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Incest Sagar (Completed)

Update 6 A.

भीड़ भाड़ तक मैंने कार ठीक चलाईं फिर मैंने अपनी बांई बांह उसके कन्धे के पीछे लपेटी और उसे अपनी तरफ खींचने की कोशिश की ।

" गाड़ी चलाने की तरफ तवज्जो दो " - वह मेरी बांह परे करते हुए बोली " एक्सीडेंट हो जाएगा ।"

" तुम तो दिल तोड़ रही हो "

" ऐसे ही हरकतों के कारण ट्रेन से ज्यादा रोड एक्सीडेंट्स होते हैं "

" अच्छा ।" मैं मायूसी से बोला ।

" एक बात बताओ "

" पुछो "

" ऐसी हरकतों से कितनी लड़कियां पटा चुके हो "

" एक भी नहीं "

" झुठ मत बोलो । इतने हैंडसम हो , सुन्दर हो , पढ़ें लिखे हो और उससे भी बड़ी बात लच्छेदार बातें करते हो ।"

" शुक्रिया । मुझे नहीं पता था कि मेरे में इतने सारे गुण है । "

" बोलो ना "

" अरे बोला न । कोई नहीं है । ....वैसे एक है जिस पर मैं ट्राई कर रहा हूं लेकिन वो तो मेरी बांह ही झटक देती है "

" सो सैड ।" मुस्करा कर बोली - " कौन है वो " ।

" हमारे रोहिणी की ही है । बेचारी की शादी गाजियाबाद में एक खुसट से हुई है "

" च..च..च... बेचारी ।" - अफसोस भरे स्वर में बोली ।

" एक बात कहूं ! "

" हां.. हां.. बोलो ।"

" अगर उसकी शादी नहीं हुई होती न तो मैं उसे जबरदस्ती उड़ा ले गया होता ।"

" और वो नहीं जाना चाहती तो ।"

" बोला न जबरदस्ती उड़ा ले गया होता ।"

" जबरदस्ती ! "

" हां , जबरदस्ती ।"

" उसका हसबैंड तुम्हें गोली मार देता ।"

" मैंने कहा अगर उसकी शादी नहीं हुई होती तो ...। वैसे भी मैं ब्लैक बेल्ट हूं , उसके हसबैंड जैसे तीन चार लोगों को तो मैं दो मिनट में छठी का दूध याद दिला दूं ।" - मैंने उसे अपना मसल दिखाते हुए कहा ।

" बड़ा घमंड है अपनी ताकत पर ।"

" घमंड नहीं विश्वास है ।....कभी आजमा लेना ।"

" मैं क्यों आजमाऊ । जिसे आजमानी है वो आजमाएं ।"

" सच कहूं तो मुझे उसके पति से बड़ी जलन होती है ।"

" वो क्यों भला ।"

" इतनी शानदार रसमलाई का रोज रोज भोग लगाता होगा ।"

उसने मेरे भुजाओं में एक जोरदार का पंच मारा ।

" आउच " - मैं अपनी भुजाएं सहलाने लगा ।

" क्या जोर से लगी ।" - उसने संवेदना प्रकट करते हुए कहा ।

" नहीं नहीं । ठीक हूं ।" - मैंने उसके बाल सहलाते हुए कहा ।

थोड़ी देर बाद हम गाजियाबाद उसके फ्लेट के नीचे पहुंचे । कार से उतरकर मैंने कहा - " श्वेता दी ! आप अन्दर चलो , मैं थोड़ी देर में आ रहा हूं ।"

" कहां जा रहे हो ।" उसने पूछा ।

" यहीं बगल में । आप चलो मैं दस मिनट में आया ।"

" अच्छा ।" कहकर जैसे ही वह पलटी कि मैंने उसे रोकते हुए कहा - " श्वेता दी । एक मिनट , रुकना जरा ।"

" क्या हुआ ।" - वह रूकते हुए बोली ।

" मुझे राजीव जीजू से कुछ personal बातें करनी थी , इसलिए आप हम दोनों को कुछ देर के लिए अकेला छोड़ देंगी ? "

" क्यों ! क्या बात है ।" - वह संशय भरे स्वर में बोली ।

" है कूछ बात जो मैं आपको अभी नहीं बता सकता । "

" नहीं । पहले मुझे बताओ बात क्या है ।"

" जब तक उनसे बात नहीं हो जाती तब तक आप को नहीं बता सकता । हां उनसे बात होने के बाद मैं आप को बता दूंगा , वादा करता हूं आपसे ।" - मैंने उनके दोनों हथेलियों को अपने हाथों से सहलाते हुए कहा ।

" कोई गड़बड़ वाली बात नहीं है न ।"

" नहीं । ऐसी बात नहीं है ।" मैंने उन्हें विश्वास दिलाते हुए कहा ।

" ठीक है फिर ।" कहकर वो अपने फ्लैट की तरफ चली गई ।

उनके जाने के पश्चात मैं भी एक तरफ चला गया । थोड़ी पुछताछ करने पर मैं उस PCO में प्रवेश किया जहां से किसी अज्ञात व्यक्ति ने पुलिस को अजय के मर्डर की सूचना दी थी ।

PCO वाला कोई साठ पैंसठ साल का बुजुर्ग था जो आंखों में चस्मा लगाए हुआ था । मैं वहां इस मकसद से आया था कि शायद वो उस अज्ञात मुखबिर के बारे में कुछ जानकारी दे दे । पहले तो बुड्ढा बड़ा ना नुकुर किया । फिर काफी समझाने के बाद बोला कि उस दिन सुबह दस बजे से ही काफी बारिश हो रही थी । और इस कारण PCO में भीड़ नहीं थी । सिर्फ पांच या छः लोग ही उस दिन आये थे जो सभी के सभी मर्द थे । वो उनमें से किसी को भी पहचानता नहीं था । और जो लोग आये थे उन्हें दुबारा देखने पर पहचान भी नहीं पाएगा । ये सारी बातें तो पुलिस के द्वारा मुझे पहले से ही मालूम थी ।

मैं निराश हो कर श्वेता दी के फ्लेट के तरह चला गया ।

जब मैं जीजा के घर पहुंचा तब श्वेता दी ने अपने कपड़े चेंज कर ली थी और जीजू कमरे में blanket से ढके टीबी देख रहे थे । मुझे देखते ही उनके चेहरे पर मुस्कान आई ।

" आओ सागर । बैठो ।" उन्होंने बैठते हुए कहा ।

मैंने उनको नमस्कार करते हुए कहा - " अरे ! अरे ! आप लेटे रहो । कैसी तबीयत है अभी ।"

" ठीक हूं । पहले से बेहतर हूं ।"

मैंने उनका नब्ज छुआ । बुखार नहीं था । मैं उनके बगल में बिस्तर पर बैठ गया । तभी श्वेता दी ने चाय लाई और वो बिस्तर के पास लगे सोफे पर बैठ गई ।

चाय पीते हुए जीजा ने कहा - " तुम्हारे दोस्त अमर के क़ातिल का कुछ पता चला ?"

" अभी तक तो नहीं " मैं चाय की चुस्की लेते हुए कहा ।

" मेरे तो समझ में नहीं आ रहा है कि वह यहां कर क्या रहा था ? किसी ने आखिर उसे क्यों मारा ।"

" ये तो मुझे भी नहीं पता लेकिन वो जो भी हो आखिर में कब तक कानून के नजरों से छुपा रहेगा, कभी ना कभी तो पकड़ा जाएगा ही ।" - कहते हुए मैंने श्वेता दी को इशारा किया तो वो आंखों ही आंखों से हामी भरी ।

" मैं जरा किराने की दुकान से आ रही हूं " श्वेता दी ‌ने जीजू से कहा । और फिर मुझसे बोली - " तुम बैठो । खाना खा कर ही जाना । मैं बस थोड़ी देर में आईं ।"

मैंने सहमति में सिर हिलाया । वह चली गई ।

चाय खतम हो गई थी । मैंने क्लासिक का पैकेट निकाला और जीजा को आफर किया । उन्होंने सिगरेट निकाली लेकिन पीने का उपक्रम नहीं किया । मैंने अपनी सिगरेट सुलगाई , एक गहरा कश लगाया फिर जीजा की तरफ देखते हुए कहा ।

" जीजू , मुझे आप से कूछ बातें पुछनी थी ।"

" पुछो ।"

" मुझे पुरा विश्वास है कि मैं आप से जो कुछ पूछूंगा उसका जवाब आप सच सच देंगे ।"

" क्या बात है ! क्या पुछना चाहते हो ।" उन्होंने संशय भरे स्वर में कहा ।

" क्या आप ने अमर का खून किया ।" - मैंने स्पष्ट शब्दों में कहा ।

" क्या बकवास करते हो । मैं क्यों भला उसका खून करूंगा । मैं तो उसे ढंग से जानता तक नहीं ।"

" ओके । मान लिया । " - मैं उनके आंखों पर अपनी नजरें टिकाए बोला - " आप के फ्लेट में उस दिन जो लड़की थी , वो कौन थी ।"

" म.. मुझे क्या पता । होगी कोई । शायद कोई चोर होगी ।"

" आप उस लड़की को नहीं जानते ।"

" नहीं । मैं नहीं जानता ।"

" आप की जानकारी के लिए बता दूं कि मैं उस लड़की , उस कटे बालों वाली लड़की से मिल चुका हूं ।"

" क्या ! " अब जीजा कुछ बेचैन सा हो गया । उसने पहलु बदलते हुए कहा - " क. कौन है वो ।"

" ये तो आप मुझे बताइए कि वो कौन है जो आप के फ्लेट में आप का इन्तजार कर रही थी । और अगर .... अगर उसने लाश नहीं देखी होती तो वो वहां से भागती नहीं बल्कि आप के आने तक आप का इन्तजार कर रही होती ।"

अब जीजा के सर पर हवाइयां उड़ने लगा। वो बैचैन हुआ । इस बार उसने सिगरेट सुलगाई और उसके लम्बे लम्बे कश लगाया लगा |

वो बड़ी मुश्किल से बोला - " म. मैं तुम्हें सारी बातें बताता हूं लेकिन तुम्हें एक वादा करना होगा कि ये सब तुम श्वेता को नहीं बताओगे ।"

" जीजा ! ये एक कत्ल का मामला है । मेरे सबसे अजीज दोस्त अमर के कत्ल का । एक बुड्ढी औरत के एकलौते पुत्र का जिसकी जिन्दगी में उसके अलावा और कोई सहारा नहीं था । जिसकी जिन्दगी में अब दुःख और सिसकियों के अलावा कुछ नहीं बचा ।"

" वो अनुष्का थी । - " जीजा थके स्वर में बोला - " कालेज के दिनों में हम बहुत अच्छे दोस्त हुआ करते थे । धीरे धीरे हममें प्यार हुआ । मैं उससे शादी करना चाहता था लेकिन..." ।

" लेकिन क्या ? " मैं उत्सुकता से बोला ।

" उसके सपने काफी ऊंचे थे । वो रईसी की जिन्दगी जीने में यकीन करती थी । उसका सपना था कि उसका पति काफी अमीर हो । उसके पास गाड़ी हो , शोपिंग करने के लिए अनाप-शनाप पैसे हों , सोसल स्टेटस हो । लेकिन मैं ठहरा एक मध्यम वर्गीय परिवार का । मैं भला कहां से उसे ये सब दे पाता । एक साल के अफेयर के बाद उसने मुझे छोड़ दिया । फिर ना जाने कहां वो गायब हो गई ।"

" फिर आप से दुबारा कब मुलाकात हुई ।"

" उसके छः साल बाद एक दिन मैं अपने दोस्तों के साथ पैराडाइज क्लब गया । वहां वो मिली । स्वीमिंगपूल में । फिर उसके बाद हम कई बार मिले । उसने बताया उसकी शादी हो चुकी है किसी कुलभूषण खन्ना से । वो उसी पैराडाइज क्लब का मैनेजर था । कहने को तो वो क्लब का मैनेजर था लेकिन असलियत में उस क्लब के पचास पर्सेंट का हिस्सेदार था । उस क्लब के अलावा वो एक नाइटक्लब का भी मालिक है जो पहाड़गंज में है ।"

जीजा थोड़ी देर रुका फिर बोला ।

" उसकी शादी एक अमीर व्यक्ति से हो तो गई थी , उसके सपने भी पुरे हो रहे थे लेकिन शारीरिक जरूरतें से वो महरुम हो गई थी । उसका पति उसके जरूरतों को पूरा करने में असक्षम था । और कहते हैं ना पहला प्यार भुलाए नहीं भूलता । हम मिलने लगे । और फिर काफी करीब हो गये ।" कहकर जीजा चुप हो गया ।

" तो उस दिन आप दोनों की डेटिंग थी ।"

" हां । इसीलिए आफिस से बहाना बना कर जल्दी घर आ गया था ।"

" आप को क्या लगता है ? क्या उसने खून किया होगा ? क्या वो हिंसक प्रवृत्ति की है ।"

" नहीं , नहीं । वो कुछ भी हो सकती है लेकिन खुनी नहीं हो सकती है ।"

मैं उनसे कुछ और पुछता तभी श्वेता दी आ गई और हमारी बातों पर विराम लग गया ।

उसके बाद कुछ खास नहीं हुआ । खाना खाने के दौरान श्वेता दी ने जीजू से कहा - " उर्वशी और उसके हसबैंड ने हमें अपने घर बुलाया है । उनकी शादी की रिसेप्शन है परसों ।"

तभी मुझे याद आया कि जिस दिन अमर का खून हुआ था उसी दिन उनकी शादी थी ।

" मैं कैसे जा सकता हूं । अभी मुझे तो ठीक होने में कम से कम पांच सात दिन तक तो लग ही जायेंगे ।" - जीजा ने कहा ।

श्वेता दी उदास हो गई ।

" जाना कहां है ।" मैं खाते खाते पुछा ।

" आगरा ।" श्वेता दी गई कहा ।

" तुम सागर के साथ क्यों नहीं चली जाती " - श्वेता दी की उदासी देखकर जीजा ने कहा ।

" म..म.. मैं ।" मैं हड़बड़ा कर बोला ।

" हां । ये सही रहेगा । चलो न सागर । प्लीज़ ! एक ही तो सहेली है मेरी । मेरे नहीं जाने से वो बहुत गुस्सा करेगी ।" श्वेता दी ने कहा ।

" अरे ! मैं कैसे जा सकता हूं । कालेज जाना है फिर शाम को कराटे क्लास के लिए जाना है ।"

" प्लीज़ ! एक दिन की तो बात है । क्या एक दिन के लिए भी मेरे लिए तुम्हारे पास समय नहीं है ।" - उसने इमोशनल होते हुए कहा ।

" ओके ओके । चलूंगा ।" मैंने मुस्कराते हुए कहा ।

तभी जीजा ने अपनी राय दी । " सागर , तुम दिल्ली से ट्रेन से ही आ जाना और यहां से मेरी कार से आगरा चले जाना ।"

" ठीक है ।" कहकर मैं खाने की थाली से उठा और मुंह धोकर वापस आया ।

फिर मैंने जीजा से जाने की अनुमति ले कर दरवाजे की तरफ चल दिया । श्वेता दी मुझे छोड़ने दरवाजे तक आई ।

" बातें हो गई ।" श्वेता दी ने पूछा ।

" हां । बातें हो गई ।"

" फिर बताओ ।"

" मैंने आपको बताया था न कि बताउंगा । थोड़ी सब्र करो ।" कहकर मैंने उनको हग किया और दरवाजे से बाहर निकल गया । तभी श्वेता दी बोली -

" रूको ।

मैं रूक गया ।

" यहां आओ ।"

मैं उनके पास गया ।

वो मेरे गले लगी और मेरे दाहिने गाल पर एक किस कर दी ।

" अब जाओ ।" उन्होंने मुस्करा कर कहा ।

मैंने अपने होंठ की तरफ इशारा किया तो मुस्कराते हुए मुझे धक्का दिया और बोली - " परसो सुबह आठ बजे तक आ जाना ।"

" जो आज्ञा तुफाने हमदम ।" - मैंने हल्के से सर को झुकाया और अपने घर को निकल गया ।
 
Update 7.

अगले दिन सुबह जब मैं सो कर उठा तब हल्की हल्की बारिश हो रही थी । मैंने खिड़की से झांक कर देखा तो आसमान में हल्के-हल्के बादल आंख मिचौली खेल रहे थे । अप्रैल का महीना बारिश का नहीं होता है लेकिन हमारे यहां मौसम कब पलट जाए कोई नहीं जानता । शायद इसीलिए भारतीय मानसून को जुए का खेल कहा जाता है । मैं नित्य कर्म से निवृत्त हो कर अपने बिस्तर पर बैठ गया और पिछले कुछ दिनों से चल रहे घटनाओं के बारे में सोचने लगा ।

तभी वहां रीतु आईं ।

" नाश्ता नहीं करना है क्या " रीतु बोली ।

मैंने उसे देखा । नहा धो कर वह किसी ताजा ताजा खिले कली के समान लग रही थी । उसके शरीर से किसी सुगन्धित सेंट की खुशबू आ रही थी । वैसे उसे किसी भी आर्टिफिशियल सेंट की कोई जरूरत नहीं थी। उसने लेगिंग्स और टाप पहना था जिसमें उसके शरीर के उतार चढ़ाव किसी भी भी विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए काफी था । कितनी खूबसूरत है मेरी बहन ।

मैंने एक लम्बी सांस ली और उसके साथ नीचे हाल में आ गया ।

" क्या बात है ! आज बड़ी देर कर दी ।" माॅम ने पूछा ।

" कोई खास बात नहीं है माॅम । चलो जल्दी से नाश्ता लगाओ ।" मैं कुर्सी पर बैठते हुए बोला ।

माॅम ने नाश्ता निकाला । हम दोनों भाई बहन नाश्ता करने लगे । डैड ड्यूटी चले गए थे । थोड़ी देर बाद माॅम भी अपना नाश्ता ले कर हमारे साथ ही बैठ गई ।

" माॅम ! कल मुझे श्वेता दी को लेकर आगरा जाना है ।" मैंने खाने के दौरान कहा ।

" क्यों । " माॅम ने प्रश्न सूचक दृष्टि से देखा ।

" उनकी सहेली उर्वशी की शादी की रिसेप्शन है ।"

" तो तुम क्यों जा रहे हो । जीजू नहीं है क्या ।" रीतु ने बीच में टोकते हुए कहा ।

" नहीं । उनकी तबीयत थोड़ी रिवर्स गियर में चल रही है ।" मैंने उसे देखकर मजाक करते हुए कहा ।

" तब कल तो आ नहीं पाओगे ? " माॅम ने पूछा ।

" पता नहीं । ये तो वहां जाने के बाद मालूम पड़ेगा ।"

अभी हम बातें कर ही रहे थे कि मेरा मोबाइल बजने लगा । मैंने देखा किसी अनजान नंबर से फोन था । मैंने फोन पिक अप किया ।

" हैलो ! सागर जी ? "

" हां जी । बोलिए ।" मैंने कहा

" मैं अनुष्का ।"

" जी , जी अनुष्का जी कहिए ।"

" यदि आज आप फ्री हो तो क्या हम मिल सकते हैं ।"

" क्यों नहीं । बोलिए कहा और कब आना होगा ।"

" निजामुद्दीन स्टेशन के पास दो बजे तक आ जाइए ।"

" ओके । मैं पहुंच जाऊंगा ।"

फिर ' बाय ' बोलकर उसने फोन काट दिया । अभी उस वक्त दस ही बजे थे मतलब चार घंटे बाद । नाश्ता भी हमारा हो गया था । फिर मैंने माॅम को कालेज जाने की बोलकर घर से निकल गया ।

कालेज से ही मैं निजामुद्दीन स्टेशन पहुंचा । वहां अगल बगल नजरें दौड़ाई तभी किसी ने मेरा ‌नाम लेकर पुकारा । मैंने देखा अनुष्का कार में बैठे मुझे ईसारे से बुला रही थी । मैं उसके पास गया । उसने मुझे कार में बैठने को कहा । मैं उसके बगल बैठ गया ।कार में उसके सिवा और कोई नहीं था ।

" मुझे शक है कि मेरी निगरानी के लिए मेरे पति ने किसी को मेरे पिछे लगा रखा है । एक आदमी मुझे अपने पिछे लगा हुआ दिखा लेकिन मैं उसे डाज देने में कामयाब हो गई ।" अनुष्का ड्राइव करती हुई बोली ।

" अच्छा ! बहुत होशियार है आप ।"

" वो तो मैं हूं ।" वो मुदित मन से बोली ।

" अब हम कहां जा रहे हैं ।"

" जहां तुम कहो ।"

" जी ! किसी खास जगह चलें ।"

" कैसी खास जगह ।"

" जहां तन्हाई हो । नीम अंधेरा हो । रोमांटिक म्यूजिक हो । जहां जाम छलकते हों । शराब के भी और शवाव के भी ।"

" ऐसी कोई जगह है यहां

" एक नहीं कई है ।"

" कहां है ? " वह संशय भरे दृष्टि डाली ।

" होटल में ।"

" बीबी झाड़ू लेकर सर गंजी कर देगी ।"

" आप के खादिम के पास झाड़ू तो है लेकिन बीबी नहीं ।"

" क्यों । मायके गई है ।"

" है ही नहीं ।"

" इस बात का अफसोस है या खुशी ।"

" दोनों । कभी अफसोस कभी खुशी ।"

" मतलब ।"

" " सर्दियों की तन्हा रातों में अफसोस और बाकी खुशी ।"

" काफी रंगीन किस्म के आदमी हो ।"

" ऐसा ही है कुछ ।"

" बातें बढ़िया करते हो ।"

" मैं और भी कई काम बढ़िया करता हूं लेकिन वो फिर कभी । "

उसके बाद हम निजामुद्दीन में ही कनिष्क नामक बार एंड रेस्टोरेंट में गये । वहां एक कोने की टेबल पर आमने-सामने बैठने की जगह अगल बगल बैठ गये ।

" क्या लोगे " " उसने कहा ।

" जो आप कहो ।"

थोड़ी देर बाद हमारे टेबल पर काफी की ग्लास आई ।

" उस दिन मेरे पति के सामने मेरी पोल न खोलने के लिए शुक्रिया ।"

" वो सब छोड़ो , उस दिन मैंने जो सवाल पूछा था उसका जवाब दो ।"

" देखो ! मुझे राजीव ने बता दिया है कि उससे तुम्हारी बात हुई है । तुम सब कुछ तो जान ही चुके हो ।"

" सब कुछ नहीं । दी के आने से बात अधुरी रह गई थी । तुम अपने बारे में कुछ बताओ ।"

" मैं , मैं मेरठ की रहने वाली हूं । मेरे घर में मेरे अलावा सिर्फ एक बहन है जो वहीं रहती है । हमारे मां बाप बहुत पहले गुजर चुके थे ।हमारी जिंदगी काफी ग़रीबी में कटी है , हमने अपने जिन्दगी में इतने अभाव देखें है कि उन दिनों की याद करके आज भी हमारी रूह कांप जाती है ।" वो जैसे बिते दिनों में खो सी गई थी ।

" फिर । फिर क्या हुआ ।"

मेरे टोकने पर वह धरातल पर आई ।

" हमारे पास इतने पैसे भी नहीं थे कि हम अपर क्लास की शिक्षा पूरी कर पाते । वीणा की तो पढ़ाई में कोई खास रूचि नहीं थी लेकिन मैं पढ़ना चाहती थी । मैं कुछ करना चाहती थी । मैं कुछ बनना चाहती थी । मैंने , मां की कुछ जेवर थी , वो बेच कर दिल्ली आ गयी । यहां आकर कालेज में दाखिला लिया । यहीं राजीव से मुलाकात हुई । "

मैं चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था । थोड़ी देर बाद वो बोली ।

" वो मुझ से शादी करना चाहता था लेकिन मैंने जो कष्ट , जो जिल्लत , जो अभाव देखा था वो मुझे रह रह कर डरावने ख्वाब की तरह डसता था । राजीव एक अच्छा लड़का था लेकिन वो मेरे सपनों को पूरा करने में सक्षम नहीं था । करीब एक साल के बाद हमने आपसी रजामंदी से अलग अलग रास्ते चुन लिए । "

" तुम्हारी मुलाकात कुलभूषण खन्ना से कैसे हुई ? " मैंने पूछा ।

" वो हमारे कालेज के principal का दोस्त था । एक दिन वो कालेज principal से मिलने आया था , तभी उसने मुझे देखा था ।
वो मुझ पर फिदा हो गया और दो चार मुलाकात में ही शादी का प्रस्ताव रख दिया ।... मैंने बहुत सोचा । महिनों सोचा फिर लास्ट में उसे हां कर दी । "

मैं चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा । मैं उसके दुबारा बोलने की प्रतीक्षा करता रहा ।

" आप उस दिन राजीव के फ्लेट में क्या कर रही थी ।" मैंने पुराना सवाल फिर दोहराया ।

थोड़ी देर बाद वो बोली ।
" राजीव से दुबारा छः महीने पहले मुलाकात हुई । वो अपने दोस्तों के साथ पैराडाइज क्लब आया था । मैं उस वक्त अपनी सहेलियों के साथ स्वीमिंगपूल में थी । हमारी बातें हुई ।उसने बताया उसकी शादी डेढ़ साल पहले हो चुकी है । मैंने भी अपने बारे में बताया । फिर कुछ और मुलाकातें हुईं और हम दुबारा दोस्त बन गए । ...उस दिन हमारी राजीव के फ्लेट पर डेट थी । मैं वहां सुबह के ग्यारह बजे पहुंची थी । राजीव ने अपने फ्लैट की डुप्लीकेट चाबी मुझे पहले ही दे दी थी । जब मैं वहां पहुंची तब दरवाजा खुला था । मैंने सोचा वो फ्लेट में ही होगा लेकिन वो वहां नहीं था । मैंने उसे फ़ोन किया तो उसने बताया कि वह रास्ते में है । मैं थोड़ी देर बिस्तर पर लेट गई । थोड़ी देर बाद मैं हाथ मुंह धोने बाथरूम गई । वहां मैंने एक आदमी को बाथ-टब में पड़े हुए देखा । मैं डर गई फिर मैंने उसके पास जाकर देखा तो वह मरा पड़ा था । उसे गोली लगी थी । मेरे छक्के छूट गये ।मैं काफी भयभीत हो गयी । फिर जल्दी से वहां से भाग कर निकल ही रही थी कि तुम आ गए ।"

वो चुप हो गई ।

मैं कुछ समझ तक चुप रहा फिर मैंने सिगरेट निकाल कर उसे आफर की तो उसने पैकेट में से एक सिगरेट निकाल ली । फिर मैंने भी सिगरेट निकाली और उसकी सिगरेट सुलगाने के बाद अपनी सुलगाई ।

सिगरेट के चार पांच कश लगाने के बाद वो थोड़ी नार्मल हुई ।

" तुम्हारे पति को राजीव के साथ अफेयर की कोई खबर है ? " मैंने सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए कहा ।

" पता नहीं..... मेरा पति बहुत ईष्र्या करने वाला आदमी है ।" उसने कहा ।

" कोई बड़ी बात नहीं । आप जैसी खुबसूरत औरत का पति जो कोई भी होगा , ऐसा ही होगा ।" मैंने मज़ाक कर कहा ।

" हर किसी पे शक करने वाला ? "

" वो हर किसी पे शक करता है ? "

" हां ।"

" फिर तो मुझे यूं आपके करीब नहीं बैठा होना चाहिए ।"

" अरे ! वो तुम पर शक नहीं करता ।"

" मैं इसे अपनी खुशकिस्मती समझु या तौहीन ।"

वह हंसी फिर बोली - " सुनो , मैं तुमसे एक वादा चाहती हूं ।"

" कैसा वादा ।'

" कि तुम मेरे राज को आगे भी राज रखोगे ।"

" लगता है आप अपने पति से बहुत डरती है ।"

" हां । बहुत ज्यादा ।"

" आप की बनती नहीं उनसे ।"

" नहीं ।"

" तो फिर छोड़ क्यों नहीं देती ।"

" मैं ऐसा नहीं कर सकती ।"

" क्योंकी वो अमीर है । क्योंकी दौलत के बिना आप नहीं रह सकती ।"

उसने आहत भाव से मेरी तरफ देखा ।

औरत ही ऐसा कर सकती है कि चित भी उसकी हो और पट भी उसकी । वो दो किशितयो में सवार होकर चाह सकती हैं कि मझधार में न गिरे । औरत के मन में क्या है , कौन माई का लाल बता सकता है । ( मैं मन ही मन सोचा )

" फिलहाल मुझे नहीं मालूम कि अमर की मौत से आपका कोई रिश्ता है या नहीं । और अभी तक आप के बारे में पुलिस को भी कुछ नहीं पता । अगर आप बेगुनाह है तो बेफिक्र होकर रहिए । ... लेकिन अगर आप गुनाहगार है तो अभी से पनाह तलाश करनी शुरू कर दीजिए ।" मैंने कहा ।

उसके चेहरे पर सख्त नाराजगी के भाव उभरे ‌। वो जोर से लम्बी लम्बी सांसें लेने लगी ।

" मिस्टर सागर ।'

" यस मैडम ।"

" मुझे तुम से ऐसी उम्मीद नहीं थी ।"

" कैसी उम्मीद नहीं थी मैडम ! "

" कि तुम्हें मेरा जरा भी लिहाज नहीं होगा । मैं इतनी दूर से तुम्हारे पास आईं और तुम...."।

" इज्जत अफजाई का शुक्रिया । " मैंने हल्के से सिर झुका कर कहा ।

वो खड़ी हुई और अपना पर्स उठाते हुए बोली -" मैं तुम से फिर बात करूंगी ।"

" वैलकम मैडम ।"

फिर दनदनाते हुए रेस्टोरेंट से बाहर निकल गई । मैं कुछ देर तक वहीं बैठा सोचता रहा फिर मैं वहां से निकल गया ।

"
 
Update 8.

दोपहर बाद जब मैं घर पहुंचा तो माॅम ने खाना लगाया । रीतु अपनी सहेली काजल से मिलने गयी थी । मैं अपने कमरे में गया । कुछ देर आराम करने करने के बाद पैराडाइज क्लब चला गया । आज कुलभूषण खन्ना नहीं आया था । वहां ड्यूटी देने के बाद मैंने कुलभूषण खन्ना के असिस्टेंट से एक दिन की छुट्टी लेकर घर आ गया । आठ बज गए थे लेकिन अभी तक रीतु आईं नहीं थी । माॅम से पूछा तो उन्होंने कहा वो नौ बजे तक लौटोगे । माॅम ने खाने के लिए पुछा तो मैंने रीतु के आने तक इन्तजार करने के लिए कहा ।

मैं अपने कमरे में गया । कपड़े बदले और छत पर टहलने लगा । तभी मुझे याद आया कि मैंने अपने ब्लेजर और पैंट तो लांड्रिंग में दिए हैं, वो तो मैं लाना ही भूल गया । मैंने रीतु को फोन लगाया और उससे पूछा वो अभी काजल के पास ही है या वहां से निकल गई है तो उसने कहा आधे घंटे में निकल रही है । मैंने उससे कहा कि आते समय रास्ते में ही जो लाउंड्री है और उससे मेरी बात करा देना और मेरी कपड़े लेती आना ।

पहले तो बड़ी आना कानी करी कि वो लांड्रिंग वाला उसके आते वक्त रास्ते में नहीं पड़ेगा , वो जगह दुर है , वो बस से नहीं आयेगी , बस से आने से कपड़े खराब हो जायेंगे , गर्मी से मेरी पोलिस उत्तर जायेगी , कैब से आयेगी , कैब के भाड़े के पैसे नहीं हैं , तब मैंने बड़ी मुश्किल से उसे कपड़े लेकर आने के लिए तैयार किया ।

रीतु को किसी बात के लिए convince कराना बड़ी टेड़ी खीर है । ये शर्तिया अपने हसबैंड को नाकों चने चबवा देगी । मैं जा कर अपने बेड पर लेट गया और पिछले दिनों के बारे में सोचने लगा ।

करीब एक आध घंटे बाद रीतु आईं और मेरे आयरन किए हुए कपड़े सलिके से बिस्तर पर रख दी । मैंने उसे देखा वो इस वक्त एक हरे रंग का सलवार सूट पहनी थी । उसके शरीर से आती वही जानी पहचानी खुशबू । हमेशा की तरह जगमग जगमग ।

" बस में तुम्हारी पालिश तो ‌नही उतरी ।" मैंने कहा ।

" नहीं उतरी ।" वो खड़े खड़े ही बोली ।

" अंदेशा तो बहुत था तुम्हें ।"

" हां । अलबत्ता उससे ज्यादा बुरी बात हो गई ।"

" क्या ?" मैं सशंकित स्वर में बोला ।

" बस में कुछ लफंगे सवार थे ।"

" ओहो !" - मैं हमदर्दी भरे स्वर में बोला - " उन्होंने तुम्हें छेड़ा होगा , गन्दे इशारे किए होंगे , फब्तियां कसी होंगी ।"

" इससे भी बुरा किया कमीनों ने ।"

" अच्छा !" क्या किया उन्होंने ?"

" उन्होंने मुझे हर तरह से नजर अंदाज कर दिया , मेरी तरफ झांका भी नहीं , पीठ फेर ली मेरी तरफ से ।"

" यह तो वाकई बुरा किया कमीनों ने ।"

" हां न । आप यदि मुझे कैब से आने को बोले होते तो क्या होती मेरी इतनी बेइज्जती ।" " आप ..........."

उसकी बक बक शुरू हो गई थी और मैं चुपचाप उसे देखे जा रहा था । मैं जानता था कि वो कैब से ही आयी होगी लेकिन उसे तो मुझसे अपनी बक बक करनी थी । मुझे तो उसकी बक बक भी बहुत प्यारी और सेक्सी लगती थी । उसके बोलने का अंदाज , उसके लबों का हिलना, उसके हाथों का झटकना, बोलते वक्त उसके लटो का उसके गालों को चूमना । मैं तो जैसे कहीं खो गया था ।

" लगता है अभी तक आपने डीनर नहीं किया ।"

" क.. क्या कहा ? " मैं जैसे होश में आया ।

" मैंने कहा लगता है अभी तक आपने डीनर नहीं किया ।"

" कैसे जाना ?" मैं हकबकाया ।

" आंखों ही आंखों में मुझे निगल जाने की कोशिश जो कर रहे हो ।"

" सिर्फ कोशिश कर रहा हूं ।" - मैंने नकली आह भरी - " कोशिशें तो मैं और भी बहुत करता हूं लेकिन कामयाब कहां हो पाता हूं ।"

" कयी बार कोशिश में कामयाबी से ज्यादा मजा आता है ।"

" वो कैसे ?"

" कोशिश इनसान बार बार करता है । कामयाबी के बाद वो कहानी खतम हो जाती है ।"

" क्या बात है , आज तो बड़ी काबिलियत भरी बातें कर रही है ।"

" मैं अक्सर काबिलियत भरी बातें करती हूं , खास तौर से सूर्य अस्त होने के बाद ।"

" गुड । अब अपनी प्रवचन बन्द कर मुझे जोरों से भुख लगी है ।"

" तो मैंने आपको खाने से रोका है कब से खुद ही बक बक किये जा रहे हो ।" वो अपनी आंखें तरेरती हुई बोली ।

फिर खाना खाने के बाद मैं अपने कमरे में आ गया और आगरा जाने के लिए अपने बैग तैयार किया और फिर बिस्तर के हवाले हो गया ।

सुबह साढ़े आठ बजे होंगे जब मैं गाजियाबाद श्वेता दी के फ्लेट पहुंचा । जीजा अपने कमरे में आराम कर रहा था । श्वेता दी तैयार हो गई थी । उन्होंने पीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी । बिना आस्तीन का ब्लाउज जिसमें उनके गोरी माशल भुजाएं काफी आकर्षित लग रही थी । ब्लाउज का गला v आकार का था जिसमें से उनकी cleavage कुछ हद तक नुमाइश हो रही थी । गले में मंगलसूत्र के अलावा बदन पर कुछ और भी गहने पहन रखी थी । उनका गदराया हुआ यौवन किसी भी इन्सान को घायल करने के लिए पर्याप्त था ।

मैंने नाश्ता वहीं किया फिर जीजा से इजाजत लेकर हम दोनों कार लेकर वहां से निकल गये । मैं ड्राइव कर रहा था और वो आगे वाली सीट पर मेरे बगल बैठी थी । कुछ दुर तक हम शान्त ही रहे । जब कार भीड़ भाड़ वाले एरिया से बाहर निकल मेन रोड पर आई तब श्वेता दी ने कहा ।

" अब बताओ क्या बात है "

" कैसी बात ? " मैंने नजरें स्क्रीन से हटाकर उनकी तरफ देखा ।

" जब तुम राजीव से प्रायवेट बात करने को बोल कर मुझे वहां से हटने के लिए बोले थे।"

" ओह ! वो । " मैं वापस नजरें स्क्रीन पर रखते हुए कहा - " " बता दुंगा , थोड़ी धीरज रखो ।"

" नहीं । अभी बताओ ।"

" वो काफी लम्बी कहानी है , इस वक्त कार ड्राइव करते हुए कैसे बोल सकता हूं । एक काम करते हैं वहां पहुंच कर बताता हूं । वहां अकेले में हमें काफी समय मिलेगा ।"

" ओके ।" बोलकर वो चुप हो गई । कुछ देर बाद वो एक्साइटेड हो कर बोली - " आज कितने दिनों के बाद न हम किसी पार्टी में शामिल हो रही हैं , कितना मजा आयेगा । है ना ।"

" हां । तुम्हारे शादी के बाद पहली बार ।" - मैंने मुस्कराते हुए कहा ।

" हां । जब हम छोटे थे कितने मस्ती करते थे , कितने झगड़ते थे । "- वो कहीं खोई खोई सी बोली । - " और अब जैसे लगता है मैं अपना बचपन भुल गयी हूं ।"

" अच्छा तो है , अब शादी शुदा जिंदगी की लुत्फ उठा रही हो । इतना अच्छा प्यार करने वाला पति मिला है । वैसे भी जिन्दगी का चक्र तो हमेशा बदलते रहता है ।"

" हां । " वो चुपचाप सी हो गई ।

" सब ठीक है ना ? "

" हां । सब ठीक ठाक है ।" - वो अचानक से अलग रंग में आते हुए बोली - " छोड़ो वो सब , कोई गाना वाना लगाओ । किशोर कुमार के मस्त गाने ।"

करीब एक घंटे बाद वो गाने से बोर होने लगी तो मैंने कहा अगर नींद आ रही हो तो सो जाओ । मगर उसनेे मना कर दिया । और खुद ही तरन्नुम में शायरी करने लगी -

" फिर मुझे दीदा - ए - तर याद आया ,
दिल जिगर तश्रना ए फरियाद आया ,
दम लिया था ना कयामत ने हनोज ,
फिर तेरा वक्त ए सफ़र याद आया । "

" वाह ! वाह । शायरी की तुकबंदी तो बहुत अच्छी है लेकिन मुझे समझ नहीं आया ।" मैंने उनको शाबाशी देते हुए कहा ।

वो हंसते हुए बोली - " मुझे उर्वशी ने सुनाया था पर सच कहूं तो मुझे भी इसका अर्थ नही पता ।"

" उर्वशी ऐसी भी शायरी करती है मगर मुझे तो ..." मैं अचरज से बोला ।

" क्या मुझे तो ? " वो प्रश्न सूचक दृष्टि डाली ।

" नहीं , कुछ नहीं ।"

" तुम कुछ छुपा रहे हो , मेरी कसम बोलो ।"

" मुझे तो बड़ी सिम्पल और अच्छी अच्छी शायरी भेजती हैं ।" मैंने धीरे से कहा ।

" क्या मतलब ? - वो अचरज से बोली - " उर्वशी तुम्हें शायरी मैसेज करती है ।"

" हां । इसमें अचरज की बात क्या है , तुम्हीं ने तो कराई थी हमारी जान पहचान , भुल गयी ? "

" नहीं ।" वो अभी भी शंकित नजरों से मुझे घुर रही थी - " वैसे वो क्या क्या मैसेज करती थी ? "

" अरे यार ! क्यों हलकान होती है , वहीं सिम्पल साधारण सी मैसेज ।"

" मुझे दिखाओ ।" मुझे घुरते हुए बोली ।

" ठीक है बाबा ! आगरा चल के देख लेना ।"

वो आश्वस्त नहीं हुई ।

" क्या अब भी , मेरा मतलब ‌शादी के बाद भी मैसेज करती है ? "

" हां । अभी भी करती है । परसों ही तो किया था ।" - मैंने उसे और छेड़ते हुए कहा ।

" और तुम ? क्या तुम भी करते हो ? "

" मैं भी करता हूं ।"

अब श्वेता दी के मन मन्दिर में उथल-पुथल मच गई थी । वो काफी देर तक चुप रही फिर बोली -

" अच्छा परसों वो क्या मैसेज की थी ? "

" अरे यार ! कितनी शकी हो । मैंने कहा न आगरे में बता दुंगा ।"

" नहीं । परसो वाली मैसेज बताओ बाकी वहां बता देना ।" उसने जीद पकड़ ली ।

मैं सोचता हुआ बोला - " मुझे पुरी तरह से याद नहीं आ रहा है ।"

" कुछ तो याद होगा वहीं बताओ ।"

" ठीक है , मुझे सोचने दो ।"

वो बैठे बैठे ही पहलु बदल रही थी और मैं ड्राइव करते हुए थोड़ी सोचने की मुद्रा में आ गया ।

" अभी याद नहीं आ रहा है ।" मैंने ललाट सहलाते हुए कहा ।

" चुपचाप सीधी तरह से बताओ नहीं तो अभी गाड़ी से ढकेल दुंगी ।" वो आंखें तरेरते हुए बोली ।

" हद है यार । ठीक है याद करने की कोशिश करता हूं ।" - थोड़ी देर बाद बोला - " हां , कुछ कुछ याद आया , बोलता हूं ।"

" सुनो ।"

वो मुझे अपलक देखती रही ।

" तेरी बु...."( मैं यहां बु बोलकर अटक गया जैसे कि मैं भुल गया हूं )

वो चौंकी ।

" तेरी बुटदार चु...." ( मैं अब चु पर अटक गया )

वो इस बार अपनी आंखें फैलाई । ये देख मैं जल्दी से बोला -

" तेरी बुटदार चुनर को देख कर मेरा झां....( अब मैं झां पर अटक गया )

अब उसके चेहरे के रंग बदलने लगे थे । उसके गुस्सा होने से पहले मैंने वाक्य पुरी की -

" तेरी बुटदार चुनर को देख कर मेरा झांझर सा दिल डोल उठा ।"

अब वो थोड़ी नोर्मल हुई तो फिर आगे का लाईन बोलना शुरू किया ।

" तेरी बुटदार चुनर को देख कर मेरा झांझर सा दिल डोल उठा ।
तेरी चु....( अब फिर मैं चु पर अटक गया और याद करने का नाटक करने लगा )

वो मुझे बिना पलक झुकाए मुझे देख रही थी । मैंने उसे देखा फिर आगे का लाईन बोलना शुरू किया -

" तेरी चुन-चुन करती पायल ने मेरा लन्ड....." ( इस बार मैं लन्ड पर अटक गया )

उसके चेहरे के हाव-भाव से लग रहा था कि अब ज्वालामुखी फटने ही वाला है इसलिए मैंने जल्दी से अगले लाईन को भी पुरा किया -

" मेरा लंडन जाना रोक दिया ।" - बोलकर मैंने उसे देखा और उसे शायराना अंदाज़ में पुरी शायरी एकसाथ कहा ।

" तेरी बुटदार चुनर को देख कर , मेरा झांझर सा दिल डोल उठा ।
तेरी चुन-चुन करती पायल ने , मेरा लंडन जाना रोक दिया । "

वो मुझे गुस्से से अपनी आंखें बड़ी बड़ी करके अपलक देखे जा रही थी ।

मैंने कहा - " ऐसे क्या देख रही हो ? मैंने तो पहले ही कहा था मुझे याद नहीं आ रहा है ।...... वैसे शायरी अच्छी थी न ? "

उसने एक जोरदार का पंच मेरे बांह पर मारा ।

" अरे ! क्या करती हो ? एक्सीडेंट हो जाएगा ।" - मैंने अपने हाथ सहलाते हुए कहा ।

" मैं सब समझती हूं । तुम न ! तुम्हे ना मैं वहां जाके आगरा के पागलखाने में भर्ती करवा दुंगी । तुम पहले पहुंचो वहां ।" - उसने मुझे घुरते हुए कहा ।

" मुझे एक और याद आ गया । सुनाऊं ? " मैंने उसे छेड़ते हुए कहा ।

" जरुरत नहीं है । चुपचाप गाड़ी चलाओ । - मुझे घुरते हुए ही बोली - " और रास्ते में कहीं होटल के सामने रुकना "

" क्यों ? भुख लगी है क्या ? अरे ! कितना खाती हो यार दो ढाई घंटे पहले ही तो खाया था, मोटी हो जाओगी । जानती हो , मोटापा न अपने आप में एक गम्भीर बिमारी है । तुम्हारी ये छरहरी काया ..."

" चुप रहो " - मुझे बीच में टोकते हुए बोली - " बकवास बंद करो । मुझे बाथरूम जाना है ।"

" बाथरूम ! ... बाथरूम क्यों ? घर में नहाई नहीं थी क्या या सिर्फ हाथ मुंह धोना है ।"

" तुम ! " - वो गुस्से से देखी - " टायलेट जाना है । अब ये मत पूछना कि टायलेट क्यों जाना है ।"

" ठीक है नहीं पूछूंगा । वैसे एक बात कहूं ? "

" क्या ?"

" मैं पुछने वाला था ।"

" तुम एक नम्बर के कमीने हो ।" - कहकर फिर मेरे बगल में घुसा मारा ।

कुछ दुर जाने के पश्चात एक होटल जो ठीक ठाक ही था मिला । हम कार से उतर कर होटल की तरफ चल दिए ।
 
Update 8 A.

अभी हम होटल जाने के रास्ते पर ही थे कि मुझे एक ख्याल आया और मैंने श्वेता दी से कहा -

" मुझे ये 2 nd class वाली होटल पे बहुत डाउट रहता है । तुम न यहां तो बाथरूम जाओ मत ।"

" क्यों ? " वो रूकते हुए बोली ।

" ऐसे होटल में बाथरूम के अन्दर गुप्त कैमरा छिपे होते हैं जो औरतों को नहाते समय , टायलेट करते हुए , या पेशाब करने हुए रिकॉर्ड कर लेते हैं ।"

" क्या ?" वो चौंकते हुए बोली ।

" हां "

" तो अब क्या करें "

" यहां से चलते हैं आगे चलकर रास्ते में कहीं सुनसान जगह देखकर पेशाब कर लेना ।"

" ठीक है , जल्दी चलो ।"

उसने शायद पेशाब शब्द पर ज्यादा गौर नहीं किया था । हम वापस कार में सवार होकर वहां से निकल गये । अभी हम थोड़ी ही दूरी पर गये था तो वो कसमसाते हुए बोली - कहीं रूको न । मुझे बर्दाश्त नहीं हो रहा है ।"

मैंने कार को मेन रोड से हटाकर साइड में एक कच्ची रोड पर रोक दिया । वहां अगल बगल जंगल तो नहीं था लेकिन पेड़ पौधे बहुत थी ।

" जाओ पेड़ के ओट में बैठ कर कर लो ।"

वो जल्दी से भागती हुए गई और एक पेड़ के पीछे जा कर बैठ गई । मगर ताज्जुब की बात ये है कि वो पेड़ कार से मात्र दसेक फुट दूर थी । जब की उस पेड़ के थोड़ी ही आगे बहुत सारे घने पेड़ थे । उसके सीटी की मनमोहनी आवाज मेरे कानों में अमृत घोल रही थी । मेरे नाभी के नीचे साढ़े सात बाई अढ़ाई का लिंग राज जोर से इन्कलाब जिंदाबाद का नारा लगाने लगा। मैं अभी उसको कन्ट्रोल करने में लगा ही था कि वो आई और कार के दरवाजे खोल कर बगल में बैठ गई ।

" चलें अब ? " उसने मुझे देखते हुए कहा ।

" तुम्हे करते देख अब मुझे भी लग गई है । मैं अभी आ रहा हूं ।"

बोलकर मैंने अपनी ओर के दरवाजे से बाहर निकला और उसी पेड़ के पीछे चला गया जहां उसने पेशाब किया था । जहां उसने पेशाब की थी वहां की जमीन पर उसके पेशाब जमा हो गए थे । मैं इतना उत्तेजित हो गया कि मेरे लिंग राज ने पेशाब करने से मना कर दिया । बड़ी मुश्किल से उसे तैयार कराया और उसके पेशाब के उपर ही पेशाब कर दिया ।

वहां से निवृत्त हो कर कार में सवार हुआ और वहां से निकल गया ।

ड्राइव करते हुए कहा - " कल से बाथरूम नहीं की थी क्या "

" सुबह निकलने के पहले फ्रेश हुईं थी । क्यों ?"

" वहां देख कर लगा जैसे कई लोगों ने पेशाब किया है ।"

उसने फिर मेरी तरफ मारने के लिए हाथ उठाया तो मैं जल्दी से बोला -" sorry sorry मैं अब कुछ नहीं बोलुंगा । तुम हाथ वाथ फिर मत उठा देना वो पहले से ही तुम्हारे मारने से दर्द कर रहा है ।"

" तुम्हारी हरकतें ही ऐसी है । अब अगर फिर तुमने कुछ उल्टा पुल्टा कहा तो शर्तिया मैं तुम्हें गाड़ी से ढकेल दुंगी ।" - उसनेे आंखें तरेरते हुए कहा ।

मैं चुप हो गया । पन्द्रह बीस मिनट तक हम ऐसे ही चुप रहे । आखिर में उसने अपनी चुप्पी तोडते हुए कहा _

" उर्वशी के साथ तुम्हारा कोई अफेयर था ?"

मैं चुपचाप रहा और कार ड्राइव करता रहा । जब मैंने कुछ नहीं बोला तो वो दुबारा पुछी -

" बोलो ना । तुम दोनों रिलेशनशिप में थे ?"

" क्या बोलूं ? जब कुछ बोलने जाता हूं तब तब हाथ उठा देती हो । मैं अब कुछ नहीं बोलने वाला ।"- मैंने नकली नाराजगी जताते हुए कहा ।

" ओले ओले मेरा राजा भैया , अपनी ‌ श्वेता दी से नाराज हो गया । " - मेरे पेट पर गुदगुदी करती हुई बोली - " अच्छा , अब कुछ नहीं बोलुगी ।"

" नहीं नहीं मुझे तुम पर विश्वास नहीं है , तुम घड़ी घड़ी मुंह फुला लेती हो और हाथ पांव चलाने लगती हो । मैं अब तुम्हें कुछ नहीं बताने वाला ।"

" नौटंकी बाज कहीं का । बोलता है या नहीं ।"

" नहीं ।" मैंने मुंह फुलाते हुए कहा ।

" अच्छा । तेरी कसम । अब कुछ नहीं करूंगी ।" उसने अपने बाहों का हार मेरे गले में डालते हुए कहा ।

उसके ऐसा करने से उसका दायां वक्ष मेरे बगल से सट गया और मेरे शरीर में उत्तेजना हिलोरें मारने लगा । और कार हल्के से लहरा गई ।

" अरे ! क्या कर रही हो । एक्सीडेंट करवाना है क्या " मैंने स्टियरिंग सम्हालते हुए कहा ।

वो मुझे छोड़ कर जरा सी दुर होते हुए बोली - " बताओ ना , तुम दोनों का अफेयर था क्या ।"

" मुझसे क्यों पुछती हो ? वो तो तुम्हारी बेस्ट फ्रेंड थी । उसने तुम्हें कुछ नहीं बताया ? "- मैंने उसे देखकर कहा ।

" बोलो ना यार । क्यों लड़कियों जैसी नखरे करते हो । और हां उसने मुझे कुछ नहीं बताया ।"

" ओके । "- मैंने ठंडी सांस भरी -" हमारा अफेयर था ।"

मैंने उसे देखा वो मुझे बिना पलक झुकाए देख रही थी ।

" क्यों ? क्या हुआ ? ऐसे मुझे एक टक क्यों देख रही हो ?"

" कुछ नहीं । साली ।कमीनी । इतना बड़ा राज मुझे तक नहीं बताया । "- वो गुस्से से बोली -" और तुमने मुझे क्यों नहीं बताया ?"

" मैं ... मुझे उसने अपनी कसम दिला कर किसी को भी बोलने से मना किया था इसलिए नहीं बोला ।"

" वाह । उसने तुम्हें बोला और तुमने मान लिया । मुझे अपनी बेस्ट फ्रेंड , नुरे नजर , हम प्याला , हम निवाला और ना जाने क्या क्या बोलते हो और सिक्रेट उर्वशी के साथ शेयर करते हो ।" - वो गुस्से से बोली ।

" देखो फिर गुस्सा हुई ना । इसीलिए नहीं बता रहा था । और कुछ बातें ऐसी होती हैं जो नहीं बताई जा सकती है अगर किसी लड़की के इज्जत का सवाल हो तो ।"

" ठीक है ठीक है ।" वो अभी भी मुंह फुलाए बैठी थी ।

" मेरी जानेमन तुम तो ऐसा रियेक्ट कर रही हो जैसे मैं तुम्हारा खसम हूं ।" मैंने उसके बांह पर चिकौटी काटते हुए कहा ।

" बकवास बंद करो ।" - वो पुर्ववत गुस्से से बोली ।

हम थोड़ी देर तक चुप रहे । वो शायद किसी सोच में डुबी हुई थी । फिर उसने खामोशी तोड़ी ।

" क्या तुम लोगों ने वो भी कर लिया है ?" वो धीरे से बोली ।

" वो ? वो क्या ? "

" वो ! वही जो एक लड़का लड़की करते हैं ।"

" हां । खुब घुरा फिरा हमलोगो ने । पार्क , सिनेमा , लांग ड्राइव ..."

" बेवकूफ मैं पार्क सिनेमा की बात नहीं कर रही हूं ।"

" फिर किसकी बात कर रही हो ?"

" म..म... मैं उसकी बात कर रही हूं जो लवर अकेले में करते हैं । जो पति-पत्नी बन्द कमरे में करते हैं ।" वो झिझकते हुए बोली ।

" अच्छा वो ।" - मैंने ऐसे बोला जैसे मुझे अब बात समझ में आयी हो -" ऐसे बोलो ना चो.. मतलब सेक्स किया है या नहीं ।"

" हां वही ।" वो गुस्से से मुझे घुरते हुए बोली ।

" ज्यादा तो नहीं लेकिन सात आठ बार किया है ।" - मैंने ऐसे बोला जैसे मुझे काफी शर्म आ रही हो ।

जब मैंने उसकी तरफ देखा तो मुझे लगा कि जैसे अब वह मुझ पर रासन पानी लेकर झपटने ही वाली है । मैंने तुरंत कार खड़ी कर दी और उससे कहा -

" देखो ! अभी तुमने मेरी कसम खाई है ।"

वो थोड़ी देर में शान्त हो गई । फिर मैंने कार आगे बढ़ा दी । मैंने थोड़ी देर बाद कहा - " वैसे तो मैं पटाना चाहता था उसके सहेली को लेकिन उसने तो मुझे घांस तक नहीं डाला बल्कि शादी करके फुर्र हो गई तो मैंने सोचा वो नहीं तो उसकी सहेली ही सही ।"

वो कुछ बोली नहीं , चुपचाप सुनती रही । उसे सब समझ में आ रहा था कि मैं किसके बारे में कह रहा हूं । वो एक बार मेरी तरफ देखी फिर सामने सीसे की तरफ देखने लगी ।

" तुमसे कभी झुठ नहीं बोलता ये बात तुम भी जानती हो । अगर तुम्हें बुरा लगा हो तो sorry ." - मैंने उसे मनाते हुए कहा ।

वो चुप बैठी रही ।

" मुझे एक जबरदस्त शायरी याद आ रही है , बोलूं ?" - मैंने कहा ।

वो मेरी तरफ पलटी और अपनी चौबीस कैरेट के मुस्कराहट से माहौल को तनावमुक्त कर दी ।

ये औरतें न , पल में तोला पल में माशा ।

" नहीं नहीं कोई जरूरत नहीं है । जैसे तुम वैसे ही तुम्हारी शायरी ।"- वो बोली ।

रास्ते में एक ढाबे में हल्का फुल्का नाश्ता किया और चाय सिगरेट पीने के बाद आगरा की ओर निकल पड़े । आगरा थोड़ी देर बाद पहुंचने ही वाले थे । रास्ते में मैंने श्वेता दी को मेरे और उर्वशी के रिश्तों के बारे में पुछताछ करने से मना किया ।

उर्वशी का पति संजय चोपड़ा एक बेहद ही रईस और दिल्ली शहर का जाना माना व्यापारी था । उसके दिल्ली में ही नहीं वल्कि आगरा , मुम्बई , हैदराबाद और जयपुर में भी होटल का बिजनेस था । मैंने तो यहां तक सुना था कि वो अगले इलेक्शन में रूलिंग पार्टी के तरह से m.p. के लिए खड़ा होने वाला है । पता नहीं सच है या झूठ ।

उर्वशी भी कोई साधारण घराने से नहीं थी । उसके पिता का गुड़गांव में आटोमोबाइल हार्डवेयर का इंपोर्ट एक्स्पोर्ट का काम था । उर्वशी अपने मां बाप की एकलौती लड़की थी । बहुत बहुत ही सुन्दर बिल्कुल उर्वशी ढोलकिया की तरह ।

उर्वशी की दोस्ती श्वेता दी से कालेज में हुई थी और जल्दी ही वे दोनों बेस्ट फ्रेंड बन गई थी । श्वेता दी ने ही उर्वशी से मेरी परीचय कराई थी जो बाद में चलकर उसके बिस्तर तक पहुंच गई ।

उन्होंने अपने शादी की रिसेप्शन आगरा के अपने ही होटल में रखी थी । जब हम होटल पहुंचे तब दोपहर के दो बज रहे थे । हम होटल के रिसेप्शन हाल में पहुंचे । वहां मेहमानों का जमघट लगा हुआ था । रिसेप्शन को बहुत ही अच्छी तरह से सजाया गया था । खाने में कई तरह की Verity थी । वेज और नान वेज दोनों ही तरह का व्यवस्था था । शराब का साईड में अलग काउंटर बना था जहां पर मेहमानों की भीड़ ज्यादा थी । वर्दी धारी वेटर हाल के चारों ओर मेहमानों के खातिरदारी में जुटे हुए थे । नये नये शादी के बंधन में बंधे हुए जोड़े के लिए एक शानदार मंच बना हुआ था जो अभी खाली पड़ा था । हाल के अन्दर जगह जगह मर्द और औरतें ग्रुप बनाकर स्नैक्स और तरल पेय का आनंद लेते हुए बातों में व्यस्त थे ।

जब हम हाल में प्रवेश किये तो हमारी नजरें मेजबान को ढूंढने लगी । हमने चारों तरफ देखा तो संजय को कुछ लोगों में घिरा हुआ पाया वहीं उर्वशी कुछ औरतों के बीच में । उर्वशी उन औरतों से हंस हंस कर बातें कर रही थी ।

" देखो ! उर्वशी वहां है । उन औरतों के बीच में । हंस हंस के बातें करते हुए ।" श्वेता दी ने उर्वशी की तरफ इशारा किया ।

" हां ।" मैंने देखा इस वक्त वो लाल साड़ी , लाल ब्लाउज , लाल सैंडल माने सर से पांव तक लाल ही लाल गेट अप में थी । गले में सोने का बड़ा हार , जुल्फें खुली हुई , होंठों पर लाली... कयामत लग रही थी ।

" देख कर कौन बोल सकता है कि ये साली इतनी चालु निकलेगी ।" उसने मेरी आंखों के आगे अपनी हथेली हिलाते हुए कहा ।

" तुम्हे एक बात कहूं ।" मैंने श्वेता दी को थोड़ा साईड में ले जाकर बोला ।

" क्या ?"

" A bad man is better than a bad name ."

" मतलब ?"

" बद बदनाम होने से अच्छा है ।"

" मैं समझी नहीं ।" उन्होंने मुझे प्रश्न भरी निगाहों से देखा ।

" मैं समझाता हूं ....मान लो ..एक लड़का राम , जिसने कभी शराब को हाथ भी नहीं लगाया हो, कभी शराब पी ना हो उसे यदि कोई शराब दुकान में या शराब दुकान के पास या पब में कोई देख ले तो वो यही समझेगा कि वो लड़का राम शराबी है । और एक लड़का जिसका नाम मोहन है वो डेली ड्रींकर है रोज शराब पीता है लेकिन उसे शराब पीते हुए कभी किसी ने भी नहीं देखा तो लोग उसके बारे में यही कहेंगे कि मोहन कितना अच्छा लड़का है , शराब को हाथ तक नहीं लगाता ।.... यहां राम बदनाम है लेकिन एक्चुअली बद आदमी मोहन है ।......समझी ।"

वो कुछ बोली तो नहीं लेकिन समझने का प्रयत्न कर रही थी ।

मैंने फिर कहा -" मान लो .... मैं कहता हूं मान लो कि मैं एक अय्याश छोकरी बाज लड़का हूं , मेरी कई लड़कियों से नाजायज ताल्लुकात है मगर किसी ने भी... किसी ने भी मुझे वो सब गन्दी हरकतें करते हुए नहीं देखा है, और ना ही सुना है इसका मतलब मै एक शरीफ बन्दा हूं । दुसरी तरफ वो उर्वशी का हसबैंड संजय एक बहुत ही शरीफ और पराई औरतों से दूर रहने वाला लड़का है लेकिन भुले भटके किसी कोठा या वैश्या के साथ दिख गया तो लोग यही समझेंगे कि वो एक रंडीबाज और चरित्रहीन लड़का है ।..... तुम गलत करो लेकिन पकड़े मत जाओ तो सब ठीक ठीक लेकिन अगर पकड़े जाओ तो सब खराब खराब ।.... इसीलिए कहते हैं कि बद आदमी बद नाम होने से अच्छा है ।"

" ठीक है ठीक है । समझ गई । तुम्हारी विद्या तुम्हे ही मुबारक । चलो उर्वशी के पास चलते हैं ।" उसने मेरी बांह पकड़ कर ले जाते हुए कहा ।

चलते-चलते वो अचानक रूकी और मुझसे पूछा " तुम भी कुछ gift लाए हो ?"

"हां । तुम क्या लाई हो ?"

" एक सोने की अंगूठी , चांदी का पायल और कपड़े का सेट । और तुम ?"

" मैं " -मैं उसके कान में फुसफुसाया -" Manforce Condoms "

उसने मेरे पेट एक जोर का मुक्का मारा और मुस्कराते हुए मेरी बांह पकड़ उर्वशी की तरफ चल पड़ी ।
 
Update 8 B.

दोनों सहेलियां बगलगीर होकर मिली । मैंने उर्वशी को शादी की मुबारकबाद दी । उर्वशी ने अजय के लिए संवेदना प्रकट की । फिर वो अपने हसबैंड संजय के पास हमें ले गयी ।

संजय जी भी हमसे बड़े गर्मजोशी से मिले और मेरे काम और परिवार के बारे में पुछा । मैंने बड़े धैर्य से उन्हें सब बताया । मुझे वो बहुत ही मिलनसार ‌और हंसमुख स्वभाव के व्यक्ति लगे । फिर उर्वशी ने अपने माता-पिता से और फिर अपने सास ससुर से मिलवाया । हम दोनों ने उनको प्रणाम किया ।।फिर दोनों सहेलियां मुझसे बिदा ले कर गर्ल्स टाक में लग गई ।
मैं भी टहलते टहलते जुस काउंटर पर पहुंच और मिल्क शेक लेकर ज्योंहि पलटा कि एक लड़की से टकरा गया । मैंने जल्दी से लड़की को कमर से पकड़ कर गिरने से बचाया ।

लड़की मुझे thanks कहते हुए पलटी ‌तो उसे देखते हुए मैं चौंक गया ।

" तुम !" मैंने चौंकते हुए कहा ।

" तुम ! तुम यहां क्या कर रहे हो ?" लड़की ने भी चौंकते हुए कहा ।

ये वही लड़की थी जिससे मैं रीतु के कालेज में मिला था और जिससे मैंने मज़ाक में फ्रेंडशिप बनाने का आफर दिया था ।

" जो आप कर रही है । " मैंने संभलते हुए मुस्कुरा कर कहा ।

" लड़की वालों के तरफ से हो ?"

" जी " मैंने कहा ।

वो घुटनों तक का जीन्स और नाभि से उपर तक का डिजाइनर सफेद रंग का टॉप पहने हुए थी । पैरों में ऊंचे हील का सेंडल था । उसके लम्बे लम्बे पांव , केले के टहनियों की तरह माशल जांघें , नंगी कमर , गहरी नाभि , गिरिवर के ऊंचे शिखरों की तरह वक्ष , गुलाबी होंठ , कजरारे नैन .....सब कुछ बन्दा के मन मुताबिक जैसा था ।

मैं उसके सौन्दर्य का रसपान कर ही रहा था कि उर्वशी और श्वेता दी वहां आ गई ।

उर्वशी ने लड़की से पुछा " क्या हुआ मधुमिता ? सब ठीक है ना ।"

" हां भाभी सब ठीक है । थोड़ी फिसल गई थी । सब ठीक है ।" उस लड़की ने मुझे घुरते हुए कहा ।

ओह तो ये उर्वशी की ‌ननद और संजय जी की बहन है । मैंने सोचा ।
" तुम दोनों एक दूसरे को जानते हो क्या " उर्वशी ने मधुमिता से पूछा ।

" हां भाभी एक बार दिल्ली में मिल चुके हैं । लेकिन जान पहचान नहीं है ।" मधुमिता ने कहा ।

उर्वशी ने मुस्कुराते हुए मधुमिता से कहा -" ये सागर हैं । श्वेता का भाई । और मेरा भी सबसे प्यारा भाई । श्वेता से तो तुम शादी में मिल चुकी हो । और सागर..ये है मेरी एकलौती ननद मधुमिता ।"

मधुमिता ने श्वेता दी को नमस्कार किया । और मुझसे हैंड सेक किया ।

उर्वशी ने मुझे कुटिल मुस्कान भरी नजरों से देखा और मधुमिता से बोली " सागर बहुत ही शरीफ और नेक लड़का है । ये श्वेता और रीतु से भी ज्यादा मुझे मानता है । मुझे जब भी कोई जरूरत पड़ जाय तो मेरी मदद के लिए हमेशा तैयार रहता है ।'

मैं हड़बड़ाया । मैंने श्वेता दी को देखा वो मेरे ही तरफ देख रही थी । मैंने मधुमिता को देखा तो वो भी मुझे ही घुर रही थी । मुझे डर लगा कहीं मधुमिता कालेज वाली बात यहां न बता दें ।

तभी किसी ने उर्वशी को पुकारा और वो श्वेता दी को लेकर उनके पास चली गई । उनके जाते ही मेरी confidence वापस आई ।

मैंने मधुमिता को देखा और मुस्कुरा कर कहा " मेरा उस दिन के प्रस्ताव के बारे में आप ने क्या सोचा ?"

वो मुझे देख कर व्यंग भरे स्वर में बोली " अच्छी इमेज बनाई है आप ने अपने फेमिली में । अगर उन्हें पता होता कि लड़कियों के बारे में आप के कितने उच्च विचार है ?"

मैंने मुस्करा कर कहा " मैंने क्या ग़लत कहा । हमारे शास्त्रों में भी तो यही कहा गया है कि औरतों का चरित्र और पुरूषों का भाग्य तो देवता भी नहीं समझ पाए फिर मानव की क्या विशात है ।"

वो कुछ बोली नहीं सिर्फ मूझे अपनी बड़ी बड़ी आंखों से घूरती रही । मैंने उस वक्त जाते हुए एक वेटर से दो ग्लास मैंगो शेक लेकर एक उसे दिया और एक खुद लेकर अपने होंठों से लगा लिया ।

" मेरे सवाल का जवाब अभी भी नहीं मिला " मैंने कहा ।

" आप को आप के सवाल का जवाब चाहिए ?" वो चलते चलते बोली ।

" यदि आप को कोई आपत्ती नही हो ।"

" ओके । जब आप सवाल कर ही रहे हैं तो क्यों न मैं भी कुछ सवाल करूं ।"

" जरुर जरुर । पुछिए ।'

" आप मेरे पांच सवालों का जवाब दें दे । अगर आपका जवाब सही हुआ तो we are friend "

" कैसा सवाल ?" मैं शंकित भरी नजरों से उसे देखा ।

" सिम्पल । जनरल नॉलेज वाली ।"

मैंने उसे देखा । वो मुझे अपलक देखे जा रही थी । क्या लड़की थी । अपने आप को जेनिफर लोपेज समझती है या ऐश्वर्या राय ।जरूर पैसे का और सुन्दरता का घमंड है ।

" मैडम । ये क्या बात हुई । आप क्या पूछेगी और किस विषय पर पूछेंगी । ये तो मैं नहीं जानता लेकिन दुनिया में इतने जनरल नॉलेज के सवाल है कि उसे गुगल बाबा के अलावा दुनिया में कोई भी नहीं बता सकता । अब यदि आप ने पूछा कि अमेरिका के अलास्का के गवर्नर का नाम बताओ , जर्मनी के रेलमंत्री का नाम बताओ , युगांडा के होम मिनिस्टर कौन है , तेलंगाना के हाई कोर्ट के जज का नाम क्या है ? .... ये कौन बता सकता है ।"

वो चुप हो गई और मुझे घुरती रही ।

मैंने बातों को बढ़ाते हुए कहा " इससे अच्छा है कि इसके उलट गेम खेलते हैं ।'

" क्या ?" उसने कहा ।

" मैं आप से पांच सवाल पूछूंगा और उसके जबाव में आप को उत्तर गलत देने होंगे ।'

" मतलब ?" उसने प्रश्न भरी नजरों से देखा ।

" मतलब ये कि मैं आप से पांच सवाल पूछूंगा और आप को उसके जबाव सही नहीं बल्कि गलत देने हैं । यदि आप ने एक भी सवाल का जवाब सही में दिया तो आप हार जाएंगी और मैं जीत जाउंगा । फिर आप को मेरी फ्रेंड शिप कबूल करनी होगी ।"

" ओके । और अगर मैंने आपके सवालों का जवाब गलत में दे दिया तो "

' तो फिर आप जीती और मैं हारा । उसके बाद में आप को फ्रेंड शिप के लिए जोर नहीं दुंगा । आप अपनी राह और मैं अपनी राह ।"

वो कुछ देर तक सोचती रही । उसे इसमें कुछ तो राज लग रहा था । मैंने उसे सोचते देख कहा ' आप सोचती बहुत ज्यादा है । सिम्पल सा गैम है । आप को बस गलत ऐनसर देने हैं । जैसे मैं आप से आपका नाम पुछूं तो आप अपना नाम मधुमिता ना बोलकर रीना सीना आदि बता देना ।'

वो आश्वस्त हुई ।

" ओके । डन । अपना सवाल पुछो ।" मधुमिता ने कांफिडेंस से कहा ।

" ओके । मेरा पहला सवाल है "- मैं ड्रामेटिक अंदाज में बोला -" भारत के राष्ट्रपति का नाम क्या है ?"

वो कुछ देर सोची । अब वो इतनी बेवकूफ तो नहीं होगी कि भारत के राष्ट्रपति का नाम भी पता ना हो ।

" मनमोहन सिंह " उसने जवाब दिया ।

" गुड ।" मैंने अगला सवाल पूछा -" भारत के राष्ट्रीय झंडे में कौन-कौन सा रंग है ?"

इस बार उसने काफी सोच-विचार कर जबाव दिया -" नीला , पीला और लाल ।"

मैंने तुरंत अगला सवाल पूछा -" तुम्हारे पिता जी का नाम क्या है ?"

वो चौंक गई । थोड़ी कसमसाई फिर बोली -" सुभाष चन्द्र बोस "

मैं मुस्कराया । वो मुझे देख कर थोड़ी शरमाई ।

" कितने सवाल हुए " मैंने पूछा।

" तीन ।" मधुमिता ने कहा ।

" तुम हार गयी ।" - मैंने मुस्कराते हुए कहा ।

" कहां हार गयी ? मैंने तो सारे जबाव गलत ही दिए हैं ।" वो चौंकते हुए बोली ।

" तुम गेम हार गयी । मेरा चौथा सवाल ही ये था कि ' कितने सवाल हुए ? ' तुम्हें इसके जवाब में आठ , दस , बीस कुछ भी बोलना था लेकिन तीन नहीं बोलना था ।"

वो भौंचक्का सा मुझे देखती रही ।

" तो अब हमारी फ्रेंड शिप पक्की ?" - मैंने मुस्कराते हुए कहा ।

वो अपलक मुझे घुरती रही फिर एकाएक जोर से हंसने लगी ।

वो हंसते हुए बोली -" सच में यार काफी फनी हो । ओके । पक्की लेकिन फ्रेंड शिप नहीं ।"

" फिर ?"

मुझे मुस्करा कर बड़े ही ड्रामेटिक से में बोली -" गर्लफ्रेंड । .... क्या मैं तुम्हारा गर्लफ्रेंड बन सकती हूं ?"

मैं खुश हो गया । मैंने अपने सिर को उसके आगे हल्के से झुकाते हुए कहा -" जहे नसीब । It's my pleasure ।"

उसने अपने कोमल हाथ मेरी तरफ बढ़ाई । मैंने उसे अपने दोनों हाथों से थाम लिया । मन तो किया उसे पकड़ कर अपने गले से चिपका लूं कि तभी श्वेता दी वहां आ गई । श्वेता दी के आने के बाद मधुमिता काम का बहाना बना कर वहां से चली गई ।

" क्या बात है ? बड़ी हंस हंस के बातें हो रही थी ।"- श्वेता दी ने कहा ।

" हां क्यों ना हो आखिर मेरी गर्लफ्रेंड जो है ।"

" दो ही मुलाकात में गर्लफ्रेंड ?" - श्वेता दी आश्चर्य करते हुए बोली -" बड़े फास्ट हो ।"

" हर काम फास्ट ही होना चाहिए । वो दोहा सुनी है ना ?"

" कौन सा ?"

" काल करे सो आज कर , आज करे सो अब ।
पल में प्रलय होयगी , बहुरी करोगे कब ।।"

श्वेता दी भुनभुनाती हुए बोली -" बस बस । सुनो हमें आज रात यहीं रूकना पड़ेगा । उर्वशी और जीजू दोनों बहुत जोर दे रहे हैं । हमारे ठहरने का इंतजाम इसी होटल में थर्ड फ्लोर में हुआ है । कमरे का नम्बर ३०३ है । आज पुरा होटल सिर्फ मेहमानों के लिए बुक हैं ।हमारा बैग रूम में चला गया है । मैं बहुत थक गई हूं तो मैं सोने जा रही हूं अगर तुम्हें भी आराम करना है तो रूम में आ जाना ।"

" क्या हम दोनों एक ही रूम में सोयेगे ।" मैं खुश होते हुए बोला ।

" हां । एक ही रूम में ।"

" वाह ! वाह ।"

" मैं जा रही हूं और हां एक ही रूम में नहीं बल्कि एक ही बिस्तर पर ।" - बोलकर वह पलटी और एक मीनट के अन्दर मेरे आंखों से ओझल हो गई ।

मैं चुम्बक की तरह वहीं जमीन से चिपका हुआ भौंचक्का खड़ा रहा । उसके बातों का अर्थ सोचने लगा ।मेरे सांसों की गति तीव्र हो गई । मैं कल्पनाओं के पंख में उड़ने लगा । मेरा दिल गार्डेन गार्डन हो गया ।

आज रात जरूर कुछ तुफानी होने वाला है ।
 
Update 9.

श्वेता दी के आवाज से मेरी नींद खुली । मैंने घड़ी में टाईम देखा शाम के सात बज रहे थे । मैं जम्हाई लेते हुए बोला - " बहुत देर तक सो लिया ।"

" हां , सात बज गए । चलो उठो जल्दी से तैयार हो जाओ उर्वशी नीचे हाल में बुला रही है ।"

मैंने श्वेता दी की तरफ देखा । वो नहा कर फ्रेश हो गई थी । उसने ब्लू कलर की साड़ी और ब्लाऊज़ पहन रखी थी । चेहरे पर हल्की सी मेकअप थी । मैं उसकी सुन्दरता को निहारते हुए सोच रहा था खुबसूरत लड़कियो को शादी ही नहीं करनी चाहिए । इनके शादी के बाद न जाने कितने लड़कों का दिल टुट जाता होगा । कितने बेचारे देवदास बन जाते होंगे ।

" क्या हुआ ? चलना नहीं है क्या ?" मुझे सोचते देख उसने कहा ।

" हां हां चलता हूं ।" कहकर मैं बिस्तर से नीचे उतरा ।

" सुनो ! मैं निचे जा रही हूं तुम जब आना तब कमरे को बंद कर देना ।'

श्वेता दी बोलकर कमरे से निकल गयी । मैं भी बाथरूम में चला गया ।

करीब आधा घंटा बाद नहा धो कर पैन्ट शर्ट पहन कर मैं भी तैयार हो गया । मैं कमरे से निकलने ही वाला था कि मेरा मोबाइल बजा ।
मैंने देखा माॅम का नम्बर था । मैंने फोन उठाया । माॅम मेरे वापस आने के प्रोग्राम के बारे में पुछ रही थी । मैंने उन्हें बताया कि मैं कल शाम को किसी वक्त आऊंगा । उन्हीं से ये भी मालूम हुआ कि रीतु की सहेली काजल भी घर आईं हुई है और वो आज रात मेरे घर पर ही रूकेगी ।

माॅम से बात कर मैं रूम से बाहर निकला और दरवाजे को बंद कर मैं लिफ्ट की तरफ बढ़ा कि फिर मेरा मोबाइल बजने लगा । मैंने देखा इस बार रीतु थी ।

" हां बोल ।"

" भैया , मां ने कहा आप कल शाम को आवोगे ।"

" हां कल शाम तक आ जाउंगा । कोई काम है क्या "

" आप आ जाओ फिर बोलती हूं ।" - रीतु बोली - " भैया आप की लाडो काजल आप से बात करना चाहती है ।"

" बोलो काजल " मैंने प्यार से बोला ।

" भैया आप आते समय वहां के पेठा लेते आईयेगा ।"

" लेते आऊंगा । और कुछ चाहिेए ? " मैंने कहा ।

" नहीं भैया । लीजिए ! रीतु आप से कुछ बोलना चाहती है ।"

फोन पर अब रीतु आ गयी ।

मैं उसके बोलने से पहले ही कहा -" तु क्यों काजल को परेशान करती है । न जाने मेरे बारे में क्या क्या सोचती होगी ।"

" आप एक नम्बर के बेवकूफ हो । आपको बताऊं वो थोड़ी देर पहले क्या कर रही थी ।'

" क्या कर रही थी ।"

" आपके रूम में आपके बिस्तर पर लेट कर गाना गा रही थी ।"

" गाना कौन सा गाना ?"

" मैं तो छोड़ चली बाबुल का देश पिया का घर प्यारा लगे ।'

" क्या ?"

" क्या बकवास करती है । भैया ये झुठ बोल रही है ।" - काजल हड़बड़ाते हुए बोली ।

दोनों को एक साथ बोलते हुए सुनकर मैं समझ गया कि मोबाइल स्पीकर पर है ।

" मैं झुठ नहीं बोल रही हूं बल्कि मैं तो झुठ बोलती ही नहीं हूं । सतयुग में राजा हरिश्चन्द्र के बाद कलयुग में सच बोलने वाला सिर्फ मैं ही हूं ।"

अभी उसकी बक बक जारी ही थी कि वहां मधुमिता पहुंच गई । मैंने रीतु को बाद में फोन करने को बोलकर फोन काट दी ।

" किससे बातें हो रही थी ।" मधुमिता ने मुस्कुराते हुए कहा ।

" मेरी बहन थी पर तुम यहां क्या कर रही हो ?"

" मैं भी इसी फ्लोर पर ठहरी हूं रूम नं ३०७ ।"

" अच्छा ये तो बहुत अच्छी बात है । तब तो रात अच्छी कटेगी ।"

" ज्यादा ख्याली पुलाव बनाओ मत । मेरे साथ मेरी दो सहेलियां भी है ।"

" ओह ।" मैंने बुरा मुंह बनाया ।

" और मेरे बगल वाला रुम ३०६ भैया और भाभी का है ।"

" अच्छा । और बाकी तुम्हारे फेमिली ?"

" सभी इसी फ्लोर पर ठहरे हैं । मेरे डैड और मम्मी और भाभी का भी परिवार सभी ।"

तब तक मधुमिता की सहेलियां आ गयी । मैं मधुमिता से फोन नंबर एक्सचेंज का के नीचे हाल में आ गया ।

मैं नीचे रिसेप्शन हाल में पहुंचा । वहां पहले से ज्यादा लोगों का जमावड़ा था । पार्टी पुरे शबाब पर थी । मैं टहलते हुए चाय के काउंटर पर पहुंचा और चाय लेकर धीरे धीरे पीने लगा । तभी श्वेता दी वहां आ गई और वो भी चाय लेकर मेरे बगल में खड़ी हो गई ।

" इतनी देर कैसे हो गई ?" श्वेता दी ने पूछा ।

" माॅम और रीतु का फोन आ गया था ।"

" सब ठीक है ना ।"

" सब ठीक है दरअसल वो आने के बारे में पुछ रही थी ।"

' ओह ।"

मैं चाय पीते हुए हाल के चारों ओर नजर दौडा रहा था । हाल में इस वक्त करीब सौ के आसपास मेहमान थे । उर्वशी और संजय जी दोनों स्टेज पर सिंहासन के समान चेयर पर बैठे थे । मेहमान वहां जाकर उनको शादी की मुबारकबाद दे रहे थे ।

" उर्वशी के शादी के बाद भी तुम्हारा सम्बन्ध रहा है क्या " - श्वेता दी ने कहा ।

मैंने चौंक कर श्वेता दी की तरफ देखा ।

" कहां से होता ? जिस दिन उसकी शादी थी उसी दिन तो अमर का खून हो गया था । फिर उसके बाद की सारी कहानी तुम्हें पता ही है ।"

" हूं .... तुम दोनों की लास्ट पिछली डेट कब हूई थी ?"

" मैं सच कहुंगा तो फिर गुस्सा करोगी ।"

" नहीं करूंगी । बोलो ना ।"

" तुम्हे याद है जब वो अपने शादी की कार्ड देने तुम्हारे घर आई थी ।"

" हां याद है । अपने शादी के चार दिन पहले आई थी ।"

" उसी दिन ।"

" क्या ?" वो मुंह बाये मुझे देख रही थी ।

" हां उसी दिन । उस दिन के बारे में याद करो ।"- मुस्कराते हुए मैंने कहा ।

" वो दोपहर में शायद आई थी ।" श्वेता दी बोली ।

" वो दोपहर नहीं ग्यारह बजे आई थी । तब चाचा चाची को लेकर राहुल के स्कूल गए थे । उस दिन राहुल के स्कूल में पैरेंट्स मीटिंग था ।"

" हां याद आ गया । जब वो आई थी उस समय हम दोनों तास खेल रहे थे । है ना ।"

" हां । हम तास खेल रहे थे । उर्वशी ने तुम्हें कार्ड बांटने के लिए साथ में चलने को कहा तब तुमने उससे कहा मैंने अभी नहाया नहीं है । तुम बैठो मैं अभी नहा कर तैयार हो कर आती हूं ।"

" हां याद आया । फिर मै नहाने चली गई ।"

" उसी समय ।"

श्वेता दी आश्चर्य से मुझे देखते हुए बोली -" क्या ? मतलब जब मैं नहाने गई तब तुम दोनों वो.. वो मेरा मतलब सेक्स किया ।"

" हां तुम्हारे रूम में और तुम्हारे ही बिस्तर पर और सेक्स के दौरान वो तुमसे बातें भी करती रही ।"

" तुम न सच में एक नम्बर के हरामी हो । और ये उर्वशी की बच्ची..."

" छोड़ो ना यार । क्यों खामखां की टेंशन पालती हो ।"

मैंने देखा वो नाखुश नजर आ रही थी । फिर उर्वशी ने हमें देख कर अपने पास बुला लिया । मैं श्वेता दी के साथ स्टेज पर चला गया । श्वेता दी उर्वशी के पास खड़ी हो गई । मैं संजय जी के सामने से गुजरा । संजय जी ने इस वक्त घी कलर की शेरवानी पहन रखी थी । वो काफी हैंडसम दिख रहे थे ।आंखों में शानदार गोगल्स ।

मैं उनके गोगल्स की तरफ देखते ही चौंक गया । गोगल्स के प्रति बिम्ब से मुझे एक रिवाल्वर की नाल को उनकी तरफ तानते हुए पाया । मैं बिना सोचे समझे संजय जी पर झपटा और उन्हें लिए जमीन पर गिर पड़ा । गोली मेरे शर्ट को छुते हुए पिछे की दिवार में घुस गई ।
 
Update 9 A.

मैं जितनी तेजी से संजय जी को लेकर फ्लोर पर गिरा था उतनी ही तेजी से खड़ा हुआ और जिधर से गोली चलने की आवाज आई थी उधर झपटते हुए दौड़ा । मैंने एक आदमी को हाल के प्रवेश द्वार से बाहर की ओर भागते हुए जाते देखा । मैं उसके पीछे दौड़ा । वो आदमी प्रवेश द्वार से बाहर निकल गया था । मैं अभी उसके पास पहुंचता कि वो मेन गेट के सामने रखे एक बाइक पर सवार होकर ये जा । वो जा । मैं उसका पिछा नहीं कर सकता था क्योंकि हमारी कार होटल के पिछे बनी पार्किंग में खड़ी थी । और वहां दुसरी कोई भी गाड़ी नहीं थी । मैंने उस शख्स को जितना देखा उससे यही पता लगा कि वो एक हल्के लाल रंग का शर्ट पहना था । उसके बाल काफी बड़े थे और वो एक दाढ़ी मूंछ वाला इंसान था । मैं वापस हाल की तरफ चल दिया कि तभी संजय जी , उनके पिता जी और कुछ गेस्ट वहां आ गए ।

संजय जी ने मेरी तरफ प्रश्न भरी नजरों से देखा तो मैंने इनकार में सर हिलाते हुए कहा -" भाग गया ।"

हम हाल में वापस आये । वहां अफरातफरी का माहौल था । संजय जी और उनके पिता जी मेहमानों को शान्त कराने की कोशिश करने लगे । मैं संजय जी के पास पहुंचा और उनसे पुलिस को फोन करने को कहा । उन्होंने हां में सिर हिलाया और पुलिस को फोन किया ।

दस मिनट में ही पुलिस आ गयी । फिर संजय जी , उनके फादर और मैं हाल में ही कोने में बने मैनेजर के केबिन में चले गए । हमने पुलिस को वहां घटित हुए वारदात के बारे में बताया । पुलिस के ये पुछने पर कि आप को किसी पर शक है तो संजय जी ने कहा उन्हें किसी पर शक नहीं है ।

संजय जी एक उच्च दर्जे के बिजनेस मैन थे इसलिए पुलिस उनसे बड़े लिहाज से पेश आई । आधे घंटे के पुछताछ के बाद पुलिस जिस दिवार में गोली घुसी थी वहां गयी । उन्होंने गोली निकाल कर अपने कब्जे में किया और ये बोलकर बिदा हुई कि कुछ पता चलने पर आपको खबर करेंगे ।

धीरे धीरे माहौल थोड़ा शांत हुआ । मेहमान खा पी कर अपने अपने कमरों में जाने लगे थे । वहां के लोकल मेहमान अपने अपने घरों को निकल गये ।

मैं एक काउंटर पर गया और लेमन जूस लेकर पीने लगा और आज के कार्यक्रम में जो विध्न हुआ था उसके बारे में सोचने लगा । तभी मैंने संजय जी , उनके डैड और मम्मी , उर्वशी , उर्वशी के माॅम डैड , मधुमिता और श्वेता दी को मेरी तरफ आते देखा । वे सभी मेरे पास आये तभी संजय जी ने मुझे गले से लगाते हुए कहा -

"Thank you soo much सागर । मैं तुम्हारा किस तरह से आभार प्रकट करूं ।आज मैं जिन्दा हूं तो सिर्फ तुम्हारी वजह से । "

" हां बेटा । आज तुमने संजय को एक नई जीवन दी है । हम तुम्हारा अहसान कभी नहीं भुलेंगे ।" संजय जी के फादर ने प्यार से कहा ।

मैं शर्मिंदा होता हुआ बोला -" ऐसी बात नहीं है अंकल । मैंने ऐसा कोई चमत्कार नहीं किया है । मुझे संजय जी के चस्मा में से रिवाल्वर की झलक मिली और मैंने इन्हें तुरंत धक्का दे दिया । एक ग्रह था जो कट गया ।"

" अगर एक सेकेंड की भी देरी होती तो जीजू या तुम्हारा किसी ना किसी को गोली लग ही जाती " - श्वेता दी भयभीत होते हुए बोली ।

तभी उर्वशी मेरे हाथ को पकड़ कर रोते होते हुए बोली -" सागर तुम ने मेरी मांग सुनी होने से बचा लिया । मैं जिन्दगी भर तुम्हारा अहसानमंद रहुंगी । मैं..."

मैंने उसे बीच में टोकते हुए उसे अपने गले लगा लिया और बोला -" क्या बात करती हो उर्वशी दी भाई भी कभी अहसान करता है । भाई का कर्तव्य होता है कि वह अपनी बहन के हर सुख दुःख का ख्याल रखें । और तुम इसे एक दुर्घटना समझ कर भुल जाओ नहीं तो आज के पार्टी का कैसे मजा उठाओगी ।"

वो मुझ से लिपट गई । मैंने उसके सिर के बालों को सहलाते हुए कहा - " ज्यादा रोना धोना करोगी तो सारी मेकअप उत्तर जाएगी और संजय जी डर से कहीं दिल्ली न भाग जाएं ।"

सबके चेहरों पर मुस्कान आ गई । उर्वशी ने मुस्कुराते हुए मेरी छाती पर हल्के से मुक्का जड़ दिया । मैंने देखा सभी मुझे बलिहारी नजरों से देख रहे थे ।

धीरे धीरे परिवार के मेम्बर खाने के लिए निकल गये । रात के दस बज गए थे । बुजुर्ग लोग खा कर अपने अपने कमरे में चले गए । वहां मेरे अलावा संजय जी , उर्वशी , और श्वेता दी ही खड़े थे ।

तभी संजय जी ने मुझसे कहा -" सागर जब भी कभी तुम्हे मेरी जरूरत होगी चाहे वो किसी भी मामलात में हो , बेहिचक मेरे पास आ जाना । किसी भी तरह की संकोच मत करना । ओके ।"

मैंने मुस्करा कर कहा -" ओके ।"

" चलो अब जरा गला तर कर लें ।"

" जी चलिए लेकिन मैं दो पैग से ज्यादा नहीं लुंगा ।" मैंने कहा ।

" ठीक है। चलो।" उन्होंने कहा ।

हम चारों जहां बार का काउंटर बना था वहां गये । संजय जी ने जानी वाकर ब्लैक लेबल के बोतल से पैग बना कर एक मुझे दिया और एक खुद पकड़ लिया । संजय जी के बहुत जोर देने पर उर्वशी और श्वेता दी ने एक बोतल बीयर में से हाफ हाफ पिया । ना ना करते भी मैं तीन पैग पी गया और संजय जी ने तो पांच पैग मार लिया ।

मुझे हल्का हल्का शरूर था लेकिन संजय जी को देख कर लगता नहीं था कि उन्होंने शराब पी रखी हो । उर्वशी और श्वेता दी के चेहरे से लगता था जैसे उन्हें भी कुछ नशा हुआ है । फिर हमने खाना खाया और अपने कमरों में जाने के लिए लिफ्ट की तरफ बढ़े ।

" सागर ताश खेलते हो या नहीं ।" चलते-चलते ही संजय जी ने मुझसे पूछा ।

" जी थोड़ी बहुत खेल लेता हूं ।"

" तो आ जाओ रुम नम्बर ३२२ में । हमारे कुछ दोस्त भी हैं । थोड़ा लक आजमाते हैं ।"

" आप लोग जूआ खेलोगे ।"

" क्यों तुम्हें पसंद नहीं ।"

" पसंद नापसंद वाली बात नहीं है । कहा आप लोगों की बड़ी बड़ी चाल वाली जुआ और कहां मै ।" मैंने मना किया ।

" मेरी तरफ से खेल लेना ।"

" नहीं । आज नहीं फिर कभी जरूर खेलेंगे ।"

बातों ही बातों के दौरान हम थर्ड फ्लोर पर पहुंच गए । हमारा कमरा पहले आता था इसलिए हम अपने कमरे के सामने खड़े हो गए और उर्वशी और संजय जी को गुड नाईट बोल कर अपने कमरे में प्रवेश कर गये ।

कमरे में प्रवेश करते ही श्वेता बोली -" संजय जीजू से एक ताश मांग के ले आओ ।"

मैं चौंकते हुए बोला -" ताश ! ताश क्या करोगी ?"

" खेलेंगे ।"

" इस वक्त । रात के बारह बजने वाले हैं ।" मुझे आश्चर्य हुआ ।

" हां । इस वक्त । क्यों तुम्हें नींद आ रही है ?"

" नहीं । " - मैंने उसे थोड़ी देर घुर के देखा -" ओके । लाता हूं ।"

बोलकर मैं कमरे से निकल गया और संजय जी से ताश लेकर वापस कमरे में आ गया ।

मैंने देखा श्वेता दी ने कपड़े चेंज नहीं किए थे । वो पलंग के सिरहाने पीठ पीछे तकिया लगाए बैठी थी । मैंने कमरे का दरवाजा बंद किया और उसके विपरीत पलंग पर बैठ गया ।
 
Update 9 B.

" कपड़े तो चेंज कर लो ।" मैंने कहा ।

" नहीं । पहले बताओ राजीव से क्या बात हुई थी ।" श्वेता दी आराम से बिस्तर पर अपने को एडजस्ट करते हुए बोली ।

मैंने इमानदारी से पुरी बात बताई । वो राजीव के अनुष्का के साथ नाजायज संबंधों को सुनकर भड़क गई । मैंने बड़ी मुश्किल से उसे शान्त किया । मैंने उसे समझाया कि अनुष्का राजीव का पहला प्यार था और यदि वो राजी होती तो वो आज के तारीख में राजीव की पत्नी होती । और वैसे भी अनुष्का शादी शुदा है और वो अपने फिजूलखर्ची और लालची स्वभाव के कारण अपने पति को छोड़ने वाली नहीं है ।

वो आश्वस्त हुई । फिर बोली " एक और बात है ।"

" क्या?"

उसने चिंतित स्वर में कहा -" मुझे उस घर में सोने से डर लगता है । बाथरूम में जाती हूं तो ऐसा लगता है जैसे अमर अभी उठ कर खड़ा हो जाएगा और मुझे...."

मुझे उसकी बात जायज़ लगी । अमर की मौत कोई स्वाभाविक मौत तो थी नहीं । उसका कत्ल हुआ था । तो डरना वाजिब ही था । सोचते हुए मुझे एक आइडिया आया ।

मैंने कहा -" तुम लोग क्यों नहीं वो फ्लेट बेच देते हो ? और गाजियाबाद छोड़ कर दिल्ली में ही शिफ्ट हो जाओ ।"

" तुम्हें इतना आसान लगता है ? फ्लेट खरीदना अमूमन आसान होता है । लेकिन बेचना बहुत मुश्किल होता है । और गरजु हो कर बेचने में फ्लेट की कीमत भी सही नहीं मिलती है ।"

" इसका एक रास्ता हो सकता है ।"

" क्या ?"

" तुम लोग अमर के घर शिफ्ट हो जाओ । अमर के घर में उसके मां के अलावा और कोई भी नहीं है । वो बेचारी अकेली घर में अमर के यादों में डुबी रहती है । तुम लोगों के आने से उनका अकेलापन दूर हो जाएगा और उनका दिमाग भी दुसरी चीजों की तरफ केन्द्रित होगा । और फ्लेट की जब सही कीमत मिले तब बेच देना ।"

" बोल तो तुम सही रहे हो लेकिन क्या वो हमे अपने घर में रहने देगी ।"

" उसकी चिंता मत करो । तुम राजीव जीजू से बात करो फिर अपनी राय मुझे बता देना । और उनके लिए भी तो ये डिसीजन अच्छा ही होगा , वहां से उनकी आफिस काफी नजदीक हो जाएगी ।

श्वेता दी को ये मशवरा काफी अच्छा लगा । वो खुश हो कर बोली - ओके । चलो अब ताश खेलते हैं ।"

मैंने ताश अपने पैंट से निकाल कर उस के सामने रखा ।

" याद रखना मेरे पास हजार बारह सौ से ज्यादा रूपए नहीं है । वैसे खेलना क्या है ?"

" स्ट्रीप पोकर ।" श्वेता दी ने कहा ।

मैं चौंक गया । स्ट्रीप पोकर एक इरोटिक गेम है जिसे अमेरिका और यूरोप में अधिकतर खेला जाता है । इस गेम में पैसों की बाजी नहीं लगती है । इसमें प्रत्येक बाजी में हारने वाला अपने शरीर से एक कपड़े उतारता है । और अन्त में हारने वाले के शरीर से जब सभी कपड़े उतर जाते हैं मतलब हारने वाला जब पुरी तरह से नंगा हो जाता है तब जाकर ये गेम खतम होता है । इसे कार्ड या स्पाइन दि बोटल के द्वारा खेला जाता है ‌।

"तुम्हें स्ट्रीप पोकर के बारे में पता है न ।" मैं आश्चर्यचकित हो बोला ।

" हां पता है ।"

" केसे भाई "

" क्या सारी दुनिया का ज्ञान तुम्हारे ही पास है ? क्या इन्टरनेट तुम्हीं सर्च करते हो ।"

" तुम क्या जानती हो । ये तो बताओ ? " मैं अभी भी आश्वस्त नहीं था ।

" यहीं कि अगर मैं जीती तब तुम्हें अपने शरीर से एक वस्त्र निकालना पड़ेगा और यदि तुम जीते तो मैं अपने शरीर से एक वस्त्र निकालूंगी ।"

" और गेम शेष कब होगा ?"

" जब तक हारने वाले के शरीर से पुरी तरह कपड़े उतर नहीं जायेंगे ।"

" मतलब जब तक कोई एक पुरी तरह नंगा नहीं हो जाएगा ।" मैंने कहा ।

" हां ।"

मैंने उसे सर से पांव तक निहारा । वो अभी भी वहीं ब्लू कलर की साड़ी और ब्लाऊज़ पहने हुए थी । ब्लाउज में कैद उसके बड़े-बड़े वक्ष गर्व से सीना तान कर खड़ी थी । शरीर का कोई भी भाग खुला तो नहीं था लेकिन उसके गदराए हुए का प्रत्यक्ष प्रमाण पेश कर रही थी ।मेरा दिल तो बल्लियों उछलने लगा । उसके नंगे होने की कल्पना से ही मेरा लिंग उत्तेजित हो गया । मुझे सालों की मेहनत साकार होते हुए नजर आने लगी ।

" सपने देखना बंद करो । और मेरे सामने नंगे होने के लिए तैयार हो जाओ ।" उसने मेरे चेहरे के हाव-भाव को पढ़ते हुए कहा ।

मैं मुस्कराते हुए बोला -" जब मैं टेंथ स्टैंडर्ड में और तुम हायर सेकंडरी में थी तभी से तुम को नंगा देखने की लालसा जगी हुई थी । लगता है आज उपर वाले को दया आ ही गई ।"

" बड़ी शौक है ना अपनी बहन को नंगी देखने की । मगर अफसोस तुम्हारी इच्छा अधूरी ही रह जाएगी । वैसे भी आज तक ताश में मुझसे हारते ही आए हो ।"

" देखते है आज तुम्हें हारने से तुम्हारी किस्मत कितना बचाती है ।"- मैंने मुस्कराते हुए ताश को फेंटते हुए कहा -" अब जरा कपड़ों के बारे में बात कर ले । हम दोनों के वस्त्र ‌भी तो बराबर बराबर होनी चाहिए न । मेरे शरीर पर इस वक्त चार कपड़े है पैंट , शर्ट , गंजी और जांघिया । अब तुम अपने बताओ ।"

" मेरे पांच हैं ।"

" कौन कौन सा ?"

" साड़ी , ब्लाउज , पेटिकोट , ब्रा और पैंटी ।"

" ये तो गलत है । मेरी तरह तुम भी चार कपड़ों में हो जाओ ।"

" नहीं । तुम्हारे कलाई की घड़ी को पांचवां वस्त्र मान लेंगे ।"

" ओके ।" - मैं राजी हो गया ।

मैंने ताश फेटी और उसने ताश को बीच से काटा । असल में कार्ड फ्लश की तरह ही बांटे जाते हैं । तीन तीन करके । फ्लश की तरह जिसका कार्ड बड़ा होगा वो ही जीतेगा ।वो अपने कार्ड उठाई ।

मैंने अपना कार्ड देखा । मेरे पास हार्ट का 7 और स्प्रेड का 10 और किंग आया था । मैंने उसे अपने कार्ड देखाने को बोला ।

उसके पास डायमंड का क्विन , स्प्रेड का गुलाम और क्लब्स का 9 आया था । उसके कार्ड मेरे से बड़े थे । मैं पहला गेम हार गया था । मैंने अपनी घड़ी निकाल कर पलंग के बगल में रखे मेज पर रख दिया ।

वो जीती थी इस बार कार्ड उसने बांटे । मैंने अपनी कार्ड देखी । इस बार डायमंड का तीन , क्लब्स का छः और स्प्रेड का नौ आया था । मैं निराश हो गया । जब उसने अपने कार्ड दिखाया तो उसके पास हार्ट के आठ और क्लब्स के दो और स्प्रेड के आठ निकले । उसके पास आठ का पेयर था । मैं फिर हार गया ।

मैंने अपना शर्ट निकाल कर मेज पर रख दिया । उसने मेरे बदन पर एक सरसरी निगाह डाली ।

वो मुस्कुराती हुई कार्ड बांटी । वो फिर जीत गयी । उसने कलर से मुझे बीट कर दिया जबकि इस बार मेरे पास भी अच्छे पते आये थे । मेरे पास किंग का पेयर था ।

मैंने अपनी गंजी उतार दी और उसे भी बगल में रख दिया । अब मैं उपर से नंगा हो गया था । मेरे शरीर पर सिर्फ पैंट और जांघिया ही बचा था ।

नेक्स्ट राउंड में मेरी तकदीर खुली । उसके पास दो का पेयर आया था जबकि मेरे पास छः का पेयर आया था ।

श्वेता दी ने पलंग पर खड़े होकर अपनी सारी उतारी और उसे उसी मेज पर रख दिया जिस पर मेरा वस्त्र था । साड़ी उतरने के बाद उसकी कमर नंगी हो गई थी । ब्लाउज में कैद उसके बड़े-बड़े वक्ष प्रत्यक्ष रूप से सामने आ गये ।

अगला राउंड भी मैं ही जीता । उसके पास सबसे बड़ा कार्ड गुलाम था जबकि मेरे पास दो तीन , चार का सिक्वेंस आया था ।

उसनेे बैठे बैठे ही अपने ब्लाउज को निकाला और बगल मेज पर रख दिया ।

उसकी ब्रा उसके बड़े-बड़े गोलाईयों को ढकने में पुरी तरह से नाकाम थी । वो उसके पुरे वक्ष का चालीस प्रतिशत ही ढक पाई थी । साठ प्रतिशत वक्ष नंगे हो गए थे । गोरी त्वचा अधनंगी गोलाईया नंगा कमर और गहरी नाभि देखकर मैं होशो-हवास खो बैठा । मेरी उत्तेजना बढ़ती ही जा रही थी ।

" कार्ड बांटो " - उसकी आवाज से मेरी तनदरा भंग हुई ।

अभी भी वो तीन वस्त्र पहने हुए थी जब की मैं दो । मैंने कार्ड बांटी । इस बार उसने मुझे हरा दिया । उसके पास तीन दहला आया था और मेरे पास तो सबसे बड़ा कार्ड ही नौ था ।

मैंने अपना पैंट निकाल कर रख दिया । अब मैं सिर्फ जांघिया पहने हुए था । मैंने महसूस किया कि वो मेरे बदन को चोरी छिपे निहार रही है । कभी उनकी नजर मेरे चौड़ी सीने पर जाती तो कभी मेरे माशल जांघों पर और कभी मेरे जांघिया में कैद उठे हुए उभारों पर । मैंने अपने शरीर पर काफी मेहनत की थी । मैंने जिन लड़कियों से संभोग क्रिया था वो सभी मेरे गठिले शरीर की कदरदान थी ‌।

" अब अपने आखिरी वस्त्र को निकालने और हारने के लिए तैयार हो जाओ ।" श्वेता दी ने मुस्कुराते हुए कहा ।

" देखते है । जब तक सांस तब तक आस ।"

उसने कार्ड बांटे । इस बार मैं जीता । मेरे कार्ड तो बहुत छोटे थे लेकिन उसके कार्ड मुझसे भी छोटे थे । मेरे पास छः , नौ और ग़ुलाम था जबकि उसके पास छः , आठ और दस था । अबकी बारी श्वेता दी को कपड़े उतारने की थी ।

" क्या उतारोगी ?" मैं तो चाहता था कि वो अपने ब्रा निकाल दे ताकि मैं उसके नंगे चुचियों का दिदार कर सकूं ।

लेकिन उसने अपना पेटीकोट उतारा । उसकी मोटी मोटी जांघें ‌जो दुध के समान गोरी थी मेरे आंखों के सामने साक्षात थी । वो अब पैन्टी में थी । पैन्टी उसकी चुत से चिपका हुआ था और वो उसके चुत के रस से भीगी हुई थी ।

मैं 'आह ' भर कर रह गया ।

" पत्ते बांटो । इस बार तो बच गए । लेकिन इस बार नहीं छोडूंगी ।"

मैं इतना भी अहमक नहीं था । कुछ कुछ समझ में आ रहा था लेकिन सगे संबंधियों के सामने मती काम करना भुल जाती है । मैंने पत्ते बांटे । धड़कते दिल से पत्ते उठाया और जैसे ही मैंने पत्तों पर नजर डाली मैं खुश हो गया । मेरे पास ग़ुलाम , बेगम , बादशाह का स्टेट सिक्वेंस था ।

श्वेता दी के पास स्प्रेड का कलर था । वो ये गेम हार गयी थी । मैं सोच रहा था अब वो क्या करेंगी । अपनी ब्रा उतारेगी या अपनी पैंटी । जो भी उतारें मुझे तो मजा ही आयेगा ।

श्वेता दी ने मुझे अपने नशीली आंखों से देखा और अपने जीभ को अपने होंठों पर फिराया । मैं उसके गुलाबी होंठ और रसीली जीभ को देख कर आहें भरता रह गया । कितना मज़ा आएगा इन को चुसने में । एक बार चुसने को मिल जाए तो फिर कयामत तक चुसता रहुं ।

वो मेरी आंखों में देखते हुए अपनी हाथ पिछे की तरफ ले गई और ब्रा को खोल कर नजाकत से मेरी गोद में फेंक दिया । और अपने सीने को अपने हाथों से ढक लिया ।

" ये ग़लत है । वहां से अपने हाथ हटाओ ।" मैंने कहा ।

" कपड़े उतारने की शर्त थी वो तो की ना मैंने ।"

" नहीं । अपने बदन को ढकना गेम के रूल में नहीं है ।"

" नहीं । मैं नहीं हटाउगी ।"

" ठीक है तब गेम बंद करते हैं ।"

" तुम एक नम्बर के बदमाश हो । नखरे करते हुए उसने अपने हाथ अपने वक्ष पर से हटा लिये ।

उसकी दुधिया कलर की बड़ी बड़ी चुचिया नग्न हो गई । उसकी चुची के निप्पल मध्यम आकार के थे । निप्पल का areola सांवला रंग का था । उसकी चुची गोलाकार और ठोस थी । शायद 38 D होगी ।

मेरी ‌नजर चुचियों पर से हटती ही नहीं थी । थोड़ी देर बाद मेरी नज़र चुचियों से निचे की तरफ गई तो उसके नंगे कमर और गहरी नाभि पर फ्रिज हो गई । अगर वो नहीं टोकती तो मैं घंटों उसके सुंदर और सेक्सी बदन को देखते ही रहता ।

" कार्ड बांटो ।" इस बार उसके आवाज में कामुकता और थोड़ी शरमाहटपन थी ।

मैंने मन ही मन उपर वाले को धन्यवाद दिया और कार्ड बांटी ।

अब हम दोनों के बदन पर सिर्फ़ एक एक ही वस्त्र था । वो सिर्फ पैंटी में थी और मैं सिर्फ जांघिया में । हम दोनों बिस्तर पर थोड़ी सी ही फासले पर बैठे थे।

मैंने सहुलियत के लिए अपने पांव थोड़ा फैला लिया था । मैं अपने पत्ते उठाते हुए उसकी तरफ देखा तो उसे मैंने अपने दोनों जांघों के बीच देखते हुए पाया । मैंने देखा मेरा लन्ड जांघिया को फाड़ कर बाहर निकलने के लिए फड़फड़ा रहा था ।

उसने अपनी पलकें उपर की ओर की । हमारी नजरें मिली । दोनों की आंखों में वासना चरम पर थी । उसने मेरी आंखों में देखते हुए बड़े ही इरोटिक ढंग से कार्ड को अपने पैन्टी के अन्दर किया और उसे अपने चुत से रगड़ कर बाहर निकाला फिर सेक्सी आवाज़ में बोली -

" इस बार मैं ही जीतूंगी । अपने पत्ते दिखाओ ।"

मेरा कलेजा मुंह पर आ गया । मुझे तो लगता था कि बिना कुछ किए मेरा लन्ड पानी फेंक देगा ।मैंने भी अपने लन्ड को जांघिया के उपर से मसलते हुए कहा - " दिखा रहा हूं जाने मन । पहले अपनी तो दिखाओ ।"

उसने अपने पत्ते दिखाए । मेरी आंखें उन पत्तों को देख कर फटी की फटी रह गई । उसके पत्ते उसके चुत के रस से भीगी हुई थी । मैं तो पागल सा हो गया ।

मैंने उसके पत्ते उठाये और उसकी आंखों में देखते हुए पत्तों को जीभ से चाटने लगा । वो ये देखकर काफी उत्तेजित हो गई । मैं उसके नमकीन पानी को चाट कर पत्ते से पुरी तरह साफ कर दिया । फिर उसके पत्तों पर देखा ।

उसके पास बहुत ही अच्छा कार्ड आया था । उसके पास तीन बेगम आई थी । मैं गेम हारने वाला था । मुझे उसकी चुत को देख ने की लालसा धूमिल होते हुए दिखाई देने लगी ।

" तुम्हारे कार्ड में देखूंगी ।" बोलकर उसने मेरे कार्ड उठा लिए ।

मैं धड़कते दिल से उसे देखा कि शायद मेरे पास उससे भी अच्छा कार्ड आ जाय और मैं उसकी चुत को देख सकूं ।

उसने मुझे देखा और निराशा भरे स्वर में कहा - " तुम्हारी किस्मत आज अच्छी है । तुम जीत गए ।"

मैं आश्चर्य और खुशी से मन ही मन झुम गया । मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने करोड़ों रुपए की लाटरी की बमपर प्राइज जीत ली हो । मैं मछली के आंख की तरह उसके पैन्टी पर नजर टिका दी ।

श्वेता दी ने बड़ी ही कामुकता पूर्वक अपनी उंगलियों को अपने पैन्टी पर रखा और धीरे-धीरे नीचे की तरफ खिसकाने लगी । पैन्टी को उतार कर मेरे मुंह पर फेंक दिया । मैंने जल्दी से उसे लपका और उसकी नंगी चुत को देखने का प्रयास करने लगा ।

श्वेता दी फिर से अपने सुखे होंठों पर जीभ फिराई और मेरी नज़रों में देखते हुए आंखों से नीचे की तरफ देखने की इशारा करते हुए अपनी दोनों टांगें फैला दी ।

मेरी नजर उसकी दोनों टांगों के बीच पर गयी ।

मेरी आंखों के सामने उसकी चुत थी ।

एक दम चिकनी , डबल पावरोटी के समान फुली फुली , चुत के बीचों-बीच लम्बी दरार और मोटे मोटे ओंठ । उसके दरारों से रिसता हुआ पानी जो उसके जांघों तक आ पहुंचा था ।

" कैसी है ?"

मेरा ध्यान उसके बोलने से टुटा । मैं वासना से लथपथ उसकी तरफ प्रश्न भरी नजरों से देखते हुए कहा -" क.. क्या ?"

" ये ." - उसने अपनी चुत की तरफ इशारा करते हुए कहा ।

" क्या ये ?" - मैंने उसे दिखा कर अपना लौड़ा मसलते हुए कहा ।

वो थोड़ी सी मेरे तरफ़ घिसकी और मेरे जांघों के उपर अपने पांव रखते हुए फुसफुसा कर बोली - " तुम्हारी बहन की बुर ।"
 
Update 9 B. Continue.

उसके लफ्ज़ सुनकर मेरे कानों से धुआं निकलने लगा । मेरे शरीर का सारा खून मेरे लन्ड पर पर एकत्रित हो गया । धड़कने तेज हो गई । मैं उसके आंखों में देखते हुए अपनी जांघिया को पकड़ कर नीचे खिसका दिया । जांघिया के हटते ही लन्ड स्प्रिंग की तरह उछल पड़ा ।

श्वेता दी की नजर मेरे लन्ड पर पड़ी । उसकी आंखें वहीं अटक गई ।

वो मेरा लन्ड देख रही थी और मैं उसकी चुत देख रहा था ।

" अद्भुत , अनुपम , अदि्वतीय , अव्वल " मैं फुसफुसाया ।

" क्या ।"

" तेरी बुर ।"

" शरम नहीं आती है ।"

" किसलिए ।"

" अपनी बहन की बुर की बड़ाई करते हुए ।"

" जब देखते हुए और ' बुर ' बोलते हुए शर्म नहीं आती है तो बड़ाई करने में शरम क्यों आयेगी ।"

" हमम "....." मेरी कच्छी दो ।"

" क्यों ।"

देखते नहीं कितनी पानी छोड़ रही है ।" -उसने अपनी टांगें फैला कर अपने चुत में ऊंगली डाल कर चोदने लगी और रस से सराबोर अपनी ऊंगली मुझे दिखाते हुए बोली ।

मैंने तेजी से अपना जांघिया निकाल फर्श पर फेंक दिया । हम दोनों पुरी तरह मादरजात नंगें हो गये थे ।

हम दोनों अपने अपने गुप्तांगों को एक दुसरे को दिखा कर मसलने लगे ।

" तुम्हारी कछी गन्दी हो जाएगी । "- मैं कभी उसकी चुत तो कभी उसकी रस से भरी हुई ऊंगली को देखते हुए कहा -" इससे अच्छा है मैं चाट कर साफ कर देता हूं ।"

" मेरी बुर चाट कर साफ करोगे ।"

" हमम ।"

" कहीं तुम्हारे जीजा को पता चल गया तो ।"

" क्या ।"

" की उनकी बीवी की बुर को उसका छोटा भाई चाट चाट कर साफ़ करता है ।"

अब वो तेजी से अपनी चुत को उंगलियों से चोद रही थी और मैं उसके सामने बैठा मुठ मारे जा रहा था ।

" जीजा को कैसे पता चलेगा कि उसकी बीवी अपने भाई से अपनी बुर चुसवा रही है । जीजा को कैसे पता चलेगा कि उसकी बीवी अपने भाई से चोदवा रही है ।"

' अच्छा चोदवा भी रही है " - वो सरक कर मेरे गोद में बैठ गई ।

" हां " कहकर मैंने उसकी चूचियों को दबोच लिया ।

" उसे पता चल जाएगा ।"

" कैसे ।"

वो मेरा लन्ड पकड़ कर मसलते हुए बोली -" बुर फट जायेगी । तुम्हारा लौड़ा बहुत बड़ा जो है ।"

मैंने उसकी चुत में अपनी ऊंगली डाल दी और ऊंगली से चोदते हुए कहा -" बुर तो फटने के लिए ही होती है । लन्ड जितना बड़ा होगा बुर को उतनी ही ज्यादा मजा आयेगा ।"

" अच्छा ! और उसे पता नहीं चल जाएगा कि उसकी बीवी की बुर अपने भाई के मोटे लन्ड से चुद चुद कर ज्यादा ढीली हो गई है ।" वो मेरे लन्ड को मुठ मारते हुए बोली ।

" उसे तो ये भी पता नहीं चल पाएगा कि उसके होने वाले बच्चों का बाप वो नहीं बल्कि उसके बीबी का भाई होगा ....उसे ये भी पता नहीं चलेगा कि उसकी बीवी उसी के बगल में लेट कर अपने भाई से अपनी रसीली चुत कुटवायेगी ।"

वो काफी उत्तेजित हो गई ।

" अच्छा ? ...तो शुरू करो ।"

" क्या ।"

" चोदन पर्व .... तभी न बहनचोद बनोगे ।"

" हां और तुम्हारे होने वाले बच्चों का मामा और बाप ।"

अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था । उसने मुझे धक्का दिया । मैं बिस्तर पर पीठ के बल गिर पड़ा । वो मुझ पर झुकी । अपनी चूची को मेरे सीने पर रगड़ी और अपने होंठ मेरे होंठों से लगा दी ।

मैंने उसे अपने बाहों में कस कर दबोच लिया । वो अपने बाहों को हार मेरे गले में डाल कर मुझ पर पसर गई । उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां मेरे चौड़े सीने से दब गई ।

हम दोनों का गहरा चुम्बन शुरू हो गया था । मैं उसके निचले होंठ को अपने होंठों में दबा कर चूसने लगा । वो मेरा उपर वाले होंठ चुस रही थी । थोड़ी देर बाद उसने मेरे निचले होंठ को अपने होंठों में दबा लिया और बुरी तरह चूसने लगी । मैं उसके ऊपर वाले होंठ चूसने लगा ।

मैं उसकी चूचियों को दबाना चाहता था लेकिन वो मुझसे जोंक की तरह चिपकी हुई थी अतः मैंने उसके बड़े बड़े गांड़ को हाथों से सहलाने और मसलने लगा । क्या गांड़ थी उसकी । एक दम बड़े बड़े और मांस से भरपूर । वो उत्तेजित हो कर मेरे होंठों को बुरी तरह चूसने लगी । हम दोनों इतनी बुरी तरह एक दूसरे को चूम रहे थे कि ऐसा लग रहा था जैसे वो मेरे मुंह में अपनी मुंह घुसाए जा रही थी और मैं उसके मुंह में । दोनों के थुक लार मिल कर एक हो गए थे । मै उसके थूक अपने गले से निगल रहा था और वो मेरी थूक निगल रही थी ।

हमारी सांसें फूलने लगी थी । उसने अपना मुंह उपर किया तब जाकर हमारी सांसें व्यवस्थित हुई । हम दोनों एक-दूसरे के आंखों में देखते जा रहे थे । मैंने उसकी आंखों में देखते हुए अपनी ऊंगली उसके गांड़ के छेद में डाल कर कुरेदने लगा । उसकी आंखें वासना से लाल हो गई थी । उसने मेरी आंखों में देखते हुए अपनी रसीली जीभ को बाहर निकाला तो मैंने भी अपनी जीभ निकाल ली । वो फिर मेरे होंठों पर झुकी और अपने जीभ से मेरी जीभ को लड़ाने लगी । एक-दूसरे के जीभ से कुछ देर खेलने के बाद वो मेरे जीभ को अपने मुंह में ले कर चूसने लगी । थोड़ी देर बाद मैंने उसे पलट कर अपने नीचे लिटा दिया और मैं उसके ऊपर चढ़ गया और उसके चुत से लन्ड को रगड़ते हुए उसकी जीभ को अपने मुंह में लिया और उसे चुसने लगा । मन कर रहा था उसके जीभ को चुसता रहुं चुसता रहुं और चुसता ही रहुं । वो बेचैन हो कर अपने हाथोंको बीच में डाल कर मेरे लन्ड को पकड़ लिया और उसे जोर जोर से मरोड़ने लगी ।

हम दोनों एक दूसरे के चुमाई चटाई से थक ही नहीं रहे थे । मैं उसके दोनों चूचियों को अपने हथेलियों में भर कर दबाने लगा । उसकी चुची में कुंवारी लड़कियों जैसी कड़ापन था ।करीब आधे घंटे तक दोनों ने एक दूसरे के जीभ और होठों को चूमा । चूसा । फिर मैं धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ने लगा और उसके पुरे चुचियों को दबा दबा कर चूसने लगा काटने लगा ।

" लगता है " वो दर्द से कराही ।

लेकिन मैं तो बावला हो गया था । मैंने उसकी चूचियों को हाथों से दबोचते हुए निप्पल को अपने मुंह में ले कर चूसने लगा ।

अब उसे मज़ा आने लगा ।

वो अपनी सीने को उठा कर निप्पल को मुंह में ठूंसते हुए कामुक हो कर बोली -

" मेरे भैया को भुख लगी है...दुधु पियेगा.... अपनी दीदी की चूची का दूध पियेगा....।"

" Ssrrrruuuupppp.....Ssssrrruuuuppp...qqquuuummm..... ssrrrruuuupppp."- मैं उसके निप्पल को होंठों से दबोच दबोच कर चुसने लगा ।

" aaaahhhh....aaahhhhh.....ooohhhh."- वो बस सिसकारियां भर रही थी और " आह ' ' ओह' कर रही थी । और मेरे लन्ड को पकड़ कर मुठ मारने लगी । और अपनी गांड़ उठा कर झटके पर झटके देते हुए झर गई ।

मैं बदल बदल कर उसके दोनों निप्पलों को चूसना शुरु कर दिया । काफी देर तक उनको चूसा । जब मैं उसके चुचियों पर से हटा तब देखा कि उसकी पुरी चुचिया लाल हो गई थी । मैं धीरे धीरे नीचे की तरफ जाने लगा । उसके नंगे पेट को जीभ से चाटते हुए उसकी नाभि पर पहुंचा । मैंने अपने जीभ का नोक बना कर उसके नाभि में प्रवेश करा दिया । वो मेरे सर के बालों को सहलाये जा रही थी ।

उसके नाभि को गीला करने के बाद मैं उसके उसके चुत के ऊपरी हिस्से पर जीभ फिराने लगा ।

थोड़ी देर बाद मैं उठा और उसके दोनों पांवों के बीच बैठ गया । मैंने उसकी तरफ नजर फेराई । वो मुझे ही देख रही थी । मैं मुस्कराया तो वो भी मुस्कुरा दी । मैं झुक कर उसके मोटे मोटे जांघों पर अपने होंठ रख दिए । उसकी जांघें भी उसके चुत रस से भीगी हुई थी । मैंने उन्हें चाट लिया । अब मैं शीघ्र उसके चुत के पास जाना चाहता था ।

मैंने जांघों को चाटते चाटते उसके दोनों पैरों को पकड़ा और उसे विपरीत दिशा में फैला दिया । उसके डबल पावरोटी के समान फुली हुई चुत मेरे आंखों के समकक्ष आ गयी । उसकी चुत उसके कामरस से भीगी हुई थी । वो थोड़ी देर पहले झड़ी थी इसलिए उसके चुत के साथ साथ बिस्तर भी गीली हो गई थी । ताश के सारे पत्ते बिखरे पड़े थे । पत्ते मुड़ गई थी और बिस्तर के के चारों तरफ फैल गए थे। तभी मेरी नजर एक जगह रखें ताश के उन
तीन पत्तों पर पड़ी जो शायद मेरे थे और जीतने का कारण बने थे । वे पत्ते उस के गांड़ के नीचे दबे हुए थे । मैंने उन पत्तों को उसके गांड़ के नीचे से निकाला तो देखा उन पत्तों में एक स्प्रेड का छः , एक डायमंड का गुलाम और एक हार्ट का सात आया था । मैं आश्चर्यचकित हो गया । लास्ट गेम मैं नहीं श्वेता दी जीती थी और उसने कहा था कि मैं जीता हूं । उसने मुझे झुठ बोला था । वो मेरे सामने नंगी होना चाहती थी ।

मैंने उन पत्तों को उठाया और श्वेता दी को वहीं से दिखाया । श्वेता दी उन पत्तों को देख कर मुस्कराई । मेरे दिल में उसके लिए बहुत प्यार आया । मैंने झुक कर उनके होंठों को चुम लिया। मैं वापस उनके पैरों के बीच बैठा और उनके पांवों को उठा कर उनके सीने पर कर दिया जिससे उनकी चुत फैल गई । मैंने उनकी चुत को जी भर के देखा फिर अपने होंठों को चुत से सटा दिया ।

मैंने सबसे पहले चुत के मोटे ओंठ पर अपनी जीभ फिराई फिर उन को अपने होंठों से भर कर चूसने लगा । वो दुबारा गरम हो गई थी ।चुत रस से भींगने लगा था । वो अपना काम रस छोड़ने लगी थी जिसे मैं चुस चुस कर पी रहा था । मैंने अपनी ऊंगली चुत के छेद में डाल दिया और भगनासे को होंठों से दबा कर चुसने लगा । वो हाय हाय कर उठी । अपने कमर उठा कर मेरे मुंह पर फेंकने लगी । उसकी चुत में पानी का सैलाब आ गया । मैं उस पानी का एक कतरा भी जाया नहीं होने देना चाहता था । मैंने अपने होंठ को उसके चुत से चिपका कर उसके छेद में अपनी जीभ डाल दिया । वो मलाई छोडती रही और मैं उसे चाट चाट कर गले से निगलता रहा ।

श्वेता दी की उत्तेजना चरम पर थी । वो मेरे बालों को कस कर पकड़ ली और अपनी चुत की तरफ खिंचने लगी । ऐसी प्रतित हो रहा था जैसे वो मुझे अपने चूत में ही घुसेड़ लेगी । और मैं तैयार था उनके चुत में घुसने के लिए । मुझे उनके चुत की महक ने पागल सा कर दिया था । अपने नाक से चुत की महक को सुंघते हुए तेजी से छेद के अंदर जीभ को डालने लगा और निकालने लगा । वो अपने गांड़ को उपर की तरफ धकेलती हुई बोली -

" म...मेरा निकलने वाला है ।"

मैं चुत को चाटते चाटते ही बोला - " निकलने दो लेकिन सब मेरे मुंह के अंदर ही छोड़ना । सारी मलाई पीनी है मुझे ।"

वो पूर्ववत अपने गांड़ उछालते हुए बोली -" मुझे भी पीना है ।"

मैंने उसके चुत से मुंह उपर करते हुए बोला -" तुम कैसे पियोगी ।"

वो मुझे धकेलते हुए बोली -" बेवकूफ मैं इसकी बात कर रही हूं "- बोलकर मेरे लन्ड को पकड़ लिया ।

वो मेरा लन्ड के पानी के लिए बोल रही थी । मैं उसके ऊपर से उठा और बिस्तर पर लेट गया और उसे मेरे उपर आने का इशारा किया । वो मेरे सिर की तरफ अपनी पांव करके मेरे उपर लेट गई । हम 69 पोजीशन में आ गये थे ।

वो मेरे लन्ड को हाथों से पकड़ते हुए बोली -" कितना लम्बा है । मोटा भी बहुत है ।"

" क्यों जीजू का नहीं है ?"

" है पर इतना ज्यादा नहीं ।"

" तुम्हे कैसा लगा ।"

" वो तो तुमसे पहले ही बोल चुकी हूं । बहुत सुंदर ।"

" क्यों नहीं होगा । आखिर है किसका ।" मैंने मजाक किया ।

" मेरे छोटे भाई का जो अब मेरा भतार बन गया है ।" बोलकर मेरे लन्ड के सूपाडे पर अपनी जीभ लड़ाने लगी । मैंने भी उसके पांवों को अलग कर के उसके चुत पर अपना मुंह रख दिया । धीरे धीरे उसने लन्ड को अपने मुंह में डालने का प्रयास किया । थोड़ी दिक्कत हुई लेकिन अंततः उसे अपने मुंह में ले ही ली और चुसने लगी । कभी सुपाड़ा के छिद्र पर जीभ रगडती कभी मुंह उपर नीचे करके पुरे लन्ड को चूसने लगती ।

मैं उत्तेजित तो पहले से ही था अब ऐसा लग रहा था कि मैं एक दो मिनट में ही झड़ जाऊंगा । मैं अपने कमर उठा उठा कर लन्ड को उसके मुंह में पेलने लगा । साथ ही उसके चुत के भी चूमता चाटता रहा । बड़ी मुश्किल से पांच मिनट तक कन्ट्रोल किया ।

" मेरा होने वाला है "- मैंने चुत से मुंह हटा कर बोला ।

" मेरा भी "- वो जोर जोर से लन्ड चूसती हुई बोली ।

मैं वापस अपने मुंह उसके चुत से सटा दिया । तभी मेरे लन्ड ने जोर की पिचकारी मारी और उसके मुंह में झड़ने लगा । उसी वक्त उसने भी अपने चुत से अमृत रस की बौछार शुरू कर दी । उसके चुत की मलाई मेरे गले से होते हुए पेट में जाने लगी । वो झड़ती रही और मैं पीता रहा उसी तरह मैं झड़ता रहा और वो पीती रहीं । दोनों का जबरदस्त इजेकुलेशन हुआ था । झड़ने के बाद काफी देर तक हम वैसे ही पड़े रहे ।

कुछ देर बाद वो उठी और बाथरूम चली गई । उसके आने के बाद मैं बाथरूम गया और फ्रेश होकर बाहर आया। वो नंगे बदन बिस्तर पर लेटी थी । रूम की लाइट पहले की ही तरह जल रही थी । मैं जा कर उसके बगल में लेट गया । फिर मैंने करवट ली और उसे अपने बाहों में भर लिया । वो मुझ से लिपट गई ।

मेरे होंठों पर एक चुम्बन दे कर बोली -" इतना मजा मुझे आज तक नहीं आया था ।"

" जीजू के साथ भी नहीं ।" मैंने उसकी चूची को सहलाते हुए कहा ।

" नहीं । " कहकर उसने थोड़ी जगह बनाई जिससे मैं उसके चुचियों को प्यार कर पाता ।

" इसकी वजह बताऊं ।"

" हमम ।"

" हम दोनों भाई बहन हैं ना इसलिए । सगे संबंधियों में सेक्स करने से उत्तेजना अधिक आती है ।"

" हम्मम...सच में मैं इतनी उत्तेजित कभी नहीं हुई थी और अपनी जिंदगी में इतने गन्दे शब्द कभी नहीं बोले हैं । लेकिन तुम्हारे साथ न जाने कैसे ये सब बोलती गयी । उनके साथ तो कभी भी नहीं बोली ।"

" ऐसा ही होता है गुल बदन । अपने भाई से चोदवाओगी तो इससे भी ज्यादा गन्दे शब्द निकलेंगें "- बोलकर मैंने उसकी चुत को हथेलियों से मसल दिया ।

वो मेरे लन्ड को पकड़ कर सहलाने लगी और बोली -"लेकिन तुम्हें मेरी कसम जो इसके बारे में किसी को कहा तो ।"

" पागल हूं जो ये सब किसी से कहुंगा । और कहुंगा भी क्या कि मैं अपनी दीदी को चोदता हूं । क्या तुम किसी से कहोगी मेरा भाई मुझे रोज पुरी नंगी कर के मेरी बुर में अपना मोटा लौड़ा डाल कर चोदता है ।"

वो लन्ड को जोर जोर से मुठ मारते हुए उत्तेजित हो कर बोली -" कितनी गंदी बात करते हैं ना हम ।"

मैंने उसके चुत के दरारों में ऊंगली डालते हुए कहा -" मैं नहीं तुम ।"

" गन्दे भाई की गन्दी बहन ।" वो मेरे शरीर पर चढ़ गयी ।

उसके पुरे शरीर को सहलाते हुए कहा -" गन्दे भाई की सबसे प्यारी चहेती बहन ।"

हम दोनों उत्तेजित हो गये थे । एक दुसरे के शरीर को सहलाते दबाते गुत्थम गुत्थी हुए ऊपर नीचे होने लगे । मैंने उसे पेट के बल लिटा दिया और उसके पांवों को पकड़ कर उसकी कमर उपर उठा दी । वो चौपाया जानवर की तरह अपनी गांड़ को उठा दी । उसके गांड़ को चूमता चाटता हुआ मैंने अपनी जीभ उसके गांड़ के छेद में डाल दी और उसे जीभ से चाटने लगा । वो सिहर गई और अपनी गांड़ मेरे मुंह पर पटकने लगी । गांड़ को चाटते चाटते उसकी चुत को मुंह में भर लिया और उससे टपकते रसों को पीने लगा । वो बेचैन हो कर बोली -

" क..करो । बर्दाश्त नहीं हो रहा है ।"

मैंने उसे पीठ के बल लिटा दिया और उसके उपर चढ़ गया । मैंने लन्ड को उसके चुत से रगड़ते हुए कहा -" क्या करूं ।"

" साले कमीने अपनी दीदी के बुर के छेद में लन्ड लगा के बोलता है क्या करूं । चोद मुझे बहन चोद ।"

मैंने उत्तेजित हो कर धक्का दिया । लन्ड का सुपारा उसके चुत में घुस गया । वो दर्द से कराही ।

" धीरे से कर ना ।"

" अब धीरे से नही तेरी बुर को जोर जोर से चोदूंगा मेरी जान ।" कहकर मैंने जोर का धक्का दिया और आधा लन्ड उसके चुत में समा गया ।

वो जोर से चिल्लाई ।

" धीरे से नही कर सकता है ।" वो कराहती हुई बोली ।

मैंने अपने होंठ उसके होठों पर रख कर एक और प्रहार किया । लन्ड उसकी चुत में पुरी तरह से घुस गया । उसके आंख के कोने से आंसू छलक पड़े । मैं थोड़ी देर वैसे ही पड़ा रहा। फिर कुछ देर बाद उसके चुचियों को प्यार से दबाया फिर उसके निप्पल को मुंह में ले कर चूसने लगा । थोड़ी देर में वो नोर्मल हुई । मैंने हल्के हल्के धक्के लगाने शुरू कर दिया । उसकी दर्द अब कम हो गयी थी । उसकी चुत अब गीली होने लगी थी । थोड़ी देर में ही उसने अपने कुल्हे उठाने लगी ।

मैंने धक्के तेज कर दिए । वो भी नीचे से ऊपर की ओर अपनी चुत को ढकेलने लगी । मेरा लन्ड उसके चुत में तेजी से घुसने और निकलने लगा । चोदाई फुल स्पीड में चालु हो गई थी । हम दोनों ताल से ताल मिला कर कमर उपर नीचे कर रहे थे । उसकी चुत काफी गीली हो गई थी । जिससे ' फच ' ' फच ' की आवाज आने लगी । मैं उसके होंठों को चूसने लगा। उसने अपनी जीभ मेरे मुंह में डाल दी । मैं उसके जीभ को चुसते हुए कमर उठा उठा कर धक्के मारने लगा । वो अपने पांवों को मेरे कमर से लिपटा कर मेरे गांड़ को अपने हाथों से दबाने लगी ।

दोनों सेक्सी भरी आवाज निकालते हुए घमासान चुदाई में लगे हुए थे । उसकी चुत की गर्मी से मुझे लगता नहीं था कि अब मैं ज्यादा देर तक टिक पाऊंगा ।

चोदाई के दौरान उसने मुझे नीचे पलट दिया और वो मेरे उपर आ गयी । अब मैं नीचे था और वो उपर । वो उछल उछल कर मुझे चोदने लगी और मैं नीचे से ऊपर की तरफ धक्का मारने लगा । उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां जोरों से हील रही थी ।

" हाय.... कितना मज़ा आ रहा है बहन को चोदते हुए ।"

" कुछ बोलो मत " - वो अपनी गांड़ जोर जोर से पटकते हुए बोली - " अब हम नहीं सिर्फ उन्हें बात करने दो ।"

मैंने उसे पलट कर अपने नीचे किया और उसकी चुत में तेजी से धक्का देते हुए कहा -" किन्हें बात करने दो ।"

" उन्हें " - वो नीचे की तरफ इशारा करते हुए बोली -" फच फच की आवाज नहीं सुन रहे हो ।"

हम दोनों के घमासान चुदाई से जो ' फच ' ' फच ' की आवाज आ रही थी वो उसकी बात कर रही थी ।

" सही कह रही हो । अब सिर्फ तुम्हारी बुर और मेरी लन्ड को बात करने दो ।"

करीब पौन घंटे की चुदाई के बाद वो हांफते हुए बोली -" मैं झडने वाली हूं ।"

" मैं भी ... दोनों एक साथ झडते है ।"

अचानक उसका शरीर अकड़ा और वो झटके दे दे कर अपनी गरम पानी मेरे लन्ड पर छोड़ने लगी । उसकी गर्मी से मैं भी बच ना सका । मैं भी अपना वीर्य उसके चुत में तेजी से छोड़ने लगा । ज्योंहि मेरे विर्य को उसने अपने अन्दर महसूस किया वो मेरे होंठों को अपने होंठों से दबा कर चूसने लगी । दोनों ने काफी पानी फेंका था । हम एक-दूसरे से जोंक की तरह लिपटें हुए काफी देर तक पड़े रहे ।

हमारा चोदन पर्व अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच कर शेष हुआ ।
 
Update 10.

होटल के बेल बजने की आवाज सुनकर मेरी नींद खुली । मैंने देखा श्वेता दी मुझसे लिपट कर सोई हुई थी । वो करवट के बल सोई थी । उसकी चुची मेरे सीने से धंसी हुई थी । मेरे पांव उसके माशल जांघों के उपर थी । मेरा लन्ड खड़ा हो कर उसके जांघों से दबा हुआ था ।वो बेसुध गहरी नींद में थी । मुझे उसे देखकर बड़ा ही प्यार आया । उसके होंठों को देख कर चूमने का मन किया ।मैंने उसके निचले होंठ को अपने होंठों से दबा लिया और हल्के हल्के चुसने लगा । उसने अपनी पलकें खोली । मेरी आंखों में देखते हुए मुस्कराई और अपनी लबों का मर्दन करवाती रही ‌। तभी फिर बेल बजी । वो हड़बड़ा कर उठी ।

" कौन है ।" उसने धीरे से कहा ।

" पता नहीं ।"

मैं भी उठ कर बैठ गया । हम दोनों के शरीर पर कोई भी वस्त्र नहीं था । उसे अपनी स्थिति का आभास हुआ तो वो जल्दी से अपने और मेरे कपड़े समेटते हुए बाथरूम की तरफ भागी ।

बाथरूम के अन्दर जाने से पहले पलटी और बोली -" देखो कौन है ।"

मैंने घड़ी की तरफ निगाह डाली सुबह के नौ बजे थे । मैंने थोड़ा ऊंचे स्वर में बोला -" कौन है ?"

" मैं उर्वशी ।"

" एक मिनट आता हूं ।"

मैंने जल्दी से बैग खोला और पैजामा पहना । और जाकर दरवाजा खोला । मेरा उपर का शरीर नंगा था ।

वो इस वक्त गहरे लाल रंग की साड़ी पहने हुए थी । चेहरे पर हल्की सी मेकअप और ताजगी । उसकी खूबसूरती साड़ी में और भी निखर गई थी । वो मुझे देखते ही बोली ।

" मैं कब से बेल बजा रही हूं "- उसने मुझे कमर से ऊपर नंगे बदन देखते ही बोली -" तुम लोग अभी तक तैयार नहीं हुए हो ।"

" नींद जरा देर से खुली । आओ अन्दर आओ ‌।"

वो अन्दर आईं ।

" श्वेता कहा है ।"

" बाथरूम में ।"

उसने बाथरूम की तरफ देखा । बाथरूम से पानी चलने की आवाज आ रही थी । फिर कमरे के चारों तरफ सरसरी निगाह से देखी ।

मैं जा कर बिस्तर पर बैठ गया । वो मेरे पास आई और खड़े खड़े ही बोली ।

" तुम लोग अभी सो कर उठे हो । रात में नींद नहीं आई । "

" आई लेकिन थोड़ी ही देर से सोए थे इसलिए नींद नहीं टुटी ।"

" देर से सोए थे । क्या कर रहे थे अच्छा हां याद आया संजय बोल रहे थे तुम उनसे ताश ले आए थे । "

और तभी उसकी नज़र फर्श पर पड़ी । फर्श पर पलंग से सटकर श्वेता दी की कछी पड़ी हुई थी और थोड़ी दूर मेरी जांघिया पड़ी थी । श्वेता दी ने बाथरूम जाते समय सारे कपड़े तो ले ली थी लेकिन अपनी पैंटी और मेरी जांघिया ले जाना भुल गयी थी । बिस्तर और फर्श पर ताश के पत्ते बिखरे पड़े थे । कुछेक ताश बुरी तरह मुड़े और कुचले हुए थे ।

वो संदिग्ध भाव से मुझे देखी । मैं समझ गया वो वो जान चुकी है कि रात में मेरे और श्वेता दी के बीच में क्या हुआ था । मैं नीचे झुक कर अपना जांघिया और श्वेता दी की कछी को उठाया और साईड में रख दिया ।

" लगता है जबर्दस्त गेम हुआ था । कौन जीता ।"- वो कुटिल मुस्कान भरी ।

" कोई नहीं जीता । बराबरी पर गेम खतम हुआ ।" मैंने मुस्कराते हुए कहा ।

वो पलंग पर बैठते हुए बुरी तरह मुड़े हुए ताश के एक पत्ते को उठाते हुए बोली -" एक ही राउंड गेम चला या और भी कई राउंड हुए ।"

" एक ही राउंड में चार बज गए और फिर शाम के वाइन के नशे का भी असर था तो फिर पड़े पड़े कब सो गए पता ही नहीं चला ।"

वो ताश के पत्ते को मेरे आंखों के सामने लाते हुए पूर्व वत मुस्कराते हुए बोली -"

" कम से कम इन बेचारे पतों पर तो रहम कर दिया होता । देखो इसकी क्या हालत कर दी है । "

मैंने देखा कार्ड के उपर हम दोनों का कामरस लगा हुआ था जो अब सुख गया था लेकिन उसके दाग स्पष्ट दिख रहे थे । लगता है ये कार्ड हमारे संभोग के दौरान कमर के नीचे हमारे संधि स्थल से के पास ही थे ।

" ये दो खिलाड़ियों के बीच में आ गया था इसलिए मैंने मशीनगन से इस पर गोलियों की बौछार कर दी । और हो सकता है कि श्वेता दी को भी पसंद नहीं आया हो और उसने भी अपनी कूआं के पानी से इसे डुबो देना चाहा हो ।"

" सच में तुम ना एक नम्बर के हरामी हो । "

" शुक्रिया ।" कहकर मैंने उसे दबोच कर पलंग पर गिरा दिया और उसके मुंह से अपनी मुंह सटा दिया और उसके गुलाबी होठों को चूसने लगा । उसने मुझे कसकर अपनी बाहों में कस लिया । हमारी चुम्बन काफी wild होने लगी । मैंने उसे पलट कर पीठ के बल लिटा दिया और उसके होंठों को चूसने लगा । वो होंठ चुसाते हुए अपनी जीभ निकाल कर मेरे मुंह में ठूंस दी । मैं उसकी जीभ मेरे अपने मुंह में दबा कर चूसने लगा ।

हमारे saliva ( लार ) एक दूसरे के मुंह में जा रहे थे । मैं उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों को ब्लाउज के ऊपर से जोर जोर से दबाने लगा ।
तभी बाथरूम में कुछ हलचल हुई । वो मुझे परे धकेल दी और अपने कपड़े दुरूस्त करने लगी । मैं भी उठकर उसके बगल में बैठ गया ।

हम अपनी सांसें दुरूस्त कर ही रहे थे कि श्वेता दी बाथरूम से फ्रेश होकर बाहर निकली । वो उस वक्त एक टावल लपेटे हुए थी जो उसके घुटनों से ऊपर थी । सीने का उपरी हिस्सा खुला हुआ था । टावल में उसके बड़े-बड़े वक्ष काफी मनमोहक एवं सेक्सी लग रहे थे ।

" अरे ! तु कब आई ।" श्वेता दी ने उर्वशी को को देख कर चौंकते हुए कहा । और जल्दी से अपने कपड़े बैग में से निकालने लगी । और मुझे देखते हुए बोली -" तुम क्या कर रहे हो । जाओ जल्दी से रेडी हो जाओ ।

मैंने उसकी पैंटी और अपनी जांघिया को अपने हाथों में दबा कर अपने कपड़े लिया और बाथरूम में घुस गया ।

" अभी आई । और बता रात में नींद कैसी आई ।" -" उर्वशी ने मुस्कुराते हुए कहा ।

" अच्छी आई । ताश खेलते खेलते देरी हो गई इसलिए नींद जल्दी टुटी नहीं ।" श्वेता दी अपने कपड़े पहनते हुए बोली ।

मैंने बस इतना ही बात बाथरूम में प्रवेश करते हुए सुनी । करीब आधे घंटे बाद जब मैं बाहर निकला तो उर्वशी और श्वेता दी को धीरे धीरे बातें करते हुए सुना । दोनों काफी प्रसन्न चित्त मुद्रा में मुस्करा मुस्करा कर बातें कर रही थी । श्वेता दी तैयार हो चुकी थी । वो हरे रंग की साड़ी पहनी थी । दोनों औरतें काफी खूबसूरत और सेक्सी दिख रही थी । मैं कंघी करते हुए आईना से उनकी खुबसूरती निहार रहा था कि संजय जी कमरे में प्रवेश किए ।

" तुम यहां बैठी हो और मैं तुम्हें कहां कहां खोज लिया ।" संजय जी कमरे के अंदर आते हुए बोले ।

" क्या हुआ ।" उर्वशी ने कहा ।

श्वेता दी और मैंने उन्हें गुड मार्निंग वीश किया । वो हमें गुड मार्निंग वीश करते हुए बोले -" चलना नहीं है क्या ? मां डैड और तुम्हारे पैरेंट्स सभी को दिल्ली निकले हुए एक घंटा हो गया ।"

" और मधुलिका ?"

" वो हमारे साथ चलेगी । " संजय जी ने मुझे देखते हुए कहा -" आप लोग अभी रुकोगे या हमारे साथ ही निकलोगे ।"

" रुकना किसलिए है । हम भी साथ ही निकलते हैं ।" मैं अपने बैग को रेडी करते हुए बोला ।

" मैं भी अपना बैग पैक कर लेती हूं ।" श्वेता दी ने उर्वशी से कहा । और वो वहां से उठ गई ।

मैं संजय जी के पास गया और बोला -" एक बार थाने में पता कर लेते हैं कल वाली वारदात में कुछ प्रोग्रेस है कि नहीं ।"

" सही बोल रहे हो । ये बात मुझे सुझी नहीं थी । चलो । थाने चलते हैं ।"

हम दोनों श्वेता दी और उर्वशी को आधे घंटे में आने के लिए कहकर थाने की तरफ निकल गये । उनके पास BMW कार थी । मैं उनके बगल में बैठ गया । पुलिस स्टेशन में वही अधिकारी था जो होटल में छानबीन करने आया था । उसने बड़े गर्म जोशी से स्वागत किया । कांस्टेबल को काफी लाने को बोलकर अपनी केस से सम्बंधित सारी बातें बताई ।

उसके बातों से यही पता चला कि गोली चलाने वाले शख्स की बाइक एक सुनसान जगह पर खड़ी मिली थी और वो बाइक चोरी की हुई आगरा की ही थी जिसकी जिसकी रपट उसी दिन दोपहर को लिखाई गई थी । दिवाल में धंसी हुई गोली 36 कैलेवर के रिवाल्वर की थी ।

थोड़ी देर बाद हम वहां से निकल गये । रास्ते में एक अच्छे दुकान से पेठा खरिदा और होटल की तरफ रवाना हो गए ।

होटल से निकलते निकलते बारह बज गए । जाने के लिए व्यवस्था ये था कि मैं , श्वेता दी और उर्वशी राजीव जीजू के कार में थे जबकि संजय जी और मधुमिता अपने कार में थे । और प्लान था कि गाजियाबाद में श्वेता दी को उनके फ्लैट पर उतार कर उनकी कार वहीं छोड़ दुंगा और मैं संजय जी के साथ ‌उनके कार में दिल्ली चला जाऊंगा ।

श्वेता दी और उर्वशी दी कार के पिछले सीट पर बैठ गई । मैंने कार स्टार्ट की और भीड़ भाड़ एरिया से धीरे धीरे बाहर की ओर मेन रोड पर लाकर स्पीड बढ़ा दी । दोनों सहेलियां कार में बेठते ही खुसुर फुसुर शुरू कर दी । संजय जी की BMW हमसे आगे तेजी से बढ़ी जा रही थी ।

तभी मेरा मोबाइल बजा । मैंने देखा काजल का फोन है ।

मोबाइल उठाते हुए कहा -" बोलो काजल ।"

काजल बोली -" भैया आप ने ले ली है ना ।"

" कहां ली है "- मै मुस्कराते हुए कहा -" जब दोगी तब ना लुंगा ।"

" अरे भैया मैं पेठा की बात कह रही हूं ।"

" अच्छा वो । हां हां ले लिया है ।"

" आप किसकी बात कर रहे थे ?"

" मैं समझा तुम मुझे कुछ देने वाली थी जो शायद मैं भुल गया हूं ।"

" मैं क्या आप को देने वाली थी । मैंने तो पहले आप को कुछ देने के लिए नहीं कहा था ।"

" ओह शायद मुझे ही गलतफहमी हो गई है । कोई बात नहीं मैंने पेठा ले लिया है और कल किसी वक्त तुम्हारे घर दे जाऊंगा ।"

" ठीक है भैया।" वो कुछ देर चुप रही फिर बोली -" वैसे भैया यदि आपको आम अच्छा लगता है तो वो मैं आपको दे सकती हूं । मेरे घर के पीछे जो बगीचा है ना वहां काफी अच्छे-अच्छे आम हुए हैं ।"

" अच्छा ! ये तो बहुत अच्छी बात है । मुझे आम बहुत पसंद हैं । मैं जरुर खाऊंगा ।"

" तब जब आप कल आना तो मुझे पहले से खबर कर देना ।"

" श्योर । वैसे कौन कौन से आम के पेड़ लगे हैं ।

" अब इतना तो मुझे पहचान नहीं है भैया बस ये जानती हूं कि उसे हम चुस कर खाते हैं ।"

" वाह । यही आम मुझे भी पसंद है । चुस चुस कर खाने वाले ।"

" ठीक है भैया तो कल मिलते हैं । बाॅय ।" बोलकर उसने फोन काट दी ।

मुझे कुछ कुछ संभावनाएं दिखने लगी । मैंने प्रसन्नचित मुद्रा से कार के साइड मिरर से पिछले सीट पर बैठे हुए सहेलियों को देखा । वो गप्पे लड़ाने में व्यस्त थी । उन्हें तो जैसे मेरी मौजूदगी का अहसास ही नहीं था । मैंने उन्हें उन के हाल पर छोड़ा और मैं ड्राइव पर ध्यान देने लगा ।

काफी समय हो गया था कार चलाते । रास्ते में कहीं रुकना था नहीं क्योंकि निकलने से पहले होटल में ही हैबी नाश्ता कर लिया था । गाजियाबाद आधे घंटे में पहुंचने वाले थे । मैंने एक बार फिर पिछे की तरफ नजर फिराई । वो दोनों अभी भी बातों में मसगुल थी ।

दाता । कितनी बातें करती है ये औरतें । इनका मुंह भी नहीं दुखता । इन्हें रोका नहीं जाय तो ये non stop बिना रुके दो चार दिनों तक बातें करती रह जाएगी । आगरा से शुरू हुई है और अब थोड़ी देर में गाजियाबाद पहुंचने वाले हैं लेकिन अभी तक इनकी खुसुर फुसुर बन्द नहीं हुई है । शायद यही कारण है कि हर समाचार चैनल वालों ने लड़कियों को ही समाचार सुनाने के लिए रख रखा है ।

कुछ देर बाद फिर मैंने ग्लास से पिछे की तरफ देखा तो सौभाग्य से इस बार उर्वशी को अपनी तरफ देखते हुए पाया । हमारी नजरें मिली । वो मुस्कुराती हुई बोली -"

" क्या बात है बोर हो रहे हो ।"

" नहीं खुशी से झूम रहा हूं , उछल रहा हूं । यहां मैं इतनी देर से बिना पलक झपकाए , चुपचाप कार ड्राइव कर रहा हूं और तुम दोनों अपने में ही व्यस्त हो । ऐसा नहीं कि एक बार पुछ लें भाई थक गया है , भुख लगी है , थोड़ा रेस्ट कर लो ।" मैंने भुनभुनाते हुए कहा ।

" अच्छा थक गया है , भुख भी लगी है , क्या खायेगा , क्या पियेगा , दुध पियेगा ।" उसकी मुस्कान शरारत से भरी हुई थी । अब श्वेता दी की नजर भी मिरर के द्वारा मेरे चेहरे पर थी ।

" बड़ी मेहरबानी होगी ।"

" किससे पियेगा भाई । अपनी श्वेता दी से या अपनी उर्वशी दी से ।"

" मैं तो दोनों का ही पीना चाहता हूं अब ये तो आप दोनों पर निर्भर करता है ।

" अभी तो तुम अपनी श्वेता दी की पियो बाद में मेरी पी लेना । मैंने तो पहले कई बार पिलाया है लेकिन श्वेता ने अभी तक सिर्फ एक बार ही पिलाया है ।" बोलकर मेरे आंखों में देखते हुए श्वेता दी की एक चुची को साड़ी के ऊपर से ही दबा दिया । मेरी नजर श्वेता दी पर पड़ी वो मुझे देख कर मन्द मन्द मुस्करा रही थी । मेरा लन्ड पैन्ट के अन्दर फुफकारा ।

" अगर ऐसा है तो मैं कार खड़ी करता हूं ।"

" नहीं । अभी नहीं । हम पहुंचने वाले हैं । अभी ड्राइव करो ।" उर्वशी ने कहा ।

" वही तो कब से कर रहा हूं । तुम दोनों ‌ने तो आज मुझे सच का ही ड्राइवर बना दिया ।"

" वो तो हो ही । मेरे तो बहुत पहले से हो अब श्वेता के भी ड्राइवर हो गये हो । "

मैं उसे देख कर सिर्फ मुस्करा दिया ।मैं सावधानी से कार ड्राइव करते हुए उन दोनों को शीशे से देख रहा था । तभी उर्वशी आगे झुक कर मेरे मुंह के पास आई और बोली -

" तुम हम दोनों की गाड़ी पर सवारी कर चुके हो तो सच सच बताना कि तुम्हें ज्यादा मजा किसमें आया । मेरी में ना अपनी श्वेता दीदी की गाड़ी सवारी करने में । "

मेरा लन्ड उसकी बातें सुनकर ज्यादा ही उथल पुथल मचाने लगा । मैंने उसे पैंट के ऊपर से ही एडजस्ट किया ।

" तुम एक्सीडेंट करवा कर मानोगी । " मैंने उसकी तरफ पलटते हुए कहा तो उसने जल्दी से मेरे होंठों पर अपने होंठ रख कर एक चुम्बन ले लिया ।

" क्या कर रही हो । मैं पक्का एक्सीडेंट कर बैठुंगा ।"

वो पिछे घसक गई और श्वेता दी के साथ सट कर बैठ गई ।

" लेकिन तुम ने मेरी बात का जबाव नहीं दिया ।" - उर्वशी फिर पुछी ।

" तो तुम भी तो दो घोड़ों पर सवार हो चुकी हो । तुम्हे किसका घोड़ा अच्छा लगा ।" मैंने कहा ।

" हाय मुझे तो तुम्हारे घोड़े पर सवार होकर ज्यादा मजा आता है ।"उर्वशी ने अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा ।

" लेकिन मुझे तुम दोनों की सवारी करने में मजा आता है । "

" ये तो डिप्लोमेटिक जवाब हुआ । कुछ तो अंतर होगा ।"

" अब मैं क्या कहूं " मैंने पलट कर उन्हें देखा और उनके साड़ियों का कलर देखते हुए कहा -"एक हरी मिर्च की तरह है तो दुसरी लाल मिर्च की तरह ।"

तभी श्वेता दी प्रथम बार हस्तक्षेप करते हुए बोली -" हम दोनों में हरी और लाल मिर्च कौन है ।"

मैंने श्वेता दी की तरफ देखा । वो मुस्कुराती हुई मुझे देख रही थी । मैंने कहा -" तुम हरी मिर्च हो और उर्वशी दी लाल मिर्च है ।"

" अच्छा ! ऐसी बात है तो याद रखना एक दिन ये लाल और हरी मिर्च एक साथ तुम्हारे मुंह में ढुकेगी तब तुम्हें इसके असल तीखेपन का पता चलेगा ।"- उर्वशी ने श्वेता दी को अपने बाहों में भर कर कहा ।

उसके बातों का मतलब समझते ही मेरे धड़कने बढ़ गई और लन्ड अन्दर से बाहर निकलने के लिए व्याकुल हो उठा । ये थ्रीसम की बात कर रही थी ।तभी सामने रोड के किनारे संजय जी की BMW खड़ी दिखाई दिया । मैंने अपनी कार उनके बगल में रोक दी । उन्होंने मुझे आगे आगे चलने को कहा । हम गाजियाबाद प्रवेश कर गये थे लेकिन उन्हें श्वेता दी के फ्लैट का एड्रेस मालूम नहीं था । मैंने अपनी कार उनके कार से आगे बढाया ।

थोड़ी देर में हम श्वेता दी के फ्लैट के नीचे थे । श्वेता दी के आग्रह पर सभी उनके फ्लैट के अन्दर गये । राजीव जीजू घर में ही थे । वहां हल्के फुल्के नाश्ता और चाय सिगरेट पीने के बाद आधे घंटे में निकल गये ।

BMW में मैं पीछे बैठा । मधुमिता संजय जी के साथ आगे बैठी थी । वहां से दिल्ली तक के सफर में दोनों से हल्की फुल्की औपचारिक बातें होती रही । संजय जी के रहते मधुमिता से ज्यादा बातें नहीं हूई ।

जब मैं घर पहुंचा तब सात बज गए थे । मैंने संजय जी को घर चलने के लिए कहा तो उन्होंने विनय पूर्वक मना कर दिया यह कहकर हफ्ते भर के अन्दर वो हमारे घर आयेंगे । उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया और ' गुड नाईट ' बोलकर अपने घर की तरफ रवाना हो गए । मैंने अपने घर की बेल बजाईं । माॅम ने दरवाजा खोला और मैं घर के अन्दर प्रवेश किया ।
 
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