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लेखक :- लीलाधर
अगर खुदा न करे सच ये ख्वाब हो जाए
मेरी सहर हो तेरा आफताब हो जाए!
45 साल की उम्र कोई बड़ी तो नहीं होती? और मुझसे आठ साल छोटी मेरी बीवी से अभी भी औरतें पूछती हैं- Are you newly married?
और फिर जब वे हमारे बड़े-बड़े बच्चों को देखती हैं तो उनकी दातों तले उंगलियाँ दब जाती हैं, पूछती हैं, कब शादी हुई थी? बचपन में ही?
मैं जहाँ हम दोनों के युवा जैसे दिखते चुस्त शरीर को लेकर प्रशंसा और गर्व के भाव से भरा रहता हूँ, वहीं पत्नी कहती है- अब पहले वाला बचपना छोड़ो। देखो, बच्चे कितने बड़े हो गए हैं! औरतों को बूढ़ी होने का शौक होता है क्या?
वैसे यह ख्वाब मूलत: मेरा ही है, पर पत्नी ने उसमें साझी होना मंजूर कर लिया है। कई सालों के समझाने, बहस करने, रूठने-मनाने के बाद आखिरकार जब उसने हामी भरी तो लगा अब क्या देर है, तुरंत कर डालेंगे।
पर मालूम नहीं था एक मनोनुकूल दम्पति का मिलना और उसके साथ अनुकूल परिस्थितयों का भी जुट पाना इतना मुश्किल होगा। बार-बार लगता है जिंदगी में क्या किसी दूसरी औरत का स्वाद क्या नहीं मिलेगा?
और उससे भी अधिक उत्तेजक लगती है अपनी खूबसूरत पत्नी को किसी दूसरे मर्द की बाँहों में देखने की कल्पना!
वह उसके गोरे सुंदर शरीर को अनावृत करे, उसके अंगों को, जिनका सौंदर्य अबतक केवल मैंने देखा है, उसकी नजरों के सामने आएँ; वह उनका संचालन करे, उसके सु्ंदर गोल बड़े स्तनों, उन पर सजे साँवले चूचुकों का चुम्बन, चूषण, मर्दन करे… उसकी योनि को बिना संकोच के चूमे, चाटे… उसमें अपने कठोर लिंग के घर्षण से चिन्गारियाँ उठा दे; मेरी उत्तेजित, ‘आपे-में-नहीं’ पत्नी आँखें उलटाती, जोर-जोर साँसें छोड़ती, उसके बंधन में छटपटाती, सीऽऽ सीऽऽ सीऽऽ आऽऽह आऽऽह ओऽऽह करती कमरे को गुंजाती झड़ती जाए…
आह! ‘अगर खुदा न करे सच ये ख्वाब हो जाए’…
“हुजूर आरिजो रुखसार क्या तमाम बदन
मेरी सुनो तो मुजस्सम गुलाब हो जाए…”
दिल तो करता है किसी दोस्त को ही थ्रीसम के लिए बुला लूँ… पर वह इजाजत ही नहीं देगी, कहेगी- मैं तो तुम्हारे लिए तैयार हुई हूँ। मुझे अपने लिए थोड़े ही चाहिए?” हमेशा वही बात!
काश…
आस छोड़ी नहीं है, लगा हूँ। लेकिन जब तक कोशिशें रंग नहीं लातीं एक फंतासी ही मुझे सहारा देती है…
फंतासी… आधी हकीकत, आधा फसाना …
तब मेरी पत्नी ने नई ही हामी भरी थी, उसका गुस्सा ताजा था। ठीक से हामी भी नहीं भरी थी, ‘कभी हाँ कभी ना’ की स्थिति थी। कभी व्यंग्य करती कि मैं कैसा आदमी हूँ जो अपनी पत्नी को दूसरे मर्द के साथ सुलाना चाह रहा हूँ। ‘तुम्हारे जैसा मर्द हजार लाख में नहीं, करोड़ में भी कोई एक ही होगा।’ और कभी पूछती- क्या हुआ, उस दम्पति से बात कर रहे थे?
उस खास दम्पति से हमारी बातचीत का सिलसिला बन चला था, उसके बारे में वह दो-तीन बार पूछ चुकी थी।
अन्य कई दम्पतियों से बातें करने के बाद वही हमें सबसे अधिक जँच रहा था। रायपुर, छत्तीसगढ़ का निवासी, पति बिजनेसमैन, पत्नी गृहिणी।
फोन पर उनसे बात होती। दोनों काफी दोस्ताना और समझदार तरीके से पेश आते। मैं चिंतित रहता कि पता नहीं मेरी पत्नी सहयोग करेगी कि नहीं।प्रकाश (पति) मुझे समझाता कि औरतें तो इनकार करती ही हैं, आप उसकी चिंता मत करो। अंजलि जी (मेरी पत्नी) ने इतनी दूर आपको आने दिया है, तो समझो मंजिल मिलेगी ही मिलेगी। मैंने कई ‘इनकार वाली’ औरतों से किया है। वे बाद में बढ़-चढ़कर भाग लेती हैं।
एक-दो बार मेरे ठेलने पर मेरी पत्नी ने भी उससे बात की थी, हालाँकि बहुत रस्मी। वह प्रत्यक्षत: नापसंदगी जाहिर करती कि यह तो कइयों के साथ किए हुए है, चालू आदमी है।
पर मुझे लगता वह अंदर ही अंदर उसमें रुचि लेती है। यह भी लगता है कि ‘उस मौके’ पर मेरी पत्नी के संभावित गुस्से और व्यंग्यबाणों को ठीक से ‘हैंडल’ करने और अंतत: उसे बिस्तर पर लाकर ‘चोद’ लेने में सफल हो जाने के लिए मुझे ऐसा ही अनुभवी और धैर्यवान आदमी चाहिए।
उस आदमी की पत्नी भी उत्साही थी, मुझे कहती- अंजलि जी (मेरी पत्नी) मान जाएंगी, चिंता नहीं कीजिए। एक बार हम मिलें तो सही। मजाक भी करती, प्रकाश के साथ उन्हें होने तो दीजिए, फिर देखिएगा वे क्या करती हैं। गंभीर होकर मुझे समझाती– कौन औरत होती जो प्रस्ताव पर सीधे हाँ कर दे? हमने भी इस बात पर प्रकाश से लड़ाइयाँ की हैं।
उसकी ना-ना के बावजूद प्रकाश उसे प्यार से धीरे-धीरे आगे बढ़ाता गया था और अंततः दूसरे कपल से सेक्स करवा ही दिया था।
खैर, दुविधा से जूझते मैंने अंतत: मिलने का प्रोग्राम बना ही डाला। प्रकाश काफी उत्सुक था और रायपुर से हमारी ही खातिर उतनी दूर से आने को तैयार था (क्यों न होता, यहाँ उसके लिए नया ‘माल’ था)।
लेकिन सौभाग्य से उसे अपने व्यवसाय के सिलसिले में कलकत्ता आने का मौका मिल गया। मैंने उससे वादा ले लिया