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मोहन राकेश संचयन
अंधेरे बंद कमरे [भाग-1]
नौ साल में चेहरे काफी बदल जाते हैं; और कोई-कोई चेहरा तो इतना बदल जाता है कि पहले के चेहरे के साथ उसकी कोई समानता ही नहीं रहती।
मैं नौ साल के बाद दिल्ली आया, तो मुझे महसूस हुआ जैसे मेरे लिए यह एक बिल्कुल नया और अपरिचित शहर हो। जिन लोगों के साथ कभी मेरा रोज़ का उठना-बैठना था, उनमें से कई-एक तो अब बिल्कुल ही नहीं पहचाने जाते थे; उनके नयन-नक्श वही थे, मगर उनके चेहरे के आसपास की हवा बिल्कुल और हो गयी थी। हम लोग कभी आमने-सामने पड़ जाते, तो हल्की-सी ‘हलो-हलो’ के बाद एक-दूसरे के पास से निकल जाते। और ‘हलो’ कहने में भी केवल होंठ ही हिलते थे, शब्द बाहर नहीं आते थे। कई बार मुझे लगता कि शायद मेरे चेहरे की हवा भी इस बीच इतनी बदल गयी है कि परिचय का सूत्र फिर से जोडऩे में दूसरे को भी मेरी तरह ही कठिनाई का अनुभव होता है।
हालाँकि कुछ लोग ऐसे भी थे जो काफ़ी खुलकर मिले और जिनसे काफ़ी खुलकर बातें हुईं, मगर उनके पास बैठकर भी मुझे महसूस होता रहा कि हम लोगों के बीच कहीं एक लकीर है—बहुत पतली-सी लकीर, जिसे हम चाहकर भी पार नहीं कर पाते और उसके इधर-उधर से हाथ बढ़ाकर ही आपस में मिलते हैं। कहाँ क्या बदल गया है, यह ठीक से मेरी समझ में नहीं आता था, क्योंकि कुछ लोग तो ऐसे थे कि उनके चेहरे-मोहरे में ज़रा भी फ़र्क़ नहीं आया था। मेरे बाल कनपटियों के पास से सफ़ेद होने लगे थे, मगर उनके बाल अब भी उतने ही काले थे जितने नौ साल पहले, यहाँ तक कि कभी-कभी मुझे शक होता था कि वे सिर पर ख़िज़ाब तो नहीं लगाते। मगर उनके गालों की चमक भी वैसी ही थी और उनके ठहाकों की आवाज़ भी उसी तरह गूँजती थी, इसलिए मुझे मजबूरन सोचना पड़ता था कि ख़िज़ाबवाली बात भी गलत ही होनी चाहिए। फिर भी कई क्षण ऐसे आते थे जब वे परिचित चेहरे मुझे बहुत ही अपरिचित और बेगाने प्रतीत होते थे।
हरबंस को नौ साल के बाद मैंने पहली बार देखा; उसका चेहरा मुझे और चेहरों की बनिस्बत कहीं ज़्यादा बदला हुआ लगा। उसके गालों का मांस कुछ थलथला गया था जिससे वह अपनी उम्र से काफ़ी बड़ा लगने लगा था (उसे देखते ही पहला विचार मेरे दिमाग में यह आया कि क्या मैं भी अब उतना ही बड़ा लगने लगा हूँ?)। उसके सिर के बाल काफ़ी उड़ गये थे, जिससे उसे देखते ही सिलविक्रिन के विज्ञापन की याद हो आती थी। मैं उस समय सिन्धिया हाउस के स्टॉप पर बस से उतरा था और कॉफ़ी की एक प्याली पीने के इरादे से कॉफ़ी हाउस की तरफ़ जा रहा था। तभी पीछे से अपना नाम सुनकर मैं चौंक गया। पीछे मुडक़र देखते ही हरबंस पर नज़र पड़ी, तो मैं और भी चौंक गया। मुझे ज़रा भी आशा नहीं थी कि इस बार दिल्ली में उससे मुलाकात होगी। नौ साल पहले जब मैं यहाँ से गया था, तब से मेरे लिए वह विदेश में ही था। मैं सोचता था कि मेरे एक और दोस्त की तरह, जिसने पोलैंड की एक विधवा से शादी करके वहीं घर बसा लिया है, वह भी शायद बाहर ही कहीं बस-बसा गया होगा। जाने से पहले वह कहता भी यही था कि अब वह लौटकर इस देश में कभी नहीं आएगा।
“हरबंस, तुम?” मैं ठिठककर उसके लम्बे डीलडौल को देखता रह गया। वह हाथों में दो-एक पैकेट सँभाले बहुत उतावली में मेरी तरफ़ आ रहा था। उसकी चाल में वही पुरानी लचक थी जिससे मुझे उसका बदला हुआ चेहरा भी उस समय बदला हुआ नहीं लगा। मैंने अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया, तो उसने मेरा हाथ नहीं पकड़ा, अपनी पैकेटवाली बाँह मेरे कन्धे पर रखकर मुझे अपने साथ सटा लिया।
“अरे, तुम यहाँ कैसे, मधुसूदन?” उसने कहा, “मैंने तो समझा था कि तुम अब बिल्कुल अख़बारनवीस ही हो गये हो और दिल्ली में तुम्हारा बिल्कुल आना-जाना नहीं होता। तीन साल में आज मैं पहली बार तुम्हें यहाँ देख रहा हूँ।”
हम लोग जनपथ के चौराहे पर खड़े थे और मैं बत्ती का रंग बदलने की राह देख रहा था। बत्ती का रंग बदलते ही मैंने उसकी बाँह पर हाथ रखकर कहा, “आओ, पहले सडक़ पार कर लें।”
मेरा यह सुझाव उसे अच्छा नहीं लगा, मगर उसने चुपचाप मेरे साथ सडक़ पार कर ली। सडक़ पार करते ही वह रुक गया जैसे कि अपनी सीमा से बहुत आगे चला आया हो।
“मैं एक तरह से नौ साल के बाद यहाँ आया हूँ।” मैंने कहा, “बीच में मैं दो-चार बार एक-एक दिन के लिए आया था, मगर वह आना तो न आने के बराबर ही था।”
मगर मुझे लगा कि उसने मेरी बात की तरफ़ ध्यान नहीं दिया। उसकी आँखें मेरे कन्धों के ऊपर से सडक़ के पार किसी चीज़ को खोज रही थीं।
“तुम बाहर से कब आये हो?” मैंने पूछा, “मैंने तो सोचा था कि तुम अब बाकी ज़िन्दगी लन्दन या पेरिस में ही कहीं काट दोगे। जाने से पहले तुम्हारा इरादा भी यही था।” यह कहते हुए मुझे सहसा नीलिमा के नाम लिखे उसके पत्रों की याद हो आयी, और मेरा मन एक विचित्र उत्सुकता से भर गया।
“मुझे आये तीन साल हो गये।” वह उसी तरह मोटरों और बसों की भीड़ में कुछ खोजता हुआ बोला, “बल्कि अब यह चौथा साल जा रहा है? मुझे किसी ने बताया था कि तुम लखनऊ के किसी दैनिक में हो। दैनिक का नाम भी उसने बताया था। मैंने एकाध बार सोचा भी कि तुम्हें चिट्ठी लिखूँ, मगर ऐसे ही आलस में बात रह गयी। तुम जानते हो चिट्ठियाँ लिखने के मामले में मैं कितना आलसी हूँ।”
मुझे फिर उन दिनों की याद हो आयी जब वह अभी बाहर गया ही था। उन दिनों भी क्या वह चिट्ठियाँ लिखने के बारे में ऐसी बात कह सकता था? मेरे होंठों पर मुस्कराहट की एक हल्की-सी लकीर आ गयी और मैंने कहा, “हो सकता है, मगर इसमें सिर्फ नीलिमा की बात तुम्हें छोड़ देनी चाहिए।”
वह इससे थोड़ा सकपका गया। सहसा उसके हाथ इस तरह हिले जैसे अपनी खोयी हुई चीज़ उसे भीड़ में नज़र आ गयी हो, मगर दूसरे ही क्षण उसके कन्धे ढीले हो गये और उसके चेहरे पर निराशा की लहरें खिंच गयीं।
“तुम किसी को ढूँढ़ रहे हो?” मैंने पूछा।
“नहीं, देख रहा हूँ कि कोई स्कूटर मिल जाए, तो तुम्हें अपने घर ले चलूँ।”
उसका यह सोच लेना कि मुझे साथ घर ले जाने के लिए उसका मुझसे पूछना ज़रूरी नहीं है, मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने तुरन्त ही मन में निश्चय कर लिया कि मैं उसके साथ नहीं जाऊँगा।
“आज हमारे यहाँ कुछ लोग खाने पर आ रहे हैं, इसलिए मेरा जल्दी घर पहुँचना ज़रूरी है।” वह बोला, “नीलिमा तुम्हें देखकर बहुत ख़ुश होगी। अभी आठ ही दस दिन हुए जब हम लोग तुम्हारी बात कर रहे थे। मैं उससे कह रहा था कि जीवन भार्गव की तरह यह आदमी भी ज़िन्दगी के दलदल में फँसकर रह गया। घर चलो, तो वहाँ तुम्हें एक नया व्यक्ति भी मिलेगा जिससे मिलकर तुम्हें ख़ुशी होगी।”
“नया व्यक्ति?”
“हमारा लडक़ा अरुण। वह अब तीन साल का होने जा रहा है। एक बार तुम्हें पहचान लेगा, तो फिर तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगा। आओ, उधर स्कूटर स्टैंड पर चलते हैं। यहाँ पर खड़े-खड़े कोई स्कूटर नहीं मिलेगा।”
“मैं इस समय तुम्हारे साथ नहीं चल सकूँगा,” मैंने कहा। “फिर किसी दिन चलूँगा। या तुम मुझे घर का पता बता दो, मैं अपने आप किसी दिन पहुँच जाऊँगा। तुम्हारे यहाँ आने में मुझे कोई तकल्लुफ तो है नहीं।” और यह कहते हुए मुझे उलझन हुई कि मेरी यह बात भी तकल्लुफ नहीं, तो और क्या है?
“फिर किसी दिन खाक आओगे!” वह थोड़ा खीझ गया, “कल-परसों जाकर लखनऊ से चिट्ठी लिख दोगे कि मुझे अफ़सोस है कि मैं तुमसे मिलने नहीं आ सका। और हो सकता है कि चिट्ठी भी न लिखो।”
“नहीं, अब इस तरह का मौका नहीं आ सकता।” मैंने कहा, “मैं लखनऊ छोडक़र दिल्ली में ही आ गया हूँ।”
“क्या!” आश्चर्य से उसके हाथ का पैकेट गिरने को हो गया जिसे उसने किसी तरह सँभाल लिया, “तुम लखनऊ से नौकरी छोड़ आये हो?”
“हाँ।”
“कब से?”
“वहाँ से रिलीव हुए मुझे दस दिन हो गये। पिछले मंगल से मैंने यहाँ ‘न्यू हैरल्ड’ में जॉइन कर लिया है। अब दूसरा मंगल है।”
“सच?”
“हाँ, सच नहीं तो क्या?”
“यह सुनकर नीलिमा तो बहुत ही ख़ुश होगी।” उसने दोनों पैकेट एक हाथ में लेकर दूसरे हाथ से मेरी बाँह को पकड़ लिया, “इस वक़्त तो तुम्हें हर हालत में मेरे साथ चलना ही है। नीलिमा को पता चलेगा कि तुम दिल्ली में हो और फिर भी मेरे साथ घर नहीं आये, तो वह कितना बुरा मानेगी? आओ, चलो...।”
“नहीं, इस वक़्त मैं सचमुच नहीं चल सकूँगा।” मैंने अपनी बाँह उसके हाथ से छुड़ाते हुए कहा, “अभी मैं बस से उतरा ही हूँ और पहले कॉफ़ी की एक प्याली पीना चाहता हूँ। और कॉफ़ी हाउस में मैंने किसी से मिलने के लिए भी कह रखा है।”
“ऐसा कौन आदमी है जिससे मिलना इतना ज़रूरी है?”
“है एक आदमी।” मैंने कहा, “तुम उसे नहीं जानते।” मुझे अपने पर गुस्सा आया कि मैंने फट से किसी का भी नाम क्यों नहीं ले दिया। झूठ बोलते वक़्त जाने ज़बान कुछ जकड़ क्यों जाती है? इससे झूठ बोलने का सारा मज़ा किरकिरा हो जाता है और दूसरे को भी फ़ौरन पता चल जाता है कि बात झूठ कही गयी है।
“तो चलो, मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।” वह बोला, “कॉफ़ी की एक प्याली पी लो और उस आदमी को जिस किसी तरह टाल दो। घर तुम्हें मैं अपने साथ लेकर ही जाऊँगा।”
मैं अपना हठ दिखा चुका था और किसी से मिलने की बात थी नहीं, इसलिए मेरा मन हुआ कि अब मैं सीधा उसके साथ चला जाऊँ। मगर अपनी बात मुझे रखनी थी, इसलिए मैंने कहा, “अच्छा आओ, वहाँ चलकर देख लेते हैं। उससे छ: बजे मिलने की बात थी। वह नहीं मिला, तो मैं तुम्हारे साथ चला चलूँगा। अपनी तरफ़ से तो मैं उसके सामने सच्चा रहूँगा कि मैं वक़्त पर पहुँच गया था।”
हरबंस और उसके सारे साहित्य और कला सम्बन्धी ज्ञान की बात मैं बम्बई में ही भूल आया था। दिल्ली आकर मैं अपने मित्र अरविन्द के पास ठहरा था जो उन दिनों एक हिन्दी दैनिक में सहायक सम्पादक के रूप में काम कर रहा था। अरविन्द क़स्साबपुरा में अपने प्रेस के एक दफ़्तरी के साथ रहता था। दफ़्तरी, जिसे वहाँ सब लोग ठाकुर साहब कहकर बुलाते थे, क़स्साबपुरा के उस मुसलमान मुहल्ले में एक टूटे-फूटे घर में नीचे की दो कोठरियों पर कब्ज़ा किये हुए था, जिनमें से आगे की कोठरी में अरविन्द रहता था और पीछे की कोठरी में वह स्वयं अपनी पत्नी और सात-आठ साल की लडक़ी के साथ रहता था। अरविन्द खाना भी उसके यहाँ से ही खाता था, और उसे कुल मिलाकर पचहत्तर रुपये महीने देता था। मेरे आने पर पच्चीस रुपये महीने और देकर उसने मेरे खाने की व्यवस्था भी साथ ही कर दी। दफ़्तरी की पत्नी, जिसे हम कभी ठकुराइन और कभी भाभी कहकर बुलाते थे, बहुत स्नेह और चाव से हमें खिलाती थी। कभी-कभी तो मुझे लगता था कि वह अपने ठाकुर साहब को उतना अच्छा खाना नहीं देती जितना अच्छा हमें देती है। अरविन्द की जब दिन की ड्यूटी होती थी, तो वह दोपहर का खाना साथ दफ़्तर ले जाता था और जब रात की ड्यूटी होती थी तो ठकुराइन बारह-एक बजे आने पर भी उसे खाना गरम करके ही खिलाती थी। खाना खाते समय अरविन्द ठकुराइन से कुछ न कुछ चुहल करता रहता था। “ठकुराहन, तर माल तो तुम सब ठाकुर साहब को दे देती हो; हमारे आगे तो जो रूखा-सूखा बच जाता है वही रख देती हो।” वह कहता।
“अभी तुम तर माल के लायक हो कहाँ लाला?” ठकुराइन हँसकर कहती, “अभी तो तुम बच्चे हो। तर माल खाओगे, तो बिगड़ नहीं जाओगे?”
“तुम तो ठकुराइन सारी उम्र हमें बच्चा ही बनाये रखोगी।” अरविन्द कहता, “आखिर हमें किसी तरह बड़े भी तो होना है। हमें कभी तो कुछ खिलाया करो।”
“जब खाने लायक हो जाओगे, तो माँगकर नहीं खाओगे।” ठकुराइन हँसती रहती, “पतीली में से निकालकर खा जाया करोगे। जिस दिन इतनी हिम्मत आ जाएगी, उस दिन ठकुराइन को नहीं पूछोगे। जहाँ पतीली देखोगे, वहीं मुँह मारने लगोगे।” कहते-कहते ठकुराइन को न जाने क्या लगता कि वह सिर पर कपड़ा ठीक कर लेती। अपनी मैली धोती के सूराख भी वह जिस किसी तरह ढक लेती।
“इस तरह कहीं मुँह मारेंगे, तो जूती नहीं खाएँगे?” अरविन्द कहता।
“पकड़े जाओगे तो जूती भी खाओगे। मगर जो जूती से डरता हो, उसे तर माल की बात नहीं करनी चाहिए। क्यों, छोटे लाला?”
अंधेरे बंद कमरे [भाग-1]
नौ साल में चेहरे काफी बदल जाते हैं; और कोई-कोई चेहरा तो इतना बदल जाता है कि पहले के चेहरे के साथ उसकी कोई समानता ही नहीं रहती।
मैं नौ साल के बाद दिल्ली आया, तो मुझे महसूस हुआ जैसे मेरे लिए यह एक बिल्कुल नया और अपरिचित शहर हो। जिन लोगों के साथ कभी मेरा रोज़ का उठना-बैठना था, उनमें से कई-एक तो अब बिल्कुल ही नहीं पहचाने जाते थे; उनके नयन-नक्श वही थे, मगर उनके चेहरे के आसपास की हवा बिल्कुल और हो गयी थी। हम लोग कभी आमने-सामने पड़ जाते, तो हल्की-सी ‘हलो-हलो’ के बाद एक-दूसरे के पास से निकल जाते। और ‘हलो’ कहने में भी केवल होंठ ही हिलते थे, शब्द बाहर नहीं आते थे। कई बार मुझे लगता कि शायद मेरे चेहरे की हवा भी इस बीच इतनी बदल गयी है कि परिचय का सूत्र फिर से जोडऩे में दूसरे को भी मेरी तरह ही कठिनाई का अनुभव होता है।
हालाँकि कुछ लोग ऐसे भी थे जो काफ़ी खुलकर मिले और जिनसे काफ़ी खुलकर बातें हुईं, मगर उनके पास बैठकर भी मुझे महसूस होता रहा कि हम लोगों के बीच कहीं एक लकीर है—बहुत पतली-सी लकीर, जिसे हम चाहकर भी पार नहीं कर पाते और उसके इधर-उधर से हाथ बढ़ाकर ही आपस में मिलते हैं। कहाँ क्या बदल गया है, यह ठीक से मेरी समझ में नहीं आता था, क्योंकि कुछ लोग तो ऐसे थे कि उनके चेहरे-मोहरे में ज़रा भी फ़र्क़ नहीं आया था। मेरे बाल कनपटियों के पास से सफ़ेद होने लगे थे, मगर उनके बाल अब भी उतने ही काले थे जितने नौ साल पहले, यहाँ तक कि कभी-कभी मुझे शक होता था कि वे सिर पर ख़िज़ाब तो नहीं लगाते। मगर उनके गालों की चमक भी वैसी ही थी और उनके ठहाकों की आवाज़ भी उसी तरह गूँजती थी, इसलिए मुझे मजबूरन सोचना पड़ता था कि ख़िज़ाबवाली बात भी गलत ही होनी चाहिए। फिर भी कई क्षण ऐसे आते थे जब वे परिचित चेहरे मुझे बहुत ही अपरिचित और बेगाने प्रतीत होते थे।
हरबंस को नौ साल के बाद मैंने पहली बार देखा; उसका चेहरा मुझे और चेहरों की बनिस्बत कहीं ज़्यादा बदला हुआ लगा। उसके गालों का मांस कुछ थलथला गया था जिससे वह अपनी उम्र से काफ़ी बड़ा लगने लगा था (उसे देखते ही पहला विचार मेरे दिमाग में यह आया कि क्या मैं भी अब उतना ही बड़ा लगने लगा हूँ?)। उसके सिर के बाल काफ़ी उड़ गये थे, जिससे उसे देखते ही सिलविक्रिन के विज्ञापन की याद हो आती थी। मैं उस समय सिन्धिया हाउस के स्टॉप पर बस से उतरा था और कॉफ़ी की एक प्याली पीने के इरादे से कॉफ़ी हाउस की तरफ़ जा रहा था। तभी पीछे से अपना नाम सुनकर मैं चौंक गया। पीछे मुडक़र देखते ही हरबंस पर नज़र पड़ी, तो मैं और भी चौंक गया। मुझे ज़रा भी आशा नहीं थी कि इस बार दिल्ली में उससे मुलाकात होगी। नौ साल पहले जब मैं यहाँ से गया था, तब से मेरे लिए वह विदेश में ही था। मैं सोचता था कि मेरे एक और दोस्त की तरह, जिसने पोलैंड की एक विधवा से शादी करके वहीं घर बसा लिया है, वह भी शायद बाहर ही कहीं बस-बसा गया होगा। जाने से पहले वह कहता भी यही था कि अब वह लौटकर इस देश में कभी नहीं आएगा।
“हरबंस, तुम?” मैं ठिठककर उसके लम्बे डीलडौल को देखता रह गया। वह हाथों में दो-एक पैकेट सँभाले बहुत उतावली में मेरी तरफ़ आ रहा था। उसकी चाल में वही पुरानी लचक थी जिससे मुझे उसका बदला हुआ चेहरा भी उस समय बदला हुआ नहीं लगा। मैंने अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया, तो उसने मेरा हाथ नहीं पकड़ा, अपनी पैकेटवाली बाँह मेरे कन्धे पर रखकर मुझे अपने साथ सटा लिया।
“अरे, तुम यहाँ कैसे, मधुसूदन?” उसने कहा, “मैंने तो समझा था कि तुम अब बिल्कुल अख़बारनवीस ही हो गये हो और दिल्ली में तुम्हारा बिल्कुल आना-जाना नहीं होता। तीन साल में आज मैं पहली बार तुम्हें यहाँ देख रहा हूँ।”
हम लोग जनपथ के चौराहे पर खड़े थे और मैं बत्ती का रंग बदलने की राह देख रहा था। बत्ती का रंग बदलते ही मैंने उसकी बाँह पर हाथ रखकर कहा, “आओ, पहले सडक़ पार कर लें।”
मेरा यह सुझाव उसे अच्छा नहीं लगा, मगर उसने चुपचाप मेरे साथ सडक़ पार कर ली। सडक़ पार करते ही वह रुक गया जैसे कि अपनी सीमा से बहुत आगे चला आया हो।
“मैं एक तरह से नौ साल के बाद यहाँ आया हूँ।” मैंने कहा, “बीच में मैं दो-चार बार एक-एक दिन के लिए आया था, मगर वह आना तो न आने के बराबर ही था।”
मगर मुझे लगा कि उसने मेरी बात की तरफ़ ध्यान नहीं दिया। उसकी आँखें मेरे कन्धों के ऊपर से सडक़ के पार किसी चीज़ को खोज रही थीं।
“तुम बाहर से कब आये हो?” मैंने पूछा, “मैंने तो सोचा था कि तुम अब बाकी ज़िन्दगी लन्दन या पेरिस में ही कहीं काट दोगे। जाने से पहले तुम्हारा इरादा भी यही था।” यह कहते हुए मुझे सहसा नीलिमा के नाम लिखे उसके पत्रों की याद हो आयी, और मेरा मन एक विचित्र उत्सुकता से भर गया।
“मुझे आये तीन साल हो गये।” वह उसी तरह मोटरों और बसों की भीड़ में कुछ खोजता हुआ बोला, “बल्कि अब यह चौथा साल जा रहा है? मुझे किसी ने बताया था कि तुम लखनऊ के किसी दैनिक में हो। दैनिक का नाम भी उसने बताया था। मैंने एकाध बार सोचा भी कि तुम्हें चिट्ठी लिखूँ, मगर ऐसे ही आलस में बात रह गयी। तुम जानते हो चिट्ठियाँ लिखने के मामले में मैं कितना आलसी हूँ।”
मुझे फिर उन दिनों की याद हो आयी जब वह अभी बाहर गया ही था। उन दिनों भी क्या वह चिट्ठियाँ लिखने के बारे में ऐसी बात कह सकता था? मेरे होंठों पर मुस्कराहट की एक हल्की-सी लकीर आ गयी और मैंने कहा, “हो सकता है, मगर इसमें सिर्फ नीलिमा की बात तुम्हें छोड़ देनी चाहिए।”
वह इससे थोड़ा सकपका गया। सहसा उसके हाथ इस तरह हिले जैसे अपनी खोयी हुई चीज़ उसे भीड़ में नज़र आ गयी हो, मगर दूसरे ही क्षण उसके कन्धे ढीले हो गये और उसके चेहरे पर निराशा की लहरें खिंच गयीं।
“तुम किसी को ढूँढ़ रहे हो?” मैंने पूछा।
“नहीं, देख रहा हूँ कि कोई स्कूटर मिल जाए, तो तुम्हें अपने घर ले चलूँ।”
उसका यह सोच लेना कि मुझे साथ घर ले जाने के लिए उसका मुझसे पूछना ज़रूरी नहीं है, मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने तुरन्त ही मन में निश्चय कर लिया कि मैं उसके साथ नहीं जाऊँगा।
“आज हमारे यहाँ कुछ लोग खाने पर आ रहे हैं, इसलिए मेरा जल्दी घर पहुँचना ज़रूरी है।” वह बोला, “नीलिमा तुम्हें देखकर बहुत ख़ुश होगी। अभी आठ ही दस दिन हुए जब हम लोग तुम्हारी बात कर रहे थे। मैं उससे कह रहा था कि जीवन भार्गव की तरह यह आदमी भी ज़िन्दगी के दलदल में फँसकर रह गया। घर चलो, तो वहाँ तुम्हें एक नया व्यक्ति भी मिलेगा जिससे मिलकर तुम्हें ख़ुशी होगी।”
“नया व्यक्ति?”
“हमारा लडक़ा अरुण। वह अब तीन साल का होने जा रहा है। एक बार तुम्हें पहचान लेगा, तो फिर तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगा। आओ, उधर स्कूटर स्टैंड पर चलते हैं। यहाँ पर खड़े-खड़े कोई स्कूटर नहीं मिलेगा।”
“मैं इस समय तुम्हारे साथ नहीं चल सकूँगा,” मैंने कहा। “फिर किसी दिन चलूँगा। या तुम मुझे घर का पता बता दो, मैं अपने आप किसी दिन पहुँच जाऊँगा। तुम्हारे यहाँ आने में मुझे कोई तकल्लुफ तो है नहीं।” और यह कहते हुए मुझे उलझन हुई कि मेरी यह बात भी तकल्लुफ नहीं, तो और क्या है?
“फिर किसी दिन खाक आओगे!” वह थोड़ा खीझ गया, “कल-परसों जाकर लखनऊ से चिट्ठी लिख दोगे कि मुझे अफ़सोस है कि मैं तुमसे मिलने नहीं आ सका। और हो सकता है कि चिट्ठी भी न लिखो।”
“नहीं, अब इस तरह का मौका नहीं आ सकता।” मैंने कहा, “मैं लखनऊ छोडक़र दिल्ली में ही आ गया हूँ।”
“क्या!” आश्चर्य से उसके हाथ का पैकेट गिरने को हो गया जिसे उसने किसी तरह सँभाल लिया, “तुम लखनऊ से नौकरी छोड़ आये हो?”
“हाँ।”
“कब से?”
“वहाँ से रिलीव हुए मुझे दस दिन हो गये। पिछले मंगल से मैंने यहाँ ‘न्यू हैरल्ड’ में जॉइन कर लिया है। अब दूसरा मंगल है।”
“सच?”
“हाँ, सच नहीं तो क्या?”
“यह सुनकर नीलिमा तो बहुत ही ख़ुश होगी।” उसने दोनों पैकेट एक हाथ में लेकर दूसरे हाथ से मेरी बाँह को पकड़ लिया, “इस वक़्त तो तुम्हें हर हालत में मेरे साथ चलना ही है। नीलिमा को पता चलेगा कि तुम दिल्ली में हो और फिर भी मेरे साथ घर नहीं आये, तो वह कितना बुरा मानेगी? आओ, चलो...।”
“नहीं, इस वक़्त मैं सचमुच नहीं चल सकूँगा।” मैंने अपनी बाँह उसके हाथ से छुड़ाते हुए कहा, “अभी मैं बस से उतरा ही हूँ और पहले कॉफ़ी की एक प्याली पीना चाहता हूँ। और कॉफ़ी हाउस में मैंने किसी से मिलने के लिए भी कह रखा है।”
“ऐसा कौन आदमी है जिससे मिलना इतना ज़रूरी है?”
“है एक आदमी।” मैंने कहा, “तुम उसे नहीं जानते।” मुझे अपने पर गुस्सा आया कि मैंने फट से किसी का भी नाम क्यों नहीं ले दिया। झूठ बोलते वक़्त जाने ज़बान कुछ जकड़ क्यों जाती है? इससे झूठ बोलने का सारा मज़ा किरकिरा हो जाता है और दूसरे को भी फ़ौरन पता चल जाता है कि बात झूठ कही गयी है।
“तो चलो, मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।” वह बोला, “कॉफ़ी की एक प्याली पी लो और उस आदमी को जिस किसी तरह टाल दो। घर तुम्हें मैं अपने साथ लेकर ही जाऊँगा।”
मैं अपना हठ दिखा चुका था और किसी से मिलने की बात थी नहीं, इसलिए मेरा मन हुआ कि अब मैं सीधा उसके साथ चला जाऊँ। मगर अपनी बात मुझे रखनी थी, इसलिए मैंने कहा, “अच्छा आओ, वहाँ चलकर देख लेते हैं। उससे छ: बजे मिलने की बात थी। वह नहीं मिला, तो मैं तुम्हारे साथ चला चलूँगा। अपनी तरफ़ से तो मैं उसके सामने सच्चा रहूँगा कि मैं वक़्त पर पहुँच गया था।”
हरबंस और उसके सारे साहित्य और कला सम्बन्धी ज्ञान की बात मैं बम्बई में ही भूल आया था। दिल्ली आकर मैं अपने मित्र अरविन्द के पास ठहरा था जो उन दिनों एक हिन्दी दैनिक में सहायक सम्पादक के रूप में काम कर रहा था। अरविन्द क़स्साबपुरा में अपने प्रेस के एक दफ़्तरी के साथ रहता था। दफ़्तरी, जिसे वहाँ सब लोग ठाकुर साहब कहकर बुलाते थे, क़स्साबपुरा के उस मुसलमान मुहल्ले में एक टूटे-फूटे घर में नीचे की दो कोठरियों पर कब्ज़ा किये हुए था, जिनमें से आगे की कोठरी में अरविन्द रहता था और पीछे की कोठरी में वह स्वयं अपनी पत्नी और सात-आठ साल की लडक़ी के साथ रहता था। अरविन्द खाना भी उसके यहाँ से ही खाता था, और उसे कुल मिलाकर पचहत्तर रुपये महीने देता था। मेरे आने पर पच्चीस रुपये महीने और देकर उसने मेरे खाने की व्यवस्था भी साथ ही कर दी। दफ़्तरी की पत्नी, जिसे हम कभी ठकुराइन और कभी भाभी कहकर बुलाते थे, बहुत स्नेह और चाव से हमें खिलाती थी। कभी-कभी तो मुझे लगता था कि वह अपने ठाकुर साहब को उतना अच्छा खाना नहीं देती जितना अच्छा हमें देती है। अरविन्द की जब दिन की ड्यूटी होती थी, तो वह दोपहर का खाना साथ दफ़्तर ले जाता था और जब रात की ड्यूटी होती थी तो ठकुराइन बारह-एक बजे आने पर भी उसे खाना गरम करके ही खिलाती थी। खाना खाते समय अरविन्द ठकुराइन से कुछ न कुछ चुहल करता रहता था। “ठकुराहन, तर माल तो तुम सब ठाकुर साहब को दे देती हो; हमारे आगे तो जो रूखा-सूखा बच जाता है वही रख देती हो।” वह कहता।
“अभी तुम तर माल के लायक हो कहाँ लाला?” ठकुराइन हँसकर कहती, “अभी तो तुम बच्चे हो। तर माल खाओगे, तो बिगड़ नहीं जाओगे?”
“तुम तो ठकुराइन सारी उम्र हमें बच्चा ही बनाये रखोगी।” अरविन्द कहता, “आखिर हमें किसी तरह बड़े भी तो होना है। हमें कभी तो कुछ खिलाया करो।”
“जब खाने लायक हो जाओगे, तो माँगकर नहीं खाओगे।” ठकुराइन हँसती रहती, “पतीली में से निकालकर खा जाया करोगे। जिस दिन इतनी हिम्मत आ जाएगी, उस दिन ठकुराइन को नहीं पूछोगे। जहाँ पतीली देखोगे, वहीं मुँह मारने लगोगे।” कहते-कहते ठकुराइन को न जाने क्या लगता कि वह सिर पर कपड़ा ठीक कर लेती। अपनी मैली धोती के सूराख भी वह जिस किसी तरह ढक लेती।
“इस तरह कहीं मुँह मारेंगे, तो जूती नहीं खाएँगे?” अरविन्द कहता।
“पकड़े जाओगे तो जूती भी खाओगे। मगर जो जूती से डरता हो, उसे तर माल की बात नहीं करनी चाहिए। क्यों, छोटे लाला?”