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अंध विश्वास
रात का अंधेरा गहराता जा रहा था. समय करीब 11:30 रहा होगा जब वो अपने घर से निकली थी. चारो तरफ सन्नाटा फैला हुया था. बस हवाओ और पेड़ के पत्तों की आवाज़ ही इस सन्नाटे को भंग कर रहे थे. कभी कभी कुत्तों के भोंकने की आवाज़ भी सुनाई पड़ जाती थी लेकिन वो छनिक मात्र थी.
वो पैदल ही सबसे छुपते छुपाते शमशान की ओर जा रही थी. और कोई होता तो उसे इतनी रात को शमशान जाने के नाम से हार्ट अटॅक हो जाता, लेकिन जाने वो किस मिट्टी की बनी थी उसे भूत प्रेतों का ज़रा भी भय नहीं था. वो तो बस अपने किसी उद्देश्य के लिए जैसे सर पर कफ़न बाँध कर चली जा रही थी. हाथों में अपने पति की तस्वीर और कुछ पूजा का सामान लिए वो धीरे धीरे बिना डरे शमशान वाले रास्ते पर बढ़ रही थी. डर था तो केवल इतना की कहीं उसे कोई देख ना ले और उसकी पूजा भंग ना हो जाए जिसके लिए उसे पूरे 10 दिन अमावस्या तक इंतजार करना पड़ा.
………………………………………………………………………………………………
10 दिन पहले
रूपा एक बेहद खूबसूरत कोई 25 साल की नवयुवना थी जिसकी चाह हर किसी के मन में होती है. उसका पति रमेश खेतों में मज़दूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता था. दोनो का एक सुंदर सा बेटा भी था जिसे दोनो ही बहुत प्यार करते थे. एक कारण ये भी था कि इस बच्चे का जनम ऑपरेशन से शहर में हुया था जिसका खर्चा खेत के मालिक ने दिया था और वो क़र्ज़ धीरे धीरे रमेश चुका रहा था. इस ऑपरेशन के बाद अब रूपा कोई बच्चा नहीं जन सकती थी तो बस वोही एक उनकी आँख का तारा था जिसे दोनो बेहद प्यार करते थे.
रमेश रोज़ सुबह नाश्ता करके काम पर चला जाता और शाम को घर आ जाता. दोपहर का खाना वो घर से लेकर जाता था क्यूंकी खेत घर से दूर थे. खेत का मालिक भी बहुत अच्छा इंसान था जो समय समय पर रमेश की मदद कर देता था. उनकी जिंदगी बढ़िया चल रही थी लेकिन कब किस की नज़र लग जाए कोई नहीं कह सकता.
ऐसे ही एक दिन अचानक जब रमेश खेत में काम कर रहा था तो अचानक वो बेहोश हो कर गिर पड़ा. उसके साथ काम करने वाले दूसरे मजदूरों ने उसे उठाया और पास ही एक पेड़ के नीचे लिटा दिया. उसको ठंडे पानी के छींटे मारके उठाया गया और शायद ये उन लोगों के लिए नुक़सानदायक ही हुआ. रमेश होश में आते ही पागलों जैसी हरकत करने लगा. बिना मतलब चिल्लाना, हाथ पैर चलाना, गालियाँ बकना उसने शुरू कर दिया.
पहले तो सब लोग कुछ समझ नहीं पाए लेकिन बाद में उन्हें लगा कि कहीं इस पर कोई भूत प्रेत का साया आ गया है जो ये इस तरह की हरकत कर रहा है. किसी तरह उन लोगों ने रमेश के हाथ पैर बाँध दिए और उसे उसके घर पहुँचा दिया. जल्दी ही ये खबर पूरे गाओं में आग की तरह फैल गयी. सब भौंचक्के से रमेश को देख रहे थे. रमेश उठता, चीखता चिल्लाता और फिर बेहोश हो जाता. रूपा की तो जैसे जान ही निकल गयी थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे. किसी ने भी ये ध्यान नहीं दिया कि रमेश दो दिन से बुखार में था और आज बुखार इतना तेज हो गया था कि उसके दिमाग़ में चढ़ गया था. सब इसे भूत प्रेत का मामला समझ रहे थे और यही समझ रहे थे कि भूत प्रेत की वजह से ही रमेश का बदप तप रहा है.
रूपा बस रोए जा रही थी. किसी तरह गाओं की औरतों ने उसे संभाला. गाओं के एक आदमी ने जाकर पास के शमशान से बाबा गोरखनाथ को बुलाने भेज दिया जो भूत प्रेत को अपने वश में करके की विद्या जानते थे. थोड़ी ही देर में वो आदमी उन बाबा को लेकर आ गया. लंबे घुँगराले बाल, बड़ी बड़ी लाल आँखें, गले में नर मुंडों की माला, एक हाथ में खोपड़ी तो दूसरे में एक मोर पंख की झाड़ू, कंधे पर एक बड़ा सा झोला जिसमे जाने क्या क्या रखा था. एक बार तो सब उन्हें देख कर डर गये लेकिन फिर हिम्मत करके उन्होने अपनी दुविधा सामने रखी.
बाबा ने रमेश की नाडी को देखा और जल्दी ही वो असली बात भाँप गये. लेकिन उनके मन में पाप आ गया और उन्हें अपनी काली विद्या की पूजा के लिए एक साधन मिल गया. उन्होने रूपा से एकांत में बात करनी चाही जिसके लिए गाओं वाले तय्यार हो गये. बाबा रूपा को सबसे थोड़ा सा दूर ले गये और कहा “बेटी, तुम्हारे पति पर बहुत बड़े भूत का साया है जो हर क्षण तुम्हारे पति के शरीर को कमजोर किए जा रहा है. जल्दी ही उपाय नहीं किया गया तो उसकी जान को ख़तरा हो सकता है.”
“बाबा आप कृपया करके मेरे पति को बचा लीजिए. जो भी पूजा करनी है आप करिए. जितना भी पैसा लगेगा मैं अपनी तरफ से भरने की पूरी कोशिश करूँगी.”
“बेटा पैसा तो कुछ खास नहीं लगेगा लेकिन एक काम है जो तुम शायद ना कर सको”
“बाबा आप बताइए ऐसा क्या काम है. मैं अपने पति की जान बचाने के लिए सब कुछ कर सकती हूँ”
“बेटा तुम्हे अमावस्या वाले दिन रात को 12 बजे शमशान पहुचना होगा क्यूंकी उसी दिन राक्षसी ताकतें बाहर निकलती हैं तो उनको आसानी से वश में किया जा सकता है. हां और तुम्हे सबसे छुपते छुपाते आना होगा वरना ये पूजा भंग हो जाएगी”
“मैं आ जाउन्गि बाबा. आप के बताए अनुसार 12 बजे बगैर किसी की नज़र में आए में शमशान पहुँच जाउन्गि”
“लेकिन एक दिक्कत है बेटी, हमे इस पूजा में एक बलि देनी होगी”
“कोई बात नहीं बाबा, मेरे पास मुर्गा है बाडे में. मैं वो लेती आउन्गि”
“नहीं बेटी हमे पशु बलि नहीं नर बलि चाहिए”
“क्या! बाबा ये आप क्या कह रहे हैं. मैं किसी की जान कैसे ले सकती हूँ. ये मुझसे नहीं होगा”
“तो फिर तुम्हारे पति को भी में नहीं बचा सकता”
रूपा की रुलाई फुट पड़ी. बाबा को शायद उस पर तरस आ गया तो उसने कहा “चिंता मत करो बेटी, बलि का इंतजाम में कर दूँगा तुम बस ये बात किसी को मत बताना इसे राज़ ही रखना”
“जैसा आप ठीक समझे बाबा”
इसके बाद बाबा अपने शमशान में चले गये और रूपा ने लोगों के पूछने पर सिर्फ़ यही बताया कि बाबा ने कोई पूजा करने को कहा है मुझे जिससे ये ठीक हो जाएँगे.
सब उसकी बात पर विश्वास करके वहाँ से चले गये. सिवाय भोला के जो काफ़ी देर से इनकी बातें सुनने की कोशिश कर रहा था लेकिन ठीक से कुछ सुन नहीं पाया केवल अमावस्या की रात का जिकर ही सुन पाया.
धीरे धीरे दिन बीतते गये और रमेश की हालत में भी सुधार आता गया. ये सुधार अच्छे ख़ान पान, पूरे आराम और रूपा की देखभाल की वजह से आया था लेकिन रूपा को तो अब भी डर था कि कहीं फिर से भूत कब्जा ना कर ले तो उसने पूजा करने की ठान ली. और वो दिन भी आ ही गया जिसका उसे इंतजार था. रात 11 बजे उसकी नींद खुली तो देखा कि उसका पति और उसका बच्चा दोनो सो रहे हैं तो वो दबे पैर वहाँ से निकल गयी.
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रात का अंधेरा गहराता जा रहा था. समय करीब 11:30 रहा होगा जब वो अपने घर से निकली थी. चारो तरफ सन्नाटा फैला हुया था. बस हवाओ और पेड़ के पत्तों की आवाज़ ही इस सन्नाटे को भंग कर रहे थे. कभी कभी कुत्तों के भोंकने की आवाज़ भी सुनाई पड़ जाती थी लेकिन वो छनिक मात्र थी.
वो पैदल ही सबसे छुपते छुपाते शमशान की ओर जा रही थी. और कोई होता तो उसे इतनी रात को शमशान जाने के नाम से हार्ट अटॅक हो जाता, लेकिन जाने वो किस मिट्टी की बनी थी उसे भूत प्रेतों का ज़रा भी भय नहीं था. वो तो बस अपने किसी उद्देश्य के लिए जैसे सर पर कफ़न बाँध कर चली जा रही थी. हाथों में अपने पति की तस्वीर और कुछ पूजा का सामान लिए वो धीरे धीरे बिना डरे शमशान वाले रास्ते पर बढ़ रही थी. डर था तो केवल इतना की कहीं उसे कोई देख ना ले और उसकी पूजा भंग ना हो जाए जिसके लिए उसे पूरे 10 दिन अमावस्या तक इंतजार करना पड़ा.
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रूपा एक बेहद खूबसूरत कोई 25 साल की नवयुवना थी जिसकी चाह हर किसी के मन में होती है. उसका पति रमेश खेतों में मज़दूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता था. दोनो का एक सुंदर सा बेटा भी था जिसे दोनो ही बहुत प्यार करते थे. एक कारण ये भी था कि इस बच्चे का जनम ऑपरेशन से शहर में हुया था जिसका खर्चा खेत के मालिक ने दिया था और वो क़र्ज़ धीरे धीरे रमेश चुका रहा था. इस ऑपरेशन के बाद अब रूपा कोई बच्चा नहीं जन सकती थी तो बस वोही एक उनकी आँख का तारा था जिसे दोनो बेहद प्यार करते थे.
रमेश रोज़ सुबह नाश्ता करके काम पर चला जाता और शाम को घर आ जाता. दोपहर का खाना वो घर से लेकर जाता था क्यूंकी खेत घर से दूर थे. खेत का मालिक भी बहुत अच्छा इंसान था जो समय समय पर रमेश की मदद कर देता था. उनकी जिंदगी बढ़िया चल रही थी लेकिन कब किस की नज़र लग जाए कोई नहीं कह सकता.
ऐसे ही एक दिन अचानक जब रमेश खेत में काम कर रहा था तो अचानक वो बेहोश हो कर गिर पड़ा. उसके साथ काम करने वाले दूसरे मजदूरों ने उसे उठाया और पास ही एक पेड़ के नीचे लिटा दिया. उसको ठंडे पानी के छींटे मारके उठाया गया और शायद ये उन लोगों के लिए नुक़सानदायक ही हुआ. रमेश होश में आते ही पागलों जैसी हरकत करने लगा. बिना मतलब चिल्लाना, हाथ पैर चलाना, गालियाँ बकना उसने शुरू कर दिया.
पहले तो सब लोग कुछ समझ नहीं पाए लेकिन बाद में उन्हें लगा कि कहीं इस पर कोई भूत प्रेत का साया आ गया है जो ये इस तरह की हरकत कर रहा है. किसी तरह उन लोगों ने रमेश के हाथ पैर बाँध दिए और उसे उसके घर पहुँचा दिया. जल्दी ही ये खबर पूरे गाओं में आग की तरह फैल गयी. सब भौंचक्के से रमेश को देख रहे थे. रमेश उठता, चीखता चिल्लाता और फिर बेहोश हो जाता. रूपा की तो जैसे जान ही निकल गयी थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे. किसी ने भी ये ध्यान नहीं दिया कि रमेश दो दिन से बुखार में था और आज बुखार इतना तेज हो गया था कि उसके दिमाग़ में चढ़ गया था. सब इसे भूत प्रेत का मामला समझ रहे थे और यही समझ रहे थे कि भूत प्रेत की वजह से ही रमेश का बदप तप रहा है.
रूपा बस रोए जा रही थी. किसी तरह गाओं की औरतों ने उसे संभाला. गाओं के एक आदमी ने जाकर पास के शमशान से बाबा गोरखनाथ को बुलाने भेज दिया जो भूत प्रेत को अपने वश में करके की विद्या जानते थे. थोड़ी ही देर में वो आदमी उन बाबा को लेकर आ गया. लंबे घुँगराले बाल, बड़ी बड़ी लाल आँखें, गले में नर मुंडों की माला, एक हाथ में खोपड़ी तो दूसरे में एक मोर पंख की झाड़ू, कंधे पर एक बड़ा सा झोला जिसमे जाने क्या क्या रखा था. एक बार तो सब उन्हें देख कर डर गये लेकिन फिर हिम्मत करके उन्होने अपनी दुविधा सामने रखी.
बाबा ने रमेश की नाडी को देखा और जल्दी ही वो असली बात भाँप गये. लेकिन उनके मन में पाप आ गया और उन्हें अपनी काली विद्या की पूजा के लिए एक साधन मिल गया. उन्होने रूपा से एकांत में बात करनी चाही जिसके लिए गाओं वाले तय्यार हो गये. बाबा रूपा को सबसे थोड़ा सा दूर ले गये और कहा “बेटी, तुम्हारे पति पर बहुत बड़े भूत का साया है जो हर क्षण तुम्हारे पति के शरीर को कमजोर किए जा रहा है. जल्दी ही उपाय नहीं किया गया तो उसकी जान को ख़तरा हो सकता है.”
“बाबा आप कृपया करके मेरे पति को बचा लीजिए. जो भी पूजा करनी है आप करिए. जितना भी पैसा लगेगा मैं अपनी तरफ से भरने की पूरी कोशिश करूँगी.”
“बेटा पैसा तो कुछ खास नहीं लगेगा लेकिन एक काम है जो तुम शायद ना कर सको”
“बाबा आप बताइए ऐसा क्या काम है. मैं अपने पति की जान बचाने के लिए सब कुछ कर सकती हूँ”
“बेटा तुम्हे अमावस्या वाले दिन रात को 12 बजे शमशान पहुचना होगा क्यूंकी उसी दिन राक्षसी ताकतें बाहर निकलती हैं तो उनको आसानी से वश में किया जा सकता है. हां और तुम्हे सबसे छुपते छुपाते आना होगा वरना ये पूजा भंग हो जाएगी”
“मैं आ जाउन्गि बाबा. आप के बताए अनुसार 12 बजे बगैर किसी की नज़र में आए में शमशान पहुँच जाउन्गि”
“लेकिन एक दिक्कत है बेटी, हमे इस पूजा में एक बलि देनी होगी”
“कोई बात नहीं बाबा, मेरे पास मुर्गा है बाडे में. मैं वो लेती आउन्गि”
“नहीं बेटी हमे पशु बलि नहीं नर बलि चाहिए”
“क्या! बाबा ये आप क्या कह रहे हैं. मैं किसी की जान कैसे ले सकती हूँ. ये मुझसे नहीं होगा”
“तो फिर तुम्हारे पति को भी में नहीं बचा सकता”
रूपा की रुलाई फुट पड़ी. बाबा को शायद उस पर तरस आ गया तो उसने कहा “चिंता मत करो बेटी, बलि का इंतजाम में कर दूँगा तुम बस ये बात किसी को मत बताना इसे राज़ ही रखना”
“जैसा आप ठीक समझे बाबा”
इसके बाद बाबा अपने शमशान में चले गये और रूपा ने लोगों के पूछने पर सिर्फ़ यही बताया कि बाबा ने कोई पूजा करने को कहा है मुझे जिससे ये ठीक हो जाएँगे.
सब उसकी बात पर विश्वास करके वहाँ से चले गये. सिवाय भोला के जो काफ़ी देर से इनकी बातें सुनने की कोशिश कर रहा था लेकिन ठीक से कुछ सुन नहीं पाया केवल अमावस्या की रात का जिकर ही सुन पाया.
धीरे धीरे दिन बीतते गये और रमेश की हालत में भी सुधार आता गया. ये सुधार अच्छे ख़ान पान, पूरे आराम और रूपा की देखभाल की वजह से आया था लेकिन रूपा को तो अब भी डर था कि कहीं फिर से भूत कब्जा ना कर ले तो उसने पूजा करने की ठान ली. और वो दिन भी आ ही गया जिसका उसे इंतजार था. रात 11 बजे उसकी नींद खुली तो देखा कि उसका पति और उसका बच्चा दोनो सो रहे हैं तो वो दबे पैर वहाँ से निकल गयी.
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