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नीले परिन्दे ( एक थ्रिलर उपन्यास )

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StoryPublisher

Guest
नीले परिन्दे

चौदहवीं की चाँदनी पहाड़ियों पर बिखरी हुई थी....सन्नाटे और चाँदनी की रोशनी में नहायी और पहाड़ों में चक्कर खाती हुई काली सड़क किसी बल खाये हुए साँप जैसी लग रही थी। और इसी सड़क पर एक लम्बी-सी कार दौड़ती चली जा रही थी।

तभी अचानक वह कार एक जगह रुक गयी....और स्टीयरिंग के सामने बैठा हुआ आदमी बड़बड़ाने लगा। "क्या हो गया है....? भई!"

उसने उसे दोबारा स्टार्ट किया....इंजन जागा....एक छोटी-सी अंगड़ाई ली और फिर सो गया....!

कई बार स्टार्ट करने के बावजूद इंजन होश में न आया....

“यार, धक्का लगाना पड़ेगा।' उसने पीछे मुड़ कर कहा। मगर पिछली सीट से खराटे ही बुलन्द होते रहे....

उसने दोनों घुटने सीट पर टेक कर बैठते हुए, सोने वाले को बुरी तरह झिंझोड़ना शुरू कर दिया....

लेकिन खर्राटे बराबर जारी रहे। आख़िर जगाने वाला सोने वाले पर चढ़ ही बैठा।

“अरे....अरे....बचाओ....बचाओ!” अचानक सोने वाले ने गला फाड़ना शुरू कर दिया। लेकिन जगाने वाले ने किसी-न-किसी तरह खींच-खाँच कर उसे नीचे उतार ही लिया।

"हाँय! मैं कहाँ हूँ!" जागने वाला आँखें मल-मल कर चारों तरफ़ देखने लगा।

“इमरान के बच्चे, होश में आओ।" दूसरे ने कहा।

“बच्चे....ख़ुदा कसम एक भी नहीं हैं....अभी तो मुर्गी अण्डों ही पर बैठी हुई है....सुपर फ़ैयाज़....!"

“कार स्टार्ट नहीं हो रही है।'' कैप्टन फ़ैयाज़ ने कहा।

“जब चले थे तब तो शायद स्टार्ट हो गयी थी।"

"चलो, धक्का लगाओ।" इमरान ने उसके कन्धे पकड़े और धकेलता हुआ आगे बढ़ने लगा।

"यह क्या बेहूदगी है? मैं थप्पड़ मार दूंगा।' फ़ैयाज़ पलट कर उससे लिपट गया....

“हाय....हाय....अरे, मैं हूँ....मर्द हूँ....!"

“कार धक्का दिये बगैर स्टार्ट नहीं होगी।' फ़ैयाज़ गला फाड़ कर चीख़ा।

"तो ऐसा बोलो न....मैं समझा शायद....वाह यार....!"

फ़ैयाज़ स्टीयरिंग के सामने जा बैठा....और इमरान कार को आगे से पीछे की तरफ़ धकेलने लगा।

“अरे....अरे....!" फ़ैयाज़ फिर चीख़ा। “पीछे से!''

इमरान ने मुँह फेर कर अपनी कमर कार के अगले हिस्से से लगा दी और ज़ोर देने लगा।

“अरे खुदा ग़ारत करे....सुअर....गधे!” फ़ैयाज़ दाँत पीस कर रह गया।

“अब क्या हो गया....?'' इमरान झल्लायी हुई आवाज़ में बोला।

 
फ़ैयाज़ नीचे उतर आया। कुछ पल खड़ा इमरान को घूरता रहा, फिर बेबसी से बोला।

"क्यों परेशान करते हो?"

“परेशान तुम करते हो या मैं!"

“अच्छा....तुम स्टीयरिंग सँभालो! मैं धक्का देता हूँ।'' फ़ैयाज़ ने कहा।

“अच्छा बाबा!” इमरान माथे पर हाथ मार कर बोला।

वह अगली सीट पर जा बैठा और कैप्टन फ़ैयाज़ कार को धकेल कर आगे की तरफ़ बढ़ाने लगा।

कार न सिर्फ स्टार्ट हुई, बल्कि फ़र्राटे भरती हुई आगे बढ़ गयी।

“अरे....अरे....रोको....रोको....!" फ़ैयाज़ चीख़ता हआ कार के पीछे दौड़ने लगा। लेकिन वह अगले मोड़ पर जा कर ग़ायब हो गयी। फ़ैयाज़ बराबर दौड़ता रहा....उसके पास इसके अलावा और कोई चारा भी नहीं था....वह दौड़ता रहा....यहाँ तक कि ताकत जवाब दे गयी....और वह एक चट्टान से टेक लगा कर हॉफने लगा। चढ़ाई पर दौड़ना आसान काम नहीं होता। वह एक पत्थर पर बैठ कर हाँफने लगा।

इस वक़्त इस हरकत पर वह इमरान की बोटियाँ भी उड़ा सकता था। लेकिन साँसों के साथ ही उसकी दिमागी हालत भी ठिकाने पर आती गयी।

इमरान पर गुस्सा आना कुदरती बात थी। लेकिन उसके साथ ही फ़ैयाज़ को इस बात का भी एहसास था कि आज उसने भी इमरान को काफी परेशान किया है।

आज शाम को वह इमरान को सैर के बहाने कार में बिठा कर किसी अनजान मंज़िल की तरफ़ ले उड़ा था। इमरान को बताये बगैर वह रूशी से उसका सामान पहले ही हासिल कर चुका था और वह सब कार की डिकी में लूंस दिया गया था।

वह जानता था कि इमरान आजकल काम के मूड में नहीं है, इसलिए यह हरकत करनी पड़ी और फिर जब यह टूर बढ़ता ही गया, तो फ़ैयाज़ को यह बताना पड़ा कि उसे सरदारगढ़ ले जा रहा है। इस पर इमरान एक लम्बी साँस खींच कर खामोश हो गया। उसने यह भी नहीं पूछा कि इस तरह सरदारगढ़ ले जाने का मतलब क्या है?....

फिर उसने कोई बात ही नहीं की थी। कुछ देर यूँ ही बैठा रहा। फिर पिछली सीट पर जा कर ख़र्राटे लेने शुरू कर दिये थे।

ज़ाहिर है कि ऐसी सूरत में फ़ैयाज़ का गुस्सा ज़्यादा ज़ोर न पकड़ सका होगा। वह उसी पत्थर पर घटनों में सिर दिये बैठा रहा। सिगरेटों का डिब्बा और कॉफ़ी का थर्मस गाड़ी ही में रह गया था, वरना वह इसी सुकुन-भरे माहौल का आन्नद लेने की कोशिश ज़रूर करता।

वैसे उसे इत्मीनान था कि इमरान का यह मज़ाक लम्बा नहीं होगा और वह जल्द ही वापस आयेगा और कोई ताज्जुब नहीं कि वह करीब ही कहीं हो।

 
__ फ़ैयाज़ घुटनों में सिर दिये इमरान ही के बारे में सोचता रहा। उसे उसकी बहुत-सी हरकतें याद आ रही थीं। ऐसी हरकतें जिन पर हँसी और गुस्सा साथ ही आते थे और दूसरों की समझ में नहीं आता था कि वे हँसते ही रहें या इमरान को मार बैठे।

बेवकूफ़ी उसकी फ़ितरत का दूसरा हिस्सा बन चुका था और वह किसी मौके पर भी उससे बाज़ नहीं आता था....वह उनके सामने भी बेवकूफ़ों जैसी हरकतें करता जो उसे बेवकूफ़ नहीं समझते थे। मिसाल के तौर पर खुद कैप्टन फ़ैयाज़ के लिए इमरान ने एक नहीं, दर्जनों केस निपटाये थे। काम उसने किये थे और नाम फ़ैयाज़ का हुआ था। ज़ाहिर है कि वह ऐसे आदमी को बेवकूफ़ नहीं समझ सकता था, लेकिन इसके बावजुद इमरान के बेवकूफ़ाना रवैये में कोई तब्दीली नहीं हुई थी।

लगभग पाँच मिनट बीत गये और फ़ैयाज़ उसी तरह बैठा रहा....लेकिन कब तक.... आख़िर उसे सोचना ही पड़ा कि कहीं सचमुच इमरान जुल न दे गया हो,

क्योंकि वह भी तो उसे गोली दे कर ही सरदारगढ़ ले जा रहा था।

फ़ैयाज़ उठा और दिल-ही-दिल में इमरान को गालियाँ देता हआ सड़क पर चलने लगा....लेकिन जैसे ही अगले मोड़ पर पहुँचा उसे सामने से कोई आता दिखाई दिया। चलने का अन्दाज़ इमरान का-सा ही था....फ़ैयाज़ की मुट्टियाँ बँध गयीं।

इमरान ने दूर ही से हाँक लगाई। “कप्तान साहब! वह फिर रुक गयी है....चलो, धक्का लगाओ....!"

फ़ैयाज़ की रफ़्तार तेज़ हो गयी। वह करीब-करीब दौड़ने लगा था। इमरान के करीब पहुँच कर उसका हाथ घूमा ज़रूर, लेकिन घूम कर ही रह गया, क्योंकि इमरान बड़ी फुर्ती से बैठ गया था। ___

"हाय....! क्या हो गया है तुम्हें?" इमरान ने उठ कर उसके दोनों हाथ पकड़े हुए कहा। “अभी तो अच्छे-भले थे...."

“मैं तुम्हें मार डालूँगा।” फ़ैयाज़ दाँत पीस कर बोला।

“अब यहाँ अकेले में जो चाहो कर लो....कोई देखने आता है!” इमरान ने शिकायती अन्दाज़ में कहा। "अगर वह साली स्टार्ट नहीं होती तो इसमें मेरा क्या कसूर है?"

"हाथ छोड़ो!" फ़ैयाज़ ने झटका दे कर कहा।

लेकिन इमरान की पकड़ मज़बूत थी। वह हाथ न छुड़ा सका।

“वादा करो कि मारोगे नहीं।” इमरान बड़ी सादगी से बोला।

“मुझे गुस्सा न दिलाओ।"

“अच्छा तो इसके अलावा जो कुछ कहो, दिला दूँ। टॉफ़ियाँ लोगे?"

फ़ैयाज़ का मूड ठीक होने में बहुत देर नहीं लगी....वह करता भी क्या; इमरान पर गुस्सा उतारना भी एक तरह से वक़्त की बर्बादी ही थी।

वैसे इस बार हक़ीक़त में कार को धक्का देने की ज़रूरत नहीं पेश आयी।

इमरान ने अपने कई मिनट उसके इंजन पर बेकार किये थे। वह ज़्यादा दूर नहीं गया था....करीब ही एक जगह कार रोक कर इंजन की मरम्मत करने लगा था। उसे उम्मीद थी कि फ़ैयाज़ बेतहाशा दौड़ता हुआ वहाँ तक पहुँच ही जायेगा, लेकिन जब कई मिनट बीत जाने के बावजूद फ़ैयाज़ न आया तो वह खुद ही उसकी तलाश में चल पड़ा।

 
इमरान ने अपने कई मिनट उसके इंजन पर बेकार किये थे। वह ज़्यादा दूर नहीं गया था....करीब ही एक जगह कार रोक कर इंजन की मरम्मत करने लगा था। उसे उम्मीद थी कि फ़ैयाज़ बेतहाशा दौड़ता हुआ वहाँ तक पहुँच ही जायेगा, लेकिन जब कई मिनट बीत जाने के बावजूद फ़ैयाज़ न आया तो वह खुद ही उसकी तलाश में चल पड़ा।

थोड़ी देर बाद वे फिर उसी चक्कर खाती हुई सड़क पर सफ़र कर रहे थे। लेकिन कार फ़ैयाज़ ही चला रहा था....और इमरान ने फिर पिछली सीट सँभाल ली थी।

फ़ैयाज़ बड़बड़ाने लगा।

“उस वक़्त तुम्हारी जगह अगर कोई और होता तो....!"

"चैन से घर पर पड़ा सो रहा होता।” इमरान ने जल्दी से जुमला पूरा कर दिया।

“बकवास मत करो।' फ़ैयाज़ ने कहा। “मामला पचास हज़ार पर तय हुआ है।''

"कैसा मामला?'

“सरदारगढ़ में तुम्हारा निकाह नहीं होगा।” फ़ैयाज़ ने कहा।

"हाय....फिर क्या....यूँ ही मुफ़्त में मेरा वक़्त बर्बाद कर रहे हो?"

“एक बहुत ही दिलचस्प केस है।"

“यार फ़ैयाज़! मैं तंग आ गया हूँ।"

"तुम्हारी ज़बान से पहली बार इस किस्म का जुमला सुन रहा हूँ।” फ़ैयाज़ ने हैरत ज़ाहिर की।

“सैकड़ों बार कह चुका हूँ कि लफ़्ज़ केस मेरे सामने न दोहराया करो। केस लाहौल विला कूवत। मैंने अक्सर दाइयों के बच्चा पैदा कराने को भी केस ही कहते सुना है।"

“सुनो इमरान....बोर न करो....ऐसा दिलचस्प....!"

"मैं कुछ नहीं सुनना चाहता। ख़त्म करो, मुझे नींद आ रही है।” इमरान ने अपने ऊपर कम्बल डालते हुए कहा।

“फ़िलहाल मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि उन लोगों के सामने कोई ऐसी हरकत न करना जिससे वे बुरा मान जायें....मामला ऐसा है कि वे सरकारी तौर पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकते....! अगर करना भी चाहें तो कम-से-कम मेरा डिपार्टमेंट उसे हँस कर ही टाल देगा।"

फ़ैयाज़ बड़बड़ाता रहा....और इमरान के खर्राटे कार में गूंजते रहे, इतनी जल्दी सो जाने का मतलब था कि इमरान कुछ सुनना नहीं चाहता था। खर्राटे इस बात की गवाही दे रहे थे।

 
Neele Pareende

‘Neele Pareende’ Mein Ibne Safi K

Kalam Se Jurm Ki Aur Uske Parda-Faash Ki Ek Aur Hairath-Angez Dastaan Pesh Hai.!

Chaudvi Ki Chaandni Pahadiyo Par

Bikhri Hui Thi…Sunnate Aur Chaandni Ki Roshni Mein Nahayi Aur Pahado Mein

Chakkar Hui Kaali Sadaq Kisi Bal Khaye Hue Saanp Jaisi Lag Rahi Thi Aur Isi

Sadaq Par Ek Lambi Si Car Daudti Chali

Jaa Rahi Thi

Tabhi Achanak Wo Car Ek Jagah Rukh

Gayi…Aur Steering K Saamne Baitha Hua

Aadmi Badh-Badhane Laga.! Kya Ho Gaya

Hai…? Bhai

Usne Dobara Start Kiya…Engine Jaaga…Ek Chothi Si Angdayi Li Aur Fir So Gaya…!

Kayi Baar Start Karne K Ba-Wajood

Engine Hosh Mein Na Aya…

‘Yaar’,Dhakka Lagana Padhega.! Usne

Piche Mudh Kar Kaha.! Magar Pichli

Seat Se Kharrate Hi Buland Hote Rahe…

Usne Dono Ghutne Seat Par Tek Kar

Baithte Hue Sone Wale Ko Buri Tarah

Jhinjhodna Shuru Kar Diya…

Lekin Kharrate Bara-Bar Jaari Rahe

Aakhir Jaagane Wala Sone Wale Par

Chadh Hi Baitha

Arey…Arey…Bachao…Bachao…Achanak Sone

Wale Ne Gala Faadhna Shuru Kar Diya Lekin Jaagane Wale Ne Kisi-Na-Kisi

Tarah Kheench-Khaanch Kar Use Niche

Utaar Hi Liya

Haaye.! Main Kaha Hu.! Jaagne Wala

Aankhe Mal-Mal Kar Chaaro Taraf Dekhne

Laga

Imran K Bachche,Hosh Mein Aao.! Dusre

Ne Kaha

Bachche…Khuda Qasam Ek Bhi Nahi Hai…Abhi Toh Murgi Ando Hi Par Baithi Hui Hai…Super Fayaz…!

Car Start Nahi Ho Rahi Hai.! Captain

Fayaz Ne Kaha

Jab Chale The Tab Toh Shayad Start Ho

Gayi Thi

Chalo, Dhakka Lagao

Imran Ne Uske Khaadhe Pakde Aur

Dhakelta Hua Aage Badhne Laga

Yeh Kya Be-Hoodhgi Hai.? Main Thappad

Maar Dunga.! Fayaz Palat Kar Usse

Lipat Gaya…

Haaye… Haaye… Arey… Main Hu… Mard Hu…!

Car Dhakka Diye Ba-Ghair Start Nahi

Hogi.! Fayaz Gala Faad Kar Cheekha

Toh Aisa Bolo Na… Main Samjha Shayad… Waah Yaar…!

Fayaz Steering K Saamne Jaa Baitha… Aur Imran Car Aage Se Piche Ki Taraf

Dhakelne Laga

Arey… Arey…! Fayaz Fir Cheekha.! Piche

Se

Imran Ne Muh Fer Kar Apni Kamar Car K

Agle Hisse Se Laga Di Aur Zor Dene

Laga

Arey Khuda Gharath Kare… Suar…Gadhe.!

Fayaz Daant Pees Kar Rahe Gaya

Ab Kya Ho Gaya…? Imran Jhunjhulayi Hui

Awaaz Mein Bola

Fayaz Niche Utar Aya Kuch Pal Khada

Imran Ko Ghoorta Raha, Fir Be-Basi Se

Bola

Kyun Pareshan Karte Ho.?

Pareshan Tum Karte Ho Main

Acha… Tum Steering Sambhalo Main

Dhakka Deta Hu.! Fayaz Ne Kaha

Acha Baba.! Imran Maathe Par Haath

Maar Kar Bola

Wo Agli Seat Par Jaa Baitha Aur

Captain Fayaz Car Ko Dhakel Kar Aage Ki Taraf Badhne Laga

Car Na Sirf Start Hui, Balki Farrate

Bharti Hui Aage Badh Gayi

Arey… Arey… Roko… Roko…! Fayaz

Cheekhta Hua Car K Piche Daudne Laga

Lekin Wo Agle Modh Par Jaa Kar Ghayab

Ho Gayi

Fayaz Bara-Bar Daud Raha… Uske Paas

Iske Alawa Aur Koi Chaara Bhi Nahi

Tha… Wo Daudta Raha… Yaha Tak Ki

Taaqath Jawaab De Gayi… Aur Wo Ek

Chattaan Se Tek Laga Kar Haanfne Laga

Chadhayi Par Daudna Aasaan Kaam Nahi

Hota Wo Patthar Baith Kar Haanfne Laga Iss Waqt Iss Harkat Par Wo Imran Ki

Botiya Udha Sakta Tha Lekin Saanso K

Saath Hi Uski Dimaaghi Halath Bhi

Thikaane Par Aati Gayi

Imran Par Ghussa Aana Khudrati Baat

Thi Lekin Uske Saath Hi Fayaz Ko Iss

Baat Ka Bhi Ehsaas Tha Ki Aaj Usne Bhi

Imran Ko Kaafi Pareshan Kiya Hai

Aaj Shaam Ko Wo Imran Ko Sair Ke

Bahane Car Baitha Kar Kisi Anjaan

Manzil Ki Taraf Le Udha Tha

Imran Ko Bataye Ba-Ghair Wo Rushi Se

Uska Saamaan Pahle Hi Haasil Kar Chuka

Tha aur Wo Sab Car Ki Dikki Mein Thoos Diya Gaya Tha

Wo Jaanta Tha Ki Imran Aaj-Kal Kaam Ke

Mood Mein Nahi Hai, Isliye Yeh Harkat

Karni padhi Aur Fir Jab Yeh Tour

Badhta Hi Gaya Toh Fayaz Ko Yeh Batana Hi Padha Ki Use Sadargarh Le Jaa Raha

Hai

Iss Par Imran Ne Ek Lambi Saans

Kheench Kar Khamosh Ho Gaya

Usne Yeh Bhi Nahi Pucha Ki Iss Tarah

Sadargarh Le Jane Ka Matalab Kya Hai…

Fir Usne Koi Baat Hi Nahi Ki Thi Kuch

Der Yun Hi Baitha Raha Fir Pichli Seat

Par Jaa Kar Kharrate Lene Shuru Kar

Diye The

Zaahir Hai Ki Aisi Surat Mein Fayaz Ka

Ghussa Zyada Zor Na Pakad Saka Hoga

Wo Usi Patthar Par Ghutno Mein Sar

Diye Baitha Raha Cigarette Ka Dibba

Aur Coffee Ka Thermos Gaadi Mein Rahe

Gaya Tha, Warna Wo Isi Sukun Bhare

Maahol Ka Anand Lene Ki Koshish Zaroor Karta

Waise Use Itminaan Tha Ki Imran Ka Yeh

Mazaaq Lamba Nahi Hoga Aur Wo Jald Hi

Wapas Ayega Aur Koi Taajjoob Nahi Ki

Wo Khareeb Hi Kahi Ho

Fayaz Ghutno Sar Diye Imran Hi Ke

Baare Mein Sonchta Raha

Use Uski Bohath Si Harkate Yaad Aa

Rahi Thi Aisi Harkate Jin Par Hasi Aur Ghussa Saath Hi Aate The Aur Dusro Ko Samajh Mein Nahi Aata Tha Ki Wo Haste

Hi Rahe Ya Imran Ko Maar Baithe

Bewaqoofi Uski Fithrath Ka Dusra Hissa

Bann Chuka Tha Aur Wo Kisi Mauqe Par

Bhi Usse Baaz Nahi Aata Tha…

Wo Unke Saamne Bhi Bewaqoofo Jaisi

Harkate Karta Jo Use Bewaqoof Nahi

Samajhte The

Misaal Ke Taur Par Khud Captain Fayaz

Ke Liye Imran Ne Ek Nahi, Darjano Case

Niptaye The Kaam Usne Kiye The Aur

Naam Fayaz Ka Hua Tha

Zaahir Hai Wo Aise Aadmi Ko Bewaqoof Nahi Samajh Sakta Tha, Lekin Iske BaWajood Imran Ke Bewaqoofana Rawwaiye

Mein Koi Tabdeeli Nahi Thi

Lag-Bhag 5 Minute Beeth Gaye Aur Fayaz

Usi Tarah Baitha Raha… Lekin Kab Tak

Aakhir Use Sonchna Hi Padha Ki Kahi

Sach-Much Imran Jhool Na De Gaya Ho, Kyun Ki Wo Bhi Toh Use Goli De Kar Hi

Sadargarh Le Jaa Raha Tha

Fayaz Utha Aur Dil-Hi-Dil Imran Ko

Gaaliya Deta Hua Sadaq Par Chalne

Laga…

Lekin Jaise Hi Agle Modh Pahuncha Use

Saamne Se Koi Aata Dikhayi Diya

Chalne Ka Andaaz Imran Ka Hi Sa Tha…

Fayaz Ne Muththiya Bandh Gayi

Imran Ne Dur Hi Se Haank Lagayi

‘Captain Sahab’ Wo Fir Rukh Gayi Hai…

Chalo Dhakka Lagao…

Fayaz Ki Raftaar Tez Ho Gayi Wo Khareeb-Khareeb Daudne Laga Tha

Imran K Khareeb Pahunch Kar Uska Haath

Ghooma Zaroor, Lekin Ghoom Kar Hi Rahe

Gaya, Kyun Ki Imrn Badi Foorti Se

Baith Gaya Tha

Haaye…! Kya Ho Gaya Hai Tumhe.? Imran

Ne Uth Kar Uske Dono Haath Pakadte Hue

Kaha.! ‘Abhi Toh Ache Bhale The…’

Main Tumhe Maar Daalunga.! Fayaz Daant

Pees Kar Bola

Ab Yaha Akele Mein Jo Chaho Kar Lo…

Koi Dekhne Aata Hai.! Imran Ne

Shikayathi Andaaz Mein Kaha.! “ Agar

Wo Saali Start Nahi Hoti Toh Isme Mera

Kya Qasoor Hai.?”

 
“Haath Chhodo”.! Fayaz Ne Jhatka De

Kar Kaha.! Lekin Imran Ki Pakad

Mazboot Thi Wo Haath Na Chhuda Saka

“Waada Karo Maaroge Nahi”.! Imran Ne

Badi Saadgi Se Bola

“Mujhe Ghussa Na Dilao”

Acha Toh Iske Alawa Jo Kuch Kaho, Dila Du.! “Toffiya Loge”.?

Fayaz Ka Mood Thik Hone Mein Bohath

Der Nahi Lagi… Wo Karta Bhi Kya: Imran

Par Ghussa Utaarna Bhi Ek Taraf Se

Waqt Ki Bar-Baadi Hi Thi

Waise Iss Baar Haqeeqat Mein Car Ko

Dhakka Dene Ki Zaroorath Nahi Pesh Ayi Imran Ne Apni Kayi Minute Uske Engine

Par Bekaar Kiye The.! Wo Zyada Dur

Nahi Gaya Tha… Khareeb Hi Ek Jagah Car

Rokh Kar Engine Ki Marramath Karne

Laga Tha.! Use Umeed Thi Ki Fayaz Be-

Tahasha Daudta Hua Waha Pahunch Hi

Jayega, Lekin Jab Kayi Minute Beeth

Jane K Ba-Wajood Fayaz Na Aya Toh Wo Khud Hi Uski Talaash Mein Chal Padha

Thodi De Wo Fir Usi Chakkar Khaati Hui

Sadaq Par Safar Kar Rahe The Lekin Car

Fayaz Chala Raha Tha… Aur Imran Ne Fir

Pichli Seat Sambhaal Li Thi

Fayaz Badh-Badhane Laga.! Uss Waqt

Tumhari Jagah Agar Koi Aur Hota Toh….!

Chain Se Ghar Padha So Raha Hota.!

Imran Ne Jaldi Se Jumla Pura Kar Diya

Bakwaas Mat Karo.! Fayaz Ne Kaha.!

Maamla Pachaas Hazaar Mein Taaye Hua

Hai

Kaisa Maamla.?

Sadargarh Mein Tumhara Nikaah Nahi

Hoga.! Fayaz Ne Kaha

Haaye… Fir Kya… Yun Hi Muft Mein Mera Waqt Bar-Baad Kar Rahe Ho.?

Ek Bohath Hi Dilchasp Case Hai

Yaar Fayaz.! Main Tang Aa Gaya Hu

Tumhari Zubaan Se Pahli Baar Iss Qism

Ka Jumla Sunn Raha Hu.! Fayaz Ne

Hairath Zaahir Ki

Saikdo Baar Kahe Chuka Hu Ki Lafz Case Mere Saamne Na Dohraya Karo.! Case

LAHOL WILA QUWWAT.! Maine Aksar Daiyon Ke Bachcha Paida Karane Ko Bhi Case Hi

Kahte Suna Hai

Suno Imran… Bore Na Karo… Aisa Dilchasp…!

Main Kuch Nahi Sunna Chahta.! Khatm

Karo, Mujhe Neend Aa Rahi Hai.! Imran

Ne Apne Upar Kambal Daalte Hue Kaha

Filhaal Main Yeh Kehna Chahta Hu Ki

Unn Logon K Saamne Koi Aisi Harkat Na Karna Jisse Wo Bura Maan Jaye… Maamla

Aisa Hai Ki Wo Sarkari Taur Par Koi

Karwaayi Nahi Kar Sakte… Agar Karna

Bhi Chahe Toh Kam-Se-Kam Mera

Department Use Hass Kar Hi Taal Dega

Fayaz Badh-Badhata Raha… Aur Imran K Kharrate Car Mein Goonjte Rahe, Itni

Jaldi So Jane Ka Matlab Tha Ki Imran

Kuch Sunna Nahi Chahta Tha.! Kharrate Iss Baat Ki Gawaahi De Rahe The

 
“फ़िलहाल मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि उन लोगों के सामने कोई ऐसी हरकत न करना जिससे वे बुरा मान जायें....मामला ऐसा है कि वे सरकारी तौर पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकते....! अगर करना भी चाहें तो कम-से-कम मेरा डिपार्टमेंट उसे हँस कर ही टाल देगा।"

फ़ैयाज़ बड़बड़ाता रहा....और इमरान के खर्राटे कार में गूंजते रहे, इतनी जल्दी सो जाने का मतलब था कि इमरान कुछ सुनना नहीं चाहता था। खर्राटे इस बात की गवाही दे रहे थे।

सरदारगढ पहाडी इलाका था। अब से पचास साल पहले यहाँ ख़ाक उडती रहती थी, लेकिन मिट्टी के तेल का भण्डार मिलने के बाद यहाँ अच्छा-खासा शहर बस गया था।

शुरू में यहाँ सिर्फ़ गरीब लोगों की आबादी थी। धीरे-धीरे यह आबादी फैलती गयी और फिर एक दिन सरदारगढ़ आधुनिक शहर बन गया। पहले सिर्फ़ मिट्टी के तेल के कुओं की वजह से उसकी अहमियत थी, लेकिन अब इसकी गिनती मशहूर हिल स्टेशनों में भी होने लगी थी....और यहाँ के नाइट क्लब दूर-दूर तक मशहूर थे....

कैप्टन फ़ैयाज़ ने कार एक क्लब के सामने रोक दी। टाउन हॉल के क्लॉक टावर ने अभी-अभी ग्यारह बजाये थे और यह नाइट क्लबों के जागने का वक्त था....मगर इमरान के खराटे शबाब पर थे....फ़ैयाज़ जानता था कि वह सो नहीं रहा है, खराटे बिलकुल बनावटी हैं, लेकिन वह उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता था। यह और बात है कि वह कार के करीब से गुज़रने वालों से आँखें मिलाते हुए शर्मा रहा था। वे कार के करीब से गुज़रते वक्त पल भर रुक कर ख़र्राटे सुनते और फिर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ जाते। ___

“ओ मर्दूद!'' फ़ैयाज़ झल्ला कर उसे झिंझोड़ने लगा।

पहले तो उस पर कोई असर नहीं हुआ। फिर अचानक बौखला कर उसने खुले हुए दरवाज़े से छलांग लगा दी, मगर इस बार चोट उसी को लगी। मक़सद शायद यह था कि सड़क पर गिरने की सूरत में फ़ैयाज़ नीचे होगा और वह खुद ऊपर....मगर फ़ैयाज़ बड़ी फुर्ती से एक तरफ़ हट गया और इमरान जो झोंक में था, औंधे मुँह सड़क पर चला आया....

अलबत्ता उसकी फुर्ती भी काबिले-तारीफ़ थी। शायद ही किसी ने उसे गिरते देखा हो....दूसरे पल में वह इतने सुकुन के साथ फ़ैयाज़ के कन्धे पर हाथ रखे खड़ा था जैसे कोई बात ही न हई हो।

हाँ, तो अब हम कहाँ हैं?'' इमरान ने ऐसे अन्दाज़ में पूछा जिसमें न तो शर्मिन्दगी थी और न बेइत्मीनान....फ़ैयाज़ पर हँसी का दौरा पड़ गया था।

इमरान आराम से खड़ा रहा।

आख़िर फ़ैयाज़ बोला, “कपड़े तो झाड़ लो...." और इमरान बड़ी होशियारी से फ़ैयाज़ के कपड़े झाड़ने लगा। “अब झेंप न मिटाओ।" फ़ैयाज़ फिर हँस पड़ा। “तुम हमेशा ऊट-पटाँग बातें किया करते हो।' इमरान बिगड़ गया।

"चलो-चलो!" फ़ैयाज़ उसे धकेल कर इमारत की तरफ़ बढ़ा। वे दोनों हॉल में दाख़िल हुए। अभी बहुत-सी मेजें ख़ाली थीं। फ़ैयाज़ ने चारों तरफ़ निगाह दौड़ा कर एक मेज़ चुन ली....और वे दोनों कुर्सियों पर जा बैठे।

एक वेटर ने करीब आ कर उन्हें सलाम किया।

“वालेकुम अस्सलाम!” इमरान ने उठ कर उससे हाथ मिलाते हुए कहा। “बच्चे खैरियत से तो हैं?”

"जज....जी....साहब....ही-ही-ही....!" वेटर बौखला कर हँसने लगा और फ़ैयाज़ ने इमरान के पैर में बड़ी बेदर्दी से चुटकी ली....इमरान ने “सी” करके वेटर का हाथ छोड़ दिया।

“खाने में जो कुछ भी हो, लाओ।” फ़ैयाज़ ने वेटर से कहा और वेटर चला गया।

जिन लोगों ने इमरान को वेटर से हाथ मिलाते देखा था, वे अब भी उन दोनों को घूर रहे थे। ___

फ़ैयाज़ को फिर उस पर ताव आ गया और गुस्से में बोला, “तुम्हारे साथ वही रह सकता है, जिसे अपनी इज़्ज़त का पास न हो।" ____

“आजकल फ्री पास और कन्सेशन बिलकुल बन्द हैं।” इमरान ने सिर हिला कर कहा और होंट सिकोड़ कर चारों तरफ़ देखने लगा।

"फ़ैयाज़! परवाह न करो।" इमरान ने थोड़ी देर बाद संजीदगी से कहा। “मैं जानता हूँ कि तुम मुझे यहाँ क्यों लाये हो। क्या मैं नहीं समझता कि ये पेरिसियन नाइट क्लब है?'

"मैं कब कहता हूँ कि तुम सरदारगढ़ पहली बार आये हो।" फ़ैयाज़ बोला। अचानक उसका मूड बदल गया था। हो सकता है कि ये इमरान की संजीदगी का असर रहा हो।

“मैं रोज़ बाकायदा तौर पर अख़बार पढ़ता हूँ।” इमरान ने कुछ सोचते हुए कहा।

"फिर!"

“आज से एक हफ़्ता पहले इसी हॉल में एक छोटा-सा नीला परिन्दा उड़ रहा था।” इमरान धीरे से बोला।

“ओ हो....! तो तुम समझ गये!" फ़ैयाज़ की आवाज़ में दबी हुई ख़ुशी थी।

“मगर तुम इससे यह न समझना कि मुझे किसी ऐसे परिन्दे के वजूद पर यकीन भी है।"
 
"तब फिर क्या बात हुई?" फ़ैयाज़ ने मायूसी से कहा।

“मतलब यह है कि अपने तौर पर पता लगाये बगैर मैं ऐसे किसी परिन्दे के वजूद पर यक़ीन नहीं कर सकता।"

“और तुम पता लगाये बगैर मानोगे नहीं।” फ़ैयाज़ ने चहक कर कहा।

“मुझे पागल कुत्ते ने नहीं काटा।” इमरान ने टाइट होते हुए कहा। "मुझे क्या पड़ी है कि बेकार में अपना वक़्त बर्बाद करूँ।"

“वह तो तुम्हें करना ही पड़ेगा।"

“ज़बर्दस्ती....?"

“तुम्हें करना पड़ेगा!"

“क्या करना पड़ेगा?' इमरान की खोपड़ी फिर आउट ऑफ़ ऑर्डर हो गयी।

"कुछ भी करना पड़ेगा।"

“अच्छा मैं करूँगा। मगर नहीं, वेटर खाना ला रहा है। मैं फ़िलहाल खाना खा कर एक कप चाय पियूँगा....इसलिए बकवास बन्द।”

खाने के दौरान सचमुच ख़ामोशी रही। शायद फ़ैयाज़ भी बहुत ज़्यादा भूखा था....खाने के बाद चाय के दौरान फिर वही बात शुरू हो गयी।

"जमील का बयान यही है। मैंने वही मेज़ चुनी है जिस पर उस दिन जमील था।"

"क्या?'' इमरान उछल कर खड़ा हो गया।

“यानी यही मेज़ जो हम इस्तेमाल कर रहे हैं।"

"हाँ यही। और ख़ुदा के लिए संजीदगी से सुनो। बैठ जाओ।"

“वाह रे, आपकी संजीदगी!'' इमरान चिढ़ कर हाथ नचाता हुआ बोला।

“साँप के फन पर बिठा दो मुझे। लानत भेजता हूँ ऐसी दोस्ती पर....!"

फ़ैयाज़ ने उसे खींच कर बिठा दिया और कहा, “तुम्हें यह काम करना ही पड़ेगा, चाहे कुछ हो। मैं उन लोगों से वादा कर चुका हूँ...."

“किन लोगों से?"

"जमील के ख़ानदान वालों से!''

“अच्छा तो शुरू हो जाओ....मैं सुन रहा हूँ।"

“जमील इसी मेज़ पर था।"

“फिर मूड ख़राब कर रहे हो मेरा।” इमरान डरी हुई आवाज़ में बोला।

“बार-बार यही जुमला दोहरा कर...."

“हुश्त....! दर्जनों आदमियों ने उस परिन्दे को हाल में चक्कर लगाते देखा था। वह कुछ पल हवा में चकराता रहा फिर अचानक जमील पर गिर पड़ा....और अपनी बारीक-सी चोंच उसकी गर्दन में उतार दी। जमील का बयान है कि उसे उसकी चोंच अपनी गर्दन से निकालने के लिए काफ़ी ताकत भी लगानी पड़ी थी। बहरहाल उसने उसे खींच कर खिड़की से बाहर फेंक दिया था। दूर बैठे हुए लोग उसका मज़ाक उड़ाने के लिए हँसने लगे। उनके साथ वह भी हँसता रहा। लेकिन वह ज़्यादा देर तक यहाँ नहीं बैठ सका, क्योंकि उसे ऐसा लग रहा था जैसे गर्दन में बिच्छ ने डंक मार दिया हो....लेकिन फिर यह तकलीफ़ एक घण्टे से ज़्यादा न रही। रात भी वह सुकुन से सोया और जब दूसरी सुबह जागा तो अपने सारे जिस्म पर बड़े-बड़े धब्बे पाये....ख़ास तौर पर चेहरा बिलकुल ही ख़राब हो गया था....अब अगर तुम उसे देखो तो पहली नज़र में वह सफ़ेद दाग़ का कोई बहुत पुराना मरीज़ मालूम होगा...."

“कहने का मकसद ये है कि वह दाग़ उसी परिन्दे के हमले का नतीजा है।" इमरान बोला।

"यक़ीनन।” “क्या डॉक्टरों की राय यही है।"

"डॉक्टर उसे सफ़ेद दाग़ मानने से हिचकिचा रहे हैं....जमील का खून टेस्ट किया गया है और उसी की बिना पर डॉक्टर कोई साफ़ राय देते हुए भी हिचकिचा रहे हैं।"

"खून के बारे में रिपोर्ट क्या है?"
 
"ख़न में बिलकुल नयी किस्म के वाइरस पाये गये हैं जो डॉक्टरों के लिए बिलकुल नये हैं।"

"ओह! अच्छा! रिपोर्ट की एक कॉपी तो मिल ही जायेगी....!"

“ज़रूर मिल जायेगी।'' फ़ैयाज़ ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा।

“मगर उसके ख़ानदान वाले डिपार्टमेंट ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन से क्यों मदद चाहते हैं। इस बीमारी का सुराग़ तो डॉक्टर ही पा सकेंगे।"

“हालात कुछ इसी किस्म के हैं।” फ़ैयाज़ सिर हिला कर बोला।

“अगर वाकई यह कोई बीमारी है तो उस परिन्दे ने जमील ही को क्यों चुना था जब कि पूरा हॉल भरा हुआ था।"

“यह दलील बेतुकी है।"

“पूरी बात भी तो सुनो।"

“अगर अचानक उस दिन वह इस बीमारी में न फँस गया होता तो उसकी मँगनी तीसरे ही दिन एक बहुत ऊँचे ख़ानदान में हो जाती।"

“आच....छा....! हूँ!"

“अब तुम खुद सोचो।''

“सोच रहा हूँ!” इमरान ने लापरवाही से जवाब दिया। फिर कुछ देर बाद बोला। “गर्दन के ज़ख्म के बारे में डॉक्टर क्या कहते हैं।"

“कैसा ज़ख़्म? दूसरी सुबह उस जगह सिर्फ एक निशान दिख रहा था जैसे गर्दन में पिछले दिन इंजेक्शन दिया गया हो और अब तो शायद ख़ुद जमील भी यह न बता सके कि परिन्दे ने किस जगह चोंच लगायी थी।"

"खूब....!” इमरान तिरछी नज़रों से एक तरफ़ देखता हुआ बड़बड़ाया। कुछ देर तक ख़ामोशी रही फिर इमरान ने पूछा।

“अच्छा सुपर फ़ैयाज़! तुम मुझसे क्या चाहते हो?"

"यह कि तुम इस सिलसिले में जमील के ख़ानदान वालों की मदद करो।"

“लेकिन इससे क्या फ़ायदा होगा। जमील की मँगनी तो होने से रही। तुम मुझे उन लोगों का पता बताओ जिनके यहाँ जमील की मँगनी होने वाली थी।"

“उससे क्या होगा?"

"मेरी मँगनी होगी। क्या तुम यह चाहते हो कि मैं शादी के बगैर ही मर जाऊँ?''

“मैं नहीं समझा।"

“तुम मँगनी और शादी नहीं समझते! उल्लू कहीं के! हाँ!"

"इमरान काम की बात करो....!''

"फ़ैयाज़ साहब....! पता....!''

“अच्छा तो क्या तुम यह समझते हो कि यह उन्हीं लोगों की हरकत है?"

“अगर उनका ताल्लक परिन्दों की किसी नस्ल से है तो यक़ीनन उन्हीं की होगी और मुझे बहुत ही ख़ुशी होगी अगर मैं किसी बहेलिए का दामाद बन जाऊँ।"

"तुम फिर बहकने लगे।"

“फ़ैयाज़....डियर....पता....!

" फ़ैयाज़ कुछ पल कुछ सोचता रहा फिर बोला। "वह यहाँ का एक बहुत बड़ा ख़ानदान है....नवाब जावेद मिर्जा का ख़ानदान....परवीन....जावेद मिर्जा ही की इकलौती लड़की है और जावेद मिर्जा बेपनाह दौलत का मालिक है।"

“आहा....” इमरान अपनी राने पीटता हुआ बोला। “तब तो अपनी चाँदी है।"

“बकवास बन्द नहीं करोगे।"

“अच्छा! खैर हटाओ!'' इमरान ने कुछ सोचते हुए कहा।

"जमील किस हैसियत का आदमी है?” ___

“ज़ाहिर है कि वह भी दौलतमन्द ही होगा, वरना जावेद मिर्जा के यहाँ रिश्ता कैसे होता....और अब तो जमील की दौलत में ज़्यादा इज़ाफ़ा हो जायेगा, क्योंकि अभी हाल ही में उसकी एक पुश्तैनी ज़मीन में तेल का बहुत बड़ा ज़ख़ीरा मिला है।"

“क्या जमील उस ज़मीन का अकेला मालिक है?"

“सौ फ़ीसदी! ख़ानदान के दूसरे लोग हक़ीक़त में उसकी पकड़ में हैं या दूसरे अलफ़ाज़ में उसके नौकर समझ लो। तीन चचा, दो मामा....चचेरे भाई कई अदद....!"

“और चचेरी बहनें?"

"बहुत सारी....!"

“उनमें से कोई ऐसी भी है जिसकी उम्र शादी के काबिल हो?"

“मेरा ख़याल है कि ख़ानदान में ऐसी तीन लड़कियाँ हैं।"

"जमील के कारोबार की तफ़सील?...."

"तफ़सील के लिए और पूछताछ करनी पड़ेगी। वैसे यहाँ उसके दो बड़े कारखाने हैं। एक ऐसा है जिसमें मिट्टी के तेल के बैरल ढाले जाते हैं। दूसरे में मिट्टी के तेल की सफ़ाई होती है।"

“तो कहिए वह भी काफ़ी मालदार है।" इमरान सिर हिला कर बोला।

“लेकिन क्या ख़ुद जमील ही ने तुम से बातचीत की थी?"

“नहीं! उसने तो लोगों से मिलना-जुलना ही बन्द कर दिया है। अब वह घर से बाहर ही नहीं निकलता है।"

"तो क्या मैं उसे न देख सकूँगा?''

“कोशिश यही की जायेगी कि तुम उसे देख सको....वैसे वह मेरे सामने भी नहीं आया था।"

"तुमने यह नहीं बताया कि यह केस तुमको किससे मिला?"

“उसके चचा....सज्जाद से....उससे मेरी पुरानी जान-पहचान है।"

“अब हम कहाँ चलेंगे?''

"मेरा ख़याल है कि मैं तुम्हें जमील की कोठी में पहुँचा दूं। लेकिन खुदा के लिए बहुत ज़्यादा बोरियत न फैलाना....तुम्हें अपनी इज़्ज़त का भी ख़याल नहीं होता।"

“मेरी फ़िक्र तो तुम किया ही न करो। मेरी इज़्ज़त ज़रा वॉटर प्रूफ़ किस्म की है।"

“मैं नहीं चाहता कि लोग मुझे उल्लू समझें।"

"हालाँकि तुमसे बड़ा उल्ल आज तक मेरी नज़रों से नहीं गुज़रा।" इमरान ने संजीदगी से कहा।

"लाओ, एक सिगरेट मझे भी दो। मैं भी अब बाकायदा तौर पर सिगरेट शुरू कर दूँगा। कल ही एक बुजुर्ग फ़रमा रहे थे कि जिन पैसों का घी-दूध खाते हो, अगर उन्हीं के सिगरेट पियो तो क्या हरज है।"

“अच्छा, अब बकवास बन्द करो।" फ़ैयाज़ उसकी तरफ़ सिगरेट केस बढाता हुआ बोला....और इमरान ने सिगरेट केस ले कर अपनी जेब में रख लिया....वे दोनों कुर्सियों से उठ गये।

"क्या मतलब....?” फ़ैयाज़ ने कहा।

"तुम्हारे पास काफ़ी सिगरेट हैं। अब मैं आज तो सिगरेट ख़रीदने से रहा....
 
" फ़ैयाज़ होंटों-ही-होंटों में कुछ बड़बड़ा कर ख़ामोश हो गया।

.

.

जमील की कोठी बड़ी शानदार थी और उसका फैलाव बहुत ज़्यादा था। शायद हो सकता है कि उसकी बनावट इस अन्दाज़ में की गयी हो कि पूरा ख़ानदान उसमें रह सके। लगभग पच्चीस कमरे ज़रूर रहे होंगे।

फ़ैयाज़ इमरान को पिछली रात ही यहाँ पहुँचा गया था और फिर फ़ैयाज़ वहाँ इतनी ही देर ठहरा था जितनी देर में उसने सज्जाद और उसके दुसरे भाइयों से इमरान का परिचय कराया था। इमरान ने बाकी रात सुकुन से गुज़ारी यानी सुबह तक इत्मीनान से सोता रहा।

दिन के उजाले में लोगों ने इमरान के बारे में कोई अच्छी राय नहीं कायम की, क्योंकि वह सूरत ही से एक नम्बर का बेवकूफ़ लगता था।

चाय उसने अपने कमरे में अकेले पी....और फिर बाहर निकल कर एक-एक से “अमजाद साहब" के बारे में पूछने लगा। लेकिन सबने इस नाम को पहली बार सुना था। कोई अमजाद साहब के बारे में उसे न बता सका। आख़िर सज्जाद आ टकराया। इमरान ने उससे भी “अमजाद साहब' के बारे में पूछा।

“यहाँ तो कोई भी अमजाद नहीं है।' सज्जाद ने कहा....

वह एक अधेड़ उम्र आदमी था। और उसके चेहरे पर सबसे ज़्यादा बड़ी चीज़ उसकी नाक थी।

"तब फिर शायद मैं ग़लत जगह पर हूँ।'' इमरान ने मायूसी से कहा। “कैप्टन फ़ैयाज़ ने कहा था कि अमजाद साहब मेरे पुराने साथी हैं और उनके भतीजे....!''

“अमजाद नहीं सज्जाद,' सज्जाद ने कहा। “मैं ही सज्जाद हूँ।"

"नहीं साहब मुझे अच्छी तरह याद है। अमजाद....अगर आप सज्जाद कहते हैं तो फिर यही सही होगा। आपके भतीजे साहब....मैं उनसे मिलना चाहता हूँ।''

“बहुत मुश्किल है जनाब!' सज्जाद बोला। “वह कमरे से बाहर निकलता ही नहीं....हम सब खुशामद करते-करते थक गये!"

“मुझे वह कमरा ही दिखा दीजिए।"

“आइए....फिर कोशिश करें। हो सकता है कि....मगर मुझे उम्मीद नहीं।"

गलियारों से गुज़रने के बाद वे एक कमरे के सामने रुक गये इमरान ने दरवाज़े को धक्का दिया, लेकिन वह अन्दर से बन्द था।

सज्जाद ने आवाज़ दी, लेकिन अन्दर कोई सिर्फ खाँस कर रह गया....इतने में इमरान ने जेब से सिगरेट केस निकाल कर एक सिगरेट सज्जाद को पेश किया और दूसरा ख़ुद सुलग लिया....सज्जाद ने सिगरेट सुलगा कर फिर दरवाज़े पर दस्तक दी।

"खुदा के लिए मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो!” अन्दर से एक भर्रायी हुई आवाज़ आयी। ____

“जमील बेटे! दरवाज़ा खोल दो। बाहर आओ....देखो, मैंने एक नया इन्तज़ाम किया है। हमारे दुश्मनों की गर्दनें नाली में रगड़ दी जायेंगी।"

“चचा जान मैं कुछ नहीं चाहता....मैं कुछ नहीं चाहता।"

"हम तो चाहते हैं!"

“बेकार है....इस कमरे से मेरी लाश ही निकलेगी....!”

“देखा आपने!' सज्जाद ने धीरे से इमरान से कहा और इमरान सिर्फ़ सिर हिला कर रह गया।

फिर सज्जाद ख़ामोश हो कर कुछ सोचने लगा। साथ ही वह सिगरेट के लम्बे लम्बे कश ले रहा था। अचानक उसके चेहरे के करीब एक धमाका हुआ और सिगरेट की धज्जियाँ उड़ गयीं।

"अरे, क्या हुआ!” सज्जाद चीख़ मार कर जमीन पर ढेर हो गया।

“क्या हआ।" अन्दर से कोई चीख़ा। फिर दौड़ने की आवाज़ आयी और दरवाजा झटके के साथ खुल गया। दूसरे पल में इमरान के सामने एक लम्बा-चौड़ा नौजवान खड़ा था जिसके चेहरे पर बड़े-बड़े सफ़ेद धब्बे थे।

उसने झपट कर सज्जाद को ज़मीन से उठाया और सज्जाद इमरान की तरफ़ देख कर दहाड़ा।

“यह क्या....बेहूदगी थी?''

“अरे....खु....खुद....खुदा की कसम....!” इमरान हकलाने लगा।

"यह क्या हुआ....” जमील ने सज्जाद को झिंझोड़ कर कहा।

"यह क्या था।"

"कुछ नहीं,” सज्जाद इमरान को गुस्से से घूरता हुआ हाँफ रहा था।

“आप कौन हैं?" जमील इमरान की तरफ़ मुड़ा, लेकिन फिर दूसरे ही पल में दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपा कर कमरे में चला गया। दरवाज़ा फिर बन्द हो चुका था।

"मुझे बताइए कि इस बेहूदगी का क्या मतलब था?" सज्जाद इमरान के चेहरे के करीब हाथ हिला कर चीख़ा। घर के कई दूसरे लोग भी वहाँ पहुँच गये थे। __

“देखिए! कहता हूँ!” इमरान घबरायी हुए आवाज़ में बोला। “यह कैप्टन फ़ैयाज़ की हरकत है। उसने मेरे सिगरेट केस से अपना सिगरेट केस बदल लिया है, देखिए....सिगरेट केस पर उसका नाम भी मौजूद है।"

“इमरान ने सिगरेट केस उसे पकड़ा दिया।"

“यह सिगरेट दरअसल मेरे लिए था।' इमरान फिर बोला। “मुझे बहुत अफ़सोस है। लाहौल विला कूवत। आप जले तो नहीं।" ।

वह आगे झुक कर उसके चेहरे का जायजा लेने लगा।

“अगर यह मज़ाक़ था तो मैं ऐसे मज़ाक पर लानत भेजता हूँ।" सज्जाद नाखुश होते हुए बोला। “मैं नहीं जानता था कि फ़ैयाज़ अभी तक बचपने ही के दायरे में है।"

“मैं फ़ैयाज़ से सुलट लूँगा।” इमरान अपनी मुट्टियाँ बन्द करके बोला।

दूसरे लोग सज्जाद से धमाके के बारे में पूछने लगे और सज्जाद ने सिगरेट फटने की बात दोहराते हुए कहा। “इस तरह अचानक हार्ट-फेल भी हो सकता है। फ़ैयाज़ को ऐसा मज़ाक़ नहीं करना चाहिए था। उसने उसके सिगरेट केस से अपना सिगरेट बदल लिया है। अब सोचता हूँ, कहीं फ़ैयाज़ ने मुझसे भी तो मज़ाक़ नहीं किया है।"

“ज़रूर किया होगा।' इमरान बेवकूफ़ी के अन्दाज़ में पलकें झपकाता हुआ बोला।

“आपका ओहदा क्या है?” सज्जाद ने उससे पूछा। __

“शोहदा....मेरा कोई शोहदा नहीं है। लाहौल विला कुवत....क्या आप मुझे लफंगा समझते हैं। लफंगा होगा वही साला फ़ैयाज़। एक बार फिर लाहौल विला कूवत।"

“आप ऊँचा भी सुनते हैं!” सज्जाद उसे घूरने लगा।

“मैं ऊँचा-नीचा सब कुछ सुन सकता हूँ!” इमरान बुरा-सा मुँह बना कर बोला और सिगरेट केस से दूसरा सिगरेट निकालने लगा....फिर इस तरह चौंका जैसे धमाके वाली बात भूल ही गया हो उसने झल्लाहट के साथ सारे सिगरेट तोड़ कर फेंक दिये और सिगरेट केस को ज़मीन पर रख कर पहले तो उस पर घुसे बरसाता रहा....फिर खड़ा हो कर जूतों से रौंदने लगा। नतीजा यह हुआ कि सिगरेट केस की शक्ल ही बिगड़ गयी।
 
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