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Romance दो कतरे आंसू

डॉली और दीपू के साथ जब कृष्ण डाइनिंग-रूम में पहुंचा तो उसके बदन पर बहुत ही कीमती सूट था। बाल सलीके से संवरे हुए थे। उसके हाथ में स्कॉच की बोतल थी।

खाना मेज पर लगा था। लेकिन डाइनिंग टेबल पर कोई नहीं था।

कृष्ण ने बैठते हुए कहा- “अरे वाह, किसी का भी पता नहीं।”

“जूली, जूली।” डॉली ने पुकारा।

“बेबी, खाना मेज पर लगा है। जिस चीज की जरूरत हो बता देना।”

“अंकल और मम्मी कहां है?”

“वे अपने-अपने कमरे में खाना खायेंगे।”

“क्यों?”

“आप लोग खाइए। खाना ठंडा हो रहा है।”

“अरे जूली।” कृष्ण ने ऊंची आवाज में कहा, “जरा फ्रिज से बर्फ निकालकर दे जाओ।”

“पानी फ्रिज का ही है।”

“भई, स्कॉच में बर्फ मिलाए बिना मजा नहीं आता।”

दूसरी ओर खामोशी छा गई। जूली ने कोई उत्तर नहीं दिया।

कृष्ण ने स्कॉच की बोतल खोली। पहले अपने लिए एक गिलास में उंडेली और होंठों पर जीभ फेरते हुए हाथ मलकर बोला- “आज पूरे दस साल के बाद चखने को मिलेगी।”

“दस साल बाद क्यों डैडी?”

“बच्चों, यह बड़े आदमियों के पीने की चीज है। क्या तुम्हारी मम्मी ने तुम्हें कभी नहीं पिलाई?”

“नहीं।”

“कमाल है। खुद तो चार-चार पैग पी जाती थी। खैर कोई बात नहीं। आज हम अपने हाथों से अपने बच्चों को पहला पैग पिलाएंगे।”

फिर उसने डॉली और दीपू के लिए भी दो गिलासों में उड़ेल दी।

गिलासों में स्प्रिट जैसी गन्ध उठी तो डॉली और दीपू ने बुरा-सा मुंह बना लिया।

“बेटी, इस गन्ध को बरदाश्त करना ही बहादुरी है। जो लोग इसे नहीं पीते, वे कभी बड़े आदमी नहीं बन सकते।”

तभी महेश और सुषमा वहां पहुंच गए।

महेश ने बड़े शान्त भाव से मुस्कराते हुए कहा- “हां बेटी डॉली, तुम्हारे डैडी भी यही पी-पीकर इतने बड़े आदमी बन गए थे कि इन्हें दस वर्ष तक तुमसे अलग रहना पड़े।”

कृष्ण चौंक पड़ा।

महेश और सुषमा कुर्सियां खींचकर बैठ गए।

डॉली ने खुशी से उछलकर कहा, “आहा मम्मी! अंकल! आप दोनों भी हमारे साथ खाना खायेंगे?”

“हां बेटी, मां के दूध पिलाने और बाप के दूध पिलाने में बहुत अन्तर होता है। आज से तुम मेरे सामने ही खाना खाया करोगे।” सुषमा बोली।

“जूली और दर्शन दो डिशेज लेकर अन्दर आ गए।

महेश डॉली और दीपू के सामने से दोनों गिलास उठा लिए और दर्शन को देकर कहा, “दर्शन, इन्हें तोड़कर फेंक दो।”

दर्शन गिलास लेकर जाने लगा तो कृष्ण ने कहा, “ठहर जा बे।”

लेकिन दर्शन नहीं रुका। और जूली ने कृष्ण के मुड़ते ही उसके आगे से गिलास और बोतल उठा ली।

कृष्ण ने गुस्से से कहा, “अरे, अरे यह क्या करती है!”

“आपके कमरे में रखने जा रही हूं। इस मेज पर आपके जाने के बाद आज तक किसी ने शराब नहीं पी और न ही कभी कोई पियेगा।”

कृष्ण होंठ काटता रह गया।

जूली चली गई।

सुषमा और महेश खाना निकालने लगे तो कृष्ण ने डॉली और दीपू की ओर देखकर पूछा, “बच्चों, इस घर के मालिक नौकर लोग हैं या तुम्हारे डैडी?”

“मम्मी, इस घर का मालिक कौन है?” डॉली ने सुषमा से पूछा।

सुषमा ने गम्भीरता से कहा, “बेटी, खाना खाते समय बातें नहीं करते। चुपचाप खाना खाओ।”

डॉली और दीपू कृष्ण की ओर देखने लगे।

कृष्ण ने महेश की ओर देखते हुए कहा-

“डॉली बेटी- दीपू बेटे, जिस मेज पर हमारा नौकर खाना खा रहा हो, हम उस मेज पर खाना नहीं खा सकते।”

“कौन नौकर?”

“मिस्टर महेश।”

“लेकिन मम्मी ने तो बताया था कि यह आपके पुराने दोस्त हैं।”

“मम्मी से सौगन्ध लेकर पूछो कि मिस्टर महेश तुम्हारे डैडी के दोस्त हैं या मम्मी के।”

और फिर वह तेजी से उठकर चला गया।

डॉली और दीपू हक्के-बक्के से उन दोनों की ओर देखते रह गए।

सुषमा ने कहा, “बच्चो, तुम लोग खाना खाओ।”

“नहीं।” वे दोनों उठकर खड़े हो गए, “जब तक हमारे डैडी खाना नहीं खायेंगे, हम लोग भी नहीं खायेंगे।”

और फिर वे दोनों बाहर निकल गए।

सुषमा की आंखें भर आईं।

डॉली और दीपू कृष्ण के कमरे में पहुंचे तो वह गिलास में व्हिस्की उडेलकर इस तरह पी रहा था, जैसे शर्बत पी रहा हो।

“डैडी, आप खाना छोड़कर क्यों चले आए?” दीपू और डॉली ने पूछा।

“मैंने कहा था ना कि यहां मेरा नौकर।”

“फिर मम्मी ने हमसे झूठ क्यों बोला था कि महेश अंकल आपके दोस्त हैं और आपका स्वर्गवास हो चुका है।”

“इस सारे झगड़े फसाद का जड़ तुम्हारा अंकल महेश ही है। अगर यह न होता तो तुम्हारी मम्मी मुझे तलाक न लेती। आज भी तुम लोग देखते ही इस घर में तुम लोगों की नहीं चलती महेश की चलता है क्योंकि वह तुम्हारी मम्मी से और तुम्हारी मम्मी उससे प्यार करती है।”

तभी महेश ने दहाड़कर कहा, “कृष्ण!”

कृष्ण लड़खड़ाकर दरवाजे की ओर मुड़ा। दरवाजे के पास ही सुषमा भी खड़ी थी।

सुषमा ने आगे बढ़कर भर्राई आवाज में कहा-

“किस जन्म का बदला ले रहे हो मुझसे? क्या बिगाड़ा है मैंने तुम्हारा? इस मासूम बच्चो का दिमाग क्यों खराब कर रहे हो?”

“सुन-लिया-बच्चों-तुमने।” कृष्ण बच्चों की ओर मुड़कर बोला, “अब तुम्हारे सामने तुम्हारा महेश अंकल भी खड़ा अपनी-मम्मी से कहो तुम्हारे सिर पर हाथ रखकर सौगंध खाकर कहे कि वह महेश को प्यार नहीं करतीं।’

“कृष्ण!” सुषमा की आवाज कांप उठी।

डॉली और दीपू के चेहरे क्रोध से लाल हो गए थे।

कृष्ण के सीने पर हाथ मारकर कहा-

“हां यही गम है मेरे सीने में जो आग बन कर दहक रहा है मेरा घर उजाड़ने वाला यह महेश है। तुम लोगों को दस साल तक मुझसे दूर रखने वाला यह महेश है। मेरे पीछे घर में घुस आने वाला तुम्हारी मां की दौलत के स्याह सफेद का मालिक महेश है तुम्हारी मां के साथ छिप छिपकर रातों को रंगरेलियां मानने वाला!”

“कृष्ण!”

महेश इतनी जोर से दहाड़ा कि उसकी आवाज फट गई। उसने झपटकर कृष्ण गिरेबान पकड़ लिया-

“अगर आगे तेरी जबान से एक भी शब्द निकला तो जबान काट दूंगा।”

“देख लिया- तुमने-बच्चो? सच्ची बात कितनी बुरी लगी।”

“हां, यह सच है।” डॉली गुस्से से हांफती हुई बोली, “मैंने देखा था। आप मम्मी के बेडरूम की खिड़की के पास खड़े छिप-छिपकर मम्मी से बातें कर रहे थे।”

“मैंने भी देखा था।” दीपू गुस्से से बोला, “डैडी को जहरीला सांप कहा जा रहा था।

महेश सन्नाटे में रह गया।

“डॉली, दीपू।” सुषमा चिल्लाई।

“आप हमें झुठला नहीं सकतीं मम्मी। हमें डैडी से दस साल तक अलग रखने वाले महेश अंकल हैं। अब या तो इस घर में यह रहेंगे या हम और डैडी रहेंगे।”

महेश ने धीरे से कृष्ण को गिरेबान छोड़ दिया।

कृष्ण लड़खड़ाते हुए मुस्कराकर बोला-

“सुन लिया महेश?”

और फिर उसने तड़ाक से एक चांटा उसके मुंह पर मारा।

“कृष्ण!” सुषमा चीख उठी।

“कैसी चोट लगी दिल को।” कृष्ण ने दूसरा चांटा मारा। “इसने मुझे-बच्चों के स्कूल के बाहर भरी सड़क पर मारा था। तब-मेरे बच्चे-इतने मेरे नहीं थे जितने आज हैं।”

फिर वह तड़ातड़ महेश को मारता हुआ बाहर तक ले गया। सुषमा चिल्लाती रह गई-

कृष्ण ने दरवाजे की ओर हाथ उठाकर कहा-

“निकल जा हमारे घर से-!”

महेश कुछ न बोला। वह चुपचाप कपड़े झाड़कर खून पोंछने लगा। फिर उसने सुषमा की ओर देखकर से कहा-

“बहुत हो चुका सुषमा-अब मैं तुम्हें इस नरक में किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हूं।”

“हां, मैं भी इस नरक में नहीं रहूंगी। अभी चलती हूं तुम्हारे साथ।” सुषमा ने क्रोध और दुखभरे स्वर में कहा।

“क्या?” कृष्ण ने आश्चर्य से कहा,” तुम अपने बच्चों को छोड़कर चली जाओगी?”

“बच्चे तेरे हैं मेरे नहीं। तेरा उद्देश्य पूरा हो गया। और क्या चाहिए तुझे।”

“मम्मी!” डॉली और दीपू ने आश्चर्य से कहा।

“अपनी इस गन्दी जबान से मुझे मम्मी मत कहो, “सुषमा हांफती हुई बोली, “इसी घड़ी के लिए तो मैंने तुम लोगों को इतने ऐशो-आराम से पाला था। इतना प्यार दिया था कि शायद किसी मां ने न दिया होगा। केवल तुम्हारा भविष्य बनाने के लिए मैंने बुढ़ापे में भी खुद को जवान रखने की कोशिश की। लेकिन मेरे त्याग और बलिदान का तुम लोगों ने आज खूब बदला दिया है। जिस बाप के लिए तुमने देवता जैसे अंकल को ठुकरा दिया है उसका अपमान किया है वह बाप तुम्हें कितना सुख देगा, यह तुम्हें कल पता चल जायेगा।”

“फिर वह तेजी से अन्दर चली गई। उसने एक अटैची में कुछ कपड़े और जरूरी कागजात रखे और महेश के साथ फ्लैट से निकल गई।

जब वे दोनों चले गए तो कृष्ण ने दोनों बच्चों की ओर देखा। उन दोनों की आंखों में आंसू थे।

“अरे, तुम लोग उस मां के लिए रो रहे हो जिसने अपने मालिक के लिए तुम्हें ठुकरा दिया। मेरे बच्चो, अब देखना मैं किस तरह तुम्हें मां और बाप दोनों का प्यार देता हूं।”

“डैडी!” दोनों कृष्ण से लिपट गए।

कृष्ण दोनों को थपथपाने लगा।

तभी उसने जूली और दर्शन को जाते हुए देखा। उसके होंठों पर विजेता जैसी मुस्कान दौड़ गई।

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कृष्ण बड़ी शान से कार से उतरा और ऑफिस के गेट में घुसने लगा। तभी उसकी नजर प्रदीप पर पड़ी। वह चौंककर बोला-“अरे प्रदीप!”

“अरे-” प्रदीप कृष्ण को देखकर चौंक पड़ा, “छोटे जीजाजी आप-!”

“तुम यहां, हां प्रदीप?”

“जी, मैं तो इस कम्पनी में असिस्टेन्ट मैनेजर हूं।”

“अच्छा आओ।” कृष्ण ने बड़े घमंड से कहा।

“लेकिन आप, आप यहां कैसे?”

“शायद तुम्हें पता नहीं महेश यहां मैनेजर था।”

“जी हां। मालूम है।”

“आज से हम तुम्हें मैनेजर बनाते हैं।”

“क्या मतलब?”

“शायद तुम्हें पता नहीं। डॉली और दीपू मेरे बच्चों के नाम हैं, जो इस कम्पनी के मालिक हैं। और जिस कम्पनी के मालिक मेरे बच्चे हैं, मैं भी उस कम्पनी का मालिक हूं।”

“यानी आप और छोटी दीदी-?”

“नहीं,” कृष्ण ने बुरा-सा मुंह बनाकर कहा, “तुम तो जानते ही हो कि उसका करेक्टर शुरू से ही खराब था। वह मुझे और बच्चों को छोड़कर अब महेश के साथ रहने लगी हैं इसलिए मैंने महेश को निकाल दिया है।”

“बस कीजिए जीजाजी। सुषमा का जिक्र अब किसी के सामने मत कीजिएगा। उसका नाम सुनकर शर्म से हमारी नजरें झुक जाती हैं। भगवान के लिए यहां किसी को यह न बतलाइएगा कि वह मेरी बहन है।”

“नहीं-नहीं। इत्मीनान रखो।”

दोनों बातें करते हुए ऊपर पहुंच गए।

बॉस के रूम का दरवाजा खोलकर जैसे ही कृष्ण अंदर पहुंचा भौंचक्का-सा रह गया। सामने बॉस की कुर्सी पर महेश बैठा किसी को फोन कर रहा था।

कृष्ण ने गुस्से से कहा- “यह क्या बदतमीजी है? तुम्हें अंदर किसने घुसने दिया?”

महेश ने इत्मीनान से रिसीवर रखा और मुस्कराकर पास ही बैठे हुए वकील की ओर देखते हुए बोला, “वकील साहब, जरा इन्हें समझाइए।”

“अच्छा तो आप हैं मिस्टर कृष्ण कुमार सक्सेना।” ‘डॉली-दीप बिल्डर्स’ की बुनियाद सुषमा देवी की दौलत पर रखी गई थी। अब उन्होंने इस फर्म का नाम बदल दिया है। और फर्म अपने नाम वापस करा ली है। और इस फर्म के कर्त्ता-धर्त्ता मिस्टर महेश ही रहेंगे।”

कृष्ण को ऐसा लगा, जैसे उसके पैरों तले से जमीन ही निकल गई हो। फिर उसने कहा- “लेकिन यह कैसे हो सकता है?”

“कानून की किताबों में ऐसा ही लिखा है।” महेश ने मुस्कराकर कहा। फिर उसने घंटी पर हाथ मारा और जैसे ही चपरासी अंदर आया महेश ने उससे कहा- “साहब को बाहर का रास्ता दिखाओ।”

कृष्ण दांत पीसता हुआ चला गया।

प्रदीप आश्चर्य में डूब सब-कुछ सुन रहा था।

वकील के जाने के बाद उसने अंदर आकर कहा-

“महेश बाबू, क्या यह बात सही है कि इस फर्म की मालिक-?”

“तुम्हारी दीदी सुषमा देवी है,” महेश ने इत्मीनान से कहा, “कुछ दिनों पहले ही वह मॉडल गर्ल के व्यवसाय से अलग होने की घोषणा कर चुकी हैं। उन्होंने बच्चों के नाम से यह फर्म स्थापित की थी। उन्होंने ही तुम्हें उस दिन उस हालत में देखकर तुम्हारे बारे में मुझे बताया था। मैंने तुम्हें ऊपर बुलाया था, उस समय वह बराबर वाले कमरे में बैठी थीं। उन्हीं के कहने पर मैंने तुम्हारे, संध्या और रजनी के परिवार के बारे में पूछताछ की थी। उन्हीं के कहने पर मैंने तुम्हें असिस्टेंट मैनेजर बनाया था। रहने के लिए अपना फ्लैट दिया था। और अगली बिल्डिंग में तुम्हारे लिए फ्लैट बुक कर दिया था।

“उन्हीं के कहने पर मैंने संध्या के इलाज के लिए मनाली सेनीटोरियम भिजवाया था। वही उनके इलाज का सारा खर्च भेजती हैं। उन्हीं के कहने पर रजनी के पति शंकर को बीमा कम्पनी से मुकदमा लड़ने के लिए दस हजार रुपये दिए थे। आज भगवान की दया से शंकर ने फिर से अपनी दुकान खोल ली है। उन्हीं को एक दिन संध्या का पति प्रकाश शराब पीकर जख्मी हालत में पड़ा मिला था। जिसे कोई ट्रक रौंदकर चला गया था।

आजकल वही उसका इलाज करा रही हैं।

प्रदीप सन्नाटे में डूबा खड़ा था।

महेश ने ठंडी सांस लेकर कहा-

“अपने पिता को बचाने के लिए वह कृष्ण के हाथों पहली बार बिकी थीं। कृष्ण ने शादी करके उन्हें छोड़ दिया और जब वह समुद्र में कूदकर मरने वाली थीं- मैंने उन्हें नया जीवन दिया। उन्हें बचाकर लाया। और जब मैं उनकी मांग में सिन्दूर भरने वाला था तो कृष्ण पुलिस की सहायता से उन्हें ले गया। क्योंकि उसने अपनी स्कीम बदल दी थी।”

सुषमा ने पतिव्रता पत्नी के रूप में घर में रहना चाहा लेकिन कृष्ण ने ऊपर दस लाख रुपये के गबन के इल्जाम में केस चलने का नाटक रच कर उन्हें दोबारा मॉडल गर्ल बनने पर मजबूर कर दिया। अपने पति को पांच साल की कैद से बचाने के लिए वह फिर मॉडल गर्ल बनी और कृष्ण ने तुम्हें उल्टा बताया। यह सच्चाई सुषमा को उस दिन मालूम हुई जब वह तुम्हें राखी बांधने गई थी। उससे पहले ही कारोबार के बहाने कृष्ण उनसे पांच लाख रुपये और ले चुका था।

पन्द्रह लाख रुपये झूठ बोलकर सुषमा से लेने के बाद उसने दो हजार रुपये माहवार पर मालाबार हिल पर एक बंगला किराए पर ले लिया और एक सोसायटी गर्ल के साथ ऐय्याशी करने लगा। उसने बताया कि वह हर शनिवार को दिल्ली से आता है और हर सोमवार को चला जाता है। लेकिन जो लड़की उसके साथ रहती थी सुषमा से उसकी मुलाकात हो गई और उसने सारी बातें सुषमा को बता दीं।

सुषमा जब उस लड़की से मिलकर घर लौटी तो कृष्ण दस-ग्यारह साल की जूली की आबरू लूटने की कोशिश कर रहा था। और उसकी बच्ची डॉली सामने खड़ी दहाड़े मार-मार कर रो रही थी। सुषमा ने उसे अपने बच्चों के भविष्य के लिए खतरनाक समझकर उससे तलाक ले लिया। कृष्ण ने इसी बात पर गुस्से में आकर रूबी को मार डाला जिसने कि उसकी वास्तविकता सुषमा को बता दी थी। जेल जाते-जाते उसने सुषमा को भी मारने की धमकी दी थी।

अब दस वर्ष के बाद कृष्ण जेल से निकला है। लेकिन सुषमा की दौलत देखकर उसकी आंखें फट गईं। उसने सुषमा को मार डालने का इरादा छोड़ दिया और बच्चों के मासूम दिमागों पर कब्जा कर लिया। अब वह बाप बनने का दम भर रहा है और इसीलिए मुझे रात सुषमा को लेकर घर से निकलना पड़ा।

“लेकिन कृष्ण तो कह रहा था कि अब वह आपके साथ!”

“चुप रहो प्रदीप, तुम सुषमा के भाई हो। तुम्हारी जुबान से ऐसे शब्द भी शोभा नहीं देते। तुमने आज तक सुषमा के वास्तविक रूप ही नहीं पहचाना। वह प्रेम, त्याग, और बलिदान का सागर है, जिसमें से तुम चाहे जितना पानी निकाल लो वह, कभी सूखेगा नहीं।”

महेश ने जेब से सिन्दूर की डिबिया और एक मंगल-सूत्र निकाला और प्रदीप को दिखाते हुए बोला-

“यह देखो प्रदीप, मेरा और सुषमा का वर्षों का सपना। जब हम कॉलेज में पढ़ रहे थे। हम एक दूसरे को प्यार करते थे। लेकिन वह बड़ी बहनों से पहले अपनी शादी करना नहीं चाहती थी। मेरी मां को कैंसर था। वह बहू को देखने के लिए तड़प रही थी। हम दोनों ने तय किया था कि महालक्ष्मी के मन्दिर में शादी करके मां को खुश कर देंगे। लेकिन सुहागरात तब मनायेंगे जब सचमुच विदा करा के उसे ले जाऊंगा।”

जिस रात मैं यह डिबिया और मंगलसूत्र लेकर महालक्ष्मी मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा सुषमा की राह देख रहा था। उसी रात तुम्हारे बाबूजी ने संध्या और रजनी की शादी के लिए सुषमा को बीस हजार रुपये का चैक लेने के लिए प्रेम के पास भेजा था।”

महेश एक पल रुका और फिर बोला-

“और उस दिन से यह सिन्दूर इसी तरह इस डिबिया में रखा है, मंगलसूत्र रखा है। भगवान जानता है कि आज भी हम दोनों के बीच उतने ही दूरी जितनी नदी के दो किनारों के बीच। अगर वह चाहतीं तो कृष्ण से तलाक लेने के बाद ही मेरे साथ शादी कर सकती थीं। लेकिन उन्होंने जिस तरह अपने परिवार के सुख के लिए अपनी खुशी का बलिदान किया था, उसी तरह अपने बच्चों के लिए अपने सुख की बलि दे दी।

“वह बहुत थक चुकी थीं। बच्चे बहुत छोटे थे। उन्हें एक सहारे की जरूरत थी। और कृष्ण के जेल से छूटने के बाद एक संरक्षक की भी संयोग से मैं वर्षों के बाद मिल गया। उन्होंने अपना काम छोड़ दिया और इस फर्म की स्थापना की। मेरे कहने पर ही यह फर्म स्थापित की गई थी मैं ही इसका काम देख रहा हूं।”

“इन तमाम सच्चाइयों के जानने के बाद भी अगर कोई सुषमा गलत समझता है तो वह उसे क्षमा कर देगी। क्योंकि क्षमा करना उसका स्वभाव बन गया है। लेकिन उसे भगवान कभी क्षमा नहीं करेंगे।”

प्रदीप खामोश बैठा रहा। उसकी आंखों में गहरा आश्चर्य था।

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कृष्ण का मूड सुबह से ही बहुत खराब था। वह गुस्से से भिन्नाया चक्कर काट रहा था। बच्चे अभी-अभी स्कूल से लौटे थे। उनके चेहरे लटके हुए थे।

कृष्ण ने उन्हें उदास देखकर पूछा-

“क्यों? तुम लोगों को क्या हुआ?”

“डैडी, आज हम दोनों की क्लास में प्रिंसिपल साहब ने नोटिस भिजवाया था कि अब हम दोनों की फीस मम्मी नहीं दिया करेंगी, आपको देनी पड़ेगी।”

“क्या?” कृष्ण उछल पड़ा।

अभी वह कुछ कहने भी न पाया था कि अचानक दरवाजे की घंटी बज उठी। उसने आगे बढ़कर दरवाजा खोल दिया और फिर एकदम झिझककर पीछे हट गया।

वकील ने अंदर आते हुए कहा-

“क्षमा कीजिए मिस्टर कृष्ण, मैं कोर्ट के इन आदमियों और पुलिस के साथ आप को इस फ्लैट से निकालने के लिए आया हूं। क्योंकि इस फ्लैट की मालिक श्रीमती सुषमा देवी हैं। और आपने इस पर नाजायज कब्जा कर रखा है।”

“क्या? मैंने नाजायज कब्जा कर रखा है? ये सुषमा के बच्चे यहां रह रहे हैं।”

“श्रीमती सुषमा का कहना है कि बच्चे बालिग हो जाने के बाद ही अपनी इच्छा से मां या बाप के पास रहते हैं। लेकिन वह अभी से बच्चो को आप के सुपुर्द करने के लिए तैयार हैं। आप बच्चों को लेकर जहां इच्छा हो जा सकते हैं।”

“मैं...मैं बच्चों को लेकर कहां जाऊं?”

“यह तो आप जानें।” वकील ने घड़ी देखकर कहा, “आप पन्द्रह मिनट के अंदर फ्लैट खाली कर दीजिए।”

“ठ-ठ-ठीक है। देखता हूं, कब तक बच्चों के बिना रहेगी। चलो बच्चो, अपना-अपना सामान ले जाकर गाड़ियों में रखो।”

“जी नहीं। आपके बच्चे यहां से कोई गाड़ी नहीं ले जा सकते। क्योंकि गाड़ियां श्रीमती सुषमा की प्रॉपर्टी हैं। बच्चे केवल अपने स्कूल की किताबें और यूनिफार्म ले जा सकते हैं। आज जो सूट पहने हुए हैं उसी को पहने-पहने जा सकते हैं।”

“उफ्फोह, इतनी जालिम मां मैंने आज तक नहीं देखी।”

“डैडी।” डॉली फौरन चलिए।” दीपू बोला।

“हां हां चलो-चलो।”।

थोड़ी देर बाद वे तीनों फ्लैट से बाहर आ गए। डॉली और दीपू ने पलटकर फ्लैट की ओर देखा। उनकी आंखें भर आईं।

कृष्ण ने कहा, “देखो बच्चों, तुम मेरे साथ चल तो रहे हो लेकिन एक बाद याद रखना।”

“वह क्या?”

“तुम्हें अपनी मां की याद तो नहीं आएगी?”

“बिल्कुल नहीं।”

“घर तो याद नहीं आएगा?”

“कभी नहीं।”

“अच्छी तरह सोच-समझ लो।”

“चलिए, सोच लिया।”

“तो फिर चलो।”

तीनों चल पड़े। कृष्ण बड़बड़ा रहा था। डॉली और दीपू सिसकते जा रहे थे।

कृष्ण ने अपना बटुआ खोलकर देखा। उसमें लगभग दो हजार रुपये थे।

वह सोचने लगा, यह क्या हुआ? दांव ही उल्टा पड़ गया। मैंने तो सोचा था कि बच्चों के जरिए घर पर कब्जा कर लूंगा। लेकिन ये तो बच्चे ही उल्टे गले पड़ गए। मैं इन्हें कहां-कहां लिए फिरूंगा? जेब में कुल दो हजार रुपए हैं। हो सकता है, दो-चार दिन के बाद सुषमा को बच्चों की याद आ जाए। तब तक तो बच्चों का दिल हाथों में रखना ही चाहिए। सुषमा ज्यादा दिन अपने बच्चों से दूर नहीं रह सकती। वह बच्चों को वापस बुलाएगी तो मुझे भी उसे अपने साथ रखना पड़ेगा। और स्थायी रूप से रखना पड़ेगा।

तभी डॉली ने सिसकते हुए कहा, “डैडी, मुझसे पैदल नहीं चला जा रहा।”

“मुझसे भी नहीं।”

“अरे, मैं तो भूल ही गया था। भला मैं अपने बच्चों को पैदल चलते देख सकता हूं। मैं अभी टैक्सी लाता हूं।”

“लेकिन हम लोग जायेंगे कहां?”

“जब तक रहने का कोई स्थायी प्रबन्ध नहीं हो जाता हम लोग ओरिएन्टल पैलेस होटल में रहेंगे।”

तभी एक खाली टैक्सी आ गई। वे तीनों टैक्सी में बैठकर होटल की ओर चल दिए।

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रात के बाहर बज चुके थे।

डॉली और दीपू को न जाने क्यों नींद नहीं आ रही थी।

अचानक दरवाजा खुला और शराब के नशे में धुत्त कृष्ण एक लड़की के साथ अन्दर आ गया। वह लड़की की कमर में हाथ डाले लड़खड़ाते कदमों से आ रहा था। वह दीपू और डॉली को जागते देखकर एक पल ठिठका और फिर लड़की से अलग हो गया।

“अरे, अभी तक तुम लोग सोए नहीं?”

“डर लग रहा था डैडी।”

“खैर, अब सो जाओ।”

“हमने अभी तक खाना भी नहीं खाया डैडी।”

“अब तो आधी रात बीत चुकी है। इस वक्त खाना कहां मिलेगा। मैंने क्या मना किया था। चलो अब सो जाओ। सुबह डटकर नाश्ता कर लेना।”

दोनों बच्चे लड़की की ओर देखने लगे।

कृष्ण ने जल्दी से कहा, “यह तुम्हारी आण्टी है। मेरे एक मित्र की मिसेज। आज यह यहीं रहेंगी इसलिए तुम दोनों को नीचे फर्श पर सोना पड़ेगा।”

दोनों बच्चे सहमे-सहमे से पलंग से उतरकर फर्श पर बिछे कालीन पर लेट गए।

कृष्ण ने बत्ती बुझा दी। काफी देर तक दोनों को सो जाने के लिए कहता रहा।

कुछ देर बाद बच्चों ने बोलना बन्द कर दिया तो कृष्ण ने लड़की को खींचकर चिपटा लिया।

“अरे रे-ये बच्चे?”

“सो गए साले। मुफ्त की बला गले पड़ गई।”

“दूसरा कमरा ले लेना था।”

“क्या जरूरत थी फालतू खर्च करने की।”

दीपू और डॉली उन दोनों की बातें सुनते रहे। दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

दीपू ने डॉली के कान में कहा, “दीदी मैं बाथरूम जाऊंगा।”

“श-श-चुपचाप लेटे रहो।”

लेकिन दीपू बर्दाशत नहीं कर पाया। उसने उठकर बत्ती जला दी।

और डॉली के हलक से चीख निकल गई। अचानक ही उसे बचपन की घटना याद आ गई। ठीक इसी तरह कृष्ण ने जूली को जबर्दस्ती गिरा लिया था। और-

कृष्ण फुर्ती से चादर लपेटकर उठ खड़ा हुआ। लड़की ने भी जल्दी से चादर लपेट ली।

कृष्ण तेजी से आगे बढ़ा और दीपू के गाल पर एक जोरदार तमाचा मारकर गुर्राया, “उल्लू के पट्ठे, किसने कहा था तुमसे बत्ती जलाने को?”

“दीदी-!” दीपू चीख मारकर डॉली से लिपट गया और बिलख-बिलखकर रोने लगा।

डॉली ने उसे अपनी बांहो में भर लिया। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसका समूचा बदन भय से थरथर कांप रहा था।

29

अचानक सुषमा ने एक जोरदार चीख मारी, “दीपू! डॉली! मेरे बच्चे।”

फिर वह हड़बड़ाकर उठ बैठी। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। सांस तेज-तेज चल रही थी। आंखें फटी हुई थीं।

जूली दौड़ती हुई बेडरूम में आ गई। उसने घबराकर पूछा, “मेम साहब क्या हुआ?”

“जूली, महेश बाबू कहां हैं?” सुषमा ने थरथर कांपते हुए पूछा।

तभी महेश गाउन की डोरी कसता हुआ वहां पहुंच गया।

“क्या हुआ सुषमा?”

“महेश।” सुषमा ने बेचैनी से कहा, “मैंने बहुत ही भयानक सपना देखा है। वह दुष्ट डॉली और दीपू को मार रहा है।”

“सपनों की बातें कहीं सच होती हैं सुषमा?” महेश ने समझाया।

“मेरा तो दिल बैठा जा रहा है।”

“बेकार घबरा रही हो। मेरे पास एक-एक मिनट की रिपोर्ट हैं। वह बच्चों को लेकर सीधा ओरिएन्टल पैलेस होटल में गया था। उसने एक कमरा किराए पर लिया था। तब से बच्चे कमरे से बाहर नहीं निकले हैं। दर्शन बराबर होटल की निगरानी कर रहा है। कृष्ण की जेब में कुल दो हजार रुपए हैं। दो-चार दिन में खत्म हो जायेंगे। और जब रुपए खत्म हो जायेंगे वह बच्चों को छोड़कर भाग जाएगा। अभी तो वह तुम्हारी ममता की परीक्षा ले रहा है। अब तुम्हें अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपने ऊपर काबू रखना है। कम-से-कम बच्चों के मासूम दिलों में से यह बात निकालनी है कि उन्हें बाप का प्यार बच्चों तक खींचकर लाया है। इसके लिए अगर बच्चों को थोड़ी सी तकलीफ भी उठानी पड़े तो तुम्हें बर्दाश्त करनी होगी।”

“लेकिन मैं डर रही हूं कि कहीं वह मेरे बच्चों के साथ कोई ज्यादती न करे।”

“क्या ज्यादती करेगा? उनसे मेहनत-मजदूरी या नौकरी तो कराने से रहा। अगर वास्तव में बच्चों के लिए उसके दिल में प्यार होता तो वह उन्हें होटल के बजाए किसी छोटी जगह में ले जाता। और जो रुपए उसके पास थे उनसे कोई छोटा-मोटा धन्धा करने की कोशिश करता।”

सुषमा कुछ न बोली। भय से उसकी आंखें फैली हुई थीं।

महेश ने कहा, “डरो मत सुषमा। कोई ऐसी-वैसी बात होती तो दर्शन हमें फौरन खबर कर देता। अब आराम से सो जाओ।”

सुषमा धीरे से लेट गई। महेश ने जूली से कहा कि वह सुषमा के पास ही रहे।

सुषमा की आंखें अब भी शून्य में घूर रही थीं। उसकी आंखों के सामने रह-रहकर दीपू और डॉली के मासूम चेहरे घूम रहे थे और बार-बार उसका दिल भर आता था।

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डॉली और दीपू के चेहरे भय से पीले पड़ गए थे। उन्होंने कसकर आंखें बन्द कर रखी थीं। मगर आंखों से नींद कोसों दूर थी। उनके बदन थरथर कांप रहे थे। कमरे में गहरा अंधेरा छाया हुआ था।

काफी देर बाद जब उन दोनों के कानों से कृष्ण और उस लड़की की तेज-तेज सांसें टकरायीं तो डॉली ने चुपके से दीपे के कान में धीरे से कहा- “दीपू!”

“हां दीदी।” दीपू ने कांपती हुई आवाज में कहा।

“चलो-यहां से निकल चलें।”

“चलो दीदी।”

दोनों बहुत धीरे से उठ गए। डॉली ने झांककर देखा.... कृष्ण और वह लड़की बेसुध सोए पड़े थे। डॉली और दीपू चुपचाप धीरे-धीरे घुटनों के बल दरवाजे की ओर सरकने लगे। दरवाजे के पास पहुंचकर उन दोनों ने पलट कर देखा। डॉली ने बहुत धीरे से कांपते हाथों से दरवाजा खोला और फिर दीपू का हाथ पकड़कर बाहर निकल गई। डॉली ने चुपके से दरवाजा बंद कर दिया। और फिर दोनों एक-दूसरे का हाथ थामकर तेजी से सीढ़ियों की ओर चल दिए।

जब वे नीचे पहुंचे तो काउन्टर क्लर्क अपनी कुर्सी पर बैठा ऊंघ रहा था। वे तेजी से बाहर निकल आये और मेन गेट के बजाय दूसरी ओर चल दिए।

बाउन्ड्री वॉल के पास पहुंचकर पहले डॉली ने दीपू को मुंडेर पर चढ़ा दिया और फिर उचक कर खुद भी चढ़ गई। और फिर दोनों पीछे की ओर कूद गए।

सड़क पर पहुंचकर दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर तेजी से भागने लगे। वे बार-बार पलटकर भयभीत नजरों से पीछे की ओर भी देखने जाते थे।

होटल की मेन रोड के सामने भिखारी के वेश में दर्शन बैठा ऊंघ रहा था। वह पूर्ववत् ऊंघता ही रहा। उसे पता भी न चल सका कि बच्चे कब और किधर से निकल गए।

काफी दूर तक दौड़ने के बाद वे रुक गए। उन्होंने गश्त करने वाले कांस्टेबलों को आते देखा। वे जल्दी से अंधेरे में छिप गए और जब कांस्टेबल चले गए तो डॉली ने हांफते हुए कहा- “अब चलो दीपू भैया।”

“मुझसे अब नहीं चला जाता दीदी।”

दोनों एक तख्ते पर बैठ कर सुस्ताने लगे।

दीपू ने हांफते हुए कहा- “दीदी, मम्मी के पास चलो।”

“मम्मी के पास? क्या अब मम्मी हमें घर में घुसने देंगी?” डॉली रो पड़ी।

“जरूर घुसने देंगी। हमारी मम्मी बहुत अच्छी हैं दीदी।’

“ठीक कहते हो भैया।” डॉली रोती हुई बोली- “हमारी मम्मी बहुत अच्छी हैं। उन्होंने हमें आज तक कभी नहीं मारा। न कभी नाराज हुई। कितने प्यार से रखती थीं हमें। कितने ढेर सारे कपड़े थे हमारे पास। मेरे लिए कार ले कर दी थी। तुम्हें स्कूटर खरीदकर दिया था। हमें घुमाने-फिराने ले जाती थीं। लेकिन हम डैडी की बातें में आ गए और उनके साथ चले आए। डैडी ने हमें रात-भर भूखा रखा। मेरे गले की सोने की चैन और तुम्हारी अंगूठी बेच डाली। जिस दिन से होटल में लाए थे बाहर नहीं निकलने दिया। स्कूल नहीं भेजा। और आज जिस लड़की को लेकर आए थे, वह आंटी नहीं थी।”

“फिर कौन थी?” दीपू ने मासूमियत से पूछा।

“कोई बदमाश लड़की थी। उसे देखकर मुझे याद आ गया कि जब डैडी इसी तरह जूली को गिरा रहे थे तो जूली चिल्ला रही थी। तभी मम्मी आ गई थीं। और मम्मी ने पिस्तौल दिखाकर डैडी को कुर्सी से बंधवा दिया था। मुझे बस थोड़ा-सा याद है।”

“डैडी ऐसा क्यों करते हैं?”

“पता नहीं। एक बार मेरे स्कूल के एक लड़के ने मेरे साथ भी ऐसा ही करना चाहा था। लेकिन मम्मी ने जिस तरह उसकी नीयत मुझे समझाई थी। तुम समझ नहीं सकते। क्योंकि तुम अभी बहुत छोटे हो। अब मेरी समझ में आता है कि मम्मी सचमुच बहुत अच्छी हैं। डैडी अच्छे नहीं हैं। जैसा वह कर रहे थे, वैसा तो बदमाश लोग ही किया करते हैं। तुम्हें याद है, जब डैडी स्कूल में हमें मिले थे। भिखारी जैसे लगते थे।”

“हां।”

“घर पहुंचते ही उन्होंने कपड़ों के लिए दस हजार रुपए लिए। कपड़ों के साथ-साथ शराब भी खरीद लाए और हम दोनों को पिलाने की कोशिश की। जैसे वह खुद पिए हुए थे और वह लड़की भी पिए हुए थी।”

“हां।”

“दीपू मम्मी ने कभी शराब नहीं पी। महेश अंकल ने भी कभी शराब नहीं पी।”

“हां दीदी।”

“दीपू, डैडी हमसे प्यार नहीं करते। उन्हें अच्छे कपड़े, शराब और बदमाश औरतों की जरूरत थी। बस इसलिए हमारे घर में घुसे थे। हमें औलाद बनाकर घर से निकाल लिए। लेकिन हमारी चेन और अंगूठी बेचकर शराब पी और हमारे सामने ही उस बदमाश औरत को ले आए। उन्हें हमसे बिल्कुल प्यार नहीं है, रुपयों से प्यार है।”

“तुम ठीक कहती हो दीदी।” दीपू रोने लगा।

“अब हम क्या करेंगे? कैसे मम्मी और महेश अंकल के पास जायेंगे।

“दीदी, तुम उनके पास चलो। वह हमें जरूर माफ कर देंगे।”

“लेकिन रात में मुझे डर लगता है। रात चुपके से यहीं सो जायें।” सुबह होते ही मम्मी के पास हम लोग टैक्सी में बैठ कर चले जायेंगे।”

“ठीक है।” फिर दोनों तख्ते पर ही लेट गए।

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कृष्ण की आंख खुली तो उसने अपने बराबर टटोला। वह लड़की बिस्तर पर नहीं थी। कृष्ण जल्दी से उठकर बैठ गया। उसने जल्दी से तकिए के नीचे टटोला। पर्स गायब था। फिर उसने मुड़कर फर्श की ओर देखा, डॉली और दीपू भी गायब थे। कृष्ण को जोरदार धक्का लगा। वह जल्दी-जल्दी कपड़े पहनकर बाहर निकला। वह तेजी से नीचे उतरकर काउन्टर पर आया। उसने काउन्टर क्लर्क से पूछा- “रात यहां ड्यूटी पर कौन था?”

“जी-मैं ही था। मेरी ड्यूटी आठ बजे खत्म होगी।”

“तो यह बताइए, मेरे दोनों बच्चे कहां गए?”

“बच्चे?”

“हां बच्चे। वह काउन्टर पर घूंसा मार कर बोला, “रात दोनों मेरे साथ कमरे में सोए थे। मैं जरा बेखबर सो गया था। रात में ही न जाने कहां गायब हो गए।”

“स-स-साहब, हमें कुछ पता नहीं।”

“पता कैसे नहीं है। मेरी पत्नी के साथ मेरा झगड़ा चल रहा है। बच्चे मेरे साथ रहना चाहते हैं। वह अपने साथ रखना चाहती है। याद रखिए अगर मेरे बच्चे, पत्नी के द्वारा छोड़े हुए बदमाशों के हाथ पड़ गए तो मैं इस होटल को उलट-पुलटकर रख दूंगा। कम-से-कम पचास लाख के हर्जाने का दावा करूंगा। वरना मेरे बच्चे किसी भी तरह आज शाम तक मुझे मिल जाने चाहिए।”

“ज-ज-जी-मैं अभी पुलिस को फोन करता हूं।”

“कुछ भी कीजिए। मुझे मेरे बच्चे चाहिए।”

फिर वह तेजी से ऊपर चला गया।

काउन्टर क्लर्क जल्दी-जल्दी नम्बर डायल करने लगी थी। उसका चेहरा पीला पड़ गया था।

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महेश ने चौंक कर दरवाजे की ओर देखा। दरवाजे पर कृष्ण खड़ा मुस्करा रहा था। महेश के होंठों पर व्यंग्य भरी मुस्कराहट दौड़ गई। उसने कहा- “फर्माइए मिस्टर कृष्ण।”

“भई मान गए महेश बाबू, आप जीते हम हारे।” कृष्ण ने कहा।

“क्या मतलब?”

“भई, हम पूरे जोश में बच्चों को ले गए थे। लेकिन चार दिन में ही बच्चो के दिमाग से बाप के प्यार का भूत उतर गया। क्योंकि उन्हें पाला तो मां ने है। रो-रो कर उन्होंने बुरा हाल कर लिया है अपना।”

“हूं-क्या चाहते हैं?”

“अपनी मां के पास जाना चाहते हैं।”

“और आप?”

“यह तो आप जानते ही हैं कि बच्चे मेरा खून हैं। मैं जानता हूं आपने सुषमा की जिन्दगी में जो जगह बना ली है वह मुझे कभी नहीं मिल सकती। और जब मुझे वह जगह ही नहीं मिल सकती तो बच्चे भी नहीं मिल सकते। अब बच्चों की कोई कीमत तो होनी ही चाहिए।”

“क्या कीमत चाहते हैं आप?”

“पच्चीस लाख।”

“इसके बाद आपने कभी बच्चों से सम्पर्क स्थापित किया या बम्बई आए तो?”

“जो सजा आप निश्चित करें।”

“मौत।” महेश ने जहरीली मुस्कराहट के साथ कहा- “आप अब तक सिर्फ इसलिए बचे रहे थे कि बच्चों को बाप की मौत का सदमा न पहुंचे। याद रखिए, अगर रकम लेने के बाद आपको बम्बई में देखा गया तो आपकी लाश चील-कौवे भी खाना पसंद नहीं करेंगे।”

“मंजूर है।”

“तो फिर होटल चलिए। मैं थोड़ी देर बाद रकम लेकर पहुंच जाऊंगा। आप बच्चों को मेरे हवाले कर देंगे तो रकम आपको दे दूंगा।”

“ओ. के. मैं इंतजार करूंगा।”

कृष्ण चला गया।

उसके जाते ही प्रदीप अंदर आया। उसने बाहर कृष्ण को जाते हुए देखा था। लेकिन कृष्ण ने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया था।

“क्या हुआ महेश बाबू? यह कृष्ण कैसे आया था?”

“बच्चों का सौदा करने आया था।” महेश ने कहा, “एक बाप अपने बच्चों को बेच रहा है। यह संसार के उन बापों के नाम पर कलंक है जो जीवन-भर अपने बच्चों के लालन-पालन में ही लगे रहते हैं।”

अचानक फोन की घंटी बज उठी। महेश ने रिसीवर उठाकर कहा- “हैलो, डॉली-दीप बिल्डर्स।”

“महेश बाबू, मैं दर्शन बोल रहा हूं। गज़ब हो गया। डॉली और दीपू रात में ही होटल से गायब हो गए।”

“क्या?” महेश चीखकर खड़ा हो गया, “बच्चे गायब हैं? तुम क्या कर रहे थे?”

“पता नहीं किधर निकल गए। अन्तिम बार मैंने लगभग बारह बजे कृष्ण को नशे में धुत एक आवारा लड़की के साथ होटल में जाते देखा था। अब कृष्ण ने होटल वालों को धमकी दी है। वे लोग बच्चों को खोज रहे हैं। पुलिस भी खोज रही है। कृष्ण का कोई पता नहीं है।”

“तुम वहीं ठहरो दर्शन, मैं अभी आ रहा हूं।” महेश ने जल्दी से रिसीवर रख दिया और प्रदीप से बोला, “जरूर कोई गड़बड़ हो गई प्रदीप। कृष्ण ने ही बच्चों को कहीं गायब न कर दिया हो। अगर बच्चों को कुछ हो गया तो सुषमा जिन्दा न रह सकेगी। उसे हर रिश्तेदार से घृणा मिली है। उसका एकमात्र रिश्ता अपने बच्चों से ही था। और अगर सुषमा को कुछ हो गया तो मैं दुनिया को जलाकर राख कर दूंगा। इस दुनिया में मां-बाप, बहन-भाई और पति-पत्नी सभी रिश्तों का प्यार मिटा दूंगा। हर रिश्ते का एक-दूसरे के लिए त्याग और बलिदान मिटा दूंगा। जिस जबान पर इन रिश्तों का नाम आयेगा, उस जबान को काटकर फेंक दूंगा। जिन आंखों में प्यार दिखाई देगा उन आंखों को फोड़ दूंगा।”

फिर वह झटके से अपनी रिवाल्विंग चेयर से उठा और तेजी से बाहर निकल गया।

उसकी रिवाल्विंग चेयर तेजी-से घूम रही थी और प्रदीप का दिमाग उससे भी अधिक तेजी से चक्कर काट रहा था।

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सुषमा पागलों की तरह कम्पाउंड में चक्कर काट रही थी।

अचानक एक टैक्सी गेट के सामने आकर रुकी और उसमें से दो चीखें गूजीं- “मम्मी!”

“मम्मी!”

“डॉली! दीप!” सुषमा पागलों की तरह दोनों बांहें फैलाकर चिल्लाई।

डॉली और दीपू टैक्सी से उतरे और दौड़कर मां के सीने से जा लिपटे और बिलख-बिलखकर रोने लगे।

सुषमा रोती जा रही थी और उन्हें चूमती जा रही थी।

“हमें क्षमा कर दो मम्मी।”

“मेरे बच्चो! मेरे जिगर के टुकड़ो।”

अचानक गेट के पास से खुश्क आवाज सुनाई दी, “आ गए तुम्हारे जिगर के टुकड़े तुम्हारे पास?”

“कृष्ण-!” सुषमा चीख उठी।

बच्चे चीखकर मां से लिपट गए।

सुषमा ने दोनों को जल्दी से अन्दर की ओर धकेलते हुए कहा- “अन्दर भाग जाओ और अन्दर से दरवाजा बन्द कर लो।”

और फिर उसने झपटकर दरवाजे की चटकनी लगा दी।

“क्या बात है? अब यहां क्या लेने आए हो?” सुषमा ने गुर्राकर कहा।

“अपनी पच्चीस लाख की हुंडी।”

“कैसी हुंडी?”

“दोनों बच्चों को मुझे दे दो। इन्हें महेश के हवाले करने के बाद मुझे पच्चीस लाख रुपये मिल जायेंगे।”

“नहीं। अब मैं तुम्हारा साया भी बच्चों पर नहीं पड़ने दूंगी। तुम्हें रुपये मिल जायेंगे।”

“बच्चे मिल जाने के बाद रुपये रुपये देता है।” कृष्ण ने चाकू निकालकर कहा, “बच्चों को मेरे हवाले कर दो, वरना तुम्हारी गर्दन काटकर फेंक दूंगा?”

“मुझे भले ही मार डालो, लेकिन बच्चे तुम्हें कभी नहीं मिलेंगे।”

“मान जा सुषमा। क्यों अपनी जिन्दगी से खेल रही है?”

“मैं कहती हूं,चले जाओ यहां से.... वरना चौकीदार आते ही तुम्हें गोली मार देगा।”

कृष्ण झपटकर आगे बढ़ा- और उसने खचाक् की आवाज के साथ चाकू सुषमा के पेट में उतार दिया। सुषमा की एक तेज चीख गूंज उठी।

फिर उसने पेट पकड़े-पकड़े कहा- “मेरे बच्चों, दरवाजा मत खोलना।”

फिर वह धीरे-धीरे नीचे बैठ गई। उसने पेट में धंसा हुआ चाकू नहीं निकाला था जिसकी वजह से खून रुका हुआ था।

तभी एक जोरदार चीख गूंजी- “सुषमा!”

कृष्ण ने घबराकर देखा। महेश अन्दर आ रहा था।

कृष्ण ने उसे देखते ही छलांग लगाई। लेकिन महेश ने बाज की तरह झपटकर उसकी टांग पकड़ी थी। वह धड़ाम से जमीन पर जा गिरा।

महेश ने हांफते हुए कहा, “कुत्ते! आज तूने एक दुनिया उजाड़ दी। तब तू यहां से जिन्दा नहीं जा सकता।”

फिर उसके घूंसे, ठोकरें और लातें कृष्ण पर बरसने लगे।

गेट पर भीड़ जमा हो गई। उस भीड़ में सबसे आगे प्रदीप था। उसके पीछे शंकर, प्रकाश, संध्या, रजनी और उनके बच्चे थे।

संध्या और रजनी चीखकर सुषमा के पास आ गईं।

प्रकाश, शंकर और प्रदीप भी महेश के साथ कृष्ण की पिटाई करने लगे। थोड़ी-सी देर में ही कृष्ण इतना घायल हो गया कि उसमें आंखें खोलने और हिलने-डुलने तक की ताकत न रही।

महेश ने उसका गला पकड़ लिया और उसे दबोचने लगा।

“रहने दो महेश बाबू। इस पापी के खून से अपने हाथ अपवित्र मत करो। कानून इसे खुद ही निबट लेगा।”

महेश उसे छोड़कर सुषमा के पास आ गया।

दरवाजा खोलकर दीपू और डॉली भी बाहर आ गए। और मां से लिपटकर बिलख-बिलखकर रोने लगे।

प्रदीप ने रोते हुए कहा- “दीदी, हम तीनों भाई बहनों के लिए तुमने जो कुछ किया, शायद ही दुनिया की कोई बहन कर सकती। उसका जो बदला हम लोगों ने दिया, वह भी शायद कोई नहीं देगा। तुमने तो हमें अपने पापों का प्रायश्चित करने का मौका तक भी नहीं दिया दीदी।”

“सुषमा के होंठों पर मुस्कराहट बिखर गई। उसने धीमे से कहा, “प्रदीप भैया तुम सब लोग मेरे पास हो, इससे बड़ी भाग्यशाली मौत भला किसे-मिल-सकती है।”

महेश की आंखों से आंसू बह रहे थे। उसने कांपते हाथों से सिन्दूर की डिबिया और मंगल-सूत्र निकाला और भर्राई हुई आवाज में बोला- “सुषमा, जीवन भर तुमने मुझे पराया ही रखा। अब जाते-जाते कम-से-कम इन बच्चों को एक बाप का साया तो दे दो।”

सुषमा ने दर्द भरी मुस्कराहट के साथ गर्दन हिला दी। महेश ने कांपते हाथों से उसकी मांग में सिन्दूर भरा और मंगल-सूत्र उसके गले में पहना दिया।

सुषमा ने एक हाथ बढ़ाकर महेश के पांव छुए और फिर उसकी गर्दन एक ओर लुढ़क गई।

एक साथ कई चीखें गूंज उठीं।

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