• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

अंधेरे बंद कमरे / मोहन राकेश संचयन

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
“मैं पीकर आयी हूँ तो, और नहीं पीकर आयी तो उसमें तुम्हारा क्या आता-जाता है?” नीलिमा लापरवाही से सिर उठाकर बोली, “मेरी बहन की लडक़ी का जन्म-दिन था। मैं उसकी मेहमान थी। उसने जो कुछ खिलाया वह मैंने खा लिया। जो कुछ पीने को दिया, वह मैंने पी लिया। इसमें शरम की कौन-सी बात है? मगर तुम सब कह सकते हो। तुम एक मुंसिफ़ हो और मैं एक मुजरिम हूँ, जिसे तुम हर वक़्त अपने सामने कठघरे में खड़ी रखते हो। मगर देखो, मुझे तुम्हारा यह बात करने का तरीका पसन्द नहीं है? तुम्हें मेरे साथ इस तरह बात करने का कोई हक नहीं है।”

मुझे डर लगा कि कहीं हरबंस उस समय गुस्से में कोई और हरकत न कर बैठे। मगर उसने किसी तरह अपने पर वश किये हुए इतना ही कहा, “देखो, मैं कह रहा हूँ कि तुम इस वक़्त जाकर कपड़े बदल लो और सो जाओ।”

“मुझे नींद आएगी तो मैं जाकर सो जाऊँगी।” नीलिमा कुरसी पर बैठती हुई बोली, “और सोऊँगी, तो कपड़े बदलकर ही सोऊँगी, ऐसे थोड़े ही सो जाऊँगी, मुझे इतनी सभ्यता तो आती है।” और वह कुरसी से टेक लगाकर आँखें मूँदे हुए एक बार हँस दी।

“तुम्हें पता है कि तुम इस समय जो कुछ भी कर रही हो, वह सभ्यता नहीं है।” हरबंस खीझ, बेबसी और हताशा के साथ बोला।

“और तुम इस समय जो कुछ कर रहे हो, वह सभ्यता है!” वह फिर हँसी, “मेरे पीछे जो बातें करते रहे हो, वह सभ्यता है! सभ्यता का व्यवहार हममें से किसे आता है? वह जर्नलिस्ट जो व्यवहार करता है, वह सब सभ्यता का व्यवहार होता है? इससे पूछो, एक बार मैंने इसे शाम को घर पर बुलाया था, तो इसने उसके बाद नौ साल तक शक्ल क्यों नहीं दिखायी?”

“तुम इस वक़्त अपनी ज़बान बन्द रखो और दूसरे कमरे में जाकर सो जाओ।” हरबंस ने उसके पास जाकर उसे कन्धों से पकडक़र कुरसी से उठा दिया।

“मेरी ज़बान बन्द है।” वह ज़बान थोड़ी-सी निकालकर फिर उसे होंठों से काटकर बन्द करती हुई बोली, “और मैं यहाँ से जा रही हूँ।” कहती हुई वह दरवाज़े के पास चली गयी, “तुम यहाँ बैठकर मेरे बारे में चाहे जो बातें लोगों से करो, वह सब सभ्यता है! मगर मैं तुमसे कह रही हूँ कि मुझे ऐसी सभ्यता अच्छी नहीं लगती। ये सभ्य बने फिरते हैं! अच्छा,जर्नलिस्ट...” और मेरी तरफ़ हाथ हिलाकर वह अपने बेड-रूम में चली गयी।

“तुम देख रहे हो?” हरबंस ने बहुत हताश स्वर में कहा और निढाल-सा कुरसी पर बैठ गया। कुछ देर हम दोनों चुप बैठे रहे। फिर अचानक ही वह उठ खड़ा हुआ और बोला, “मेरा ख़याल है कि तुम भी अब सो जाओ। मैं बत्ती बुझा देता हूँ।”

“अच्छी बात है।” मैंने कहा, “मेरा भी ख़याल है कि अब सो ही जाना चाहिए! मुझे आँखों में कुछ भारीपन भी महसूस हो रहा है।”

“तुम्हें किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं?” उसने बिजली के बटन पर हाथ रखे हुए पूछा।

“नहीं।”

“ज़रूरत हो, तो बता देना। पानी का जग बाहर बरामदे में रखा है और गुसलखाना उस तरफ़ है।” और बत्ती बुझाकर वह चला गया। मैंने सोचा था कि साथ के कमरे में अब फिर नीलिमा से उसकी कुछ झड़प होगी, मगर उसके जाने के बाद वहाँ कोई बात नहीं हुई, खामोशी छायी रही। मेरी रीढ़ की हड्डी बुरी तरह दर्द कर रही थी। मैं कुछ देर करवटें बदलता रहा। फिर सो गया।

सुबह उठने पर जब यह पता चला कि हम अपने घर में नहीं, किसी और घर में हैं, तो मन कुछ उखड़ा-उखड़ा-सा हो जाता है। मन अपने घर की असुविधाओं का भी इतना अभ्यस्त हो जाता है कि सुबह-सुबह वह उन्हीं की माँग करता है। दूसरे के घर की सुविधाएँ भी अस्वाभाविक और बेगानी लगती हैं और उनसे एक तरह की असुविधा ही होती है। सुबह मेरी आँख खुलते ही बाँके आकर चाय की प्याली सागवान की चमकती हुई तिपाई पर रख गया, तो मुझे इस बेगानेपन की अनुभूति ने घेर लिया कि मेरे आसपास का वातावरण मेरा अपना नहीं है। उसमें तो उठते ही यह खीझ मन में जागनी चाहिए थी कि यह कैसी ज़िन्दगी है कि सुबह-सुबह इन्सान को बिस्तर में चाय की एक प्याली तक नहीं मिल सकती। चारपाई, मेज़ और मोढ़ों से लदे हुए अपने कमरे की जगह, जिसके बारे में एक बार मेरे एक मित्र ने कहा था कि वह एक जहाज़ के केबिन की तरह लगता है, मैं अपेक्षाकृत एक काफ़ी खुले कमरे में था जहाँ मेरी बिखरी हुई पुस्तकों की जगह सामने अलमारी में बहुत तरतीब से रखी हुई पुस्तकें नज़र आ रही थीं। मेरे कमरे में सुबह-सुबह नीचे से सोडावाटर कम्पनी के ट्रकों के गुर्राने की आवाज़ें आने लगती थीं। स्टार्ट के बाद गियर बदलने से उनके इंजन घर के नीचे आकर इस तरह आवाज़ करते थे कि मुझे लगता था जैसे वे ट्रक मेरे ऊपर से ही गुज़रकर जा रहे हों। उन आवाज़ों की जगह उस समय साथ के कमरे से तबले के साथ घुँघरुओं के छनकने की आवाज़ आ रही थी। मैंने चाय की प्याली उठाकर मुँह से लगायी, तो मुझे अहसास हुआ कि मैं काफ़ी दिन चढ़े तक सोता रहा हूँ। खिडक़ी के परदे से छनकर आती हुई धूप डाइनिंग-टेबल पर पड़ रही थी। वहाँ रखी जूठी प्लेटों और प्यालियों से लग रहा था कि सुबह का नाश्ता किया जा चुका है।

बाँके ने मेरे जागने की ख़बर साथ के कमरे में दे दी, तो वहाँ घुँघरुओं का छनकना बन्द हो गया। कुछ देर एक अपरिचित व्यक्ति के साथ नीलिमा के बात करने की आवाज़ सुनायी देती रही, फिर वह व्यक्ति भी चला गया। वह शायद उसका तबलची था। उसके जाने के बाद नीलिमा घुँघरू बाँधे हुए मेरेवाले कमरे में आ गयी।

“तो तुम जाग गये!” उसने मेरे पासवाली कुरसी पर बैठते हुए कहा।

“हाँ, जाग गया।”

“रात को नींद ठीक से आ गयी थी?”

“नहीं, ठीक से नहीं आयी। रात-भर मेरी रीढ़ की हड्डी दर्द करती रही है।”

“हरबंस ने तो कहा था कि तुम्हें जगा दिया जाए, मगर मैंने कहा कि रहने दो, जब अपने-आप तुम्हारी नींद खुलेगी, तभी चाय दे देंगे।”

“हरबंस चला गया?” मुझे कुछ शरम आ रही थी कि मैं इतनी देर क्यों सोया रहा कि हरबंस उस बीच तैयार होकर अपने दफ़्तर भी चला गया।

“उसे गये डेढ़ घंटा हो गया है।” नीलिमा अपने घुँघरुओं को खोलकर अलग रखने लगी, “उसे दस बजे दफ़्तर पहुँचना होता है, इसलिए वह नौ बजे ही घर से चला जाता है। अरुण भी अपने नर्सरी स्कूल में चला गया है।”

मुझे ठीक पता नहीं था कि हरबंस किस कार्यालय में काम करता है; इतना ही पता था कि वह जिस कार्यालय में है उसका सम्बन्ध गुप्त रिकाड्र्स से है। उसने बताया था कि वह वहाँ एक अस्थायी पद पर काम कर रहा है और उसे डर है कि थोड़े दिनों तक वह जगह उड़ा न दी जाए। उसका काम शायद ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के सम्बन्ध में परामर्श देने का था।

“मुझे जल्दी उठ जाना चाहिए था।” मैंने नीलिमा से कहा, “आज सुबह-सुबह मुझे एक जगह जाकर कुछ सूचना प्राप्त करनी थी। साढ़े दस बजे तक मुझे दफ़्तर में बैठकर रिपोर्ट लिख लेनी चाहिए थी।” और यह कहते-कहते रीढ़ की हड्डी ने फिर मुझे अपनी याद दिला दी।

“साढ़े दस बजे तक?” नीलिमा हँसी, “और इस समय कुल साढ़े दस ही बजे हैं।”

“रीढ़ में दर्द था और थकान की वजह से बुख़ार-सा भी लग रहा था, इसलिए मैं इतनी देर सोया रह गया।” मैंने कहा, “मेरा ख़याल है कि मुझे दफ़्तर से आज छुट्टी ले ही लेनी चाहिए। मेरे सम्पादक को पहले ही मुझसे शिकायत रहती है।”

“तो मैं अभी तुम्हारे दफ़्तर में फोन कर देती हूँ।” नीलिमा बोली, “या कहो, तो मैं बाँके के हाथ अरज़ी भिजवा दूँ। मगर तबीयत ठीक नहीं है तो तुम्हें आराम करने के लिए छुट्टी ले ही लेनी चाहिए, नहीं तो कहोगे कि इनके घर पर एक रात सोया और तभी बीमार पडक़र गया।”

मैंने चुपचाप उसके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। बिस्तर से उठने और नहा-धोकर तुरन्त तैयार हो जाने की हिम्मत उस समय मुझमें नहीं थी।

“तो मैं फ़ोन कर दूँ?” नीलिमा ने पूछा।

“हाँ, कर दो।” मैंने कहा, “कह देना कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए आज मैं दफ़्तर नहीं आ सकूँगा।”

“तो ठीक है।” वह झटके के साथ उठती हुई बोली, “तुम आराम से पड़े रहो। मैं तुम्हें अभी एक टिकिया भी दे देती हूँ। एक छोटी-मोटी डिस्पेंसरी मैं घर में ही रखती हूँ। अगर तुम कुछ ठीक हो जाओगे, तो दोपहर को हम ओखला की तरफ़ घूमने चलेंगे।...तुम कभी ओखला गये हो?”

मैंने सिर हिला दिया, “नहीं, अभी तक नहीं गया। सुना है अच्छी जगह है।”

“हाँ, बहुत अच्छी जगह है।” वह चलती हुई बोली, “मैं तुम्हें अभी टिकिया देती हूँ। तुम्हारे भाग्य में मेरे हाथ से दवाई की टिकिया खाना ही लिखा है।” जाते-जाते वह रुकी और बोली, “मैं हरबंस को फ़ोन कर दूँगी कि तुम आज यहीं हो, इसलिए अगर हो सके, तो वह दोपहर का खाना घर आकर ही खाये।”

इस बार दिल्ली में आकर मेरे लिए ऐसे दिन बहुत कम आये थे जब मैंने पूरा दिन कुछ न किया हो, खाली खाया हो, बातें की हों और घूम लिया हो। वह दिन मेरे लिए एक ऐसा ही दिन था, हालाँकि मैं यह भी कह सकता हूँ कि मेरे जीवन में बहुत कम ऐसे दिन आये हैं जो उस दिन की तरह भरे हुए रहे हों। मैंने दिन-भर कुछ नहीं किया, मगर कुछ न करते हुए भी मैंने उस दिन इतना कुछ देखा, इतना कुछ जाना कि कई बार दिनों, महीनों, बल्कि बरसों में भी उतना नहीं जान पाया। कुछ दिन होते हैं जो घटनाओं और कार्यों से लदे रहते हैं, परन्तु कुल मिलाकर उनका महत्त्व हमारे लिए शून्य के बराबर होता है—विश्व रंगमंच के वही दाँवपेंच, वही अख़बार की सुर्खियाँ, वही मुलाक़ातें और वही पार्टियाँ। कहने को हमें दम मारने की फुरसत नहीं होती, मगर वास्तव में हम पूरे दिन में दम-भर भी जिये नहीं होते, केवल पहले से एक दिन और बीत चुके होते हैं; उसी धुरी के इर्द-गिर्द एक बार और घूम लेते हैं। परन्तु एक अपने में निरर्थक और घटनाहीन दिन भी ऐसा हो सकता है जिसके छोटे से विस्तार में जीवन का इतना कुछ सिमट आये कि मन से उसे समेटते न बने। जीवन के अनेकानेक दिन अपना सारा संचय जैसे उस एक दिन में ला भरते हैं। और सब दिन जैसे प्रयत्न होते हैं, और वह एक दिन परिणाम। इस तरह देखूँ, तो मैं कह सकता हूँ कि उस दिन का आरम्भ पिछली रात उस समय से हो चुका था जब हरबंस टेबल लैम्प बुझाकर मुझे लन्दन के दिनों की बातें सुनाने लगा था। उन बातों के प्रभाव को मैं अभी मन में समेट नहीं पाया था कि और और प्रभाव मन को घेरने लगे। शाम होने तक मैं अनुभव के इतने स्तरों में से गुज़र आया कि मेरे लिए अपने मन को सँभाले रखना कठिन हो गया। पिछली रात जब मैं दफ़्तर की वैन में डिफेंस कॉलोनी की तरफ़ चला था, तो मैंने क्या यह सोचा था कि उन चौबीस घंटों में मुझे पूरे एक जीवन के-से विस्तार की कई-कई विडम्बनाओं में झाँककर देखने का अवसर मिलेगा? और क्या केवल झाँककर देखने का ही?
 
मैं अभी बिस्तर में ही था और नीलिमा की बनाकर दी हुई कोको की प्याली पी रहा था जब शुक्ला नीलिमा को पुकारती हुई पीछे के दरवाज़े से वहाँ आ गयी। नीलिमा उस समय नहाकर निकली थी और अपने गीले बालों को तौलिये से छटक रही थी। शुक्ला सीधे मेरे कमरे में आ गयी और मुझे देखकर सहसा ठिठक गयी, “अरे आप?” उसने कहा और शिष्टाचार का एकाध प्रश्न पूछकर तुरन्त ही लौटने को हुई, परन्तु तब तक नीलिमा अपने बाल कन्धों पर फैलाये हुए कमरे में आ गयी जिससे उसे रुक जाना पड़ा। “तुम सूदन को पहचानती हो?” नीलिमा ने उससे पूछा।

“पहचानती क्यों नहीं?” शुक्ला कुछ व्यस्त भाव से बोली, “भापाजी के लन्दन जाने से पहले ये बहुत आया करते थे। मगर बाद में तो ये एकदम गायब ही हो गये थे।”

“यह आजकल यहाँ ‘न्यू हैरल्ड’ में काम कर रहा है।”

“मुझे मालूम है।” शुक्ला ने कहा, “आपने भी बताया था और सुरजीत भी एक दिन कह रहा था।” और फिर मेरी तरफ़ मुडक़र बोली, “उन दिनों तो आपकी कविताएँ बहुत निकला करती थीं। आजकल तो शायद आपने लिखना-लिखाना बिल्कुल छोड़ दिया है।”

“आजकल मैं राजनीतिज्ञों के इंटरव्यू और सम्मेलनों की रिपोर्टें लिखता हूँ।”

“यही हाल हरबंस भापाजी का है।” वह बोली, “उन्हें भी आजकल दफ़्तर के काम के सिवा और किसी काम के लिए समय नहीं मिलता। कई सालों से उनकी फ़ाइलें जैसी की तैसी रखी हैं। अब वे कभी कुछ लिख ही नहीं पाते।”

उसके मुँह से हरबंस की फ़ाइलों की बात सुनकर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ। तो उसे यह विश्वास था कि हरबंस कुछ लिख भी सकता है!

“काम-धन्धे में पडक़र ऐसा हो ही जाता है।” मैंने कहा, “आदमी नमक की खान में नमक होकर रह जाता है।”

“मेरा मन होता है कि मुझे लिखना आ जाए, तो मैं भी एक कहानी लिखूँ।” शुक्ला पढऩे की मेज़ पर रखे हुए कागज़ों को हाथ से सहलाती हुई बोली। उसका शरीर पहले से कुछ भर गया था और अब वह अच्छी-खासी गृहस्थिन नज़र आती थी। उसके चेहरे और आँखों का आकर्षण भी अब पहले जैसा न होकर कुछ और तरह का हो गया था। उसमें एक तरह का पिघलाव आ गया था, जिससे चेहरे की रेखाएँ उतनी तीखी नहीं रही थीं। परन्तु उस पिघलाव ने उसके चेहरे को जो नया रूप दे दिया था, उसमें ज़्यादा कोमलता और आत्मीयता प्रतीत होती थी। उस आकर्षण में पहले जो एक विद्युत्-सी थी, वह अब एक उष्णता में बदल गयी थी। “मैंने कहीं पढ़ा था कि हर इन्सान कम से कम एक कहानी तो लिख ही सकता है।” उसने कहा, “नहीं? अपने जीवन की घटनाओं को ही आदमी सिलसिलेवार लिख दे, तो एक कहानी बन सकती है। नहीं?”

“मैं तो अब कविता-कहानियों की दुनिया से बहुत दूर निकल आया हूँ।” मैंने कहा। मेरे लिए उसके साथ इतना खुलकर और इतना नज़दीक से बात करना एक नया अनुभव ही था। पुराने दिनों में उसने कभी मुझसे ‘अच्छा जी’ और ‘कहिए जी’ से ज़्यादा बात नहीं की थी।”

“मैं कौन लिखने जा रही हूँ!” वह बोली, “मैं भी ऐसे बात ही कर रही थी।” और फिर सहसा बात को बदलते हुए उसने कहा, “दीदी, कोई काम हो तो बता दो, नहीं तो मैं जाऊँ। घर में भी बहुत-सा काम पड़ा छोड़ आयी हूँ।”

“काम तुम अपने आप ही देख लो।” नीलिमा बोली, “पहले हर रोज़ मुझसे पूछकर करती थी?” और एक हल्की रूखी-सी हँसी के साथ उसने मुझसे कहा, “इसके हरबंस भापाजी मुझ पर खीझते रहते थे कि मैं उनकी कमीज़ों के बटन वक़्त पर लगाकर नहीं रखती, यह नहीं करती, वह नहीं करती। इसलिए उनके ये सब छोटे-मोटे काम अब इसने अपने ऊपर ले रखे हैं और उनकी $गैरहाज़िरी में आकर चुपचाप सब कर जाती है। इसके हरबंस भापाजी को किसी तरह की तकलीफ़ हो और वे खीझते रहें, यह इसे बरदाश्त नहीं। मैं कहती हूँ कि अगर कमीज़ का बटन टूटा हो, तो आदमी सूई-धागा लेकर खुद भी लगा सकता है।”

“उन्हें जैसे और तो कोई काम ही नहीं है!” शुक्ला के हाथ उसके शाल में सिमट गये, “वे बेचारे दिन-भर दफ़्तर में सिर खपाते रहें और घर आकर अपने बटन भी खुद ही लगायें। आपसे नहीं होता, तो आप इसे बहाना तो न बनाइए। लाइए, अगर कुछ है करने को, तो मैं कर दूँ और फिर जाऊँ।” तभी उसकी नज़र मेरे पलँग के नीचे रखी चप्पल पर पड़ी, तो वह कुछ चौंक गयी। “दीदी, यह चप्पल...?” उसने कहा।

नीलिमा फिर हँस दी, “क्यों, क्या यह चप्पल हरबंस भापाजी के अलावा और कोई नहीं पहन सकता? घर में आया हुआ मेहमान भी नहीं?” और मेरे चेहरे पर खिसियानेपन की रेखाएँ देखकर वह बोली, “बात असल में यह है कि यह चप्पल और एक टाई यह हरबंस के पिछले जन्मदिन पर ख़रीदकर लायी थी, हालाँकि हरबंस को आज तक इस बात का पता नहीं है। वह इसकी तरफ़ इतना रूखा हो गया है कि इससे बात करना भी पसन्द नहीं करता। उसके सामने यह ग़लती से घर में क़दम भी रख जाए तो बोल-बोलकर मेरे लिए जीना मुश्किल कर देता है। और दूसरी तरफ़ यह लडक़ी है जो उसकी छोटी से छोटी तकलीफ़ भी बरदाश्त नहीं कर सकती और उसका काम करने के लिए पागल हुई रहती है। इसने हरबंस की चप्पल टूटी हुई देखी थी, तो यह चप्पल ख़रीद लायी थी। तब से इस चप्पल को झाड़-पोंछकर साफ़ रखने का काम भी यह खुद ही करती है। इसे भला यह कैसे बरदाश्त हो सकता है कि यह चप्पल किसी और के पैरों को छुए?”

“दीदी!” शुक्ला कुछ नाराज़गी के साथ वहाँ से चल दी, “मैं इस वक़्त तो अपने घर जा रही हूँ। फिर किसी वक़्त इधर आऊँगी।”

“लेकिन हरबंस के कुरते तो देख जाती। शाम को कोई ठीक कुरता नहीं मिला, तो वह मेरी जान खाएगा। परसों जो कुरते तुमने ठीक किये थे, उनमें से एक उसने खुद पहन लिया था और दूसरा सूदन ने पहन रखा है।”

“कुरते मैं माई को भेजकर मँगवा लूँगी।” शुक्ला कमरे से निकलकर अहाते में उतरती हुई बोली, “और कोई चीज़ भेजनी हो, तो वह भी उसके हाथ भेज देना। मुझे इस वक़्त घर में बहुत काम है।” और वह चली गयी।

“मुझे इस लडक़ी के दिमाग़ की कुछ समझ नहीं आती।” नीलिमा अपने गीले बालों को हाथों से सहलाती हुई बोली, “कई बार तो सचमुच मैं सोचती हूँ कि हरबंस का ब्याह मुझसे न होकर इस लडक़ी से ही होना चाहिए था।”

मैं काफ़ी देर से कोको की ख़ाली प्याली हाथ में पकड़े था। मैंने उसे रख दिया और उठते हुए कहा, “मेरा ख़याल है कि मैं अब तैयार हो जाऊँ।” टिकिया खाने और कोको पीने के बाद मैं अपने को काफ़ी स्वस्थ महसूस कर रहा था और मुझे अफ़सोस हो रहा था कि मैंने दफ़्तर से छुट्टी क्यों ले ली। शरीर की स्वस्थता ने शायद मन को थोड़ा अस्वस्थ बना दिया था।

“तुम्हारी तबीयत अब कैसी है?” नीलिमा ने पूछा।

“पहले से काफ़ी ठीक है।”

“तो ठीक है। तुम अब तैयार हो जाओ। मैं तब तक सेंडविच बना लेती हूँ। फिर हम ओखला चलेंगे। हरबंस से मैंने फ़ोन पर पूछा था, मगर उसने कहा है कि वह खाने के वक़्त घर नहीं आ सकेगा, शाम को ही आएगा। हम लोग उसके लौटने तक वापस पहुँच जाएँगे।”

ओखला के पुल से पानी में लचकती हुई छोटी-छोटी नावों को देखते हुए नीलिमा ने कहा, “मैं जब भी यहाँ आती हूँ, न जाने क्यों मुझे सेन के तट पर बितायी हुई शामें याद आने लगती हैं। कितना फ़र्क है इस दुनिया में और उस दुनिया में। फिर भी न जाने क्यों यहाँ आते ही वहाँ की याद हो आती है!”

“तुम यहाँ बहुत बार आती हो?” मैंने पूछा।

“नहीं, बहुत बार तो नहीं।” वह बोली, “मगर कभी मेरा मन घर में बैठे-बैठे ऊब जाता है, तो मैं यहाँ चली आती हूँ। यहाँ आकर लडक़े-लड़कियों को साथ-साथ घूमते और बातें करते देखती हूँ, तो मुझे भी अपने में कुछ ताज़गी का अनुभव होता है। घर बैठे-बैठे तो मेरा मन बुढिय़ाने लगता है। यहाँ आकर मुझे लगता है कि मैं अब भी युवा हूँ, ज़िन्दगी अभी बहुत बाक़ी है और मैं अभी न जाने कितना कुछ कर सकती हूँ। जब मेरे मन पर बोझ बहुत बढ़ जाता है, तो खुली हवा में साँस लेने के लिए मुझे इसी जगह की याद आती है।”

हम लोग काफ़ी देर वहाँ टहलते रहे। जनवरी की सफ़ेद धूप पानी की सतह पर चमक रही थी। हवा में एक हल्का-सा स्पर्श वसन्त का भी था। आसपास काफ़ी चहल-पहल थी—घास पर, बेंचों पर, वृक्षों के नीचे। दायीं ओर के पतले झुरमुटों की तरफ़ से भी कई लोग आ-जा रहे थे। बुरके में से आँखें बाहर निकालकर बहुत उत्सुकता से हर चीज़ पर नज़र डालती हुई दो लड़कियों को देखकर नीलिमा पल-भर के लिए ठिठक गयी और हँसकर बोली, “सचमुच, ज़िन्दगी कितनी अच्छी चीज़ है!”

उसकी इस बात ने उन लड़कियों को काफ़ी गुदगुदा दिया और वे कुछ देर मुड़-मुडक़र हम लोगों की तरफ़ देखती रहीं। पुल से नीचे आकर पुल को देखते हुए, पानी के विस्तार और उस पर नन्ही-नन्ही नावों को देखते हुए, और बायीं ओर ऊँचे उठे हुए मिट्टी के ढूहों को देखते हुए लगता था जैसे आकाश में कई-कई गहराइयाँ हों। आकाश में चीलें तैर रही थीं। पानी की सतह से ऊपर वे एक परदे पर तैरती हुई प्रतीत होती थीं। जब भी कोई चील आकाश से ढूहों की तरफ़ उतरती, तो मन की गहराई में कहीं कोई चीज़ सिहर जाती। नीले आकाश से मटियाले ढूहों पर चील का उतरना एक विश्व की सन्धि से उसके दूसरे विश्व में उतर आने की तरह लगता था। कोई-कोई चील ढूहों के ऊपर से बहुत दूर तक उड़ती चली जाती थी, आकाश की सभी गहराइयों को लाँघती हुई ऊपर से घूमकर जो चीलें पानी की सतह के बराबर उड़ती आती थीं, वे शीशे के बरतन में बन्द मछलियों जैसी लगती थीं...।

हमने वहाँ चाय की एक-एक प्याली पी। नीलिमा ने चाय के साथ सैंडविच नहीं निकाले। कहा कि सैंडविच लौटते हुए रास्ते में कहीं खाएँगे। “मैं तुमसे एक बात जानना भी चाहती हूँ।” उसने कहा, “मगर यहाँ लोगों के बीच बैठकर मैं यह बात नहीं करूँगी।”

लौटते हुए जब हम सडक़ पर काफ़ी दूर निकल आये, तो जामिया मिलिया से थोड़ा पहले एक जगह वह रुक गयी। वहाँ से ढूहीं की तरफ़ एक पगडंडी जा रही थी। उसके मोड़ पर दो पतले-पतले बाँस के टुकड़ों पर एक छोटा-सा नीला बोर्ड लगा था जिस पर लिखा था—

ग्राम जोगा बाई को

सही राम मार्ग

“चलो, सही राम मार्ग से चलते हैं।” उसने हँसकर कहा, “देखें, यह मार्ग हमें कहाँ ले जाता है।”

मगर जल्दी ही वह उस मार्ग से भी हटकर एक ऊँचे ढूह पर चढ़ गयी। वहाँ एक तरफ़ चबूतरा-सा था, पुराना, टूटा हुआ, खुदाई में ज़मीन से निकले खँडहर जैसा। एक तरफ़ जामिया मिलिया की भव्य इमारत थी और दूसरी तरफ़ नीचे क़ब्रिस्तान की सलेटी क़ब्रें नज़र आ रही थीं।

“आओ कुछ देर यहीं चबूतरे पर बैठते हैं,” उसने कहा। मगर बैठने से पहले ही वह ठिठक गयी। वहाँ बिस्कुट के टुकड़ों और चिलगोज़े के छिलकों के अलावा एक और भी चिपचिपी-सी चीज़ पड़ी थी। मैंने चबूतरे को साफ़ करने के लिए रूमाल निकाला, तो उसने कहा, “नहीं, यहाँ नहीं, चलो उधर कहीं और चलकर बैठते हैं। ओखला की सैरगाह आजकल ऐसे ही लोगों की वजह से बदनाम है।”

हम लोग वहाँ से हट आये, तो भी मेरे शरीर में एक झुरझुरी-सी भर रही थी। एक तरफ़ भुरभुरी मिट्टी के टीले, दूसरी तरफ़ जामिया मिलिया की इमारत और तीसरी तरफ़ क़ब्रिस्तान—प्रेम के उन्माद को जगाने के लिए यह भी एक उपयुक्त पृष्ठभूमि हो सकती थी।
 
ओखला की उस ऊबड़-खाबड़ सैरगाह में एक ढूह पर बैठकर टमाटर-सैंडविच को दाँतों से काटते हुए नीलिमा ने कहा, “एक बात पूछूँ? ठीक-ठीक बताओगे?” वह बात जैसे बहुत देर से उसके मुँह पर आ रही थी और वह जैसे-तैसे पूछने के क्षण को टाल रही थी।

“हाँ, हाँ, पूछो।”

“रात को हरबंस की तुमसे क्या-क्या बातें हुई थीं?”

“क्यों?”

“मेरा ख़याल है कि वह मेरी वजह से बहुत दुखी है और अब मुझसे छुटकारा चाहता है।”

“यह तुम कैसे कहती हो?”

“मैं जानती हूँ। वह कई बार मुझसे कह भी चुका है। कल दिन-भर वह मुझसे उलझता रहा था और तभी फ़ोन करके उसने तुम्हें बुलाया था। मैं समझती हूँ कि उसने ज़रूर तुमसे कुछ बातें की हैं। मैं इसलिए जानना चाहती हूँ कि मुझे ठीक से पता चल जाए कि वह अपने दिल में क्या चाहता है। अगर वह सचमुच यह चाहता है कि मैं उससे अलग हो जाऊँ, तो मैं भी उसे अब ज़्यादा परेशान नहीं करूँगी। जितने दिन कट गये हैं, उतने ही बहुत हैं। मैं अकेली रहकर भी किसी तरह ज़िन्दगी काट ही लूँगी। मैं उसके ऊपर बोझ बनकर नहीं रहना चाहती।” और बात करते-करते उसकी आँखें छलछला आयीं। उसने पूरा सैंडविच मुँह में भर लिया और उसे जल्दी-जल्दी निगलने का प्रयत्न करने लगी।

मेरी समझ में नहीं आया कि मैं उससे क्या बात कहूँ। सब कुछ सच-सच बता देने में भी एक बहुत बड़ी उलझन थी। हरबंस को उसका बुरा लग सकता था। मैं पल-भर सूखी घास में चोंच मार-मारकर कुछ ढूँढ़ते हुए कौए को देखता रहा। रह-रहकर उसके पंख फडफ़ड़ा उठते थे। वह मिट्टी के अन्दर किसी चीज़ से गहरा संघर्ष करता जान पड़ता था।

“उसने मुझे लन्दन के दिनों की कुछ बातें बतायी थीं,” मैंने कहा, “कि तुम लोगों को किस तरह वहाँ तकलीफ़ में दिन काटने पड़े और किस तरह बाद में तुम लोग उमादत्त के ट्रुप के साथ यूरोप में घूमते रहे।”

“उसने तुम्हें सब बातें बतायी थीं?”

“सब बातें यानी?”

“सब बातें...जैसे कि जब मैं पहली बार उमादत्त के साथ स्पेन गयी थी, तो तीन दिन पैरिस में अकेली रुक गयी थी...?”

मुझे बहुत जल्दी अपने मन में फ़ैसला कर लेना पड़ा। मैं उस समय उसके सामने झूठ नहीं बोल सकता था। “हाँ, उसने बताया तो था...,” मैंने कहा।

“तब तो उसने तुम्हें सब कुछ बता दिया है। उसने पश्चिमी बर्लिन के बाहर अपने जन्म-दिन की घटना भी तुम्हें बतायी थी?”

“हाँ, बतायी थी।”

वह सहसा बहुत गम्भीर हो गयी। “यह उसने अच्छा नहीं किया,” उसने कहा।

“वह बहुत परेशान था और उस परेशानी में उसने वह सब कह दिया होगा। तुम्हें इससे यह नहीं सोचना चाहिए कि...।”

“मेरे सोचने न सोचने से क्या होगा?” वह बोली, “उसने अपने मन में फ़ैसला कर लिया है, तो ठीक है।”

“कैसा फ़ैसला? उसने किसी फ़ैसले की बात तो मुझे नहीं बतायी।” मैंने कहा।

“उसने तुमसे यह नहीं कहा कि वह हमेशा के लिए मुझे छोड़ देना चाहता है और किसी और के साथ...”

“किस और के साथ? किसी और की बात तो उसने मुझे नहीं बतायी और न ही यह कहा है कि वह इस तरह का कोई दूसरा ख़याल रखता है।”

“तुम सच कह रहे हो, उसने ऐसा कुछ नहीं कहा?”

“मैं बिल्कुल सच कह रहा हूँ।”

वह पल-भर कुछ सोचती हुई मुझे देखती रही। फिर दूसरी तरफ़ देखने लगी। “हो सकता है उसने न कहा हो।” वह बोली, “मगर मुझे लगता यही है कि वह जल्दी ही कुछ-न-कुछ करना चाहता है।”

“यह तुम्हें कैसे लगता है?”

“ऐसे ही लगता है,” वह बोली। “वह असल में मुझे बिल्कुल नहीं समझता। वह शायद सोचता है कि मैं...।”

मैं चुपचाप उसकी तरफ़ देखता रहा।

“वह शायद सोचता है कि मैं...कि मैं उसके प्रति वफ़ादार नहीं रही। पैरिस की घटना का उसने अपने मन में कुछ और ही अर्थ लगा रखा है। मेरे बार-बार विश्वास दिलाने पर भी शायद उसे विश्वास नहीं होता कि वह जो बात सोचता है, वह ग़लत है।”

बात बहुत ना$जुक जगह पर आ गयी थी, इसलिए मैं कुछ न कह सका। मैंने कौए की तरफ़ हाथ करके एक बार ताली बजायी, जिससे उसे लगे कि मेरा ध्यान उसकी बात से ज़्यादा कौए को उड़ाने की तरफ़ है।

“मैं चाहती हूँ कि वह एक झूठी बात को आधार बनाकर कोई फैसला न करे। वैसे उसे जो भी फैसला ठीक लगे, वह कर ले। मैं अपनी ज़िन्दगी अलग रहकर काट सकती हूँ, मगर अपने ऊपर झूठा लांछन बरदाश्त नहीं कर सकती...।”

“मगर मुझसे तो उसने ऐसी कोई बात नहीं कही जिससे लगता हो कि वह अपने मन में ऐसी बात सोचता है...।” मैंने ध्यान कौए पर ही रखे हुए कहा।

“मगर मुझसे वह कई बार कह चुका है।” उसने अपने ऊपर के होंठ को दाँतों में चबा लिया और आँखें बन्द करके फिर पल-भर कुछ सोचती रही, “देखो, मैंने आज तक पूरी बात उसे नहीं बतायी। इसलिए नहीं बतायी कि उसका सन्देह कम न होकर शायद बढ़ ही जाता। मैं जीवन में किसी भी परिस्थिति का सामना करने से नहीं डरती। मगर झूठा सन्देह मुझे एक ऐसे नश्तर की तरह लगता है जो घाव नहीं करता, मगर हर समय चुभता रहता है। मुझे इस तरह की परिस्थिति बहुत लिजलिजी लगती है और उसके सामने मेरा धैर्य छूट जाता है। अगर उसने तुम्हें अपने दिल की बात बतायी है, तो मैं भी तुम्हें अपनी स्थिति बता सकती हूँ। तुम जितने उसके मित्र हो, उतने ही मेरे भी हो। कम से कम उन दिनों मैं ऐसा ही समझती थी। अगर उन दिनों तुम अचानक ही ग़ायब न हो जाते, तो बहुत कुछ शायद उस तरह न होता जैसे अब हुआ है। तुम नहीं जानते कि उस शाम को तुम्हारे न आने से मेरे लिए सारी स्थिति कैसे और की और हो गयी थी। मगर वह अलग बात है। मैं इस समय दूसरी बात करना चाहती हूँ। मगर उससे पहले मैं तुमसे यह जानना चाहती हूँ कि क्या मैं आज भी तुम्हें अपना मित्र समझ सकती हूँ और तुमसे आशा कर सकती हूँ कि तुम मेरी सहायता करोगे?”

“अगर मेरे करने से कुछ हो सकता है, तो मैं ज़रूर करूँगा।” मैंने कहा, “मगर उस दिन की जो बात तुम कह रही थीं, मैं उसे भी जानना चाहता हूँ। उस दिन मेरे न आने से कैसे स्थिति और की और हो गयी थी? मैं चाह रहा था कि मेरे भाव और शब्दों से यह प्रकट न हो कि मैं किसी दिलचस्पी की वजह से यह बात कह रहा हूँ। मगर मेरे मन में वह साँझ फिर घिरने लगी थी जब सारा दिन मैं बसों में घूमता रहा था और रात होने पर...।”

“इस समय तुम उस बात को जाने दो।” वह बोली, “वह बीते हुए दिनों की बात है जो फिर भी की जा सकती है। अब हम सब लोग तब से नौ साल बड़े हो गये हैं और हम सबकी ज़िन्दगी तब से कई-कई मंज़िलें तय कर आयी है। उस दिन तुम पहली बार हरबंस के साथ आये थे, तो मेरे दिल में तुम्हारे लिए बहुत गुस्सा था। इसलिए उस दिन मैंने तुमसे ठीक से बात भी नहीं की थी। कल रात को भी मुझे तुम पर गुस्सा था क्योंकि शुक्ला के यहाँ न जाने के लिए हरबंस ने तुम्हारे आने को ही बहाना बनाया था। मगर आज सुबह तुम्हें दवाई की टिकिया देते हुए मुझे लगा कि शायद आज भी मैं उन दिनों की तरह तुमसे बात कर सकती हूँ। हो सकता है तुम्हारे उस दिन न आने की कोई ख़ास वजह रही हो।”

“तुम मुझे बात बताओ, तो मैं तुम्हें वजह भी बता दूँगा।” मैं नहीं चाहता था कि वह प्रकरण टल जाए। मेरी उत्कंठा इतनी बढ़ गयी थी कि मेरा नौ साल का सारा तजरबा उसके सामने बेकार हो रहा था।

“वह वजह भी मैं तुमसे सुन लूँगी।” वह उस ओर से उसी तरह उदासीन रहकर बोली, “मगर पहले मैं चाहती हूँ कि तुमको सारी बात बताकर अपना मन हल्का कर लूँ। तुम मुझसे वादा करते हो कि तुम यह बात किसी को नहीं बताओगे? हरबंस को भी नहीं? मतलब जब तक कि पहले मुझसे न पूछ लो?”

“मैं वादा करता हूँ कि तुमसे पूछे बिना किसी को नहीं बताऊँगा,” मैंने कहा। मैं बहुत कठिनाई से अपने मन को नौ साल पहले की साँझ से बाहर निकालने का प्रयत्न कर रहा था। फिर भी बार-बार यह विचार मन में कौंध जाता था कि साँझ को नीलिमा से मिल लिया होता, तो क्या होता! क्या तब अगले दिन सुबह मैंने त्यागपत्र न दिया होता?

“तुम मुझे एक मित्र की तरह वचन दे रहे हो?”

मैंने सिर हिलाया। मैं उसके विश्वास को तोडऩे की बात क्या सोच भी सकता था? और आज भी अगर उसकी अनुमति न होती, तो क्या मैं यह सब यहाँ लिखता?

“मैं तुम्हें सिर्फ़ इतना ही बताना चाहती हूँ कि मैं पैरिस में तीन दिन अकेली क्यों रह गयी थी और वे तीन दिन मैंने किस तरह बिताये थे।”

मेरे मन में उत्सुकता जाग आयी। दूसरों के जीवन के अन्तरंग में झाँककर देखने का अवसर मिलने पर मन में कब उत्सुकता नहीं जागती! वह बच्चा क्या सारी उम्र हमारे अन्दर जीवित नहीं रहता जिसे रोशनदान पर सीढ़ी लगाकर दूसरों की गतिविधियाँ देखने की आदत होती है?

“हम लोग स्पेन से पैरिस आये थे और सारा ट्रुप लौटकर लन्दन जा रहा था...।” नीलिमा ने अपने पैर समेट लिये और शरीर का पूरा बोझ एक हथेली पर डाल लिया। मैंने भी सुननेवाले की मुद्रा में अपना भार एक कुहनी पर डाल लिया। कौआ न जाने कब का उडक़र जा चुका था और जामिया की इमारत, कब्रिस्तान और गाँव के घरों को छोडक़र दूर तक मटियाले रंग के टीलों और गड्ढों के सिवा कुछ नज़र नहीं आता था। उस सारी ज़मीन को जैसे बरसों का घुन लगा था जिससे वह इतनी खोखली और भुरभुरी हो गयी थी। अपने आदिम रूप में एक कोढ़ी की तरह धूप में पड़ी हुई वह जमीन हवा से हाँफती और कराहती-सी जान पड़ती थी। किसी-किसी क्षण हवा से धूल उड़ आती थी, मगर रेतीली धूल ज़मीन से ज़्यादा ऊँची नहीं उठ पाती थी। बीस गज़ दूर सडक़ से कभी एक बस और कभी दो-एक कारें गुज़र जाती थीं। एक सोलह-सत्रह बरस का लडक़ा हाथ में एक पतली-सी टहनी लिये दूर से हम लोगों की तरफ़ ईर्ष्या-भरी आँखों से देख रहा था। ढूहों पर पड़ती हुई धूप का रंग पिघली हुई गन्धक जैसा था। मुझे प्यास लग आयी थी जिससे मेरे होंठ सूख रहे थे।

“स्टेशन तक मैं उन लोगों के साथ ही गयी थी और तब तक मैंने पीछे रुकने का निश्चय नहीं किया था...।”

गर्द का एक झोंका उठा जिससे आँखों में किरकिरी-सी भर गयी। मेरी एक आँख से पानी बह आया। मैं हाथ से आँख को मलने लगा।

“मुझे पता था कि मैं इसके सिवा कुछ कर ही नहीं सकती।” नीलिमा अपनी चप्पल से मिट्टी को ठोकरें लगाती हुई कह रही थी। मैं सोच रहा था कि वहीं कहीं पीने के लिए पानी मिल जाता, तो कितना अच्छा होता।

“मगर तुम्हें इसके लिए अफ़सोस तो नहीं है न?” मैंने पूछा।

“नहीं। अफ़सोस नहीं है। अफ़सोस इसलिए नहीं है कि मैं और कुछ भी करती, तो शायद बहुत दुखी होती। मगर एक बात का अफ़सोस ज़रूर है कि मैं उसके बाद भी हरबंस को ख़ुश नहीं रख सकी। बल्कि इस बात को सोच-सोचकर वह परेशान हो रहा है और आज तक मुझे कुरेदता रहता है कि कहीं मैंने...”

“मगर तुम्हें यह भी तो सोचना चाहिए कि उसकी जगह कोई और आदमी होता, तो शायद इतना भी बरदाश्त न करता और खुद परेशान रहने की जगह न जाने क्या कर डालता!”
 
“यह मैं जानती हूँ।” वह बोली, “और इसके लिए उसकी क़द्र भी करती हूँ। मगर फिर बीच में जाने क्या हो जाता है! मुझे लगता है जैसे हम पति-पत्नी न होकर एक-दूसरे के दुश्मन हों और साथ रहकर एक-दूसरे से किसी बात का बदला ले रहे हों। शायद उसके मन के सन्देह के कारण ही यह स्थिति पैदा होती है। अगर किसी तरह उसका मन मेरी तरफ़ से साफ़ हो जाए जिससे वह बात-बात पर मेरे ऊपर ताने कसना छोड़ दे, तो हो सकता है हम लोग ठीक से ज़िन्दगी बिता सकें। कम से कम अरुण के लिए तो हमें सोचना ही चाहिए कि उस पर इस सबका क्या असर पड़ता होगा। वह कभी हरबंस के गिर्द हो जाता है कि तुम ममी को इस तरह क्यों डाँटते हो और कभी मेरी साड़ी खींचकर फाडऩे लगता है कि तुम बाबा के सामने इस तरह क्यों बोलती हो। वह इतनी छोटी उम्र में ही सयाना होता जा रहा है और मुझे इससे डर लगता है। कभी जब हम लोग लड़ते हैं, तो वह बैठा-बैठा रोने लगता है और घर की चीज़ें तोडऩे-फोडऩे लगता है। मुझे डर लगता है कि हम लोगों की खींचतान में कहीं वह बहुत ही एबनॉर्मल न हो जाए।”

“इसके अलावा तुम समझती हो कि तुम लोगों के सम्बन्ध में और कोई लकीर नहीं है?”

“नहीं...और कोई लकीर नहीं है। कम से कम मेरे मन में तो नहीं है। मैं नहीं समझती कि...या शायद...मगर और कोई बात महत्त्वपूर्ण नहीं है। कम से कम मैं और चीज़ों को महत्त्व नहीं देती। हम लोग अब काफ़ी बड़े हो गये हैं और...हाँ, एक बात और है। मैं यह अच्छी तरह जानती हूँ कि मैं नाचने के बिना नहीं रह सकती।...सुबह घंटा-भर प्रैक्टिस कर लेती हूँ, तो उससे मेरी अच्छी कसरत भी हो जाती है और...मैं नहीं चाहती कि मेरा शरीर थुल-थुल हो जाए और मैं अभी से बूढ़ी लगने लगूँ। मुझे बुढ़ापे से बहुत डर लगता है और मैं कम से कम दस साल और ऐसी ही बनी रहना चाहती हूँ। तुम देखो, मैं अब चौंतीस की हो चुकी हूँ और मेरे पास मुश्किल से यही दस साल हैं।...लन्दन से आने के बाद मैं अरुण की वजह से एक भी शो नहीं दे सकी। मुझे यह सोचकर डर लगता है कि मैं ऐसे ही बूढ़ी होकर मर जाऊँगी और लोग यह जानेंगे भी नहीं कि मैं भी कभी थी और...देखो, मैं नाचना नहीं छोड़ सकती। उसके लिए चाहे मुझे कुछ भी क्यों न बलिदान करना पड़े। मैं मरने से पहले एक बार खूब नाम कमाना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ कि लोग मुझे जानें और...मगर यह नहीं कि मैं सिर्फ़ ख्याति चाहती हूँ। मैं जानती हूँ कि मेरे अन्दर वह चीज़ है जो मुझे इस क्षेत्र में आगे ला सकती है। तुमने कामिनी और शची के शो देखे होंगे। मैं नहीं मानती कि उनकी आज जितनी ख्याति है, वे उतनी ही बड़ी कलाकार भी हैं। दरअसल...तुम नहीं जानते कि मेरे शरीर में उन दिनों कितनी लोच और लचक थी। मैं अब भी ठीक से अभ्यास करूँ, तो...तो शची और कामिनी के बराबर तो आ ही सकती हूँ। मैं केवल ख्याति की भूखी नहीं, मगर मेरे अन्दर वह चीज़ है, तो मैं क्यों न...क्यों न उनकी तरह ही जानी जाऊँ? जहाँ तक अभिनय का सम्बन्ध है, मेरा अभिनय उन दोनों से अच्छा होता है। मेरे गुरु भी कहते थे कि मेरी जैसी भावपूर्ण आँखें और हाथ उनकी किसी शिष्या के नहीं हैं। मैं वही चीज़ पाना चाहती हूँ जो मेरा अधिकार है...।”

वह बात कर रही थी और मैं फिर आस-पास की ऊँची-नीची भुरभुरी ज़मीन को देख रहा था। चींटियों की एक पंक्ति हमारे पास से चक्कर काटकर सीधी सामने की झाड़ी की तरफ़ जा रही थी। दूर तक के झाड़-झंखाड़ ढलती धूप में सदियों के घुन खाये कंकालों जैसे नज़र आ रहे थे। सारे वातावरण में एक विरसता थी, एक उदासीनता, एक भावहीन विरक्ति। दूर सडक़ पर कितनी ही गाडिय़ाँ एक-दूसरी के पीछे आ रही थीं और वह ज़मीन जैसे कपड़े उतारकर और बाँहें फैलाकर उनके सामने एक मौन प्रदर्शन कर रही थी। वह भाव का एक विवश, हताश, व्यंग्यात्मक मुद्रा में मुँह बिचकाने जैसा था। मुझे लग रहा था कि मेरा ही नहीं, उस सारे वातावरण का गला सूखा है और उसे प्यास लग रही है।

“हमें लौटने में देर तो नहीं हो जाएगी?” मैंने कहा, “अब हम चलते-चलते बातें करें, तो कैसा है?”

नीलिमा जैसे चौंककर उठ खड़ी हुई। “अरे हाँ!” उसने कहा, “मैं तो भूल ही गयी थी कि हरबंस के दफ़्तर से आने का समय हो गया है। हमें उसके लौटने से पहले ही घर पहुँच जाना चाहिए था।”

हम लोग पैदल चलते हुए फ्रेंच कॉलोनी के पुल तक आ गये। दिन जल्दी ढल गया था और झुटपुटा-सा अँधेरा उतर आया था। फटे-फटे बादल के गेरुआ टुकड़े दूर रेल की पटरियों पर झुके हुए थे। नीलिमा चलते-चलते सहसा ठिठक गयी।

“क्या बात है?” मैंने पूछा।

“कुछ नहीं।” वह बोली, “वह गाड़ी आ रही है। उसे गुज़र जाने दो।”

दायीं तरफ़ से रेल की पटरियों पर एक स्याह इंजन हमारी तरफ़ रेंगता आ रहा था। हम लोग पुल पर रुककर देखते रहे। गाड़ी धड़धड़ाती हुई पुल के नीचे से निकलकर चली गयी, तो नीलिमा ने एक उत्तेजना में अपने दोनों हाथ भींच लिये और बोली, “मुझे गाड़ी का दूर से आना और गुज़र जाना बहुत अच्छा लगता है, जाने क्यों!”

मैंने कुछ नहीं कहा और हम लोग चुपचाप आगे चलने लगे। कुछ आगे चलकर नीलिमा फिर बोली, “मैंने आज न जाने क्यों तुमसे इतनी बातें की हैं! मैं तो जैसे किसी से यह सब कहने के लिए भरी बैठी थी। तुम भी सोचते होगे कि इसका दिमाग़ कुछ ख़राब है। नहीं?”

“इसमें दिमाग़ ख़राब होने की तो कोई बात नहीं थी,” मैंने कहा।

“मुझे खूब ख़ुश रहना और भरपूर ज़िन्दगी जीना अच्छा लगता है।” वह और उत्साहित होकर बोली, “मैं बहुत चाहती हूँ कि मेरा कोई ऐसा मित्र हो जिससे मैं अपने मन की सब बातें कह सकूँ। उस दिन भी मैं तुमसे बहुत-बहुत बातें करना चाहती थी...।”

“किस दिन?”

“उस दिन जिस दिन तुम नहीं आये थे। जिस दिन मैं तुम्हें लाने के लिए तुम्हारे कसाईपुरा या क़स्साबपुरा, क्या था वह, वहाँ गयी थी।”

उस दिन की बात याद हो आने से मेरा मन फिर एक उदासी में डूबने लगा। नीलिमा ने उस दिन की पहले भी चर्चा की थी, तो कहा था कि अगर उस शाम को मैं उससे मिलने आया होता तो शायद...।

“उस दिन मैं एक खास वजह से नहीं आ सका था।” मैंने कहा, “उसके बाद तो मैं दिल्ली से चला ही गया था।”

“उस दिन तुम आये होते, तो शायद मैं बहुत हल्के मन से मैसूर और फिर हरबंस के पास जा सकती,” उसने कहा।

“कैसे?”

“उन दिनों मैं शुक्ला की बात सोचकर बहुत परेशान थी। मैं नहीं चाहती थी कि मैं चली जाऊँ और पीछे सुरजीत को उससे घनिष्ठता बढ़ाने का मौका मिल जाए। मुझे वह आदमी अच्छा नहीं लगता था। मगर मेरा जाना ज़रूरी था और हुआ भी वही जिसका मुझे डर था। मैं चाहती थी कि...।”

वह सहसा चुप कर गयी। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धडक़ रहा था। मैं आगे की बात सुनने के लिए बहुत उत्सुक था।

“मैं चाहती थी कि मेरे जाने से पहले शुक्ला का ध्यान सुरजीत की तरफ़ से हट जाता। जीवन भार्गव चला गया था और तुम्हीं एक ऐसे व्यक्ति मुझे नज़र आते थे जिसे मैं...मगर अब बात करने में क्या रखा है! अब तो मैं यही चाहती हूँ कि उसकी ज़िन्दगी अच्छी तरह कट जाए। तुम्हें पता है सुरजीत की यह दूसरी या तीसरी शादी है?”

“मुझे पता है,” मैंने मरे हुए मन से कहा।

“मैं उन दिनों एक प्रयत्न करके देखना चाहती थी और उसी बारे में तुमसे बात करना चाहती थी। वैसे सोचती हूँ कि हो सकता है मेरे करने से कुछ न भी होता। अच्छा बताओ, तुम्हें शुक्ला अच्छी नहीं लगती थी? मेरा तो ख़याल था कि तुम...।” और वह अपने स्वाभाविक अन्दाज़ में हँसकर चुप कर गयी।

मेरा मन इस क़द्र गिर गया था कि मुझे बात करने के लिए बहुत प्रयत्न करना पड़ा। “मैंने ऐसी नज़र से कभी देखा ही नहीं था,” मैंने कहा।

“मैं बताऊँ, शुक्ला ने सुरजीत से ब्याह क्यों किया है?” वह बोली।

“क्योंकि वह उसे चाहती थी।”

“वह सुरजीत को इसीलिए चाहती थी कि वह भी हरबंस की तरह ही लम्बे-ऊँचे डीलडौल का है और हरबंस उन दिनों उसकी बहुत प्रशंसा किया करता था। तुम्हारे बारे में उसकी राय थी कि तुम्हें अपना बहुत गुमान है और तुम किसी से सीधे मुँह बात तक नहीं करते। बेचारी शुक्ला! उसे सुरजीत के पहले जीवन का तब पता चला जब वह उसे अपना सब कुछ दे चुकी थी। उस कच्ची उम्र में उसे भले-बुरे की पहचान हो ही क्या सकती थी? हरबंस भी उसे बीच में ही छोडक़र चला गया था, और मैं भी चली गयी। बाद में उसके लिए एक विचित्र परिस्थिति खड़ी हो गयी। वह शादी हम लोगों के लौटकर आने के बाद ही करना चाहती थी, मगर सुरजीत ने उससे कहा था कि नया कानून लागू हो जाएगा, तो वह उससे ब्याह नहीं कर सकेगा। तुम्हें पता है नया कानून अठारह मई सन् पचपन से लागू हुआ है और इनका ब्याह सत्रह मई सन् पचपन की रात को हुआ है? ब्याह के पहले दिन शुक्ला बीजी की गोद में सिर डालकर खूब रोयी थी। बीजी कहती हैं कि मुझे और हरबंस को बहुत याद करती रही थी।”
 
रास्ता बहुत बाक़ी था और मुझसे अब चला नहीं जा रहा था। मैंने सुझाव दिया कि हम लोग बस ले लें। अगले स्टाप से हमने बस पकड़ ली। जब हम लोग बस से उतरे, तो भी मुझे पैरों में इतनी थकान महसूस हो रही थी कि मुझे एक क़दम भी चलना मुश्किल लग रहा था। सडक़ पर दूर तक दिखायी देते हुए खम्भे मुझे जेल के सींखचों जैसे लग रहे थे। मेरा गला इतना ख़ुश्क हो रहा था कि एक शब्द भी मुझसे नहीं बोला जाता था। दोराहे पर आकर मैंने नीलिमा से कहा कि मैं अब उससे विदा लेना चाहूँगा।

“तुम यहाँ से कैसे जा सकते हो?” नीलिमा मेरा हाथ पकडक़र बोली, “हरबंस अगर आ गया होगा, तो मैं अकेली उसकी डाँट कैसे सुनूँगी? और तुम चाय या कॉफ़ी पिये बिना कैसे जा सकते हो?” और फिर थोड़ा हँसकर उसने कहा, “तुम्हें मैं घर पर चलकर एक टिकिया और खिला दूँगी। कहीं यही न हो कि मेरी बातें सुनने-सुनने में जाकर फिर बीमार हो जाओ...।”

उनके घर तक आधा फर्लांग रास्ता मुझे बहुत लम्बा लग रहा था। उतना लम्बा रास्ता चलकर जाना मुझे बहुत मुश्किल लग रहा था। मुझे ऐसे महसूस हो रहा था जैसे सरदी की वह शाम एक जगह ठिठककर रह गयी हो—अपने अन्दर के किसी आवेग से स्तब्ध, हैरान, खोयी हुई। सारा आकाश एक मैली चादर की तरह था जिस पर जगह-जगह सिकुडऩें पड़ी थीं। वातावरण की उस निर्जीवता को पास के किसी घर से आती हुई रेडियो की आवाज़ तोड़ रही थी। मगर वह आवाज़ भी केवल एक गूँज ही थी, भारी और बोझिल, जिसमें शब्द, अर्थ या लय, कुछ भी नहीं था...। हम लोग अभी घर के दरवाज़े के बाहर ही थे कि सडक़ की बत्तियाँ जल उठीं।

घर भी उस समय बहुत नि:स्तब्ध और ठंड में सिमटा हुआ-सा लग रहा था। किसी भी कमरे में रोशनी नहीं थी। बाँके ने दरवाज़ा खोला, तो उसका चेहरा भी इस तरह उतरा हुआ था जैसे वह कहीं से मार खाकर आया हो।

“साहब अभी नहीं आये?” नीलिमा ने उसके दरवाज़ा खोलते ही पूछा।

“आये थे,” बाँके के संक्षिप्त-से उत्तर में कुछ ऐसा था जिसने हम दोनों को चौंका दिया।

“कब आये थे और अब कहाँ गये हैं?” नीलिमा ने उतावली में पूछा।

“पहले दोपहर को खाना खाने आये थे।” बाँके ने कहा, “तब दो बजे तक घर पर रहे। मैंने उन्हें बताया था कि आप लोग ओखला गये हैं। अभी आधा घंटा हुआ फिर आये थे और यह पूछकर कि आप लोग अभी आये हैं या नहीं, उसी वक़्त वापस चले गये।”

“माई गुडनेस!” नीलिमा हताश स्वर में बोली और बैठक में जाकर टूटी-सी दीवान पर बैठ गयी, “जाते हुए कुछ कहकर नहीं गये?”

बाँके उत्तर देने से पहले क्षण-भर आँखें इधर-उधर करता रहा जैसे उत्तर देने से बचना चाहता हो। फिर उसने अपने हाथ बग़लों में दबाये हुए कहा, “कह गये थे कि वे रात को खाना नहीं खाएँगे और हो सकता है रात को घर भी न आयें।”

“मगर क्यों?” नीलिमा ने अपनी हताशा से शिथिल पडक़र पीछे टेक लगा ली। “मैं कहती हूँ कि इस आदमी का दिमाग़ बिल्कुल ख़राब हो गया है और अब कुछ नहीं हो सकता।” उसका भाव उस पिटे हुए बच्चे जैसा हो रहा था जो जैसे भी हो, पीटनेवाले पर अपने मन की खीझ निकाल लेना चाहता हो। “सिली!”

“छोटी बीबीजी कह गयी थीं कि आप आयें, तो मैं उन्हें पता दे दूँ।” बाँके बोला, “वे अरुण को भी उधर अपने यहाँ ले गयी हैं। वह उधर ही खेल रहा है।”

“उससे कह दो कि मैं आ गयी हूँ।” नीलिमा का चेहरा उस अभियुक्त की तरह हो गया जिसे निरपराध होते हुए भी किसी के सामने अपने सच की सफ़ाई देनी हो।

बाँके चला गया, तो वह मेरी तरफ़ देखकर बोली, “अब बताओ मैं क्या कर सकती हूँ?”

मैं तब तक बैठा नहीं था और दीवार पर लगी हुई सियासी गुडिय़ों को देख रहा था। मैंने सोचा था कि उसे घर पहुँचाकर मैं तुरन्त ही वहाँ से चल पड़ूँगा। मैं उस समय कुछ देर अकेला रहना चाहता था। इस नयी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था। वहाँ से जाना चाहते हुए भी मुझे जाना सम्भव नहीं लग रहा था।

“हम लोगों को जल्दी लौट आना चाहिए था,” मैंने कहा।

“मगर वह कुछ देर यहाँ इन्तज़ार नहीं कर सकता था?” नीलिमा कुछ चिल्लाकर बोली, जैसे कि हरबंस वहाँ खड़ा उसकी बात सुन रहा हो, “दोपहर के लिए तो उसने खुद ही फ़ोन पर कहा था कि वह घर नहीं आएगा। तुम बताओ इस तरह के शक की ज़िन्दगी भी कोई ज़िन्दगी है? मैं उसके किसी दोस्त के साथ भी बाहर घूमने के लिए नहीं जा सकती? ख़ासतौर पर ऐसे दोस्त के साथ जिसे वह अपनी ज़िन्दगी की सब बातें बता सकता है? मगर उसके दिमाग़ को तो ऐसा घुन लगा है कि वह मेरे ऊपर शक किये ब$गैर रह ही नहीं सकता। मैं किसी को चाय की प्याली पकड़ाते हुए हँस भी दूँ तो उसके दिमाग़ की नसें फडक़ने लगती है। मैं कहती हूँ कि यह उसके अपने मन का पाप है जो वह मेरे अन्दर देखना चाहता है। क्योंकि खुद वह किसी स्त्री के साथ खुले मन से मित्रता का व्यवहार नहीं कर सकता, इसलिए उसे हमेशा यही सूझता है कि मैं भी अगर किसी के साथ बात करती हूँ, या किसी का हाथ छू लेती हूँ, तो इसमें मेरे मन में कोई पाप ही होना चाहिए। अब आप रात को खाना नहीं खाएँगे और नहीं आएँगे! न आयें, मेरी बला से! अगर बात सचमुच यहाँ तक पहुँच गयी है, तो मैं खुद ही उसे छोडक़र अलग हो जाऊँगी। मैंने लन्दन में हेयर ड्रेसिंग का डिप्लोमा लिया था। मैं जाकर किसी सैलून में नौकरी कर लूँगी। वह अलग रहे, मैं अपने बच्चे के साथ अलग रहूँगी। और अगर वह लडक़े को भी मुझसे छीनना चाहेगा, तो मैं उसे भी छोड़ दूँगी। मुझे अपने लिए कुछ भी नहीं चाहिए, कम से कम इसके घर की कोई चीज़ नहीं चाहिए। मैं सचमुच इस ज़िन्दगी से बेज़ार आ गयी हूँ।

मेरा मन अपने अपवाद में डूबा हुआ था और मैं तब तक भी यह तय नहीं कर पाया था कि मैं कुरसी पर बैठ जाऊँ या नहीं। मैं नौ साल पहले की शाम से उस शाम तक के सारे दु:ख-दर्द में से नये सिर से गुज़र रहा था और उस दर्द को जो नया रूप मिल गया था, उससे मैं भी अन्दर उसी तरह छटपटा रहा था जैसे नीलिमा बाहर छटपटा रही थी।

“पहली चीज़ तो यह है कि यह पता किया जाए कि वह गया कहाँ है।” मैंने फिर भी अपने पर वश किये हुए कहा और कुरसी पर बैठ गया। “अगर उसे कोई ग़लतफ़हमी हो गयी है, वह उससे मिलकर बात करने से ही दूर होगी।”

“मुझे उसकी कोई ग़लतफ़हमी दूर नहीं करनी है।” नीलिमा उसी तरह चिल्लाकर बोली, “आज एक ग़लतफ़हमी दूर करूँगी, तो कल उसे दूसरी ग़लतफ़हमी हो जाएगी। मैं कहाँ तक रोज़-रोज़ उसके सामने मुजरिम की तरह सफ़ाई देती रहूँ? मुझसे यह सब नहीं होगा। अगर वह मुझसे कुछ भी कहेगा, तो मैं आज ही उसका घर छोडक़र चली जाऊँगी।”

उसी समय अरुण एक होलाहूप को कमान की तरह कन्धे पर डाले बाहर से आ गया। “ममी!” उसने कहा और दौडक़र उससे चिपट गया। नीलिमा उसे छाती से लगाकर पागलों की तरह चूमने लगी।

“ममी,” अरुण उससे अलग होकर होलाहूप को पहिये की तरह घूमता हुआ बोला, “आज छुक्का मौछी ने बिनी के बहुत-छे खिलौने मेले को दे दिये हैं। कल उछको जो-जो प्लेजेंट मिले थे, वो आधे मैंने ले लिये हैं। यह देखो होलाहूप...!” और वह खिलखिलाकर हँस दिया।

“तुम जाओ और बाँके से कहो कि तुम्हारा मुँह साफ़ कर दे।” नीलिमा अपने स्वर को सँभालकर बोली।

“मैं मौछी के घल में जा लहा हूँ,” कहता हुआ अरुण तुरन्त कमरे से भाग गया, जैसे उसे डर हो कि ममी उसे पीछे से पकड़ न ले। उसके वहाँ से जाते न जाते शुक्ला कमरे मे आ गयी। “दीदी,” उसने कहा और मुझे देखकर ठिठक गयी।

नीलिमा ने एक बार अवज्ञा-भरी नज़र से उसकी तरफ़ देखा और बोली, “तुम देख रही हो कि मैं कैसी नरक की ज़िन्दगी जी रही हूँ!”

“आप तो पागल हो गयी हैं!” शुक्ला अब संकोच छोडक़र सामने आ गयी और मेरे साथ की कुरसी पर बैठ गयी, “आप इतने सालों में भापाजी को नहीं समझ सकीं, तो मैं नहीं जानती कि कब समझ सकेंगी।”

“मैं उसे कभी नहीं समझ सकूँगी।” नीलिमा का स्वर फिर तीखा हो गया, “और मैं ही क्या, दुनिया की कोई भी स्त्री उसे समझ सकती है, इसमें मुझे शक है।”

“आप उनके साथ ज़्यादती कर रही हैं।” शुक्ला बड़प्पन के लहज़े में बोली, “वे इतने अच्छे हैं कि दुनिया में कोई क्या होगा! आप उनके साथ इतनी ज़्यादतियाँ कर जाती हैं और वे फिर भी बरदाश्त कर लेते हैं। उनकी जगह कोई और होता, तो देखती किस तरह आपकी ज़्यादतियाँ सहता!”

“मैं ये सब बातें नहीं सुनना चाहती।” नीलिमा बोली, “मैं उसके साथ ज़्यादतियाँ करती हूँ? उसने मेरे लिए जीना मुश्किल कर रखा है और आप कहती हैं कि मैं उसके साथ ज़्यादतियाँ करती हूँ। मैं जानती हूँ कि तुम भी अपने मन से मुझसे नफ़रत करती हो; और क्यों नफ़रत करती हो, यह भी जानती हूँ।”

शुक्ला कुछ देर चुप रहकर शिकायत-भरी आँखों से उसकी तरफ़ देखती रही। सुबह मैंने उसे देखा था,तो वह सजी-सँवरी हुई नहीं थी। मगर अब वह सुबह की तरह एक गृहस्थिन न लगकर फिर एक लडक़ी-सी ही लग रही थी। वह आसमानी रंग की औरंगाबादी रेशम की प्लेन साड़ी बाँधे थी, और उसके बालों की दो-एक लटें उसके चेहरे पर आयी हुई थीं। जाने वे लटें सचमुच बहुत सुन्दर थीं या मेरे दिमाग़ का आईना ही उस समय ऐसा था कि मुझे उसकी हर छोटी से छोटी चीज़ बहुत सुन्दर लग रही थी। मुझे फिर एक बार भद्रसेन की कही हुई बात याद आ गयी, “शी रेडिएट्स ब्यूटी!” हालाँकि मेरे अन्दर का अनुभवी पत्रकार बार-बार मुझे अपने नौ वर्ष के निकाले हुए निष्कर्षों की याद दिला रहा था।

“दीदी, आप जानती हैं कि आप यह कितनी ग़लत बात कह रही हैं!” शुक्ला कुछ देर चुप रहकर बोली, “आप जानती हैं मैं आपसे कितना प्यार करती हूँ। मैं आपके दिल को भी उतनी ही अच्छी तरह समझती हूँ जितनी अच्छी तरह भापाजी के दिल को समझती हूँ। आप दिल की कितनी साफ़ हैं, यह मैं जानती हूँ और यह भी जानती हूँ कि आपको ज़रा भी लुकाव-छिपाव पसन्द नहीं। मगर आपको सिर्फ़ इतना सोचना चाहिए कि किन बातों से भापाजी को तकलीफ़ होती है। आप जानते हुए भी फिर-फिर वही बातें क्यों करती हैं? मैं नहीं समझ सकती कि उसमें आपको क्या सुख मिलता है! भापाजी दिल के इतने अच्छे हैं कि दूसरे का बड़े से बड़ा अपराध भी क्षमा कर देते हैं। उनकी जगह कोई और आदमी हो, तो कभी नहीं करेगा। आप उनके दोष ही दोष देखती हैं और उनके इस गुण को कभी नहीं देखतीं। आप मुझे चाहे जो कह लें, मगर मुझे आपकी इन बातों से तकलीफ़ ज़रूर होती है।”

“तुम्हें तकलीफ़ होती है, मैं जानती हूँ।” नीलिमा फिर उसी तरह बोली, “मगर मुझे कभी कोई तकलीफ़ नहीं होती! मुझे तकलीफ़ हो ही कैसे सकती है!”

शुक्ला ने एक बार मेरी तरफ़ देखा और फिर कुछ अव्यवस्थित होकर उठती हुई बोली, “मैं आपसे कितनी बार कह चुकी हूँ कि आप ये फ़िजूल की बातें न किया करें। मैं अपने लिए भी सोचती हूँ कि सुरजीत मेरे लिए जो कुछ करता है, मैं उसका दसवाँ हिस्सा भी उसके लिए नहीं कर पाती। लेकिन मैं यह कोशिश ज़रूर करती हूँ कि उसके लिए कुछ कर सकूँ। आपसे भी मैं यही कहती हूँ कि जितना भापाजी आपके लिए करते हैं, अगर आप उसका दसवाँ हिस्सा भी उनके लिए करें, तो...।”

“मुझमें और तुममें बहुत फ़र्क है।” नीलिमा भी साथ ही उठ खड़ी हुई। “तुम्हारे लिए घरेलू किस्म की ज़िन्दगी ही सब कुछ है, मेरे लिए नहीं है। मेरी अपनी और भी ज़रूरतें हैं।”

“तो अपनी उन ज़रूरतों के लिए अरुण की और भापाजी की ज़िन्दगी तबाह कर डालिए, और साथ ही अपनी भी।” शुक्ला सहसा गुस्से से तमतमा उठी, “मैं आपसे और क्या कह सकती हूँ? यह आपकी ज़िन्दगी है और इसे बनाने-बिगाडऩे वाली आप ही हैं।” और वह गुस्से के आवेश में कमरे से निकलकर चली गयी।

कुछ देर हम लोग ख़ामोश रहे। नीलिमा फिर अपनी जगह पर बैठ गयी और आँखें बन्द किये अपने को सहेजने का प्रयत्न करती रही। फिर सहसा वह एक उसाँस भरकर उठ खड़ी हुई और बोली, “तुम मेरे साथ चलोगे?”

“कहाँ!” मैंने पूछा।

“जहाँ कहीं भी वह हो सकता है, वहाँ? ऐसी दो-एक ही जगहें हैं जहाँ वह जा सकता है।”

“तुम समझती हो कि मेरा साथ चलना ज़रूरी है?”

“हाँ! मैं अकेली इस वक़्त उसके सामने जाऊँगी, तो बात शायद और भी बिगड़ जाएगी।”

मैं साथ नहीं जाना चाहता था, मगर उस स्थिति में उसे इनकार भी नहीं कर सकता था। मैं जैसे दो पत्थरों का वज़न अपने मन पर लिये हुए चुपचाप खड़ा हुआ था और मैंने कहा, “अच्छा चलो।”

हरबंस को जहाँ-जहाँ देखा जा सकता था, वहाँ-वहाँ वह नहीं मिला। न वह रमेश के घर गया था, न अपने बॉस के यहाँ और न ही उस स्वीडिश लेखक के यहाँ जिसके पास वह गाहे-बगाहे शराब पीने और साहित्य-चर्चा करने के लिए चला जाता था। कॉफ़ी-हाउस में भी किसी ने उसे नहीं देखा था और न ही वह मॉडल बस्ती या हनुमान रोड पर गया था। मैं जानता था कि हम लोग व्यर्थ का चक्कर लगा रहे हैं और वह स्वयं ही रात को घर पहुँच जाएगा, मगर नीलिमा उसके कहीं भी न मिलने से बहुत घबरा गयी थी और ऐसी हो रही थी जैसे उसके लिए दुनिया का अन्त अब बहुत पास आ गया हो। आख़िर जब उसे डिफेंस कॉलोनी वापस पहुँचाने के लिए मैं स्कूटर में हनुमान रोड से उसके साथ चला, तो इंडिया गेट के पास आकर मुझे बहुत दिन पहले वहाँ पर उसके साथ हुई बातचीत का ध्यान हो आया और मैंने सोचा कि कहीं वह वहीं पर न हो। मेरा अनुमान ठीक था। हम टैक्सी को रोककर जब दस मिनट वहाँ चक्कर लगा चुके, तो एक जगह वह अँधेरे में अकेला लेटा हुआ दिखायी दे गया। जिस चीज़ पर पहले मेरी नज़र पड़ी, वह सिगरेट का जलता हुआ सिरा था।

“हरबंस!” मैंने उसके पास पहुँचकर कहा, तो वह चौंककर उठ बैठा।

“तुम यहाँ पड़े हो?” नीलिमा की घबराहट गुस्से में बदल गयी, “और हम तुम्हें ढूँढ़ते हुए सारी दिल्ली छान आये हैं।”

“मैं खुली हवा के लिए यहाँ चला आया था।” हरबंस बहुत मुरझाये हुए स्वर में बोला।

“तुम्हें तो खुली हवा मिल गयी।” नीलिमा बोली, “मगर हम लोगों को तो तुमने बेहाल कर दिया।”

“क्यों? मैंने तुमसे क्या कहा है?” वह बोला।

“तुम बाँके से यह क्यों कह आये थे कि तुम रात को घर नहीं आओगे?”

“मेरा मन नहीं था।”

“तुम्हारा मन नहीं था! मैं जान सकती हूँ कि क्यों तुम्हारा मन नहीं था?”

“मुझे इसकी व्याख्या नहीं करनी है।”

“तुम्हें इसकी व्याख्या नहीं करनी है! दूसरों की तुम जान भी निकालकर रख दोगे तो कहोगे कि मुझे इसकी व्याख्या नहीं करनी है।”

“देखो, मैं इस समय बात करने के मूड में नहीं हूँ।” हरबंस शायद मेरी वजह से अपने गुस्से को दबाये हुए था।

“हाँ, तुम बात करने के मूड में क्यों होगे!” नीलिमा बोली, “तुम्हारे मन में एक कीड़ा लगा है जो तुम्हें अन्दर ही अन्दर खा रहा है।”
 
“मैं कह रहा हूँ, मैं इस समय यह सब बकवास नहीं सुनना चाहता।” हरबंस का स्वर तीखा होने लगा।

“तुम यह बकवास नहीं सुनना चाहते! तुम अपने दोस्तों से घंटों जो चाहो बातें कर सकते हो। मगर मैं किसी से कुछ बात करूँ, तो तुम्हें सुइयाँ चुभने लगती हैं। तुम मेरे ऊपर तो शक करते ही हो, अपने दोस्तों के ऊपर भी शक करते हो! लन्दन में तो कहा करते थे कि सूदन ही एक ऐसा आदमी था जिस पर तुम भरोसा कर सकते थे।”

“तुमको ये सब बातें करने के लिए यही मौका मिला है?” हरबंस फिर कुछ फीका पड़ गया और मुझसे बोला, “देखो सूदन, तुम इन बातों का बुरा नहंी मानना। यह जो बात कह रही है, वह बात मैं कभी सोच भी नहीं सकता। यह ख़ामख़ाह बक रही है।”

“अगर ऐसी बात तुम सोच भी नहीं सकते, तो तुम घर से क्यों चले आये थे?” नीलिमा चिल्लायी। वह उस समय यह भूल गयी थी कि वह आम लोगों के आने-जाने की जगह है।

“देखो सूदन, तुम किसी बात का बुरा नहीं मानना।” हरबंस बोला, “मैं दफ़्तर से बहुत थका हुआ आया था। पहले दोपहर को भी आया था। सोचा था लौटकर दफ़्तर नहीं जाऊँगा और तुमसे बातें करूँगा। मगर...! ख़ैर, उस बात को तुम जाने दो। मेरी आज अपने बॉस से ख़ासी झड़प हो गयी है। शायद मेरेवाली जगह बहुत जल्द ही उड़ा दी जाएगी।...तुम बुरा नहीं मानना।”

“मेरे बुरा मानने की बात नहीं।” मैंने कहा, “मगर तुम्हें अपना दिमाग़ इस तरह ख़राब नहीं करना चाहिए। जहाँ तक नौकरी का सवाल है, यह तो तुम पहले भी जानते थे कि वह जगह स्थायी नहीं है...।”

“वह तो ठीक है, मगर...,” उसने अपना सिगरेट का टुकड़ा इस तरह दूर फेंक दिया जैसे किसी को पत्थर मार रहा हो। मैं सोचता था कि शायद इसमें अभी दो-तीन साल और निकल जाएँगे। मगर बॉस की आज की बातचीत से मुझे लगा कि अब इस जगह पर साल-छ: महीने भी मुश्किल से ही निकलेंगे। मैंने नहीं सोचा था कि मुझे फिर से इतनी जल्दी सडक़ पर पहुँच जाना पड़ेगा।”

“मगर साल-छ: महीने की बात है, तो तुम अभी से क्यों परेशान होते हो? जब वक़्त आएगा, तब देखा जाएगा।”

“हा-हा।” वह बोला, “जब वक़्त आएगा, तब मैं क्या देखूँगा—आसमान? घर का ख़र्च अब भी पूरा नहीं होता और तब...? मैं बुरे दिन विदेश में बहुत देख चुका हूँ, सूदन! अब उस तरह की ज़िन्दगी की बात सोचते भी मुझे डर लगता है, ख़ासतौर पर लडक़े की वजह से। उसे मैं वैसे दिन नहीं दिखाना चाहता। तुम अन्दाज़ भी नहीं लगा सकते कि मैं इस वक़्त कितनी बड़ी कशमकश में हूँ। मैं इस वक़्त एक ऐसे दोराहे पर खड़ा हूँ कि—!”

नीलिमा ख़ामोश रहकर फ़व्वारों की तरफ़ देख रही थी। मैं सोच रहा था कि मुझे जल्द-अज़-जल्द उन दोनों को अकेले छोडक़र चल देना चाहिए। इसलिए मैंने कहा, “ख़ैर, फिर किसी दिन मिलेंगे, तो इस बारे में बात करेंगे। इस वक़्त मुझे भी जल्दी है और तुम लोगों को भी जल्दी घर जाना होगा।”

हरबंस एक झटके के साथ उठ खड़ा हुआ और क्षण-भर खड़ा रहकर आसमान की तरफ़ देखता रहा। फिर एक उसाँस के साथ बोला, “कुछ समझ में नहीं आता। शायद अब मेरे लिए वही एक रास्ता है जिस रास्ते पर मैं चलना नहीं चाहता।”

मुझे उसका बात करने का ढंग बहुत किताबी-सा लग रहा था। मैंने उससे कुछ कहा नहीं और चुपचाप उसके साथ लॉन पार करने लगा।
 
अंधेरे बंद कमरे [भाग-3]

हवा में कहीं एक कोहेनूर झिलमिलाता है...।

सुबह-सुबह हज़ारों साइकिलें शहर की विभिन्न बस्तियों से निकलती हैं और शाम को थकी-हारी उन्हीं बस्तियों को लौट जाती हैं। सन् दो की ओल्ड्स्मोबाइल से लेकर सन् साठ की डॉज किंग्सवे तक सैकड़ों तरह की गाडिय़ाँ यहाँ से वहाँ भटकती हैं—हार्डिंग रोड, सुन्दरनगर, चाणक्यपुरी, नॉर्थ एवेन्यू, साउथ एवेन्यू, जनपथ, राजपथ, ओल्ड मिल रोड, पार्लियामेंट स्ट्रीट, कनॉट प्लेस, कनॉट सर्कस!

इस होड़ में हर व्यक्ति हर दूसरे व्यक्ति का प्रतिद्वन्द्वी है। हरएक का हरएक के साथ युद्ध है। हरएक का घर उसकी अपनी गज़नी है...।

गाडिय़ों के पहिये कोलतार की सड़कों पर घिसते जाते हैं। सप्रू हाउस से विज्ञान भवन, विज्ञान भवन से अशोका, अशोका से चेम्सफ़ोर्ड क्लब, चेम्सफ़ोर्ड क्लब से लाल किला...।

कनॉट सर्कस के बरामदों में एक चुलबुली भीड़ इधर से उधर जाती नज़र आती है। कई रंग एक साथ आँखों के सामने बिखरते और एक बहाव में बहते चले जाते हैं। चुस्त कपड़ों में किसी का गदराया हुआ शरीर सँभाले नहीं सँभलता और बाहर को बिखर-बिखर जाना चाहता है। किसी की लम्बी-लम्बी उँगलियाँ आसपास की सारी भीड़ को जैसे सहलाती हुई चलती हैं। बस के पीछे दौड़ते हुए एक बाबू की रेज़गारी बिखर जाती है और वह शर्मिन्दा होकर उसे उठाने लगता है। चालीस की रफ़्तार से आता हुआ फटफटिया उसे बस इंच-भर बचाकर निकल जाता है। बस-स्टॉप पर एक और बस आ जाती है। बाबू को अपनी रेज़गारी में से एक चवन्नी नहीं मिल रही। वह अपनी चवन्नी भी ढूँढऩा चाहता है और क्यू में अपनी जगह भी बनाये रखना चाहता है...।

फुटपाथ की भीड़ में सहसा कोई परिचित मगर भूला हुआ चेहरा सामने पड़ जाता है। हम दोनों के चेहरों पर एक अर्थहीन मुसकान आ जाती है, जैसे पहचानना न चाहते हुए भी हमें एक-दूसरे को पहचानना पड़ रहा हो।

“आजकल दिल्ली में ही हो?”

“हाँ।”

“तुम तो लखनऊ में थे?”

“हाँ, कभी था। अब साल-भर से दिल्ली में ही हूँ।”

“अच्छा! मैं समझता था कि तुम अब तक लखनऊ में ही हो। आजकल क्या हो रहा है?”

“बस वक़्त कट रहा है।”

“आजकल वक़्त कट जाए, वही बहुत है। अच्छा...!” और वह परमहंस निर्लिप्त भाव से हाथ बढ़ा देता है, “कभी मेरे लायक कोई काम हो, तो बताना। मैं आजकल एक्साइज में हूँ। कभी स्कॉच-ऑच की ज़रूरत पड़े, या और कोई काम हो...।”

“कभी ज़रूरत होगी तो बताऊँगा।”

“अच्छा...!” और वह जल्दी-जल्दी सड़क पार करके चला जाता है। सड़क के पार पहुँचने तक शायद उसे मेरे अस्तित्व की याद भी नहीं रहती।

कॉफ़ी-हाउस परमहंसों का अड्डा है। वहाँ दाख़िल होते ही कई-एक जमघटों पर एक साथ नज़र पड़ती है। एक जमघट में पत्रकार लोग बैठते हैं। उनमें स्कूप, स्कैंडल और अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की बातें चलती हैं। दूसरे जमघट में कुछ ऐसे लोग हैं जिनमें आधारभूत साम्य एक ही है और वह यह कि वे शाम को कॉफ़ी-हाउस में इकट्ठे होते हैं। इनमें सुन्दर जुनेजा विटा-रोज़ की कम्पनी का डिस्ट्रीब्यूशन इन्चार्ज है। श्याम मलहोत्रा लाइफ़ इंश्योरेंस का एजेंट है। जयदेव उर्फ़ 'गन्दा इंजन’ सेनीटेशन के महकमे में नौकर है। भद्रसेन मकानों और ज़मीनों की दलाली करता है। चौधरी कई काम करता है—टेंडर देकर सरकार को माल सप्लाई करता है, फ़ौलाद और कोयले का कोटा लेकर ब्लैक मार्केट में बेचता है, मोटरों का बीमा करता है और पासपोर्टों के सम्बन्ध में हर तरह की जानकारी रखता है। ये लोग हर रोज़ एक जगह बैठकर यही बातें करते हैं जो इन्होंने इससे पहले दिन की थीं, या उससे पहले दिन की थीं। मल्होत्रा एक कुहनी मेज़ पर रखे तिरछी नज़र से आने-जानेवालों को देखता हुआ अपने साथियों को साहिर लुधियानवी या फ़ैज की नज़्में सुनाता है।

“कहता है कि...

तुम नाहक टुकड़े चुन-चुनकर

तुम...नाहक टुकड़े चुन-चुनकर

दामन में छिपाये बैठे हो।

और कि—

शीशों का मसीहा कोई नहीं,

शीशों का...मसीहा...कोई नहीं...

क्यों आस लगाये बैठे हो?”

उसके दोस्त इस तरह वाह-वाह करते हैं जैसे वह रचना उसकी अपनी हो। मलहोत्रा का अन्दाज़ तिरछे से और तिरछा होता जाता है और उसकी आवाज़ की गहराई बढ़ती जाती है। जब बात जयदेव उर्फ़ 'गन्दे इंजन’ पर आती है, तो वह अपनी पतली-पतली मूँछों पर ताव देता हुआ अपने नाम और धन्धे के अनुकूल चीज़ सुनाने लगता है : 'छल्ला सावी सीटी, ओ छल्ला सावी सीटी...।” मोटा भद्रसेन अपनी आँखें बन्द करता है और खोलता है, खोलता है और बन्द करता है। उसका भरा हुआ गोल चेहरा हँसी से और गोल होने लगता है तो वह कहता है, “यह साला 'गन्दा इंजन’ आज भी वैसा ही है जैसा लाहौर में था। इसमें तेरह साल में ज़रा भी फ़र्क़ नहीं आया। इसकी ज़बान आज भी उतनी ही गन्दी और उतनी ही मीठी है।” सुन्दर जुनेजा केवल हँसे जाता है। उससे पूछा जाए कि वह क्यों हँस रहा है, तो वह और हँसता है और चुप कर जाता है। चौधरी समझदारी के साथ मुसकराता है और घड़ी की तरफ़ देख लेता है। वह इस तरह उन लोगों के बीच बैठता है जैसे उसकी जगह उनके साथ न होकर कहीं और हो और उसे मजबूर होकर उनके साथ बैठना पड़ रहा हो। कॉफ़ी-हाउस से बाहर निकलकर वे पान खाते हैं और घंटा-भर सामने अहाते में खड़े होकर फिर वही बातें करते हैं। सुन्दर जुनेजा वहीं पर उनसे अलग हो जाता है। बाकी चारों चौधरी के घर जाकर शराब पीते हैं, उन्हीं बातों को फिर दोहराते हैं और अगले दिन फिर कॉफ़ी-हाउस में मिलने का कार्यक्रम बनाकर अपने-अपने घर चले जाते हैं। सबके चले जाने के बाद चौधरी अपने नौकर पर खफ़ा होता है और उसे गालियाँ देता हुआ यह तय करके सो जाता है कि आने वाले कल से वह अपने घर में यह मजलिस इकट्ठी नहीं होने देगा।

कॉफ़ी-हाउस का तीसरा जमघट वहाँ का आर्ट सर्कल है। यह वहाँ का सबसे आकर्षक और लोकप्रिय सर्कल है। इनकी बैठक फ़ेमिली-केबिन्स में से किसी एक में जमती है। इनमें कुछ रंगमंच के निर्देशक हैं, कुछ पुराने अनुभवी कलाकार हैं, दो-एक नाटककार हैं, एकाध नाट्य-समीक्षक है, कुछ नये एमेच्योर आर्टिस्ट हैं और दो-एक ऐसी लड़कियाँ हैं जो अभिनय के दिनों में टिकट बेचती हैं और ब्रोश्योर बाँटती हैं। इसमें बातचीत रंगमंच सम्बन्धी गम्भीर समस्याओं को लेकर होती है। भारत में और विशेष रूप से नयी दिल्ली में, व्यावसायिक रंगमंच का भविष्य क्या है? व्यावसायिक रंगमंच की रूपरेखा क्या होनी चाहिए? क्या लोकप्रिय रंगमंच ही व्यावसायिक रंगमंच हो सकता है? क्या साहित्यिक रंगमंच को भी व्यावसायिक आधार पर प्रतिष्ठित किया जा सकता है? रंगमंच की प्रगति के लिए सरकारी सहायता कहाँ तक अपेक्षित है? सरकार कर देश-भर में नयी रंगशालाएँ स्थापित करने का कार्यक्रम रंगमंच की प्रगति में कहाँ तक सहायक सिद्ध होगा? हमारी जनता क्या चाहती है? हम जनता को क्या देना चाहते हैं? क्या भविष्य का रंगमंच सर्वथा प्रतीकात्मक होगा? नाटक में नृत्य और संगीत का क्या स्थान होना चाहिए? संगीत रूपक की अपने में क्या सम्भावनाएँ हैं?

बातचीत इन विषयों से आरम्भ होकर अधिक ठोस विषयों पर उतर आती है। 'विक्रमोर्वशीय’ में लाइट और सेट्स के सिवाय क्या था! 'चन्द्रगुप्त’ में चन्द्रगुप्त कितना भौंडा लगता था! चाणक्य के उच्चारण में कितनी पंजाबियत थी! 'ललित माधव’ की राधा राधा न लगकर क्या मेनका नहीं लगती थी। उसमें सिवा सेक्स अपील के था ही क्या? 'रंगदार शीशे’ में ड्राइंग-रूम का वातावरण कितना स्वाभाविक था! कितना अच्छा होता अगर उस ड्राइंग-रूम में चरित्रों को प्रवेश करने की इजाज़त न दी जाती! वे सब के सब क्या सब्जी मंडी से उठाकर लाये गये नहीं लगते थे? 'रूपसी’ में शची का नृत्य कितनी ग़लत जगह पर रखा गया था? 'मुग़ल दरबार’ क्या मुग़ल दरबार था? उसमें क्या मुग़लकालीन वातावरण का ज़रा भी टच था? ऐसे नहीं लगता था जैसे वह भेड़ों का तबेला हो जहाँ कई-कई भेड़ें एक साथ मिमिया रही हों। इस तरह के अभिनयों से क्या रंगमंच की प्रगति हो रही है? 'वेणी संहार’ का दुर्योधन देखा था? वह क्या ऐसे नहीं बोलता था जैसे कोई मंजन बेचनेवाला अपने मंजन का इश्तहार कर रहा हो?

“साहब, हद हो गयी!” नाट्य-समीक्षक सोमेन्द्र बार-बार अपने माथे पर हाथ मार लेता है। 'वेणी संहार’ वालों ने तो अच्छी भाँडों की मंडली इकट्ठी कर रखी थी। किसी को इतनी भी समझ नहीं थी कि स्टेज पर उसे हिलना-डुलना किस तरह चाहिए। ऐसे लगता था जैसे नाटक से कुछ ही देर पहले सब लोग चवन्नी-चवन्नी देकर बाहर से इकट्ठे कर लिये गये हों। स्टेज-कवरेज का उन्हें एक ही अर्थ आता था कि हाथ-पैर पटकते हुए इस तरफ़ से उस तरफ़ चले जाएँ और उस तरफ़ से इस तरफ़ चले आयें। कभी दसों आदमी इस कोने में जमा हो रहे हैं और कभी सब के सब बीच की तरफ़ कूच कर रहे हैं। मुझे तो कई बार लगता था कि मैं असली थियेटर न देखकर मॉक-थियेटर देख रहा हूँ। वैसे तो बहुत-बहुत भौंडे नाटक देखे हैं, मगर इतना भौंडा नाटक आज तक नहीं देखा।”

“ 'अलकापुरी’ में वह नारद कौन बना था?” शैलबाला कहती है। वह स्वयं दो नाटक प्रोड्यूस कर चुकी है और नाटकों की चर्चा करते समय उसे हमेशा उनकी याद हो आती है। “मेरे किसी नाटक में वह होता, तो मैं पहले ही दिन उसे चुटिया से पकड़कर रिहर्सल रूम से बाहर निकाल देती। जिन लोगों का असली काम है कि बनिये की दुकान पर बैठकर अनाज तोलें, वे भी एक्टर बनकर रंगमंच पर चले आते हैं। यह रंगमंच के साथ बलात्कार नहीं तो क्या है? मैं तो कहती हूँ कि ऐसे लोगों पर भी वही दफ़ा लागू होनी चाहिए जो दूसरे बलात्कार करनेवाले लोगों पर लागू होती है। ये लोग बल्कि और बुरे क्रिमिनल हैं। कला की पवित्रता...मैं कहती हूँ...एक स्त्री की पवित्रता से कहीं बड़ी और महत्त्वपूर्ण चीज़ है!”

“आराम से शैल, आराम से, इतने ज़ोर से नहीं,” निर्देशक ज़हीर उसका कन्धा थपथपा देता है। “लोग सुनेंगे, तो क्या कहेंगे?” इस पर सब लोग ज़ोर से ठहाका लगाते हैं। शैल कुछ झेंप जाती है और झेंप मिटाने के लिए ज़हीर की बाँह पर मुक्के मारने लगती है, “तुम तो ज़हीर इतने बुरे आदमी हो कि तुम्हारे साथ बैठकर बात करना गुनाह है। तुम सीरियस बातचीत में भी अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आते।”

“मैंने सिर्फ़ तुम्हें चेतावनी दी है और क्या कहा है?” ज़हीर कहता है, “मैं तुम्हारा खैरख्वाह हूँ और तुम्हारी इज़्ज़त का ख़याल रखना मेरा फ़र्ज़ है। मैं जानता हूँ कि तुम जो बात कह रही थीं, बहुत भोलेपन से कह रही थीं, मगर...सुननेवाले तो सब तुम्हारी तरह भोले नहीं हैं।”
 
सब लोग फिर ठहाका लगाते हैं, तो शैल भी साथ हँस देती है और कहती है, “मैं ज़हीर, आज से तुमसे बात भी नहीं करूँगी। तुम्हें मेरा नहीं, तो इन छोटी-छोटी लड़कियों का तो लिहाज करना चाहिए जो न जाने मन में क्या-क्या विचार लेकर हमसे मिलने आती हैं! इन बेचारियों के दिमाग़ क्यों स्पॉयल करते हो?”

छोटी लड़कियाँ, अर्थात् मीना और सुदर्शन, जो रंगमंच के शौक़ से नयी-नयी उस सर्कल में आने लगी हैं, थोड़ा शरमाकर एक-दूसरी की तरफ़ देखती हैं और नज़रें झुका लेती हैं। नाटककार सुखवन्त जो हर चौथे महीने विदेश-यात्रा के लिए जाता है और विदेशी कला और संस्कृति के सम्बन्ध में बहुत अधिकार के साथ बात करता है, काफ़ी गम्भीर होकर कहता है, “इन लड़कियों के कॉम्प्लेक्स अगर दूर नहीं होंगे शैल, तो ये कुछ भी नहीं कर सकेंगी। इनमें लाइफ़ आनी चाहिए लाइफ़! और वह लाइफ़ इनमें कैसे आ सकती है? खूब खुलकर रहने और लोगों में घुल-मिलकर जीने से। अगर वह लाइफ़ इनमें नहीं होगी, तो ये सच्ची कलाकार नहीं बन सकेंगी। तुम ऐसी बात कहकर इनके मन में कॉम्प्लेक्स डाल रही हो। तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। ये लड़कियाँ अगर पैरिस, मैड्रिड या लन्दन में होतीं, तो इस ज़रा-सी बात से आँखें झुकाकर न बैठ जातीं। जो लड़कियाँ इतनी ज़रा-सी बात पर अपनी आँखें सीधी नहीं रख सकतीं, वे रंगमंच पर आकर क्या करेंगी? तुम्हें इनके लिए ऐसी बात कभी नहीं कहनी चाहिए!”

सुखवन्त के उपदेश से शैल कुछ फीकी पड़ जाती है। लड़कियाँ चेष्टा करके अपनी झुकी हुई आँखें ऊपर उठा लेती हैं और ज़हीर सुखवन्त की पीठ ठोककर कहता है, “शाबाश सुखवन्त! तुमने खूब मेरी वकालत की! तुम वकालत न करते, तो इन लड़कियों के साथ मेरी भी आँखें शरम से झुक जातीं।”

“आँखें झुकाकर रखना हिन्दुस्तानी लड़कियों के लिए शरम की बात नहीं है, फ़ख्र की बात है।” शैल फिर कहती है, “तुम्हें पैरिस और मैड्रिड की लड़कियों पर नाज़ है, तो मुझे अपनी इन हिन्दुस्तानी लड़कियों पर नाज़ है। मैं कभी नहीं चाहूँगी कि ये लड़कियाँ भी उन लड़कियों की तरह बेशरम हो जाएँ।”

इस पर मीना और सुदर्शन कुछ असमंजस में पड़कर एक-दूसरी की तरफ़ देखती हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि उन्होंने अपनी झुकी हुई आँखों को उठाकर अच्छा किया है या बुरा किया है। सुखवन्त अपनी दोनों कुहनियों पर झुककर शैल की बात के उत्तर में अपना उपदेश आगे आरम्भ कर देता है और उस उपदेश में इतने उद्धरण और अपनी विदेश-यात्राओं के इतने संस्मरण शामिल कर देता है कि अन्त तक फिर और किसी को बोलने का अवकाश नहीं मिलता।

पीछे की तरफ़ एक जमघट में कुछ लेखक, कवि और आलोचक बैठते हैं। इनकी बातचीत का सम्बन्ध प्राय: नये साहित्य से होता है। नयी कविता के माने क्या हैं? नयी कहानी कहाँ तक 'नयी’ कही जा सकती है? 'नयी’ की परिभाषा क्या है? किसकी नयी कहानी कम 'नयी’ है और किसी ज़्यादा 'नयी’? किसने किसकी रचना के सम्बन्ध में कहाँ क्या लिखा है? उस लेखक की ओर से उसका क्या उत्तर आया है? इस महीने किस-किस नयी पुस्तक का विज्ञापन निकला है?

विज्ञापनों से हटकर बात नयी कांशसनेस पर आ जाती है। आज के साहित्य में नयी कांशसनेस का प्रतिनिधित्व कहाँ तक हो रहा है? अन्य कलाओं की नयी कांशसनेस से साहित्य क्या अछूता रह सकता है? किन-किन लेखकों में वास्तविक नयी कांशसनेस के लक्षण विद्यमान हैं और किन-किन में नहीं हैं? किन-किन की नयी कांशसनेस वास्तविक है और किन-किनकी सिर्फ़ बाहरी है? कौन लोग नयी कांशसनेस का जामा ओढ़कर भी पुरानी कांशसनेस को ही अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त कर रहे हैं? एक नयी सैंसिटिविटी किस तरह नयी कांशसनेस की अनिवार्य शर्त है?

इनमें कलकत्ता से आया हुआ जनक सुखाडिय़ा अकेला आदमी है जो कवि, लेखक या आलोचक नहीं है। वह ऐसा विरक्त जीव है कि कॉफ़ी-हाउस में बैठकर भी कॉफ़ी नहीं पीता। उनकी आँखें हर समय लाल रहती हैं, जाने अनिद्रा के कारण या ऐसे ही; दाढ़ी दो-दो ह$फ्ते की बढ़ी होती है और सिर के बाल लगभग खड़े रहते हैं। वह बहुत गम्भीर होकर ये बातें सुनता है। सुनते हुए उसके चेहरे का भाव ऐसा हो जाता है जैसे उसकी आँखों के सामने उसे धोखा दिया जा रहा हो। जब उससे नहीं सहा जाता, तो वह बीच में बोल पड़ता है, 'च् च् च्! मेरी समझ में नहीं आता कि यह नयी कांशसनेस किस चिडिय़ा का नाम है! दुनिया को धोखा देने के लिए लोग नये-नये फ़ैशन निकाल लेते हैं और यह नयी कांशसनेस आज का फ़ैशन है और कुछ नहीं। नयी कांशसनेस! हँ! अगर वास्तव में ही लोगों की रचनाओं में कोई नयी कांशसनेस है, तो उन्हें पढ़कर उसका पता क्यों नहीं चलता? ज़्यादातर रचनाएँ तो ऐसी होती हैं कि मुझसे पढ़ी भी नहीं जातीं। क्या यही उनकी नयी कांशसनेस का सबूत है?”

लोग जनक सुखाडिय़ा की बातों को गम्भीरतापूर्वक नहीं लेना चाहते मगर उनसे कुछ अस्थिर ज़रूर हो जाते हैं। उसकी बातें इस तरह होती हैं जैसे चलते अभिनय में सहसा कोई व्यक्ति नेपथ्य में मंच पर चला आये और वहाँ पर खड़े चरित्रों को कन्धे से पकड़कर कहने लगे कि बालकराम, सुखराम सेठी और चन्द्रकला, तुम लोग अपने को कण्व, दुष्यन्त और शकुन्तला कहकर लोगों को धोखा क्यों दे रहे हो? क्या तुम लोग सच्चे दिल से कह सकते हो कि तुम बालकराम, सुखराम सेठी और चन्द्रकला भार्गव नहीं हो? तुम अपनी दाढ़ी-मूँछ और मेकअप उतार दो, तो लोगों को पता चल जाए कि असल में तुम लोग कौन हो। लोग क्या इतने अन्धे हैं कि तुम्हें कण्व, दुष्यन्त और शकुन्तला मान लेंगे? कवि, कहानीकार और आलोचक सुखाडिय़ा की बातों से कुछ क्षुब्ध हो उठते हैं। उसे नेपथ्य से मंच पर आने का अधिकार किसने दिया है? क्या वह उनके साथ अपनी मित्रता का अनुचित लाभ नहीं उठाता? कल का छोकरा...उसे नयी कांशसनेस का पता ही क्या है? जब बात और आगे बढ़ती है, तो सुखाडिय़ा के लिए वहाँ बैठना असम्भव हो जाता है। 'सब बकवास है,’ वह कहता है और सहसा उठकर चल देता है। उसके चले जाने से बातचीत में एक अस्वाभाविक गतिरोध आ जाता है। कवि-कहानीकार ब्रजेन्द्र खन्ना कहता है, “यह आदमी एक झपट्टे से सबके न$काब उठा देता है और उठकर चला जाता है। मुझे यह आदमी अच्छा लगता है।”

“इस आदमी का दृष्टिकोण नेगेटिव है, वैसे आदमी अच्छा है और समझदार भी है।” कवि श्रीनिवास तटस्थ भाव से कहता है।

“नेगेटिव हो या जो हो, वह बात ठीक कहता है।”

“तो तुम भी समझते हो कि नयी कांशसनेस कोई चीज़ नहीं है?” उसमें और श्रीनिवास में झड़प हो जाती है।

“मैं तो समझता हूँ कि नयी कांशसनेस हो या पुरानी, सब बेकार है।”

“तब तो तुम साहित्य को भी बेकार चीज़ मानोगे!”

“उसमें मानने न मानने को क्या है? उसमें रखा ही क्या है?”

“इसका मतलब है कि तुम्हारे लिए ज़िन्दगी का भी कोई अर्थ नहीं है!”

“ज़िन्दगी का अर्थ!” खन्ना हँस देता है, “यह मैं नयी बात सुन रहा हूँ कि ज़िन्दगी में कुछ अर्थ भी है।”

“तुम्हारा दृष्टिकोण ध्वंसात्मक है।”

“होगा। मैं नहीं जानता।”

“अगर ऐसी ही बात है, तो तुम स्वयं क्यों लिखते हो?”

“यह मुझे क्या पता है कि मैं क्यों लिखता हूँ? लिखने को मन होता है, इसलिए लिख देता हूँ।”

“लेकिन मन क्यों होता है?”

खन्ना कन्धे हिला देता है, “शायद इसलिए कि और किसी तरह मुझसे वक़्त नहीं कटता।”

“वक़्त काटने के लिए तो आदमी कुछ भी कर सकता है।”

“जैसे?”

“जैसे क्या? आदमी कुछ भी कर सकता है; ताश खेल सकता है, गप कर सकता है, और भी कितने फ़िजूल के काम कर सकता है।”

“तो इसकी बजाय बैठकर कुछ लिख ही लिया जाए, तो उसमें क्या बुराई है?”

“लिखकर तुम अपना ही नहीं, पढऩेवालों का भी तो वक़्त बरबाद करते हो।”

“तो उसमें क्या बुराई है? उनका भी कुछ वक़्त कट जाता है।”

“तुम सैडिस्ट हो।”

“तुम जो भी कह लो। मुझे जनक सुखाडिय़ा की बातें बहुत अच्छी लगती हैं।”

“तुम ज़िन्दगी में कुछ नहीं कर सकोगे।”

“इससे भी क्या फ़र्क पड़ता है! जो लोग कुछ कर लेंगे, वही क्या कर लेंगे?”

और यह बात तब तक चलती रहती है जब तक उनमें से कोई घड़ी देखकर उठने का प्रस्ताव नहीं कर देता।

इन सब जमघटों से हटकर कला-समीक्षक गजानन बिल्कुल अकेला बैठता है। उसे शायद लगता है कि दूसरे लोगों के साथ बैठने से उसका सफ़ेद कोट कुछ मैला हो जाएगा। उसे अपनी टाई की गाँठ का भी बहुत ध्यान रहता है और वह उसे हर समय सहलाता रहता है कि कहीं बैठे-बैठे वह ढीली न पड़ गयी हो। जो लोग उसके साथ घनिष्ठता रखना चाहते हैं, उनकी तरफ़ से वह प्राय: उदासीन रहता है और उन्हीं से बात करना पसन्द करता है जो उसकी घनिष्ठता से बचते हैं। वह जानता है कि अकेलेपन में एक विशिष्टता रहती है जो व्यक्ति को थोड़ा रहस्यमय बना देती है और कि लोग इस रहस्यमयता का सम्मान करते हैं। उसकी समीक्षाएँ यदि वे प्रशंसात्मक न हों, तो बहुत कटु और निर्मम होती हैं, इसलिए लोग उससे घबराते हैं और वह घबराहट भी एक तरह के सम्मान का रूप ले लेती है। इस क्षेत्र में सबसे पुराना खिलाड़ी वही है। उसे कलाकारों को उठाते और गिराते बीस साल हो चुके हैं। जब वह मुँह से बात नहीं करता और केवल सिगरेट का धुआँ छोड़ता है, तो वह धुआँ भी एक समीक्षात्मक अन्दाज़ में हिलता है। उस धुएँ की गोलाइयों से भी कई बार लोग उसके मत का अनुमान लगा लेते हैं।

“अकेले?” मैं उसके पास से गुज़रते हुए कहता हूँ।

“हाँ, हमेशा की तरह,” वह अपने सिगरेट के धुएँ को देखता हुआ कहता है, “आओ, बैठो।”

“मेरे पास बैठने से तुम्हारे अकेलेपन में खलल नहीं पड़ेगा?”

वह मेरा हाथ पकड़कर मुझे अपने पास बिठा लेता है। “मुझे पता है, तुम मेरे पास बैठकर प्रोफ़ेशनल बातें नहीं करोगे।” वह कहता है, “वैसे आदमी जब अकेला रहना चाहे, तो सैकड़ों आदमियों के बीच बैठकर भी अकेला रह सकता है। नहीं?”

“तुम्हारे जैसा आदमी ज़रूर रह सकता है।”

“इसका मतलब है कि तुम्हारी भी मेरे बारे में वही राय है जो और सब लोगों की है।”

“तुम्हारी सफलता का रहस्य भी तो शायद यही है।” मैं कहता हूँ, “इधर मैं हूँ कि अपने सम्पादक को कभी खुश ही नहीं कर पाता।”

“यह लक्षण तो बुरा नहीं है।” वह कहता है, “मैंने बीस साल में पाँच सम्पादकों के नीचे काम किया है और आज तक उनमें से एक भी मुझसे $खुश नहीं रहा।”

“तो क्या ख़याल है कि एक दिन हम दोनों एक-एक टिप्पणी अपने सम्पादकों पर लिखें...?”

“इस तरह लिखने की बात हो, तो मैं न जाने किस-किस पर टिप्पणी लिखना चाहूँगा।” वह हँसकर कहता है, “हर दूसरा आदमी जिससे मैं मिलता हूँ, उस पर मेरा मन होगा कि एक टिप्पणी लिख दूँ। मैं जिससे भी मिलता हूँ लगता है वह एक छीना-झपटी में पड़ा है। लोगों ने इसे एक सुन्दर-सा नाम भी दे रखा है, 'व्यक्तिगत सुख की खोज’। वह सुख की खोज क्या है? झूठ बोलो, काम से बचो, जैसे भी हो पैसा जमा करो और अधिकार पाने के लिए कुछ भी कुरबान कर दो। इस नैतिकता का एक बना-बनाया शास्त्र है जो कोई किसी को नहीं पढ़ाता, फिर भी सब लोग उसके पंडित हैं। और यह शास्त्र कहता है कि अपने अलावा हरएक को हीन समझो, हरएक को अविश्वास की नज़र से देखो, खुद झूठ बोलो और दूसरों के झूठ पर नाक-भौं चढ़ाओ, कोई तुमसे मूल्यों की बात करे, तो कन्धे हिलाकर मुँह बिचका दो और एक ही विश्वास लेकर जियो कि बड़े लोगों से मिल-जुलकर और अपने सहयोगियों को बेवकूफ़ बनाकर तुम्हें अपना उल्लू सीधा करना है। सरकार से अपने काम निकालो और दोस्तों में बैठकर सरकार की निन्दा करो। अगर तुम्हारा सम्बन्ध इंटलेक्चुअल वर्ग से है, तो बड़ी-बड़ी डींगें मारो, विदेश में जाकर रहने के सपने देखो और अपने ओछे स्वार्थों को सिद्धान्त और दर्शन का रूप दे लो। और इस सबसे प्राप्त होनेवाला व्यक्तिगत सुख क्या है? सोशल स्टेटस।”

“मुझे नहीं पता था कि आज तुम सारी दुनिया से ही कुढ़े हुए बैठे हो।” मैं कहता हूँ, “लगता है दो-एक दिन से तुमने किसी नृत्य या नाटक पर टिप्पणी नहीं लिखी।”

इस पर वह फिर हँस पड़ता है, “सच पूछो, तो अब मेरा नृत्यों और नाटकों पर टिप्पणियाँ लिखने को मन नहीं होता। आज तक जिन-जिन लोगों की मैंने प्रशंसा की है, वे सब मेरे प्रतिद्वन्द्वी हैं और जिन-जिन लोगों की मैंने निन्दा की है, वे सब आज मेरे दुश्मन हैं।”

वह और भी बात करना चाहता है, मगर मैं जल्दी ही उससे विदा ले लेता हूँ। उसके पास से उठकर चलते हुए अचानक मेरी एक उर्दू शायर से मुठभेड़ हो जाती है। वह शराब के नशे में झूमता हुआ मेरे पास से गुज़र जाता है, मगर दो क़दम जाकर मुझे पीछे से आवाज़ दे देता है, “मधुसूदन भाई, ज़रा बात सुनना...।” मैं रुककर उसकी तरफ़ देखता हूँ, तो वह पास आकर मेरे दोनों कन्धों पर हाथ रख देता है। “देखो, मैं हिन्दी की एक किताब पढ़ रहा था,” वह कहता है।

“तो...?”

“उसमें एक बात लिखी थी...।”

“क्या?”
 
“उसमें लिखा था कि...मगर आओ, बैठकर बात करें। मैं यह बात तुमसे अच्छी तरह समझना चाहता हूँ।”

हम लोग बैठ जाते हैं, तो वह कहता है,...”उस किताब में लिखा था कि भारतमाता गाँवों में रहती है।”

“मगर तुम मुझसे क्या बात समझना चाहते थे?”

“मैं तुमसे यह जानना चाहता था कि भारतमाता क्या हमेशा गाँवों में ही रहती है, और दिल्ली कभी नहीं आती...?”

मैं उसकी बात पर हँस देता हूँ, तो वह कहता है, “देखो, हँसने की बात नहीं। मैंने जब से यह बात पढ़ी है तभी से सोच रहा हूँ कि भारतमाता गाँवों में ही क्यों रहती है! क्या वह कभी दिल्ली आयी ही नहीं, या दिल्ली की हवा रास न आने से वापस गाँवों में चली गयी है? और अगर भारतमाता राजधानी में नहीं रहती, तो जो यहाँ रहती है, वह कौन है? वह क्या भारत की सौतेली माँ है? वह जो बुड्ढा राजपूत है...,” और वह दीवार पर लगे पोस्टर की तरफ़ इशारा करता है, “उसकी माँ कहाँ रहती है? क्या वह अपने बेटे को कभी चिट्ठी नहीं लिखती कि मुझे अपने पास दिल्ली बुला लो? मेरी माँ की तो मेरे पास हर आठवें दिन चिट्ठी आती है...।” और वह उसी लहजे में बात किये जाता है। मेरी आँखें कुछ देर दीवार पर लगे पोस्टर पर टिकी रहती हैं। झाग जैसी दाढ़ीवाले बुड्ढे राजपूत का चेहरा और गरम कॉफ़ी की एक प्याली! साथ दिया हुआ शीर्षक 'यह सुन्दर कॉफ़ी और यह सुन्दर चेहरा दोनों भारतीय हैं।’ फिर मैं अपने शायर दोस्त के चेहरे की तरफ़ देखता हूँ। क्या यह सुन्दर चेहरा भी भारतीय नहीं?

कॉफ़ी-हाउस का शीशे का दरवाज़ा बार-बार खुलता और बन्द होता है। कुछ लोग इस तरह अन्दर आते हैं जैसे वहाँ किसी अभियुक्त की तलाश कर रहे हों। आकर दो-एक जगह ठिठककर चारों तरफ़ देखते हैं और जब कहीं से भी कोई परिचित हाथ हिलाता नज़र नहीं आता, तो निराश होकर लौट जाते हैं। सिगरेटों के धुएँ में चीनी की प्यालियों और काँच के गिलासों के रखने-उठाने की आवाज़ पृष्ठभूमि के संगीत की तरह चलती रहती है। हर नये व्यक्ति के आने के साथ कुरसियों की व्यवस्था बदल जाती है। इधर की कुरसियाँ उधर घिसट जाती हैं और उधर की कुरसियाँ कहीं और आगे चली जाती हैं। “मे आई...?” और बिना दूसरे की हाँ या ना की प्रतीक्षा किये कुरसी उठा ली जाती है। कहीं से एक क़हक़हा उठता है, कोई कुरसी सहसा अपनी कुरसी से आ टकराती है, कहीं चम्मच और छुरी-काँटे झनझनाते हैं, और कहीं कोई गिलास सहसा गिरकर टूट जाता है जिससे उफनते हुए शोर में पल-भर के लिए एक विराम आ जाता है।

'यह सुन्दर कॉफ़ी और सुन्दर चेहरा दोनों भारतीय हैं!’

शीशे का दरवाज़ा खुलता है और हरबंस नाक की सीध में देखता हुआ अन्दर दाख़िल होता है। वह दूर से ही थका हुआ और खोया-सा नज़र आता है। उसके आगे को झुके हुए कन्धे और कनपटियों के सफ़ेद बाल भी ये कहते-से लगते हैं कि हम परेशान हैं, हमसे बात मत करो। वह आसपास बैठे हुए लोगों पर एक उड़ती हुई नज़र डालकर एक केबिन में चला जाता है। मैं भी अपनी जगह से उठता हूँ और उसके पास उसके केबिन में चला जाता हूँ। थोड़ी देर में नीलिमा भी अरुण के साथ वहाँ आ जाती है। उसके साथ बम्बई के एक साप्ताहिक का विशेष प्रतिनिधि भुवन शर्मा भी है। नानावती कांड की रिपोर्टों के कारण उसकी बहुत ख्याति हुई है। वह दिल्ली में कुछ राजनीतिज्ञों के विशेष इंटरव्यू लेने के लिए आया है। उसे अपने पत्र में तीसरी पंचवर्षीय योजना पर विशेष लेख देना है। वह बहुत व्यस्त है, बड़ी मुश्किल से समय निकालकर आया है। हरबंस बताता है कि वह जिन दिनों लन्दन में था, उन दिनों भुवन भी वहीं था और उन लोगों की मित्रता वहीं से हुई है। वह उसे भुवनभाई कहकर बुलाता है। भुवनभाई एक संरक्षक की तरह बाँहें फैलाकर बात करता है।

“आज कोई भी काम असम्भव नहीं है।” वह कहता है, “सिर्फ़ दो चीज़ों की ज़रूरत है—एक टैक्ट की और दूसरे कांटैक्ट की। टैक्ट तुम इस्तेमाल करो, कांटैक्ट तुम जिससे चाहो, तुम्हारा मैं बना देता हूँ। और अगर तुम सोचो कि इन चीज़ों के बिना तुम लोग कुछ कर सकते हो, तो नामुमकिन बात है।”

“यह तो सरकस के अन्दर करतब करने की तरह है।” हरबंस कहता है, “कला का अपना कोई मूल्य नहीं, मूल्य है तो इस बात का कि आप कुछ साधन-सम्पन्न लोगों के इशारे पर चलते हैं या नहीं।”

“आज ज़िन्दगी का सारा ढाँचा ही इस तरह का है।” भुवनभाई की बाँहें और फैल जाती हैं, “इसमें हम और तुम क्या कर सकते हैं? आज वह ज़माना नहीं है जब योग्यता, मेहनत और ईमानदारी का कोई मूल्य था। आज की ज़िन्दगी में ये सब शब्द पुराने पड़ गये हैं। जिसके हाथ में साधन हैं, वह दूसरों को अपने ढंग से नचा सकता है। तब आपको उसके चाबुक का भी सम्मान करना होगा। आप चाबुक खाकर भी उसके आगे दुम हिला सकते हैं और उसके बताये हुए करतब कर सकते हैं, तो ठीक है। आपकी खुराक आपके लिए हाज़िर है। और अगर नहीं, तो आप भूखे रहिए। जंगल का रास्ता भी आपके लिए खुला नहीं है। यह कोई बरदाश्त नहीं करेगा कि आपके लिए जो पिंजरा बनाने में इतना ख़र्च किया गया है, आप अपनी मर$जी से उसमें से निकलकर चल दें। और अगर आप किसी तरह निकल भी जाएँ, तो जंगल में जाकर भी आपको पता चलेगा कि वहाँ की घास भी उन्हीं ठेकेदारों की ख़रीदी हुई है और आपको उसमें मुँह मारने का हक नहीं है। तब आप झख मारकर पिंजरे में लौट आएँगे और वही घास खाएँगे और वही करतब करेंगे। और कोई चारा ही नहीं है।”

हरबंस इस तरह गुर्राता है जैसे वह अपने सामने की घास को ठोकर मारना चाहता हो। “मैं इसीलिए इससे कहता हूँ कि यह घर में अभ्यास करती है, करती रहे।” वह कहता है, “मगर उसका प्रदर्शन करने के लिए यह मुझे इन सब झंझटों में क्यों घसीटना चाहती है? मैं यूरोप के दौरे में ही बहुत कुछ देख चुका हूँ। अब और देखना मेरी हिम्मत से बाहर की बात है।”

“इससे तो अच्छा है कि तुम कहो कि मैं हाथ-पैर बाँधकर कुएँ में जा पड़ूँ।” नीलिमा चिल्लाकर कहती है, “घर में अभ्यास करती रहूँ! और दीवारों पर लगी हुई गुडिय़ों और तसवीरों को दिखाती रहूँ! तुम यह जिस वजह से कहते हो, वह मैं जानती हूँ...।”

“मैं किसी वजह से नहीं कहता।” हरबंस उसी स्वर में उसका विरोध करता है, “मुझसे यह सरकस का खेल नहीं खेला जाता। आज इससे मिलो, कल उसकी पार्टी में जाओ। क्या हो रहा है? कांटैक्ट बन रहे हैं! किसलिए? कि हमें कोई अच्छा-सा ग्रुप स्पांसर कर दे, कि बड़ी-बड़ी जगहों पर हमारा ज़िक्र होने लगे, लोग हमें जानने लगें, और जब हमारा प्रदर्शन हो, तो वे वहाँ आकर वाहवाही करें; उनके पत्रों में हमारी प्रशंसा निकले, बड़े-बड़े घरों में हमारी दावतें हों। मैं इतने दिनों से कोशिश कर रहा हूँ, मगर मुझसे ये ची$जें निभती नहीं।”

“तो तुम कुछ मत करो। मुझे जो कुछ करना होगा, मैं आप कर लूँगी।” नीलिमा और तल्ख हो जाती है, “तुम मदद तो करोगे नहीं, मेरे रास्ते में रुकावटें ही डालोगे। मैं इतने दिनों से इसलिए अभ्यास नहीं कर रही कि घर का फ़र्श तोड़ती रहूँ।”

भुवनभाई मध्यस्थ की तरह हँसता है। “तुम लोग बच्चों की तरह आपस में लड़ते हो।” वह कहता है, “हरबंस यह बात भूल जाता है कि जो काम यह तुम्हारे लिए करने से कतराता है, वही काम इसे अपनी रो$जी के लिए करना पड़ता है। तो जहाँ दिन में चार बार नाक घिसानी पड़ती है, वहाँ दस बार सही। इससे नाक और मज़बूत ही होती है। क्यों भाई मधुसूदन?”

मैं तिरछे रास्ते से बात में से निकलने की कोशिश करता हूँ, “हो सकता है आप ठीक कहते हों। मुझे अभी आप जितना तजरबा नहीं है।”

“देखा, लोग बातचीत में भी कितनी सावधानी बरतते हैं?” भुवनभाई मेरे ऊपर पिल पड़ता है, “लोग आजकल दोस्तों में बैठकर भी इस तरह तौल-तौलकर बातें करतें हैं जैसे अदालत के कठघरे में खड़े होकर बयान दे रहे हों। जहाँ आपस में इतना सन्देह और विश्वास हो, वहाँ नाक को मज़बूत किये बिना काम कैसे चल सकता है? आपको जीना है और ठीक ढंग से जीना है, तो आपको बेशरमी का सबक पढऩा पड़ेगा। आपको अपना एक रैकेट बनाना पड़ेगा। अगर आपका कोई रैकेट नहीं है, तो समझ लीजिए कि आप बिना बुनियाद के खड़े हैं। जो चाहे आपको गिराकर आगे बढ़ सकता है। आप सफलता चाहते हैं, प्रसिद्धि चाहते हैं, पैसा चाहते हैं, तो अपना एक रैकेट बनाइए या नाक लम्बी करके किसी बड़े-से रैकेट में घुस जाइए। अगर आपका रैकेट मज़बूत है, तो लोग आपसे डरेंगे, आपकी इज़्ज़त करेंगे और आपके घटिया से घटिया काम में भी महत्ता के बीज खोज निकालेंगे। और आपका रैकेट नहीं है, तो आप चाहे जितनी कलाबाज़ियाँ दिखाइए, लोग उन्हें देखेंगे भी नहीं। और देखेंगे तो देखकर हँस देंगे। जो हँसेंगे नहीं, वे संरक्षकों की तरह आपको बताएँगे कि आपमें कहाँ क्या कमी है। वही काम जो इस समय मैं कर रहा हूँ...।” और वह हँसता है। नीलिमा भी हँसकर कहती है, “भुवनभाई बातें बहुत अच्छी करते हैं।”

“मैं सच बात कहता हूँ।” भुवनभाई कहता है, “तुम लोग आज नहीं तो कल समझोगे। मगर तब तक बा$जी तुम्हारे हाथ से निकल जाएगी और तुम सिर्फ़ मुँह देखने के लिए रह जाओगे। पिछले आठ-दस सालों में जितने लोगों का कुछ नाम हुआ है और जिनकी आज गिनती की जाती है, तुम उनमें से किसी एक को भी ले लो। हरएक का एक अपना रैकेट है। इनमें से कई रैकेट कुछ बड़ी-बड़ी संस्थाओं के हाथों में हैं। जिसका रैकेट जितना बड़ा है, वह आदमी भी उतना ही बड़ा है...। यह एक पुरानी कहावत है कि नहीं कि बड़े बनने के लिए बड़ों के क़दमों के निशान देखने चाहिए?”

एक व्यक्ति है जो इस बीच बिल्कुल गम्भीर बना रहता है—अरुण। वह चुपचाप अपना पनीर का सैंडविच चबाये जाता है। सहसा वह सैंडविच छोड़कर उठ खड़ा होता है। “ममी, मैं पान ले आऊँ?” वह कहता है, “अपने लिए भी लाऊँगा और बिनी के लिए भी।” और वह गर्व के साथ अपनी छोटी-सी जेब में हाथ डाले हुए बाहर चला जाता है।

कॉफ़ी-हाउस से निकलते हुए दरवाज़े के पास शुद्ध खादी का पाजामा-कुरता पहने एक युवक मेरा रास्ता रोक लेता है, “कहिए मधुसूदनजी, क्या हाल-चाल हैं?” वह बहुत शिष्टता के साथ कहता है।

मैं गौर से उसे देखता हूँ और सहसा मेरे मुँह से निकल पड़ता है, “अरे बत्रा, तुम? यह तुम्हारा कायाकल्प कैसे हो गया?”

“मैं आजकल राजनीतिक काम कर रहा हूँ।” वह उसी शिष्टता के साथ कहता है, “आप आजकल कहाँ हैं?”

“मैं 'न्यू हैरल्ड’ में हूँ। तुमने 'इरावती’ से काम छोड़ दिया?”

वह बहुत शिष्ट ढंग से मुसकराता है, “नहीं, वह पत्रिका अब मेरे ही पास है...।”

“तुम्हारे पास...?”

“मैंने डेढ़ साल हुआ वह पत्रिका बाल भास्कर से ख़रीद ली थी।”

“अच्छा?” मुझे विश्वास नहीं होता कि वह सच कह रहा है, “और बाल भास्कर आजकल क्या कर रहा है?”

“वह आजकल बड़े बिजनेस में है। ज़मीनों के ठेके लेकर कॉलोनियाँ बनवा रहा है।” और वह बाल भास्कर की बनवायी हुई दो-एक कॉलोनियों के नाम गिना देता है, “बहुत बड़े चक्कर में है वह...।”

“अच्छा...!” मैं चलने लगता हूँ, तो वह बहुत कोमल ढंग से मुझसे हाथ मिलाता है और कहता है, “कभी उधर आइएगा। आपका तो वह अपना ही कार्यालय है।”

“हाँ-हाँ, कभी ज़रूर आऊँगा...।”

“मुझे बहुत-बहुत $खुशी होगी।” और वह थोड़ा झुककर विदा लेता है और कुरते की आस्तीन ठीक करता हुआ अन्दर चला जाता है।

बाहर आने पर मुझे लेखकों, कवियों और आलोचकों की मंडली साइकिल स्टैंड के पास खड़ी मिलती है। वहाँ क्षण की अनुभूति और अनुभूति के क्षण को लेकर वाद-विवाद चल रहा है। कवि विनीत, जिसका प्यार का नाम बबुआ है, क्षण की सार्थकता पर भाषण दे रहा है। ब्रजेन्द्र खन्ना अपनी मोटर-साइकिल पर बैठा हुआ भी ज़मीन पर पैर रखकर रुका हुआ है।

“एक क्षण से दूसरे क्षण तक मेरा अवचेतन न जाने अनुभूति के किन-किन स्तरों पर से गुज़र जाता है।” विनीत कह रहा है, “और उसके एक-एक स्तर पर भी न जाने कितनी गहराइयाँ हैं! यदि मैं अपनी रचना में उनमें से किसी एक भी गहराई का ठीक से उद्घाटन कर पाता हूँ, तो मैं अपने प्रति भी ईमानदार हूँ और उस क्षण के प्रति भी, क्योंकि मैं किसी बाह्य प्रभाव से चालित नहीं हूँ। उससे अगले क्षण यदि मैं अनुभूति के किसी और स्तर पर हूँ जो मुझे पहले स्तर से विपरीत ले जाता है, तो मेरी ईमानदारी की माँग है कि मैं उसी स्तर से अपने को अभिव्यक्त करूँ, यदि मैं अपनी रचना में बाहर के प्रभावों से मुक्त नहीं रह पाता...।”

ब्रजेन्द्र खन्ना की मोटर साइकिल चल पड़ती है। कोई उससे पूछता है, “जा रहे हो?”

“मुझे भूख लग आयी है,” ब्रजेन्द्र कहता है और उसकी साइकिल सामने से आते हुए पैदल व्यक्ति को बचाकर आगे निकल जाती है। विनीत न जाने कब तक क्षण की सार्थकता की व्याख्या करता हुआ वहाँ खड़ा रहता है!

...और इस तरह खुली आँखों से देखा हुआ सपना समाप्त होने में ही नहीं आता था। बत्तियाँ उसी तरह जलती-बुझती रहतीं, सराय रुहेला स्टेशन से नयी-नयी गाडिय़ाँ गुज़रती जातीं और मैं कई-कई बार खिड़कियाँ बदलने के बाद उस सपने को आँखों में लिये हुए बिस्तर में लेट जाता। हर बीते हुए दिन के साथ सपना पहले से बड़ा हो जाता था, फिर भी मुझे लगता था कि जो कुछ मैं देखता हूँ, वह बहुत-बहुत अधूरा है। “यहाँ आओ मधुसूदन! यहाँ खड़े होकर ज़रा इस भीड़ को देखो...।” बस पर धक्कमधक्का करते हुए लोगों की गाली-गलौज, मद्रास होटल के पास के ग्राउंड में नवयुवती के साथ संदिग्ध स्थिति में पकड़े गये नवयुवक की भीड़ और पुलिस द्वारा मरम्मत, गेलार्ड के सामने बिकती हुई बेला और गुलाब की बेनियाँ, पुलिसमैन के डर से भागते हुए बूट-पॉलिश करनेवाले लड़के, थिएटर कम्यूनिकेशन्स बिल्ंिडग के सामने फुटपाथ पर पड़े हुए अपाहिज की कराह, भीड़ में खोये हुए अपने लड़के के लिए बिलखती हुई माँ, कुछ लड़कियों को होटलों के कमरे में ले जाती हुई डी.एल.ए. के ख़ास-ख़ास नम्बरों की गाडिय़ाँ, पंजाबी सूबे के नारे लगाता हुआ जुलूस, शराबियों की-सी चाल में कनॉट प्लेस में आड़ी-तिरछी होकर चलती हुई कारें, फैक्टरियों से काम करके लौटते हुए मज़दूर, दफ़्तरों से आते हुए बाबू, विदेशों से नाजायज़ तौर पर लाये गये माल को बेचते हुए लड़के, अख़बारों की सुर्खियाँ, कॉन्फ्रेंसें और भाषण, स्वागत और अभिनन्दन, इंटरव्यू और बयान, फ़ाइलें और फ़ीते, कला की प्रदर्शनियाँ, सौन्दर्य की खोज, मूल्यों की खोज, मौलिकता की खोज, मनुष्य की खोज, एक्सटेंशन लैक्चर्स, मैमोरियल लैक्चर्स, तारा-रा लारा-रा,...क्या सह सम्भव था कि इस पूरी भीड़ को तो क्या, इसके किसी एक हिस्से, किसी एक समूह या किसी एक व्यक्ति को ही खिड़की के पास खड़े होकर अच्छी तरह देखा जा सके?

अपने फ़ीचर के सिलसिले में मैं दफ़्तर के फ़ोटोग्राफ़र के साथ दरीबा में घूम रहा था।

पहले जब कभी मैं दरीबा के पास से गुज़रा था, तो इस ख़याल से नहीं गुज़रा था कि वह मेरे लिए एक फ़ीचर का विषय भी हो सकता है। शहर के जिस हिस्से में नादिरशाह के सिपाहियों ने सबसे ज़्यादा क़त्लेआम किया था, मैं कितनी ही बार बिना उसके ऐतिहासिक महत्त्व की ओर ध्यान दिये उस हिस्से से होकर निकल गया था। मगर उस समय मैं वहाँ ख़ास मतलब से आया था और मुझे वहाँ की हर छोटी से छोटी चीज़ को नोट करना था। पॉइंट एक—मोड़ के दोनों तरफ़ हलवाइयों की दुकानें हैं। पॉइंट दो—बाज़ार में दाख़िल होते ही दोनों तरफ़ जौहरियों की दुकानें हैं। पॉइंट तीन—पहले दायें हाथ को एक छोटी-सी गली है, फिर बायें हाथ को दो गलियाँ हैं। पॉइंट चार—बायें हाथ की गली का नाम कटरा मसरू है।

फ़ोटोग्राफ़र कुढ़ रहा था। ज्यों-ज्यों हम कटरा मसरू के अन्दर बढ़ते जाते थे, गली तंग होती जाती थी। आगे वह हिस्सा आ गया जहाँ एक के पीछे एक आदमी ही मुश्किल से गुज़र सकता था। गली पानी और कई-कई लेसीले द्रव्यों से इस तरह चिपचिपी हो रही थी कि एक-एक क़दम बहुत सँभालकर रखना पड़ता था। फ़ोटोग्राफ़र सुबह से भूखा-प्यासा गलियों के चक्कर काटता हुआ बुरी तरह तंग आ गया था। वह चाहता था कि जल्दी से दो-एक तसवीरें और ली जायें और वापस चला जाए। मगर मैं अपने फ़ीचर से सिर्फ़ तीन-चार इलाकों का वर्णन करके ही रह जाना चाहता था। मुझे जैसे भी हो, अपने सम्पादक की नज़रों में अपनी जगह बनानी थी और मैं अभी कम से कम तीन-चार इलाकों में और जाना चाहता था।

सारी गली एक बहुत बड़े उगालदान की तरह थी जहाँ बरसों का उगाल कई-कई तहों में जमा हुआ है। कैमरा से ली हुई कोई भी तसवीर क्या उसका सही चित्र प्रस्तुत कर सकती थी? लगता था जैसे गली का हर घर बरसों से क्षय रोग का मरीज़ हो और दुर्गन्ध और बच्चों और स्त्रियों के शोर के रूप में एक भयानक खाँसी उसके अन्दर से उठ रही हो। फ़ोटोग्राफ़र आगे नहीं जाना चाहता था, मगर मैं किसी तरह उसे रा$जी करके लिये जा रहा था। एक घर के अन्दर से एक स्त्री कूड़ा गली में फेंकने के लिए बाहर निकली, मगर हम लोगों को देखकर कूड़ा हाथ में लिये वैसे ही खड़ी रह गयी। उसके चेहरे की झाइयों को देखकर मुझे सहसा क़स्साबपुरा के घर की और ठकुराइन की याद हो आयी। स्त्री ने कूड़ा फेंक दिया और अन्दर चली गयी। इस बीच फ़ोटोग्राफ़र ने उसकी तसवीर ले ली थी। उसने शायद सोचा हो कि एकाध तसवीर और ले लेने से झंझट समाप्त हो जाएगा। फ़िल्म बाइंड करके उसने नाक पर रूमाल रखे हुए कहा, “इससे आगे चलने की मेरे अन्दर बिल्कुल हिम्मत नहीं है। आपको जाना हो, आप आगे हो आइए। मैं गली के बाहर आपका इन्तज़ार करूँगा।”

“मगर मैं तो यहाँ के बाद अभी और भी कुछ जगह जाना चाहता हूँ।” मैंने कहा, “अभी तो हमने कुछ भी मैटीरियल इकट्ठा नहीं किया। जहाँ-जहाँ हम गये हैं, वे सब तो अच्छी-खासी मध्य-वर्ग की बस्तियाँ हैं। एकाध ऐसे इलाके का और चक्कर लगाकर मैं चाहूँगा कि हम इससे निचले वर्ग के उन इलाकों में चलें जो कि वास्तव में स्लम्स के इलाके हैं।” मैं नहीं चाहता था कि सम्पादक को मेरे इस काम में भी दोष निकालने का मौका मिले। मैं उसकी व्यंग्यपूर्ण मुस्कराहट देख-देखकर बेज़ार हो चुका था।

“मेरे अन्दर अब और हिम्मत नहीं है।” फ़ोटोग्राफ़र अड़ गया, “आपको भी जाने कैसा फ़ीचर लिखने की सूझी है!”

“तुम्हें पता है सम्पादक ने यह फ़ीचर ख़ास तौर पर लिखने के लिए कहा है?”

“उसके दिमाग़ में भी कोई न कोई फ़ितूर उठता रहता है।” फ़ोटोग्राफ़र अपनी जगह से एक क़दम नहीं चला। “उससे कहिए, कभी खुद भी आकर इन गलियों का चक्कर काट जाए। जिस किसी को उसे तंग करना होता है, उसे वह इस तरह का काम सौंप देता है। मैं उसे जानता नहीं? आप तो अभी साल-भर पहले आये हैं, मैं उसके साथ छ: साल से काम कर रहा हूँ। और यह सारा झंझट वह किसी के इलेक्शन के लिए करा रहा होगा। आपको अन्दर की बातों का अभी पता नहीं है।”

“ख़ैर, तसवीरें बहुत हो गयी हैं।” मैंने कहा, “तुम वापस जाना चाहो, तो जाओ। मगर मुझे फ़ीचर के लिए कुछ और मैटीरियल भी चाहिए। मैं कुछ देर और चक्कर लगाकर वापस आऊँगा। अगर दे सको, तो अपना छोटा कैमरा मुझे दे दो। ज़रूरत हुई तो एकाध तसवीर मैं खुद ले लूँगा।”

फ़ोटोग्राफ़र इस बुरी तरह उस काम से उकताया हुआ था कि उसने झट अपना छोटा कैमरा उतारकर मुझे दे दिया। “मैं पहले कहीं जाकर चाय की एक प्याली पिऊँगा।” उसने कहा, “मुझे डर लग रहा है कि कहीं मेरी तबीयत ज़्यादा न मितलाने लगे।”

उस गली से बाहर आकर जब फ़ोटोग्राफ़र चला गया, तो मैंने डायरी में कुछ नोट्स लिखे और सोचने लगा कि अब मुझे किस इलाके की तरफ़ चलना चाहिए। एक मन था कि पहाडग़ंज के पुल की तरफ़ जो टीन, चटाई और टाट के गले-सड़े घर हैं, एक चक्कर उनका लगा आऊँ। पुल पर से गुज़रते हुए वह पूरी की पूरी आबादी कूड़े के एक बड़े-से ढेर की तरह नज़र आती थी। मैं जानता था कि एक बार वहाँ चक्कर लगा आने का कुछ भी अर्थ नहीं है—बल्कि चक्कर लगाने का जो काम मैं कर रहा हूँ, उस सारे काम का ही कोई अर्थ नहीं है—फिर भी जितनी अच्छी सुर्खी मुझे उन घरों में जाकर मिल सकती थी, उतनी अपने अब तक के चक्कर में नहीं मिली थी। और मुझे एक अच्छी सुर्खी ज़रूर चाहिए थी। कुछ आकर्षक सब-टाइटल्स मैंने सोच लिये थे। मगर सुर्खी बहुत ज़रूरी थी ताकि सम्पादक को व्यंग्य-भरी नज़र के साथ मेरी तरफ़ देखने का अवसर न मिले। मगर मेरा दूसरा मन यह हो रहा था कि इतने बरसों के बाद कम से कम आज एक बार क़स्साबपुरा की उस गली में भी हो आऊँ जिसमें कभी मैं खुद रहता था। आख़िर व्यक्ति की माँग दूसरी माँग से ज़्यादा शक्तिशाली सिद्ध हुई और मैं चाँदनी चौक से स्कूटर लेकर सदर के चौक में आ उतरा। सोचा कि आज भी काठ बाज़ार से होता हुआ ही क़स्साबपुरा में जाऊँगा।
 
काठ बाज़ार में दाख़िल हुआ, तो वहाँ का बदला हुआ न$क्शा देखकर मुझे कम अचम्भा नहीं हुआ। यह जानते हुए भी कि वेश्यावृत्ति सरकारी तौर पर बन्द कर दी गयी है, मैंने उस बाज़ार को इतने बदले हुए रूप में देखने की कल्पना नहीं की थी। यह चौकोर अहाता अब अहाता न लगकर एक साधारण बाज़ार-सा ही लग रहा था जहाँ पहले के पिंजरानुमा कठघरों की जगह अब गल्ले और आढ़त की दुकानें खुली हुई थीं। सिर्फ़ कहीं-कहीं पुराने जाली और सींखचेदार दरवाज़े अब भी नज़र आ रहे थे, जो कि शायद गुज़रे हुए दिनों की बात अभी भूले नहीं थे। वरना उस बाज़ार को देखकर पहले के दिनों का कुछ अनुमान तक नहीं होता था।

काठ बाज़ार का रूप बिल्कुल बदला होने पर भी वहाँ आकर मेरी चाल कुछ तेज़ हो गयी थी। वह बाज़ार जितना बदल गया था, मेरे मन का संस्कार उतना नहीं बदला था। जब तक उस इलाके को पार करके मैं बस्ती हरफूल में नहीं पहुँच गया, तब तक मेरे मन में एक तनाव बना ही रहा। उस चौकोर अहाते में क्या उन दिनों गुजरे हुए मेरे क़दमों की एक आहट अभी बाकी थी? और उस आहट के अलावा सींखचों के पीछे से झाँकते हुए चेहरों की एक छाया भी? क्या समय की भी अपनी प्रतिध्वनियाँ नहीं होतीं जो उसके बीत जाने के बाद भी बनी रहती हैं?

बस्ती हरफूल में ज़िन्दगी लगभग उसी तरह थी—उतनी ही सुस्त और उतनी ही ठहरी हुई। वही दुकानें, वही ठेले, वैसे ही आते-जाते हुए लोग। क़स्साबपुरा की पहली गली के मोड़ पर एक भीड़ जमा थी, वैसी ही जैसी हमेशा गली में आनेवाले मदारियों के इर्द-गिर्द जमा हुआ करती थी। सिर्फ़ मदारी के तमाशे की जगह वहाँ उस समय एक तरह का मुजरा चल रहा था। एक तेरह-चौदह साल की लड़की अपनी हरी ओढऩी के दोनों छोर हाथों में लिये एक फ़िल्मी गीत गाती हुई नाच रही थी :

'हवा में उड़ता जाये,

मेरा लाल दुपट्टा मलमल का

जी मेरा लाल दुपट्टा मलमल का,

ओ जी, ओ जी...!’

उसके इर्द-गिर्द जमा भीड़ में कुछ लोग उसे पास बुलाने के लिए हाथों में चवन्नियाँ और अठन्नियाँ लिये थे। वह जिस किसी के नज़दीक जाती थी, वही उसका हाथ थाम लेना चाहता था। हारमोनियम बजानेवाला उस्ताद हारमोनियम में से आवा$जें पैदा करने के साथ-साथ आँखों से कुछ इशारे किये जाता था।

“दुनिया नहीं मानती बाबूजी।” मैं वहाँ से आगे चला तो मेरे साथ-साथ चलता हुआ एक अँगोछेवाला व्यक्ति मुझसे बोला। पहले वह भी मेरी तरह भीड़ के पीछे से एडिय़ाँ उठाकर मुजरा देख रहा था। “सरकार अपनी जगह होशियार है, तो ये लोग सरकार से ज़्यादा होशियार हैं। क्यों?”

मेरे क़दमों की रफ़्तार फिर कुछ तेज़ हो गयी। मैं उसे कुछ भी उत्तर न देकर अपनी गली के मोड़ पर पहुँच गया।

पानवाले की दुकान वहीं थी, सिर्फ़ वहाँ बैठनेवाला कोई और था। सब्$जीवाले खोमचे भी लगभग उसी तरह लगे थे। मुझे एक बार तो ऐसे लगा था जैसे मैं सुबह ही वहाँ से गया था और दोपहर होते-होते फिर वहाँ वापस आ गया हूँ। मगर गली में बढ़ते हुए मुझे लगने लगा कि वहाँ की भीड़ पहले से कुछ ज़्यादा हो गयी है। पहले दोपहर को वहाँ इतनी भीड़ नहीं होती थी। घरों और दरवाज़ों की पहचानी हुई सूरतें लगभग उसी तरह थीं—हाँ, उनकी खस्ताहाली पहले से थोड़ी बढ़ गयी थी। मगर गली में चलता हुआ वही नालियों का पानी था, वैसी ही आवा$जें थीं और वही बिना बरसात का कीचड़ था।

गली में आकर जहाँ घर और दरवाज़े मुझे बहुत परिचित और पहचाने हुए लग रहे थे, वहाँ गली की भीड़ में एक भी ऐसा चेहरा नज़र नहीं आ रहा था जिसे मैं पहचान सकता था। खोमचों पर बैठनेवाले प्राय: सभी लोग अब दूसरे थे—जैसे दस साल में उस मुहल्ले में एक पूरी पीढ़ी बीत चुकी थी और उसकी जगह उसके बाद की पीढ़ी ने ले ली थी। यह सोचकर मेरे मन में एक निराशा की लहर दौड़ गयी कि शायद अब ठकुराइन और उसका परिवार भी मुझे उस घर में नहीं मिलेगा; मैं वहाँ का दरवाज़ा खटखटाऊँगा तो कोई और ही किरायेदार उस दरवाज़े से बाहर झाँककर देखेगा और उसे शायद यह पता ही नहीं होगा कि कभी सरस्वती ठकुराइन नाम की कोई स्त्री भी वहाँ अपने पति और लड़की के साथ रहती थी। घर के पास पहुँचते ही सबसे पहले मेरी नज़र बाहर लगी हुई त$ख्ती पर पड़ी। उसका नीचे का आधा हिस्सा जाने टूटकर गिर गया था या ऐसे ही धीरे-धीरे झड़ गया था। जितना हिस्सा बाकी था, वह अपनी जंग खायी कील के सहारे किसी तरह झूल रहा था। अब उस पर लिखे हुए नाम में से इबादत और अली, दोनों बिल्कुल गायब हो गये थे; इसका एक हल्का आभास मात्र रह गया था कि उस त$ख्ती पर कभी कोई नाम भी था। बाहर की जिस कोठरी में मैं और अरविन्द रहा करते थे, उसकी दहलीज़ पर एक बूढ़ी-सी औरत बैठी थी। उसे देखते ही मेरे क़दम सहसा लौटने को हो गये। मगर एक बार कोठरी को अन्दर से देखने का मोह मुझसे नहीं रोका गया और मैंने उस औरत के पास जाकर पूछ लिया कि वहाँ पहले जो एक ठाकुर साहब रहते थे, वे आजकल कहाँ हैं। वह औरत पल-भर ध्यान से मेरे चेहरे को देखती रही और फिर सहसा बोली, “अरे लाला, तुम हो? अपनी भाभी को पहचाना नहीं क्या?” और यह कहती हुई वह दहलीज़ से गली में उतर आयी।

“भाभी!” मेरी छाती में कोई चीज़ अटक गयी, “तुम एकदम इतनी कैसे बदल गयीं? मैं तो सचमुच तुम्हें पहचान ही नहीं सका।”

“आओ, अन्दर तो चलो।” ठकुराइन बोली, “भाभी के घर को तो तुम एक बार जाने के बाद फिर भूल ही गये। मैं तो सोचती थी कि तुम कहीं विलायत-इलायत चले गये होगे। इतने बरसों में कभी भाभी को पाँच नये पैसे की चिट्ठी भी नहीं डाली?”

मैंने कोठरी में क़दम रखा, तो वह भी मुझे ठकुराइन के चेहरे की तरह ही बदली हुई लगी। उसका पलस्तर इतनी जगह से उतर चुका था कि जो दो-चार टुकड़े बचे थे वे बहुत अस्वाभाविक रूप से वहाँ चिपकाये गये से लगते थे। छत की कडिय़ाँ बिल्कुल स्याह पड़ चुकी थीं। दीवारों पर जगह-जगह गेरू से स्वस्तिक बने थे और राम नाम लिखा था। दोनों कोठरियों के बीच का दरवाज़ा चौखट समेत बाहर को झूल आया था। सारी कोठरी में एक इस तरह की गन्ध फैली थी जैसी पुराने कपड़ों के ढेर में से आती है। एक चीज़ जो उस कोठरी को फिर भी बहुत परिचित बना रही थी, वह थी ऊपर से आती हुई स्त्रियों के लडऩे की आवाज़। मुझे लगा जैसे दस साल से वह लड़ाई लगातार उसी तरह चल रही हो और अभी तक उसका फ़ैसला न हुआ हो।

“दिल्ली कब आये हो?” ठकुराइन ने पूछा।

मुझे यह बताते हुए संकोच हुआ कि मुझे यहाँ आये एक साल हो गया है। “अभी थोड़े ही दिन हुए आया हूँ।” मैंने कहा, “मैंने फिर यहीं नौकरी कर ली है।”

“अच्छा!” ठकुराइन ने जाने कहाँ से निकालकर एक पुराना स्याह पड़ा हुआ मोढ़ा मेरे बैठने के लिए रख दिया और कहा, “बैठो। हमारे लिए तो यही बहुत है कि तुम्हें हम गरीबों की याद तो आयी। इस बार कहाँ घर लिया है?”

“करोल बाग के पास एक जगह कमरा ले रखा है।”

“हाँ भैया, अब तुम भाभी के पास इस तरह के कबाडख़ाने में थोड़े ही रहोगे। तब भाभी के दिन फिर भी अच्छे थे, अब तो भाभी का भाग ऐसा उलटा है कि बस...!”

“नहीं भाभी, आजकल मेरा दफ़्तर उस तरफ़ है न...।” मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूँ। ठकुराइन की आवाज़ में भी पहले से कुछ फ़र्क़ आ गया था, जैसे उसके गले के सुरों में से दो-एक सुर टूट गये हों। मैं लगातार उसके चेहरे की तरफ़ देख रहा था कि ठकुराइन इस अरसे में सचमुच बुड्ढी हो गयी है या मुद्दत के बाद देखने से मेरी आँखों को ही ऐसा लग रहा है।

“ठाकुर साहब तो आजकल भी उसी दफ़्तर में काम करते हैं न?” मैंने पूछा।

ठकुराइन की बुढिय़ायी हुई आँखें पल-भर के लिए मिची-मिची-सी हो रहीं और उसने कहा, “तुम्हारे भैया तो लाला दूसरे ही दफ़्तर में चले गये। वो होते तो तुम भाभी की आज यह हालत देखते? अब तो तुम्हारी भाभी को कोई पानी पूछनेवाला भी नहीं है।” और उसकी आँखें छलछला आयीं। उन्हें अपनी फटी हुई धोती के पल्ले से पोंछकर वह छत की तरफ़ देखती हुई बोली, “जिस मुये की आयी थी, वह तो मरा नहीं और जिसे जाने अभी कितने बरस जीना था, वह चलता हुआ।” और वह विस्तार के साथ बताने लगी कि मियाँ इबादत अली उन दिनों बहुत बीमार था। सारी-सारी रात उसे बुरी तरह खाँसी आती थी। हकीम ने कह दिया था कि वह अब दो-चार दिन से ज़्यादा नहीं बचेगा। एक रात को उसकी हालत बहुत ख़राब हो गयी। लोगों का ख़याल था कि सुबह होने से पहले ही वह चल बसेगा। मजीद और कई दूसरे लोग रात-भर उसके पास बैठे रहे। उन्होंने एक मौलवी को भी बुला लिया जो रात-भर मियाँ के सिरहाने बैठकर क़लमा पढ़ता रहा। उन्होंने उसे दफ़नाने ले जाने के लिए इन्तज़ाम भी कर लिया था।

“मगर जाने लाला, उस मौलवी ने क़लमा पढ़कर क्या जादू किया कि दिन भी चढ़ गया, रात भी हो गयी, मगर वह मरदूद फिर भी साँस लेता रहा। उसी रात तुम्हारे भैया को दमे का दौरा पड़ गया। शिकायत तो उन्हें पहले से थी मगर दौरा पड़ता भी था और ठीक भी हो जाता था। मगर उस दिन जो वार हुआ, वह ऐसा कि कहे कि मैं तुम्हारी जान ही लेकर छोड़ूँगा। सो चार-पाँच दिन में मियाँ तो भला-चंगा होकर बैठ गया और तुम्हारे भैया हमें छोड़कर चलते हुए। आज तो उन्हें गुज़रे भी तीन साल हो गये और मियाँ आज भी भला-चंगा उसी तरह खाता-पीता है। मैं जब भी उसे देखती हूँ, तो मेरी छाती पर साँप लोट जाता है। मन करता है कि मुये की लकड़ी छीनकर मुये को गली में धक्का दे दूँ। अपनी आयी मेरे घर भेजकर मुये ने मेरा घर तो मसान कर दिया और आप पाव-भर गोश्त रोज खाने के लिए आज भी बचा हुआ है। मेरा बस हो तो मैं तो किसी दिन ऊपर जाकर मुये की सितार उठा लाऊँ और उससे अपना एक बखत का चूल्हा जलाऊँ।”

ठकुराइन की बात सुनते हुए मुझे उस दिन की घटना याद आ रही थी जिस दिन मैं इबादत अली के पास बैठकर सितार सुनने के इरादे से अन्दर गया था और मैंने पहली बार उस टूटे-फूटे सितार को देखा था जिसमें से मियाँ की उँगलियाँ जाने कैसे वे तीव्र और कोमल स्वर पैदा कर लेती थीं जो मेरी उनींदी आँखों में नींद भर देते थे। उस दिन के साथ मेरे मन में एक और याद भी जुड़ी हुई थी—फटी हुई शेरवानी सीती हुई खुरशीद की आँखों में भरी हुई उपेक्षा और भत्र्सना की याद! उस लड़की के मन में प्रतिशोध की कितनी प्रबल भावना थी!

“मियाँ की वह एक लड़की थी न खुरशीद!” मैंने ठकुराइन से कहा, “उसकी मियाँ ने शादी-आदी कर दी या अब भी वह उसके पास ही रहती है?” और यह कहते हुए मुझे लगा कि वह लड़की अभी-अभी दरवाज़ा खोलकर कॉपी हाथ में लिये वहाँ आ जाएगी और कहेगी, “माईजी, आज पहली तारीख़ है, किराया दे दीजिए।”

“अरे लाला, उस लड़की के लच्छन क्या तुम्हें शादी कराने के दीखते थे?” ठकुराइन उसी ताव में बोली, “उसकी चाल-ढाल उन दिनों तुम देखते नहीं थे क्या? भूखी बाघनी की तरह हर मरद को घूरती रहती थी। हम तो तभी कहती थीं कि एक न एक दिन यह लड़की कोई गुल खिलाकर रहेगी। सो वही बात हुई। जब सिर पर माँ न हो, और बाप होकर भी न होने के बराबर हो, तो ऐसी लड़की जो न करे वह थोड़ा है। उसे लेकर घर में वह लंका-कांड हुआ कि तुम्हें क्या बताऊँ!”

और यह कहते-कहते ठकुराइन सहसा उठ खड़ी हुई, “तुम भी कहोगे लाला कि इतने बरसों में भाभी के घर आया तो घर आने पर उसने चाय की भी नहीं पूछी। मैं निम्मा को भेजती हूँ कि जाकर दो पैसे का दूध ले आये। तुम्हारी भाभी की आज जुगत ही इतनी है, नहीं तो तुम्हारे आने पर जाने तुम्हारी क्या-क्या खातिर करती!”

“मगर भाभी...,” मैं कुछ कहने को हुआ, तो ठकुराइन ने बीच में ही टोक दिया, “ना लाला, मैं तुम्हारे मुँह से ना नहीं सुनूँगी। तुम्हारी भाभी ग़रीब है, तो क्या तुम्हें दो पैसे की चाय भी नहीं पिला सकती? तुम्हें सौगन्ध लगे, अगर तुम मना करो तो!”

और वह झूलते हुए चौखट को पार करके अन्दर की कोठरी में चली गयी और कुछ ही देर में गिलास लिये और निम्मा की बाँह पकड़े बाहर आ गयी। निम्मा हँस भी रही थी और संकोच से अपनी बाँह भी छुड़ा रही थी।

“देखो लाला, पहचानते हो इसे?” ठकुराइन आकर मुझसे बोली, “जब तुम यहाँ रहते थे, तो यह इतनी-सी थी। अब देखो, कितनी बड़ी हो गयी है। लड़की और अनार का पेड़, इन्हें बढऩे में कितनी देर लगती है!” निम्मा ने एक उड़ती हुई नज़र मेरे चेहरे पर डाली, जल्दी से हाथ जोड़े और माँ के हाथ से गिलास लेकर गली में उतर गयी। ठकुराइन ने अपनी जगह पर आकर कहा, “कितनी सयानी लगने लगी है!”

“हाँ, मैं तो इसे पहचान ही नहीं सका।” मैंने कहा, “उन दिनों तो यह मिट्टी खाया करती थी और गली में खेला करती थी।”

“अब तो भैया मुझे इसी की चिन्ता खाये जाती है।” ठकुराइन के चेहरे की झुर्रियाँ गहरी हो गयीं, “वो आप तो रहे नहीं कि कहीं देखभाल करके इसकी शादी कर देते। मेरे पास जो तिनका-पत्ता था वह उनके बाद हम दोनों जनी खा-पी गयीं। अब तो रामजी का ही भरोसा है। हम दोनों जनी चार घरों में जाकर बरतन मलती हैं, तो रोटी का टुकड़ा मुँह में जाता है। इतनी बड़ी मूरत को लोगों के घरों में भेजते मेरे मन में हौल उठता है। तुम जानते ही हो आजकल ज़माना कैसा आ रहा है। अपने सगों का भरोसा नहीं, दूसरों की तो बात ही क्या है!”

मेरी आँखें पल-भर के लिए नीचे झुकी रहीं। कहीं ठकुराइन का इशारा दस साल पहले की उस घटना की ओर तो नहीं था जिसकी वजह से मैं यह घर छोड़कर चला गया था? मगर ठकुराइन के चेहरे पर या बात के लहजे में कहीं शिकायत का भाव नहीं था।

“घर में जवान लड़की तो भैया काँच की इमारत होती है।” वह फिर बोली, “इसे टूटते कितनीे देर लगती है? कोई एक बात भी कह दे, तो माँ-बाप का मरना हो जाता है। मैं इसीलिए अब आगे की कोठरी में कोई किरायेदार भी नहीं रखती। एक को साधु-महात्मा समझकर रख लिया था, तो वह भी एक मुस्टंडा निकला। ये देखो, दीवारों पर उसी महात्मा ने अपना चरित्तर लिख रखा है। सवेरे-शाम राम नाम का जाप करता था और धूनी रमाता था। मैं सोचती थी घर में इतना धरम-करम होता है, तो उसका कुछ फल हमें भी मिलेगा। मैं क्या जानती थी कि फल मिलेगा तो ऐसा कि बस याद रहे। ऊपर से तो धरम-करम और अन्दर से मुये का दिल भी धूनी की लकड़ी की तरह काला! मुआ लड़की को रात-दिन बेटी-बेटी कहता था और दोनों टेम धूनी की राख इसके माथे पर लगाता था। मगर एक दिन उसने वह करनी की कि ठाकुर साहब होते, तो जूते मार-मारकर मुये की चमड़ी उधेड़ देते। पहले लड़की के माथे पर राख लगायी और फिर उसके मुँह को पकड़ लिया और उसकी बाँह खींचने लगा। लड़की बाँह छुड़ाकर भागती हुई मेरे पास आयी और कहने लगी कि अम्माँ, इस बाबाजी को आज ही घर से निकाल दो। मैं सारी बात समझ गयी। मैंने कहा कि शोर मचाऊँगी, तो अपनी लड़की पर ही बात आएगी। इसलिए मैंने ऊपर से तो चुप साध रखी मगर उस मुये से उसी बखत कह दिया कि हमारे घर के लोग बाहर से आनेवाले हैं, इसलिए दिन चढ़ते ही अपना बोरिया लेकर यहाँ से चला जाए। मुये को डर था कि यहाँ रहा, तो जूते ही न खाने पड़ें, इसलिए उसने ज़रा चूँचरा नहीं की और दूसरे दिन सवेरे ही यहाँ से चला गया।”
 
Back
Top