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अगर खुदा ना करे

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लेखक :- लीलाधर

अगर खुदा न करे सच ये ख्‍वाब हो जाए

मेरी सहर हो तेरा आफताब हो जाए!

45 साल की उम्र कोई बड़ी तो नहीं होती? और मुझसे आठ साल छोटी मेरी बीवी से अभी भी औरतें पूछती हैं- Are you newly married?

और फिर जब वे हमारे बड़े-बड़े बच्‍चों को देखती हैं तो उनकी दातों तले उंगलियाँ दब जाती हैं, पूछती हैं, कब शादी हुई थी? बचपन में ही?

मैं जहाँ हम दोनों के युवा जैसे दिखते चुस्‍त शरीर को लेकर प्रशंसा और गर्व के भाव से भरा रहता हूँ, वहीं पत्‍नी कहती है- अब पहले वाला बचपना छोड़ो। देखो, बच्‍चे कितने बड़े हो गए हैं! औरतों को बूढ़ी होने का शौक होता है क्‍या?

वैसे यह ख्‍वाब मूलत: मेरा ही है, पर पत्‍नी ने उसमें साझी होना मंजूर कर लिया है। कई सालों के समझाने, बहस करने, रूठने-मनाने के बाद आखिरकार जब उसने हामी भरी तो लगा अब क्‍या देर है, तुरंत कर डालेंगे।

पर मालूम नहीं था एक मनोनुकूल दम्पति का मिलना और उसके साथ अनुकूल परिस्‍थितयों का भी जुट पाना इतना मुश्किल होगा। बार-बार लगता है जिंदगी में क्‍या किसी दूसरी औरत का स्‍वाद क्‍या नहीं मिलेगा?

और उससे भी अधिक उत्‍तेजक लगती है अपनी खूबसूरत पत्‍नी को किसी दूसरे मर्द की बाँहों में देखने की कल्‍पना!

वह उसके गोरे सुंदर शरीर को अनावृत करे, उसके अंगों को, जिनका सौंदर्य अबतक केवल मैंने देखा है, उसकी नजरों के सामने आएँ; वह उनका संचालन करे, उसके सु्ंदर गोल बड़े स्‍तनों, उन पर सजे साँवले चूचुकों का चुम्बन, चूषण, मर्दन करे… उसकी योनि को बिना संकोच के चूमे, चाटे… उसमें अपने कठोर लिंग के घर्षण से चिन्गारियाँ उठा दे; मेरी उत्‍तेजित, ‘आपे-में-नहीं’ पत्‍नी आँखें उलटाती, जोर-जोर साँसें छोड़ती, उसके बंधन में छटपटाती, सीऽऽ सीऽऽ सीऽऽ आऽऽह आऽऽह ओऽऽह करती कमरे को गुंजाती झड़ती जाए…

आह! ‘अगर खुदा न करे सच ये ख्‍वाब हो जाए’…

“हुजूर आरिजो रुखसार क्या तमाम बदन

मेरी सुनो तो मुजस्सम गुलाब हो जाए…”

दिल तो करता है किसी दोस्त को ही थ्रीसम के लिए बुला लूँ… पर वह इजाजत ही नहीं देगी, कहेगी- मैं तो तुम्‍हारे लिए तैयार हुई हूँ। मुझे अपने लिए थोड़े ही चाहिए?” हमेशा वही बात!

काश…

आस छोड़ी नहीं है, लगा हूँ। लेकिन जब तक कोशिशें रंग नहीं लातीं एक फंतासी ही मुझे सहारा देती है…

फंतासी… आधी हकीकत, आधा फसाना …

तब मेरी पत्‍नी ने नई ही हामी भरी थी, उसका गुस्‍सा ताजा था। ठीक से हामी भी नहीं भरी थी, ‘कभी हाँ कभी ना’ की स्‍थिति थी। कभी व्‍यंग्‍य करती कि मैं कैसा आदमी हूँ जो अपनी पत्‍नी को दूसरे मर्द के साथ सुलाना चाह रहा हूँ। ‘तुम्‍हारे जैसा मर्द हजार लाख में नहीं, करोड़ में भी कोई एक ही होगा।’ और कभी पूछती- क्‍या हुआ, उस दम्‍पति से बात कर रहे थे?

उस खास दम्‍पति से हमारी बातचीत का सिलसिला बन चला था, उसके बारे में वह दो-तीन बार पूछ चुकी थी।

अन्‍य कई दम्‍पतियों से बातें करने के बाद वही हमें सबसे अधिक जँच रहा था। रायपुर, छत्तीसगढ़ का निवासी, पति बिजनेसमैन, पत्‍नी गृहिणी।

फोन पर उनसे बात होती। दोनों काफी दोस्‍ताना और समझदार तरीके से पेश आते। मैं चिंतित रहता कि पता नहीं मेरी पत्‍नी सहयोग करेगी कि नहीं।प्रकाश (पति) मुझे समझाता कि औरतें तो इनकार करती ही हैं, आप उसकी चिंता मत करो। अंजलि जी (मेरी पत्‍नी) ने इतनी दूर आपको आने दिया है, तो समझो मंजिल मिलेगी ही मिलेगी। मैंने कई ‘इनकार वाली’ औरतों से किया है। वे बाद में बढ़-चढ़कर भाग लेती हैं।

एक-दो बार मेरे ठेलने पर मेरी पत्‍नी ने भी उससे बात की थी, हालाँकि बहुत रस्‍मी। वह प्रत्‍यक्षत: नापसंदगी जाहिर करती कि यह तो कइयों के साथ किए हुए है, चालू आदमी है।

पर मुझे लगता वह अंदर ही अंदर उसमें रुचि लेती है। यह भी लगता है कि ‘उस मौके’ पर मेरी पत्‍नी के संभावित गुस्‍से और व्‍यंग्‍यबाणों को ठीक से ‘हैंडल’ करने और अंतत: उसे बिस्‍तर पर लाकर ‘चोद’ लेने में सफल हो जाने के लिए मुझे ऐसा ही अनुभवी और धैर्यवान आदमी चाहिए।

उस आदमी की पत्‍नी भी उत्‍साही थी, मुझे कहती- अंजलि जी (मेरी पत्‍नी) मान जाएंगी, चिंता नहीं कीजिए। एक बार हम मिलें तो सही। मजाक भी करती, प्रकाश के साथ उन्‍हें होने तो दीजिए, फिर देखिएगा वे क्‍या करती हैं। गंभीर होकर मुझे समझाती– कौन औरत होती जो प्रस्ताव पर सीधे हाँ कर दे? हमने भी इस बात पर प्रकाश से लड़ाइयाँ की हैं।

उसकी ना-ना के बावजूद प्रकाश उसे प्यार से धीरे-धीरे आगे बढ़ाता गया था और अंततः दूसरे कपल से सेक्स करवा ही दिया था।

खैर, दुविधा से जूझते मैंने अंतत: मिलने का प्रोग्राम बना ही डाला। प्रकाश काफी उत्‍सुक था और रायपुर से हमारी ही खातिर उतनी दूर से आने को तैयार था (क्‍यों न होता, यहाँ उसके लिए नया ‘माल’ था)।

लेकिन सौभाग्‍य से उसे अपने व्‍यवसाय के सिलसिले में कलकत्‍ता आने का मौका मिल गया। मैंने उससे वादा ले लिया
 
लेकिन सौभाग्‍य से उसे अपने व्‍यवसाय के सिलसिले में कलकत्‍ता आने का मौका मिल गया। मैंने उससे वादा ले लिया था कि वह अंजलि के साथ कोई जबरदस्‍ती नहीं करेगा। मैंने उसे बहुत हतोत्साहित किया था कि निराश होने के लिए तैयार रहे, पर वह रोमांचित था, कहता था, एक अनिच्‍छुक औरत को ‘तोड़ने’ में जो मजा है, वह पहले से ही राजी औरत में नहीं। आप देखना अंजलि जी क्‍या गुल खिलाती हैं।

निश्‍चित तारीख को वे कलकत्‍ता आ पहुँचे। मैं अंजलि को देख रहा था, उसके चेहरे के भाव क्‍या हैं, अब तो उसे मिलना ही पड़ेगा। पर उसमें एक दुर्लभ किस्‍म का आत्‍मविश्‍वास दिखता था, यही चीज मुझे डरा रही थी। शायद प्रकाश का पाला इस बार ‘असली’ औरत से पड़ेगा।

हमने तय किया था पहले एक पार्क में मिलेंगे, वहाँ अगर ठीक लगा तो आगे बढ़ेंगे।

तय तिथि और समय पर वे आ पहुँचे।

खूबसूरत एलियट पार्क, कलकत्‍ता के प्रसिद्ध धरमतल्‍ला से एक-दो किलोमीटर आगे, मेट्रो के मैदान स्‍टेशन के सामने। अभी नया ही बना था, रंग-बिरंगे फूलों वाले पार्क में सतरंगी पट्टियों वाली साड़ी में थोड़ी भारी बदन की स्‍त्री के साथ खड़ा था वह।

औरत सामान्‍य थी पर अपनी वेशभूषा के कारण अच्‍छी लग रही थी। मर्द उसकी अपेक्षा आकर्षक और मजबूत बदन का था। चेहरे पर ऊर्जा और ताजगी थी हालांकि उम्र में वे हमसे लगभग पाँच सात साल बड़े थे।

इशारों से और मोबाइल के जरिए हम एक दूसरे के सामने हुए, मर्दों ने हाथ मिलाया, औरतें सकुचाती एक-दूसरे को कुछ पल देखीं, फिर हल्‍की सी ‘हाय’, दोनों मर्द कनखियों से एक दूसरे की औरतों को देख और तौल रहे थे।

प्रकाश अपने स्‍वभाव के अनुरूप दोस्‍ताना तरीके से मिला।

हमने चाय पी, कुछ देर इधर-उधर की बातें कीं। मैंने उनके साथ जाना तय कर लिया, मेरी पत्‍नी हिचकी, मुझे दबी आवाज में लौटने को कहा।

पर अब पीछे हटना कहाँ था? लौटने का मतलब होता कि वे हमें पसंद नहीं आए! उन्हें कितना बुरा लगता!!

प्रकाश और सुषमा होंठों पर मुस्‍कान लिए, उत्‍सुकता को मन में दबाए, ऊपर से सामान्य बने हमें देख रहे थे।

मैंने पत्‍नी से चलने की जिद की।

हम पहले एक रेस्टोरेंट में गए। मैं प्रकाश के साथ और मेरी पत्‍नी सुषमा के साथ बैठी। मैंने प्रकाश को दुहराया कि सबसे बड़ी बाधा मेरी पत्‍नी का संकोच और हिचक ही है और वह हजार कोशिशों के बावजूद उसका इनकार या कम से कम असहयोग झेलने के लिए तो तैयार ही रहे।

लेकिन वह आत्‍मविश्‍वस्‍त था, जैसे शिकारी हिरन के बारे में निश्‍चिंत हो, कि बचकर जाएगा कहाँ। उसने कहा कि वह कई औरतों के ‘इनकार’ पर जीत हासिल कर चुका है। पत्‍नियाँ ही नहीं, उसने कई अकेली औरतों को भी फतह किया है।

मुझे लग रहा था आखिर क्‍या करेगा यह। कहीं यह ‘रफ’ बर्ताव तो नहीं करेगा, मेरी पढ़ी-लिखी, सुसंस्‍कृत पत्‍नी पर इसका जादू चलेगा?

उसकी पत्‍नी मेरी पत्‍नी से बातें करते हुए उसे बीच बीच में ‘चीयर अप’ (उत्‍साहित) कर रही थी, कह रही थी चिंता न करो, सबकुछ ठीक रहेगा। कुछ बुरा नही लगेगा।

अंतत: हम उनके होटल पहुँचे।

प्रकाश ने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया और हम सब बिस्‍तर पर बैठ गए।

थोड़ा अटपटा लग रहा था कि क्‍या बात करें! एकदम से क्‍या शुरू ही हो जाएंगे?

मेरी पत्‍नी के चेहरे पर कई भाव आ-जा रहे थे, वह लज्‍जा से गड़ी जा रही थी। एक कुलीन खानदान की बहू के लिए यह कितना गैरपारंपरिक और भारी था मैं समझ रहा था।

उसने कहा- तुम तीनों जो चाहो करो, मैं नहीं शामिल हूँगी।

प्रकाश ने उसे बहाने से छूने की कोशिश की तो उसका चेहरा सख्‍त हो गया, वह पीछे हट गया।

मुझे लग रहा था जैसे अंजलि के अंदर गुस्‍सा सिर उठा रहा है। मैं उत्सुक था कि हमारे बीच अपरिचय की दीवार जल्‍दी टूटे। कुछ ऐसा करें कि उसमें सभी शामिल हों और कम से कम एक दूसरे की मौजूदगी के अभ्‍यस्‍त तो हो जाएँ।

प्रकाश ने इस समस्‍या के लिए सोच रखा था। उसने कहा चलो ताश का खेल खेलते हैं। लेकिन अंजलि को ताश नहीं आती थी। हम ड्रिंक भी नहीं करते थे, नहीं तो शराब खुद ही एक सोशल अनौपचारिक वातावरण बना देता है।

‘चलो, लूडो तो खेलते हो?’ प्रकाश ने ऑफर किया।

अंजलि अब भला क्या आपत्ति कर सकती थी, मैं मुस्कुराया, वह तैयारी से आया था।

‘हाँ, हाँ…’ उसकी पत्नी ने तुरंत अनुसरण किया।

लूडो मुझे अलग से भी इस काम के लिए सही खेल लगता है। ताश में दिमाग लगाना पड़ता है, अगर शराब का साथ न हो तो उसमें उत्‍त्‍ेजना को कायम रख पाना मुश्‍किल जान पड़ता है।

लूडो में चतुराई की गुंजाइश भी कम है। भाग्‍य से जो अंक आए वही आपको चलाता है।

हम सभी ‘साँप और सीढ़ी’ खेलने बैठ गए।

प्रकाश ने प्रस्‍ताव किया- जिसको भी साँप काटेगा, वह अपने बदन में पहनी कोई एक चीज उतार देगा…

अंजलि के चेहरे का भाव बदला पर वह कुछ नहीं बोली।

‘और जो सीढ़ी चढ़ने का lucky होगा वह दूसरे को चूम या कुछ और कर सकेगा।
 
यह सिर्फ मनोरंजन के लिए है।’ सुषमा ने आगे कहा।

प्रस्‍ताव चूँकि औरत की तरफ से था इसलिए अंजलि ना नहीं कर सकी।

खेल शुरू हो गया, अंजलि ने भी अपनी बारी में पाँसा फेंका और चाल चली।

मैं उत्‍सुक था कौन पहले साँप या सीढ़ी की लपेट में आता है।

पहला लपेट साँप ने लिया ‘सुषमा’ वह मुस्‍कुराई, उसने पांवों से मोजे उतार दिए! नंगे गोरे, चिकने पैरों को देखकर मेरे पैंट के अंदर सुरसुराहट हुई।

अंजलि को साँप ने डँसा। प्रकाश की उत्‍सुकता को निरस्‍त करते हुए उसने अपनी उंगली से अंगूठी निकाल दी। मुझे तसल्ली हुई कि अंजलि खेल में शामिल हो रही है।

प्रकाश मुस्‍कुरा रहा था।

खेल आगे बढ़ा। इस बार मुझको सीढ़ी मिली, अंजलि का चेहरा खिंच गया ‘रिलैक्‍स, यह तो बस खेल है!’ कहता हुआ मैं उठ खड़ा हुआ। घूमकर सुषमा के पास गया और उसका चेहरा उठाया और मुँह पर चूम लिया।

सुषमा ने मेरे चुम्बन का मजा लेते हुए मेरा सिर पकड़कर अपने मुँह पर दबा लिया।

औरत का चुम्बन, जो होश छीनने लगता है। वह भी पहली बार किसी दूसरी औरत का।

‘अँ… हँ… हँ…’ प्रकाश ने खँखारकर आने का इशारा किया, हम अलग हुए। और समय होता तो अंजलि ताना मारती, अभी उसके चेहरे पर बस लाली थी।

अबकी मुझे साँप ने काटा, अंजलि बोली- अच्‍छा है सजा मिली।

मुझे उसका मजाक करना अच्‍छा लगा, मैंने नहले पर दहला मारा- सजा या मजा?

मैंने शर्ट उतार दी।

प्रकाश को सीढ़ी आई तो अंजलि खेल छोड़ने लगी। प्रकाश उसको आश्‍वस्‍त करता हुआ बोला- मैं बस खेल की औपचारिकता निभाऊँगा, कुछ नहीं करूंगा।

उसने अंजलि का हाथ पकड़ा और हथेली के पीछे की सतह पर चूम लिया।

अंजलि जैसे मुक्त हुई।

मुझे अगली बार साँप ने काटा तो मैंने बनियान उतार दी। पैंट उतारने पर चड्ढी ही बचती। मैं उस समय की सोच रहा था जब इन औरतों के कपड़ों का नम्बर आएगा। क्या सचमुच ऐसा होगा? सचमुच मेरी पत्नी के कपड़े उतरेंगे?

मैं चाहता था उसे चलाए चलने के लिए भाग्य सुषमा को भी विवस्त्र करता चले… काश पाँसे इसी तरह आएँ।

मगर सुषमा सड़सड़ाती आगे बढ़ी चली जा रही थी। वह एक के बाद दूसरी सीढी भी चढ़ गई। किस्मत उसका साथ दे रही थी। मगर भगवान अंजलि का बेड़ा गर्क (या कि पार?) ही करना चाह रहे थे, उसे बार-बार साँप काट रहा था। फिर भी, औरतों के पास बहुत कुछ होता है उतारने के लिए।

गेम समाप्त होते होते यह स्थिति थी–

सुषमा : गले का हार छोड़कर सारे गहने जा चुके, बदन पर साया-साड़ी-ब्लाउज, मेरे दो चुम्बन। उसकी तरफ से भी मुझे तीन चुम्बन।

अंजलि : सारे गहनों से वंचित, (गर्दन पर मंगलसूत्र की गाँठ मैंने ही खोली थी), एक कपड़े तक बारी आई थी। वह कुछ देर तक दुविधा में रही थी कि क्या उतारे। मैंने सुझाव दिया था कि पैंटी निकाल दे। अंदर की चीज है, बाहर वह जस की तस दिखती रहेगी, मगर वह सुनकर ही भड़क गई थी। सुषमा ने उसे अंततः साड़ी उतारने पर मना लिया। साड़ी उतारकर उसने होटल की दी हुई चादर ओढ़ ली। बदन पर साया और ब्लाउज ही बच रहे थे। (ये कब जाएंगे?)

मैं : टॉपलेस, मगर पैंट सलामत! शर्ट, घड़ी, बनियान और मोजे जा चुके थे। तीन चुम्बन के मौके, तीनों सुषमा पर जोरदार तरीके से। अंतिम वाले में मैंने थोड़ा सस्पेंस बनाया था। मुँह बढ़ाया था सुषमा के होंठों की तरफ, पर धोखा देते हुए नीचे गले पर उतर गया था और वास्तविक चुम्बन के समय तो उभारों के बीच में था। ऐसा मैंने थोड़ा अंजलि को जलाने के खयाल से भी किया, ताकि बदला लेने के खयाल से वह प्रकाश से सम्पर्क बनाए।

प्रकाश : बनियान, पैंट को छोड़कर मोजे और अंगूठी तक खुल चुकी थी। दो बार सीढ़ी चढ़ने का कारण अंजलि के साथ कुछ करने के दो चांस मिले थे। एक बार उसने अंजलि की हथेली के पीछे चूमा था। दूसरी बार अंजलि ने ना ना करते हुए सिर झुका लिया था। मेरे और सुषमा के बढ़ावा देने के बाद उसने उसके झुके सिर के पीछे गरदन चूमी थी। मुझे डर था कहीं वह भड़क न जाए, पर वह सह गई थी।

आधा घंटा हम चारों का बंद कमरे में एक साथ हुए बीत गया था, मंजिल अभी दूर थी।

लूडो ने इतना कर दिया था कि मेरी बीवी के सख्त रवैये में नरमी ले आए। लेकिन इस बदलाव को मुकाम तक ले जाने के लिए अब कुछ तेज करने की जरूरत थी। साँप-सीढ़ी को दुबारा खेलना उबाऊ होता।
 
आधा घंटा हम चारों का बंद कमरे में एक साथ हुए बीत गया था, मंजिल अभी दूर थी।

लूडो ने इतना कर दिया था कि मेरी बीवी के सख्त रवैये में नरमी ले आए। लेकिन इस बदलाव को मुकाम तक ले जाने के लिए अब कुछ तेज करने की जरूरत थी। साँप-सीढ़ी को दुबारा खेलना उबाऊ होता।

मैं प्रकाश को देख रहा था, कि क्या करेगा?

उसके चेहरे पर भी उलझन थी।

मैंने लूडो को परे सरकाते हुए कहा- लड़कियों को खेल जीतने की बधाई! कुछ ईनाम लेना है तो मांग लो, आज हम मूड में हैं।

सुषमा बच्चों-सी ताली बजाकर हँस पड़ी, देखा-देखी अंजलि भी मुसकुराई।

‘मांगूँ…?’

‘सचमुच!’ प्रकाश ने सिर हिलाया।

‘मुझे हीरे के टॉप्स चाहिए।’

सुषमा में अभी भी बचपना था, इस वक्त कोई सेक्सी चीज मांगनी चाहिए थी! खैर, प्रकाश ने हाँ कर दिया।

अंजलि चुप थी।

सुषमा ने उसको टोका- तुम क्या मांग रही हो?

अंजलि ने इनकार में सिर हिला दिया, वह गंभीरता बरत रही थी।

मैंने अपनी तरफ से घोषणा की- एक सुंदर सी नथ!

‘अरे वाह! अभी भी भाई साहब नथ उतारने का ख्वाब देखते हैं। क्या बात है?’

‘मैं ख्वाब नहीं देखता, हकीकत में करता हूँ।’

मैं उठा और अपने बैग से एक सुनहले रंग का बॉक्स निकाल कर ले आया, इसे मैंने पहले ही खरीद रखा था, आज चुपके से साथ रख लिया था।

मुझे नथ की कल्पना बड़ी उत्तेजक लगती थी और सोचा था कि आज अगर संभोग हो गया तो अंजलि को गिफ्ट करूँगा और कहूँगा- यह लो, आज तुम्हारी एक और नथ उतरी।

अंजलि हैरान थी और शर्म से लाल भी… कभी मुझे देख रही थी, कभी उस बक्से को जिसमें लाल मखमली सतह पर सोने की नथ झिलमिला रही थी- कब खरीदी?

चकित सुषमा और प्रकाश भी थे- आपने तो कमाल कर दिया?

उस अनुभवी और गर्वीले प्रकाश पर बढ़त बनाकर मेरा सीना चौड़ा हो गया।

सुषमा ने टिप्पणी की- इसको कहते हैं प्यार!

सुनकर प्रकाश थोड़ा झेंप भी गया।

मैंने अगले कदम का नेतृत्व थाम लिया। अंजलि को फँसाने के लिए बचपन में खेला जाने वाला एक खेल इस सिचुएशन में चमत्कारिक रूप से फिट हो रहा था, मैंने कुटिलता को छिपाते हुए कहा- अब अंजलि मुझे बताएगी कि वह मुझे कितना प्यार करती है।

‘वो कैसे?’

जी चाहा कि अपनी जानेमन दिलरुबा बीवी को वहीं चूम लूँ पर मैंने सस्पेंस को बरकरार रखते हुए जेब से रूमाल निकाला और उसे पट्टी सा बनाते हुए अंजलि की सवाल और आश्चर्य से फैली आँखों पर रख दिया।

सुषमा ने रूमाल के सिरों को बाँध दिया।

पट्टी की कसावट को जाँचने और यह पक्का करने के बाद उसे कुछ दिख नहीं रहा है, मैंने कहा- अंजलि, तुम मुझे मेरी छुअन से ही पहचान कर दिखाओगी। हम तीनों तुमको छुएंगे और तुमको बताना है कि कौन सा स्पर्श मेरा है। वैसे अब तक तुम हम तीनों की छुअऩ से वाकिफ हो ही चुकी हो।

‘हाँ.. हाँ.. यह तो मजेदार रहेगा।’

छुआ-छुई का बचपन का खेल… आज यौवन में उसकी अलग परिभाषा हो रही थी।

सुषमा ने शुरूआत की, उसने उसका माथा छुआ। अंजलि ने हाथ बढ़ाकर पकड़ा तो मैंने रोका- तुम्हें अपने हाथ में लेकर देखना नहीं है, खाली स्पर्श से ही पहचानना है।

वह औरत के हाथ को पहचान चुकी थी, बोली- सुषमा।

‘बिल्कुल सही!’ प्रकाश बोला।

मैंने टोका- लेकिन इस बार तो तुम हाथ से पकड़कर पहचान चुकी थी। अबकी बोलो?” मैं अंजलि को सम्हलने का मौका नहीं देना चाहता था। उसकी चादर कंधों से गिर चुकी थी और ब्लाउज में कसे कंधे और वक्ष प्रकट हो गए थे। अंजलि को इसका पता चल गया था और वह फिर से चादर कंधों पर खींच रही थी।

मैंने जैसे ही ‘अबकी बोलो’ का वाक्य खतम किया कि प्रकाश ने उसकी बाँह छुई। अंजलि पहचानने की कोशिश करने लगी, बोली- ऐसे कैसे होगा, सिर्फ़ छूने से कैसे पता चलेगा?

ठीक है, हम थोड़ा ज्यादा छुएंगे, तुम्हें पता चलने लायक!’

प्रकाश के चेहरे पर खुशी दौड़ गई। उसने उसकी बाँह सहलानी शुरू कर दी। लेकिन डरते हुए हाथ कपड़े पर ही रखा, नीचे नंगे हिस्से पर नहीं ले गया। अंजलि के तेज दिमाग ने इस डर से अंदाजा लगा लिया- प्रकाश!

‘अरे वाह!’ हम तीनों के मुँह से एक साथ निकला।

आँखें बंधी होने के बावजूद उसका दिमाग काम कर रहा था।

‘तुम कब आओगे?’ वह मुझे बुला रही थी।

‘अभी आता हूँ। मैंने कहा।

एक हाथ उसके एक स्तन पर आया।

अंजलि चौंककर हाथ बढ़ाते हुए बोली- यह क्या कर रहे हो?

मैंने उसके बढ़ते हाथ को पकड़ लिया- ऊँहूँ, तुम्हें सिर्फ छूने को महसूस करना है।

‘मगर…’

‘कहाँ छुएंगे, इसकी तो पाबंदी नहीं थी।’ मैंने जोड़ा।

उसके स्तन संवेदनशील थे। सहलाने से नोंक सख्त होकर उभर गए। अंजलि ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, मैंने उसको कोंचा, ‘बोलो!’

सुष… या शायद… प्रका..’ यह अटकाव शर्म की थी, या उत्तेजना की, या उलझन की, पता नहीं… या शायद तीनों की।

वह आगे झुककर वक्षों को यथासंभव छिपाने की कोशिश कर रही थी।

‘एक नाम बोलो- सुषमा, या प्रकाश, या मैं?

‘सुषमा…’ शायद वह मर्द और औरत के स्तन छूने के अंतर को महसूस कर रही थी‘करेक्ट!’ इसके साथ ही उसके स्तनों पर हाथ की हरकत बंद हो गई।

मैंने उसके हाथ छोड़ दिए।

लेकिन तभी कोई हाथ उसकी पैरों के पास चादर में अंदर घुस गया।

उसने रोकना चाहा पर मैंने टोका- जानेमन, यह मैं हूँ। तुम्हारी पिंडली छू रहा हूँ।

लेकिन असल में यह प्रकाश की हरकत थी।

‘नहीं, नहीं…’ उसने रोकने के लिए हाथ बढ़ाए।

मैंने उसके ना ना करते मुँह पर एक चुम्बन ठोक दिया, वह ठगी-सी रह गई।

मैंने पूछा- बताओ, यह कौन था?

अंजलि के हाथ आँखों पर से पट्टी हँटाने के लिए उठे मगर सुषमा-प्रकाश ने एक एक हाथ पकड़ लिया।

मैंने जोड़ा, “नहीं, नियम नहीं तोड़ना है। लो, फिर से बताओ।

कहते हुए मैंने उसे फिर चूमा, इस बार दोनों हाथों से उसका चेहरा पकड़कर देर तक चुम्बन दिया।

वह मेरे चुम्बन को पहचान गई और तब उसको लग गया कि साए के अंदर घुस गया हाथ दूसरे का है, उसको पाँव से ठेलने लगी।

उसके विरोध को कमजोर करने के लिए स्तन सबसे जरूरी थे, मैंने एक हाथ से उसका एक एक स्तन थामा और दूसरे पर सुषमा को बुला लिया।

दोनों मिलकर उसके रसीले आमों को दबा-दबाकर चूसने के लिए तैयार करने लगे।

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प्रकाश ने होटल की चादर उसके बदन पर से धीरे धीरे खींच दी, ब्लाउज और साए में औरत का दृश्य तो यों ही मादक होता है, उभरा वक्ष, नंगे पेट की तहें, उसके नीचे साए का बंधन, उसके अंदर नंगे पैर – रसीली योनि का साम्राज्य!

प्रकाश अभी तो अंजलि के पैरों को कपड़े पर से ही सहला रहा था लेकिन उस अकेली पतली परत के जाने में कितनी देर लगेगी।

मेरी उत्तेजना पैंट के बंधन में कसमसाने लगी।

लेकिन असली कसमसाहट तो अंजलि में हो रही थी। उसकी उम्म.. उम्म.. बोलने की कोशिशों को मैं अपने मुँह में दफन कर दे रहा था।

यह एक तरह से जबरदस्ती थी, लेकिन मेरी नजर में वाजिब हद के भीतर। औरत सहमति देती है मगर खुलकर और आसानी से नहीं, उसे प्रायः एक जबरदस्ती की आवश्यक खुराक देनी पड़ती है।

मैंने उसके मांसल स्तनों को पहले कितनी बार सहलाया था मगर आज और ही बात थी। आज उसे नए सिरे से महसूस कर रहा था – मुलायम और लचीले, और भरे-भरे, दबाने पर बच्चों की तरह अंदर से ठेलते। उन्हें नंगे करके चूचुकों पर मुँह लगाने के बाद तो अंजलि के बेबस हो जाने की गारंटी थी। पति होने के नाते मैं उसकी कमजोरी जानता था।

हमारी कोशिशें बेकार नहीं जा रही थीं। प्रकाश अंजलि के पैरों को कभी साए के ऊपर से, कभी उसके अंदर घुसकर सहला रहा था। अंजलि बचाव में पैरों को आगे-पीछे कर रही थे जिसे देखकर मुझे उनके उत्तेजना में बिस्तर की चादर पर रगड़ खाने का खयाल आ रहा था। मैंने हल्के से ही उसके एक पाँव को अपने पाँव से नियंत्रित कर लिया।

अंजलि समझ चुकी थी कि हम तीनों ने उसे खेल खेल में फंदे में ले लिया है। उसके हाथ-पाँव पकड़ रखे हैं। लगातार हो रहा चुम्बनों, स्तन-मर्दन, टांगों के बीच गुदगुदी के हमलों को वह कहाँ तक संभल पाएगी। उसकी तेज चलती साँसों और चेहरे की लाली में गुस्सा और उत्तेजना दोनों की भूमिका था।

मैं कोशिश कर रहा था उसमें गुस्से की भूमिका घटाने की।

जाएगी कहाँ… होंठों और स्तनों पर के अनुभवों को इनकार कर सकना उसके लिए मुश्किल था, असंभवप्राय! वह बेहद संवेदनशील अंगों वाली औरत थी।

 
मुझे गर्व हुआ। यह तेज साँस छोड़ती, मेरे होंठों के नीचे उम्म उम्म करती, उड़हुल की तरह चेहरा लाल कर रही औरत मेरी है। वह जितना असहाय हो रही थी उतनी ही मुझे उत्तेजना हो रही थी।

लगा इसे रस्सी से बाँध दूँ और सब मिलकर उसके साथ संभोग करें।

सुषमा ने देखा, अंजलि मेरे चुम्बन स्वीकार कर रही है। उसने उसका हाथ छोड़ दिया और उसकी पीठ पर ब्लाउज के बटन खोलने लगी। अंजलि ने हुमक-सी मारी पर मैंने उसे आलिंगन में बाँध रखा था।

उसने पीठ सिकोड़ी मगर इससे उल्टे ब्लाउज का कपड़ा ढीला होकर बटन खोलने में मददगार हो गया।

बटन खोलकर सुषमा ने ब्रा का हुक भी खोल दिया। ओह, यह हुक खोलना मेरी प्रिय चीज थी। पर ‘समाज’ के लिए मैंने इस व्यक्तिगत सुख का त्याग कर दिया।

ब्लाउज के नीचे ब्रा का सफेद फीता हल्का सा नम था। कपों के नीचेवाली पट्टी में स्तनों के बोझ से लम्बाई में पड़ी समानांतर सिलवटें थीं। ब्लाउज पीठ को खोलकर यूँ झूल गया था जैसे ड्यूटी समाप्त कर निश्चिंत पड़ गया हो।

यौन सुख का नशा जल्दी ही अंजलि पर तारी होने लगा, उसकी आहें निकलने लगी, होंठ काँपने लगे।

सुषमा ने उसकी हालत देखकर अपने हाथ में पकड़े उसके हाथ को मेरे सिर पर लाकर जमा दिया। अंजलि का दूसरा हाथ स्वयं मेरे सिर पर आ लगा।

बला का चुम्बन, बला की बीवी, बला का सिचुएशन।

आज उसी चिरपरिचित पत्नी की साँस की गंध में कोई और ही एहसास था, आज उसकी लार में कोई और ही मिठास थी। हथेली के नीचे उसकी छातियों के ऊपर नीचे होने में कोई और ही अनुभव मिल रहा था। लेकिन मैं याद रखे था- आज यह स्वाद मुझे नहीं लेना है, किसी और को दिलाना है। आज मैं उसे किसी और के लिए लाया हूँ। एक बार यह फूल अपना मधु किसी और भंवरे को दे दे।

मधु से मुझे अंजलि के निचले होंठों का ध्यान आया। पैरों को आगे-पीछे करने से साया जाँघों के ऊपर चढ़ जाता था, जिसे अंजलि पैरों के बीच दबाकर रोकने की कोशिश करती थी। निश्चित रूप से प्रकाश को पैंटी की झलक मिल रही होगी।

चोली और ब्रा खुलकर स्तनों पर झूल रहे थे और लेकिन उन्हें हटाकर नंगे स्तनों को थामने की जल्दबाजी मैंने नहीं दिखाई। सुषमा भी उसे सतर्क नहीं करना चाहती थी।

उसने धीरे धीरे अंजलि के कंधों से चोली और फिर ब्रा को भी खिसका दिया। अंजलि के मुँह पर मेरा मुँह जमा था सो उसने कंधे उचकाकर बचने की कोशिश की लेकिन सुषमा ने उसकी रीढ़ पर उंगली फिराकर उसे मीठी गुदगुदी देते हुए निष्फ़ल कर दिया।

अंजलि के कंधों के उघड़ते ही उसके बदन की पसीने मिली खास गंध मेरे नथुनों में और बढ़ गई।

सुषमा ने उसके गीले कंधे पर होंठ फिराए… पता नहीं अंजलि को यह बुरा लगा या अच्छा! शायद वह इसे महसूस भी नहीं कर पाई। मुझे अच्छा लगा कि सुषमा को पसीने से एतराज नहीं था।

धीरे धीरे मैंने अंजलि को पीछे की तरफ झुकाना शुरू कर दिया। सुषमा ने सिरहाने तकिया लगा दिया। नीचे प्रकाश अंजलि की ‘चरण-सेवा’ में लगा हुआ था, हालाँकि साया चरणों से बहुत ऊपर उठ चुका था और पैंटी से ढँकी ‘देव-प्रतिमा’ साया के अंदर से लुकाछिपी खेलती भक्त के धैर्य की परीक्षा ले रही थी।

मैंने मन ही मन कहा- लगे रहो वत्स। हम हैं ना। ‘भग-वान’ अवश्य दर्शन देंगे।’

‘ओ अंजलि…’ खुशी से भरकर मैं एक बार उसके चेहरे के ऊपर फुसफुसाया। उसके होंठ उत्तर में फुसफुसाए, लेकिन मुझे शब्दों में कुछ नहीं सुनना था। यह जो आज हो रहा था यह मेरे कितने लम्बे इंतजार में चल रहे सवालों का जवाब ही तो था। अंजलि का एक-एक ‘चीर-हरण’, उसकी एक-एक हरकत, बाद में आनेवाले रति-क्रिया के दृश्य मेरे सवालों के उत्तरों से सिलसिले ही तो होंगे।

प्रकाश ने उसकी साए की गाँठ की डोरी खींची। रेशमी धागे की सरसराहट की मीठी आवाज मेरे मोहित मुग्ध मन में अंकित हो गई। यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

मैंने उसे बाँहों पर लेते हुए बिस्तर पर लिटा दिया, सुषमा ने कमर में खींच खींचकर साए की डोर को ढीला किया।

इस दौरान प्रकाश उसके पैरों को पकड़कर उनकी बगावत को शांत किए रखा, हालाँकि बगावत में कुछ खास दम नहीं बचा था।

डोर पर्याप्त ढीली होने के बाद सुषमा ने उसकी कमर के नीचे हाथ डालकर नितंबों को उठाने के लिए प्रेरित किया और प्रकाश ने साए को नितंबों से खींचकर झटके के साथ पैरों से बाहर निकाल लिया।

मुझे बड़ी इच्छा हुई कि इस अनमोल घटना को किसी वीडियो कैमरे में कैद कर लेते।

मेरी पत्नी कमर से नीचे नंगी थी। दुनिया की नजरों से सदा छिपे रहने वाली टाँगें इस समय ‘खुलकर’ अपनी खूबसूरती बिखेर रही थी। गोरी चमकती जांघें, उनके बीच के उभार पर तनी गुलाबी पैंटी, बीच में अंदर की विभाजक रेखा का आभास।

गोल घुटने, जाँघों से नीचे क्रमशः मोटाई खोती पिंडलियाँ, टखनों से नीचे भरी एड़ियाँ, नेल पॉलिश से चमकती उंगलियाँ।

एक जोड़ी सुंदर स्त्री पाँव!
 
अगर कोई पुरुष इस पर मर न मिटे तो उसका जीना बेकार है।

मैंने अपने भाग्य पर गर्व किया।

‘या देवी सर्वभूतेषु कामनारूपेण संस्थिता’ … हे देवी तुम सभी जीवों में कामना बनकर मौजूद हो।

मैंने उस देवी की आँखों पर से पट्टी उतार दी — कि वह अपने मुग्ध कर देनेवाले सौंदर्य को खुद भी देख सके…

पर वह आँखें कसकर बंद किए थी।

सुषमा ने उसकी ब्रा और चोली उतार दी। अब अंजलि के तन में, और मन में भी, कोई बाधा नहीं बची थी। हमने उसके स्तनों को सम्हाल लिया। सुषमा के साथ मिलकर अंजलि के स्तनों को चूसना, चूमना, सहलाना, एक दूसरे की देखादेखी हाथों में लेकर मसलना बहुत अच्छा लग रहा था।

अंजलि ही सुषमा को मेरे नजदीक लाने में माध्यम बन रही थी।

अंजलि कसमसा रही थी।

हमने उसके हाथों को खुला छोड़ दिया था ताकि वे यौनोत्तेजना को प्रकट कर सकें। वे कभी छटपटाते थे, कभी हमारे सिरों को सहलाने लगते, कभी परेशान होकर हमारे चेहरों को स्तनों पर से हटा देते।

हम खुद भी अंजलि को ज्यादा परेशान नहीं करने के लिए बीच बीच में उसके स्तनों को छोड़ देते थे।

मुझे सुषमा के प्रति अन्याय ही लग रहा था कि मैं उसके साथ कुछ नहीं कर रहा था, जबकि वह भी तो ‘गर्म’ हो रही होगी।

लेकिन अंजलि के लिए यह पहला मौका था और उसे पूरा ध्यान देना जरूरी था। सुषमा भी इसे सफल बनाने की पूरी कोशिश में लगी थी। एक बार अंजलि पूर्ण नग्न हो जाए, प्रकाश के लिंग को अपने अंदर स्वीकार कर ले, उसका सतीत्व समाप्त हो जाए, कम से कम मुझे तो चाँद-सितारों की खुशी हासिल हो जाएगी।

और अंजलि बची भी कहाँ थी, पूरी नंगी तो हो ही चुकी थी, दूसरा लक्ष्य भी ज्यादा दूर नहीं था।

फिर भी, अंजलि के चेहरे और छातियों के ठीक ऊपर अपने चेहरे के पास सुषमा मुँह की नजदीकी इतनी उत्तेजक थी कि अलग रहना मुश्किल था।

मैंने सुषमा के मुँह को अपनी तरफ घुमा लिया और उसके होंठों पर अपने होंठ दबा दिए। गरमाई हुई सुषमा तुरंत ही मेरे सिर को पकड़ कर जोर जोर से मेरे होंठों को अपने मुँह में खींचकर चूसने लगी।

चुम्बनों का शोर सुनकर अंजलि की आँखें खुल गईं, उसकी लाल डूबी आँखों में हैरानी का भाव उभरा।

मैंने झुककर अंजलि को चूम लिया।

अगले ही क्षण सुषमा ने दुगुने जोर से उसका चुम्बन लिया, वह फिर आँखें मूंदने को विवश हो गई।

मुझे बड़ा मजा आया। हमने मिलकर कुछ और बार यह खेल दुहराया। कुछ देर में अंजलि सहयोग भी करने लगी। वह मेरे साथ साथ सुषमा के भी चुम्बनों का जवाब देने लगी।

सुषमा के थोड़ी ही देर के उस चुम्बन ने जतला दिया कि वह बिस्तर पर कितनी गरम औरत साबित होगी, दम-खम की पूरी परीक्षा होगी।

सुषमा ने मेरा ध्यान खींचा – वह एक छोटी-सी बाधा, जो प्रकाश की विनम्र कोशिशों से जाने का नाम नहीं ले रही थी। पैंटी। औरत के संकोच का एक कोना हमेशा बचा रहता है – शायद पूर्ण संभोग के बाद भी।प्रकाश पैंटी को हटाने की संकोच सहित कोशिश कर रहा था, अंजलि अपने पाँव कसे थी, वह बेचारा उसे कमर से भी ठीक से खिसका नहीं पाया था। अंजलि उसके हाथ पकड़ ले रही थी या पैरों से ठेल दे रही थी।

सुषमा को अपने पति की असफलता बुरी लग रही थी।

यहाँ मेरी जरूरत थी, मुझे मालूम था कि क्या करना है। मैंने अंजलि का हाथ खींचकर कंधों से ऊपर कर दिया और उस ‘बाधा’ के अंदर हाथ घुसा दिया।

यह मेरे होंठों और उंगलियों की सबसे प्रिय जगह थी। चिकने गीलेपन ने हाथों को अंदर आसानी से घूमने की सुविधा दे दी और मैं ‘दरवाजे’ के अंदर घुसने के साथ साथ ऊपर की ‘कुंडी’ भी खटखटाने लगा।

अंजलि बचने के लिए कमर हिलाने लगी मगर घूमती हुई कमर ने और पैंटी को हर तरफ से नीचे खिसकाने की सुविधा दे दी। मेरे सहयोग का बल पाकर प्रकाश ने उसकी एड़ियों को अपनी एक बाँह में जकड़ा और सुषमा की मदद से पैंटी को भगों के उभार पर से और नितम्बों से खिसका दिया।

मैंने योनि के अंदर घुसी उंगलियों की हरकत बढ़ा दी, अंजलि के पैर जरा से अलग हुए और पैंटी आजाद हो गई।

मैंने हाथ बाहर निकाल लिया, योनि के रस की एक गंध एकबारगी हवा में तैर गई।

अंजलि ने पुनः पाँव कस लिए।

मैंने गीली उंगलियों को थोड़ा सा अंजलि के होंठों पर पोंछ दिया। हिचकते हुए मैंने उन्हें सुषमा की ओर बढ़ाया तो उसने जीभ बढ़ाकर चख लिया।

मुझे अच्छा लगा, हम दोनों मिलकर इसकी योनि भी चूसेंगे, मैंने सोचा, पर एक ही समय क्या क्या करेंगे।

प्रकाश ने दोनों हाथों में अंजलि की एक एक एड़ी पकड़ी और जोर लगाकर लकड़हारा जैसे लकड़ी चीरता है वैसे ही अंजलि के पाँव झटके से फैला दिए। भगों की विभाजक रेखा नितम्बों को फाड़ती गुदा को दिखाती ठहाके की तरह खुल गई।

अंजलि ने शर्म से भरकर पाँव खींच लिए मगर तब तक प्रकाश उनके बीच घुस चुका था। उसने झुककर उसकी योनि पर मुँह लगा दिया।

मैंने और सुषमा ने अंजलि के पैरों को अलगाकर उसकी सहायता की।

अंजलि हैरानी की सीमा से भी कहीं बहुत ऊपर जा चुकी थी। हैरान तो कुछ मैं भी था – यह प्रकाश तो मौखिक रति का बड़ा प्रेमी निकला!

 
मैंने सुषमा की ओर मुस्कुराते हुए भौंहे उचकाईं।

सुषमा थोड़ा गर्व से हँसी – हम झूठ नहीं कहते थे। प्रकाश पूरे लगाव से अंजलि की योनि को चूम और चूस रहा था। उसकी दीवानगी देखकर मुझे गर्व हो रहा था अंजलि पर।

मैं अंजलि के स्तनों को हौले-हौले ही सहला रहा था ताकि वह योनिप्रदेश से मिल रहे आनन्द पर ज्यादा ध्यान लगा सके।

सुषमा उसकी जाँघों को, पेट को, शरीर के अन्य हिस्सों को सहला रही थी।

सचमुच यह अंजलि का यादगार अनुभव होगा! वह इतनी चंचल हो रही थी कि प्रकाश को सुविधा देने के लिए हमें उसे पकड़ना पड़ रहा था। वह जोर जोर से सीत्कार भर रही थी और हमें चिंता हो रही थी कि आवाज कहीं बाहर न चली जाए।

सुषमा उसकी उग्रता से चकित थी, कभी कभी तो अंजलि छटपटा-सी जाती। जिस समय प्रकाश की जीभ की अंदर भगनासा पर गुदगुदी करती, वह सहन नहीं कर पाती, वह उसका सिर हटा देती।

प्रकाश रुक कर फिर शुरू करता।

मैंने काम देवता को धन्यवाद दिया, उनकी पूरी मेहरबानी अंजलि पर हो रही थी, अंजलि आहें भर भरकर मानो उनकी आराधना में मंत्र-पाठ कर रही थी। प्रकाश उसे पूरे दिल से चूस रहा था।

मैं योनि और मुख के संगम के इस अनोखे दृश्य को मंत्रमुग्ध होकर देख रहा था, मुझमें तरंगें उठ रही थीं, कितनी गहरी इ्च्छा पूरी हो रही थी। कोई और स्त्री होती तो मुझ पर इतना असर न होता पर अपनी प्राण प्यारी पत्नी को इस हाल में देखना।

यह खुशी की इंतिहा थी। मुझे डर लग रहा था कहीं मेरा आधे रास्ते में ही…

मुख-सुख की अभ्यस्त अंजलि जल्दी ही स्खलित होने के कगार पर आ पहुँची। अनुभवी खिलाड़ी प्रकाश ने मुँह हटा लिया। अंजलि ने उसके मुँह से मिलने के लिए कमर उठाई तो प्रकाश ने योनि के उभार पर एक चपत जड़ दी। अवाक होकर अंजलि की हलचल बंद हो गई।

मैंने प्रकाश को देखा, वह आत्मविश्वास से भरा था।

हमने भी अपने हरकतें रोक दीं।

कुछ क्षणों बाद प्रकाश उस पर पुनः झुका और हम भी चालू हुए। पुनः अंजलि स्खलन पर पहुँचने को हुई कि वह उठ गया। वही चपत, वही अपमानजनित स्थिरता। फिर से शुरूआत।

तीसरे दौर में तो अंजलि बेकरार हो गई। वह आतुरता में कमर उठाकर प्रकाश का सिर खींचकर अपनी योनिस्थल पर लगाने लगी। हमारी पकड़ने की कोशिश को भी उसने हाथ से झटक दिया।

निर्णय का क्षण आ गया था, लोहा गरम लाल था, अब उस पर चोट की जरूरत थी।
 
तीसरे दौर में तो अंजलि बेकरार हो गई। वह आतुरता में कमर उठाकर प्रकाश का सिर खींचकर अपनी योनिस्थल पर लगाने लगी। हमारी पकड़ने की कोशिश को भी उसने हाथ से झटक दिया।

निर्णय का क्षण आ गया था, लोहा गरम लाल था, अब उस पर चोट की जरूरत थी।

प्रकाश बड़ी देर से सम्हाले था। उसने हड़बड़ाते हुए पैंट उतारी और अंजलि के खुले पैरों के बीच आ गया।

उसका लिंग मुझसे बड़ा और मोटा था।

मैं उत्कंठापूर्वक देखने लगा – कैसे सुषमा उसके लिंग को चूमकर गीला कर रही है और कैसे प्रकाश उसे अंजलि की योनि-होंठों पर लगाकर उनके बीच ऊपर-नीचे फिरा रहा है।

मेरे अंदर झुरझुरी सी होने लगी, मेरी पत्नी की योनि में एक पराए मर्द का लिंग घुसने वाला था, उसके मुँह से सी-सी-सी निकल रही थी।

लिंग की नोक ऊपर से नीचे तक लंबाई में घूमती हुई अंदर की बनावट और बुनावट का जायजा ले रही थी, गीले होंठों ने खुलकर लिंग को बीच में उतरने का रास्ता दे दिया था।

कुछ ही सहलाहटों के बाद अंजलि ने अंदर लेने के लिए कमर उचकाई और प्रकाश ने लिंग को योनि के मुँह पर लगा दिया।

असल काम की घड़ी, वर्षों प्रतीक्षा की घड़ी, मेरी पतिव्रता बीवी के व्यभिचार की घड़ी, उसकी योनि में परपुरूष के प्रवेश की घड़ी…

मैं – उसका पति – उत्साह से उसकी योनि के होंठों को फैलाकर उसके शीलभंग में मदद कर रहा था।

प्रकाश कोमलता से ही अंदर ठेल रहा था।

उसमें डूबते लिंग के साथ ही मैं आनन्द के सागर में डूबा जा रहा था। लिंग जैसे ही अदृश्य हुआ, पेड़ू से पेड़ू सटे, प्रकाश ने एक धक्के के साथ पूर्ण प्रवेश की क्रिया सम्पन्न की, मेरे सम्हलने की इंतिहा हो गई, आनन्द का लावा बह निकला, कुछ नहीं कर पाया, बस ‘अरे’ ‘अरे’ करता किसी तरह पैंट को दबोचकर उसे इधर उधर फैलने से बचाने की कोशिश करने लगा।

प्रकाश हँसा लेकिन सुषमा का रवैया अलग था, उसने सहानुभूति से मेरा माथा सहलाया, वह मेरी तरफ आई और मेरे पैंट का बकल खोलकर जिप नीचे की और कमर से चड्डी सहित खींचकर बाहर निकाल दिया।

अंजलि को भी कुछ अजीब होने का पता चल गया और उसने गरदन उठाकर ‘क्या हुआ’ पूछा। पर प्रकाश के धक्के चालू हो गए थे और कोई औरत संभोग के धक्कों के बीच कहीं और ध्यान दे भी तो कैसे।

मैं उसे प्यार से गाल थपथपाकर आश्वस्त करना चाहता था पर मैं स्वयं लज्जित था। सुषमा मुझे चादर से पोंछ रही थी। मेरा लिंग सिकुड़कर छोटा हो गया था जिसे मैं हाथों से छिपा रहा था।

सुषमा ने हाथ घुसाकर उसे हथेली में भरकर सहलाया और हंसते हुए कहा- देखना, बड़ा होकर यह बड़ा काम करेगा।

प्रकाश और अंजलि की रतिक्रीड़ा, पुरुष और स्त्री की संयोग-प्रक्रिया मेरी आँखों के आगे चल रही थी – लेकिन अब मेरा मन उचट गया था।

हालाँकि मुझे अंजलि का चुदना अच्छा लग रहा था – अंजलि की कमर उचक रही थी और प्रकाश हुमक हुमक कर धक्के लगा रहा था। वैसा ही गर्म, जोरदार और जबरदस्त मैथुन जैसा मैंने चाहा था, पर मैं अपने को इससे नहीं जोड़ पा रहा था।

वे दोनों काफी देर से गरम थे, मिनट भर में ही चरमोत्कर्ष पर पहुँच गए।

प्रकाश ने पूछा- कहाँ करूँ?

तो मैंने उसे अंदर ही झड़ जाने को कह दिया।

अंजलि पिल्स पर थी, दोनों एक-दूसरे को चिपटाकर साथ-साथ झड़ने लगे।

सुषमा मेरे अलगाव को समझ गई थी। वह तेज instinct वाली औरत थी। उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा- आइये, इन दोनों को थोड़ी देर के लिए अकेले छोड़ देते हैं और हम बाहर चलते हैं।

शुक्र है, मैंने अपने बैग में हम दोनों के लिए एक एक जोड़ी एक्स्ट्रा कपड़े रख लिए थे।
 
बाहर दुनिया कितनी अलग थी, फैली हुई और विविधतापूर्ण, पहली बार मुझे सेक्स का घोर बंद एकांत गलत लगा।

हम होटल के रेस्टोरेंट में चले आए। कॉफी की चुस्कियाँ लेते हुए सुषमा ने कहा- It was too much for you. First time था ना, so it is natural.

मुझे उस वक्त वह बहुत अच्छी लगी – अपने मोटापे और अंजलि की तुलना में सामान्य चेहरे-मोहरे के बावजूद। लगा कि इसके भारी वक्षों और मोटी कमर को सह जाऊंगा। उसने मुझे बधाई दी, अंजलि के चुद जाने की।

‘हाँ, यह मेरा बहुत बड़ा सपना था।’ मैंने कहा।

‘मैंने कहा था न उन्हें एक बार हमारे साथ होने दीजिए, वे खुद आगे बढ़कर सेक्स कराएँगी। पर यह सपना आपके सहयोग के बिना सच नही होता। आपको पूरा श्रेय जाता है।’

‘Thanks for being so understanding.’

रेस्तराँ के हल्का संगीत मेरे दिमाग के थके रेशों को सुकून दे रहा था। कॉफी की चुस्कियों के बीच वह मुझे देख रही थी, बिस्तर पर मैं कैसा साबित हूँगा, शायद इसका अंदाजा लगा रही थी।

‘You are a thorough gentleman.’

मैं अचकचा गया- अरे, यह आपने क्या कहा!

‘ठीक कह रही हूँ। हमने कई दम्पतियों के साथ किया है। और लोग स्वैप के लिए कमरे में साथ होते ही मुझ पर टूट पड़ने के लिए आतुर हो जाते हैं। पर आपने अंजलि जी पर ध्यान दिया। आप उन्हें बहुत चाहते हैं। यह भी पहली बार ही देखा कि कोई अपनी पत्नी को देखते देखते ही स्खलित हो जाए। इतना लगाव तो दुर्लभ है।’

मैं शरमा गया।

‘प्रकाश के साथ पत्नी को अकेले छोड़कर बाहर आने में भी आपने एतराज नहीं किया। अपनी पत्नी पर और किसी दूसरे पुरुष पर इतनी उदारता और भरोसा कम ही लोग दिखा पाते हैं।’

मैं उससे नजर मिलाए रखने की कोशिश कर रहा था, पर संकोच हावी हो जाता था। मुझे लगा मैं सचमुच बहुत gentle व्यक्ति हूँ।

‘मैं आपके साथ अकेले होना चाहती थी, इसीलिए बाहर बुला लिया। कमरे में भी मैं आपके साथ अकेले ही…’

I felt honored…

‘आपको एतराज तो नहीं होगा?’

मैंने ना कहा।

‘अंजलि जी को?’

मैंने जवाबी सवाल किया- प्रकाश को बुरा तो नहीं लगेगा? वो आपको नहीं देख पाएँगे तो?

‘उन्होंने मुझे कई बार देखा है, मेरी इच्छा उनके लिए सबसे बड़ी है।’

‘और अंजलि का कहना है कि मैं तुमको मुझे दूसरी औरत के साथ नहीं देख सकती। इतना प्यार करती हूँ तुमको।’

वह जोर से हँस पड़ी ‘सही कहा, मुझे भी ईर्ष्या होती है उस वक्त!’

‘कहाँ, आज तो आपने बढ़-चढ़कर सहयोग किया।’

‘आपकी खातिर!’

दोनों जोर से हँस पड़े।

उसने मेरे हाथ पर अपना हाथ रख दिया, मैंने चारों ओर देखा, लोग अपने में डूबे थे, मैंने टेबल के नीचे पाँव बढ़ाकर उसके पाँवों को महसूस किया, लगा कि एक बार फिर से किशोर वय की कोई घड़ी लौट आई है।

मेरा लिंग धड़क उठा।

औरत साधारण भी हो, उसका साथ होना मादकता ले ही जाता है।

कॉफी खत्म करके हम एक-दूसरे का हाथ पकड़े ही कमरे तक वापस आए।

कमरा प्रकाश ने खोला। अंजलि कपड़े पहन चुकी थी। वह सिकुड़ी हुई बैठी थी।

प्रकाश कमर से ऊपर खुला था, उसका चेहरा खुशी से चमक रहा था।

मैंने उससे हाथ मिलाया और धन्यवाद कहा
 
‘अरे भाई साहब, धन्यवाद तो मुझे कहना चाहिए। इतनी अच्छी…’ मैंने उसे बीच में ही रोका और अंजलि की बगल में बैठते हुए उसे अपने से सटाकर उसके कान में कहा- बधाई मेरी जान!!

वह शरम से गठरी बन गई।

मुझे गर्व हुआ, वह मेरी है।

कुछ देर तक इधर-उधर की बातें करने के बाद सुषमा ने अनुरोध कर दिया कि वे दोनों बाहर जाकर थोड़ा खुली हवा में फ्रेश हो लें।

सुषमा के साथ का एकांत खास था।

प्रकाश और अंजलि में कोई बात नहीं हुई थी सीधे संभोग हुआ था; यहाँ परिचय की गरमाहट उत्पन्न हो चुकी थी।

शुरू में सुषमा देखने में ही नहीं, बात में भी साधारण लगी थी लेकिन अंजलि का सेक्स कराने में और अभी इस थोड़ी देर के interaction ने बहुत फर्क डाल दिया था।

अंजलि के साथ कुछ जबरदस्ती करनी पड़ी थी, पर सुषमा के साथ तालमेल था, सहयोग था – एक-दूसरे के कपड़े खोलने से लेकर चूमने, सहलाने हर चीज में।

वह मेरी छाती में मुँह घुसाकर मुझे चूमती थी और मैं उसकी पीठ पर रीढ़ के ऊपर के कोमल माँस को महसूस करता था, उसके बालों को सूँघता था, उसके गुलगुले गालों पर होंठों को दबाता था और उसके स्तनों को हाथों में भर लेता था, उसके चूचुकों के बड़े से वृत को मैं अपने होंठों की गोलाई से नापता था और धीरे से उन्हें मुँह के अंदर खींच लेता था।

वह मेरे सिर पर हाथ फेरती थी और मेरी कमर में हाथ डाल मुझे अपने मुँह पर खींच लेती थी, उसकी ‘आ…ह’ की आवाजों में कोमलता और समर्पण थे, उसका माँसल बदन मेरे आकार में ढलकर मुझसे मिलता था।

उसके बदन के अन्य हिस्सों में भी स्तनों को दबाने-सहलाने की किस्म का आनन्द आता था।

हमने एक-दूसरे को होंठों को पिया, बगलों को चाटा, पसीने को सूँघा, कहीं कोई घिन या वर्जना महसूस नहीं की।

हमारे कमर के नीचे कपड़े क्रमशः ही खुले, साए की डोर और पैंट की चेन एक साथ खुले, पैंटी और चड्डी की साथ-साथ विदाई हुई, जैसे दूल्हा और दुल्हन साथ विदा होकर जा रहे हों।

उसने मुझे ‘यू आर लवली’ कहा था और उस वक्त मुझे ‘तुम सुंदर हो’ कहना भी झूठ नहीं लगा था।

जब वह मेरे ऊपर होती थी तो वह मुझ पर छा ही जाती थी और जब मैं उसके ऊपर होता था तो उसका स्वामी, उसको काबू में रखने वाला मालिक महसूस करता था।

स्वाभाविक था कि हम 69 की मुद्रा में उतरते, दोनों में एक दूसरे के लिए कोई हिचक नहीं थी, अपने अपने जीवन साथियों के साथ इसके लिए प्रशिक्षित थे।

उसके भगोष्ठों में भराव और गहराई अधिक थी, उन्हें उंगलियों से फैलाना पड़ता था और मेरे होंठों के चारों तरफ घिराव का एहसास ज्यादा होता था, उनमें मेरे होंठ ज्यादा डूबते थे, उसकी भगनासा भी बड़ी थी, जिस पर होंठ अच्छे से कसते थे।

उसे भी मेरे अपेक्षाकृत छोटे लिंग को चूसने में सुविधा हो रही थी।

यह मिलन के क्षणों में ही उत्पन्न हो जाने वाला प्यार था। सेक्स की क्रिया में वह मुझे और मैं उसे प्यार अधिक कर रहे थे।

मैं एक बार स्खलित होकर धैर्यपूर्वक करने की स्थिति में था जबकि वह अपने कुशल मुख-संचालन से मेरे धैर्य की परीक्षा ले रही थी।
 

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