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डॉली और दीपू के साथ जब कृष्ण डाइनिंग-रूम में पहुंचा तो उसके बदन पर बहुत ही कीमती सूट था। बाल सलीके से संवरे हुए थे। उसके हाथ में स्कॉच की बोतल थी।
खाना मेज पर लगा था। लेकिन डाइनिंग टेबल पर कोई नहीं था।
कृष्ण ने बैठते हुए कहा- “अरे वाह, किसी का भी पता नहीं।”
“जूली, जूली।” डॉली ने पुकारा।
“बेबी, खाना मेज पर लगा है। जिस चीज की जरूरत हो बता देना।”
“अंकल और मम्मी कहां है?”
“वे अपने-अपने कमरे में खाना खायेंगे।”
“क्यों?”
“आप लोग खाइए। खाना ठंडा हो रहा है।”
“अरे जूली।” कृष्ण ने ऊंची आवाज में कहा, “जरा फ्रिज से बर्फ निकालकर दे जाओ।”
“पानी फ्रिज का ही है।”
“भई, स्कॉच में बर्फ मिलाए बिना मजा नहीं आता।”
दूसरी ओर खामोशी छा गई। जूली ने कोई उत्तर नहीं दिया।
कृष्ण ने स्कॉच की बोतल खोली। पहले अपने लिए एक गिलास में उंडेली और होंठों पर जीभ फेरते हुए हाथ मलकर बोला- “आज पूरे दस साल के बाद चखने को मिलेगी।”
“दस साल बाद क्यों डैडी?”
“बच्चों, यह बड़े आदमियों के पीने की चीज है। क्या तुम्हारी मम्मी ने तुम्हें कभी नहीं पिलाई?”
“नहीं।”
“कमाल है। खुद तो चार-चार पैग पी जाती थी। खैर कोई बात नहीं। आज हम अपने हाथों से अपने बच्चों को पहला पैग पिलाएंगे।”
फिर उसने डॉली और दीपू के लिए भी दो गिलासों में उड़ेल दी।
गिलासों में स्प्रिट जैसी गन्ध उठी तो डॉली और दीपू ने बुरा-सा मुंह बना लिया।
“बेटी, इस गन्ध को बरदाश्त करना ही बहादुरी है। जो लोग इसे नहीं पीते, वे कभी बड़े आदमी नहीं बन सकते।”
तभी महेश और सुषमा वहां पहुंच गए।
महेश ने बड़े शान्त भाव से मुस्कराते हुए कहा- “हां बेटी डॉली, तुम्हारे डैडी भी यही पी-पीकर इतने बड़े आदमी बन गए थे कि इन्हें दस वर्ष तक तुमसे अलग रहना पड़े।”
कृष्ण चौंक पड़ा।
महेश और सुषमा कुर्सियां खींचकर बैठ गए।
डॉली ने खुशी से उछलकर कहा, “आहा मम्मी! अंकल! आप दोनों भी हमारे साथ खाना खायेंगे?”
“हां बेटी, मां के दूध पिलाने और बाप के दूध पिलाने में बहुत अन्तर होता है। आज से तुम मेरे सामने ही खाना खाया करोगे।” सुषमा बोली।
“जूली और दर्शन दो डिशेज लेकर अन्दर आ गए।
महेश डॉली और दीपू के सामने से दोनों गिलास उठा लिए और दर्शन को देकर कहा, “दर्शन, इन्हें तोड़कर फेंक दो।”
दर्शन गिलास लेकर जाने लगा तो कृष्ण ने कहा, “ठहर जा बे।”
लेकिन दर्शन नहीं रुका। और जूली ने कृष्ण के मुड़ते ही उसके आगे से गिलास और बोतल उठा ली।
कृष्ण ने गुस्से से कहा, “अरे, अरे यह क्या करती है!”
“आपके कमरे में रखने जा रही हूं। इस मेज पर आपके जाने के बाद आज तक किसी ने शराब नहीं पी और न ही कभी कोई पियेगा।”
कृष्ण होंठ काटता रह गया।
जूली चली गई।
सुषमा और महेश खाना निकालने लगे तो कृष्ण ने डॉली और दीपू की ओर देखकर पूछा, “बच्चों, इस घर के मालिक नौकर लोग हैं या तुम्हारे डैडी?”
“मम्मी, इस घर का मालिक कौन है?” डॉली ने सुषमा से पूछा।
सुषमा ने गम्भीरता से कहा, “बेटी, खाना खाते समय बातें नहीं करते। चुपचाप खाना खाओ।”
डॉली और दीपू कृष्ण की ओर देखने लगे।
कृष्ण ने महेश की ओर देखते हुए कहा-
“डॉली बेटी- दीपू बेटे, जिस मेज पर हमारा नौकर खाना खा रहा हो, हम उस मेज पर खाना नहीं खा सकते।”
“कौन नौकर?”
“मिस्टर महेश।”
“लेकिन मम्मी ने तो बताया था कि यह आपके पुराने दोस्त हैं।”
“मम्मी से सौगन्ध लेकर पूछो कि मिस्टर महेश तुम्हारे डैडी के दोस्त हैं या मम्मी के।”
और फिर वह तेजी से उठकर चला गया।
डॉली और दीपू हक्के-बक्के से उन दोनों की ओर देखते रह गए।
सुषमा ने कहा, “बच्चो, तुम लोग खाना खाओ।”
“नहीं।” वे दोनों उठकर खड़े हो गए, “जब तक हमारे डैडी खाना नहीं खायेंगे, हम लोग भी नहीं खायेंगे।”
और फिर वे दोनों बाहर निकल गए।
सुषमा की आंखें भर आईं।
डॉली और दीपू कृष्ण के कमरे में पहुंचे तो वह गिलास में व्हिस्की उडेलकर इस तरह पी रहा था, जैसे शर्बत पी रहा हो।
“डैडी, आप खाना छोड़कर क्यों चले आए?” दीपू और डॉली ने पूछा।
“मैंने कहा था ना कि यहां मेरा नौकर।”
“फिर मम्मी ने हमसे झूठ क्यों बोला था कि महेश अंकल आपके दोस्त हैं और आपका स्वर्गवास हो चुका है।”
“इस सारे झगड़े फसाद का जड़ तुम्हारा अंकल महेश ही है। अगर यह न होता तो तुम्हारी मम्मी मुझे तलाक न लेती। आज भी तुम लोग देखते ही इस घर में तुम लोगों की नहीं चलती महेश की चलता है क्योंकि वह तुम्हारी मम्मी से और तुम्हारी मम्मी उससे प्यार करती है।”
तभी महेश ने दहाड़कर कहा, “कृष्ण!”
कृष्ण लड़खड़ाकर दरवाजे की ओर मुड़ा। दरवाजे के पास ही सुषमा भी खड़ी थी।
सुषमा ने आगे बढ़कर भर्राई आवाज में कहा-
“किस जन्म का बदला ले रहे हो मुझसे? क्या बिगाड़ा है मैंने तुम्हारा? इस मासूम बच्चो का दिमाग क्यों खराब कर रहे हो?”
“सुन-लिया-बच्चों-तुमने।” कृष्ण बच्चों की ओर मुड़कर बोला, “अब तुम्हारे सामने तुम्हारा महेश अंकल भी खड़ा अपनी-मम्मी से कहो तुम्हारे सिर पर हाथ रखकर सौगंध खाकर कहे कि वह महेश को प्यार नहीं करतीं।’
“कृष्ण!” सुषमा की आवाज कांप उठी।
डॉली और दीपू के चेहरे क्रोध से लाल हो गए थे।
कृष्ण के सीने पर हाथ मारकर कहा-
“हां यही गम है मेरे सीने में जो आग बन कर दहक रहा है मेरा घर उजाड़ने वाला यह महेश है। तुम लोगों को दस साल तक मुझसे दूर रखने वाला यह महेश है। मेरे पीछे घर में घुस आने वाला तुम्हारी मां की दौलत के स्याह सफेद का मालिक महेश है तुम्हारी मां के साथ छिप छिपकर रातों को रंगरेलियां मानने वाला!”
“कृष्ण!”
महेश इतनी जोर से दहाड़ा कि उसकी आवाज फट गई। उसने झपटकर कृष्ण गिरेबान पकड़ लिया-
“अगर आगे तेरी जबान से एक भी शब्द निकला तो जबान काट दूंगा।”
“देख लिया- तुमने-बच्चो? सच्ची बात कितनी बुरी लगी।”
“हां, यह सच है।” डॉली गुस्से से हांफती हुई बोली, “मैंने देखा था। आप मम्मी के बेडरूम की खिड़की के पास खड़े छिप-छिपकर मम्मी से बातें कर रहे थे।”
“मैंने भी देखा था।” दीपू गुस्से से बोला, “डैडी को जहरीला सांप कहा जा रहा था।
महेश सन्नाटे में रह गया।
“डॉली, दीपू।” सुषमा चिल्लाई।
“आप हमें झुठला नहीं सकतीं मम्मी। हमें डैडी से दस साल तक अलग रखने वाले महेश अंकल हैं। अब या तो इस घर में यह रहेंगे या हम और डैडी रहेंगे।”
महेश ने धीरे से कृष्ण को गिरेबान छोड़ दिया।
कृष्ण लड़खड़ाते हुए मुस्कराकर बोला-
“सुन लिया महेश?”
और फिर उसने तड़ाक से एक चांटा उसके मुंह पर मारा।
“कृष्ण!” सुषमा चीख उठी।
“कैसी चोट लगी दिल को।” कृष्ण ने दूसरा चांटा मारा। “इसने मुझे-बच्चों के स्कूल के बाहर भरी सड़क पर मारा था। तब-मेरे बच्चे-इतने मेरे नहीं थे जितने आज हैं।”
फिर वह तड़ातड़ महेश को मारता हुआ बाहर तक ले गया। सुषमा चिल्लाती रह गई-
कृष्ण ने दरवाजे की ओर हाथ उठाकर कहा-
“निकल जा हमारे घर से-!”
महेश कुछ न बोला। वह चुपचाप कपड़े झाड़कर खून पोंछने लगा। फिर उसने सुषमा की ओर देखकर से कहा-
“बहुत हो चुका सुषमा-अब मैं तुम्हें इस नरक में किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हूं।”
“हां, मैं भी इस नरक में नहीं रहूंगी। अभी चलती हूं तुम्हारे साथ।” सुषमा ने क्रोध और दुखभरे स्वर में कहा।
“क्या?” कृष्ण ने आश्चर्य से कहा,” तुम अपने बच्चों को छोड़कर चली जाओगी?”
“बच्चे तेरे हैं मेरे नहीं। तेरा उद्देश्य पूरा हो गया। और क्या चाहिए तुझे।”
“मम्मी!” डॉली और दीपू ने आश्चर्य से कहा।
“अपनी इस गन्दी जबान से मुझे मम्मी मत कहो, “सुषमा हांफती हुई बोली, “इसी घड़ी के लिए तो मैंने तुम लोगों को इतने ऐशो-आराम से पाला था। इतना प्यार दिया था कि शायद किसी मां ने न दिया होगा। केवल तुम्हारा भविष्य बनाने के लिए मैंने बुढ़ापे में भी खुद को जवान रखने की कोशिश की। लेकिन मेरे त्याग और बलिदान का तुम लोगों ने आज खूब बदला दिया है। जिस बाप के लिए तुमने देवता जैसे अंकल को ठुकरा दिया है उसका अपमान किया है वह बाप तुम्हें कितना सुख देगा, यह तुम्हें कल पता चल जायेगा।”
“फिर वह तेजी से अन्दर चली गई। उसने एक अटैची में कुछ कपड़े और जरूरी कागजात रखे और महेश के साथ फ्लैट से निकल गई।
जब वे दोनों चले गए तो कृष्ण ने दोनों बच्चों की ओर देखा। उन दोनों की आंखों में आंसू थे।
“अरे, तुम लोग उस मां के लिए रो रहे हो जिसने अपने मालिक के लिए तुम्हें ठुकरा दिया। मेरे बच्चो, अब देखना मैं किस तरह तुम्हें मां और बाप दोनों का प्यार देता हूं।”
“डैडी!” दोनों कृष्ण से लिपट गए।
कृष्ण दोनों को थपथपाने लगा।
तभी उसने जूली और दर्शन को जाते हुए देखा। उसके होंठों पर विजेता जैसी मुस्कान दौड़ गई।
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खाना मेज पर लगा था। लेकिन डाइनिंग टेबल पर कोई नहीं था।
कृष्ण ने बैठते हुए कहा- “अरे वाह, किसी का भी पता नहीं।”
“जूली, जूली।” डॉली ने पुकारा।
“बेबी, खाना मेज पर लगा है। जिस चीज की जरूरत हो बता देना।”
“अंकल और मम्मी कहां है?”
“वे अपने-अपने कमरे में खाना खायेंगे।”
“क्यों?”
“आप लोग खाइए। खाना ठंडा हो रहा है।”
“अरे जूली।” कृष्ण ने ऊंची आवाज में कहा, “जरा फ्रिज से बर्फ निकालकर दे जाओ।”
“पानी फ्रिज का ही है।”
“भई, स्कॉच में बर्फ मिलाए बिना मजा नहीं आता।”
दूसरी ओर खामोशी छा गई। जूली ने कोई उत्तर नहीं दिया।
कृष्ण ने स्कॉच की बोतल खोली। पहले अपने लिए एक गिलास में उंडेली और होंठों पर जीभ फेरते हुए हाथ मलकर बोला- “आज पूरे दस साल के बाद चखने को मिलेगी।”
“दस साल बाद क्यों डैडी?”
“बच्चों, यह बड़े आदमियों के पीने की चीज है। क्या तुम्हारी मम्मी ने तुम्हें कभी नहीं पिलाई?”
“नहीं।”
“कमाल है। खुद तो चार-चार पैग पी जाती थी। खैर कोई बात नहीं। आज हम अपने हाथों से अपने बच्चों को पहला पैग पिलाएंगे।”
फिर उसने डॉली और दीपू के लिए भी दो गिलासों में उड़ेल दी।
गिलासों में स्प्रिट जैसी गन्ध उठी तो डॉली और दीपू ने बुरा-सा मुंह बना लिया।
“बेटी, इस गन्ध को बरदाश्त करना ही बहादुरी है। जो लोग इसे नहीं पीते, वे कभी बड़े आदमी नहीं बन सकते।”
तभी महेश और सुषमा वहां पहुंच गए।
महेश ने बड़े शान्त भाव से मुस्कराते हुए कहा- “हां बेटी डॉली, तुम्हारे डैडी भी यही पी-पीकर इतने बड़े आदमी बन गए थे कि इन्हें दस वर्ष तक तुमसे अलग रहना पड़े।”
कृष्ण चौंक पड़ा।
महेश और सुषमा कुर्सियां खींचकर बैठ गए।
डॉली ने खुशी से उछलकर कहा, “आहा मम्मी! अंकल! आप दोनों भी हमारे साथ खाना खायेंगे?”
“हां बेटी, मां के दूध पिलाने और बाप के दूध पिलाने में बहुत अन्तर होता है। आज से तुम मेरे सामने ही खाना खाया करोगे।” सुषमा बोली।
“जूली और दर्शन दो डिशेज लेकर अन्दर आ गए।
महेश डॉली और दीपू के सामने से दोनों गिलास उठा लिए और दर्शन को देकर कहा, “दर्शन, इन्हें तोड़कर फेंक दो।”
दर्शन गिलास लेकर जाने लगा तो कृष्ण ने कहा, “ठहर जा बे।”
लेकिन दर्शन नहीं रुका। और जूली ने कृष्ण के मुड़ते ही उसके आगे से गिलास और बोतल उठा ली।
कृष्ण ने गुस्से से कहा, “अरे, अरे यह क्या करती है!”
“आपके कमरे में रखने जा रही हूं। इस मेज पर आपके जाने के बाद आज तक किसी ने शराब नहीं पी और न ही कभी कोई पियेगा।”
कृष्ण होंठ काटता रह गया।
जूली चली गई।
सुषमा और महेश खाना निकालने लगे तो कृष्ण ने डॉली और दीपू की ओर देखकर पूछा, “बच्चों, इस घर के मालिक नौकर लोग हैं या तुम्हारे डैडी?”
“मम्मी, इस घर का मालिक कौन है?” डॉली ने सुषमा से पूछा।
सुषमा ने गम्भीरता से कहा, “बेटी, खाना खाते समय बातें नहीं करते। चुपचाप खाना खाओ।”
डॉली और दीपू कृष्ण की ओर देखने लगे।
कृष्ण ने महेश की ओर देखते हुए कहा-
“डॉली बेटी- दीपू बेटे, जिस मेज पर हमारा नौकर खाना खा रहा हो, हम उस मेज पर खाना नहीं खा सकते।”
“कौन नौकर?”
“मिस्टर महेश।”
“लेकिन मम्मी ने तो बताया था कि यह आपके पुराने दोस्त हैं।”
“मम्मी से सौगन्ध लेकर पूछो कि मिस्टर महेश तुम्हारे डैडी के दोस्त हैं या मम्मी के।”
और फिर वह तेजी से उठकर चला गया।
डॉली और दीपू हक्के-बक्के से उन दोनों की ओर देखते रह गए।
सुषमा ने कहा, “बच्चो, तुम लोग खाना खाओ।”
“नहीं।” वे दोनों उठकर खड़े हो गए, “जब तक हमारे डैडी खाना नहीं खायेंगे, हम लोग भी नहीं खायेंगे।”
और फिर वे दोनों बाहर निकल गए।
सुषमा की आंखें भर आईं।
डॉली और दीपू कृष्ण के कमरे में पहुंचे तो वह गिलास में व्हिस्की उडेलकर इस तरह पी रहा था, जैसे शर्बत पी रहा हो।
“डैडी, आप खाना छोड़कर क्यों चले आए?” दीपू और डॉली ने पूछा।
“मैंने कहा था ना कि यहां मेरा नौकर।”
“फिर मम्मी ने हमसे झूठ क्यों बोला था कि महेश अंकल आपके दोस्त हैं और आपका स्वर्गवास हो चुका है।”
“इस सारे झगड़े फसाद का जड़ तुम्हारा अंकल महेश ही है। अगर यह न होता तो तुम्हारी मम्मी मुझे तलाक न लेती। आज भी तुम लोग देखते ही इस घर में तुम लोगों की नहीं चलती महेश की चलता है क्योंकि वह तुम्हारी मम्मी से और तुम्हारी मम्मी उससे प्यार करती है।”
तभी महेश ने दहाड़कर कहा, “कृष्ण!”
कृष्ण लड़खड़ाकर दरवाजे की ओर मुड़ा। दरवाजे के पास ही सुषमा भी खड़ी थी।
सुषमा ने आगे बढ़कर भर्राई आवाज में कहा-
“किस जन्म का बदला ले रहे हो मुझसे? क्या बिगाड़ा है मैंने तुम्हारा? इस मासूम बच्चो का दिमाग क्यों खराब कर रहे हो?”
“सुन-लिया-बच्चों-तुमने।” कृष्ण बच्चों की ओर मुड़कर बोला, “अब तुम्हारे सामने तुम्हारा महेश अंकल भी खड़ा अपनी-मम्मी से कहो तुम्हारे सिर पर हाथ रखकर सौगंध खाकर कहे कि वह महेश को प्यार नहीं करतीं।’
“कृष्ण!” सुषमा की आवाज कांप उठी।
डॉली और दीपू के चेहरे क्रोध से लाल हो गए थे।
कृष्ण के सीने पर हाथ मारकर कहा-
“हां यही गम है मेरे सीने में जो आग बन कर दहक रहा है मेरा घर उजाड़ने वाला यह महेश है। तुम लोगों को दस साल तक मुझसे दूर रखने वाला यह महेश है। मेरे पीछे घर में घुस आने वाला तुम्हारी मां की दौलत के स्याह सफेद का मालिक महेश है तुम्हारी मां के साथ छिप छिपकर रातों को रंगरेलियां मानने वाला!”
“कृष्ण!”
महेश इतनी जोर से दहाड़ा कि उसकी आवाज फट गई। उसने झपटकर कृष्ण गिरेबान पकड़ लिया-
“अगर आगे तेरी जबान से एक भी शब्द निकला तो जबान काट दूंगा।”
“देख लिया- तुमने-बच्चो? सच्ची बात कितनी बुरी लगी।”
“हां, यह सच है।” डॉली गुस्से से हांफती हुई बोली, “मैंने देखा था। आप मम्मी के बेडरूम की खिड़की के पास खड़े छिप-छिपकर मम्मी से बातें कर रहे थे।”
“मैंने भी देखा था।” दीपू गुस्से से बोला, “डैडी को जहरीला सांप कहा जा रहा था।
महेश सन्नाटे में रह गया।
“डॉली, दीपू।” सुषमा चिल्लाई।
“आप हमें झुठला नहीं सकतीं मम्मी। हमें डैडी से दस साल तक अलग रखने वाले महेश अंकल हैं। अब या तो इस घर में यह रहेंगे या हम और डैडी रहेंगे।”
महेश ने धीरे से कृष्ण को गिरेबान छोड़ दिया।
कृष्ण लड़खड़ाते हुए मुस्कराकर बोला-
“सुन लिया महेश?”
और फिर उसने तड़ाक से एक चांटा उसके मुंह पर मारा।
“कृष्ण!” सुषमा चीख उठी।
“कैसी चोट लगी दिल को।” कृष्ण ने दूसरा चांटा मारा। “इसने मुझे-बच्चों के स्कूल के बाहर भरी सड़क पर मारा था। तब-मेरे बच्चे-इतने मेरे नहीं थे जितने आज हैं।”
फिर वह तड़ातड़ महेश को मारता हुआ बाहर तक ले गया। सुषमा चिल्लाती रह गई-
कृष्ण ने दरवाजे की ओर हाथ उठाकर कहा-
“निकल जा हमारे घर से-!”
महेश कुछ न बोला। वह चुपचाप कपड़े झाड़कर खून पोंछने लगा। फिर उसने सुषमा की ओर देखकर से कहा-
“बहुत हो चुका सुषमा-अब मैं तुम्हें इस नरक में किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हूं।”
“हां, मैं भी इस नरक में नहीं रहूंगी। अभी चलती हूं तुम्हारे साथ।” सुषमा ने क्रोध और दुखभरे स्वर में कहा।
“क्या?” कृष्ण ने आश्चर्य से कहा,” तुम अपने बच्चों को छोड़कर चली जाओगी?”
“बच्चे तेरे हैं मेरे नहीं। तेरा उद्देश्य पूरा हो गया। और क्या चाहिए तुझे।”
“मम्मी!” डॉली और दीपू ने आश्चर्य से कहा।
“अपनी इस गन्दी जबान से मुझे मम्मी मत कहो, “सुषमा हांफती हुई बोली, “इसी घड़ी के लिए तो मैंने तुम लोगों को इतने ऐशो-आराम से पाला था। इतना प्यार दिया था कि शायद किसी मां ने न दिया होगा। केवल तुम्हारा भविष्य बनाने के लिए मैंने बुढ़ापे में भी खुद को जवान रखने की कोशिश की। लेकिन मेरे त्याग और बलिदान का तुम लोगों ने आज खूब बदला दिया है। जिस बाप के लिए तुमने देवता जैसे अंकल को ठुकरा दिया है उसका अपमान किया है वह बाप तुम्हें कितना सुख देगा, यह तुम्हें कल पता चल जायेगा।”
“फिर वह तेजी से अन्दर चली गई। उसने एक अटैची में कुछ कपड़े और जरूरी कागजात रखे और महेश के साथ फ्लैट से निकल गई।
जब वे दोनों चले गए तो कृष्ण ने दोनों बच्चों की ओर देखा। उन दोनों की आंखों में आंसू थे।
“अरे, तुम लोग उस मां के लिए रो रहे हो जिसने अपने मालिक के लिए तुम्हें ठुकरा दिया। मेरे बच्चो, अब देखना मैं किस तरह तुम्हें मां और बाप दोनों का प्यार देता हूं।”
“डैडी!” दोनों कृष्ण से लिपट गए।
कृष्ण दोनों को थपथपाने लगा।
तभी उसने जूली और दर्शन को जाते हुए देखा। उसके होंठों पर विजेता जैसी मुस्कान दौड़ गई।
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