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अमरबेल एक प्रेमकहानी

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अमरबेल एक प्रेमकहानी

भाग-1

गाँव में घुसते ही एक इमली का पेड़ पड़ता था. उस पेड़ के पास से गुजरने वालो को अक्सर एक लड़की उस इमली के पेड़ के नीचे खड़ी, बैठी. या काम करती दिखाई पड़ती थी. नाम था कोमल. कोमल दिखने में मोहल्ले की अन्य लड़कियों से खूबसूरत थी.

लम्बाई भी औसत थी. उम्र कोई अठारह के आस पास. भरा हुआ बदन. कजरारी आँखें. कजरारी इतनी कि कभी कभी लगता था कि काजल की पूरी डिबिया आँखों में लगा डाली है.

कोमल को सजने सवरने का बहुत शौक था. कभी कभी सजने में घंटों लगा देती थी. पीछे से उसकी बड़ी बहन देवी चिल्लाती, “क्या आज ही सब सिंगार कर डालोगी राजकुमारी जी."

कोमल कुछ न बोलती बस अपना सुंगार करने में लगी रहती थी. और सच कहा जाय तो कोमल के सजने सवरने का ही परिणाम था कि वह मोहल्ले की सबसे खूबसूरत लडकी थी. नाक लम्बी और पतली थी. जिसमे गोल नथुनी सोने पे सुहागा लगती थी. पतले गोरे कान जिनमे सोने के सादा कुंडल किसी भी सुन्दरी को लजाने के लिए काफी थे.

ऐसा नही कि कोमल बहुत ज्यादा सुन्दर थी लेकिन गाँव में अपनी उम्र की लड़कियों में बह अधिक सुंदर थी. सबसे हंसकर बातें करना तो जैसे उसकी खुराक थी. जब तक सारे मोहल्ले के घरों में जाकर उनके चौका चूल्हे का हाल न जान लेती उसे चैन न पड़ता था.

ये छोटा सा गाँव था भी बहुत प्यारा, मुश्किल से पच्चीस घर थे इस प्यारे से गाँव में कोमल का मोहल्ला तो सिर्फ चंद घरों से घिरा था. सारे घरों के लोग एकदूसरे से एक परिवार की तरह जुड़े हुए थे. फिर इस गाँव की लडकी कोमल ही पीछे क्यों रहती? वो भी मोहल्ले में अपनी प्यार मोहब्बत लुटाती फिरती थी.

कोमल पास के ही एक गाँव के इंटर कॉलेज में पढने जाती थी. उसकी बड़ी बहन देवी भी उसी के साथ उसी की क्लास में पढ़ती थी. दोनों बहन होने के साथ साथ सहेलियां भी थी. वो सहेलियां जो एक दूसरे से अपने मन की बात कह सुन लेती हैं. दोनों को एक दूसरे के गुण और कमियां मालुम थीं.

होली हो, दिवाली हो या कोई आम दिन. कोमल की मौज मस्ती मोहल्ले वालो के साथ रोज चालू रहती थी.अगर कोमल एक दिन के लिए भी कहीं चली जाती तो मोहल्ले को लगता कि उनके मोहल्ले से कुछ तो गायब है.

इसी मोहल्ले में एक शांत लडका छोटू भी रहता था. उम्र कोई बारह तेरह साल के आस पास रही होगी. कोमल से उसका कोई लेना देना नही था लेकिन वो कोमल के प्रशंसकों में से एक था. वो कोमल के घर से मट्ठा ले कर आता था और कोमल उसके नल से पानी. छोटू के घर का नल मोहल्ले के लिए सरकारी नल की तरह था. कोमल भी इस बात का फायदा उठाती थी. छोटू और कोमल में जमकर बातें होती थी. पढाई से लेकर शादियों की दावतों तक.

कोमल अपनी इमली के पेड़ से छोटू के लिए इमली तोड़ कर दे दिया करती थी और बदले में उससे हरी मेहँदी के पत्ते तोड़कर लाने को कहती.

छोटू अपने स्कूल से आते वक्त कोमल के लिए मेहँदी के हरे पत्ते तोड़ कर ले आता था.
 
कोमल मुस्कुरा कर कहती, "तू ही है छोटू मोहल्ले में जो मेरा हर काम कर देता है." छोटू अपनी तारीफ सुन फूला न समाता फिर कोमल से पूछता, “कोमल क्या में इमली के पत्ते तोड़कर खा लूं?"

कोमल कहती, “हाँ हाँ क्यों नही? तेरे लिए कोई मना नही है.” इमली की तरह इमली के हरे पत्ते भी खट्टे होते हैं. जो खाने में बहुत खट्टे और अच्छे लगते हैं.

छोटू रोज़ स्कूल जाते वक्त कोमल से इमली के पत्ते लेकर जाता था और स्कूल में दोस्तों के साथ बैठकर खाता. यही सिलसिला सालों साल चलता रहा. कोमल इमली के पत्ते छोटू को देती और अपने लिए मेहँदी के पत्तो का बन्दोवस्त करवाती. लेकिन समय एक जैसा तो नही रहता और वही हुआ. इमली का मौसम खत्म हुआ. कोमल और छोटू का मिलना भी कम हो गया.

अब कभी कभार ही दोनों की मुलाक़ात होती थी. कोमल आज कल किसी अलग हवा में जी रही थी. जिसकी भनक किसी को नही थी लेकिन एक दिन वो भी आया जब कोमल अपने आप को किसी में खो बैठी और वो खोना ऐसा कि जिसके लिये वह अपनी जान हथेली पर लिए घूम रही थी.

___ गाँव में एक दूधिया आता था. वो कोमल के घर से भी दूध लेकर जाता था. कोमल उसके साथ बहुत मजाकें करती. कभी कभी उसके घर वाले उसे डांट भी देते लेकिन कोमल किसी के कहने से कब मानी थी जो आज मानती. दुधिया भी कोमल की ही उम्न का था. नाम था राज. उसका गाँव कोमल के स्कूल वाले रास्ते में ही पड़ता था.

धीरे धीरे दोनों एक दूसरे से घुलने मिलने लगे और फिर पता नही कब दोनों एक दूसरे को अपना दिल दे बैठे. ये बात खुद उन दोनों प्रेमियों को भी पता न चली. कोमल और राज ने अभी तक एक दूसरे से इश्क का इजहार भी न किया था.

बस बातें करते रहते. एक दूसरे को चिढाते, नये नये चुटकुले सुनाते. समय बीतता जा रहा था. इधर कोमल और राज का मौन इश्क अपने चरम पर था. उनके इश्क की आग उनके दिलों को जलाकर राख किये दे रही थी. मानो कह रही हो कि या तो इजहार करो नही तो तुम्हारे दिल के साथ साथ तुम्हे भी जलाकर राख कर दूंगी.

कोमल जब भैंस का दूध दुहने बैठती उस वक्त दूधिया राज बैठा बैठा उसके मोहक रूप के दर्शन करता रहता था. बीच बीच में कोमल भी उसे देखती रहती. कभी कभार भोंह के इशारे से पूंछती, "क्यों क्या हुआ ऐसे क्यों देख रहे हो?" और उसके रंग में रंगा दूधिया राज भी सर हिलाकर इशारों में कहता, "कुछ भी तो नही."

दोनों इश्क कलंदरों को पता था कि वो एक दूसरे को क्यों देखते हैं? लेकिन फिर भी पूछते थे. कारण था कोई भी पहले इजहार करने की हिम्मत न कर पा रहा था. जब भी उन में से कोई दूसरे की तरफ देखता और जब दूसरा पूछता तो तो उसमे मिलने वाला आनंद इजहारे इश्क के विचार से ज्यादा अच्छा लगता था.

इसलिए लोगों ने कहा है की छुप छुप के इश्क करने का मजा ही कुछ और होता है और वही आनंद ये दोनों प्रेमी प्राप्त किये जा रहे थे. लेकिन इश्क सिर्फ चुप रहकर देखना भर तो नहीं है. उसका और भी तो रूप है. जिसको पाने के लिए ये लोग भी लालयित थे. कोमल और उसकी बहन दोनों जब कॉलेज जातीं तो राज रास्ते में उन दोनों का इन्तजार करता रहता था. जैसे ही ये दोनों उसे दिखाई देतीं वो उठकर दोनों के साथ चलने लगता फिर अपना गाँव आने तक इनके साथ चलता रहता था.

एक दो दिन का तो कुछ नही लेकिन जब रोज़ ऐसा होने लगा तो कोमल की बड़ी बहन देवी उससे बोल पड़ी, "क्यों री कोमल ये राज दूधिया रोज अपने साथ ही क्यों जाता है?

कोमल अनजान बनते हुए बोली, “मुझे क्या पता?"

देवी उसे कुरेदते हुए बोली, “तो ठीक है. आज इसकी शिकायत पापा से किये देती हूँ. एक दिन में लाइन पर आ जाएगा."

कोमल हडबडा कर बोली, “अरे नही नही शिकायत की क्या जरूरत है? उसने हम से कोई गलत हरकत तो की ही नही न. फिर पापा से कहने की क्या जरूरत है."

देवी तंज करते हुए बोली, “अच्छा मेरी भोली बहन, जब कोई हरकत करेगा तभी कहोगी उससे पहले नही. जब कुछ हरकत कर ही देगा तब कहने का क्या फायदा? आज में इसकी शिकायत करके ही रहूँगी."

कोमल के दिल में राज का वास था. उसे राज के खिलाफ कुछ भी बर्दाश्त नहीं होना स्वभाविक था. वह तुनक कर बोली, "ठीक है कह देना पर में तुमसे न बोलूंगी. भूल जाना कि तुम्हारी कोई बहन भी थी."

देवी हैरत भरे स्वर में बोली, "अरे अरे पागल हो गयी हो क्या? ये राज क्या तुम्हारा फूफा लगता है जो इसकी शिकायत न करने दोगी और ये हो क्या गया है तुम्हे? उस राज की इतनी तरफदारी क्यों कर रही हो?"

कोमल अपने कहे पर हडबडा उठी. उसने इश्क के नशे में जो बात देवी से कह दी थी उसका अंदाज़ा उसे बात कहने के बाद हुआ. फिर सम्हलते हुए बोली, "देखो देवी मेरी बहन में तो सिर्फ ये कह रही थी क्यों किसी बेचारे सीधे साधे लडके को परेशान किया जाय?"

देवी को कोमल पर अब शक हो रहा था. सोच रही थी हो न हो ये राज इसी की राज़ी से हमारे साथ आता जाता है. कोमल के राज को सीधा साधा कहने पर वह तुनककर बोली, “अच्छा अब ये सीधा साधा लड़का कब से हो गया? कहीं कोई और बात तो नहीं कोमल रानी? बता देना नही तो तुम्हारी खैर नही."

कोमल तो पहले ही राज नाम की चासनी में पकी जलेबी थी.

ऊपर से देवी की तीखी बाते उसे और ज्यादा कुरकुरी किये जा रही थी लेकिन कोमल कितनी ही मुंहलवार थी परन्तु अपनी बड़ी बहन के सामने अपने इश्क को कबूल करना उसके लिए बहुत मुश्किल था.
 
ये वो इश्क था जो अभी उसने अपने मुंह से अपने चाहने वाले को बोला भी नहीं था और न ही उसके आशिक ने उससे बोला था. फिर अपनी बहन को क्या बताये?

लेकिन बहन को उसके सवाल का जबाब देना भी तो जरूरी था. क्योंकि चुप रहने का मतलब अक्सर हाँ माना जाता है. यह सोच कोमल अपनी बहन देवी से बोली, "अरे कैसी बातें करती हो देवी बहन? कोई बात होती तो तुम्हे न बताती? आजतक तुमसे कोई बात छिपाई है भला मैने?"

देवी को शक तो था लेकिन अपनी बहन कोमल पर भरोसा भी था. उसका दिमाग उलझन में तो था लेकिन कोमल से राज ने कुछ कहा भी तो न था. कैसे कहती कि तुम दोनों के बीच में कुछ चक्कर चल रहा है?

सब कुछ ऐसा ही चलता रहा. राज रोज उन्हें मिलता और बातें करता हुआ उनके साथ अपने गाँव की शुरुआत तक जाता. अब देवी भी राज से बाते करती थी. कोमल को ये बात अच्छी लगी. सोचती थी चलो देवी अब राज की शिकायत पापा से न करेगी.

लेकिन कोमल और राज का मौन इश्क अपनी चरम सीमा को पार करता जा रहा था. कभी कभी तो राज के मन में आता कि वो कोमल से देवी के सामने ही अपने इश्क का इजहार कर डाले. किन्तु उसे डर भी लगता था कि कहीं उसका उतावलापन कोमल और उसके मिलन में बाधा न बन जाए?

इधर यही हाल कोमल का भी था. उसके भी मन में आता था कि देवी को सब कुछ बता डाले कि वो राज पर अपना दिल हार बैठी है लेकिन उसे भी डर था कि देवी कहीं पापा से जाकर न बोल दे? दैय्या रे दैय्या फिर तो मुसीबत हो जाएगी,
 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
भाग - 2

लेकिन कभी तो ऐसा होना ही था. एक दिन देवी बीमार पड़ गयी. घरवालों ने उस दिन स्कूल जाने से मना कर दिया लेकिन कोमल का तो घर में मन ही नही लगता था. उसका मन तो उस राज से जा लगा था. उसे आज से अच्छा मौका न लगा. सोचा देवी न जायेगी तो आज रास्ते में सिर्फ वो और राज होंगे.

घर वालों के काफी मना करने के बाबजूद कोमल घर से स्कूल के लिए चल दी. घर से बाहर कदम पड़ते ही कोमल का मन बारिश में मोर जैसा हो गया. आज कोयल को बसन्त और चकोर को चाँद से मिलने की तमन्ना थी.

आज सुबह कोमल ने घर से चलते वक्त खाना भी नही खाया था. आज तो वो राज के दर्शन से भूख को तृप्त करने वाली थी फिर खाना भला कौन कमबख्त खाए?

उधर राज रास्ते में आकर बैठ गया. आज सुबह से राज को भी न जाने क्यूँ ऐसा लग रहा था कि कुछ अच्छा होने वाला है? सुबह जल्दी उठा. खुशबु वाले साबुन से नहाया और बाल कंघी कर सीधा उसी जगह आ बैठा जहाँ से रोज उसकी महबूब कोमल गुजरती थी. जिधर उसके दिल को सुकून मिलता था. जहाँ जाए बिना उसका दिल थामे न थमता था.

कोमल के पैर हवा में चल रहे थे. उसे लगता था कि जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी वो उस जगह पहुंच जाए जहाँ राज बैठा उसकी राह देख रहा है. वो इतनी तेज चल रही थी कि आज अगर देवी उसके साथ होती तो वो उसे काफी पीछे छोड़ आगे निकल जाती. सांस फूल रही थी लेकिन इस पगली को तो अपनी मंजिल पर जाकर रुकना था.

फिर वो वक्त भी आ पहुंचा जब उसे राज कुछ दूर पर खड़ा दिखाई दिया. राज आज कोमल को अकेली आते देख अंदर तक कंपकपा गया. दिल में हलचल हो गयी थी. परन्तु आनंद की भी सीमा न रही. जल्दी जल्दी पेंट की पिछली जेब से छोटा सा कंघा निकाल बाल ठीक कर लिए. मुंह रुमाल से पोंछ लिया. थोडा सा रुमाल दांतों पर भी घिस लिया लेकिन उसे अपनी आँखों पर भरोसा न होता था. सोचता था देवी भी उसके साथ पीछे पीछे आ रही होगी.

कोमल ने राज को देखा और राज ने उसे. दोनों की आँखे मिली जिनमे एकदूसरे को कुछ बताने और कुछ पूछने की अधीरता साफ़ दिखाई देती थी. जैसे ही दोनों करीब आये दोनों की हिम्मत न हुई कि एक दूसरे से कुछ बोल सकें. राज को यह जानने की जल्दी थी कि आज उसके साथ देवी आई है या नहीं?

कोमल ने थोडा रुककर अपनी सांसो पर काबू किया जो तेज चलकर आने की वजह से फूल रही थी. लेकिन तब तक राज अपनी अधीरता खो कोमल से पूंछ बैठा, “आज तुम्हारी...बहन नही आई." राज ये सवाल पूछते वक्त काँप रहा था. आज से पहले उसे कोमल के सामने इतना डर कभी भी महसूस न हुआ था जबकि रोजाना कोमल से खूब बातें किया करता था.

कोमल सांसो पर काबू पा चुकी थी लेकिन राज के साथ अकेले खड़े होने के कारण आज उसे भी अपने आप का होश न रहा. राज के सवाल के जबाब में बस उसने ना में सर हिला कर बताया कि आज सचमुच में देवी नहीं आई है. ओह मेरे भगवान! कितनी मोहक बात कोमल ने कह डाली. जैसे राज को सारे जहाँ का सुख दे दिया था.

इतना सुनना था कि राज के दिल की धडकने किसी मशीन की तरह चलने लगीं. उसे लगा कि अगर उसके दिल ने धडकना कम न किया तो उसका दिल फट जाएगा. कोमल का दिल भी राज के दिल की तरह बिना बात धडके जा रहा था. दोनों काफी देर से चुप चाप खड़े थे. कोई किसी से न बोलता था.
 
सारे दिन बडबड करने वाली कोमल भी आज अपने मुंह से एक शब्द न बोल सकी थी. और वो राज? राज को तो जैसे सांप सूंघ गया था. हद तो ये थी कि दोनों एक दूसरे से नजरें तक न मिला पा रहे थे. बस चोरी चोरी एक दूसरे को देखते थे. कभी एक तो कभी दोनों.

कोमल चाहती थी कि पहले राज बोले और राज चाहता था कि पहले कोमल बोले. लेकिन दोनों के दिमाग में ये बात न आ रही थी कि बोले तो बोले क्या? घर से तो राज भी न जाने क्या क्या सोच के निकला था कि आज ये बोलूँगा आज वो बोलूँगा. और ये चंचल मतवाली कोमल ये तो हवा में उडती आई थी. रास्ते भर सोचती आ रही थी कि आज राज बोला तो ठीक नही तो वो खुद बोल देगी कि मुझे तुमसे प्यार हो गया है.

लेकिन अब क्या हुआ? अब तो दोनों के दोनों चुप खड़े थे. दोनों की हिम्मत जबाब दिए जा रही थी. दोनों के हाथ पैर कांप रहे थे. दोनों की हथेलियाँ पसीज रही थी. दोनों ही अपने होंठ चबा रहे. कुछ कहने की जद्दोजहद का महान नमूना पेश हो रहा था.

ये हो क्या रहा था? दोनों को ऐसे ही खड़े थे. कीमती समय बर्बाद हुआ जा रहा था. इसकी दोनों को चिंता भी थी. कोमल के स्कूल का टाइम भी लेट हो रहा था लेकिन उसे जरा भी परवाह नही थी. उसे तो परवाह थी राज के बोलने की. उससे कुछ कहने की.

लेकिन बिल्ली के गले में पहले घंटी कौन बांधे? कोमल लाज के मारे जमीन में नजरें गढाए खड़ी थी और वो बातूल राज? वो तो कोमल से भी ज्यादा शरमा रहा था. किन्तु अब कोमल को ज्यादा देर चुप रहना अच्छा न लग रहा था तो वो खुद ही बोल पड़ी, “ऐ दूधिया(राज). तुम रोज हमारे पीछे क्यों लगे रहते हो? किसी दिन देवी ने पापा से तुम्हारी शिकायत कर दी तो?"

ये बात कहने में कोमल ने अपना पूरा जोर लगा दिया था. दिल की धडकनें तो किसी इंजिन की तरह चल रही थी. वो तो राज का नाम तक न ले सकी थी. इसीलिए तो उसे दूधिया कहकर सम्बोधित किया था.

लेकिन राज को कोमल के मुंह से अपने नाम की जगह दूधिया सुनना भी उतना ही अच्छा लगा जितना कि वो राज को नाम से उसे पुकारती. राज ने जब कोमल का ये सवाल सुना तो उसकी की हिम्मत बढ़ गयी. अपने दिल की धडकनों को थामते हुए लजाकर बोला, “देवी ही शिकायत करेगी तुम न करोगी?"

कोमल हडवडा गयी. बोली, “हाँ हाँ में भी करूंगी." लेकिन कोमल के मन में राज की शिकायत का तो खयाल तक नहीं था. ये बात तो राज भी जानता था और कोमल भी.

राज जानबूझकर अंजान बन कोमल से बोला, "ठीक है तो कल से में यहाँ न आया करूंगा और तुम कहोगी तो तुमसे बात भी न किया करूँगा.” राज ने ये बात कोमल का मन जाने के लिए बोली थी और हुआ भी वही.

कोमल तडप कर बोली, "नही नही. मेरा वो मतलब नही था. अगर तुम कोई गलत बात न करोगे तो तुम्हारी शिकायत न करूंगी. तुम साथ साथ जाते हो तो रास्ता बड़े आराम से गुजर जाता है." कोमल एक सांस में बोल गयी. लेकिन हाय रे दैय्या! ये क्या कह गयी? जो नही कहना था वही कह गयी. वाह री राज की दीवानी कोमल!

राज अब खुलने लगा था. उसे कोमल की बातों से थोडा सहारा मिला था. बोला, “तो तुम्हे अच्छा लगता है...ये जो में..तुम्हारे साथ आता जाता हूँ.” राज बात कहने में हिचक रहा था लेकिन दिल अपनी हमदम के इश्क में घुलता जा रहा था. जैसे रवडी में चीनी. जैसे रसगुल्ला में चासनी .जैसे दही में वडा और जैसे कड़ी में पकोड़ा.

कोमल ने शरमा कर चेहरा ऊपर उठाया. राज पहले से ही उसकी तरफ देख रहा था. दोनों की नजरें मिली. राज दूधिया की सादा आँखे कोमल की काली समंदरी कजरारी आँखों से जा लगी. राज तृप्ति पा उठा. उसे लगा कि आज उसने जीवन की सबसे खूबसूरत चीज को देख लिया हो. जैसे किसी गहरी प्यास में पानी मिल गया हो.

राज को उसकी बात का जबाब मिल चुका था. कोमल की नजरों ने राज को ये बता दिया था कि उसका रोजाना कोमल के साथ आना जाना अच्छा लगता है. बतलाना भी अच्छा लगता है. प्रेम कहानी आगे बढ़ने लगी थी. दोनों धीरे धीरे एकदूसरे को समझते जा रहे थे.

लेकिन अब क्या बात की जाय? तभी राज को सूझा कि कोमल आज स्कूल जायेगी कि नही? उसे बात करने का मुद्दा मिल गया था. बोला, “आज तुम स्कूल नही जाओगी?" राज का मन होता था कि कोमल को बोल दे कि तुम आज स्कूल न जाओ. यही मेरी नजरों के सामने बैठी रहो. में तुम्हे तुम्हे देखता रहूँ और तुम मुझे देखती रहो.

कोमल सोचती हुई बोली, “आज लेट हो गयी हूँ. मन नही करता स्कूल जाने का, अब लौट कर घर को भी नहीं जा सकती, घर के लोग पूंछेगे की पढने क्यों नही गयी आज?" कोमल स्कूल के लिए ज्यादा लेट नही हुई थी लेकिन उसका मन राज से अलग होने को नहीं करता था इसीलिए उसने ये बात बोली. सोचती थी ये राज क्या कहेगा?
 
कोमल ने स्कूल न जाने की बात कह जैसे राज के मुंह की बात छीन ली थी. वह हिम्मत कर बोला, "हां तो क्यों जाती घर लौट कर? जब तक स्कूल की छुट्टी का समय नहीं होता तब तक यहीं रुक जाओ, में यहाँ तुम्हारे साथ बैठा रहूँगा."

कोमल राज के मन की बात जान चुकी थी लेकिन वो और ज्यादा राज से बात करना चाहती थी. वो अपने दिल के दिलवर को और ज्यादा पहचानना चाहती थी इसलिए बोली, “यहाँ तुम्हारे साथ मुझे किसी ने देख लिया तो न जाने लोग क्या क्या बात सोचेंगे? और मेरे घर ये बात पहुंची तो मेरी खैर नही.

राज ने जब अपनी कोमल के मुंह से उसका डर जाना सुना तो तडप उठा. वो कैसे अपनी जान को मुसीबत में देख सकता था? बोला, “अगर तुम बुरा न मानो तो मेरे पास एक जगह है जहाँ कोई आता जाता ही नही. अगर तुम चाहो तो छुट्टी होने के समय तक वहां...बैठ सकती हो?"

राज ये बात कहने में इतना सकुचा रहा था. जैसे कोई बुरी बात कह रहा हो? जैसे कोमल कहीं बुरा न मान जाए. कोमल को ये बात अच्छी तो लगी परन्तु कुछ बोली नही. उसने अपना किताबों का बस्ता (बैग) उठा आगे को बढ़ना शुरू कर दिया. राज समझ गया कि कोमल उसके साथ चलने को तैयार है.

लेकिन राज आगे न बढ़ पाया. वो तो उस चंचल कोमल को देख रहा था जिसकी चाल किसी नवयौवना हिरनी की तरह थी. कोमल की ये शोख अदाएं ही तो राज के दिल को लूट बैठी थी. कोमल ने महसूस किया कि राज उसके पीछे नही आ रहा है. उसने मुड कर देखा.

राज खड़ा खड़ा उसे एकटक देखे जा रहा था. मुंह पर हल्की मुस्कान थी जो लज्जा की चिकनाई से युक्त थी लेकिन कोमल को ये शरारत लगी. ऐसी शरारत जो मीठी मीठी चुभन देती है.जो चिढाती तो है लेकिन प्यार से.

कोमल उसी प्यार से चिढती हुई बोली, “तुम नही आओगे? न आओ तो मुझे वो जगह बता दो में अकेली ही चली जाउंगी.” कोमल ने अकेले जाने की बात राज का धैर्य परखने के लिए कही थी और हुआ भी वही.

राज का धैर्य जबाब दे गया. वो हड्वड़ा कर बोला, "हाँ हाँ चलता हूँ." और अपनी साईकिल को उठा कोमल के पीछे चल दिया.

कोमल राज की इस हड्वड़ा पर मुस्कुरा उठी. ये चंचल लडकी उस शरमाये हुए आशिक को छेड़ने का पूरा आनंद उठा रही थी. कोमल बलखाती हुई आगे आगे चल रही थी और राज साईकिल लिए कोमल के पीछे पीछे. राज अपनी नजरों को कोमल के रूप से मुक्त न कर पा रहा था. कभी कभी तो कोमल की तरफ देखने के कारण उसकी साईकिल गिरने को होती थी लेकिन वो आशिक ही क्या जो दर्द और कष्ट न सहे? जो मुश्किल न झेले. जो जमाने की फटकर न खाए. जो दो चार दिन भूखा न रहे. जो घर वालों से लात घूसों से न पिटे और जो पागलों की तरह दुःख भरे नग्मे न सुने. ये सोच थी आशिक दूधिया राज की. वाह रे राज!

फिर कोमल को ध्यान आया कि वो बिना राज के रास्ता बताये जा कहाँ रही है? उसे तो पता ही नहीं था कि राज कौन सी जगह की कह रहा था? और राज! राज को तो सुध ही नही थी कि वो कोमल के साथ कौन सी जगह जा रहा था? न ये फिकर कि वो रास्ता यही है जिसपे वो कोमल को ले जाना चाहता था? आखिर ये हो क्या रहा था?

कोमल फिर रुकी गयी. मुड़कर राज की तरफ देखा. वो पगला दूधिया राज तो पहले से ही उसको देख रहा था. कोमल के एकदम मुडकर देखने पर हड्वड़ा गया. कोमल अब राज के सामने पहले से अधिक खुल गयी थी. तीखी नजरें और होठों पर मुस्कान लिए बोली, “अब कितनी दूर और जाना है?"
 
__ राज फिर हड्बड़ा उठा. इधर उधर रास्ते को देखा. वो लोग सचमुच में गलत रास्ते पर आ गये थे और ये गलती थी राज की, वह कोमल के पीछे पीछे चलता रहा और एक बार भी ये न कहा कि हम गलत रास्ते पर जा रहे हैं. फिर सर खुजलाते हुए डर कर एक आम के पेड़ की तरफ इशारा करता हुआ बोला, "हम गलत रास्ते पर आ गये. हमें तो उस तरफ जाना था जिधर वो आम का पेड़ खड़ा है."

कोमल ने प्यार भरे अंदाज से माथा पीटते हुए कहा, "दैय्या रे दैय्या! तो फिर तुम इतनी देर से मेरे पीछे चलते हुए क्या कर रहे थे जो तुम्हे रास्ते की ही खबर नही रही?"

राज इस बात का क्या जबाब देता? क्या वो कोमल से ये कहता कि में तुम्हारे इश्क के समंदर में गोता लगा रहा था? क्या वो ये कहता कि मैं तुम्हारे हुश्न और मतवाली चाल के चंगुल में फस गया था? ये बात कोमल भी जानती थी कि राज क्यों रास्ता भूल गया था? माना कि राज की गलती थी कि उसने रास्ता नही बताया लेकिन कोमल भी तो राज से पूंछ सकती थी कि उसे जाना कहाँ है?

ये पगली पूंछती कहाँ से? ये तो खुद मोहब्बत के ख़्वाबों के शहर में घूम रही थी. सुध वुध तो ये दोनों ही गंवा चुके थे लेकिन कबूले कौन? फिर वही बात. बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? अब दोनों उस आम के पेड़ की तरफ चले जा रहे थे. जहाँ उन्हें कोई देख न पाए. जहाँ वो अपने इश्क का सजदा कर सकें. जहाँ वो अपनी साँसें थाम एक दूसरे को देख सकें और जहाँ वो अपनी मोहब्बत के जुर्म को कुबूल कर सकें.

आम के पेड़ के नीचे आ दोनों के कदम रुक गये. कोमल अभी आम के पेड़ को निहार रही थी. राज ने एक झटके में साईकिल उसके स्टैंड पर खड़ी कर दी. राज को हड्बड़ाहट ज्यादा थी और होती भी क्यों न? ये उसका पहला ऐसा इश्क था जिसका वो इजहार करने जा रहा था. और कोमल! कोमल भी तो पहली बार ही किसी के प्यार में पड़ी थी. उसका कौन सा प्यार करने का कारोवार था?

राज ने जल्दी से अपने बाल संबारे, मुंह पर हाथ फिराया. कमीज का कॉलर ठीक किया और चुपचाप खड़ा हो कोमल के पवित्र रूप के दर्शन करने लगा लेकिन तभी कोमल ने मुड़कर उसकी तरफ देखा. इस बार राज ने अपनी नजरें कोमल की नजरों से अलग न की. दोनों की नजरें ऐसे मिली जैसे सूरज की किरन और ओंस भरी धरती. सूरज की हल्की गर्म किरणें जमीन पर पड़ी ओस की बूंदों पर पड उन्हें गर्म करने लगी.

दोनों की साँसे किस लय में चल रहीं थी ये किसी को पता नही था. टकटकी लगाये दोनों की आखें अपने हमदम की आँखों की गहराइयाँ माप रहीं थी लेकिन जितना मापती गहराई उतनी बढती जाती थी. शायद इसीलिये दुनियां का कोई भी आशिक अपने महबूब की आँखों की गहराई न जान सका था.

लेकिन आँखे भी तो आँखे होती है. किसी भी चीज को कितनी देर देखे? ज्यादा देर तक पलकें न झपकाने के कारण दोनों की आँखों में आंसू आ गये. दोनों ने एक साथ अपनी नजरें एक दूसरे से हटा लीं. दोनों इधर उधर देखने लगे. समय कभी किसी के लिए नही रुका इसलिए आज भी भागा ही जा रहा था. दोनों के पैरों में सबकुछ जल्दी करने की गुगगुदी होती थी. लेकिन इश्क और हवस में अंतर होता है. जो इस समय इन दोनों दिलदारों के बीच दिखाई दे रहा था.
 
आज एक अलग घड़ी थी इन दोनों प्यार के जीवों के लिए. जिसे ये पूरी तरह से महसूस कर रहे थे. दिलों की धडकनों में होने वाली सुरसुरी उन्हें कुछ नया होने का आभास करा रहीं थी और अजीब बात तो ये थी कि दोनों के पास घड़ी भी नही थी. समय का पता कैसे चले? कैसे इश्क कबूल करने की जल्दी हो?

अन्य दिन तो राज भी घड़ी पहनता था लेकिन आज बो जल्दी जल्दी में अपनी घड़ी पहनना भूल गया था. घड़ी राज के लिए सबसे जरूरी चीजों में से एक थी. जब वो दूध लेने कोमल के गाँव जाता था तो घड़ी से ही तो पता चलता था कि किसकी भैंसिया कब दूही जानी है? अगर थोडा सा भी लेट हुए तो भैंस वाला दूध में पानी मिला देता था और फिर राज डेयरी मालिक की फटकार सुननी पडती थी.

लेकिन आज उसे घड़ी की एक और अहमियत पता चली कि अगर इश्क करो तो घड़ी जरूर पहनो, नही तो समय का पता ही नही चलता और आप उस दिन का इश्की लेक्चर मिस कर देते हैं. ये ऐसा लेक्चर होता है जिसका एक एक अक्षर आपके लिए बहुत ज़रूरी होता है. अगर आप इश्क के कलमा पढने वाले है तो.

कोमल ने राज की तरफ फिर से देखा और शुरुआत करती हुई बोली, “अब खड़े ही रहने का इरादा है? कहो तो बैठ जाऊं? मेरी टाँगे तो दर्द कर रही है." इतना कह कोमल बैठ गयी

लेकिन राज ने सुना कि कोमल के पैरों में दर्द हो रहा है तो एकदम से बोला, "कहों तो तुम्हारे पैर दबा दूँ?" ये कहने के बाद राज खुद ही झेंप गया. सोचा दैय्या रे दैय्या! ये क्या कह गया?

कोमल का माथा ठनक गया और हंसी भी छूट गयी. बोली, “आज बाबले हो गये हो क्या? अरे हम तो कह रहे थे कि खड़े खड़े पैर में दर्द हो रहा है ये कोई वैसा दर्द थोड़े ही है. और हो भी रहा होता तो क्या तुमसे पैर दबाने को कहती? बुद्धू कहीं के."

कोमल की प्यार भरी फटकार सुन राज का मन इश्क के रंग से रंग उठा. डालडा पिघल कर मक्खन हो गयी. सादा पानी मीठा शरवत वन गया.

कोमल आम के पेड़ के नीचे बैठी थी और राज उससे थोड़ी दूर पर खड़ा था. कोमल ने राज की तरफ देखा और बोली, “अब खड़े रहकर क्या कर रहे हो? आकर बैठ जाओ और कुछ बताओ या सुनाओ. घर पर दूध लेने आते थे तब तो बड़ी लम्बी लम्बी बाते करते थे. फिर आज क्या मौन व्रत रखा है?"

राज पहले से बहुत बातूल था. कोमल की प्यार भरी चुटकियां उसे उस बातूलपन की तरफ धकेलती जा रहीं थी. अब बह भी खुलता जा रहा था. बोला, “नही ऐसी कोई बात नही. सोचता हूँ क्या बोलूं? अच्छा चलो ये बताओ तुम आज स्कूल क्यों नही गयीं? अगर चाहती तो जा भी सकतीं थी.

कोमल ने मन ही मन में सोचा वाह रे राज दूधिया! मुझसे पूछता है की स्कूल क्यों नही गयीं और खुद के मन में था कि में आज स्कूल जाऊं ही नहीं, यह सोच वह बोली, "अच्छा और तुम ये रोज रोज मेरे साथ यहाँ से गाँव के बाहर तक आते जाते हो ये सब किस लिए करते हो?" सवाल से महा सवाल टकरा दिया. वाह री मतवाली कोमल!

कोमल के सवाल ने राज को निरुत्तर कर दिया था. जबकि राज जानता था कि कोमल स्कूल क्यों नही गयी और कोमल भी ये जानती थी कि राज उसके आगे पीछे क्यों घूमता है? फिर ये सवाल क्यों? इन सब शुरूआती आशिक लोगो की ये सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि इन्हें ये पता नहीं होता कि ये कर क्या रहे हैं? सब करते भी जाते है. यही तो हो रहा था इन दोनों इश्क कलंदरों के बीच में.
 
राज डरते डरते कंपकपाती टांगों से चलते हुए कोमल की बगल में जा बैठा और हाथ में घास का तिनका ले जमीन पर उसे घुमाने लगा. बगल में बैठे राज को दूर से कोमल ने महसूस किया. वह अंदर तक एक अनजाने रंग में रंग गयी. पेड़ के नीचे बैठे इन अनबोले आशिकों को सावन के महीने में चलने वाली सुगन्धित वायु का स्पर्श हो रहा था. आज हवा भी ऐसी थी कि कभी राज की तरफ से कोमल की तरफ बहती तो कभी कोमल की तरफ से राज की तरफ बहती थी.

पता नहीं कि ये हवा ही थी जो इधर से उधर वह रही थी या कोई इश्क की अनजानी वयार जो दोनों को एक दूसरे की बदन की खुशबु का आनंद दिलवाए जा रही थी? कोमल के बदन से उठती सुंगधित खुसबू राज को स्वर्ग का आनंद दिए जा रही थी. राज के बदन की मर्दाना खुश्बू कोमल को पागल किये जा रही थी.

दरअसल हवा में कोई खुसबू थी ही नही. ये तो इन आशिकों का बहम था. और हो भी क्यों न? जब आप किसी को इतनी शिद्दत से चाहते हैं तो उसकी हर एक बात आपको निराली लगती है. उसके बदबू भरे पसीने में आपको खुसबू आती है. उसकी मामूली अदायें आपका दिल लूट लेती हैं. और ये ही आभास चंचल कोमल और वाबले दूधिया राज के साथ हो रहा था, अब गाँव में तो उस समय डियोडेरेंट नही थे तो खुसबू कहाँ से आई? ये तो इन दोनों के इश्किया पागलपन की सुगंध थी.

लेकिन आग और फूस एक साथ ज्यादा देर तक अलग नहीं रहते. आग पहले फूस को जलाती है और फिर खुद भी बुंझ जाती है. यही तो होना था इन दोनों का. अब ये तो पता नही कि आग कौन था और फूस कौन. लेकिन थे दोनों ही कुछ न कुछ. कोमल ने राज की तरफ देखा. राज ने कोमल की तरफ.कोई कुछ न बोला. फिर कोमल बोल पड़ी, “क्या देख रहे हो?"

राज का फिर वही जबाब था, “कुछ भी तो नही."

फिर कोमल को पता नही क्या सूझा. बोली, “अगर कल से में स्कूल न आऊं? तुम्हे कहीं मिलूं भी नहीं तो क्या करोगे?" कोमल ने ये बात राज को टटोलने के लिए कही थी लेकिन इस बात ने राज के दिल पर तलवार की धार की तरह वार किया.

वो तिलमिला कर रह गया. उसका मन तो करता था कि बात कहते वक्त ही कोमल को चुप कर दे लेकिन न कर सका और प्यार के आवेश में आ बोला, "पहले तो तुम्हें ढून्ढूगा और अगर न मिलीं तो जहर खा मर जाऊँगा. लेकिन तुम जाओगी कहाँ?"

कोमल राज के मुंह से एकदम ऐसे अंदाज़ से की गयी बात पर हैरान थी लेकिन उसे अंदर से अपने होने बाले प्रेमी पर गर्व भी था जो उसके लिए अपनी जान देने के लिए तैयार था. एक लड़की को अपने आशिक से और क्या चाहिए? चंचल कोमल अभी राज को और तैस में लाना चाह रही थी. बोली, "तुम क्यों जान दे दोगे? मुझसे रिश्ता ही क्या है तुम्हारा? दूध लेने ही तो आते हो मेरे घर फिर ये जीने मरने की बाते किसलिए?"

कोमल मन में खुश थी. उसे राज से प्यार भरी चुटकी लेने में बड़ा मजा आ रहा था लेकिन राज तो उन बातों को गम्भीरता से लेता जा रहा था. बोला, “में कौन लगता हूँ तुम्हारा ये तुम पूंछ रही हो? अगर एक लडकी एक अकेले लडके के साथ सूनसान जगह पर बैठी है तो वो कौन होगी उसकी? ये अपने आप से पूंछ लो."

कोमल को राज से इस उत्तर की उम्मीद नहीं थी. वो सकपका गयी लेकिन फिर सम्हलते हुए बोली, “हमारा होगा क्या? क्या हम ऐसे ही मिलते रहेंगे? क्या हमारा कोई भविष्य नही?"

राज ने कोमल के मुंह से हम' शब्द का जिक्र सुना तो उसे यकीन हो गया कि जो मेरे अंदर है वो इस पगली कोमल के अंदर भी है. कोमल को अपने भविष्य को लेकर जो चिंता थी वो राज को भी थी. राज बोल पड़ा, “अभी शुरुआत होने से पहले हमे ऐसा नही सोचना चाहिए. पहले शुरुआत तो होने दो."

कोमल फिर से मजाक के मूड में थी. बोली, “अभी और कुछ करना है शुरुआत करने के लिए? ये जो साथ बैठकर बातें कर रहे हैं क्या ये शुरुआत नही है?"

राज कोमल की बात सुन झेंप गया. उसे समझ नही आता था कि कब कोमल मजाक करती है और कव गम्भीर होती है. लेकिन अब राज भी कोमल की तरह चुलबुला होना चाहता था. जैसे वो रोज उसके घर दूध लेने जाता था तब जो मजाकें वो कोमल के साथ करता था आज फिर से वही मजाकें करना चाहता था. चेहरे पर शरारती मुश्कान लिए बोला, "मेरे एक दोस्त ने जब एक लडकी के साथ ये शुरुआत की थी तो एक बच्चे का बाप बन गया था. तो उस हिसाब से तो हमारी शुरुआत कुछ भी नही."
 
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