दिए..वो उसके मुँह में अपनी जीब डालके चलाने लगती है....अर्जुन इससे बदहवास हो जाता है...

उसका लंड जो रह रहके तपोती के मज़बूत हाथो की पकड़ में दर्द कर रहा था उसे...एक बार फिर जैसे और सख़्त हो जाता है...इसी बीच तपोती उसे कस कर भीच देती है तो एक कर्राहट सी आवाज़ आदम के मुँह से निकलती है...

"हाए सस्स मज़ा आवत रहा है अर्जुन बाबू अफ"........तपोती शरारत भरी हँसी देते हुए लंड को आगे पीछे मुत्ठियाए उसकी तरफ देखती है जो आँखे मुन्दे इधर उधर नज़र जैसे फेर रहा है...

जल्द ही तपोती उसे धकेल देती है...जिससे अर्जुन तुरंत ज़मीन पे गिर पड़ता है....तपोती उसकी टाँगों के बीच खड़ी हो जाती है और फिर अपना ल़हेंगे का ज़रबन खोल देती है...जिससे ल़हेंगा सीधे उसके पाओ के बीच फस जाता है....उसे पाओ से खीचके उतारते हुए वो एक ओर फ़ैक् देती है और फिर...

अर्जुन के मोटे लंबे लंड को एक हाथो से पकड़े उसके उपर जैसे अपनी चूत बिठाने की कोशिश करने लगती है......तपोती के पाओ की दोनो पायल जैसे उसके हिल डुलने से छान्न छान्न की आवाज़ निकाल रही थी...उसी बीच उसने कस कर अपनी कुल्हो को सख़्त किया और हॅगने

की मुद्रा में जैसे लंड को अपने चूत के अंदर दाखिल करते हुए उस पर बैठने लगी...

 
तपोती का चेहरा एकदम लाल और दर्द से भर गया....और उसी पल उसने अपनी गान्ड को जैसे ढीला छोड़ा...तो उसे लंड की सख्ती और

चुभन अपनी चूत के भीतर प्रवेश होते महसूस हुई...उसने कस कर दम साढ़ लिया तो अर्जुन भी जैसे दाँतों पे दाँत रख उठा...

अर्जुन को बड़े कस कर अपने लंड छिल्ने का जैसे जलन सा हुआ क्यूंकी उसे अपना लंड किसी गरम भट्टी में घुस्सते महसूस हो रहा था...."सस्स आहह"......इधर तपोती का भी बुरा हाल था वो ज़ोर से चीखी....अब तक जो कुँवारापन उसने शायद ब्याह तक के लिए बचा रखा था आज वो अर्जुन के लंड की घुसा से फॅट रहा था.....

तपोती ने होंठो को कस कर दाँतों से भीचा और काँपते हुए लिंग पे पूरा ज़ोर दिए अपने भीतर बैठ गयी...जिससे उसे एक कस कर दर्द अपने पूरे शरीर के भीतर लगा....

तपोटी : हाययएए माँाआ मररर गाइिईईई सस्स साहह उम्म्म्म (तपोती जैसे रोने रोने पे हो गयी)

हवस वासना की आग में जैसे दहेक उठी तपोती को शायद चूत के कुंवारेपन और सख्ती का मालूमत नही था...उसे तो लगा कि औरत जब

चाहे मर्द का लंड अपने अंदर लेती है और वैसी ही चुदने लगती है...जैसा वो कयि रात अपने पिता को माँ की चुदाइ करते देख चुकी थी....

दर्द से बिबिला उठी तपोती और जैसे अर्जुन पे ढेर हो गयी.....अर्जुन को उस वक़्त ऐसा लगा कि उसके लंड को तपोती की सख़्त चूत के भीतर किसी चीज़ ने कस कर जकड लिया है दरअसल तपोती ने अपनी चूत को इतना सख़्त कर लिया दर्द से कि उसने लिंग को बुरी तरीके

से जकड लिया...अर्जुन चाह कर भी ना आगे पीछे लंड को कर सकता था और ना ही चूत से लंड को एक इंच भी बाहर खीच निकाल सकता था...

तपोती की जैसे आँखो में वासना का जुनून था अर्जुन को पा लेने का जैसे दीवानापन उसने दर्द में ही अर्जुन के हाथो को खुद की चुचियो पे रखके अपने ही हाथो से उसे दबाने को कहा....."हाए सस्स अर्जुंन्ं तुम्हारा बहुत मोटा और लंबा है बहुत दर्द और तक़लीफ़ हो रही है मुझे पर तुम ठहरे किसलिए हो लगाओ धक्के सस्स दो मुझे वो मज़ा जो एक मर्द एक औरत को देता है अगर ब्याह होता तो भी तो तुम मेरे साथ यही सब करते आख़िर तुम कुछ करते क्यूँ नही? करो ना कुछ करो ना"........बार बार तपोती जैसे उल्झनो में फँसे अर्जुन की ओर देखते हुए कह रही थी....

अर्जुन ने उसके नितंबो को पीछे से कस कर दबाया और एक करारा धक्का बिना जलन की परवाह किए और गहराई तक लगाया....तपोती जैसे चिहुक उठी उसने कस कर जैसे दहाड़ लगाई पूरे खेत में जैसे उसकी चीख गूँज़ उठी....

अर्जुन ने वैसे ही दस बारह करारे धक्के उसकी चूत के अंदर बाहर करने शुरू कर दिए..."सस्स सस्स ससस्स आह अहहह उउररघ्ज्ग

आहह"......तपोती अर्जुन से कस कर लिपटी अपना कुँवारापन खोते हुए धक्को से चीख रही थी...

कुछ पल बाद अर्जुन ने उसे अपनी बाहों में भरा और उस पर जैसे सवार होते हुए उसे अपने नीचे लेटा दिया....उस वक़्त अर्जुन के दिलो दिमाग़ पे जैसे तपोती का क़ब्ज़ा था वो ना जाने कैसे तपोती से खुद को दूर ना कर सका और उसकी चुदाई का जैसे हिकच हिकच के मज़ा लेने लगा...एक पल को उसे अपनी माँ अरुणा का भी ख्याल ना आया...

तपोती को अच्छा लगा कि उसने पहेल कर ली थी...उसने अपने उपर नीचे हो रहे अर्जुन के माथे को कस कर चूमा और फिर उसके होंठ नाक और गाल को फिर उसके चेहरे को थामे उसके आँखो में फुटती वासना और दर्द को देख मुस्कुराने लगी....

 
चूत से लंड बेतरतीब ढंग से अंदर बाहर हो रहा था....लंड पे और चूत पे खून के लत्ते जैसे लगे हुए थे...तपोती की सील टूट चुकी थी उसकी

चूत का कुँवारापन अब खो चुका था...वो झड ज़रूर रही थी पर उसके ऑर्गॅज़म में खून भी निकल रहा था...

तपोती : सस्स और कर और कर्र आह आहह आहह देगी ऐसा मज़ा कोई तुझे अहहह क़िस्ससे ब्याहह करके तुझे ऐसा मज़ा मिलेगा आहह स गाओं की सब कोई तो अपनी चूत पहले ही किसी ना किसी से मरा चुकी आहह किसी ने गाओं के लड़के से किसी ने अपने मंगेतरर से तो किसी ने अपने भाई या पिता से हाहहा

जैसे तपोती चुदते हुए बड्बडा रही थी और अर्जुन उसके उपर नीचे होता हुआ जैसे उसकी बातें सुन रहा था उसे चोद भी रहा था...जब अर्जुन को अहसास हुआ कि अब वो चरम सीमा पे है उसने कस कर तपोती के होंठो से होंठ जोड़ दिए और धक्के करारे और जल्दी जल्दी लगाने लगा...

तपोती : आहह आह हहाई दायया अहाआहह आहह ह्ह बॅस कर्र आ स्स्स आहह फाड़ दी आहह स दर्द्द्द हो रहा हाीइ आहह आहह रुक

रुक्क्क जा आहह आहह कय्या हूँ रहाआ हाीइ तुझी अहह्ा आआआआआहह

अर्जुन : आहह उरर्ग्घ आआआआआआहह

अर्जुन ज़ोर से दहाड़ उठा और ठीक उसी पल वो अकड़ने लगा...तपोती को अपनी चूत के भीतर कुछ गीला गीला और गरम बहता महसूस हुआ उसने मुस्कुराया अर्जुन ने अपना बीज उसके अंदर डाल दिया था...उसने कस कर अर्जुन को अपने बदन से जैसे लिपटा लिया दोनो एकदुसरे के पाओ से पाओ रगड़ते हुए एकदुसरे से जैसे लिपट गये...दोनो के बदन पसीने पसीने हो रहे थे कच्ची मिट्टी के उपर दोनो कुछ देर वैसे ही सुस्ताते पड़े रहे....

जब अर्जुन को अहसास हुआ कि उससे क्या भूल हुई? वो एकदम से तपोती को खुद से छुड़ाए उठ खड़ा हुआ ...उसके उठने के साथ साथ उसका लिंग भी चूत की दरारो को चौड़ा किए हुए बाहर निकल आया...वो हांफता हुआ आँखे बड़ी बड़ी किए उसकी चूत से निकलते वीर्य को देख रहा था....इतने में अपनी चूत से सख़्त कोई चीज़ के निकलने के अहसास से ही तपोती को होश आया और वो जैसे उठी तो चूत के दर्द ने जैसे उसे टीस मारी वो वैसे ही गुप्तांगो पे लगे वीर्य पे हाथ से पोंछती हुई अर्जुन को हक्का बक्का खड़ा देख रही थी...

 
अर्जुन : ये तूने क्या किया? तपोती क्या किया तूने?

तपोती : क....क्या किया? प्यार किया और क्या किया?

अर्जुन : नहिी तपोती ये ठीक नही किया तूने तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे साथ ऐसी हरकत करने की तूने ये क्यूँ किया?

तपोती : मुझे यही सही लगा तू मुझसे दूर इसलिए जा रहा था तो मुझे लगा कि शायद ये सब करके तू मेरे करीब आ सकता है

अर्जुन : देख तपोती जो हुआ वो मेरी भूल और तेरी ग़लती थी मैं तुझे किसी भी हाल में अपनी पत्नी स्वीकार नही करूँगा मुझे सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना घर बार देखना है मेरी माँ अरुणा ही मेरे लिए सबकुछ है

तपोती को जैसे झटका लगा वो अर्जुन को और कुछ कह पाती...अर्जुन वहाँ से अपनी धोती लिए उसी हालत में खेत से दूर चला गया....तपोती वहीं गिरके रोने लगी....ऐसा लगा जैसे उसे धोका मिला था....

चाह कर भी अर्जुन सबकुछ भुला नही पा रहा था..उसने आज जो कुछ तपोती के साथ किया कल को उसका भरना पड़ेगा उसे ही भुगतना पड़ता....वो घर लौटा तो माँ को बिना कहे वो वहीं बैठके नहाने लगा.....अरुणा ने उससे बात करने की भी कोशिश की पर अर्जुन उस अवस्था में नही था की उसे कुछ कह पाए क्यूंकी वो काफ़ी डरा हुआ था....उसे लगा की तपोती ना जाने कही उसे बलात्कारी ना बोलके या फिर उसकी इज़्ज़त लूटी ऐसा कुछ ना कह कर उसके लिए कोई मुसीबत खड़ी करवा दे क्यूंकी उसने सॉफ इनकार किया था...

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गाओं के मुखिया रामसिंग से ये बात छुपी ना रह सकी...क्यूंकी उसी का घर का नौकर उस दिन तपोती और अर्जुन को उसके खेत में चुदाई करते हुए देख लेता है....उसे विश्वास नही होता कि तपोती अर्जुन के साथ कैसे ज़बरदस्ती कर रही थी..उसने चुदाई का हर एक लम्हा अपनी

आँखो से देखा था....वो ये सब बात मुखिया रामसिंघ को बताके जैसे मज़े लेना चाह रहा था.....उसे डर तो था पर ये बात भी वो जानता था कि तपोती अर्जुन को बेपना चाहती है...

बात सुनके रामसिंघ ने उसी पल जैसे अपने नौकर को एक थप्पड़ कस कर लगाया वो गश ख़ाके वहीं गिर पड़ा....रामसिंघ को मालूम था की अगर अर्जुन को कुछ किया तो ये बात फैल जाएगी कि उसकी बेटी ही तो आगे आगे उसके खेत जाया करती थी उसी ने ही तो ज़बरदस्ती

चुदवाया...अपना कुँवारापन खोई...ये सब सोचते सोचते उसे लगा कि अर्जुन को ज़बरदस्ती धमका कर वो अपनी बेटी से शादी करवा भी नही

सकता क्यूंकी अर्जुन हरगिज़ इसके लिए तय्यार नही इसी कशमकश में उसने एक गहरी चाल चली....घर हुई बेज़्ज़ती से भी ज़्यादा उसे अपनी बेटी के कुँवारापन और उसकी इज़्ज़त खो देने का जो गुस्सा चढ़ा उससे तो अर्जुन बच नही सकता था.....

 
उस रात....

"माँ मैं खेत जा रहा हूँ आजकल सुनने में आया है कि मूसलधार बरसात होने की बड़ी आसार है इससे फसल को नुकसान हो जाएगा अगर रात गये बाअृिश होने लगी तो तू किवाड़ लगाए सो जाना हो सका तो मैं देर रात्त आउ मैं आवाज़ लगाउन्गा तू खोल देना किवाड़"...............अर्जुन कहता हुआ आपना गमछा ओढ़े खेत के रास्ते चला गया....

"ठीक है बेटा ध्यान रखना"........माँ चिल्लाते हुए उसके जाने के वक़्त बोल उठी....

उसने बेटे के जाते ही दरवाजा लगाया और लालटेन जलाए तकिया ठीक किए उस पर सर रखकर सोने लगी....इकलौता बेटा इतनी रात गये

अकेले अंधेरे में खेत की तरफ गया काश वो ना जाता...ये सोचते सोचते उसकी आँख कब लग गयी उसे मालूम नही चला....

कंबल ओढ़े अपने दो प्यादो के साथ....मुखिया रामसिंग ने अर्जुन के घर की तरफ रवाना दिया....वहाँ पहूचके उसने घर का जायेज़ा लिया सब कुछ खामोशी में जैसे वीरान था....उसने दरवाजा लगा हुआ देख छप्पर पे चढ़ने के लिए सीडिया लगाई.....जैसे तैसे चढ़ते हुए उसने अपने प्यादो को घर में कूदने का इशारा किया....

वो दोनो नीचे धप्प से कूदे...तो एका एक अरुणा की नींद टूटी उसने उठते हुए लालटेन जलाई ही थी की उसे दो मर्द दिखे वो चीख उठी तो उन दोनो ने आगे बढ़ते हुए उसके मुँह को कस कर दबोचा....उम्म्म म्‍म्म्मम......अरुणा की आवाज़ जैसे गले में ही घूंटति रह गयी..उसने आखे बड़ी बड़ी किए दोनो की तरफ एक बार गौर किया दोनो उसे पहचान के लगे वो मुखिया रामसिंघ के नौकर थे....

एक ने आगे बढ़ते हुए दरवाजा खोला और अंदर मुख्य रामसिंघ दाखिल हुआ..उसके भीतर आते ही नौकर ने दरवाजा फिर लगा दिया...."क्यूँ रे साली अरुणा? अकेले अकेले आराम फरमा रही है तोरे बेटे के बदौलत हमरी बेटी की जिंदगी जो खराब हुई वो आज तेरी इज़्ज़त उतारके हम ना ली तो हमरा नाम रामसिंघ नही साला तोके किसी को मुँह दिखाने लायक हम ना छोड़ेंगे आज"...........

.अरुणा को ख़ौफ्फ सताने लगा वो समझ चुकी थी उसने अब हाथ पाँव चलाना शुरू कर दिया...उसने कस कर मुँह पे हाथ रखे हुए नौकर के हाथो को कस कर काट लिया

तो नौकर चिल्ला उठा...एका एक उठ खड़ी होते हुए चीखने लगी....मुखिया रामसिंघ ने बाघ की तरह उस पर झपट्टा मारा और उसे गिरा डाला..."तुम दोनो बाहर जाके जायेज़ा लेते रहो कोई आने ना पाए जाओ"....दोनो नौकर बाहर निकल गये फिर किवाड़ बाहर से ही लगा दिए...पहरा देने लगा

अरुणा बड़ी बड़ी आँखे किए जैसे उसे खुद से दूर करने लगी रामसिंघ उसके साया को कस कर लगभग फाड़ता हुआ खीच के उतारने लगा......"बड़ी विधवा बनती है साली आज दिखात है तुझे"......उसने कस कर जैसे अरुणा को निवस्त्र कर दिया एक झटके में अरुणा उसके सामने नंगी खड़ी हो गयी...अरुणा ने चीखते चिल्लाते हुए मदद की जैसे गुहार लगाई उसने अपने छातियो को एक हाथ और दूसरे हाथ से अपने गुप्ताँग को छुपाए टाँगों के बीच हाथ रखकर घर के इधर उधर दौड़ने लगी...

उसके बदन को देखते ही जैसे रामसिंघ पागल सा हो गया और उसको कस कर पकड़ लिया अरुणा उसके हाथ किसी भी तरीके से नही आ

रही थी तो उसने कस कर एक थप्पड़ उसके चहहरे पे लगाया गश खाए अरुणा ज़मीन पे गिर पड़ी...राम सिंग अपने कपड़े उतारने लगा था....

तो इतने में उसे किवाड़ खुलने की आवाज़ हुई...उसने पाया कि उसका बेटा अर्जुन आ चुका था...देखते ही देखते रामसिंघ के जैसे टट्टो में जान ना रही...उसकी पकड़ ढीली हुई तो अरुणा ने एक करारा धक्का उसके पेट से देते हुए उसे अपने उपर से दूसरी ओर गिरा डाला...और उसी नंगी हालत में बेटे के बदन से लिपटके रोने लगी.....अर्जुन का तो जैसे खून खौल उठा....रामसिंघ को अहसास नही था कि उसके दोनो नौकर उसे अंदर आने से रोक नही सकते थे...

 
दोनो का बेजान शरीर बाहर पड़ा हुआ था....उसे देखते ही रामसिंघ अपनी पतलून जैसे तैसे ठीक करता हुआ भागने को हुआ...तो अर्जुन ने उसके गले को दबोच लिया...."हरामजादा कुत्ता तू हमरी माँ की इज़्ज़त लूटेगा"...........अर्जुन ने कस कर उसके गले को दबोचते हुए उसे

दीवार पे फिर बर्तनो पे जैसे फैंक दिया...

रामसिंघ ने चाकू उठाया और अर्जुन पे वार करना चाहा..अर्जुन ने उसके हाथो को कस कर अपने हाथो से जकड़ा और फिर दोनो में जैसे हाथा पाई होने लगी....पूरी ताक़त से अर्जुन ने अपनी एक घुटने को उसके अंडकोष पे मारा और उसके झुकते ही उसे उठाते हुए सीधा खाट

पे दे पटका...खटिया चरमरा कर टूट गया और रामसिंघ बुरी तरीके से दर्द से बिलबिला उठा....

उसको उठने का मौका भी ना मिला कि उसकी एक टाँग पे जैसे अर्जुन ने करारी लात दे मारी....रामसिंघ जैसे दर्द से दहाड़ उठा...उसी हालत में गेरेबान से उठाए अर्जुन ने उसे खड़ा किया और सीधे उसके चेहरे पे एक करारा घुसा दे मारा....वो घुसा रामसिंघ के जबड़े को हिला देने के लिए काफ़ी था....

रामसिंघ वहीं दर्द में कराहते हुए गिर पड़ा....अर्जुन और उस पर वार करता तब तक उसने माँ को रोता बिलखता हुआ पाया वो उसके पास आया उसने तब साया साड़ी अपने बदन पे लिपटा ली थी....अचानक रामसिंघ ने मौके का फायेदा उठाया और ज़ख़्मी हालत में उठते हुए उस गिरे हुए छुरी को उठाया..और घोपने के फिराक़ से जैसे अर्जुन पे जैसे हमले की ओर बढ़ा...

अर्जुन इस बात वाक़िफ़ नही था वो माँ के गले लगे हुए था..अचानक जब उसे अहसास हुआ तो वो खड़ा होके अभी बच भी पाता कि इतने में रामसिंघ की छुरी उसके शरीर को छू देने से पहले ही उसके बीच खड़ी तपोती के पेट के अंदर चीरते हुए छुरी अंदर दाखिल हो गयी उसके शरीर के...

तपोती की घूंटति आवाज़ और अपने किए गुनाह को देख रामसिंघ के हाथ जो छुरी सहित उसके पेट को फाडे अंदर दाखिल हुए वो उसके बेतहाशा खून से रंगे वापिस छुरी को वैसे ही छोड़ वापिस हो गये...."बेतत्टिईइ"........."तप्पोत्ती"...

.एकदम से अर्जुन ने तपोती को कस कर संभाल लिया वो बदहवास तड़प्ते हुए अर्जुन के बाज़ुओं में जैसे गिर पड़ी...

अरुणा मुँह पे हाथ रखके जैसे रोने लगी...."तपोती तपोती"...उसके चेहरे को थपथपाते हुए अर्जुन न्‍ने उसे जगाना चाहा उसकी आँखे जैसे बंद

हो रही थी...उसके पेट पे गढ़ा छुरा उसने निकालना चाहा उसके पेट से निकल रहा खून उसके हाथ में लग गया...

अर्जुन : तपोती ये तुमने क्या किया?

तपोती : मेरी वजह से तुम...ही य..ई द..इन द..ईखनना पड़ा मेररे पिता जीई ने तुम्हे...इन न्मुझसस..ई तू..एमेम..हेंन्न छीन...ना च..आहा अब्ब मैंन्न आअहह उरगग्घ और ज़्यादा बर्दाश्त नही कर पा रही हूँ आहह सस्स आखरी बार तुमसे माँफी मांगती हूँ (अपने खून लगे हाथो को जोड़ते हुए)

अर्जुन जैसे बिलख बिलख के रो रहा था....तपोती ने अपने काँपते खून लगे हाथो से उसके आँसुओं को पोछा और जैसे दुआ किया की इस जनम में ना सही किसी और जनम में वो उसके हर पल संग होगी उस जनम में शायद उसकी बाहों में अर्जुन उसे खुद थामेगा चाहे वो किसी भी रूप में हो बस अर्जुन उसे स्वीकार करे यही उसकी दुआ थी खुदा से....उस जनम में शायद उसकी मुहब्बत की अर्जुन को जैसे अहमियत मालूम होगी...तपोती ने रोते हुए दर्द में तड़प्ते बस इतना कहा कि हो सके तो उसकी भूल और उसके किए हसरत को मांफ कर डाले....वो जानती थी कि अर्जुन अपनी माँ को छोड़ किसी से मुहब्बत तक नही कर सकता लेकिन शायद ये उसी की एकतरफ़ा दीवानगी थी जो उसने

अर्जुन और अरुणा की हँसती खेलती ज़िंदगी को अपने चलते बर्बाद कर डाली ना वो उसके ज़िंदगी में आती और ना ही उसके पिता उन दोनो के दुश्मन बनते....आदम ने कहा कि नही तेरा कोई कसूर नही तपोती कसूर मेरा है जो तुझे समझ ना पाया.....तपोती का पिता रामसिंघ जैसे एकदम मूर्ति की तरह आँखे फाडे खड़ा आँसू बहा रहा था जैसे उसकी हिम्मत नही हो रही थी कि वो तपोती के खून से लथपथ जिस्म को अर्जुन की गोदी से उतार ले...तपोती इतने में काँपते हुए ख़ासने लगी और उसके ख़ासने से उसके मुँह से खून के छींटे जैसे बाहर आने

लगे...अर्जुन बौखलाया पर उसके शरीर को झींझोड़ता हुआ बस रोता रहा..उसे अहसास था कि अहमियत तो इस जनम में भी उसके प्यार की उसे मालूम चल चुकी थी आज उसकी खातिर उसने अपनी जान दे डाली...उसके बाद जैसे तपोती का चेहरा वैसे ही मुस्कुराता ठहरा रह गया और उसकी कलाई अपने आप ज़मीन पे गिर पड़ी...

 
अर्जुन ने उसे झींझोड़ा अरुणा ने उसके कंधे पे हाथ रखके उसे संभाला...अर्जुन की सुर्ख गुलाब आँखे रामसिंघ की ओर

उठी...."य्ाआ"......दहाड़ते हुए अर्जुंन्ं वैसी ही तपोती की बेजान लाश को छोड़....उस पर जैसे टूट पड़ा...

रामसिंघ को पलभर का मौका ना मिला और ठीक उसी पल अर्जुन ने उसके गले को कस कर दबोच दिया और उसके हाथ की छुरी अपने हाथो में खीचके उसके पेट में कयि दफ़ा छुरी अंदर बाहर करते रहा...लाहुलुहान दहाड़ते हुए वहीं दर्द से तड़प्ता रामसिंघ गिर पड़ा....उसके

पेट से खून बेहिसाब से बहे जा रहा था....वो भी दर्द से तड़प्ता हुआ छटपटाता वहीं दम तोड़ चुका था...

अरुणा ने अर्जुन के हाथो से कस कर छुरी छीनी और उसे एक ओर फैका जिसपे खून लगा हुआ था...उसने बेटे के दोनो हाथो को खून से रंगा हुआ देखा..."बेटा चल बेटा भाग चल यहाँ से वारना गावंवाले तुझे मार डालेंगे कोइ हमपर यकीन नही करेगा ये तूने क्यूँ किया? क्यूँ किया आख़िर ऐसा?"......बौखलाए बेटे को उसी रात अरुणा खीचते हुए घर से लिए बाहर दौड़ पड़ी...पीछे छूटती चली गयी तपोती की लाश जो घर में उनके पड़ी हुई थी....

उसने देखा कि गाओं वाले मशाल लिए रात गये उनके घर की तरफ ही आ रहे थे...अंधेरे का फ़ायदा उठाए वो दोनो जैसे तैसे अपने इक्का दुक्का सामान की गठरी लिए भागें जा रहे थे...अर्जुन जानता था गावंवाले उन्हें मुखिया और उसकी बेटी का खून का दोषी मानते....अरुणा को बचाने के लिए ही उसके पाओ वहाँ से भाग खड़े हुए थे...

वो दोनो जंगल ही जंगल के रास्तो से भागते भागते नहर के करीब पहुच चुके थे...उन्हें जितना हो सके उतना दूर इस राज्य को जल्द से जल्द छोड़के जाना था....अपना घर खेत सबकुछ वैसा का वैसा छोड़ जान बचाने के डर से दोनो वियावान जंगल में उस गहरी हो रही रात को बस भागें ही जा रहे थे जब दोनो की साँस उखड़ने पे हो गयी तो एका एक नहेर के पास किनारे तट पे पत्थरों पे बैठते हुए हाफने लगे....अरुणा को जैसे साँस लेने में तक़लीफ़ हो रही थी...नहेर से बहता पानी का शोर एक मात्र सुनाई दे रहा था इस खामोश वीरान जंगलों में तो कही दूर कोई जानवर रो रहा था....उन्हें महसूस हुआ की उनका पीछा करता अब कोई नही आ रहा तो वो दोनो वहीं झाड़ियों के पास जाके छुपे रहे...बार बार झाड़ियों से दूर झाँक झाँके देख रहे थे लेकिन उस नीम अंधेरे में कुछ दिखाई नही दे रहा था...जैसे खामोशी ही चारो तरफ छाई हुई थी....

अपनी अपनी साँसों पे काबू पाते हुए...अर्जुन ने एक झलक घुटनो पे दोनो हाथ रखकर साँस लेने की नाकाम कोशिशें की...फिर वो जब शांत हुआ तो सीधा होके उसने पेड़ के सहारे टैक लिए हुए माँ को देखा....फिर उसके पास आए उसके गाल को सहलाने लगा....माँ जैसे थककर हान्फ्ते हुए पसीने पसीने हो रही थी आँखो में जैसे दहशत सिमटी हुई थी...

अर्जुन : माँ माँ तू ठीक है माँ (अपने हाथो पे लगे खून को देख अर्जुन फिर एक बार दुखी हो गया)

उसने पास की नहर से बहते पानी के भीतर अपना हाथ डाला और अपने हाथो को धोते हुए वापिस किनारे घने जंगलों में आया....माँ की आँखो से आँसू थम जाने का नाम नही ले रहे थे....

अर्जुन : माँ होश में आओ

अरुणा : बेटा इतना बड़ा हादसा हो जाएगा मैने सोचा नही था

अर्जुन : माँ अगर मैं वक़्त पे नही आता तो शायद आज कोई अनर्थ ही हो जाता..जाने दो उस खेत और घर को माँ मानते है उसमें हमरे बाप

की पसीने और खून की मेहनत थी पर अब वहाँ से भागने के अलावा हम कर भी क्या सकते थे?

अरुणा : मुझे बहुत डर लग रहा है मुझे यकीन नही होता कि मुखिया रामसिंघ इस हद तक गुज़र जाने वाला था....अगर तू सही वक़्त पे ना आता तो शायद तुझे मेरी लाश ही घर लौटते हुए मिलती

 
अरुणा : मुझे बहुत डर लग रहा है मुझे यकीन नही होता कि मुखिया रामसिंघ इस हद तक गुज़र जाने वाला था....अगर तू सही वक़्त पे ना आता तो शायद तुझे मेरी लाश ही घर लौटते हुए मिलती

अर्जुन : माँ भगवांन के लिए ऐसी अपशब्द बातें ना कहो अभी हम ज़्यादा देर इस घने जंगल में रात भी ना गुज़ार सकते जैसे जैसे रात ढलेगी हमारे दिल का डर और बढ़ता जाएगा क्यूंकी अंधेरा छाता जाएगा और गावंवाले किसी ना किसी तरह यहाँ पहुच भी सकते है और हमारे भाग जाने से उनका सीधा शक़ हंपे होगा ऐसे ही वो लोग पिछड़ी सोच के है तुझपे गंदे गंदे इल्ज़ाम लगाके बेज़्ज़त करेंगे और मुझे तो शायद जान से ही मार दे क्यूंकी यहाँ खून का बदला खून से चुकता होता है

अरुणा : नही मेरे होते हुए तुझे कुछ नही होगा तू छोढ़ जो पीछे छूट गया...हम आज़ाद है और गाओं से कयि मील दूर निकल ही आए है बस

किसी तरह ये ये जंगल पार करके कही सुरक्षित किसी राज्य पहुच जाए बस

अर्जुन : पर हम कब तक ऐसे भागेंगे माँ? मेरे हाथो से पाप हुआ है मैने इन्ही हाथो से मुखिया रामसिंघ का खून कर डाला है मुझे नही मालूम था अगर सही वक़्त पे उसकी बेटी तपोती ने मुझे बचाया ना होता...मुझे तो बस उसका प्यार वासना और ज़िद्द ही लगी थी लेकिन आज उसकी मौत ने जैसे मुझे अंदर तक झींझोड़ दिया है

अरुणा : तू खुद पे काबू पा बेटा ऐसे कमज़ोर पड़ेगा तो हम यहाँ से भाग ना पाएँगे मुझे तपोती की मुहब्बत पे कोई शक़ नही उसने तुझसे

सच्चा प्यार किया और उसके लिए अपनी जान भी दे डाली....अब तक तो गावंवालो को बाप-बेटी दोनो की लाश हमारे घर से मिल गयी होगी

अर्जुन : ह्म और साथ में उसके प्यादो की भी जो मेरे घर पे ही पहरा दे रहे थे मैने दूर से ही उन दोनो को देख लिया था इसलिए अंधेरे का

फ़ायदा उठाए मैने चुपके से उनपे हमला करके उन दोनो की गर्दन मरोड़ के तोड़ दी थी मुझे नही लगता उनमें से कोई ज़िंदा भी बचा होगा

अरुणा : हां बेटा पर अब हम यहाँ से कैसे निकलेंगे ये सोच? हमे किसी तरह इस रात में ही इस जगह को पार कर जाना है

अर्जुन ने जहाँ तक निगाह दौड़ाई सिर्फ़ और सिर्फ़ वीयावान जंगल ही था....नहर के उस पार भी उचे उचे पहाड़ थे और उचे उचे पेड़ मज़ूद थे....चाँद पर जैसे बादलो की परत जमा सी हुई थी इसलिए नीम अंधेरा था पूरी फ़िज़ायो में...उसने एक बार नहेर के बहते पानी को गौर

किया...जिसका शोर उसे काफ़ी देर से सुनाई दे रहा था....उसने माँ के करीब आके अपना इरादा बताया

अर्जुन : माँ ये नहर सीधी घाटी को पार करती हुई नदी में जा रही है....अगर हम इस नहर के संग संग तैरते हुए नदी पार कर जाए तो दूसरे

राज्य पहुच जाएँगे

अरुणा : अरे बेटा पर हम इतनी रात गये कैसे नहेर को तैर करके रास्ता पूरा करेंगे?

अर्जुन : तैरके नही नाव से

अरुणा : कैसे?

अर्जुन : नाना जी जब ज़िंदा थे तो वो हमेशा मुझे नाव बनाने की विधि बताया करते थे हम उसी तरह नाव को बना इस नहेर से होते हुए सीधा घाटी से दूर निकल कर जा सकते है इससे किसी का ध्यान हंपे भी नही पड़ेगा और हम सीधा इंसानो की आबादी से दूर हो जाएँगे उसके बाद नदी पार करते ही हमे कोई दिशा मिल सकती है यही बचने का विकल्प है

अरुणा को तो समझ नही आ रहा था कि वो क्या करें? उसे तैरना तक नही आता था...उसने बेटे की रज़ामंदी पे हां तो कर दी थी लेकिन इसमें जोखिम बड़ा था...एक तो वो लोग सड़क पे कितना चल सकते थे रात भी जैसे जल्दी जल्दी ढलती जा रही थी....अब तक गावंवालो की

कोई भी टोली उन्हें ढूँढते हुए नाही पहुचि थी...इसका मतलब सॉफ था कि वो लोग उन्हें तलाशने निकले होंगे पर रात ज़्यादा देखते हुए वापिस हो लिए होंगे उन्हें लगा होगा कि हम जंगलों में है जिनमें उनका आना नामुमकिन ही था क्यूंकी जंगलों में कयि ज़हरीले जंगली साँप मज़ूद थे....

अर्जुन के पास भागते वक़्त खेत से लाया फसल की बोरी काटने वाला औज़ार था...उसने 1 हाथ लंबे छुरा को निकाला उन बाँस की डांदियो को काट काट इकहट्टा करने लगा....माँ चुप चुपके उसके कारनामो को देख रही थी....अर्जुन ने सारी बाँस की लड़किया बहुत सी इकहट्टी की

और उन दो को जोड़ते हुए उनके सिरे को नुकीला किया फिर उसने जैसे बाँस की गोल गोल लकड़ियो को बाँधने के लिए पेड़ की शाखाए

काट काटके लाई उस पूरी रात उसे बहुत मेहनत करने जैसा काम था...

 
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