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मिशन
वर्तमान समय से तीन साल पहले - सन 2018
अलीगढ़, उत्तर प्रदेश
इंडस्ट्रियलिस्ट समीर चौधरी के बंगले के अन्दर, स्टडी रूम में उसके साथ रमन आहूजा उपस्थित था।
देर रात का समय था। स्टडी लैम्प से निकलती पीले रंग की रोशनी से उजागर थी।
दोनों कुर्सियों पर आमने-सामने बैठे थे। मेज पर एक बड़ा-सा मैप खुला हुआ था, साथ ही लैपटॉप, कागजात, पासपोर्ट वगैरह रखे हुए थे।
“सारी तैयारी हो गई ?” चौधरी ने पूछा।
“हां! बस समझ लो – एक हफ्ते बाद मैं अंडरग्राउंड हो जाऊंगा। उसके बाद तुम से कॉन्टेक्ट करने का क्या जरिया रहेगा, अभी कुछ कह नहीं सकता। देखते हैं–प्लान क्या है।”
चौधरी सोचने वाली मुद्रा में हथेली पर अपनी ठोड़ी टिकाते हुए बोला, “ये बहुत बड़ा रिस्क लग रहा है। अभी भी समय है। सोच लेते हैं।”
“जिस लेवल का काम हम करने जा रहे हैं उसके हिसाब से देखें तो ये रिस्क कुछ भी नहीं है। सिर्फ पेशंस रखना होगा। बहुत सारा पेशंस। तुम बताओ–आईएसआई वाले क्या कर रहे हैं ?”
“उन्होंने मुझे उस मॉडल मिनाज़ के जरिए साजिश में फंसाना शुरू कर दिया है। फंसने का नाटक मैं कर रहा हूँ पर उन्हें क्या मालूम फंस तो वो रहे हैं– हमारे प्लान में।”
“हां! तुम उनकी बनाई साजिश में फंसते चले जाना। उन्हें लगेगा– तुम उनकी हाथों की कठपुतली हो। एक बार जब वह तुम्हें पूरी तरह से फांस लेंगे फिर वे लोग तुम्हें मास्टरमाइंड प्लान में ज़रूर इनवॉल्व करेंगे। मुझे यकीन है–वह तुम्हारी कंपनी की सहायता से यहाँ हथियार पहुंचाना चाहेंगे।”
“मैं तैयार हूँ फंसने के लिये। बस एक बार खलीली तक पहुँचने का मौका मिल जाये, मेरा जीवन सफल हो जायेगा।”
“तुम्हारी मनोकामना जरूर पूरी होगी।”
“याद है ? बचपन में जब हम यह सब सोचते थे ?” चौधरी चहकते हुए बोला, “तब लगता नहीं था कि यह कभी सच हो सकेगा। क्या करेंगे, कैसे करेंगे, कुछ भी पता नहीं था।”
“पर यह तो तय था कि कुछ न कुछ करेंगे। हमारे परिवार वालों के साथ जो हुआ– उसका बदला तो लेना ही था। साथ ही इस समाज में पनप रहे गंदे कीड़ों को खत्म भी करना है।”
“आगे का प्लान क्या है ? अगर सब कुछ ठीक रहा और हमने खलीली के ऊपर फतेह कर ली तो उसके बाद किस तरह आगे बढ़ेंगे ? इतनी बड़ी जिम्मेदारी हम कैसे उठायेंगे ? भारत के मित्र देश तुरंत हमारे ऊपर एक्शन लेंगे।”
आहूजा मुस्कुराया। “तुम्हारा सोचना एकदम ठीक है। हमारी इतनी भी साख नहीं कि एक समूचा देश एकदम से अपने कब्जे में कर पायें। तुम यकीन नहीं मानोगे हमारे पीछे कितनी बड़ी बैकिंग है, बहुत शक्तिशाली बैकिंग।”
“कैसी बैकिंग ? और ये तुम मुझे आज बता रहे हो।” चौधरी आंदोलित होते हुए उठ खड़ा हुआ।
“मैं इंतजार कर रहा था सही वक़्त का।” आहूजा उसी तरह इत्मिनान से बैठे-बैठे बोला।
“तो अभी तक तुम पूरी तरह से मुझ पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे ? अपने बचपन के दोस्त पर भी नहीं।”
“जिस डगर पर मैं चला हूँ उस पर मैं कभी-कभी अपनी परछाई को भी शक की निगाह से देखता हूँ।” आहूजा शून्य में घूरते हुए बोला। उसकी आँखों में दार्शनिक से भाव थे।
“कौन है वो ?”
“तुम गेस करो। वह अपने देश से ज्यादा शक्तिशाली है।”
“अपने देश से ज्यादा शक्तिशाली...” चौधरी सोचते हुए बोला।
“हाँ! कई गुना ज्यादा शक्तिशाली। इतना शक्तिशाली कि वक्त आने पर वह अमेरिका और रूस को भी जवाब दे सकेगा।”
चौधरी ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। “तुम कहना क्या चाहते हो ? कोई दूसरा देश हमें बैक कर रहा है ?”
आहूजा ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ उंगली का इशारा किया। “एकदम सही कहा तुमने।”
“कौन...कौन-सा देश ?”
आहूजा ने उत्साह के साथ मेज पर खुले मैप की तरफ ऊँगली बढ़ाई और फिर एक देश के मानचित्र के ऊपर रख दी।
चौधरी अचंभित-सा उस मानचित्र को देखता रह गया।
क्यों कुछ यादें चाहकर भी भुलाई नहीं जाती ?
क्यों कभी-कभी हम खुद को किसी दूसरे इंसान के इतना करीब महसूस करते हैं कि उसके जाने के बाद भी हर पल उस के अपने पास होने का अहसास होता रहता है ?
अलीगढ़ में बारिश का मौसम था। आये-गये मतलब-बेमतलब बारिश हो रही थी। अभी शाम को अचानक हुई बारिश से एक तरफ लोग सिर पर किसी आसरे की तलाश में भाग-दौड़ रहे थे और दूसरी तरफ सीक्रेट सर्विस का एजेंट राज वर्मा अपने ख्यालों में खोया बारिश में भीगता हुआ पैदल चला जा रहा था।
आज एक महीना बीत चुका था खलीली के मास्टरमाइंड प्लान को असफल हुए। आज एक महीना हो चुका था उस दिन को जब देश की खातिर सीक्रेट सर्विस, रॉ, सीबीआई और इन्डियन आर्मी ने संयुक्त होकर देश के खिलाफ रची गई अब तक की सब से बड़ी आतंकवादी साजिश को नेस्तनाबूत किया था। साथ ही आज एक महीना हो चुका था– समीर चौधरी, रमन आहूजा और रिंकी सेन को मरे हुए।
रिंकी ...
राज की आँखों के सामने उसका मनमोहक चेहरा घूम गया।
वह एक रॉ एजेंट थी जो राज का प्यार बन गई थी। उसे अपना सोलमेट मानने लगी थी। पर जिस दिन उस प्यार का इज़हार उसने राज से किया वही दिन नियति में उसका आखिरी दिन साबित हुआ। अपने सिरफिरे भाई समीर चौधरी को खुद अपने हाथों से मारने के अपराध बोध से बोझिल उस लड़की ने अपना पिस्टल खुद अपनी कनपटी पर लगाकर ट्रिगर दबा दिया था।
क्यों किया तुमने ऐसा ? आखिर क्यों किया ? काश ऐसा न हुआ होता तो आज हम दोनों साथ होते। क्या कुछ नहीं हो सकता था जिंदगी में ? हम साथ मिलकर अपना-अपना मिशन पूरा कर सकते थे। किसी मिशन में भले ही तुम्हें कुछ हो जाता तो शायद इतना गम न होता जितना तुम खुद अपनी जान लेकर दे गई हो।
कैसे एक बार के लिये भी तुम्हारे हाथ नहीं हिचके ? एक बार भी तुमने नहीं सोचा कि तुम्हारे भाई के अलावा भी अब तुम्हारी जिंदगी में कोई और है। उसका क्या होगा वह कैसे जियेगा ? तुमने तो जाने से पहले आखिरी शब्द तक नहीं बोले। मेरी तरफ एक आखिरी बार देखना भी जरूरी नहीं समझा। अगर देखा होता तो शायद तुम ऐसा सेल्फिश कदम नहीं उठातीं। अब जब चली ही गई हो तो अब...तो अब यूँ बार-बार मेरे ख्यालों में, मेरे सपनों में आकर यह बोलने का क्या मतलब है कि मैं अपना ख्याल रखूं और तुम्हें भूल जाऊं ? यह तुम्हारे लिये आसान था पर मेरे लिये नहीं हो पा रहा है। मैं ये सोचने के लिये मजबूर हूँ कि क्या वाकई तुम मुझसे प्यार करती थी या सिर्फ मेरा दिल बहलाने के लिये ऐसा बोल दिया था।
नहीं !
राज ने याद किया सोहनगढ़ माइंस के बाहर बिताये उन लम्हों को जब रिंकी ने अपने प्यार का इज़हार किया था और यह कहा था कि राज उसका सोलमेट है इसमें कोई शक नहीं।
सोचते-सोचते राज अपने घर पहुँच गया। उसने मेन गेट खोला तो हमेशा की तरह बिंगो दुम हिलाते हुए उसका स्वागत करने लगा। राज ने धीरे से एक बार उसकी पीठ सहलाई और फिर अंदर की तरफ बढ़ गया। बिंगो असंतुष्टि से उसको जाता देख पूँछ हिलाते हुए ‘कूँ-कूँ’ करने लगा।
राज अंदर पहुँचा। इमरतीलाल ने उसके बुझे हुए चेहरे पर नज़र डाली। उसे सब पता था। ज़ाहिद और सुरेश ने उसे सब बता दिया था और खास हिदायत दी थी कि राज पर नज़र रखे, उसका ख्याल रखे क्योंकि राज सुरेश के कई बार आग्रह करने के बाद भी उसे घर में आकर रुकने नहीं दे रहा था। वह निरंतर यही बोलता रहा कि उसे एकांत चाहिए। इस एक महीने के दौरान वो ऑफिस भी नहीं गया था। चीफ अभय कुमार ने उसे ब्रेक लेने को कहा था।
“खाना लगा दें बाबू ?” इमरतीलाल ने पूछा।
“नहीं मन नहीं है। दोपहर में बहुत खा लिया था।”
“कहां बहुत खा लिये थे! दो रोटी ही तो खाए थे। थोड़ा तो खा लो। तुम्हारी पसंद की मखनी दाल और चावल बनाया है।”
“नहीं! सही में मूड नहीं है।”
“बाबू मूड के लिये थोड़ी न खाते हैं। अब थोड़ा देखो बियर पिए हो तो खाना भी खा लो वरना नुकसान करेगा।”
राज ने मुस्कुराकर उसे देखा और कहा- “अच्छा ठीक है लगा दो।”
खाना खाने के बाद राज बैठक में पहुँचा। उसे याद आया एक बार रिंकी उससे वहाँ पर सिगरेट मांग रही थी। उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। वह उस कमरे में पहुँचा जो कि रिंकी का उसके घर में परमानेंट कमरा बन गया था।
उसकी नज़र टेबल पर गई जहां रिंकी का लैपटॉप और उसके अनगिनत उपकरण रखे रहते थे। कितनी सहजता और कंफर्ट के साथ वह इस कमरे में रहती थी जैसे बचपन से ही रह रही हो। राज के चेहरे पर मुस्कान आ गई। वह पलंग पर जाकर बैठ गया फिर कुछ सोचते हुए तकिया लगा कर लेट गया और चादर ओढ़ ली और जैसे कि रिंकी को उस बेड पर महसूस करने लगा। राज ने आंखें बंद कर ली। न जाने क्यों उसके चेहरे पर मुस्कान थी रिंकी की मीठी यादें उसके मन को गुदगुदा रही थी।
☐☐☐
वर्तमान समय से तीन साल पहले - सन 2018
अलीगढ़, उत्तर प्रदेश
इंडस्ट्रियलिस्ट समीर चौधरी के बंगले के अन्दर, स्टडी रूम में उसके साथ रमन आहूजा उपस्थित था।
देर रात का समय था। स्टडी लैम्प से निकलती पीले रंग की रोशनी से उजागर थी।
दोनों कुर्सियों पर आमने-सामने बैठे थे। मेज पर एक बड़ा-सा मैप खुला हुआ था, साथ ही लैपटॉप, कागजात, पासपोर्ट वगैरह रखे हुए थे।
“सारी तैयारी हो गई ?” चौधरी ने पूछा।
“हां! बस समझ लो – एक हफ्ते बाद मैं अंडरग्राउंड हो जाऊंगा। उसके बाद तुम से कॉन्टेक्ट करने का क्या जरिया रहेगा, अभी कुछ कह नहीं सकता। देखते हैं–प्लान क्या है।”
चौधरी सोचने वाली मुद्रा में हथेली पर अपनी ठोड़ी टिकाते हुए बोला, “ये बहुत बड़ा रिस्क लग रहा है। अभी भी समय है। सोच लेते हैं।”
“जिस लेवल का काम हम करने जा रहे हैं उसके हिसाब से देखें तो ये रिस्क कुछ भी नहीं है। सिर्फ पेशंस रखना होगा। बहुत सारा पेशंस। तुम बताओ–आईएसआई वाले क्या कर रहे हैं ?”
“उन्होंने मुझे उस मॉडल मिनाज़ के जरिए साजिश में फंसाना शुरू कर दिया है। फंसने का नाटक मैं कर रहा हूँ पर उन्हें क्या मालूम फंस तो वो रहे हैं– हमारे प्लान में।”
“हां! तुम उनकी बनाई साजिश में फंसते चले जाना। उन्हें लगेगा– तुम उनकी हाथों की कठपुतली हो। एक बार जब वह तुम्हें पूरी तरह से फांस लेंगे फिर वे लोग तुम्हें मास्टरमाइंड प्लान में ज़रूर इनवॉल्व करेंगे। मुझे यकीन है–वह तुम्हारी कंपनी की सहायता से यहाँ हथियार पहुंचाना चाहेंगे।”
“मैं तैयार हूँ फंसने के लिये। बस एक बार खलीली तक पहुँचने का मौका मिल जाये, मेरा जीवन सफल हो जायेगा।”
“तुम्हारी मनोकामना जरूर पूरी होगी।”
“याद है ? बचपन में जब हम यह सब सोचते थे ?” चौधरी चहकते हुए बोला, “तब लगता नहीं था कि यह कभी सच हो सकेगा। क्या करेंगे, कैसे करेंगे, कुछ भी पता नहीं था।”
“पर यह तो तय था कि कुछ न कुछ करेंगे। हमारे परिवार वालों के साथ जो हुआ– उसका बदला तो लेना ही था। साथ ही इस समाज में पनप रहे गंदे कीड़ों को खत्म भी करना है।”
“आगे का प्लान क्या है ? अगर सब कुछ ठीक रहा और हमने खलीली के ऊपर फतेह कर ली तो उसके बाद किस तरह आगे बढ़ेंगे ? इतनी बड़ी जिम्मेदारी हम कैसे उठायेंगे ? भारत के मित्र देश तुरंत हमारे ऊपर एक्शन लेंगे।”
आहूजा मुस्कुराया। “तुम्हारा सोचना एकदम ठीक है। हमारी इतनी भी साख नहीं कि एक समूचा देश एकदम से अपने कब्जे में कर पायें। तुम यकीन नहीं मानोगे हमारे पीछे कितनी बड़ी बैकिंग है, बहुत शक्तिशाली बैकिंग।”
“कैसी बैकिंग ? और ये तुम मुझे आज बता रहे हो।” चौधरी आंदोलित होते हुए उठ खड़ा हुआ।
“मैं इंतजार कर रहा था सही वक़्त का।” आहूजा उसी तरह इत्मिनान से बैठे-बैठे बोला।
“तो अभी तक तुम पूरी तरह से मुझ पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे ? अपने बचपन के दोस्त पर भी नहीं।”
“जिस डगर पर मैं चला हूँ उस पर मैं कभी-कभी अपनी परछाई को भी शक की निगाह से देखता हूँ।” आहूजा शून्य में घूरते हुए बोला। उसकी आँखों में दार्शनिक से भाव थे।
“कौन है वो ?”
“तुम गेस करो। वह अपने देश से ज्यादा शक्तिशाली है।”
“अपने देश से ज्यादा शक्तिशाली...” चौधरी सोचते हुए बोला।
“हाँ! कई गुना ज्यादा शक्तिशाली। इतना शक्तिशाली कि वक्त आने पर वह अमेरिका और रूस को भी जवाब दे सकेगा।”
चौधरी ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। “तुम कहना क्या चाहते हो ? कोई दूसरा देश हमें बैक कर रहा है ?”
आहूजा ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ उंगली का इशारा किया। “एकदम सही कहा तुमने।”
“कौन...कौन-सा देश ?”
आहूजा ने उत्साह के साथ मेज पर खुले मैप की तरफ ऊँगली बढ़ाई और फिर एक देश के मानचित्र के ऊपर रख दी।
चौधरी अचंभित-सा उस मानचित्र को देखता रह गया।
क्यों कुछ यादें चाहकर भी भुलाई नहीं जाती ?
क्यों कभी-कभी हम खुद को किसी दूसरे इंसान के इतना करीब महसूस करते हैं कि उसके जाने के बाद भी हर पल उस के अपने पास होने का अहसास होता रहता है ?
अलीगढ़ में बारिश का मौसम था। आये-गये मतलब-बेमतलब बारिश हो रही थी। अभी शाम को अचानक हुई बारिश से एक तरफ लोग सिर पर किसी आसरे की तलाश में भाग-दौड़ रहे थे और दूसरी तरफ सीक्रेट सर्विस का एजेंट राज वर्मा अपने ख्यालों में खोया बारिश में भीगता हुआ पैदल चला जा रहा था।
आज एक महीना बीत चुका था खलीली के मास्टरमाइंड प्लान को असफल हुए। आज एक महीना हो चुका था उस दिन को जब देश की खातिर सीक्रेट सर्विस, रॉ, सीबीआई और इन्डियन आर्मी ने संयुक्त होकर देश के खिलाफ रची गई अब तक की सब से बड़ी आतंकवादी साजिश को नेस्तनाबूत किया था। साथ ही आज एक महीना हो चुका था– समीर चौधरी, रमन आहूजा और रिंकी सेन को मरे हुए।
रिंकी ...
राज की आँखों के सामने उसका मनमोहक चेहरा घूम गया।
वह एक रॉ एजेंट थी जो राज का प्यार बन गई थी। उसे अपना सोलमेट मानने लगी थी। पर जिस दिन उस प्यार का इज़हार उसने राज से किया वही दिन नियति में उसका आखिरी दिन साबित हुआ। अपने सिरफिरे भाई समीर चौधरी को खुद अपने हाथों से मारने के अपराध बोध से बोझिल उस लड़की ने अपना पिस्टल खुद अपनी कनपटी पर लगाकर ट्रिगर दबा दिया था।
क्यों किया तुमने ऐसा ? आखिर क्यों किया ? काश ऐसा न हुआ होता तो आज हम दोनों साथ होते। क्या कुछ नहीं हो सकता था जिंदगी में ? हम साथ मिलकर अपना-अपना मिशन पूरा कर सकते थे। किसी मिशन में भले ही तुम्हें कुछ हो जाता तो शायद इतना गम न होता जितना तुम खुद अपनी जान लेकर दे गई हो।
कैसे एक बार के लिये भी तुम्हारे हाथ नहीं हिचके ? एक बार भी तुमने नहीं सोचा कि तुम्हारे भाई के अलावा भी अब तुम्हारी जिंदगी में कोई और है। उसका क्या होगा वह कैसे जियेगा ? तुमने तो जाने से पहले आखिरी शब्द तक नहीं बोले। मेरी तरफ एक आखिरी बार देखना भी जरूरी नहीं समझा। अगर देखा होता तो शायद तुम ऐसा सेल्फिश कदम नहीं उठातीं। अब जब चली ही गई हो तो अब...तो अब यूँ बार-बार मेरे ख्यालों में, मेरे सपनों में आकर यह बोलने का क्या मतलब है कि मैं अपना ख्याल रखूं और तुम्हें भूल जाऊं ? यह तुम्हारे लिये आसान था पर मेरे लिये नहीं हो पा रहा है। मैं ये सोचने के लिये मजबूर हूँ कि क्या वाकई तुम मुझसे प्यार करती थी या सिर्फ मेरा दिल बहलाने के लिये ऐसा बोल दिया था।
नहीं !
राज ने याद किया सोहनगढ़ माइंस के बाहर बिताये उन लम्हों को जब रिंकी ने अपने प्यार का इज़हार किया था और यह कहा था कि राज उसका सोलमेट है इसमें कोई शक नहीं।
सोचते-सोचते राज अपने घर पहुँच गया। उसने मेन गेट खोला तो हमेशा की तरह बिंगो दुम हिलाते हुए उसका स्वागत करने लगा। राज ने धीरे से एक बार उसकी पीठ सहलाई और फिर अंदर की तरफ बढ़ गया। बिंगो असंतुष्टि से उसको जाता देख पूँछ हिलाते हुए ‘कूँ-कूँ’ करने लगा।
राज अंदर पहुँचा। इमरतीलाल ने उसके बुझे हुए चेहरे पर नज़र डाली। उसे सब पता था। ज़ाहिद और सुरेश ने उसे सब बता दिया था और खास हिदायत दी थी कि राज पर नज़र रखे, उसका ख्याल रखे क्योंकि राज सुरेश के कई बार आग्रह करने के बाद भी उसे घर में आकर रुकने नहीं दे रहा था। वह निरंतर यही बोलता रहा कि उसे एकांत चाहिए। इस एक महीने के दौरान वो ऑफिस भी नहीं गया था। चीफ अभय कुमार ने उसे ब्रेक लेने को कहा था।
“खाना लगा दें बाबू ?” इमरतीलाल ने पूछा।
“नहीं मन नहीं है। दोपहर में बहुत खा लिया था।”
“कहां बहुत खा लिये थे! दो रोटी ही तो खाए थे। थोड़ा तो खा लो। तुम्हारी पसंद की मखनी दाल और चावल बनाया है।”
“नहीं! सही में मूड नहीं है।”
“बाबू मूड के लिये थोड़ी न खाते हैं। अब थोड़ा देखो बियर पिए हो तो खाना भी खा लो वरना नुकसान करेगा।”
राज ने मुस्कुराकर उसे देखा और कहा- “अच्छा ठीक है लगा दो।”
खाना खाने के बाद राज बैठक में पहुँचा। उसे याद आया एक बार रिंकी उससे वहाँ पर सिगरेट मांग रही थी। उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। वह उस कमरे में पहुँचा जो कि रिंकी का उसके घर में परमानेंट कमरा बन गया था।
उसकी नज़र टेबल पर गई जहां रिंकी का लैपटॉप और उसके अनगिनत उपकरण रखे रहते थे। कितनी सहजता और कंफर्ट के साथ वह इस कमरे में रहती थी जैसे बचपन से ही रह रही हो। राज के चेहरे पर मुस्कान आ गई। वह पलंग पर जाकर बैठ गया फिर कुछ सोचते हुए तकिया लगा कर लेट गया और चादर ओढ़ ली और जैसे कि रिंकी को उस बेड पर महसूस करने लगा। राज ने आंखें बंद कर ली। न जाने क्यों उसके चेहरे पर मुस्कान थी रिंकी की मीठी यादें उसके मन को गुदगुदा रही थी।
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