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Romance फिर बाजी पाजेब

"अब बस भी करो न।"

"कमला ! तुम बीच में मत बोलो।"

"अरे...तो क्या..अब मार ही डालोगे...ऐसा कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा जो उसने छोटे मालिक के साथ मिलकर केक काट ली...वह भी मालकिन के कहने पर।"

"कमला ! इससे बड़ा भी कोई गजब हो सकता है। उस दिन छोटे मालिक पर इसके कारण सिर्फ डांट ही पड़ी थी...आज इतने मेहमानों के बीच उसका घोर अपमान हुआ-उसे वहीं मुर्गा बनाया गया-उस अपमान का कारण सिर्फ राजेश है।"

"लेकिन राजेश को तो खुद ही जिद्द करके छोटे मालिक साथ ले गए थे और मालकिन के कहने पर दोनों ने मिलकर केक काटा था।"

"तुम जानती हो, छोटे मालिक बहुत भोले हैं, मगर राजेश तो भोला नहीं है-इसे तो समझना चाहिए था।"

"आप ठीक कहते हैं पिताजी।' राजेश ने कहा-"मेरे कारण छोटे मालिक का अपमान हुआ है इसलिए मुझे खूब मारिए।" और उसने कैलाश के दोनों हाथ पकड़कर खुद अपने ही गालों पर थप्पड़ मारने शुरू कर दिए-कमला रो पड़ी...साथ ही कैलाश के होंठों से भी भर्राई आवाज निकली

"बेटे...! मैं जानता हूं, तुम और छोटे मालिक एक-दूसरे को बहुत प्यार करते हो...मगर अब तुम बिल्कुल बच्चे नहीं रहे-तुम्हें समझना चाहिए कि धरती और आकाश का मेल न कभी हुआ है और न होगा।"

"पिताजी...!"

"हां बेटे...वे लोग हमारी तरह गरीब नहीं खानदानी रईस हैं और हम लोग खानदानी नौकर हैं.. हम लोग पुरखों से उनके वफादार और नमकख्वार

उसने फिर राजेश को जोर से लिपटा लिया।

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जगमोहन अपने कमरे में बैड पर लेटा हुआ सिसक-सिसककर रो रहा था.. इतने में पार्वती आ गई...उनके चेहरे से दुःख और बेचैनी झलक रही थी....वह जगमोहन के पास आकर बैठ गई और उसका सिर सहलाकर बोली-“बेटे !"

जगमोहन के होंठों से भर्राई आवाज निकली-"मां

फिर वह पार्वती की गोद में सिर रखकर सिसकने लगा–पारो की आंख छलक पड़ीं। उन्होंने जगमोहन के बालों में उंगलियों फिराते हुए कहा-"बस कर बेटे...रो मत।"

"मां ! आज मेरे कारण राजेश का दिल कितना दुखा है....उसके ऊपर मार भी पड़ी है।"

“बेटे...यह सब तो तुम्हारी आपसी दोस्ती को मजबूत करेगा...फिर अपमान तो तुम्हारा भी हुआ है।"

"ऐसा क्यों होता है मां?"

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"बेटा ! भाग्य की बात है।"

"क्या मैं अब राजेश से कभी नहीं मिल सकूँगा ?"

"ऐसा मत कह बेटे...जब तक मैं जिन्दा हूं तुम्हें राजेश से मिलने से कोई नहीं रोक सकता।"

"क्या तुम हम दोनों को बराबर कर दोगी ?"

“बेटे ! बराबर तो अब भी हो तुम दोनों।"

"फिर डैडी क्यों कहते हैं कि राजेश हमसे छोटा है, गरीब है, यह छोटा, बड़ा, अमीर-गरीब क्या होता है मां ?"

"बेटा ! भगवान करे तेरी समझ में कभी न आए।"

"मां-!"

फिर वह सिसककर रो पड़ा और पारो उसे थपकने लगी।

"लो ! इस पर सिग्नेचर करो।"

"यह क्या कर रहे हो तुम ?"

"सेठ बनने की शुरूआत ।"

"क्या मतलब ?"

"मतलब तब समझ में आएगा शारदा, जब मैं तुम्हें और शक्ति को एक शानदार बंगले में ले जाऊंगा।"

"भगवान के लिए...कुछ बताओ तो सही।"

प्रेम झुंझला गया और बोला-"यह सब अगर औरतों की समझ में आने लगे तो फिर हम मर्द क्या झक मारने के लिए पापड़ बेलते रहते हैं।"

"तुम मुझे सिर्फ इतना बता दो कि जब दूसरे बैंक में तुम्हारे नाम से एकाउंट खुला हुआ है तो इस बैंक में मेरे नाम से एकाउंट खुलवाने की भला क्या जरूरत पड़ गई थी ?"

"बताऊंगा अभी आकर।"

शारदा ने सिग्नेचर कर दिए। एकाउंट खोलने में लगभग आधा घंटा लगा। प्रेम ने शादरा के नाम से सेविंग एकाउंट खोला था-केवल पांच सौ रूपए से...फिर उसमें पूरे दस लाख रूपए कैश डाले और शारदा की आंखें फटी रह गईं।

जब वे लोग कार में आकर बैठ गए तो शारदा ने पूछा

.

"तुमने दस लाख रूपए डाले हैं।"

"हां ! तुम्हारे एकाउंट में।"

"मगर इतनी रकम तुम्हारे पास आई कहां से ?"

"तुम्हारे दूर के रिश्ते के एक बे-औलाद मामा से जिन्होंने स्वर्गवासी होते समय यह रकम छोड़ी

थी।"

"हे भगवान ! मेरे कौन-से मामा थे?"

"नहीं थे तो समझ लो कहीं से निकल आए होंगे।"

"भगवान के लिए सचमुच बता दो...यह सब तुम क्या करते फिर रहे हो ?"

“सेठ बनने की तैयारियां-फिर तुम सेठानी कहलाओगी...और हमारा बेटा शक्ति, सेठ का बेटा बिल्कुल जगमोहन की तरह ।"

"मुझे इतना तो बता दो...इतनी रकम तुम्हारे पास आई कहां से ? तुम्हारी तनख्वाह केवल दस हजार रूपए है तुम्हारे खर्चे इससे ज्यादा हैं।"

"तुम्हें आम खाने से मतलब या पेड़ गिनने से।"

"मैं तो इसलिए पूछ रही हूं कि तुम कोई ऐसी बात तो नहीं कर रहे जिससे बाद में हम परेशानी में पड़ जाएं।

प्रेम ने डांटकर कहा-"तुम मेरी पत्नी हो कि बॉस।"

शारदा चुप हो गई, लेकिन उसके माथे पर चिन्ता की लकीरें स्पष्ट नजर आ रही थीं..फिर उसने गाड़ी रोककर कहा-"यह ब्रीफकेस उठाओ और उतरकर एक टैक्सी पकड़ो और घर चली जाओ-मुझे वकील के यहां जाना है।"

"मगर घर दूर ही कितना है।"

"मुझे वकील के यहां से एक दूसरी जगह भी जाना है।"

"मैं तो इसलिए कह रही हूं कि मैं बस से या पैदल ही चली जाऊंगी।"

"मेरी जान ! अब तुम किसी मैनेजर की पत्नी नहीं हो...लखपति सेठानी हो और तुम्हें अब पैदल नहीं चलना चाहिए।"

शारदा कोई जवाब दिए बगैर ब्रीफकेस लेकर उतर गई-जब प्रेम की गाड़ी बढ़ गई तो वह 'बस' की

ओर चल पड़ी।

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प्रेम को देखते ही एडवोकेट भार्गव ने कहा

"आइए, आइए प्रेम साहब...मुझे आप ही का इन्तजार था।"

"बैंक गया था. सेठ साहब के काम से.. इसलिए कुछ लेट हो गया।"

"कोई बात नहीं।"



"कागजात तैयार है।"

“बिल्कुल..मगर एक बात समझ में नहीं आई।"

"वह क्या ?"

"अभी कल ही तो आपने सरस्वती निवास के रहन के कागजात तैयार कराए थे और इकरारनामा के कागजात तैयार करा रहे हैं।"

"अरे साहब..मैंने नहीं...सेठ साहब ने ।'

"मैं यही कह रहा हूं. आखिर रात भर में यह क्या चमत्कार हो गया कि जो आदमी सरस्वती निवास रहन रख रहा था वह उसे बेचने के लिए तैयार हो गया।"

"अब यह राज की बातें तो सेठ दौलतराम ही जानें या देवीदयाल जी-मैं ठहरा सेठ साहब का नौकर।"

"मुझे इसी बात पर तो आश्चर्य है...देवीदयाजी के बारे में तो मशहूर हैं कि वह किसी भाव पर भी बंगला बेचने को तैयान नहीं थे...जाने कितने बिल्डर्स ने चक्कर लगा लिये हैं।"

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"साहब, आदमी की नीयत बदलने में कितनी देर लगती है...सेठ साहब ने कोई बहुत बड़ी ऑफर कर दी होगी।"

"हां हो सकता है।"

"अच्छा..वह कागजात तो दे दीजिए।"

"हां लीजिए-दस्तखतों के साथ रजिस्ट्री बहुत जरूरी होगी।"



"जानता हूं। फिर वह फाइल दूसरे ब्रीफकेस में लेकर सरस्वती निवास की ओर चल पडा...उसके मस्तिष्क में तेजी से अलगा प्लान घूम रहा था जिस पर उसे अमल करना था।

थोड़ी देर बाद उसकी कार सरस्वती निवास के सामने रूक गई-उसी समय पहली शिफ्ट के बच्चे पढ़कर जा रहे थे। देवीदयाल बरामदे में आए खड़े थे...प्रेम को देखकर वह चौंक पड़े। प्रेम कार से उतरा और ब्रीफकेस लेकर देवीदयाल के पास पहुंचा तो उन्होंने कहा-"आइए प्रेम बाबू ।"

प्रेम ने पहले झुककर देवीदयाल के पांव छुए...उन्होंने जल्दी से पीछे हटते हुए कहा-"अरे...अरे....यह क्या करते हो ?"

"पुण्य कमा रहा हूं, देवीदयालजी-आप जैसे महान व्यक्ति के चरण स्पर्श करना तो तीर्थ के समान है।"

"अब इतना ऊंचा मत चढ़ाइए...मैं तो एक साधारण व्यक्ति हूं..कहिए, आपका कैसे आना हुआ?"

"अंदर चलिए...आराम से बैठकर बात करेंगे।"

"कोई खास बात ?"

"बात खास ही होती है।

देवीदयाल प्रेम को बैठक में ले आए...प्रेम ने दीवार पर लगी गांधी की पेंटिंग और दूसरे नेताओं की तस्वीरें देखीं...फिर पुरानी मेज और उसके गिर्द सरकियों के मूढ़े देखकर कहा-“वाह ! क्या सादगी है देवीदयालजी-आपने तो गांधीजी को फिर सजीव कर दिया है।"

"क्यों शर्मिंदा करते हैं उस महान हस्ती के नाम से जोड़कर..मैं तो महात्मा गांधीजी के चरणों की धूल भी नहीं हूं।"

इतने में अशोक स्कूल बैग लेकर आ गया तो देवीदयाल ने उससे कहा-“बेटा ! अंदर कह देना....चाय भिजवा दें।"

अशोक चला गया तो प्रेम ने कहा-"होनकार बिरवान के होत चीकने पात, बड़ा इन्टैलीजेन्ट बच्चा है।

"हमारा विद्यार्थी है-मेरी पत्नी कहती है मेरे विद्यार्थियों में यहीं लड़का हमारा नाम रोशन करेगा-हां..आप बताइए क्या हुक्म है ?"

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प्रेम ने दोनों हाथों को मलते हुए कहा-"क्या बताऊ देवीदयाल जी, आप जैसे महान व्यक्ति के सामने जबान खोलते हुए शर्म आ रही है।"

"ऐसी क्या बात है आखिर ?"

"बताता हूं..प्रेम ने ब्रीफकेस खोलकर उसमें से एक फाइल निकालकर देवीदयाल की ओर बढ़ा दी

और बोला-“लीजिए, खुद पढ़ लीजिए।"

देवीदयाल ने फाइल लेते हुए कहा-"क्या है इसमें …..देवीदयाल फाइल खोलकर पढ़ने लगे. इतने में अशोक चाय की ट्रे रखने आया और बोला-"मास्टर जी...चाची पूछ रही हैं. इस समय क्लास कौन लेगा ?"

"उनसे कहना...मैं एक मेहमान से जरा बात कर रहा हूं-वह खुद ही क्लास ले लें।

"उन्हें तो मन्दिर जाना है...आज मंगल का दिन है न।"

"तो तुम ही ले लो। पिछली पढ़ाई दोहरा देना।"

प्रेम ने चाय का चूंट भरकर कहा-“बड़ी मजेदार चाय बनाती हैं भाभीजी।"

देवीदयाल ज्यों-ज्यों कागजात पढ़ते जाते, उनके चेहरे का रंग बदलता जा रहा था प्रेम ध्यान से उनके चेहरे के बदलते भावों को देख रहा था और चाय के बूंट भी भरता जा रहा था।

देवीदयालजी का चेहरा गुस्से से लाल होता जा रहा था-पूरे कागजात पढ़कर वह बोले

"इसका क्या मतलब हुआ ?"

प्रेम ने जल्दी से हाथ जोड़कर कहा-"मैं पापी हूं जो यह फाइल लेकर आया...लेकिन मैं तो सेठ साहब का नौकर हूं...मुझे तो अपनी ड्यूटी पूरी करनी थी।"

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"वह तो मैं समझता हूं मगर..!"

"आपकी बात सेठजी से बंगला रहन सहन की हुई थी न ?"

"मैंने अपने मुंह से कोई ऐसी बात नहीं निकाली थी-सेठजी ने खुद कहा था कि वह बंगले का स्कूल बनवा देंगे-मैंने उनकी मदद लेने से इंकार कर दिया तो उन्होंने कहा था, आप अपनी मजदूरी बचाने के लिए बंगला रहन रख दें-मैं कोई ब्याज नहीं लूंगा...लेकिन रसीदें देता रहूंगा।"
 
"और आप राजी हो गए।"

"हां।"

"यही तो चाल थी सेठजी की...आपका बंगला उनके पास 'मियाद' पर रहन रखा जाता...और जब 'मियाद पूरी हो जाती और आप कर्जा न चुका पाते तो वह यह बंगला अपने कब्जे में ले लेते।"

"लेकिन तब तक तो स्कूल बन चुका होता।"

"कैसा स्कूल ? अगर मंदिर भी बना हो तो वह उसे तोड़कर फाइव स्टार होटल बना लेंगें"

"हे भगवान !"

"आप उनका चैक वापस करने गए थे...वह चैक देखते ही भड़क उठे...कहने लगे, उस दो टके के आदमी की यह मजाल कि सेठ दौलतराम का दिया हुआ चैक लौटा दे क्षमा कीजिए, मैं आप जैसे महान व्यक्ति के लिए ऐसे शब्द दोहरा रहा हूं।"

"वह तो..."

“सेठ साहब गुस्से से आग-बबूला हो गए...कहने लगे, इस आदमी को सबक न सिखाया तो मेरा नाम दौलतराम नहीं, उन्होंने आज ही आपका लौटाया हुआ चैक आप ही के नाम पर कैश करा लिया और यह कागजात तैयार करा लिए-जिनके अनुसार उन्होंने आपके बंगले का सौदा लिया है और इसका बयाना दस लाख आप वसूल कर चुके हैं।"

"दस लाख...!"

"जी हां..और सौदा पच्चीस लाख में हुआ है

जबकि आप किसी दूसरे बिल्डर को यह बंगला बेचें तो पचास लाख से भी ऊपर मिल सकते हैं।"

"मगर मैंने तो उस चैक पर दस्तखत नहीं किए थे।"

“साहब नकली दस्तखत करना क्या मुश्किल है ?"

“यह तो बड़ा जुल्म है.जबरदस्ती है-मैं अदालत का दरवाजा खटखटाऊंगा।"

"देवीदयालजी, अदालत का दरवाजा खटखटाना तो बड़ी बात है.. आजकल तो मंदिर का दरवाजा खटखटाने के लिए जेब भारी होनी चाहिए.दौलतरामजी के लिए असल को नकल और नकल को असल करना कोई मुश्किल काम नहीं है।"

“यह तो सरासर अंधेरगर्दी है।"

"मास्टरजी ! यह तो है ही अंधेरगर्दी और चौपटराज जिसके हाथ में लाठी है, उसी की भैंस है।"

"मगर मैं एक स्वतंत्रता सेनानी का बेटा हूं...खुद भी स्वतंत्रता सेनानी रहा हूं इस देश को आजादी हमने दिलाई है।"

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"मास्टरजी, न जाने कितने स्वतंत्रता सेनानी सड़कों पर मारे–मारे फिर रहे हैं और इंगलैंड में पढ़ने वाले ऊंची कुर्सियों पर बैठे हैं।"

"तो फिर...?"

"यह बंगला तो आपको बेचना ही पड़ेगा।"

देवीदयाल झटके से खड़े होते हुए बोले-“हर्गिज नहीं...यह बंगला हर्गिज नहीं बिकेगा...यहां कोई फाइव स्टार होटल या बिल्डिंग नहीं बनेगी...मेरे पिताजी का सपना है इसमें गरीब बच्चों के लिए स्कूल ही बनेगा।"

प्रेम भी जल्दी से खड़ा होता हुआ बोला-"शांत...मास्टरजी...शांत ।"

"जाइए...अपने सेठ से कह दीजिए, जब तक देवीदयाल के शरीर में आखिरी सांस बाकी है, यह बंगला नहीं बिकेगा यहां गरीब बच्चों की मुफ्त पढ़ाई के लिए स्कूल बनेगा।"

अशोक और सुनीता दौड़कर आ गए थे...सुनीता ने जल्दी से अंदर आते हुए कहा-"क्या हुआ बाबूजी

?"

"क्या हुआ मास्टरजी ?" अशोक ने जल्दी से कहा।

प्रेम बोला-"कुछ नहीं...मास्टरजी को थोड़ा गुस्सा आ गया है।"

"प्रेम बाबू ! आप जाकर अपने सेठ से कह दें।"

"हां..हां...जा रहा हूं।"

प्रेम ने एक नजर सुनीता पर डाली और फिर चला गया। अशोक ने कहा-“मास्टरजी ! मामला क्या है ?"

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देवीदयाल ने सारी बात विस्तार से बताई तो सुनीता को भी गुस्सा आ गया..अशोक ने कहा-“मास्टरजी ! यह तो सरासर धांधली है।"

अचानक विद्यादेवी की आवाज आई-"मुझे तो सेठ दौलतराम को उस दिन देखेते ही खटक गई थी कि अब कुछ न कुछ जरूर होने वाला है।"

अशोक ने कहा-“कुछ नहीं होगा मांजी यह बंगला नहीं सरस्वती का मंदिर है...सरस्वती के हजारों पुजारी आसपास की झोंपड़ियों में रहते हैं जिनके बच्चे यहां आकर विद्या की रोशनी से दिमाग रोशन करते हैं।"

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"मगर वह बहुत बड़ा आदमी है।"

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"मास्टरजी ! आप तो कहते हैं कि भगवान से बड़ा कोई नहीं...फिर यह दौलतराम कैसे बड़ा हो गया

"बेटे !"

विद्यादेवी ने कहा-“अशोक ठीक कहता है-हमारे साथ भगवान है. इन गरीबों की शक्ति है...आपके पिताजी का सपना और आशीर्वाद है-यह सेठ हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।"

"फिर क्या करूं?"

अशोक ने कहा-“मेरी मानिए तो पहले आप सेठ दौलतराम के पास जाकर नर्मी से बात । कीजिए-इधर मैं सबको सेठ दौलतराम की बेईमानी की खबर करता हूं. जब सेठ नहीं मानेगा तब हमलोग देख लेंगे।"
 
विद्यादेवी ने कहा-"अशोक ठीक कहता है...आप जाकर पहले सेठ से बात तो कीजिए।"

"ठीक है-मैं जाता हूं।"

"लेकिन आप इस समय कहां जाएंगे...सेठ अपने आफिस में होगा-वहां कोई काम की बात नहीं हो सकेगी।"

"फिर क्या करूं?"

प्रेम जो बाहर निकलकर उनकी बातों सुनने के लिए खड़ा हो गया था...अचानक सामने आकर बोला-“मैं आपको बताता हूं।"

वे लोग चौंककर मुड़े तो प्रेम ने जल्दी से हाथ जोड़कर नमस्ते की।

..

देवीदयाल ने कहा-"अरे...आप गए नहीं ?"

"मास्टरजी...मैं आपका पुराना भक्त हूं. मैं सेठ की तरह धनवार नहीं...मेरे दिल में जो दर्द अपने जैसे लोगों के लिए हो सकता है वह धनवानों के लिए नहीं हो सकता।"

"क्या कहना चाहते हैं आप?"

"गुर की बात बताना चाहता हूं...सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।"

"क्या मतलब ?"

"दरअसल दौलतरामजी आपकी लोकप्रियता और इज्जत से भलीभांति परिचित हैं....वह समझते हैं कि कानून माने न माने, मगर जनता अपकी बात को सच मानेगी।"

..

"फिर-काननू तो उन्हीं की मानेगा।"

“एक खास बात बता रहा हूं-इलेक्शन हो रहे हैं...सेठजी एम. पी. का इलेक्शन लड़ने के लिए अपना एक आदमी खड़ा करने वाले हैं...वैसे भी वह अपनी धर्मपत्नी से बहुत डरते हैं. इसलिए अपनी बदनामी से भी डरते हैं।"

"आप कहना क्या चाहते हैं ?"

"यही कि सेठ दौलतराम धनवान हैं और धनवानों के कुछ शौक भी होते हैं...भाभीजी मेरे लिए मां के समान हैं और सुनीता बेटी के समान..इनके सामने मैं जबान नहीं खोल सकता। आप उनसे एकांत में कहां मिल सकते हैं, आपको यह बात मैं बताना चाहता हूं।"

विद्यादेवी और सुनीता सुनकर स्वयं बाहर चली गईं...और प्रेम धीरे और चुपके-चुपके देवीदयाल को कुछ बताने लगा जिसे सुनकर देवीदयाल हां-हां के इशारे में सिर हिलाते रहे। सेठ दौलतराम ने रिसीवर रखा ही था कि प्रेम की दरवाजे के पास से गिड़गिड़ाती आवाज आई-"मैं आ सकता हूं सर !"

"आओ।"

प्रेम अंदर दाखिल हुआ और शिष्टता से खड़ा हो गया-फिर दौलतराम के इशारे पर सामने कुर्सी पर बैठ गया।

“कहिए-क्या हुआ ?" दौलतराम ने पूछा।

"सर ! पूछिए मत...आप सुनेंगे तो पता नहीं क्या कर बैठेंगे?"

"क्या मतलब ? साफ-साफ और संक्षेप में सीधे कहो।"

"जी ! मास्टर देवीदयाल जो अपने आपको स्वतंत्रता सेनानी कहते हैं, उन्होंने ऐसा गजब किया है कि आप विश्वास नहीं करेंगे।"

"गोल-मोल बात न करके असल बात कहो।"

“वह बंगला बेचने की बात कर गए थे...आपकी आज्ञा अनुसार मैं उन्हें चैक तो सबेरे ही लौटा आया था। आज वकील से बंगले के बैनामे के कागजात लेकर गया तो उन्होंने मुझे पहचानने ही से इंकार कर दिया कि वह कभी मुझसे मिले भी थे।"

"नहीं.!"

"उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि उन्होंने न बंगला रहन रखने जैसी कोई बात की और न

बेचने की।"

"ओहो !"

“यही नहीं, उन्होंने तो यह भी कहा कि मुझे सेठजी ने एडवांस का कोई चैक नहीं दिया।"

“क्या कह रहे हो तुम..मेरी तो समझ में कुछ नहीं आ रहा ?"

“सर ! वही कुछ कह रहा हूं जो देवीदयाल ने कहा है।"

"और वह कागजात ?"

“वह तो उन्होंने लौटा दिए बिना हस्ताक्षर किए।" यह कहकर प्रेम ने ब्रीफकेस खोलकर फाइल सामने रख दी और बोला-"यह रही फाइल, देख लीजिए।"
 
सेठ दौलतराम ने ध्यान से फाइल देखी और उनका चेहरा लाल हो गया। उन्होंने गुस्से से पूछा-"और वह एडवांस का चैक ?"

"उन्होंने साफ इंकार कर दिया कि कोई चैक मिला है।"

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"व्हाट !"

"जी हां सर !"



"मगर चैक तो तुम खुद देकर आए थे।"

"मैंने कहा न कि उन्होंने मुझे पहचानने से इंकार कर दिया।

"तो क्या चैक फाड़कर फेंक दिया ?"

"भला मैं क्या बता सकता हूं।"

"एक मिनट ठहरिए।" सेठ ने इन्टरकॉम का बटन दबाकर रिसीवर कान से लगा लिया। आवाज आई-"यस सर।"

"जरा स्टेट बैंक से पला लगाइए...क्या मास्टर देवीदयालजी के नाम का चैक कैश कर दिया गया है या नहीं।

प्रेम ने कहा-"सर ! उसने तो एकदम तोते की तरह आंखें फेर लीं।"

कुछ देर बाद इन्टरकॉम का बजर बोला और दौलतराम ने रिसीवर उठाकर बटन दबाया और आवाज आई-"सर ! वह चैक कैश करा लिया गया है।"

"ठीक है।" फिर दौलतराम ने रिसीवर रखकर पहलू बदलकर प्रेम से कहा-"सुन लिया तुमने चैक कैश करा लिया गया है।"

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"मुझे तो पहले ही सन्देह था सर।"

"फोन करो वकील को-अब तो वह बंगला दस लाख रूपए में ही बेचना पड़ेगा उस बेईमान को।"

"सर ! एक बात कहूं।"

"हां बोलो।"

"सर ! उसकी ताकत का अंदाजा गलत मत लगाइएगा।"

"क्या मतलब ?"

“सर ! जब मैं वापस लौट रहा था तो मुझे कुछ भ्रम-सा हुआ..मैं वहीं छुप गया...उसने आसपास के सारे गरीबों को काबू में कर रखा है, उनके बच्चों को फ्री कोचिंग देकर वहां का नेता बना बैठा है-वह लोग उस शैतान को देवता समझते हैं और आसपास कितनी झोंपड़िया हैं आपने देखा ही है।"

"तो क्या हुआ ?"

"वह आसानी से बंगले का कब्जा देने वाला नहीं है।"

"हम पुलिस की मदद लेंगे।"

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“सर ! वह लोग सामने आ जाएंगे...मास्टरजी बहुत चालाक हैं-वह गरीबों को लड़ने नहीं देंगे-अगर वह लोग लेट गए तो पुलिस भी कुछ नहीं कर सकती।"

"फिर..!"

"उसकी चाल उसके सिर पर मारनी चाहिए।"

"क्या मतलब ?"

"सर ! एक फाइल ऐसी तैयार करा लें-जिसमें लिखा होगा कि आपने वह दस लाख मास्टर देवीदयाल को स्कूल बनाने के लिए दिए हैं...और जरूरत पर उन्हें दस-बीस लाख और भी देंगे और यह कर्जा बिना ब्याज होगा....बंगला रहन भी नहीं रखा जाएगा।"

"पर...!"

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"और एक और फाइल बनवाऊंगा जिसमें लिखा होगा कि वह बंगला मास्टर देवीदयाल ने सिर्फ तीन महीने की 'मियाद' पर दस लाख रूपए में आपके पास रहन रख दिया है जिसका ब्याज दस परसेंट होगा।"

"ओहो !"

"बस..बड़ी नर्मी से उससे कहें। मास्टरजी, मैंने तो पहले ही आपको स्कूल बनाने के लिए बगैर शर्त के रकम दे रहा था। आपने स्वयं ही खुद्दारी दिखाई और मुझे रहन के कागजात बनाने पड़े...अब यह दस लाख, अगर और जरूरत हो तो आप वह भी देने को तैयार हैं-आप खुद ही फाइल लेकर जाइए।"

"क्या वह दस्तखत कर देगा ?"

"जरूर करेगा।"

"बहुत खूब, मिस्टर प्रेम-तुम्हारे दिमाग का जवाब नहीं।

“सर...आप मेरे दिमाग की दाद तो आगे चलकर देखेंगे जब मेरे 'कारनामे' देखेंगे।"

'

"मगर क्या हम मास्टर देवीदयाल के पास खुद चलकर जाएं...उसके बंगले ?"

"नहीं सर ! यह खतरा तो मैं किसी कीमत पर भी आपको मोल नहीं लेने दूंगा।"

"क्या मतलब ?"

.

"अरे साहब...अब तक तो उसने आसपास के सब गरीबों को भड़का दिया होगा...अगर आप पुलिस के साथ जाएं तो वह आप पर विश्वास नहीं करेंगे-मुलाकात अलग निश्चित करा दूंगा।"

"कहां?"

"आपके वरसोवा वाले कॉटेज में वहां केवल वह होगा-आप होंगे और मैं कोई चौथा नहीं।"

"लेकिन...।"
 
"सर, अगर घी सीधी उंगली से न निकले तो आदमी को उंगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है।"

"क्या मतलब ?"

"मैं उसके सीने पर रिवाल्वर रखकर उससे हस्ताक्षर करा लूंगा।"

"बाद में वह पुलिस में जाएगा।"

"सर ! अगर आप चार-पांच लाख रूपए और भी खर्च कर देंगे तो भी वह बंगला बुरा नहीं है।"

"तुम ठीक कहते हो ?"

"तो फिर मैं आज ही रात को आपकी मुलाकात का बंदोबस्त कराए देता हूं। आप देखिए-मैं क्या चाल चलता हूं।"

"वह क्या ?"

"मास्टर देवीदयाल जैसा धर्मात्मा और महात्मा अगर शराब के नशे में चूर होकर पुलिस स्टेशन पहुंच जाए तो लोगों की नजरों में उसकी इमेज ही क्या रह जाएगी।

“मगर क्या वह शराब पी लेगा ?"

"सर...शराब के साथ 'शबाब' हो तो बड़े-बड़े ऋषि-मुनि बहक जाते हैं-मैं ऐसी सुन्दर युवती लेकर आऊंगा कि वह देवीदयाल को शराब क्या जहर पीने पर मजबूर कर देगी।"

"वैरी गुड, मिस्टर प्रेम...तुम फर्म में सही आदमी हो।"

"मैं उसके फोटोग्राफ भी उतरवा लूंगा और उसे जनता के सामने नंगा करने की धमकी दूंगा।"

"वैरी गुड !" ‘

"तो फिर मैं चलता हूं-पहले दोनों तरह के कागजात तैयार कराऊंगा...उसके बाद देवीदयाल से मिलकर आपके काटेज का पता बताऊंगा और आपका प्यार भरा सन्देश भी पहुंचा दूंगा।"

"ठीक है-मैं आठ बजे कॉटेज पहुंच जाऊंगा।"

“यस...मैं एक 'हसीना' का इन्तजाम करके फौरन बाद हाजिर हो जाऊंगा।"

प्रेम बाहर निकला तो उसके होंठों पर विजय भरी मुस्कराहट खेल रही थी और आंखों में शैतान था।

प्रेम की कार नौरंग सिनेमा के पास रूक गई-उसका मुंह वरसोवा जाने वाली सड़क की ओर था और बैक व्यू मिरर में वह अंधेरी स्टेशन से आने वाले किसी भी जानकार को आसानी से देख सकता था।

लगभग साढ़े सात बजे होंगे, लेकिन मुम्बई की सड़कों पर रात में भी दिन का-सा उजाला रहता है। प्रेम ने डैश बोर्ड से हिसकी का क्वाटर निकाला...उसमें से चूंट भरा...अभी उसने चंद घूट ही लिए थे कि उसे देवीदयाल नजर आ गया जो पैदल ही अंधेरी स्टेशन की ओर से चलकर आ रहा था प्रेम ने उन्हें नवरंग सिनेमा के सामने ही मिलने का समय दिया था।

प्रेम ने जल्दी से एक लम्बा चूंट भरकर क्वाटर को डाट लगाई और डैशबोर्ड में रख दिया...फिर होंठों को साफ करके वह जल्दी से नीचे उतर आया-तब तक देवीदयाल पास पहुंच चुके थे। प्रेम को देखकर वह उसकी ओर बढ़े। प्रेम ने झुकते हुए कहा-"मैं आप ही का इन्तजार कर रहा था।" फिर उसने देवीदयाल के पांव छुए...देवीदयाल ने उसके दोनों कंधे पकड़कर कहा-"अरे! आप क्या करते हैं ?"

"मास्टरजी ! मुझे इन चरणों को स्पर्श करने से मत रोकिए..मेरा बस चले ती मैं चौबीस घंटे इन्हीं चरणों में बैठा रहूं।"

"आप बड़ों का आदर करते हैं...आपका भाग्य भी अच्छा होगा।"

प्रेम ने अगला दरवाजा खोल दिया और देवीदयाल के बैठने के बाद ड्राइविंग सीट सम्भाल ली और कार चल पड़ी...कार की गति तेज थी जैसे देर न हो जाए।

कुछ देर बाद देवीदयाल ने पूछा-"क्या बात हुई सेठजी से ?"

"मास्टर जी ! मैं तो उस दौलत के पुजारी को पूरी तरह बोतल में उतार लिया है....वह अपने किए पर शर्मिंदा है।"

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"और वह चौक का मामला ?"

"वह उन्होंने खुद ही कैश कराया था-अगर खुद ही एक्शन नहीं लेंगे तो उसका कोई महत्व नहीं।"

"धन्य हो भगवान !"

"लेकिन उनकी एक शर्त है।"

"वह क्या ?"

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"वह कहते हैं...मैंने सचमुच पाप किया है-बहुत बड़ा पाप और इस पाप के प्रायश्चित के बिना मुझे

शांति नहीं मिलेगी।
 
..

"कैसा प्रायश्चित ?"

"सेठजी मन से आपके बंगले को एक अच्छे स्कूल के रूप में देखना चाहते हैं...जहां शिक्षा ही फ्री हो और दोपहर का भोजन भी मिले-वह आपके पिताजी के सपने को सच करना चाहते हैं...शिक्षा से और गरीबी दूर होने ही से देश का कल्याण होगा। उनका कहना है कि इस बार सेठजी को रकम लेनी ही पड़ेगी और कर्ज बगैर सूद के।"

"नहीं....!"

"कह रहे थे कि मैं कागजात तैयार कराए लेता हूं मास्टर जी पहले उन्हें इस बार पढ़ लें. इसके बाद घर ले जाएं-अपनी धर्मपत्नी को पढ़ाएं-जब पूरी तसल्ली हो जाए कि मेरी नीयत में खोट नहीं है तब इन पर साइन करके मुझे वापस भिजवा दें।"

देवीदयाल के माथे पर चिन्ता की लकीरें नजर आने लगीं तो प्रेम ने उन्हें कनखियों से देखकर कहा-"आपको सन्देह है कोई ?"

"क्या आपने इस एग्रीमेंट की ड्राफ्टिग खुद कराई है ?"

"वह तो उन्होंने अपने वकील ही से कराई है...मगर मुझे विश्वास है कि इस बार वह कोई विश्वासघात नहीं करेंगे आपके साथ ।"

"मगर..!"

प्रेम ने कार एक किनारे करके रोक ली और बोला

"अगर आपको उनकी नीयत पर कोई सन्देह हो तो आप खुद फैसला कीजिए कि आपको सेठजी से मिलना है या नहीं।"

"देखिए. मैं आपकी जबान पर भरोसा करता हूं।"

"मेरा सौभाग्य है।"

"और आप ही परामर्श दीजिए कि मैं क्या करूं?

सेठजी से मिलूं या न मिलूं ?"

"मेरा विचार है कि जरूर मिल लीजिए. इसमें कोई हानि नहीं है।"

"अच्छी बात है।"

"मैं यह इसलिए कह रहा हूं कि यह धनवान लोग भी उलटी खोपड़ी के होते हैं. हो सकता है आपके न जाने से वह भड़क उठे और आपको किसी प्रकार की विपत्ति का सामना करना पड़ जाए।"

"ठीक है...चलिए।"

प्रेम ने कार स्टार्ट कर दी और बोला-"वैसे मुझे विश्वास है कि वह कोई विश्वासघात नहीं करेंगे...पर मैं भी तो जल्दी ही आ जाऊंगा।"

"आपको कहीं जाना है ?"

"बस-थोड़ी देर का काम है...आपको छोड़कर मुझे जुहू बीच तक जाना है...फिर जल्दी ही लौट आऊंगा।"

"ठीक है।"

प्रेम ने बातों में रिझाने के लिए कहा-"आपकी एक ही बेटी है।"

"हां-सुनीता।"

"बड़ी प्यारी बच्ची है..चेहरे से लक्ष्मी का रूप मालूम होती है।"

"मेरे जीवन की ज्योति है मेरी सुनीता।"

“निःसंदेह.ऐसी होनहार बच्ची को जीवन ज्योति ही कहा जा सकता है...जिस घर में जाएगी उस घर के लोगों का जीवन रोशन कर देगी।"

"भगवान...आपकी जबान शुभ करे।"

"आपने उसके लिए कोई रिश्ता भी सोचा है ?"

"अभी उसकी उम्र ही क्या है...बड़ा समय-पढ़ रही है।"

"मास्टर जी, लड़की देखते-देखते जवान हो जाती है...ऐसी होनहार बच्ची के लिए तो पहले ही कोई अच्छा होनहार, खानदानी लड़का नजर में रखना चाहिए।"

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"अभी स्कूल बनवाने से तो फुर्सत मिल जाए।"

"अगर आज्ञा हो तो इस भले काम मैं आपकी कोई मदद करूं ? एक लड़का है मेरी नजर में...उमर तेरह बरस की होगी, मगर अभी से हाईस्कूल में पहुंच गया है-बड़ा होकर डाक्टर बनने का सपना है उसका, शक्ल भी अच्छी, सेहत भी अच्छी है, गुण भी अच्छे हैं...कोई बुरी लत नहीं।"

"क्या नाम है ?"

"शक्ति...शक्ति शर्मा।

"माता-पिता कौन हैं ?"

"अब आप छोटा मुंह बड़ी बात समझेंगे...उसे आप अपना ही बेटा समझ लीजिए।"

"ओहो....तो आपका बेटा है ?"

"मगर मैं इसलिए उसकी प्रशंसा नहीं कर रहा-कभी खुद ही देख लें-परख लें।"

"अरे...आपको देख लिया तो उसे देख लिया।"

इतने में कॉटेज आ गया-प्रेम ने कॉटेज के सामने कार रोककर इशारे से बताया-"यही कॉटेज है सेठ साहब का इस वक्त अकेले होंगे और आपका इन्तजार कर रहे होंगे-मैं बस थोड़ी देर में आ जाऊंगा।"

फिर देवीदयाल कार से उतर गया। प्रेम ने गियर डाला और कार आगे बढ़ाकर 'यू टर्न लेने लगा...देवीदयाल का दिल धड़क रहा था-कॉटेज की ओर बढ़ते हुए उन्हें कुछ अजीब-सा महसूस हो रहा था। उन्होंने कम्पाउंड में पहुंचकर भगवान को याद किया...चंद क्षण के लिए उनका जी चाहा कि वह लौट जाएं। कम्पाउंड में सेठ की गाड़ी खड़ी थी...कुछ अजीब-अजीब-सा सन्नाटा था-वह किसी फैसले पर नहीं पहुंचे थे कि अचानक दरवाजा खुला और कैलाश बाहर आया...वह चौंक गया और उसने देवीदयाल को ध्यान से देखते हुए पूछा-"कहिए।"

"वो...क्या नाम...सेठजी अंदर हैं।"

"जी हां...मगर...।"

"मुझे उन्हीं से मिलना है।"



"आपका शुभ नाम ?"

"देवीदयाल शर्मा ।"

कैलाश चौंककर बोला-“देवीदयाल जी....वही स्वतंत्रता सेनानी।"

"हां।"

कैलाश का चेहरा खुशी से खिल उठा...उसने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कहा-"धन्य भाग्य मेरे-लोगों से आपके बारे में सुना था...आज दर्शन भी हो गए।"

देवीदयाल के दिल को थोड़ा सन्तोष मिला, क्योंकि कैलाश चेहरे और आंखों से सीधा, सच्चा और साफ दिल नजर आ रहा था। अचानक अंदर से आवाज आई-"कौन है कैलाश ?"
 
कैलाश का चेहरा खुशी से खिल उठा...उसने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कहा-"धन्य भाग्य मेरे-लोगों से आपके बारे में सुना था...आज दर्शन भी हो गए।"

देवीदयाल के दिल को थोड़ा सन्तोष मिला, क्योंकि कैलाश चेहरे और आंखों से सीधा, सच्चा और साफ दिल नजर आ रहा था। अचानक अंदर से आवाज आई-"कौन है कैलाश ?"

कैलाश ने जल्दी से मुड़कर कहा-"मालिक ! देवीदयालजी पधारे हैं।"

"ओह ! मास्टर जी !" सेठ दौलतराम खुद बाहर निकल आए और उन्होंने हाथ जोड़कर कहा

"आप बाहर क्यों खड़े हैं-अंदर आ जाइए न।"

फिर कैलाश से बोले-“तुम गाड़ी लेकर आओ।"

"नहीं मालिक, मैं बस से चला जाऊंगा।"

"कब तब आ जाओगे ?"

"दो घंटे तो लग ही जाएंगे।" कैलाश ने कहा।

"ठीक है...जाओ।

कैलाश ने देवीदयाल को नमस्ते किया और चला गया। जाते-जाते उसने फाटक बंद कर दिया। दौलतराम, देवीदयाल को लेकर अंदर आ गए और दरवाजा बंद करते हुए बोले-“पधारिए मास्टर जी-आज तो मेरे कॉटेज के भाग्य खुल गए।" उन्होंने बड़े आदर से देवीदयाल को एक कीमती सोफे पर बिठाया और एक अलमारी खोलते हुए बोले-"बोलिए मास्टर जी, क्या सेवा करूं ?"

देवीदयाल ने जल्दी से कहा-"अरे नहीं सेठ साहब...मैं तो हाथ भी नहीं लगाता।"

सेठ दौलतराम हंसकर बोला-"मैं जानता हूं...आप जैसा महात्मा भला कैसे पी सकता है...यह तो हम जैसे शैतानों ही का काम है।"

"अरे...नहीं।"

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"मैं पूछ रहा था ठंडे में क्या पसंद करते हैं ?"

"ठंडा शुद्ध जल ।

“ऐसा भी क्या, चलिए 'कोक' ले लीजिए।"

"आप कहते हैं श्रद्धा से तो कोक ले लूंगा।"

सेठ दौलतराम ने हंसकर फ्रिज से कोकाकोला की वह बोतल निकाली जिसमें पहले ही से बहुत कम कड़वी वाली हिस्की मिली हुई थी थी...और यह इन्तजाम प्रेम करके गया था।

सेठ दौलतराम ने बोतल खुद ही खोलकर देवीदयाल के समाने रखते हुए कहा-"आज मैं एक महान हस्ती के साथ चीयर्स करूंगा।"

देवीदयाल भी मुस्कराकर रह गए। सेठ ने अपने लिए एक छोटा पैग हिस्की का बनाया और देवीदयाल के गिलास के साथ टकराकर 'चीयर्स' कहा...देवीदयाल को कोक में कड़वाहट का एहसास तक नहीं हुआ।

"सुनाइए मास्टर जी।" सेठ ने कहा।

"क्या सुनाऊं? सुनाने योग्य तो सब कुछ आप जैसे लोगों के पास ही होता है।"

सेठ ने मुस्कराकर कहा-"होता तो आपके पास भी बहुत कुछ है, लेकिन आपलोग छुपे रूस्तम होते हैं, बताते नहीं।"

देवीदयाल मुस्कराकर रह गए। सेठ ने कहा-"प्रेम से सब कुछ मालूम हो गया था।"

"जी-मुझे भी।"

"उसने बताया कि आगे क्या करना है ?"

"जी हां।"

"फिर क्या सोचा आपने ?"

"अब आप इतनी श्रद्धा से आदेश दे रहे हैं तो भला मैं कैसे टाल सकता हूं।"

"मुझे भी आपसे यही आशा थी।" फिर सेठ ने घड़ी देखकर कहा-“यह प्रेम कहां रह गया है ?"

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"कह रहा था कि आप ही के किसी काम से जुहू तक जाना है।

"हां, याद आ गया...तो फिर आने दीजिए प्रेम को।"

"जैसे आपकी आज्ञा ।"

सेठ ने चूंट लेकर कहा-“ऐसा कीजिए-कर्जे के कागजात की जो ड्राफ्टिग की है, आप उसे प्रेम के आने तक पढ़ लीजिए। मैं यही ले आता हूं।"
 
फिर सेठ अंदर वाले कमरे में चला गया और दरवाजा बंद होने से साऊंड प्रूफ हो गया। इतने में फोन की घंटी बजी-सेठ ने रिसीवर उठाकर कान से लगा लिया-"हैलो !"

"सेठजी...मैं प्रेम बोल रहा हूं।"

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"हां प्रेम, बोलो।"

"बकरा पहुंच गया होगा और आपने कोक पिला दी होगी।"

"हां-आधी पी गया है-मगर तुम क्या कर रहे हो ?"

"मैं 'शबाब' का इन्तजाम कर रहा हूं-तब तक शराब का नशा चढ़ जाने दीजिए।

"ठीक है।"

"अब आप तो अंदर हैं न ?"

"हां-आज फोन अन्दर ही है।"

"बकरा क्या कर रहा है ?"

"ड्राफ्टिग पढ़ रहा है।

"आप अंदर कैसे आ गए ?"

“फाइल लेने के लिए।

"ऊपर वाली फाइल नकली है जो उसे पढ़ाई जानी है...नीचे वाली असली है-आप ऊपर वाली पढ़वाकर रख लें...दस्तखत मैं आकर करवा लूंगा।"

"ठीक है...मगर फाइल बदलोगे कैसे ?"

"यह आप मुझ पर छोड़ दें।"

"ठीक है।"

"याद रखिएगा, ऊपर वाली फाइल नकली है।"

फिर दूसरी ओर से डिस्कनेक्ट होने पर सेठ ने रिसीवर रख दिया और प्रेम वाला ब्रीफकेस खोलकर ऊपर वाली फाइल निकाल ली और बाहर आ गया। दौलतराम ने ऊपर वाली फाइल निकाल ली और फिर बाहर आ गया। देवीदयाल कोक का गिलास खाली कर चुके थे और उनके ऊपर हल्का-सा नशा छा रहा था। वह मुस्कराते हुए बोले-"आ गए सेठजी।"

"हां..यह रही फाइल, पढ़ लीजिए।" और फाइल बढ़ाते हुए बोले-"आप भी क्या याद करेंगे-इससे बढ़िया डील कहीं भी नहीं मिलेगी।"

देवीदयाल फाइल लेकर पढ़न लगे। सेठ दौलतराम के गुमान में भी नहीं था कि नकली फाइल नीचे वाली थी। जिस फाइल पर देवीदयाल के हस्ताक्षर लेने थे वह ऊपर वाली थी लेकिन यह चाल प्रेम ने खेली थी।

सेठ दौलतराम ने अपने लिए पैग बनाया और धीरे-धीरे चूंट भरते हुए देवीदयाल को इस तरह देखने लगे जैसे देवीदयाल फाइल पढ़कर खुशी से उछल पड़ेंगे।

उधर देवीदयाल ज्यों-ज्यों फाइल पढ़ते जाते, उनके चेहरे का रंग बदलता जाता और आंखें लाल होती जा रही थीं...उन पर हल्का-सा नशा भी तारी हो चुका था इसलिए उन्हें अब डर भी नहीं लग रहा था। जब वह पूरी फाइल पढ़ चुके तो सेठ ने मुस्कराते हुए उनकी तरफ देखा और पूछा-"कहिए मास्टर जी।"

"क्या कहूं ?"

"पसंद आई ड्राफ्टिग।"

"बहुत ज्यादा।"

"मुझे विश्वास था कि आपको पसंद आएगी।"

देवीदयाल ने गुस्से से कहा-"और मुझे विश्वास था कि आप फिर मेरे साथ दगा करने वाले हैं...धोखाधड़ी।"

अचानक सेठ की भवें तन गईं...उन्होंने गुस्से में देवीदयाल से कहा-"क्या मतलब ?"

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"मतलब आप खूब समझते हैं-क्या लिखा है इसमें आपने।"

"आपको स्कूल बनाने के लिए कर्जा देने को लिखा है।"
 
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