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Guest
इधर अंजुम का भी मन ज्योति भाभी के बिना नही लगता था....इस बीच आदम इतना खुशमीज़ाज़ रहने लगा कि लगता नही था कि ये वहीं दुख में डूबा चिड़ा हुआ मगरूर किसम का वहीं ग़रीब आदम था जिसकी संघर्ष कभी ख़तम नही होने को थी....धीरे धीरे वक़्त बीतता गया और अंजुम और आदम का प्यार उतना ही गहरा होता चला गया...
पिता जी जब वापिस लौटे तो इतने कम वक़्त में इतनी बड़ी खुशी जानकर उन्हें काफ़ी गर्व महसूस हुआ.....लेकिन माँ-बेटे के प्यार के बीच वो कभी आड़े नही आए....क्यूंकी घर में उनकी मज़ूदगी में दोनो वैसी ही ज़िंदगी निभाते थे जैसा एक माँ और बेटे का साधारण रिश्ता होता है....इस बीच पिता जी भी आदम की नयी शौहरत और नये रुतबे से प्रभावित होके खुद भी वैसी ही अमीरी ज़िंदगी बसर करने लगे....
आदम ने अपनी बाइक बेच दी और एक सुंदर सी बड़ी गाड़ी खरीद ली....उसके पास आज सबकुछ था...अब उसने सॉफ इनकार भी कर दिया था अपने डॅड को कि उसे हक़ के पैसे की भी कोई दरकार नही...अल्लाह का दिया उसके पास सबकुछ है....माँ को इस बात पे गर्व हुआ कि जिसने उन्हें कल बेज़्ज़त किया आज उन ददिहाल वालो के मुँह पे उन्ही का तमाचा आदम ने सूद समेत अपनी इज़्ज़त और रुतबे से मारा था
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बरसात हल्की हल्की हो रही थी...आदम बारिश में भीगता हुआ अपने ऑफीस से सीधा कार में दाखिल हुआ वो फोन पे लगा हुआ था मिस्टर जमशेद से...कोई अर्जेंट करके बात थी....आदम ने किराए का एक ड्राइवर रख लिया था...जिसकी तनख़्वाह आदम उसे महीने महीने दे देता था....अभी आदम की गाड़ी पार्क से गुज़र ही रही थी कि इतने में उसने जो देखा उसे देखके वो एक पल को मोबाइल में "ई विल कॉल यू बॅक सर" कह ड्राइवर को गाड़ी थामने को कहने लगा
ड्राइवर ने आदेश अनुसार गाड़ी को साइड किया और रोक दिया....आदम ने फुरती से दरवाजा खोला और अपनी कोट और टाइ को ठीक करता हुआ घड़ी जिसपे पानी की बूँदें पड़ रही थी उस कलाई को घुमाता हुआ उन दो महिलाओ के करीब आया....
उसने देखा कि सामने एक औरत तो वहीं काकी है जिससे आदम की मुलाक़ात चंपा के घर पर हुई थी और दूसरी एक पल को जैसे आदम को झटका लगा हो वो एकदम हिल गया उसने टाइट जीन्स और टॉप पहन रखा था....उसके हाव भाव से लग ही नही रहा था कि वो चंपा हो सकती है हां चंपा वो ऐसे बातचीत कर रही थी जैसे मानो चेहरे में कितनी मांसुमियत हो आवाज़ वैसी कि वैसी जैसी चंपा बोलती और हँसती थी...वहीं सूरत वहीं चेहरा वहीं नैन नक्श सबकुछ जैसे आदम के दिमाग़ में मानो ऐसा घूम रहा था कि काकी के संग बैठी वो लड़की चंपा ही तो है
एक पल को तिठका सा आदम उनके सामने आ खड़ा हुआ और उसने लरखराई ज़ुबान से कहा "सी..चाम्म.पा"......ये सुन्न्ं वो लड़की जो हूबहू चंपा सी दिखती थी आदम की तरफ देखने लगी ऐसा लग रहा था जैसे वो कितना गौर से उसे देख रही हो लेकिन उसके चेहरे पे आदम को पहचानने की कोई हैरत ना दिख रही थी...
काकी उसे देख उठ खड़ी हुई उसने एक पल को आश्चर्य से उसकी तरफ देखा...आदम की निगाह जैसे उस लड़की की तरफ ही ठहरी हुई थी...."कि गो? तुमि के?" (क्या? आप कौन?)....जैसे वहीं मीठी सी आवाज़ दिए चंपा ने उससे प्रश्न किया हो...
पिता जी जब वापिस लौटे तो इतने कम वक़्त में इतनी बड़ी खुशी जानकर उन्हें काफ़ी गर्व महसूस हुआ.....लेकिन माँ-बेटे के प्यार के बीच वो कभी आड़े नही आए....क्यूंकी घर में उनकी मज़ूदगी में दोनो वैसी ही ज़िंदगी निभाते थे जैसा एक माँ और बेटे का साधारण रिश्ता होता है....इस बीच पिता जी भी आदम की नयी शौहरत और नये रुतबे से प्रभावित होके खुद भी वैसी ही अमीरी ज़िंदगी बसर करने लगे....
आदम ने अपनी बाइक बेच दी और एक सुंदर सी बड़ी गाड़ी खरीद ली....उसके पास आज सबकुछ था...अब उसने सॉफ इनकार भी कर दिया था अपने डॅड को कि उसे हक़ के पैसे की भी कोई दरकार नही...अल्लाह का दिया उसके पास सबकुछ है....माँ को इस बात पे गर्व हुआ कि जिसने उन्हें कल बेज़्ज़त किया आज उन ददिहाल वालो के मुँह पे उन्ही का तमाचा आदम ने सूद समेत अपनी इज़्ज़त और रुतबे से मारा था
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बरसात हल्की हल्की हो रही थी...आदम बारिश में भीगता हुआ अपने ऑफीस से सीधा कार में दाखिल हुआ वो फोन पे लगा हुआ था मिस्टर जमशेद से...कोई अर्जेंट करके बात थी....आदम ने किराए का एक ड्राइवर रख लिया था...जिसकी तनख़्वाह आदम उसे महीने महीने दे देता था....अभी आदम की गाड़ी पार्क से गुज़र ही रही थी कि इतने में उसने जो देखा उसे देखके वो एक पल को मोबाइल में "ई विल कॉल यू बॅक सर" कह ड्राइवर को गाड़ी थामने को कहने लगा
ड्राइवर ने आदेश अनुसार गाड़ी को साइड किया और रोक दिया....आदम ने फुरती से दरवाजा खोला और अपनी कोट और टाइ को ठीक करता हुआ घड़ी जिसपे पानी की बूँदें पड़ रही थी उस कलाई को घुमाता हुआ उन दो महिलाओ के करीब आया....
उसने देखा कि सामने एक औरत तो वहीं काकी है जिससे आदम की मुलाक़ात चंपा के घर पर हुई थी और दूसरी एक पल को जैसे आदम को झटका लगा हो वो एकदम हिल गया उसने टाइट जीन्स और टॉप पहन रखा था....उसके हाव भाव से लग ही नही रहा था कि वो चंपा हो सकती है हां चंपा वो ऐसे बातचीत कर रही थी जैसे मानो चेहरे में कितनी मांसुमियत हो आवाज़ वैसी कि वैसी जैसी चंपा बोलती और हँसती थी...वहीं सूरत वहीं चेहरा वहीं नैन नक्श सबकुछ जैसे आदम के दिमाग़ में मानो ऐसा घूम रहा था कि काकी के संग बैठी वो लड़की चंपा ही तो है
एक पल को तिठका सा आदम उनके सामने आ खड़ा हुआ और उसने लरखराई ज़ुबान से कहा "सी..चाम्म.पा"......ये सुन्न्ं वो लड़की जो हूबहू चंपा सी दिखती थी आदम की तरफ देखने लगी ऐसा लग रहा था जैसे वो कितना गौर से उसे देख रही हो लेकिन उसके चेहरे पे आदम को पहचानने की कोई हैरत ना दिख रही थी...
काकी उसे देख उठ खड़ी हुई उसने एक पल को आश्चर्य से उसकी तरफ देखा...आदम की निगाह जैसे उस लड़की की तरफ ही ठहरी हुई थी...."कि गो? तुमि के?" (क्या? आप कौन?)....जैसे वहीं मीठी सी आवाज़ दिए चंपा ने उससे प्रश्न किया हो...