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Thriller मिशन

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मिशन

वर्तमान समय से तीन साल पहले - सन 2018

अलीगढ़, उत्तर प्रदेश

इंडस्ट्रियलिस्ट समीर चौधरी के बंगले के अन्दर, स्टडी रूम में उसके साथ रमन आहूजा उपस्थित था।

देर रात का समय था। स्टडी लैम्प से निकलती पीले रंग की रोशनी से उजागर थी।

दोनों कुर्सियों पर आमने-सामने बैठे थे। मेज पर एक बड़ा-सा मैप खुला हुआ था, साथ ही लैपटॉप, कागजात, पासपोर्ट वगैरह रखे हुए थे।

“सारी तैयारी हो गई ?” चौधरी ने पूछा।

“हां! बस समझ लो – एक हफ्ते बाद मैं अंडरग्राउंड हो जाऊंगा। उसके बाद तुम से कॉन्टेक्ट करने का क्या जरिया रहेगा, अभी कुछ कह नहीं सकता। देखते हैं–प्लान क्या है।”

चौधरी सोचने वाली मुद्रा में हथेली पर अपनी ठोड़ी टिकाते हुए बोला, “ये बहुत बड़ा रिस्क लग रहा है। अभी भी समय है। सोच लेते हैं।”

“जिस लेवल का काम हम करने जा रहे हैं उसके हिसाब से देखें तो ये रिस्क कुछ भी नहीं है। सिर्फ पेशंस रखना होगा। बहुत सारा पेशंस। तुम बताओ–आईएसआई वाले क्या कर रहे हैं ?”

“उन्होंने मुझे उस मॉडल मिनाज़ के जरिए साजिश में फंसाना शुरू कर दिया है। फंसने का नाटक मैं कर रहा हूँ पर उन्हें क्या मालूम फंस तो वो रहे हैं– हमारे प्लान में।”

“हां! तुम उनकी बनाई साजिश में फंसते चले जाना। उन्हें लगेगा– तुम उनकी हाथों की कठपुतली हो। एक बार जब वह तुम्हें पूरी तरह से फांस लेंगे फिर वे लोग तुम्हें मास्टरमाइंड प्लान में ज़रूर इनवॉल्व करेंगे। मुझे यकीन है–वह तुम्हारी कंपनी की सहायता से यहाँ हथियार पहुंचाना चाहेंगे।”

“मैं तैयार हूँ फंसने के लिये। बस एक बार खलीली तक पहुँचने का मौका मिल जाये, मेरा जीवन सफल हो जायेगा।”

“तुम्हारी मनोकामना जरूर पूरी होगी।”

“याद है ? बचपन में जब हम यह सब सोचते थे ?” चौधरी चहकते हुए बोला, “तब लगता नहीं था कि यह कभी सच हो सकेगा। क्या करेंगे, कैसे करेंगे, कुछ भी पता नहीं था।”

“पर यह तो तय था कि कुछ न कुछ करेंगे। हमारे परिवार वालों के साथ जो हुआ– उसका बदला तो लेना ही था। साथ ही इस समाज में पनप रहे गंदे कीड़ों को खत्म भी करना है।”

“आगे का प्लान क्या है ? अगर सब कुछ ठीक रहा और हमने खलीली के ऊपर फतेह कर ली तो उसके बाद किस तरह आगे बढ़ेंगे ? इतनी बड़ी जिम्मेदारी हम कैसे उठायेंगे ? भारत के मित्र देश तुरंत हमारे ऊपर एक्शन लेंगे।”

आहूजा मुस्कुराया। “तुम्हारा सोचना एकदम ठीक है। हमारी इतनी भी साख नहीं कि एक समूचा देश एकदम से अपने कब्जे में कर पायें। तुम यकीन नहीं मानोगे हमारे पीछे कितनी बड़ी बैकिंग है, बहुत शक्तिशाली बैकिंग।”

“कैसी बैकिंग ? और ये तुम मुझे आज बता रहे हो।” चौधरी आंदोलित होते हुए उठ खड़ा हुआ।

“मैं इंतजार कर रहा था सही वक़्त का।” आहूजा उसी तरह इत्मिनान से बैठे-बैठे बोला।

“तो अभी तक तुम पूरी तरह से मुझ पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे ? अपने बचपन के दोस्त पर भी नहीं।”

“जिस डगर पर मैं चला हूँ उस पर मैं कभी-कभी अपनी परछाई को भी शक की निगाह से देखता हूँ।” आहूजा शून्य में घूरते हुए बोला। उसकी आँखों में दार्शनिक से भाव थे।

“कौन है वो ?”

“तुम गेस करो। वह अपने देश से ज्यादा शक्तिशाली है।”

“अपने देश से ज्यादा शक्तिशाली...” चौधरी सोचते हुए बोला।

“हाँ! कई गुना ज्यादा शक्तिशाली। इतना शक्तिशाली कि वक्त आने पर वह अमेरिका और रूस को भी जवाब दे सकेगा।”

चौधरी ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। “तुम कहना क्या चाहते हो ? कोई दूसरा देश हमें बैक कर रहा है ?”

आहूजा ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ उंगली का इशारा किया। “एकदम सही कहा तुमने।”

“कौन...कौन-सा देश ?”

आहूजा ने उत्साह के साथ मेज पर खुले मैप की तरफ ऊँगली बढ़ाई और फिर एक देश के मानचित्र के ऊपर रख दी।

चौधरी अचंभित-सा उस मानचित्र को देखता रह गया।

क्यों कुछ यादें चाहकर भी भुलाई नहीं जाती ?

क्यों कभी-कभी हम खुद को किसी दूसरे इंसान के इतना करीब महसूस करते हैं कि उसके जाने के बाद भी हर पल उस के अपने पास होने का अहसास होता रहता है ?

अलीगढ़ में बारिश का मौसम था। आये-गये मतलब-बेमतलब बारिश हो रही थी। अभी शाम को अचानक हुई बारिश से एक तरफ लोग सिर पर किसी आसरे की तलाश में भाग-दौड़ रहे थे और दूसरी तरफ सीक्रेट सर्विस का एजेंट राज वर्मा अपने ख्यालों में खोया बारिश में भीगता हुआ पैदल चला जा रहा था।

आज एक महीना बीत चुका था खलीली के मास्टरमाइंड प्लान को असफल हुए। आज एक महीना हो चुका था उस दिन को जब देश की खातिर सीक्रेट सर्विस, रॉ, सीबीआई और इन्डियन आर्मी ने संयुक्त होकर देश के खिलाफ रची गई अब तक की सब से बड़ी आतंकवादी साजिश को नेस्तनाबूत किया था। साथ ही आज एक महीना हो चुका था– समीर चौधरी, रमन आहूजा और रिंकी सेन को मरे हुए।

रिंकी ...

राज की आँखों के सामने उसका मनमोहक चेहरा घूम गया।

वह एक रॉ एजेंट थी जो राज का प्यार बन गई थी। उसे अपना सोलमेट मानने लगी थी। पर जिस दिन उस प्यार का इज़हार उसने राज से किया वही दिन नियति में उसका आखिरी दिन साबित हुआ। अपने सिरफिरे भाई समीर चौधरी को खुद अपने हाथों से मारने के अपराध बोध से बोझिल उस लड़की ने अपना पिस्टल खुद अपनी कनपटी पर लगाकर ट्रिगर दबा दिया था।

क्यों किया तुमने ऐसा ? आखिर क्यों किया ? काश ऐसा न हुआ होता तो आज हम दोनों साथ होते। क्या कुछ नहीं हो सकता था जिंदगी में ? हम साथ मिलकर अपना-अपना मिशन पूरा कर सकते थे। किसी मिशन में भले ही तुम्हें कुछ हो जाता तो शायद इतना गम न होता जितना तुम खुद अपनी जान लेकर दे गई हो।

कैसे एक बार के लिये भी तुम्हारे हाथ नहीं हिचके ? एक बार भी तुमने नहीं सोचा कि तुम्हारे भाई के अलावा भी अब तुम्हारी जिंदगी में कोई और है। उसका क्या होगा वह कैसे जियेगा ? तुमने तो जाने से पहले आखिरी शब्द तक नहीं बोले। मेरी तरफ एक आखिरी बार देखना भी जरूरी नहीं समझा। अगर देखा होता तो शायद तुम ऐसा सेल्फिश कदम नहीं उठातीं। अब जब चली ही गई हो तो अब...तो अब यूँ बार-बार मेरे ख्यालों में, मेरे सपनों में आकर यह बोलने का क्या मतलब है कि मैं अपना ख्याल रखूं और तुम्हें भूल जाऊं ? यह तुम्हारे लिये आसान था पर मेरे लिये नहीं हो पा रहा है। मैं ये सोचने के लिये मजबूर हूँ कि क्या वाकई तुम मुझसे प्यार करती थी या सिर्फ मेरा दिल बहलाने के लिये ऐसा बोल दिया था।

नहीं !

राज ने याद किया सोहनगढ़ माइंस के बाहर बिताये उन लम्हों को जब रिंकी ने अपने प्यार का इज़हार किया था और यह कहा था कि राज उसका सोलमेट है इसमें कोई शक नहीं।

सोचते-सोचते राज अपने घर पहुँच गया। उसने मेन गेट खोला तो हमेशा की तरह बिंगो दुम हिलाते हुए उसका स्वागत करने लगा। राज ने धीरे से एक बार उसकी पीठ सहलाई और फिर अंदर की तरफ बढ़ गया। बिंगो असंतुष्टि से उसको जाता देख पूँछ हिलाते हुए ‘कूँ-कूँ’ करने लगा।

राज अंदर पहुँचा। इमरतीलाल ने उसके बुझे हुए चेहरे पर नज़र डाली। उसे सब पता था। ज़ाहिद और सुरेश ने उसे सब बता दिया था और खास हिदायत दी थी कि राज पर नज़र रखे, उसका ख्याल रखे क्योंकि राज सुरेश के कई बार आग्रह करने के बाद भी उसे घर में आकर रुकने नहीं दे रहा था। वह निरंतर यही बोलता रहा कि उसे एकांत चाहिए। इस एक महीने के दौरान वो ऑफिस भी नहीं गया था। चीफ अभय कुमार ने उसे ब्रेक लेने को कहा था।

“खाना लगा दें बाबू ?” इमरतीलाल ने पूछा।

“नहीं मन नहीं है। दोपहर में बहुत खा लिया था।”

“कहां बहुत खा लिये थे! दो रोटी ही तो खाए थे। थोड़ा तो खा लो। तुम्हारी पसंद की मखनी दाल और चावल बनाया है।”

“नहीं! सही में मूड नहीं है।”

“बाबू मूड के लिये थोड़ी न खाते हैं। अब थोड़ा देखो बियर पिए हो तो खाना भी खा लो वरना नुकसान करेगा।”

राज ने मुस्कुराकर उसे देखा और कहा- “अच्छा ठीक है लगा दो।”

खाना खाने के बाद राज बैठक में पहुँचा। उसे याद आया एक बार रिंकी उससे वहाँ पर सिगरेट मांग रही थी। उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। वह उस कमरे में पहुँचा जो कि रिंकी का उसके घर में परमानेंट कमरा बन गया था।

उसकी नज़र टेबल पर गई जहां रिंकी का लैपटॉप और उसके अनगिनत उपकरण रखे रहते थे। कितनी सहजता और कंफर्ट के साथ वह इस कमरे में रहती थी जैसे बचपन से ही रह रही हो। राज के चेहरे पर मुस्कान आ गई। वह पलंग पर जाकर बैठ गया फिर कुछ सोचते हुए तकिया लगा कर लेट गया और चादर ओढ़ ली और जैसे कि रिंकी को उस बेड पर महसूस करने लगा। राज ने आंखें बंद कर ली। न जाने क्यों उसके चेहरे पर मुस्कान थी रिंकी की मीठी यादें उसके मन को गुदगुदा रही थी।

☐☐☐
 
राज ... राज ...

कोई प्यार से उसका नाम पुकार रहा था।

राज!

राज ने आंखें खोलीं तो उसने पाया रिंकी उसके बगल में बेड पर बैठी थी और उसने लैपटॉप अपनी गोद में रखा हुआ था। दुबली-पतली सी प्यारी सी स्कूल गर्ल जैसी दिखने वाली रिंकी जिसके चेहरे पर मुस्कान और मुस्कान के कारण गलों में गड्ढे दिखाई देते थे।

“तुम मेरे बेड पर क्यों सो रहे हो ?” उसने पूछा।

राज ने हैरानी से उसे देखा। वह सकपकाकर पीछे हो गया।

“अरे! क्या हुआ ?” रिंकी खिलखिलाकर हंस दी। “मैं कुछ दिन बाहर क्या थी तुमने मेरे कमरे पर कब्जा कर लिया।”

“यह कैसे हो सकता है ?” राज उठ खड़ा हुआ।

“लुक एट यू!” रिंकी हंसी।

“तुम यहाँ कैसे हो सकती हो ?”

“तो तुमने क्या सोचा था इतनी आसानी से मुझ से पीछा छुड़ा लोगे ?” कहकर उसने लैपटॉप साइड में रखा और सरकककर उसके पास आ गई। अपनी बाहें राज के गले में डालकर वह उसकी आँखों में देखने लगी।

“मैं जिंदा हूँ पर सिर्फ तुम्हारे लिये।”

“मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। मैंने अपनी आँखों के सामने तुम्हें मरते...” राज आगे वाक्य पूरा न कर सका उसके होंठ फड़फड़ा उठे।

“वो सच था। पर मैं अभी भी ज़िंदा हूँ, सिर्फ तुम्हारी लिये।”

“प्लीज़! मुझे इस छलावे में मत रखो। मेरे सपनों से निकल जाओ। मैं तुम्हें भूल जाना चाहता हूँ।”

“सच में तुम यहीं चाहते हो ?”

राज उससे नज़रें न मिला सका।

“मैं तुम्हारे सपनों में आना छोड़ दूंगी। पर तुम्हें कुछ करना होगा।”

“क्या ?”

“आहूजा के बारे में और खोजो, नूर के बारे में और पता करो। तुम अभी तक समझ नहीं पाये कि मरते वक्त मैं कितने बड़े सदमे में थी। अपनी जान से प्यारे भाई की असलियत जानकर विश्वास नहीं कर पा रही थी कि ये हकीकत है या कोई सपना। इसीलिये उस वक्त मैं कुछ और न सोच सकी। मेरा भाई एक हैवान बन चुका था। मुझ में इतनी हिम्मत नहीं थी कि उसे अरेस्ट होते हुए, कोर्ट में खड़ा देख सकूँ। उस वक्त मैं खत्म हो चुकी थी। मैं मानती हूँ– मैंने तुम्हारे साथ गलत किया। स्वार्थी हो गई। तुम्हारे ऊपर क्या बीतेगी नहीं सोच सकी... मुझे उसके लिये माफ कर दो और प्लीज़ प्लीज़ ...इस तरह अब डिप्रेशन में रहने की जगह वो काम करो जो मैं न कर सकी। उनके बारे में और पता लगाओ... मुझे यकीन है अपना देश अभी भी भारी खतरे में है।”

“ठीक है!” राज उसकी आँखों में झांक रहा था। “पर...क्या तुम वापस नहीं आ सकती ?”

“काश ये मुमकिन होता। पर अब तुम मुझे प्रॉमिस करो कि तुम ये काम करोगे।”

राज ने बेमन से सिर हिलाया।

“अब सो जाओ... अब मैं तुम्हें परेशान नहीं करुँगी।”

वह उसे एकटक देखता रहा। फिर अचानक ही रिंकी कहीं गायब हो गई।

☐☐☐

राज नींद से उठा। इतनी बढ़िया और गहरी नींद उसे एक महीने बाद आई थी। वह पूरी तरह से फ़्रेश महसूस कर रहा था। उसने कमरे में चारों तरफ देखा पर रिंकी कहीं दिखाई नहीं दी।

अलविदा!

वह मन ही मन बोला। उसने महसूस किया कि वह अब दुखी नहीं था। उसकी यादें उसके ज़हन में अभी भी ताज़ा थीं पर उसका अंतर्मन अब उनसे आन्दोलित नहीं हो रहा था।

वह मुस्कुराते हुए बैड से उठा और पूरे जोश के साथ उसका दिन चालू हुआ।

कुछ देर में गाना गुनगुनाते हुए वह शेव बना रहा था। उसे इस तरह देखकर इमरतीलाल की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इतने समय बाद लगातार उसे चुप और उदास देखते-देखते उसका मन भी खट्टा हो गया था।

“क्या बात है बाबू ? आज तो बहुत खुश हो और सुबह-सुबह कहां की तैयारी है ?”

“अरे ऑफिस जाना है। इतने दिन हो गए। न जाने कितना काम पेंडिंग हो गया होगा। चलो आप जल्दी से नाश्ता बना दो। बहुत भूख लगी है। मैं नहा कर आता हूँ।”

इमरतीलाल बहुत खुश हुआ। उसने फटाफट लाजवाब आलू के पराठे बनाये, जिन्हें चाव से खाकर राज घर से निकला।

आधे घंटे के अंदर वह सीक्रेट सर्विस के ऑफिस पहुँच चुका था।

हाथ में कार की चाबी नचाते और कोई गाना गुनगुनाते हुए वह तेजी से ऑफिस में प्रविष्ट हुआ। पर वहाँ के माहौल में कुछ अजीब-सा सन्नाटा महसूस करते हुए ही वह ठिठककर रुक गया। उसने चारों तरफ देखा। सभी लोग उसे ही देख रहे थे और फिर काफी लोग उठ कर खड़े हो गए और एक एक करके धीरे-धीरे सभी ताली बजाने लगे।

राज मुस्कुराया और सभी की तरफ देखकर सिर झुकाने लगा।

“थैंक यू! थैंक यू!”

भीनी मुस्कान के साथ फिर वह अपनी डेस्क पर पहुँचा।

कुछ ही देर में श्रीनिवासन उसके पास पहुँचा और हाथ मिलाते हुए गर्मजोशी के साथ बोला, “वेलकम बैक राज सर!”

“थैंक्स श्रीनि! और क्या हाल-चाल ?”

“सब ठीक है सर एज़ यूज़ुअल। आपको काफी मिस कर रहे थे। हम लोग आपके बिना तो ऑफिस में कोई रौनक ही नहीं रहती।”

“अच्छा! आते ही मेरी खिंचाई शुरू हो गई ?”

“सर, हम कहां आप की खिंचाई कर सकता है। आप कौन सा रबड़बैंड है जो आपको खींचा जाएगा और आप खिंचते चले जाएंगे।”

“वाह श्रीनि! क्या बात कही है। चलो इसी बात पर कॉफी हो जाए।”

“बिल्कुल राज सर! आप तो जब से ऑफिस नहीं आए हमारा तो कॉफी पीना ही छूट गया।”

“अब इतना भी मत फेंको यार।” राज ने खड़े होते हुए कहा और फिर दोनों पैंट्री की तरफ बढ़ गए।

वहाँ पहुँचकर दोनों ने कॉफी मशीन से अपने लिये कॉफी बनाई और वहीं खड़े होकर धीरे-धीरे गर्म कॉफी की चुस्की लेने लगे।

“और क्या चल रहा है आजकल ऑफिस में ? चीफ कहां हैं और मेरी जान और ज़ाहिद किधर हैं ?”

“आप किसी के कॉन्टेक्ट में नहीं हैं क्या ?”

“नहीं! मैंने तो कई दिन से फोन-वोन सब बंद करके रखा हुआ था।”

“आई कैन वेरी वेल अंडरस्टैंड राज सर। यह काफी मुश्किल समय था आपके लिये।”

राज कुछ पल शून्य में घूरता रहा, फिर बोला, “कोई नहीं! हर किसी की लाइफ में मुश्किल समय आता ही है। ज़ाहिद ने भी कितनी मुश्किलें झेली हैं पर देखो अब इतने सालों बाद उसे कुछ आशा की किरण तो नज़र आई, उसकी फैमिली शायद जिंदा है और ये कितनी खुशी की बात है।”

“यू आर राइट सर और आजकल ज़ाहिद और सुरेश सर उसी सिलसिले में लगा हुआ है। आज भी दोनों लापता फ्लाइट 301 के जांच पड़ताल के चक्कर में निकला हुआ है।”

“आई सी!”

☐☐☐
 
छह साल पहले - सन 2013

महानगर कॉलोनी, अलीगढ़

उस वक़्त रात के ग्यारह बजे हुए थे जब ज़ाहिद की मारुती 800 उसके घर के अन्दर पोर्च में आकर रुकी।

गाड़ी से उतारकर उसने मेन गेट बंद किया और अन्दर पहुंचा।

हॉल में उसे सोफे पर बैठी उसकी बीवी सरीना और छः साल की बेटी फलक दिखाई दिए।

सरीना ने उसे देखते ही नज़र दीवार घड़ी पर डाली और फिर नज़रें वापस टीवी पर डाल लीं। हालांकि उसे देखते ही फलक सोफे पर से कूदते हुए ज़ाहिद की तरफ दौड़ी।

“डैडी...डैडी!”

वह अपने अब्बा के गले आ लगी।

“मेरी प्यारी बच्ची!” ज़ाहिद उसे गोद में लेकर गालों को चूमते हुए बोला।

“डैडी! मेला-मेला।”

“मेला तो अब बंद हो गया मेरी जान! पर डैडी अपनी जान के लिये कुछ लेकर आये हैं।”

“वाओ! गिफ्ट!” वह स्वछन्द भाव से सोफे पर चढ़कर कूदने लगी।

ज़ाहिद ने पीठ से बैग उतारा और उसमे से एक गुड़िया निकाली।

फलक ने ख़ुशी से किलकारी मारते हुए गुड़िया थाम ली।

“मेजर साहब!” सरीना तुनककर बोली, “छः बज गये ?”

ज़ाहिद से कुछ बोलते न बना। वह सोफे पर बैठ गया और सरीना के कंधे पर बांह रखने की कोशिश ही कर रहा था कि उसने उसका हाथ परे धकेल दिया।

“सॉरी! अचानक ही नया केस आ गया।”

“हाँ-हाँ! तो पूरी सीक्रेट सर्विस में आप तो अकेले ही एजेंट हैं न।”

ज़ाहिद फलक को देखने लगा।

“हफ्ते में एक ही दिन होता है छुट्टी का और जनाब वह दिन भी ऑफिस में ही बिताना पसंद करते हैं।”

“अरे, मैं निकल ही रहा था पर चीफ ने...”

“मुझे न सही अपनी बच्ची को तो वक़्त दीजिए। सिर्फ खिलौने देकर कब तक उसे खुश करते रहेंगे ?”

“अरे बाबा! कल लेट चला जाऊंगा। सुबह चलेंगे मेला।”

“सुबह कौन मेला जाता है ? मुझे नहीं जाना।”

“फलक के स्कूल से वापस आने के बाद जहाँ बोलो चलेंगे।”

“हुंह!” सरीना ने मुंह फेर लिया और फिर रिमोट सोफे पर पटककर उठ खड़ी हुई। “खाना खायेंगे या वो भी ऑफिस में ही हो गया।”

“ऐसा कभी हुआ है ?”

“बहुत बार हो चुका है, आपकी याददाश्त उम्र के साथ कमज़ोर हो रही है।” किचन की तरफ बढ़ते हुए वह गुस्से में भुनभुनाये जा रही थी।

ज़ाहिद ने जवाब नहीं दिया और फलक के साथ खेलने लगा।

“डैडी! क्या मैं गुड़िया प्लेन में ले जा सकती हूँ ?”

“हाँ! बिलकुल!”

“नेक्स्ट वीक, नानू के यहाँ जब हम जायेंगे तो मैं अपने सारे खिलौने ले जाउंगी।”

“सारे नहीं बच्चा! प्लेन में थोड़ा-थोड़ा सामान ही ले जा सकते हैं।”

“पर प्लेन तो इतना बड़ा होता है, उसमे तो बहुत जगह होती है।” वह हाथ फैलाकर सोफे पर घुटनों के बल खड़े होते हुए बोली।

ज़ाहिद उसकी नादानी पर मुस्करा दिया। “पर उसमे बहुत सारे लोग जाते हैं न और प्लेन की मशीन भी बहुत बड़ी-बड़ी होती हैं तो जगह कम बचती है।”

फलक गंभीर मुद्रा में सोचने लगी। “फिर मैं कौन से खिलौने ले जाऊं ?”

“अपने बेस्ट खिलौने, बनी वाले बैग में रख लेना- उसमे जितने भी आ जाएँ।”

“ओके!” वो प्रफुल्लित होते हुए सीढ़ियों की तरफ भागी जो दूसरी मंजिल में उसके कमरे की ओर जाती थीं।

ज़ाहिद ने रिमोट उठाया और टीवी पर चैनल बदलने लगा। न्यूज़ चैनल पर आकर वह रुका।

पिछले महीने मलेशिया के गायब हुए एक प्लेन को लेकर अभी तक न्यूज़ में काफी सरगर्मी थी। काफी खोजबीन के बाद अभी तक उस प्लेन का कुछ पता नहीं चला था। कई लोग अपनी-अपनी थ्योरी दे रहे थे। कोई इसे हाईजैकिंग का मामला करार दे रहा था कोई टेररिज़म का। कुछ लोगों का ये भी मानना था कि प्लेन किसी वैज्ञानिक फिनोमिना के चलते गायब हो गया।

फिलहाल न्यूज़ पर कहा जा रहा था –

“मलेशिया की गायब हुई फ्लाईट 540 को लेकर फिलिपाइन्स के एक साइंटिस्ट का दावा है कि प्लेन टाइम ट्रेवल के एक्सपेरिमेंट का शिकार हुआ है। आइये आपको दिखाते हैं उनका क्या कहना है।”

फिर स्क्रीन पर एक ईमारत के बाहर चश्मा लगाये एक बूढा एशियन एक रिपोर्टर के साथ दिखाई दिया। वह फिलिपिनो में बोल रहा था जिसका हिंदी अनुवाद सब टाइटल्स में लिख कर आ रहा था –

“टाइम ट्रेवल मुमकिन है और मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर आज की तारीख में कोई इस मुकाम तक पहुँच चुका हो कि अब उसे मुमकिन कर दिखाए।”

“पर अगर प्लेन टाइम ट्रेवल के चक्र में फंस गया है तो उसके कुछ अवशेष कैसे मिल रहे हैं ?” रिपोर्टर ने पूछा।

“टाइम ट्रेवल के लिए प्लेन किसी चक्रवात के समान तेजी से घूमा होगा, जिससे ऐसा होना सम्भव है।”

“पर कोई प्लेन जैसी चीज़ के साथ ही अपना एक्सपेरिमेंट क्यों करेगा ?”

“ये तो उसके ऊपर है उसके उपकरण के ऊपर है। शायद हवा में उड़ती चीज़ पर ऐसा करना आसान होगा। छोटे लेवल पर शायद वह पहले ही टेस्ट कर चुका होगा।”

“कुछ लोग कह रहे हैं ये एलियंस का काम है।”

वह मुस्कराकर बोला, “एलियंस दरअसल कोई और नहीं हम इंसानो का ही भविष्य का रूप है। आज से लाखों साल बाद जब इंसान इवोल्यूशन के चलते बदल चुका होगा।”

“तो क्या मुमकिन है ये एलियंस का ही काम है ?”

फिर अचानक उसने रिपोर्टर से विदा ली और अपनी कार की तरफ बढ़ गया।

☐☐☐

वर्तमान समय

इंडियन एयरलाइन्स कार्यालय, अलीगढ़

अतीत के भंवर से निकलते हुए ज़ाहिद ने चौंककर उसे देखा।

“सर, पानी!” हाथ में ट्रे लिए हुए एक बैरे ने मुस्कराकर कहा।

ज़ाहिद ने पानी का गिलास ले लिया।

वह सुरेश के साथ इस वक़्त इंडियन एयरलाइन्स के ऑफिस में मौजूद था और वे दोनों उनके एक उच्च अधिकारी का इंतज़ार कर रहे थे।

ज़ाहिद के हाथों में प्लास्टिक के ज़िप लॉक के अन्दर सुरक्षित वह फोटो थी जिसे पिछले महीने से वह अनगिनत बार देख चुका था। दिन में, रात में, सोते हुए... उसकी नजरें अपनी बीवी और बेटी के साथ पीछे बहते समुद्र पर भी थीं, वहाँ की रेत पर थी, दूसरे इंसानो पर थी। वह चाहता था कि कोई तो क्लू मिले जिससे उनकी लोकेशन के बारे में कुछ पता चल सके।

तुम दोनों जिंदा हो, तुम दोनों जिंदा हो! तुम्हारे पास दूसरा कोई ऑप्शन नहीं है।

“कुछ कहा ?” सुरेश ने अपने फ्रेमलेस चश्मे को नाक पर चढ़ाते हुए पूछा।

ज़ाहिद ने इंकार में सिर हिलाया।

“मैं शर्त लगाने को तैयार हूँ – भाभी और फलक एकदम ठीक ठाक होंगे।”

ज़ाहिद ने हामी भरी। आमतौर पर उसे अपनी काबीलियत और अपने काम के लिये कभी किसी दूसरे के आश्वासन की जरूरत नहीं पड़ती थी, पर इस मामले में वाकई वह मन से चाहता था कि हर कोई उसे यह आश्वासन दे कि उसकी बीवी सरीना और बेटी फलक ठीक-ठाक होंगे। इतने सालों से उनके दोबारा मिलने की आशाएं पूरी तरह से खो चुकने के बाद पिछले महीने सोहनगढ़ माइंस में ISIK के नेता खलीली के दिए इस फोटो और जानकारी के बाद उसके जीवन में फिर से उम्मीदें जाग उठी थीं। चीफ अभय कुमार भी बखूबी इस बात को समझता था और उसने ज़ाहिद को पूरी छूट दी थी कि किसी भी और केस पर ध्यान न दे और फ़िलहाल लापता फ्लाइट 301 के केस पर पूरी तरह से लग जाए। हालांकि ये केस सिर्फ ज़ाहिद के लिये व्यक्तिगत महत्त्व नहीं रखता था बल्कि यह पूरे विश्व के लिये एक बहुत बड़ी मिस्ट्री थी, क्योंकि पूरा का पूरा एयरप्लेन गायब हो गया था- वो भी एक नहीं दो बार। पहले मलेशिया का एक विमान और कुछ ही दिनों बाद भारत का। दोनों का ही कोई भी सुराग आज तक कभी किसी को नहीं मिला था। सभी तरह की टेक्नोलॉजी प्रयोग कर ली गई, पूरे समुद्र को छान मारा गया, लेकिन नतीजा सिर्फ और सिर्फ सिफर निकला। पर अब खलीली की दी हुई जानकारी से यह तो साबित हो गया था कि कम से कम वह भारतीय प्लेन क्रैश तो नहीं हुआ था। अन्यथा ज़ाहिद की बीवी और बच्चे जिंदा कैसे होते! किसी समुद्र तट पर खड़े कैसे होते! यह फोटो कोई ऐसी भी नहीं थी कि जिससे पता चले कि टेक्नोलॉजी यूज़ करके कृत्रिम फोटो बनाई गई हो, क्योंकि ज़ाहिद उसमें सरीना और फलक के भाव देख सकता था, फलक की बढ़ी हुई उम्र देख सकता था। कहने को तो ये भी टेक्नॉलॉजी के इस्तेमाल से किया जा सकता था, पर फिर भी यह एक बहुत दूर का शॉट था जिस पर विश्वास करना मुश्किल था। आसार यही थे कि खलीली ने जो कहा था– वो सच था। एयरप्लेन का यूं गायब होना इत्तफाक नहीं था, वह एक साजिश थी और वह साजिश क्या थी यह जानना बहुत जरूरी था। यह सिर्फ ज़ाहिद की बीवी और बच्चे के लिये ही नहीं था बल्कि उन तमाम पैसेंजर्स के लिये था जो उस दुर्भाग्यशाली फ्लाइट में सवार थे। साथ ही ये देश की सुरक्षा का मामला था क्योंकि अब इस मामले में आतंकवादियों के शामिल होने की सम्भावना प्रबल हो गई थी। पर फिर भी ये रहस्य समझ में नहीं आ रहा था कि अगर प्लेन हाईजैक किया गया तो उसके बदले में कोई मांग क्यों नहीं की गई ? अगर टेररिस्ट प्लाट के तहत किया गया तो किसी ऑर्गेनाइजेशन ने इसकी जिम्मेदारी क्यों नहीं ली ? तो क्या यह हाईजैकिंग किसी और बड़ी साजिश का हिस्सा थी, जो कि खलीली द्वारा रचित मास्टरमाइंड प्लान से संबंधित थी ? या ये कोई और ही साजिश थी ?

बहरहाल सच क्या था इस पर सिर्फ अटकलें लगाई जा रही थी, सबूत कुछ भी नहीं मिला था। पिछले कई दिनों से अभय, ज़ाहिद और सुरेश के बीच निरंतर मीटिंग हो रही थी और इस केस पर आगे बढ़ने के बारे में रणनीति बनाई जा रही थी। तो अब शुरूआत यहाँ से हुई थी कि पता किया जाये कि फ्लाइट के दो पायलेट्स कौन थे ? उनका बैकग्राउंड कैसा था ? इसी काम के लिये आज ज़ाहिद और सुरेश इंडियन एयरलाइंस के ऑफिस पहुँचे थे।

तभी ऑफिस में वह उच्च अधिकारी प्रविष्ट हुआ। उसने एक नज़र ज़ाहिद और सुरेश की तरफ डाली और फिर उन्हें इशारा कर के अपने केबिन की तरफ बढ़ गया। ज़ाहिद और सुरेश उसके पीछे कैबिन में दाखिल हुए।

वह अधिकारी, जिसका नाम श्रीपद था, औपचारिकता निभाने के बाद जल्दी से बोला, “देखिए ये एक बहुत पुराना केस है और इसे पहले ही बहुत हाइलाइट किया जा चुका है। मीडिया परेशान करती रही है, इसकी छानबीन भी की जा चुकी है। मुझे समझ नहीं आ रहा है अब इतने सालों बाद मैं आपको क्या नया बता सकता हूँ ?”

“मैं समझ सकता हूँ कि इस केस को लेकर आपको काफी परेशानी हुई है।” ज़ाहिद बोला, “पर इसे फिर से ओपन इसलिये किया गया है क्योंकि अब हालात बदल चुके हैं। अभी तक तो ये माना जाता रहा था कि प्लेन क्रैश हुआ होगा पर कुछ नये सबूत सामने आए हैं जिनसे पता लगा है कि प्लेन के कई यात्री किसी अज्ञात जगह सुरक्षित उतारे गए थे और वह शायद अभी भी जिंदा हैं। इसका मतलब यह एक सोची-समझी साजिश थी न कि कोई दुर्घटना अब जबकि यह साबित हो चुका है तो इन्वेस्टीगेशन एक नए सिरे से शुरू करना बेहद जरूरी है।”

श्रीपद ने ताज्जुब से ज़ाहिद की तरफ देखा। “यह तो वाकई चौंका देने वाली बात पता लगी है।”

ज़ाहिद ने जेब से वह फोटो निकालकर सामने टेबल पर रख दी। श्रीपद ने गौर से फोटो को देखा। ज़ाहिद बोला, “इस फोटो में उस फ्लाइट के पैसिंजर हैं।”

वह ताज्जुब से फ़ोटो देखने लगा।

“केस रिपोर्ट हम कई बार पढ़ चुके हैं पर फिर भी क्या आप हमारी नॉलेज के लिए एक बार फिर वाकया बता सकते हैं ?” सुरेश बोला, “अ समरी विल बी हेल्पफुल।”

“जो आप पढ़ चुके हैं उसके अलावा कुछ भी नया मैं शायद ही बता सकूं। 23 मार्च 2013 को दोपहर ढाई बजे ये फ्लाईट अलीगढ़ से मुंबई पहुंची और फिर वहां से क़तर के लिये शाम छः बजे रवाना हुई। सात बजकर छः मिनट पर एयर ट्रैफिक कंट्रोल से उसका लास्ट कम्युनिकेशन हुआ था। उसके दस मिनट बाद अचानक उसका रुख दक्षिण की तरफ हो गया। इस बीच एयर ट्रैफिक कंट्रोल से उसे कई बार मैसेज भेजे गए पर कोई जवाब नहीं मिला। वह उड़ते हुए मालदीव्स के ऊपर से गुज़रा। ग्यारह बजे वह वहां के रडार स्क्रीन से गायब हो गया। उसके बाद भारतीय नेवी का रडार उसे हिन्द महासागर की तरफ ट्रेक करता रहा। रात बारह बजकर चालीस मिनट पर वह नेवी के रडार से भी गायब हो गया। उसके बाद से आज तक ऑफिशियल तौर पर प्लेन को न कहीं देखा गया न ही उसकी लोकेशन का पता चला।”

“थैंक्स, सर!” सुरेश ने कहा- “हम चाहते हैं कि आप हमें उस फ्लाइट के पायलेट्स के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी दें।”

“देखिए अगर आप फिर से पायलेट्स पर शक कर रहे हैं, तो मैं आपको बता दूं कि पिछली बार भी खुफिया एजेंसीज़ को पायलट के खिलाफ कुछ भी नहीं मिला था। विक्रम और अजय दोनों का बैकग्राउंड क्लीन था और उनकी मानसिक हालत भी एकदम ठीक थी। उनके खिलाफ कुछ भी पता नहीं चला था अब मैं आपको और क्या नई जानकारी दूं ? सब कुछ तो पहले ही बताया जा चुका है।”

“मानसिक हालत तो ठीक ही होगी। क्योंकि अब पता चला है यह साजिश थी न कि किसी पायलट का सुसाइड मिशन। इसका मतलब पायलट के इन्वोल्व होने की संभावना नकारी नहीं जा सकती।” सुरेश ने कहा।

“मुझे नहीं लगता...” श्रीपद ने नकारात्मक ढंग से सिर हिलाते हुए कहा पर ज़ाहिद उसकी बात बीच में ही काटते हुए बोला-

“जैसा कि आपने कहा प्लेन ने जैसे ही अपनी दिशा बदली, एयर ट्रैफिक कंट्रोल से उसका कॉन्टेक्ट टूट गया था।”

“हां सही है।”

“ऐसा पायलेट्स ने जानबूझकर किया हो सकता है।”

“हाईजैकर्स ने भी किया हो सकता है, पायलेट्स से जबरदस्ती करवाया हो सकता है या तकनीकी खराबी भी हो सकती है।”

“समझ सकते हैं कि आप अपने पायलेट्स का पक्ष ले रहे हैं।”

“मैं दोनों से परिचित हूँ, इसलिये ऐसा पूरे कॉन्फिडेंस के साथ कह रहा हूँ और जब सीबीआई को भी उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला तो मेरा ये विश्वास यकीन में बदल गया था।”

ज़ाहिद ने फ़ोटो ज़िप लॉक सहित अपनी शर्ट की ऊपरी जेब मे रखा और कहा, “अगर ये सच है तो वे दोनों पायलेट्स भी आज बाकी पैसेंजर्स के साथ कैद होंगे। मामला अब और भी संगीन ही चुका है। क्योंकि अब हमारे सामने चुनौती है इन सभी को सुरक्षित वापस लाने की।”

“पर अगर ये सभी जिंदा हैं तो अभी तक इनके लिये कोई फिरौती क्यों नहीं मांगी गई!”

“ये भी एक रहस्य है। हो सकता है वो किसी मुकम्मल वक़्त का इंतज़ार कर रहे हों। हमें ये सब पता करना है और हम शुरुआत कर रहे हैं। भले ही पायलेट्स बेगुनाह हों पर उनकी खोजबीन से इन रहस्यों पर से पर्दा उठ सकता है।”

“मैं समझ सकता हूँ। मैं आपका पूरा साथ दूंगा।”

☐☐☐
 
क्योंकि राज बहुत दिनों बाद ऑफिस आया था फिलहाल उसके पास कोई काम नहीं था।

चीफ अभय कुमार ने उससे फौरी तौर पर एक मुलाक़ात की और हालचाल लिया। ये भी कहा कि जब तक पूरी तरह से ठीक न लगे ऑफिस न आये। पर राज ने कहा अब वह ठीक है और नियमित रूप से ऑफिस आयेगा।

राज फिलहाल किसी नये केस में हाथ डालने के मूड में नही था। हाल में हुए वाकये अभी तक उसके अंतर्मन को झिंझोड़ रहे थे। खलीली के मास्टरप्लान के बाद से काफी लोगों का यहीं हाल था। भारत की सभी खुफिया एजेंसीज़ अब पहले से बेहद ज्यादा सजग थीं। रिक्रूटमेंट बढ़ा दिया गया था फिर चाहे वो बाहर देशों की हरकतों पर नज़र रखने वाली रॉ हो या फिर अंदरूनी मामलों को संभालने वाली सीक्रेट सर्विस, सीबीआई, आईबी आदि।

राज ने सुरेश को कॉल किया पर उसने कॉल रिसीव नहीं की। उसके मन में खलीली और उसके प्लान से जुड़े कई सवाल कौंध रहे थे और वो उस बारे में किसी के साथ बात करना चाहता था।

कुछ देर बाद उसे सुरेश का मैसेज आया कि वो केस के सिलसिले में ज़ाहिद के साथ अभी दिल्ली की फ्लाइट पकड़ रहा है।

उसने कुछ देर व्हाट्सएप पर आये मैसेज को देखा फिर सुरेश की प्रोफाइल पिक देखने लगा जो उसने हाल ही में बदली थी। उसमे वो सफेद टी शर्ट पहने था और सामने देखते हुए मुस्करा रहा था। राज उसे देखकर मुस्कराया। उसने सोचा कि वाकई वो बहुत खुशकिस्मत है जो उसे सुरेश जैसा दोस्त मिला। उसके हर गलत कदम से पहले ही अक्सर सुरेश उसे आगाह कर देता था, मुसीबत का कोई ऐसा पल नहीं होगा जब वह उसके साथ खड़ा न रहा हो।

उसने कहा था रिंकी के चक्कर में मंदिरा जैसी भली लड़की को न गंवाओ। क्या वो ठीक कह रहा था ? आखिर मैं कैसे इतनी आसानी से रिंकी के प्यार में पड़ गया! मुझे हुआ क्या था ? क्या वाकई वो प्यार था या वो किसी सम्मोहन के वश में था। आखिर रिंकी ने उससे प्यार क्यों किया ? उसके साथ नज़दीकियां बढ़ाने में रिंकी का ही स्वार्थ था। उसे किसी तरह से सीक्रेट सर्विस के सहारे खलीली तक पहुँचना था और वो इसमें सफल भी हुई। पर फिर वक्त से पहले ही क्यों अपने राज़ उसने हम पर खोल दिये ? क्यों अपने भूत की दिल दहला देने वाली कहानी सुनाते वक्त उसने मेरा सहारा लिया ? उसकी आँखों में उमड़े वो भाव, वो प्यार और अपनापन ...नहीं ... वो झूठे नहीं थे!

तभी फोन की घंटी ने उसे आकर्षित किया। उसने मोबाइल की स्क्रीन देखी। मंदिरा का नाम दिखा। राज स्क्रीन को देखता रहा, कॉल बजती रही फिर कुछ देर में बंद हो गई। राज ने फोन एक तरफ रख दिया और फिर सिर पर हाथ रखकर कुर्सी में रिलेक्स होकर बैठ गया।

तभी अभय उसकी डेस्क पर पहुँचा। राज उसे देखकर एकदम से चौंका। इस तरह अभय किसी एजेंट की डेस्क पर खुद चलकर आये ये कभी-कभार ही होता था।

“ राज!” वह उतावलेपन के साथ बोला, “हमें दिल्ली चलना होगा।”

“दिल्ली!”

“हाँ! तुम फ़िलहाल कुछ कर रहे हो ?”

“नहीं! कुछ भी नहीं!”

“तो चलो- अभी सीधे एयरपोर्ट चलते हैं।”

“ठीक है! लेकिन हुआ क्या सर ?”

“सीबीआई ने तलब किया है। खलीली सम्बंधित कुछ पूछताछ करना चाहते हैं। हालाँकि हम लोग अभी रिपोर्ट पर काम कर ही रहे हैं और उसमे काफी वक्त लगने वाला है, पर कुछ ऐसे मसले हैं जिन पर वह इंतज़ार नहीं कर सकते। कुछ ऐसे सवाल हैं जो अंतर्राष्ट्रीय फोरम पर पूछे गये हैं, इसलिये उनका तुरंत जवाब देना ज़रुरी हो गया है। इस मिशन में तुम्हारी अहम भूमिका थी इसलिये तुम्हारा चलना महतवपूर्ण होगा।”

“चलिए।” कहकर राज उठ खड़ा हुआ।

दोनों तेज़ कदमों से बढ़ते हुए हेडक्वार्टर से बाहर निकले।

☐☐☐

राज और अभय नई दिल्ली में लोधी रोड स्थित सीबीआई के हेडक्वार्टर में इंटरपोल ऑफिस पहुँचे।

उन्हें सिर्फ दस मिनट इंतज़ार करना पड़ा और फिर मीटिंग रूम में उनकी मुलाकात इंटरपोल ऑफिस के इंचार्ज एस पी राज निकेतन और एक एक्सपर्ट मनोज रामचंद्रन से हुई।

चारों मीटिंग रूम में पड़ी विशालकाय मेज के आमने-सामने बैठ गये।

“हमारे आग्रह पर तुरंत यहाँ पहुँचने के लिये थैंक्स, अभय एंड राज!” राज ने कहा।

अभय और राज ने सिर्फ सिर हिलाया।

“आप समझ सकते हैं कि खलीली के प्लान को विफल करने में आप और आपकी एजेंसी की अहम भूमिका रही है। इस प्लान की चर्चा देश-विदेश हर फोरम पर आजकल हो रही है। हमारी-आपकी एजेंसी के साथ विदेश की ख़ुफ़िया एजेंसियां भी हैरान-परेशान हैं कि इतनी बड़ी साजिश कैसे किसी की नज़र में नहीं आई। थोड़ा बहुत नज़र आई भी तो इसके इतना खतरनाक होने का अंदाज़ा कैसे नहीं लगा। मतलब...न्यूक्लियर वैपन वो भी ड्रोन पर...कम ऑन... मिलट्री भी अभी तक ऐसी तकनीक पर काम नहीं कर सकी है और ये आतंकवादी...खैर...इन सभी मसलों पर छानबीन चल ही रही है आप भी उसका हिस्सा हैं। पर आज आपको यहाँ इसलिये बुलाया गया है ताकि इंटरपोल से आ रहे सवालों का उत्तर दिया जा सके। उन्हें अभी तक यहीं कहकर टाला जा रहा था कि रिपोर्ट बन रही है अभी समय लगेगा, पर अब वे होम मिनिस्ट्री से दबाव डलवा रहे हैं, मुझे लियोन से रोज फोन आ रहे हैं। आई होप आप मेरी पोजीशन समझ सकते हैं।”

“बखूबी समझ सकते हैं मिस्टर राज! इसलिये तो मैं यहाँ राज के साथ तुरंत पहुँचा हूँ। ऐसे खतरनाक मिशन रोज नहीं होते। सिर्फ भारत ही नहीं पूरे विश्व में इस के बाद बहुत कुछ बदलने वाला है। आप पूछिए जो भी पूछना है। बस इसमें एक केवियट [1] रहेगा कि इसे प्रिलिमनरी जवाब ही माना जाए। अंतिम उत्तर तो सीबीआई और सीक्रेट सर्विस की जांच पूरी होने बाद ही भेजा जायेगा।”

“बिलकुल अभय! हमारे उत्तर में ये लाइन पहले ही बोल्ड में लिख दी जायेगी। अब आप दोनों को मुद्दे पर लाता हूँ। आप जानना चाहेंगे कि क्यों इंटरपोल इंतज़ार नहीं कर पा रहा ? क्यों हमारी सरकार पर तुरंत जवाब देने का दबाव बना रहा है ? तो उसका जवाब है- रमन आहूजा! वो एक इंटरपोल अफसर था और वो इंग्लैण्ड का सिटिज़न था। वो भारत में आतंकी हरकतों की जानकारी लेने आया था।”

“पर आमतौर पर ऐसा नहीं देखा गया कि इंटरपोल का कोई अफसर किसी मिशन पर काम करे या फील्ड में उतरे।” अभय बोला।

“आपने बिलकुल सही कहा। फील्ड वर्क करना इंटरपोल का काम नहीं। वो सिर्फ एक नेटवर्क है जो सिर्फ देशों को ज्यादातर इस तरह के क्राइम में मददगार साबित होता है जहाँ अपराधी देश छोड़कर दूसरे देश भाग गया हो, ऐसे केस में वो देश इंटरपोल से उस अपराधी के खिलाफ रेड नोटिस ज़ारी करवाने की मांग कर सकता है, जैसा कि आप जानते ही हैं कि खलीली के खिलाफ कई देशों ने रेड नोटिस जारी करवा रखा था।”

“फिर रमन आहूजा किस केपेसिटी में भारत आया था ?”

“क्योंकि मामला टेररिज़म का था, उसे यहाँ भेजा गया था। इसके लिये हमारी गवर्नमेंट से विशेष अनुग्रह किया गया था। इसमें किसी का नुकसान नहीं था तो उसे आने दिया गया।”

“तो क्या ये पहले से मालूम था कि खलीली भारत में है या आने वाला है ?”

“सिर्फ एक अनुमान था, बहुत हल्का सा हिंट। ऐसा कोई बड़ा प्लान है इसकी कोई भनक नहीं थी।”

“फिर आहूजा कैसे खलीली के गुप्त अड्डे पर मौजूद था ?” अचानक राज बोला।

“मैं बस उसी मुद्दे पर पहुँच रहा हूँ।” राज हल्की सी मुस्कान के साथ बोला, “रमन आहूजा करीब सात साल पहले भारत आया था। जैसा कि इंटरपोल करता है उसका काम सिर्फ डेस्क वर्क था। जानकारियां इकठ्ठा करना। वो यहीं इसी ऑफिस में बैठता था।”

“यहाँ ?”

“बिलकुल! इंटरपोल ऑफिसर के लिये यहीं तो ऑफिस है भारत में।”

“ओह!”

“आई नो...” अभय ने कहा– “यानि फील्ड पर काम करना वैसे भी उसके जेडी [2] में नहीं था।”

“बिलकुल...”

“पर उसका तो पर्सनल एजेंडा था।” राज भेद भरी मुस्कान के साथ बोला।

अचानक ही राज की आँखों में चमक उभरी। “बस यही वो वजह है जिसके कारण मैंने अभय को कहा कि तुम्हें साथ लेकर आये।”

राज ने सहमति में सिर हिलाया। “मैं समझ रहा हूँ। सोहनगढ़ माइंस में उसने अपना जो राज़ उगला था उस वक्त मैं भी वहाँ था और...और अब वहाँ मौजूद लोगों में सिर्फ मैं ज़िंदा हूँ।”

“बुल्स आई!” राज उत्साह के साथ बोला, “अब समझा अभय क्यों आपको अपने बेस्ट मेन मे गिनते हैं।”

अभय ने गर्व के साथ राज की तरफ देखा।

“सब अभय सर से ही सीखा है।” राज बोला, “तो फिर आहूजा ने यहाँ कितना समय निकाला ?”

“मुश्किल से छह महीने।”

“उसके बाद ?” राज ने पूछा।

“वह अपने देश वापस चला गया।”

“ओह!” राज के चेहरे पर शातिर मुस्कान आ गई। “यानि सिर्फ पेपर पर...”

“हाँ!”

“अपने देश और काम पर वापस न पहुँचने पर इंटरपोल ने उसे ढूंढा नहीं ?”

“बिलकुल ढूंढा, पर उसका कुछ पता नहीं चला। उसने लंडन का टिकट निकाला हुआ था, इम्मीग्रेशन का स्टम्पिंग भी करवाया हुआ था उसके बावजूद भी वह असल मे भारत से कभी नहीं निकला।”

“अब समझा! उसने कहा था कि उसने चार साल आईएसआई का एजेंट बनने मे लगाये थे।”

“और... ?” राज ने पूछा और उसके इशारे पर मनोज ने अपने लैपटॉप पर टाइप करना शुरू किया।

“फिर आई एस आई ने उसे गुप्त मिशन पर लगा दिया। वह मिशन था– सोहनगढ़ माइंस का निर्माण।”

“यानि एक तरह से वो खलीली के लिये काम करने लगा था।”

“हाँ! और उसे खलीली के मिशन की जो भी जानकारी मिलती थी वो उसे समीर चौधरी उर्फ नूर मोहम्मद के साथ शेयर करता रहा।”

“रिंकी सेन भी उसके बारे मे जानती थी ?”

राज ने गहरी सांस ली और फिर कहा- “हाँ!”

“रिंकी किस तरह उसके साथ इन्वॉल्व थी ?”

“मुझे लगा हम आहूजा के बारे मे बात करने वाले हैं...” राज राज और फिर अभय की तरफ देखते हुए बोला।

“सब इंटरलिंक्ड है...यू नो हाउ इट इज़ एजेंट...” राज ने हाथ फैलाये।

“रिंकी समीर चौधरी की बहन थी और दोनों मिलकर खलीली से बदला लेना चाहते थे।” राज बोला।

“उनकी बैक स्टोरी के बारे मे पता चला। काफी इंट्रेस्टिंग लगा। तो ये दोनों भाई-बहन आहूजा की मदद ले रहे थे ?”

“हाँ!”

“अब अहम बात है ये जानना है कि आहूजा के क्या इरादे थे।”

“वो खलीली के प्लान को फेल कर के अपना प्लान लागू करना चाहता था।”

“वो क्या था ?”

“देश को प्रस्तुत गवर्नमेंट से मुक्ति दिलाना।” राज ने भौहें उचकाकर कहा।

“और ऐसा वो खलीली के ही उपकरणों के इस्तेमाल से करना चाहता था ?”

“हाँ!”

“अब हमें इन सभी बातों को प्रमाणित करने के लिये कुछ सबूत भी पेश करने होंगे।”

अभय तुरंत बोला, “हम बोल सकते हैं अभी इन्वेस्टिगेशन चल रही है। फ़िलहाल जो सीक्रेट सर्विस से जवाब मिला है उसके आधार पर उत्तर दिया जा रहा है।”

“जी हाँ! वो तो बोलना ही है। पर मैं फ़िलहाल ये समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि क्या उस दौरान हमें उसके खिलाफ कोई प्रामाणिक तथ्य मिला था उसके कन्फेशन के आलावा। मुझे उम्मीद तो नहीं कि हमने उसके कन्फेशन की कोई रिकार्डिंग की... ?” उसने आशापूर्ण निगाहों से राज को देखा। राज ने इंकार मे सिर हिलाया।

फिर कुछ सोचते हुए राज बोला, “वह समीर चौधरी और रिंकी के टच मे था तो उनके फोन, इमेल अदि से शायद कुछ पता चले।”

“वो ऑनगोइंग इन्वेस्टिगेशन का हिस्सा है।” अभय बोला।

“ओके!” राज बोला। मनोज निरंतर टाइप कर रहा था।

“अब खलीली के कंट्रोल रूम मे हुए उन लम्हों में पहुँचते हैं जब आहूजा उसे अपने आधीन लेने की कोशिश कर रहा था। उस वक्त के बारे मे बताइए।”

“आहूजा ‘मलिक चचा’ के रूप मे खलीली के संगठन यानि ISIK के बीच काफी लोकप्रिय था। उसे विश्वास था खलीली की मौत के बाद उसे उनका लीडर बनने मे ज्यादा दिक्कत नहीं आयेगी।”

“तो अगर ये कहा जाये कि वो खुद ISIK का लीडर बनना चाहता था तो कुछ गलत नहीं होगा।”

राज ने कुछ सोचते हुए कहा, “हाँ! पर उसके इरादे...”

“हाँ! वो कुछ क्रान्ति लाना चाहता था, वो भी आतंकवादी बनकर...सब बकवास! क्या तुम नहीं मानते वो सिर्फ बकवास कर रहा था ?”

“करप्शन का शिकार था, सर! बदले की भावना ने उसे भटका दिया था।”

राज ने मनोज से कहा “ये मत लिखना।”

फिर आगे झुककर व्यंगात्मक भाव के साथ राज से बोला, “हमारी फील्ड में इमोशन की, वो भी एक क्रिमिनल के लिये, कहां कुछ अहमियत होती है, राज।”

“मैं बस यह...”

“नहीं!” राज सख्ती से अंगुली उठाकर बोला फिर अभय की तरफ पलटा। “अभय जी! आप बोलिए।”

अभय चुप रहा।

“अगर हम आतंकवादी से उसके बनने की परिस्थिति और हालत समझने में लग गये उसके साथ हमदर्दी रखने लगे फिर तो हमारा काम हो चुका।”

“मेरा वो मतलब नहीं था।” राज तेजी से बोला।

“तो एजेंट राज...” वह तेज़ स्वर में बोला, “मुझे सिर्फ सीधे जवाब दीजिए। मुझे ये रिपोर्ट बनाकर होम मिनिस्टर को दिखानी है और उसके बाद लियोन और ब्रिटिश गवर्नमेंट तक ये रिपोर्ट पहुँचने वाली है। आप इसकी अहमियत समझ रहे हैं न ?”

राज ने सहमति मे सिर हिलाया।

“नहीं! शायद आप इस मामले की गंभीरता समझ नहीं रहे। यहाँ हमारा देश इस बात का जवाब दे रहा है कि इंटरपोल का एक अफसर भारतीय जासूस के हाथों क्यों मारा गया। इसलिये हमें ये नहीं बताना है कि वो जो कुछ करने जा रहा था उसके पीछे उसका कोई बहुत बड़ा मानवता भरा मंतव्य था। यहाँ सिर्फ ये बताना है कि कैसे वो एक आतंकवादी था, कैसे उसके इरादे हमारे देश के लिये बेहद खतरनाक था। कैसे वो देश के लिये खलीली की तरह ही एक घातक टेररिस्ट था। समझ रहे हो न ?”

राज ने हामी भरी।

“गुड! इसी में आपकी, हमारी और हमारे देश की भलाई है। हम दूसरे देश से ये नहीं कह सकते कि एक अंतर्राष्ट्रीय एजेंट को हमने बिना सबूत, बिना सोचे-समझे मार दिया। इसलिये आपकी इन्वेस्टिगेशन में और किसी के खिलाफ पुख्ता सबूत उभरे न उभरे, आहूजा के खिलाफ ज़रूर उभरने चाहिये।”

“हम इसका पूरा ध्यान रखेंगे, राज!” अभय बोला।

“मनोज!” राज बोला, “तुम्हें कुछ पूछना है ?”

राज का ध्यान मनोज की तरफ गया जो कि गोल फ्रेम का चश्मा लगाये था, उसके बाल तेल से चिपड़े हुए थे, जिससे कि वह एक सीबीआई अफसर से ज्यादा एक पढ़ाकू विद्यार्थी दिख रहा था। उसकी भूमिका अभी तक सिर्फ एक टाइपिस्ट की रह गई थी। पर अब अपना चश्मा ठीक करते हुए वह बोला, “मैं आपसे बस ये जानना चाहता था कि आहूजा पर गोली चलाने के अलावा क्या कोई और विकल्प मौजूद था ?”

राज संभलते हुए बोला, “मुझे नहीं लगता...”

“चिंता मत कीजिए।” राज बोला, “ये बात आगे नहीं जाने वाली। हम दूसरे देश को ऐसा कोई इशारा नहीं देने वाले जिससे आप या हम मुश्किल मे पड़ जाएँ।”

“वो न्यूक्लियर वैपन से लोडेड ड्रोन पार्लियामेंट के लिये लॉन्च करने जा रहा था।” इस बार राज कुछ तेज स्वर मे बोला, “उसे तुरंत रोकने के लिये मुझे उस वक्त यहीं तरीका समझ आया। उससे पहले वो काम खलीली करने जा रहा था। उसे भी रोकने के लिये यहीं करना पड़ता। मेरी जगह आप होते तो क्या करते ?”

“बिलकुल वही करता...” राज बोला।

मनोज तुरंत बोला, “आपने शर्तिया देश को भारी विपत्ति से बचाने के लिये जो भी कदम उठाये वो सराहनीय हैं। आपके साहस की बदौलत हजारों लोग आज भी सांसे ले रहे हैं। आप नेशनल हीरो हैं, नो डाउट। पर जब इन्वेस्टिगेशन के रिज़ल्ट पेश किये जायेंगे तो हमें इस तरह के सवालों का जवाब देने के लिये तैयार रहना होगा।”

“आई थिंक राज ये बात समझता है।” अभय बोला, “इसलिये उन परिस्थितियों के बारे में बता रहा है। खलीली या कोई भी अगर उस वक़्त देश पर न्यूक्लियर बम गिराने की साजिश में भाग ले रहा होता तो उसे रोकने के लिये यहीं मुनासिब कदम था।”

“आई अंडरस्टैंड सर!” मनोज बोला, “हम सब एक ही साइड हैं। पर इंटरपोल को जवाब देने के लिये हमारे पास माइंस में आहूजा ने जो कुछ किया उसका कोई सबूत नहीं है, कम से कम फिलहाल तो नहीं है और अब वहाँ आर्मी रेड और बॉम्बिंग के बाद तो और भी मुश्किल है, इसलिये उसके खिलाफ माइंस के बाहर सबूत मिलने बहुत ज़रूरी हैं।”

“सी!” अभय बोला, “इन्वेस्टिगेशन तो चल ही रही है और आहूजा से सम्बंधित सबूत भी ढूंढे जाएंगे क्योंकि उससे जुड़े और लोग अभी भी खुले घूम रहे हो सकते हैं। यह सिर्फ इंटरपोल की जवाबदेही के लिये ही ज़रूरी नहीं है बल्कि अगले किसी ऐसे मिशन को रोकने के लिये भी ज़रूरी है। बाकी रही बात सोहनगढ़ माइंस में हुए वाकये की तो आप लोगों का ये लिखना ज़रूरी है कि भारत उस वक़्त युद्ध के हालातों में था, इमरजेंसी में था, और युद्ध मे दुश्मन को मारने के लिये ज्यादा सोचा नहीं जाता।”

“आई...” राज ने बोलना चाहा पर अभय ने इस बार उसे मौका नहीं दिया– “मैं समझ सकता हूँ हम सिर्फ ये कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकते, पर हमें उन्हें वो परिस्थिति बतानी ज़रूरी है जिसमे राज को उसे शूट करना पड़ा।”

“आई अग्री विद यू, अभय!” राज ने कहा, “पर आप समझ सकते हैं कि इस जवाब के बाद भी यह जांच खत्म नहीं होने वाली। जब तक कि लियोन और लंडन दोनों सेटिस्फाई नहीं हो जाते ये ज़ारी रहेगी।”

“आई नो!”

फिर कुछ देर राज ने उन्हें सोहनगढ़ माइंस में घटी घटनाओं और हालातों का विवरण दिया, आहूजा और चौधरी के बीच पार्टनरशिप के बारे में बताया। (इन सभी घटनाओं के बारे में विस्तार से जानने के लिये पढ़ें ज़ाहिद - राज -सुरेश सीरीज़ का चौथा उपन्यास 'मास्टरमाइंड' )

जहां तक सम्भव हुआ रिंकी के बारे में वह एक सकारात्मक छवि ही प्रस्तुत करता रहा। शाम सात बजे मुलाकात का अंत हुआ। मीटिंग रूम की टेबल पर चाय-कॉफी के कई खाली कप इकट्ठा हो गए थे।

राज, मनोज, अभय और राज उठ खड़े हुए। राज अभय से प्राइवेट में कुछ बात करने के लिये उसे एक कोने में ले गया। राज ने मनोज की तरफ देखा।

मनोज बोला, “आपका नंबर मिल सकता है मिस्टर राज ?”

“लगता है मेरे बयान से आप अभी भी संतुष्ट नहीं है।” राज बोला, “लिखिए –” कहकर उसने अपना नंबर बताया।

मनोज ने उसका नंबर अपने मोबाइल पर अंकित किया और फिर उसकी तरफ देखकर रहस्यमय स्वर में बोला, “मैं आपको कॉल करूंगा।”

राज ने कुछ सोचते हुए हामी भरी। उसे मनोज की आँखों में कुछ अजीब-सा भाव दिखा। ऐसा लग रहा था जैसे वह उसे कोई संकेत देना चाह रहा है।

☐☐☐
 
वर्तमान समय से सात साल पहले- सन 2012

इंडस्ट्रियल एरिया, एनसीआर

दिल्ली के इंडस्ट्रियल क्षेत्र के एक कोने में स्थित वह ईमारत गुजरे ज़माने में एक फैक्ट्री हुआ करती थी पर आज की तारीख में वह वीरान थी और लोग उसे प्रेतग्रस्त समझते थे।

आस-पास के गाँव वाले तो उसके आस-पास भी फटकने की जुर्रत नहीं करते थे, खासकर के अँधेरा ढलने के बाद।

पर इस वक़्त ईमारत के अन्दर एक कोने में तीन शख्स मौजूद थे। उनमे से एक ज़मीन पर बैठा था। उसकी आँखों पर पट्टी थी और मुंह पर डक्ट टेप चिपका हुआ था।

बाकि दो शख्स उसके सामने मौजूद थे जो कि ईमारत के अँधेरे में किसी प्रेत की तरह प्रतीत हो रहे थे। उनमे से एक ने लाइटर जलाया जिससे उसका चेहरा दृष्टिगोचर हुआ। उसकी आँखें गड्ढों में धंसी हुई थी जैसे उसे चैन की नींद महीनों से नसीब न हुई हो। चेहरे पर सख्त भाव थे। वह रमन आहूजा था।

उसने सिगरेट सुलगाई और अपने साथी को बंधक की तरफ बढ़ने का इशारा किया।

वह आगे बढ़ा और झुककर बोला, “अब मैं तुम्हारा मुंह खोलने जा रहा हूँ। हम बस तुमसे बात करना चाहते हैं। अगर तुमने चीखने-चिल्लाने की कोशिश की तो हमारे पास साइलेंसर युक्त रिवॉल्वर है...यहाँ तुम्हारी लाश भी खोजने कोई नहीं आयेगा। समझे ?”

बंधक ने हामी भरी।

उसने उसके मुंह से डक्ट टेप हटा दिया पर आँखों की पट्टी हटाने का कोई उपक्रम नहीं किया।

मुंह खुलते ही वह बोला, “मुझे इस तरह यहाँ लाने का क्या मतलब ?”

“तुम्हें जवाब मिलेंगे, पहले हमें कुछ जवाब दो।” सिगरेट का कश लेते हुए आहूजा ने कहा।

बंधक ने अपना चेहरा उसकी तरफ पलटा।

“तुम उसे क्यों मारना चाहते हो ?”

“कि...किसे ? मैं किसी को नहीं मरना चाहता। क्या बात कर रहे हैं आप!”

“देखो-गिरीश! हम कोई पुलिस वाले नहीं हैं, न ही कानून के अंधरक्षक। तुम जो करना चाहता हो आसान नहीं है, पर हम उसे आसान बना सकते हैं-बशर्ते हमें तुम्हारा मंतव्य समझ आये।”

“तुम...तुम लोग विधायक जोगेंद्र कुमार के आदमी हो न ?” वह गुस्से से बोला।

“नहीं!”

“मैं तुम्हारे किसी सवाल का जवाब नहीं दूंगा।”

आहूजा ने गहरी सांस ली और सिगरेट अपने साथी को पास की, फिर बंधक के सामने झुककर उसके चेहरे के नज़दीक आकर बोला–

“दो साल पहले विधायक जोगेंद्र कुमार के साले जोगिंदर ने तुम्हारी बीवी को अगवा करवाया था और फिर एक फार्महॉउस पर एक हफ्ते तक उसके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और फिर हत्या। वो एक सीधी-सादी औरत थी, जिसने घर से निकलकर नौकरी करके अपने परिवार को सपोर्ट करने की हिमाकत की थी। क्या ये उसकी गलती थी ? या फिर उसने अपने कार्यालय में दबंगई करते हुए जोगिंदर और उसके गुर्गों को शांत रहने के लिए आग्रह किया– ये उसकी गलती थी ?”

गिरीश का गला भर आया था। “तुम्हें ये सब....”

“या उसकी गलती थी कि वह एक औरत थी, खूबसूरत थी, रात में भी अकेले ट्रेवल करने की हिम्मत रखती थी। पर ये देश और इसमें जानवरों सी मानसिकता वाले लोग ऐसा कैसे होने देंगे। अगर वो रात को अकेले निकलती है इसका मतलब वह एक खुला शिकार है जिस पर कोई भी अपना खेल खेल सकता है....”

“प्लीज़ चुप हो जाओ...” वह गिड़गिड़ा उठा।

“ये उसकी गलती है कि एक औरत होकर उसने ऐसा दुस्साहस किया। उसे सिर्फ सिर झुकाकर सिर पर पल्लू डालकर घर की चारदीवारी के अन्दर, रसोई और बैडरूम के अन्दर कैद रहना चाहिए था। पर उसे तो मॉडर्न होने का गुमान था। अकेले घूमने-फिरने की हिम्मत रखने लगी थी। इसका तो यही मतलब है कि वह किसी भी मर्द के लिए अवेलेबल थी...”

“बस!” गिरीश चीख पड़ा, फिर रोने लगा। “चुप हो जाओ भगवान के लिये...”

उसने उसका कन्धा थपथपाया। “तुम दो साल से केस लड़ रहे हो। पहले छः गवाह थे, अब सिर्फ एक बचा है, वो भी कुछ दिनों में पीछे हट जायेगा। जोगिंदर और उसके दोस्तों को क्लीन चिट मिल जाएगी। ऐसा तो नहीं चाहते होगे तुम ?”

“कानून के अलावा मैं और कहाँ किससे न्याय मांगूं ?”

“जब कानून न्याय न दे सके तो तुम खुद कानून बन जाओ। अपने हाथों से उसे सजा दो। तभी तुम्हें सही मायने में तृप्ति मिलेगी।”

“क्या तुम्हें लगता है मैंने ऐसा सोचा नहीं। दिन-रात उठते-बैठते बस मन करता है कि...”

“जानता हूँ! मन तो काफी हद तक बना चुके हो तुम।”

“क्या मतलब ?”

वह मुस्कराया। “जब हम इतना कुछ तुम्हारे बारे में जानते हैं तो क्या तुम्हें नहीं लगता तुमने हाल में जो प्लानिंग शुरू की है उसके बारे में हमें खबर नहीं होगी ?”

गिरीश सिर झुककर बोला, “मैं थक गया हूँ...कोर्ट के चक्कर लगा-लगाकर। मेरी नौकरी भी चली गई क्योंकि मैं ऑफिस में काम पर ध्यान ही नहीं दे सका।”

“तो तुम्हें लगता है तुम जोगिंदर के घर के सामने खड़े रहोगे और उसके निकलते ही उसे अपने देसी तमंचे से शूट कर दोगे और वो मर जायेगा ?”

वह निःशब्द हो गया।

“जो तमंचा तुमने खरीदा है कभी उसे चलाकर देखा है ? उसका निशाना सटीक नहीं होता और कई बार तो गोली निकलती ही नहीं, तमंचे के अन्दर ही फट जाती है। जरा सोचो- जोगिंदर अपनी कार से बाहर निकला। तुमने उसे देखकर गोली चलाई। गोली अन्दर ही अटक गई। वह तुम्हें देख रहा है फिर गोली तुम्हारे हाथ में ही फट गई। जोगिंदर तुम पर हंस रहा है...”

“तुम चाहते क्या हो... प्लीज़ बोलो...”

“मैं तुम्हें न्याय दिलाना चाहता हूँ। तुम्हें अपनी बीवी के साथ हुए अमानवीय कर्मों का बदला लेते देखना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ तुम जोगिंदर और उसके गुर्गों को तड़पा-तड़पाकर मारो।”

“पर...आप ये क्यों... ?”

“सुनो–गिरीश! अब तक तुम समझ ही गए होगे कि मैं कोई कानून का रक्षक नहीं। पर अगर तुम मुझ पर विश्वास करोगे तो मैं भी तुम पर करूँगा और तुम पर कोई आंच नहीं आने दूंगा। पर मैं ये काम तुम्हारे लिए फ्री में नहीं करूँगा।”

“पर मेरे पास...पैसे...”

“चिंता मत करो....मुझे तुमसे पैसे नहीं, उससे भी बड़ी चीज़ चाहिए। मैं चाहता हूँ तुम हमारे मिशन में साथ दो।”

“कैसा मिशन ?”

“मिशन अंतर्द्वंद्व!”

“ये क्या है ?”

“अंतर्द्वंद्व यानि आंतरिक संघर्ष या इंग्लिश में इनर कंफ्लिक्ट। एक ऐसा मिशन जिसमें हमें अपने देश में एक अंदरूनी लड़ाई लड़नी है। करप्शन को जड़ से उखाड़ फेंकना है। लोगों में ऐसी दहशत पैदा कर देनी है कि कोई भी गलत काम करने से पहले उसे डर रहे कि पुलिस और कानून से अगर बच भी गया तो मिशन अंतर्द्वंद्व वाले मुझे नहीं छोड़ेंगे।”

“तो क्या मुझे...”

“नहीं! ज़रूरी नहीं तुम्हें इसके लिये पेशेवर हत्यारा ही बन जाना पड़े। किसी भी मिशन में बहुत-से काम होते हैं जो कि ब्रॉडली बैकग्राउंड वर्क, प्लानिंग, और एग्झीक्यूशन में विभाजित होते हैं। तुम उनमे से अपना पसंदीदा काम उठा सकते हो। जब भी कोई काम होगा तुम्हें इमेल आयेगा और गुप्त रूप से किसी लोकेशन पर आने के लिये कहा जायेगा जहाँ तुम्हें मिशन सम्बंधित निर्देश दिये जायेंगे। कहने की ज़रूरत नहीं कि तुम इस बारे में कभी-कभी किसी को कुछ नहीं बता सकते न ही इसका दुरूपयोग कर सकते हो। अगर तुम्हें कहीं कोई ऐसा टारगेट मिलता है तो तुम ईमेल करोगे, उसे जांचा-परखा जायेगा, फिर प्लानिंग के साथ काम होगा। कभी कोई काम गुस्से में, आवेश में नहीं किया जायेगा, हर एक्शन सोच-समझ के लिया जायेगा। हमें ये मिशन बहुत आगे तक ले जाना है। इसमें लोगों को जोड़ते जाना है इसलिये कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना जिससे मिशन खतरे में आ जाये। बोलो-बनना चाहोगे इस मिशन का हिस्सा ?”

“मुझे सोचने के लिये कुछ समय चाहिये।”

“जो समय है अभी है तुम्हारे पास। यहाँ से निकलने के बाद तुम फिर कभी हमारे बारे में नहीं सुनोगे। क्या चाहते हो तुम– अपनी लड़ाई खुद से लड़ते रहना या फिर हमारे मिशन में शामिल होकर... तुम्हें जॉइनिंग बोनस में जोगिंदर मिलेगा – एक कमरे में, निहत्था, तुम्हारे अधिकार में, तुम्हें जो हथियार चाहिये हों मिलेंगे, तुम उस पर जो कहर गिराना चाहोगे गिरा सकोगे। बोलो...”

गिरीश कुछ पला असमंजस में मौन धारण किये रहा, फिर दृढ़ स्वर में बोला, “मुझे मंजूर है।”

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