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Guest
Horror चामुंडी
घर के मुख्य दरवाज़े पर ‘ठक ठक ठक ठक’ की आवाज़ हुई ... और इसी के साथ आवाज़ आया....
“हाँ..... मैडम जी.... दूध ले लीजिए...!!”
अभी ये आवाज़ ठीक से ख़त्म हुई भी नहीं कि घर के ऊपर तल्ले से एक जनानी की खनकती सी आवाज़ गूँज उठी,
“गुड्डू... ए गुड्डू... देख बेटा ... दूधवाला आया है.. जा के दूध ले ले ज़रा...”
लेकिन गुड्डू की ओर से कोई आवाज़ नहीं आया...
जब और दो तीन बार आवाज़ देने के बाद भी गुड्डू ने कोई उत्तर नहीं दिया तब उसी जनानी की आवाज़ गूँजी... झुँझलाहट भरी,
“ओफ्फ़.. इस लड़के को तो सिर्फ़ खाना और सोना है... और सोना भी ऐसा कि चिल्लाते रह जाओ .... या फ़िर, बगल से रेलगाड़ी ही क्यों न गुज़रे... मजाल इसके कानों में जूँ तक भी रेंग जाए.... |”
इसके एक मिनट बाद ही कमरे से वही खनकती आवाज़ की मालकिन निकली...
सुचित्रा...
सुचित्रा चटर्जी नाम है इनका...
गौर और गेहूँअन के बीच की वर्ण की है ... सुंदर गोल मुख... भरा बदन ... धनुषाकार भौहें और उतने ही सुंदर बड़ी आँखें ... दोनों हाथों में पाँच पाँच लाल रंग की मोटी चूड़ियाँ जिन पर सोने की अति सुंदर नक्काशी की हुई हैं ... |
सीढ़ियों पर से जल्दी उतरती हुई नीचे सीधे रसोई घर में घुसी और एक बड़ा सा बर्तन लेकर तेज़ कदमों से चलते हुए घर के मुख्य दरवाज़े की ओर बढ़ी...
दरवाज़ा खोली...
और,
बर्तन आगे बढ़ाते हुए बोली,
“लीजिए भैया... जल्दी भर दीजिए... मुझे देर हो रही है.”
दूध वाला बर्तन लेने के लिए हाथ बढ़ाते हुए एक नज़र सुचित्रा की ओर डालता है ... और ऐसा करते ही उसके हाथ और आँखें दोनों जम जाती हैं..
सुचित्रा एक तो है ही रूपवती ... और उसपे भी इस समय दूधवाले के सामने ब्लाउज और पेटीकोट में खड़ी है.उन्नत उभारों के कारण ब्लाउज में बने सुंदर उठाव ध्यान उसका खींच ही रहे हैं... गोपाल ने सुचित्रा को देखा तो है कई बार... पर कभी इस तरह... ऐसे कपड़ों में नहीं देखा.
गोपाल को यूँ अपनी ओर अपलक आश्चर्य और एक अव्यक्त आनंद से देखता हुआ देखी तो सुचित्रा का भी ध्यान अपनी ओर गया .... और खुद की अवस्था का बोध जैसे ही हुआ; तो हड़बड़ी के कारण हुई अपनी इस नादान गलती से वह बुरी तरह अफ़सोस करते हुए लगभग उछल पड़ी..खुद को जल्दी से दरवाज़े के पीछे करती हुई आँखें बड़ी बड़ी करके बोली,
“ए चल... जल्दी कर... कहा न मुझे देर हो रही है.”
गोपाल मुस्कराया... बर्तन लिया और दूध भर कर वापस सुचित्रा की ओर बढ़ाया.. पर जानबूझ कर इतनी दूरी रखा कि सुचित्रा को बर्तन लेने के लिए हाथ तनिक और बढ़ाना पड़े ... अब चाहे इस क्रम में उसे थोड़ा झुक कर आगे बढ़ना पड़े या फ़िर कुछ और करना पड़े.
गोपाल की इस करतूत को सुचित्रा समझ नहीं पाई. एक तो उसे देर हो रही थी और दूजे, जल्दबाजी में ऐसे अर्धनग्न अवस्था में एक पराए लड़के के सामने खड़े रहते हुए शर्म से ज़मीन में गड़ी जा रही थी.
गोपाल को ठीक से हाथ आगे न बढ़ा कर देते हुए देख कर सुचित्रा झुँझलाते हुए अपना बायाँ हाथ आगे बढ़ाई.. पर बर्तन अभी भी कुछ इंच दूर है.. वो गोपाल को कुछ बोले उससे पहले ही गोपाल बोल पड़ा,
“जल्दी कीजिए मालकिन... मेरे को अभी दस जगह और जाना है.”
जो बात वो गोपाल को फ़िर से बोलना चाह रही थी; वही बात गोपाल ने उसे कह दी..
कुछ और सोच समझ न पाई वो..
दरवाज़े के पीछे से थोड़ा आगे आई... एक कदम आगे बढ़ाई, थोड़ा सामने की ओर झुकी और हाथ बढ़ाकर बर्तन पकड़ ली.
पर तुरंत ही बर्तन को ले न सकी क्योंकि गोपाल ने छोड़ा ही नहीं... वो फ़िर से आँखें बड़ी कर घोर अविश्वास से सुचित्रा की ओर देखने लगा था. सुचित्रा की स्त्री सुलभ प्रवृति ने तुरंत ही ताड़ लिया कि गोपाल क्या देख रहा है.
गोपाल को डाँटने के लिए मुँह खोली... पर एकदम से कुछ बोल न पाई.
उसका कामातुर स्त्री - मन इस दृश्य का ... एक मौन प्रशंसा का आनंद लेने के लिए व्याकुल हो उठा.
जवानी में तो बहुत देखे और सुने हैं... पर अब उम्र के इस पड़ाव पर उसकी देहयष्टि किसी पर क्या प्रभाव डाल सकते हैं और कोई प्रभाव डाल भी सकते हैं या नहीं इसी बात को जानने की एक उत्कंठा घर कर गई उसके मन में.
घर के मुख्य दरवाज़े पर ‘ठक ठक ठक ठक’ की आवाज़ हुई ... और इसी के साथ आवाज़ आया....
“हाँ..... मैडम जी.... दूध ले लीजिए...!!”
अभी ये आवाज़ ठीक से ख़त्म हुई भी नहीं कि घर के ऊपर तल्ले से एक जनानी की खनकती सी आवाज़ गूँज उठी,
“गुड्डू... ए गुड्डू... देख बेटा ... दूधवाला आया है.. जा के दूध ले ले ज़रा...”
लेकिन गुड्डू की ओर से कोई आवाज़ नहीं आया...
जब और दो तीन बार आवाज़ देने के बाद भी गुड्डू ने कोई उत्तर नहीं दिया तब उसी जनानी की आवाज़ गूँजी... झुँझलाहट भरी,
“ओफ्फ़.. इस लड़के को तो सिर्फ़ खाना और सोना है... और सोना भी ऐसा कि चिल्लाते रह जाओ .... या फ़िर, बगल से रेलगाड़ी ही क्यों न गुज़रे... मजाल इसके कानों में जूँ तक भी रेंग जाए.... |”
इसके एक मिनट बाद ही कमरे से वही खनकती आवाज़ की मालकिन निकली...
सुचित्रा...
सुचित्रा चटर्जी नाम है इनका...
गौर और गेहूँअन के बीच की वर्ण की है ... सुंदर गोल मुख... भरा बदन ... धनुषाकार भौहें और उतने ही सुंदर बड़ी आँखें ... दोनों हाथों में पाँच पाँच लाल रंग की मोटी चूड़ियाँ जिन पर सोने की अति सुंदर नक्काशी की हुई हैं ... |
सीढ़ियों पर से जल्दी उतरती हुई नीचे सीधे रसोई घर में घुसी और एक बड़ा सा बर्तन लेकर तेज़ कदमों से चलते हुए घर के मुख्य दरवाज़े की ओर बढ़ी...
दरवाज़ा खोली...
और,
बर्तन आगे बढ़ाते हुए बोली,
“लीजिए भैया... जल्दी भर दीजिए... मुझे देर हो रही है.”
दूध वाला बर्तन लेने के लिए हाथ बढ़ाते हुए एक नज़र सुचित्रा की ओर डालता है ... और ऐसा करते ही उसके हाथ और आँखें दोनों जम जाती हैं..
सुचित्रा एक तो है ही रूपवती ... और उसपे भी इस समय दूधवाले के सामने ब्लाउज और पेटीकोट में खड़ी है.उन्नत उभारों के कारण ब्लाउज में बने सुंदर उठाव ध्यान उसका खींच ही रहे हैं... गोपाल ने सुचित्रा को देखा तो है कई बार... पर कभी इस तरह... ऐसे कपड़ों में नहीं देखा.
गोपाल को यूँ अपनी ओर अपलक आश्चर्य और एक अव्यक्त आनंद से देखता हुआ देखी तो सुचित्रा का भी ध्यान अपनी ओर गया .... और खुद की अवस्था का बोध जैसे ही हुआ; तो हड़बड़ी के कारण हुई अपनी इस नादान गलती से वह बुरी तरह अफ़सोस करते हुए लगभग उछल पड़ी..खुद को जल्दी से दरवाज़े के पीछे करती हुई आँखें बड़ी बड़ी करके बोली,
“ए चल... जल्दी कर... कहा न मुझे देर हो रही है.”
गोपाल मुस्कराया... बर्तन लिया और दूध भर कर वापस सुचित्रा की ओर बढ़ाया.. पर जानबूझ कर इतनी दूरी रखा कि सुचित्रा को बर्तन लेने के लिए हाथ तनिक और बढ़ाना पड़े ... अब चाहे इस क्रम में उसे थोड़ा झुक कर आगे बढ़ना पड़े या फ़िर कुछ और करना पड़े.
गोपाल की इस करतूत को सुचित्रा समझ नहीं पाई. एक तो उसे देर हो रही थी और दूजे, जल्दबाजी में ऐसे अर्धनग्न अवस्था में एक पराए लड़के के सामने खड़े रहते हुए शर्म से ज़मीन में गड़ी जा रही थी.
गोपाल को ठीक से हाथ आगे न बढ़ा कर देते हुए देख कर सुचित्रा झुँझलाते हुए अपना बायाँ हाथ आगे बढ़ाई.. पर बर्तन अभी भी कुछ इंच दूर है.. वो गोपाल को कुछ बोले उससे पहले ही गोपाल बोल पड़ा,
“जल्दी कीजिए मालकिन... मेरे को अभी दस जगह और जाना है.”
जो बात वो गोपाल को फ़िर से बोलना चाह रही थी; वही बात गोपाल ने उसे कह दी..
कुछ और सोच समझ न पाई वो..
दरवाज़े के पीछे से थोड़ा आगे आई... एक कदम आगे बढ़ाई, थोड़ा सामने की ओर झुकी और हाथ बढ़ाकर बर्तन पकड़ ली.
पर तुरंत ही बर्तन को ले न सकी क्योंकि गोपाल ने छोड़ा ही नहीं... वो फ़िर से आँखें बड़ी कर घोर अविश्वास से सुचित्रा की ओर देखने लगा था. सुचित्रा की स्त्री सुलभ प्रवृति ने तुरंत ही ताड़ लिया कि गोपाल क्या देख रहा है.
गोपाल को डाँटने के लिए मुँह खोली... पर एकदम से कुछ बोल न पाई.
उसका कामातुर स्त्री - मन इस दृश्य का ... एक मौन प्रशंसा का आनंद लेने के लिए व्याकुल हो उठा.
जवानी में तो बहुत देखे और सुने हैं... पर अब उम्र के इस पड़ाव पर उसकी देहयष्टि किसी पर क्या प्रभाव डाल सकते हैं और कोई प्रभाव डाल भी सकते हैं या नहीं इसी बात को जानने की एक उत्कंठा घर कर गई उसके मन में.