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अधूरा प्यार-- एक होरर लव स्टोरी compleet

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Guest
अधूरा प्यार-- एक होरर लव स्टोरी

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा एक और नई कहानी लेकर हाजिर हूँ दोस्तो इस कहानी मैं रहस्य रोमांच सेक्स भय सब कुछ है मेरा दावा जब आप इस कहानी को पढ़ेंगे तो आप भी अपने आप को रोमांच से भरा हुआ महसूस करेंगे दोस्तो कल का कोई भरोसा नही.. जिंदगी कयि बार ऐसे अजीब मोड़ लेती है कि सच झूठ और झूठ सच लगने लगता है.. बड़े से बड़ा आस्तिक नास्तिक और बड़े से बड़ा नास्तिक आस्तिक होने को मजबूर हो जाता है.. सिर्फ़ यही क्यूँ, कुच्छ ऐसे हादसे भी जिंदगी में घट जाते है कि आख़िर तक हमें समझ नही आता कि वो सब कैसे हुआ, क्यूँ हुआ. सच कोई नही जान पाता.. कि आख़िर वो सब किसी प्रेतात्मा का किया धरा है, याभगवान का चमत्कार है या फिर किसी 'अपने' की साज़िश... हम सिर्फ़ कल्पना ही करते रहते हैं और आख़िर तक सोचते रहते हैं कि ऐसा हमारे साथ ही क्यूँ हुआ? किसी और के साथ क्यूँ नही.. हालात तब और बिगड़ जाते हैं जब हम वो हादसे किसी के साथ बाँट भी नही पाते.. क्यूंकी लोग विस्वास नही करेंगे.. और हमें अकेला ही निकलना पड़ता है, अपनी अंजान मंज़िल की तरफ.. मन में उठ रहे उत्सुकता के अग्यात भंवर के पटाक्षेप की खातिर....

कुच्छ ऐसा ही रोहन के साथ कहानी में हुआ.. हमेशा अपनी मस्ती में ही मस्त रहने वाला एक करोड़पति बाप का बेटा अचानक अपने आपको गहरी आसमनझास में घिरा महसूस करता है जब कोई अंजान सुंदरी उसके सपनों में आकर उसको प्यार की दुहाई देकर अपने पास बुलाती है.. और जब ये सिलसिला हर रोज़ का बन जाता है तो अपनी बिगड़ती मनोदशा की वजह से मजबूर होकर निकलना ही पड़ता है.. उसकी तलाश में.. उसके बताए आधे अधूरे रास्ते पर.. लड़की उसको आख़िरकार मिलती भी है, पर तब तक उसको अहसास हो चुका होता है कि 'वो' लड़की कोई और है.. और फिर से मजबूरन उसकी तलाश शुरू होती है, एक अनदेखी अंजानी लड़की के लिए.. जो ना जाने कैसी है...

इस अंजानी डगर पर चला रोहन जाने कितनी ही बार हताश होकर उसके सपने में आने वाली लड़की से सवाल करता है," मैं विस्वाश क्यूँ करूँ?" .. तो उसकी चाहत में तड़प रही लड़की का हमेशा एक ही जवाब होता है:

"मुर्दे कभी झूठ नही बोलते "

नीचे महफ़िल जम चुकी थी.. कुच्छ देर रवि का इंतजार करने के बाद अमन ने वहीं प्रोग्राम जमा लिया.. गिलासों को खड़खड़ाते अब करीब आधा घंटा हो चुका था.. शराब के नशे में रोहन वो सब कुच्छ बोलने लगा था जिसको बताने में अब तक वो हिचक रहा था...

"ओह तेरी.. फिर क्या हुआ?" अमन जिगयासू होकर आगे झुक गया...

"छ्चोड़ो यार.. क्यूँ टाइम खोटा कर रहे हो.. आइ डॉन'ट बिलीव इन ऑल दीज़ फूलिश थिंग्स.. एक सपने को लेकर इतना सीरीयस और एमोशनल होने की ज़रूरत नही है.. " शेखर सूपरस्टिशस किस्म की बातों में विस्वाश नही कर पा रहा था...

"पूरी बात तो सुन ले डमरू... रोहन ने शेखर को डांटा और कहानी सुनाने लगा....

"कौन डमरू.. मैं.. हा हा हा...!" शेखर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा...," डमरू.. हा हा हा!"

"तुझे नही सुन'नि ना.. चल.. जाकर सामने बैठ.. और अपना मुँह बंद रख.. मैं मानता हूँ.. और मुझे सुन'नि हैं..." अमन आकर सामने वाले सोफे पर शेखर और रोहन के बीच में फँस गया.. शेखर उठा और बड़बड़ाता हुआ सामने चला गया," डमरू.. हा हा हा!"

बातें अभी चल ही रही थी की मुस्कुराते हुए रवि ने कमरे में प्रवेश किया..," अच्च्छा.. अकेले अकेले..!"

शेखर उसके आते ही खड़ा हो गया," साले डमरू! अकेले अकेले तू फोड़ के आया है या हम.. ? बात करता है...

"भाई तू मेरे को डमरू कैसे बोल रहा है.. वो तो रोहन बोलता है..." रवि ने उसके पास बैठते हुए कहा...

"क्यूंकी मेरे अंदर रोहन का भूत घुस आया है.. हे हे हा हा हो हो!" शेखर ने भूतों वाली बात का मज़ाक बना लिया....

"चुप कर ओये जॅलील इंसान.. ऐसी बातों को मज़ाक में नही लेते.. किसी के साथ भी कुच्छ भी हो सकता है..." अमन ने प्यार से उसको दुतकारा...

"किस के साथ क्या हो गया भाई? मुझे भी तो बता दो.." रवि ने अपना गिलास उठाया और सबके साथ चियर्स किया...

"वो बात बाद में शुरू से शुरू करेंगे.. अब सबको सीरीयस होकर सुन'नि हैं.. पहले तू बता.. दी भी या नही.. मुझे तो उसकी चीख सुनकर ऐसा लगा जैसे तू अपना हाथ में पकड़े उसके पिछे दौड़ रहा है.. और वो बचने के लिए चिल्लाती हुई कमरे में इधर उधर भाग रही है...हा हा हा.. साली ने नखरे बहुत किए थे पहले दिन... मैं ऐसी नही हूँ.. मैं वैसी नही हूँ.. पर डालने के बाद पता लगा वो तो पकई पकाई है..." अमन ने अपना अनुभव सुनाया....

रवि ने छाती चौड़ी करके अपने कॉलर उपर कर लिए," देती कैसे नही... !"

"अरे... सच में.. चल आ गले लग जा.. बधाई हो बधाई.." अमन आकर उसके गले लग गया..," हां.. यार.. बात तो तू सही कह रहा है.. सलमा की खुश्बू आ रही है तेरे में से.... पर वो चिल्लाई क्यूँ यार.. साली एक नंबर. की नौटंकी है.. तुझे भी यही कह रही थी क्या कि पहली बार मरवा रही हूँ.." अमन ने वापस रोहन के पास बैठते हुए कहा...

" नही यार.. वो तो साना की चीख थी... उसकी पहली बार फटी है ना आज!" रवि ने अपनी बात भी पूरी नही की थी कि अमन ने गिलास रखा और उच्छल कर खड़ा हो गया..," तूने साना की मार ली????"

"हां.. कुच्छ ग़लत हो गया क्या?" रवि ने मरा सा मुँह बनाकर कहा...

"ग़लत क्या यार..? ये तो कमाल हो गया.. साली को तीन बार बुला चुका हूँ.. सलमा के हाथों.. पर वो तो हाथ ही नही लगाने देती थी यार.. तूने किया कैसे.. अब तो ज़ोर की पार्टी होनी चाहिए यार.. ज़ोर की.. तूने मेरा काम आसान कर दिया...!" अमन जोश में पूरा पैग एक साथ पी गया...

"वो कैसे? " रवि की समझ में नही आई बात....

"क्या बताउ यार.. तुझे तो पता होगा.. वो और सलमा दोनो सग़ी बेहन हैं..!"

अमन को रवि ने बीच में ही टोक दिया," क्या? सग़ी बेहन हैं.. ?"

"हां.. चल छ्चोड़ यार.. लंबी कहानी है.. उसके बारे में बाद में बात करेंगे... पहले रोहन भाई की सुनते हैं.. चल भाई रोहन.. अब सब इकट्ठे हो गये हैं.. शुरू से शुरू करके आख़िर तक सुना दे.. पहले बोल रहा हूँ शेखर.. बीच में नही बोलेगा.. देख ले नही तो...!" अमन शेखर को चेतावनी सी देते हुए बोला..

"नही बोलूँगा यार... चलो सूनाओ!" कहकर शेखर भी रोहन की और देखने लगा....

रोहन ने कहानी सुननी शुरू कर दी.....

"आबे, ये क्या था?" रोहन अचानक ही आसपास की घनी झाड़ियों से अपनी और उच्छल कर आए गिलहरी नुमा जानवर को देखकर उच्छल कर तीव्रता से एक और हट गया.. जानवर की उछाल में जिस प्रकार की तीव्रता थी, उस'से यही प्रतीत हुआ की उसने उन्न पर हमला करने का प्रयास किया था...," तूने इसके दाँत देखे?"

करीब 10 - 10 फीट की लंबी छलान्ग लगाता हुआ वो उस उबड़ खाबड़ रास्ते के दूसरी तरफ की झाड़ियों में खो गया..

दोनो 2 पल वहीं खड़े होकर उस अजीबोगरीब गिलहरी को आँखों से औझल होते देखते रहे.. और फिर से अपनी अंजान मंज़िल की और बढ़ चले..

"अफ.. कहाँ ले आया यार...? कितना सन्नाटा है यहाँ? यहाँ पर तो आदमी की जात भी नज़र नही आती... कितना अजीब सा लग रहा है यहाँ सब कुच्छ... तुझे लगता है यहाँ तुझे तेरी नीरू मिल जाएगी..? ... देख मुझे तो लगता है किसी ने तेरा उल्लू बनाया है.. क्यूँ बेवजह अपनी रात बर्बाद कर रहा है... और मेरी भी.. चल वापस चल!" नितिन ने बोलते हुए सावधानी बरत'ने के इरादे से रिवॉल्वेर निकाल कर अपने हाथ में ले ली..

"ऐसी बात नही है यार.. वो यहीं रहती है.. आसपास, देखना! कोशिश करेंगे तो वो हमें ज़रूर मिलेगी.. वो अगर नही मिली तो मैं पागल हो जाउन्गा यार!" रोहन ने आगे चलते चलते ही बात कही...

नितिन आगे आगे बहुत चौकन्ना होकर चल रहा था.. चौकन्ना होना लाजिमी भी था.. जहाँ इस समय वो थे, उस जगह के आसपास कोई शहर या गाँव नही था.. हर तरफ सन्नाटे की भयावह सी चादर पसरी हुई थी... आवाज़ें अगर आ रही थी तो मैंधको के टर्रने की, और रह रह कर झाड़ियों के झुरपुट में कुच्छ रेंगते होने की...दूर दूर तक कृत्रिम रोशनी का नामोनिशान तक नही था.. बस आधे चाँद और टिमटिमाते हुए तारों की हुल्की फुल्की रोशनी ही थी जो उनको रास्ता दिखा रही थी.. रास्ता भी ऐसा जो ना होने के ही बराबर था.. कहीं उँचा, कहीं नीचा.. बीच बीच में गहरे गहरे गड्ढे.. इतने गहरे की ध्यान से ना चला जाए तो अचानक पूरा आदमी ही उनमें गायब हो जाए.. दोनो और करीब 4 - 4 फीट ऊँची झाड़ियाँ थी...

"अब रास्ता सॉफ होता तो गाड़ी ही ले आते.. तुझे क्या लगता है..? यहाँ पर कोई इंसान रहता होगा.. और वो भी लड़की.. सच बताना, खुद तुझे डर नही लग रहा, यहाँ का माहौल देख कर..." नितिन ने चलते चलते रोहन से सवाल किया...

"डर लग रहा है तभी तो तुम्हे लेकर आया हूँ भाई.. नही तो मैं अकेले ही ना चला आता.." रोहन ने जवाब दिया..और अचानक ही उच्छल पड़ा," नितिन देख.. आगे पक्की सड़क दिखाई दे रही है.. मैं ना कहता था.. हम ज़रूर कामयाब होंगे... आगे ज़रूर कोई बस्ती मिलेगी... देख लेना!"

"आबे बस्ती के बच्चे.. उस'से कोई ढंग का रास्ता भी तो पूच्छ सकता था तू.. आख़िर वो लोग भी तो शहर जाते होंगे..?" नितिन को भी आगे का रास्ता पिच्छले रास्ते के मुक़ाबले बेहतर देख कर कुच्छ उम्मीद बँधी....

"यार, क्या करूँ, जब यही एक रास्ता बताया उसने...!" रोहन ने तेज़ी से चलना शुरू कर चुके नितिन के कदमों से कदम मिलाते हुए कहा....

"अजीब प्रेमिका है तेरी.. एक तो रात में मिलने की ज़िद करी और उपर से रास्ता ऐसा बताया.. चल देख.. लगता है हम पहुँचने ही वाले हैं.. उधर लाइट दिखाई दे रही है.." नितिन ने अपनी बाई तरफ हाथ उठा कर इशारा करते हुए कहा...

दोनो बाई तरफ मुड़े ही थे की अचानक ठिठक गये..," यहाँ तो पानी है..यार!" रोहन ने अपने कदम वापस खींचते हुए कहा..

"हुम्म.. कोई तालाब लगता है..चल.. आगे से रास्ता होगा... !" नितिन ने रोहन से कहा और दोनो फिर से सीधे रास्ते पर चल पड़े..
 
कुच्छ आगे जाकर उनको एक पगडंडी सी बाई और जाती दिखाई दी.. दोनो ने आँखों ही आँखों में उस रास्ते पर सहमति जताई और उस और बढ़ चले...

"ओह तेरी मा की आँख.. यहाँ तो कीचड़ है..! चल वापस चल.. ये रास्ता नही है.." मन ही मन नितिन उस लड़की को कोस रहा था जिसके प्यार में पागल रोहन अपने साथ साथ उसकी भी दुर्गति कर रहा था...

"यार, आधे रास्ते तो आ ही चुके हैं... आगे चलकर तलब में धो लेंगे पैर.. अब वो लाइट भी नज़दीक ही दिखाई दे रही है..." रोहन ने मायूसी से नितिन को देखते हुए कहा..

"चल साले.. अगर फिर भी लड़की नही मिली तो देख लेना... ऐसी बकवास जगह मैने आज तक नही देखी" बड़बड़ाता हुआ नितिन फिर से रोहन के आगे आगे चलने लगा...

"देखी क्यूँ नही है? तू तो मास्टर है ऐसे ठिकानो का... आधी जिंदगी तो तूने जंगलों में गुज़ार दी.. मुझ पर अहसान करने के लिए बोल रहा है क्या?" रोहन ने उस पर मजाकिया व्यंग्य किया...

"हां.. गुज़ारी है.. मगर ऐसे थोड़े ही.. पूरे बंदोबस्त के साथ चलना पड़ता है.. तू तो मुझे ऐसे ले आया जैसे हम उनके जन्वाइ हैं और हमारे इंतज़ार में वो किसी एरपोर्ट पर पलकें बिच्छाए बैठे होंगे.. राम जाने किस घड़ी कौन जानवर बाहर निकल आए? वो तो अच्च्छा हुआ में कम से कम अपनी रिवॉल्वेर साथ रखता हूँ.. कोई भरोसा है ऐसी बीहड़ सुनसान जगह का.." नितिन ने संभाल संभाल कर पैर रखते हुए बोला... दोनो की पेंट कीचड़ के छ्चींटों से घुटनो तक सन गयी थी..

उसके बाद ज़्यादा देर उनको चलना नही पड़ा.. कुच्छ दूर और चलने पर वो एक सॉफ सुथरे रास्ते पर पहुँच गये.. रास्ता पुराने जमाने की छ्होटी छ्होटी ईंटों से बना हुआ था.. वो जगह कोई चौराहा लग रही थी.... पानी का 'वो' तालाब यहाँ तक भी फैला हुआ था.. " चल, अपने पैर सॉफ करके आगे चलते हैं.. अब वो घर भी ज़्यादा दूर नही लगता..." रोहन ने गहरी साँस लेते हुए कहा..

दोनो ने वहाँ पानी में अपने पैर धोए और फिर से आगे बढ़ गये...

"यार, यहाँ गलियाँ और दीवारें तो इतनी दिखाई दे रही हैं.. पर घर कहाँ हैं.. ? क्या इस गाँव में वो एक ही घर है जहाँ लाइट जल रही है...?" नितिन ने हैरानी से रोहन की और देखा...

"मैने पूचछा नही यार.. क्या पता एक ही हो.. चल.. तू चलता रह!" रोहन ने खिसियाई हुई बिल्ली की तरह से बेतुका सा तर्क दिया और अपने प्यार को पाने की उम्मीद में आगे बढ़ता रहा.. नितिन के साथ साथ..

बड़े ही विस्मयकारी अनुभव का सामना दोनो को करना पड़ रहा था.. काफ़ी देर तक चलने के बाद भी वो 'रोशनी' उनसे अभी भी उतना ही दूर लग रही थी.. उन्होने गलियाँ भी बदली, पर हर बार कुच्छ दूर चलते ही फिर से वो रोशनी ठीक उनके सामने आ जाती.. और फिर से उनको उसी रास्ते पर चलते रहने का अहसास होता...

"धात तेरे की... देख.. रोहन.. मुझे तो सब कुच्छ गड़बड़ लग रहा है.. भला ऐसी जगह पर भी आजकल कोई घर बनाता है.. 'वो' लड़की सच में यहाँ होगी ना...?" नितिन थक हार कर खड़ा हो गया...

"है ना भाई.. तू मेरा.. अरे.. देख बच्चा!" रोहन एक दम उच्छल पड़ा..

रोहन की बात सुनते ही नितिन का दिल उसकी बल्लियों पर आ गया..," बच्चा.. रात के 11 बजे.. घर से बाहर, वो भी ऐसी सुनसान जगह पर? आख़िर तू मुझे बात क्लियर क्यूँ नही कर रहा.. कौन है वो लड़की.. यहाँ आख़िर करते क्या होंगे उसके घर वाले..!" नितिन का दिमाग़ चकराने लगा था.. जिस तरह सी परिस्थितियाँ वहाँ उत्पन्न हो रही थी.. ऐसा होना लाजिमी ही था...

रोहन ने बिना कुच्छ बोले नितिन का हाथ पकड़ा और उस 'बच्चे' की और लपका..

दीवार के साथ खड़ा वो बच्चा झुक कर कुच्छ कर रहा था.. जैसे ही वो दोनो उसके करीब पहुँचे.. वो पलट कर मुस्कुराया...

बड़ा ही मासूम सा बच्चा था.. करीब 8 साल की ही उमर होगी.. दोनो उसकी शकल देखते ही हैरान रह गये.. उसके मुँह पर ऐसा लगता था जैसे किसी चोट का घाव बना हुआ हो.. ताज़ा घाव.. उसके होंटो के पास से खून रिस रहा था.. उसकी आँखों में गहरी चमक थी.. और चेहरे पर अजीब सा मैलापन...

दोनो उस'से कुच्छ दूरी पर ठिठक गये.. बच्चा उनकी और लगातार, बिना पलकें झपकाए देख रहा था.. उसकी आँखों में ना तो आसचार्य का भाव था.. ना ही किसी तरह के भय का.. पर आँखों की तेज चमक में भी अजीब से सूनेपन ने उनको चौंका दिया...

नितिन ने उस'से फासला बनाए हुए ही सवाल किया," यहाँ क्या कर रहे हो, बेटा.. इतनी रात को...?"

"अपने पैरों का कीचड़ सॉफ कर रहा हूँ अंकल.." बड़ी ही मासूमियत से बच्चे ने जवाब दिया.. उसकी आवाज़ और बात करने के ढंग से उनको कहीं से भी ये अहसास नही हुआ की उसकी उमर 4 साल से उपर होगी.. हालाँकि कद काठी से पहले उन्होने उसके 7-8 साल का होने का अनुमान लगाया था...

"यहाँ कोई नीरू रहती है.. ? बता सकते हो उसका घर कौनसा है?" रोहन का दिल बैठने लगा था.. यहाँ तो सब कुच्छ अजीब ही हो रहा था.. उसने जल्दी से वहाँ से टलने में ही भलाई समझी...

लड़के ने उंगली उठा कर रोशनी की और इशारा कर दिया..," वहाँ! हम सब वहीं रहते हैं.. उस हवेली में!"

"मतलब... मतलब तुम.. तुम्हारी कुच्छ लगती है क्या वो?" रोहन को रह रह कर झटके से लग रहे थे....

"पर उस 'हवेली' का रास्ता किधर से है.. हम तो ढूँढते ढूँढते थक गये.. और तुम घर क्यूँ नही गये अभी तक.. यहाँ क्या कर रहे हो..?" नितिन ने बच्चे से सवाल किया..

"मैं खो गया हूँ अंकल.. मुझे भी रास्ता नही मिल रहा.. इतने दीनो से ढूँढ रहा हूँ.." लड़के ने उतनी ही मासूमियत से जवाब दिया..

"क्क्कितने दीनो से..?" लड़के के हर जवाब के साथ दोनो के दिल की गति बढ़ती जा रही थी..

" 74 साल से....?"

"भाग नितिन.. भाग.. हम फँस गये नही तो.. समझ ले मारे गये.." रोहन ने नितिन का हाथ पकड़ कर अपनी और खींचा.. भागने के लिए.. पर जाने क्यूँ नितिन वहाँ से हिल नही पाया...शायद उत्सुकतावश," क्यूँ मज़ाक कर रहे हो यार? क्यूँ झूठ बोल रहे हो..?"

इस बार लड़के के चेहरे पर शिकन और शदियो पुरानी तड़प उभर आई," मैं मज़ाक क्यूँ करूँगा अंकल? मरे हुए लोग झूठ नही बोलते!"

रोहन की वहीं खड़े खड़े घिघी बाँध गयी.. जिस तरह की अजीबोगरीब परिस्थितियाँ वहाँ उत्पन्न हो रही थी, जिस तरह से वो बच्चा उन्हे मिला और जो कुच्छ उसने बोला.. दोनो के कलेजे बाहर निकल आने पर उतारू हो गये.. रोहन को अहसास हो रहा था की उसने यूँ पागलपन में यहाँ आकर कितनी बड़ी भूल की है.. वो खड़े पैर वहाँ से भागना चाहता था, पर नितिन को वहाँ छ्चोड़कर कैसे भागे.. वो बस नितिन के इशारा करने का इंतज़ार कर रहा था, जिसने घबराहट में अपनी रिवॉल्वेर उस बच्चे पर तान दी," गेट आउट फ्रॉम हियर?"

"क्या अंकल?" नन्हे से बच्चे के चेहरे से नादानी और मासूमियत छू छू कर टपक रही थी..

"दफ़ा हो जाओ यहाँ से! भाग जाओ..."

" पर मुझे एक बार घर छ्चोड़ आओ ना.. मुझे घर नही मिल रहा है..!" बच्चे ने विनम्रता से प्रार्थना की...

सिर्फ़ उस लड़के की वो प्यारी सी आवाज़ ही थी जो अब तक उन्हे पैरों पर खड़े रहने लायक साहस दे रही थी.. पर आगे बढ़ने की तो बात सोचना भी अब दुश्वार था.. नितिन ने रोहन की आँखों में देखा और वो उल्टे पाँव हो लिए.. कुच्छ दूर तक यूँही सावधानी पूर्वक पिछे देखते देखते जब वो उस बच्चे की आँखों से औझल हो गये तब जाकर रोहन की आवाज़ निकली," रास्ता याद है ना भाई...?"

"सीधा चलता रह.. अब अपनी बकबक बंद रख थोड़ी देर" नितिन ने गुस्से से उसको झिड़क दिया..

उसके बाद तो उन्होने कीचड़ वाले रास्ते से होते हुए सड़क पर जाकर ही दम लिया.. तब तक तो शायद साँस भी गिन गिन कर ले रहे थे... दोनो तेज़ी से एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए आगे बढ़ने लगे.. अब मेंधकों का टर्राना उनको किसी भूत नगरी में चल रहे रहस्यमयी संगीत से कम नही लग रहा था.. झाड़ियों में ज़रा सी भी सरसराहट होते ही दोनो की साँसे जम जाती थी.. राम का नाम जप्ते जप्ते आख़िरकार वो अपनी गाड़ी तक पहुँच ही गये... पर जहाँ पैदल जाने में उनको एक घंटे से भी ज़्यादा का समय लगा था.. वापस आने में आधा घंटा भी नही लगा...

"साले, कहाँ मौत के मुँह में ले गया था तू मुझे..?" नितिन ने गाड़ी स्टार्ट करके बे-इंतहा पसीने से सना अपना चेहरा पौच्छा..

"सॉरी भाई.. मुझे नही पता था कि...." रोहन भी अब ढंग से साँसे ले पा रहा था..

"आबे सॉरी के बच्चे.. ये बता आख़िर नीरू है कौन? क्या लॅफाडा है तेरा उस'से.. और उसने तुझे यहाँ क्यूँ बुलाया था..." नितिन ने बनावटी गुस्से से कहा.. उसको इस बात का सुखद अहसास था कि वो सकुशल वापस लौट आए.. 'वहाँ से'

गाड़ी ने जैसे ही रफ़्तार पकड़ी.. उसको अहसास हो गया की कुच्छ ना कुच्छ गड़बड़ ज़रूर है," गाड़ी पंक्चर हो गयी है.. शायद.. अब क्या करें?" कहकर नितिन ने गाड़ी की रफ़्तार धीमी करते हुए उसको साइड में रोक दिया...

रोहन सहमी हुई नज़रों से नितिन को देखने लगा," सॉरी यार.. मेरी वजह से..."

नितिन उसकी बात पर ध्यान दिए बिना गाड़ी से उतरा और टाइयर चेक किए.. चारों टाइयर ज़मीन में धाँसे हुए से थे.. सबकी हवा गायब थी.. नितिन वापस गाड़ी में आया और अपना सिर पकड़ कर बैठ गया...," अब क्या करें.. एक में पंक्चर होता तो.."

"अगला गाँव कितनी दूर है भाई.." रोहन खुद की नासमझी से नितिन को भी परेशानी में डाल देने के कारण शर्मिंदा था..

"होगा कोई 5-7 काइलामीटर और.. क्यूँ?" नितिन अब सामान्य हो चुका था.. जो होना था वह तो हो ही चुका था.. गनीमत थी जो हो सकता था, वह नही हुआ..

"वहाँ तक ले चलो किसी तरह.. शायद वहाँ कोई पंक्चर लगाने वाला मिल जाए.."

और कोई चारा भी नही था.. नितिन ने गाड़ी धीरे धीरे लुढ़कानी शुरू की...

गाँव आते ही उन्होने पहले ही घर के सामने गाड़ी रोक दी.. ये घर गाँव से बाहर था.. कुच्छ अलग हटकर," यहाँ पूछ्ते हैं.. गाँव में कोई पंक्चर लगाने वाला हो तो..."

दोनो गाड़ी से उतरे और दरवाजे के सामने जाकर उस पर थपकी लगाई..

"कौन?" घर के अंदर से आई निहायत ही मीठी आवाज़ ने उनके कानो में मिशरी सी घोल दी... आवाज़ किसी नवयौवना की लगती थी..

"जी.. हम बाहर से आए हैं.. थोड़ी मदद चाहिए..!" नितिन ने रोहन के बोलने से पहले ही जवाब दे दिया...

"बापू! वो आ गये.." अंदर से लड़की की वही सुरीली आवाज़ बाहर तक आ रही थी..

यहाँ तो रह रह कर झटके लग रहे थे.. नितिन ने रोहन की और देखा और धीरे से बोला," ये तो इस तरह से कह रही है जैसे ये हमारा इंतजार ही कर रहे थे.." कहकर दोनो सावधान हो गये....

'छर्र्र्र्र्र्र्र्र्ररर..' दरवाजा पुराना था.. इसी आवाज़ के साथ खुला.. एक बार को तो इस आवाज़ ने भी उनको डरा दिया था.. कहते हैं ना 'दूध का जला छाछ को भी फूँक फूँक कर पीता है...

करीब 60 साल के अधेड़ आदमी ने दरवाजा खोला.. उसकी आवाज़ में भी उतनी ही मधुरता थी.. उपर से नीचे तक दोनो को देखा और बोला," पुराने टीले से आए हो ना...?"

"ज्जई.. क्या मतलब? पुराना टीला? हम कुच्छ समझे नही..." दोनो की हालत देखने लायक थी.. रोहन मन ही मन सोच रहा था.. ये रात किसी तरह से गुजर जाए..

"तुम्हारे पैरों में ये चिपचिपा सा कीचड़ लगा है ना.. इसीलिए पूचछा.. ये वहीं का कीचड़ है!" बुड्ढे ने बिना किसी शंका के उनसे कहा..

दोनो ने जैसे ही नीचे झुक कर देखा..," हां पर..?"

"तुमने खूनी तलब के पास से गुज़रे होगे बेटा... आ जाओ.. अंदर आ जाओ!" बुद्धा कहकर पिछे घूमने लगा...

"ज्जिई.. जी.. नही.. धन्यवाद.. वो.. हमें बस.. यही पूच्छना था कि.. यहाँ पंक्चर कोई लगाता हो तो.. हमारी गाड़ी.." रोहन के लिए पल पल काटना मुश्किल हो रहा था...

"हे हे हे हे.. आ जाओ.. अंदर आ जाओ..!" बुड्ढे ने बड़े प्यार से रोहन की बाँह पकड़ी और हौले से अंदर खींच लिया... रोहन में जैसे प्रतिरोध करने की ताक़त बची ही ना हो.. कठपुतली की तरह वो अंदर उसके साथ घुस गया...

अब नितिन के पास भी कोई चारा नही बचा.. रोहन को यूँ छ्चोड़कर भागता कैसे? नही तो हालत अब तक उसकी भी पतली हो चुकी थी.... वो भी पिछे पिछे हो लिया....

"आओ बैठो! यहाँ आ जाओ..अर्रे भाई शर्मा क्यूँ रहे हो? आओ बैठो ना!" बुड्ढे ने उनको कमरे में ले जाते हुए पूरी शराफ़त के साथ उन्न पर हक़ जताते हुए बात कही.. पर शराफ़त और मासूमियत के पिछे छिपि भयावहता को उन्होने घंटा भर पहले ही महसूस किया था.. इसीलिए दोनो के मन में उथलपुथल जारी थी.. दोनो ने एक दूसरे की आँखों में देखा और पूरी सतर्कता बरत'ते हुए दीवार के साथ बिछे पलंग पर जा बैठे.. उनकी कमर के पिछे सिर्फ़ एक सपाट दीवार थी.. वो वहाँ इसीलिए बैठे ताकि कमरे में होने वाली हर गतिविधि पर नज़र रख सकें...

 
" श्रुति बेटा.. ज़रा कुच्छ पानी वानी ले आओ.. इतनी देर क्यूँ लगा रही हो..?" बुड्ढे ने उन्न दोनो के सामने बैठते हुए बाहर मुँह करके आवाज़ लगाई...

"लाई बापू..!" बाहर से वही सुरीली आवाज़ दोनो के कानो में पड़ी...

"तो.. वहाँ क्या करने गये थे तुम लोग? शहरी मालूम होते हो..!" बुड्ढे ने बड़ी ही आत्मीयता से दोनो से पूचछा..

"ज्जई.. हम रास्ता भटक गये थे..!" नितिन ने बात को गोलमोल करते हुए जवाब दिया.. ये कहना उनको कतयि मुनासिब नही लगा की वो किसी लड़की की तलाश में वहाँ अपनी ऐसी तैसी करने गये थे...

"हुम्म.. तुम दो ही गये थे या कोई वहीं रह गया...?" बुड्ढे ने सहजता से बात कही...

"जी.. क्या मतलब?.. हम दो ही थे बस..!" इस बार भी नितिन ने ही जवाब दिया.. रोहन तो चुपचाप ही उनकी बातें सुन रहा था.. वो इसी उधेड़बुन में था की यहाँ से निकलेंगे कब...

"शुक्र है.. दोनो ठीक ताक वापस आ गये..!" बुड्ढे ने गहरी लंबी साँस लेते हुए बीड़ी सुलगा ली," पीते हो क्या?" कहकर बुड्ढे ने बीडीयों का बंड्ल उनकी और बढ़ाया..

"जी नही.. शुक्रिया...!" नितिन ने विनम्रता से मना कर दिया..

तभी रोहन पलंग से लगभग उच्छल कर खड़ा हो गया," नी...?"

नितिन ने चौंकते हुए पहले रोहन की और देखा और फिर उसकी नज़रों का अनुसरण करते हुए निगाहें दरवाजे पर जमा दी..

"क्या हुआ बेटा? तुम खड़े क्यूँ हो गये...?" बुड्ढे ने भी रोहन से बात कहकर दरवाजे की और देखा," ये मेरी बेटी है.. श्रुति.. आ जाओ बेटी.. "

रोहन की साँसें उसके हलक में ही अटकी हुई थी अभी तक.. दरवाजे से अंदर आने वाली लड़की नीरू ही तो थी.. वही नीरू जिसके लिए रोहन पागल हुआ जा रहा था.. सुंदरता की अद्भुत मिशाल थी वो.. सिर से लेकर पाँव तक.. छर्हरा लंबा बदन, हल्की सी लंबाई लिए हुए लगभग गोलाकार गोरे चेहरे पर अद्भुत कशिश लिए हुए लंबी कजरारी आँखें.. हल्का गुलबीपन लिए हुए रसीले होंठ, सुरहिदार लुंबी गर्दन.. और..

खैर यूँ कहें की सौंदर्या रस उसके बदन में सिर्फ़ दिख ही नही रहा था.. मानो टपक रहा हो.. उसकी मासूमियत से, उसके शर्मीले पन से, उसके यौवन से.. उसकी हर अदा से..

बिना एक बार भी पलकें उठाए उसने उनके सामने टेबल पर पानी रखा और वापस चलने लगी..

"बेटी.. खाना बना देना.. जाने कब से भूखे होंगे बेचारे..!"

"जी बापू.. मैने सब्जी रख दी है.." नज़रें झुकाए हुए ही उसने मुड़कर अपने लरजते होंटो से बात कही और बाहर निकल गयी..

"जी नही.. हमें भूख नही है.. हम अब बस निकलेंगे.. आप बस किसी टाइयर पंक्चर वाले का घर बता दें" नितिन ने खड़ा होते हुए कहा.. दरअसल रोहन को इस तरह चौंकते देख नितिन के मन में अनेक सवाल खड़े हो गये थे.. और वह जल्द से जल्द बाहर निकल कर सब क्लियर करना चाहता था...

"नही भाई.. ऐसे कैसे जाने दूँगा तुम्हे? ये भी कोई जाने का टाइम है.. और इस गाँव में कोई पंक्चर लगाने वाला भी नही है.. अभी आराम से खाना खाकर सो जाओ.. सुबह देख लेना.." बुड्ढे ने नितिन का हाथ पकड़ कर उसको वापस चारपाई पर बैठा दिया...

नितिन ने रोहन की और देखा.. उसकी आँखों की चमक बता रही थी की उसको अपनी मंज़िल मिल गयी है..

" ठीक है अंकल जी.. जब आप इतना दबाव डाल रहे हैं तो यही सही.. आपका बड़ा अहसान होगा.." रोहन को मानो मुँह माँगा मिल गया...

"इसमें अहसान की क्या बात है बेटा..! आदमी ही आदमी के काम आता है.. और फिर मेहमान तो भगवान होता है अपने देश में.. किसी बात की चिंता मत करो.. इसे अपना ही घर समझो!" बुड्ढे ने बड़ी आत्मीयता से मुस्कुराते हुए कहा...

बुड्ढे की बातों ने दोनो को तसल्ली सी दी.. कम से कम यहाँ अब तक कुच्छ वैसा नही हुआ था, जिसस'से उन्हे यहाँ भी कुच्छ अजीबोगरीब होने का डर रहे..

"अंकल जी.. ये खूनी तालाब का क्या चक्कर है?" नितिन ने हिचकिचाते हुए बात चला ही दी...

नितिन के ज़िक्र करते ही बुड्ढे की आँखें अतीत का कुच्छ याद सा करने के अंदाज में सिकुड सी गयी," उसके बारे में हम गाँव के लोग किसी को बताते नही बेटा.. बस इतना ख़याल रखना की दोबारा कभी उस तरफ भूल कर भी मत जाना.. और ना ही किसी से इसका जिकर करना.. तुम सही सलामत वापस आ गये, इसके लिए भगवान का धन्यवाद करो..!"

" हम किसी से नही कहेंगे.. पर बताने में हर्ज़ क्या है? कुच्छ तो बताइए..!" नितिन और रोहन दोनो उत्सुकता से कुच्छ बताने का मूड बना रहे बुड्ढे की और देख रहे थे...

"हूंम्म.. किसी से भूल कर भी जिकर मत करना.. हमारे बड़े कहते थे कि पुराने टीले की 'आत्मायें' बाहर के लोगों से नफ़रत करती हैं.. एक बार कोई अंग्रेज तुम्हारी ही तरह भटक कर वहाँ चला गया था.. सुबह उसकी लाश तालाब के किनारे पर मिली थी.. इतने बड़े बड़े कीड़े चल रहे थे उसकी आधी खाई हुई लाश में.." बुड्ढे ने कीड़ों का साइज़ बताने के लिए अपनी उंगली को लंबा कर दिया.. लाश का सिर तो बिल्कुल ही गायब था.. उसके पेट को चीर सा दिया गया था.. और दिल छाती से बाहर लटक रहा था.. बस फिर क्या था.. उसकी मौत का कारण जान'ने के लिए अँग्रेज़ों ने वहाँ डेरा डाल लिया... बहुत कोशिश की पर किसी को कुच्छ हासिल ना हुआ.. पर उसके बाद मौत बहुत हुई.. पर सारी बाहर के लोगों की.. इसीलिए अब हम किसी को कुच्छ नही बताते.. पढ़े लिखे लोग इन्न बातों में विस्वाश नही करते ना.. फिर कोई वहाँ का 'राज' जान'ने जाएगा और खम्खा मारा जाएगा.. क्या फायडा..?" कहकर बुद्धा अपने चेहरे पर पीड़ा के भाव लिए चुप हो गया..

"हम ऐसी ग़लती नही करेंगे अंकल जी.. किसी से कुच्छ कहेंगे भी नही.. बताइए ना.. और.. ऐसा क्या है वहाँ? और वो खूनी तालाब..?" नितिन की उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी...

"तुम अब मानोगे नही पूच्छे बिना.. दरअसल वो तालाब बहुत पुराना है.. हज़ारों साल पुराना.. उसका पानी कभी नही सूखता.. पर जो वहाँ से तुम्हारी तरह बचकर वापस आ जाते हैं.. वो बताते हैं कि रात को तालाब का पानी लाल हो जाता है.. खून के जैसा.. इसीलिए हम उसको खूनी तालाब कहते हैं... 'आत्मा' के प्रकोप से बचने के लिए गाँव वाले वहाँ खड़े पीपल के पेड़ की पूजा करते हैं.. देखने वाले बताते हैं की रात भर पेड़ पर रोशनी रहती है.. पर रात में आज तक कोई उसके पास पहुँच नही पाया.. या जो पहुँचा होगा.. मरा गया होगा.. सुना है वहाँ एक छ्होटे बच्चे की आत्मा भी भटकती रहती है.."

"हाँ.." रोहन बच्चे के बारे में बोलने ही वाला था की नितिन ने उसका हाथ दबा दिया और उसने अपनी बात पलट दी," हां.. आत्मा होती हैं.. मैने भी सुना है!"

"सुना क्या है बेटा.. गाँव वालों ने तो उस बच्चे को देखा भी है.. बताते हैं की 'वो' बच्चा वहाँ जाने वाले लोगों को उसके घर छ्चोड़ आने को कहता है.. पीपल के पेड़ पर....

" पर वो आत्मायें आख़िर हैं कौन? और बाहर वाले लोगों से ही नफ़रत क्यूँ करती हैं वो?" बुड्ढे के हर खुलासे के साथ नितिन की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी.. सब कुच्छ जान लेने के लिए.. हालाँकि वो 'आत्मा' के चक्कर को नही मानता था.. पर आज रात का अनुभव उसको उनके बारे में और सुन'ने को विवश कर रहा था...

"अब सच्चाई तो भगवान ही जानता है बेटा.. हुमारे पास तो सुनी सुनाई बाते हैं.. कहते हैं कि उस पीपल के पेड़ की जगह पहले किसी राजा का महल हुआ करता था.. तीन रानियाँ थी उसकी.. तीनो एक से एक सुंदर.. फिर किसी मुघल स्म्रात ने उस राजा को हरा कर रानियों के सामने ही उस पर चकला (रोलर) चलवा कर मरवा दिया और उस महल को अपना 'हरम' बना लिया.. तीनो रानियों समेत महल की सभी औरतों को अपना बंदी बनाकर रखा... जो कुच्छ 'वो' उन्न रानियों और औरतों के साथ करता था वो बताने लायक है नही.. तुम मेरे बेटों के जैसे हो.. पर हां.. हर सुबह एक अर्थी उठती थी महल से.. ये सिलसिला तब तक जारी रहा जब तक की महल में एक भी औरत बची... कहते हैं की ये 'आत्मायें' उसी राजा और उन्ही रानियों की हैं..."

"ऑश..!" नितिन ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा...

तभी श्रुति खाना ले आई और उसको टेबल पर सजाने लगी.. रोहन लगातार उसकी आँखों की और देख रहा था.. इस ताक में की श्रुति उसकी और देखे और वो उसकी आँखों में अपने लिए 'अपनापन' ढूँढ सके.. पर बदक़िस्मती से ऐसा हुआ नही.. श्रुति ने नज़रें उपर ही नही उठाई और खाना लगाकर बोली," आपके लिए भी ले आउ बापू?" आवाज़ में इतनी मिठास थी की रोहन उसके मुँह से अपना नाम सुन'ने को तरस गया.. अगर बापू ना होता तो वो कब का उसको टोक चुका होता...

"नही बेटी.. थोड़ी देर पहले ही तो खाया था.. तुम जाओ.. जाकर सो जाओ.. मैं आता हूँ थोड़ी देर में..."

"अच्च्छा बापू.. मैं कुण्डी नही लगाउन्गी.. आप आकर बंद कर लेना.." श्रुति ने अपने पिता की और देखते हुए कहा और फिर वापस मूड गयी...

"आपके घर में और कौन कौन हैं अंकल जी?" रोहन का इंटेरेस्ट सिर्फ़ नीरू के बारे में जान'ने को ही था..

"बस हम दो जान ही हैं बेटा.. बीवी इसको जनम देते ही गुजर गयी थी.. सो और कोई औलाद नही है.. कुच्छ दिन बाद तो मैं अकेला ही रह जाउन्गा.." बुड्ढे ने जवाब दिया..

"वो क्यूँ?" खाना खाते हुए ही रोहन ने उसकी और देखा...

" शादी नही करूँगा क्या बेटा.. लड़की तो पराया धन होती है.."

रोटी का टुकड़ा रोहन के हलक में ही अटक गया," कब.. कब कर रहे हैं शादी..?"

"अभी तो ये मान ही नही रही.. कहती है पढ़ाई पूरी करने के बाद सोचूँगी... नादान और भोली है पर जिद्दी भी बहुत है.. जो सोच लिया वो सोच लिया.. फिर किसी की नही सुनती ये.."

"श.. " रोहन की जान में जान आई.. पहले उसको लगा था कि कहीं शादी पक्की ना हो गयी हो इसकी..

खाना खाने के बाद बुड्ढे ने बर्तन उठाए और उनको सुबह मिलने को कहकर चला गया..

उसके जाते ही रोहन ने आँखें मटकाते हुए नितिन की और देखा," क्यूँ..? कैसी लगी..?"

"यही है वो?" नितिन को शक तो था.. पर ताज्जुब उस'से कहीं ज़्यादा...

"हुम्म.." रोहन खुशी से फूला नही समा रहा था.. अजीब सी खुमारी में उसने तकिये को अपनी छाती के नीचे दबाया और पेट के बल लेट गया..

"पर इसका नाम तो श्रुति है.. तू तो नीरू कह रहा था..?" नितिन ने दूसरे पलंग पर लेट'ते हुए दूसरा सवाल किया...

"नाम में क्या रखा है यार.. बस.. इतना जान ले, जिसके लिए मैं आया था.. मुझे मिल गया है.. मैं तेरे इस अहसान का बदला कभी नही चुका पाउन्गा.. मैं ना कहता था.. मेरी नीरू मुझे ज़रूर मिलेगी.." रोहन पर प्यार का भूत सवार था..

"आबे साले.. इसने तेरे को देखा तक नही और तू ऐसे उच्छल रहा है.. कहीं तुझे भूल ना गयी हो... कितने टाइम पहले मिली थी..?" नितिन उठकर बैठ गया..

"वो सब मैं तेरे को बाद में बताउन्गा.. पर तू ये तो बता की लगी कैसी तुझे..?"

"बहुत प्यारी है.. सच बोलूं तो.. इसके जैसी कोई लड़की मैने आज तक नही देखी.. अगर ये नीरू ना होती तो मैं इसके बारे में अपने लिए सोच रहा था.. और अब भी क्या पता.. ये श्रुति ही हो.. तेरी नीरू की हमशकाल.. तेरी नीरू तो तुझे वहीं मिलेगी.. पुराने टीले पर... हे हे हे" नितिन ने शरारती मुस्कान अपने चेहरे पर लाते हुए कहा...

" ऐसी बात मत कर यार.. मुझे अच्च्छा नही लगता.." रोहन ने मुँह बनाकर कहा..

"मज़ाक कर रहा हूँ बे.. पर एक बात मेरी समझ में नही आई...!" नितिन ने को जैसे कुच्छ अचानक याद आ गया हो..

"वो क्या?" रोहन भी उठकर बैठ गया..

"इसने तेरे को वहाँ क्यूँ बुलाया..? और बुलाया भी तो वहाँ मिलना चाहिए था.. अब किसको पता था कि हुमारी गाड़ी में पंक्चर हो जाएगा और हम वापस आकर इसी घर का दरवाजा खटखटाएंगे.. अगर हम सीधे निकल जाते तो शायद ही कभी दोबारा आते.. यहाँ पर.." नितिन की बात में दम था...

"हां यार.. वो तो है.. जब बात करेगी तो ज़रूर पूछोन्गा ये बात..." रोहन ने जवाब दिया...

" पर अब तो बता दे ये तुझे कहाँ मिली? कैसे मिली.. और कैसे पाटी?" नितिन जान'ने के लिए उत्सुक था...

"एक बार बात हो जाने दे.. फिर सब कुच्छ बताउन्गा.. हमारा मिलना अंकल जी की भूतो वाली कहानी से कम दिलचस्प नही है.. मुझे खुद विस्वास नही था कि मैं इस'से मिल पाउन्गा..."

"अभी बता दे ना.. अभी क्या दिक्कत है..?" नितिन ने इस बार ज़ोर देकर कहा था..

"ना.. अभी नही.. बहुत दिलचस्प बात है.. पर अभी कुच्छ नही कह सकता.. पहले इस'से बात कर लूँ...!" रोहन ने कहा और वापस लेट गया," चल अब सो जाते हैं.. सुबह जल्दी उठना है.."

"ठीक है बेटा.. लोग मतलब निकल जाने के बाद किस कदर रंग बदलते हैं.. ये मैं देख रहा हूँ.. चल अच्च्छा है.. मैं इंतजार करूँगा, तेरी इस'से बात होने की.. गुड नाइट!"

"गुड नाइट भाई गुड नाइट!" रोहन ने कहा और सिर के नीचे से तकिया निकाल कर सीने पर रख लिया.. दोनो हाथों में दबोच कर.....

कहानी अभी बाकी है फिर मिलेंगे अगले पार्ट के साथ

दोस्तो ये कहानी आपको कैसी लगी बताना मत भूलना
 
अधूरा प्यार--2 एक होरर लव स्टोरी

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा एक और नई कहानी लेकर हाजिर हूँ दोस्तो इस कहानी मैं रहस्य रोमांच सेक्स भय सब कुछ है मेरा दावा जब आप इस कहानी को पढ़ेंगे तो आप भी अपने आप को रोमांच से भरा हुआ महसूस करेंगे दोस्तो कल का कोई भरोसा नही.. जिंदगी कयि बार ऐसे अजीब मोड़ लेती है कि सच झूठ और झूठ सच लगने लगता है.. बड़े से बड़ा आस्तिक नास्तिक और बड़े से बड़ा नास्तिक आस्तिक होने को मजबूर हो जाता है.. सिर्फ़ यही क्यूँ, कुच्छ ऐसे हादसे भी जिंदगी में घट जाते है कि आख़िर तक हमें समझ नही आता कि वो सब कैसे हुआ, क्यूँ हुआ. सच कोई नही जान पाता.. कि आख़िर वो सब किसी प्रेतात्मा का किया धरा है, याभगवान का चमत्कार है या फिर किसी 'अपने' की साज़िश... हम सिर्फ़ कल्पना ही करते रहते हैं और आख़िर तक सोचते रहते हैं कि ऐसा हमारे साथ ही क्यूँ हुआ? किसी और के साथ क्यूँ नही.. हालात तब और बिगड़ जाते हैं जब हम वो हादसे किसी के साथ बाँट भी नही पाते.. क्यूंकी लोग विस्वास नही करेंगे.. और हमें अकेला ही निकलना पड़ता है, अपनी अंजान मंज़िल की तरफ.. मन में उठ रहे उत्सुकता के अग्यात भंवर के पटाक्षेप की खातिर....

रात करीब 2 बजकर 17 मिनिट...... रोहन दरवाजे पर पैरों की आहट सुनकर चौंक गया.. उसकी उम्मीद को पूरी तरह पंख लगे भी ना थे की कमरे में रोशनी च्छा गयी.. हल्की सी नाराज़गी जताती हुई नीरू उसकी आँखों में आँखें डाले उसको घूर रही थी.. हौले हौले चलती हुई वो उसके पैरों के पास आकर उसके पलंग पर बैठ गयी..

"ये कौन है?" नीरू ने झुकते हुए धीरे से नितिन की और इशारा करते हुए पूचछा..

"मेरा दोस्त है.. मेरे भाई जैसा है.. क्यूँ?" रोहन ने भी उसी के अंदाज में जवाब दिया..

"इसको क्यूँ लेकर आए..? मैने अकेले आने को बोला था ना..?" नाराज़गी अब भी नीरू की नाक पर बैठी थी..

"कमाल करती हो? ऐसी ख़तरनाक जगह पर अकेले.. जान लेने का इरादा था क्या?" रोहन ने लेटे लेटे ही जवाब दिया...

"जान तो मैं तुम्हारी लूँगी ही.. एक बार समय आने दो" कहकर नीरू कातिल अदा से मुस्कुराने लगी.. उसकी इसी अदा का तो रोहन दीवाना था," चलो ठीक है.. तुम्हारी ये बात मान लेती हूँ.. इसको लेकर आ जाओ.. पर इसको दूर ही खड़ा कर देना.. मुझे तुमसे ज़रूरी बातें करनी हैं.. जाने कब से तुम्हारे लिए तड़प रही हूँ.. तुम्हे तो अहसास भी नही होगा, मेरी मोहब्बत का.."

"तुम्हारी यही बात मेरी समझ में नही आ रही.. कहती हो मुझसे प्यार करती हो.. पर आज तक कभी छूने की इजाज़त नही दी.. मैं भी तुम्हारे लिए पागल हो चला हूँ.. प्लीज़ एक बार.. एक बार मुझे तुम्हे छू कर महसूस कर लेने दो.. कितनी प्यारी हो तुम.. तुम्हारे लिए मैं यहाँ तक भी आ गया.. एक बार मेरे आगोश में आ जाओ ना.. प्लीज़!" रोहन उसके शरीर से उत्सर्जित हो रही यौवन बयार को अपने अंदर तक महसूस करने को तड़प उठा...

"मैं भी तो उतनी ही तड़प रही हूँ देव! तुम्हे क्या पता, मेरा एक एक पल कैसे बीत'ता है.. उस पल के लिए जब मैं और तुम 'हम' होंगे.. ये फ़ासले कितना तड़पते हैं, मुझसे ज़्यादा कौन समझेगा.. बस इंतज़ार करो... " नीरू की आँखों से उसके लिए बे-इंतहा ज़ज्बात झलक रहे थे...

"कितनी बार बताउ कि मैं रोहन हूँ.. अगर तुम किसी देव के धोखे में मेरे पिछे पड़ी हो तो माफी चाहता हूँ.. पर फिर भी यही कहूँगा कि अब मैं तुम्हारे बिना रह नही पाउन्गा.. तुम्हारे प्यार में जाने.... तुमने मुझे पागल सा कर दिया है.."

"दुनिया के लिए तुम चाहे कुच्छ भी हो.. पर मेरे लिए तो मेरे देव ही हो.. मुझे तुम्हारा यही नाम अच्च्छा लगता है.. मैं तो यही कहूँगी.." आँखों में गहरी प्यास और मादक अहसास लिए नीरू उसकी और टकटकी लगाकर देखती रही...

"तुम मुझे पूरी तरह पागल बना कर ही छ्चोड़ॉगी.. मुझ रोहन को तुम देव कहती हो और अपना नाम नीरू बता रही हो जबकि तुम्हारे पिताजी तुम्हे श्रुति कहते हैं.. मैं क्या समझू और क्या नही.." रोहन नाम के चक्कर से अभी तक भी निकल नही पाया था..

"वहाँ आओगे तो सब समझ आ जाएगा.. अब यहाँ मैं तुम्हे क्या बताउ?" नीरू ने बेबस नज़रों से उसको देखते हुए कहा..

"अजीब लड़की हो.. यहाँ मेरे सामने बैठी हो.. उस वक़्त नज़र उठा कर भी तुमने नही देखा.. और अब ये छ्होटी सी बात बताने के लिए मुझे वहाँ बुला रही हो.. इतनी ख़तरनाक और डरावनी जगह मैने आज तक नही देखी.. पता है.. ?" रोहन के चेहरे पर उस अजीबोगरीब जगह की डरावनी यादों की टीस छा गयी..

"क्या? तुम वहाँ गये थे? पर मैने तुम्हे 12 बजे के बाद आने को कहा था ना.. रुके क्यूँ नही वहाँ पर..." नीरू अधीर होते हुए बोली...

" कैसे रुकते..हम वहाँ गये तो हमें वहाँ एक बच्चा मिला.. इतना खौफनाक मंज़र था कि मेरी तो जान ही निकल गयी होती.. और तुम्हे पता भी है.. वहाँ भूत रहते हैं.. तुम्हारे पिताजी ने ही बताया था.." रोहन ने स्पष्ट किया...

"असमय गुजर चुके लोगों को भूत कहकर उनका मज़ाक ना बनाओ देव.. तुम्हे हम... उनकी पीडाओं का अहसास नही है.. हर पल किस वेदना और दर्द की भत्ति में तपते रहना पड़ता है.. ये तुम्हे क्या मालूम.. तुम तो आज़ाद हो.. कहीं भी आ जा सकते हो.. पर वो हर तरह से एक दायरे में बँधे हैं.. हरपल उसी दर्दनाक मंज़र को आँखों में लिए तड़प्ते रहते हैं.. जिस घड़ी जिंदगी ने बड़ी क्रूरता से उनके सिर से अपना हाथ हटा लिया.. वो हर पल इसी इंतज़ार में रहते हैं कि कब कोई रहनुमा आएगा और उनको वहाँ से, उस जहन्नुम से मुक्ति दिलाएगा.. आ जाओ ना देव.. सिर्फ़ एक बार आ जाओ.. मैं हर पल तुम्हारा इंतजार करती हूँ.. एक बार वहाँ आ जाओ मेरी जान.. मुझे जहन्नुम से निकल कर जन्नत में ले चलो.." नीरू बोलते बोलते भावुक होकर गिदगिडाने सी लगी..

"ऐसे क्यूँ कर रही हो.. मुझसे तुम्हारी ये बेचैनी देखी नही जाती.. पर ऐसा क्या है जो यहाँ नही बता सकती.. वहीं जाना क्यूँ ज़रूरी है नीरू..?"

"वहाँ जाना ज़रूरी नही है देव.. पर मुझे डर है.. मैने यहाँ बता दिया तो तुम वहाँ शायद कभी नही आओगे.." मायूस नीरू की आँखों से आँसू छलक उठे..

"इसका मतलब तुम्हे मेरे प्यार पर भरोसा नही है.. इसका मतलब कुच्छ ऐसा ज़रूर है जो तुम मुझसे छिपा रही हो.. जब तुम मुझ पर विश्वास नही करती तो मैं तुम पर क्यूँ करूँ..?" रोहन बात जान'ने को लालायित लग रहा था..

"तुम्हारे अंदर के देव पर मुझे पूरा विस्वास है.. पर बाहर के रोहन पर नही.. वक़्त जाने कितनी करवटें बदलता है.. इस दरमियाँ जाने तुम कितनी बार बदले होगे.. मैं इसीलिए डर रही हूँ.." नीरू अपना हाथ बढ़कर उसके चेहरे को छूने को हुई पर कुच्छ याद आते ही तुरंत वापस खीच लिया...

"देखो नीरू या श्रुति, तुम जो भी हो.. तुमने अपने प्यार में तो मुझे पागल कर ही दिया है.. अब असलियत में पागल होना नही चाहता.. पहेलियाँ मत बुझाओ.. पर इतना जान लो कि जब तक तुम मुझे सब कुच्छ सच सच नही बताती, मैं वहाँ वापस नही जाउन्गा.. हरगिज़ नही.." रोहन ने दो टुक जवाब दिया..

"ऐसा क्यूँ कह रहे हो देव.. क्या मैं यूँही तड़पति रहूंगी..? तुम मेरी बात समझते क्यूँ नही हो.. आ जाओ ना प्लीज़..." नीरू की हालत दयनीय हो चली थी..

"मैं तो सब समझ रहा हूँ.. अगर समझता नही तो यहाँ तक आता ही क्यूँ.. अच्च्छा चलो.. मैं वादा करता हूँ कि अगर तुम अभी सब कुच्छ बता दोगे तो तुम जहाँ कहोगी, वहाँ आने के लिए तैयार हूँ.."

कुच्छ देर सोचते रहने के बाद नीरू बोली," ये रोहन का वादा है या फिर देव का.."

रोहन झल्ला उठा..," क्या है यार.. देव.. रोहन.. दोनो का वादा रहा.. देव का भी.. और रोहन का भी.. अब तो बता दो..."

"सोच लो.. देव के वादे सूली पर जाकर भी नही टूट'ते.." नीरू को कुच्छ उम्मीद सी बँधी..

"हुम्म.. सोच लिया... वादा रहा.. देव का!" रोहन ने कहते हुए अपना हाथ बढ़ाया पर नीरू की तरफ से कोई प्रतिक्रिया ना मिली....

नीरू ने लंबी साँस छ्चोड़ते हुए छत की और देखा.. और अचानक ही बोलना शुरू कर दिया..," वो बच्चा.. जिसकी तुम बात कर रहे हो.. मेरा छ्होटा भाई है..

"क्याआ?" रोहन नीरू की इस बात को पचा नही पाया और नींद में ही अंदर तक काँप गया.. हड़बड़ा कर लगभग चीखते हुए वह उठ बैठा.. चीख के साथ ही नितिन एक पल में ही उठ कर पलंग से खड़ा हो गया..," क्या हुआ?"

"ये.. ये लाइट क्यूँ बंद कर दी.. नीरू कहाँ गयी.." रोहन का सिर चकरा रहा था.. बंद आँखों में जहाँ उसको उजाला ही उजाला दिख रहा था.. आँखें खोलते ही.. अंधेरे के सिवा उसको कुच्छ नज़र ना आया.. वहाँ तो पहले से ही अंधेरा था.. उजाला तो सपने में नीरू साथ लेकर आई थी...

"नीरू, यहाँ? साले तू पागल हो गया है क्या? सपना देख रहा था या?" नितिन ने रोहन को कंधे से पकड़ कर हिला दिया...

रोहन ने जैसे तैसे खुद को संभाला," हां भाई.. सपना ही था.. सॉरी.. सो जा.."

"अब थोड़ी बहुत रात बची है.. उसमें तो चैन से सो लेने दे तू.. क्या हो गया है तुझे.. बता ना.. तू खुलकर क्यूँ नही बताता..?" नितिन ने उसके कंधे पर हाथ रख कर प्यार से पूचछा...

"कुच्छ नही यार, सो जा.. सुबह बात करेंगे..!" कहते हुए रोहन मुँह ढक कर लेट गया..

"देख.. कोई बात मन में नही रखनी चाहिए.. गाँठ बन जाती है.. और फिर मुझसे छिपा कर तुझे मिलेगा क्या? बाकी तेरी मर्ज़ी है.. सुबह का इंतजार करूँगा.." नितिन ने कहा और दूसरी और करवट लेकर सो गया...

रोहन की समझ में कुच्छ नही आ रहा था.. पिच्छले करीब 2 महीने से उसकी रातों की नींद और दिन का चैन हराम था.. कारण नीरू ही थी.. हर रात को वो उसके सपनो में आती और दिन भर वो उसके सपनो में खोया रहता.. जिंदगी अचानक कितनी बदल गयी थी उसकी.. हमेशा मस्त कलंदर की तरह जीने वाला रोहन शुरू शुरू में तो इन्न सपनो का आनंद लेता और रात को उसके पास आकर उसको पुकार रही इस हसीना के बारे में दिन भर सोच कर आनंदित होता रहता.. नितिन की बात सच ही थी.. नीरू के जितनी प्यारी लड़की उसने भी आज तक नही देखी थी.. पर जल्द ही ये आनंद बेचैनी में और फिर वो बेचैनी एक अंजाने से लगाव में बदल गयी.. आख़िर यही लड़की रोज उसके सपनो में क्यूँ आती है.. क्या रिश्ता है इस लड़की का उसके साथ.. लड़की का सिर्फ़ सपने में आना भर ही होता तो बात अलग थी.. पर वो तो उसको दोनो के प्यार की दुहाई देती थी.. अपने पास बुलाती थी.. सपने में उसकी आवाज़ यूँ लगती थी जैसे किसी गहरी खाई से बोल रही हो.. रुक रुक कर कही गयी उसकी बातें प्रतिध्वनित होकर बार बार उसके कानों में गूँजती रहती थी.. रात भर.. दिन भर...

अपने मस्त अंदाज का मलिक रोहन दोस्तों में उसके हँसी मज़ाक और लड़कियों को भाव ना देने के कारण हमेशा छाया रहता था.. पर अचानक ही वो गुम्सुम सा रहने लगा.. पूच्छने की कोशिश बहुतों ने की.. पर बताता भी तो क्या बताता रोहन.. अंत में जब उसकी बेचैनी और अपने आपको नीरू कहने वाली लड़की के प्रति उसका लगाव चरम को पार कर गया तो उसने एक बार उसके पास जाने की ठान ली.. पर नीरू की एक शर्त ने उसको नितिन का सहारा लेने पर मजबूर कर दिया.. एक तो सिर्फ़ रात को ही मिल पाने की बेबसी और दूसरा उसके पास आने के लिए बताए गये रास्ते की जियोग्रफी..

नितिन उसके सबसे नज़दीकी दोस्तों में से एक था.. वो अग्यात जगह पर जाने, घूमने फिरने और बीहड़ और दूर दराज के इलाक़ों में जाकर वहाँ के लोगों की दिन चर्या जान'ने का शौकीन था.. इनफॅक्ट, अड्वेंचर उसकी लाइफ का एक हिस्सा था...

रोहन ने नितिन को एक कहानी बनाकर सुनाई.. उसको यकीन था अगर सपने वाली बात उसको बताएगा तो साथ देना तो दूर.. उल्टा दोस्तों मैं उसकी किरकिरी करने में भी कसर नही छ्चोड़ेगा.. उसने नितिन को बताया कि बहुत पहले एक लड़की से वो मिला था और अब उसको पता चला है कि वो लड़की उस'से बे-इंतहा प्यार करती है.. और उसको मिलने के लिए बुला रही है.. पहले पहल तो नितिन ने उसको इन्न खाम-खाँ के चक्करों से दूर रहने की हिदायत देकर सॉफ मना कर दिया.. पर जब उसको काई दीनो तक लगातार रोहन का चेहरा उतरा हुआ दिखाई दिया तो एक दिन उसने खुद ही रोहन को टोक दिया," कहाँ है वो लड़की.. चल मिला लाता हूँ.."

"यार.. उनका घर गाँव से दूर है.. काफ़ी आगे चलकर.. " रोहन इस बात को खा गया कि लड़की ने उसको बताया था कि उसको काफ़ी दूर पैदल चलना पड़ेगा....

"अच्च्छा.. फट'ती है तेरी.. इसीलिए मुझको बोला.. है ना.. नही तो तू मुझे बताता भी नही कि तू मजनू बन गया है आजकल..." नितिन ने मज़ाक किया...

"कुच्छ भी समझ ले यार.. पर मुझे उस'से एक बार मिलकर आना है...!"

"हूंम्म.. चल फिर कल ही चलते हैं..!" नितिन तैयार हो गया उसके साथ जाने को...

और वो कल 'आज रात' ही थी...

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पर जो कुच्छ भी आज रात को उन्होने देखा.. उसने उसकी व्याकुलता कम करने की बजाय और बढ़ा दी.. खास तौर से तब, जब उसने सपनो में रोज आने वाली लड़की को साक्षात अपनी नज़रों के सामने देखा.. श्रुति के रूप में.. उस वक़्त तक तो टीले से वापस आते हुए वह यही सोच रहा था कि ये सब महज उसके दिमाग़ के फीतूर के अलावा कुच्छ नही था.. पर अब; अब तो वो कतयि ऐसा नही सोच सकता था.. उसके सपनो की रानी यथार्थ बनकर उस'से रूबरू हो चुकी थी.. भले ही उसका अंदाज बेरूख़ा रहा हो.. भले ही उसका नाम श्रुति रहा हो.. कुच्छ ना कुच्छ तो बात ज़रूर है.. वरना इसी गाँव की लड़की उसके सपने में क्यूँ आती...

पर अब.. आज रात के सपने को वो कैसे ले.. कहीं 'नीरू' सच में कोई भूत तो नही.. उसने टीले पर मिलने वाले बच्चे को 'अपना भाई बताया.. चक्कर क्या है.. और फिर भूत तो डराते हैं.. प्यार थोड़े ही करते हैं.. फिर भूत भी माने तो कैसे माने.. लड़की तो उसके सामने थी ही.. रोहन को लग रहा था जैसे वो भी उस लड़की के प्यार में बुरी तरह जकड़ा जा चुका हो.. वो फिर से उसको अपने सपने में लाना चाहता था.. अपने अनगिनत सवालों के जवाब लेने के लिए.. उस'से उसका संबंध क्या है.. ये जान'ने के लिए... इसी उधेड़बुन में वो कब खो गया और कब खुद को नीरू बताने वाली श्रुति फिर उसके सपने में आ गयी उसको पता ही नही चला...

"क्या हो गया था.. तुम चले क्यूँ गये थे, बीच में ही.." नीरू वहीं बैठी थी.. उसके पैरों के पास..

"मैं कहाँ गया था.. चली तो तुम गयी थी.. मेरे सपने से.." रोहन नींद में बड़बड़ाया...

"हां.. मगर सपना तो तुम्हारा ही था ना.. तुमने वो तोड़ दिया.. मुझे जाना पड़ा..!"

"तुम सपने में ही क्यूँ आती हो..? उठकर आ जाओ ना.. बराबर वाले कमरे में ही तो हो..." रोहन ने जवाब दिया...

नीरू ने यहीं पर उसको सब कुच्छ बताने का इरादा कर लिया था.. उसके देव ने वादा जो किया था.. इस जनम में उसका साथ देने का... " समझने की कोशिश करो देव.. मैं वो नही हूँ.. जो तुम समझ रहे हो.. वो तो श्रुति ही है जिसे तुम अपने सामने बैठी देख रहे हो.... मैं देव की प्रियदर्शिनी हूँ.. और इस जनम की तुम्हारी नीरू.."

रोहन किसी तरह अपने आप पर काबू पाए रहा.. उसको सब कुच्छ जान लेना था.. आज ही,"मतलब हमारा पिच्छले जनम का कोई संबंध है?"

"पिच्छले जनम का नही.. पिच्छले कयि जन्मो का.. प्रियादरिशिनी के हर जनम में मैने तुम्हारा इंतजार किया.. पर मैं तुम्हे इसी जनम में ढूँढ सकी.." नीरू ने जवाब दिया..

"पर तुम मुझे पहले भी तो ढूँढ सकती थी.. मतलब पिच्छले जन्मों में.." रोहन ने तर्क दिया...

"हां.. और मैने बहुत ढूँढा भी.. पर मेरी एक सीमा है... हम एक दायरे से बाहर नही निकल सकते.. 2 महीने पहले तुम इस गाँव के पास से गुज़रे.. और मैने तुम्हे पहचान लिया.. तब से मैं इस बात का इंतजार कर रही हूँ कि तुम कब आओगे मेरे पास.. मतलब नीरू के पास.. कब हमारा मिलन होगा.. इसी वजह से मैने इस घर में रहने वाली लड़की का रूप चुराया.. ताकि तुम्हे इसके आकर्षण में बाँध कर अपने पास ला सकूँ... क्यूंकी इस'से सुंदर कोई और लड़की मुझे आसपास दिखाई नही दी.." नीरू लगातार बोल रही थी कि रोहन ने उसको टोक दिया..

"पर अगर तुम आत्मा हो तो हम कैसे मिल सकते हैं.. बताओ.."

"नही मैं आत्मा नही हूँ.. मैं भी जनम ले चुकी हूँ.. कयि बार.. इस बार भी.. नीरू के रूप में.. सिर्फ़ उसका दिल उस लॉकेट में अटक कर वहीं महल में ही रह गया था जो देव ने प्रियदर्शनि को दिया था.. यानी तुमने मुझे.. प्यार की पहली और आख़िरी निशानी के रूप में.."

"ये लॉकेट का क्या चक्कर है?" रोहन ने उसको फिर टोका..

"वो एक लंबी कहानी है.. हमारे प्यार की.. हमारे मिलने की और मिलन पूरा होने से पहले ही हमारी जुदाई की.. कभी फ़ुर्सत में बताउन्गि.." नीरू अब उसका जवाब सुन'ने को उतावली थी...

रोहन को कुच्छ कुच्छ पल्ले पड़ रहा था.. पर बहुत कुच्छ नही," और अब असली नीरू को कौन ढूंढेगा? कहाँ कहाँ भटकू मैं.. और क्यूँ भटकू?"

"तुम्हे भटकने की ज़रूरत नही है.. हर जनम में वो मेरे संपर्क में रही है.. आख़िर मैं भी उसका हिस्सा हूँ.. अमृतसर से 50 किलोमीटर दूर बतला कस्बे में रहती है वो.. गवरमेंट. कॉलेज के आसपास घर है उसका...मुझे इस बात पर गर्व है कि हर जनम में वो अंजाने में ही सही पर कुँवारी ही रही.. तुम्हारे अलावा मैने किसी के बारे में सोचा तक नही देव.. तुम्हारे अलावा मुझे कोई छू भी नही पाया.." नीरू का गला भर आया..

"ओह.. और मैं..?" रोहन को उसकी अजीब मगर मीठी सी कहानी में मज़ा आने लगा था...

"तुम्हारा मुझे नही पता.. और इस जनम की तो तुम खुद ही जान'ते होगे..." नीरू ने उसको प्यार से देखते हुए कहा...

"तो क्या वो मुझे देखते ही पहचान लेगी..?" रोहन के मन में सवालों की झड़ी लगी हुई थी....

"बस यही एक समस्या है.. उसके लिए तुम्हे उसको वहीं लाना होगा.. महल में.." नीरू के चेहरे पर उदासी छा गयी..

"अब ये महल का क्या चक्कर है?" सवालों में से ही इतने सवाल निकल रहे थे कि पुराने सवाल रोहन भूलता जा रहा था...

"जहाँ तुम गये थे.. वहाँ एक पीपल का पेड़ है.. उसके नीचे ही हमारा महल है.. तुम्हे नीरू को वहीं लेकर आना होगा.."

"एक मिनिट.. एक मिनिट.. जो लड़की मुझे जानती नही, पहचानती नही.. उसको मैं कैसे ला सकता हूँ.. और वो भी ऐसी जगह पर जहाँ के बच्चे भी इतने ख़तरनाक हैं.." रोहन का सिर चकरा गया..

"इसका जवाब मेरे पास नही है.. पर अगर तुम उसके दिल में प्यार जगाओगे तो वो आ सकती है.. तुम्हारे साथ.. तुम्हे उसका प्यार भी जीतना होगा और भरोसा भी... ये काम तुम्हे अपने तरीके से करना होगा...."

" मुझे नही पता कि लड़कियों का दिल कैसे जीत'ते हैं.. इस मामले में एकदम अनाड़ी हूँ... तुम ही कुच्छ बताओ!" रोहन की समझ में कुच्छ नही आ रहा था..

"तुम जब देव थे, तब भी ऐसे ही थे.. शर्मीले और झेंपू.. पर तुम्हे कुच्छ ना कुच्छ तो करना ही होगा..." नीरू अपने देव की यादों में खोकर मुस्कुराने लगी....

" सॉरी नीरू.. ये सब मैं नही कर सकता.. किसी अंजान लड़की से मैने आज तक बात भी नही की है.. और तुम उसको यहाँ लाने को कह रही हो.. ये नही हो सकता.. और फिर उसको भी रात को ही लाना होगा.. है ना?"

"हाँ देव.. ये मेरी मजबूरी है.."

"शिट.. नेवेर पासिबल.. ऐसा कभी नही हो सकता.. और फिर तुम ही बताओ.. मैं तुम्हारी बातों पर क्यूँ विस्वास करूँ.. और विस्वास कर भी लूँ तो मैं इतनी बड़ी टेन्षन मोल क्यूँ लूँ..? ये जान'ने के बाद की तुम कोई भटकती हुई आत्मा हो; मेरे दिल में तुम्हारे लिए सहानुभूति के अलावा कुच्छ नही है.. पर फिर भी मैं माफी चाहता हूँ.. मेरी जिंदगी से निकल जाओ.. तुमने मेरी हँसती खेलती जिंदगी बर्बाद कर दी है.. मैं पागल सा हो गया हून.. तुम्हारी बात को सच मान भी लूँ तो मुझे अब कुच्छ याद नही है.. फिर मैं तो किसी भी लड़की से प्यार कर सकता हूँ.. शादी कर सकता हूँ.. सच बोलूं तो मैं सुबह श्रुति के पापा से अपने रिश्ते के बारे में बात करना चाहता हूँ.. मैने अपनी जिंदगी में इसी लड़की के सपने देखे हैं, जिसका चोला पहने अभी तुम मेरे सामने बैठी हो.. मुझे इस'से प्यार हो गया है.. तो क्यूँ ना मैं नीरू के आगे पिछे बेवजह चक्कर लगाने की बजाय श्रुति पर ही डोरे डाल लूँ..? प्लीज़.. मेरा पिच्छा छ्चोड़ दो.. आज के बाद मेरी जिंदगी में मत आना.. मैं तंग आ गया हूँ तुम्हारी बातें सुनकर... मैं और कुच्छ जान'ना नही चाहता.." रोहन ने सीधे और निर्दयी शब्दों में अपनी बात कह दी...

नीरू का चेहरा सफेद पड़ गया.. रोहन को इस बार पाकर भी खो देने के भय और गुस्से के वो काँपने सी लगी," देव.. तुम्हारे वादे का क्या होगा..?" नीरू के मुँह से कहते ही सिसकी सी निकली...

"भाड़ में गया वादा.. आइ डोंट केर.. मुझे मरना नही है अभी.. जीना है.. अपने लिए.. घर वालों के लिए..!"

नीरू खड़ी हो गयी," ठीक है देव.. मैं जा रही हूँ.. आइन्दा कभी नही आउन्गि.. मैने तो ये सोचकर तुम्हे कभी खुद को हाथ भी नही लगाने दिया कि मेरे द्वारा धारण की गयी देह किसी और की है.. उसको हाथ लगवाकर मैं तुम्हे दूषित करके खुद को पाप का भागी नही बनाना चाहती थी.. अगर तुम्हे यही पसंद है तो लो, नोच डालो अभी इसको, कर लो अपनी हवस पूरी..." कहते हुए नीरू ने गुस्से से अपना गले से पकड़ कर अपना कमीज़ खींच कर तार तार कर डाला.. श्रुति बनी नीरू अर्धनग्न अवस्था में नज़रें झुकाए सिसकियाँ ले रही थी..

रोहन की आँखें शर्म से झुक गयी.. उसको यूँ नज़रें झुकाए देख नीरू ने खड़े खड़े ही बोलना शुरू कर दिया," काश तुम्हे अहसास करवा सकती कि तुम क्या थे, काश तुम्हे देव और प्रियदर्शिनी की मोहब्बत से रूबरू करवा पाती.. तुम्हे देव के वादे की कीमत का अहसास होता तो तुम कभी ऐसा ना कहते, जान पर खेल जाते अपनी नीरू को अपने गले से लगाकर उसको कम से कम इस जनम में पूर्ण नारी बनाने के लिए.. बेशक उसके पास प्रियदर्शिनी का दिल नही.. फिर भी उसने देव को किया वादा हर जनम में निभाया है.. बेशक वो तुम्हारा इंतजार नही करती.. पर किसी का भी इंतजार नही करती वो.. इस जनम में भी ऐसे ही जाएगी.. और मेरा क्या है? काश मुझे तुम्हारे दिए गये लॉकेट से भी उतनी ही मोहब्बत ना होती जितनी कि तुमसे है.. तो मेरी आत्मा मेरे दिल को भी साथ लेकर निकल जाती.. यूँ ना तड़प्ता रहना पड़ता मुझे.. जनम जनम तुम्हारे आने के इंतज़ार में... " नीरू ने भरभराते गले से कहा और चुपचाप सिसकियाँ लेती उसके सपने से गायब हो गयी.....
 
अधूरा प्यार--3 एक होरर लव स्टोरी

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा दोस्तो इस कहानी मैं रहस्य रोमांच सेक्स भय सब कुछ है मेरा दावा जब आप इस कहानी को पढ़ेंगे तो आप भी अपने आप को रोमांच से भरा हुआ महसूस करेंगे दोस्तो कल का कोई भरोसा नही.. जिंदगी कयि बार ऐसे अजीब मोड़ लेती है कि सच झूठ और झूठ सच लगने लगता है.. बड़े से बड़ा आस्तिक नास्तिक और बड़े से बड़ा नास्तिक आस्तिक होने को मजबूर हो जाता है.. सिर्फ़ यही क्यूँ, कुच्छ ऐसे हादसे भी जिंदगी में घट जाते है कि आख़िर तक हमें समझ नही आता कि वो सब कैसे हुआ, क्यूँ हुआ. सच कोई नही जान पाता.. कि आख़िर वो सब किसी प्रेतात्मा का किया धरा है, याभगवान का चमत्कार है या फिर किसी 'अपने' की साज़िश... हम सिर्फ़ कल्पना ही करते रहते हैं और आख़िर तक सोचते रहते हैं कि ऐसा हमारे साथ ही क्यूँ हुआ? किसी और के साथ क्यूँ नही.. हालात तब और बिगड़ जाते हैं जब हम वो हादसे किसी के साथ बाँट भी नही पाते.. क्यूंकी लोग विस्वास नही करेंगे.. और हमें अकेला ही निकलना पड़ता है, अपनी अंजान मंज़िल की तरफ.. मन में उठ रहे उत्सुकता के अग्यात भंवर के पटाक्षेप की खातिर....

अगली सुबह बुड्ढे ने आकर रोहन और नितिन को उठाया.. रोहन के सिर में दर्द था.. रात के सपने की बातें उसके दिमाग़ में अब हथोदे की तरह बज रही थी..

"क्या बात है? ठीक तो है ना?" नितिन ने उसको इस तरह सिर पकड़ कर बैठे देखा तो पूच्छ लिया..

"नही भाई.. सब ठीक है.. बस ऐसे ही सिर में दर्द हो रहा है.." रोहन ने नितिन की और देखते हुए कहा..

"तो अब चलें या तेरी नीरू से मिलने की तमन्ना है.." बुड्ढे के वापस जाते ही नितिन ने रोहन कोछेड़ा...

"उसका नाम भी मत ले यार मेरे सामने.." रोहन फट पड़ा...

"अरे मैं तुझे फोन करके टीले पर बुलाने वाली लड़की की बात नही कर रहा.. मैं इसकी बात कर रहा हूँ; श्रुति की.. मिली तो यही थी ना तुमसे.. काफ़ी पहले.. तू कह रहा था..." नितिन ने उसको खंगालना शुरू किया...

"अभी कुच्छ मत बोल यार.. प्लीज़.. मेरे सिर में दर्द है.." रोहन अब भी अपना सिर पकड़े बैठा था...

"चल छ्चोड़.. तू टेन्षन क्यूँ लेता है.. अभी निकलते ही हैं बस यहाँ से.." रोहन ने उस वक़्त बात को टाल दिया..

"मैं फ्रेश होकर आता हूँ यार.. टाय्लेट किधर है.. कुच्छ आइडिया है..?" रोहन खड़ा होते हुए बोला...

"बाहर निकल कर दाई तरफ सीधा चला जा.."

"थॅंक्स.." कहकर जैसे ही रोहन बाहर निकलने को हुआ, उनके लिए चाय बनाकर ला रही श्रुति उस'से टकराते टकराते बची..,"ओह सॉरी..!" रोहन ठिठक कर खड़ा हो गया..

श्रुति उसके सामने सिर झुका कर खड़ी हो गयी.. क्या गजब की मिठास थी उसके चेहरे पर.. सुंदरता का प्रतीक कहें तो कोई अतिशयोक्ति ना होगी.. मारे लज्जा के उसने अभी तक अपनी आँखें उठाई ही ना थी उपेर.. एक बार भी उनसे आँखें चार नही की... काफ़ी देर तक जब रोहन उसको ठगा सा खड़ा देखता रहा तो उसको बोलना ही पड़ा," जी.. चाय.."

"श.. अंदर रख दो.. मैं आता हूँ अभी.. थॅंक्स!" कहकर रोहन उसको रास्ता देकर आगे निकल गया..

श्रुति चाय लेकर अंदर गयी और टेबल नितिन की और सरका कर चाय उस पर रख दी.. मुड़कर जैसे ही वा बाहर जाने के लिए पलटी.. नितिन ने उसको टोक दिया," क्या नाम है तुम्हारा?"

श्रुति के कदम वहीं ठिठक गये... शर्मीली थी पर पागल नही थी.. उसके बापू ने कितनी ही बार उसका नाम लिया उनके सामने.. वो समझ गयी.. लाइन मारने की फिराक में है... वह दो पल रुकी और फिर से आगे बढ़ने लगी..

"नीरू.. ये भी तुम्हारा ही नाम है ना..!" नितिन ने उसके बढ़ते कदमों पर फिर से विराम लगा दिया..

"जी.. जी नही.." श्रुति ने जवाब दिया..

"रोहन तुम्हारे लिए ही यहाँ आया है.. कोई तुम्हारा नाम लेकर उसको यहाँ बुला रही थी.. तुम मिले हो ना पहले.. वो ... तुम दोनो प्यार भी तो करते हो.." नितिन को जितना पता था.. उतना बोल दिया...

श्रुति को नितिन की बातें समझ में नही आई थी.. वह पलट कर कुच्छ बोलना चाहती थी.. पर उसकी हिम्मत ना हुई.. बिना पलटे, बिना रुके वा बाहर निकल गयी...

"अजीब लड़की है.." नितिन बड़बड़ाया... और न्यूसपेपर उठाकर पढ़ने लगा... श्रुति ने नितिन की आख़िर में कही गयी बातों को सुन लिया...

कुच्छ देर बाद रोहन वापस आया तो बुड्ढ़ा वहीं बैठा था... रोहन आते ही ठंडी हो चुकी चाय उठाने लगा तो बुड्ढे ने उसको रोक दिया," रहने दो बेटा.. ठंडी हो गयी होगी.. श्रुति कह रही थी वो और बनाकर ला रही है..

"ओह अंकल जी.. क्या ज़रूरत थी परेशान होने की..." रोहन ने अपनी बात ख़तम भी नही की थी श्रुति वहाँ हाजिर हो गयी.. ट्रे में एक कप चाय लेकर..

नितिन ने आँखों ही आँखों में रोहन की और इशारा किया.. मानो कह रहा हो.. "क्या बात है.. तुम पर तो बड़ी मेहरबान है.."

इस बार श्रुति सीधी आकर रोहन के सामने खड़ी हो गयी और ट्रे उसकी और बढ़ा दी... रोहन ने चेहरा उठाकर उसकी नज़रों में झाँका.. इस बार आसचर्यजनक रूप से वो उसकी ही और देख रही थी.. आँखों में आँखें डाले.. रोहन उसकी आँखों में देखते ही सम्मोहित सा हो गया.. अपनी आँखों में ही जहाँ भर की खुशियाँ समेटे वा उसकी और टकटकी लगाए खड़ी रही.. जब काफ़ी देर तक रोहन ने ट्रे नही पकड़ी तो श्रुति को बोलना ही पड़ा," चाय लीजिए...!"

"श हां.. थॅंक्स!" रोहन झेंप सा गया.. श्रुति के बापू वहाँ नही बैठे होते तो नितिन कोई ना कोई कॉमेंट ज़रूर करता.. उनके आँखे चार करने के अंदाज पर..

"अच्च्छा अंकल जी.. हम अभी निकलेंगे... बता सकते हैं कि पंक्चर लगाने वाला कहाँ मिल सकता है...?"

"क्या जल्दी है बेटा.. खाना वाना खाकर निकल जाते.." बुड्ढे ने अतिथिधर्म के नाते बात कही..

"नही अंकल जी.. पहले ही आप.. वैसे भी हम लेट हो रहे हैं.. पंक्चर भी लगवाना है.. जाने कहाँ मिलेगा... हमें आगया दीजिए अब.."

"ठीक है बेटा.. जैसी तुम्हारी मर्ज़ी.. पंक्चर की एक दुकान अगले गाँव में है.." बुड्ढे ने बताया ही था कि बाहर से श्रुति की आवाज़ आई," बापू.. एक बार आना!"

" एक मिनिट.." बुड्ढ़ा कहकर बाहर निकल गया... रोहन के कप रखते ही वो दोनो भी यूँही बाहर निकल कर गाड़ी के पास आ गये..

"नितिनन्न.. ये कैसे हुआ? तूने ढंग से देखा था ना रात को..." रोहन उच्छल पड़ा..

"क्या हुआ?"

"हवा तो देख टाइयर्स की..." रोहन जैसेचिल्ला सा रहा था...

"ओह माइ गॉड.. कमाल है.. हां मैने मोबाइल की लाइट जला कर देखा था.. तब तो किसी टाइयर में हवा नही थी.. हद हो गयी यार.. यहाँ भी?"

"क्या हुआ बेटा..?" रोहन की चीख सी सुनकर बुड्ढ़ा लगभग भागता हुआ बाहर आया..

"अंकल जी.. ये.. हवा.. रात को तो बिल्कुल गायब थी.. अब कहाँ से आ गयी...? रोहन ने टाइयर्स की और इशारा करते हुए कहा...

बुड्ढे के चेहरे पर शिकन तक नही आई," हम ऐसे चमत्कारों के आदि हो चुके हैं बेटा.. आज रात ही... श्रुति सुबह उठी तो उसका कमीज़ गले से फटा हुआ था.. नीचे तक.. बुरा मत मान'ना.. पर अगर कमरे की कुण्डी बंद ना होती तो मैं तुम लोगों के बारे में भी जाने क्या क्या सोचता... पर यहाँ कुच्छ भी हो सकता है.. "

नितिन ने आसचर्या से एक बार फिर रोहन की और देखा.. वो रात को सपने में आई नीरू के बारे में सोच रहा था.. सुन्न सा खड़ा खड़ा...

"चल ठीक है अंकल जी.. अब हम निकलें..." नितिन सब कुच्छ भूल कर जाने की तैयारी करने लगा...

"शहर की और ही जाओगे ना बेटा.." बुड्ढे ने विनम्रता से सवाल किया...

"हां.. शहर से होकर ही गुजरेंगे... क्यूँ?" नितिन ने जवाब देते हुए सवाल किया..

"नही.. कुच्छ खास बात तो नही थी.. पर वो.. श्रुति को भी शहर ही जाना है.. कॉलेज में.. अगर तुम ज़्यादा लेट ना हो रहे होते तो वो भी साथ ही चली जाती.. बस के इंतजार में बहुत टाइम खराब हो जाता है.. वो कह रही थी..." बुड्ढे ने कहा..

नितिन मन ही मन उच्छल पड़ा... खुशी से.. पर खुशी को मन में दबाकर रखते हुए बोला," ये भी कोई कहने की बात है.. वैसे हमें कोई जल्दी भी नही है.. अब तो पंक्चर भी नही लगवाना.. जितनी देर कहें हम रुकने को तैयार हैं.. "

"अच्च्छा बेटा!.. वैसे तो उसका कॉलेज अभी 2-3 घंटे बाद है.. पर मैं उसको कह देता हूँ.. वह जल्दी से तैयार हो जाएगी..." बुड्ढ़ा खुश होते हुए बोला..

"नही अंकल जी.. कोई जल्दी नही है.. हम तब तक एक काम कर आते हैं.. घंटे भर में आ जाएँगे.. तब तक वो भी तैयार हो लेंगी..." नितिन का मन सातवें आसमान पर था...

"ठीक है बेटा.. जैसी तुम्हारी इच्च्छा.. मैं श्रुति को बोल देता हूँ...." बुड्ढ़ा बड़ा ही खुश लग रहा था....

"हम बस घंटे भर में आते हैं अंकल जी..." नितिन कहते हुए गाड़ी में बैठ गया.. रोहन भी उसके साथ जा बैठा.. पर उसकी समझ में नही आ रहा था की ये नितिन आख़िर जा कहाँ रहा है... नितिन ने बुड्ढे के अंदर जाते ही गाड़ी स्टार्ट करके घुमा दी," क्यूँ बे.. अब तो खुश हो जा.. तेरे मन की हो गयी.. जी भर कर बात कर लेना.. मुझसे तो बात की नही ढंग से.." कहकर नितिन ने बत्तीसी निकाल दी..

"पर अभी तुम वापस कहाँ जा रहे हो?" रोहन ने पूचछा...

"पुराने टीले पर.. देखें तो सही आख़िर क्या ड्रामा है वहाँ.." नितिन ने गाड़ी की स्पीड तेज कर दी..

"तू.. पागल हो गया है क्या..? मुझे नही जाना वहाँ..." रोहन लगभग उच्छलते हुए बोला...

"तुझे लगता है.. कोई दम है बुड्ढे की बातों में.. मुझे तो बहुत बड़ा नाटक लग रहा है.. और मुझे लगता है कि बुद्धा भी इस नाटक में शामिल है.. देखा.. उसको गाड़ी में अपने आप हवा भरी जाने पर भी आस्चर्य नही हुआ.. उल्टा कहानी बनाने लगा.. बेटी का कमीज़ फट गया रात को.. हुन्ह.. और अब देख.. कैसे अपनी बेटी को हम जवान मुस्टांडों के साथ भेज रहा है.. भला इतना भी नादान है क्या कोई आज की दुनिया में... मुझे लगता है कि श्रुति ही नीरू बनकर तुझे फोने करती होगी.. कुच्छ ना कुच्छ चक्कर तो ज़रूर है प्यारे.. कहीं ये तेरी करोड़ों की संपत्ति हथियाने की तो नही सोच रहे.. तेरा उल्लू बनाकर..." नितिन बोलता ही जाता अगर रोहन उसको बीच में ही ना टोकता..

" चुप हो जा यार.. ऐसा कुच्छ नही है.. ये सब महज इत्तिफ़ाक़ है.. तू गाड़ी वापस मोड़ ले..." रोहन झल्लाया...

"गाड़ी तो अब खूनी तालाब पर ही जाकर रुकेगी बेटा.. मुझे वो पीपल का पेड़ देख कर आना है.. और उस बच्चे को भी ढूँढना है.. तुझे उतरना है तो उतर जा.. रोकू क्या?"

रोहन कुच्छ नही बोला.. कुच्छ सोचता हुआ गाड़ी के बाहर देखने लगा....

"लेट नही हो जाएँगे क्या? अब पैदल चलना पड़ेगा..." रोहन ने आगे रास्ते पर गहरा गड्ढा सा देखते हुए कहा..

"यहाँ से गाड़ी को रास्ते से नीचे उतार कर ट्राइ करता हूँ.. उसके बाद ज़्यादा दिक्कत नही आएगी... शायद निकल जाए... चलो यहाँ से तो पार हुए... चल तू बता अब.. क्या चक्कर है तेरा श्रुति के साथ.. अब तो मुझे लग रहा है कि आज तू कुँवारा नही रहेगा..तुझे क्या लगता है?" वो गाड़ी समेत धीरे धीरे चलते हुए बढ़ते जा रहे थे..

"कुच्छ नही लगता भाई.. मेरी समझ में तो कुच्छ नही आ रहा.. अब मैं तुझे कैसे बताउ?" रोहन ने उसकी और देखते हुए कहा...

"क्यूँ? मुझे नही बताएगा तो किसको बताएगा.. साले, दोस्त हूँ मैं तेरा... भाई हूँ..." नितिन ने उसपर बताने के लिए ज़ोर डाला..," अगर आज तूने सब कुच्छ नही बताया तो समझ ले.. फिर तेरा मेरा मामला यहीं ख़तम है..."

"तो ये तालाब है वो.. इसमें तो अच्च्छा ख़ासा सॉफ सुथरा पानी है... रात को लाल कैसे हो जाता होगा.." नितिन तालाब को देखते ही रोहन से कुच्छ भी पूच्छना भूल गाड़ी रोक कर वहीं उतर गया.. रोहन भी साथ ही नीचे आ गया..," चल ना यार.. वापस चलते हैं.."

"अबे क्यूँ फट रही है.. ताउ की बात मान भी लें तो दिन में तो यहाँ कुच्छ नही होता.. चल आजा.." कहकर नितिन एक रास्ता देख दाई और बढ़ चला..

"वो बात नही है यार.. पर मेरा मन नही है.. आगे चलने का.. मूड ऑफ है.." रोहन उसके पिछे पिछे चलता रहा...

"कमाल है यार.. अब तो कीचड़ नही है.. लगता है हम दूसरे रास्ते से आए हैं आज.."

रोहन कुच्छ नही बोला.. उसके दिमाग़ में नीरू की बातें कौंध रही थी.. अगर सपने में कुच्छ सच्चाई है तो वो उसको देख रही होगी ज़रूर.. कम से कम उसको पता तो चल ही गया होगा की मैं आया हूँ.. सोच कर ही रोहन चौकन्ना हो गया...

चलते हुए वो तालाब के पार जाकर उसी जगह खड़े हो गये जहाँ कल रात वो उस बच्चे से मिले थे... सूनापन वहाँ अब भी वातावरण में मौजूद था पर वो सूनापन अब भयावह नही था.. इसके उलट अजीब सी शांति वहाँ पसरी हुई थी.. इंसानो से रहित, हल्की हल्की बह रही हवा माहौल को और भी चित्ताकर्षक बना रही थी... ऐसा लगता था की यहाँ पहले कोई गाँव बस्ता होगा.. पर अब वहाँ कुच्छ नही था.. सिवाय पुरानी ईंटों की गलियों, टूटी फूटी आधी गिरी हुई दीवारों और एकाध आवारा जानवरों के...

"कहाँ मिल सकता है वो बच्चा.. साले ने रात को खूब उल्लू बनाया.. सच में डर गया था मैं.." नितिन एक जगह जाकर खड़ा हो गया...

"मैं भी.." रोहन के मुँह से निकला...

"मुझे लगता है वो किसी घूमंतू जाती का रहा होगा.. ये लोग ऐसी ही जगहों पर जाकर रहते हैं..." नितिन बच्चे के बारे में आइडिया लगाने लगा...

"तुझे वो आदिवासी लगता है.. कितना प्यारा था दिखने में.. क्या पता वो भी कोई आत्मा ही हो " रोहन धीरे धीरे उसको लाइन पर लाना चाहता था.. ताकि जब वो उसकी कहानी सुने तो हँसे नही...

"अब तू भी शुरू हो गया ताउ की तरह... और मुझे जेनेटिक्स मत सीखा.. आदिवासी क्या खूबसूरत नही हो सकते.. क्या पता किसी देसी आदमी का टांका फिट बैठ गया हो किसी आदिवासी औरत के साथ.. होता है यार... पर अब कहाँ गये वो..?" नितिन चारों और घूम घूम कर कुच्छ तलाश कर रहा था...

"कौन?" रोहन ने पूचछा..

"आदिवासी यार.. और कौन मिलेगा यहाँ.. अर्रे देख.. वही पीपल का पेड़.. जिसके बारे में ताउ बात कर रहा था.. आ.." नितिन उसकी और बढ़ चला...

"रहने भी दे अब.. चल वापस चल.. लेट हो रहे हैं..." रोहन वहीं खड़ा खड़ा बोला.. मन ही मन नीरू की याद और उसकी बताई गयी वो जगह रोहन को अजीब सा अहसास दे रही थी.. उसका मन नही कर रहा था.. एक पल भी वहाँ खड़ा रहने को..

"अबे आ ना.. 2 मिनिट में कुच्छ नही होता.. " नितिन ने वापस आकर रोहन का हाथ पकड़ कर अपने साथ खींच लिया..," वैसे भी देरी किस बात की.. उसको आज कॉलेज थोड़े ही जाना है.. तेरे साथ चौन्च भिड़ाएगी आज तो.. प्यार भरी बतियां करेगी.. सच में बहुत प्यारी है.. अगर इनकी तरफ से कोई साजिस ना हुई तो तू बेशक इस'से शादी कर लेना.. और नही तो होली पर तो.." कहकर नितिन खिलखिला कर हंस पड़ा...

"मुझे नही जाना यार आगे.. तुझे जाना है तो जा.." रोहन अपना हाथ छुड़ा कर वहीं खड़ा हो गया... नीरू की बातें उसके दिमाग़ में अब हथोदे की तरह बजने लगी थी.. उसका सिर भारी सा होने लगा...," मैं यहीं रुक जाता हूँ.."

"साले डरपोक.. मुझे नही पता था तेरी भी... चल तू यहीं रुक.. मैं अभी आया देखूं तो सही कैसा पेड़ है और कितने वॉट का बल्ब टंगा है उस पर.. जो सारी रात उस पर रोशनी रहती है..." कहते हुए नितिन उसको वहीं छ्चोड़कर आगे बढ़ गया...

रोहन अब अकेला रह गया था.. पर जाने क्यूँ उसको हवा की साय साय में से छन छन कर आ रही कुच्छ अजीब सी हुलचल सुनाई दे रही थी.. वो सच में ही मान'ने लगा था की कुच्छ ना कुच्छ तो ज़रूर गड़बड़ है उसकी लाइफ में...नीरू की रात को कही गयी बातें रह रह कर उसके दिमाग़ में गूँज रही थी.. बेशक रोहन को वहाँ डर नही लग रहा था.. पर दिमाग़ में लगातार अजीबोगरीब तरीके से रात की यादों का भंवर उसके दिलो दिमाग़ को शिथिल सा कर रहा था...

अचानक रोहन को अहसास हुआ कि उसको पिछे से किसी ने छ्छू लिया है.. घबराकर उसने पिछे पलट कर देखा.. पर वहाँ कुच्छ नही था.. कुच्छ भी नही..," शिट.. ये मुझे क्या हो गया है...?" मन ही मन रोहन बड़बड़ाया.. और वापस मूड कर नितिन को देखने लगा.. नितिन पेड़ के पास ही खड़ा था...

तभी छ्होटी सी दीवार पर रखा पत्थर वहाँ से लुढ़क कर नीचे गिर गया.. इत्तिफाक से रोहन उधर ही देख रहा था.. अपने आप ही रोहन की धड़कने बढ़ गयी.. धीरे धीरे आगे बढ़ते हुए उसने दीवार के दूसरी तरफ झाँका.. पर वहाँ कुच्छ नही था...

 
सब कुच्छ अजीब था.. पर रोहन को अब वो सब अजीब नही बुल्की एक इशारा लग रहा था.. नीरू की तरफ से, उसके वहाँ पर होने का...

"तुम यहीं हो क्या?" रोहन ने धीरे से कहा... पर उसको कोई जवाब नही मिला...

"नीरू... नीरू.. अगर यहाँ हो तो जवाब दो..." रोहन ने फिर पुकार कर देखा.. पर कोई होता तो जवाब मिलता ना...

तभी उसको नितिन अपनी और आता दिखाई दिया.. रोहन चुप हो गया और उसकी ही और देखने लगा...

"मुझे विस्वास नही था तुम यहाँ आओगे.." नितिन आकर उसके पास खड़ा हो गया..

"हाँ.. मैं आना नही चाहता था.. पर तू ही ले आया ज़बरदस्ती.. चल अब.." रोहन ने घूमते हुए जवाब दिया और चलने लगा...

"यानी तुम मेरे लिए यहाँ नही आए..!" नितिन वहीं खड़ा हो गया..

"अब चल यार.. तेरे लिए ही तो आया हूँ.. वरना तू मुँह फूला लेता.. और मुझे अगली बार काम पड़ता तो नखरे दिखाता.. चल अब.." रोहन वापस आकर उसके पास खड़ा हो गया...

"पर.. क्या तुमने सोचा नही की मेरा क्या होगा..." नितिन अपनी जगह से हिला नही.. वहीं खड़ा खड़ा बोलता रहा...

"क्या अनाप शनाप बक रहा है.. अब चल भी..." रोहन झल्ला उठा.. उसको वहाँ से निकलने की जल्दी थी...

"पर तुम समझने की कोशिश क्यूँ नही करते.. देव.." नितिन के मुँह से 'देव' निकलते ही रोहन उच्छल पड़ा..

"व्हत.. क्या बोला तू..?"

"मेरा क्या होगा देव.. तुम्हारे वादे का क्या होगा.. बोलो"

"श माइ गॉड.. नीरू.." रोहन के आस्चर्य का ठिकाना ना था..

"हाँ देव.. मैं अब भी तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ.. प्लीज़.. नीरू को ले आओ यहाँ.. मुझे मुक्ति दे दो.. फिर जो मन में आए करना.. मैं कब से तुम्हारे इंतजार में तड़प रही थी.. कम से कम...... मुझे .....यहाँ .....से .....निकाल तो दो...." कहते ही नितिन धदाम से पीठ के बल गिर पड़ा," देव.. मुझे वापस ले चलो.. पीपल के पास.."

"नितिन.. क्या हो गया तुम्हे..?" रोहन ने घुटनो के बल बैठ कर उसका सिर अपने हाथों में उठा लिया.. सब कुच्छ पलट'ता दिखाई दिया उसको.. धरती घूमती सी दिखाई देने लगी..

"मुझे.. वापस ले चलो देव.. धूप में मुझे... इन्फेक्षन होता है.. उसका जहर तुम्हारे दोस्त की रगों.... में फैलना शुरू... हो गया है... मुझे जल्दी से.. वहीं ले चलो.. मैं वापस.... चली जाउन्गि..." नितिन अटक अटक कर बोल रहा था.. उसकी साँस फूलती जा रही थी..

रोहन की समझ में और कुच्छ ना आया.. उसने बड़ी मुश्किल से नितिन को उठाकर कंधे पर डाला और पीपल की तरफ दौड़ पड़ा...

"हाँ.. यहीं लिटा दो.. पेड़ के साथ.."

रोहन ने वैसा ही किया...

"मुझे मुक्ति दिलाना देव.. इसको ले जाओ यहाँ से.." कहते हुए नितिन की आँखें बंद हो गयी और रोहन ने वैसा ही किया जैसी उसको इन्स्ट्रक्षन मिली थी.. वह पहले की तरह नितिन को कंधे पर उठा कर तेज़ी से चलने लगा...

"अबे.. मुझे यूँ क्यूँ उठा रखा है उल्लू की डूम..उतार नीचे..." नितिन के बोलते ही रोहन की जान में जान आई और उसने नितिन को कंधे से उतार कर खड़ा कर दिया...

नितिन की साँसे तेज़ी से चल रही थी.. मानो बहुत लंबी रेस लगाकर आया हो..," क्या था ये.. कहाँ उठा ले जा रहा था मुझे.. ?"

"तुझे मालूम भी है तू कहाँ है..?" रोहन ने उसका हाथ पकड़ कर खींच लिया और आगे बढ़ने लगा...

"बता तो क्या हुआ..?" नितिन अब सामान्य होने लगा था..

"चल बाहर चल कर बताता हूँ..." रोहन ने कहा और कुच्छ समय के बाद ही वो गाड़ी के पास थे..

"तुझमें भूत आ गये थे...." रोहन ने उसकी और देखते हुए कहा...

"हा हा हा हा हा... तुझे पता नही.. मैं अब भी भूत ही हूँ...भयंकर भूत..." नितिन ने गुर्रकार कहा और फिर बोला..," चुप बे साले.. मुझे ये मज़ाक एक दम घटिया लगते हैं.. चल गाड़ी में बैठ.." कहकर नितिन ड्राइविंग सीट पर आ गया..

"तुझे विस्वास नही होता ना.. तुझे पता भी है मैं तुझे कहाँ से लाया हूँ.." रोहन उसके साथ वाली सीट पर बैठता हुआ बोला...

"हाँ.. पता है.. मैं पेड़ के साथ लेटा हुआ था जब तुमने मुझे उठाया..." नितिन ने गाड़ी स्टार्ट करके जवाब दिया..

"क्यूँ... क्यूँ लेटा था तू वहाँ.." रोहन ने फिर सवाल किया..

नितिन एक पल के लिए चुप हो गया.. फिर रोहन के चेहरे पर नज़रें थाम कर बोला," पता नही.. कमाल है यार.. विस्वास नही होता.. क्या पता नींद आ गयी हो.. छाव देखकर......."

" हुम्म.. हो सकता है..." रोहन ने बात को बढ़ाना नही चाहा.. उसको नितिन के नेचर का पता था.. अगर वो अभी नितिन को वो बातें बता देता जो अभी थोड़ी देर पहले हुई तो नितिन को वापस वहीं जा कर छनबीन शुरू कर देनी थी..," अब तो सीधे चल रहे हैं ना.. श्रुति के घर?"

"आए हाए.. क्या बात है मेरी जान..? तू तो बड़ा उतावला हो रहा है.. चिंता ना कर.. आज सारा दिन वो तेरे साथ ही रहेगी.. बस हल्का सा इशारा कर देना उसको..." नितिन शरारती सुर में बोलते हुए मुस्कुराने लगा...

"तुझे वो कैसी लगती है...?" रोहन ने नितिन से पूचछा...

"क्या मतलब?"

"बस ऐसे ही.. बता ना.. कैसी लगती है...?" रोहन ने फिर ज़ोर दिया...

"स्वीट है, सुंदर है, शर्मीली है.. कुल मिलकर मेरी भाभी बन'ने के लायक है.. पर अगर टीले पर बुला कर डराने की साज़िश में उसका या उसके बाप का कुच्छ हाथ मिला तो मैं उनको छ्चोड़ूँगा नही.. पहले बता रहा हूँ.. मुझे धोखेबाज़ी से सख़्त नफ़रत है..." नितिन ने सामने आ गये गड्ढे को देख कर गाड़ी नीचे उतार दी...

"मैं क्या पूच्छ रहा हूँ.. और तू क्या जवाब दे रहा है..?" रोहन ने कहा..

"अबे दे तो दिया जवाब.. झकास है एकद्ूम... ले लेना आज... बाहों में.. हा हा हा.." नितिन ने मसखरा किया...

"और अगर... मुझे किसी और से प्यार हो तो.....?" रोहन ने उसके चेहरे की और देखते हुए कहा...

"साले.. अपने साथ मेरी भी दुर्गति क्यूँ करवा रहा है.. कितनी 'बसंती' हैं तेरे पास.. कल इसके लिए फट रही थी और आज.. अब मुझे मत बताना वो नयी लड़की कौन है.. समझा..!" नितिन ने झल्ला कर बनावटी गुस्से से उसकी और देखा...

"म्‍मैई तो मज़ाक कर रहा हूँ यार...!" रोहन ने हिचकिचाते हुए बात कही और बाहर देखने लगा.. गाँव करीब आ गया था..

"मज़ाक कर रहा हूँ.." नितिन ने अजीब सा मुँह बनाकर उसकी नकल उतारी.. और घर के सामने गाड़ी रोक कर हॉर्न दिया... बुड्ढ़ा लगभग भागता हुआ बाहर आया..

"वो.. तैयार हो गयी क्या अंकल जी..?" नितिन ने गाड़ी का शीशा नीचे करते हुए पूचछा...

"हां.. बेटा.. वो तो तैयार है.. तुम खाना खा लो एक बार.. श्रुति ने बना रखा है.. तुम दोनो के लिए..."

रोहन कुच्छ बोलने ही वाला था कि नितिन ने पहले ही बोल दिया," ठीक है अंकल जी.. एक बार और सही..." कहकर दोनो गाड़ी से उतर कर अंदर आ गये...

अंदर जाते हुए, खाना खाते हुए और फिर बाहर आते हुए.. नितिन अपनी बारीक नज़र से घर के कोने कोने का मुआयना कर रहा था.. शायद उनके साथ पिच्छली रात हुई घटना से संबंधित किसी भी सुराग की तलाश में.. पर कुच्छ होता तो मिलता.. आख़िरकार चारों घर से बाहर निकल आए.. श्रुति के लिए रोहन ने पिच्छली खिड़की खोल दी और वो चुपचाप गाड़ी में जा बैठी," अच्च्छा बापू.. मैं चार बजे तक आऊँगी..!"

"ठीक है बेटी.." और फिर नितिन से मुखातिब होते हुए बोला," अच्च्छा बेटा.. आराम से जाना.. और इसको बस-स्टॅंड उतार देना.. वहाँ से चली जाएगी.. अपने आप.."

"क्यूँ चिंता करते हो अंकल जी.. हम कॉलेज ही छ्चोड़ जाएँगे.. अच्च्छा.. नमस्ते.."

"भगवान तुम्हारा भला करे बेटा..." बुड्ढे के ऐसा कहते ही नितिन ने गाड़ी को रफ़्तार दे दी.....

वहाँ से रवाना होने के बाद जब रोहन और श्रुति में से कोई कुच्छ नही बोला तो मजबूरन नितिन को ही अपना मुँह खोलना पड़ा," जा रोहन.. पीछे बैठ जा.."

"म्‍मैई.. कक्यूँ?" रोहन हकला सा गया...

नितिन ने बॅक व्यू मिरर को सेट करके श्रुति के चेहरे पर नज़र डाली.. लगता था उस पर उसकी बात का कोई असर नही हुआ.. या शायद उसका ध्यान उंनपर था ही नही.. अपनी लंबी काली ज़ुल्फोन को बार बार कानो के पिछे ले जाने की कोशिश सी करती हुई वह बाहर निहार रही थी... उसका चेहरा एकद्ूम शांत था.. ठहरे हुए जल की तरह, ना तो मुस्कान ही उसके चेहरे पर थी और ना ही कोई शिकन..

"अबे तू नही तो क्या मैं जाउन्गा.. सेट्टिंग तेरी है या मेरी..?" इस बार नितिन ने जान बूझकर तेज बोला था, श्रुति ने उसकी बात सुनकर तुरंत प्रतिक्रिया दी.. पर बोल कर नही.. अचानक उसने नज़रें घूमकर नितिन को देखा और अपनी गर्दन झुका ली..

" भाई तू गाड़ी चलता रह ना.. कहीं नही जाना मुझे..!" रोहन ने खिसियकर जवाब दिया.. उसका मॅन ही नही था श्रुति से बात करने का... होता भी तो अंजान लड़की से क्या बात करता.. अब तो सब सॉफ हो ही चुका था... कम से कम रोहन के दिमाग़ में...

"अजीब किस्म का प्राणी निकला तू.. 2 दिन से मुझे गधे की तरह हांक रहा है और अब कहता है कि... देख ले.. अगर तुझे कोई प्राब्लम नही है तो मैं शुरू हो जाउ?" नितिन अपनी बात का मतलब आँखों ही आँखों में रोहन को समझाता हुआ बोला...

उनको इस तरह की बातें करते देख श्रुति के कान खड़े हो गये थे.. उसका चेहरा कुच्छ फीका सा पड़ गया था.. जब उस'से रहा ना गया तो वो उनकी ही और देखकर ध्यान से बातें सुन'ने लगी....

"तू चलता रह ना भाई.. बता तो रहा हूँ.. ऐसा कुच्छ नही है.. वो मेरी ग़लतफहमी थी.. तू जो समझ रहा है, यहाँ वो मामला नही है..." रोहन ने उसको चुप करने का प्रयास किया...

"ठीक है फिर.. तेरा मामला नही है तो मैं फिर कर लेता हूँ मामला.. अब बीच में मत बोलना.." शहर को नज़दीक आते देख नितिन ने अचानक नहर के साथ साथ बने कच्चे रास्ते पर गाड़ी मोड़ दी...

श्रुति सिहर गयी और कुंपकपति हुई आवाज़ में बोली," ये.. ये कहाँ लेकर.... जा रहे हैं आप.. गाड़ी रोकिए....!"

"चिंता मत करो नीरू जी.. ये रास्ता सीधा शॉर्टकट वहीं जाता है.. जहाँ आप जाना चाहती थी.. हा हा हा" कहकर नितिन ने सिटी बजानी शुरू कर दी..

श्रुति बदहवासी में गाड़ी की खिड़की पीटने लगी..," मुझे उतार दो.. मैं चली जाउन्गि.. अपने आप!"

रोहन को नितिन के व्यवहार पर ताज्जुब हो रहा था.. इतनी बचकनी हरकत नितिन भी कर सकता है.. रोहन को कतयि उम्मीद नही थी," क्या कर रहा है यार.. ये वो लड़की नही है.. समझा कर.. इसका कोई कुसूर नही..."

नितिन ने रोहन को देखते हुए अपनी दाई आँख मारी.. मजबूरन रोहन को चुप हो जाना पड़ा.. जाने क्या करना चाहता था नितिन...

"ययएए.. आप लोग कहाँ लेकर जा रहे हैं.. गाड़ी रोकिए प्लीज़.." श्रुति गिड-गिडाने लगी..

नितिन ने उसकी बात पर कोई ध्यान नही दिया.. गाड़ी उसी गति से आगे दौड़ती रही..

"हमने सुना है किसी ने तुम्हारा कमीज़ फाड़ दिया रात को.. कौन आशिक था भला.."

श्रुति को उसकी बातों से ज़्यादा अपनी जान की फिकर हो रही थी..," मुझे नही पता.. आप गाड़ी रोक दीजिए प्लीज़.."

"बताइए तो सही.. फिर मैं आपको वापस छ्चोड़ आउन्गा.. वादा रहा.. वैसे किसी का भी कुसूर नही है.. आप हैं ही इतनी गरम की आपके साथ ज़बरदस्ती करने का मौका मिले तो कोई फाँसी की भी परवाह नही करेगा.. क्यूँ रोहन?"

"रोहन ने मुँह पिचका लिया.. उसको श्रुति पर बड़ी दया आ रही थी..

"रोक दीजिए प्लीज़.. गाड़ी वापस ले चलिए.. मैं.. आपके हाथ जोड़ती हूँ.." सच में ही हाथ जोड़ कर श्रुति रोने लगी थी...

"देखिए मिस.. मुझ पर आँसू असर नही करते.. लड़कियों का तो शिकारी हूँ मैं.. 5-4 रेप केसिज भी हैं मुझ पर.. इसीलिए सलामती इसी में है कि आप वो बोलना शुरू कर दें जो मैं पूच्छ रहा हूँ.. वरना.. मुझे अपने जज्बातों पर काबू करने की आदत नही है.. और आपके मामले में तो मैं रियायत देने के मूड में कतयि नही हूँ.. " नितिन ने फिल्मी लहजे में बात कही...

श्रुति का गला सूख गया था उसकी बातें सुनकर.. धीरे धीरे अपनी सिसकियों पर काबू पाती हुई सी बोली," क्या...?"

"क्या ये सच है कि रात को किसी ने आपकी कमीज़ फड़कर उपर से नंगी कर दिया था...?" नितिन ने पूछ्ताछ शुरू की..

श्रुति का सिर शरम के मारे झुक गया.. पर उसने अपनी गर्दन हां में हिला ही दी...

नितिन ने हालाँकि उसका हिलता हुआ सिर देख लिया था.. पर फिर भी वो बोला," बोलो!"

"हां.." बड़ी मुश्किल से श्रुति के गले से आवाज़ निकली...

"किसने?" नितिन का अगला सवाल था...

"पता नही.." श्रुति ने सिर झुकाए हुए ही जवाब दिया...

"मतलब कोई आपको नंगी कर गया और आपको पता भी ना चला.. आपको लगता है मुझे विस्वास हो जाएगा.."

"वो हमारे गाँव में अक्सर कुच्छ भी अजीब हो जाता है.. इसीलिए हमें आदत हो गयी है.." श्रुति ने संयम से जवाब देने में ही भलाई समझी...

"आदत? यूँ.. नंगी होने की.."

श्रुति ने इस बात का कोई जवाब नही दिया...

"फिर तो मैं भी ट्राइ कर सकता हूँ.. नही?" नितिन ने बेबाकी से कहा...

श्रुति सुबकने लगी.. उसके पास बोलने के लिए कुच्छ नही बचा था..

"चलिए छ्चोड़िए.. ये बता दो कि मेरे शेर से आप कब मिली थी.." नितिन ने अपना लहज़ा अपेक्षाकृत नरम करते हुए पूचछा...

"जी..?" श्रुति कुच्छ समझी नही..

"इस'से.. रोहन से आपकी मुलाक़ात कब हुई थी..?" नितिन ने रोहन की कमर पर हाथ मारते हुए पूचछा...

"मेरी..? मैने तो इनको अब से पहले कभी देखा भी नही...." सहज सवालों का जवाब देते हुए श्रुति का सुबकना कम हो गया था.. पर अंजाने डर से वो अब भी काँप रही थी...

"अच्च्छा? तुम्हे पता नही ये आपका कितना बड़ा दीवाना है.. तुम्हारे पास जाने के लिए ये मुझे रात को वो.. पुराने टीले पर ले गया.. इतना पागल हो चुका है ये.. और आप कहती हैं इस'से आप कभी मिली ही नही... ये कैसे हो सकता है?" नितिन ने चलते चलते ही कहा...

श्रुति ने हैरानी से रोहन के चेहरे की और गौर से देखा.. पर 100-100 कोस तक भी उसके पहले देखे होने का अहसास अपने दिल में जगा नही पाई," मेरा विस्वास कीजिए.. मैने इनको पहले कभी देखा नही है... मैं तो इस शहर के अलावा कभी कहीं गयी ही नही..."

"मैं कह तो रहा हूँ यार की ये वो लड़की नही है.. मुझे ग़लत फ़हमी हो गयी थी... वो कोई और है...!" रोहन से अब चुप बैठा नही गया...

"तू चुप हो जा बस.. आज के बाद तेरी शकल भी नही देखनी मुझे.. अब कौन्से टीले पर ले जाने की सोच रहा है मुझे.. तेरा तो दिमाग़ खराब हो ही गया है.. मुझे भी पागल करके छ्चोड़ेगा तू.... लीजिए मिस.. श्रुति.. आपका कॉलेज आ गया.. यही होगा ना...?"

सुनते ही श्रुति की भय के मारे सिकुड़ी हुई आँखों में चमक सी आ गयी.. अपना चेहरा उठाकर उसने चौंक कर बाहर की तरफ देखा..." हाँ.. आप.. श.. पर आपको कैसे पता मेरे कॉलेज का..." खिड़की खोलने की कोशिश करती हुई वो बोली.. पर खिड़की खुली नही..

"इस शहर में यही एक कॉलेज है.. मेरे ख़याल से... खैर.. माफ़ करना.. मैं कुच्छ जान'ना चाहता था.. इसीलिए मुझे आपको डराने के लिए घटिया बातें कहनी पड़ी... पिच्छली खिड़की का लॉक खोलना रोहन..

श्रुति कुच्छ ना बोली.. उसका मन अब उच्छल रहा था.. बचने की कम ही उम्मीद थी उसको.. गाड़ी खोलते ही वह तेज़ी से बाहर निकली और बिना बोले रोड पार करने लगी...

"ये सब क्या बकवास थी नितिन... ? चल अब..." रोहन की आँखें कॉलेज के गेट की तरफ बढ़ रही श्रुति का पीछा करती रही...

"अबे रुक तो सही.." नितिन भी बड़े गौर से श्रुति को देखे जा रहा था...

गेट पर पहुँच कर श्रुति तिठकि और पीछे मुड़कर देखा.. गाड़ी की और.. नितिन मुस्कुराने लगा और उसकी और अपना हाथ हिला दिया.. श्रुति अपनी नज़रें झुकाती हुई मूडी और सीधी आगे बढ़ गयी...

"ये क्या था भाई.. तू ऐसा भी है क्या? क्या कर रहा था तू...?" रोहन ने श्रुति के नज़रों से औझल होते हुए पूचछा...

"एक तीर से दो शिकार.." कहकर नितिन रोहन की और मुस्कुराया और गाड़ी चला दी....

"क्या मतलब?" रोहन उसकी बात समझ नही पाया....

"तू अब मेरी बातों का मतलब पूच्छना छ्चोड़ और अपने इस वाहयात नाटक का मंचन शुरू कर.. पहले तू मुझे ज़िद करके वहाँ ले गया जहाँ आदमी तो क्या आदमी की जात भी नही रहती.. फिर वापस आते हुए तुझे वो लड़की मिल भी गयी.. अब इस लड़की ने इनकार कर दिया तो तू कह रहा है कि वो ये नही कोई और है.. मतलब क्या है तेरी बातों का.. एडा समझा है क्या?" नितिन उसकी और गुर्राता हुआ सा बोला..

"नही भाई.. मैं तुझसे झूठ क्यूँ बोलूँगा.. हमेशा मैने तुझे बड़े भाई की तरह माना है.. पर सच में, मेरी खुद समझ में नही आ रहा क़ि ये सब आख़िर हो क्या रहा है.. मेरे सिर में हमेशा चक्कर सा रहता है.. ये बातें सोचकर.. तू ही बता मैं करूँ तो क्या करूँ.." रोहन ने सीट से सिर टीका अपनी आँखें बंद कर ली...

"हुम्म.. पर अब ये तू किस आधार पर कह रहा है कि 'वो' लड़की कोई और है.. फिर से फोन आया था क्या...?" नितिन ने उस'से पूचछा...

"उम्म्म.. हां..!" रोहन ने यूँही कह दिया...

"लात मार ना यार बात को.. ये लड़की कितनी मस्त है.. कहे तो इसको पटवा दूं.. चलेगी ना...?" नितिन ने सारी बात छ्चोड़ कर श्रुति की बात उठा दी...

"कैसे?" रोहन आँखें बंद किए हुए ही बोला...

"वो तू मुझ पर छ्चोड़ दे.. सिर्फ़ ये बता, उसके बाद तो तू ठीक हो जाएगा ना.. मतलब तेरे दिमाग़ का फितूर..." नितिन ने गाड़ी रोक कर उसके कंधे पर हाथ रख दिया...

रोहन कुच्छ देर चुप बैठा रहा, फिर बोला," नही यार.. मुझे उस'से मिलना है एक बार.. उसके बाद तू जो कहेगा मैं कर लूँगा..."

"उस लड़की को देखा है तूने?" नितिन ने सवाल किया...

"नही.." रोहन ने फिर अपनी आँखें बंद कर ली...

"यही बात... इसी बात पर इतना गुस्सा आता है कि.. क्यूँ अपनी अच्छि ख़ासी जिंदगी को गधे पर लादना चाहता है.. तूने उसको देखा तक नही है.. फिर क्यूँ उसके पीछे पागल हुआ जा रहा है.. मैं शर्त लगाकर कह सकता हूँ कि वो लड़की शर्तिया इस'से सुंदर नही हो सकती.. देखा है कभी नज़र भर कर इसको.. कितनी ठंडक मिलती है कलेजे को.." नितिन ने कहते हुए दिल पर हाथ रख लिया..

"तुझे ठंडक मिलती है तो तू ही ले आ ना भाई..!" रोहन उसकी बातों से तंग आ गया.. उसका दिमाग़ तो अब वहीं घूम रहा था.. बतला!

"और तू क्या समझता है.. आज भी मैं इसीलिए चुप रहा कि ये तेरी है.. वरना मैं तो टिकेट काट कर रहूँगा.. कम से कम एक बार..." नितिन ने विस्वास के साथ कहा..

"हुन्ह.. बड़ा चुप रहा तू आज.. बातों ही बातों में बलात्कार कर डाला बेचारी का.. और कह रहा है.. मैं चुप था.. अपने साथ मेरी भी ढीली करवा दी...तुझे लगता है की ये लड़की अब तेरी तरफ देखना भी पसंद करेगी...?" रोहन ने व्यंग्य किया..

"तूने मुझे क्या अपनी तरह लल्लू समझ रखा है.. एक एक दिन में दो दो लड़कियाँ पटाई हैं मैने.. और फिर ये तो बेचारी बहुत नादान है.. इसका तो घंटे भर का भी काम नही.. लड़कियों की साइकॉलजी, जियोग्रफी, केमिस्ट्री.. सब जानता हूँ मैं.." नितिन ने सीना फुलाते हुए कहा...

 
रोहन नितिन की इस बात पर हँसे बिना नही रह सका.. नितिन ने ग़लत नही कहा था.. रोहन के नेचर के उलट वो एकदम टी-20 स्टाइल का खिलाड़ी था.. जिस लड़की पर मन आ गया, उसको बिस्तेर पर लाए बिना नही छ्चोड़ा.. और फिर अगले मॅच की तैयारी.. यहीं पर नितिन और रोहन में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ था..

"चल तू जो मर्ज़ी कर लेना.. पर मेरा तो कुच्छ हल कर..."

" अब वो लड़की कहाँ मिलेगी..?" नितिन तुरंत सीरीयस हो गया...

"बतला!" रोहन ने तुरंत जवाब दिया...

"बताता? ये कौनसी जगह है? और वो तुझे कैसे जानती है...?" नितिन ने शायद नाम ढंग से नही सुना था...

"बताता नही बतला.. और हम कभी मिले नही हैं.." रोहन ने बात स्पस्ट कर दी...

"ये ले.. तो क्या सपना आया था?" नितिन ने मज़ाक में कहा..

"सच बताउ की झूठ..?" रोहन ने आँखें खोलकर उसकी और देखा...

"अब भी झूठ बोलेगा तो कान के नीचे दूँगा.. समझा क्या है मुझको..? चल शुरू हो जा..." नितिन ने उसको प्यार से झिड़की दी...

"हां.. सपना आया था...!" रोहन ने बिना रुके कह दिया...

"वॉट..?" नितिन को उसकी बात मज़ाक लगी थी..

"सपना ही आया था भाई.. तुम्हारी कसम...!" रोहन को आख़िरकार किसी ना किसी से तो अपनी विडंबना शे-अर् करनी ही थी.. सो अपने सबसे अच्छे दोस्त से कर ली..

"लगता है तुझे नशा हो गया है.. चल आ.. बियर पीते हैं.. बाद में बात करेंगे.." कहकर हंसते हुए नितिन ने गाड़ी स्टार्ट करके वापस शहर की और घुमा दी...

"ये सब क्या है यार..? तूने मुझे पहले क्यूँ नही बताया? तुझे उस लड़की की नही किसी अच्छे साइकॉलजिस्ट की तलाश करने की ज़रूरत है..." सारी बात चुपचाप सुन'ने के बाद नितिन की यही प्रतिक्रिया थी.. वो और रोहन बार में बैठे बियर पी रहे थे...

"तू ऐसा बोल सकता है भाई.. क्यूंकी तेरे साथ ऐसा हुआ नही है.. तू नही समझ सकता.. अगर ये सब मेरे दिमाग़ का फितूर होता तो बता वही लड़की जो मुझे दिखाई देती थी सपनों में, वो असलियत में कैसे मिल गयी.. जबकि हम दोनो ने कभी एक दूसरे को देखा तक नही है.. फिर अंकल जी ने जो कुच्छ पुराने टीले के बारे में बताया.. उस लड़की ने भी तो मुझे वहीं बुलाया था.. हमारी गाड़ी की अपने आप हवा निकल गयी.. सुबह अपने आप भर गयी.. सपने में उसने मेरे सामने अपनी कमीज़ फाडी.. और सुबह वो भी सच था... सबसे बड़ी बात तो मैने तुम्हारे मुँह से भी नीरू की पुकार सुनी.. जब हम टीले पर गये थे.. क्या अब भी तू कहेगा की ये सब वहाँ है..?" रोहन ने अपनी बात को पुख़्ता तरीके से पेश करने के लिए इन्न बातों को फिर से दोहराया...

"हूंम्म.. तभी तो मुझे लग रहा है की इसमें बाप बेटी की साजिश की बू आ रही है.. हर सपने का इसी लड़की से ताल्लुक है... जिसने कहानी सुनाई.. वो उसका बाप है.. टीला भी उनके गाँव का ही है.. बच्चा वो खड़ा कर सकते हैं वहाँ... और टाइयर्स की हवा भी निकाल सकते हैं.. क्यूंकी उन्हे विश्वास होगा कि वापस आते हुए हम उनका ही दरवाजा खटखटाएंगे... सुबह जागने से पहले टाइयर्स में हवा भी भर सकते हैं.. तुम्हे याद है.. जब हमने उनका दरवाजा खटखटाया तो श्रुति ने क्या कहा था.. 'बापू' वो आ गये....' क्या मतलब था इसका? यही ना की वो हमारा इंतजार कर रहे थे... शर्तिया ये इनकी ही साज़िश है.. तू मान या ना मान.." नितिन ने निष्कर्ष निकाला...

"और तू जो मुझे देव.. देव करके पुकार रहा था.. वो?" रोहन उसकी सारी बात सुन'ने के बाद बोला...

"अब तेरी दिमागी हालत ही ऐसी हो गयी है तो ये तेरा वेहम भी हो सकता है.. मुझे तो यही याद आ रहा है कि पीपल के पेड़ की ठंडी छाया देख कर एक बार लेटने का मॅन हुआ था.. फिर तू मुझे वहाँ से कंधे पर उठाकर भाग लिया...." नितिन अब भी रोहन की पूर्वजनम और आत्मा वाली बात पर विश्वास करने को तैयार नही था...

"तुझसे इस बारे में बात करना ही बेकार है.. इसीलिए तो मैने इतने दिन तक तुझे कुच्छ नही बताया.. सिर्फ़ रॉकी को ही बताया था.. पर वो डर गया और साथ आने से इनकार कर दिया...."कुच्छ रुक कर रोहन ने फिर बोलना शुरू किया," चल तेरी बात मान भी लेता हूँ.. पर एक बार बतला जाकर उस लड़की का पता लगाने में क्या हर्ज़ है.. अगर कोई नीरू वहाँ मिल गयी तो फिर तो तुझे यकीन हो जाएगा ना..." रोहन उसको समझा समझा कर थक चुका था.. पर नितिन इसको अब तक साज़िश ही मान रहा था...

"देख.. अलबत्ता तो कोई लड़की तुझे वहाँ मिलनी नही है.. इन्होने सोचा होगा की बस तू एक बार यहाँ तक आ जाए.. उसके बाद शराफ़त और नज़ाकत का चोला पहन कर श्रुति तुझे अपने आप फँसा लेगी.. पर अगर कोई लड़की वहाँ मिल भी गयी तो कौनसी बड़ी बात है.. इतना बड़ा नाटक करने वालों के लिए.. बोल.. हो सकता है कि वहाँ बैठी नीरू भी इस साज़िश में शामिल हो.."

"पर तू ये क्यूँ भूल रहा है कि सपने तो खुद मुझे आते हैं ना... अब मेरा सपना भी क्या किसी की साज़िश का नतीजा हो सकता है? या तुझे कहीं ये तो नही लग रहा कि मैं भी साजिश में शामिल हूँ.. और झूठ बोल रहा हूँ, सपने के बारे में..." रोहन ने झल्लाते हुए कहा...

"ना.. तू साजिश का हिस्सा कैसे हो सकता है.. अगर ये साज़िश है तो तेरे ही खिलाफ है.. पर मुझे लगता है कि सपना साज़िश का हिस्सा हो सकता है.. हमें किसी नूरॉलजिस्ट से बात करनी पड़ेगी..." नितिन ने एक और तर्क ठोंक दिया...

"शिट यार.. तू बात को बार बार वहीं लाकर छ्चोड़ देता है.. आख़िरी बात ये है की किसी को.. खास तौर से इन्न बाप बेटी को मेरे खिलाफ साज़िश से मिलेगा क्या?" रोहन के सब्र का बाँध टूट'ता जा रहा था...

"तेरी अकूत दौलत.. तुझे प्यार के जाल में फँसाकर ये या वो नीरू तुझसे शादी कर सकती हैं.. और फिर आधी जायदाद की मालिक बन सकती हैं.. इसमें किसी और का हिस्सा भी हो सकता है.. मसलन तेरे किसी खास दोस्त या रिश्तेदार का.. क्यूंकी इन्न लोगों के वश में नही है इतनी बड़ी प्लॅनिंग.. हमें इनकी जड़ें टटॉलनी होंगी.... कोई ना कोई तो ज़रूर है.. इस सब के पीछे... और मैं आज ही पता लगाकर रहूँगा..." नितिन ने बीअर की केन ख़तम करके एक और फैंक दी..

रोहन ने अपना माथा पीट लिया," अच्च्छा.. आज ही पता कर लेगा? पूच्छ सकता हूँ कैसे?" रोहन ने व्यंग्य सा किया...

"क्या टाइम हुआ है?" नितिन ने पूचछा...

"1:30 हो गये.. क्यूँ?"

"श्रुति आते हुए बोल रही थी कि वो 4 बजे तक आएगी.. घर बस से जाने में उसको 1:30 घंटा तो लगता ही होगा.. जल्दी से एक एक और मंगवा ले.. फिर कॉलेज के सामने चलते हैं?" नितिन ने वेटर को इशारा किया...

"आख़िर क्या करने की सोच रहा है भाई तू?" रोहन अजीब तरीके से उसको देखता हुआ बोला...

" श्रुति को सब कुच्छ बताना ही पड़ेगा..." फिर वेटर की और मुँह करके बोला," 2 चिल्ड और......."

“तू क्या फिर से श्रुति को ज़बरदस्ती गाड़ी में डालने की सोच रहा है?” रोहन ने आस्चर्य से पूचछा…

“श्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह..” नितिन ने अपने होंटो पर उंगली रख दी…

रोहन के सोचकर ही रोंगटे खड़े हो गये,” और अगर वो बेकसूर निकली तो?”

“तो क्या? सुबह उसको वापस कॉलेज छ्चोड़ देंगे.. हमें कौन जानता है?” नितिन ने सहजता से कह दिया.. मानो कोई बात ही ना हो..

“तेरी गाड़ी का नंबर.?” रोहन किसी तरह उसको इस खुरापात से दूर करना चाहता था..

“मैने आज तक अपनी गाड़ी पर ओरिजिनल नंबर. प्लेट लगाई है क्या?” नितिन शैतानी से मुस्कुराने लगा………

"मैं आज ही चला जाउ घर? मम्मी भी चिंता कर रही होंगी.." रोहन उसके खुरापाति दिमाग़ की कारस्तानियों के चक्कर में नही पड़ना चाहता था...

"ये तो और भी अच्च्छा रहेगा.. वैसे भी मुझे आज तुझे वापस भेजना ही था... गाड़ी देकर.. पर अब तो तुझे टॅक्सी करनी पड़ेगी..." नितिन ने खुश होते हुए कहा....

"वो कोई प्राब्लम नही है... बस तू ध्यान रखना.. उसका नाजायज़ फ़ायदा उठाने की कोशिश मत करना.. बेचारी बहुत मासूम है.." रोहन ने गाड़ी से निकलते हुए कहा...

"तू चुप रह ना यार.. मैं कौनसा उसका बलात्कार करने वाला हूँ.. कुच्छ पूच्छना ही तो है.. हाँ.. अपनी मर्ज़ी से देगी तो फिर तुझे कोई प्राब्लम नही होनी चाहिए.. ठीक है ना..." नितिन हंसते हुए बोला...

"मैं आज ही चला जाउ घर? मम्मी भी चिंता कर रही होंगी.." रोहन उसके खुरापाति दिमाग़ की कारस्तानियों के चक्कर में नही पड़ना चाहता था...

"ये तो और भी अच्च्छा रहेगा.. वैसे भी मुझे आज तुझे वापस भेजना ही था... गाड़ी देकर.. पर अब तो तुझे टॅक्सी करनी पड़ेगी..." नितिन ने खुश होते हुए कहा....

"वो कोई प्राब्लम नही है... बस तू ध्यान रखना.. उसका नाजायज़ फ़ायदा उठाने की कोशिश मत करना.. बेचारी बहुत मासूम है.." रोहन ने गाड़ी से निकलते हुए कहा...

"तू चुप रह ना यार.. मैं कौनसा उसका बलात्कार करने वाला हूँ.. कुच्छ पूच्छना ही तो है.. हाँ.. अपनी मर्ज़ी से देगी तो फिर तुझे कोई प्राब्लम नही होनी चाहिए.. ठीक है ना..." नितिन हंसते हुए बोला...

रोहन ने कोई जवाब नही दिया.. वो चुपचाप नितिन की और देखता रहा... बेशक नितिन ने कोई ग़लत काम ना करने का वादा किया था.. पर उसको ज़बरदस्ती रात भर रोके रखना भी तो बलात्कार से कम नही था.. कितनी नाज़ुक और कमसिन है बेचारी.. सोच कर ही रोहन का मॅन रह रह कर गाड़ी से उतर जाने को कर रहा था.. पर 'नीरू' की सच्चाई जान'ने की उत्सुकता उसको कुच्छ भी करने या कहने से रोक रही थी.. नितिन ने जो तर्क उसको इस मायवी रहस्य को साज़िश साबित करने के लिए दिए थे.. कहीं ना कहीं उसके मॅन में भी कहीं कोई गड़बड़ी होने की आशंका घर करने लगी थी....

"फिर भी यार.." रोहन अब भी नितिन की ज़िद के खिलाफ था...

"चिंता मत कर यार.. तुझे पता है.. मैं दिल का बुरा नही हूँ..." नितिन ने रोहन से हाथ मिलाया और गाड़ी स्टार्ट कर दी....

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कॉलेज के गेट पर घंटा भर इंतजार करने के बाद उस्स्को श्रुति बाहर आती दिखाई दी....

"ओये.. आ गयी...." नितिन ने मंन ही मंन कहा और गाड़ी स्टार्ट कर दी...

"चख ले बेटा.." बड़बड़ाते हुए नितिन ने गाड़ी थोड़ा और आगे करके उसी तरफ ले गया जहाँ श्रुति रोड क्रॉस करके आने वाली थी...

श्रुति ने गेट से बाहर निकलते हुए ही उनकी गाड़ी पहचान ली थी और नितिन को भी अपनी और ताकते देख लिया था.. उसने अपना सिर झुकाया और उसको नज़रअंदाज सा करके कॉलेज से थोड़ा आगे गयी ही थी की नितिन ने गाड़ी उसकी बराबर में रोक दी,"हाई श्रुति!"

श्रुति ने तिर्छि नज़र से नितिन को देखा और बिना कुच्छ बोले आगे बढ़ गयी.. नितिन ने एक पल भी नही गँवाया.. फटाफट गाड़ी से उतरा और तेज़ी से चलकर उसका रास्ता रोक कर खड़ा हो गया," मैं भी गाँव ही जा रहा हूँ.. आओ ना.. बैठ जाओ.."

"श्रुति ने नज़रें उठाकर नितिन को घूरा," मुझे जाने दो.. मैं बस में ही चली जवँगी.. हटो मेरे रास्ते से.."

"तुम तो बेवजह उस बात को दिल पर ले रही हो.. वो सिर्फ़ हल्का सा मज़ाक था.. अगर मैं सीरीयस होता तो तुम्हे यहाँ क्यूँ छ्चोड़ता.. मान भी जाओ.. मैं वहीं जा रहा हूँ.. गाँव में.." नितिन ने उसको प्यार से मना'ने की कोशिश की..

नितिन की बात का हल्का सा असर उसको श्रुति पर होता दिखाई दिया.. उसकी आँखों के झुक जाने से ..

"तुम समझ क्यूँ नही रहे हो? ये मेरा कॉलेज है.. यहाँ सब मुझे जानते हैं.. कोई क्या सोचेगा..? प्लीज़ हट जाओ और जहाँ जाना है चले जाओ.. मैं बस में जा सकती हूँ.. रोज़ ही जाती हूँ... प्लीज़ मुझे जाने दो.." कहते हुए श्रुति ने अनुनय की मुद्रा में हाथ बाँध लिए...

नितिन को भी उसकी बातों से बात बन'ती दिखाई दी..," मुझे पता नही था कि तुम इतनी कोमल हृदय हो कि ज़रा से मज़ाक से तुम आहत हो जाओगी.. मैने तो सिर्फ़ 'अपना' मानकर मज़ाक किया था.. यूँही.. तुम्हारे स्वीट से चेहरे पर गुस्सा बिल्कुल भी अच्च्छा नही लगता.. कहो तो मैं यहाँ सबके सामने कान पकड़ने को तैयार हूँ.. पर प्लीज़.. माफ़ कर दो.. और मान जाओ.. आइन्दा कभी ऐसी ग़लती नही करूँगा.. तुम्हारी कसम...!" और नितिन सच में ही अपने कानो को हाथ लगाकर खड़ा हो गया...

श्रुति शर्मिंदा सी हो गयी.. हालाँकि नितिन की कही बातों ने उसका दिल छू लिया था.. फिर भी.. वहाँ सबके सामने गाड़ी में बैठना असंभव था.. पहले ही उसको अपना तमाशा बनता नज़र आ रहा था.. जाने क्या सोचकर श्रुति के मुँह से निकल गया," थोड़ी आगे आ जाओ प्लीज़.. यहाँ मेरा यूँ तमाशा ना बनाओ.. कहकर वो उसकी बगल से निकलकर आगे बढ़ गयी..

नितिन खुशी से उच्छलता हुआ गाड़ी की और बढ़ा..

नितिन धीरे धीरे करके गाड़ी आगे बढ़ा रहा था...

बस-स्टॅंड करीब आते ही श्रुति की चाल धीमी पड़ गयी थी.. शायद उसने मन बना ही लिया था, गाड़ी में बैठने का.. उसके नितिन के पक्ष में फ़ैसला करने में इस बात ने अहम प्रभाव डाला कि उन्होने सुबह उसको सही सलामत कॉलेज छ्चोड़ दिया था...

"आ जाओ अब!" नितिन ने गाड़ी उसकी बराबर में रोक दी...

श्रुति ने झिझकते हुए सड़क पर मौजूद लोगों पर निगाह डाली.. किसी को भी जान कार ना पाकर उसने फट से खिड़की खोली और अंदर आ बैठी..

"जल्दी चलो प्लीज़... " एक लंबी साँस लेते हुए श्रुति ने कहा और आगे वाली सीट से सिर लगाकर बैठ गयी....

नितिन ने मौका देखते ही आगे से यू-तुर्न लिया और अपने पहले से निर्धारित ठिकाने की और गाड़ी दौड़ा दी, बदक़िस्मती से सिर को सीट से लगाए आँखें बंद किए बैठी श्रुति उस दिशा परिवर्तन की भनक नही पा सकी....

"कौनसा साल चल रहा है तुम्हारा?" नितिन ने श्रुति के साथ बातों का सिलसिला शुरू कर दिया...

कुच्छ देर तक श्रुति बिन बोले बैठी रही.. पर जब काफ़ी देर तक नितिन की तरफ से दूसरा सवाल नही दागा गया तो उसने मुँह खोल ही दिया," 20वा..."

"हा हा हा हा... मैं तुम्हारी उमर नही पूच्छ रहा था.. फिर भी धन्यवाद.. वैसे कौन्से ईयर में हो कॉलेज में...?"

"जी, फर्स्ट ईयर...!" श्रुति ने नज़रें झुकाए हुए ही जवाब दिया...

"शादी कब कर रही हो..?" नितिन ने पहले सवाल का जवाब मिलते ही दूसरा दाग दिया.. पर श्रुति ने इसका जवाब देना ज़रूरी नही समझा....

"कोई लड़का देख रखा है या मैं अपने लिए कोशिश करूँ...?" नितिन ने रोमॅंटिक लहजे में अगला सवाल किया...

श्रुति इस तरह की बातें सुनकर लजा सी गयी.. उसको इस तरह की बातों की आदत ही नही थी शायद...

"क्या बात है? अभी तक नाराज़ हो क्या?" नितिन की अगली बात भी सवाल ही थी...

"कितना टाइम लगेगा घर तक पहुँचने में..." श्रुति ने इस बार पलटकर सवाल किया.. वह नितिन के बेढंगे सवालों का रुख़ मोड़ देना चाहती थी.. बेशक वह अपनी मर्ज़ी से गाड़ी में बैठ गयी थी.. पर अभी तक भी अपने इस निर्णय को लेकर वो असमन्झस में लग रही थी.. पता नही किस मानसिक दबाव ने उसको नितिन की बात मान'ने पर मजबूर कर दिया था... उसके गोरे चित्ते चेहरे पर शिकन इस बात का सबूत थी कि वो अपने आप से खुश नही थी...

"बस उतना ही जितना तुम्हे बस से लगता है...." कुच्छ रुकते हुए नितिन ने अधूरी बात पूरी की...," अगर सब कुच्छ सही तरीके से हो गया तो....!"

श्रुति का माथा ठनका.. उसने तुरंत चेहरा उठाकर बॅक्कव्यू मिरर से उसकी ही और देख रहे नितिन से नज़रें मिलाई," क्क्या मतलब?"

"तुम घबरा बहुत जल्दी जाती हो.. कभी कुच्छ ऐसा वैसा किया नही है क्या?" नितिन के चेहरे पर शरारती मुस्कान उभर आई...

श्रुति को अहसास भी नही था कि वो उसके गाँव से उल्टी दिशा में किसी अग्यात स्थान की और जा रही है..," प्लीज़ ऐसी बातें मत करो.. मुझे बहुत डर लगने लगता है.. जल्दी से मुझे घर पहुँचा दो..." सच में वह डरी हुई थी.. बार बार अपने रुमाल से चेहरा पोंछती हुई वह मन ही मन खुद को कोस रही थी...

"कौन्से घर..? पुराने टीले पर...?" नितिन ने अबकी बार तो उसकी जान ही निकाल दी.. " ऐसे मज़ाक ना करें.. मुझे रोना आ जाएगा..."

"पहली बार तो हर लड़की रोती है.. ख़ासकर तुम्हारी तरह कच्ची उमर में सेक्स करना पड़ जाए तो.." नितिन ठहाका लगाकर हंस पड़ा...

श्रुति के चेहरे पर भय की बूंदे छलक उठी," ययए.. ये क्या... बकवास कर रहे हैं आप..? मैने आप पर विस्वास करके बहुत बड़ी ग़लती की.. मुझे किसी भी स्टॅंड पर नीचे उतार दो.. मैं अपने आप चली जाउन्गि बस पकड़ कर..." श्रुति के शब्दों में गुस्सा था.. पर ज़ुबान उसकी डर के मारे लड़खड़ा रही थी...

"डोंट वरी स्वीट हार्ट.. ग़लती तो हमने की तुम पर विस्वास करके... रोहन के साथ तुमने जो करने की कोशिश की.. अब क्या उसका बदला ही ना लें.. आज रात तुम मेरे बिस्तेर की शोभा बनोगी.. और तुम्हारी कसम.. तेरे जैसी लड़की बिस्तेर में कितना मज़ा देगी.. मेरा तो सोच सोच कर ही बुरा हाल है... दम निकला जा रहा है.. मेरा" नितिन बात बात पर अश्लील बाते करने से बाज नही आ रहा था..

श्रुति की हालत सुबह के जैसी ही हो गयी.. पहली बार उसने नज़रों को खिड़की के पार किया.. सब कुच्छ अंजाना था.. अंजान रास्ते.. अंजान मर्द.. और अंजान भविश्य.. श्रुति अंदर तक काँप गयी...," कहाँ जा रहे हो तुम ?.. मुझे उतार दो प्लीज़.. मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ..." अब उसकी आवाज़ में रूखापन और कठोरता नही बुल्की दयनीय और कंपकँपता हुआ लहज़ा था...

"अब तुम्हे हमारा मकसद जान'ने में ज़्यादा समय नही लगेगा जानेमन.. मंज़िल बहुत करीब है..." नितिन के चेहरे पर कड़वी सी मुस्कान लगातार श्रुति के लिए माहौल को और भी भयावह बना रही थी...

"मुझे नही चलना तुम्हारे साथ.. जहाँ भी अभी मैं हूँ.. यहीं उतार दो.. मेरा बापू मर जाएगा.. अगर मैं समय पर नही पहुँची तो....!" श्रुति ने गिड-गिडाते हुए नितिन के कंधे पर हाथ रख दिया..

"आआहा.. कितना मीठा टच है तेरे हाथों का.. तेरी ये जवानी तो सच में... हाए.. क्या चीज़ है तू..? मेरे ऑफीस में नौकरी करेगी..? दोनो को रख लूँगा साथ में.. और तो कोई तुम्हारा है नही.. बाप बेटी का... सोच ले..."

श्रुति फफक फफक कर रोने लगी... उसको अहसास हो चुका था कि वो बहुत बड़े ख़तरे में आ गयी है.. कम से कम उसकी जवानी और इज़्ज़त तो ख़तरे में थी ही.. ये उसको विस्वास था...

नितिन ने गाड़ी को छ्होटे रास्ते पर दौड़ा दिया.. हाइवे से उतार कर.. श्रुति के हाथ में कुच्छ नही था.. सिवाय सुबकने के.. उसको मालूम था की अगर वो चिल्लाने की कोशिश भी करती है तो गाड़ी के तेज म्यूज़िक में ही उसकी आवाज़ घुट कर रह जाएगी.. और फिर उसको नितिन के और ज़्यादा क्रूर होने का भी डर था.. फिलहाल अपनी नासमझी पर आँसू बहाने के अलावा उसके पास कोई रास्ता ही नही था.. सो वह कर ही रही थी....

अचानक ही गाड़ी तेज़ी से मूडी और हल्की सी चढ़ाई चढ़ कर एक पुरानी जर्जर सी इमारत में घुस गयी... श्रुति की छातिया उसके दिल के धड़कने के साथ साथ खराब रास्ते पर बड़े ही कामुक अंदाज में उच्छल रही थी....

गाड़ी इमारत में काफ़ी अंदर जाकर बने गैराज सी दिखने वाली जगह पर जाकर रुकी.. नितिन तुरंत गाड़ी से उतर गया.. उतरने के साथ ही उसने अपनी पॅंट में आ चुके उभार को छुपाने के लिए ठीक किया...

" आजा मेरी जान.. शर्मा क्यूँ रही है...? कहते हुए नितिन ने खिड़की खोलकर श्रुति को गाड़ी से बाहर खींच लिया....

"आओ.. नीचे चलते हैं...!" नितिन श्रुति के हाथ को पकड़े हुए आगे बढ़ गया.. बेचारी निरीह मासूम जानवर की तरह उसके हाथों की कठपुतली बनी उसके साथ साथ खींचती चली गयी...

बहुत ही तंग और बिना रोशनी वाले छ्होटे से टुकड़े को पार करके नितिन श्रुति का हाथ पकड़े नीचे की ओर जा रहे एक जीने पर उतरने लगा.. करीब करीब 13-14 घुमावदार पैडियो से होते हुए वो दोनो एक लॉबी में आ गये.. जिसके दोनो ओर कमरे बने हुए थे... आसचर्यजनक रूप से उस जर्जर इमारत के नीचे बनी ये जगह काफ़ी नयी प्रतीत होती थी.. उसका हर कोना कृत्रिम प्रकाश से दमक रहा था...

"तुम्हे जो चाहिए मैं दे दूँगी.. जो पूछोगे, सब बता दूँगी.. प्लीज़.. मुझे हाथ मत लगाना..." साथ चलते हुए श्रुति रह रह कर गिड-गिडा रही थी.. पर नितिन को उस वक़्त बात करने में इंटेरेस्ट नही था.... लॉबी पार करके वो दाई तरफ मुड़ा और सबसे आख़िर में जाकर एक विशाल और अद्भुत रूप से सुसज्जित शयनकक्ष सी दिखने वाली जगह पर आ गया..

"किसी बात की चिंता मत करो.. जब तक तुम मेरा कहा मनोगी.. तुम्हे कुच्छ नही होगा... लेकिन चालाक बन'ने या नखरे करने की कोशिश की तो तुम्हारा भी यही हाल होगा, जो इनका हुआ था... कहते हुए नितिन ने एक जगह चाबी फँसाई और बेडरूम के अंदर बनी दीवार के एक खास हिस्से को खिसककर आराम से खोल दिया..

"एयेए...आआआ!" बदहवास सी आँखें फैलाए श्रुति सिर्फ़ इतना ही बोल पाई थी कि बेहोश हो गयी.. उसने तो कमरे के अंदर पड़ी 5 लड़कियों की नंगी लाशों को ढंग से देखा भी नही था.. उनके शरीर से निकल कर कमरे में फैली हुई तेज दुर्गंध ने ही उसको इतना लचर कर दिया कि वह अपने पैरों पर खड़ी ना रही सकी और नितिन की बाहों में झूल गयी.....

"बहुत मज़ा आएगा... तेरे अंग अंग में इतना रस भरा हुआ है कि तेरा कतरा कतरा पीने में मुझे महीने लग जाएँगे..." नितिन ने उसको बाहों में उठाया और बेड पर लेजाकर पटक दिया.... और उसके पास बैठकर उसके नाज़ुक गुलाबी होंटो पर अपनी उंगली फिराने लगा.....

 
अधूरा प्यार--4 एक होरर लव स्टोरी

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा इस कहानी मैं रहस्य रोमांच सेक्स भय सब कुछ है मेरा दावा जब आप इस कहानी को पढ़ेंगे तो आप भी अपने आप को रोमांच से भरा हुआ महसूस करेंगे दोस्तो कल का कोई भरोसा नही.. जिंदगी कयि बार ऐसे अजीब मोड़ लेती है कि सच झूठ और झूठ सच लगने लगता है.. बड़े से बड़ा आस्तिक नास्तिक और बड़े से बड़ा नास्तिक आस्तिक होने को मजबूर हो जाता है.. सिर्फ़ यही क्यूँ, कुच्छ ऐसे हादसे भी जिंदगी में घट जाते है कि आख़िर तक हमें समझ नही आता कि वो सब कैसे हुआ, क्यूँ हुआ. सच कोई नही जान पाता.. कि आख़िर वो सब किसी प्रेतात्मा का किया धरा है, याभगवान का चमत्कार है या फिर किसी 'अपने' की साज़िश... हम सिर्फ़ कल्पना ही करते रहते हैं और आख़िर तक सोचते रहते हैं कि ऐसा हमारे साथ ही क्यूँ हुआ? किसी और के साथ क्यूँ नही.. हालात तब और बिगड़ जाते हैं जब हम वो हादसे किसी के साथ बाँट भी नही पाते.. क्यूंकी लोग विस्वास नही करेंगे.. और हमें अकेला ही निकलना पड़ता है, अपनी अंजान मंज़िल की तरफ.. मन में उठ रहे उत्सुकता के अग्यात भंवर के पटाक्षेप की खातिर....

कुच्छ ऐसा ही रोहन के साथ कहानी में हुआ.. हमेशा अपनी मस्ती में ही मस्त रहने वाला एक करोड़पति बाप का बेटा अचानक अपने आपको गहरी आसमनझास में घिरा महसूस करता है जब कोई अंजान सुंदरी उसके सपनों में आकर उसको प्यार की दुहाई देकर अपने पास बुलाती है.. और जब ये सिलसिला हर रोज़ का बन जाता है तो अपनी बिगड़ती मनोदशा की वजह से मजबूर होकर निकलना ही पड़ता है.. उसकी तलाश में.. उसके बताए आधे अधूरे रास्ते पर.. लड़की उसको आख़िरकार मिलती भी है, पर तब तक उसको अहसास हो चुका होता है कि 'वो' लड़की कोई और है.. और फिर से मजबूरन उसकी तलाश शुरू होती है, एक अनदेखी अंजानी लड़की के लिए.. जो ना जाने कैसी है...

इस अंजानी डगर पर चला रोहन जाने कितनी ही बार हताश होकर उसके सपने में आने वाली लड़की से सवाल करता है," मैं विस्वाश क्यूँ करूँ?" .. तो उसकी चाहत में तड़प रही लड़की का हमेशा एक ही जवाब होता है:

'' मुर्दे कभी झूठ नही बोलते "

दोस्तों कहानी का ये पार्ट पढ़ने के बाद कमेन्ट जरूर देना इस कहानी को आगे भी पोस्ट करू या नही

गतांक से आगे .........................

नितिन हुश्न की बेपनाह दौलत को अपने कमसिन अनच्छुए बदन में समेटे बिस्तेर पर अचेत अवस्था में लेती श्रुति को देख अपने होंटो को अपनी ही जीभ से बार बार तर करता रहा.. वह उसके पास ही बैठा उसकी यौवन प्रकाश्ठा का पर्याय मदमस्त छातियो को एकटक देखे जा रहा था... पर आसचर्यजनक ढंग से उन्हे छ्छूने की कोई कोशिश उसने नही की... अचानक वह उठा और कमरे से बाहर निकल गया...

कमरा बंद किए जाने की आवाज़ आते ही भय से चरमरा सी उठी श्रुति ने धीरे से अपनी आँखें खोल दी.. अपनी साँसों पर काबू पाने की असफल कोशिश करती हुई श्रुति ने गर्दन घूमाकर कमरे में देखा.. वहाँ कोई नही था... पर वहाँ पसरा सन्नाटा ही वहाँ किसी की मौजूदगी से भी भयानक था.. श्रुति की आँखों के सामने कुच्छ ही मिनिट पहले का अमानुषिक मंज़र रह रह कर कौंध रहा था.. उस दीवार की तरफ देखने तक की हिम्मत नही कर पा रही श्रुति अचानक उठी और बाहर निकलने के दरवाजे की और लपकी.. पर उसकी ये तेज़ी व्यर्थ ही थी; दरवाजा बाहर से बंद था...

"हे भगवान.. मैं क्या करूँ?" घुटनो के बल वहीं बैठकर सुबकने लगी श्रुति के पास और कोई चारा भी नही था...

"अभी आया मेम'साब!" अचानक कमरे में गूँजी एक मर्दानी आवाज़ ने लगभग उसको उच्छाल ही दिया..,"क्क्कौन.. कौन है?" भय के मारे श्रुति का कलेजा और आँखें दोनो बाहर निकलने को हो गये.. पर उसके बाद कोई आवाज़ उसको सुनाई नही दी...

इन्न हालत में तो बड़े से बड़े तीस्मारखा भी थर्रने को मजबूर हो जाते.. श्रुति तो फिर भी एक लड़की थी.. बदहवास सी कमरे में इधर उधर देखती वो एक दीवार के साथ चिपक कर खड़ी होकर हाँफने लगी...

अचानक दरवाजा खुला और करीब 35-40 साल का भद्दी सी शकल का लंबा तगड़ा आदमी कमरे में दाखिल हुआ.. श्रुति दह्सत के मारे सिमट कर कोने में जा खड़ी हुई...

"कुच्छ चाहिए मेम'शाब!" आदमी की आवाज़ में अत्यधिक विनम्रता थी.. पर श्रुति के लिए उस पल कोई भी आवाज़ किसी यमराज की दहाड़ से कम नही थी...

"कौन हो तुम?.. मुझे यहाँ से जाने दो प्लीज़.." श्रुति कोने में चिपके हुए ही अपने दोनो हाथ प्रार्थना की मुद्रा में आगे ले आई..

"मैं भगवान हू मेम'शाब.. भगवानदास.. साहब का सेवक हूँ.. और उनके मेहमानो का भी.. अभी साहब यहाँ नही हैं.. कुच्छ चाहिए तो फिर से मुझे आवाज़ लगा देना.. कुच्छ चाहिए क्या आपको अभी..?"

"मुझे जाने दो प्लीज़.. मुझे जाना है यहाँ से...!" श्रुति गिड-गिडाते हुए बोली...

"पर यहाँ से तो कोई जाता ही नही वापस.. जब साहब का काम हो जाएगा तो वो आपको मुझे गिफ्ट कर देंगे.. हे हे हे.. तब तक आप मेरी मालकिन हैं.. पर मेरे सामने दोबारा जाने का जीकर मत करना मेम'शाब.. साहब ने बता रखा है मुझे क्या करना है, अगर आप जाने की कोशिश करो तो.. हे हे हे.." भगवानदास ने कहा और बाहर निकल गया.. दरवाजे की कुण्डी लगाकर...

श्रुति कोने में खड़ी खड़ी सूखे पत्ते की तरह काँप रही थी.. आतंक के मारे उसका गोरा चेहरा पीला पड़ने लगा था.. रह रह कर उसको घर में उसका इंतज़ार कर रहे अपने बापू की याद आ जाती और वा सिसकने लगती.. अब तक तो उसके लिए चिंता भी करने लग गये होंगे...

"मेम'शाब खाना!" दरवाजा खोलकर अंदर आए भगवान दास ने टेबल पर एक थाली रखते हुए कहा.. एक बार श्रुति के मन में आया कि वह भागने की कोशिश करे.. पर उसके कदमों ने उसका साथ नही दिया.. उसको भगवान दास की बात याद आ गयी.. 'साहब ने मुझे बता रखा है कि आप भागनेकी कोशिश करें तो मुझे क्या करना है...'

सहमी हुई श्रुति ने खाने की और देखा तक नही.. भगवान दास के वापस जाते ही वा अपने आँसू पोन्छ्ते हुए बिस्तर पर जाकर बैठ गयी...

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"तो क्या बात हुई उस लड़की से?" रोहन नितिन के पास अकेले में बैठा था...

"कुच्छ खास हासिल नही हो पाया... उसको घर जाने की जल्दी थी और वो गिड-गिडाने लगी.. मुझे उस'पर दया आ गयी और मैने उसको जाने दिया... फिर मिलने का वादा लेकर..." नितिन ने बड़ी सफाई से झूठ बोला...

"मुझसे अब और इंतज़ार नही होता भाई.. मैं कल सुबह ही पंजाब जा रहा हूँ.. चल ना मेरे साथ.. मैने मम्मी पापा से भी पूच्छ लिया है..." रोहन ने नितिन से साथ चलने का आग्रह किया...

"क्या बताया तूने उनको? तुझे सपने में उनकी बहू मिल गयी है?" नितिन कहकर ज़ोर से हंसा...

"मैं पागल हूँ क्या?"रोहन ने नितिन की बात खारिज़ की..

"तो?"

"बस बोल दिया ऐसे ही कुच्छ.. तू बता ना.. साथ चल रहा है ना?" रोहन ने नितिन से फिर पूचछा....

"क्यूँ? वहाँ भी भूत वूत मिलने के चान्स हैं क्या?" नितिन फिर से हंसा..

"मेरा मज़ाक मत बना यार.. तुझे पता है मुझसे इतनी लंबी ड्राइविंग नही होगी.. और ड्राइवर को मैं लेकर जाना नही चाहता... चल पाडो ना भाई..." रोहन ने असली वजह बताई...

"देख मेरे पास एक दिन से ज़्यादा का टाइम नही है.. तुझे खुद ही कुच्छ करना पड़ेगा...." नितिन ने सॉफ मना कर दिया...

"वैसे तो मैने रविंदर को साथ चलने के लिए मना रखा है.. पर जाना पड़ेगा बस या ट्रेन में...." रोहन ने सपस्ट किया...

"तो कौनसा पहाड़ टूट जाएगा.. चला जा.. ड्राइविंग का झंझट ही ख़तम.. चल अभी मैं चलता हूँ.. सुबह जल्दी उठकर एक काम निपटाना है..." नितिन कहते हुए उठ गया...

रोहन उसको दरवाजे तक छ्चोड़ कर आया और वापस आकर अपने बिस्तेर में दुबक गया....

रात के करीब 9 बज चुके थे, इस दौरान जानने कितनी ही बार श्रुति दिल पकड़ कर रोई थी. जाने कितनी ही बार उसका कलेजा मुँह को आने को हुआ था.. जाने कितनी ही बार अपने बापू के बारे में सोचकर वह सिसक उठी थी.. इतना तो उसका मन भी मन चुका था कि उसकी इज़्ज़त तार तार होने से अब कोई करिश्मा ही उसको बचा सकता है, उसके बाद वह जिंदा वापस चली जाए; गनीमत है...

जान बचाने के लिए नितिन की हर बात मान लेने के लिए वह खुद को मानसिक रूप से तैयार कर चुकी थी.. यही सोच सोच कर बार बार उसका कलेजा फट पड़ता था और आँसू रह रह कर उसके गालों पर निशान छ्चोड़ जाते थे..

यूँही लेटी लेटी अपनी किस्मत को कोस रही श्रुति ने जैसे ही बाहर से नितिन की आवाज़ सुनी तो उसने अपने आँसू पौन्छे और आँखें बंद करके दम साधकर सोने का नाटक कर लिया...

नितिन दरवाजा खोलकर जैसे ही अंदर आया, उसने श्रुति को बिखरे हुए बलों में बिस्तेर पर सोते हुए पाया.. टेबल पर दोपहर का खाना ज्यों का त्यों पड़ा था.. वह मुड़कर बाहर निकलने को हुआ तो भगवान दास दरवाजे पर प्रकट हो गया..

"इसने खाना नही खाया?" नितिन ने भगवान दास से पूचछा...

"नही साहब.. मैने तो आपके कहे अनुसार बड़ी शिद्दत से बनाया था, मेम'शाब की खातिर.. हे हे हे.." भगवान दास ने बत्तीसी निकालते हुए कहा..

"इधर आओ.. "कहते हुए नितिन ने बाहर निकल कर दरवाजा बंद कर दिया.. और कमरे से दूर जाने लगा.. भगवान दास उसके पिछे पिछे ही था..

"इसको कुच्छ शक तो नही हुआ?" नितिन ने भगवान दास से पूचछा...

"नही साहब.. डर के मारे इसकी तो जान ही निकली जा रही थी.. आपके कहे अनुसार मैने रटे रताए डाइलॉग बोलने शुरू किए ही थे कि इसका बुरा हाल हो गया.. मुझे इसकी दया आ गयी साहब.. मुझसे सारी बातें बोली नही गयी..!" भगवानदास सिर झुका कर बोला...

"कोई बात नही.. डर तो पूरी तरह गयी है ना..?"

"डरने की छ्चोड़ो साहब.. ये तो मर ही जाती अगर थोड़ी देर और मैं यहाँ रहता..."

"कोई बात नही.. वो लाशों वाला प्रोग्राम तुमने बहुत अच्च्छा किया था.. एक दम असली लग रही थी.. माँस किस चीज़ का था..?" नितिन ने मुस्कुराते हुए पूचछा...

"हे हे हे.. बकरे का कच्चा माँस था साहब.. आपका फोन आते ही मैं बकरा ले आया था.. और काट कर डाल दिया था अंदर.."

"हुम्म.. गुड.. अब दूसरी तरफ से जाकर वो रब्बर के पुतले भी वहाँ से हटा दो और कमरा अच्छि तरह सॉफ कर दो..."

"जी अच्च्छा साहब...." भगवान दास ने अदब से सिर झुकाया और वहाँ से चला गया...

नितिन जैसे ही कमरे में घुसा.. उसने श्रुति को तेज़ी से अपनी आँखें बंद करते देख लिया..,"अच्च्छा.. तो अब मेरे चेहरे से इतनी नफ़रत हो गयी है कि देखना भी नही चाहती..." कहता हुआ नितिन बिस्तेर के पास जाकर खड़ा हो गया..

सिर से लेकर पाँव तक डर के मारे श्रुति काँपने लगी.. उसकी आँखें बंद थी..

नितिन का हर शब्द उसको अपने सीने में चुभता हुआ महसूस हो रहा था.. वह चुपचाप लेती रही..

"मैं सिर्फ़ तीन तक गिनूंगा...." नितिन ने अपनी बात पूरी भी नही कि थी कि श्रुति अचानक आँखें खोल कर उठ बैठी और नितिन से सबसे दूर वाले कोने पर जाकर उसको बेबसी से देखने लगी...

"बड़ी समझदार हो जाने-मॅन... अब क्या इरादा है?" नितिन ने बचकाने अंदाज में उसको और डराने की कोशिश की...

श्रुति कुच्छ नही बोली.. चुपचाप किसी मासूम मेम्ने की तरह उसको आँखें फाड़कर देखती रही जैसे खुद पर रहम करने की भीख माँग रही हो.. हालाँकि चेहरे के उड़े हुए रंग से सॉफ था की उसको रहम की उम्मीद थी नही...

"जिंदा रहना चाहती हो?" नितिन ने उसी रूखे स्वर में पूचछा...

 
श्रुति ने तुरंत अपना चेहरा हिलाया.. अब तो बस जिंदगी बचने की ही आस थी.. इज़्ज़त के साथ तो वो कब का समझौता कर चुकी थी...

"शाबाश.. लेकिन उसके लिए बहुत ज़रूरी है की मैं जो कुच्छ भी कहूँ.. जो कुच्छ भी पूच्छू.. आगया का तुरंत पालन होना चाहिए.. यदि एक बात भी तुमने नही मानी.. या एक बार भी झूठ बोला.. तो समझ लेना.. कमरे में पड़ी लाशों की तरह तुम्हे भी दूसरा मौका नही मिलेगा..."

"जी.." बड़ी मुश्किल से घुटि हुई आवाज़ श्रुति के गले से निकली...

"जाओ.. जाकर नहा लो.. तब तक मैं तुम्हारे लिए कपड़े निकालता हूँ.." नितिन ने शरारती आँखों से उसको उपर से नीचे घूरा..

"ज्जई.. यही ठीक हैं.." श्रुति ने हकलाते हुए कहा...

"क्या कहा था मैने? इतनी जल्दी भूल गयी..." नितिन ने उसको याद दिलाया की उसको उसकी हर बात मान'नि ही पड़ेगी...

"जी.. जी.. जाती हूँ.." कंपकँपति आवाज़ में बोलते हुए श्रुति ने तुरंत बाथरूम का रुख़ कर लिया... बाथरूम में घुसते हुए उसने मुड़कर नितिन की आँखों में देखा.. उसको विस्वास नही हो रहा था की अत्यंत सभ्य दिखने वाले उस इंसान की चमड़ी के पिछे एक घिनौना जंगली जानवर छिपा हुआ है....

अंदर जाकर उसने दरवाजा बंद कर लिया...

करीब 15 मिनिट बाद बाथरूम के दरवाजे पर खटखट हुई.. श्रुति सहम गयी.. वह अभी नहा ही रही थी..,"ज्जई.."

"नहाई नही हो क्या अब तक..?" बाहर से नितिन की आवाज़ उसके कानो में पड़ी....

"जी.. नहा ली.." पानी का नाल बंद करते हुए श्रुति ने मरी सी आवाज़ में कहा...

"दरवाजा खोलो..!" नितिन के स्वर में सहज आदेश था जिसे श्रुति तुरंत समझ गयी.. उसकी आँखों से आँसू लुढ़क कर उसके नंगे बदन पर मोतियों की तरह दमक रही पानी की बूँदों में समाहित हो गये.. अब हो ही क्या सकता था.. उसने दरवाजे के पास आकर एक बार अपने मजबूर बेपर्दा हुश्न को मायूसी से देखा और चिताकनी खोल कर नितिन के अंदर आने का इंतज़ार करने लगी...

"अपने कपड़े मुझे दो..." नितिन ने बाहर खड़े खड़े ही रूखे स्वर में कहा..

"जी.. एक मिनिट.." श्रुति ने काँपते हाथों से अपनी कमीज़ और सलवार हाथ बाहर निकाल कर उसको पकड़ा दी...

"और?" नितिन अभी कपड़ों की गिनती से संतुष्ट नही था...

"जी.. क्या?" श्रुति उसका मतलब समझ नही पाई....

"नाम लेने पड़ेंगे क्या?" बाकी कपड़े भी दो..." नितिन ने अपनी मंशा को विस्तार से प्रकट किया....

श्रुति की रूह तक काँप गयी.. कुँवारी जवान लड़कियाँ अपनी ब्रा और पॅंटी को तो अपनी बेशक़ीमती अमानत की तरह छुपा कर रखती हैं.. पर जान बचने की हल्की सी उम्मीद लिए श्रुति उसकी हर बात मान'ने को मजबूर थी..."जी.."

श्रुति ने कहा और सुबक्ते हुए अपने वो आख़िरी वस्त्र भी हाथ बढ़कर बाथरूम से बाहर निकल दिए... उसको विस्वास हो चुका था कि आज वो किसी हालत में कुँवारी नही रहने वाली है...

"बाहर आ जाओ.." नितिन पॅंटी को नाक से लगाकर उसमें से आ रही खट्टी मीठी गंध का आनंद लेते हुए बोला...

"जी.. तौलिया..?" कुच्छ देर उसके नायाब हुश्न को शर्मसार होने से बचाने के लिए अब टवल ही एकमत्रा सहारा हो सकता था...

"बाहर आकर ले लो..." नितिन ने उसको तड़पने में कोई कसर नही छ्चोड़ी थी...

अब कहने को श्रुति के पास कुच्छ बचा ही नही था.. और ना ही कुच्छ छिपाने को.. बिलखती हुई वो घुटनो के बल वही बैठ गयी और अपनी सिसकियों को नितिन की नाराज़गी से बचने के लिए छिपाने की कोशिश करने लगी..

"मेरे पास ज़्यादा टाइम नही है..?" बाहर उसका इंतजार कर रहे नितिन ने ज़रा ऊँची आवाज़ में कहा....

बेबस श्रुति ने हल्का सा दरवाजा खोला और उसकी आड़ लेकर अपना चेहरा बाहर निकाला.. नितिन उस'से दूसरी तरफ मुँह किए खड़ा था.. उसके कंधे पर तौलिया टंगा हुआ था और एक हाथ में श्रुति की ब्रा और पॅंटी और दूसरे हाथ में कोई हल्की नीली ड्रेस थी..

"बाहर आकर टवल ले लो.." नितिन का स्वर हल्का सा नरम पड़ा...

बाहर निकलने से पहले श्रुति ने आखरी बार अपने कुंवारे बदन को मायूसी से देखा.. उसका अंग अंग इतना प्यारा था कि नितिन की कुत्सित नज़रों से ही मैला हो जाना था.. श्रुति अंदर से टूट चुकी थी.. अपनी जांघों को चिपकाए हुए, जो कुच्छ छुपा सकती थी.. उसको च्छुपाकर; नज़रें झुकाए हुए उसके कदम अपने आप ही बाहर नितिन की और बढ़ गये.. अब वो नितिन के इतना करीब आ चुकी थी कि नितिन उसकी सिसकियाँ महसूस कर सकता था... श्रुति ने अचानक तौलिए पर झपट्टा सा मारा और जितना बदन ढक सकती थी.. ढक लिया...

"अभी वो समय नही आया है.. चिंता मत करो.. आराम से अपना बदन पौंछ लो.." नितिन क़ी ये कुच्छ देर की दरियादिली श्रुति की समझ से बाहर थी.. मन ही मन डरी सहमी शरुति धीरे धीरे तौलिए से अपना बदन पौंच्छने लगी.. इस डर के साथ की ना जाने कब नितिन पलट जाए...

"पौंच्छ लिया...?" नितिन ने पूचछा...

"ज्जई.." मानो श्रुति को 'जी' के अलावा कुच्छ कहना आता ही ना था.. नितिन के बोलते ही उसने झट से तौलिए को अपनी सेब के आकर की छातियो पर लगाकर लटका लिया.. ताकि जितनी हो सकें.. जंघें भी ढक जायें...

"गुड..! ये लो.. पहन लो.." कहते हुए नितिन ने अपना हाथ पीछे करके नीली ड्रेस श्रुति की और बढ़ा दी...

ड्रेस लेते हुए श्रुति का हाथ नितिन के हाथ से टकरा गया और उसके पुर बदन में झंझनाहट सी दौड़ गयी.. कारण था उसका नन्गपन...

श्रुति ने एक हाथ को तौलिए के साथ ही अपनी चूचियो पर चिपकाए हुए दूसरे हाथ से ड्रेस को नीचे लटका कर देखा... निहायत ही खूबसूरत वन पीस स्कर्ट थी वो.. मखमली सी बारीक रेशे की बनी हुई.. एक दम मुलायम.. इस ड्रेस को श्रुति किसी और मौके पर अपने लिए देखती तो शायद उसके चेहरे पर अलग ही नूर होता.. पर अब वैसा नही था.. उसको लगा जैसे ये सब उसकी इज़्ज़त की बलि लेने से पहले की तैयारियाँ हैं... उसने ड्रेस को सीने से उपर लगाकर देखा.. ड्रेस उसके घुटनो तक आ रही थी...

"जी.. वो.." श्रुति को लगा बिना बोले कुच्छ नही होगा...

"वो क्या.." नितिन दूसरी और मुँह किए इस कल्पना में लीन था कि बेपनाह हुषन की मालकिन उस शानदार ड्रेस में कैसी दिखेगी...

"मेरे कपड़े..!" अंजान मर्द से अपनी ब्रा और पॅंटी माँगते हुए श्रुति का चेहरा भय में भी लज्जा से लाल हो गया...

"हां.. पहन लो.. दे तो दी.." नितिन जानता था कि वो क्या माँग रही है.. पर जानते बूझते भी उसने यही जवाब दिया...

"नही.. वो.. अंदर वाले.." श्रुति की जांघों के बीच अजीब सी हुलचल हुई...

"जो तुम्हारे पास है.. वही पहन लो.." नितिन ने शरारत से कहा..

नितिन का लहज़ा नरम होता जान श्रुति ने थोड़ी सी हिमाकत कर ही दी.. और कहते हुए पूरी तरह पिघल सी गयी," सिर्फ़.. वो... पॅंटी दे दो!"

" मैने बोल दिया ना...."

नितिन ने पूरी बात बोली भी नही थी की कठपुतली की माफिक एक दम से श्रुति ने वो ड्रेस अपने गले में डाल ली..," जी.. पहनती हूँ.."

"गुड! पहन ली.." नितिन ने अब तक भी मुड़कर नही देखा था...

"जी!" श्रुति बुदबुदाई... चेहरा झुकाते हुए उसने अपनी छातियो पर मानसिक उत्तेजना की वजह से उभर कर दिख रहे 'दानो' को देखा.. और वह अंदर तक पानी पानी हो गयी.. बिना ब्रा के वो ड्रेस निहायत ही कामुक लग रही थी.. चूचियो और उसकी पेट से चिपकी हुई सी उस ड्रेस ने उसके बदन को सिर्फ़ ढक रखा था.. पर छुपा हुआ मानो कुच्छ भी नही था....

जैसे ही श्रुति ने नितिन को पिछे मुड़ते देखा.. वो उसकी तरफ पीठ करके खड़ी हो गयी.. नितिन भौचक्का सा श्रुति को देखता रह गया.. ड्रेस में वो उसकी कल्पना से कहीं अधिक कामुक लग रही थी.. नितंबों से चिपका हुआ कपड़ा उनकी दोनो फांकों का एक दम सही सही आकार बता रहा था... उनके बीच की खाई की सौम्यता भी मानो बेपर्दा सी थी.. जाने क्यूँ नितिन अपने उपर काबू किया हुए था.. श्रुति का शर्मीला स्वाभाव नितिन की उत्तेजना को और बढ़ा रहा था.. काप्ते हुए पैरों की खनक कंपन के रूप में नितंबों तक जाकर उसके गदराए हुषन को यौवन प्रकस्था तक ले गयी थी... जैसे उसकी जवानी थिरक उठी हो...

"इधर आकर बैठो.. " नितिन एक कुर्सी के सामने जाकर बेड पर बैठ गया.. सकुचती हुई श्रुति अपने दोनो हाथों को कंधे से लगाकर अपने यौवन फलों को च्छुपाने का प्रयास करती हुई मूडी और नितिन का इशारा समझ कुर्सी पर जाकर बैठ गयी....

"क्या लगता है तुम्हे? तुम वापस जा पाओगी या नही...?" नितिन ने श्रुति से काम की बात शुरू कर दी...

श्रुति कुच्छ नही बोली.. पहले से झुके हुए अपने चेहरे को थोडा सा और झुकाया और आँसू लुढ़का दिए....

"मेरा ये रोज का काम है.. मुझे तुम्हारे आँसू प्रभावित नही कर सकते.. मैने तुम्हे बताया था कि तुम कैसे वापस जा सकती हो..? अब बताओ, क्या इरादा है?" नितिन ने अपनी आवाज़ में यथासंभव क्रूरता लाने की कोशिश करते हुए कहा..

"जी.. मैं... आपकी हर बात मानूँगी..." श्रुति को डराने के लिए किसी और नाटक की ज़रूरत ही ना थी.. अब तक जो कुच्छ हो चुका था.. वह काफ़ी से भी बहुत ज़्यादा था.. उसको अंदर तक हिलाने के लिए...

"शाबाश.. तो शुरू करें..?" नितिन ने उसी अंदाज में कहा...

"जी.." श्रुति के पास और कोई ऑप्षन था ही नही.. सिवाय उसकी हर बात मान'ने के...

"तुम्हे पता है कि तुम कितनी सुन्दर हो?" नितिन ने इस सवाल से शुरुआत की...

क्या कहती श्रुति? पर कुच्छ तो कहना ही था," जी.." कहते हुए उसके दीन हीन चेहरे पर नारी सुलभ गर्व प्रीलक्षित होने लगा...

"कैसे पता?" नितिन ने इस बार निहायत ही बेतुका सवाल किया...

"जी.. !" श्रुति को कोई जवाब नही आया...

"तुम्हारे अंदर ऐसा क्या है कि तुम्हे लगता है तुम औरों से सुन्दर हो..?" नितिन बात को पता नही कहाँ ले जाना चाहता था..

"जी.. कुच्छ नही.. और भी बहुत सुंदर हैं..." श्रुति को यही कहना मुनासिब लगा..

"नही.. मैने दुनिया देखी है.. बहुतों को अपने बिस्तेर पर लाकर देखा परखा है.. पर सच कहता हूँ.. तुम जैसी मैने आज तक नही देखी.. मैं जानता हूँ.. पर बताना तुमको ही है कि तुम्हारे अंदर दूसरों से अलग क्या है?" नितिन ने कहा..

"जी.. पता नही.." श्रुति ने धीरे से कहा..

"मैं बताउ?.. तुम्हारे एक एक अंग को छ्छूकर..?" नितिन ने धमकी दी..

श्रुति अंदर तक सिहर गयी.. सवालों के जवाब देना उसको अपनी इज़्ज़त देने से भी अटपटा लग रहा था.. और वो भी उस हालत में जबकि इज़्ज़त तो जानी ही जानी थी... वो कुच्छ नही बोली...

"खड़ी होकर यहाँ आओ..!"

श्रुति ने अक्षरश: आग्या का पालन किया... खड़ी होते ही उसके हाथ फिर से उसकी छातियों को ढकते हुए कंधों पर टिक गये... नज़रें झुकाए वह नितिन के पास आकर खड़ी हो गयी...

"ये क्या छुपा रही हो?" नितिन ने उसकी आँखों में आँखें डाल कहा...

"ज्जई.. क्या?" श्रुति उसकी बात को भाँप गयी थी..

"यही.. हाथों के नीचे.. हाथ सीधे क्यूँ नही करती.. मैं चाहता तो तुम्हे बिना कपड़ों के भी यहाँ खड़ा कर सकता था.. है ना?" नितिन ने कहा..

"जी.."श्रुति की आँखें दबदबा गयी.. उसने नितिन के दोबारा बोलने से पहले ही हाथ नीचे लटका दिए...

नितिन ने अपने हाथ आगे करके उसकी 28" कमर पर दोनो और टीका दिए.. श्रुति का पेट काँपने सा लगा... भय और उत्तेजजना की लहर तेज़ी से उसके पूरे बदन को कंपकँपति चली गयी..

ना चाहते हुए भी नितिन के मुँह से निकल गया," क्या चीज़ हो तुम..!"

श्रुति की आँखें पहले ही बंद हो चुकी थी...

"अच्च्छा चलो छ्चोड़ो.. आओ.. मेरी गोद में बैठ जाओ.. !" नितिन को अपने आवेगो पर काबू पाना मुश्किल हो रहा था..

श्रुति ने चौंक कर नितिन की आँखों में देखा.. कितनी आसानी से उसने ये बात कह दी.... पर नितिन की आँखों में आदेशात्मक इशारे से वह टूट गयी.. कुच्छ प्रतिक्रिया देने की उसमें हिम्मत ही ना हुई... उसने तुरंत नज़रें वापस झुकाई और मुँह फेर कर खड़ी हो गयी.. उसको यकीन था कि नितिन उसको अपने आप ही खींच लेगा... सोचकर ही उसके नितंबों में खून का संचार हो गया.. नितंबों की थिरकन उसकी स्कर्ट के बारीक रेशों के उपर से ज्यों की त्यों महसूस की जा सकती थी...

"बैठो!" नितिन ने पयज़ामा पहन रखा था.. उसने अपनी जांघों को हल्का सा खोल दिया...

इस बार देर करने की हिम्मत श्रुति की नही हुई.. वह झुकती चली गयी और हल्की सी टीस अपने मुँह से निकलती हुई उसकी जांघों के बीच बैठ गयी," आआअहह!"

"क्या हुआ?" नितिन ने अंजान सा बनते हुए पूचछा...

अब श्रुति बताती भी तो क्या बताती.. नितिन एक साथ उसको दोनो तरह की चोट दे रहा था.. एक तरफ जान लेने का डर लगातार उसको थर्रए हुए था... और दूसरी तरफ उसकी अचेत जवानी की आग में घी डालता हुआ उसको और भड़का कर उसके जज्बातों को जिंदा करने की कोशिश की जा रही थी.. श्रुति को कपड़े के उपर से ही अपने नितंबों के नीचे कुच्छ 'साँस' सा लेता हुआ महसूस हुआ.. तेज़ी से फैल रही इस आग को पूरे शरीर में फैलाकर उसका असर कम करने की कोशिश में श्रुति ने अपनी कमर नितिन की छाती से चिपका दी....

नितिन ने अपने हाथ आगे करके उसकी जांघों पर रख दिए.. श्रुति की पलकें बंद होनी शुरू हो गयी...

"तुम्हे तो कोई भी पसंद कर सकता है.. है ना?" नितिन ने अपनी उंगलियों को उसकी मांसल जांघों पर नचाते हुए पूचछा...

इस हालत में श्रुति के लिए ऐसे सवालों का जवाब देना अपेक्षाकृत आसान था.. पर 'हां' कहते हुए भी उसके गले से 'हां' की बजाय 'अया' ही निकला..

नितिन का एक हाथ अब श्रुति के कमसिन पेट पर आग लगा रहा था...," रोहन को पटा सकती हो...?"

श्रुति के लिए अब उसकी जांघों के बीच लगातार ठोस होते जा रहे मर्दाना औजार की चुभन असहनीय होती जा रही थी... पर जवाब देना भी ज़रूरी था....," ज्जई.. पर्र..क्यूँ?"

"दौलत के लिए.. वो 80 करोड़ का अकेला मलिक है.. पर एक्दुम भोला है.. और तुम्हारे लिए पागल भी... सिर्फ़ तुम्हे उसको ये यकीन दिलाना है कि तुम ही उसकी नीरू हो...."

श्रुति को उसकी आधी बात ही समझ में आई.. उसकी जांघों के बीच बढ़ रही हुलचल के कारण उसकी उत्तेजना लगातार अनियंत्रित होती जा रही थी,"पर.... मैं तो उनको जानती भी नही..." श्रुति ने अपनी जांघें थोड़ी सी और खोल दी..

नितिन का हाथ अब थोडा और उपर होकर श्रुति की गोल और मुलायम छातियो के निचले भाग से जा टकराया था..,"उसकी चिंता मत करो... मैं तुम्हे सब समझा दूँगा.. उस'से मिलवा भी दूँगा.. तुम्हे कुच्छ नही करना.. बस मेरे हाथों का 'मोहरा' बन'ना है.. उस'से शादी करके तलाक़ लेना है बस.. 10 करोड़ तुम्हारे.. और 30 मेरे.. बोलो..."

श्रुति को तो अब तक सुन'ना भी बंद हो गया था.. उसके कानो में अजीब सी सीटियाँ बजने लगी थी... मारे कामुकता के उसने अपनी छातियो पर जा चढ़े नितिन के हाथों को वहीं दबोच लिया.. और छातियों में आ चुकी सख्ती को दबा दबा कर मुलायम करने की चेष्टा करने लगी.. उसकी साँसे अब जोरों से चलने लगी थी... नितंब नितिन की जांघों के बीच आगे पीछे होकर उस अंजानी खुजली को मिटाने का प्रयास करने लगे थे...

 
अधूरा प्यार--5 एक होरर लव स्टोरी

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा इस कहानी मैं रहस्य रोमांच सेक्स भय सब कुछ है मेरा दावा जब आप इस कहानी को पढ़ेंगे तो आप भी अपने आप को रोमांच से भरा हुआ महसूस करेंगे दोस्तो कल का कोई भरोसा नही.. जिंदगी कयि बार ऐसे अजीब मोड़ लेती है कि सच झूठ और झूठ सच लगने लगता है.. बड़े से बड़ा आस्तिक नास्तिक और बड़े से बड़ा नास्तिक आस्तिक होने को मजबूर हो जाता है.. सिर्फ़ यही क्यूँ, कुच्छ ऐसे हादसे भी जिंदगी में घट जाते है कि आख़िर तक हमें समझ नही आता कि वो सब कैसे हुआ, क्यूँ हुआ. सच कोई नही जान पाता.. कि आख़िर वो सब किसी प्रेतात्मा का किया धरा है, याभगवान का चमत्कार है या फिर किसी 'अपने' की साज़िश... हम सिर्फ़ कल्पना ही करते रहते हैं और आख़िर तक सोचते रहते हैं कि ऐसा हमारे साथ ही क्यूँ हुआ? किसी और के साथ क्यूँ नही.. हालात तब और बिगड़ जाते हैं जब हम वो हादसे किसी के साथ बाँट भी नही पाते.. क्यूंकी लोग विस्वास नही करेंगे.. और हमें अकेला ही निकलना पड़ता है, अपनी अंजान मंज़िल की तरफ.. मन में उठ रहे उत्सुकता के अग्यात भंवर के पटाक्षेप की खातिर....

कुच्छ ऐसा ही रोहन के साथ कहानी में हुआ.. हमेशा अपनी मस्ती में ही मस्त रहने वाला एक करोड़पति बाप का बेटा अचानक अपने आपको गहरी आसमनझास में घिरा महसूस करता है जब कोई अंजान सुंदरी उसके सपनों में आकर उसको प्यार की दुहाई देकर अपने पास बुलाती है.. और जब ये सिलसिला हर रोज़ का बन जाता है तो अपनी बिगड़ती मनोदशा की वजह से मजबूर होकर निकलना ही पड़ता है.. उसकी तलाश में.. उसके बताए आधे अधूरे रास्ते पर.. लड़की उसको आख़िरकार मिलती भी है, पर तब तक उसको अहसास हो चुका होता है कि 'वो' लड़की कोई और है.. और फिर से मजबूरन उसकी तलाश शुरू होती है, एक अनदेखी अंजानी लड़की के लिए.. जो ना जाने कैसी है...

इस अंजानी डगर पर चला रोहन जाने कितनी ही बार हताश होकर उसके सपने में आने वाली लड़की से सवाल करता है," मैं विस्वाश क्यूँ करूँ?" .. तो उसकी चाहत में तड़प रही लड़की का हमेशा एक ही जवाब होता है:

'' मुर्दे कभी झूठ नही बोलते "

दोस्तों कहानी का ये पार्ट पढ़ने के बाद कमेन्ट जरूर देना इस कहानी को आगे भी पोस्ट करू या नही

गतांक से आगे ............................

"थोड़ी देर बातें मत करो प्लीज़... मुझे कुच्छ सुनाई नही दे रहा.." श्रुति अब पूरी रंग में रंग चुकी थी....

"क्या हुआ?" नितिन ने अंजान बनते हुए पूचछा...

"पता नही.. पर प्लीज़.. बाद में चाहे कुच्छ पूच्छ लेना.. अब सहन नही हो रहा.." श्रुति बदहवास हो चुकी थी..

"स्कर्ट निकाल दो.." नितिन ने कहते हुए उसके गालों को चूम लिया....

नितिन के इस आदेश को पूरा करने में श्रुति ने एक पल भी नही लगाया.. उसको तो पहले ही नितिन और उसकी जांघों के बीच कपड़े की वो बारीक सी दीवार अपनी सौतन लगने लगी थी.. इस आदेश को श्रुति ने उसकी जान बखसने की शर्त नही बुल्की निमंत्रण माना.. झटके के साथ वह उठी और जांघों से स्कर्ट को खिसका उसके नितंबों से उपर करके कमर तक चढ़ा लिया और तुरंत वापस बैठ गयी...

श्रुति के नितंब उसके गालों की तरह ही गोरे और एकद्ूम चिकने थे.. उनको देख नितिन भी पागला सा गया और अपनी सारी प्लॅनिंग भूल कर उस पर टूट पड़ा.. श्रुति को अपनी गोद से उठाकर बेड पर पटका और उसके नितंबों की करारी खाई में अपनी उंगली फिराने लगा.. आनंद के मारे श्रुति ने उनको और उपर उठा चौड़ा करके उस गहराई को थोड़ा कम कर दिया...

"आआआहह बापू.. मैं तो गयी..." करारी और सॉफ किए हुए हुल्के बालों वाली योनि के दाने पर जैसे ही नितिन की उंगली ने स्पर्श किया.. श्रुति के बदन में आनंद की एक मीठी सी लहर दौड़ गयी.. एक ही पल में नितिन का हाथ मीठी गंध के योनि रस से तरबतर हो गया... श्रुति बिस्तेर पर अर्धमूर्छछित अवस्था में लंबी लंबी साँसे ले रही थी...

पर नितिन अब उसको आराम देने के मूड में नही था... उसने अपना पयज़ामा उतार फैंका.. वह भी बिना अंडरवेर के ही सोच समझ कर आया था... पयज़ामा उतारते ही फन उठाकर खड़े हो गये उसके हथियार को उसने श्रुति के हाथ में दे दिया.. श्रुति उल्टी लेटी होने के कारण उसको ढंग से देख नही पा रही थी... पर हाथ में गरमागरम तने हुए नितिन के लिंग के आते ही वह पलट गयी," हाए राम.. इतना बड़ा..!" आस्चर्य से उसने कहा..

नितिन बिना कुच्छ बोले सिर्फ़ मुस्कुराया और बाकी बचा हुआ श्रुति का शरीर भी स्कर्ट से बेदखल कर दिया... स्कर्ट से बाहर आते ही श्रुति की गोरी मस्त चूचियाँ कबूतरों की तरह फड़फड़ने लगी.. सख़्त हो जाने के बावजूद प्यारी सी कोमलता समेटे हुए दोनो चूचियों को अपने हाथों से मसलकर उनका आनंद लेता हुआ नितिन श्रुति की छाती पर आ चढ़ा.. उसका लिंग अब श्रुति की चूचियों के बीच फुफ्कार रहा था.. थोड़ा आगे झुक कर नितिन ने उसको श्रुति के होंटो से छुआ दिया.. पर श्रुति समझ नही पाई कि क्या करना है..?"

"मुँह खोलो..." पगलाए हुआ सा नितिन अब भी आदेशात्मक आवाज़ का इस्तेमाल कर रहा था..

श्रुति अब उसका इशारा समझ गयी.. अपना मुँह पूरा खोल कर उसने होंटो को गोल करके जितना हो सका उसने उनका दायरा बढ़ा दिया... नितिन ने झुक कर उसके मुँह में अपना सूपड़ा थूस दिया...," चूसो इसे... और अंदर लेने की कोशिश करो.. गले तक.."

श्रुति को ये सब अजीब सा लगा.. पर बेहूदा बिल्कुल नही.. अपनी तरफ से वो पूरी कोशिश करने लगी.. जितना अंदर ले सकती थी लिया और फिर अपना मुँह हिलाकर उसको अंदर बाहर करने लगी.. नितिन आनंद के मारे मरा जा रहा था.. सच है कि इस खेल में अनुभव का अलग ही मज़ा है.. पर ये भी सच है कि पार्ट्नर अगर बिल्कुल अनाड़ी हो तो उत्तेजना अपने चरम पर रहती है...

अचानक नितिन को लगा कि वह अब कुच्छ पल का ही मेहमान है तो उसने श्रुति के हाथों को दबोचा और पूरी ताक़त से अपना लिंग उसके गले में उतार दिया...

श्रुति छॅट्पाटा उठी.. उसको अपना दम घुट'ता सा महसूस होने लगा और उसने उसको निकालने की भरसक कोशिश की.. पर जब तक वो सफल होती.. नितिन के लिंग से निकले रस की धार उसके गले को तर करती चली गयी.. और उसके बाद अपने आप ही लिंग ने छ्होटा होकर उसको साँस लेने लायक जगह गले में दे दी...

नितिन मुस्कुराता हुआ उसके उपर से उठ गया.. श्रुति कुच्छ समझ नही पाई.. जिस पल नितिन ने उसके गले में लिंग फँसाया.. उसको तो यही अहसास हुआ था कि ये कोई मारने का तरीका है.. नितिन के अपने उपर से हट जाने के बाद वो उसको आँखें फाड़ कर देखने लगी...

"क्या हुआ..? नितिन ने उसको अपनी बाहों में उठा अपनी गोद में लिटा सा लिया.. इस स्थिति में श्रुति के नितंब एक बार फिर नितिन की जांघों के बीच थे.. पर इस बार नज़ारा दूसरा था.. गोद में सीधी लेटी हुई श्रुति की जांघों में छिपि बैठी कुँवारी तितली लाल होकर नितिन के मुँह में लार का कारण बन रही थी..

श्रुति को जब तक समझ में आता.. नितिन उसको बिस्तेर पर लिटा 69 की पोज़िशन में उसके उपर आ चुका था.. जैसे ही नितिन ने श्रुति की योनि को अपने होंटो से च्छुआ, उसकी सिसकी निकल गयी..,"अया.. ये क्या है?" कसमसाते हुए श्रुति ने कहा...

"बस देखती जाओ.. तुम्हारा दिल करे वो तुम करो.. मेरा दिल जो कर रहा है.. वो मैं करूँगा.." कहते ही नितिन ने वापस उसकी योनि से अपने होन्ट सताए और उसकी पतली फांकों के बीच रास्ते को अपनी जीभ से कुरेदने लगा..

श्रुति उन्माद से पागल सी होती जा रही थी.. जब कुच्छ और उसकी समझ में नही आया तो अपनी आँखों के सामने झूल रहे उसके लिंग को अपने सिर के नीचे तकिया लेकर अपने मुँह में भर लिया.. और पहले की तरह चूसने लगी...

खेल करीब 5 मिनिट तक चला... दोनो पागल से होकर एक दूसरे के अंगों को काट खाने को उतावले से होने लगे.. जैसे ही श्रुति की सिकियाँ बढ़ने लगी.. नितिन ने तैयार होकर अपने होंटो को पूरा खोलकर उसकी योनि को ढक लिया.. ताकि रस के एक भी कतरे से वह वंचित ना रह पाए... सखलन आरंभ होते ही श्रुति ने अपने नितंबों को उपर उठा लिया और हाँफने लगी.. बिस्तेर पर निढाल पड़ी हुई श्रुति पहले ही दिन दूसरी बार यौन आनंद के सागर में गोते लगाने लगी...

साँसों की गति कम होने पर जैसे ही श्रुति ने आँखें खोली, नितिन को सामने बैठकर अपनी जांघों के बीच कुच्छ टटोलते पाया... वासना की खुमारी उतरने के बाद जब उसने नितिन को इस तरह अपनी कुँवारी योनि पर नज़रें गड़ाए देखा तो वह शरम से लाल हो गयी," क्या कर रहे हो?"

"अभी पता चल जाएगा..." नितिन ने इतना ही कहा और उसकी रस से तर योनि में अपनी उंगली घुसा दी.. हुल्के पर अजीब से दर्द ने श्रुति को उच्छलने पर मजबूर कर दिया..," ऊओई.. "

नितिन उसकी और देखकर मुस्कुराया और बोला," सच में लड़कियाँ इतनी कमसिन और नादान होती हैं.. आज पहली बार पता लगा...!"

ज़बरदस्ती वहाँ लाकर उसको डरा धमका हर बात के लिए मजबूर करने को नितिन के द्वारा 'प्यार' का नाम देने पर श्रुति की आँखें डॅब्डबॉ गयी..," प्यार ऐसे होता है क्या? जान से मारने की धमकी देकर.." श्रुति में जाने कहाँ से व्यंग्य करने का साहस आ गया...

"कौन मार रहा है तुमको जान से... तुम तो जान के करीब रखने वाली चीज़ हो जानेमन..." नितिन ने उंगली धीरे धीरे आगे पीछे करनी शुरू कर दी.. अब उंगली सररर से अंदर बाहर हो रही थी.. बिना रुकावट के..."

"अब तो मुझे बखस दोगे ना..? जाने दोगे ना यहाँ से...?" श्रुति बहकति हुई साँसों के साथ भावुक हो उठी...

"तुम्हे कुच्छ नही होगा जान.. मैं बाद में बात करूँगा... अब प्लीज़ चुप हो जाओ और प्यार करने का आनंद लो.. मेरा वादा है.. तुम जो चाहोगी वैसा ही होगा..." नितिन इतने कोरे माल को पाकर धन्य हो उठा था...

श्रुति ने अपनी आँखें बंद कर ली और एक बार फिर नितिन की उंगली के साथ अपने नितंबों की थिरकन से ताल मिलाने लगी.. नितिन का जोश भी अब हिलौरे मार रहा था.. उसने अपनी उंगली निकाली और श्रुति की टाँगें उपर उठाकर योनि के होंटो पर अपना लिंग सटा दिया...

इसके साथ ही श्रुति को फिर से बेचैनी सी महसूस होने लगी.. उंगली की बजाय इस गरम और मोटी चीज़ का स्पर्श ज़्यादा आनंदकरी था.. पर इतना मोटा?.. यही सोचकर उसकी धड़कने बढ़ने लगी थी," प्लीज़.. आराम से.. तो... आआआआअहह.. मर गयी.. निकाल लो... प्लीज़.." श्रुति का लहज़ा बोलते बोलते अचानक बदल गया.. आनंद अचानक तीव्र पीड़ा में बदल गया और अंदर गये औजार को बाहर निकालने की अनुनय करती हुई वा च्चटपटाने सी लगी...

"अब निकालने का कोई फायडा नही जान.. उल्टा दर्द ज़्यादा ही होगा..." कहते हुए अपने सूपदे को योनि मुख में डाले हुए ही उसने श्रुति को कसकर दबोचा और उसकी चूचियो पर झुक गया... गोल गोल छाती को एक हाथ से प्यार से मसलता हुआ नितिन जैसे ही उसकी दूसरी चूची से रास्पान सा करने लगा.. श्रुति का मन दावदोल हो गया.. आनंद और पीड़ा की एक साथ अनुभूति ने उसको अजीब से धर्मसंकट में डाल दिया... धीरे धीरे जब उसकी पीड़ा कम होनी शुरू हुई तो आनंद उस पर हावी हो गया और वो फिर से 'तीसरी' बार की तैयारी में मस्त होकर नितंब उपर उठाने लगी.. नितिन धीरे धीरे अंदर होता जा रहा था...

"आआआहह.." जैसे ही नितिन का लिंग पूरा श्रुति के अंदर समाया, श्रुति पागल सी हो गयी.. दर्द के मारे नही.. आनंद के मारे.. नितिन ने लगभग पूरा लिंग बाहर खींचा और इस बार ज़्यादा तेज़ी के साथ अंदर कर दिया.. तेज़ी बढ़ने से आनंद में भी वृधि हुई थी.. श्रुति ने नितिन की कमर पर हाथ ले जाकर उसको अपनी चूचियो पर चिपका लिया.. अब रास्ता एकद्ूम सॉफ था.. नितिन के धक्कों की गति तेज हो गयी और हर धक्के के साथ वो बढ़ती ही गयी.. साथ में साँसें भी... साथ में धड़कने भी.. श्रुति के मंन का सारा डर निकल कर अब वासना के इस अजीबोगरीब सफ़र में नितिन का हुमराही बन गया.. नितिन उपर से धक्का लगाता और एक उसी वक़्त श्रुति नीचे से... धक्कम धक्का की इस रेलाम पेल में उनको ये अहसास तक नही हुआ कि बिस्तेर की चदडार का एक छ्होटा सा हिस्सा खून के धब्बों से रंग चुका है... ये रेलाम पेल तब तक जारी रही, जब तक कि श्रुति ने तीसरी बार सखलित होकर अपनी जांघें भींचने की कोशिश शुरू नही कर दी... अब नितिन का ठहरना नामुमकिन था.. पर अंदर ही झड़ने की बजाय उसने श्रुति के योनि रस और खून से सना अपना लिंग निकाल कर उसके पेट पर धारदार पिचकारी छ्चोड़ दी.... और फिर उसके उपर लाटेकर ही अपनी साँस उतारने लगा....

श्रुति की आँखें नम हो गयी... नितिन ने देखा और पूचछा," क्या हुआ?"

"अब तुम मुझे मारोगे तो नही ना....?" श्रुति ने उसकी आँखों में देखते हुए पूचछा....

"तुम तो बिल्कुल पागल हो... जाओ.. जाकर नहा लो.. फिर बात करते हैं..." कहते हुए नितिन ने उसको बाहों में उठाया और बाथरूम के दरवाजे पर उतार दिया...," मैं भी नाहकार आता हूँ.. तब तक..."

श्रुति उसको गौर से देखती हुई पल पल में आ रहे उसमें बदलाव के कारण को समझने की कोशिश करने लगी... अटनाक से ग्रस्त उसके दिल के एक छ्होटे से हिस्से में अब जीने की आस बढ़ गयी थी..

बाथरूम से नहा कर श्रुति ठहरे और थके हुए कदमों से बाहर निकली.. उत्तेजना का भूत दिमाग़ से उतरते ही उसको फिर से 'अपनी जान' और बापू की चिंता सताने लगी.. नितिन नहा धोकर बेड पर पसरा हुआ था.. श्रुति को देखते ही उसने बैठ कर अपनी बाहें फैला दी," आओ जाने मॅन!"

श्रुति किसी खिलौने की तरह उसके करीब आकर खड़ी हो गयी.. नितिन ने हाथ बढ़कर उसका हाथ पकड़ा और अपनी बाहों में खींच लिया.. श्रुति निढाल सी उसके उपर जा गिरी...

नितिन ने प्यार से उसके गालों को चूमा," तुम किसी बात की फिकर ना करो... वो सब सिर्फ़ एक नाटक था.. तुम्हे डराने के लिए.. ताकि तुम चुपचाप मेरी हर बात मान लो.."

नितिन के बात करने के लहजे में आए बदलाव से श्रुति कुच्छ हद तक निसचिंत हुई.. पर पूरी तसल्ली उसको नही हुई थी," पर.. वो लाशें?" याद करते हुए श्रुति का पूरा बदन झनझणा उठा...

"हा हा हा... एक मिनिट.. भगवान दास...!" नितिन ने ज़रा ज़ोर से आवाज़ लगाई...

"जी साहब.."भगवान दास दरवाजे के बाहर से बोला...

नितिन उठा और दरवाजा खोलते हुए बोला," ज़रा एक बार वो लाश उठाकर लाना..!"

भगवान को अहसास नही था कि नाटक ख़तम हो चुका है.. नितिन के करीब आते हुए धीरे से बोला..," पर साहब.. उनको तो मैने धो दिया है..."

"हां.. हां.. वही.." कहते हुए नितिन वापस बिस्तेर पर आकर श्रुति से दूरी बनाकर बैठ गया...," दरअसल वो रब्बर के पुतले हैं.. शिकार के दौरान उन्न पर खून लगा मैं उनको जानवरों को आकर्षित करने के लिए यूज़ करता हूँ.. अभी तुम पूरी रोशनी में उनको देखोगी तो सब समझ जाओगी..."

श्रुति प्रतिक्रिया देने ही वाली थी कि भगवान दास 'एक लाश' को बालों से पकड़ कर खींचता हुआ कमरे में ले आया...

श्रुति हैरत के मारे उच्छल पड़ी," ये तो... नकली हैं...!"

"मैं क्या अभी फ़ारसी में बोल रहा था...!" नितिन ने मुस्कुराते हुए कहा...," मैं क्या तुम्हे आदमख़ोर दिखाई देता हूँ...?"

श्रुति ने खुद को ठगा सा महसूस किया... ये पुतले ही थे जिन्होने श्रुति को अपनी मर्ज़ी से बिना किसी प्रतिरोध के अपना शरीर नितिन को सौंपने पर मजबूर कर दिया.. वरना..," अब तो मुझे घर छ्चोड़ आओ.. मैं कुच्छ भी कह दूँगी बापू को... सुबह तक नही गयी तो वो तो मर ही जाएँगे..."

"अभी कहाँ.. अभी तो तुम्हे लाने का असली मकसद पूरा करना है... बापू जी की चिंता मत करो.. मैने एक लड़की से घर फोने करवा दिया है कि तुम उसके पास हो..." नितिन ने श्रुति को धाँढस बँधाया...

"पर... तुम्हे घर का नंबर. कहाँ से मिला...?" श्रुति ने आस्चर्य से कहा...

" तुम्हारे बापू से लिया था.. जब मैं और वो अकेले बैठे थे... यूँही.." नितिन दरवाजा बंद करके उसके पास आकर बैठ गया...

श्रुति को अब अपने आप से ग्लानि हो रही थी.. जान बचने का भरोसा मिलने के बाद उसको अपने भंग हो चुके कौमार्या का गहरा पासचताप था... ये पीड़ा अब उसके दिल में टीस बनकर उभरने लगी...," पर आपने ऐसा क्यूँ किया.. मेरे साथ?" श्रुति ने भावुक होकर दर्द से भारी आँखों से नितिन की आँखों में देखा..

"तुम्हारे 10 करोड़ और अपने 30 करोड़ के लिए.. अगर तुम मुझसे शादी करना चाहो तो ये हमारे 40 करोड़ भी हो सकते हैं..." शादी का जिकर करके नितिन ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया.. उसको कतयि अहसास नही था कि उसको शादी के लिए प्रपोज़ करने वाला पहला शख्स इस अंदाज में उस'से रूबरू होगा.... सोचकर ही श्रुति पूरी तरह टूट गयी और सुबकने लगी...

"डॉन'ट बी एमोशनल यार.. जिंदगी में कुच्छ हासिल करने के लिए कुच्छ खोना ही पड़ता है... और 10 करोड़ के लिए ये कीमत कुच्छ भी नही.. तुम रोना धोना छ्चोड़ ध्यान से मेरी बात सुनो...!" नितिन ने उसकी और गौर से देखते हुए कहा...

"क्या सुनू मैं अब?" श्रुति फट सी पड़ी..," आपको अहसास भी है कि एक लड़की के लिए उसकी इज़्ज़त क्या मायने रखती है.. ? आप मेरी कीमत लगा रहे हो.. मेरी जिंदगी की... अब अगर मैं जियूंगी तो सिर्फ़ बापू के लिए.. घुट घुट कर.. आपको नही पता की आपने मुझे क्या जखम दिया है..!" श्रुति सुबकने लगी...

"पर मैने कहा ना.. मैं तुमसे शादी तक करने को तैयार हूँ.. मेरी बात तो सुन लो..." नितिन एक पल के लिए श्रुति की नफ़रत उगलती आँखों को देख बॅकफुट पर आ गया...

" सीना तान कर कहते हो कि जाने कितनी ही लड़कियों को इस तरह बिस्तेर पर लेकर आए हो! किस किस से शादी करोगे.. बलात्कार करने के बाद... बोलो!" श्रुति चिल्ला पड़ी.. उसके आँसू अब भी नही थम रहे थे...

"हे.. एक मिनिट.. मैने तुम्हारे साथ कोई ज़बरदस्ती नही की.. मेरे पास सबूत भी है.. अब मेरी नरमी का ज़्यादा फयडा उठाने की कोशिश मत करो.. शादी के लिए मैने सिर्फ़ इसीलिए ऑफर किया है कि तुम मुझे पसंद हो.. इसीलिए नही कि मैं तुमसे प्यार करने का हर्जाना भुगतना चाहता हूँ.. समझी.. चुप चाप मेरी बात सुनो.. वरना भगवान दास को भी नयी नयी लड़कियों का बड़ा शौक है... और उसका अंदाज तुमसे सहन नही हो पाएगा..." नितिन खिज कर गुर्राने सा लगा...

श्रुति को तो डरने के लिए हूल्का सा इशारा ही काफ़ी था.. खुद को भगवान दास को सौंप दिए जाने की धमकी सुनकर तो वह थर्रा सी उठी... यहाँ वह उनका विरोध कर भी कैसे सकती थी.. अपने आपको सिसकने से रोकने की कोशिश करते हुए उसने आँसुओं को पौंच्छा और चुप होकर बैठ गयी....

"मेरा एक काम तुम्हे करना होगा.. बदले में तुम्हे मैं इसकी कीमत भी दूँगा.. 10 करोड़..." नितिन ने उसके हाथों को अपने हाथ में लेते हुए कहा....

"क्या? " श्रुति का जवाब 10 करोड़ के लालच की वजह से नही आया.. पर जवाब देना ज़रूरी था.. बात सुन'ना ज़रूरी था..

"पहले तुम्हे मैं एक कहानी सुना दूं... रोहन अपने बाप का इकलौता लड़का है.. जाहिर है उसके बाप की 80 करोड़ की वसीयत सीधी उसके ही हिस्से आनी है... पर मुझे नही लगता वो इस दौलत को संभाल पाएगा.. बड़ा सीधा और सरल है बेचारा... कोई ना कोई उस'से वो दौलत हथिया ही लगा.. तो क्यूँ ना मैं ही कुच्छ सोच लूँ.. हे हे हे.. वैसे मुझे बड़ा भाई मानता है बेचारा...!" कहते हुए नितिन रुक गया...

 
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