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वह बिल्कुल निढाल-सा बैठा था और उसकी आँखें बाहर की बजाय अन्दर की तरफ़ झाँकने लग रही थीं। ओलों का तूफ़ान बीच में ज़ोर से खिडक़ी से टकराता और फिर धीमा पड़ जाता था। वह एक कड़वी चीज़ को निगलने की तरह कुछ देर आँखें बन्द किये और माथे पर बल डाले बैठा रहा और फिर बोला, “आधी रात को मेरी तबीयत बहुत ख़राब हो गयी। पहले कै हुई, फिर सिर चकराने लगा और सारे शरीर से जान निकलती हुई-सी लगने लगी। तब शायद रात के दो या ढाई बजे थे। बाँके ने तब ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया जिससे दरवाज़े की चटखनी अपने आप खुल गयी। बाँके अन्दर आया, तो भी मुझे लगा कि यह लडक़ी बाहर दरवाज़े के पास खड़ी है। बाँके ने बत्ती जलायी, तो यह जल्दी से दरवाज़े के पास से हट गयी। उस नीम बेहोशी की हालत में भी मेरे मन में एक डर-सा समा गया कि सुरजीत को पता चलेगा कि यह आधी रात को अकेली इस घर में रही है, तो वह क्या सोचेगा और इसके साथ क्या सलूक करेगा? मैं यह नहीं मान सकता कि वह सुरजीत को बताकर उस समय यहाँ आयी होगी और उसने इसे आने दिया होगा। यह बात सोचकर मेरी आँखों के सामने अँधेरा गहरा होने लगा और फिर मुझे सुबह तक होश नहीं आया कि मैं कहाँ पड़ा हूँ और कैसे पड़ा हूँ। सुबह जब मेरी आँखें खुलीं, तो मैं दो तकियों के बीच बिस्तर पर पड़ा था। कमरे की सब चीज़ें ठीक-ठिकाने से रखी थीं जैसाकि नीलिमा के रहते हुए कभी नहीं होता था। बाँके ऊँघता हुआ अपने कम्बल में लिपटा दहलीज़ के पास बैठा था मगर रसोईघर में चूल्हा जल रहा था और केतली में चाय का पानी उबल रहा था।”
तभी बाँके उधर से कम्बल और गरम पानी की बोतल लिये हुए आ गया। “साहब, छोटी बीबीजी कह रही हैं आप लेट जायें।” उसने दोनों चीज़ें हरबंस को देते हुए कहा। हरबंस ने एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह दोनों चीज़ें ले लीं और गद्दी बाँह के नीचे रखकर कुहनी के बल लेट गया। “और आप साहब, खाना कब खाएँगे?” बाँके ने मुझसे पूछा।
“मैं खाना यहाँ से जाकर ही खाऊँगा।” मैंने कहा, “तुम मेरे लिए कुछ मत बनाओ। इनके लिए जो कुछ बना हो, वह इन्हें खिला दो।”
“इनके लिए सूप और आपके लिए खाना तैयार हो चुका है।” बाँके बोला, “आप जब कहेंगे, तभी मैं ले आऊँगा। आपके लिए धुला हुआ कुरता-पाजामा भी निकालकर रख दिया है। छोटी बीबीजी कह रही हैं आप रात को यहीं रहेंगे।”
“नहीं, देखो बात यह है...”, मैं कहने लगा। मगर उसी समय ड्यौढ़ी के दरवाज़े के पास से शुक्ला की थकी हुई-सी आवाज़ सुनायी थी, “बाँके, इनसे कहो कि ये भी सावित्री दीदी की तरह न हो जाएँ। रात को किसी को तो भापाजी के पास रहना ही चाहिए।”
बाँके ने एक बार उधर देखा और फिर मेरी तरफ़ मुडक़र बोला, “तो जी, आपको पाजामा-कुरता दे दूँ, या...?”
“अभी रहने दो।” मैंने कहा, “अगर मैं रह गया तो मैं सोने से पहले तुमसे ले लूँगा।” बाँके के दाँत निकल आये और दरवाज़े पर झुकी हुई छाया दरवाज़े के पास से हट गयी।
शुक्ला के मुँह से सावित्री दीदी का ज़िक्र सुनते ही हरबंस के चेहरे का भाव कुछ बदल गया था। बाँके चला गया, तो वह पल-भर हाथ से अपने माथे को दबाये रहा।
“सिर में दर्द है क्या?” मैंने पूछा।
“नहीं, दर्द नहीं है, एक जकड़-सी है।” वह बोला, “मुझे कल से एक बहुत अजीब-सा अनुभव हो रहा है। मुझे पहली बार लग रहा है कि यह घर घर है और यहाँ जो जैसे होना चाहिए, वैसे ही हो रहा है। यह कितना बड़ा व्यंग्य है कि जो कुछ मैं नीलिमा से चाहता रहा हूँ, वह सब कुछ उसकी अनुपस्थिति में हो रहा है; और इसलिए सब कुछ होते हुए भी मेरे मन का खालीपन ज्यों का त्यों है, बल्कि पहले से भी बढ़ गया है।”
“तुम इसके लिए नीलिमा को ही दोषी नहीं ठहरा सकते।” मैंने कहा, “दोष बहुत-कुछ तुम्हारा अपना भी है। तुम उससे वह कुछ माँगते हो जो वह नहीं दे सकती और जो वह दे सकती है...।”
“वह मुझे कुछ नहीं दे सकती।” कहता हुआ वह गरम पानी की बोतल पीठ के पीछे रखकर सीधा बैठ गया। “इतने बरसों में मैं इसी नतीजे पर पहुँचा हूँ कि न वह मुझे कुछ दे सकती है और न मैं उसे कुछ दे सकता हूँ। इसलिए उसने अलग रहने का निश्चय कर लिया है, यह अच्छा ही है, नहीं तो वही चख़-चख़ ज़िन्दगी-भर बनी रहती। वह दस साल पहले जो कुछ मुझे नहीं दे सकती थी, वह आज भी नहीं दे सकती और दस साल और गुज़र जाते, तो भी न दे पाती।”
हवा की लहर एक गूँज के साथ आयी और निकल गयी। उस गूँज के बाद भी वातावरण में एक छटपटाहट-सी बनी रही, जैसे हवा जाते-जाते उसमें कई कुछ तोड़ और बिखेर गयी हो। कुछ क्षण भीगे हुए आकाश की तिप-तिप करती ख़ामोशी बनी रही और फिर एक वैसी ही गूँज उठ आयी।
“तुम्हें कल तो कम से कम उसका उत्साह नहीं तोडऩा चाहिए था।” मैंने कहा, “यह क्या ठीक था कि वहाँ से आते ही तुमने कह दिया कि तुम्हें उसके प्रदर्शन से निराशा हुई है?”
हरबंस पल-भर सीधी नज़र से मुझे देखता रहा। फिर बोला, “तुम्हारी इस बीच नीलिमा से मुलाकात हुई है?”
“मैं सुबह उससे मिल चुका हूँ।” मैंने कहा।
उसकी पीठ में शायद बहुत दर्द हो रहा था, क्योंकि उसने अपने पीछे बोतल को फिर ठीक किया और पल-भर फ़र्श की तरफ़ देखता हुआ कुछ सोचता रहा। फिर आँखें उठाकर बोला, “बात यह है मधुसूदन कि मैंने कभी उसे धोखे में नहीं रखना चाहा और शायद यही मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। मुझे सबसे बड़ा दु:ख इस बात का है कि वह आज तक मुझ पर विश्वास नहीं कर सकी। वह यही समझती है कि मैं अपने हीन भाव से जकड़ा हुआ हूँ, इसीलिए उसे ऊपर नहीं उठने देना चाहता। कल रात को उसने जो कुछ कहा, उसने मेरे अन्दर के घाव को और भी गहरा कर दिया है।”
“मगर उसका गिला भी तो बेजा नहीं था। तुम टिकटों की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेना चाहते थे, तो तुमने उससे पहले ही क्यों नहीं कह दिया?”
“तो तुम भी समझते हो कि मैंने जान-बूझकर ऐसा किया है?” उसकी आँखों का भाव बहुत व्यथापूर्ण हो उठा, “तुम्हारा भी यही ख़याल है कि मैं अपनी हीनता की भावना से पीडि़त हूँ और उसे धोखा दे रहा हूँ? मगर न तुम जानते हो, न वह जानती है, और न कोई और ही जानता है कि मेरे अन्दर क्या गुज़र रही है। मैं परसों टिकट देने के इरादे से ही पोलिटिकल सेक्रेटरी के यहाँ गया था।”
“तो फिर तुम उसे बिना टिकट दिये ही क्यों लौट आये? उसने जब खुद तुमसे कहा था कि...।”
“हा-हा!” वह अपने ख़ास लहजे पर आकर बोला, “यही बात है जिसे मेरे आसपास के लोगों में से कोई समझना नहीं चाहता। वह आदमी मेरे ऊपर इतना मेहरबान क्यों है? और आज ही नहीं, बहुत दिनों से वह मेरे लिए कुछ न कुछ करने की कोशिश करता रहता है। आखिर क्यों?”
“तुम इसकी क्या वजह समझते हो?”
“वजह बहुत साफ़ है, मधुसूदन! तुम्हें मैंने बताया था कि वे लोग मुझे एक बहुत अच्छी नौकरी ऑफ़र कर रहे हैं।”
“हाँ, यह तो बताया था, मगर यह नहीं बताया था कि वह नौकरी कैसी है और तुम्हें उसे लेने में एतराज़ क्या है?”
“नौकरी बहुत अच्छी है।” वह बोला, “और सीधे तौर पर देखा जाए, तो मुझे उसे लेने में कोई एतराज़ नहीं होना चाहिए। भारतीय संस्कृति केन्द्र के सेक्रेटरी की जगह खाली है और वही जगह मुझे ऑफ़र की जा रही है।”
“अरे!” मैं एकदम चौंक गया, “भारतीय संस्कृति केन्द्र के सेक्रेटरी की जगह और वह ऑफ़र तुम्हें ये लोग कर रहे हैं? इनका भारतीय संस्कृति केन्द्र के साथ क्या सम्बन्ध है?”
‘क्या सम्बन्ध है?” वह थोड़ा आवेश के साथ बोला, “तुम दिल्ली में रहते हुए भी नहीं जानते कि क्या सम्बन्ध है? भारतीय संस्कृति केन्द्र की स्थापना किसके पैसे से हुई है? उसकी नीति का संचालन किन लोगों के हाथ में है? शची को उसकी प्रधानता स्वीकार करने के लिए तुम्हें पता है कितना पैसा दिया जाता है?”
“मगर...।” मैं भौंचक्का-सा उसके चेहरे की तरफ़ देखता रहा।
“मगर क्यों?”
“मगर भारतीय संस्कृति केन्द्र तो भारतीय कला और संस्कृति को प्रोत्साहित करने का ही काम करता है। उनके कार्यक्रमों में तो ऐसा कुछ नहीं होता जिसका दूर से भी राजनीति के साथ किसी तरह का सम्बन्ध हो...।”
हरबंस ने हताश भाव से कन्धे हिलाये और पल-भर चुप रहा। फिर बोला, “तुम पत्रकार हो और जानते हो कि राजनीति में बफ़र स्टेट क्या अर्थ रखती है। साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी इस तरह की बफ़र स्टेट अपना अर्थ रखती है। भारतीय संस्कृति केन्द्र का काम सिर्फ़ इतना ही है कि वह साहित्यिकों और कलाकारों की एक ऐसी बफ़र स्टेट बनाये रखे जिसकी कम से कम दूसरे पक्ष के साथ सहानुभूति न हो। राजनीतिक दृष्टि से यह काम तुम्हारे ख़याल में कम महत्त्वपूर्ण है? इसी काम के लिए ये लोग ‘कल्चर’ नाम के अँग्रेज़ी साप्ताहिक को पैसा दे रहे हैं, इसीलिए कुछ लोगों को हर साल विदेश-यात्रा के लिए भेजते हैं। ये सबके सब उस बफ़र स्टेट को बनाये रखने के साधन हैं। इसके लिए किसी आदमी का नाम उपयोगी है, कोई आदमी दूसरी तरह से उपयोगी सिद्ध हो सकता है, इसलिए उसे हथियाने की कोशिश की जाती है। मुझे भारतीय संस्कृति केन्द्र के सेक्रेटरी का पद किसलिए दिया जा रहा है?”
“किसलिए दिया जा रहा है?”
“तुम्हें यह समझ नहीं आता कि मैं भी एक उपयोगी आदमी हूँ? मैं आज जिस पद पर काम कर रहा हूँ, उस पद को ध्यान में रखते हुए...तुम्हें कुछ भी समझ नहीं आता कि मैं किस तरह उपयोगी हूँ?”
अँगीठी की आँच मुझसे बरदाश्त नहीं हो रही थी, इसलिए मैंने अपनी कुरसी बदल ली।
“तो तुम समझते हो कि...।”
“मैं ही नहीं समझता, बात ही दरअसल यह है। मैं अपने को धोखे में रखना चाहूँ, तो कुछ भी कह सकता हूँ। मेरे मन में कई बार यह आया है कि जब दुनिया इसी रास्ते पर चल रही है, तो मैं भी क्यों न चलूँ! जब मेरे बदलने से दुनिया नहीं बदल सकती, तो मैं ही क्यों एक फिसलनवाले रास्ते को अपनाऊँ? मैंने कितनी ही बार अपने मन को मनाया है कि एक बार जाऊँ और चुपचाप बिन्दुओंवाली रेखा पर हस्ताक्षर करके लौट आऊँ। परसों भी मैं गया था, तो मेरे मन में अनिश्चय बना हुआ था। मगर वहाँ जाते ही उसने पहली बात इसी विषय में आरम्भ की, तो कोई चीज़ मेरे अन्दर से उठकर गले की तरफ़ आने लगी। मुझसे यह बरदाश्त नहीं हुआ कि मैं भी अपने को उसी पंक्ति में देखूँ जिसमें ‘कल्चर’ का सम्पादक है, सुषमा श्रीवास्तव है और हमारे परिचितों में कई और लोग हैं...।”
सुषमा का नाम बीच में आ आने से अचानक मेरे होंठ सूखने लगे। “तुम सुषमा के बारे में यह कैसे कह सकते हो कि वह भी इन्हीं लोगों में से है?” मैंने कुछ कठिनाई के साथ कहा।
“हा-हा!” वह बोला, “क्या मैं नहीं जानता? सुषमा कुछ दिन मेरे साथ भी घूमती रही है। एक बार मुझे लगा था कि मैं उससे अच्छी इंटलेक्चुअल मित्रता प्राप्त कर सकता हूँ। मगर बहुत जल्दी मुझे पता चल गया कि मैं कितने बड़े धोखे में हूँ। सुषमा ने उन्हीं दिनों करनाल में अपने पिता को नया मकान बनवाकर दिया था। उसके पिता की आर्थिक हालत क्या थी, मैं जानता हूँ। मैंने उससे पूछा कि अचानक वे लोग इतने अमीर कैसे हो गये, तो उसने मेरा हाथ दबाकर उत्तर दिया कि इस तरह के सवाल किसी से नहीं पूछने चाहिए।
मेरा सिर चकरा रहा था। मैंने कुरसी की दोनों बाँहों को पकडक़र अपने को सँभाले हुए कहा, “मगर तुमने यह बात मुझे पहले क्यों नहीं बतायी?”
“मैं सोचता था कि तुम्हारा उसके साथ इतना उठना-बैठना है, तुम्हें सब पता होगा। और जब मैं ही अपने मन में अपने लिए तय नहीं कर पा रहा था तो मुझे तुमसे कुछ कहने का अधिकार ही क्या था?”
मेरा शरीर और दिमाग़ बिल्कुल खाली हो गये थे। मेरी छाती में एक गोला-सा अटक रहा था। मैं खोयी हुई आँखों से चुपचाप उसकी तरफ़ देखता रहा तो वह बोला, “कल जाते ही उस आदमी ने मेरे साथ जब वह बात छेड़ दी, तो न जाने क्यों मेरे लिए वहाँ बैठना और उससे बात करना भी मुश्किल हो गया। उसके चेहरे पर जो रहस्यमय मुस्कराहट थी, वह मुझसे बरदाश्त नहीं हुई। यह कहकर कि मैं अभी दो मिनट में आ रहा हूँ, मैं उसके पास से उठकर चला आया और फिर लौटकर उसके पास नहीं गया। मैंने नीलिमा से कहा था कि मेरा उस आदमी से झगड़ा हो गया है। मगर सच बात यह है कि मेरा उससे कोई झगड़ा नहीं हुआ। अब सोचता हूँ तो लगता है, सचमुच उससे झगड़ा करके ही आया होता तो ज़्यादा अच्छा था। तब मुझे अपने मन के किसी कोने में यह आशंका तो न रहती कि शायद अब भी मैं किसी वक़्त जाकर बिन्दुओंवाली रेखा पर हस्ताक्षर कर आऊँ...।”
“मधुसूदन भाई!” दरवाज़े के चौखट के पास से शुक्ला की थकी हुई आवाज़ फिर सुनायी दे गयी। मैं उठकर ड्यौढ़ी में आ गया, तो वह थोड़ा गुस्से के साथ बोली, “देखिए, सारी रात भापाजी की तबीयत ख़राब रही है और अब भी ये लगातार बातें किये जा रहे हैं। कल को क्या ये अस्पताल ही जाना चाहते हैं? आप इन्हें बातें करने से रोकिए और कहिए कि थोड़ा-सा सूप पीकर सो जाएँ। मैं आपका खाना भी भेज रही हूँ। रात काफ़ी हो गयी है और वैसे भी इतनी सरदी है,आप लोगों को अब चुपचाप सो जाना चाहिए।” उसका जूड़ा बिल्कुल खुल गया था जिससे उसके बाल कन्धों पर बिखर आये थे। उस रूप और अपने अधिकारपूर्ण स्वर के कारण वह सचमुच घर की मालकिन लग रही थी।
“मैं अभी जाकर उसे बातें करने से रोक देता हूँ।” मैंने कहा, “तुम खाना भेज दो।” मैं कमरे में आया, तो हरबंस तब अपनी बाँह आँखों पर रखकर सीधा लेट गया था। वह ज़रा भी नहीं हिला-डुला, तो मुझे लगा कि वह अचानक ही सो गया है। “तुम्हें नींद आ गयी?” मैंने पूछा।
“नहीं।” उसने बाँह हटाकर आँखें खोल लीं, “बाँके से कह दो कि सूप ले आये, और क्षण-भर बाद उसने इतने धीमे स्वर में, कि मैं भी उसे कठिनाई से ही सुन सकता था, कहा, “और सुनो मधुसूदन, तुम रात को यहीं रहना, चले नहीं जाना।”
“ठीक है नहीं जाऊँगा, मगर...।”
“मगर-अगर कुछ नहीं। मैं तुम्हें बता नहीं सकता कि मुझे कैसा लग रहा है।...यह लडक़ी कल से जिस तरह का व्यवहार कर रही है, उससे मुझे अपने से ही डर लगता है।”
“क्यों, डर कैसा लगता है?”
“मुझे डर लगता है कि अगर मैं...अगर मैं अकेला घर में रहा और यह इसी तरह सब कुछ करती रही, तो न जाने...।”
तभी बाँके उधर से कम्बल और गरम पानी की बोतल लिये हुए आ गया। “साहब, छोटी बीबीजी कह रही हैं आप लेट जायें।” उसने दोनों चीज़ें हरबंस को देते हुए कहा। हरबंस ने एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह दोनों चीज़ें ले लीं और गद्दी बाँह के नीचे रखकर कुहनी के बल लेट गया। “और आप साहब, खाना कब खाएँगे?” बाँके ने मुझसे पूछा।
“मैं खाना यहाँ से जाकर ही खाऊँगा।” मैंने कहा, “तुम मेरे लिए कुछ मत बनाओ। इनके लिए जो कुछ बना हो, वह इन्हें खिला दो।”
“इनके लिए सूप और आपके लिए खाना तैयार हो चुका है।” बाँके बोला, “आप जब कहेंगे, तभी मैं ले आऊँगा। आपके लिए धुला हुआ कुरता-पाजामा भी निकालकर रख दिया है। छोटी बीबीजी कह रही हैं आप रात को यहीं रहेंगे।”
“नहीं, देखो बात यह है...”, मैं कहने लगा। मगर उसी समय ड्यौढ़ी के दरवाज़े के पास से शुक्ला की थकी हुई-सी आवाज़ सुनायी थी, “बाँके, इनसे कहो कि ये भी सावित्री दीदी की तरह न हो जाएँ। रात को किसी को तो भापाजी के पास रहना ही चाहिए।”
बाँके ने एक बार उधर देखा और फिर मेरी तरफ़ मुडक़र बोला, “तो जी, आपको पाजामा-कुरता दे दूँ, या...?”
“अभी रहने दो।” मैंने कहा, “अगर मैं रह गया तो मैं सोने से पहले तुमसे ले लूँगा।” बाँके के दाँत निकल आये और दरवाज़े पर झुकी हुई छाया दरवाज़े के पास से हट गयी।
शुक्ला के मुँह से सावित्री दीदी का ज़िक्र सुनते ही हरबंस के चेहरे का भाव कुछ बदल गया था। बाँके चला गया, तो वह पल-भर हाथ से अपने माथे को दबाये रहा।
“सिर में दर्द है क्या?” मैंने पूछा।
“नहीं, दर्द नहीं है, एक जकड़-सी है।” वह बोला, “मुझे कल से एक बहुत अजीब-सा अनुभव हो रहा है। मुझे पहली बार लग रहा है कि यह घर घर है और यहाँ जो जैसे होना चाहिए, वैसे ही हो रहा है। यह कितना बड़ा व्यंग्य है कि जो कुछ मैं नीलिमा से चाहता रहा हूँ, वह सब कुछ उसकी अनुपस्थिति में हो रहा है; और इसलिए सब कुछ होते हुए भी मेरे मन का खालीपन ज्यों का त्यों है, बल्कि पहले से भी बढ़ गया है।”
“तुम इसके लिए नीलिमा को ही दोषी नहीं ठहरा सकते।” मैंने कहा, “दोष बहुत-कुछ तुम्हारा अपना भी है। तुम उससे वह कुछ माँगते हो जो वह नहीं दे सकती और जो वह दे सकती है...।”
“वह मुझे कुछ नहीं दे सकती।” कहता हुआ वह गरम पानी की बोतल पीठ के पीछे रखकर सीधा बैठ गया। “इतने बरसों में मैं इसी नतीजे पर पहुँचा हूँ कि न वह मुझे कुछ दे सकती है और न मैं उसे कुछ दे सकता हूँ। इसलिए उसने अलग रहने का निश्चय कर लिया है, यह अच्छा ही है, नहीं तो वही चख़-चख़ ज़िन्दगी-भर बनी रहती। वह दस साल पहले जो कुछ मुझे नहीं दे सकती थी, वह आज भी नहीं दे सकती और दस साल और गुज़र जाते, तो भी न दे पाती।”
हवा की लहर एक गूँज के साथ आयी और निकल गयी। उस गूँज के बाद भी वातावरण में एक छटपटाहट-सी बनी रही, जैसे हवा जाते-जाते उसमें कई कुछ तोड़ और बिखेर गयी हो। कुछ क्षण भीगे हुए आकाश की तिप-तिप करती ख़ामोशी बनी रही और फिर एक वैसी ही गूँज उठ आयी।
“तुम्हें कल तो कम से कम उसका उत्साह नहीं तोडऩा चाहिए था।” मैंने कहा, “यह क्या ठीक था कि वहाँ से आते ही तुमने कह दिया कि तुम्हें उसके प्रदर्शन से निराशा हुई है?”
हरबंस पल-भर सीधी नज़र से मुझे देखता रहा। फिर बोला, “तुम्हारी इस बीच नीलिमा से मुलाकात हुई है?”
“मैं सुबह उससे मिल चुका हूँ।” मैंने कहा।
उसकी पीठ में शायद बहुत दर्द हो रहा था, क्योंकि उसने अपने पीछे बोतल को फिर ठीक किया और पल-भर फ़र्श की तरफ़ देखता हुआ कुछ सोचता रहा। फिर आँखें उठाकर बोला, “बात यह है मधुसूदन कि मैंने कभी उसे धोखे में नहीं रखना चाहा और शायद यही मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। मुझे सबसे बड़ा दु:ख इस बात का है कि वह आज तक मुझ पर विश्वास नहीं कर सकी। वह यही समझती है कि मैं अपने हीन भाव से जकड़ा हुआ हूँ, इसीलिए उसे ऊपर नहीं उठने देना चाहता। कल रात को उसने जो कुछ कहा, उसने मेरे अन्दर के घाव को और भी गहरा कर दिया है।”
“मगर उसका गिला भी तो बेजा नहीं था। तुम टिकटों की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेना चाहते थे, तो तुमने उससे पहले ही क्यों नहीं कह दिया?”
“तो तुम भी समझते हो कि मैंने जान-बूझकर ऐसा किया है?” उसकी आँखों का भाव बहुत व्यथापूर्ण हो उठा, “तुम्हारा भी यही ख़याल है कि मैं अपनी हीनता की भावना से पीडि़त हूँ और उसे धोखा दे रहा हूँ? मगर न तुम जानते हो, न वह जानती है, और न कोई और ही जानता है कि मेरे अन्दर क्या गुज़र रही है। मैं परसों टिकट देने के इरादे से ही पोलिटिकल सेक्रेटरी के यहाँ गया था।”
“तो फिर तुम उसे बिना टिकट दिये ही क्यों लौट आये? उसने जब खुद तुमसे कहा था कि...।”
“हा-हा!” वह अपने ख़ास लहजे पर आकर बोला, “यही बात है जिसे मेरे आसपास के लोगों में से कोई समझना नहीं चाहता। वह आदमी मेरे ऊपर इतना मेहरबान क्यों है? और आज ही नहीं, बहुत दिनों से वह मेरे लिए कुछ न कुछ करने की कोशिश करता रहता है। आखिर क्यों?”
“तुम इसकी क्या वजह समझते हो?”
“वजह बहुत साफ़ है, मधुसूदन! तुम्हें मैंने बताया था कि वे लोग मुझे एक बहुत अच्छी नौकरी ऑफ़र कर रहे हैं।”
“हाँ, यह तो बताया था, मगर यह नहीं बताया था कि वह नौकरी कैसी है और तुम्हें उसे लेने में एतराज़ क्या है?”
“नौकरी बहुत अच्छी है।” वह बोला, “और सीधे तौर पर देखा जाए, तो मुझे उसे लेने में कोई एतराज़ नहीं होना चाहिए। भारतीय संस्कृति केन्द्र के सेक्रेटरी की जगह खाली है और वही जगह मुझे ऑफ़र की जा रही है।”
“अरे!” मैं एकदम चौंक गया, “भारतीय संस्कृति केन्द्र के सेक्रेटरी की जगह और वह ऑफ़र तुम्हें ये लोग कर रहे हैं? इनका भारतीय संस्कृति केन्द्र के साथ क्या सम्बन्ध है?”
‘क्या सम्बन्ध है?” वह थोड़ा आवेश के साथ बोला, “तुम दिल्ली में रहते हुए भी नहीं जानते कि क्या सम्बन्ध है? भारतीय संस्कृति केन्द्र की स्थापना किसके पैसे से हुई है? उसकी नीति का संचालन किन लोगों के हाथ में है? शची को उसकी प्रधानता स्वीकार करने के लिए तुम्हें पता है कितना पैसा दिया जाता है?”
“मगर...।” मैं भौंचक्का-सा उसके चेहरे की तरफ़ देखता रहा।
“मगर क्यों?”
“मगर भारतीय संस्कृति केन्द्र तो भारतीय कला और संस्कृति को प्रोत्साहित करने का ही काम करता है। उनके कार्यक्रमों में तो ऐसा कुछ नहीं होता जिसका दूर से भी राजनीति के साथ किसी तरह का सम्बन्ध हो...।”
हरबंस ने हताश भाव से कन्धे हिलाये और पल-भर चुप रहा। फिर बोला, “तुम पत्रकार हो और जानते हो कि राजनीति में बफ़र स्टेट क्या अर्थ रखती है। साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी इस तरह की बफ़र स्टेट अपना अर्थ रखती है। भारतीय संस्कृति केन्द्र का काम सिर्फ़ इतना ही है कि वह साहित्यिकों और कलाकारों की एक ऐसी बफ़र स्टेट बनाये रखे जिसकी कम से कम दूसरे पक्ष के साथ सहानुभूति न हो। राजनीतिक दृष्टि से यह काम तुम्हारे ख़याल में कम महत्त्वपूर्ण है? इसी काम के लिए ये लोग ‘कल्चर’ नाम के अँग्रेज़ी साप्ताहिक को पैसा दे रहे हैं, इसीलिए कुछ लोगों को हर साल विदेश-यात्रा के लिए भेजते हैं। ये सबके सब उस बफ़र स्टेट को बनाये रखने के साधन हैं। इसके लिए किसी आदमी का नाम उपयोगी है, कोई आदमी दूसरी तरह से उपयोगी सिद्ध हो सकता है, इसलिए उसे हथियाने की कोशिश की जाती है। मुझे भारतीय संस्कृति केन्द्र के सेक्रेटरी का पद किसलिए दिया जा रहा है?”
“किसलिए दिया जा रहा है?”
“तुम्हें यह समझ नहीं आता कि मैं भी एक उपयोगी आदमी हूँ? मैं आज जिस पद पर काम कर रहा हूँ, उस पद को ध्यान में रखते हुए...तुम्हें कुछ भी समझ नहीं आता कि मैं किस तरह उपयोगी हूँ?”
अँगीठी की आँच मुझसे बरदाश्त नहीं हो रही थी, इसलिए मैंने अपनी कुरसी बदल ली।
“तो तुम समझते हो कि...।”
“मैं ही नहीं समझता, बात ही दरअसल यह है। मैं अपने को धोखे में रखना चाहूँ, तो कुछ भी कह सकता हूँ। मेरे मन में कई बार यह आया है कि जब दुनिया इसी रास्ते पर चल रही है, तो मैं भी क्यों न चलूँ! जब मेरे बदलने से दुनिया नहीं बदल सकती, तो मैं ही क्यों एक फिसलनवाले रास्ते को अपनाऊँ? मैंने कितनी ही बार अपने मन को मनाया है कि एक बार जाऊँ और चुपचाप बिन्दुओंवाली रेखा पर हस्ताक्षर करके लौट आऊँ। परसों भी मैं गया था, तो मेरे मन में अनिश्चय बना हुआ था। मगर वहाँ जाते ही उसने पहली बात इसी विषय में आरम्भ की, तो कोई चीज़ मेरे अन्दर से उठकर गले की तरफ़ आने लगी। मुझसे यह बरदाश्त नहीं हुआ कि मैं भी अपने को उसी पंक्ति में देखूँ जिसमें ‘कल्चर’ का सम्पादक है, सुषमा श्रीवास्तव है और हमारे परिचितों में कई और लोग हैं...।”
सुषमा का नाम बीच में आ आने से अचानक मेरे होंठ सूखने लगे। “तुम सुषमा के बारे में यह कैसे कह सकते हो कि वह भी इन्हीं लोगों में से है?” मैंने कुछ कठिनाई के साथ कहा।
“हा-हा!” वह बोला, “क्या मैं नहीं जानता? सुषमा कुछ दिन मेरे साथ भी घूमती रही है। एक बार मुझे लगा था कि मैं उससे अच्छी इंटलेक्चुअल मित्रता प्राप्त कर सकता हूँ। मगर बहुत जल्दी मुझे पता चल गया कि मैं कितने बड़े धोखे में हूँ। सुषमा ने उन्हीं दिनों करनाल में अपने पिता को नया मकान बनवाकर दिया था। उसके पिता की आर्थिक हालत क्या थी, मैं जानता हूँ। मैंने उससे पूछा कि अचानक वे लोग इतने अमीर कैसे हो गये, तो उसने मेरा हाथ दबाकर उत्तर दिया कि इस तरह के सवाल किसी से नहीं पूछने चाहिए।
मेरा सिर चकरा रहा था। मैंने कुरसी की दोनों बाँहों को पकडक़र अपने को सँभाले हुए कहा, “मगर तुमने यह बात मुझे पहले क्यों नहीं बतायी?”
“मैं सोचता था कि तुम्हारा उसके साथ इतना उठना-बैठना है, तुम्हें सब पता होगा। और जब मैं ही अपने मन में अपने लिए तय नहीं कर पा रहा था तो मुझे तुमसे कुछ कहने का अधिकार ही क्या था?”
मेरा शरीर और दिमाग़ बिल्कुल खाली हो गये थे। मेरी छाती में एक गोला-सा अटक रहा था। मैं खोयी हुई आँखों से चुपचाप उसकी तरफ़ देखता रहा तो वह बोला, “कल जाते ही उस आदमी ने मेरे साथ जब वह बात छेड़ दी, तो न जाने क्यों मेरे लिए वहाँ बैठना और उससे बात करना भी मुश्किल हो गया। उसके चेहरे पर जो रहस्यमय मुस्कराहट थी, वह मुझसे बरदाश्त नहीं हुई। यह कहकर कि मैं अभी दो मिनट में आ रहा हूँ, मैं उसके पास से उठकर चला आया और फिर लौटकर उसके पास नहीं गया। मैंने नीलिमा से कहा था कि मेरा उस आदमी से झगड़ा हो गया है। मगर सच बात यह है कि मेरा उससे कोई झगड़ा नहीं हुआ। अब सोचता हूँ तो लगता है, सचमुच उससे झगड़ा करके ही आया होता तो ज़्यादा अच्छा था। तब मुझे अपने मन के किसी कोने में यह आशंका तो न रहती कि शायद अब भी मैं किसी वक़्त जाकर बिन्दुओंवाली रेखा पर हस्ताक्षर कर आऊँ...।”
“मधुसूदन भाई!” दरवाज़े के चौखट के पास से शुक्ला की थकी हुई आवाज़ फिर सुनायी दे गयी। मैं उठकर ड्यौढ़ी में आ गया, तो वह थोड़ा गुस्से के साथ बोली, “देखिए, सारी रात भापाजी की तबीयत ख़राब रही है और अब भी ये लगातार बातें किये जा रहे हैं। कल को क्या ये अस्पताल ही जाना चाहते हैं? आप इन्हें बातें करने से रोकिए और कहिए कि थोड़ा-सा सूप पीकर सो जाएँ। मैं आपका खाना भी भेज रही हूँ। रात काफ़ी हो गयी है और वैसे भी इतनी सरदी है,आप लोगों को अब चुपचाप सो जाना चाहिए।” उसका जूड़ा बिल्कुल खुल गया था जिससे उसके बाल कन्धों पर बिखर आये थे। उस रूप और अपने अधिकारपूर्ण स्वर के कारण वह सचमुच घर की मालकिन लग रही थी।
“मैं अभी जाकर उसे बातें करने से रोक देता हूँ।” मैंने कहा, “तुम खाना भेज दो।” मैं कमरे में आया, तो हरबंस तब अपनी बाँह आँखों पर रखकर सीधा लेट गया था। वह ज़रा भी नहीं हिला-डुला, तो मुझे लगा कि वह अचानक ही सो गया है। “तुम्हें नींद आ गयी?” मैंने पूछा।
“नहीं।” उसने बाँह हटाकर आँखें खोल लीं, “बाँके से कह दो कि सूप ले आये, और क्षण-भर बाद उसने इतने धीमे स्वर में, कि मैं भी उसे कठिनाई से ही सुन सकता था, कहा, “और सुनो मधुसूदन, तुम रात को यहीं रहना, चले नहीं जाना।”
“ठीक है नहीं जाऊँगा, मगर...।”
“मगर-अगर कुछ नहीं। मैं तुम्हें बता नहीं सकता कि मुझे कैसा लग रहा है।...यह लडक़ी कल से जिस तरह का व्यवहार कर रही है, उससे मुझे अपने से ही डर लगता है।”
“क्यों, डर कैसा लगता है?”
“मुझे डर लगता है कि अगर मैं...अगर मैं अकेला घर में रहा और यह इसी तरह सब कुछ करती रही, तो न जाने...।”