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Romance लव स्टोरी

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काम करते-करते थककर राज थोड़ी देर आराम करने के लिए कार के मडगार्ड पर बैठ गया और कारीगर से बोला, “जरा बाहर वाले से एक चाय तो मंगवाओ।”

कारीगर दौड़ता हुआ बाहर चला गया। राज पैकेट निकाल कर सिगरेट सुलगाने लगा। कार के मालिक सूटेड-बूटेड व्यक्ति ने अखबार पढ़ते-पढ़ते राज की ओर देखा और मुंह बनाकर बोला, “भई! मुझे जरा जल्दी है....”

“आप ही का काम हो रहा है साहब।” राज ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा, “दो घण्टे से अधिक हो गए लगे लगे-चन्द मिनट सुस्ताने तो दें।”

“सुस्ताने के लिए तो पूरी रात पड़ी है...” वह व्यक्ति झल्लाकर बोला, “मैं लेट हो गया तो मैनेजर से भेंट भी न हो सकेगी...”

राज उठ खड़ा हुआ। उसने सिगरेट के दो गहरे कश लिए और उस व्यक्ति की आंखों में देखता हुआ बोला, “यहां जो भी काम कराने आता है हवा के घोड़े पर सवार आता है....हम लोग इन्सान है मशीन नहीं कि थकान का भान ही न हो....और फिर मशीन को भी आराम की आवश्यकता होती है।”

राज के तेवर देखकर व्यक्ति कुछ नर्म पड़ गया और खुशामद भरे स्वर में बोला, “तुम नहीं समझ सकते भाई। यह मेरे भाई के भविष्य का प्रश्न है....मुझे हर हालत में पांच बजे से पहले जेमसन कम्पनी के मैनेजर से मिलना है। मेरा भाई इंजीनियर है....मैं जेमसन कम्पनी के मैनेजर के नाम एक सिफारिशी पत्र लाया हूं....यदि काम बन गया तो मेरे भाई को पांच हजार रुपये महीने की नौकरी मिल जाएगी।”

राज ने ध्यान से उस व्यक्ति के चेहरे को देखा....कितनी तड़प थी अपने भाई के लिए इस व्यक्ति के चेहरे पर....राज के हृदय में एक ज्ञात-सी हूक उठी....उसी समय कारीगर चाय लेकर आ गया राज ने कहा, “पी ले तू....मैं थोड़ी देर बाद पी लूंगा।”

राज कार के पास आ गया। उस व्यक्ति के चेहरे पर धन्यवाद कहती हुई मुस्कराहट आ गई। वह राज के पास खिसककर बोला‒

“क्षमा करना मिस्त्री....मैं झुंझलाहट में जरा कठोर शब्दों में कुछ कह गया था। तुम नहीं जानते मैं अपने भाई के लिए कितना चिन्तित हूं....बड़ी कठिनाई से मैंने उसे इंजीनियरिंग पढ़ाई है....किन्तु, दो वर्षों से बेकार फिर रहा है;...कहते हैं हिन्दुस्तान में टैकनिकल हैन्डस का अभाव है....हजारों युवक इंजीनियरी पास करके बेकार फिर रहे हैं।”

“जब हर तीसरा व्यक्ति इंजीनियर बन जाएगा तो यही होगा।” राज ने रेंच चलाते हुए कहा, “आप उसके बड़े भाई हैं?”

“बड़ा भाई ही छोटे भाई के भविष्य के लिए इतना चिन्तित हो सकता है....बेकार फिरते-फिरते लड़का बिगड़ा जा रहा है....मैं उसका मन नहीं तोड़ सकता.....जो मांगता है खर्च के लिए देता हूं....कहीं वह यह न समझने लगे कि बड़ा भाई मेरी बेकारी से तंग आ गया है और अब पीछा छुड़ाना चाहता है।”

राज के मन में एक विचित्र-सी हलचल हो रही थी....एक हूक....एक कसक....एक विशेष सी तड़प....उसने उस व्यक्ति से पूछा‒

“क्या नौकरी है जेमसन एण्ड जेमसन में....”

“नौकरी क्या? कुछ समय गुजरना है......वास्तव में मेरी अपनी फैक्टरी में ही काम निकलने वाला है....किन्तु चन्द महीने और भाई बेकार रहा तो बिल्कुल नाकारा हो जाएगा....दोस्त-यार बस हा-हा, हू-हू के ही साथी होते हैं....इसीलिए सोचा है जेमसन एण्ड जेमसन में कुछ दिन लगा रहेगा तो कम से कम समय अनुकूलता तो सीख जाएगा....मैं जानता हूं वह बहुत सख्त काम नहीं कर सकता...जेमसन एण्ड जेमसन अपने यहां तैयार होने वाली कारों के कुछ खास पुर्जे विदेश से मंगवाती है....किन्तु धीरे-धीरे इन पुर्जों को भारत में तैयार करने की योजना बन रही है....उनमें से एक पुर्जा ऐसा है जो यहां के बड़े-बड़े इंजीनियरों को भी चक्कर में डाले हुए है। उस पुर्जे की तैयारी के लिए फर्म छः छः महीने के लिए इंजीनियर नौकर रखती है....छः महीने तक वह सफल नहीं होते तो समझौते के अनुसार उन्हें अलग कर दिया जाता है और नये किसी इंजीनियर को प्रयोग का अवसर दिया जाता है। मैं जानता हूं मेरा भाई वह पुर्जा नहीं बना सकता किन्तु छः महीने तक पांच हजार रुपये महीना तो कमा ही लेगा....यदि छः महीने बाद भी कोई काम न मिला तो पैसे से कोई धंधा ही कर लेगा।”

“किन्तु यह तो अच्छी बात नहीं, यह तो केवल स्वार्थता है....आप जानते हैं कि आपका भाई वह पुर्जा नहीं बना सकता, फिर भी आप उसे वह नौकरी दिवाना चाहते हैं....यह तो समाज और देश से द्रोह होगा।”

“अरे भई आजकल अपने कर्तव्यों में कौन ईमानदारी बरतता है....आपने सुना नहीं गंगा के उस पुल के विषय में जिसका बजट तैयार हुआ, पुल कागजों पर बना, रकम दे दी गई और जब निरीक्षण के लिए सरकारी कमीशन गया तो उस स्थान पर कभी कोई पुल नहीं बना था।”

राज कुछ न बोला। वह चुपचाप इंजन की मरम्मत करता रहा।

दस मिनट बाद कार ठीक हो गई। उस व्यक्ति ने मरम्मत का बिल चुकाया और इतनी शीघ्र काम पूरा करने पर राज का धन्यवाद करके चला गया। उसके चले जाने के बाद राज ने सिगरेट सुलगाया और वहीं एक दूसरी गाड़ी के मडगार्ड पर बैठते हुए उसने एक कारीगर को चाय लाने के लिए कहा। उसकी दृष्टि अचानक ही उस अखबार पर पड़ी जिसे वह व्यक्ति पढ़ रहा था। राज ने अखबार उठा लिया। अखबार तह किया हुआ था और सबसे ऊपर ही एक इश्तहार पर राज की दृष्टि पड़ी जिसके गिर्द लाल पेंसिल से हाशिया खींच दिया गया था। यह अखबार वह व्यक्ति शीघ्रता में यहीं भूल गया था। इश्तहार के बीच में एक पुर्जे की तस्वीर थी जिसे बनाने के लिए जेमसन कम्पनी को किसी कुशल इंजीनियर की आवश्यकता थी।

राज बड़े ध्यान से उस पुर्जे की तस्वीर देखता रहा।

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शंकर ने राज को मुस्कराकर देखा और बोला‒

“आओ बैठो....आज इधर कैसे चले आए?” फिर शंकर ने नौकरानी को पुकारा, “जरा दो प्याली चाय बना देना काकी।”

“यह इश्तहार देखा है तुमने दादा?”

शंकर ने विज्ञापन पर एक दृष्टि डाली और मुस्कराकर बोला, “तो तुम्हारे दिमाग में यह सनक समा गई?”

“मैं समझा नहीं...” राज ने आश्चर्य से पूछा।

“इस चक्कर में पड़कर मैं भी अपना बहुत-सा समय और धन नष्ट कर चुका हूं।” शंकर ठंडी सांस लेकर बोला, “वास्तव में मुझे यह जेमसन एण्ड जेमसन कम्पनी की सनक ही लगती है....इसमें शायद वे लोग कभी सफल न हों....जेमसन एण्ड जेमसन विभाजन से पूर्व एक यूरोपियन फैक्टरी थी....इस फैक्टरी की बड़ी फैक्टरी इंग्लैंड में, हैम्पशायर में है। यहां वह फर्म यूरोप में खुली गाड़ियों का आयात करके असेम्बल करती थी। जो-जो पुर्जे यहां तैयार होते गए उनका आयात बन्द होता गया....जो पुर्जे यहां न बन सके वे हैम्पशायर से आते रहे.....अब एक पुर्जे को छोड़कर शेष सभी पुर्जे यहां बनते हैं....इस एक पुर्जे को यूरोप से ही इम्पोर्ट करते हैं.....और यूरोप वालों ने इसका मूल्य इतना बढ़ा दिया है कि मुबादले की बहुत-सी धनराशि इसमें चली जाती है। पिछले दो वर्षों से जेमसन वाले इस पुर्जे को देश में ही बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं। पहले ये लोग अपने नियुक्त इंजीनियरों से प्रयोग करवाते रहे और जब उनके अपने इंजीनियर यह बनाने में सफल न हो सके तो उन्होंने देश-भर में विज्ञापन द्वारा इस पुर्जे को बनाने के लिए आमंत्रित किया। आरम्भ में वे प्रत्येक इंजीनियर को एक-डेढ़ महीने के लिए नियुक्त करते थे और असफल होने पर वह अलग कर दिया जाता था किन्तु बाद में यह अनुभव किया गया कि एक-डेढ़ महीना इतने प्रयोग के लिए थोड़ा है इसका समय बढ़ा कर छः महीने कर दिया गया और वेतन पांच हजार रुपया....किन्तु खेद यह है कि हमारे देश में राष्ट्रीय और सामाजिक, लाभों की अपेक्षा निजी लाभ उत्तम समझे जाते हैं....सुना गया है कि जेमसन एण्ड जेमसन कम्पनी में ऐसे-ऐसे इंजीनियर नियुक्त हुए हैं जो निर्माण शक्ति और बुद्धि में बिल्कुल कोरे थे.....बड़े-बड़े मन्त्री और अधिकारीगण पूंजीपतियों की सिफारिशें लेकर पहुंचे हैं और खाया-पिया है, मौज की है और निश्चित समय के बाद निकल आए हैं....इसलिए जेमसन एण्ड जेमसन निराश भी हो गए हैं और इस प्रकार की नियुक्ति बड़ी सावधानी से करते हैं ताकि फर्म का धन व्यर्थ में न जाए....साथ ही अब उन्होंने इस प्रकार की योजना भी रखी कि इस पुर्जे के निर्माण के लिए यह आवश्यक नहीं कि इंजीनियर केवल डिग्री पाया हुआ ही हो....यदि कोई और कारीगर भी इसे ठीक से बना सके तो वे उसका स्वागत करेंगे और न केवल उसे इस सफल प्रयोग के लिए कम्पनी की ओर से पचास हजार रुपया मिलेगा बल्कि वह आजीवन वेतन पर फर्म का अधिकारी बना दिया जाएगा...छः महीने के एग्रीमेंट पर सफल प्रयोग करने पर इंजीनियर का समय आवश्यकता अनुसार बढ़ाया भी जा सकता है...इसके अतिरिक्त निजी तौर पर भी स्वयं कोई यह पुर्जी तैयार करके कम्पनी की तसल्ली कर सकेगा, तो भी कम्पनी यह सब लाभ उसे देगी। इस सम्बन्ध में मैंने स्वयं भी महीना-भर तक सिर खपाया और छः-सात हजार रुपया भी नष्ट किया किन्तु सफल न हो सका...हार कर मैंने इस ओर ध्यान देना ही छोड़ दिया।”

“ऐसी क्या बात है इस पुर्जे में?”

“यह तो समझ में नहीं आता...किन्तु यह पुर्जा इतना महत्वपूर्ण है कि न केवल जेमसन एण्ड जेमसन की तैयार की हुई एक विशेष मॉडल की गाड़ी में इसका प्रयोग होता है बल्कि इसी प्रकार के मॉडल की दूसरी फर्मों की गाड़ियों में भी सुविधा से चलता है...यदि जेमसन एण्ड जेमसन इस प्रयोग में सफल हो गई तो न केवल अपनी ही गाड़ियों के विषय में वह आत्म-निर्भर हो जाएंगे बल्कि दूसरी फर्मों को भी इसकी सप्लाई कर सकेंगे...इस प्रकार लाखों पौंड वार्षिक की मुबादले की राशि की बचत हो जाएगी...किन्तु; जेमसन एण्ड जेमसन इस प्रोजेक्ट पर लाखों रुपये खर्च करने पर भी सफल नहीं हुई।”

राज चुपचाप सोच में डूबा बैठा रहा। शंकर ने ध्यानपूर्वक उसका चेहरा देखा, फिर मुस्कराकर बोला, “इस सनक को मन से निकाल दो राज! वरना जो कुछ कर रहे हो वह भी हाथ से निकल जाएगा!”

“साथ में कुछ-न-कुछ तो प्राप्त हो ही जाएगा।” राज ने गम्भीरता से कहा।

इतने में काकी चाय लेकर आ गई। राज और शंकर प्यालियां उठाकर धीरे-धीरे चुस्कियां भरने लगे। कुछ देर बाद राज ने धीरे से पूछा, “कोई ऐसी भी गाड़ी अपने गैरेज में है जिसमें यह पुर्जा प्रयोग होता है?”

“मेरी निजी कार ही टूटी पड़ी है...एक कारीगर ने ट्रक से एक्सीडेन्ट कर दिया था।”

“मैं उसमें से यह पुर्जा निकाल लूंगा।”

“तुम अपना निश्चय बदलोगे नहीं?”

“यही तो पागलपन है मेरे दिमाग में...जो निश्चय एक बार कर लूं...उसे बदल नहीं सकता।”

“कोई बात नहीं...” शंकर मुस्कराया, “तुम भी अपना पागलपन आजमा लो...गैरेज का एक भाग अपने प्रयोग के लिए अलग कर लो...जिन कल-पुर्जों और हथियारों की इसके लिए आवश्यकता पड़ सकती है वह मैं अपने प्रयोग के लिए खरीद ही चुका हूं...तुम्हें दो-चार हजार से अधिक रुपये नहीं लगाने पड़ेंगे...इस सम्बन्ध में जो सहायता मुझसे बन पड़ेगी वह भी दूंगा...सम्भव है इस काम पर अभी तक किसी ने मन लगाकर गम्भीरता से एकाग्र होकर ध्यान ही न दिया हो...मेरा दिमाग बुढ़ापे की ओर अग्रसर है, तुम युवक हो, तुम्हारी बुद्धि तीव्र है...मैं तुम्हारी लगन और धुन भी देख चुका हूं...मैं शीघ्र निराश हो गया था, यदि एक महीना और जमकर लगा देता तो शायद सफल हो जाता...हो सकता है तुम्हारा धन और लगन तुम्हें सफलता की मंजिल तक पहुंचा दें...कल ही काम आरम्भ करने के लिए दो हजार रुपये ले लेना।”

“इसकी आवश्यकता नहीं दादा! दस-बारह हजार तो मेरे पास भी निकल आएंगे...” राज ने गंभीरता से कहा।

“दस-बाहर हजार?” शंकर ने आश्चर्य से पूछा।

“हां दादा! मैंने केवल कमाया है गंवाया नहीं...जब से गैरेज का काम संभाला है गैरेज और घर के बाहर की दुनिया से अनभिज्ञ हूं...दूसरे मिस्त्रियों के समान थकान से मुक्ति पाने के लिए दस-पांच रुपये ठर्रे या व्हिस्की पर नष्ट नहीं करता...थ्री फाइव मेरे प्रिय सिगरेट थे किन्तु अब मैं कैवेण्डर पीता हूं.....”

शंकर ध्यान और आश्चर्य से राज को देखता रहा, फिर धीरे से बोला, “थ्री फाइव...यह सिगरेट तो कोई करोड़पति या राजकुमार ही पी सकता है...”

“मैं भी अपने समय का प्रिंस हूं...” राज फीकी-सी मुस्कराहट के साथ बोला, “किसी पतलून पर उंगली का हल्का-सा दाग लग जाता तो उसे उतारकर लांडरी भिजवा देता था।”

“तुम्हारी सूरत और व्यवहार से तो यही प्रतीत होता है कि तुम किसी धनी और ऊंचे घराने के सदस्य हो...किन्तु तुमने किस प्रकार अपने-आपको हालात के सांचे में ढाला है, भगवान की कसम, राज! मैं विश्वास से कहता हूं कि तुम जिस काम पर भी लग जाओ उसमें कोई शक्ति सफल होने से नहीं रोक सकती...”

राज के चेहरे पर एक दृढ़ निश्चय झलक उठा।

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सुषमा टिफिन-कैरियर बन्द करते-करते चौंक पड़ी...उसने कोठरी के सामने किसी गाड़ी के इंजन का झन्नाटा सुना था जो तुरन्त ही बन्द हो गया...फिर चन्द ही क्षण बाद चन्दर ने कोठरी में प्रवेश किया...उसके चेहरे पर थकान के चिन्ह थे। चन्दर ने एक दृष्टि सुषमा की ओर डाली और मटके की ओर बढ़ता हुआ बोला, “ला, शीघ्र से खाना निकाल दे...यह राज अभी तक खाना खाने नहीं आया।”

“वह तो सप्ताह-भर से रात को भी नहीं आ रहे...मैं ही खाना पहुंचा देती हूं...” सुषमा खाना निकालते हुए बोली, “मेरी समझ में नहीं आता तुम दोनों को क्या हो गया है...तुम दिन-रात भर टैक्सी चलाते हो और वह चौबीस घण्टे मशीनरी से उलझे रहते हैं...आखिर इतना धन कमाकर तुम लोगों को महल खड़े करने हैं क्या?”

“महल भी खड़े किए जा सकते हैं।” चन्दर हाथ पोंछकर पटरे पर बैठता हुआ बोला, “तू नहीं जानती राज क्या कर रहा है...चौबीस-चौबीस घण्टे के निरन्तर परिश्रम के साथ ही दस-बारह हजार रुपया अपना भी लगा चुका है...दो-चार हजार शंकर दादा से लेकर समाप्त कर चुका है...यदि मैं रात-रात भर टैक्सी न चलाऊं तो उसका यह पागलपन यहीं का यहीं रह जाए।”

“आखिर मैं भी तो सुनूं कैसा पागलपन है यह, जिसमें इतना समय और धन नष्ट किया जा रहा है...”

“नष्ट नहीं किया जा रहा पगली! यह वह दांव लगाया जा रहा है जो भगवान से जुआ खेलते समय लगाया जाता है...मुझे विश्वास है कि लगन और उसके परिश्रम के आगे भगवान यह दांव अवश्य ही हारेगा...और जानती है फिर क्या होगा?” चन्दर ने ठंडी सांस ली और मुस्कराकर बोला, “हम इस कोठरी में रह जाएं शायद और राज पलक झपकते ही जाने कहां पहुंच जाए।”

सुषमा चुपचाप खाना निकालने लगी।

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चन्दर ने फाटक के पास टैक्सी रोककर सुषमा को उतार दिया और सुषमा टिफिन का डिब्बा उठाये हुए भीतर चली आई। गैरेज के एक कोने से किसी मशीनरी के चलने की ध्वनि सुनाई दे रही थी। सुषमा उसी ओर बढ़ गई। वह उस शेड के पास पहुंचकर रुक गई। जहां राज बड़ी तन्मयता से हाथ चला रहा था। उसके बाल बिखरे हुए थे और दाढ़ी बढ़ी हुई थी मानो कई दिन से शेव न बनाया हो...उसे सुषमा के अपने निकट पहुंचने की भी सूचना नहीं हुई।

सुषमा चुपचाप राज का चेहरा देखती रही...यह राज का चेहरा कहां था? यह तो एक फौलादी चट्टान का चेहरा था जिससे एक अलौकिक प्रकाश फूट रहा था....थोड़ी देर बाद सुषमा ने राज के कंधे पर धीरे से हाथ रख दिया....राज चौंका नहीं....वह निरन्तर हाथ चलाता रहा....उसके होंठों पर एक सन्तोषजनक मुस्कराहट रेंग गई।

“सुषमा आ.....गईं तुम....”

“थोड़ी देर तो आराम कर लीजिए....” सुषमा ने धीरे से कहा।

“आज की रात आराम की रात नहीं है सुषमा!” राज का हाथ वैसा ही चल रहा था, “कल का सूरज तुम्हारे राज के लिए एक नया प्रकाश लेकर आने वाला है।”

“इतने ही समीप हो सफलता के?”

“सफल हो चुका हूं सुषमा! गगनमुखी पर्वत टुकड़े-टुकड़े हो चुका है....अब तो केवल मार्ग साफ कर रहा हूं....”

राज के मुख पर उन्माद भरी मुस्कराहट थी और आंखों से एक विचित्र प्रकाश फूट रहा था। सुषमा के शरीर में एक प्रसन्नता की झुरझुरी-सी दौड़ गई....उसने राज के कंधे से सिर लगा दिया और धीरे से बोली, “खाना तो खा लो....”

“हां अवश्य खाना खाऊंगा....” राज ने अचानक मशीन बन्द कर दी।

फिर धीरे से राज सुषमा की ओर मुड़ा और उसे दोनों कंधों से पकड़कर उसकी आंखों में झांकता हुआ बोला, “आज मैं कांटों-भरे मार्ग से गुजरकर सफलता की उस मंजिल पर पहुंच चुका हूं सुषमा! जहां मेरे सपनों की तस्वीरें मेरे पांव में शीश नवा रही हैं....जानती हो मुझे यह सफलता किसने प्रदान की है।”

“आपके साहस ने....आत्मविश्वास ने...”

“नहीं, सुषमा....साहस आत्मविश्वास, मन की दृढ़ता ये मानव के मजबूत हथियार हैं जिन्हें उठाने वाले हाथ में एक शक्ति की भी आवश्यकता होती है....एक बल चाहिए....और उस हाथ में शक्ति नहीं उत्पन्न हो सकती जिस हाथ के हृदय में प्यार नहीं....प्यार मानव को हर निश्चय और साहस प्रदान करता है जो संसार की कोई भी दूसरी शक्ति नहीं कर सकती....कई अच्छे-अच्छे मस्तिष्क केवल इसलिए नष्ट हो जाते हैं कि उन्हें प्यार की शक्ति नहीं मिलती....वे इस अमृत से वंचित रहते हैं....उनकी कला और निर्माण-शक्ति निराशा और झुंझलाहट का शिकार हो जाती है जो दुनिया उन्हें घृणा और ठोकरों के रूप में देती है....प्यार....मां का हो, भाई का हो, बहिन का हो....या अपने प्रीतम का प्यार हो....मानव के लिए बहुत बड़ा आश्रय, बहुत बड़ी शक्ति है....मुझे शक्ति तुमसे मिली है....चन्दर से मिली है....आज तुम लोगों की प्रेरणा मेरे साथ न होती तो मैं सचमुच शायद एक दीवाना राज होता....किन्तु आज...जानती हो....जब मैं चौबीस घन्टे तक काम करता हूं....और रात का वह समय निकट आता है जब तुम मेरे लिए खाना लेकर आती हो तो मेरे अन्तर में एक नया निश्चय एक नया साहस जन्म लेता है....एक नई ताजगी मिलती है.....और जब तुम सामने आती हो तो मेरी सारी थकान दूर हो जाती है।”

“राज बाबू!” सुषमा बड़े स्नेह से राज के कंधे से लग गई।

दूसरी सुबह सबसे पहले शंकर गैरेज में आया। गैरेज में गहरा सन्नाटा था.....जिस शैड में राज काम करता था वहां भी मौन था.....मशीनरी बन्द थी। शंकर का हृदय किसी अज्ञात शंका से धड़क उठा। वह धीरे-धीरे बोझल पांव से शैड की ओर बढ़ा। एकाएक वह राज को देखकर चौंक पड़ा। राज अपनी मैली-कुचैली डांगरी में जमीन पर चित-लेटा हुआ गहरे खर्राटे ले रहा था.....टोपी से उसका चेहरा ढका हुआ था और दोनों हाथ सीने पर बंधे हुए थे....उसके हाथ में कई स्थानों पर खराशें थी जिनमें कालिख की लकीरें भरी हुई थीं....शंकर का मन डूब-सा गया। उसने बड़बड़ाए स्वर में पुकारा, “राज....!”

राज की नींद शायद टूट गई, क्योंकि खर्राटों का तांता सहसा रुक गया। चन्द क्षण बाद ही राज ने हल्की-सी एक सिसकी ली और उसका हृदय बुरी तरह धड़क उठा....फिर उसकी सिसकियां कुछ तेज हो गईं। शंकर के चेहरे पर कई सलवटें-सी उभर आईं;...वह धीरे से बोला, “पागल हुआ है लड़के! आदमी दांव लगाता है तो दोनों में से एक चीज मिलती है....या हार, या जीत....हारने वाला यदि तुम्हारे ही समान हाथ-पैर छोड़ बैठे तो आदमी जीवन के प्रति ही निराश हो जाए...चल, उठ खड़ा हो। नरक में झोंक सब कुछ....तू एक कुशल मिस्त्री है और वह हुनर तुझसे कोई नहीं छीन सकता...”

फिर शंकर अपनी डबडबाई आंखों को छिपाने के लिए पीठ मोड़कर खड़ा हो गया.....कुछ देर बाद राज ने पीछे से उसके गले में बांहें डाल दीं....उसकी सिसकियां और तेज हो गईं....शंकर ने आंसू पोंछकर प्यार से उसके दोनों हाथ थपथपाए....फिर अचानक उसकी दृष्टि राज के एक हाथ में दबे पुर्जे पर पड़ी। शंकर चौंक पड़ा और इतनी तेजी से राज की ओर मुड़ा जैसे उसे स्प्रिंग ने उछाल दिया हो। झपटकर उसने राज के हाथ से पुर्जा ले लिया और पागलों की भांति उसे चारों ओर से उलट-पलट कर देखने लगा....फिर आंखें फाड़कर उसने राज को देखा। राज के होंठ कंपकंपपाए और उसके मुंह से बहुत धीमे स्वर में निकला, “मैं सफल हो गया....शंकर दादा! मैं सफल हो गया।”

दूसरे ही क्षण वह शंकर के कंधे से लगकर सिसकियां लेने लगा। शंकर ने पागलों के समान उसे भींच लिया और बार-बार उस बाप के समान प्यार करने लगा जिसका बेटा देश-भर में परीक्षा में प्रथम आया हो....अधिक प्रसन्नता में वह कुछ बोल न पा रहा था।

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जेमसेन एण्ड जेमसन के मैनेजर ने घंटी बजाकर चपरासी को बुलाया और पुर्जे को देखता हुआ बोला, “मिस्टर राज को भीतर भेज दो...”

चपरासी के जाने के बाद मैनेजर पाइप में तम्बाकू भरकर उसे सुलगाने लगा। थोड़ी देर बाद राज भीतर आया और मैनेजर को देखते ही ठिठक गया। मैनेजर ने कुर्सी की पीठ से टेक लगाए मुस्कराकर कहा, “आइए मिस्टर राज! विराजिए।”

राज धीरे-धीरे चलता हुआ आगे बढ़ा और कुर्सी खींचकर बैठ गया। मैनेजर ने ध्यान से उसे देखते हुए कहा, “तो आप भी उसी पुर्जे के सम्बन्ध में आए हैं?”

“जी....” राज ने धीरे से कहा।

“देखिए मिस्टर राज!” मैनेजर सीधा होता हुआ बोला, “हमारी फर्म इस पुर्जे के लिए लाखों रुपये खर्च कर चुकी है....किन्तु, अभी तक सफलता के नाम से एक पग भी आगे नहीं बढ़ी....अब हमारी फर्म हैम्पशायर के एक इंजीनियर की सेवाएं उपलब्ध कर रही है....उसे स्थायी तौर पर यहां नियुक्त किया जाएगा इसलिए यह प्रयोगों का चक्कर समाप्त कर दिया गया है....इन अढ़ाई वर्षों में हमें बड़ी निराशा का सामना करना पड़ा है....आश्चर्य है कि हमारे युवक इंजीनियरों में कोई इतना योग्य नहीं कि किसी यूरोपियन इंजीनियर का मुकाबला कर सके....यदि यही बुद्धि और सूझ-बूझ का अकाल रहा तो इस देश के भविष्य का क्या होगा....क्या हम सदा दूसरे देशों के अधीन रहेंगे इन बातों में?”

“हैम्पशायर से इंजीनियर बुलाया जा रहा है वह तो आपके इंजीनियरों को शिक्षा दे सकता है....उनको ट्रेनिंग दे सकता है।”

“असम्भव है....हम यूरोप के विचार को भली भांति जानते हैं....वे अपनी कला इतने सस्ते दामों में नहीं देते....यदि वे ऐसा करते तो संसार में इतने आगे न होते....आजकल देश अपना धन विदेशी मुद्रा के बदले से ही तो बढ़ाते हैं।”

“फिर आपको इस यूरोपियन इंजीनियर को बुलाकर क्या लाभ होगा?”

“उसका वेतन मुकाबले की उस राशि से कम होगा जो हैम्पशायर से दस हजार की आयात पर व्यय होता है....इसके अतिरिक्त और कोई उपाय भी नहीं....हमने अपनी ओर से पूरा प्रयत्न कर लिया है किन्तु पूरे भारत में कोई भी ऐसा दिमाग न खोज सके जो यह पुर्जा बना सकता।”

“आपकी खोजें केवल सिफारिशों तक सीमित रहीं...” राज गम्भीर होकर बोला, “और सिफारिशें भी उन दिमागों की की जाती हैं जिनका अपना कोई मूल्य नहीं होता....जिन दिमागों का मूल्य होता है वे सिफारिशों पर निर्भर नहीं करते....”

“आपका दावा बहुत ऊंचा है, मिस्टर राज!”

“केवल दावा नहीं...इसका प्रणाम भी है मेरे पास!”

राज ने एक बड़े से डिब्बे से पुर्जा निकालकर मेज पर रख दिया। मैनेजर इस प्रकार उछला जैसे अचानक ही उसकी कुर्सी में दांत निकल आए हों। उसने झट पुर्जा उठाकर इधर-उधर नीचे ऊपर से देखा, फिर राज की ओर देखकर मुस्कराया‒

“एक आदमी पहले भी मार्किट से ऐसा पुर्जा खरीद लाया था जिसे वह दावे के साथ अपना बता रहा था....बाद में उसकी पोल खुल गई।”

“परिणामस्वरूप उसे जेल में होना चाहिए...” राज भी मुस्कराया।

“यदि हम ढील देते तो यह बात उलझ जाती!”

“ठीक है....आप इस पुर्जे को पूर्ण रूप से परखिए....विशेषतः पुर्जे का वह भाग देखिए जिस पर हैम्पशायदर की गुप्त मुहर लगी है जिसे किसी प्रकार भी मिटाया नहीं जा सकता....इस पुर्जे पर वह मुहर नहीं मिलेगी।”

मैनेजर ने पुर्जे के उस भाग को देखा....वास्तव में वहां कोई मुहर न थी....और वह स्थान भी इतना सपाट और साफ था कि अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता था कि खुदे हुए मुहर के स्थान पर वैल्डिंग से कोई धातु भर कर उसे समतल कर दिया गया हो। मैनेजर की आंखें आश्चर्य से फैली रह गईं....फिर उसने घण्टी बजाकर चपरासी को बुलाया, ‘चीफ इंजीनियर साहब को सलाम बोलो।”

चपरासी के जाने के बाद मैनेजर कभी तो उस पुर्जे को देखता और कभी राज को। थोड़े ही समय में चीफ इंजीनियर आज्ञा लेकर भीतर आया। मैनेजर ने उसे पुर्जा देकर कुछ आदेश दिया। जब चीफ इंजीनियर चला गया तो मैनेजर फिर राज को देखने लगा, फिर बोला, “ऐसे लगता है आपको पहले भी कहीं देखा है।”

राज ने चुपचाप मुस्कराकर एक सफेद कार्ड निकाल कर मैनेजर को देते हुए कहा, “शायद साल-भर पहले आपने यह कार्ड एक टैक्सीड्राइवर को दिया था जिसकी टैक्सी में आप स्टेट बैंक से कुछ पैसा लेकर लौट रहे थे....आपकी अपनी कार उस समय वर्कशाप गई हुई थी।”

मैनेजर एक बार फिर अनायास उछल पड़ा।

“ओह....याद आया...तुमने मुझे लुटने से बचाया था...उफ फो...तुम वह हो....तभी तो मैं सोच रहा था इससे पहले भी तुम्हें कहीं देखा है....किन्तु तुम तो टैक्सी ड्राइवर थे....मिस्त्री कैसे बन गए?”

“आदमी आगे बढ़ने के लिए हर वह मार्ग अपनाता है जिस पर वह समझता है, आगे चलकर उसे मंजिल मिलने वाली है।”

“मंजिल!” मैनेजर ने आश्चर्यचकित उसे देखा, “यदि यह पुर्जा वास्तव में तुम्ही ने निर्माण किया है तो पचास हजार रुपया नकद और दस हजार रुपये प्रतिमाह तो पैसे ही तुम्हारे हुए।”

राज कुछ न बोला....मैंनेजर अब भी उसे बेचैन और असमंजसभरी दृष्टि से देख रहा था।”

लगभग बीस मिनट बाद चीफ इंजीनियर वापस आया। उसके चेहरे पर गहरा जोश और आश्चर्य के चिन्ह स्पष्ट थे। उसने व्याकुल भाव से मैनेजर से पूछा, “क्या इसे मिस्टर राज ने ही बनाया है?”

“कोई कमी?” मैनेजर ने संभलकर बैठते हुए पूछा।

“इम्पोर्ट किए हुए और इस पुर्जे में बस इतना ही अन्तर है कि उस पर मुहर है और इस पर मुहर नहीं।”

सहसा मैनेजर ने अनायास खड़े होकर राज से हाथ मिलाते हुए कहा, “बधाई हो मिस्टर राज!”

चीफ इंजीनियर ने भी बड़े तपाक में राज से हाथ मिलाकर उसे बधाई दी....फिर चन्द ही मिनटों में पूरी फैक्टरी में एक शोर मच गया। फैक्टरी के कर्मचारियों ने राज, शंकर और चन्दर को घेरे में लिया था। इस समय वे लोग फैक्टरी की अस्टडी में थे। चन्दर और शंकर के सीने गौरव से फूल गए थे....उन्हें यों अनुभव हो रहा था जैसे यह सफलता राज की नहीं बल्कि स्वयं उनकी विजय थी।

बड़े यत्न से मैनेजर राज को उन लोगों से अलग करके दफ्तर में ले गया‒उसके संग शंकर और चन्दर भी थे। मैनेजर ने चपरासी को बुलाकर चाय का ऑर्डर दिया और राज से सम्बोधित हुआ, “आज मेरी छाती गौरव और मान से फूल गई है मिस्टर राज कि हमारे देश में भी ऐसे युवक हैं जो दूसरे देशों के सामने हमरा सिर ऊंचा कर सकते हैं....पिछले अढ़ाई वर्षों से मैं अपने युवकों से बहुत निराश हो गया था....मैं नहीं बता सकता मुझे कितनी प्रसन्नता हुई है....मेरा बेटा भी विलायत में इंजीनियरी की शिक्षा ग्रहण कर रहा है....वह वहां से कोई पोजीशन भी प्राप्त करके आता तो भी मुझे इतनी प्रसन्नता न होती.....क्योंकि मैंने तुम्हारा एक वह रूप भी देखा है जब तुम टैक्सी ड्राइवर थे और तुमने मेरा बैग लुटेरों से बचाकर साढ़े तीन लाख रुपये बचा दिए।” कुछ क्षण रुक कर वह फिर बोला, “मैं आज ही यह पुर्जा मालिकों के सामने रख दूंगा....एक-दो दिन में तुम्हारा इन्टरव्यू हो जाएगा और इसी सप्ताह तुम्हारी नियुक्ति भी हो जाएगी....पचास हजार रुपया नकद और दस हजार रुपया महीना....कोठी और कार फैक्टरी की ओर से....यह समझ लो तुम्हारा जीवन बदल गया।”

शंकर और चन्दर के चेहरे प्रसन्नता से चमक उठे....किन्तु राज ने बड़े सन्तोष से उत्तर दिया, “किन्तु इस प्रकार मैं अपना जीवन नहीं बदलना चाहता।”

मैनेजर के साथ ही चन्दर और शंकर ने भी चौंककर राज की ओर देखा और शंकर बोला, “यह क्या कह रहे हो राज?”

“मैं ठीक कह रहा हूं दादा! मुझे न पचास हजार इनाम चाहिए न दस हजार महीना, न कोठी, न कार....”

“यह तुम कैसी बातें कर रहे हो?” मैनेजर ने आश्चर्य से पूछा, “फिर तुमने यह पुर्जा बनाने के लिए इतनी मेहनत किस लिए की थी?”

“दस हजार रुपये माहवार की नौकरी के लिए नहीं की।” राज मुस्कराकर बोला, “मैं फैक्टरी की नौकरी का बन्दी नहीं होना चाहता....मैंने जो परिश्रम किया है उसे केवल पचास हजार के इनाम, दस हजार रुपये की नौकरी, एक कोठी और एक कार के बदले नहीं बेच सकता....”

“फिर...? क्या करोगे?’’ मैनेजर ने विस्मय से पूछा।

“मैं इस पुर्जे के लिए स्वयं अपनी फैक्टरी खड़ी करना चाहता हूं....परिश्रम मैंने किया है और इसका लाभ जेमसन एण्ड जेमसन ही के लिए नहीं....देश की आधी दर्जन ऐसी उन फैक्टरियों के लिए महत्व रखता है जिन्हें यह पुर्जा विदेश से आयात करना पड़ता है....स्पष्ट है कि जब यह पुर्जा देश में ही बनेगा तो सरकार दूसरी कम्पनियों को इसे बाहर से इम्पोर्ट करने के लिए मुबादले की राशि नहीं देगी....वह भी यहीं से अपनी आवश्यकताएं पूरी करेंगी....इस स्थिति में मेरे परिश्रम का लाभ जेमसन एण्ड जेमसन ही उठाएगी जबकि मैंने यह परिश्रम, यह प्रयोग आपकी फैक्टी की देख-रेख में नहीं बल्कि अपने निजी पैसे से किया है....”

“हूं....” मैनेजर लम्बी सांस लेकर मुस्कराया और कुर्सी की पीठ से टेक लगा कर बोला, “इसके लिए फैक्टरी और मशीनरी के लिए ही कम-से-कम अढ़ाई लाख रुपये की आवश्यकता पड़ेगी....कहां से करोगे इसका प्रबंध? यदि तुम्हारे पास निजी धन है तो ठीक है....नहीं तो इसके लिए तुम जिससे सहायता मांगोगे वह कम-से-कम आधे का लाभ तो तुमसे लेगा ही।”

“आपकी फर्म इस सम्बन्ध में मेरी क्या सहायता कर सकती है?”

“फैक्टरी तो शायद कोई सहायता न दे, क्योंकि पचास हजार का इनाम वह तभी देगी जब तुम फैक्टरी की नौकरी स्वीकार करोगे, तो....हां, मैंने यह अनुभव किया है कि तुम साहसी युवक हो, तुम्हारी आकांक्षाएं ऊंची हैं....निश्चय दृढ़ हैं....तुमने जो मार्ग सोचा है बहुत अच्छा है किन्तु, ऐसे उच्च विचार साधारणतः विवशताओं की भेंट हो जाते हैं....हमारे देश में जिनके पास बुद्धि है उनके पास पूंजी नहीं, धन नहीं.....और जिनके पास धन है वे ऐसे दिमागों को न केवल खरीद ही लेते हैं बल्कि जीवन-भर के लिए दास भी बना लेते हैं।”

“और मैं ऐसी दासता कभी स्वीकार नहीं करूंगा।”

“और इसका परिणाम यह होगा कि यह आविष्कार तुम्हारी हठ की भेंट हो जाएगा और यह बात राष्ट्रीय हित के विरुद्ध होगी।”

“आप राष्ट्रीय हित का भास उन पूंजीपतियों को भी दिला सकते हैं जो मेरे जैसे दिमागों को खरीद कर नाकारा बना देते हैं....धन और पूंजी पर उन लोगों को अधिकार है जो दिमाग नहीं रखते....इसीलिए धन चन्द एक हाथों में ही रहता है....तकनीकी हाथ उनके अधीन हैं.....वह स्वतन्त्र रूप से कुछ भी नहीं कर सकते....मैं इस प्रथा को तोड़कर रहूंगा.....लाभ उसे पहुंचना चाहिए जिसने परिश्रम किया है न कि उसे जो बैठे-बैठे एक दिमाग का अनथक परिश्रम खरीद ले।”

मैनेजर ध्यानपूर्वक राज का चेहरा देखता रहा, फिर धीरे से बोला, “मैं फैक्टरी का कर्मचारी हूं इसलिए फैक्टरी के विरुद्ध यहां कुछ नहीं कर सकता...तुम मुझसे रात के आठ बजे के लगभग मेरी कोठी पर मिलो...”

मैनेजर ने अपना पता लिखकर राज को दिया। थोड़ी देर बाद राज निकला तो टैक्सी में बैठने के बाद शंकर ने आश्चर्य से पूछा, “यह तुम क्या मूर्खता कर रहे हो राज! पचास हजार और दस हजार महीना, एक कोठी और एक कार.....क्या कम होते हैं? सारा जीवन ऐश से बीतेगा।”

“दादा! आप स्वयं ही सोचिए.....जो फैक्टरी मुझे पचास हजार और दस हजार महीना, एक कोठी और कार केवल इसलिए देगी कि मैंने एक ऐसा पुर्जा बना लिया है जो लाखों रुपये वार्षिक की मुबादले की राशि बचाएगा....तो वह फैक्टरी स्वयं इससे कितना कमाएगी....और यदि फैक्टरी कमाएगी तो उसका लाभ भी वह ही लेगी....मैं तो हर हाल में इसका नौकर ही रहूंगा....और वह भी जीवन भर के लिए....जितना फैक्टरी कमाएगी यदि उतना ही मैं स्वयं कमाऊं तो क्या बुरा है.....अपने मस्तिष्क के परिश्रम का फल मैं स्वयं ही खाऊं.....। इस प्रकार प्रेरणा मिलेगी और मैं कुछ और उन्नति कर पाऊंगा....आज यदि केवल एक पुर्जे की प्रोडक्शन के लिए हमारी फैक्टरी खड़ी होती है तो कल वह फैक्टरी और चीजें भी बना सकती है.....उन्नति से उन्नति का मोड़ मिलता है.....इसके अतिरिक्त जो फैक्टरी मैं बनाऊंगा यह किसी पूंजीपति की फैक्टरी न होगी वह टैक्नीकल हैन्डस की फैक्टरी होगी....उन्हीं का आधिपत्य होगा उस पर....उसमें शंकर दादा भी अपनी योग्यता दिखा सकते हैं और चन्दर भी....न जाने कितने चन्दर और शंकर दादा.....किसी पुर्जे का निर्माण करते-करते केवल इसलिए निराश हो जाते हैं कि उनके पास इस पर लगाने के लिए पर्याप्त धनराशि नहीं होती.....समय नहीं होता.....मेरी फैक्टरी में इस बात का पूरा ध्यान रखा जाएगा।”

“पागल है” ....चन्दर ने ठहाका लगाया, “और ऐसे ही पागल यदि हमारे देश में पैदा होते रहे तो देश की दौलत चन्द हाथों में एकत्र होकर न रह जाए....योग्य दिमाग पूंजीपतियों के अधीन न रहें....”

“वह सब तो ठीक है....किन्तु फैक्टरी बनाने के लिए रुपया कहां से आएगा?”

“रुपया?” राज मुस्कराया, “दादा रुपया उन से छीना जाता है जो अपनी पतलून की क्रीज ठीक रखते हैं....चौबीस घण्टे शराब पीते हैं....अब आप देखिए....धन तो लोग मेरे पीछे-पीछे लेकर दौड़ेंगे।”

शंकर कुछ न बोला। उसकी आंखों में चिन्ता की झलक थी।

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मैनेजर ने राज का स्वागत किया और उसे लिपटाता हुआ बोला, “आओ....मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था?”

राज को बिठा कर मैनेजर ने सामने रखे गिलास ने व्हिस्की उड़ेली, और पूछा, “सोडा मिलाते हो?”

“धन्यवाद!” राज ने गम्भीरता से कहा, “केवल सोडा पीता हूं, वह भी बदहजमी होने पर....”

“बहुत खूब....” मैनेजर की मुस्कराहट में स्नेह और प्रशंसा दोनों थीं, “कितनी खुशी की बात है कि तुम बिना शराब के ही इतना दिमागी काम कर लेते हो।”

“शराब को छोड़ कर ही दिमाग का प्रयोग कर सका हूं....जब शराब पीता था तो बिना नशे के कुछ अनुभव ही न करता था।”

“तुम निस्सन्देह योग्य युवक हो....काश! तुम मेरे ही बेटे होते....तुमने कल फैक्टरी में जिन विचारों को प्रकट किया था मैं उनसे पूर्णतया सहमत हूं....मैं चाहता हूं कि तुम जैसे नौजवानों का साहस बढ़ाया जाए....तुम्हें शायद ज्ञात न हो कि स्टेट बैंक इंडस्ट्री के लिए बड़े-बड़े ऋण भी देता है जिससे तकनीकी हाथ केवल पूंजी के अभाव के कारण देश के निर्माण में सहायता देने से पीछे न रह जाएं....मैंने स्टेट बैंक के मैनेजर से तुम्हारे विषय में बातचीत की है वह मेरा घनिष्ठ मित्र है....उसने मुझे सब समझाया है....तुम्हें स्टेट बैंक ऋण दे सकता है.....यदि तुम्हारी फैक्टरी अढ़ाई लाख की लागत से बनती हो तो बैंक से तुम्हें कम से कम डेढ़ लाख रुपया मिल सकता है....इसके लिए स्टेट बैंक की कुछ शर्तें भी हैं....उदाहरण के लिए तुम्हें डेढ़ लाख रुपया ऋण लेना हो तो इसके लिए तुम्हें कम से कम एक लाख रुपया अपनी निजी राशि भी दिखानी पड़ेगी।”

राज चुपचाप सन्तोष से मैनेजर का चेहरा देखता रहा....मैनेजर ने मुस्करा कर पूछा, “कर सकोगे एक लाख का प्रबंध?”

“इस समय तो मेरे पास एक लाख पैसा भी नहीं....” राज एक दृढ़ मुस्कराहट के साथ बोला, “किन्तु मुझे विश्वास है कि एक लाख का प्रबंध होगा और अवश्य होगा....जिन लोगों की बुद्धि रोशन हो और उनके हृदय की आंखें खुल जाएं भगवान उन्हें उन्नति के मार्ग दिखाता है और उन मार्गों से कांटे चुनकर साफ करना इन्सान का अपना काम है।”

मैनेजर के चेहरे पर सन्तोषजनक मुस्कान फैल गई और वह धीमे स्वर में बोला, “तो जाओ बेटा! डेढ़ लाख रुपया तुम्हारी प्रतीक्षा में है....चौरानवे हजार का प्रबंध करो और मेरे पास चले आओ।”

“चौरानवे हजार?”

“इसकी व्याख्या मत मांगो....बस इतना ही कह सकता हूं कि मैं एक फैक्टरी का मैनेजर हूं....छः हजार रुपये माहवार वेतन पाता हूं....पांच लड़कियों एक लड़के का बाप हूं....क्या स्टैन्डर्ड, क्या खर्चा दे सकता हूं....सहायता के रूप में नहीं, ऋण के रूप में जो बिना ब्याज के होगा और बिना लिखित के....तुम जब चाहो वापस करना....इसे अधिक.....मैं दे नहीं सकता....वरना मैं कहता अपने छोटे बेटे के कारोबार में अधिक लगा दिया है.....बस अब तुम चले जाओ....तुम्हारे समय का एक-एक क्षण कीमती है....”

राज चकित दृष्टि से मैनेजर की ओर देखता रह गया....मैनेजर झुंझला कर बोला, “जाओ....देर मत करो...”

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राज ने सिगरेट का कश लिया और आंखें फैलाए हुए उस धुएं को देखता रहा जो चूल्हे से सुलगती हुई लकड़ियों से उठकर बल खाता हुआ ऊपर की ओर जा रहा था। अचानक सुषमा ने राज के कंधे पर हाथ रखा और धीरे से बोली, “राज बाबू....!”

“हम...” राज ने सुषमा की आंखों में देखा।

“आखिर कब तक आप इस प्रकार सोचते रहेंगे। आप समझते हैं इस प्रकार सोचने से एक लाख रुपये का प्रबन्ध हो जाएगा?”

राज ने मुस्करा कर सुषमा के दोनों कंधों पर हाथ रख दिए और उसकी आंखों में देखता हुआ बोला, “हो जाएगा....यदि तुम्हारी आंखों की ज्योति यों ही मेरी आंखों को मार्ग दिखाती रही....सच कहता हूं सुषमा। मुझे तुम्हारे प्यार ने वह शक्ति, वह साहस दिया है कि मुझे कोई कठिनाई नहीं लगती....मार्ग कर रुकावटों के पहाड़ साधारण कंकर ज्ञात होते हैं जिन्हें मेरा साहस ठोकरों से हटाता हुआ चलता है......और मुझे अपनी मंजिल बिल्कुल सामने दिखाई देती है....”

अचानक कोठरी के द्वार का किवाड़ दीवार से टकरा कर बजा और राज और सुषमा ने एक साथ सामने देखा। उसी क्षण सुषमा ठिठककर कर राज से अलग हो गई। उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं....किन्तु राज के चेहरे पर कोई घबराहट, कोई चिन्ता न थी....वह बड़े सन्तोष से चन्दर को देख रहा था जिसके मुख पर बेचैनी-सी झलक रही थी। वह इस प्रकार द्वार का सहारा लिए खड़ा था जैसे उसने वर्षों से एक मूर्ति को भगवान समझ कर पूजा हो और अचानक उसे ज्ञात हुआ हो कि वह तो पत्थर की है। उसकी आंखों से उसकी घायल आत्मा कराहती हुई झांक रही थी। राज के होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कराहट फैल गई और वह धीरे से बोला‒

“बहुत निर्बल है तुम्हारा विश्वास....मेरे दोस्त!”

चन्दर कुछ न बोला। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और राज के बिल्कुल सामने पहुंचकर रुक गया। चन्द क्षण तक वह राज की आंखों में झांकता रहा। राज ने आंखें नहीं झुकाईं। उन आंखों में कोई लज्जा नहीं थी, कोई खेद नहीं था....धीरे-धीरे चन्दर का हाथ क्रोध में ऊपर उठता गया....सुषमा को अपनी सांस रुकती-सी लगी। अचानक चन्दर का हाथ पूरी शक्ति से घूमा और तड़ाके की आवाज के साथ एक तमाचा राज के गाल पर पड़ा....सुषमा कलेजा थाम कर दीवार से लग गई। राज के होंठों से लहू की एक रेखा फूट कर ठोड़ी पर आ गई....किन्तु उसकी मुस्कराहट में कोई अन्तर न आया। चन्दर कंपकंपाते स्वर में बोला‒

“यह लहू की धारा तुम्हारी छाती से फव्वारा बनकर भी फूट सकती थी किन्तु, चन्दर मित्रता का खून करके तुम्हारी टोली में सम्मिलित नहीं होना चाहता। जाओ....तुम्हें शंकर दादा ने गैरेज में बुलाया है....चन्दर आज से तुम्हारे लिए मर चुका है।”

राज के होंठों की मुस्कराहट और गहरी हो गई। उसने कहा, “चन्दर अमर है....चन्दर मेरे लिए कभी नहीं मर सकता।”

फिर राज ने होंठ से बहते हुए लहू को अंगूठे पर लगाया और सुषमा की ओर मुड़कर उसी अंगूठे से बिंदिया लगा दी....सुषमा अवाक, हक्की बक्की-सी खड़ी रही। चन्दर की आंखें आश्चर्य से फैल गईं। राज ने चन्दर की ओर मुड़कर देखा और धीरे से बोला, “जो प्यार और मित्रता.....एक बुझे हुए निर्जीव हृदय को फौलाद की शक्ति और समुद्र का साहस प्रदान करें वह न पाप कहलाते हैं, न मर सकते हैं।”

फिर राज उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना चुपचाप तेज चलता हुआ कोठरी से बाहर निकल गया।

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जब राज गैरेज के पास पहुंचा तो उसने आश्चर्य से देखा....गैरेज के बाहर सड़क के दोनों किनारों से लगी हुई दो दर्जन से अधिक कारें खड़ी थीं....अम्पाला....मर्सिडीज....शेवरलेट, हिलमैन....राज ध्यानपूर्वक उन कारों को देखता हुआ होंठों पर मुस्कराहट लिए गैरेज में आया....गैरेज में बढ़िया वस्त्र पहने हुए कुछ लोग खड़े थे जिनके हाथों में बाहर वाले की चाय के घटिया गिलास थे....अचानक राज के कानों से शंकर को आवाज टकराई, ‘वह आ गया राज।’

दूसरे ही क्षण उन लोगों ने राज को घेरे में ले लिया। गैरेज से मरम्मत के लिए आई हुई गाड़ियों की छतों पर चढ़कर कुछ लोग फ्लैश कैमरों में धड़ाधड़, राज की तस्वीरें लेने लगे। एक बड़ी-सी पगड़ी वाले ने राज से पूछा, “मिस्टर राज! तुम्हारे गैरेज की चाय तो रूसी शराब से अधिक बढ़िया नशे वाली है?”

“मिस्टर राज! तुमने हमारे देश का सिर ऊंचा कर दिया है।” दूसरे ने कहा।

“ऐसे-ऐसे रत्न मिट्टी में पड़े हैं.....हमारे देश का दुर्भाग्य है....”

“किन्तु अब यह रत्न मिट्टी में नहीं पड़ा रहेगा।”

“यह है एक लाख का चैक एडवांस के रूप में....” एक हाथ राज की ओर बढ़ा, “फैक्टरी की स्थापना का प्रबन्ध कराए देता हूं।”

“मैं दो लाख देता हूं एडवांस के रूप में।”

“ठहरिए....ठहरिए....ठहरिए...” राज जोर से चिल्लाया। जब सब चुप हो गए तो राज बोला‒

“क्षमा करें....मैं आप में से किसी की भी सहायता स्वीकार करने को तैयार नहीं हूं...”

“हम तुम्हें पचास प्रतिशत का पार्टनर बनाते हैं।” एक ने कहा।

“हम साठ प्रतिशत....” दूसरा बोला।

“किन्तु मुझे पार्टनरशिप स्वीकार नहीं...” राज हाथ उठाकर बोला, “आप लोगों को देश और जाति से इतनी ही सहानुभूति है और आप इस रत्न को मिट्टी से निकालना चाहते हैं तो फैक्टरी की स्थापना के लिए ऋण दीजिए जो ब्याज समेत वापस कर दिया जाएगा....दूसरी कोई शर्त मुझे स्वीकार नहीं....यही मेरा फैसला है....आप में से जिसे यह स्वीकार है वह यहां ठहर जाए शेष जा सकते हैं।”

सबने एक-दूसरे की ओर देखा....फिर एक ने दूसरे से कहा, “कितनी कबाड़ा चाय है....सारा मुंह कसैला हो गया है....क्या स्क्रीन मिलाते हैं चीनी की जगह....”

“इस शताब्दी का युवक आवश्यकता से अधिक आत्मविश्वासी होकर पागल हो गया है....” दूसरा बोला, “अनुभव की बात नहीं मानेगा...”

“आवाज तो जानेगा...” तीसरा मुस्कराया, “जब कोई मार्ग नहीं होगा तो हमारे पास ही आएगा।”

थोड़ी देर बाद सभी कारों वाले लौट गए और प्रेस वालों ने राज को घेर कर प्रश्नों की बौछार कर दी।

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राज ने गैरेज के मध्य में खड़े होकर चारों ओर दृष्टि घुमाई। गैरेज में एक भी मरम्मत वाली गाड़ी न थी....कोई औजार न था, कोई मशीनरी न थी....उसने गैरेज के एक-एक कारीगर को देखा। शंकर के चेहरे पर उसकी दृष्टि रुक गई। शंकर ने अपनी जेब से कुछ बड़े नोट निकाले और मुस्कराकर बीच में रखे एक मेज पर रखता हुआ बोला, “छत्तीस हजार....अब मेरे पास चन्द बर्तनों के अतिरिक्त कुछ नहीं रहा।”

“यह सात सौ रुपये....मेरी कुल पूंजी है....राज दादा!” एक और कारीगर ने नोट डालते हुए कहा, “मेरी पत्नी के पास और कोई गहना नहीं था कि इनमें बढ़ोतरी कर सकता।”

“और यह पन्द्रह सौ रुपया है....” अचानक चन्दर की आवाज सुनकर राज चौंका, “मेरी पूरी पूंजी जो मैंने बहन के दहेज के लिए एकत्र की थी....उसके दहेज में दे रहा हूं।”

उन लोगों ने आश्चर्यचकित चन्दर को देखा जिसके होंठों पर एक स्नेहमय मुस्कराहट खेल रही थी। दूसरे कारीगर भी एक-एक करके रुपये डालते रहे। आखिरी कारीगर लड़के ने ठण्डी सांस ली और फीकी-सी मुस्कराहट के साथ बोला, “मां की दवा लाने के बाद मैंने यह बीड़ियों के लिए चार आने बचाए थे....इससे अधिक मेरे पास कुछ नहीं है राज भैया।”

राज ने उस लड़के के चेहरे को ध्यान से देखा, फिर चन्दर को, शंकर को, शम्भू, करीम को और बचनसिंह को....इसके बाद उसकी दृष्टि मेज पर टिक गई...उसने दोनों हाथों से नोटों को टटोला और उसके होंठ कंपकंपाए....उसने आकाश की ओर देखा....फिर अचानक चीख पड़ा, “जय भैया! आओ, देखो.....तुमने मुझसे एक भाई छीनकर मुझे अकेला समझ लिया था....यदि आंखें हैं तो आकर देखो, मैं अकेला नहीं हूं....मेरे कितने भाई हैं....कौन कहता है कि मुझे एक लाख रुपया नहीं मिल सकता....पूछो उन निर्धनों से जाकर। जिनकी तिजोरियां करोड़ों रुपयों से भरी रहती हैं....वे मुझसे अधिक धनी हो सकते हैं....उसके पास किसी शंकर, किसी चन्दर, किसी शम्भू किसी करीम और किसी बचनसिंह के प्यार की दौलत है.....किसी के पास है यह दौलत....?”

चीखते-चीखते राज की आवाज भर्रा गई और वह दोनों हाथों से मुंह छिपाकर सिसकियां लेने लगा....आवाज बढ़ती ही गई....फिर वह फूट-फूट कर रोने लगा।

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जेमसन एण्ड जेमसन कम्पनी के मैनेजर ने हजार-हजार के छः नोट मेज पर पड़े हुए रुपयों में मिला दिए और सब रुपयों को उठाकर गिनने लगा। फिर राज की ओर देख कर बोला, “ये कुल मिलाकर सैंतालीस हजार रुपये होते हैं।”

“जी हां....” राज ने धीरे से कहा, “मैं यह रुपया आपके पास अमानत रखने आया हूं।”

“किन्तु, इनमें अभी पूरे तिरेप्पन हजार की आवश्यकता है....पचास और तीन हजार...”

“मैनेजर साहब!” राज मुस्कराया, “जब यह रकम सैंतालीस हजार तक पहुंच सकती है तो क्या एक लाख तक नहीं पहुंच सकती?”

“तुम्हारा विश्वास और साहस यही है तो एक लाख क्या दस लाख तक पहुंच जाएगी।”

“किसी अकेले आदमी का साहस और विश्वास काफी नहीं होता....मैनेजर साहब। जब तक आप जैसे प्यार करने वाले, सहानुभूति रखने वाले उसके संग न हो....आज ही से मैं एक फैक्टरी में दो हजार रुपये माहवार पर लग गया हूं....मेरे अन्य मित्र भी गैरेजों और कारखानों में लग गए हैं....शंकर दादा को एक हजार रुपया माहवार की मैकेनिक की नौकरी मिल गई है....चन्दर रात-दिन टैक्सी चलाने का निश्चय कर चुका है और ये सब हाथ मिलकर इस राशि को एक लाख तक पहुंचाने का निश्चय कर चुके हैं...”

“काम चालू रखो....” मैनेजर मुस्कराया, “मैंने स्टेट बैंक के मैनेजर से कागजात तैयार करा लिए हैं....गवाहियां, हस्ताक्षर ओर जमानतें भी हो चुकी हैं....जिस दिन एक लाख पूरा हो जाएगा....एक सप्ताह के भीतर-भीतर डेढ़ लाख स्टेट बैंक से मिल जाएगा....इसके अतिरिक्त सरकार ने पंचवर्षीय योजना में जो इंडस्ट्रियल एरिया बनवाया है उसमें एक फैक्टरी के लिए आसान किस्तों पर मैंने भी तुम्हारे लिए एक स्थान का प्रबन्ध कर दिया है।”

“मैं आपका धन्यवाद करके आपके प्यार का अपमान नहीं करूंगा मैनेजर साहब!”

“जाओ व्यर्थ बातों में समय नष्ट न करो।”

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राज ने शंकर के गैरेज के फाटक में प्रवेश किया‒जिसमें एक ओर शैड में शंकर की नौकरानी चूल्हा सुलगाकर रोटियां पका रही थी....दूसरी ओर एक टीन के नीचे बेबी बैठी पढ़ रही थी। राज उस कोठरी की ओर बढ़ा जिसमें उसका बिस्तर लगा था....इसी समय उसे शंकर की आवाज सुनाई दी जो राज को पुकार रहा था। राज बेबी के पास से गुजरकर उसके सिर पर हाथ फेरता हुआ शंकर को कोठरी में पहुंच गया। शंकर ने मुस्कराकर उसे देखा और बोला, “आज के समाचार पत्र देखे तुमने?”

“नहीं।”

“लो देखो....”

शंकर ने ढेर सारे समाचार-पत्र राज के सामने डाल दिए। राज एक-एक समाचार पत्र देखने लगा‒पहले ही पन्ने पर कई ढंगों में राज की तस्वीर छपी थी....साथ ही कई शीर्षक थे जैसे‒‘विप्लवकारी दिमाग रखने वाला युवक मिस्त्री जिसने विदेशों के बड़े-बड़े इंजीनियरों को दांतों तले उंगली दबाने पर विवश कर दिया।’ ‘एक युवक मैकेनिक जिसने वह पुर्जा बना लिया जिसे देश का कोई इंजीनियर नहीं बना सका। ‘एक युवक इंकलाबी जिसने लाखों की दौलत ठुकराकर पूंजीपतियों की दासता स्वीकार नहीं की।’ शीर्षकों के नीचे पूरी खबरे थीं, राज के इन्टरव्यू थे....कुछ अखबारों ने राज को सिरफिरा कहा था....राज ने समाचार पत्र एक ओर रखकर मुस्कराकर शंकर की ओर देखा और सिगरेट सुलगाने लगा। शंकर ने चुपचाप एक बड़ी-सी गड्डी राज के सामने रखते हुए कहा, “और आखिरी समाचार यह है।”

“नोट‒!” राज चौंककर शंकर को देखने लगा।

“पूरे साठ हजार!” शंकर मुस्कराया।

“साठ हजार!” राज की पुतलियां आश्चर्य से फैल गईं।

“यह न पूछो तो अच्छा है कि ये कहां से आए?” शंकर ने ठण्डी सांस लेकर कहा, “क्योंकि मुझे झूठ बोलना पड़ेगा।”

राज ने ध्यान से शंकर को देखा और उसके कंधे को पकड़कर बोला “इधर देखो दादा! मेरी आंखों में....तुमने अपना फ्लैट पगड़ी लेकर किराये पर दिया था....या उसे बेच दिया?”

“राज....बेटा...” शंकर भारी आवाज में बोला, “देर न करो अब, यह राशि लेकर तुम श्रीधर सिन्हा साहब के पास पहुंच जाओ। हमारे लिए अब वही सबसे बड़ी खुशी का दिन होगा जिस दिन तुम अपनी फैक्टरी का उद्घाटन समारोह मनाओगे....”

और राज आंखें फाड़े हुए शंकर को देखता रह गया।

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‘सुषमा प्रोडक्ट’ का एक बहुत बड़ा-सा बोर्ड फैक्टरी के फाटक पर रंग-बिरंगी रोशनियों में झिलमिला रहा था।

फैक्ट्री के फाटक के सामने एक बहुत बड़े मैदान में छोटा-सा पंडाल बना हुआ था जिसमें कुछ पंक्तियां कुर्सियों की लगी हुई थी जिन पर सुषमा प्रोडक्ट फैक्टरी के उद्घाटन समारोह में चलाए गए चन्द एक विशेष व्यक्ति विराजमान थे। इनमें वे कारीगर भी थे जो राज के साथ शंकर के गैरेज में काम करते थे। सबसे अगली पंक्ति में बीच वाली कुर्सी पर मिस्टर सिन्हा बैठे थे। राज, शंकर और चन्दर के साथ एक ओर खड़ा हुआ बातें कर रहा था। अचानक एक कार फाटक पर आकर रुकी...शंकर ने जल्दी से कहा‒

“वह देखो...ये कौन लोग हैं? बिठाओ जरा इन्हें....”

राज आगे बढ़ा....कार की खिड़कियां खुलीं....और राज के पुराने मित्र अनिल, धर्मचन्द, फकीरचन्द और कुमुद नीचे उतरे। चारों ने तेजी से बढ़कर राज को घेर लिया। अनिल राज से लिपटता हुआ बोला, “बधाई हो राज! तुम्हें देखने को तो आंखें तरस गई थीं....हम तो सपने में भी नहीं सोचते थे कि हमारा मित्र इतना छिपा रुस्तम निकलेगा....बस यही सुना था कि तुम टैक्सी ड्राइवर बन गए हो....आज सारा देश राज के गीत गा रहा है....इससे बड़ी खुशी की बात हमारे लिए क्या हो सकती है।”

“आजकल समाचार-पत्रों में आए दिन धड़ाधड़ तुम्हारे भाषण आ रहे हैं....हमारा तो मन बाग-बाग हो जाता था देख-देखकर” धर्मचन्द ने मुस्कराते हुए कहा।

“हम तो यह सोच रहे थे कि शायद इस समारोह में तुम हमें भी याद करोगे....” कुमुद ने बड़ी आत्मीयता से कहा।

“तुम लोगों को तो मैं जीवन के किसी भाग में भी नहीं भूल सकता।” राज की मुस्कराहट और गहरी हो गई।

“आखिर दोस्त हैं न....” फकीरचन्द मुस्कराकर बोला, “दोस्तों को कैसे भूला जा सकता है।”

“अरे यार! यह खुला पंडाल बनवाया है तुमने?” अनिल बोला, “क्या पीने-पिलाने का प्रबन्ध न होगा इस समारोह में....बिना पिए-पिलाए तो खुशी का कोई समारोह पूर्ण नहीं होता....”

“पीने का प्रबन्ध भी है।” राज की मुस्कराहट और गहरी हो गई। वह चन्दर से बोला, “चन्दर! मेरे बहुत अच्छे समय के साथी हैं ये जिन्होंने मेरे फालतू समय में मुझे कभी बोर नहीं होने दिया। इनकी देखभाल ध्यान से करना....इन्हें ले जाकर कुर्सियों पर बिठाओ....एक-एक ठण्डा गिलास पानी पिलाओ...”

फिर इससे पहले कि उन लोगों में से कोई बोलता....एक मर्सिडीज आकर रुकी। राज शीघ्र मुस्कराता हुआ मर्सिडीज की ओर बढ़ गया। अनिल, धर्मचन्द, फकीरचन्द और कुमुद आश्चर्य से उसे देखते हुए कुर्सियों की ओर बढ़ गए। मर्सिडीज की खिड़की खुली और उसमें से पहले राजा कूदकर उतरा और लपककर राज की गोद में चढ़ता हुआ बोला, “अंकल....अंकल डार्लिंग...”

“मेरा राजा बेटा....” राज ने राजा को प्यार किया।

फिर राज की दृष्टि जय पर पड़ी। जय मुस्कराता हुआ गाड़ी से उतरा था....उसकी आंखों में विजय का भाव झलक रहा था....साथ ही साथ राधा भी उतरी जिसने डबडबाई आंखों से स्नेह भरी मुस्कराहट से राज को देखा। राज मुस्कराया।

“आइए सेठ जयदास और श्रीमती जयदास....मुझे प्रसन्नता है कि इस खुशी के समारोह में सम्मिलित होने की मेरी प्रार्थना को आपने ठुकराया नहीं।”

“यह तुम क्या कह रहे हो राज भैया।” राधा कंपकंपाते हुए स्वर में बोली, “तुम्हारी इस अनुपम सफलता पर हम खुश न होंगे तो और कौन होगा।”

“सच कहती हैं आप...” राज की मुस्कराहट और गहरी हो गई, “आइए! केवल आप ही की प्रतीक्षा थी....शेष सब अतिथि गण आ चुके हैं...समारोह में।”

जय कुछ न बोला। उसके होंठों पर अब भी वही मुस्कराहट थी। उसने सिगार का कोना तोड़कर दांतों में दबा लिया और राधा के साथ धीरे-धीरे राज के पीछे चलने लगा। राज ने उन्हें कुर्सियों पर बिठाया। फिर राज पंडाल से निकला तो उसकी दृष्टि सुषमा पर पड़ी और वह ठिठक गया। सुषमा के माथे पर एक लाल बिन्दिया जगमगा रही थी। उसकी आंखें लाज से झुक गईं। राज मुस्कराकर बोला, “आज तुम सुषमा नहीं....साक्षात एक समारोह हो...प्रसन्नता का उत्तम समारोह....एक उत्सव हो।”

“हटिए! कोई सुन लेगा,” सुषमां घबराहट से लजाते हुए बोली....और इधर-उधर देखने लगी।

“यही लड़की है वह?” राधा ने धीरे से जय की ओर झुककर पूछा।

“हां....सुषमा...”

“बड़ी प्यारी है....गुड़िया सी...राज का चुनाव बहुत प्यारा है।”

थोड़ी देर बाद राज सबके सामने खड़े होकर सब को सम्बोधित करते हुए बोला, “समारोह में उपस्थित देवियो और सज्जनो। अब सारे अतिथि आ चुके हैं सो कार्य वही आरम्भ करने की आज्ञा चाहता हूं....आप सोच रहे होंगे कि इस समारोह में शहर की प्रसिद्ध हस्तियां सम्मिलित नहीं हुईं....कोई मंच क्यों नहीं बनाया गया....कोई माइक का प्रबन्ध नहीं किया गया....इसके लिए मैं निवेदन करूंगा कि दो प्रकार के व्यक्ति ही आदर और सम्मान के योग्य होते हैं....पहले वे जिनका सम्मान उनके हाथों और उजले मन के कारण होता है और दूसरे वे जिनका आदर उनके धन के कारण होता है....यहां दोनों प्रकार की हस्तियां उपस्थित हैं....मंच और माइक इत्यादि वहां आवश्यक होते हैं जहां के समारोह दिखावे और प्रदर्शनी के लिए होते हैं....यह समारोह मेरे और मेरे मित्रों के मन की खुशी को प्रकट करता है....इस प्रसन्नता को प्रकट करने के लिए हमें किसी दिखावे की आवश्यकता नहीं....क्योंकि आवाज चाहे कितनी हल्की ही क्यों न हो वह उन हृदयों तक अवश्य ही पहुंच जाती है जिनमें स्नेह, सत्यता, सौन्दर्य होता है....सहानुभूति और आपस में समझने की बुद्धि होती है....जहां ये गुण नहीं होता वहां लाख ऊंचे स्वर में और मंच लगाकर बोलो....कुछ लाभ नहीं। अब आपसे प्रार्थना है कि फैक्टरी के मुख्य द्वार पर पहुंचकर उद्घाटन की रस्म में सम्मिलित हों।”

थोड़ी देर बाद सारे अतिथि फैक्टरी के फाटक पर थे। फाटक के बिलकुल पास ही राज खड़ा था। राज के पास सुषमा, चन्दर और शंकर भी थे....सब यही सोच रहे थे कि देखें राज किसे फैक्टरी के उद्घाटन का श्रेय देता है। राज ने इधर-उधर देखा और शंकर से बोला, “भैया! कल्लन किधर गया?”

“मैं हां हूं राज भैया!” कल्लन ने आगे बढ़कर कहा।

सब लोग उधर देखने लगे। कल्लन दस-ग्यारह वर्ष का लड़का था जो घर के धुले हुए बिना प्रेस किए कपड़े पहने हुए था....राज ने उसे अपने पास बुलाया और उसके कंधे पर हाथ रखकर मुस्कराकर इधर-उधर देखा और फिर बोला, “यह मेरा साथी, शंकर दादा के गैरेज का सवा दो रुपये दिन का सबसे छोटा कारीगर है जिसने अपनी मां की दवा में से बचे हुए चार आने जो इसने बीड़ियों के लिए बचाए थे....इस फैक्टरी की स्थापना के लिए सहायता में दिए थे...वे चार आने इस फैक्टरी के लिए जितने महत्वपूर्ण हैं उतने शायद कहीं से मिले हुए चार लाख रुपये भी न हों....यह फैक्टरी मेरी है किन्तु, इसका असली मालिक कल्लन है....इसलिए कल्लन ही फैक्टरी का उद्घाटन करेगा।”

सबसे पहले जय ने तालियां बजाईं और फिर बड़ी देर तक तालियां गूंजती रहीं....कल्लन ने घबराकर इधर-उधर देखा और कांपते हुए हाथों से फैक्टरी का उद्घाटन किया....फैक्टरी का फाटक खोला गया....उसमें सबसे पहले कल्लन ने प्रवेश किया। फिर राज ने हाथ उठाकर जोर से कहा, “ठहरिए....”

सब लोग ठिठककर रह गए...राज ने मुस्कराकर कहा‒

“यह था मेरी फैक्टरी के उद्घाटन का समारोह जिसका दृश्य आपने देखा....यह है वह फैक्टरी जिसकी नींव प्यार और स्नेह पर रखी हुई है और उसकी स्थापना में मेरा हाथ बंटाने वाले वे लोग हैं जिन्होंने अपने घरों के गहने और बर्तन बेचकर, अपनी बीवियों के पैसे देकर मुझे इस काम को पूरा करने की शक्ति प्रदान की है। साहस बढ़ाया है....इसकी स्थापना में उन लोगों का कोई भाग नहीं जिन लोगों ने उस समय, जब मैं एक करोड़पति बाप का बेटा था मेरे साथ शराब पी, मौज उड़ाई, मुझे गलत मार्ग दिखाए....इसकी स्थापना में उनका कोई हाथ नहीं जिनकी दृष्टि में दौलत खून के रिश्ते से अधिक महत्वपूर्ण होती है...इसलिए फैक्टरी की जमीन पर केवल वही पैर जाएंगे जो एक निर्धन और गरीब राज के साथी रहे हैं...वे पांव नहीं जाएंगे जिन्होंने राज को गरीब बनाया....और उसके गरीब और निर्धन बन जाने पर उससे आंखें चुरा गए...”

“अरे!” शंकर बड़बड़ाया, “यह क्या बक रहा है तू!”

“मैं वह कह रहा हूं दादा जो कुछ कहने के लिए मैंने इतना समय प्रतीक्षा की....अपनी रात की नींदें और दिन का आराम हराम किया...मर्सिडीज के मालिक से टैक्सी-ड्राइवर बना...मिस्त्री बना, दादा! मैं वह समय कभी नहीं भूल सकता जब अचानक किसी की स्वार्थता ने मुझे निर्धन-मुफलिस बना दिया....और मेरे घनिष्ठ मित्र मुझे इस प्रकार छोड़कर भागे जैसे मैं उन पर बोझ बन जाऊंगा....इसी समय की प्रतीक्षा में मैंने कितनी रातें जाग-जाग कर बिताई हैं....दादा! आज मुझे अवसर मिला है उस इन्तकाम का, उस बदले का....यह आप बरसों मेरी आत्मा को झुलसाती रही है.....मुझे घृणा है ऐसे लोगों से....आज मेरा इन्तकाम पूरा हो चुका है....इन लोगों ने मुझसे एक दुनिया छीन कर यह समझा था कि बस अब मुझे कोई दुनिया नहीं मिलेगी....आज मैंने एक नई दुनिया बना ली है जिसका निर्माता मैं हूं....मैं अपनी दुनिया का मालिक हूं...मैं अपनी दुनिया में इन स्वार्थी पांवों की चांप भी नहीं आने दूंगा।”

कुछ देर बाद सन्नाटा रहा...फिर अनिल, कुमुद, धर्मचन्द, फकीरचन्द बुरे मुंह बनाकर पलटे और बाहर चले गए....किन्तु जय वहीं खड़ा रहा। राधा ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा और भर्राई हुई आवाज में बोली....“चलिए....अब कितना अपमान कराएंगे।”

“आभास हुआ आपको....श्रीमती जयदास!” राज कड़वी मुस्कराहट होंठों पर लाता हुआ बोला, “जब आदमी का अपमान होता है तो उसकी आत्मा को कितना दुख होता है....”

“किन्तु मुझे तनिक भी नहीं पहुंचा....” जय बड़ी ममतामय मुस्कराहट से बोला, “क्योंकि मैं जानता हूं आज तुम उस स्थान पर हो जहां पर खड़े होकर तुम अपने अपमान का बदला लेने का अधिकार रखते हो....मुझे खुशी है कि मेरे भाई में इतना साहस, इतनी शक्ति है कि वह अपने अपमान का बदला ले सकता है....अपनी बेइज्जती को नहीं भूल सकता....क्योंकि उसने अपने अपमान का बदला लेने के लिए ही अपनी दुनिया का निर्माण किया है....किन्तु तुम भूल रहे हो कि जब मैंने तुम्हारा अपमान किया था उस समय मेरा दिन था तुम्हें अपमानित करने का इसलिए नहीं कि तुम मेरे छोटे भाई थे बल्कि इसलिए कि जिस दुनिया में उस समय मैं खड़ा था उस दुनिया की मैंने स्थापना की थी...मैंने निर्माण किया था....डैडी की दौलत अवश्य थी किन्तु ऐसे ही जैसे आज तुम्हारे पास अपना कुछ नहीं...सब कुछ इन्हीं सच्चे मित्रों की दौलत है...इस दुनिया का निर्माण तुमने किया है....डैडी की दौलत बेकार पड़ी थी, क्योंकि वह हृदय रोग के रोगी थे....और एक दिन इसी रोग से चल बसे...तुम्हारे भविष्य का उत्तरदायित्व मुझे सौंप गए....तुम यह भी जानते हो कि डैडी की मृत्यु के बाद मैंने दिन को दिन नहीं समझा और रात को रात....तुम्हारी ही तरह मैंने जीतोड़ कर परिश्रम किया....अपनी आधी शिक्षा छोड़ कर कारोबार को संभाला...अपने जीवन को सीमित कर लिया‒केवल तुम्हारे लिए। मैंने जीवन की सारी दिलचस्पियां समाप्त कर दीं....क्योंकि मैं जानता था दौलत उन हाथों में रहती है जो उसे रोकना जानते हैं....मैं भी यदि तुम्हारे ही समान एक धनाढ्य बाप का अय्याश बेटा बनकर शराब, जुआ और सुन्दरी में खो जाता....जीवन की रंगीनियों में स्वयं को व्यस्त कर देता....तो एक दिन मैं स्वयं ही निर्धन न होता बल्कि तुम, राधा, राजा....सब मेरे साथ मुफलिस हो जाते....मैं सब कुछ भूल कर यह याद रखने का प्रयास कर रहा था कि डैडी ने तुम्हारे भविष्य का उत्तरदायित्व मुझ पर डाला है....मैंने कभी तुम्हारा मन नहीं दुखाया...तुम्हारी हर हठ मैंने पूरी की....तुम मेरे असीम, प्यार के कारण अनुचित रंगरेलियों में पड़ गए....शराब, जुआ, बुरी संगति....तुमने क्या नहीं किया? फिर एक दिन जब मुझे यह अनुभव हुआ कि तुम उस स्थान पर पहुंच चुके हो जहां मेरा समझाना तुम्हें विष लगता है और झूठे कपटी मित्रों के परामर्श अमृत.....तुम जिस लड़की से शादी के इच्छुक थे उसे मैं निकट से जानता था और तब मैंने बहुत सोच-समझकर फैसला किया कि यही समय है तुम्हें भास दिलाने का कि जो दौलत तुम पानी के समान बहा रहे हो उसे कमाने में लहू-पसीना एक करना पड़ता है और जब दौलत आदमी के पास होती है तो हजारों दोस्त होते हैं खाने-पीने और ऐश करने वाले....किन्तु सच्चे दोस्त वही है जो मुफलिस को सहारा बनें....असली प्रेमिका वही होती है जिसके प्यार का तौल धन न हो और मैंने क्षण-भर में तुम्हें मुफलिस बना दिया। डैडी की वसीयत वास्तविक नहीं थी...नकली थी। निर्धन होकर तुमने देख ही लिया कि कौन तुम्हारा मित्र सिद्ध हुआ, कौन प्रेमिका। तुम्हारे एक-एक दिन के हालात से मैं परिचित हूं....तुम्हारे कष्ट सुनकर मेरे हृदय में नश्तर से चुभते रहे किन्तु मैं अपनी छाती पर सिल रखे रहा, ताकि डैडी की आत्मा के सम्मुख लज्जित न हो सकूं...और अपने भाई को कुछ बना देख लूं। तुम्हारी भाभी राधा जो तुम्हारे लक्षणों से घृणा प्रकट करती थी। वह तुम्हें राजा के ही समान चाहने लगी। उसने रो रोकर, मेरे पांव पकड़-पकड़ कर कहा कि तुम्हें वापिस बुला लूं....मैंने उसे दुत्कार दिया। तुमने टैक्सी चलाई, मिस्त्री बने....और आज तुम उस स्थान पर हो कि सारा देश राज के नाम पर गौरव करता है...यह सब तुमने किन लोगों से मिल कर पाया? अच्छे मित्रों और अच्छे-परामर्श देने वाले शुभचिन्तकों से क्योंकि इनमें से कोई भी अनिल, फकीरचन्द, धर्मचन्द या कुमुद नहीं है....तुम यह जान चुके हो कि अच्छी संगत आदमी को कहां पहुंचा देती है और बुरी कहां। आज तुम यह सब कुछ प्राप्त कर चुके हो....मैं नकली वसीयतनामा फाड़ चुका हूं....असली वसीयतनामा मेरे पास है जिसके अनुसार तुम आधी सम्पत्ति के अधिकारी हो....मेरा उद्देश्य पूरा हो चुका है मेरे राजा के लिए आधी दौलत ही इतनी है कि वह स्वयं खाएगा और बच्चों के लिए छोड़ जाएगा....इसलिए तुम जब भी चाहो अपनी सम्पत्ति का आधा भाग मुझसे ले सकते हो.....और मेरा आशीर्वाद है कि तुम जीवन-भर फलते-फूलते रहो मेरे लाल...” कहते-कहते जय की आवाज भर्रा गई, “चलो राजा...राजा बेटा चलो।”

राज और उसके सब साथी सन्नाटे में खड़े थे। अचानक शंकर ने बढ़कर कहा, “ठहरिए जय बाबू! बहुत हो चुका....अब मैं आपकी कसम नहीं रख सकता।” फिर वह राज से बोला, “इतनी ठोकरें खाने के बाद भी तुझे बुद्धि नहीं आई लड़के, तू एक देवता का अपमान कर रहा है...जानता है वह साठ हजार रुपया किसने दिया था जिससे यह फैक्टरी बन सकी....वह जय बाबू देकर गए थे....मुझसे कसम लेकर कि रहस्य तुझ पर नहीं खोलूं किन्तु मैं एक देवता का अपमान होते नहीं देख सकता....यदि तूने जय बाबू के पांव पकड़ कर अभी क्षमा न मांगी तो मैं जीवन-भर तेरा मुंह नहीं देखूंगा।”

राज भौंचक्का-सा रह गया। सुषमा ने उसका कंधा हिलाया और धीरे से बोली।

“सुन रहे हैं आप....मैंने आपसे कहा था कि जिस दिन आदमी आदमी से निराश हो जाएगा वह दिन दुनिया का अन्तिम दिन होगा अब भी आप सोच रहे हैं। आगे बढ़िए....मान दीजिए इस देवता को और खुशी के इस समारोह की शोभा बढ़ा लीजिए।”

राज ने झट आगे बढ़कर जय के पैर पकड़ लिए। जय ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया और हड़बड़ाई आंखों से बोला, “मेरे बेटे....मेरे लाल।”

“मुझे क्षमा कर दो भैया....मुझे क्षमा कर दो....” राज जय के गले लगकर बच्चों के समान बिलख-बिलखकर रोने लगा।

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