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अधखिला फूल (उपन्यास) /'हरिऔध'

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बासमती के चले जाने पर देवहूती अपनी कोठरी में से निकली, कुछ घड़ी आँगन में टहलती रही, फिर डयोढ़ी में आयी। वहाँ पहुँच कर उसने देखा, बासमती पहरे के भीलों से बातचीत कर रही है। यह देखकर वह किवाड़ों तक आयी-और बहुत फुर्ती के साथ किवाड़ों को लगाकर-फिर भीतर लौट गयी। जब देवहूती अपनी कोठरी के पास पहुँची-देखा उस कोठरी में से एक जन आँगन की ओर निकला आ रहा है। यह देखकर वह भौचक बन गयी-सोचा राम-राम करके अभी बासमती से पीछा छूटा है-फिर यही बिपत कहाँ से आयी। बड़ा अचरज उसको इस बात का था-यह कोठरी में आया तो कैसे आया ? उसमें तो कहीं से कोई पथ नहीं जान पड़ता!!! देवहूती घबराने को तो बहुत घबरायी-पर उसके जी को कुछ ढाढ़स भी हुआ। उसने पहचाना यह वही जन है-जिसने उस अंधियाली रात में उसके कोठे पर कामिनीमोहन से उसका सत बचाया था। देवहूती यह सब जान-बूझकर कुछ सोच रही थी, इसी बीच उसने पास आकर कुछ दूर से पूछा, देवहूती! मुझको पहचानती हो?

देवहूती ने सर नीचे करके कहा-क्यों नहीं पहचानती हूँ! जिसने प्राण से भी प्यारे मेरे धर्म की रक्षा की, क्या मैं उस को भूल सकती हूँ!

आये हुए जन का नाम देवस्वरूप है, यह आप लोग अब समझ गये होंगे। देवहूती की बातों को सुनकर उसने कहा-मैं तुमसे कुछ बातचीत करने के लिए यहाँ आया हूँ-मुझ से बातचीत करने में तुमको कुछ आनाकानी तो नहीं है? मैं नहीं चाहता बिना पूछे तुमसे सारी बातें कहने लगूँ।

देवहूती-मुझको चेत है-आपने उस दिन कहा था, जो लोग धर्म की रक्षा के लिए कभी-कभी इस धरती पर दिखलाई देते हैं-मैं वहीं हूँ। जो सचमुच आप वही हैं तो आपसे बातचीत करने में मुझको कुछ आनाकानी नहीं है। पर बात इतनी है, इस भाँति आपसे बातचीत करके मुझको इस सुनसान घर में जो कोई देख लेगा-तो न जाने क्या समझेगा। जो कोई न देखे तो धर्म के विचार से भी किसी सुनसान घर में किसी पराई स्त्री का पराये पुरुष के साथ रहना और बातचीत करना अच्छा नहीं है। आप बड़े लोग हैं, इन बातों को सोचकर जो अच्छा जान पड़े कीजिए, मैं आपसे बहुत कुछ नहीं कह सकती।

देवस्वरूप-मैं यह जानता हँ, बासमती यहाँ आयी हुई है-दूसरी बातें जो तुम कहती हो मुझको भी उनका वैसा ही विचार है। मैं कभी यहाँ न आता, पर एक तो मैंने देखा, बिना अन्न-पानी तुम मर जाना चाहती हो। दूसरे आज अभी एक ऐसी बात हुई है, जिससे तुम्हारी सारी बिपत कट गयी। मुझको यह बात तुमको सुनानी थी, इसीलिए मुझको यहाँ आना पड़ा।

देवहूती-वह कौन सी बात है जिससे मेरी सारी बिपत कट गयी? आप दया करके उसको बतला सकते हैं?

देवस्वरूप-कामिनीमोहन कल्ह रात में ही बासमती को यहाँ छोड़कर घर चला गया था। आज दिन निकले वह गाँव से इस बन की ओर घोड़े को सरपट फेंकता हुआ आ रहा था। इसी बीच एक गीदड़ एक झाड़ी से दूसरी झाड़ी में ठीक घोड़े के सामने से होकर दौड़ता हुआ निकल गया। घोड़ा अचानक चौंक पड़ा-और उस पर से धड़ाम से कामिनीमोहन नीचे गिर पड़ा। गिरते ही उसका सर फट गया-और वह अचेत हो गया। उसके लोग जो पीछे आ रहे थे-घड़ी भर हुआ उसको उठाकर घर ले गये। जैसी चोट उसको आयी है-उससे अब उसके बचने का कुछ भरोसा नहीं है-मैं इसी से कहता था, तुम्हारी सारी बिपत कट गयी।

देवहूती-कामिनीमोहन ने अपनी करनी का फल पाया है, और मैं क्या कहूँ!!! पर सचमुच क्या आप कोई देवता हैं, जो इस भाँति बिना किसी स्वार्थ के दूसरों का दुख दूर करते फिरते हैं!

देवस्वरूप-मैं देवता नहीं हूँ-एक बहुत ही छोटा जीव हूँ। उस दिन मैंने यह बात इसलिए कही थी-जिससे कामिनीमोहन डरकर पाप करना छोड़ देवे।

देवहूती-अभी आपको मुझसे कुछ और कहना है?

देवस्वरूप-दो बातें कहनी हैं। एक तो तुम कुछ खाओ पीओ-दूसरे यहाँ का रहना छोड़कर घर चलो। तुम्हारी माँ की तुम्हारे बिना बुरी गत है-उनकी दशा देखकर पत्थर का कलेजा भी फटता है।

देवहूती-आपका कहना सर आँखों पर-आप में बड़ी दया है। पर आप जानते हैं स्त्रियों का धर्म बड़ा कठिन है! आपने मेरी बहुत बड़ी भलाई की है-मेरा रोआँ-रोआँ आपका ऋणी है। पर इतना सब होने पर भी आप निरे अनजान हैं-आप जैसे अनजान और बिना जान-पहचान के पुरुष के साथ मैं कहीं आ-जा नहीं सकती। दूसरे जो दो दिन पीछे मैं इस भाँत अचानक घर चली चलूँ तो माँ न जाने क्या समझेंगी। अभी तो उन्हांने यही सुना है-मैं डूबकर मर गयी-रो कलप कर उनका मन मान ही जावेगा। पर जो कहीं उनके मन में मेरी ओर से कोई बुरी बात समायी-तो अनर्थ होगा-मेरा उन का दोनों का जीना भारी होगा। रहा कुछ खाना-पीना, इसके लिए अब आप कुछ न कहें। मैं समझ-बूझ कर जो करना होगा, करूँगी।

देवस्वरूप-बात तुम बहुत ठीक कहती हो-मैंने तुम्हारी इन बातों को सुनकर बहुत सुख माना। पर इतना मुझको और कहना है-इस बन से तुम्हारा छुटकारा बिना मेरी परतीत किए नहीं हो सकता।

देवहूती-क्या मैं आपकी परतीत नहीं करती हूँ-यह आप न कहें। मेरा धर्म क्या है, इस बात को आप सोचिए। और बतलाइए मुझको क्या करना चाहिए। इस जग में सैकड़ों बातें लोग ऐसी करते हैं-जिनमें ऊपर से देखने में उनका कोई अर्थ नहीं होता-पर समय पाकर उन्हीं बातों में उनकी बड़ी दूर की चाल पायी जाती है। आज जिसको किसी की भलाई के लिए अपना तन मन धन सब निछावर करते देखते हैं-कल्ह उसी को उसके साथ अपने जी की किसी बहुत ही छिपी चाल के लिए ऐसा बुरा बरताव करते पाते हैं-जिसको देखकर बड़े पापी के भी रोंगटे खड़े होते हैं। ये बातें ऐसी हैं जिनका मरम आप जैसे बड़े लोग भी ठीक-ठीक नहीं पाते। स्त्रियों क्या हैं जो इन भेद की बातों का ओर-छोर पा सकें। इसीलिए उनको यह एक मोटी बात बतलायी हुई है-अपने इने-गिने जान-पहचान के लोगों को छोड़कर दूसरे को पतिआना उनका धर्म नहीं है। मैं आपसे इन्हीं बातों को सोचने के लिए कहती हँ। रहा इस बन से छुटकारा पाना। यह एक ऐसी बात है जिसके लिए मुझको तनिक घबराहट नहीं है-अपजस के साथ घर लौटने से जान के साथ बन में मरना अच्छा है।

देवस्वरूप-मैं तुम्हारे इन विचारों को सराहता हूँ। तुम्हारे धीरज करने से ही तुम्हारी सारी बिपत कटती है।

देवस्वरूप के इतना कहते ही उसी कोठरी में से एक जन और देवहूती की ओर आता दिखलायी पड़ा। इसके सिर पर बड़ी-बड़ी जटाएँ थीं, उसकी बहुत ही घनी उजली और लम्बी दाढ़ी थीं, जो छाती पर भोंड़ेपन के साथ फैली थी, मुखड़े पर तेज था, पर यह तेज निखरा हुआ तेज न था, इसमें उदासी की छींट थी। माथे में तिलक, गले में तुलसी की माला, बाएँ कंधो पर जनेऊ और हाथ में तूमा था। ऍंचले की भाँति एक धोती कमर से बँधी थी-जो कठिनाई से ठेहुने के नीचे तक पहुँचती थी। स्वभाव बहुत ही सीधा और भला जान पड़ता था, भलमनसाहत रोएँ-रोएँ से टपकती थी। जब यह देवहूती के पास पहुँचा, देवस्वरूप ने कहा, देवहूती इनकी ओर देखो, इनको मत्था नवाओ, और अब तुम इनके साथ जाकर कुछ खाओ-पीओ, मैं देखता हँ तुम्हारा जी गिरता जाता है-इनके साथ जाने में भी क्या तुमको कोई अटक रहेगी?

देवहूती ने बड़ी कठिनाई से सर उठाकर इस दूसरे जन की ओर देखा, देखते ही चौंक उठी मानो सोते से जाग पड़ी। उस के जी में बड़ा भारी उलट फेर हुआ-कुछ घड़ी वह ठीक पत्थर की मूर्ति बन गयी। पीछे उसकी आँखों से आँसू बह निकले। देवस्वरूप ने उस दूसरे जन का भी रंग कुछ पलटता देखकर कहा-देखो इन सब बातों का अभी समय नहीं है-इस घड़ी चुपचाप यहाँ से निकल चलना चाहिए, फिर जैसा होगा, देखा जावेगा। यहाँ रहने में भी अब कोई खटका नहीं है-बासमती कुछ कर नहीं सकती। पर जब तक कामिनीमोहन का क्या हुआ, यह ठीक न जान लिया जावे, तब तक किसी हाथ आयी बात में चूकना अच्छा नहीं!। देवस्वरूप की बातों को सुनकर दूसरा जन कोठरी की ओर चला-देवहूती बिना कुछ कहे उसके पीछे चली। इन दोनों के पीछे देवस्वरूप चला-तीनों कोठरी में आये।

कोठरी में पहुँचकर देवहूती ने देखा वहाँ की धरती में एक सुरंग है-और उसी सुरंग में से होकर नीचे उतरने को सीढ़ियाँ हैं। इसी पथ से होकर ये तीनों जन नीचे उतरे, नीचे उतरकर देवस्वरूप ने वहीं लटकती हुई एक लम्बी रस्सी को पकड़कर खींचा, उसके खींचते ही सुरंग का मुँह मुँद गया-और नीचे ऊपर पहले जैसा था-ठीक वैसा ही हुआ। पीछे वह तीनों जन नीचे ही नीचे बन में एक ओर निकल गये।
 
दिन बीतता है, रात जाती है, सूरज निकलता है, फिर डूबता है, साथ ही हमारे जीने के दिन घटते हैं। हम लोगों से कोई पूछता है, तो हम लोग कहते हैं, मैं बीस बरस का हुआ, कोई कहता है, मैं चालीस का हुआ। कहने के समय तनिक भी हिचक नहीं होती-मुखड़ा वैसा ही हँसता रहता है-मानो हम लोग जानते ही नहीं मरना किसे कहते हैं; पर सच बात यह है-हम बीस बरस-चालीस बरस-के नहीं होते। हमारे जीने के दिन में से-बीस बरस-चालीस बरस-घट जाते हैं। जो हम को पचास बरस जीना है-तो अब हमारा दिन पूरा होने में-तीस बरस-और दस बरस-और रह जाते हैं। दूर तक सोचा जावे तो इसमें हिचकने और मुँह के उदास बनाने की कोई बात है भी नहीं-मरना इतना डरावना नहीं है, जितना लोग समझते हैं। सच तो यों है मरने ही से जीने का आदर है-जो जग में मरना न होता-लोग जीने से घबरा जाते, न तो खाना कपड़ा मिलता, न ठहरने को ठौर मिलती, न रहने को घर अंटता, उस समय धरती पर कैसा लौट फेर होता-यह बात सोचने से भी जी काँपता है। पर हम बहुत दूर की बात नहीं कहते हैं-हम उसी बात को दिखलाते हैं जिसको सोचकर सभी मरने से डरते हैं। धरती एक अनोखी ठौर है, इस पर जनम से लेकर एक-न-एक बात में सभी उलझ जाते हैं। जिस ढंग का जिसका जी होता है-प्यार करने के लिए वैसा ही बहुत कुछ उसको यहाँ मिल जाता है। एक चितेरे को लो, देखो वह यहाँ के फल फूल पत्तियों, चमकते हुए सूरज, प्यारी किरणों वाले चाँद, जगमगाते हुए तारों, सुथरे जलवाली झीलां, हरे भरे जंगलों, उजले धाौले पहाड़ों, कलकल बहती हुई नदियों, चाँद से मुखड़ेवाली नबेलियों, बाँके-बाँके बीरों और दूसरी सहज ही जो लुभानेवाली छटाओं को कितना प्यार करता है। इनको लेकर वह कैसी-कैसी काट छाँट करता है-कैसे-कैसे बेल बूटे बनाता है। दिन रात होती है, सूरज उगता और डूबता है, पर उसको इन कामों से छुट्टी नहीं। वह देखता सब कुछ है, समय पर करता सब कुछ है, पर जैसा चाहिए उसका जी इधर नहीं रहता। वह अपनी धुन में डूबा हुआ, अपनी ही काट-छाँट में लगा रहता है। कितनी मूर्तियाँ बनाता है-कितने बन, परबत, नदी, झीलों की छवि उतारता है। पर फिर भी सोचता है, अभी मुझको बहुत कुछ करना है। अभी मैंने यह मूर्ति नहीं बनायी, अभी तक मूर्ति में रंग भरना है, इस मूर्ति के गालों की लाली ठीक नहीं उतरी, भौंहें भी ठीक-ठीक नहीं बनीं, आँखों के बनाने में तो मुझसे बहुत ही चूक हुई, तिरछी चितवन क्या योंही दिखलायी जाती है!!! वह यही सब सोचता रहता है, इसी बीच काल उसको आ घेरता है-मन की बात मन में ही रह जाती है, वह कितनी बातों के लिए छटपटाता है-पर करे तो क्या करे-विष की सी घूँट घोंट कर वह काल का सामना करता है-और बहुत सी चाहों को जी में रखे हुए इस धरती से उठ जाता है। इसी भाँति कोई घर बार बाल बच्चों में उलझा रहता है, कोई पूजा पाठ और जप तप में लगा रहता है, कोई राजकाज और धन धरती में फँसा होता है, कोई गाने बजाने और हँसी खेल में मतवाला होता है, पर सभी के ऊपर काल अचानक टूटता है, और सभी को बरबस इस धरती से उठा ले जाता है-सभी अपना काम अधूरा छोड़ते हैं, पछताते हैं, पर कुछ कर नहीं सकते।

कामिनीमोहन की भी आज ठीक यही दशा है-वह खाते पीते, सोते जागते, भोले-भाले मुखड़े का ध्यान करता, जहाँ रसीली बड़ी-बड़ी आँखें देखता वहीं लट्टू होता, गोरे-गोरे हाथों में पतली-पतली चूरियाँ उसको बावला बनातीं, सुरीले कण्ठ का बोल सुनकर वह अपनी देह तक भूल जाता, गरदाया हुआ जोबन उसके कलेजे में पीर उठाता-उसकी इन्हीं बातों ने उसको नई-नई जवान स्त्रियों का रसिया बनाया। कितनी स्त्रियों का सत उसके हाथों खोया गया, कितनी स्त्रियों उसके हाथों मिट्टी में मिलीं, पर उसकी चाह न घटी, आजकल वह देवहूती पर मर रहा था, बिना देवहूती चारों ओर उसकी आँखों के सामने अंधेरा था। पर काल ने उसकी इन बातों को न सोचा, आजकल वह काल के हाथों पड़ा है, काल को उसकी तनिक पीर नहीं है, आज वह उसको धरती से उठा लेना चाहता है।

कामिनीमोहन अपने घर की एक कोठरी में एक पलँग पर पड़ा हुआ आँखों से आँसू बहा रहा है। वहीं दस-पाँच जन और बैठे हुए हैं। दो-चार जन उसकी सम्हाल कर रहे हैं-गाँव के पुराने बैद पास बैठे हुए देखभाल कर रहे हैं। पर उ]=नके मुखड़े पर उदासी छायी हुई है-वे कामिनीमोहन की दशा घड़ी-घड़ी बिगड़ते देखकर हाथ मल रहे हैं, पर उनसे कुछ करते नहीं बनता। कामिनीमोहन पहले अचेत था, पर बैद ने दो-एक बलवाली ऐसी औषधों खिलायी हैं, जिससे अब वह चेत में है। पर चेत में होने ही से क्या होता है-लहू सर से इतना निकल गया है और चोट इतनी गहरी आयी है-जिससे अब लोग उसकी घड़ी गिन रहे हैं-कामिनीमोहन के पास जो दस-पाँच जन बैठे हैं उनमें कुछ साधु और कुछ घरबारियों के भेस में। एक जन और बैठा है। इसका मुखड़ा भी उदास है, जी पर कुछ चोट सी लगी जान पड़ती है, आँखें भी थिर हैं, पर कभी-कभी बिजली की कौंध की भाँत मुखड़े पर तेज भी झलक जाता है। साथ ही मुँह की एक ठण्डी साँस निकल कर बाहर की पवन में मिल जाती है। इसने कामिनीमोहन को अपनी ओर निराशभरी दीठ से बार-बार ताकते देखकर कहा, क्या आप मुझको पहचानते हैं?

कामिनीमोहन-हाँ! पहचानता हूँ! देवस्वरूप आपका नाम है। उस दिन आप देवहूती की बिपत में सहाय हुए थे, क्या आज मुझको बिपत से उबारने के लिए आप यहाँ आये हैं?

देवस्वरूप की आँखों में पानी आया, उन्होंने कहा, मेरे हाथों जो आपका कुछ भला हो सके तो मैं जी से उसको करना चाहता हँ, आपकी दशा देखकर मुझको बड़ा दुख है पर क्या करूँ, मेरा कोई बस नहीं चलता। उस दिन देवहूती को बचाने के लिए जी पर खेल गया था, आज आपके लिए भी अपने को जोखों में डाल सकता हूँ, पर कैसे आपका भला होगा-यह मुझको बतलाया जाना चाहिए। मैं, जितने जीव हैं सबका भला करना, सबको बिपत से उबारना, अपना धर्म समझता हूँ-आपका भला करने में क्यों हिचकूँगा।

कामिनीमोहन-आप बड़े लोग हैं जो ऐसा कहते हैं-सच तो यों है, अब मैं किसी भाँति नहीं बच सकता-मेरे दिन पूरे हो गये। पर आप किसी भाँति यहाँ आ गये हैं, तो मैं आपसे दो-चार बातें पूछना चाहता हूँ, क्या आप उनको बतला सकतेहैं?

देवस्वरूप-मैंने जो कुछ किया है-धर्म के नाते किया है, धर्म में खोट नहीं होती-आप पूछें, मैं सब बातें सच-सच कहूँगा।

कामिनीमोहन ने इतना सुनकर, जो लोग कोठरी में बैठे थे बैद छोड़ उन सब लोगों से कहा, आप लोग थोड़ी बेर के लिए बाहर जाइये। उन लोगों के बाहर चले जाने पर उसने देवस्वरूप से कहा-पहले यह बतलाइये उस दिन आप देवहूती के कोठे पर कैसे पहुँचे, क्या आप देवहूती के कोई हैं? जो आप देवहूती के कोई नहीं हैं-तो आपने मेरी भेद की बातों को कैसे जान लिया।

देवस्वरूप-बड़ों ने कहा है पाप कभी नहीं छिपता, क्यों उन्हांने ऐसा कहा है, यह बात थोड़ा सा विचार करने पर अपने आप समझ में आती है। सच बात यह है-जिन पापों को हम बहुत छिपकर करते हैं, उनके भी देखने-सुननेवाले मिल जाते हैं। एक ही समय सब ओर न देखनेवाली हमारी आँखें चूकती हैं-दूसरी ओर लगा हुआ हमारा कान पास की बात भी नहीं सुनता। पर हमारे कामों की ओर लगी हुई देखनेवालों की आँखें-हमारी बहुत ही धीरे कही गयी बातों की ओर लगे हुए सुननेवालों के कान अपने-अपने अवसर पर नहीं चूकते। बहुत ही चुपचाप ये सब अपना काम करते हैं-और हमारी बहुत सी बातों को जानकर हमारी बहुत सी होनेवाली बुराइयों का हाथ बाँटते हैं। पीछे इन्हीं देखने सुननेवालों से हमारे पापों का भण्डा फूटता है। जिस दिन आपने रात में मुझको देवहूती के कोठे पर पाया, उसी दिन दोपहर को मैं देवहूती के घर के पासवाले पीपल के पेड़ के नीचे बैठा था। इस पीपल के पेड़ के पास एक पक्का कुआँ है-इसी कुएँ पर मुझको दो स्त्रियों बात करती दिखलाई पड़ीं। उनमें एक बासमती थी, और दूसरी भगमानी। उन दोनों में बातचीत धीरे-धीरे हो रही थी, पर मैं सब सुनता था। एक दो बार बासमती की दीठ मेरी ओर फिरी थी, पर उसने मुझको देखकर भी नहीं देखा। एक बार जब उसकी दीठ मुझपर पूरी पड़ी, तो वह कुछ चौंकी, पर उसी क्षण वह समझ गयी, मैं बटोही हूँ। जो मैं गाँव का होता तो उसको कुछ उलझन होती भी, पर बटोही समझकर वह मेरी ओर से निचिन्त हो गयी। और जो बातें भगमानी से कहने को रह गयी थीं, उनको भी उस भाँति धीरे-धीरे उसने उससे कहा, पीछे दोनों वहाँ से चली गयीं। जितनी बातें बासमती और भगमानी में हुईं-उनको सुनकर मैं उस दिन होनेवाली सब बातों को भली-भाँति जान गया, और उसी समय अपने मन में ठाना, जैसे हो एक भले घर की स्त्री का सत बचाना चाहिए। यह सब सोचकर मैं छ: घड़ी रात गये, देवहूती के घर के पिछवाडे एक ठौर ओलती के नीचे आकर खड़ा हुआ। आप अपने दोनों साथियों के साथ ठीक मेरे पास से होकर निकले थे-पर आपने मुझको नहीं देखा। जिस खिड़की से होकर हम और आप ऊपर गये थे-वह खिड़की उस ठौर के बहुत पास थी। आपको दो और साथियों के साथ देखकर मैं घबराया, पर कुछ ही बेर में मेरी विपत टल गयी, जब आपके दोनों साथी आपके गहनों का डब्बा लेकर वहाँ से नौ दो ग्यारह हुए। उन दोनों के चले जाने पर मैं कोठे पर चढ़ा। कोठे पर जो कुछ हुआ, वह सब आप जानते हैं। मैंने बातचीत के समय आपसे कहा था, जहाँ वह दोनों गये वहाँ तू भी जा, पर उस समय उनको भगा हुआ जानकर मैंने आपको घबड़ा देने के लिए ऐसा कहा था, मेरा उस समय ऐसा कहने का कोई दूसरा अर्थ न था।

कामिनीमोहन-एक बात तो हुई-दूसरी बात मुझको यह पूछनी है-क्या इस गाँव के बन में भी आप आ जा सकते हैं? क्योंकि कल्ह जब मैं बन में गया था, तो उसमें कई बार मैंने गाना होते सुना। यह गाना आप ही के गले से होता जान पड़ता था; क्योंकि आपके गले को मैं भली-भाँति पहचानता हूँ।

देवस्वरूप-उस दिन मैंने जो कुछ देखा सुना, उससे मेरे जी में बहुत बड़ी उलझन पड़ गयी। सब बातें जानने के लिए मेरा जी उकताने लगा। पर मुझको कोई बात ऐसी न सूझी, जिस से मेरा काम निकल सके। इसलिए मैं गाँव के बाहर धुनी रमाकर साधुओं के भेस में बैठा, यहाँ मुझको तुम्हारी बहुत सी बातें जान पड़ीं। पर देवहूती पर तुम्हारा जी आया हुआ है-और तुम उसको फाँसना चाहते हो, ये बातें मैंने किसी से नहीं सुनीं। हाँ, तुम्हारी चालचलन की जितनी बुराई सुनी गयी, उतना ही पारबती और देवहूती के चालचलन को लोगों को सराहते सुना। लोगों ने तुम्हारी और बातों के साथ तुम्हारे बन के अड्डॆ की चर्चा भी मुझसे की। सभों ने मुझसे यही कहा, न तो उसमें कोई जा सकता है औन न वहाँ का भेद कोई जानता है, पर इतना सभी कहते, बन के सहारे कामिनीमोहन बड़ा अनर्थ करता है। यह सब सुनकर मैंने अपने जी में यह दो बातें ठानी। एक तो जैसे हो आपका चालचलन ठीक किया जावे-दूसरे बन का सारा भेद जान लिया जावे। पहले मैंने बन का भेद जानना चाहा-और दो दिन पीछे गाँव से बन की ओर चला। बन का भेद जानने में मुझको पूरा एक महीना लगा। मैंने बन के सब भीलों को अपना चेला बनाया, और उन सबों ने बन का सारा भेद मुझको बतला दिया। बन में मिट्टी के नीचे खंडहरों में से होकर बहुत ही सुरंगें निकली हुई हैं-मैंने उन भीलों के सहारे एक-एक करके उन सबको छान डाला। जिस दिन मैं सब कुछ देखभालकर गाँव की ओर लौट रहा था, मैंने दूर से आपको बन में आते देखा, और समझ गया-आप किसी बुरे काम के लिए ही बन में आ रहे हैं। मेरा दूसरा काम आपको पाप से बचाना था, इसलिए गाने के बहाने मैंने उस बेले ऐसी सीख आपको दी, जिसको सुनकर आप पाप करने से हिचकें। पर दुख की बात है-उस दिन के मेरे किसी गीत ने काम नहीं किया, और आप अपनी बातों पर वैसे ही जमे रहे। जब आप मुझको बड़ के नीचे खोज रहे थे, तो मैं वहीं मिट्टी के नीचे एक सुरंग में था। जब आपसे और देवहूती से बातचीत उस खंडहरवाले घर में हुई, तब भी मैं उसी कोठरी के नीचे की एक सुरंग में खड़ा सब सुनता रहा, और यहीं से बाहर निकलकर आपकी बात पूरी होने पर मैंने अपना सबसे पिछला गीत देवहूती को ढाढ़स बँधाने के लिए गाया। आप कह सकते हैं तुम एक बटोही थे, तुमको इन बातों से क्या काम था, पर सच बात यह है, मैंने जनम भर अपने लिए ऐसे ही कामों का करना ठीक किया है, मुझको ऐसे कामों को छोड़ दूसरा काम नहीं है, और इसीलिए मैंने जिस दिन आपके गाँव में पाँव रखा, उसी दिन अपने को जोखों में डाल दिया था।

कामिनीमोहन ने एक ऊँची साँस भरकर कहा, आप कह सकते हैं मरती बेले मुझको इन बातां से क्या काम था, पर सच बात यह है, मुझको देवहूती के चालचलन का खटका था, आपको इस भाँति उसका सहाय होते देखकर ही मेरे जी में यह खटका हुआ था। मैं अपने जी को बहुत समझाता था, नहीं, देवहूती का चालचलन कभी बुरा नहीं है-पर यह न मानता। अब आप की बातों को सुनकर मेरा सब भरम दूर हुआ-अब मैं अपना काम करके मरूँगा।

इतना कहकर कामिनीमोहन ने एक बात देवस्वरूप से कही-देवस्वरूप ने भी उसको अच्छा कहा। पीछे गाँव के बड़े-बड़े लोग बुलाये गये। सब लोगों के आ जाने पर एक काम कामिनीमोहन ने बहुत धीरज के साथ किया। पर ज्यों ही वह काम पूरा हुआ, कामिनीमोहन की साँस ऊपर को चलने लगी, उसकी आँखें बिगड़ गयीं, औेर रह-रह कर वह चौंक उठने लगा। उसकी यह गत देखकर देवस्वरूप ने कहा, कामिनीमोहन! तुम रह-रह कर इतना चौंकते क्यों हो? कामिनीमोहन की पलकें उठती न थीं-पर उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और कहा, बड़ी डरावनी मूर्तियाँ सामने देख रहा हूँ-क्या यमदूत इन्हीं का नाम है! मैं इनके डर से काँप रहा हूँ। मुझको जान पड़ता है, मुझको मारने के लिए वह सब मेरी ओर लपक रहे हैं। ओहो! कैसे-कैसे डरावने हथियार उन लोगों के हाथों में हैं। आप इनके हाथों से मुझको बचाइए, क्या यह सब मुझको नरक में ले जावेंगे? मैं इन्हीं सबों से डरकर चौंक उठता हूँ। यह कहते-कहते कामिनीमोहन की आँखें फिर मुँद गयीं।

देवस्वरूप को कामिनीमोहन की बातें सुनकर बड़ा दुख हुआ। उन्होंने जी में सोचा, अभी कल्ह तक ये कह रहे थे, नरक स्वर्ग कहीं कुछ नहीं है, परमेश्वर भी एक धोखे की टट्टी है, और आज इनकी यह गत है, सच है, मरने के समय बड़े पापी की भी आँखें खुलती हैं। जब तक बने दिन होते हैं, मनुष्य बेबस नहीं होता, तभी तक उसको सब सीटी पटाक रहती है। बिपत पड़ने पर उसका जी कभी ठिकाने नहीं रहता। पर यह माटी का पुतला इन बातों को पहले नहीं सोचता, दु:ख इतना ही है। इतना सोचकर देवस्वरूप ने कहा-कामिनीमोहन! राम-राम कहो, राम का नाम सब बिपतों को दूर करता है।

कामिनीमोहन-बान लगाने से ही सब कुछ होता है-जैसी बान सदा की होती है-काम पड़ने पर वही बान काम में आती है। मैंने आज तक राम का नाम जपने की बान नहीं डाली, इसलिए इस बेले भी मुझसे राम-राम नहीं कहते बनता। मैंने जो पाप किये हैं-वे एक-एक करके मेरी आँखों के सामने नाच रहे हैं। मेरा जी बेचैन हो रहा है-अपने पापों का मुझको क्या फल मिलेगा, यह सोचकर मेरा रोआँ-रोआँ कलप रहा है, गले में काँटे पड़ रहे हैं, जीभ सूख रही है, तालू जल रहा है-मैं राम-राम कहूँ तो कैसे कहूँ।

इतना कहते-कहते कामिनीमोहन चिल्ला उठा, मुझको बचाओ, बचाओ, ये काले-काले, डरावने, टेढ़े-टेढ़े दाँतवाले यमदूत मुझको मारे डालते हैं। फिर कहा, अरे बाप! अरे बाप!! मरा! मरा!!! क्या ऐसा कोई माई का लाल नहीं है, जो मुझको इनके हाथों से बचावे!!! आह! आह!! जी गया! जी गया!! मेरे रोएँ रोएँ में भाले क्यों चुभाये जा रहे हैं! मेरी जीभ क्यों ऐंठी जाती है! मेरी बोटी-बोटी क्यों काटी जाती है! मेरा कलेजा क्यों निकाला जाता है! लोगो दौड़ो! लोगो दौड़ो!! अब तो नहीं सहा जाता!!!

देवस्वरूप ने कामिनीमोहन के सर पर हाथ रखकर कहा-कामिनीमोहन! राम-राम कहो, तुम्हारी सब पीड़ा दूर होगी। कामिनीमोहन ने कहा, रा-म रा-म-फिर कहा, उहँ! उहँ!! रहो! रहो!! अरे मेरे गले में जलते-जलते लोहे के छड़ क्यों डाले देते हो!!! अरे अरे! यह क्या! यह क्या!! हाय बाप! हाय बाप!! मार डाला! मार डाला!!!

देवस्वरूप की आँखों से कामिनीमोहन की दशा देखकर आँसू चलने लगे-वह कामिनीमोहन से कुछ न कहकर आप उसकी खाट पर बैठ गये-धीरे-धीरे उसके कान में राम-राम कहने लगे-पर कामिनीमोहन छटपटाता इतना था, जिससे वह भली-भाँति उसके कानों में राम-राम भी नहीं कह सकते थे। अब कामिनीमोहन की साँस बड़े बेग से ऊपर को खिंच रही थी-गले में कफ आ गया था-साँस के आने-जाने में बड़ी पीड़ा हो रही थी। आ:! आ:!! उहँ! उहँ!! करने छोड़ वह कुछ कह भी नहीं सकता था। गला घर्र घर्र कर रहा था। इतने में उसकी देह को एक झटका सा लगा-आँखों के कोये फट गये-और सड़ाके से साँस देह के बाहर हो गयी। सारे घर में हाहाकार मच गया।
 
एक चूकता है-एक की बन आती है। एक मरता है-एक के भाग्य जागते हैं। एक गिरता है-एक उठता है। एक बिगड़ता है-एक बनता है। एक ओर सूरज तेज को खोकर पश्चिम ओर डूबता है-दूसरी ओर चाँद हँसते हुए पूर्व ओर आकाश में निकलता है। फूल की प्यारी-प्यारी जी लुभावानेवाली पंखड़ियाँ एक ओर झड़ती हैं-दूसरी ओर अपने हरे रंग से जी को हरा करते हुए फल सर निकालते हैं। इधर पतझड़ होती है-उधर नई-नई कोपलों से पौधे सजने लगते हैं। इधर रात की अंधियाली दूर होती है-उधर दिन का उँजियाला फैलने लगता है। जग का यही ढंग सदा से चला आया है। कामिनीमोहन मर गया, दो-चार दिन गाँव में उसकी बड़ी चर्चा रही, कोई उसके लिए आठ-आठ आँसू रोता रहा, कोई उस पर गालियों की बौछार करता रहा, कोई उसको भला कहता रहा, कोई उसको बुरा बताता रहा। जो उसके बैरी मित्र कुछ न थे, वे उसके जवान मरने पर आँसू बहाते, पर जब उसकी बुरी चालों को सुनते, नाक-भौं सिकोड़ते, कहते-हाय! कामिनीमोहन! चार दिन के जीने पर तुम इतने आपे से बाहर हो गये थे, तुमको सोचना चाहिए था। मरने पीछे जग में जस और अपसज भी रह जाता है। दो-चार दिन पीछे लोगों को ये सारी बातें भूल गयीं। धीरे-धीरे कामिनीमोहन की ठौर एक दूसरा जन लोगों के जी में घर करने लगा, गाँव में जहाँ देखो वहीं उसी की चर्चा होती-ये हमारे देवस्वरूप थे। ज्यों-ज्यों वे कामिनीमोहन की क्रिया बिध के साथ लगे, ज्यों-ज्यों वे गाँव के लोगों के साथ दया और प्यार से बरतने लगे, त्यों-त्यों लोगों का जी उनकी ओर खिंचने लगा।

धीरे-धीरे कामिनीमोहन का दसवाँ हुआ, फिर तेरहवीं हुई, देवस्वरूप ने कामिनीमोहन का सब काम पूरा-पूरा कराया, क्रिया कर्म की कोई बिध उठा न रखी। जब सब कर्म हो चुका, तो एक दिन एक चौपाल में सारा गाँव इकट्ठा हुआ, गाँव का कोई मुखिया ऐसा न था, जो उस समय वहाँ न पहुँचा हो। जब सब लोग आकर अपनी-अपनी ठौरों बैठ चुके देवस्वरूप उठकर खड़े हुए, और कहा-कामिनीमोहन ने मरते समय अपने धन के लिए कुछ लिखापढ़ी की है, और जो लोग उस समय वहाँ थे उनसे कहा था, मेरा सब कर्म हो जाने पर एक दिन गाँव के सब लोगों को इकट्ठा करना, और जो लिखावट आज मैं लिखता हूँ उसको पढ़कर सबको सुनाना, पीछे इस लिखावट में जैसा लिखा है वैसा करना। आज आप लोग उसी लिखावट को सुनने के लिए यहाँ बुलाये गये हैं। आप लोगों के गाँव के पाँच बड़े मुखियाओं ने जिनको आप लोग यहाँ बैठे देख रहे हैं, उस लिखावट को मुझको पढ़ने के लिए दिया है-वह लिखावट यह मेरे हाथ में है। मैं अब इसको पढ़ता हूँ-आप लोग इसको सुनें। इतना कहकर देवस्वरूप उस लिखावट को पढ़ने लगे। लिखावट यह थी-

''मैं कामिनीमोहन बेटा राधिकामोहन रहनेवाला बंसनगर, परगना हरगाँव (गोरखपुर) का हूँ-

''मेरे कोई लड़की लड़का नहीं है, जो सम्पत्ति मेरे पास है, वह सब मेरे बाप की कमाई हुई है, इसमें मेरे बंस के किसी दूसरे का कोई साझा नहीं है। मेरे मरने पर मेरा यह सारा धन मेरी स्त्री फूलकुँअर का होगा, पर इतना धन एक थोड़े बयस की स्त्री के हाथ में छोड़ जाना मैं अच्छा नहीं समझता, इसलिए मरने के पहले मैं अपने धन के लिए कुछ लिखा-पढ़ी करना चाहता हूँ-

''किसी का सर पर न होना, और बहुत सा धन अचानक हाथ में आ जाना, अनर्थों की जड़ है, मेरे बाप के मरने पर मेरी यह गत हुई थी-मेरे मरने पर मेरी स्त्री की भी ठीक यही गत होगी। मेरा जन्म ब्राह्मण के घर में हुआ है-मैं लिखा पढ़ा भी हूँ-दस भलेमानस के साथ उठा बैठा भी हूँ-समय का फेरफार भी देखा है। पर मैंने क्या किया? कोई बुरा कर्म मुझसे करने से छूटा? जब मेरी यह गत हुई, तो सब भाँति से कोरी एक स्त्री ऐसी दशा में क्या करेगी-यह कहकर बतलाने का काम नहीं है। पर इन सब बातों को सोचकर इस बेले जो मैं कोई ढंग निकाल जाऊँ-तो मैं समझता हूँ सभी समझवाले इस बात को अच्छा समझेंगे-

''मेरे बाप ने बड़ी कठिनाई से इतनी सम्पत्ति कमायी थी, एक-एक पैसे के लिए उन्होंने कितनों का रोआँ कलपाया था, छल-कपट करके कितनों का सरबस हरा था, पर इतनी बड़ी सम्पत्ति में से एक पैसा उनके साथ न गया, मैं उनका प्यारा बेटा हूँ, मैं भी आज इसको छोड़कर चला। फिर क्यों लोग दूसरों का रोआँ कलपा कर धन इकट्ठा करते हैं, यह कुछ समझ में नहीं आता। क्या यह उन्हीं कलपे हुए लोगों की आह का फल नहीं है, जो आज इतनी बड़ी सम्पत्ति का कोई भोगनेवाला नहीं रहा? जान पड़ता है जब तक किसी की चलती है-तब तक नहीं सूझता। आज मुझको अपने बाप के लिए ये बातें सूझ रही हैं-पर कल्ह उनसे बढ़-बढ़ कर मैं बुरे-बुरे कर्म गली-गली करता था, उस घड़ी तो लोगों के समझाने पर भी मेरी आँख न खुली। मुझको इस घड़ी इन पचड़ों से कुछ काम न था, पर एक तो इन बातों को दिखलाकर मैं इस ढंग से धन बटोरनेवाले की आँखें खोलता हूँ-दूसरे जिनको अपनी सम्पत्ति सौंपना चाहता हूँ, उन के कान भी खड़े किये देता हूँ। मरते समय मरनेवाले के मुँह की ऐसी बातें बहुत काम की होती हैं।

''देवहूती कौन है? कहाँ रहती है? मैं यह बतलाना नहीं चाहता। आजकल हमारे गाँव के सभी देवहूती को जानते हैं। पर मैं यह कहूँगा, देवहूती एक बहुत ही सीधी, सच्ची, सती, समझवाली, और भलेमानस स्त्री है। मैंने आज तक बहुत सी स्त्रियों बहुत से ढंग की देखीं-पर देवहूती ऐसी स्त्री मुझको देखने में नहीं आयी। मेरे दिन बड़े खोटे थे-जो मेरा जी देवहूती पर आया और अचरज नहीं है जो एक सती स्त्री पर बुरी दीठ डालने से ही आज मैं भरी जवानी में इस भाँत अचानक मर रहा हूँ। मैंने देवहूती को फाँसने के लिए क्या नहीं किया-कैसी-कैसी चाल नहीं चला-पर मेरी सब चालों में देवहूती के धर्म की जैजैकार रही और मैं सदा मुँह की खाता रहा। क्या इतना कहने पर भी देवहूती के सत के लिए मुझको कुछ और कहना चाहिए-मैं समझता हूँ अब कुछ कहने का काम नहीं है-पर इतना कहूँगा। जैसे गंगाजल खारा नहीं हो सकता, चाँद की किरणें मैली नहीं हो सकतीं, सूरज पर अंधियाली नहीं दौड़ सकती-वैसे ही देवहूती के सत पर अपजस का धब्बा नहीं लग सकता। मैं पहले देवहूती को प्यार की दीठ से देखता था, पर आज मैं उसको एक देवी समझता हूँ-जी से उसके आगे मत्था नवाता हूँ-और जो कुछ साग पात मेरे पास है, उसको आदर के साथ उसके सामने रखकर उसकी पूजा करना चाहता हूँ। मैं बड़ा पापी हूँ, क्या जानें इस पूजा के फल से उस लोक में मेरा कुछ भला हो। दूसरे यह भी दिखलाना है-जो स्त्री संकट के समय भी अपना धर्म निबाहती है, उस लोक की कौन कहे, उसको यहाँ ही सब कुछ मिलता है-

''मेरी स्त्री फूलकुँवर कैसी है? मैं इसको क्या कहूँ। पर मुझ ऐसे कुचाली पति से भी जो कभी उखड़कर नहीं बोली-वह स्त्री कैसी स्त्री है-इसको समझनेवाले आप समझ लें। हाय! आज उसके ऊपर कैसी विपत ढहती है! इस को नेक सोचने पर भी कलेजा फटता है। पर मैं उसको देवहूती के हाथ में सौंपता हूँ-देवहूती से बढ़कर मैं किसी को ऐसा नहीं देखता, जो फूलकुँवर का आँसू ठीक-ठीक पोंछ सके-और उसको अपने धर्म पर भी रखे। देवहूती के हाथों फूलकुँवर का अच्छा निबटेरा होगा-मेरे जी को इसकी पूरी परतीत है-

''मेरे बंस के जो लोग हैं, भगवान की दया से वे सब अच्छे हैं-सबको दूध-पूत है-धन सम्पत्ति का भी किसी को टोटा नहीं; इसलिए इन लोगों के लिए मैं कुछ करना नहीं चाहता। पर मुझसे पाँचवीं पीढ़ी में जो पण्डित रामस्वरूप हैं उनके दिन आज कल पतले हैं। इसलिए आज मैं उनको नहीं भूल सकता-इस समय मैं उनके लिए भी कुछ कर जाना चाहता हूँ-

''जो कुछ मैंने अब तक कहा और लिखाया है, उससे मेरे सुध बुध का ठीक होना और मेरा सचेत रहना पाया जाता है-इसलिए ''जो कुछ मैं लिखता हूँ सुधबुध ठीक होते और सचेत रहते लिखता हूँ'' मैं ऐसी बात अपनी इस लिखावट में लिखना नहीं चाहता-

''मेरे पास बीस गाँव हैं, इनमें से मनोहरपुर गाँव मैंने पं. रामस्वरूप को दिया। इस गाँव में बरस में बाहर सौ रुपये बचते हैं-मैं समझता हँ इतने रुपये बरसौढ़ी मिलते रहने पर वह अपना दिन भली-भाँति बिता सकेंगे-

''अब उन्नीस गाँव और रहे-इन उन्नीस गाँवों और दूसरी सारी सम्पत्ति को मैं देवहूती और फूलकुँवर को देता हूँ। उन्नीसों गाँवों पर देवहूती और फूलकुँवर दोनों का नाम चढ़ेगा, और दूसरी सारी सम्पत्ति भी इन दोनों के साझे की समझी जावेगी। मेरी स्त्री जैसी सीधी भोली है, और देवहूती जैसी भलेमानस और समझवाली है, इससे मैं समझता हूँ कोई सम्पत्ति बाँटनी न पड़ेगी। देवहूती अपनी माँ और भाई के साथ आकर मेरे घर में रहे, और फूलकुँवर और वह मिलकर सारी सम्पत्ति की सम्हाल करें, मेरे जी की प्यारी चाह यही है। और जिस लिए मैं फूलकुँवर को देवहूती को सौंपे जाता हूँ-वह बात भी तभी पूरी होगी। इन दोनों में से किसी एक के मरने पर सारी सम्पत्ति दूसरे की समझी जावेगी। देवहूती का पति किसी साधु के साथ निकल गया है-वह कहाँ है कोई नहीं जानता। पर जो देवहूती का दिन पलटे और उसका खोया हुआ पति उसको फिर मिले, और भगवान उसको कोई बेटा देवे, तो दवेहूती और फूलकुँवर दोनों के मरने पर सारी सम्पत्ति उसकी होगी। जो यह दिन भगवान न दिखलावें तो दोनों के मरने पर सारी सम्पत्ति मेरे वंश के लोग पावेंगे। ये दोनों स्त्रियों मेरी सम्पत्ति किसी भाँति दूसरे को न लिख सकेंगी-जो लिखेंगी तो वह लिखना न लिखने ऐसा समझा जावेगा। देवहूती जी करने पर अपने भाई को, ऐसे ही फूलकुँवर अपने भाई के छोटे लड़के को कोई गाँव लिख सकती है-पर इस गाँव की बचत बरस में चौबीस सौ से ऊपर की न होगी-

''मैं पण्डित हरनाथ, पण्डित रामस्वरूप, पण्डित रामदेव, बाबू महेश सिंह और बाबू राजबंस लाल, और जो यहाँ रहें तो देवस्वरूप के हाथों में-जिनके सामने यह लिखावट लिखी गयी है-अपनी सारी सम्पत्ति की देखभाल सौंपता हूँ। ये लोग मेरी सम्पत्ति को बिगड़ने और बुरे ढंग से काम में आने से बचावेंगे-और देवहूती और फूलकुँवर को ऐसी सीख देंगे जिससे वह मेरी सम्पत्ति को आज से अच्छे कामों में लगावें। स्त्रियों को अपने ऊपर छोड़ देना हमारे यहाँ अच्छा नहीं समझा जाता, इनके ऊपर किसी का दबाव भी होना चाहिए, इसलिए मुझको इतना और करना पड़ा। मैं समझता हूँ ऐसा करके मैंने कोई चूक नहीं की है-

''मुझको एक बात का दुख रह गया, मैं देवस्वरूप को अपनी सम्पत्ति में से कुछ देना चाहता था, पर उन्होंने न लिया, मेरा बहुत कुछ बोध होता, जो मेरी सम्पत्ति में से वे कुछ थोड़ा भी लेते। इस लिखावट के लिखने में मुझको उनसे बहुत सहाय मिली है-इसके लिए मैं उनका निहोरा करता हूँ-

''जहाँ तक मैं सोचता हूँ अब मुझको कुछ और नहीं लिखना है-इसलिए इस लिखावट को मैं पूरा करता हूँ-

ह. कामिनीमोहन''

देवस्वरूप पूरी लिखावट पढ़कर बोले-आप लोगों को जो कुछ सुनना था सुनाया गया। आप लोग इस लिखावट को सुनकर पूछ सकते हैं, देवहूती तो सरजू में डूबकर मर गयी! फिर क्या कोई दूसरी देवहूती है जिसको कामिनीमोहन ने अपनी सम्पत्ति दी है? मैं गाँव के उन पाँच बड़े मुखियाओं के कहने से-जिनका नाम लिखावट पढ़ते समय लिया जा चुका है-आप लोगों का यह भरम दूर करना चाहता हूँ। पर भरम दूर करने से पहले मैं आप लोगों से पूछता हूँ-क्या आप लोग हरमोहन पाण्डे को जानते हैं?

लोगों की जो बड़ी भीड़ वहाँ इकट्ठी थी, उनमें से कुछ लोग बोल उठे-क्यों नहीं जानता हूँ, वह देवहूती के बाप थे। दो बरस हुआ, एक दिन वे गाँव के दक्खिन बन के पास एक जन को दिखलाई पड़े-फिर तब से उनकी खोज न मिली। हम लोग जानते हैं, उनको कोई बन का जीव उठा ले गया, और अब वह इस धरती पर नहीं हैं।

जिस घड़ी लोगों के मुँह से यह बात निकली, उसी समय उस भीड़ में एक जन उठकर खड़ा हुआ। इस जन को हम बन में देख चुके हैं। जब देवस्वरूप के साथ घर लौटने में देवहूती ने नाहीं की थी, उस बेले यही जन देवहूती के पास आया था। उस समय हम लोगों ने जिस भेस में इस जन को देखा था, इस बेले उसका यह भेस नहीं है। इस घड़ी इस के सर पर पगड़ी है, देह पर अंगा है, गले में दुपट्टा है, और उजली लम्बी धोती पाँवों को छू रही है। पर दाढ़ी जैसी की तैसी थी, उसमें कुछ लौट फेर न हुआ था। जब यह जन अपनी ठौर पर उठकर खड़ा हुआ, देवस्वरूप ने कहा, क्या आप लोग इनको पहचानते हैं? यह सुनकर सारी भीड़ कुछ घड़ी चुप रही, पीछे दो जन भीड़ में से उठकर खड़े हुए। और उन लोगों ने कहा, हाँ! हम लोग पहचानते हैं, यही हरमोहन पाण्डे हैं। इन दोनों की बातें सुनकर सारी भीड़ खड़बड़ा उठी, बारी-बारी करके बहुत से लोग उठ बैठे। सर ऊँचा नीचा करके सभों ने देखभाल की, और कहा, ठीक है, यही हरमोहन पाण्डे हैं। इस समय सारी भीड़ अचरज में आ गयी थी, और जितने मुँह उतनी बातें होने लगने से, हौरा सा मच गया था, पर देवस्वरूप ने किसी भाँति फिर सबको चुप किया, और कहा अब आप लोग जानिये, जो दो बरस के मरे हुए हरमोहन पाण्डे जी सकते हैं, तो पन्द्रह बीस दिन की मरी देवहूती भी जी सकती है। सच बात यह है देवहूती भी मरी नहीं है, जीती है। यहाँ आप लोग हरमोहन पाण्डे से पूछकर अपना-अपना भरम दूर करें। और इनके घर पर जाकर देखें, वहाँ आप लोगों को देवहूती जीती मिलेगी। देवस्वरूप इतना कह पाये थे और हरमोहन पाण्डे उनकी बातों को ठीक बतला ही रहे थे, इसी बीच भीड़ फिर खड़बड़ा उठी, बहुत लोग अपनी-अपनी ठौर छोड़कर चौपाल के नीचे उतरने लगे। कोई रोता चिल्लाता भी सुनाई पड़ा। सब लोग घबड़ा उठे, बात क्या है! पर जो था चौपाल के नीचे उतरा जा रहा था, इसलिए कुछ ठीक न जान पड़ा क्या है। यह हलचल देखकर गाँव के पाँचों मुखिया और देवस्वरूप भी चौपाल से नीचे उतरे, और भीड़ चीर कर आगे बढ़े। तो देखा एक खाट पर बासमती लहू में डूबी हुई पड़ी तड़प रही है, उसकी देह में छुरी के सैकड़ों घाव लगे हुए हैं, और उसका बेटा उसकी खाट के पास खड़ा रो चिल्ला रहा है। देवस्वरूप ने उसके बेटे की ओर देखकर कहा, यह क्या हुआ गंगाराम?

गंगराम-देखो महाराज! गाँव को सूना पाकर न जाने कौन आज मेरी माँ को इस भाँति छुरियों से घायल कर गया। मैं अभी चौपाल में से उठकर घर गया, तो वहाँ इसको पड़े तड़पते पाया। यह बहुत पुकारने पर भी नहीं बोलती, न किसी का नाम बतलाती। इसी से आप लोगों को दिखलाने के लिए मैं इसको यहाँ खाट पर अपने एक पड़ोसी के साथ उठा लाया हूँ। बाबू आप लोग अब इसका निआव करें-दोहाई बाबू लोगों की।

जिस घड़ी गंगाराम बातें कर रहा था, बासमती साँस तोड़ रही थी, उसके घाव, उसकी बुरी गत, और उसका तड़पना देखकर सबके रोंगटे खड़े थे, ऐसा कोई अंग नहीं था जहाँ छुरी चुभाई नहीं गयी थी। उसकी यह दशा देखकर गाँव के मुखियाओं ने कहा, इसको अभी थाने में ले जाओ। यह सुनकर गंगाराम ने ज्यों खाट उठायी, त्यों उसीमें कहीं लिपटी एक लिखावट नीचे गिर पड़ी-लिखावट यह थी-

''बासमती ने कितनी भोली-भाली स्त्रियों और कितने भले घरों को बिगाड़ा है। मेरा जी इसी से इसके ऊपर बहुत दिनों से जलता था, पर कामिनीमोहन का डर मुझको कुछ करने न देता था। जिस दिन कामिनीमोहन मरे उसी दिन मुझको अपने जी की जलन बुझाने का विचार था। पर अवसर हाथ न आता था। आज अवसर हाथ आने पर मैं अपने जी की जलन को बासमती के लहू से ठण्डा करता और जो स्त्रियों कुटनपन करने में बड़ी चोख हैं, उनको बतलाता हूँ, वे चेत रखें, मेरे ऐसा उनको भी कोई कभी मिल रहेगा। किसी को जी से मारना और थाने के लोगों के हथकण्डों का विचार न करके एक लिखावट भी पास रख जाना, एक नई बात है। पर लोगों की भलाई के लिए मैं ऐसा करता हूँ-आगे मेरे भाग्य में जो बदा हो।

एक अपने जी पर खेलनेवाला।''

लिखावट पढ़ जाने पर गंगाराम बासमती को लेकर थाने की ओर चला गया, पर जाने से पहले बासमती मर चुकी थी। जितने लोग वहाँ थे सब लोगों ने बड़े दुख से तड़प-तड़प कर बासमती को मरते देखा था, इसलिए उसी की चर्चा करते-करते वे लोग भी अपने-अपने घर आये। पर न जाने कैसा एक डर आज गाँव के सब लोगों के जी में समा गया।
 
आज तक मरकर कोई नहीं लौटा, पर जिसको हम मरा समझते हैं, उसका जीते जागते रहकर फिर मिल जाना कोई नई बात नहीं है। ऐसे अवसर पर जो आनन्द होता है-वह उस आनन्द से घटकर नहीं कहा जा सकता-जो एक मरे हुए जन के लौट आने पर मिल सकता है। पारबती बड़ी भागवाली है-आज दो बरस का खोया हुआ पति ही उसको नहीं मिला, उस की आँखों की पुतली, वह देवहूती भी अचानक आकर उससे गले मिली-जिसको वह डूब मरी समझकर आठ-आठ आँसू रोती थी। आज उसके आनन्द का पार नहीं है। कुछ घड़ी के लिए वह बावली बन गयी, अपने देह तक की सुध भूल गयी, संसार उसकी आँखों में कुछ और हो गया, न उससे हँसते बनता था न रोते। पर कुछ ही बेर में वह भाप जो धुन बाँधकर भीतर उठ रही थी, बाहर निकल पड़ी, और वह फूट-फूट कर रोने लगी। जब बहुत दिनों की जी में लगी दुखड़ों की काई झर-झर बहते हुए आँसुओं से धुल गयी और पारबती का जी कुछ हलका हुआ, उस घड़ी वह और सब बातें भूलकर हरमोहन से कहने लगी-क्या आपको मुझको इस भाँति छोड़ देना चाहिए था-आप किसके हाथ मुझको सौंप गये थे, जो दो बरस तक मेरी सुधा भी न ली? सब तो गया ही था, मैं आपका ही मुँह देखकर रोती थी, फिर आप इतने कठोर क्यों हुए? पर फिर भी मेरे भाग्य अच्छे हैं, जो आपने इतने दिनों पीछे भी चेता, और मेरे उजड़े हुए घर को बसाया।

हरमोहन पाण्डे भी इस बेले चुपचाप आँखों से आँसू बहा रहे थे, जब पारबती कह चुकी, वह बोले-जिस होनहार ने धन सम्पत्ति और गाँव घर मुझसे छुड़ाया था, उसी ने तुम्हारी ऐसी घरनी, देवहूती जैसी लड़की, और देवकिशोर जैसा लड़का भी मुझसे छुड़ाया। मुझको सब भाँत का दुख तो था ही, पर जमाई के किसी साधु के संग कहीं निकल जाने की बात मैंने सुनी, उसी घड़ी मेरे दुख का पार न रहा, मैंने सोचा ऐसे घर से तो बन अच्छा है, और इसी धुन में मैं बन में निकल गया। निकलने को तो मैं बन में निकल गया, पर वहाँ मुझको बहुत कुछ भुगतना पड़ा। महीनों मुझको बनफल खाकर और झरनों का पानी पीकर अपने दिन बिताने पड़े। बात यों है-बन में निकल जाने पर जब दो-चार दिन पीछे जी ठिकाने हुआ, तो मेरे जी में कई बार यह बात उठी-मैं घर लौट चलूँ-मैं घर की ओर चला भी। पर जिस पथ से मैं बन में घुसा था, वह पथ कुछ ऐसी भूल-भुलइयाँ के ढंग का है, जिसने मुझको घर न लौटने दिया। जाते समय मुझको कहाँ जाना है, यह विचार तो था ही नहीं, इसलिए नाक की सीध में मैं बन में घुसता चला गया, पर निकलते समय मैं जिधर से निकलना चाहता था, कुछ दूर चलने पर फिर वहीं आ जाता था, महीनों तक मैं नित बन से निकलने का जतन करता रहा, पर एक दिन भी मेरे मन की न हुई। उलटे लेने के देने पड़ गये। महीनों बनफल खाने, झरनों का पानी पीने और धरती पर सोने से मैं रोगी हो गया, और मेरा चलना-फिरना तक रुक गया। इन दिनों मैं एक पत्ते की झोंपड़ी में-जिसको मैंने अपने हाथों बनाया था, दिन रात पड़ा रहता था। और इतना दुबला हो गया था, जिससे किसी जंगली जीव का सामना होने पर किसी भाँति अपने को बचा न सकता था।

पर मेरे दिन पूरे नहीं हुए थे, इसीलिए रोगी होने के थोड़े ही दिनों पीछे किसी ओर से घूमते घामते दो भील मेरे पास आये, इन दोनों ने मुझको देखा, मेरा नाम धाम पूछा और चुपचाप मुझको अपने घर उठा ले गये। मैंने उन दोनों से घर पहुँचा देने के लिए बहुत कहा, भाँति-भाँति की लालच दिलायी, पर उन्होंने मेरी एक न सुनी, कहा, आप इतने घबराते क्यों हैं? जब आप अच्छे हो जावेंगे, घर पहुँचा दिया जावेगा। मैं उनकी बातें सुनकर चुप हो रहा, कुछ डरा भी, पर अपने घर लाकर उन दोनों ने मेरी जितनी टहल की, मैं उसके लिए उनका जन्म भर ऋणी रहूँगा। मैं पाँच छ: महीने अच्छा नहीं हुआ, पर उन दोनों ने एक दिन भी मेरी टहल और सम्हाल करने से जी न चुराया। जब मैं भली-भाँति चंगा हुआ, उस समय मुझको घर से निकले एक बरस हो चुका था। बीच-बीच में कई बार मैंने उन सबों से घर पहुँचाने के लिए कहा, पर जब मैं घर की बात उठाता, तभी वे सब टालटूल करते। क्यों वह टालटूल करते, मैं पहले इस भेद को न समझता था, इसलिए मैं सोचता-इन सबका प्यार मेरे साथ बहुत हो गया है, इसीलिए ये सब मुझको घर पहुँचाना नहीं चाहते। धीरे-धीरे यह बात मेरे जी में जम गयी, और मैंने सोचा, अपने आप मुझको जंगल से बाहर निकलने के लिए कोई जतन करना चाहिए। पर यह काम मैं इस भाँति करना चाहता था, जिसमें वे दोनों भील जानें तक नहीं। क्योंकि सेवा टहल करके उन्होंने इस भाँति मुझको अपने हाथों में कर लिया था, जिससे मैं किसी भाँति उनका जी तोड़ना अच्छा न समझता था।

तुम कहोगी भीलों की ओर इतना ध्यान! पर इन भीलों के बरताव की बात मैं क्या कहूँ। क्या बस्ती में बसनेवालों में इतनी भलमनसाहत हो सकती है? कभी नहीं! छल कपट का वे सब नाम तक नहीं जानते, सीधे और सच्चे इतने हैं जितना होना चाहिए। हम लोग मुँह पर बात बनाते हैं, बात चलने पर धरती आकाश एक करते हैं, कभी-कभी ऐसी चिकनी चुपड़ी सुनाते हैं, जिससे पाया जाता है हमसे बढ़कर भला कोई दूसरा हो नहीं सकता। पर भीतर की सड़ी गन्ध से जी भिन्ना जाता है-काम पड़ने पर ऐसा भण्डा फूटता है, जिसके कहते हुए भी लाज लगती है। मुझको बस्ती के लोगों से भली-भाँति काम पड़ चुका था, मैं बहुत से लोगों का रंग-ढंग देख चुका था, इसलिए जंगल में पहुँचने पर जब भीलों से पाला पड़ा, तो मुझको जान पड़ा, बस्ती के लोग इन भोले-भाले भीलों से कितनी दूर हैं। कभी-कभी मेरे जी में घर न पहुँचाने की बात खटकती थी, पर इसको भी मैं उनका प्यार ही समझ चुका था, चाहे मेरे साथ उनका यह प्यार न था, तब भी जिसलिए वे मुझको घर न पहुँचाते थे, यह भी एक ऐसी बात थी, जिससे वह और अच्छे समझे जा सकते हैं। कामिनीमोहन की ओर से वे सब बन के रखवाले थे, कामिनीमोहन ने उनसे कह रखा था, जो बन के भीतर गाँव का कभी कोई पाया जावे तो उसको बिना मुझसे पूछे बाहर न निकलने देना, फिर वह क्यों उनकी बातों पर न चलते? अवसर पाकर उन सबों ने कामिनीमोहन से मेरे घर पहुँचा देने के लिए पूछा भी था, पर जान पड़ता है उन दिनों उसकी दीठ देवहूती पर पड़ चुकी थी, इसलिए उसने मुझको जंगल में रख छोड़ने के लिए ही कहा। ये बातें कामिनीमोहन के मरने पर मुझको भीलों ने बतलायी थीं।

जब बन में एक बरस बीतकर दूसरा लगा, और बाल-बच्चों का नेह बहुत सताने लगा, तब मैं चुपचाप नित्य बन से निकलकर घर पहुँचने के लिए पथ ढूँढ़ने लगा। पर मुझ ऐसे आलसी जीव के लिए बन में पथ ढूंढ़ लेना कठिन बात थी। जब बन में मैं पथ ढूँढ़ने निकलता और कहीं कुछ उलझन पड़ती, तभी मैं अपनी झोंपड़ी में पलट आता, कहता अब कल्ह पथ ढूँढ़ईँगा। पर इस भाँति कल्ह-कल्ह करते दो बरस बीतने पर आये और मुझको पथ न मिला।

भाग्य से एक दिन देवस्वरूप से भेंट हुई। उन्होंने मुझे देखकर साधु समझा, और कहा, आपका दर्शन बड़े अवसर पर हुआ, आज मैं एक सती स्त्री का धर्म बचाना चाहता हूँ, पर मुझको डर था वह मेरी परतीत करे न करे। पर आपको देखकर मैं सुखी हुआ, आप बड़े बूढे हैं, आपकी परतीत करने में उसको कुछ आगा पीछा न होगा। आप मेरे साथ चलिए और एक धर्म के काम में सहाय हूजिए। मैं उनकी बातों को कुछ न समझ सका, पर धर्म की दुहाई देते देखकर उनके साथ हो गया। वे मुझको एक सुरंग से एक कोठरी में ले गये। ज्यों मैं कोठरी में पहुँचा एक डयोढी में से निकलकर देवहूती को कोठरी की ओर आते देखा। मैंने देवहूती को देखकर पहचाना, और उनसे कहा, यह तो मेरी लड़की है। यह यहाँ कैसे आयी, आप सब बातें मुझसे खोलकर कहें। उन्होंने मेरी बात सुनकर कहा तब तो और अच्छा हुआ, पर आप इस घड़ी न कुछ पूछें-पाछें और न कुछ बोलें-इस घर से बाहर निकल चलने पर सब बातें अपने आप जान जावेंगे। जब हम तीनों सुरंग से बाहर निकले, तो देवस्वरूप मेरी झोंपड़ी तक हम लोगों के साथ आये, पथ में बहुत सी बातें देवहूती की भलमनसाहत और कामिनीमोहन की चाल की उन्होंने मुझको सुनायीं, मैंने भी अपना सारा दुखड़ा उनको सुनाया, बीच-बीच में देवहूती फूट-फूट कर रोती थी। जब मैं अपनी झोंपड़ी में पहुँचा, वे कहने लगे-इस समय मैं एक काम से बंसनगर जाता हूँ, आप देवहूती के साथ कुछ दिन और बन में रहिये, थोड़े ही दिनों पीछे मैं आपको देवहूती के साथ आपके घर पहुँचा दूँगा। गाँव के पंचों के कहने से आज वही देवहूती के साथ मुझको घर लिवा लाये हैं, पथ में गाँव की बड़ी चौपाल में मुझको थोड़ी बेर के लिए ठहरा लिया था, चौपाल से थोड़ी दूर पर देवहूती की पालकी भी उतरवायी थी, सोचा था, क्या जाने कुछ काम पड़े। पर मुझको जीता देखकर गाँववालों ने देवहूती के लिए कुछ पूछपाछ न की। इसी बीच बासमती का पचड़ा फैल गया। मैंने देखा अब यहाँ रहना ठीक नहीं, इसलिए देवहूती के साथ घर चला आया। तुमने जो कुछ कहा ठीक है, पर होनहार किसी के हाथ नहीं, जो-जो नाच उसने नचाया, वह सब नाचना पड़ा, अब भी जो नाच वह नचावेगा, नाचना पड़ेगा, पर इस बुढ़ौती में एक बार हमारी तुम्हारी भेंट और बदी थी, वह हुई, आगे की राम जानें।

पारबती चुपचाप हरमोहन पाण्डे की बातें सुनती रही, कभी रोती, कभी ऊँची साँसें लेती, और कभी चुपचाप उनके मुँह की ओर ताकती रही। जब हरमोहन पाण्डे चुप हुए, वह बोली, भगवान ने जैसा मेरा दिन फेरा, सबका दिन फिरे। आपको और देवहूती को इन दो बरसों में जैसी बिपत झेलनी पड़ी, राम किसी बैरी को भी ऐसी बिपत में न डालें। मैंने जब भूलकर भी कभी किसी का बुरा नहीं किया, तो मेरा बुरा कैसे होता। कामिनीमोहन के मरने पर बासमती मेरे पास दो-तीन दिन आयी थी, उससे देवहूती की सब बातें सुनी थीं, मैं उससे मिलने की आस में ही दिन गिन रही थी, पर अचानक आपका भी दर्शन कर भगवान ने मेरे किस जनम के पुण्य का फल आज मुझको दिया है, मैं नहीं कह सकती।

पारबती इन्हीं बातों को कह रही थी, इसी बीच गाँव की बहुत-सी स्त्रियों देवहूती से मिलने के लिए वहाँ आयीं। देखकर हरमोहन वहाँ से उठकर एक दूसरे घर में चले गये। पारबती देवहूती को स्त्रियों के पास छोड़कर पहले हरमोहन के पास गयी। उनका हाथ मुँह धुलाया, उनको कुछ खाने को दिया, पीछे स्त्रियों के पास लौट आयी। पारबती, देवहूती, और आयी हुई स्त्रियों में क्या बातचीत हुई, मैं इसको लिखना नहीं चाहता। ऐसे अवसर पर जैसी बातें हुआ करती हैं, उसको आप लोग अपने आप समझ लें।
 
जब तक हमको पेट भर खाने के लिए नहीं मिलता, हम दो मूठी अन्न के लिए तरसते रहते हैं, उन दिनों हमको यही सोच रहता है, कैसे पेट भर खाने को मिलेगा, कहाँ से दो मूठी अन्न लायें, जिससे पापी पेट की आग बुझे। पर पेट भर खाना मिलने पर, दो मूठी अन्न का ठिकाना हो जाने पर, हमारा जी पहले का-सा नहीं रह जाता। इस घड़ी हम सोचते हैं, कुछ कमाना चाहिए, हमारे पहनने के कपड़े कैसे फटे और बुरे हैं, भलेमानसों को मुँह तक नहीं दिखाया जाता, कहाँ से कुछ मिले, जो आये दिन पत रहे। जो भगवान ने दया की, इस दुखड़े से भी छुट्टी मिली, तो जी में आता है, घर चारों ओर से गिरा पड़ा है, बरसात में घर की छतें चलनी बन जाती हैं, धूप के दिनों लू और लपट के थपेड़ों से जी पर आ बनती है, जैसे हो घर बनवाना चाहिए। जो भाग ने साथ दिया, पैसे हाथ चढ़ गये, तो घर बनते भी बेर नहीं होती। पर क्या हमारी चाहें यहीं आकर ठिकाने लगती हैं ? नहीं, घर बना तो हाथी घोड़ा चाहिए, धन धरती चाहिए, रुपये चाहिए। सच बात यह है, चाह कभी पूरी नहीं होती। जिसके लिए आज हम बेकल हैं, जो वह कल्ह मिल गया, तो परसों दूसरी ही उधेड़ बुन में हम लगते हैं, और उसके लिए हाथ-पाँव मारते हैं, जो अब हमारे पास नहीं है। पारबती आजकल दिन-रात हरमोहन पाण्डे और देवहूती के लिए रोती-कलपती थी; सोते-जागते उसको इन्हीं का ध्यान था। राम-राम करके उसके दुख की रात बीती, सुख के सूरज ने मुँह दिखलाया, हरमोहन पाण्डे और देवहूती ने आकर उसके अंधेरे घर में उँजाला किया, वह दो-एक दिन इस सुख में भूली रही। पर दो ही दिन पीछे उसका जी फिर दुखी रहने लगा, वह देवहूती का रूप जीवन देखती, उसके धन विभव की बात विचारती, और सोचती, क्या कोई दिन वह भी होगा, जिस दिन देवहूती का उजड़ा हुआ घर बसेगा? फिर सोचती, यह भी बावलापन है! जो साधु हो गया, वह घरबारी कैसे होगा!!! फिर जी में बात आती, तो भगवान ने इसको इतना रूप क्यों दिया! इतना धन विभव क्यों दिया!!! जो सदा उसको जलना ही है, तो यह रूप और धन विभव किस काम आवेगा! क्या देवहूती को विपत से उबारनेवाले देवस्वरूप उसकी इस बिपत से रच्छा करने का भी कोई उपाय सोचेंगे! देवस्वरूप का नाम मुँह पर आते ही वह चौंक उठी। देवस्वरूप को एक दिन अचानक पारबती ने देख लिया था, देखते ही उसके जी का भाव न जाने कैसा हो गया था, इस घड़ी भी उसके जी का भाव वैसा ही हुआ, वह मन-ही-मन सोचने लगी, देवस्वरूप का मुखड़ा देवहूती के पति से इतना क्यों मिलता है? देवहूती का पति भी साधु हो गया है, देवस्वरूप भी साधु है! फिर क्या देवस्वरूप ही तो देवहूती का पति नहीं है? इन बातों को सोचकर पारबती बड़े गोरखधंधे में पड़ी। वह जानना चाहती थी, देवस्वरूप कौन है? कहाँ का है? क्यों दूसरों की भलाई के लिए दिन-रात उतारू रहता है? क्यों उसने देवहूती के साथ इतनी भलाइयाँ कीं? पर बहुत कुछ पूँछपाछ करने पर भी वह इन बातों को न जान सकी। इसी बीच एक दिन पारबती ने सुना, कल्ह देवस्वरूप बंसनगर से चले जावेंगे, उनको कई तीर्थों में जाना है, इसीलिए वे उतावली कर रहे हैं। पारबती ने गाँव से चले जाने के पहले एक दिन अपने यहाँ उनका नेवता करना चाहा-और यह बात हरमोहन पाण्डे से कही। उन्होंने पारबती की बात मानी, और नेवता देकर एक दिन देवस्वरूप को अपने यहाँ बुलाया। जब वह खा-पी चुके तो घर से मिली हुई एक बैठक में उन दोनों जनों में इस भाँति बातचीत होने लगी।

हरमोहन-आपने हम लोगों के साथ जितनी भलाइयाँ की हैं, उनका हम लोग कहाँ तक निहोरा करें-बिना किसी अर्थ के इस भाँति दूसरों की भलाई करते आपसे पहले मैंने किसी दूसरे को नहीं देखा। आप अब बंसनगर छोड़कर आजकल में जाना चाहते हैं, इससे हम लोगों का जी मल रहा है, आँखों से आँसू निकल रहे हैं। क्या आप फिर दर्शन देकर हम लोगों को कृतार्थ करेंगे? आप जैसे साधुओं का दर्शन करने ही से हम जैसे घरबारियों का भला होता है।

देवस्वरूप-एक के बिपत में फँसने पर दूसरे का उसके बचाने के लिए उतारू हो जाना, हम सब लोगों का सबसे बड़ा धर्म है। मैंने वही किया है, इसमें आप के निहोरा मानने की कोई बात नहीं है। यह आपका बड़प्पन है जो इस बहाने आप मुझको सराहते हैं। और जो प्यार आप लोगों का मेरे साथ है, वह आप लोगों की दया है, मुझमें कोई गुण ऐसा नहीं है, जिसके लिए आप लोग मुझको इतना चाहें। यह सच है, मैं आज कल में बंसनगर छोडँगा, पर कुछ दिनों पीछे आप लोगों का दर्शन करने की फिर चाह है। मेरा जनम ब्राह्मण के घर में हुआ है, एक तो यों ही ब्राह्मण और साधुओं का भेस बहुत मिलता-जुलता है-दूसरे इधर दो-तीन बरस में साधुओं के साथ रहा भी हूँ। इससे मेरा भेस कुछ साधुओं का-सा देखकर आप मुझको साधु समझ रहे हैं, पर सच बात यह है, मैं साधु नहीं हूँ। साधु क्या, साधुओं के पाँव की धूल भी नहीं हूँ।

हरमोहन-आपकी बातें ठीक-ठीक मेरी समझ में नहीं आती हैं, क्या आप साधु नहीं हैं? घरबारी हैं?

देवस्वरूप-हाँ! घरबारी ही समझिए, जब मैं साधु बनने योग्य अभी नहीं हूँ तो अपने को घरबारी कहने में क्यों हिचकूँगा। साधु होना टेढ़ी खीर है, बड़ा कठिन काम है। सर पर जटा बढ़ाये, भभूत रमाये, गेरुआ पहने, हाथ में तूँबा और चिमटा लिए, आप कितनों को देखते हैं, पर क्या वे सभी साधु हैं? नहीं, वे सभी साधु नहीं हैं। भेस उनका साधुओं का सा देख लीजिए, पर गुण किसी में न पाइयेगा। कोई पेट के लिए भभूत रमाता है, कोई चार पैसा कमाने के लिए जटा बढ़ाता है, कोई लोगों से पुजाने के लिए गेरुआ पहनता है, और कोई घर के लोगों से लड़कर बिगड़ खड़ा होता है, और झूठ-मूठ साधुओं का भेस बनाए फिरता है। इन सब लोगों से निराले कुछ ऐसे लोग होते हैं-जो न तो कुछ काम कर सकते-न किसी काम में जी लगाते-जिस काम को वे करना चाहते हैं, आलस से वही काम उनके लिए पहाड़ होता है-फिर उनका दिन कटे तो कैसे कटे! वे सब छोड़-छाड़ कर साधु बनने का ढचर निकालते हैं, और इसी बहाने किसी भाँति अपना दिन काटते हैं। जब तक इन लोगों को तन ढाकने और पेट भरने ही तक मिलता है, तब तक कहने-सुनने को ये लोग कुछ भले होते भी हैं, पर जो कहीं कुछ रुपया पैसा हाथ चढ़ गया, कुछ धन धरती मिल गयी, तो अनर्थ होता है, जो काम बिगड़े से बिगड़ा घरबारी नहीं कर सकता, उन कामों को यह झूठा साधु करता है और जितनी बुराई देश और देश के लोगों की इन लोगों के हाथों होती है, दूसरों के हाथ कभी नहीं हो सकती-हमसे जवान साधु तो और अनर्थ करते हैं। अभी भली-भाँति मूँछ भी नहीं आयी है-अठारह-बीस बरस का बय है-जवानी ऊपर फिसली जाती है-अकड़ तकड़ देह में भरी हुई है-मन में सभी ढंग की चाहें हैं-एक चाह ने भी पूरा होने का अवसर नहीं पाया-इसी बीच साधु बनने की धुन समायी। साधु बने, भभूत रमाया, जटा बढ़ायी, गेरुआ पहना, पर इसी साधु बनने से क्या हुआ, जब तक मन हाथ न आया, और जी की चाहें न मिटीं। हाँ! इतना होगा, भोले-भाले लोग उनको साधु महात्मा समझकर उनसे किसी बात की झिझक न रखेंगे और वह महामना देश की और देश के लोगों की बुराई करते रहेंगे। किसी पोथी में इस भाँति साधु होना नहीं लिखा है, कहीं ऐसे साधुओं की बड़ाई नहीं की गयी है। आजकल साधु होना भेड़ियाधसान हो गया है-जिसको देखो वही साधु बना फिरता है, पर इस भाँत साधु होने से साधु न होना ही अच्छा है।

मैं यह नहीं कहता सभी साधु ऐसे हैं, जितने साधु देखने में आते हैं, सभी बुरे और खोटे हैं। पर यह कहूँगा जो भली-भाँति पढ़ा लिखा नहीं है, जिसके साधु होने का समय नहीं आया, जो यह नहीं जानता साधु किसलिए हुआ जाता है, जिसने यह नहीं समझा, साधुभेस बनाने के पहले साधु का गुण होना चाहिए, उसका साधु बनना जग को धोखे में डालना है। साधु का भेस देखकर हमारा आपका उसका आदर मान न करना, एक ऐसी बात है, जिससे कभी किसी अच्छे साधु का मान न करने का दोष भी हमको आपको लग सकता है। इसी से हम लोगों में जो साधु के भेस में देखने में आते हैं, उन सबका आदर और मान करने की चाल है। पर यह हमारा और आप का करतब है, ऐसे झूठे भेस बनाने वाले के लिए यह और लाज की बात है। जितनी बातें मैं ऊपर कह आया हूँ, उससे आपने समझा होगा, मुझमें ऐसे गुण अब तक नहीं हैं, जिससे मैं साधु हो सकूँ, और इसीलिए मैंने आपसे कहा है, मैं साधुओं के पाँव की धूल भी नहीं हूँ। हाँ! साधु होने के लिए जतन कर रहा हूँ-आप बड़ों की दया से जो मेरा जतन पूरा हुआ, मेरा मन ठीक हो गया, और चाहें मिट गयीं, तो समय आने पर मैं साधु होने की चाह रखता हूँ। इस समय साधु कहकर आप मुझको न लजवावें।

हरमोहन-आप बहुत बड़े लोग हैं जो ऐसी बातें कहते हैं, मैं आपकी बातों को काटकर यह न कहूँगा-आपसे बढ़कर कौन साधु हो सकता है। पर यह कहूँगा, हम लोगों का बड़ा भाग्य है, जो आप फिर दर्शन देने के लिए इस गाँव में आने की चाह रखते हैं। जो कभी आकर आप दर्शन दे जाया करेंगे, तो हम लोगों का बहुत कुछ भला होगा। इस घड़ी हम आपसे अपनी एक और भलाई की आशा रखते हैं। आप जानते हैं, दो बरस हुआ, देवहूती का पति किसी साधु के साथ कहीं निकल गया। आप कितने तीर्थों, नगरों और गाँवों में जाते हैं, ऐसा संजोग हो सकता है, जो आपके साथ उसकी भेंट होवे, आप का जी इधर होने से ऐसा होने में और सुभीता होगा। जो भगवान यह दिन दिखलावें, और आपके साथ किसी दिन उसकी भेंट हो जावे, तो आप उसको घर फेर लाने के लिए जतन करेंगे। जिस भाँति देवहूती को आपने कितनी बिपतों से बचाया है उसी भाँति देवहूती को इस बिपत से भी बचावें। हम लोगों की बड़ी गिड़गिड़ाहट के साथ आपसे यही बिनती है।

देवस्वरूप-आपके बिना कहे उसी दिन से मेरे जी में यह बात बैठी हुई है, जिस दिन यह बात मैंने जानी। मैं जहाँ तक हो सकेगा देवहूती के पति को ढूँढ़ने में न चुकूँगा, पर आप दया करके उनका रूप रंग क्या कुछ बतला सकते हैं?

हरमोहन-मैंने सुना है उसका रूप रंग आपसे बहुत मिलता है।

देवस्वरूप यह सुनकर कुछ घड़ी चुप रहे-एक-एक करके कई बार हरमोहन के मुखड़े पर दीठ डालते रहे। फिर बोले-आपका नाम हरमोहन पाण्डे छोड़ कुछ और है? क्या देवहूती का कोई दूसरा नाम भी है?

हरमोहन-मेरा नाम तो हरमोहन पाण्डे ही है-पर मुझको लोग कहते मोहन पाण्डे हैं। इसी भाँति देवहूती का भी कोई दूसरा नाम नहीं है-हाँ! प्यार से लोग उसको पियारी पुकारा करते हैं, क्यों? आपने यह क्यों पूछा?

देवस्वरूप कुछ इधर-उधर करके बोले-पियारी तो मर गयी न?

देवस्वरूप को इधर-उधर करते देखकर हरमोहन पाण्डे ने एक गहरी दीठ उनके ऊपर डाली, इस समय उनके मुखड़े पर एक रंग आता, और एक जाता था, जी में अनोखा उलट फेर हो रहा था। पर उन्होंने सम्हल कर कहा, नहीं वह मरी नहीं, अब तक जीती है। क्यों देवहूती के मरने की बात आप जानते हैं?

देवस्वरूप ने धीरज के साथ कहा-हाँ! मैंने सुना कुछ ऐसा ही था, पर आपकी बात भी सच हो सकती है। किसी बड़े रोग में बेसुधा हो जाने पर बहुत लोगों के लिए ऐसी बातें फैल जाती हैं।

हरमोहन-ठीक ऐसा ही देवहूती के लिए भी हुआ है, जिस दिन यहाँ यह बात फैली, उसके थोड़े ही दिनों पीछे, मैंने उसके पति के किसी साधु के साथ निकल जाने की बात सुनी। जान पड़ता है अपनी स्त्री को मरा समझ कर ही, उसने ऐसा किया है। जो हो, पर आप यह बतलावें, आप इन बातों को कैसे जानते हैं? क्या आप रामनगर के रहनेवाले हैं?

एक जन सच्चे जी से तीर्थ जाने के लिए सजधज कर खड़ा है, कैसे वहाँ जाकर देवताओं की सेवा पूजा करके अपना जनम सफल करेगा! कैसे साधु महात्माओं का दर्शन करके अपने को बड़भागी बनावेगा!! वह इन्हीं उमंगों फूला नहीं समाता है। इसी बीच अचानक उसने एक ऐसी बात सुनी, जिससे उसको तीर्थ जाने का विचार छोड़ना पड़ा, सारी चाहें उसकी धूल में मिल गयीं, और मुखड़े पर निराशा-भरी गहरी उदासी झलकने लगी। ठीक यही दशा हरमोहन की बात सुनकर देवस्वरूप की हुई। मुखड़े का चमकता हुआ चटकीला रंग फीका पड़ गया, आँखों की जोत कुछ मैली हो गयी, और अचानक वह कुछ घबरा से गये, पर देखते-ही-देखते ये सब बातें दूर हुईं, धीरज मुखड़े पर खेलने लगा, और उन्होंने कुछ चौंकते-चौंकते कहा, हाँ! मैं रामनगर का ही रहनेवाला हूँ।

हरमोहन पाण्डे ने कुछ उकताहट के साथ कहा, आपके बाप का नाम?

देवस्वरूप ने वैसे ही धीरज के साथ कहा, पंडित गोबिन्दस्वरूप?

अबकी बार हरमोहन का कलेजा धाक से हो गया, उन्होंने लड़खड़ाती जीभ से कहा, और आपका नाम? फिर से कहा-क्या देवस्वरूप ही आपका नाम है?

देवस्वरूप बोलना ही चाहते थे, इतने में लाल पगड़ीवाले, थाने के दो मुचण्डे, अचानक बैठक में घुस पड़े, और डाँट कर बोले तुम लोग बासमती को मरवा कर यहाँ बैठे अट-कौसल कर रहे हो! उठो! अभी उठो!! देखो आज कैसी गाढ़ी छनती है। हरमोहन की नानी तो थानेवालों को देखते ही मर गयी थी, इस पर उन्होंने जो डाँट बतलायी, उससे उसके रहे सहे औसान भी जाते रहे। पर देवस्वरूप ने बिना किसी घबराहट के कहा, देखो ऊधम करने का काम नहीं है, जहाँ तुम लोग कहो वहाँ हम लोग चल सकते हैं। देवस्वरूप का रंग-ढंग और धीरज देखकर फिर वे दोनों कुछ न बोले और जिधर से आये थे, देवस्वरूप और हरमोहन को लेकर चुपचाप उसी ओर चले गये।
 
बासमती के मारे जाने पर दो चार दिन गाँव में बड़ी हलचल रही, थाने के लोगों ने आकर कितनों को पकड़ा, मारनेवाले को ढूँढ़ निकालने के लिए कोई बात उठा न रखी, पर बासमती से गाँववालों का जी बहुत ही जला हुआ था, इससे लाख सर मारने पर भी थाने के लोग अपनी सी न कर सके, अन्त को उन लोगों को हार माननी पड़ी, और दो-चार दिन पीछे गाँव में फिर चहल-पहल हुई। आज बंसनगर की निराली छटा है, फूल पत्तियों से सजकर वह दूसरा स्वर्ग बन गया है। घर-घर द्वारों पर बंदनवारे बँधी हैं, केले के खम्भे गड़े हैं, और जल से भरे कलसे रखे हैं। स्त्रियों मीठे सुरों में गा रही हैं, पुरुष जहाँ-तहाँ खड़े हँस बोल रहे हैं, आपस में चुहलें कर रहे हैं, और लड़के किलक रहे हैं, उछल कूद रहे हैं, तालियाँ बजा रहे हैं, और गाँव की छटा देखते हुए झुण्ड-के-झुण्ड इधर-उधर घूम रहे हैं। देखो, यह साम्हने का मन्दिर कैसा सजा हुआ है, फूल पत्तियों से, केले के खम्भों से, बंदनवारों से वह कैसे अनूठा और सुहावना बन गया है! उसके सामने एक मण्डप में बाजा कैसे मीठे सुरों में बज रहा है! इन सामने उछलते खेलते आते हुए लड़कों की ओर देखो, उनकी धुन बाजों की धुन के साथ कैसी लग रही है! वे बाजों के मीठे सुर पर कैसा उमग रहे हैं! मन्दिर के ठीक बीच में एक बहुत ही ऊँचा झण्डा गड़ा हुआ है, इस झण्डे के इधर-उधर दो छोटे झण्डे और हैं, धीरे बहनेवाली बयार इन झण्डों के फरहरों को लेकर खेल रही है। हमारा जी भी उनसे उलझा हुआ है। उनके लाल फरहरों पर उजले कपड़े से बने अच्छरों में कुछ लिखा है, हम उसको पढ़ना चाहते हैं। अच्छा देखो, हमने उसको पढ़ लिया-जो सबसे बड़ा और ऊँचा झण्डा है, वह आकाश से बातें करते हुए कह रहा है, ''धर्म की सदा जय'' उसके पास का एक झण्डा ललकार रहा है ''अन्त भले का भला और बुरे का बुरा'' और दूसरा धीरे-धीरे अपने फरहरे को उड़ाता है, और बतलाता है-''साँच को आँच नहीं''। इस मन्दिर के पास ही एक घर है, घर के द्वार पर बहुत से लोग इकट्ठे हैं, इस घर को हम लोग कई बार देख चुके हैं, यह हरमोहन पाण्डे का घर है, आओ देखें यहाँ क्या हो रहा है।

देखो, सामने एक लम्बी चौड़ी चाँदनी तनी हुई है, चाँदनी के नीचे चौकियों पर और चौकियों के नीचे धरती पर सुन्दर बिछावन बिछा हुआ है। एक एक, दो दो, चार चार, दस दस, करके लोग आ रहे हैं, और ढब से बिछावन पर बैठते जाते हैं। बिछावन ऊपर नीचे लगभग भर गया है, कितने ही लोग आसपास खड़े भी हैं, पर फिर भी भीड़ पर भीड़ चली आती है-और लोग टूटे पड़ते हैं, धीरे-धीरे हरमोहन पाण्डे के घर के पास की धरती लोगों से खचाखच भर गयी, कहीं तिल धरने को ठौर न रही, पर इतनी भीड़ होने पर भी ऊधाम नहीं था, सब लोग चुपचाप किसी की बाट देख रहे थे, पान बँट रहा था, पंखे झले जा रहे थे, और हरमोहन पाण्डे अपने दस बीस साथियों के साथ इन सब लोगों की आवभगत में लगे हुए थे।

अब हम घर के भीतर भी चलकर देखना चाहते हैं, वहाँ क्या होता है। हम लोगों में भलेमानसों के घर में जाने की चाल नहीं है। जिस भलेमानस के घर में लोग बेरोक टोक आते जाते हैं, न उसी को कोई भला समझता, और न वही भला गिना जाता, जो ऐसा करता है। पर आप आइये, हमारे साथ चले आइये, घबराइये नहीं, हम लोग सब ठौर बेरोकट-टोक आ जा सकते हैं, और अपने साथ औरों को भी ले जा सकते हैं। इससे न घरवाले को ही कोई बुरा कहता है, न हम्हीं लोगों को कोई बुरा बनाता। जब यह चाल है, तो वह चाल भले ही न हो, हमको और आपको हिचकने का कोई काम नहीं। आइये, चले आइये, देखिए, कैसा निराला समा है। आपने कभी खिला हुआ कमल देखा है? और जो देखा है तो ऐसे बहुत से कमल जिस तालाब में खिले हों, क्या ऐसे किसी तालाब की छटा की सुरत आपको है? आपने कभी हँसते हुए पूरे चाँद की शोभा देखी है? और जो देखी है तो ऐसे सैकड़ों चाँदों से सजे हुए आकाश की छवि को आपने अपने मन में कभी आँका है? हरे भरे पत्तों की आड़ में डाल पर बैठकर कोयल को आपने कभी कूकते सुना है? और जो सुना है तो कितने ही पेड़ों की झुरमुट में ऐसी कई एक कोयलों के बोलने की छटा का ध्यान आपने कभी किया है? जो सुरत नहीं है, मन में कभी नहीं आँका है, और ध्यान नहीं किया है, तो उसकी सुरत कीजिए। उस छवि को मन में आँकिये और उस छटा का ध्यान कीजिए। और फिर हरमोहन पाण्डे के घर की शोभा को उससे मिलाइये। आज हरमोहन पाण्डे के घर में सैकड़ों पूरे चाँद एक साथ निकले हैं, अनगिनत कँवल फूले हुए हैं, और रसीले कण्ठ से कितनी ही कोयलें बोल रही हैं। इस पर भाँत-भाँत और रंग-रंग के कपड़ों की फबन, गोटे पट्टे की चमक दमक, घुँघरुओं की झनकार और रंग दिखला रही हैं। एक ठौर चढ़ती जवानी की बहुत सी छबीलियाँ बैठी हैं, चाँद रस बरसा रहा है, कोयल बोल रही है, कँवल फूले हुए हैं और निराली गन्ध में बसी हुई बयार धीरे-धीरे चल रही है। वहीं देवहूती भी बैठी हुई घर में उँजाला कर रही है-आज उसके मुखड़े पर निराला जीवन है! अनूठी छटा है! और अनोखा आनन्द है! आज उसके गहनों कपड़ों की छवि देखे ही बन आती है। पास बैठी हुई छबीलियाँ उसको छेड़ रही हैं, और कभी इन सबों का वह ठहाका लगता है, जिससे सारा घर रहकर गूँज जाता है। हम यहाँ ठहरना नहीं चाहते, इन छबीलियों में हमारा क्या काम! पर एक बात जी में रही जाती है, देवहूती का आज यह ठाट क्यों!

इस दूसरी ठौर को देखो, यहाँ देवहूती की माँ पारबती बैठी हुई है, पास ही उसी के बय की सैकड़ों स्त्रियों डटी हुई हैं। भाँत-भाँत की बातें चल रही हैं, पर ओर छोर किसी का नहीं मिलता, जितने मुँह उतनी बातें सुनी जा रही हैं। कोई कुछ कहती है, तो दूसरी अपने मन से दस बातें और गढ़कर उसमें मिला देती है, न जाने कहाँ की छानबीन हो रही है। पारबती क्या कह रही है, जी करता है उसे सुनें, पर पास की स्त्रियों ने ऐसा गड़बड़ मचा रखा है, जिससे कुछ सुना नहीं जाता। जाने दो इस पचड़े को, चलो बाहर ही चलें, देखें अब वहाँ क्या हो रहा है।

देखो, अभी यहाँ वैसा ही जमघट है, लोग अभी तक उसी भाँत चुपचाप किसी की बाट देख रहे हैं-पर अब कोई आया ही चाहता है, क्योंकि लोगों में कुछ खलबली सी पड़ रही है। अच्छा, आओ, हम लोग भी यहीं ठहरें, देखें किसकी अवाई है!

मन्दिर के मण्डप में जो बाजा बज रहा था, धीरे-धीरे वह धुन से बजने लगा, जय और बधाई की धुन से सारी दिशाएँ गूँज उठीं, साथ ही गाँव के पाँच सात भलेमानसों के साथ धीरे-धीरे हमारे जाने-पहचाने देवस्वरूप ने उस जमघटे के बीच पाँव रखा। देवस्वरूप देखने में वैसे ही धीरे पूरे जान पड़ते थे, उनके मुखड़े का भाव वैसा ही था, धीरज उसी भाँति उस पर खेल रहा था, और जैसा गम्भीर वह पहले रहता था, अब भी था। वह सबसे जथाजोग मिलते-जुलते चाँदनी के भीतर आये, और उसके ठीक बीच में एक ठौर बैठ गये।

जब देवस्वरूप बैठ गये, उनके मौसेरे ससुर नन्दकुमार, अपनी ठौर से उठे, और सबकी ओर देखकर कहने लगे-

''आज आप लोगों को बड़े आनन्द के साथ मैं यह बतलाता हूँ-देवस्वरूप ही देवहूती के वह खोये हुए पति हैं-जिनके लिए हम लोगों का एक-एक दिन एक-एक बरस हो रहा था। मैं यह जानता हूँ मेरे इस बात को बतलाने के पहले ही सारा गाँव यह बात जान गया है, क्योंकि जो सारा गाँव पहले ही इस बात को न जान गया होता, तो आज गाँव में यह धुमधाम न होती। पर सबके सामने इस बात को छोड़ मुझको और दो चार बातें कहनी हैं, इसलिए आप लोगों के सामने कुछ कहने के लिए मैं खड़ा हुआ हूँ। कई बार देखादेखी होने पर भी देवस्वरूप ने हरमोहन पाण्डे को और हरमोहन पाण्डे ने देवस्वरूप को तब तक क्यों नहीं पहचाना, जब तक न्योते के दिन उन लोगों में बातचीत न हुई, यह शंका अब तक लोगों को बनी हुई है। यह शंका ठीक है; पर आप लोगों को जानना चाहिए-तिलक के दिन से ब्याह के दिनों तक एक दिन भी इन दोनों जनों में देखादेखी नहीं हुई थी और इसीलिए भेंट होने पर भी ये लोग एक दूसरे को न पहचान सके। तिलक चढ़ाने पुरोहितों के साथ मैं गया था, और ब्याह के दिनों पाण्डेजी अचानक कठिन रोग में फँस गये थे, इसी से देखा देखी न हो सकी थी। देवहूती ब्याह में बहुत छोटी थी, इसी से न उसको देवस्वरूप पहचान सके, और न देवस्वरूप को वह पहचान सकी। देवस्वरूप को पहचाना तो देवहूती की माँ ने पहचाना और वही पहचान सकती थीं, और उन्हीं के पहचानने से ही हम लोगों को आज का यह दिन देखने में आया। आप लोग कहेंगे-आज तक तुम कहाँ सोते थे, पर यह भी दिनों का फेर ही था, जो मैंने भी उसी दिन देवस्वरूप को देखा, जिस दिन यह बात धीरे-धीरे सब लोगों में फैल गयी थी। देवस्वरूप को लड़कपन में लोग देऊ कहते थे, उनके इस लड़कपन के नाम ने लोगों को और धोखे में डाला। अब मैं समझता हूँ आप लोग सब बात भली-भाँति समझ गये होंगे।''

इतना कहकर पण्डित नन्दकुमार अपनी ठौर पर बैठ गये। उस घड़ी जय और बधाई की वह धुम थी, जो किसी भाँति नहीं लिखी जा सकती है। जिस घड़ी यह धूमे मच रही थी, एक ऐसा उँजाला चाँदनी के भीतर छा गया, मानो बिजली कौंध गयी-साथ ही-

''धर्म का बेड़ा पार''

इस ध्वनि से सारी दिशा गूँज उठी।
 
आज दस बरस पीछे हम फिर बंसनगर में चलते हैं। पौ फट रहा है, दिशाएँ उजली हो रही हैं, और आकाश के तारे एक-एक कर के डूब रहे हैं। सूरज अभी नहीं निकला है, पर लाली चारों ओर दिशाओं में फैल गयी है। कहीं-कहीं पेड़ों के नीचे अभी भी गहरी अंधियाली है-पर अंधेरा धीरे-धीरे दूर हो रहा है। चिड़ियाँ बोल रही हैं, कौए काँव-काँव कर रहे हैं, फूल खिल रहे हैं, और सरजू नदी बयार के ठण्डे झोंकों से ठण्डी होकर धीरे-धीरे बह रही है। इसी सरजू के एक पक्के घाट पर एक जन बैठा हुआ पूजा कर रहा है, उसके माथे में चन्दन लगा है, उसकी दोनों आँखें अधखुली हैं, और मुखड़ा तेज से चमक रहा है। वह ऐसा एकचित्त होकर पूजा कर रहा है, और इस भाँति सच्चे जी से भगवान के भजन में लगा हुआ है, जिसको देखकर बड़े पापी का जी भी पसीज जाता है। हम जानना चाहते हैं, यह कौन है। यह और कोई नहीं, हमारे जान पहचानवाले देवस्वरूप हैं। सूरज निकलते-निकलते उन्होंने अपनी पूजा पूरी की, और सरजू के तीर से उठकर घर की ओर चले-एक टहलू जो देखने में बड़ा भलामानस जान पड़ता था-पीछे-पीछे साथ-साथ था।

हम कुछ घड़ी के लिए देवस्वरूप का साथ छोड़ना चाहते हैं-और देखना चाहते हैं, गाँव की आजकल क्या दशा है। बंसनगर गाँव पहले ही हरा भरा था, पर आजकल वह और चढ़ बढ़ गया था। गाँव में जो धनी थे, उनकी चर्चा ही क्या है-आजकल दीन दुखियों की दशा भी सुधर गयी थी। देवस्वरूप ने कामिनीमोहन का बहुत सा धन पाकर अपने ठाट-बाट में नहीं लगाया, जो ढंग उनका पहले था, अब भी था। देवहूती भी उन्हीं के दिखाये पथ पर चलती थी, लाखों रुपये की सम्पत्ति पाकर उसने अच्छे-अच्छे गहने नहीं गढ़ाये, अपने लिए ऊँचे-ऊँचे पक्के घर नहीं बनवाये। देवस्वरूप ने उसको समझाया, कामिनीमोहन के धन के हम कौन! जो अपने पसीने की कमाई नहीं, उसको अपने काम में लगाना अच्छा नहीं। तब वह धन जिससे बहुतों का भला हो सकता है, हम लोग अपने काम में क्यों लावें? चाहें बढ़ाने ही से बढ़ती हैं, फिर पहले ही उनको बढ़ने का अवसर क्यों दिया जावे? देवस्वरूप ने गाँव के दीन दुखियों की दशा देखी थी, कितनी ही अभागिनी राँड़ स्त्रियों के दु:ख पर कई बार आँसू बहाया था, उनको ये सब बातें भूली नहीं थीं। देश जिन बातों से दिन-दिन गिर रहा था, वे बातें भी दिन रात उनकी आँखों के सामने फिरा करतीं। इसलिए उन्होंने कामिनीमोहन का बहुत सा धन पाकर उसको अच्छे कामों में लगाया, आज उनके किये हुए अच्छे कामों से ही बंसनगर का ढंग निराला हो गया था। देवस्वरूप का साथ छोड़कर ज्यों हम आगे बढ़े, त्यों एक बहुत ही लम्बा-चौड़ा ऊँचा घर सामने दिखलाई पड़ा। इस घर के फाटक पर लिखा हुआ था-

कामिनीमोहन की धर्मशाला

आप आकर रहें यहाँ पर आज।

भाग्य ऐसे कहाँ हमारे हैं।

हमने इस धर्मशाले के भीतर पैठकर देखा, इसमें बटोहियों के सुख के लिए सब कुछ किया गया था। यहाँ बटोहियों को ठहराया ही नहीं जाता था, उनको दिन तक खाना भी मिलता था। और जो इसके कामकाजी थे, वे कितने भले और अच्छे थे, यह मुझसे बतलाया भी नहीं जा सकता। मैं उनकी आवभगत का ढंग देखकर मोह गया, उनकी मीठी बातों का रस चखकर जी ऊबता ही न था। मैं इस घर को भली-भाँति देखकर बाहर आया। बाहर आते ही इस घर से थोड़ी ही दूर पर बहुत ही लम्बा चौड़ा और कई खंडों में बँटा हुआ एक दूसरा घर मुझको दिखलाई पड़ा। इस घर के फाटक पर लिखा हुआ था-

कामिनीमोहन का बनाया हुआ

अनाथालय

है सहारा जिसे नहीं, उस पर।

कौन आँसू नहीं बहावेगा?

इस घर में जब मैं गया, देवस्वरूप के जी में कितनी दया है, यह बात मुझको भली-भाँति जान पड़ी। यहाँ सैकड़ों लड़के और लड़कियाँ मुझको दिखलाई पड़ीं। इन लड़के और लड़कियों के माँ-बाप नहीं थे, और न दूसरा कोई इनको सहारा देनेवाला था, इसलिए देवस्वरूप और देवहूती ने अपनी दया का हाथ इनके सर पर रखा था। गाँव में जब हम घुसने लगे थे, हमारे कान में यह भनक पड़ी थी-जिनके माँ-बाप नहीं उनके माँ और बाप देवहूती और देवस्वरूप हैं-इस घर में आकर हमने यह बात आँखों देखी। जितने लड़के और लड़कियाँ यहाँ थीं, सब ऐसे कपड़ों में थीं, और उनका मुखड़ा ऐसा हरा भरा था, जैसा बड़े सुख में पले लड़कों का भी नहीं देखा जाता। इन लड़कों को यहाँ लिखना-पढ़ना और दूसरे भाँति-भाँति के काम भी सिखलाये जाते थे, जिससे सयाने होने पर अपना पेट वे पाल सकें। सबसे बड़ी बात यह थी-ऐसे लड़कों की खोज के लिए देवस्वरूप ने पचीसों ऐसे लोग रखे थे, जो देश-देश में घूमकर यही काम किया करते थे। मेरा जी इस घर को देखकर भर आया, और मैं सोचने लगा-हाय! न जाने कितने लड़के इस भाँति सहारा न पाकर इस धरती से उठ जाते होंगे, न जाने कितने अपना सबसे अच्छा हिन्दू धर्म छोड़कर दूसरे धर्मों में चले जाते होंगे, पर हमारे देश में देवस्वरूप ऐसे कितने लोग हैं। हम सैकड़ों रुपये मिट्टी में मिला देते हैं, पर ऐसे कामों में एक पैसा भी हमसे नहीं उठाया जाता, क्या इससे भी बढ़कर कोई बात जी को दुखानेवाली है? इन बातों को सोचते मेरी आँखों में आँसू आने लगे, मैंने उनको बड़ी कठिनाई से रोका। इसी समय एक तीसरे घर पर दीठ पड़ी, इस घर के फाटक पर लिखा हुआ था-

कामिनीमोहन की पाठशाला

जिसने कुछ भी नहीं पढ़ा लिक्खा।

खो दिया हाथ का रतन उसने।

मैंने इस घर में जाकर देखा, गाँव के सब जात के लड़के इसमें पढ़ रहे थे, और देश काल के विचार से यहाँ सभी ढंग की पढ़ाई होती थी, साथ ही इसके जिसका जो निज का काम था वह काम भी उसको यहाँ सिखलाया जाता था। इस घर में भी बहुत से खंड थे, एक-एक खंड में एक-एक बातें सिखलायी और पढ़ायी जाती थीं। ब्राह्मणों को और ऐसे लड़कों को जिनको कोई सहारा न था, यहाँ खाना कपड़ा भी मिलता था। जिस खंड में ब्राह्मण के लड़कों को वेद पढ़ाया जाता था, उस खंड में जाने पर न जाने कितनी पुरानी बातें जी में घूमने लगीं। पण्डितों का सहज भेस, सीधी बोल चाल, और वेदों का सुर से पढ़ा जाना, बड़े पापी के जी में भी धर्म का बीज बोते थे। हमको यहाँ से हटना कठिन हो गया, पर किसी भाँति यहाँ से निकले, और ज्यों आगे बढ़े त्यों एक और लम्बा चौड़ा घर सामने दिखलाई पड़ा। इस घर के फाटक पर लिखा था-

कामिनीमोहन के नाम पर इस

घर में सदाबरत बँटता है।

मत कभी पेटजलों को भूलो।

भूख की पीर बुरी होती है।

गाँव में जो दीनदुखी हट्टे-कट्टे और काम करने योग्य थे, उन को रुपया, अन्न और गाय बैल देकर देवस्वरूप ने कई एक कामों में लगा रखा था। पर जो लूले, लँगड़े, अंधे, रोगी और अपाहिज थे, उन सबको यहाँ नित्य कोरा अन्न मिलता था। दूसरे गाँवों के भी ऐसे लोग जो सदाबर्त बँटने के बेले यहाँ आते, वे फेरे नहीं जाते थे। उन सबों की आवभगत भी यहाँ वैसी ही होती थी, जैसी गाँववालों की। हम यहाँ से और आगे बढ़े, कुछ दूर जाकर एक बहुत ही सुथरा और अच्छा घर दिखलाई पड़ा। इस घर के फाटक पर लिखा था-

कामिनीमोहन का बनाया हुआ

रोगियों के औषधी कराने का घर

हम उन्हें भूला समझते हैं बहुत।

रोगियों पर जो दया करते नहीं।

इस घर में, गाँव ही के नहीं, दूसरे गाँवों के भी बहुत से रोगी औषधी कराने के लिए आते थे। उन सबकी देखभाल और सम्हाल यहाँ बहुत ही जी लगाकर की जाती थी। रोगियों के ठहरने और रहने के लिए अलग-अलग बहुत से अच्छे-अच्छे घर थे-वहाँ उनको सब प्रकार का खाना भी मिलता था। जो यहाँ ठहरना नहीं चाहते थे, उनको औषधी ही दी जाती थी। जो निरे कंगाल और भूखे रहते, उनको कपड़े भी मिलते थे। जो यहाँ पका पकाया खाना चाहते, उनके लिए ब्राह्मण रखे हुए थे-जो कोरा अन्न माँगते थे, उनको कोरा अन्न ही मिलता था-रोगियों की टहल के लिए कई एक टहलू थे। अब तक यह सब देखते भालते हम सरजू के तीर से थोड़ा ही आगे बढ़े थे-पर अब यहाँ से और आगे बढ़कर हम गाँव में घुसे। गाँव में घुसने पर हमको एक घर भी उजड़ा हुआ न मिला। पहले गाँव में पचासों खंडहर थे, पर आजकल वे सब बस गये थे। गाँव में जिसको देखो वही सुखी, और वही काम में लगा हुआ दिखलाई देता। बीच गाँव में पहुँचने पर हमको कामिनीमोहन का घर दिखलाई दिया, साथ ही बहुत सी बातों की एक साथ सुरत हुई। इस घर के फाटक पर पहले जैसे आठ पहर पहरा पड़ा करता था, आज भी पड़ता था। पर हम पहरेवालों से कह सुनकर किसी भाँति फाटक के भीतर गये। इस घर में दो खंड थे, एक पुरुषों का, दूसरा स्त्रियों का। जो खंड पुरुषों का था उसमें हमको बहुत से लोग काम करते दिखलाई पड़े-ये सब कामकाजी थे, और जो बहुत से अच्छे-अच्छे काम देवस्वरूप ने खोले थे, उन सबकी लिखापढ़ी, देखभाल और उनका लेखा-जोखा इन लोगों के हाथ में था। मैं यहाँ से हटा और दूसरे खंड पर पहुँचा। यहाँ बड़ा कड़ा पहरा था। इस खंड के फाटक पर लिखा हुआ था-

अभागिनी फूलकुँवर ने अपना यह प्यारा

घर अपनी राँड़ बहनों को भेंट किया

सोग उसका सहा नहीं जाता।

हाय! जिसका रहा सुहाग नहीं।

हम इस खंड में जाने नहीं पाये, पर पूछने पर हमको सब बातें जान पड़ीं। इस घर में गाँव की ऐसी राँड़ स्त्रियों काम करती थीं, जो भले घर की थीं, और जिनका कहीं सहारा नहीं था। उनको यहाँ सिलाई, बेलबूटा काढ़ना, सूत का काम, और इसी ढंग से बहुत से और काम सिखलाये जाते थे, और उनसे बहुत थोड़ा काम लेकर, उनके खाने-पीने और कपड़ों का ब्योंत लगाया जाता था। पास ही लड़कियों की एक छोटी पाठशाला भी थी, इसके फाटक पर लिखा था-

फुलकुँवर की लड़कियों

की पाठशाला

वह लड़का भला न क्यों होगा।

माँ जिसकी पढ़ी लिखी होगी।

हम यहाँ से हटकर कामिनीमोहन की फुलवारी के फाटक पर पहुँचे। अब यह फुलवारी सबकी सम्पत्ति थी। देवस्वरूप ने इसको सारे गाँव के लोगों को दे दिया था। इसके फाटक पर लिखा हुआ था-

चौतुका

कौन चुप चाप कह रहा है वह।

क्यों छटा देख हम अटकते हैं।

दो दिनों भी न फूल रहता है।

किन्तु काँटे सदा खटकते हैं।

कामिनीमोहन

इस फाटक को छोड़कर हम आगे बढ़े। अब हमको देवस्वरूप का घर देखना था। जाते-जाते हमको हरिमोहन पाण्डे का घर मिला, और इसी घर की दाहिनी ओर देवस्वरूप का घर दिखलाई पड़ा, इस घर को देवस्वरूप ने अपने रुपये से बनवाया था, और आजकल वह देवहूती के साथ इसी में रहता थे। देवस्वरूप के पास बाप दादे की इतनी सम्पत थी, जिससे वह अपना दिन भली-भाँति बिता सकते थे, इसलिए कामिनीमोहन की सम्पत्ति में से वे अपने लिए कभी एक पैसा नहीं लेते थे, और अपने लिए जो कुछ करते थे, वह अपने बाप-दादे की सम्पत्ति से ही करते थे। इस घर के द्वार पर एक बहुत बड़ी बैठक थी, इसी बैठक में देवस्वरूप बैठे हुए थे, हम उसके भीतर गये। नित्य छ बजे दिन से ग्यारह बजे दिन तक देवस्वरूप अपने खोले सारे कामों की जाँच पड़ताल और देखभाल करते थे, इसके पीछे वे खाने पीने में लगते थे। अब बारह बजा ही चाहता था, इसलिए देवस्वरूप भी रोटी खाकर बैठक में आ गये थे। एक पाँच बरस का लड़का उनसे तोतली बातें कर रहा था, वह भी उसको खेला रहे थे, इसी बीच बारह बजा, और बैठक में एक कामकाजी आकर एक ओर बैठ गया, कुछ पीछे उजले कपड़ों में एक भलेमानस दिखलाई पड़े-देवस्वरूप ने उनको आदर से बैठाला, उनका कुशल छेम पूछा, उनसे मीठी-मीठी बातें कीं, टहलते-टहलते पास जाकर उनके अनजान में सबकी आँखें बचाते हुए उनके एक कपड़े के कोने में कुछ बाँध, और फिर अपनी ठौर आकर बैठ गये। ये अभी बाहर गये थे, इसी बीच किसी की चीठी लिए एक जन और वहाँ आया, और वह चीठी देवस्वरूप को दी। देवस्वरूप ने उसको खोलकर पढ़ा। उसमें लिखा था-

''तुम बिन नाथ सुने कौन मेरी

आपका

जगमोहन''

देवस्वरूप पढ़ते ही सब समझ गये, और उस पर लिखा ''पाँच फूल आपकी भेंट किये जाते हैं'' और पाँच रुपये उस जन को देकर वहाँ से चलता किया। बैठक में बैठे हुए कामकाजी ने चुपचाप लेखे के चिट्ठे पर लिखा-

नन्दकुमार लाल 5)

जगमोहन मिसिर 5)

एक बजे से चार बजे तक मेरे देखते-देखते कितने लोग आये, किसी ने अपनी लड़की का ब्याह बतलाया, किसी ने आँसू बहाया, किसी ने कोई और ही बहाना किया, और देवस्वरूप ने भी कुछ-न-कुछ सभी को दिया। ये जितने थे सब ऐसे थे, जिनका दिन कभी बहुत अच्छा था, पर अब पतला पड़ गया था, फिर भी भरम किसी भाँति बना था, देवस्वरूप ने उनके इस बने बनाये भरम को बिगाड़ना अच्छा नहीं समझा, और इसीलिए एक यह ढंग भी उन्होंने निकाल रखा था। उन्होंने अपने सामने एक चौकठा लटका रखा था, उसमें लिखा हुआ था-

देखिए बिगड़े नहीं उनका भरम।

मरते हैं पर माँग जो सकते नहीं।

इस ढंग की स्त्रियों के लिए, ठीक ऐसा ही ढंग देवहूती का था, और इसीलिए गाँव में घर-घर इन लोगों की जैजैकार होती थी। जो कुछ पढ़ना लिखना होता, देवस्वरूप इसी बेले पढ़ते लिखते भी थे, और पढ़ते-पढ़ते जो कोई काम ऐसा जान पड़ता जिसमें हाथ बँटाना वह अच्छा समझते, तो उसमें भी वह कुछ-न-कुछ देते थे। आज उन्होंने दो कामों में कुछ दिया, उन्हांने एक ठौर पढ़ा, बिजनौर में एक मन्दिर गिर रहा है, उस को फिर से ठीक करने के लिए पाँच सौ रुपये चाहिए-देवस्वरूप ने यहाँ सौ रुपये भेजे। दूसरी ठौर उन्होंने पढ़ा, बिहार में कुछ लोग अपनी देश भाषा की बढ़ती के लिए जतन कर रहे हैं, पर रुपये के टोटे से ठीक-ठीक काम नहीं चल सकता-देवस्वरूप ने यहाँ दौ सौ रुपये भेजे। इसी भाँति वे और और कामों में भी समय-समय पर कुछ-कुछ भेजा करते।

चार बजे देवस्वरूप अपनी बैठक से अपने दो चार साथियों के संग निकले और टहलते हुए गाँव के उत्तर और सरजू के तीर पर जा पहुँचे, हम भी साथ थे, यहाँ एक फुलवारी उन्होंने बनवायी थी, इस फुलवारी के चारों ओर ईंट की पक्की भीत थी, और भाँति-भाँति के बेल बूटे और फल फूल के पेड़ों से इसकी निराली छटा थी। फुलवारी के ठीक बीच में एक छोटा-सा पक्का तालाब था। जिसमें बहुत ही सुथरा जल भरा हुआ था। देवस्वरूप टहलते-टहलते इसी तालाब के पास आये और वहीं एक सुथरी ठौर देखकर बैठ गये। इस तालाब के पास एक बहुत ही सुन्दर मन्दिर था, इस मन्दिर के द्वार पर सोने के अच्छरों में खुदा हुआ एक पत्थर लगा था, जिसमें यह लिखा था-

फूलदेवी का मन्दिर

जो भरी हो भले गुनों ही से।

कौन देवी उसे न समझेगा।

देवी कौन है? वही, जिसमें अच्छे गुण हों, मैं समझता हूँ फूलकुँवर ऐसी अच्छे गुणवाली स्त्री कोई होगी। उनकी दया और भलमनसाहत की बड़ाई कहाँ तक करें कामिनीमोहन ऐसे पति पर भी उनका इतना सच्चा प्यार था, जो उनके मरने के एक महीने के भीतर ही उन्होंने भी यह लोक छोड़ा। कौन ऐसा कलेजा है जो इन बातों को जान कर भी न कसकेगा! हम लोग उसी फूलदेवी का यह मन्दिर बनाकर अपने को धन्य समझते हैं, और सच्चे जी से उनका और उनके पति का उस लोक में भला चाहते हैं।

देवस्वरूप और देवहूती।

पत्थर पढ़कर मुझको मन्दिर देखने की बड़ी चाह हुई। मैं हाथ-पाँव धोकर और कुछ फूल लेकर मन्दिर के भीतर गया। वहाँ जाकर देवी की मूर्ति देखने के पीछे मेरी जो गत हुई, मैं उस को किसी भाँति नहीं बतला सकता। बहुत मोल के एक पत्थर की चौकी पर एक अपसरा ऐसी सुन्दर स्त्री की मूर्ति खड़ी थी-मुखड़ा हँसता हुआ होने पर भी कुम्हलाया हुआ था-उस पर गहरी उदासी झलक रही थी। दोनों आँखें आकाश की ओर लगी हुई थीं, जिनसे पलपल कलेजे को टुकड़े-टुकड़े करती हुई निराशा टपक रही थी। दोनों हाथों में दो कमल के फूल थे, जो खिलते-खिलते कुम्हला गये थे, और देह पर के एकाध गहने और कपड़े इस ढंग से बने थे, जिनके देखते ही यह बात अचानक मुँह से निकलती थी-हा! परमेश्वर! ऐसों की भी यह गत!!! सिर के ऊपर ठीक सामने आकाश में ऊपर उठते हुए कामिनीमोहन की मूर्ति बनी हुई थी, जिसके चारों ओर धीरे-धीरे अंधियाली घिर रही थी, पर बीच-बीच में एक जोत फूटती थी, जो उस अंधियाली को दूर करना चाहती थी। पास ही दाहिनी ओर चौकी के नीचे देवहूती की मूर्ति बनी हुई थी, जो अपने हाथ की अंजुली से उसके पाँवों पर फूल डाल रही थी।

मैंने भी सर झुकाकर हाथ के फूलों को फूलदेवी के पाँवों पर डाला, पीछे कलेजा पकड़े हुए मन्दिर के बाहर आया। यहाँ देवस्वरूप की बुरी गत थी, वे फूलकुँवर और कामिनीमोहन की चर्चा अपने साथियों से कर रहे थे, और बेढब दुखी थे। पीछे वह सरजू पर आये, सूरज को डूबता देखकर कुछ पूजा की, फिर घर की ओर चल पड़े। घर आकर वह नौ बजे तक आये हुए लोगों से मिलते-जुलते रहे, जब नौ बज गया, वे घर के पास के मन्दिर में गये। यहाँ एक घण्टे तक उन्होंने एक पण्डित से रामायण की कथा सुनी, पीछे मन्दिर की आरती हो जाने पर घर आये। अब दस बज गये थे, इसलिए खा पीकर वे सोने गये। हम भी यहीं तक उनके साथ थे। उनके सोने के घर में जाते ही हम उनसे अलग हुए।

देवस्वरूप बहुत दिन तक इस धरती पर रहे, उनके हाथों देश का, देश के लोगों का बहुत कुछ भला हुआ। देवहूती भी उन की छाया थी, जितने भले काम देवस्वरूप ने किये उन सबमें उस का हाथ था।

अब इस धरती पर न देवस्वरूप हैं, न देवहूती! पर यश उन का अब तक है। नरक स्वर्ग कोई मानता है, कोई नहीं मानता पर यश अपयश सभी मानते हैं। नित्य लाखों लोग इस धरती पर जनमते मरते हैं, पर देवस्वरूप की भाँत यश बटोरनेवाले कितने माई के लाल हैं?

end
 
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