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Incest माँ को पाने की हसरत

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वैसे ही फ्रॉक सी घाघरा किए हुए...वहीं बदन पे साया (पल्लू) नही...वहीं गुलाबी ब्लाउस जिसके दो बटन खुले हुए गोरे चेहरे पे सुर्ख लाल लाल होंठ...नाक में बाली...और कानो में झुमके अपने गुलाबी लाल होंठो को दाँतों से काटते हुए काजल लगी उन निगाहो से मेरी ओर . तपोती को मैने उस हाल में पाया...उसके बाल एकदम खुले बिखरे गीले हुए से थे चेहरे पे हल्का मेक अप...ऐसा लगा साक्षात मेरे सामने तपोती नही उन्ही अदाओ से मचल रही चंपा खड़ी थी...

जिसने अपनी ब्लाउस के अंदर वैसे ही कुछ पहन नही रखा था जिसके निपल्स मुझे सॉफ कठोर ब्लाउस के बाहर से ही जान पड़ रहे थे...एक पल को मैं उठा और उन नज़ाकत . आँखो में आँखे डाल बोल उठा "चंपा! ....एका एक मुझे अहसास हुआ कि तपोती चंपा सी बनी हुई थी...कोई फरक नही था कि वो चंपा नही हो सकती...

आदम : तप...पोत्ति ये सब क्या है?

तपोती : अरे आदम बाबू आप हमे देखके चौंक क्यूँ गये?

आदम : चंपा ये सब क्या है यार? (मैं मुँह पे हाथ रखके उसको उपर से नीचे तक घूर्र रहा था हंसते हुए)

तपोती : आदम बाबू आज तपोती नही आज हम है आपके सामने हम जानते है आप हमसे कितना प्यार करते है? आज हमे अपने करीब ना होने देंगे

आदम एकपल के लिए ऐसे ठिठक गया जैसे चंपा का भूत उसके सामने ठीक उसी तरह बर्ताव कर रहा हो वहीं मुस्कुराहट वहीं चुलबुली अदायें...वहीं नैन नक्श...आदम ने पाया कि पीछे उसके बालों में वैसा ही सफेद गजरा लगा हुआ था....जो अक्सर चंपा पहना करती थी....तपोती मुस्कुराए उसके पास आई

तपोती : मैं जानती हूँ आदम आप . बहन से बहुत प्यार करते थे सोचा आज उसकी कमी पूरी कर दूं...अगर मैं हूबहू उसकी जैसी दिखती हूँ तो उस जैसा खुद को महसूस क्यूँ नही कर सकती? आज मुझमें सिर्फ़ और सिर्फ़ उसे ही ढूंढीए..

"पर्र"..कहने से पहले तपोती ने मेरे होंठो पे उंगली रखी..मैं तो वैसे ही उसे देखके बदहवास हो रहा था अब उस पर ढेर हो जाने के लिए बेताब था....

आदम से बोल ना फूटा एका एक उसे अहसास हुआ कि उसके हाथ अपने आप उसकी तरफ बढ़ रहे थे उसी पल आदम ने तपोती को कमर से अपने ओर खीच लिया...दोनो मुस्कुराए एकदुसरे की ओर देख ने लगे एकटक.....

बाहर किचन से फारिग हुई कमरे पे अंजुम ने हल्के दस्तक दिए कहा...."ज़्यादा शोर शराबा नही अगर काकु आ गये ना तुम्हारे फिर मुझे ना कहना"......हँसती हुई अंजुम बेटे और तपोती को बंद कमरे में छोड़ एकदुसरे के हवाले किए किचन में काम करने चली गयी...

अब पूछो मत उस रात और क्या क्या हुआ?

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3 महीने बाद...

ऐसा लग रहा था जैसे ज़िंदगी में मेरी खुशिया फिर दुगनी होके लौट आई थी.....हसरत जो अपनी माँ के प्रति मेरे लिए चंपा ने जगाया वो वासना और हवस से बदलते हुए एक . मुहब्बत में बदल जाएगी मैने सोचा भी नही था? और कब? चंपा को खोने की कमी मुझे खल रही थी और इसी कशमकश में था कि मैं चाह के भी अपने प्यार को ना चंपा से इज़हार कर सका और उसे ना मरते . तक देख पाया....ऐसा लग रहा था जैसे वो मुझसे सिर्फ़ मेरे दिए हुए दर्द और ज़लील को ही झेलके इस दुनिया से रुखसत हुई काश वो ज़िंदा होती तो उसे पता चलता कि मेरे दिल में उसके लिए कितनी जगह बन चुकी थी? मैं उससे कितना प्यार करने लगा था? और उसे हर दम सपोर्ट करने के लिए मैं बेझिझक तय्यार भी था....

लेकिन कब? उसे खोया रिग्रेट किया और कब उसी की हमशकाल ठीक वहीं चंपा . ज़िंदगी में तपोती बनके मेरे पास वापिस लौट आई....लगभग मेरी दोनो हसरतें अपनी माँ और अपने खोए हुए प्यार को पाने के प्रति पूरी हो चुकी थी....इसी लिए कहते है अगर इंसान ना उम्मीद रहे तो खुदा उसके दामन में इतना कुछ भर देता है कि उसे उन चीज़ों की . तक नही होती

माँ और तपोती मेरी बीवी दोनो सास-बहू सौतन होके भी एक छत के नीचे जैसे एकदुसरे के साथ सहेलियो की तरह परिवार की तरह ज़िंदगी गुज़ारते थे....घर की ज़िम्मेदारियो को बखूबी साथ साथ संभाल लेते थे....मैने भी उन्हें साबित कर दिखाया कि मैं अपनी दोनो बीवियो को आराम से पाल सकता हूँ और उन्हें संभाल भी सकता हूँ उनकी ज़िम्मेदारिया बेझिझक उठा भी सकता हूँ...

मैने तपोती के साथ साथ माँ को भी प्यार करने में कोई कमी नही रहने दी....माँ की भी . थी कि हमारे बाद कोई उस घर को संभाले उन्होने वो सारें गुण तपोती में . लिए थे....हमारा घर हँसी खुशी हसीन पॅलो से गुज़र रहा था...ना कभी तपोती ने ऐतराज़ किया और ना कभी माँ ने कि मैं किसके साथ कितना वक़्त गुज़ारता हूँ? अब तो घर का ऐसा माहौल था कि पिता जीके होते हुए भी मैं माँ को अपनी बाहों में भरके उसके गाल और होंठो को चूम लेता था हालाकी उस वक़्त तपोती ही सामने होती थी उसे कोई ऐतराज़ ना होता शरम से हंस पड़ती...

माँ मज़ाक में उसे कह देती कि देख तू ही संभाल इसे मैं तो थक चुकी....तो तपोती कहती कि संभालना तो कोई आपसे सीखे मैं तो ऑलरेडी ही बहुत संभाल के थक जाती हूँ दोनो सास बहू ऐसे डबल मीनिंग की बात करते थे कि उन दोनो को छेड़े बिना मैं रह नही पाता था....

कभी तपोती को भी माँ के सामने खूब प्यार करता और उसे माँ के सामने ही कमरे में ले जाने लगता तो कभी कभी माँ और तपोती दोनो का हाथ थामें हुए उन्हें कहता कि बीवियो से इजाज़त नही लिया जाता दोनो ही शरमा जाती थी...एकदम बोल्ड माहौल था घर का मेरा...ऐसी ही ज़िंदगी मैं जीना चाहता था...

 
आज तपोती और माँ से शादी किए इतने महीने गुज़र गये पता नही चला....अब तो तपोती बेहिचक मेरे औज़ार से खेलती थी और मेरे आदेश का पालन करते हुए अपनी टांगे फैलाए उसे अपनी चूत में बिना वक़्त ज़ाया किए ले लेती थी...कयि बार तो हमारी चुदाई के बीच जब हमे कोई चीज़ की ज़रूरत पड़ जाती तो मैं माँ को जानबूझ के बुलाया करता था....हालाकी माँ को बड़ी झिझक होती थी...पर वो जानती थी मेरी ज़िद्द के आगे उसका एक ना भी नही चल सकता था...

माँ को मैं इतना प्यार करता था कि कभी कभी तो वो खुद कह देती थी कि . जल्दी तपोती से जी भर गया जो मुझे ही पकड़े रहता है....लेकिन वो क्या जाने मेरा हक़ तो उन दोनो पे बराबर का ही था....एक बार तो मैने उसकी नाइटी उपर किए किचन में ही उसकी चुदाई शुरू कर दी थी....उस वक़्त पिता घर पे नही थे तो तपोती जब रसोईघर में लौटी तो उसने मुझे अपनी माँ की . को मसल्ते हुए उनकी गान्ड चुदाई करते पाया....माँ हिच हिच के चुद रही थी....उसने आँखे बड़ी किए वहीं मुझे माँ के साथ चुदाई करते देखती रही....मैने उसे अपने करीब खीच लिया और उसके होंठो को बेतरतीब ढंग से चूसना लगा माँ को मेरी बीवी के होने का अहसास हुआ तो वो शरम से पानी पानी हो गयी...लेकिन मेरा औज़ार उसकी छेद में बुरी तरह अंदर बाहर होते ही रहा....और तपोती को मैं किस करते हुए उसके ब्लाउस के उपर से ही स्तनों पे मुँह लगाए रहा....

ऐसे ही काइ हसीन पल मैं गुज़ार रहा था...दूसरी ओर लाजो को एक आखरी मर्तबा ही मैने चोदा था मेरी तपोती की अनुपस्थिति में जब मेरा लंड ज़्यादा ज़ोर मार रहा था...लाजो ने शरम से मुझे कहा कि अब तो दो दो पत्नी हो गयी आपकी फिर भी आपका दिल मुझसे ना भरा...मैने मुस्कुराए उसके गाल खीचते हुए कहा दिल में तो सबके लिए बारी बारी से जगह है.....लाजो को तो मौका चाहिए था पहले ही उसके हाथो में हिसाब का पैसो में तिगना गुलाबी गाँधी के तीन नोट एक्सट्रा दे दिए थे....जिससे उसने मेरा शुक्रियादा मेरे लबो पे अपने लबो को सटाते हुए एक देसी स्मूच देके किया....

उसके बाद उसकी भीषण चुदाई मैने पूरे 2 घंटे करके उसे अपने घर से रुखसत किया....अगले दिन वो सबसे मिलने आई थी अपने पति के साथ उसका पति उसे लेके कोलकाता जाने वाला था...आखरी विदाई के बाद मैने उसे अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया था तो उसने हँसके कहा कि अब रिश्ता तो हमारा भाई-बहन की हदो से पार हो चुका था वो चली गयी और अपनी यादें छोड़ गयी...

उसके बाद राजीव दा ने मुझे बताया कि ज्योति भाभी का नौवा महीना चल रहा है...ये सुनके मैने उन्हें बधाई दी उन्होने भी मेरे घर के हालतो का जायेज़ा लिया जिसे सुनके बेहद खुशी हुई कि मैं अब एक ज़िम्मेदार बेटा और पति दोनो बखूबी निभा रहा था और मैं तपोती से बेहद खुश था..और घर को ज़िम्मेदार मर्द की तरह चला भी रहा था..ये खबर माँ को मिली तो उन्होने भी राजीव दा को खूब बधाई दी

इधर समीर और सोफीया का सुना कि दोनो गोआ शिफ्ट हो चुके थे....क्यूंकी सोसाइटी में उन दोनो की खूब बातें . जा रही थी....समीर ने उन लोगो को भनक तक लगने नही दिया और खूब पैसे इकहट्टा किए उसने गोआ में एक महँगा बंगलो खरीद लिया अपनी माँ उर्फ पत्नी सोफीया के लिए....सुना था कि समीर और उसकी सोफीया बेबी लेने के विचार में थे ये सुनके मुझे बेहद खुशी हुई....

ताहिरा मौसी की हालत में सुधार आने लगा और उनकी बहू से उनके सारे गीले शिकवे दूर हो गये दोनो अब माँ-बेटी की तरह एकदुसरे के साथ व्यवहार करती थी....मौसी और रूपाली को मेरी दूसरी शादी का मालूम चला तो वो लोग काफ़ी नाराज़ हुए कि हमने उन्हें बुलाया नही पर माँ ने उनकी नाराज़गी पलभर में मिटा दी....दोनो आए भी थे मिलने....साथ में रूपाली भाभी आई थी मेरे राहिल को लेके

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तपोती को कुछ ही दिनो के भीतर उल्टिया होने लगी....माँ ने जब ये खबर मुझे दी तो मैं शाम को घर आए उसे गाइनकॉलजिस्ट के पास ले गया...जब वापिस घर लौटा तो माँ ने मुझसे पूछा कि क्या बात थी? मैने उसे अपनी बाँह में खीचा और उसे खुशख़बरी दी...तपोती माँ बन चुकी थी....माँ के खुशी का ठिकाना नही रहा था....ये बात पिता जी को भी जब मालूम चली तो उन्हें जैसे बहुत खुशी हुई...

उसके बाद माँ तपोती पे और भी ज़्यादा ध्यान देने लगी थी....और तपोती को हर काम से सख़्त परहेज करने लगी थी....पर फिर भी तपोती जैसे माँ की मदद किए लगे रहना चाहती थी....धीरे धीरे वक़्त गुज़रता गया और वो तारीख भी जल्द आई जब तपोती को हॉस्पीटलाइस्ड हो जाना पड़ा....

ऑफीस से मैने उस दिन छुट्टी लेते हुए फ़ौरन हॉस्पिटल की ओर रुख़ किया.....माँ मेरा वहीं इन्तिजार कर रही थी....हम सब वैसे ही काफ़ी नर्वस थे कि ना जाने क्या होगा? पिता जी मुझे शांत कर रहे थे....लेकिन कहते है ना दिल जब ज़्यादा धड़कने लगे तो कोई अनहोंनी सा संकेत देता है या कोई नाउम्मीदी सा

ऑपरेशन थियेटर से हडबडी में डॉक्टर जैसे बाहर निकलके जा रही थी तो मैने उन्हें थाम लिया....और उनसे सवालात करने लगा उनके चेहरे पे पसीना था और वो काफ़ी परेशान सी मुझे दिख रही थी उन्होने जो बात बताना शुरू किया उसके बाद तो जैसे मुझे झटका लगने वाला था....

"डॉक्टरर तपोती कैसी है? अरे आप कुछ कहती क्यूँ नही? प्ल्स बताइए क्या बात है?"......एका एक उस घड़ी आदम ने तेज़ी से जैसे सवालो का जवाब उत्सुकता पूरण माँगना चाहा

डॉक्टर ने आदम को शांत किया फिर उसने अपनी हड़बड़ाहट में अपनी जवाब दिया...."देखिए प्ल्स धीरज से काम रखिए दरअसल आपकी वाइफ को एक्सेस ब्लीडिंग हुई है और जिन वजहों से बर्त कॉंप्लिकेशन में ऐसे ख़तरे पैदा हो जाते है आपका साइन हमे लेना बहुत दरकार है साथ में आपके पेरेंट्स और वाइफ के घरवालो का भी"...........एका एक दिल मेरा ज़ोरो से धड़कने को हुआ...

अंजुम ने आगे बढ़ के डॉक्टर की ऐसी बात सुन उसे सवाली निगाहो से देखा...

अंजुम : आप ऐसा क्यूँ कह रही है? कोई रिस्क है क्या? क्या तपोती को कोई प्राब्लम?

डॉक्टर : देखिए ये बर्त कॉंप्लिकेशन का सीरीयस मॅटर है मुझे कहते हुए तो ठीक नही लग रहा बट हम माँ या बच्चे में से किसी एक की जान ही बचा सकते है

आदम : ये आप क्या कह रही है डॉक्टर? आप ऐसा कैसे कह सकती है? प्ल्स दो सम्तिंग सेव दा बोत लिव्स आइ बेग यू सेव दा बोत (एका एक जैसे मैं ये सुनके शॉक्ड था)

डॉक्टर : प्लस्स आप शांत हो जाइए प्लीज़ ऐसा होता है अक्सर कयि प्रेग्नेन्सी केसस में ऐसा होता है एक तो उन्हें काफ़ी पेन है और उपर से उनकी एक्सेस ब्लीडिंग की वजह से कॉंप्लिकेशन मेजर प्राब्लम खड़ी कर रहे है अगर ऐसे में हमारे पास सिर्फ़ एक यही विकल्प है हमने बहुत कोशिशें कर ली इसी नतीजे पे हम पहुचे है सो प्ल्स आप बड़े ही अहेतियात से कुछ सोचके जवाब दीजिएगा क्यूंकी ये दो जानो का सवाल है

 
मेरी तो गुस्से की इंतेहा ना रही थी मैं तो जैसे डॉक्टर पे बरस पड़ा उन्ही लोगो को तपोती के हुए इस हालत का कसूरवार ठहराने लगा...मुझे उस वक़्त माँ और पिता जी ने ही संभाला था...मैं बहुत बौखला गया था.....डॉक्टर ने माँ से एक आड़ होके कहा कि प्लस्स आप जल्दी कोई फ़ैसला लीजिए...माँ ने उन्हें बताया कि तपोती के जो भी है हम है उसके घरवालो में कोई नही है इसलिए वो लोग ही उसके गार्जियन भी है.....

माँ मुझे कुछ देर तक शांत करके बोली कि आदम बेटा तपोती की ज़िंदगी ख़तरे में है? अगर तूने जल्दी कोई फ़ैसला ना लिया तो शायद हम दोनो को खो देंगे मैं ये सुनके रो पड़ा....माँ ने मुझे अपने गले लगा लिया और मुझे चुप कराने लगी उनका कहना था कि इस वक़्त सबसे ज़्यादा इंपॉर्टेंट तपोती है ये सोचके फ़ैसला लेना कि शायद किस्मत में बच्चा इस वक़्त होना नही लिखा....

मैने फ़ैसला कर लिया था...डॉक्टर के कहे अनुसार मैने सारी फॉरमॅलिटीस भर दी उस वक़्त मेरा बहुत हाथ काँप रहा था....पिता जी और माँ ने तुरंत ही अपने साइन करे....और फॉर्म जमा दे दिया....उसके बाद ऑपरेशन का दौर शुरू हुआ.....हम बाहर ही खड़े हुए थे चुपचाप सदमे में घिरे....

करीब 3 घंटे के बाद डॉक्टर ने अपने दस्तानो को निकालते हुए बाहर कदम रखा....मैने उनसे पूछा कि डॉक्टर तपोती कैसी है? मेरा जवाब सुनके उन्होने मुस्कुराए कहा कि वो अब ख़तरे से बाहर है.....मुस्कुराहट जैसे फिर उदासी में तब्दील हुई और मुझे बताया गया कि मेरा होने वाला बच्चा अब इस दुनिया में नही रहा

ये सुनके माँ ने मुँह पे हाथ रख लिया और रो पड़ी...पिता जी भी अपने आँसू पोछते हुए मेरे कंधे पे हाथ रखके मुझे शांत करने लगे....मैं तुरंत डॉक्टर को हटाए रूम में दाखिल हो गया...उन लोगो ने मुझे रोकना चाहा पर माँ ने डॉक्टर को रिक्वेस्ट किया कि मुझे अंदर जाने दिया जाए....

मैं जब अंदर आया तो पाया बेड पर तपोती बेसूध आँखे मुन्दे बेहोश सी पड़ी हुई थी....उसकी ओर मशीनी उपकरण मज़ूद थे...और उसके हाथ पर नब्ज़ पर तार लगे हुए थे...मैं उसके पास स्टूल लिए बैठ कर उसके बेजान हाथ को पकड़े रो पड़ा...."सच में ये एक बहुत कठिन फ़ैसला था मेरी ज़िंदगी आज मुझे अहसास हुआ कि दूसरो के घर को उजाड़ने की ही जैसे ये एक सज़ा थी मैने रूपाली भाभी को माँ बनाया तबस्सुम दीदी के साथ नाजाएेज़ रिश्ते जोड़के उन्हें जुड़वा औलादें दी लेकिन अपने घर के लिए मैं कुछ ना कर पाया"......उस वक़्त माँ अंजुम ने ही मुझे काफ़ी सहारा दिया था.....मेरे पास आके मुझे बहुत समझाया और कहा कि ये बात तपोती को कहना बेहद ज़रूरी है...

तपोती को रात को होश आया था....उसके बाद जब मैने उसे तफ़सील से ब्यान किया कि क्या वजह हुई थी? अगर मैं फ़ैसला ना लेता तो उसे और अपने होने वाले बच्चे दोनो को खो देता...तपोती ये सुनके जैसे रो पड़ी...उसे बहुत दुख पहुचा था.....हॉस्पिटल से वापिस घर डिसचार्ज किए मैं और माँ तपोती को घर ले आए.....

लेकिन पहले जैसी रौनक खुशी जैसे जा चुकी थी...अब वो चेहेक्ति हँसती मुस्कुराती तपोती जैसे सदमें में रहा करती थी....मैने उसे काफ़ी समझाया माँ ने भी उसे काफ़ी समझाया कि होता है? ऐसे वाक़या हो जाता है इस्पे हमारा ज़ोर नही होता...लेकिन तपोती जैसे कुछ सुनने को तय्यार ही नही थी...धीरे धीरे उसने खाना पीना भी कम कर दिया...मुझे उसकी ये हालत देखी नही जा रही थी....कभी किसी के माँ बनने की खबर सुनती तो जैसे उसका फूल सा चेहरा मुरझा जाता तो कभी एका एक खुद को जैसे कयि बार कोस्ती.....ऐसा नही था कि उस हादसे के काफ़ी दिनो बाद हमने कोशिश नही की....मैने तपोती के साथ काफ़ी कोशिश की हर मुमकिन तरीका आज़माया उसे एक भी पल अकेला ना छोड़ा था....वो खुद ही जैसे और भी ज़्यादा पहले से वहशी सी हो गयी थी कोई भी रात मेरी महेज़ सोए नही गुज़र पाती थी...मैं थक चुका था लेकिन कोई रिज़ल्ट हाथ ना आ सका...

 
माँ से ये बात छुपी नही रही थी....और हम तपोती को लेके गाइनकॉलजिस्ट के पास एक बार फिर गये आख़िर काफ़ी चेक-अप और टेस्ट्स के बाद रिपोर्ट्स में मालूम चला कि उसके यूटरस की खराबी के वजहो से वो आगे माँ नही बन पाएगी....मुझे ये बात सुनके बेहद झटका लगा था....माँ ने ही उस वक़्त कैसे मुझे और तपोती को संभाला था सिर्फ़ मैं और तपोती ही जानते थे...ना सिर्फ़ तपोती बांझ बन गयी थी बल्कि इस गहरे सदमे की वजह से अंडर डिप्रेशन में चली गयी थी....डॉक्टर का सॉफ कहना था कि अगर उसने ज़्यादा टेन्षन ले लिया तो धीरे धीरे उसके जीवन से उसकी इच्छा ही समाप्त हो जाएगी....और मैं कत्तयि चंपा को खोने के बाद अपनी तपोती को नही खो सकता था....

काफ़ी महीने गुज़र गये और घर में एक मांतम सा माहौल छा गया...माँ ने मुझे काफ़ी समझाया और हौसला दिया कि जो हुआ उसमें हमारा कोई दोष नही जो खुदा ने किस्मत में लिखा है वैसे ही जीना चाहिए....मैने माँ से कहा कि मुझे तपोती का दुख देखा नही जाएगा उसने खाना पीना छोड़ दिया है घर के कमरे में अंधेरे किए कोने में कही दुब्कि सी रहती है किसी से कोई बात नही करती खोई खोई सी रहती है....माँ ने सॉफ पाया कि आज भी तपोती ने ठीक ढंग से नाश्ता नही किया था प्लेट डाइनिंग टेबल पे वैसी की वैसी पड़ी हुई थी...

आख़िर में अंजुम ने काफ़ी सोचने के बाद एक फ़ैसला लिया जो फ़ैसला उसके लिए काफ़ी परेशानी का सबब भी बन सकता था..उसकी उमर 43 साल हो चुकी थी लेकिन मांसिक उसे अभी भी होते थे उसे मालूम था कि इस निर्णय में उसका पति तो कभी उसका साथ नही देगा और बदनामी का डर सो अलग...लेकिन वो एक सास के साथ साथ अपने बेटे की माँ थी और उसका दुख उसकी माँ का दुख था...वो उसकी पत्नी भी थी इसलिए कुछ भी ग़लत कत्तयि नही हो सकता था....

उस रात तपोती के पास आई अंजुम ने उसके सर पे हाथ फेरा और उसके पास बैठके उसे तफ़सील से अपना निर्णय समझाने लगी....तपोती के नेत्र एका एक हैरत में फैलते हुए अंजुम की तरफ हुए....तपोती जानती थी कि बच्चा जानना अब उसके नसीब में नही लेकिन किसी ओर अंजुम का जो निर्णय था वो उसे खोई खुशिया वापिस लौटा सकता था...

अंजुम : मुझे तुम कसम दो कि कुछ भी हो जाए तुम उसे कभी पराया नही समझोगी वो तुम्हारी संतान होगी उसे अपना बच्चा समझके पालोगी खाओ कसम (ज़ज़्बात का जैसे एक पल गुज़रा तपोती के हाथो को थामे रोती अंजुम ने कहा)

तपोती : नही काकी ऐसा ना कहे आपने और इस परिवार ने जो मुझे खुशिया मुझे दी है उसके लिए मैं जितना काली माँ का शुक्रिया करू कम है आपने मुझे स्वीकार किया और एक ग़रीब बेसहारा राह से उठाके इस घर में बहू का दर्जा दिया आदम ने भी मुझे कभी दुखी नही देखा मैं जानती हूँ मेरे टूट जाने से घर की रौनक चली गयी है आप लोग दुखी रहने लगे हो आपने जो ये वादा किया है इसमें मैं आपके साथ हूँ और हमेशा रहूंगी (तपोती और अंजुम एकदुसरे से लिपटके रोने लगे सास-बहू का ये अटूट रिश्ता आँखे जैसे नम कर देने वाला था)

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"हरगिज़ नही माँ ये आप क्या सोच रही है? आपको पता भी है पिता जी हमारे साथ है अगर उन्हें ये बात मालूम लगी तो वो आपको तलाक़ दे देंगे माँ".....आदम ने माँ की तरफ देखते हुए कहा....

"देख आदम ये मेरा अपना फ़ैसला है तपोती की कोख सूनी से हरी हो जाए यही तो मैं चाहूँगी और तो और तू जानता है अपनी माँ को कि वो अब भी तेरे पैदा होने के इतने सालो बाद भी बच्चा पैदा करने लायक है...तूने देखा नही कि कितनी बार तुझे अहेतियात बरतने को कहा मैने...कभी निरोधक सहारा तो कभी गोलियो का सहारा लिया क्या अब भी तू ये समझता है कि मैं ऐसा इरादा नही कर सकती....और अल्लाह के दया से तुझमें भी कोई कमी नही है तो फिर क्यूँ नही समझता? ये तू कह रहा है जिसे कल्तक समाँज की फिकर नही थी ना फिकर हुई अपनी ही माँ से व्याबचारी रिश्ते जोड़ने की...फिर अपनी माँ को निक़ाह करने की तब तो तुझे किसी का ख्याल ना आया ना परिवार की बदनामी का गैरो का तो फिर आज क्यूँ?"........माँ ने मेरी तरफ ज़ोर से कहते हुए कहा.......जहाँ मैं अभी अड़ा रहा था..

आदम : देख माँ मैं जानता हूँ तुझमें भी कोई कमी नही तू अब भी बच्चा जनम देने लायक है लेकिन माँ जहाँ तक मैने पढ़ा है ज़्यादा उमर करके बच्चा लेने से रिस्क हो जाता है....कयि केस में औरत की मौ! (कहते कहते मैं ठहर गया नज़रें झुका ली)

आदम : बस माँ मैं जो कह दिया सो कह दिया मैं तुझे तो खासकरके खोना नही चाहता कि तू मेरे लिए महेज़ एक औलाद के लिए अपनी जान जोखिम में डाले

अंजुम : देख आदम बेटा तू बात समझ ऐसा कुछ नही है जैसा तू फील कर रहा है तू सोचके देख ना तू चाहता है और ना मैं कि तपोती घूँट घूँट के यूँ रोज़ मरती रहे उसे सदमे से बाहर निकाल बेटा प्लज़्ज़्ज़ प्ल्ज़्ज़ बेटा (माँ ने मुझे कस कर मेरे बाज़ुओं से झींझोड़ा)

मैने दूसरी ओर देखा तो पर्दे की आड़ में तपोती सुबक्ते हुए चुपचाप नज़रें झुकाए खड़ी थी...उसका चेहरा लटका हुआ था...मैं दोनो की ओर देखते हुए फ़ौरन घर से निकल गया....उस पूरे दिन दफ़्तर में मैं सोचता रहा...फीलडिंग के दौरान मेरी कार बाल बाल ट्रक से टकराते हुए बची एक दुर्घटना जैसे टल गयी.... मेरे तो जैसे जान में जान आई उस पल..मुझपे बहुत ज़्यादा सोच हावी था...कि मैं करूँ तो करूँ क्या?...उसी वक़्त मैने अपने फोन निकाला और माँ को कॉल लगाया...माँ ने तत्काल फोन उठाया उसके बाद हमारे बीच कुछ देर तक बात चीत हुई...

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अंजुम : देख आदम बेटा तू बात समझ ऐसा कुछ नही है जैसा तू फील कर रहा है तू सोचके देख ना तू चाहता है और ना मैं कि तपोती घूँट घूँट के यूँ रोज़ मरती रहे उसे सदमे से बाहर निकाल बेटा प्लज़्ज़्ज़ प्ल्ज़्ज़ बेटा (माँ ने मुझे कस कर मेरे बाज़ुओं से झींझोड़ा)

मैने दूसरी ओर देखा तो पर्दे की आड़ में तपोती सुबक्ते हुए चुपचाप नज़रें झुकाए खड़ी थी...उसका चेहरा लटका हुआ था...मैं दोनो की ओर देखते हुए फ़ौरन घर से निकल गया....उस पूरे दिन दफ़्तर में मैं सोचता रहा...फीलडिंग के दौरान मेरी कार बाल बाल ट्रक से टकराते हुए बची एक दुर्घटना जैसे टल गयी.... मेरे तो जैसे जान में जान आई उस पल..मुझपे बहुत ज़्यादा सोच हावी था...कि मैं करूँ तो करूँ क्या?...उसी वक़्त मैने अपने फोन निकाला और माँ को कॉल लगाया...माँ ने तत्काल फोन उठाया उसके बाद हमारे बीच कुछ देर तक बात चीत हुई...

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ab aage............

तपोती अपने बिस्तर पे कपड़े तय करके रख रही थी...तभी मैं ऑफीस से आया और हाथ में पॉलितेन में कुछ दवाइयाँ निकालके उसे टेबल पे रख दी...तपोती ने देखा कुछ आयुर्वेदिक मेडिसिन थे वो...तपोती ने मुझे कुछ नही कहा वो मेरे आते ही रसोईघर में चली गयी...रात को डिन्नर किए फारिग होते हुए मैने हाथ मुँह धोए कमरे में प्रवेश किया तपोती घुटनो पे सर रखकर बिस्तर पे बैठी हुई थी चुपचाप...मैं उसके पास आके बैठते हुए उससे गरम दूध माँगा...उसने मेरी तरफ देखा और बिना कुछ कहे किचन से गरमा गरम एक ग्लास भरके दूध लाया...मैने पास रखी आयुर्वेदिक की वो कॅप्सुल दूध के साथ निगल ली....उसके बाद मैने तपोती की ओर देखा और बोला कि वो सो जाए मैं आज दूसरे वाले कमरे में जा रहा हूँ...

तपोती समझ रही थी मैं क्या कह रहा था? उसने सहमति में सर हिलाया उसने मेरे कमरे से निकलते ही अपने कमरे का दरवाजा लगा लिया...मैने पाया पिता जी अपने रूम में सो रहे थे...उनके कमरे का दरवाजा सटा हुआ था...मैं फिर अपने तीसरे वाले कमरे में प्रवेश किया...तो पाया माँ नाइटी पहनी हुई मेरे ही इन्तिजार में बैठी थी...मैने मुस्कुरा के उसकी तरफ देखा तो उसने मेरी ओर मुस्कुराते हुए देखा....आज सुबह ही हम क्लिनिक गये थे और वहाँ डॉक्टर ने माँ से कहा था कि उन्हें औलाद तो हो सकती है लेकिन डेलेवर्री में रिस्क के चान्सस थोड़े से थे पर माँ ने सॉफ कह डाला कि उन्हें बच्चा लेना था....क्लिनिक के बाद माँ ने मुझसे सॉफ कह दिया था कि मेरे पिता तो हरगिज़ ये ना करने वाले से रहे...जो करना अब उसके दूसरे पति यानी उसके इकलौते बेटे यानी मुझे ही सबकुछ करना था....इसलिए जब हम घर लौटे तो मार्केट से मैने वीर्य को गाढ़ा करने वाली कुछ दवाइयाँ और सेक्स पवर को बढ़ाने वाली अपनी वहीं पुरानी दवाइया खरीद ली थी....जिनमें शिलाजीत और अश्वगंधा का मिश्रण भी मिला हुआ था...

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मैने आगे बढ़ते हुए माँ की नाइटी तुरंत उसकी टाँगों से उठाते हुए उपर उठाए लपेटते हुए पूरी उसके शरीर से उतारके उसे उनसे आज़ाद कर दिया....माँ एक झटके में मेरे सामने मदरजात नंगी खड़ी हुई थी...उसने आगे बढ़के मेरे पाजामे में बने तंबू को खीचके पैंट नीचे किया और मेरे लिंग को कस कर हाथो में लेके भीचा....

अंजुम : पूरा ज़ोर लगा दे आज बेटा पूरा जोर्र (माँ ने मेरे लंड को मुठियाते हुए मेरी आँखो में आँखे डालके ये बात कही)

मैने मशीन अंदाज़ में सर हिलाया और फिर उसे अपनी गोद में उठा लिया....माँ बढ़ती उमर के साथ भी आज भी किसी जवान जैसी वजनीय महिला थी...मैने उसे तुरंत बिस्तर पे लेटा दिया और फिर उसकी मोटी जाँघो पे अपनी ज़बान चलाते हुए उसकी टाँगों के करीब अपना सर ले आया....उसने फुरती से अपनी टांगे खोल ली तो मैने उसके बीचो बीच अपना मुँह रखा और उसकी फटी सूजी चूत के लबों को मुँह में दबोचते हुए खीचने लगा...

माँ कसमसा उठी अति उत्तेजना में उसने हाथ आगे ले जाके मेरी पीठ को सहलाया मैने उसकी चूत के होंठो को अच्छे से चूसा और उसकी फांको में अपनी नाक डालते हुए सूँघा....वाहह क्या खुश्बू थी? पेशाब और पसीने की जैसे मिली जुली महेक .....आज हम इतने महीनो बाद फिर जैसे एक हुए थे...

मेरी ज़ुबान चूत पे चलती रही...और बीच बीच में उसके दाने को गप्प से मुँह में लिए मैं चुस्स लेता..तो माँ होंठो को दाँतों से काटती...मैने अपनी चार उंगली अंदर चूत में प्रवेश करते हुए खूब ज़ोर ज़ोर से अंदर बाहर करना शुरू किया....जिसे माँ मारे उत्तेजना में अपना सर मारने लगी...मेरी उंगली की रफ़्तार तेज़ हुई तो माँ ने कस कर अपनी चूत में उनको जकड लिया और एक बार कूल्हें को हवा में उठाए फिर ढीला छोड़ गयी....इसके साथ उंगली करने से मैने अंगूठे से उसके दाने को रगड़ा...तो पाया कि चूत से फ़च फ़च की मादक आवाज़ निकल रही थी....

मैने जब उंगलिया बाहर निकाली तो उनपे काफ़ी ढेर सारा गाढ़ा सफेद रस लगा हुआ था....मैं और माँ 69 मुद्रा में हुए उनपे सवार होके मैने और भी कस कर अपने मुँह को उनके गुप्तांगो से जोड़ लिया और उनकी सिकुड़ी गान्ड की छेद पर भी जीब फैरने लगा....माँ मारें उत्तेजना में अपने उपर मुझे लिए मेरे लिंग को मुँह में भरके बड़े प्यार से चुस्स चुस्सके उसे लाल कर रही थी उसने अपने दोनो हाथो से उसे आगे पीछे करके खड़ा भी कर दिया...कुछ ही देर में मुझे अहसास हुआ कि अब वक़्त आ चुका है...

मैं उठा और माँ के मुँह में ही अपना लंड चुस्वाते हुए उसकी चूत से निकलती पानी की तेज़ धार पे अपना चेहरा रख दिया....उस नमकीन स्वाद को चखते ही जैसे मैं मूड में आ गया था...माँ ने टांगे एक मेरे उपर चढ़ा ली मैं सीधा उसके संग लेटते हुए उसकी चूत के प्रवेश द्वार छेद में ढेर सारा थूक मलके एक ही साँस में अपना लिंग अंदर सरका चुका था..पच की आवाज़ आई और गीली चूत ने अपने अंदर अपने पति के लंड को एक झटके में समा लिया...

 
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