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नीले परिन्दे
चौदहवीं की चाँदनी पहाड़ियों पर बिखरी हुई थी....सन्नाटे और चाँदनी की रोशनी में नहायी और पहाड़ों में चक्कर खाती हुई काली सड़क किसी बल खाये हुए साँप जैसी लग रही थी। और इसी सड़क पर एक लम्बी-सी कार दौड़ती चली जा रही थी।
तभी अचानक वह कार एक जगह रुक गयी....और स्टीयरिंग के सामने बैठा हुआ आदमी बड़बड़ाने लगा। "क्या हो गया है....? भई!"
उसने उसे दोबारा स्टार्ट किया....इंजन जागा....एक छोटी-सी अंगड़ाई ली और फिर सो गया....!
कई बार स्टार्ट करने के बावजूद इंजन होश में न आया....
“यार, धक्का लगाना पड़ेगा।' उसने पीछे मुड़ कर कहा। मगर पिछली सीट से खराटे ही बुलन्द होते रहे....
उसने दोनों घुटने सीट पर टेक कर बैठते हुए, सोने वाले को बुरी तरह झिंझोड़ना शुरू कर दिया....
लेकिन खर्राटे बराबर जारी रहे। आख़िर जगाने वाला सोने वाले पर चढ़ ही बैठा।
“अरे....अरे....बचाओ....बचाओ!” अचानक सोने वाले ने गला फाड़ना शुरू कर दिया। लेकिन जगाने वाले ने किसी-न-किसी तरह खींच-खाँच कर उसे नीचे उतार ही लिया।
"हाँय! मैं कहाँ हूँ!" जागने वाला आँखें मल-मल कर चारों तरफ़ देखने लगा।
“इमरान के बच्चे, होश में आओ।" दूसरे ने कहा।
“बच्चे....ख़ुदा कसम एक भी नहीं हैं....अभी तो मुर्गी अण्डों ही पर बैठी हुई है....सुपर फ़ैयाज़....!"
“कार स्टार्ट नहीं हो रही है।'' कैप्टन फ़ैयाज़ ने कहा।
“जब चले थे तब तो शायद स्टार्ट हो गयी थी।"
"चलो, धक्का लगाओ।" इमरान ने उसके कन्धे पकड़े और धकेलता हुआ आगे बढ़ने लगा।
"यह क्या बेहूदगी है? मैं थप्पड़ मार दूंगा।' फ़ैयाज़ पलट कर उससे लिपट गया....
“हाय....हाय....अरे, मैं हूँ....मर्द हूँ....!"
“कार धक्का दिये बगैर स्टार्ट नहीं होगी।' फ़ैयाज़ गला फाड़ कर चीख़ा।
"तो ऐसा बोलो न....मैं समझा शायद....वाह यार....!"
फ़ैयाज़ स्टीयरिंग के सामने जा बैठा....और इमरान कार को आगे से पीछे की तरफ़ धकेलने लगा।
“अरे....अरे....!" फ़ैयाज़ फिर चीख़ा। “पीछे से!''
इमरान ने मुँह फेर कर अपनी कमर कार के अगले हिस्से से लगा दी और ज़ोर देने लगा।
“अरे खुदा ग़ारत करे....सुअर....गधे!” फ़ैयाज़ दाँत पीस कर रह गया।
“अब क्या हो गया....?'' इमरान झल्लायी हुई आवाज़ में बोला।
चौदहवीं की चाँदनी पहाड़ियों पर बिखरी हुई थी....सन्नाटे और चाँदनी की रोशनी में नहायी और पहाड़ों में चक्कर खाती हुई काली सड़क किसी बल खाये हुए साँप जैसी लग रही थी। और इसी सड़क पर एक लम्बी-सी कार दौड़ती चली जा रही थी।
तभी अचानक वह कार एक जगह रुक गयी....और स्टीयरिंग के सामने बैठा हुआ आदमी बड़बड़ाने लगा। "क्या हो गया है....? भई!"
उसने उसे दोबारा स्टार्ट किया....इंजन जागा....एक छोटी-सी अंगड़ाई ली और फिर सो गया....!
कई बार स्टार्ट करने के बावजूद इंजन होश में न आया....
“यार, धक्का लगाना पड़ेगा।' उसने पीछे मुड़ कर कहा। मगर पिछली सीट से खराटे ही बुलन्द होते रहे....
उसने दोनों घुटने सीट पर टेक कर बैठते हुए, सोने वाले को बुरी तरह झिंझोड़ना शुरू कर दिया....
लेकिन खर्राटे बराबर जारी रहे। आख़िर जगाने वाला सोने वाले पर चढ़ ही बैठा।
“अरे....अरे....बचाओ....बचाओ!” अचानक सोने वाले ने गला फाड़ना शुरू कर दिया। लेकिन जगाने वाले ने किसी-न-किसी तरह खींच-खाँच कर उसे नीचे उतार ही लिया।
"हाँय! मैं कहाँ हूँ!" जागने वाला आँखें मल-मल कर चारों तरफ़ देखने लगा।
“इमरान के बच्चे, होश में आओ।" दूसरे ने कहा।
“बच्चे....ख़ुदा कसम एक भी नहीं हैं....अभी तो मुर्गी अण्डों ही पर बैठी हुई है....सुपर फ़ैयाज़....!"
“कार स्टार्ट नहीं हो रही है।'' कैप्टन फ़ैयाज़ ने कहा।
“जब चले थे तब तो शायद स्टार्ट हो गयी थी।"
"चलो, धक्का लगाओ।" इमरान ने उसके कन्धे पकड़े और धकेलता हुआ आगे बढ़ने लगा।
"यह क्या बेहूदगी है? मैं थप्पड़ मार दूंगा।' फ़ैयाज़ पलट कर उससे लिपट गया....
“हाय....हाय....अरे, मैं हूँ....मर्द हूँ....!"
“कार धक्का दिये बगैर स्टार्ट नहीं होगी।' फ़ैयाज़ गला फाड़ कर चीख़ा।
"तो ऐसा बोलो न....मैं समझा शायद....वाह यार....!"
फ़ैयाज़ स्टीयरिंग के सामने जा बैठा....और इमरान कार को आगे से पीछे की तरफ़ धकेलने लगा।
“अरे....अरे....!" फ़ैयाज़ फिर चीख़ा। “पीछे से!''
इमरान ने मुँह फेर कर अपनी कमर कार के अगले हिस्से से लगा दी और ज़ोर देने लगा।
“अरे खुदा ग़ारत करे....सुअर....गधे!” फ़ैयाज़ दाँत पीस कर रह गया।
“अब क्या हो गया....?'' इमरान झल्लायी हुई आवाज़ में बोला।