तीन
बुद्धू—अनमित्र के मुंह से निकल गया।
‘क्या कहा?’ अहोना ने पूछा।
‘नहीं कुछ नहीं’
‘लगता है बुढ़ापा कुछ ज्यादा ही हावी हो गया है। बुदबुदाने की बीमारी लग गई है’
‘नहीं, बूढ़ा नहीं कह सकती तुम मुझे। देखो मेरे एक भी बाल सफेद नहीं हुए हैं’—अनमित्र ने मुस्कुराते हुए कहा था।
‘जब एक भी बाल सिर पर है ही नहीं तो फिर क्या काला, क्या सफेद’
ठठाकर हंस पड़ा था अनमित्र। फिर एक लंबी सांस लेते हुए कहा—हां बूढ़ा तो हो गया हूं। चेहरे पर हल्की-हल्की झुर्रियां पड़ गई हैं। पूरी तरह गंजा हो गया हूं। आंख पर पॉवरफुल चश्मा चढ़ गया है। फ्रेम भी कितना गंदा सा है। बहुत भद्दा लग रहा हूं ना?’
‘सुंदर कब थे तुम’ अहोना ने तिरछी नजर से देखा था उसे, ‘बस दूसरे सुंदर लगते थे तो उनका मजाक जरूर उड़ाते थे’
फिर हंसा था अनमित्र—लिपस्टिक वाली बात का बदला ले रही हो ना?
‘नहीं, मैं लिपस्टिक लगाती ही नहीं। सिर्फ शादी और बहू भात के दिन लगाना पड़ा था वो भी इसलिए क्योंकि सजाने के लिए ब्यूटी पॉर्लर से ब्यूटिशियन आई थी।’
अनमित्र ने एक गहरी सांस ली थी।
‘लेकिन क्यों अहोना? मेरे एक गंदे मजाक का बोझ ज़िन्दग़ी भर क्यों ढोती रही तुम? आखिर तुम जिंदगी भर अपने आपको ये सजा क्यों देती रही?’
‘ये बात तुम नहीं समझ पाओगे’
‘हां, बुद्धू हूं मैं’ अनमित्र की आंखों के आगे श्रावणी का चेहरा आ गया, जो चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थी—
बुद्धू! बुद्धू!! बुद्धू!!! बुद्धू!!!!
क्या वो सचमुच बुद्धू ही है। उसने अहोना की आंखों में झांक कर देखने की कोशिश की कि कहीं वो भी उसे बुद्धू तो नहीं समझती लेकिन चश्मे ने साथ नहीं दिया। नजदीक का पॉवर अभी तक वो ग्लास में लगा ही नहीं पाया है। इसलिए पास होकर भी वो आंखें उससे दूर थीं। बहुत दूर। कुछ नहीं देख पाया। उसने चश्मा उतार लिया। रूमाल से पोंछने की कोशिश की तो अहोना ने उसके हाथ से चश्मा ले लिया। अपनी सफेद साड़ी से वो चश्मे को साफ करने लगी। कॉलेज के जमाने में भी उसका चश्मा अहोना ही अपने रूमाल से साफ कर दिया करती थी। हालांकि तब माइनस पॉवर था और वो भी बहुत कम। अब तो माइनस-प्लस दोनों पॉवर है। प्लस पॉवर बदल गय़ा है लेकिन अभी तक ग्लास बदलवा नहीं पाया है।
उसे याद है उस दिन वो देर रात घर लौटा था। खाना भी नहीं खाया था। बस अहोना का रुआंसा चेहरा, उसकी लिपस्टिक, लंबी-लंबी बालियां उसकी आंखों के आगे घूमते रहे और कान पर श्रावणी के बुद्धू शब्द हथौड़े बन कर पड़ते रहे। अहोना की जिंदगी में उसकी बातों की इतनी अहमियत? इससे पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ था। तो क्या....???? कल अहोना से बात करेगा वो।
दूसरे दिन कॉलेज में अहोना बिल्कुल शांत और सामान्य दिखी। लगा ही नहीं कि कल कुछ हुआ था। लगा ही नहीं कि कल उसके मजाक की वजह से वो प्रोग्राम छोड़ कर चली गई थी। सब कुछ सामान्य। पूरे ग्रुप के साथ वही हंसी मजाक। कैंटीन में एक दूसरे का लंच छीन-झपटकर खाना। उसके साथ भी कोई नाराजगी नहीं। और ये सामान्य बर्ताव उसे खटक रहा था। वो अहोना से अकेले में बात करना चाहता था लेकिन मौका ही नहीं मिल पा रहा था।
जब लंच हो गया और सब कैंटीन से जाने लगे तो उसने आखिरकार कह ही दिया—अहोना, तुम रूकना, मुझे तुमसे कुछ बातें करनी है।
‘हां, कहो’
‘अभी नहीं, अकेले में बात करनी है’
‘ओय होय—अकेले में क्या बात करनी है?’ सोमा ने चुटकी ली।
‘हम दोस्तों के बीच ये अकेले-अकेले की बात कहां से आ गई?’ गरिमा को मानो गुस्सा आ गया ‘इससे पहले तो अकेले-अकेले में हमने कभी कोई बात नहीं की’
‘अभी रूक भी नहीं सकते। क्लास का टाइम भी हो रहा है’ झेंपती अहोना ने टालने के अंदाज में कहा।
‘है कुछ जरूरी बात। तुम लोग दिल पर मत लो’ अनमित्र ने दोस्तों को समझाने की कोशिश की, ‘जी डी सर की क्लास की चिंता तुम्हें कब से होने लगी। समझ में आता भी है कुछ’
‘रूक जा ना। सुन भी ले क्या बात है। क्लास में जो पढ़ाई होगी, तुम्हें हम बता देंगे’ अब तक चुप रही श्रावणी ने कहा था। अहोना और अनमित्र को अकेला छोड़ सब चले गए थे। श्रावणी की संजीदगी अनमित्र को हमेशा अच्छी लगी थी। वो चीजों को इतने अच्छे से हैंडल करती थी कि बस पूछो मत। शायद श्रावणी ने उन दोनों के बीच बढ़ रही करीबी को समझ लिया था।
दोनों अकेले रहे गए। पहली बार दोनों के बीच ये अकेलापन भारी पड़ रहा था।
‘कहो क्या कहना है?’
‘तुम कल प्रोग्राम देखे बिना क्यों चली गई थी?’ अनमित्र ने सीधे सवाल पूछा था।
‘यूं ही तबीयत ठीक नहीं लग रही थी, इसलिए चली गई थी।’ अहोना ने मानो कुछ छिपाने की कोशिश की।
‘तो मुझे बताया होता। रोज मैं तुम्हारे साथ जाता हूं तो कल जब तबीयत खराब थी तो अकेले क्यों चली गई?’
‘मेरी वजह से तुम प्रोग्राम देखे बिना क्यों जाते? वैसे भी तुम मेरे बॉडीगार्ड थोड़े ही हो?’ कटाक्ष करने में वो उस्ताद थी।
‘नहीं तुम्हारी तबीयत खराब नहीं थी। मेरा मजाक तुम्हें खराब लग गया था और इसलिए तुम चली गई थी’
‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं है. वैसे मैंने फैसला किया है कि आज के बाद से मैं ना तो लिपस्टिक लगाउंगी, ना ही लंबी बाली पहनूंगी’
‘ये कोई बात नहीं हुई’ अनमित्र ने समझाने की कोशिश की थी, ‘लिपस्टिक और बाली तुम पर बहुत फब रहे थे, मैंने यूं ही मजाक किया था। मैं सॉरी बोलता हूं।’
‘अब चलें?’ उसने सीधे टॉपिक बदल दिया था। बात खत्म हो गई थी लेकिन बात क्या सचमुच खत्म हो गई थी। अनमित्र के बुद्धू दिमाग ने जितना समझा था, उसके मुताबिक तो बात उसी दिन शुरू हुई थी। हालांकि बहुत कुछ सोच कर गया था वो लेकिन कह कुछ नहीं पाया था। अहोना ने भी बोलने का मौका कहां दिया!