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अंधेरे बंद कमरे / मोहन राकेश संचयन

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वह बिल्कुल निढाल-सा बैठा था और उसकी आँखें बाहर की बजाय अन्दर की तरफ़ झाँकने लग रही थीं। ओलों का तूफ़ान बीच में ज़ोर से खिडक़ी से टकराता और फिर धीमा पड़ जाता था। वह एक कड़वी चीज़ को निगलने की तरह कुछ देर आँखें बन्द किये और माथे पर बल डाले बैठा रहा और फिर बोला, “आधी रात को मेरी तबीयत बहुत ख़राब हो गयी। पहले कै हुई, फिर सिर चकराने लगा और सारे शरीर से जान निकलती हुई-सी लगने लगी। तब शायद रात के दो या ढाई बजे थे। बाँके ने तब ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया जिससे दरवाज़े की चटखनी अपने आप खुल गयी। बाँके अन्दर आया, तो भी मुझे लगा कि यह लडक़ी बाहर दरवाज़े के पास खड़ी है। बाँके ने बत्ती जलायी, तो यह जल्दी से दरवाज़े के पास से हट गयी। उस नीम बेहोशी की हालत में भी मेरे मन में एक डर-सा समा गया कि सुरजीत को पता चलेगा कि यह आधी रात को अकेली इस घर में रही है, तो वह क्या सोचेगा और इसके साथ क्या सलूक करेगा? मैं यह नहीं मान सकता कि वह सुरजीत को बताकर उस समय यहाँ आयी होगी और उसने इसे आने दिया होगा। यह बात सोचकर मेरी आँखों के सामने अँधेरा गहरा होने लगा और फिर मुझे सुबह तक होश नहीं आया कि मैं कहाँ पड़ा हूँ और कैसे पड़ा हूँ। सुबह जब मेरी आँखें खुलीं, तो मैं दो तकियों के बीच बिस्तर पर पड़ा था। कमरे की सब चीज़ें ठीक-ठिकाने से रखी थीं जैसाकि नीलिमा के रहते हुए कभी नहीं होता था। बाँके ऊँघता हुआ अपने कम्बल में लिपटा दहलीज़ के पास बैठा था मगर रसोईघर में चूल्हा जल रहा था और केतली में चाय का पानी उबल रहा था।”

तभी बाँके उधर से कम्बल और गरम पानी की बोतल लिये हुए आ गया। “साहब, छोटी बीबीजी कह रही हैं आप लेट जायें।” उसने दोनों चीज़ें हरबंस को देते हुए कहा। हरबंस ने एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह दोनों चीज़ें ले लीं और गद्दी बाँह के नीचे रखकर कुहनी के बल लेट गया। “और आप साहब, खाना कब खाएँगे?” बाँके ने मुझसे पूछा।

“मैं खाना यहाँ से जाकर ही खाऊँगा।” मैंने कहा, “तुम मेरे लिए कुछ मत बनाओ। इनके लिए जो कुछ बना हो, वह इन्हें खिला दो।”

“इनके लिए सूप और आपके लिए खाना तैयार हो चुका है।” बाँके बोला, “आप जब कहेंगे, तभी मैं ले आऊँगा। आपके लिए धुला हुआ कुरता-पाजामा भी निकालकर रख दिया है। छोटी बीबीजी कह रही हैं आप रात को यहीं रहेंगे।”

“नहीं, देखो बात यह है...”, मैं कहने लगा। मगर उसी समय ड्यौढ़ी के दरवाज़े के पास से शुक्ला की थकी हुई-सी आवाज़ सुनायी थी, “बाँके, इनसे कहो कि ये भी सावित्री दीदी की तरह न हो जाएँ। रात को किसी को तो भापाजी के पास रहना ही चाहिए।”

बाँके ने एक बार उधर देखा और फिर मेरी तरफ़ मुडक़र बोला, “तो जी, आपको पाजामा-कुरता दे दूँ, या...?”

“अभी रहने दो।” मैंने कहा, “अगर मैं रह गया तो मैं सोने से पहले तुमसे ले लूँगा।” बाँके के दाँत निकल आये और दरवाज़े पर झुकी हुई छाया दरवाज़े के पास से हट गयी।

शुक्ला के मुँह से सावित्री दीदी का ज़िक्र सुनते ही हरबंस के चेहरे का भाव कुछ बदल गया था। बाँके चला गया, तो वह पल-भर हाथ से अपने माथे को दबाये रहा।

“सिर में दर्द है क्या?” मैंने पूछा।

“नहीं, दर्द नहीं है, एक जकड़-सी है।” वह बोला, “मुझे कल से एक बहुत अजीब-सा अनुभव हो रहा है। मुझे पहली बार लग रहा है कि यह घर घर है और यहाँ जो जैसे होना चाहिए, वैसे ही हो रहा है। यह कितना बड़ा व्यंग्य है कि जो कुछ मैं नीलिमा से चाहता रहा हूँ, वह सब कुछ उसकी अनुपस्थिति में हो रहा है; और इसलिए सब कुछ होते हुए भी मेरे मन का खालीपन ज्यों का त्यों है, बल्कि पहले से भी बढ़ गया है।”

“तुम इसके लिए नीलिमा को ही दोषी नहीं ठहरा सकते।” मैंने कहा, “दोष बहुत-कुछ तुम्हारा अपना भी है। तुम उससे वह कुछ माँगते हो जो वह नहीं दे सकती और जो वह दे सकती है...।”

“वह मुझे कुछ नहीं दे सकती।” कहता हुआ वह गरम पानी की बोतल पीठ के पीछे रखकर सीधा बैठ गया। “इतने बरसों में मैं इसी नतीजे पर पहुँचा हूँ कि न वह मुझे कुछ दे सकती है और न मैं उसे कुछ दे सकता हूँ। इसलिए उसने अलग रहने का निश्चय कर लिया है, यह अच्छा ही है, नहीं तो वही चख़-चख़ ज़िन्दगी-भर बनी रहती। वह दस साल पहले जो कुछ मुझे नहीं दे सकती थी, वह आज भी नहीं दे सकती और दस साल और गुज़र जाते, तो भी न दे पाती।”

हवा की लहर एक गूँज के साथ आयी और निकल गयी। उस गूँज के बाद भी वातावरण में एक छटपटाहट-सी बनी रही, जैसे हवा जाते-जाते उसमें कई कुछ तोड़ और बिखेर गयी हो। कुछ क्षण भीगे हुए आकाश की तिप-तिप करती ख़ामोशी बनी रही और फिर एक वैसी ही गूँज उठ आयी।

“तुम्हें कल तो कम से कम उसका उत्साह नहीं तोडऩा चाहिए था।” मैंने कहा, “यह क्या ठीक था कि वहाँ से आते ही तुमने कह दिया कि तुम्हें उसके प्रदर्शन से निराशा हुई है?”

हरबंस पल-भर सीधी नज़र से मुझे देखता रहा। फिर बोला, “तुम्हारी इस बीच नीलिमा से मुलाकात हुई है?”

“मैं सुबह उससे मिल चुका हूँ।” मैंने कहा।

उसकी पीठ में शायद बहुत दर्द हो रहा था, क्योंकि उसने अपने पीछे बोतल को फिर ठीक किया और पल-भर फ़र्श की तरफ़ देखता हुआ कुछ सोचता रहा। फिर आँखें उठाकर बोला, “बात यह है मधुसूदन कि मैंने कभी उसे धोखे में नहीं रखना चाहा और शायद यही मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। मुझे सबसे बड़ा दु:ख इस बात का है कि वह आज तक मुझ पर विश्वास नहीं कर सकी। वह यही समझती है कि मैं अपने हीन भाव से जकड़ा हुआ हूँ, इसीलिए उसे ऊपर नहीं उठने देना चाहता। कल रात को उसने जो कुछ कहा, उसने मेरे अन्दर के घाव को और भी गहरा कर दिया है।”

“मगर उसका गिला भी तो बेजा नहीं था। तुम टिकटों की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेना चाहते थे, तो तुमने उससे पहले ही क्यों नहीं कह दिया?”

“तो तुम भी समझते हो कि मैंने जान-बूझकर ऐसा किया है?” उसकी आँखों का भाव बहुत व्यथापूर्ण हो उठा, “तुम्हारा भी यही ख़याल है कि मैं अपनी हीनता की भावना से पीडि़त हूँ और उसे धोखा दे रहा हूँ? मगर न तुम जानते हो, न वह जानती है, और न कोई और ही जानता है कि मेरे अन्दर क्या गुज़र रही है। मैं परसों टिकट देने के इरादे से ही पोलिटिकल सेक्रेटरी के यहाँ गया था।”

“तो फिर तुम उसे बिना टिकट दिये ही क्यों लौट आये? उसने जब खुद तुमसे कहा था कि...।”

“हा-हा!” वह अपने ख़ास लहजे पर आकर बोला, “यही बात है जिसे मेरे आसपास के लोगों में से कोई समझना नहीं चाहता। वह आदमी मेरे ऊपर इतना मेहरबान क्यों है? और आज ही नहीं, बहुत दिनों से वह मेरे लिए कुछ न कुछ करने की कोशिश करता रहता है। आखिर क्यों?”

“तुम इसकी क्या वजह समझते हो?”

“वजह बहुत साफ़ है, मधुसूदन! तुम्हें मैंने बताया था कि वे लोग मुझे एक बहुत अच्छी नौकरी ऑफ़र कर रहे हैं।”

“हाँ, यह तो बताया था, मगर यह नहीं बताया था कि वह नौकरी कैसी है और तुम्हें उसे लेने में एतराज़ क्या है?”

“नौकरी बहुत अच्छी है।” वह बोला, “और सीधे तौर पर देखा जाए, तो मुझे उसे लेने में कोई एतराज़ नहीं होना चाहिए। भारतीय संस्कृति केन्द्र के सेक्रेटरी की जगह खाली है और वही जगह मुझे ऑफ़र की जा रही है।”

“अरे!” मैं एकदम चौंक गया, “भारतीय संस्कृति केन्द्र के सेक्रेटरी की जगह और वह ऑफ़र तुम्हें ये लोग कर रहे हैं? इनका भारतीय संस्कृति केन्द्र के साथ क्या सम्बन्ध है?”

‘क्या सम्बन्ध है?” वह थोड़ा आवेश के साथ बोला, “तुम दिल्ली में रहते हुए भी नहीं जानते कि क्या सम्बन्ध है? भारतीय संस्कृति केन्द्र की स्थापना किसके पैसे से हुई है? उसकी नीति का संचालन किन लोगों के हाथ में है? शची को उसकी प्रधानता स्वीकार करने के लिए तुम्हें पता है कितना पैसा दिया जाता है?”

“मगर...।” मैं भौंचक्का-सा उसके चेहरे की तरफ़ देखता रहा।

“मगर क्यों?”

“मगर भारतीय संस्कृति केन्द्र तो भारतीय कला और संस्कृति को प्रोत्साहित करने का ही काम करता है। उनके कार्यक्रमों में तो ऐसा कुछ नहीं होता जिसका दूर से भी राजनीति के साथ किसी तरह का सम्बन्ध हो...।”

हरबंस ने हताश भाव से कन्धे हिलाये और पल-भर चुप रहा। फिर बोला, “तुम पत्रकार हो और जानते हो कि राजनीति में बफ़र स्टेट क्या अर्थ रखती है। साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी इस तरह की बफ़र स्टेट अपना अर्थ रखती है। भारतीय संस्कृति केन्द्र का काम सिर्फ़ इतना ही है कि वह साहित्यिकों और कलाकारों की एक ऐसी बफ़र स्टेट बनाये रखे जिसकी कम से कम दूसरे पक्ष के साथ सहानुभूति न हो। राजनीतिक दृष्टि से यह काम तुम्हारे ख़याल में कम महत्त्वपूर्ण है? इसी काम के लिए ये लोग ‘कल्चर’ नाम के अँग्रेज़ी साप्ताहिक को पैसा दे रहे हैं, इसीलिए कुछ लोगों को हर साल विदेश-यात्रा के लिए भेजते हैं। ये सबके सब उस बफ़र स्टेट को बनाये रखने के साधन हैं। इसके लिए किसी आदमी का नाम उपयोगी है, कोई आदमी दूसरी तरह से उपयोगी सिद्ध हो सकता है, इसलिए उसे हथियाने की कोशिश की जाती है। मुझे भारतीय संस्कृति केन्द्र के सेक्रेटरी का पद किसलिए दिया जा रहा है?”

“किसलिए दिया जा रहा है?”

“तुम्हें यह समझ नहीं आता कि मैं भी एक उपयोगी आदमी हूँ? मैं आज जिस पद पर काम कर रहा हूँ, उस पद को ध्यान में रखते हुए...तुम्हें कुछ भी समझ नहीं आता कि मैं किस तरह उपयोगी हूँ?”

अँगीठी की आँच मुझसे बरदाश्त नहीं हो रही थी, इसलिए मैंने अपनी कुरसी बदल ली।

“तो तुम समझते हो कि...।”

“मैं ही नहीं समझता, बात ही दरअसल यह है। मैं अपने को धोखे में रखना चाहूँ, तो कुछ भी कह सकता हूँ। मेरे मन में कई बार यह आया है कि जब दुनिया इसी रास्ते पर चल रही है, तो मैं भी क्यों न चलूँ! जब मेरे बदलने से दुनिया नहीं बदल सकती, तो मैं ही क्यों एक फिसलनवाले रास्ते को अपनाऊँ? मैंने कितनी ही बार अपने मन को मनाया है कि एक बार जाऊँ और चुपचाप बिन्दुओंवाली रेखा पर हस्ताक्षर करके लौट आऊँ। परसों भी मैं गया था, तो मेरे मन में अनिश्चय बना हुआ था। मगर वहाँ जाते ही उसने पहली बात इसी विषय में आरम्भ की, तो कोई चीज़ मेरे अन्दर से उठकर गले की तरफ़ आने लगी। मुझसे यह बरदाश्त नहीं हुआ कि मैं भी अपने को उसी पंक्ति में देखूँ जिसमें ‘कल्चर’ का सम्पादक है, सुषमा श्रीवास्तव है और हमारे परिचितों में कई और लोग हैं...।”

सुषमा का नाम बीच में आ आने से अचानक मेरे होंठ सूखने लगे। “तुम सुषमा के बारे में यह कैसे कह सकते हो कि वह भी इन्हीं लोगों में से है?” मैंने कुछ कठिनाई के साथ कहा।

“हा-हा!” वह बोला, “क्या मैं नहीं जानता? सुषमा कुछ दिन मेरे साथ भी घूमती रही है। एक बार मुझे लगा था कि मैं उससे अच्छी इंटलेक्चुअल मित्रता प्राप्त कर सकता हूँ। मगर बहुत जल्दी मुझे पता चल गया कि मैं कितने बड़े धोखे में हूँ। सुषमा ने उन्हीं दिनों करनाल में अपने पिता को नया मकान बनवाकर दिया था। उसके पिता की आर्थिक हालत क्या थी, मैं जानता हूँ। मैंने उससे पूछा कि अचानक वे लोग इतने अमीर कैसे हो गये, तो उसने मेरा हाथ दबाकर उत्तर दिया कि इस तरह के सवाल किसी से नहीं पूछने चाहिए।

मेरा सिर चकरा रहा था। मैंने कुरसी की दोनों बाँहों को पकडक़र अपने को सँभाले हुए कहा, “मगर तुमने यह बात मुझे पहले क्यों नहीं बतायी?”

“मैं सोचता था कि तुम्हारा उसके साथ इतना उठना-बैठना है, तुम्हें सब पता होगा। और जब मैं ही अपने मन में अपने लिए तय नहीं कर पा रहा था तो मुझे तुमसे कुछ कहने का अधिकार ही क्या था?”

मेरा शरीर और दिमाग़ बिल्कुल खाली हो गये थे। मेरी छाती में एक गोला-सा अटक रहा था। मैं खोयी हुई आँखों से चुपचाप उसकी तरफ़ देखता रहा तो वह बोला, “कल जाते ही उस आदमी ने मेरे साथ जब वह बात छेड़ दी, तो न जाने क्यों मेरे लिए वहाँ बैठना और उससे बात करना भी मुश्किल हो गया। उसके चेहरे पर जो रहस्यमय मुस्कराहट थी, वह मुझसे बरदाश्त नहीं हुई। यह कहकर कि मैं अभी दो मिनट में आ रहा हूँ, मैं उसके पास से उठकर चला आया और फिर लौटकर उसके पास नहीं गया। मैंने नीलिमा से कहा था कि मेरा उस आदमी से झगड़ा हो गया है। मगर सच बात यह है कि मेरा उससे कोई झगड़ा नहीं हुआ। अब सोचता हूँ तो लगता है, सचमुच उससे झगड़ा करके ही आया होता तो ज़्यादा अच्छा था। तब मुझे अपने मन के किसी कोने में यह आशंका तो न रहती कि शायद अब भी मैं किसी वक़्त जाकर बिन्दुओंवाली रेखा पर हस्ताक्षर कर आऊँ...।”

“मधुसूदन भाई!” दरवाज़े के चौखट के पास से शुक्ला की थकी हुई आवाज़ फिर सुनायी दे गयी। मैं उठकर ड्यौढ़ी में आ गया, तो वह थोड़ा गुस्से के साथ बोली, “देखिए, सारी रात भापाजी की तबीयत ख़राब रही है और अब भी ये लगातार बातें किये जा रहे हैं। कल को क्या ये अस्पताल ही जाना चाहते हैं? आप इन्हें बातें करने से रोकिए और कहिए कि थोड़ा-सा सूप पीकर सो जाएँ। मैं आपका खाना भी भेज रही हूँ। रात काफ़ी हो गयी है और वैसे भी इतनी सरदी है,आप लोगों को अब चुपचाप सो जाना चाहिए।” उसका जूड़ा बिल्कुल खुल गया था जिससे उसके बाल कन्धों पर बिखर आये थे। उस रूप और अपने अधिकारपूर्ण स्वर के कारण वह सचमुच घर की मालकिन लग रही थी।

“मैं अभी जाकर उसे बातें करने से रोक देता हूँ।” मैंने कहा, “तुम खाना भेज दो।” मैं कमरे में आया, तो हरबंस तब अपनी बाँह आँखों पर रखकर सीधा लेट गया था। वह ज़रा भी नहीं हिला-डुला, तो मुझे लगा कि वह अचानक ही सो गया है। “तुम्हें नींद आ गयी?” मैंने पूछा।

“नहीं।” उसने बाँह हटाकर आँखें खोल लीं, “बाँके से कह दो कि सूप ले आये, और क्षण-भर बाद उसने इतने धीमे स्वर में, कि मैं भी उसे कठिनाई से ही सुन सकता था, कहा, “और सुनो मधुसूदन, तुम रात को यहीं रहना, चले नहीं जाना।”

“ठीक है नहीं जाऊँगा, मगर...।”

“मगर-अगर कुछ नहीं। मैं तुम्हें बता नहीं सकता कि मुझे कैसा लग रहा है।...यह लडक़ी कल से जिस तरह का व्यवहार कर रही है, उससे मुझे अपने से ही डर लगता है।”

“क्यों, डर कैसा लगता है?”

“मुझे डर लगता है कि अगर मैं...अगर मैं अकेला घर में रहा और यह इसी तरह सब कुछ करती रही, तो न जाने...।”
 
ओलों का तूफ़ान तो थम गया मगर तूफ़ानी हवा रात-भर चलती रही। हरबंस अपने बेडरूम में सोया था और मैं उसी पलँग पर था जिस पर मैंने एक रात पहले काटी थी। जाने उस पलँग में ही ऐसी कुछ बात थी या क्या कि मैं जिस करवट भी लेटता वही करवट मुझे अस्वाभाविक लगती। गली के लैम्प की रोशनी रोशनदान के शीशे से छनकर कमरे में आती हुई, बहुत बुझी-बुझी और उदास लग रही थी। लैम्प-पोस्ट के आगे का पेड़ हिलता था, तो वह रोशनी भी इधर से उधर सरकने लगती थी, जैसे वह अपने से भाग रही हो। सडक़ से गुज़रती हुई गाडिय़ों की रोशनियाँ कभी-कभी दीवार को उजला कर देती थीं। दीवार एकदम सफ़ेद हो जाती थी, अलमारियों में रखी हुई किताबों की जिल्दें चमक उठती थीं और फिर सब कुछ अँधेरे में गुम हो जाता था। मेरे मन में आनेवाले दिनों की एक तसवीर भी उसी तरह उभरकर अँधेरे में गुम हो जाती थी। डिफेंस कॉलोनी या जोरबाग़ का एक घर। आँगन में उगे हुए कैक्टस, पाम और मोरपंखी के पौधे। सरपत के सहारे उठे हुए स्वीटपीज़, दुधमुँहें बच्चों की तरह मुसकराते हुए। लॉन की घास पर चलते समय पैरों में उठती हुई एक कोमल चुनचुनाहट! गार्डन चेयर पर बैठकर आकाश की ओर ताकती हुई सुषमा पीछे से आकर कन्धे पर हाथ रख देती है। उसकी कोमल बाँहें धीरे-धीरे गले को कस लेती हैं और आँखों के पास आयी हुई आँखें स्वीट-पीज़ की तरह मुसकरा उठती हैं। फिर घर की दूब शिमला, कश्मीर और नैनी की मखमली दूब में बदल जाती है। पहाड़ की चोटी से दिखायी देते हुए बादल के टुकड़े सूर्यास्त के समय कई-कई रंगों में नहा लेते हैं। घाटी से खच्चरों की घंटियों की आवाज़ सुनायी देती है। सुषमा की कोमल उँगलियाँ मेरी उँगलियों में कसती जाती हैं। हवा में उड़ते हुए रेशमी बाल और उलझी हुई बाँहों के दूधिया कैक्टस! हवा के हर झोंके के साथ कैक्टसों में फूल उग आते हैं, कबूतरों के पंखों की तरह कोमल-कोमल फूल। शरीर सेमल के-से स्पर्श से ढकता जाता है और रोम-रोम में चुभते हुए काँटे बहुत मीठे लगते हैं। वातावरण की नमी गरम-गरम साँसों से गरमा जाती है। उसके बाद मरमरी प्यालों में गरम-गरम चाय। वातावरण की महक शरीर में और शरीर की महक वातावरण में भर जाती है। सुगन्ध का स्वर हृदय की धडक़नें तेज़ कर देता है। आधी-आधी रात तक नाइट लैम्प के सुरमई उजाले में बेमतलब की बातें होती हैं। आँखें खुलती हैं, तो बन्द हो रहना चाहती हैं। ‘ला बोहीम’ किसी अँधेरे कोने में आधी रात तक क्लासिक्स के विषय में बातचीत चलती है। ज़िन्दगी बहुत हल्के-हल्के क़दमों से आगे बढ़ती है। आपस से हल्की-हल्की बातचीत पार्टियों में हल्की-हल्की चुस्कियाँ, दोस्तों के हाथ हल्की-हल्की मुसकराहटें, सब कुछ हल्का और कोमल...।

हवा खिडक़ी को झटका दे जाती, दीवार उजली होकर स्याह पड़ जाती और मैं करवट बदल लेता। करवट के साथ ही ज़िन्दगी भी बदल जाती। दो छोटे-छोटे कमरों का घर। सुबह-सुबह बरतन मलने और कमरे बुहारने की आवाज़। ठकुराइन का झाइयों से लदा हुआ चेहरा। टूटे हुए मोढ़े पर बैठकर अख़बार पढ़ते हुए निम्मा चाय की प्याली लेकर पास आ खड़ी होती है। चाय पर पत्तियाँ तैर रही हैं। निम्मा की आँखें सहमी हुई हैं, जैसे उसे हवा से भी डर लग रहा हो कि वह अभी उसे डाँट देगी। उसकी पतली-पतली बाँहें देखने में भी चुभती-सी लगती हैं। बाँह को हाथ में पकड़ते ही वह एक घोंघे की तरह अपने में सिमट जाती है और बाँहों में कस लेने पर इस तरह विस्मय के साथ देखती है जैसे उसके साथ कोई बहुत ही रहस्यमय घटना घटित हो रही हो। वह नीचे को झुकती जाती है, झुकती जाती है, यहाँ तक कि उसका दुबला शरीर भी बाँहों के लिए बोझ बन जाता है। उसके हाथों से राख और प्याज़ की और कपड़ों से पसीने की गन्ध आती है। चेहरा ऊपर उठाने पर उसकी आँखें आँसुओं से भीगी नज़र आती हैं। गली में सब्ज़ीवाले ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हैं। ऊपर से इबादत अली की सितार का स्वर सुनायी देता है। दिन-भर के काम से थका हुआ सिर तकिये पर रखते ही नींद आने लगती है। पड़ोस के घर से किसी बच्चे के रोने और प्याज़ से दाल के छोंकने की आवाज़ सुनायी देती है...।

मैं करवट बदलकर सीधा हो जाता। अँधेरे का रंग सुरमई और उजला सुरमई होकर फिर गहराने लगता। आनन्द पर्वत की वही बरसाती। वही रोज़-रोज़ अकेले लौटना और दरवाज़े पर दस्तक देना। बबुआइन उसी तरह सन्देह-भरी आँखों से देखती है और अपनी लडक़ी को बाँह पकडक़र अन्दर भेज देती है। सीढिय़ाँ चढ़ते हुए कमरे में दाखिल होने को मन नहीं होता। कमरे में आकर किसी चीज़ को रखने-उठाने को मन नहीं होता। खिडक़ी के पास खड़े होकर दिल्ली का दूर-दूर तक का विस्तार दिखायी देता है। सराय रुहेला स्टेशन से एक-एक करके गाडिय़ाँ गुज़रती जाती हैं। अँधेरे में एक भटकती हुई रूह बार-बार कराह उठती है। मैं कमरे से छत पर आता हूँ और छत से कमरे में लौट जाता हूँ...।

काफ़ी देर करवटें बदलने पर भी नींद नहीं आयी, तो मैं उठकर बैठ गया। उठकर कमरे की बत्ती जला दी। दीवार पर फ़ेड-इन और फ़ेड-आउट होते हुए रंग सहसा लुप्त हो गये। पास ही तिपाई पर हरबंस की फ़ाइलें रखी थीं। मैं कुछ देर उनके अधूरे अधलिखे पन्नों को पलटता रहा। अध्याय एक—बुआजी के यहाँ पहली भेंट। दो चेहरे। उसके नाखून। एक सवाल।...अध्याय पाँच—बर्फ़ बहुत गिरी है। मगर मन में कोई ख़ुशी नहीं। भ्रूण-हत्या सिर पर मँडरा रही है। क्या अपराध की अनुभूति ही अपराध का सबसे बड़ा दंड नहीं है?...अध्याय ग्यारह—एकान्त सडक़ और खाली जेब। वह क्यों नहीं आयी?...अध्याय इक्कीस—आईना टूट गया है। क्या वह आईना ज़िन्दगी का आईना ही नहीं था? अगर गाड़ी की दुर्घटना हो गयी होती? अध्याय पच्चीस—असम्भव को सम्भव बनाने का प्रयत्न। हवा जैसे चलती है, चलने दो।—संख्याहीन अध्याय...इतने बरसों में इन काग़ज़ों को कीड़े क्यों नहीं खा गये? यह सब बकवास है, कोरी बकवास। मुझे चाहिए कि इन काग़ज़ों को आग में झोंक दूँ।...अनध्याय—आख़िर अन्त क्या होगा?

मैंने काग़ज़ रख दिये और कमरे से बाहर निकल आया। बाहर तिपाई पर पानी का जग ढककर रखा हुआ था। मैं अचानक तिपाई से टकरा गया, तो शीशे का जग ज़मीन पर गिर गया। मैं उस आवाज़ से स्तब्ध होकर पल-भर अपनी जगह पर ज्यों-का-त्यों खड़ा रहा। हरबंस ने अपने कमरे में करवट बदली और फिर उसकी लम्बी साँस सुनायी देने लगी। तभी पीछे के दरवाज़े पर हल्की-सी थपथपाहट हुई और शुक्ला की निंदियायी हुई आवाज़ आयी, “बाँके!”

मैंने धीरे-से जाकर दरवाज़ा खोल दिया। वह शॉल ओढ़े हुए ठंड में ठिठुरी हुई-सी खड़ी थी। “आप अभी जाग रहे हैं?” उसने मुझे देखकर पूछा, “अभी आवाज़ कैसी हुई थी?”

“मेरा पैर तिपाई से टकरा गया था जिससे जग टूट गया है।”

“भापाजी की तबीयत तो ठीक है न?”

“हाँ। मेरा ख़याल है उसे नींद आ गयी है।”

“शुक्र है।” वह बोली, “मैं तो डर गयी थी कि कहीं...।”

“तुम भी अभी तक जाग रही थीं?”

“नहीं, जाग नहीं रही थी, मगर पूरी तरह सोयी भी नहीं थी। सुरजीत देर से घर आया था, उसे खाना खाकर सोये अभी थोड़ी ही देर हुई है।”

मेरा ध्यान फिर उसके शरीर के फैलाव की ओर चला गया और मुझे लगा कि उसे इतनी ठंड में बाहर नहीं आना चाहिए था।

“तुम सो रहो। हरबंस के पास मैं तो हूँ ही।”

“मैं आपको एक बात बताना भूल गयी थी। अगर रात को उन्हें फिर मितली हो, तो उन्हें दवाई का एक डोज दे दीजिएगा। उनकी दवाई उधरवाले कमरे में मेज़ पर रखी है। मैंने सुबह मँगवायी थी, मगर दिन में तो उसकी ज़रूरत पड़ी नहीं।”

“अच्छा...।”

जाते-जाते वह फिर रुकी और बोली, “देखिए, एक बात और भी आपसे कहना चाहती थी। भापाजी का दिल्ली में दिल नहीं लगता, इसलिए आप इनसे कहें कि ये आगरावाली नौकरी कर लें। हो सकता है वहाँ जाकर इनका मन कुछ शान्त हो जाए। वह काम इनके मन के अनुकूल भी है...।”

“देखो, बात हुई तो उससे कहूँगा।”

“आपको आज मैंने बहुत तकलीफ़ दी हैं।” उसने कहा और धीरे-धीरे चली गयी। मैंने दरवाज़ा बन्द कर लिया। कमरे में आकर मैं बत्ती बुझाकर लेट गया। मगर हरबंस की फ़ाइल देर तक मेरे दिमाग़ में खुली रही...।

सुबह सोकर उठा, तो वर्षा से धुली हुई धूप रोशनदान से नीचे झाँक रही थी। आँगन से बत्तखों के कुडक़ुड़ाने और पंख फडफ़ड़ाने की आवाज़ आ रही थी। मैंने बिस्तर से उठकर खिडक़ी खोल ली। दो बत्तखें आँगन में चक्कर काट रही थीं। क्वाक् क्वाक् क्वाक्! उनकी काली धारियोंवाली गरदनें हिलतीं, पीली चोंचें नीचे को झुककर ऊपर उठ जातीं और पंख थोड़ा खुलकर बन्द हो जाते। क्वाक् क्वाक् क्वाक्!

मैंने कमरे का दरवाज़ा खोला, तो सहसा ठिठक गया। सामने रसोईघर में मिट्टी के तेल का स्टोव जल रहा था और उसके पास, उसके ऊपर झुकी हुई-सी नीलिमा खड़ी थी। पीठ की तरफ़ से वह उस समय बहुत दुबली लग रही थी। उसके बाल खूब कसकर बँधे हुए थे जिससे बालों के नीचे उसकी लम्बी गरदन ऊपर तक नज़र आ रही थी। मुझे देखकर वह एक बार ज़रा-सा मुसकरायी और फिर उसी तरह काम में लग गयी। मैं जाकर चुपचाप रसोईघर के दरवाज़े के पास खड़ा हो गया। उसने एक बार फिर घूमकर मेरी तरफ़ देखा और उसी तरह फीके ढंग से मुसकराकर कहा, “तुम्हें चाय दे दूँ?”

“तुम बना लो, तो साथ ही पीते हैं।” मैंने कहा।

“तुम कमरे में चलो, मैं लेकर आ रही हूँ।”

“हरबंस सो रहा है?” मैंने पूछा।

उसने धीरे-से सिर हिलाया और गरम पानी से प्यालियाँ धोने लगी। मैं कमरे में लौट आया। हरबंस की फ़ाइलें तिपाई पर खुली हुई रखी थीं। मैंने उन्हें बन्द किया और उठाकर मेज़ पर रख दिया। नीलिमा चाय लेकर आ गयी। चाय बनाते हुए भी उसने कोई बात नहीं की। चाय के दो-एक घूँट भर चुकने के बाद उसने पूछा, “तुम्हें रात को ठीक से नींद आ गयी थी?”

“शुरू में तो काफ़ी देर मैं जागता रहा था।” मैंने कहा, “मगर बाद में सो गया था।”

उसके बाद फिर कुछ देर हम दोनों खामोश रहे। फिर मैंने पूछा, “तुम किस वक़्त आयी हो?

“मैं अभी थोड़ी देर पहले ही आयी हूँ,” वह बोली। फिर कुछ देर चाय की प्याली में न जाने क्या देखते रहने के बाद उसने कहा, “सुबह सुरजीत मेरे पास आया था।”

“अच्छा!”

“रात को शुक्ला को काफ़ी बुख़ार हो गया है। अप्रैल-मई में उसके बेबी होनेवाला है, इसलिए सुरजीत बहुत घबराया हुआ था। मैं आना नहीं चाहती थी, मगर फिर मैंने सोचा कि...सोचा नहीं, मुझे लगा कि...शायद अब यही ठीक है।”

“अच्छा किया जो तुमने यह बात जल्दी सोच ली।” और कुछ देर चुप रहने के बाद मैंने कहा, “शुक्ला कल और परसों दोनों दिन बहुत हैरान हुई है और उसने काम भी बहुत किया है।”

“मुझे पता है।” वह बोली, “सुरजीत ने मुझे बताया था।”

“सुरजीत को मालूम था?”

“मालूम कैसे न होता? रात को जग टूटने पर जब वह तुमसे पूछने के लिए आयी थी तो...।”

“वह उस वक़्त जाग रहा था?”

“हाँ। वह बेचारा तो रात-भर नहीं सोया। यहाँ से जाकर शुक्ला को कुछ मितली-इतली भी हुई थी। वह सारी रात उसे सँभालता रहा है।”

“अच्छा!” मैं कुछ जल्दी-जल्दी चुस्कियाँ भरने लगा।

“मेरा तो ख़याल है कि वह हममें सबसे अच्छा आदमी है।”

मैं चुपचाप चाय पीता रहा। तभी अरुण साथवाले कमरे में से आँखें मलता हुआ आ गया। ‘ममी’, उसने नीलिमा के गले में बाँहें डालकर कहा, “मैं रात को किस घर में सोया था?”

“तू रात को नानी के घर में सोया था,” कहते हुए नीलिमा ने उसे उठाकर गोद में बिठा लिया और उसके सिर पर हाथ फेरने लगी।

“तो अब अपने घर में कैसे आ गया?”

“तेरी बत्तखें तुझे सोये-सोये अपने पंखों पर बिठाकर ले आयी थीं।”

“मेरी बत्तखें कहाँ हैं?” अरुण एकदम उसकी गोद से उतर गया।

“बाहर आँगन में घूम रही हैं।”

“आहा! आहा!” अरुण ने हाथ पर हाथ मारा और बाहर भाग गया।

“ये बत्तखें तुम खरीदकर लायी हो?” मैंने पूछा।

“नहीं।” वह बोली, “कल शाम को मैं अरुण को जन्तर-मन्तर में घुमाने के लिए ले गयी थी। वहाँ से लौटकर आ रही थी, तो ये सडक़ पर पड़ी थीं। शायद कोई क्रिसमस ईव के लिए ले जा रहा होगा और रास्ते में उससे गिर गयी होंगी। इनके पैर आपस में बँधे हुए थे और ये वहाँ पड़ी-पड़ी कुडक़ुड़ा रही थीं। मुझे लगा कि किसी बस या कार के नीचे आकर कुचली जाएँगी, इसीलिए मैंने उन्हें उठा लिया। कुछ देर इन्हें लिये वहाँ खड़ी रही कि शायद कोई इन्हें लेने के लिए आ जाए। मगर कोई नहीं आया, तो मैं इन्हें घर ले आयी। घर आकर रात तक अरुण इन्हीं से खेलता रहा है। इनसे खेलता-खेलता ही सो गया। अच्छा हुआ, नहीं तो सोने से पहले बॉबी के पास आने के लिए रोता।”

अरुण दोनों बत्तखों को बगलों में दबाये हुए बाहर से आ गया। बत्तखें उसकी बाँहों के दबाव से कुछ सहम गयी थीं और टुकुर-टुकुर सामने की तरफ़ देख रही थीं। अरुण ने उन्हें लाकर कमरे में छोड़ दिया, तो वे पंख फडफ़ड़ाती हुई पलँग के नीचे घुस गयीं।

“अच्छी पली हुई बत्तखें हैं।” मैंने कहा, “तुम इनसे नये साल की दावत करोगी?” मगर मेरे इतने कहते न कहते अरुण मेरे पास आकर मेरे घुटनों पर मुक्के मारने लगा।

“ममी, कोई मेरी बत्तखों को काटेगा, तो मैं उसे जान से मार दूँगा।” उसने कहा और मेरे पास से हटकर मुक्का ताने हुए नीलिमा के पास चला गया। नीलिमा ने उसे बाँहों में भरकर अपने साथ सटा लिया और बोली, “नहीं बेटे, तेरी बत्तखों को कोई नहीं काटेगा।”

“मैं आज से तुमको अपने घर में नहीं आने दूँगा।” अरुण मेरी तरफ़ आँखें निकालकर बोला। मैंने उसकी बाँह पकडक़र उसे अपनी तरफ़ खींच लिया और उसके गालों को चूम लिया।

बत्तखें पलँग के नीचे से निकल आयी थीं। अरुण ने मेरे हाथ से अपनी बाँह छुड़ा ली और उन्हें फिर बग़लों से लेकर पुचकारता हुआ बाहर चला गया।

रोशनदान से झाँकती हुई धूप दीवार से फ़र्श पर उतर आयी थी। मैंने घड़ी की तरफ़ देखा और उठ खड़ा हुआ। “मेरा ख़याल है मैं अब तैयार हो जाऊँ और चलूँ।” मैंने कहा।

कुछ ही देर में मैं चलने के लिए तैयार हो गया। हरबंस तब भी जागा नहीं था। “उसे जगा दूँ?” नीलिमा ने पूछा।

“नहीं, उसे अभी सोया रहने दो।” मैंने कहा, “उसे तुम्हारे आने का पता है?”

“नहीं, मैंने आकर उसे जगाना ठीक नहीं समझा। कहो, तो अब जगा दूँ।”

“नहीं, रहने दो।”

उसी समय बाँके सब्ज़ी का थैला लिये बाहर से आ गया। “तुम सब्जी ले आये?” नीलिमा उसे देखते ही बोली, “मगर तुमने जाते हुए पैसे तो मुझसे लिये ही नहीं थे। तुम्हारे पास पैसे थे?”

“कल छोटी बीबीजी ने पाँच रुपये का नोट दिया था।” बाँके थैला रखकर जेब से पैसे निकालता हुआ बोला, “उसमें से कल सब्ज़ी लाया था और साहब की दवाई लाया था। रात को इन साहब के लिए सिगरेट की एक डिब्बी भी लाया था। अब उसमें से पाँच-छ: आने मेरे पास बचे हैं।”

“ये तुम अपने पास रखो।” कहती हुई नीलिमा उधर के कमरे में चली गयी और वहाँ से अपना पर्स उठा लायी। उसमें से पाँच रुपये का नोट निकालकर बाँके को देते हुए उसने कहा, “उधर जाओ, तो ये उनके रुपये उन्हें लौटा देना।” फिर मेरी तरफ़ देखकर वह बोली, “तुम नाश्ता करके नहीं जाओगे?”

“इनके नाश्ते के लिए तो सुरजीत साहब ने उधर से कह रखा है,” बाँके बोला।

“नहीं, मैं नाश्ता करके नहीं जाऊँगा।” मैंने कहा, “वैसे तो आज मेरा हॉफ़ डे है, मगर सम्पादक ने नौ बजे मुझे दफ़्तर में बुला रखा है। उसे शायद मुझसे कोई ज़रूरी बात करनी है। तुम सुरजीत से भी मेरी तरफ़ से कह देना।

उससे पहले दिन मेरी सम्पादक से भेंट नहीं हो सकी थी। जब मैं हनुमान रोड पर नीलिमा से मिलकर वापस आया था, तो वह अपने किसी काम में व्यस्त था और उसने कहा था कि मैं कुछ देर के बाद उसे फ़ोन कर लूँ। जब मैंने फ़ोन किया, तो वह बाहर गया हुआ था। उसके बाद शाम को मुझे दूसरी चिट मिली थी कि सुबह नौ बजे आकर मैं उससे मिल लूँ। मैं जब उसके कमरे में दाख़िल हुआ, तो मेरे मन में कई-कई आशंकाएँ उठ रही थीं। वह उस समय स्टेनो को कुछ नोट्स दे रहा था। मुझे बैठने का इशारा करके वह नोट्स देता रहा। मैं धडक़ते हुए दिल से आनेवाले क्षण की प्रतीक्षा करता हुआ इधर-उधर देखता रहा। जब स्टेनो चला गया, तो उसने कुहनियाँ मेज़ पर फैलाये हुए मुझसे कहा, “तो...?”

“आपने आज आने के लिए कहा था।” मैंने कहा।

“हाँ।” वह बोला। फिर कोई बात याद आ जाने से वह अपनी टेबल डायरी के पन्ने उलटने लगा। उसमें एक जगह कोई बात नोट करके उसने कहा, “मैं तुमसे सिर्फ़ यही कहना चाहता था कि इस बीच तुमने मुझे सिर्फ़ एक ही फ़ीचर लिखकर दिया है। उसके बाद और कोई फ़ीचर तुम प्लान नहीं कर रहे? लोक सभा का बजट सेशन आरम्भ होने से पहले मैं चाहता था कि...।”

“आपने उस फ़ीचर के बारे में अपनी राय मुझे नहीं बतायी थी।” मैंने कहा।

“हाँऽऽ! वह फ़ीचर ठीक ही था।” वह आवाज़ को कुछ लटकाकर बोला।

“मगर तुमने मेरी बात को बहुत शाब्दिक अर्थ में ले लिया था। मेरा मतलब दरअसल और चीज़ से था और मैं तुमसे कुछ दूसरी ही तरह के फ़ीचर की उम्मीद कर रहा था। मगर वह फ़ीचर तुमने लिखा अच्छा था हालाँकि उसमें भी मुझे लगा कि तुम अभी अपनी कविता से बिल्कुल छुटकारा नहीं पा सके...।”

मुझे अपने मन में कुछ तसल्ली हुई कि जिस तरह की बात से मैं डर रहा था, वैसी कोई बात नहीं है। “मैं आपकी बात को समझता हूँ।” मैंने कहा, “वह फ़ीचर मैंने सिर्फ़ शुरू करने के लिए लिखा था। इधर मैं एक और फ़ीचर प्लान कर रहा हूँ...।”

“आई सी...!” वह थोड़ा मुसकराया, “उसकी कुछ रूपरेखा तुम मुझे पहले से बता दो, तो मैं उसे शेड्यूल में रख लूँ।”
 
मैं बहुत जल्दी-जल्दी सोचने लगा। कल रात से मेरे मन में एक रूपरेखा बन रही थी। “मैं सोच रहा था कि यहाँ पर विदेशी पैसे से जो कुछ ऐसी-वैसी संस्थाएँ काम कर रही हैं, उनके बारे में एक चीज़ लिखूँ...।”

“कैसी संस्थाओं के बारे में?”

“यहाँ कई एक ऐसी संस्थाएँ हैं न जो साहित्य, कला और संस्कृति की आड़ लेकर किन्हीं छिपे हुए राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति कर रही हैं...।”

“जैसे?”

मैंने उदाहरण के तौर पर ‘भारतीय संस्कृति केन्द्र’ का नाम ले लिया।

सम्पादक का चेहरा सहसा गम्भीर हो गया और उसने अपने दोनों हाथों को आपस में उलझा लिया। “यू मीन...”, उसने कहा, “मगर इस बार तुम मेरे मतलब से बहुत आगे चले गये हो। इस तरह की चीज़ राजनीतिक हो जाएगी और मैंने तुम्हें बताया नहीं, मगर तुम्हारी राजनीतिक टिप्पणियों को लेकर पहले ही ऊपर काफ़ी चर्चा हो चुकी है। मैं तुम्हारा हित चाहता हूँ, इसलिए तुम्हें यह राय दूँगा कि तुम्हें ऐसी चीज़ों में नहीं पडऩा चाहिए जो तुम्हारे अपने हित को नुक़सान पहुँचा सकती हैं। ऊपर से मुझे यह भी कहा जा रहा है कि तुम्हें सांस्कृतिक रिपोर्टिंग से भी हटाकर ‘न्यूज़’ सेक्शन में कर दिया जाए। इसलिए ऐसी चीज़ लिखने का मैं तुम्हें परामर्श नहीं दूँगा। और अख़बार की पॉलिसी को नज़र में रखते हुए मैं कह सकता हूँ कि ऐसी चीज़ हम छाप भी नहीं सकते। इसलिए करना चाहो, तो तुम कोई और ही चीज़ प्लान करो।”

पल-भर हम दोनों चुप रहकर तौलती हुई-सी नज़रों से एक-दूसरे की तरफ़ देखते रहे।

“मैं सोचकर आपका बताऊँगा।” मैंने कहा।

“हाँ-हाँ, तुम अच्छी तरह सोचकर बताना।” वह बोला, “एक अन्दर की बात तुम्हें और बता रहा हूँ जिसे तुम्हें आउट नहीं करना चाहिए। मुझसे यह भी कहा गया कि तुम्हें अगला इन्क्रीमेंट देने से पहले तुम्हारे काम को कुछ दिन और अच्छी तरह देख लिया जाए। तुम्हें इस बात को ध्यान में रखकर ही चलना चाहिए।”

उसके कमरे से अपने केबिन में आकर कुछ देर मैं चुपचाप सामने दीवार पर लगे हुए कैलेंडर की तरफ़ देखता रहा। मेरी मेज़ पर उपहार में पायी हुई नये साल की अजन्ता के चित्रोंवाली एक डायरी रखी थी। कुछ देर मैं उसके पन्ने पलटता हुआ चित्रों को देखता रहा। उन चित्रों को देखते-देखते अचानक मुझे ध्यान आया कि मैंने उस दिन साढ़े दस बजे सुषमा को फ़ोन करने के लिए कह रखा है। मैंने अनजाने ही फ़ोन का चोंगा उठा लिया हालाँकि मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं उससे क्या बात करूँगा। मैं धीरे-धीरे उसका नम्बर मिलाने लगा—चार, पाँच, पाँच, चार...! मगर आगे का हिन्दसा मिलाने से पहले ही मैंने चोंगा रख दिया। डायरी मैंने एक तरफ़ सरका दी और कुरसी की पीठ से टेक लगाकर अपने हाथों को आपस में मलता हुआ फिर कुछ देर कैलेंडर की तरफ़ देखता रहा। काग़ज़ लेकर कुछ लिखने की कोशिश की तो मुझसे कुछ लिखा नहीं गया। फिर मैंने चोंगा उठा लिया। इस बार पहले के तीन हिन्दसे मिलाने के बाद ही मैं रुक गया और मैंने चोंगा रख दिया। चोंगा रखते ही मैं सहसा अपनी कुरसी से उठ खड़ा हुआ। मुझे लग रहा था कि मुझे उस समय कहीं जाना है। मैंने चलते-चलते डायरी मेज़ से उठा ली। शायद मन में कहीं इस तरह का ख़याल भी था कि वह डायरी मुझे किसी को उपहार में देनी है। नीचे आकर मैं फुटपाथ पर खड़ा हो गया और सोचने लगा कि मैं कहाँ जाने के लिए ऊपर से आया हूँ। क्या मुझे कॉन्सीक्यूशन हाउस जाना था? मगर वहाँ जाने से पहले क्या सुषमा को फ़ोन कर देना ज़रूरी नहीं था?

मैंने हाथ देकर एक आती हुई खाली टैक्सी को रोक लिया। सरदार ड्राइवर ने मीटर गिराकर मेरी तरफ़ देखा, तो भी मैं पल-भर सोचता रहा। फिर चुपचाप दरवाज़ा खोलकर अन्दर बैठ गया। सरदार ने अपनी सीट पर बैठते हुए मेरी तरफ़ देखकर पूछा, “कहाँ चलना है साहब?”

मेरे दोनों हाथों की उँगलियाँ आपस में उलझी हुई थीं। मैंने दोनों हाथों को एक-दूसरे से कसे हुए धीरे-से कहा, “क़स्साबपुरा।” और हाथ खोल लिये।

ड्राइवर शायद नया था। वह यह सुनकर भी मेरी तरफ़ देखता रहा और बोला, “कौन-सा पुर?”

“बस्ती हरफूलसिंह!” मैंने कहा और थोड़ा ढीला होकर सीट पर नीचे को सरक गया। “बस्ती हरफूल,” सरदार सोचता हुआ-सा बोला, “यह कहाँ पर है साहब?”

“बारहटूटी, सदर बाज़ार!” मैंने झुँझलाकर कहा। सरदार ने टैक्सी स्टार्ट कर दी। टैक्सी एक झटके के साथ चली, तो मैंने अपनी गोद में रखी हुई डायरी को एक बार देख लिया कि वह गिर तो नहीं गयी।

टैक्सी चेम्सफ़ोर्ड रोड का पुल पार करके कुतुब रोड पर आ गयी। मैंने एक लम्बी साँस ली और मन में कुछ हल्का महसूस करता हुआ सीट पर थोड़ा और नीचे को सरक गया।
 
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