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Incest Sagar (Completed)

Update 25. Continue.

दस बजे के आसपास मैं गोल्डन नाईट क्लब पहुंचा ।

बाहर से दिखने में साधारण सा ही लगा लेकिन अंदर की रौनक और रंगीनी देखने लायक थी । पुरे हाॅल में मध्यम रोशनी थी। डांस फ्लोर से डीजे की धुन आ रही थी । कुछ जोड़े वहां डांस करने के बहाने एक दूसरे से अभिसार रत में मशगूल थे । हाॅल के अन्दर कई टेबल दो चार कुर्सियों सहित थोड़ी थोड़ी दुरी पर लगे हुए थे । कुछ लोग जोड़े में बैठे हुए थे तो कुछ सिंगल । अभी हाॅल पुरा भरा हुआ नहीं था ।

मैं कोने में एक खाली टेबल देखकर बैठ गया । मैंने एक बार फिर पुरे हाॅल में नजरें दौड़ाई । वहां जितने भी Steward थे सभी जवान लड़कियां थी । वो पुरे हाॅल में घुम घुम कर अपने कस्टमर को वाइन और भोजन सर्व कर रही थी । सभी लड़कियों का एक ड्रेस कोड था । वे सभी स्कर्ट और टॉप पहने हुए थी । वे जो स्कर्ट पहनी थी वो उनके घुटनों से काफी ऊपर थी । उनकी जांघें दुधिया रोशनी में भी चमक रही थी और टाॅप उनके छातियों पर कसा हुआ था ।

मैं बैठे हुए उन बार बालाओं को ताड़ ही रहा था कि एक लड़की आई और बोली -" गुड इवनिंग सर ! आप को क्या सर्व करूं ?

मैंने उसे देखा । वो एक बीस बाइस साल की स्लिम फिगर की खुबसूरत लड़की थी ।

" सर्व तो आप बहुत कुछ कर सकती हो लेकिन उसके लिए आपको मुझे कम्पनी देनी होगी । मुझे अकेले अकेले वाइन पीने में मजा नहीं आता "- मैंने मुस्कराते हुए कहा ।

" ह्वाई नाॅट सर ! "- वो भी अपने चेहरे पर गोल्डन जुबली मुस्कान लाते हुए बोली -" लेकिन बील आपको पे करनी होगी ।"

" जरूर । लेकिन आपका एम्पायर कहीं नाराज तो नहीं हो जायेगा आपको यहां बैठे देखकर ?"

" अभी नहीं होगा । अभी तो आधा हाॅल खाली है , हां ग्यारह बजे के बाद जब पुरा हाॅल भर जायेगा तब जरूर नाराज होगा ।"

" जब यहां का हाईलाइट प्रोग्राम शुरू होगा ?"

" हां । जब हाॅट लड़कियों का हाॅट डांस शुरू होगा ।"

" हाॅट तो तुम भी कोई कम नहीं हो ?"

" थैंक्यू लेकिन मेरा फिल्ड अलग है ।"

" ओके । मेरे लिए रेड वाइन विथ सोडा ऐंड वाटर और आपको जो पसंद हो ।"

" राइट सर ! मैं अभी आई ।"

वो चली गई । मैं फिर से पुरे हाॅल को सरसरी निगाह से मुआयना करने लगा ।

पांच मिनट बाद वो आई वाइन और चखने के साथ । सभी चीजें टेबल पर रख कर मेरे बाजू में बैठ गई । वो अपने लिए वोदका लाई थी ।

हमने चियर किया और ग्लास अपने अपने होंठों से लगा लिया ।

" तुमने अपना नाम तो बताया ही नहीं ?"

" आपने जो पुछा नहीं ।"

" अब पुछ लेता हूं । वैसे मेरा नाम सागर है ।"

" मैं श्रेया ।"

" ब्यूटीफुल नेम बिल्कुल तुम्हारी तरह ।"

" थैंक्यू सर । मैंने यहां पहले आपको कभी देखा नहीं ।"

" सही कहा । मैं यहां पहली बार ही आया हूं ।"

मैंने अपने पैंट से सिगरेट का पैकेट निकाला और उसे आफर किया । उसने इनकार कर दिया । मैंने सिगरेट सुलगाई और कहा - "श्रेया , मुझे तुमसे एक फैवर चाहिए !"

लड़की चौंक कर मुझे देखी और बोली -" माफ कीजिएगा सर , मैं ऐसी वैसी लड़की नहीं हूं ।"

" अरे तुम गलत सोच रही हो । मुझे किसी के बारे में जानकारी चाहिए और यदि सम्भव हो तो मिलना भी ।"

" किस के बारे में ?"- वो संदिग्ध स्वर में बोली ।

" एक वीणा नाम की लड़की है जो यहीं पर काम करती है । वो यहां के कैबरे डांसर लड़कियों में से ही कोई एक है । पर मेरी बदकिस्मती है कि मैं उसे चेहरे से भी नहीं पहचानता ।"

वो अब थोड़ा आश्वस्त हुई ।

" लेकिन इस नाम की कोई भी लड़की यहां काम नहीं करती ।"

" शायद यहां उसने अपना नाम चेंज कर लिया हो ?"

" हो सकता है । लेकिन आपको उससे काम क्या है ?"

" देखो तुम बुरा मत मानना । मै उसके बारे में ज्यादा नहीं बता सकता । बस इतना ही कह सकता हूं कि वो एक अच्छे और संभ्रांत परिवार से विलोंग करती है । उसकी बड़ी बहन यहीं दिल्ली में एक करोड़पति की पत्नी है ।"

" ओह ! लेकिन वीणा नाम की लड़की यहां कोई नहीं है , मैं यहां काम करने वाली सारी लड़कियों को जानती हूं ।"

" वो इस ट्रेड में हाल फिलहाल महिने में ही आई है । शायद एकाध साल के भीतर । जब तुम सभी को जानती हो तो ये भी जानती होगी कि कौन कौन सी लड़की हाल के महीनों में यहां ज्वाइन की है ?"

" एक लड़की है तो जिसने आठ महीने पहले ज्वाइन किया है और आज के तारीख में वो यहां की सबसे बेस्ट परफार्मर है । बाकियों से उसकी डिमांड कहीं अधिक है ।"

" कौन ?"- मैंने आशा भरी नजरों से देखा ।

" नेहा ।"

" क्या तुम उससे अभी मिल सकती हो ?"

" अभी उनके परफोर्मेंस में टाईम है । मिल सकती हूं ।"

" तो प्लीज़ एक बार उससे मिलो और ये तस्दीक करो कि वो वीणा है या नहीं ।"

" ओके , मैं मालूम करती हूं वो कहां और किस पोजीशन में है ।"

" थैंक्यू ।"

" लेकिन अगर उसको तुमसे मिलना कबूल नहीं हुआ तो , मैं कुछ नहीं कर सकूंगी ।"

" कर सकोगी । थोड़ा प्यार से समझाना , कहना ये उसी के फायदे के लिए है ।"

" मैं... मैं देखती हूं ।"

उसने अपना ग्लास खत्म किया । फिर वो चली गई ।

मैं ड्रिंक्स और सिगरेट पीते हुए इन्तजार करने लगा ।

लगभग बीस मिनट बाद वो आई । उसके चेहरे के भाव से लग रहा था कि पोजीटिव न्यूज लाई है ।"

वो बैठते हुए एक कागज का परची मुझे पकड़ा दी ।

" क्या है ये ?"

" देखो ?"

मैंने परची खोला । वो किसी जगह का एड्रेस था ।

" ये तो एड्रेस है ।"

" हां । नेहा ही वीणा है । उसने तुम्हें इसी एड्रेस पे कल एक बजे दोपहर में बुलाया है ।"

" थैंक्यू सो मच श्रेया । "

" ओके । अब मुझे जाना होगा । अब भीड़ बढ़ती जा रही है "- वो हाॅल में बढ़ते हुए भीड़ को देखते हुए बोली ।

" अब नहीं लोगी ?"

" नहीं सर । ज्यादा पी लुंगी तो ड्यूटी कैसे करूंगी ।"

" कोई बात नहीं । बील ले आओ । "

" आप क्यों जा रहे हो । अभी तो यहां की असली रौनक बाकी है ।"

" मुझे ये सब पसंद नहीं है ।"

" ओके मैं बील लाती हूं ।"

जब घर पहुंचा तब साढ़े ग्यारह बज गए थे । डैड ने दरवाजा खोला था । माॅम शायद सो गई थी । मैं उपर अपने कमरे में गया और सोने की तैयारी करने लगा ।

***********

अगले दिन समय से पहले ही वीणा के पत्ते पर पहुंच गया । वो मुझे एक बजे बुलाई थी लेकिन मैं बारह बजे ही पहुंच गया ।

मैंने काॅलबेल बजाई ।

कोई जवाब नहीं मिला ।

मैंने दोबारा काॅलबेल बजाई तो भीतर से झुंझलाए से जनाना स्वर में पुछा गया -" कौन है ?"

" मैं ।"- मैंने बोला -" दरवाजा खोलिए ।"

" मैं क्या होता है ? कौन हो ?"

" मैं सागर । कल रात आपने गोल्डन नाईट क्लब में अपने फ्लैट का पता दिया था श्रेया के थ्रू ।"

कुछ देर तक खामोशी छाई रही ।

" ओह ! ठहरो , खोलती हूं ।"

कुछ क्षण बाद दरवाजा खुला और एक बेहद ही खूबसूरत लड़की मुझे चौखट पर दिखाई दी ।

उसने एक तरफ हटकर मुझे भीतर आने दिया और फिर मेरे पीछे दरवाजा बंद कर दिया ।

मैंने देखा कि वो तभी... शायद काॅलबेल की आवाज सुनकर ही...सो के उठी मालूम होती थी । उस घड़ी उसने एक खुले गले की नाइटी पहनी हुई थी जिसमें देखने लायक जो थी... वो काफी दिलकश थी.... बड़ी बड़ी..गोल गोल ।

एकाएक वो घुमी और " अभी आई " कहकर पिछले कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर दी ।

मैं एक सोफे पर बैठ कर सिगरेट पीते हुए उसका इन्तजार करने लगा ।

वो आधे घंटे बाद वापिस लौटी । उस वक्त वो साधारण सलवार सूट पहनी हुई थी । मगर उस ड्रेस में भी वो बला की खूबसूरत लग रही थी । हाईट पांच फुट सात इंच , उम्र शायद तेईस चौबीस , जाफरानी रंगत जैसी त्वचा , बड़ी बड़ी आंखें , तीखे नैन-नक्श , भरे भरे गुलाबी होंठ , फुले हुए गाल , लंबे बाल , मोतियों जैसी दांत , असाधारण रूप से उन्नत वक्ष , उभरे हुए नितम्ब , मांशल जांघ....सब कुछ नम्बर वन...सब कुछ वाह वाह ।

" चाय पियोगे ?"- वो खड़े खड़े ही बोली ।

" जी नहीं शुक्रिया । मैं नाश्ता करके आया हूं ।"

" लेकिन मैंने नहीं किया है । मैं अभी अभी सो कर उठी हूं । "

" ओके ।"

वो फिर गई । थोड़ी देर बाद चाय और स्नैक्स लेकर आई ।

वो एक दूसरे सिंगल सोफे पर बैठ गई । उसने मुझे चाय दिया । मैंने " थैंक्स " कहकर चाय ले लिया ।

" तुम अमर के दोस्त हो ना ?"

मेरे हाथ से चाय की प्याली छलक गई । मैं चौंक कर उसे देखने लगा ।
 
Nice update bro.... TE="SANJU ( Versha Ritu ), post: 1668314, member: 12292"]
Update 19.

सुबह नौ बजे नाश्ते के बाद मैं अपनी बाइक लिए चाचा के घर गया । चाची ने कल मुझे नया मोबाइल लाने के लिए कहा था । दरवाजा बंद था । मैंने बेल बजाईं ।

चाचा ने दरवाजा खोला । मैं आश्चर्यचकित हुआ । उन्हें तो ड्यूटी पर होना चाहिए था , ये अभी तक घर पर क्या कर रहे हैं ?

मेरे चाचा जिनका नाम रमेश था , अडतालीस वरषिय करीब दुबले-पतले शख्स जो कि एक नम्बर के खड़ूस और निहायत ही हाट टेम्पर माइंडेड आदमी । एक नम्बर के जेलेसी मैन । जहां मेरे डैड एक सोवर और मिलनसार व्यक्ति थे वहीं चाचा रिजर्व और जलनखोर टाइप के आदमी थे । मैंने शायद ही इन्हें कभी हंसते हुए देखा हो ।

चाचा ने मुझे घुरते हुए कहा -" क्या है ?"

" चाची ने बुलाया था ।" मैंने कहा ।

" किस लिए ?"

" डाइवोर्स के लिए ।"

" क्या मतलब "- वो चौंकते हुए बोले ।

तभी चाची आ गई । वो इस वक्त साड़ी पहनी हुई थी । वो मुझे देखते हैं बोली ।

" अरे सागर बेटा , आओ आओ ।"

" ये क्या कह रहा है ? किसका डाइवोर्स है ?"

" डाइवोर्स " चाची ने चौंकते हुए कहा -" किसका डाइवोर्स ?"

चाचा ने मुझे गुस्से से देखा -" किसका डाइवोर्स ?"

" चाचा मेरे एक दोस्त की मम्मी है , वो अपने पति के रोज के किच किच से परेशान होकर डाइवोर्स लेना चाहती है । वो मुझे किसी काबिल वकील के बारे में पुछ रही थी । मैंने चाची को कहा था इसके बारे में तो इन्होंने कहा था कि कल आना बात करेंगे ।"

चाचा ने मुड़कर चाची को देखा ।

" अरे हां , मैं तो भुल ही गयी थी । कल सागर ने बताया था "- चाची ने बात संभालते हुए कहा ।

मेरा तात श्री इतना भी अक्ल का कोल्हू नहीं था जो इस ब्यंग्य को समझ नहीं रहा था ।

मैं निकल रहा हूं " - चाचा ने मुझे अपने आंखों से भस्म करते हुए नजरों से देख कर बोला - " थोड़ा पढ़ाई-लिखाई पर भी ध्यान दो , ऐसी चीजें पर दिमाग लगाओगे तो जिन्दगी भर भीख मांगते फिरोगे ।"

बोलकर चाचा बाहर निकल गया ।

" उफ़ चाची ! क्या खा के पैदा की थी ऐसे हसबैंड को " - मैं लम्बी सांसें लेते हुए सोफे पर ढेर हो गया ।

" नालायक कहीं का.... मैंने पैदा किया था या तेरी दादी ने । और पैदा किया तो किया ले आके मेरे ही पल्लू से बांध दिया "- चाची ने मेन दरवाजा बंद करते हुए कहा ।

" तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे तुम्हारी जबरदस्ती शादी करवा दी गई हो । हंटर मार के लग्न मंडप पे बैठा दिया गया हो । कोई प्यार मोहब्बत था ही नही । तो फिर ये आपके प्यारे प्यारे टाबरे ( लड़के और लड़कियां ) कहां से आ गए ।"

" जिस दिन तुम्हारी शादी होगी उस दिन तुम खुद जान जाओगे । जब तुम्हारी शादी भी हमारे जैसे , पुराने जमाने की तरह होगी " - चाची मेरे बगल में बैठते हुए बोली ।

" मेरी शादी आप जैसे किसी हसीना से होती तो मैं अपनी बीवी को चौबिसों घंटा इतना मीठा मीठा बोलता न कि.... इतना मीठा मीठा बोलता न..."

" तो क्या होता ?"

" उसे शुगर हो जाता ।"

" नालायक । हर घड़ी मसखरी करता है "- चाची ने हंसते हुए कहा -" चाय लाऊं ?"

" नहीं । अभी तो नाश्ता किया है । आप ये बताओ कि चाचा ने मोबाइल लाया है कि नहीं ?"

" कहां लाया है । बोलते हैं कि समय नहीं मिला , भुल गया , कल पक्का ही ले आऊंगा । रोज रोज वहीं बहाना ।"

" ओह ! अच्छा चाची क्या चाचा शुरू से ही ऐसे थे न बाद में हुए ।"

" अरे वो शुरू से ही ऐसे थे । तु तो देख ही रहा है ।"

" मैंने तो जब से होश संभाला है तब से ही मैं उन्हें ऐसे ही कठोर और किसी से कोई मतलब नहीं रखने वाला देखा है लेकिन जब आपकी शादी हुई थी तब भी क्या वो ऐसे ही थे ।"

" वो शुरू से ही ऐसे थे । ज्यादा किसी से मतलब नहीं । अपने में ही खोया रहना "- चाची अपने शादी के समय को याद करते हुए बोली " कालेज में खेल कुद में बहुत ही माहिर थे और उन्हें खेलकूद के चलते ही नौकरी भी मिली थी । उन्होंने कई प्रतियोगिताएं भी जीती थी । मेरे मां बाप ने सरकारी नौकरी वाला लड़का देखा और फिर
Thanks for supporting friend ?
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Update 25. Continue.

" तुम सोच रहे होगे कि मैं अमर को कैसे जानती हूं " - वो बोली ।

मैं सोफे पर बैठा अचरज से उसे देखे जा रहा था ।

वो अपनी चाय की कप टेबल पर रख कर खड़ी हुई और धीरे धीरे चलते हुए थोड़ी दुरी पर खिड़की के पास खड़ी हो गई । वो खिड़की की कपाट खोलकर बाहर आसमान की ओर उपर देखने लगी ।

मैं चुपचाप बैठे उसके बोलने की प्रतीक्षा कर रहा था ।

" हम छः महीने से रिलेशनशिप में थे । वो तुम्हारे और अपने मां की अक्सर चर्चा किया करता था । जब श्रेया ने तुम्हारा नाम लिया तभी मैं समझ गई थी कि तुम अमर के दोस्त सागर हो ।"

" लेकिन अमर ने तुम्हारे बारे में हमसे कभी जिक्र नहीं किया ।"

" मैंने ही मना किया था ।"

" लेकिन क्यों ?"

" अपने किस्मत पे एतबार नहीं था ।"

" मैं समझा नहीं ।"

" श्रेया बोली थी कि तुम मेरी बहन को जानते हो ?" - वो पलट कर मुझे देखते हुए बोली ।

उसने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया ।

" एकाध बार मिला था ।"

" कैसी है ?"

" तुम्हें नहीं पता ?"

" जब से अमेठी छोड़कर गई तब से नहीं ।"

" मतलब इतने सालों से तुम दोनों मिली नहीं ?"

मुझे बहुत आश्चर्य हुआ ।

" मिलना तो दूर बात तक नहीं हुई ।"

" कोई फोन वगैरह भी नहीं ?"

" मुश्किल से तो दो वक्त के अनाज का जुगाड होता था तो भला फोन कहां से आता " - वो फिकी मुस्कान करती हुई बोली ।

" अनुष्का एक करोड़पति की पत्नी बन चुकी है । मजे में है ।"

" चलो अच्छा है , कम से कम उसकी लाइफ तो सेट हुई " - वो वापस खिड़की की तरफ पलटते हुए बोली -" अमर के क़ातिल का पता चला ?"

" अभी तक तो नहीं । उसी सिलसिले में तो तुम से बातें करना चाहता था ।"

" मुझे अखबार के जरिए पता चला था । मुझे तो अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है कि वो अब इस दुनिया में नहीं है ।"

" तुम्हें किसी पर शक है ?"

" हमने अपने रिलेशन को सभी से छुपा कर रखा था । मैं किस पर शक करूंगी ?"

" जिस वक्त अमर का खून हुआ था उसी समय तुम्हारी बहन अनुष्का मौका-ए-वारदात पर पाई गई थी ।"

" क्या ?" - वो चौंक कर फिर पलटी ।

मैंने उसे अमर के केस से संबंधित सभी चीजें बताई ।

उसके हाव भाव से यही लगता था कि वो इन सारी बातों से अनजान हैं ।

" एंटरटेनमेंट के धंधे में कैसे आ गई ?"

" अनुष्का के जाने के बाद मैं अकेली पड़ गई । मैं ज्यादा पढ़ी लिखी भी तो नहीं थी कि कहीं काम करके दो वक्त की रोटी जुगाड कर सकूं । अनुष्का पढ़ने में तेज थी तो वो छोटे छोटे बच्चों को कोचिंग , ट्यूशन करके दो पैसे कमा लेती थी जिससे किसी भी तरह हो जिंदगी कट ही जा रही थी । लेकिन उसके जाने के बाद मैं क्या करती ? थोड़ी बहुत डांस जानती थी तो शादी ब्याहों में शो करने वाले एक ग्रुप में बतौर डांसर शामिल हो गई । फिर जो सफर वहां से शुरू हुई तो आकर गोल्डन नाईट क्लब में खतम हुई ।"

" क्या अमर से मुलाकात गोल्डन क्लब में हुई थी ?

" नहीं । उससे पहली बार मुलाकात इतफाकन हुईं थी । मेरी एक्सीडेंट हो गई थी । एक कार वाले ने धक्का दे दिया था । उसी ने मुझे हाॅस्पिटल पहुंचाया और इलाज भी करवाया था । फिर वो मुझे देखने हाॅस्पिटल रोज आने लगा । इसी तरह मिलते-जुलते हमारी भावनाएं कब उबलने लगी पता ही नहीं चला ।"

मुझे ताज्जुब हो रहा था कि इतनी बड़ी बात अमर ने मुझसे छुपाई थी ।

" तुमने अमर को अपने रिलेशनशिप के बारे में हमें बताने के लिए इसलिए मना किया था न कि हम तुम्हारे जाॅब को पसन्द नहीं करेंगे । तुम्हें अच्छी लड़की नहीं समझेंगे ?"

" जो काम मैं कर रही हूं उसे सभ्य समाज में अच्छा नहीं माना जाता । है तो ये बदनाम धंधा ही न । हमारी सोसायटी में कैबरे डांसर और काॅल गर्ल मे उन्नीस बीस का ही तो फर्क माना जाता है न ।"

" लेकिन आखिर में तुम दोनों को अपनी शादी के बारे में बताना तो पड़ता ही ?"

" मेरी एक साल की एग्रीमेंट अक्टूबर में खतम हो रही थी । उससे पहले मैं जाॅब नहीं छोड़ सकती थी । जाॅब छोड़ते ही हम बता देते ।"

मैं कुछ देर तक चुपचाप उसे निहारता रहा ।

" मैंने सुना है तुम्हारी एक मौसी भी है ?"

" लगता है अनुष्का ने एकाध मुलाकात में बहुत ही कुछ बता दिया तुम्हें " - वो कटाक्ष करते हुए बोली ।

मैं चुप रहा ।

" हां । एक मौसी है लेकिन हमें तो उसका चेहरा भी याद नहीं है ।"

" मैंने ये भी सुना है वो भी किसी करोड़पति से ब्याही गई थी ।"

" उनके बारे में जो भी हमने सुना था वो मां से ही सुना था । वो मां से बड़ी थी । अनुष्का की तरह उन्होंने भी शादी के बाद फिर कभी अपने मायके में कदम नहीं रखा । मां बोलती थी कि उसने प्रेम विवाह किया था और उसका पति अपने माता-पिता का एकलौता पुत्र था ।"

" तुम्हारे परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी थी ?"

" जब तक मां बाप जिंदा थे किसी तरह की दिक्कत नहीं थी । पिता जी एक मील में काम करते थे लेकिन इतना पैसा कमा ही लेते थे कि चारों का गुजारा अच्छे से हो जाता था । जब दोनों की मृत्यु हुई उस वक्त मैं दस साल की और अनुष्का चौदह साल की थी । अनुष्का ने दसवीं कक्षा पास कर ली थी लेकिन मां बाप के मरने के बाद हमारी पढ़ाई बंद हो गई । कोई कमाने वाला नहीं था । मां बाप सम्पत्ति के नाम पर एक छोटा सा टाली का घर और थोड़ी गहने ही छोड़ गए थे , इससे हम क्या कर सकते थे ?"

" उसी गहने को बेचकर अनुष्का दिल्ली चली गई ?"

" हां । उसे पढ़ने का बहुत शौक था । उसकी महत्त्वाकांक्षाएं बहुत बड़ी थी । वो मुझसे छुपा कर गहने बेची थी और दिल्ली चली गई । उसने कहा था कि पढ़ाई पुरी करके जाॅब मिलते ही मुझे बुला लेगी । लेकिन एक बार क्या वो निकली कि फिर.....।"

मुझे अनुष्का पर सच में बहुत गुस्सा आ रहा था ।

" तुम्हारे मौसाजी और मौसी की कोई फोटो है क्या ?"

" एक फोटो थी लेकिन वो मिल नहीं रही है ?"

" ओह ।"

" वैसे एक हमारी फेमिली फोटो है लेकिन उसमें मौसाजी नहीं है "- बोलकर वो अपने कमरे में चली गई ।

थोड़ी देर बाद वो एक पुरानी सी फोटो जो गंदी भी हो गई थी ले आई ।

पांच लोगों का एक फेमिली ग्रुप फोटो था । दोनों बहनें बहुत छोटी थी । वे अपने माता-पिता के गोद में बैठी हुई थी और एक उनकी मौसी थी ।

मौसी की पिक्चर देखते ही मुझे लगा कि इसे मैंने कहीं देखा है । थोड़ी देर देखकर मैंने फोटो उसे वापस कर दिया । वो फोटो लेकर अपने कमरे की तरफ जाने लगी कि मैंने पूछा -
" यहां अकेली रहती हो ?"

" नहीं । एक लड़की के साथ रहती हूं , वो भी मेरे साथ ही काम करती है " - वो जाते जाते बोली ।

मेरे दिमाग में बार बार उसके मौसी की तसबीर आ रही थी । इसे मैंने कहीं देखा तो जरूर है ।

वो कमरे से बाहर आई तो मैं भी खड़ा हो गया ।

" जाने से पहले एक बात पुछना चाहता हूं ?"

" क्या ?"

" अब क्या करोगी ? जाॅब करती रहोगी या छोड़ दोगी ?"

वो फिर से खिड़की के पास चली गई और बाहर की ओर देखने लगी । बहुत देर तक वो वैसे ही खड़ी रही । मुझे लगा वो जबाव नहीं देना चाहती है इसलिए मैं दरवाजे की तरफ बढ़ा ।

दरवाजे पे खड़े होकर उसकी और निगाह डाली। वहां से उसकी शक्ल दिखाई दे रही थी । उसकी आंखें बंद थी और आंखो से दो बूंद आंसू छलक कर गालों पे पड़े हुए थे ।

मैं दरवाजे पर खड़ा हो गया ।

" मां बाप ने बचपन में ही साथ छोड़ दिया " - वो बहुत ही धीमी आवाज में बोल रही थी -" बड़ी बहन ने अपनी मंदबुद्धि बहन को गांव में अकेली छोड़ दिया । छः महीने में पहली बार अमर के रूप में खुशियां मेरी दामन में आई थी लेकिन उसने भी साथ छोड़ दिया । अब ये डांस वाली नौकरी ही तो आखिरी सहारा है......इसे छोड़ कहां जाउंगी ।"

उसकी बातें सुनकर मेरा मन दुःख और वेदना से भर गया । मेरी आंखें बोझिल हो गई ।

मैं उसके पास गया और उसे पकड़ कर अपनी ओर घुमाया ।

वो सिर झुकाए चुपचाप खड़ी रही । मैंने उसके आंसुओं को अपने हथेली से पोंछा ।

" तुम एक बहादुर लड़की हो वीणा । जिस तरह से विपरीत परिस्थितियों में तुमने अपने को संभाला है उससे मेरे दिल में तुम्हारे प्रति बहुत इज्जत है । मैं तुम्हें दिल से नमन करता हूं । तुम्हारे दिन भी पलटेंगे.... और बहुत जल्द पलटेंगे....मेरा पूरा विश्वास है ।"

मैं वहां से भारी मन और दिल में टिश लिए विदा हुआ ।
 
Update 26.

रात के दस बजे थे । मौसम अच्छा था इसलिए छत पर ही बिस्तर लगा लिया था। लेटकर आसमान में चमकते सितारों को देखने लगा ।

आज का दिन काफी थकावट भरा रहा था । माॅम की तबीयत कल शाम से ही खराब थी । उन्हें बुखार था । सुबह उन्हें डाक्टर को दिखाया और फिर चाची को हम सभी का खाना बनाने के लिए कह दिया । फिर वीणा से मिलने चला गया था ।

वीणा से मिलने के बाद वही रोज वाली रूटिन थी । आज क्लब में कुलभूषण खन्ना मौजूद था । उससे थोड़ी बहुत औपचारिक बातें भी हुई थी ।

आसमान में चमकते तारों को निहारते हुए वीणा के बारे में सोच रहा था । उसकी स्टोरी सुनकर मन व्यथित हो गया था । दिल में बेचैनी सी हुई थी ।

इस मर्द प्रधान समाज में एक अकेली और वो भी जवान लड़की को किन किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है , उसका अहसास था मुझे ।

मुझे इस बात का भी अहसास था कि एक जवान खुबसूरत लड़की जब स्टेज पर अनगिनत लोगों के सामने कला के नाम पर डांस प्रस्तुत करती है तो किस तरह से उसको हवश भरी निगाहों से देखा जाता है । उसके बारे में लोग कैसे कैसे विचार करते होंगे ।

कई काम ऐसे होते हैं जिसे लोग खुशी खुशी करते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो मजबूरी में करते हैं । वीणा ने मजबूरी में इस धंधे को अपनाया था । यदि उसके माता-पिता जिंदा होते तो क्या वो ये धंधा अपनाती ! यदि अनुष्का.. उसकी बड़ी बहन ने उसका साथ दिया होता तब भी क्या वो ये काम करती !.... कदापि नहीं ।

अमर को वीणा की सारी कहानी पता होगी । उसकी कहानी सुनकर उसे भी वीणा के प्रति सहानुभूति हुई होगी और शायद यही सहानुभूति धीरे धीरे प्यार में बदल गई होगी । और यदि उसकी खूबसूरती के बारे में कहें तो निसंदेह वो लाखों में एक थी । ऐसे में अमर का उसके प्यार में पड़ना कोई आश्चर्य वाली बात नहीं थी ।

उसने जो अपनी फेमिली फोटो दिखाई थी , उसमें उसकी मौसी मुझे जानी पहचानी लगी थी । फोटो तब की थी जब वो जवान थी मगर अब तो उसकी बहुत उमर हो गई होगी । अब तो वो बुड्ढी दिखती होगी । उसके बारे में सोचते सोचते अचानक मेरे दिमाग की घंटी बजी ।.....जानकी !..... रमाकांत जी की पत्नी ।

उनके चेहरे और शरीर पर भले ही उमर का असर पड़ गया हो लेकिन नाक नक्श , कद काठी वैसा ही था । जानकी आंटी ही वीणा और अनुष्का की मौसी थी ।

लेकिन वीणा ने कहा था कि उसकी मौसी की शादी एक अमीर घराने में हुई थी पर रमाकांत जी और जानकी देवी की हैसियत देखकर लगता तो नहीं है कि वो कोई खास अमीर हैं । वो एक फ्लेट में रह रहे हैं जबकि जैसा वीणा ने बताया था उस हिसाब से तो उन्हें किसी कोठी या महल में रहना चाहिए था । बड़े बड़े कारोबार होना चाहिए था । लेकिन वे तो एक आम इंसान की तरह रिटायर जिंदगी जी रहे हैं ।

मैंने रमणीक लाल से कहा था कि रमाकांत जी के कमाई का जरिया क्या है तो उसने कहा था कि मुझे पता नहीं, शायद मेरे जीजा को पता होगा । आखिर वो बहुत दिनों से पड़ोसी थे ।

मैंने मोबाइल में टाईम देखा । ग्यारह बज रहे थे । मैंने जीजा को फोन लगाने के लिए सोचा । पता नहीं अभी मुम्बई में क्या कर रहे होंगे । फिर भी मैंने फोन लगाया ।

" क्या बात है सागर ? इतनी रात को कैसे फोन किया ?"- जीजू की आवाज आई ।

" साॅरी जीजू इतनी देर रात फोन करने के लिए । किसी के बारे में पुछना था मुझे ।"

" किसके बारे में ?"

" अभी आप कहां हो ?"

" होटल में हूं । सोने जा रहा था ।"

" ओके । आपके गाजियाबाद वाले फ्लेट में आपके पड़ोसी रमाकांत जी और उनकी पत्नी के बारे में पुछना था ।"

" क्या पुछना है ?"

" मैंने कहीं सुना कि वो बहुत ही पैसे वाले और रईस खानदान से थे तो फिर वो एक साधारण से फ्लेट में क्यों रह रहे हैं ।"

" किसने कहा ? कहीं इसका मतलब भी अमर मर्डर केस से तो नहीं है ?"

" एक लड़की ने बोला था । क्या ये सच है ?"

" अब सच है या झूठ , ये तो मैं नहीं जानता लेकिन जितना रमाकांत जी ने अपने बारे में जो बताया था वही जानता हूं ।"

" क्या बताया था उन्होंने अपने बारे में ?"

" उनका कहना था कि उनके पिता एक रईस खानदान से थे । लेकिन उन्हें अपने अपनी औलाद मतलब रमाकांत जी से बड़ी नाउम्मीदी थी । क्योंकि ये उस वक्त बुरे लोगों की सोहबत में थे । शराब सिगरेट का शौक था । फिर ये एक लड़की के सम्पर्क में आए और अपने पिता के मर्जी के खिलाफ उस लड़की से शादी कर लिए ।"

" क्या वो लड़की जानकी आंटी थी ?"

" हां । वो जानकी आंटी थी । शादी के बाद इनके पिता बहुत खपा हुए । वो इतने ज्यादा खपा हुए कि उन्हें अपनी पुरी जायदाद से बेदखल करना चाहते थे लेकिन फिर उन्हें अपने एकलौते औलाद पर कुछ तरस आ गया था । उन्होंने अपनी जिंदगी में ही अपनी तमाम चल और अचल संपत्ति धर्मार्थ कार्यों में लगाने के लिए एक ट्रस्ट के हवाले कर दी थी और ऐसा इंतजाम किया था कि उन्हें यानी रमाकांत को अपनी सारी जिंदगी ट्रस्ट से चालीस हजार रुपए माहवार मिलता रहे । वो रकम बीस बाइस सालों से उन्हें नियमित मिल रही है ।"

" ओह ! तो इसका मतलब उनकी फायनांशियल स्थिति यदि खूब बढ़िया नहीं है तो कोई खराब भी नहीं है ।"

" बढ़िया क्यों नहीं है ? उस वक्त आज जैसे महंगाई नहीं थी । दो लोगों के लिए आज भी ये रकम कोई छोटी नहीं होती ।"

" और जानकी आंटी कैसी है ?"

" आंटी बहुत तन्हाई पसंद है । वो ज्यादा किसी से मिलती जुलती नहीं ।"

जीजू से बातों के दौरान मुझे याद आया कि अमर के मर्डर वाले दिन अनुष्का जीजू के फ्लेट में थी और ठीक उसके बगल में ही उसकी मौसी का फ्लैट था ।

तो क्या अनुष्का को पता है कि बगल में ही उसकी मौसी रहती है । मौसी अनुष्का को नहीं पहचान सकती थी क्योंकि उसने उसे बचपन में देखा था । दोनों बहनें उस वक्त बहुत छोटी थी और अब वो जवान लड़की में बदल गई है । मगर अनुष्का और वीणा तो फोटो के चलते अपनी मौसी को पहचान ही सकती थी ।

" जीजू एक बात और बताईए , क्या अनुष्का आप के फ्लैट पे अक्सर आती थी ? लेकिन प्लीज सच बोलिएगा ।"

" नहीं नहीं। वो पहली बार मेरे फ्लैट पे आई थी और पहली बार ही इतना बड़ा कांड हो गया ।"

" ओके । थैंक्यू जीजू । गुड नाईट ।"

बोलकर मैंने फोन काट दिया ।

__________

सुबह मोबाइल बजने की आवाज से मेरी नींद खुल गई । टाईम देखा । अभी छः ही बजे थे ।

मैंने देखा रमणीक लाल का फोन था ।

मेरे ' हैलो ' कहने के बाद जो रमणीक लाल ने कहा उसे सुन कर मैं भौंचक्का हो गया ।

मनीष जैन को किसी ने जान से मार दिया था ।

" कब ?- मैंने कहा ।

" पुरी खबर नहीं पता। मैंने अभी अभी खबर सुनी तो सोचा तुम्हें बता दूं ।"

" तुमको कैसे पता चला ?"

" क्या जाहिलो जैसे सवाल करते हो ? कुछ दिन पहले ही तो उसके बारे में जांच पड़ताल की थी । और मैं तुमसे कितना बार कहूं कि मैं भी पुलिस की ही नौकरी करता हूं ।"

" साॅरी । उसकी लाश कहां पाई गई ?"

" उसके फ्लैट पर ही ।"

" ओह ! क्या डेड बॉडी पुलिस ले गई या अभी भी फ्लैट पर ही है ?"

" जिस हवलदार ने मुझे बताया उसके अनुसार अभी भी लाश घर पर ही है और पुलिस को भी अभी ही पता चला है ।"

" इंस्पेक्टर कौन गया है ?"

" वो एरिया विजय कोठारी के थाने के अंतर्गत आता है तो वही जायेगा ।"

" ठीक है । फोन रखो , मैं वहां के लिए निकल रहा हूं ।"

" इंस्पेक्टर तुम्हें उसके फ्लैट में जाने की इजाजत नहीं देगा ।"

" देखते है । वैसे इंस्पेक्टर कोठारी मुझे जानता है " - मैंने कहा -" और सुनो , एक और काम करना है ।"

" क्या ?"

मैंने उसे काम बताने के बाद फोन काट दिया और जल्दी जल्दी तैयार हो कर माॅम डैड को बोलकर बाइक लेकर गाजियाबाद निकल गया ।

जब मैं मनीष जैन के फ्लैट के पास पहुंचा तो देखा कि फ्लैट का मुख्य द्वार खुला हुआ था और अंदर इंस्पेक्टर विजय कोठारी और उसके चंद कांस्टेबल डाइनिंग हॉल में पड़ोसियों से पुछताछ कर रहे थे । शायद अभी तक उनका टेक्निकल टीम नहीं आया था ।

इंस्पेक्टर कोठारी की नजर मुझ पर पड़ी । उसने मुझे अंदर आने का इशारा किया ।

मैं ड्राइंगरुम में प्रवेश किया ।

भीतर ड्राइंगरुम के कारपेट पर औंधे मुंह मनीष जैन पड़ा था । उसकी पीठ में मूठ तक जो खंजर घुपा हुआ था , उसे मैंने फ़ौरन पहचान लिया ।

यह वही नक्काशीदार मूठ वाला जापानी खंजर था जो मैंने श्वेता दी के पास देखा था ।

तभी पुलिस का एक बड़ा दल जिसमें टेक्निकल टीम , फोटोग्राफर , डाक्टर वहां पहुंचा ।

उन्होंने अपनी छानबीन शुरू कर दिया । उनके आने के बाद इंस्पेक्टर ने खंजर को लाश से बाहर खींचने का प्रयास किया तो केवल मूठ हाथ में आ गई , फल लाश मे ही धंसा रह गया ।

खंजर की मूठ नक्काशीदार होने की वजह से उस पर से किसी प्रकार के उंगलियों के निशान बरामद नहीं हुए ।

इंस्पेक्टर ने मूठ का मुआयना किया । खंजर की मूठ खोखली थी । उसने खोखली मूठ के अन्दर झांका ।

" क्या तुम इस खंजर को पहचानने हो ?" - इंस्पेक्टर कोठारी ने मुझे गौर से खंजर को निहारते हुए देख पुछा ।

" हां " - बड़ी मुश्किल से मैंने कहा ।

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" क्या तुम इस खंजर को पहचानते हो ?"- इंस्पेक्टर कोठारी ने मुझे गौर से खंजर को निहारते हुए देख पुछा ।

" हां "- बड़ी मुश्किल से मैंने कहा ।

अभी वो कुछ कहता कि पुलिस का डाक्टर वहां पहुंच गया और वो उससे बातें करने में मशगूल हो गया । मैं मौका देख कर तुरंत फ्लैट से बाहर निकल कर गलियारे में आ गया और श्वेता दी को फोन लगाया ।

उनके ' हैलो' कहते ही मैंने कहा -" श्वेता दी , आपके पास एक जापानी एनटिक खंजर थी ना ?"

" हां "- उन्होंने कहा ।

" कहां है अभी ? क्या वो खंजर अभी आप के पास है ?"

" सागर , वो खंजर तीन चार दिनों से मिल नहीं रहा है । पता नहीं चोरी हो गया है या कहीं मैंने गिरा दिया है ।"

मुझे ऐसा ही अंदेशा था ।

" खंजर के बारे में क्यों पुछ रहे हो ? "- श्वेता दी ने पूछा ।

" आप के पड़ोसी वकील साहब मनीष जैन का किसी ने खून कर दिया है और उन्हें उसी तरह के खंजर से मारा गया है जैसा खंजर आप के पास था ।"

" क्या ?"- वो चौंकते हुए बोली -" मनीष जी का खून हो गया ? कब ? कैसे ?"

" आज सुबह ही उनकी लाश अपने फ्लैट में पाई गई है और पुलिस अभी छानबीन कर रही है ।"

" लेकिन तुम्हें कैसे पता ?"

" मुझे एक पुलिस वाले ने ही बताया और मैं भी वहीं उनके फ्लैट पर ही हूं ।"

" उनको जिस खंजर से मारा गया क्या वो खंजर मेरा वाला है ?"- वो परेशान होते हुए बोली ।

" लगता तो हुबहू वैसा ही है । वैसे ये खंजर आप ने किस से खरीदी थी ?"

" रीतु की फ्रेंड काजल के डैड के दुकान से ।"

काजल के डैड अरविंद शर्मा की एंटीक चीजों की दुकान थी , ये मैं जानता था ।

" तुम फोन रखो , मैं थोड़ी देर में दुबारा काॅल करता हूं ।"

मैंने काजल को फोन लगाया ।

" हैलो "- काजल की चहकती हुई आवाज आई ।

" काजल तुम्हारे डैड कहां है , एक जरूरी बात करनी है ।"

" क्या हुआ ?"

" बताऊंगा लेकिन पहले अपने डैड से मेरी बात करवा ।"

" दो मिनट वेट करो ।"

थोड़ी देर बाद उसके डैड की आवाज आई -" क्या बात है सागर बेटा ?"

" अंकल आप को याद है कि आप के दुकान पे जापानी एनटिक खंजर सेल के लिए रखा था ।"

" हां । मुझे पुरा याद है ।"

" क्या वो खंजर अभी तक आप के पास है ?"

" नहीं । वो तो करीब डेढ़ साल पहले ही बिक चुका है ।"

" वैसे खंजर कितने पीस थे ?"

" तीन पीस ही था जिसे मैंने अन्य सामानों के साथ बाहर से मंगवाया था । एक तो मेरे घर पर है और बाकी दो बेच दिया था ।"

" आप को याद है आप ने किसे बेचा था ?"

" बात क्या है ? उस खंजर के लिए इतना इन्क्वायरी क्यों ?"

" जैसा खंजर आप के पास था ठीक वैसे ही खंजर से एक आदमी का खून हो गया है ।"

" ओह "- वो चौंकते हुए बोले -" ये तो बहुत बुरा हुआ । जरूर उन दो लोगों में से किसी के पास वाले खंजर से कतल हुआ होगा ।"

" वो दो लोग कौन थे जिसे आप ने खंजर बेचा था ?"

" अब नाम और चेहरा तो याद नहीं है लेकिन सेल बुक से मालूम हो जायेगा कि वो दोनों कौन थे ।"

" थैंक्यू अंकल ।"

मैंने दोबारा श्वेता दी को फोन किया ।

उनके फोन उठाते ही मैंने कहा -" श्वेता दी , देर सबेर पुलिस को खंजर के बारे में पता चल ही जाएगा इसलिए यदि पुलिस आप से खंजर के बारे में इन्क्वायरी करे तो आप यही कहना कि खंजर अभी भी आप के पास मौजूद है । कोई चोरी या गिरने की बात मत करना ।"

" जब पुलिस मुझसे खंजर मांगेगी तो क्या करूंगी ?"

" उनसे सिर्फ यही बोलना की खंजर मेरे पास है ।"

" लेकिन तुम्हारे पास कहां से आ गई ? क्या खंजर तुम्हारे पास है ?"

" नहीं । लेकिन जैसा मैंने कहा है वैसे ही पुलिस को कहना ।"

मैं वापस फ्लैट के अन्दर दाखिल हुआ । मुझे देखते ही कोठारी ने मेरे बांह को पकड़ कर ड्राइंगरुम के कोने में ले गया ।

" अब बताओ खंजर के बारे में तुम क्या जानते हो ?"

" सर ऐसा ही खंजर मेरी सिस्टर श्वेता के पास था जो फिलहाल मेरे पास है " - मैंने बड़ी सावधानी से कहा ।

कोठारी मुझे एक टक कुछ देर तक घुरता रहा फिर पुछा -" अभी भी तुम्हारे पास है ?"

" यहां नहीं घर पर है ।"

" शाम तक खंजर थाने में ले आकर मिलो "- उसने हुक्म सुना दिया ।

" जी ।"

" तुम्हें कतल की खबर कैसे हुई ?"

मैंने इमानदारी से रमणीक लाल के बारे में बता दिया ।

" सर आपको क्या लगता है कहीं इसका भी सम्बन्ध अमर के कतल से तो नहीं है ?"

" तुम्हें ऐसा क्यों लगता है ?" - कोठारी ने कहा ।

" सामने वाले फ्लैट में करीब एक महीना पहले अमर का खून हुआ और अब यहां मनीष जी का तो हो सकता है दोनों कतल का आपस में कोई लिंक हो ।"

इंस्पेक्टर कुछ नहीं बोला ।

" सर कतल के बारे में कुछ बताइए और उनकी पत्नी अनुपमा जी कहां है ?"

" ये खबर अनुपमा जी ने ही पुलिस को दी थी । वो अपने मायके जयपुर से आज सुबह वापस आई थी । उन्हें फ्लैट का मेन दरवाजा खुला पाया मिला था । जब वो अंदर गई तो उन्होंने अपने हसबैंड को ड्राइंगरुम में मरा पाया। "

जब रविवार को श्वेता दी और जीजू अपने फ्लैट से दिल्ली आने के लिए तैयारी कर रहे थे तब अनुपमा जी से मुलाकात हुई थी । आज गुरुवार है । इसका मतलब रविवार के बाद ही किसी दिन वो जयपुर चली गई थी । और दो तीन दिन रहकर आज वापस आई थी ।

" अभी कहां है वो ?" - मैंने कहा ।

" बगल वाले फ्लैट में । रमाकांत जी के यहां ।"

" खून कब हुआ होगा ?"

" डाक्टर का अंदाजा है इसे मरे हुए पांच छः घंटे हो चुका है । बाकी रिपोर्ट तो पोस्ट मार्टम के बाद ही मिलेगा ।"

कोठारी फिर से अपने काम में व्यस्त हो गया । मैं उससे इजाजत लेकर फ्लैट से बाहर निकल गया । सोचा एक बार अनुपमा जी से मुलाकात कर लूं । रमाकांत जी का फ्लैट का दरवाजा खुला हुआ था । मैं उनके फ्लैट में दाखिल हुआ । अनुपमा जी उनके कमरे में चार पांच औरतों से घिरी हुई बैठी थी । उनकी आंखें रो रो कर सूज गई थी । उन्होंने मुझे एक नजर देखा फिर अपनी नजरें झुका ली । जानकी आंटी भी वहीं बैठी हुई थी । मैं उनसे भी अनुष्का और वीणा के उनके रिश्ते के बारे में बात करना चाहता था लेकिन अभी इन सब बातों के लिए मुझे मुनासिब वक़्त नहीं लगा । रमाकांत जी मुझे नजर नहीं आए ।

मैं घर निकल गया ।

घर पहुंच कर माॅम की हालचाल पूछा फिर अपने कमरे में चला गया । पैंट शर्ट उतार कर हाथ मुंह धोया और बिस्तर पर जाकर लेट गया ।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर चक्कर क्या है । किसने मनीष जैन को मारा । वो वकील था । उसके कई दुश्मन हो सकते हैं । क्या उन्हीं में से किसी ने उसे मारा या उसने मारा जिसने अमर का खून किया था । लेकिन क्यों ?

अमर और मनीष जैन का क्या लिंक हो सकता है ? क्या वजह हो सकती है इन दोनों की हत्याओं की ? और मुझ पर भी तो आगरा में अटैक हुआ था - लेकिन क्यों ? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था ।

खंजर की क्या कहानी हो सकती है ? श्वेता दी की खंजर किस ने चुराई ? क्या खंजर मनीष जैन को मारने के लिए चुराया गया था ? लेकिन खंजर ही क्यों ?

खंजर..... मैं सहसा खड़ा हुआ । पैंट शर्ट पहना और बाइक लेकर अमर के घर चला गया जहां श्वेता दी रह रही थी ।

श्वेता दी ने दरवाजा खोला । वो कुछ कहती इससे पहले मैंने कहा-" आप अपने रूम में चलो... मैं थोड़ी देर में आ रहा हूं ।"

उन्होंने सहमति में सिर हिलाया और ऊपर तल्ले अपने कमरे में चली गई ।

मैंने अमर के कमरे का दरवाजा खोला . खंजर उसी जगह पर था ।

मैंने खंजर को मूठ से पकड़ा और फल से बाहर की ओर खिंचने लगा । थोड़ी सी कोशिश के बाद मूठ फल से बाहर निकल गया । मूठ एक तसबीर से लिपटी हुई थी ।
 
Update 26 Continue

मैंने खंजर को मूठ से पकड़ा और फल से बाहर की ओर खिंचने लगा । थोड़ी सी कोशिश के बाद मूठ फल से बाहर निकल गया । मूठ एक तसबीर से लिपटी हुई थी ।

मैंने खंजर की खोखली मूठ में झांका । फिर गोल लिपटी हुई तस्वीर को मूठ में धकेला । तस्वीर बड़ी सहुलियत से मूठ में समा गई । फिर मूठ को अपने एक हाथ की हथेली पर पटका तो तस्वीर का एक सिरा मूठ से बाहर सरक आया । मैंने तस्वीर मूठ से बाहर खींच ली ।

लगता है कि इस तस्वीर का मूल ठिकाना इस खंजर की मूठ ही था ।

मैंने तस्वीर खोला तो उसके पीछे कोई पच्चीस साल पहले की एक तारिख पायी गई । तारिख के नीचे लिखा था रमाकांत सिंह और जानकी सिंह की शादी । तस्वीर ब्लैक एंड व्हाइट थी और रंगत में पीली पड़ चुकी थी । तस्वीर देखकर लगता था कि अपनी जवानी में जानकी सिंह बहुत ही हसीन और दिलकश रही थी । उसके विपरीत रमाकांत जी बड़ा पिचका और दुर्बल सा लग रहा था । दाढ़ी तब भी रखा हुआ था और चश्मा तब भी उसके नाक पर मौजूद था । दृश्य वरमाला का था । उसमें रमाकांत जी अपने हाथ कन्धों से ऊंचे उठाकर एड़ियों पर उचक कर वधु को वरमाला पहनाने की कोशिश कर रहा था ।

मैंने तस्वीर अपने पाकेट में रखा और श्वेता दी के पास चला गया ।

घर में श्वेता दी के अलावा कोई नहीं था । वो सलवार सूट में थी । उनके पुछने पर सारा किस्सा मैंने कह सुनाया । मैंने उन्हें रमाकांत और जानकी जी की वरमाला वाली तस्वीर दिखाया ।

वो तस्वीर देखी फिर असमंजस होकर बोली -" इस तस्वीर में ऐसी क्या खूबी है जिसकी वजह से उसे इतने यत्न से इतने गुप्त रूप से यूं अमर ने छुपा कर रखा था ?"

खूबी मुझे मालूम हो चुकी थी ।

तभी रमणीक लाल का फोन आया । उससे थोड़ी देर बातें करने के बाद मैंने डैड को फोन लगाया ।

" डैड , कनात पैलेस के इंडियन बैंक शाखा में एक रमाकांत सिंह नाम के एक शख्स का एकाउंट है " - मैंने कहा -" मुझे पता करना है कि एक साल में उस शख्स ने अपने एकाउंट में क्या जमा करवाया और उसमें से क्या निकलवाया ।"

डैड खूद एक प्राइवेट बैंक में असिस्टेंट मैनेजर थे तो उनके लिए ये कोई बड़ी बात नहीं थी ।

" एकाउंट नंबर ?" - डैड ने पूछा ।

" नहीं मालूम ।"

" ऐसी जानकारी तो बैंक में गोपनीय रखी जाती है ।"

" मुझे मालूम है तभी तो आपको कहा ।"

" ओके । मैं कोशिश करता हूं ।"

" एक और शख्स की भी एक साल की स्टेटमेंट चाहिए ?"

" किसका ?"

" अमर गुप्ता । उसका एकाउंट कनात पैलेस में ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में है ।"

" ठीक है । एक घंटे बाद फोन करो ।"

" यदि काम हो जाय तो मेरे मेल में फारवर्ड कर दिजियेगा ।"

डैड ने एक घंटे का समय कहा था । तो मैंने इस का सदुपयोग करना चाहा । श्वेता दी से बढ़िया और क्या हो सकता था । एक घंटे तक हम दोनों ने खूब जमकर सेक्स का मजा लिया ।

सवा घंटे बाद मैंने अपना मेल खोला । डैड ने मेल कर दिया था । रमाकांत जी के एकाउंट में हर महीने एक ही चेक चालीस हजार रुपए का जमा होता था जिसकी रकम पूरी की पूरी ये खाते में लगते ही हर महीने निकलवा लेते थे । लास्ट में बैलेंस पांच सात हजार रुपए से ज्यादा नहीं रहता था । सिर्फ एक रकम मोटी थी - दस लाख रूपए की - जो फिक्स्ड डिपॉजिट से ट्रांसफर होकर इस एकाउंट में जमा हुआ था और वो एक हफ्ते बाद निकाल लिया गया था ।

इंस्पेक्टर कोठारी शाम तक खंजर के साथ मुझे थाने बुलाया था । मैं श्वेता दी को ' बाॅय ' बोलकर गाजियाबाद के लिए निकल गया ।

मैं थाने न जाकर रमाकांत जी के फ्लैट जा पहुंचा । उनके फ्लैट की कालबैल बजाई तो दरवाजा खुद जानकी जी ने खोला ।

दोनों पति-पत्नी वहां मौजूद थे ।

मैंने दोनों का अभिवादन किया । वे लोग काॅफी पी रहे थे ।

" मैं तुम्हारे लिए काॅफी लाती हूं "- जानकी जी बोली ।

" नहीं, नहीं " - मैं जल्दी से बोला -" इसकी जरूरत नहीं " - फिर मैं रमाकांत जी से सम्बंधित हुआ -" मैंने डिस्टर्ब तो नहीं किया ?"

" बिल्कुल नहीं "- रमाकांत जी अपनी दाढ़ी में उंगलियां फिराते हुए बोले -" बल्कि बहुत अच्छा लगा । जैसा माहौल यहां का कुछेक दिनों से होकर रखा है उससे तो एक डर का आलम सा हो गया है। तुम्हारी बहन और जीजा के यहां से जाने के बाद तो हमें भी यहां मन नहीं लग रहा है । और ऊपर से मनीष की हत्या । कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि हम क्या करें ?"

" यदि ऐसा है तो " - मैंने धीरे से कहा -" क्यों नहीं अपने रिश्तेदारों से मिलते हैं ?"

" रिश्तेदार ! किसके रिश्तेदार ?" - रमाकांत जी ने चौंकते हुए कहा ।

" आप की " - मैं जानकी जी को देख कर बोला -" छोटी बहन की बेटियां ।"

" क्या ?" वो आश्चर्यचकित हो कर बोली ।

" नाम तो याद होगा आपको अनुष्का और वीणा....या ये भी याद नहीं "- मैंने व्यंग्य से कहा ।

" तुम कैसे जानते हो उन्हें ?"

" अनुष्का वही लड़की है जो जीजू के फ्लैट में मेरे दोस्त अमर के मर्डर वाले दिन पाई गई थी और वीणा दिल्ली के एक नाइट क्लब में बतौर डांसर काम कर रही है वो भी इसलिए कि बुरे दिनों में न तो उसकी बहन ने उसकी सुध ली और न ही उसकी मौसी ने उसकी कोई खोज-खबर ली ।"

दोनों हतप्रभ मुंह बाए मुझे देख रहे थे ।
 
Update 27.

कुछ देर तक दोनों के मुंह से आवाज तक नहीं निकली ।

" मनीष जैन की की खबर आप जानते ही होंगे कि किसी ने उसके पीठ में खंजर घोंप के उसकी हत्या कर दी है ?" - मैंने कहा ।

" हां । आज की ही तो बात है " - रमाकांत जी ने कहा ।

" और वो खंजर श्वेता दी की है ।"

" क्या ?" - वो चौंकते हुए बोला -" वो श्वेता की थी ?"

" जी ।"

" उसके खंजर से मनीष की हत्या कैसे हो गई ? क्या उसकी खंजर चोरी हो गई थी ?"

" जी हां ।"

" किसलिए ? मनीष की हत्या करने के लिए ?"

" मनीष की हत्या उस खंजर से हुई तो जरूर थी लेकिन चोरी का मकसद कुछ और ही था ।"

" क्या ?"

" खंजर की मूठ खोखली थी और उस खोखली मूठ में एक ऐसी चीज छुपी हुई थी जिसकी उसे जरूरत थी । मगर दुर्भाग्य से खंजर वो वाली नहीं निकली जिसकी उसे जरूरत थी ।"

" क्यों ?"

" क्योंकि वैसी जापानी एनटिक नक्काशीदार मूठ वाली खंजर एक नहीं बल्कि तीन थी । और चोर की जरूरत वाली खंजर श्वेता दी के पास नहीं बल्कि मेरे मरहूम दोस्त अमर के पास थी ।"

" ऐसी क्या चीज थी ?"

" वो चीज पच्चीस साल पुरानी एक तस्वीर थी जो बहुत महीन तरीके से गोल लपेट कर उस खंजर की खोखली मूठ में छुपा दी गई थी ।"

रमाकांत जी के चेहरे के भाव में थोड़ी तब्दीली आई । उसके नेत्र सिकुड़ गये ।

" ऐसी क्या खास बात थी उस तस्वीर में ?" - जानकी देवी बोली ।

" तुमने देखी है वो तस्वीर ?" - रमाकांत जी ने पूछा ।

" जी हां " - मैं बोला -" देखी है ।"

" क्या तस्वीर थी वो ?"

" वो आपकी और जानकी देवी की शादी की तस्वीर थी । वरमाला के समय की । जो कि वीणा - जानकी देवी की बहन की बेटी - के व्यक्तिगत सामानों में मोजूद थी और जिस पर उसके ब्वायफ़्रेंड अमर की निगाह पड़ गई थी । अमर को वह तस्वीर बहुत काम की लगी इसलिए उसने वो तस्वीर अपने खंजर की मूठ में छुपा दी ।"

" मेरी समझ में नहीं आता कि हमारी शादी की मामूली तस्वीर में काम की लगने वाली कौन सी बात रही होगी जो अमर ने उसे यूं छुपाकर रखने की जरूरत महसूस की ?"

" आना तो चाहिए आप की समझ में ।"

" नहीं आ रहा है " - वह जिद भरे स्वर में बोला ।

" ठीक है फिर मैं समझाता हूं । रमाकांत जी , उस तस्वीर में आप बड़े पिचके हुए और कमजोर लग रहे थे और एड़ियों के बल उचक कर , कन्धों से उपर हाथ उठाकर जानकी देवी जी को वरमाला पहना रहे थे ।"

" तो क्या हुआ ?"

" तो यह हुआ कि आप तो कद काठी में अपने बीवी से अच्छे खासे लम्बे हैं , फिर आपको इनके गले में वरमाला डालने के लिए एड़ियों के बल उचकना क्यों पड़ा और हाथ कन्धों से ऊंचे उठाने क्यों पड़े ? आप का जो कद है उस हिसाब से तो आप स्वाभाविक ढंग से हाथ उठाकर ही वरमाला पहना सकते थे ।"

रमाकांत जी खामोश हो गया ।

" यही बात थी जो तस्वीर में अमर ने भी नोट की थी । और इसलिए उसने उसे एक बहुत ही खुफिया जगह पर - खंजर की खोखली मूठ में - छुपाकर रखने की जरूरत महसूस की ।"

" मतलब क्या हुआ इसका ?"

" मतलब यह हुआ कि आप तस्वीर वाले रमाकांत सिंह नहीं है ।"

" तो और कौन हूं मैं ?"

" आप उस वक्त नौजवान और हसीन रही जानकी देवी की कोई खास आशिक होंगे जो इनके पति की मौत के बाद रमाकांत सिंह की जगह ले बैठे ।"

" किस लिए ?"

" ट्रस्ट की उस माहवारी रकम को क्लेम करने के लिए - रमाकांत सिंह की मौत के बाद जो मिलनी बंद हो जानी थी । वह जानकी देवी की चालाकी थी उस रकम को हासिल करते रहने के लिए । इतफाक से इनका पति यहां से बहुत दूर हिमाचल प्रदेश में मरा जहां कि उसकी मौत की खबर छुपाए रखना इनके लिए कोई मुश्किल काम नहीं रहा । वहां इन्होंने सबके साथ आपका परिचय अपने पति के तौर पर करवाया । आप लोग बड़े आराम से रमाकांत के नाम आने वाली माहवारी की रकम डकारते रहे ।"

" पेमेंट तो चेक से होती होगी ।"

" " तो क्या हुआ ! ज्वाइंट एकाउंट में चेक पति के नाम हो तो जमा हो जाने के बाद रकम पत्नी भी निकाल सकती है । बाद में आपने कोई नया एकाउंट खोल लिया होगा , जैसा कि दिल्ली में इंडियन बैंक में खोला हुआ है , और उसमें रमाकांत के नाम से आप के साइन चलने लगे होंगे ।"

" यह बात साबित कैसे होगी ? तुम करोगे ?"

" मैं नहीं करूंगा । वो तस्वीर करेगी ।"

" पच्चीस साल पुरानी तस्वीर " - वो हंसा -" पच्चीस सालों में तो आदमी की सुरत में जमीन आसमान का फर्क आ जाता है ।"

" सुरत में ! कद में नहीं ! एक बार बालिग हो जाने के बाद आदमी का कद दो इंच भी नहीं बढ़ता । उपर से एक बात और भी है ।"

" वो क्या ?"

" हिमाचल में असली रमाकांत के असली बैंक एकाउंट में आज भी उसके हस्ताक्षर का नमूना होगा ।"

" हस्ताक्षरों का नमूना !" - वो फिर हंसा -" अब तक तो बैंक भी बंद हो गया गया ।"

" फिर भी एक जगह और है जहां से असली रमाकांत के हस्ताक्षर का नमूना पाया जा सकता है ।"

वो मुझे एक टक देखता रहा ।
 
Update 27 continue.

" फिर भी एक जगह है जहां से असली रमाकांत के हस्ताक्षर का नमूना पाया जा सकता है ।"

वो मुझे एक टक देखता रहा ।

" वो ट्रस्ट आज भी बरकरार है जिसका माहवारी का चैक आप हर महीना हजम कर रहे हैं । ट्रस्ट के रिकॉर्ड में असली रमाकांत का कोई न कोई डाॅक्यूमेंट जरूर होगा जिस पर उसके हस्ताक्षर होंगे । एक जालसाज आदमी की पोल खोलने के लिए वे बड़ी खुशी से अपने पुराने से पुराना रिकॉर्ड टटोलने के लिए तैयार हो जाएंगे ।"

दोनों मियां बीवी के मुंह से बोल न फुटा ।

" जानकी देवी ! आपने बहुत भारी गलती की जो आपने हिमाचल से दिल्ली लौटने का लालच किया । आप वहीं रहती तो किसी को कभी भनक भी नहीं पड़ती कि आपका पति मर चुका है और उसकी जगह आपका यह यार ले चुका है । अपने असली पति की मौत के इतने सालों बाद आपने यही सावधानी बहुत काफी समझी कि आप दिल्ली की जगह गाजियाबाद आकर रही । लेकिन ये आप लोगों का दुर्भाग्य कि गाजियाबाद में वहां आकर रही जहां आपके ठीक बगल में ही श्वेता दी और जीजू का फ्लैट था । अमर मेरे दोस्त होने के नाते मेरे साथ श्वेता दी के फ्लैट कई बार आ चुका था इसलिए वो आप लोगों से भली भांति परिचित था । न आप गाजियाबाद आते न आप को अमर से मुलाकात होती और न ही ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू होता और न ही आपको अमर के खून से आपको अपने हाथ रंगने पड़ते ।"

कमरे में कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा ।

" अमर की बदकिस्मती कि उसे प्यार भी हुआ तो वीणा से... जानकी देवी की बहन की ही बेटी से । काश ! वीणा दिल्ली आई ही नहीं होती । वीणा के ही एल्बम में उसने जानकी देवी और उनके हसबैंड की तस्वीर देखी । तस्वीर पर नजर पड़ते ही उसने जानकी देवी को पहचान लिया होगा और जिस तरह से मैं तस्वीर देखकर जानकी देवी के हसबैंड पर कन्फ्यूज हुआ वैसा ही वो भी हुआ होगा । उसे किसी तरह से आप के ट्रस्ट वाली कमाई का जरिया पता चला होगा । उसे पता चला होगा कि चालीस हजार रूपए आप लोग पच्चीस सालों से लगातार ट्रस्ट के माध्यम से लुट रहे हैं और जिस हालत में उसकी प्रेमिका वीणा - जानकी देवी की भांजी - जिन्दगी गुजर बसर कर रही है , उससे उसके मन में जानकी देवी के प्रति गुस्से की भावना जागृत हुई होगी और फिर यहीं से उसने आप को ब्लैकमेलिंग करना शुरू किया होगा । पिछले छः महीने से आपके एकाउंट से निकाला हुआ पैसा गवाह है कि आप लोग उसके ब्लैकमेलिंग के शिकार थे । अमर के मौत के एक दिन पहले दस लाख रूपए आपके एकाउंट से निकालना भी इसी संदर्भ में होगा । उसके ब्लैकमेलिंग की वजह से आप का हाथ टाइट रहता होगा । आप को देर सबेर ताव आना ही था , आपको महसूस होना ही था कि ब्लैकमेलिंग के उस जाल से पीछा छुड़ाना आपके लिए निहायत जरूरी था । अमर के मौत से आप ब्लैकमेलिंग के फंदे से निकल सकते थे । आपका भविष्य सुरक्षित हो सकता था , क्योंकि तस्वीर की वजह से वही एक शख्स था जो आपकी असलियत से वाकिफ था ।"

" कौन कहता है कि मेरी माली हालात खराब थी ।"

" मैं कहता हूं । आप के इंडियन बैंक का एकाउंट कहता है । जोड़ जोड़ कर जो पैसे आपने फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में दस लाख रूपए जमा किए थे वो भी निकाल लिए । ये सभी पैसे आपने ब्लैकमेलिंग के चलते ही निकाले हैं ।"

" चलो अब ये भी बता दो कि अमर का खून मैंने कैसे किया ?" - वो जहरीली मुस्कान करते हुए बोला ।

" अमर की मौत से एक दिन पहले आप ने अपने एकाउंट से दस लाख रूपए निकाले थे । ये शायद ब्लैकमेलिंग की आखिरी डील होगी । अमर को आपने अपने फ्लैट में बुलाया इस आखिरी डील के लिए । डील होगी कि अमर आपको तस्वीर सौंप देगा बदले में आप उसे दस लाख रूपए देंगे । अमर दस लाख के लालच में आप के फ्लैट में आया । आप ने उससे तस्वीर मांगी होगी लेकिन वो तस्वीर लेकर आया ही नहीं था... शायद अपनी सेफ्टी के लिए । उसे लगा कि जब तक तस्वीर उसके पास है तब तक आप उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते । कितना गलत सोच था उसका । और आप ने तभी उसका खून कर दिया ।"

" जब तस्वीर मुझे मिला ही नहीं तो फिर क्यों मैंने खून कर दिया " - वो अपने पैंट में हाथ डालते हुए बोला ।

" आप ने उसे रिवाल्वर से डराया धमकाया होगा । कुछ तो जरूर हुआ होगा । वो अपनी जान बचाने के लिए सच बोल दिया होगा कि तस्वीर एक जापानी एनटिक नक्काशीदार मूठ वाली खंजर में छुपाकर रखा गया है । ऐसे खंजर के बारे में सुनकर आपको श्वेता दी की खंजर की याद आई होगी । और जानकारी हासिल करने के बाद आपने उसे शुट कर दिया । लेकिन यहां बदकिस्मती आप की रही कि वो खंजर श्वेता दी की नहीं बल्कि उसके खुद की थी । इसीलिए तो आप ने श्वेता दी के दिल्ली से यहां वापस आने पर उनकी खंजर चुराया । श्वेता दी की खंजर चुराने का आप के सिवा और किसी के पास कोई कारण था ही नहीं ।"

" लेकिन अमर की लाश तुम्हारी बहन और जीजा के फ्लैट से बरामद हुई है ।"

" क्या मुश्किल है जीजू के फ्लैट की चाबी का डुप्लीकेट हासिल करना आपके लिए । आखिर बगल में ही तो है और फिर उनके फ्लैट में आप लोगों का आना-जाना भी तो लगा ही रहता है । आपने अपने फ्लैट में अमर का खून किया और लाश जीजू के फ्लैट में रख दिया ।"

" बढ़िया !" - वह बोला -" बहुत बढ़िया ! स्टोरी काफी अच्छी है मगर विश्वास कौन करेगा ?"

" एक बार ब्लैकमेलिंग का चक्कर पुलिस को पता चला कि बाकी बातें वो आप दोनों से खुद ही निकाल लेगी । आप शायद पुलिस के टार्चर के आगे कुछ ठहर भी जाओ लेकिन जानकी देवी जी आधे घंटे तक नहीं टिकेगी । आखिर उमर भी तो हो गई है ना ।"

" पुलिस को कौन बताएगा ?"

" मैं बताऊंगा ।"

" पुलिस से तुम्हारी मुलाकात होगी तो न बताओगे ।"

" कौन कहता है ?"

" मैं कहता हूं " - उसने पैंट के जेब से अपना दांया हाथ बाहर निकाला -" यह रिवाल्वर कहती है ।"

मैं हड़बड़ाया । मैंने देखा जानकी देवी जरा भी विचलित नहीं लग रही थी । बल्कि वह आंखों ही आंखों में उसे शाबाशी दे रही थी ।

" रमाकांत जी " - मैंने धीरे से कहा -" कम से कम इतना तो कबूल कर लीजिए कि मैंने जो कहा सच कहा ।"

" बातों में वक्त जाया मत करो "- जानकी देवी बड़ी सख्ती से रमाकांत जी से बोली -" जो करना है जल्दी करो ।"

" मरने से पहले इसके सवालों का जरा जबाव तो दे दूं नहीं तो नरक में भी सोचता ही रह जाएगा " - उसने मुझे कहर भरी निगाहों से देखते हुए कहा -" बहुत होशियार हो तुम । बधाई । अमर का खून मैंने ही किया था । वो कमीना छः महीने से मुझे चुस रहा था । उस तस्वीर के चलते । वो समझ गया था कि मैं असल रमाकांत नहीं हूं लेकिन मुझे ये नहीं पता था कि वो जानकी की ही बहन की बेटी का प्रेमी था । जरूर हरामजादे ने वही से तस्वीर पायी होगी । वो तस्वीर सामने आ जाने से हमारी माहवारी बंद हो जाती और हम एक एक पैसे के मोहताज हो जाते । भले ही वो एकमात्र तस्वीर थी लेकिन जब बात उठती तो बहुत दुर तक जा सकती थी । हम दोनों का भेद खुल सकता था और फ्राड के केस में बची खुची जिंदगी जेल में काटनी पड़ती । ये मै किसी भी कीमत पर गवारा नहीं करता । मैंने दस लाख के बदले तुम्हारे उस कमीने दोस्त अमर से उस तस्वीर का सौदा किया लेकिन वो हरामजादा खाली हाथ ही चला आया । जब मैंने उसे तस्वीर के बारे में पूछा तो कहने लगा कि कल दे दुंगा । छः महीने से तो ब्लैकमेलिंग किया ही उपर से उस दिन तस्वीर भी नहीं लाया । मेरा दिमाग गुस्से से भनभना गया । मैंने उसे गोली मारी जो उसके सर के बालों को छुते हुए दिवाल में घुस गई । जब जान पर बन आई तब जाकर वो डरा और बताया कि तस्वीर जापानी एनटिक नक्काशीदार मूठ वाली खंजर में रखा हुआ है । ऐसा खंजर मैंने श्वेता के पास देखा था तो मुझे लगा कि वो जब यहां आया होगा तो उस खंजर में छुपा दिया होगा । मैंने जरा भी देरी नहीं की और उसे शुट कर दिया । वैसे वो तस्वीर लाया भी होता तो भी मैं उसे छोड़ता नहीं । उसे मार ही देता । वो मेरा राज जान गया था , उसे मरना ही था । वो इतने दिनों तक इसलिए बचा रहा क्योंकि मुझे वो तस्वीर चाहिए था । "

" फिर ! फिर क्या किया आपने ?"

" गोली लगते ही वो मर गया । मैंने श्वेता के फ्लैट की डुप्लीकेट चाबी पहले से ही बनवा रखा था । उसके लाश को श्वेता के फ्लैट में बाथरूम में रखकर पहले की तरह दरवाजा बंद किया और अपने फ्लैट में आ गया ।"

" लेकिन जीजू का फ्लैट ही क्यों चुना ?"

" तो और कहां रखता ? अपने घर में ? राजीव के घर में इसलिए रखा कि वो तुम्हारे साथ उसके घर पहले भी कई बार आ चुका है । पुलिस की जांच को भटकाने के लिए ।"

" गोली की आवाज शायद इसीलिए सुनाई नहीं दी क्योंकि साइलेंसर लगा हुआ था " - मैंने रिवाल्वर में साइलेंसर लगा हुआ देख कहा ।

" बिल्कुल सही कहा ।"

" पुलिस को खबर आपने ही किया था ?"

" हां ।"

" क्यों ?"

" पुलिस का ध्यान दुसरी तरफ लगाने के लिए । जब देखा कि राजीव के फ्लैट में एक लड़की और उसके थोड़ी देर बाद तुम जा रहे हो तो पुलिस को बगल के पी सी ओ से एक गुमनाम काॅल कर दिया , ताकि पुलिस की तहकीकात तुम दोनों पर केन्द्रित हो जाए ।"

" मनीष जैन को क्यों मारा ?"

" अरे ! ये बातों में तुम्हें फंसा रहा है "- जानकी देवी जोर से बोली -" खतम करो इसे ।"

उसने मेरी तरफ रिवाल्वर ताना । मैंने अपनी आंखें बंद कर ली ।
 
Update 27. A

" अरे! ये बातों में तुम्हें फंसा रहा है " - जानकी देवी जोर से बोली -" खतम करो इसे ।"

" उसने मेरी तरफ रिवाल्वर ताना । मैंने अपनी आंखें बंद कर ली ।

रिवाल्वर देखकर मेरे छक्के छुट गये थे । ऐसी बात नहीं थी कि उसके पास रिवाल्वर होने का अनुमान नहीं था लेकिन हर वक्त उसके पास रिवाल्वर होने का अंदेशा नहीं था । मैं भले ही शारीरिक रूप से उससे ताकतवर था लेकिन एकाएक जब सामने वाला रिवाल्वर तान दे तो कोई भी क्या कर सकता है ।

" यहां इसका कतल करना मुनासिब नहीं होगा " - रमाकांत बोला -" इसकी लाश यहां से बरामद होना हम दोनों के लिए कोई मुसीबत खड़ा कर देगा ।"

" तो ?"

" यह खुद अपने कदमों से चलकर वहां तक जाएगा जहां से लाश बरामद होने पर हम में से किसी पर कोई आंच नहीं आएगी ।"

" कहां ?"

" इसके जीजा के फ्लैट पर ।"

" इसने कहना न माना तो ?"

" तो मैं इसे यहीं शूट कर दुंगा । जैसे अमर को मारकर इसके जीजा के फ्लैट में रख आया वैसे ही इसे भी रख दुंगा ।"

" लेकिन याद रखना " - मैं बड़ी कठिनाई से कह पाया -" तस्वीर अभी भी मेरे कब्जे में है ।"

" कोई बात नहीं । तस्वीर जब सामने आएगी तब की तब देखेंगे ।"

" जनाब ! " - मैंने अपने होंठों पर जुबान फेरी -" मेरा सवाल तो बीच में ही रह गया ।"

" कैसा सवाल ?"

" मनीष जैन की हत्या आपने की है ?"

" हां , उसका भी खून मैंने ही किया है । "

" क्यों ?"

" जिस दिन अमर का खून मैंने किया था उस दिन उसने मुझे तुम्हारे जीजा के फ्लैट के बाहर दरवाजे पर खड़े देख लिया था । उस वक्त मैं अमर को तुम्हारे जीजा के फ्लैट में रखकर बाहर निकल कर दरवाजे को बंद कर रहा था । उसने मुझसे पूछा कि मैं क्या कर रहा हूं तो मैंने उस वक्त बहाना बना कर उसे आश्वस्त कर दिया था । फिर जिस दिन तुम्हारे जीजा और बहन यहां से शिफ्ट हो रहे थे उसी दिन मैंने श्वेता का खंजर चुरा लिया था और ये साला कमीना मनीष का बच्चा मुझे खंजर चोरी करते हुए भी देख लिया था । उस वक्त उसने कुछ नहीं कहा । फिर उसी दिन शाम को उसकी पत्नी अपने मायके चली गई । दो दिन तक वो अपने काम में व्यस्त था लेकिन जिस दिन मैंने उसका खून किया उस दिन , रात में शराब पी कर आया और मुझसे खंजर के बारे में पुछने लगा । मैंने बताया कि मुझे खंजर बहुत अच्छा लगा इसलिए लोभ में पड़कर चोरी कर लिया । मैंने उससे कहा कि ये मेरी बड़ी गलती थी । ऐसा मुझे नहीं नहीं करना चाहिए था । मगर वो ये मानने को तैयार नहीं था । वो वकील था । श्वेता के फ्लैट में कतल वाले दिन मुझे दरवाजे के पास देखा था और फिर खंजर चोरी करते हुए देखा । उसे इसमें कोई साजिश दिखाई दे रही थी । मैंने उसे बार बार समझाया कि इसमें कोई साजिश नहीं है । मगर वो मानने को तैयार नहीं था । लेकिन जब वो ये बोला कि अमर को कतल वाले दिन उसने अपने कमरे से नीचे मेन गेट से फ्लैट की तरफ आते हुए देखा था तो मेरे कान खड़े हो गए । वो अमर को तुम्हारे साथ श्वेता के फ्लैट आते हुए पहले भी कई बार देखा था तो पहले तो वो यही समझा था कि वो श्वेता के घर आया था लेकिन इन दो घटनाओं से वो मुझ पर शक करने लगा था । क्योंकि उसे बाद में याद आ गया था कि श्वेता अपने मायके गई हुई है और राजीव अपने काम पर निकल चुका होता है । तो फिर अमर किसके पास आया था ? यदि श्वेता के फ्लैट में नहीं तो फिर किसके फ्लैट में गया हो सकता है ? वो मुझ पर साफ साफ आरोप लगाने लगा कि उस दिन अमर मेरे फ्लैट में आया था । मैं समझ गया कि ये बहुत कुछ जान गया है इसलिए इसका जिन्दा रहना मेरे लिए घातक होगा ।"

" लेकिन खंजर से ही क्यों मारा ? आप के पास तो रिवाल्वर भी थी ।"

" मैं नहीं चाहता था कि रिवाल्वर की गोलियों से फोरेंसिक जांच में अमर के कत्ल के साथ कोई रिश्ता जुड़े ।"

" क्या आगरा में मुझ पर हमला आपने ही करवाया था ?"

" आगरा में तुम पर हमला किया था , ये तो मुझे पता ही नहीं था " - वो अपने कंधे उचकाते हुए कहा ।

" अरे ! क्यों बेकार की बातों में वक्त जाया कर रहे हो " - जानकी देवी बेसब्री से बोली -" जल्दी से इसका काम तमाम करो ।"

" जनाब ! " मैंने कहा -" आपने दो खून किया है , आप बच नहीं सकते ।"

" दो क्यों , बल्कि तीन ।"

" मेरा स्कोर आपने पहले से ही जोड़ लिया ।"

" अभी नहीं जोड़ा । उसे मिलाकर चारों ।"

" जी !"

" हिमाचल में साला रमाकांत कौन सा अपनी आई मौत मरा था । एक नम्बर का कंजूस था वो हरामी का पिल्ला । अपनी बीवी को एक पैसा तक नहीं देता था । तब मैंने जानकी के कहने पर उसका कत्ल कर के उसकी लाश गायब कर दी थी और उसकी जगह खुद ले ली थी ।"

" कमाल है । एक कत्ल का तजुर्बा होने के वावजूद आप अमर के हाथों ब्लैकमेल होते रहे ।"

" हर काम के लिए मुनासिब वक़्त का इंतजार करना पड़ता है , बरखुदार । देख लो , मुनासिब वक़्त आया तो मैंने उसका शिकार कर लिया । और अब तुम्हारा शिकार करने जा रहा हूं ।"

" आप की जानकी जी से कैसे पहचान हुई ?"

" यह खामखाह बातों में वक्त जाया कर रहा है " - जानकी देवी बिफर कर बोली -" और तुम इसकी चाल में फंस रहे हो ।"

" चलो " - रमाकांत सख्ती से बोला ।

" कहां ?" - मैं जानबूझ कर अनजान बनता हुआ बोला ।

" यहां से बाहर । तुम्हारे जीजा के फ्लैट में ।"

" मैं न चलूं तो ?"

" छोकरे , बदतमीजी दिखाने से तेरी मौत टलने वाली नहीं । अब हिलता है या मैं गोली चलाऊं ।"

" हिलता हूं ।" - मैं बोला और मन मन के कदम उठाता हुआ दरवाजे के सामने पहुंचा । मेरा दिल धाड़ धाड़ कर मेरी पसलियों से बज रहा था और मुझे लग रहा था कि पीछे से गोली चलीं की चली ।

" वाह ! क्या संजोग है ।" - रमाकांत मंत्रमुग्ध होते हुए बोला -" अमर की मौत मेरे फ्लैट में , मनीष की मौत उसके फ्लैट में और तुम्हारी मौत तुम्हारे बहन की फ्लैट में । वाह ! वाह !"

वो दोनों ठीक मेरे पीछे पीछे आ रहे थे ।

" दरवाजा खोल ।"

मैंने दरवाजा पुरा खोला । सोच रहा था कि काश कोई गलियारे में दिख जाए ताकि इसका ध्यान भटके ।

" बाहर ।"

मैंने चौखट से बाहर कदम डाला ।

तभी एक पहलू से किसी ने मुझे जोर से धक्का दिया । मैं भरभरा कर औंधे मुंह फर्श पर गिरा ।

" खबरदार ।" - कोई गला फाड़कर चिल्लाया ।

साथ ही एक फायर हुआ ।

आतंकित मैं कांखता कराहता हुआ सीधा हुआ और उसी मुद्रा में मैंने सामने निगाह डाली ।

इंस्पेक्टर कोठारी खड़ा था । अपने दोनों हाथों में उसने अपनी सर्विस रिवाल्वर पकड़ी हुई थी जिसकी नाल से धुआं निकल रहा था ।

रमाकांत चौखट से जरा भीतर कमरे में मरा पड़ा था । पिस्तौल उसके हाथ से निकल कर जानकी देवी के पैरों के करीब जाकर गिरी थी लेकिन पता नहीं अपने सकते की सी हालत की वजह से या इंस्पेक्टर कोठारी के हाथ में थमी पहले ही आग उगल चुकी रिवाल्वर के खौफ से वह पिस्तौल उठाने के लिए नीचे नहीं झुक रही थी ।

मैं उठ कर अपने पैरों पर खड़ा हुआ और अपने कांपते हाथों से एक सिगरेट सुलगाने लगा ।
 
Update 28.

मैं उठकर अपने पैरों पर खड़ा हुआ और अपने कांपते हाथों से एक सिगरेट सुलगाने लगा ।

तब कोठारी का रिवाल्वर वाला हाथ नीचे झुका ।

" मैंने इसे वार्न किया था " - कोठारी बोला -" लेकिन यह मेरे पर गोली चलाने को पुरी तरह से आमादा था ।"

" आप यहां कैसे पहुच गए ? " - मैं फंसे स्वर में बोला ।

" अपने आपको खुशकिस्मत समझो कि मैं यहां पहुंच गया ।"

" लेकिन कैसे ?"

" तुम्हारी ही वजह से । सुबह मनीष जैन के कमरे से बाहर निकल कर जब तुमने अपनी बहन से बातें की थीं तब सारी बातें मैंने सुन ली थी । जिस तरह से तुम खंजर वाली बात की लिपापोती कर रहे थे तो मुझे तुम पर डाउट हो गया था । जब तुम वहां से निकले तभी मैंने तुम्हारे पीछे एक आदमी लगा दिया था । वो तुम्हारे पीछे शुरू से लगा हुआ था । जब उसने मुझे बताया कि तुम रमाकांत के फ्लैट में चले गए हो तो मुझे यह बात बुरी तरह खटकी । लिहाजा मैं सब काम छोड़कर सीधा यहां पहुंच गया जो कि मैंने बहुत अच्छा किया ।"

" आपने कुछ सुना ?"

" हां , सुना । मैं बाहर की होल से कान सटाए रहा था जब तक की तुम्हें बाहर को मार्च करने का हुक्म नहीं मिला ।"

" ओह ! कोठारी सर , मेरी जान बचाने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ।"

वह मुस्कराया । वह संतुष्ट था कि इतना बड़ा केस हल हो गया था ।

" खंजर और तस्वीर कहां है ?"

मैंने तत्काल खंजर और तस्वीर उसे सौंप दी ।

" अब तुम यहां से निकलो । यहां अब पुलिस का काम है ।"

मैंने तत्काल आदेश का पालन किया ।

जानकी देवी को धोखाधड़ी में शरीक होने , नाजायज और गैरकानूनी तरीके से अपने पति की मौत के बाद किसी और शख्स को अपना पति बनाकर और ट्रस्ट के साथ लगातार फ्राड करते रहने और अमर एवं मनीष जैन के हत्या में रमाकांत का साथ देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया ।

जानकी देवी ने जेल जाने के बाद एक अच्छा काम किया । उसने अपनी सारी चल और अचल संपत्ति वीणा के नाम कर दिया । बाद में जेल में उससे मिलने वीणा और अनुष्का गई थी जो कि मुझे वीणा से पता चला ।

तीन दिन बाद ----

रीतु जयपुर से वापस आ गई थी । उसके साथ काजल भी अपने फेमिली के साथ आ गई थी ।

दोपहर का समय था । मैं अपने कमरे में आराम कर रहा था कि माॅम ने कहा कि कोई कुरियर वाला आया है । मैं नीचे गया । कुरियर वाले ने एक लिफाफा दिया । लिफाफा मेरे नाम पर था । एक दिन पहले के डेट में केदारनाथ से भेजा गया था । मैं अपने कमरे में चला आया और लिफाफा खोला । लिफाफे के अन्दर एक चिट्ठी थी जिसे अमर की मां ने मुझे भेजा था ।

मैंने पढ़ना शुरू किया ।

सागर बेटा !
भगवान तुम्हें सदैव खुश रखें और लम्बी उम्र दें ।
मैं ये चिट्ठी यहां के एक धर्मशाला में बैठकर लिख रही हूं । अभी दो घंटे पहले मुझे अखबार से पता चला कि मेरे बेटे अमर का क़ातिल अपने गुनाहों का फल पा चुका है । मैंने इस की तस्दीक वहां के वकील सोहन लाल भार्गव से भी कर ली है । अब जाकर मेरे दिल को चैन मिला । अब कहीं जाकर मेरे बेटे अमर के आत्मा को शांति मिली होगी ।
मुझे तुम पर नाज है बेटा । तुमने मेरे बेटे के क़ातिल को ढूंढने के लिए बहुत मेहनत की । तुम्हारे चलते ही मेरे बेटे की आत्मा को शांति मिला है । भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे । बाबा केदारनाथ मेरी उम्र भी तुझे दे दें ।
मुझे ये भी पता चला कि अमर के जीवन में एक लड़की थी । वो वीणा नाम की एक लड़की से प्यार करता था । पागल कहीं का ! अगर मुझे बताता कि वो उससे शादी करना चाहता है कि क्या मैं उसकी शादी नहीं करवाती ? उसे अपनी बेटी बनाकर रखती । क्या हुआ जो वो क्लब में नाचती थी । मैं उसे अपने माथे पर बिठाए रखती । इसी लड़की के लिए उसने उस रमाकांत से दुश्मनी कर ली थी । शायद उसे उस लड़की का कष्ट नहीं देखा गया । वो जो कुछ किया उस लड़की के दुखों को देखकर किया । वो दिल का बुरा लड़का नहीं था । ये तुमसे अच्छा कौन जान सकता है । वो तो तुम्हारा सबसे करीबी दोस्त था न ! क्या तुम्हें लगता है कि वो ये सब पैसों के लिए किया होगा ? तुम तो जानते हो कि उसे रूपए पैसों की कभी भी तंगी नहीं थी ।
बेटा ! एक आखिरी बात कहनी थी क्योंकि थोड़ी देर बाद मैं भी अपने बेटे अमर के पास पहुंच चुकी होंगी । अपने बेटे के अस्थि कलश को लिए गंगा मैया में समाधी ले लुंगी । क्या करूंगी जीकर ! किसके लिए जिऊं ! मैं तो अब तक अपनी सांसें इसीलिए ढो रही थी कि उस हत्यारे को फांसी पर चढ़ते देख सकुं । मेरा बेटा वहां अकेले हैं ! वो मुझे पुकार रहा है ! वो मेरे बगैर कहीं भी रहा ही नहीं !
बेटा ! उसके पापा मरे थे तो वो पांच साल का था ! बहुत छोटा सा ! हमेशा मेरी पल्लू से ही बंधा रहता था ! तब से लेकर हमेशा ऐसा ही रहा ! दो महिने पहले तक भी वो कुछ नहीं करता था । सब कुछ मैं ही करती थी । बेटा.... बेटा.. वो अकेले कैसे करेगा ? मुझे जाना ही होगा । मुझे पता है वो बहुत परेशान हैं । वो जैसा बचपन में था वैसा ही आज भी है । मैं जा रही हूं अपने जिगर के टुकड़े के पास । "

मैं घुटनों के बल बैठ गया और फुट फुट कर रोने लगा ।

दो साल बाद ।

वीणा आज मेरी पत्नी है । अच्छी खासी नौकरी भी है ।
माॅम के लिए जो बुरे खयालात थे उससे मैंने कब का तौबा कर लिया ।
रीतु तो मेरी जान है । वो अभी भी वैसे ही अपने हरकतों से मुझे कभी हंसाती है तो कभी मेरी फजीहत कर देती है ।
काजल से अभी भी उसी तरह बातें करते रहता हूं । लेकिन सिर्फ बातें ही होती है ।
श्वेता दी और जीजू ने अपने फ्लैट को बेचकर दिल्ली में ही एक जगह फ्लैट खरीद लिया ।
श्वेता दी से भी सेक्सुअल सम्बन्ध खतम हो गया है । वो अपने फेमिली में व्यस्त हो गई है ।
अनुष्का और उसके हसबैंड की लाइफ भी ठीक ही चल रही है ।

संजय जी से एक बार बातों के दौरान पता चला कि आगरा में उन्हीं के कर्मचारी ने उन्हें मारने की कोशिश की थी । वो फिलहाल जेल में हैं । कुछ मालिक नौकर का प्रोब्लम था ।
मधुमिता की भी शादी हो गई है और वो बहुत खुश है ।

समाप्त ।

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माफ कीजिएगा । ये कहानी यहीं समाप्त हो रही है ।
कुछ कमी है मुझमें जो मैं समय का मैनेजमेंट नहीं कर पा रहा ।
मुझे बहुत खुशी है कि एक ऐसे आदमी की कहानी को पसंद किया गया जिसने कभी कोई कविता तक नहीं लिखा हो ।
मैं उन सभी लोगों को शुक्रिया कहता हूं जिन्होंने मुझे इतना बर्दाश्त किया ।
और खास तौर पर फ़ायरफ़ॉक्स भाई का । यदि ये नहीं होते तो मैं शायद बहुत पहले लिखना छोड़ देता ।

थोड़ा सा इमोशनल हूं लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं स्टोरी पढ़ना छोडूंगा या कमेंट नहीं करूंगा ।

बहुत बहुत धन्यवाद ।
 
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