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अधूरा प्यार-- एक होरर लव स्टोरी compleet

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श्रुति के कोई प्रतिक्रिया ना देने पर उसने बोलना जारी किया..," दर असल कयि महिने से उसको अजीब से सपने आ रहे हैं... उसके सपनो में तुम आती हो और अपने पास बुलाती हो.. पूर्व जनम का वास्ता देकर.. ये सब अजीब है और मेरी समझ से बाहर भी.. पर कुच्छ घटनाओ ने मुझे भी सोचने पर मजबूर कर दिया है.. रात को तुम्हारा जो कमीज़ फटा.. वो तुमने खुद उसके सपने में फाडा था.. कितना अजीब है ना.. खैर हमें उस'से क्या लेना देना.. सिर्फ़ काम की बात सुनो.. तुम्हे देखकर वो तुम्हे ही अपने सपनो की रानी मान'ने लगा था.. पर फिर सपने में तुमने ही उसको ये बोला कि वो लड़की मैं नही हूँ.. कोई और है.. नीरू नाम की.. समझी कुच्छ?"

"नही..!" सच में श्रुति के मॅन में कुच्छ भी पल्ले नही पड़ा...

"चलो एक मिनिट.. तुम्हे सारी बात विस्तार से बताता हूँ.." कहकर नितिन उसको पूरी कहानी बताने लगा जो उनके टीले पर जाने से शुरू हुई और आज दोपहर रोहन द्वारा सारी सपना-कहानी का पटाक्षेप करने पर ख़तम....

"अगर उसकी सारी कहानी उसके दिमाग़ का वेहम है तो फिर तुम्हे वो पीपल के पास दौरा क्यूँ पड़ा..?" श्रुति ने कहानी में पूरी दिलचस्पी ली.. हालाँकि वह उसको उसके दिमाग़ का वेहम नही बुल्की पूर्वजनम की कोई सच्ची अनकही कहानी मान रही थी...

"वो मैने नाटक किया था.. एक तरफ मैं उसको ये कह रहा था की ये सब कुच्छ नही है.. दूसरी तरफ उसके दिमाग़ में थूस थूस कर नीरू का भूत भर देना चाहता हूँ.. ताकि उसको मुझ पर रत्ती भर भी शक ना हो..." नितिन ने जैसे अपने मन की पूरी गंदगी निकाल कर उसके सामने रख दी...

श्रुति ने उसकी आँखों में देखा.. नितिन को अपने लिए श्रुति की आँखों में घृणा का संचार होते देखा," ऐसे क्या देख रही हो?"

"कुच्छ नही.. अब.. मुझसे क्या चाहते हो...?" श्रुति ने नज़रें झुकते हुए कहा...

"यही कि तुम इस प्लान में मेरा साथ दो... तुम रोहन को विस्वास दिलाओ की तुम्हे सब कुच्छ याद आ गया है.. और तुम्ही उसके पूर्वज़नम की प्रिया हो.. यानी इस जनम में रोहन की नीरू...!"

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"समय की पाबंदी तो कोई तुमसे सीखे.. कितने बजे का टाइम दिया था तुझे?" रोहन रविंदर के आते ही उस पर गुर्राया...

"ओये होये.. क्या बात हो गयी यारा...? टेन्षन ना ले.. आ तो गया ना मैं.. देख तेरी खातिर बिना नहाए ही भाग आया हूँ उठते ही... खाली ड्राइक्लेन की और पर्फ्यूम लगा लिया..," रविंदर ने अगली बात धीरे से उसके कान में कही," मैइले कपड़ों में ही.. धुले हुए मिले ही नही यार.. तूने कल रात को ही बताया..."

"तू नही सुधरेगा...! ट्रेन निकाल दी ना.. ट्रेन से चलने का प्रोग्राम था.. अब बस से जाना पड़ेगा.." रोहन ने मुँह बनाया...

" ऐसी भी क्या जल्दी है? आने वाली अपने आप सुधार देगी.. कोई इस जैसी सोहनी.." पास से गुजर रही सुंदर सी मस्त फिगर वाली लड़की को देखकर रविंदर ने जुमला फैंका... लड़की ने शायद बात सुन ली.. अपनी चाल को धीमी करके लड़की ने रविंदर को घूरा और आगे निकल गयी..

"देख कैसे देख रही थी.. मुझे ऐसी ही किसी की ज़रूरत है.. लाल मिर्ची जैसी.. जो मुझे सुधार सके.. है ना!.. हे हे हे" रविंदर ने थोड़ी और तेज आवाज़ में बात कहकर लड़की तक अपनी फरियाद पहुँचा ही दी....

"अपनी ज़ुबान को फेविकोल से चिपका कर रखा कर.. नही तो किसी दिन ऐसी धुलाई होगी कि.." रोहन ने वापस मुड़कर देख रही लड़की की तरफ देख कर आँखों ही आँखों में खेद प्रकट किया..

"ओये धुलाई उलाई छ्चोड़.. चल बस स्टॅंड ढूँढते हैं.. नही तो बस निकलने का ठीकरा भी मेरे ही सिर फोड़ेगा तू... बाकी लड़की पटाखा थी यार... नही?" रविंदर अब भी बाज नही आया...

"अबे ये क्या है चाचा... बस स्टॅंड ही तो है ये!" रोहन चिल्ला उठा...

"ओह माइ गॉड.. आइ'एम सो सॉरी.. मैं तो भूल ही गया था कि तूने मुझे दोबारा फोन करके बस-स्टॅंड पर आने को बोला था.. पर हम जा कहाँ रहे हैं.. ये तो बता दे..." रविंदर का बोलना बदस्तूर जारी था...

"जहन्नुम में.. अब तू चुप चाप खड़ा रह.. थोड़ी देर.. बस आने वाली है..."

"देख भाई.. जन्नत में चल या जहन्नुम में.. पर ख़टरा बस में में नही जाउन्गा.. नयी सी बस होनी चाहिए कोई... एक्सप्रेस!" रविंदर ने कहा...

"हुम्म.. तेरे बाप दादा ने एरपोर्ट बनवा रखा है यहाँ... खैर.. उसकी चिंता मत कर.. ए.सी. कोच है.."

"फिर ठीक है.. देख भाई.. जहाँ भी चलना है.. मुझसे बात मत करना.. रास्ते भर सोता जाउन्गा.. आज 5 घंटे पहले उतना पड़ गया.. तेरी वजह से... वैसे चलना कहाँ है यार.. बता ना..."

"तू चुप होगा तभी तो मैं बात करूँगा....यहाँ से अमृतसर चल रहे हैं.. आगे की आगे बताउन्गा.. अब और कुच्छ मत पूच्छना...!" रोहन ने उसको कहा...

"अमृतसर? अमृतसर में तो एक बार मेरी दादी खो गयी थी यार... स्वरण मंदिर के आगे कुलच्चे खाने के लिए गाड़ी से उतर गयी.. और मेरे दादा जी को याद ही नही रहा की उनके साथ दादी जी भी हैं.. बस.. फिर क्या था.. गाड़ी स्टार्ट करके चलते बने... बाद में ध्यान आया तो बड़े परेशान हुए.. पता है ढूँढते हुए वापस आए तो दादी क्या करती मिली...?" रविंदर तूफान मैल की तरह था....

"क्या यार?" रोहन ने खीजकर कहा...

"कुल्छे खाते मिली.. और क्या? कुल्छे खाने ही तो उतरी थी.. हे हे हे"

"बस अब चुप हो जा... बस आ गयी.. चल बॅग उठा...." रोहन ने उसका भोँपू बंद करवाया और बॅग उठाकर वो बस की तरफ चल पड़े....

"आहा.. अगर बस की सीट ऐसी हों तो फिर घर का पेट्रोल क्यूँ फूँकना....! सच में.. मस्त नींद आएगी यहाँ तो.." कहते हुए रविंदर ने अपने पैर उपर करके आगे वाली सीट पर रखकर सोने का प्रोग्राम सेट करना शुरू कर दिया..

आगे वाली सीट से एक सरदार जी ने पिछे मुँह निकल कर रविंदर को घूरा," ओये! पूरी बस को खरीद लिया है क्या तूने... पैर तो नीचे कर ले...!"

"अभी कहाँ सरदार जी.. अभी तो टेस्ट ड्राइव पर जा रहे हैं... हा हा हा.." कहते हुए रविंदर ने पैर नीचे रखे और अपनी बेल्ट ढीली करने लगा....

"क्या हुआ जी? क्यूँ सारा दिन सींग पीनाए घूमते रहते हो?.. सीधे नही बैठा जाता क्या?" सरदार्णि अपने सरदार पर ही सवार हो गयी...

"मैने क्या कहा है लाडो.. मेरे कंधे पर पैर रखेगा तो क्या मैं बोलूं भी नही..... देख.. तेरी गिफ्टेड शर्ट पर मिट्टी लगा दी... बस.. इसीलिए गुस्सा आ गया था..." सरदार जी ने खीँसे निपोर्ते हुए सरदारनी के आगे घुटने टेक दिए..

अचानक बस में चढ़ि एक लड़की को देख रोहन की साँसे वहीं की वहीं थम गयी.. खुले बालों को सुलझती हुई सी वो लड़की नज़रें नीची किए हुए अपनी सीट का नंबर. ढूँढती हुई आ रही थी... गोरे रंग और सम्मोहित कर देने वाले नयन नख्स ने रोहन को कुच्छ पलों के लिए बाँध सा दिया.. ग्रे कलर की धरीदार जीन और राउंड नेक की वाइट टी-शर्ट के उपर कॉलर वाली लाइट वाय्लेट कलर की बिना बटन की जॅकेट पहने उस लड़की की आँखों में ऐसा जादू था कि बस में बैठा हर सख्स उसको निहारने लगा...रोहन का क्षणिक सम्मोहन तभी टूटा जब वो उनके पास आकर खड़ी हुई..,"एक्सक्यूस मे! ये हमारी सीट है...!"

रविंदर रोहन को कहाँ बोलने देता," अच्च्छा.. सीट साथ लानी पड़ती हैं क्या घर से? मैने सोचा बस में ही मिल जाती होंगी.... कोई ना जी.. आप भी आ जाओ.. काफ़ी चौड़ी सीट है.. वो क्या है कि हम सीट लाना भूल गये.. क्यूँ रोहन?" कहकर रविंदर एक तरफ को खिसक लिया....

लड़की को उसकी बात पर हँसी भी आई और गुस्सा भी.. उसकी बेढंगी बात से सहम सी गयी लड़की को अचानक समझ नही आया की क्या बोले.. वो कुच्छ बोलती, इस'से पहले ही रोहन बोल पड़ा...," सॉरी मिस! ये कभी बस में बैठा नही है.. इसीलिए.. पर मेरे ख़याल से ये हमारी ही सीट है....!"

"अच्च्छा.. मेरे मज़ाक को मेरी नासमझी बता कर तू मेरा ही मज़ाक उड़ा रहा है साअ.." फिर लड़की की और देखकर मुँह से निकल गयी ग़ाली को वापस खींचते हुए बोला," वो क्या है की.. जैसे मर्द कभी अपनी ज़ुबान नही बदलते.. वैसे ही सीट भी नही बदलते.. पर जाओ.. हमारी सीट ढूँढ कर उस पर बैठ जाओ.. हम बड़े ही नरम दिल वाले हैं.. कुच्छ नही कहेंगे.. क्यूँ रोहन?" कहकर रविंदर लड़की की और आँखें फाड़ कर देखने लगा...

लड़की को अचानक जाने क्या सूझा.. उसने खिड़की से बाहर झाँका और आवाज़ लगाई..," रिट्युयूवूयूयुयूवयू.. जल्दी आआआआ!"

"क्या हुआ?" लड़की कुच्छ इस अंदाज में उपर चढ़ि जैसे आपात स्थिति में किसी ने उसको मदद के लिए पुकारा हो... लड़की वही थी जिस पर रवि ने बस-स्टॅंड पर खड़े होकर बातों ही बातों में जुमले कसे थे...," क्या हुआ? कोई प्राब्लम है क्या?"

ऋतु से अपने लिए इतनी हुम्दर्दि पाकर लड़की सुबकने लगी," ये हमारी सीट नही छ्चोड़ रहे..."

"तुम? " ऋतु रवि को पहचान कर गुस्से से आग बाबूला हो गयी...

"ओह्ह.. हम एक दूसरे को जानते हैं क्या? मेरी यादास्त थोड़ी कमजोर हैं.. पर देख लो.. तुम्हारा नाम अभी भी मुझे याद है.. ऋतु!.. वैसे.. कहाँ मिले हैं हम पहले..?" रवि ने सीना तानते हुए बत्तीसी निकाल दी..

"अभी बताती हूँ... चलो.. उठो यहाँ से.. नही तो अभी पोलीस अंकल को बुलाती हूँ..." ऋतु ने तैश में आकर बाँह चढ़ा कर कुल्हों पर हाथ जमा लिए...

"पोलीस मामा तुम्हारे अंकल हैं क्या? हमारी तो वैसे ही रिश्तेदारी निकल आई... हे हे हे.." रवि कहाँ काबू में आता....?

"चल उठ ना यार.. पिछे वाली सीट होगी हमारी.. सॉरी.. मिस.. डॉन'ट माइंड प्लीज़.." कहते हुए रोहन ने खड़ा होकर रवि को खींच लिया... मजबूरन रवि को उठना पड़ा... और दोनो पिछे वाली सीट पर जाकर बैठ गये...

"एय्यय.." लड़की ने पिछे देख कर रवि को अपने नाज़ुक हाथों के डोले बना कर चिड़ाया," पता है ऋतु.. मर्द कभी अपनी सीट नही बदलते... हा हा हा हा..."

रवि कुच्छ बोलता, इस'से पहले ही रोहन ने उसके मुँह को अपने हाथ से दबा दिया," कुच्छ मत बोल यार.. लड़कियाँ हैं.. खम्खा पंगा हो जाएगा..."

बेचारों को बैठे पूरा 1 मिनिट भी नही बीता होगा की एक जोड़ा आकर उनके पास खड़ा हो गया," एक्सक्यूस मे.. ये हमारी सीट है..."

रवि से रहा ना गया... अमिताभ की आवाज़ की नकल करते हुए बोला," जाओ.. पहले वो सीट देख कर आओ जिस पर हमारा नंबर. लिखा है.. ये लो हमारी टिकेट... हयें.."

मरियल से उस आधे गंजे हो चुके लड़के ने चुपचाप टिकेट्स पकड़ ली.. और नंबर. देखते ही बोला..," सर यही तो हैं आपकी सीट.. आगे वाली..."

"क्या? क्या कहा? फिर से बोलना मेरे यार.. प्लीज़..." रवि उच्छल कर सीट से खड़ा हो गया..

"हां सर.. यही तो हैं.. 13-14 नंबर.. ये लड़कियाँ ग़लती से बैठ गयी लगती हैं.." लड़के ने दोहराया..

"ओये होये.. लाले दी जान.. जी करता है तेरा सिर चूम लूँ.." रवि ने एक पल भी नही लगाया आगे वाली सीट तक पहुँचने में," आ.. उठती है या पोलीस मामा को बुलाउ? हा हा हा हा हा.. मर्द कभी अपनी सीट नही छ्चोड़ते..."

अब लड़कियों को भी थोड़ा शक हुआ.. ऋतु ने कहा," ढंग से देख एक बार.. हमारी सीट का नंबर.."

लड़की ने अपनी जेब से टिकेट्स निकाली और बोली," यही तो हैं.. 8-9 नंबर."

"चल उठ यहाँ से.. 8-9 नंबर. अगली सीट्स का है... सीट नंबर. सीट के पिछे लिखा होता है पागल..." और दोनो लड़कियाँ झेन्प्ते हुए सीट छ्चोड़ने लगी...

"वा वा वा वा.. आजकल लड़कियाँ भी डोले शोले दिखाने लगी हैं.. क्या बात है.. वा वा!" रवि से इस मौके का फायडा उठाए बिना रहा ना गया...

"चुप कर यार.. बहुत हो गया.. ग़लती किसी से भी हो सकती है..." रोहन ने उसको शांत रहने की सलाह दी....

बेचारी दोनो लड़कियाँ सरदार जी के पास पहुँच गयी," एक्सक्यूस मे अंकल.. ये सीट हमारी है..."

"ओये कमाल कर रही हो कूडियो.. अभी इन्न बच्चों के पिछे पड़ी थी.. अब हमें परेशान करने आ गयी.. सारी सीट तुम्हारी हैं क्या? ये देखो हमारे नंबर. 8-9. सीधे भटिंडा तक की हैं..." सरदार ने सीना ठोंक कर कहा...

रवि जो उनकी बातें बड़े गौर से सुन रहा था, तपाक से बोला," पर ताउ.. बस तो अमृतसर जा रही है...."

"हैं? क्या?" सरदारजी ने चौंकते हुए पूचछा...

"और क्या? " कहकर लड़कियाँ भी हँसने लगी....

"ओह तेरी.. हमारी तो बस ही निकल गयी.. मैं भी कहूँ आज बस इतनी लेट कैसे है...?" सरदारजी सकपकाकर खड़े हुए और अपना सामान उतारने लगे....

"ले.. कब सीखेगा तू सीधे रास्ते चलना.. मेरे तो करम ही फुट गये तेरे साथ ब्याह करके.." सरदारनी सरदरजी को कोस्ती हुई उसके पिछे पिछे बस से उतर गयी...

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सारी रात श्रुति बेड के एक कोने में सिमटी लेटी रही.. नितिन उसकी बराबर में ही चैन से सोया पड़ा था... पर श्रुति ने एक बार भी झपकी नही ली.. सोने से पहले नितिन ने वादा किया था कि कल उसको वो कॉलेज छ्चोड़ देगा.. नितिन के द्वारा सुनाई गयी कहानी उसके दिमाग़ में किसी पिक्चर की तरह चल रही थी.. लेते लेते उसने कयि बार रोहन के बारे में सोचा.. शकल से एक दम शरीफ और क्यूट से दिखने वाले रोहन से उसको पूरी हुम्दर्दि थी.. अगर उस'से प्यार करने और शादी करने तक की ही बात होती तो श्रुति इसको अपना सौभाग्य ही मान'ती.. नितिन के कहे अनुसार रोहन उसका दीवाना था भी.. पर नितिन उसको जिस रास्ते पर लेकर जाना चाहता था उसके बारे में तो श्रुति को सोचना भी पाप लगता था.. धोखा देना तो उसने कभी सीखा ही नही.. या यूँ कहें कि उसके खून में ही नही था.. बचपन में ही उसकी मा के गुजर जाने के बाद उसके बापू ने दूसरी शादी तक नही की.. ये सिर्फ़ उसकी मा के प्रति उसके बापू की वफ़ा नही तो और क्या थी.. वरना वंश चलाना कौन नही चाहता.. ना.. वो ऐसा नही कर सकती.. और करेगी भी नही..

रात भर करवट बदलते बदलते श्रुति ने यही फ़ैसला लिया था, कि वो नितिन की हर हां में हां मिलाएगी.. जब तक की एक बार उसके चंगुल से आज़ाद नही हो जाती.. पर घर जाने के बाद वो सब कुच्छ अपने बापू को बता देगी.. सिर्फ़ अपना कौमार्या भंग होने की बात छ्चोड़कर.... साथ ही कोशिश करेगी कि इस कामीने आदमी की मंशा कभी पूरी ना हो.. चाहे इसके लिए उसको पोलीस में खबर करनी पड़े.. चाहे उसको कॉलेज ही क्यूँ ना छ्चोड़ना पड़े..

इन्ही विचारों की उथल पुथल में कब सवेरा हो गया, श्रुति को अहसास तक नही हुआ... अचानक नितिन के करवट बदलकर उसके सीने पर हाथ रखते ही वो उठ बैठी..

"जाग गयी तुम?" नितिन ने उठकर अंगड़ाई लेते हुए कहा...

"जी.." श्रुति ने घुटनो को मॉड्कर अपनी छाती से लगा रखा था.. वो भूल गयी थी की उसने स्कर्ट पहन रखी है और उसकी चिकनी जांघें घुटने मोड़ने की वजह से काफ़ी उपर तक नंगी हो गयी हैं... जैसे ही नज़रें उठाकर उसने नितिन की और देखा.. वह सकपका गयी.. नितिन की आँखों का निशाना उसकी जांघें ही थी..

श्रुति ने तुरंत अपने पैर सीधे करके स्कर्ट नीचे खींच ली...

"तुम्हारी इसी अदा का दीवाना हूँ मैं", नितिन वापस बेड पर लटेकर स्कर्ट के उपर से उसकी चिकनी जांघों पर हाथ फेरने लगा," क्या चीज़ हो यार तुम.. तुमसे कभी दिल नही भरेगा..."

श्रुति को हद से ज़्यादा अजीब लग रहा था.. पर मजबूरी थी की सीधे तौर पर मना नही कर सकती थी," प्लीज़.. मुझे देर हो रही है.. कॉलेज भी जाना है.."

"हाँ हाँ.. छ्चोड़ दूँगा.. चिंता क्यूँ करती हो मेरी जान.. पर तुमने ये तो बताया नही कि तुमने क्या फ़ैसला किया" नितिन ने उसको बेचैन होते देख अपना हाथ हटा लिया...

"ठीक है!" श्रुति ने इतना सा जवाब दिया...

"क्या ठीक है? उसके बारे में बताओ ना.. 10 करोड़ के बारे में क्या सोचा..?" नितिन की घाघ आँखों में उसका आनमना सा जवाब चुभ गया...

"हां.. कह तो रही हूँ कि जैसा तुम कहोगे.. मैं वैसा ही करूँगी.." श्रुति ने इस बार शब्दों में कुच्छ इज़ाफा करके बोला...

"कहीं ऐसा तो नही की तुम सिर्फ़ यहाँ से वापस जाने के लिए ही ऐसा बोल रही हो.. ये भी तो हो सकता है ना.." नितिन ने पैनी निगाहों से उसके मॅन को टटोलने की कोशिश की..

श्रुति को उसकी बात में छिपि दृढ़ता को भाँप कर महसूस हुआ कि जैसे उसका झूठ पकड़ा गया हो.. पर वह संभालते हुए बोली.. ," 10 करोड़ के लिए तो मैं 10 लोगों का उल्लू बनाने को भी तैयार हूँ.. और फिर ये तो कोई काम भी नही है.. मुझे उस'से प्यार का नाटक ही तो करना है.. या फिर वही करना है जो जो तुम कहोगे.."

"गुड.. दट'स लाइक अन इंटेलिजेंट गर्ल.. अक्सर खूबसूरत लड़कियों में दिमाग़ की कमी होती है.. मुझे खुशी है कि तुम्हारे अंदर बेपनाह हुष्ण के साथ साथ दिमाग़ भी है.. देखना हम दोनो मिलकर कैसे रोहन को जाल में फाँसते है..." फिर कुच्छ रुकते हुए बोला," फिर भी.. हो सकता है की कल को तुम्हारा दिल उसकी नादानी और शराफ़त देखकर पिघल जाए.. इसीलिए मैं ये पक्का कर देना चाहता हूँ कि अब तुम्हारा अपने बीच हुए इस करार से मुकरना तुम्हारी पूरी जिंदगी को मौत से भी बदतर बना सकता है... एक मिनिट"

नितिन उठकर कोने में रखे ल सी डी टीवी के पास गया और साथ रखे डी वी डी में सीडी डाल दी.. और वापस आकर बिस्तेर पर बैठ गया...," ये कुच्छ हसीन पल हैं जो तुमने मेरे साथ गुज़ारे हैं..."

टी.वी. पर तस्वीर उभरते ही श्रुति का कलेजा मुँह को आ गया.. शुरुआत वहाँ से हुई थी जहाँ श्रुति अपना स्कर्ट उठा, कमर तक खुद को नगा करके.. सिसकियाँ लेती हुई नितिन की जांघों के बीच बैठ गयी थी.. यहाँ से तो श्रुति की मर्ज़ी भी वासना के उस गंदे खेल में शामिल हो गयी थी जिसमें वो अन्यथा अपनी जान गँवाने के डर से शामिल हुई थी.. शुरुआती सहमति उसकी मजबूरी थी पर बाद में आनच्छुए यौवन पर वासना हावी हो जाने की वजह से वो भी पागल सी होकर उसका साथ देने लगी थी.. उस'से लिपटने लगी थी... वीडियो में कहीं भी ऐसा नही लग रहा था कि उसमें श्रुति को डराया गया है या ज़बरदस्ती की गयी है..

कुच्छ देर बाद ही श्रुति टी.वी. से नज़रें हटाकर नितिन की और निरीह आँखों से देखने लगी.. उसकी आँखों से आँसू लुढ़कने लगे," ययए.. मुझे दे दो ...प्लीज़..!"

"हा हा हा हा!" नितिन ठहाका लगाकर हँसने लगा... फिर रुक कर बोला," क्या इतना प्यार है मुझसे.. या फिर अपने पहली रात को सहेज कर रखना चाहती हो.. डोंट वरी डार्लिंग.. अब तो हमारा मिलना लगा ही रहेगा.. इसकी एक कॉपी तुम्हे दे दूँगा.. ये भी वादा रहा.. एक मिनिट.. रोहन आज ही बतला जाने की बात कर रहा था.. मैं उसको फोन मिलाता हूँ.. उसको बोलो कि तुम्हारा आज ही उस'से मिलना बहुत ज़रूरी है.. सपने के बारे में..." कहकर नितिन ने रोहन का नंबर. डाइयल किया...

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सरदरजी वाली सीट, जहाँ अब वो दोनो लड़कियाँ बैठी थी, के नीचे पड़ा मोबाइल हिलने लगा... फोने 'वाइब्रेशन्स' पर सेट किया हुआ था.. नितिन ने कयि बार नंबर. ट्राइ किया और अंत में गुस्से से अपने सेल को बेड पर पटक दिया..," लगता है अभी तक सो रहा है साला.. चलो.. बाद में ट्राइ करते हैं.. तुम जल्दी नहा लो.. नही तो कॉलेज में लेट हो जाने पर मुझसे नाराज़ हो जाओगी.. हे हे हे!"

 
अधूरा प्यार--6 एक होरर लव स्टोरी

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा इस कहानी मैं रहस्य रोमांच सेक्स भय सब कुछ है मेरा दावा जब आप इस कहानी को पढ़ेंगे तो आप भी अपने आप को रोमांच से भरा हुआ महसूस करेंगे दोस्तो कल का कोई भरोसा नही.. जिंदगी कयि बार ऐसे अजीब मोड़ लेती है कि सच झूठ और झूठ सच लगने लगता है.. बड़े से बड़ा आस्तिक नास्तिक और बड़े से बड़ा नास्तिक आस्तिक होने को मजबूर हो जाता है.. सिर्फ़ यही क्यूँ, कुच्छ ऐसे हादसे भी जिंदगी में घट जाते है कि आख़िर तक हमें समझ नही आता कि वो सब कैसे हुआ, क्यूँ हुआ. सच कोई नही जान पाता.. कि आख़िर वो सब किसी प्रेतात्मा का किया धरा है, याभगवान का चमत्कार है या फिर किसी 'अपने' की साज़िश... हम सिर्फ़ कल्पना ही करते रहते हैं और आख़िर तक सोचते रहते हैं कि ऐसा हमारे साथ ही क्यूँ हुआ? किसी और के साथ क्यूँ नही.. हालात तब और बिगड़ जाते हैं जब हम वो हादसे किसी के साथ बाँट भी नही पाते.. क्यूंकी लोग विस्वास नही करेंगे.. और हमें अकेला ही निकलना पड़ता है, अपनी अंजान मंज़िल की तरफ.. मन में उठ रहे उत्सुकता के अग्यात भंवर के पटाक्षेप की खातिर....

कुच्छ ऐसा ही रोहन के साथ कहानी में हुआ.. हमेशा अपनी मस्ती में ही मस्त रहने वाला एक करोड़पति बाप का बेटा अचानक अपने आपको गहरी आसमनझास में घिरा महसूस करता है जब कोई अंजान सुंदरी उसके सपनों में आकर उसको प्यार की दुहाई देकर अपने पास बुलाती है.. और जब ये सिलसिला हर रोज़ का बन जाता है तो अपनी बिगड़ती मनोदशा की वजह से मजबूर होकर निकलना ही पड़ता है.. उसकी तलाश में.. उसके बताए आधे अधूरे रास्ते पर.. लड़की उसको आख़िरकार मिलती भी है, पर तब तक उसको अहसास हो चुका होता है कि 'वो' लड़की कोई और है.. और फिर से मजबूरन उसकी तलाश शुरू होती है, एक अनदेखी अंजानी लड़की के लिए.. जो ना जाने कैसी है...

इस अंजानी डगर पर चला रोहन जाने कितनी ही बार हताश होकर उसके सपने में आने वाली लड़की से सवाल करता है," मैं विस्वाश क्यूँ करूँ?" .. तो उसकी चाहत में तड़प रही लड़की का हमेशा एक ही जवाब होता है:

'' मुर्दे कभी झूठ नही बोलते "

दोस्तों कहानी का ये पार्ट पढ़ने के बाद कमेन्ट जरूर देना इस कहानी को आगे भी पोस्ट करू या नही

गतांक से आगे ............................

"एक मिनिट रुक जा ना यार.. उनको उतरने दे" अमृतसर बस स्टॅंड पर उतरते ही रवि ने रोहन के कंधे पर टंगा बॅग पकड़ कर खींच लिया...

"क्यूँ? अब क्या कसर रह गयी है? जल्दी चल और पता करके आ बतला के लिए बस कहाँ से मिलेगी.." रोहन ने उसको लगभग घसीट'ते हुए कहा," सारे रास्ते तूने उनकी नाक में दम रखा.. अब उनका इलाक़ा आ गया है.. यहाँ तुझे छ्चोड़ेंगी नही..देख ले!"

"आए हाए.. क्या बात कही है मेरे यार.. इलाक़ा ही नही, सच पूच्छो तो मैं भी अब उनका ही हो गया हूँ.. खास तौर पर उस लाल मिर्ची का.. देखा नही तूने.. पिछे मड्मड कर ऐसे देख रही थी जैसे खा जाएगी वहीं.. अफ ये पंजाब की लड़कियाँ..." रवि ने पिछे मुड़कर बस की और देखते हुए कहा...

लड़कियाँ अभी बस से उतरी नही थी.. जैसे ही ऋतु उठने लगी.. उसको पैर के नीचे कुच्छ महसूस हुआ.. ये मोबाइल था," ओह.. ये किसका रह गया..?"

"ड्राइवर को दे दो ऋतु.. शायद बिचारे सरदार जी का होगा.. वापस आएगा तो ड्राइवर से ही पूछेगा..." दूसरी लड़की ने ऋतु से कहा...

"तू पागल है क्या? इतना महँगा फोन.. कोई वापस नही करेगा इसको.. जिसका भी होगा वो इस नंबर. पर फोन तो करेगा ही... तभी हम बता देंगे की फोन हमारे पास है.. आकर ले लो..." ऋतु ने समझदारी की बात कही...

"हाँ.. ये बात भी ठीक है.. आ? उस लड़के का तो नही है ये फोन..? देख.. हमारी और ही आ रहा है.." लड़की बस से उतरते ही रवि की और इशारा करते हुए बोली...

ऋतु रवि को देख आग बाबूला हो गयी...," आने दे उसको.. उसको तो मैं ऐसा फोन दूँगी की सपने में भी याद करेगा मुझको.. तू चुप रहना बस.." ऋतु ने फोन अपनी बॅक पॉकेट में डाल लिया...

ऋतु के पास आते ही रवि उसके तेवर देखकर सकपका सा गया.. वह लगातार उसको घूरे जा रही थी.. रवि की टोन अचानक बदल गयी," आप तो बुरा मान गयी.. मैने तो यूँही अपना सा मानकर कह दिया था.."

पहली बार रवि के मुँह से ऐसी बात सुनकर ऋतु के स्वर में भी नर्मी आई," अच्च्छा.. एक हम ही अपने से लगे आपको पूरी बस में?"

"अजी मेरा क्या है.. मैं तो अभी बिल्कुल कुँवारा हूँ..," रवि ने 'बिल्कुल' पर कुच्छ खास ज़ोर दिया," अभी तो सभी 'अपनी' हैं.. जब तक कोई लपेट'त्ति नही... वैसे ये बतला के लिए बस कहाँ से मिलेंगी..?"

"बतला? तुम.." दूसरी लड़की बोलने लगी थी कि ऋतु ने उसका हाथ पकड़ कर दोबोच दिया," पहली बार आए हो क्या यहाँ..?" ऋतु ने रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराते हुए पूचछा...

" और नही तो क्या? बस यूँ समझ लो कि भगवान ने तुमसे मिलाने के लिए ही यहाँ खींच लिया.. उस रोहन की वजह से... मेरा नाम रवि है.. आपका?" ऋतु के मीठा बोलते ही रवि सीधा लिनेबाज़ी पर उतर आया...

"अनारकली.. अच्च्छा है ना.." ऋतु कहकर हँसने लगी..

"जी बहुत प्यारा है.. काश मेरा नाम सलीम होता.. और इनका.." रवि दूसरी लड़की को निहारते हुए पूचछा..

"गुलबो! तुम रास्ता पूच्छने आए थे या..?" ऋतु अब पक गयी थी...

"जी प्लीज़.. आइ'ल्ल बी ओब्लाइज्ड!" रवि ने अदब से झुकते हुए कहा..

"तुम्हे इंतजार करना पड़ेगा.. घंटे भर का.. उसके बाद वो सामने मिलेगी.. हो गया..?" ऋतु ने मुँह बनाकर कहा..

"अजी हमें तो पहली नज़र में ही हो गया था.. बस आपकी इनायत की ज़रूरत है.." रवि जाते जाते भी मसखरी करने से बाज़ नही आया..

गुलबो ने जाते ही ऋतु को घूरा..,"तूने उनको झूठ क्यूँ बोला.. बस तो चलने ही वाली होगी.. उसके बाद जाने कब आए..?"

"क्या बात है.. क्या बात है.. बड़ी चिंता हो रही है.. कौनसा पसंद आ गया?" ऋतु ने मज़ाक किया..

"तुझे पता है ऋतु.. मुझे ऐसी बातें बिल्कुल पसंद नही.. फिर क्यूँ?" गुलबो नाराज़ सी होते हुए बोली...

"अरे यार.. मज़ाक भी नही कर सकती क्या? खैर मैं अगर उसका उल्लू नही बनाती तो फिर से वो हमें पकाते हुए चलते.. साथ साथ.. चल अब जल्दी चल.. बस निकल गयी तो..." और दोनो जाकर चलने को तैयार खड़ी बस में जाकर बैठ गये... और बस चल पड़ी... ऋतु ने बस में बैठे हुए ही रवि को थैन्गा दिखाकर चिड़ाया और खिलखिलाकर हँसने लगी...

"यार.. अगर इनकी बस नही चलती तो ये अनारकली तो पाटी पटाई थी..." रवि ने अपने हाथ मसल्ते हुए कहा...

"हुन्ह.. तुझे लगता है कि तू इस जनम में कोई लड़की पटा पाएगा..?" रोहन ने मुस्कुराते हुए व्यंग्य किया...

"अर्रे.. क्या बात कर रहा है यार..? तूने वो.. क्या कहते हैं.. वो श्लोक नही सुना क्या 'लड़की हँसी तो फँसी.. देखा नही क्या तूने.. मेरी तरफ उसको हंसते हुए..' रवि ने ताल ठोनकी...

"हुम्म हंस रही थी?.. चल छ्चोड़.. यार अब घंटा भर इंतजार कैसे होगा.. और कोई वेहिकल नही जाता क्या बतला?" रोहन को बतला पहुँचने की जल्दी थी...

"यार ये अमृतसर तक की बात तो समझ में आती है.. पर ये बतला पतला में तेरी कौनसी अपायंटमेंट है..? जहाँ बसें भी नही जाती..." रवि ने कहा और दूर न्यूपेपर वाले को आवाज़ दी... पेपर वाला भागा भागा आया," जी साहब.. कौनसा दूं?"

"ये बतला के लिए बस कब आएगी.. और कुच्छ नही जाता क्या वहाँ..?" रवि ने पूचछा...

"अभी आपके सामने ही तो गयी है साहब यहीं से.. पठानकोट वाली.. उधर से ही जाती है.. वैसे बाहर जाकर किसी को भी लिफ्ट के लिए टोक लो.. हम पंजाब वाले बड़े दिल के होते हैं साहब.. हे हे हे.. अख़बार कौनसा दूं..?"

"हुम्म.. बहुत बड़े दिल के होते हैं पंजाब वाले.. अगर तेरी किसी न्यूसपेपर से सेट्टिंग हो तो एक खबर छप्वा देना.. एक सूकड़ी सी पुंजाबन हमारा उल्लू बना गयी... चल ला.. कोई भी दे दे एक.." रवि ने कहते हुए रोहन की और मायूसी से देखा...

"समझ गया?.. क्यूँ हंस रही थी वो..?.. बोलता है.. 'हँसी तो फँसी..' चल आजा बाहर.. अब लटक कर चलते हैं.. लिफ्ट लेकर.." रोहन खड़ा हो गया...

"मेरी क्या ग़लती है यार...?" रवि संजीदा होते हुए उसके साथ चलने लगा..

"नही नही.. ग़लती तो मेरी है.. जो तुझे साथ ले आया.. अबे उनसे ही रास्ता पूच्छना था तुझे?" रोहन और रवि बाहर आकर खड़े ही हुए थे की एक लंबी सी गाड़ी आकर उनके पास रुकी.. गाड़ी का शीशा नीचे हुआ और अंदर बैठे एक बहुत ही स्मार्ट युवक ने उनसे पूचछा..," भाई साहब.. ये बतला और कितनी दूर है?"

रोहन बोलने ही वाला था कि रवि ने झट से अंदर हाथ देकर खिड़की को अनलॉक किया और तपाक से अंदर बैठ गया...

"क्या है भाई साहब?" युवक ने अपने गॉगल्स आँखों से हटाते हुए पूचछा...

रवि ने उसकी बात पर कोई ध्यान नही दिया और पिच्छली खिड़की भी खोल दी," बैठ ना रोहन.. भाई साहब भी बतला जा रहे हैं.."

रोहन ने उस युवक से नज़रें मिलाई तो उसने अपने कंधे उचका दिए... रोहन पिछे जा बैठा... युवक ने गाड़ी दौड़ा दी...

"कितनी दूर होगा बतला यहाँ से...?" युवक ने फिर पूचछा..

"आगे चलकर पूच्छ लेते हैं ना.. टेन्षन ना ले भाई.. अब मैं साथ हूँ.." रवि ने मुस्कुरकर उसकी और देखा...

"मतलब तुम्हे भी नही पता..?" युवक ने चेहरा घूमकर रवि की और गौर से देखा...

"उम्म्म.. ऐसा है भाई साहब.. आक्च्युयली हम भी पहली बार ही आए हैं... मैने सोचा.. एक से भले तीन.. आपकी भी मदद हो जाएगी.. और हम भी पहुँच जाएँगे..." रवि ने जवाब दिया...

"हा हा हा.. कमाल के आदमी हो यार... लो.. सिगरेट पीते हो?" युवक ने सिगरेट निकालते हुए पूचछा...

"ना भाई ना.. और जब तक हम गाड़ी में हैं.. इसको सुलगाना भी मत.." रवि ने गाड़ी पर ही कब्जा सा कर लिया...

युवक ने अचानक ब्रेक लगा दिए.. और रवि को घूर कर देखने लगा..

"क्या हुआ भाई..? आगे चलकर पूछ्ते हैं ना..." रवि ने उसके हाथ से सिगरेट लेकर वापस पॅकेट में डाल दी...

गाड़ी में बैठा वो युवक अचंभित सा था.. अचानक ठहाका लगाकर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा और गाड़ी चला दी...

"नाम क्या है आपका?" रवि से ज़्यादा देर चुप बैठा नही गया..

"शेखर!" यौवक ने हल्का सा मुस्कुराते हुए कहा और फिर पूचछा," अपना भी बता दो यार.. तुम वैसे भी मनोगे नही.. बिना बताए...!"

"रवि.. और ये जो पिछे बैठा मुझे घूर रहा है.. ये रोहन है.. मेरा सबसे प्यारा दोस्त.. ये मत समझना कि ये गुस्से में है.. दरअसल करीब 2 महीने से इसकी शकल ही ऐसी रहती है...

"ऐसा क्या हो गया भाई.. ग/फ रूठ गयी क्या?" शेखर ने पिछे देखते हुए कहा..

"नही भाई.. आप अभी तक भी नही समझे क्या इसको! ये ऐसा ही है.. इसकी किसी बात का बुरा मत मान'ना.." रोहन गाड़ी में बैठने के बाद पहली बार बोला..

"हा हा हा.. वो तो मैं देख ही रहा हूँ.. वैसे बतला कोई रिश्तेदारी है क्या?" शेखर ने पूचछा...

रोहन के बोलने से पहले ही रवि बोल पड़ा," रिश्तेदारी? अजी मुझे तो अभी ये भी नही पता की फूटपाथ पर सुलाएगा या कोई होटेल भी नसीब होगा कि नही..जाने क्या रखकर भूल गया है बतला.." रवि ने मुँह बनाया..

"जहाँ मैं सो-उँगा वहाँ तो सुला ही लूँगा.. अब तेरे लिए वहाँ होटेल तो खोलने से रहा मैं.." रोहन ने कहा...

"वैसे बताओ तो यार.. जा किस काम से रहे हो.." शेखर को जान'ने की उत्सुकता हुई...

"अभी मुझे ही नही बताया तो तुम्हे क्या बताएगा..? वैसे 5-7 दिन का काम बोल रहा है... अब बता भी दे यार.. क्यूँ दिमाग़ की दही कर रहा है..?" रवि ने रोहन को देखते हुए कहा...

रोहन खिड़की से बाहर देखने लगा.. उसको कुच्छ ना बोलता देख शेखर ही बोल पड़ा..," वैसे अगर 5-7 दिन की बात है तो तुम मेरे साथ रह सकते हो.. वहाँ मेरे दोस्त की कोठी है.. अकेला ही रहता है.. अगर तुम्हारे सीक्रेट मिशन पर कोई आँच ना आ रही हो तो?"

"थॅंक्स यार.. तू तो मुझसे भी कमाल का है.. बिना जाने पूच्छे ही साथ रहने का ऑफर कर दिया... अपनी खूब जमेगी लगता है.. " रवि ने खुश होकर कहा...

"तुम्हे जान'ने में किसी को वक़्त ही कितना लग सकता है.." शेखर ने कहा और हँसने लगा... रोहन भी मुस्कुराए बिना ना रह सका...

अचानक गाड़ी के ब्रेक लगते ही रोहन और रवि का ध्यान आगे की और गया..

"ओह तेरी.. ये तो वही बस है.." रवि ने कहा...

बस सड़क के बींचों बीच खड़ी थी... उसके सामने ट्राक्टेर खड़ा था.. शायद बस का आक्सिडेंट हो गया था.. बस के पास ही 8-10 सवारियाँ खड़ी थी.. उनमें ही रवि की अनारकली और 'वो' गुलबो भी थी... रवि का ध्यान सीधा उन्ही पर गया..

"एक मिनिट रोकना शेखर भाई" रवि ने कहा और बाहर मुँह निकाल कर ज़ोर से आवाज़ लगाई...," आ जाओ.. आ जाओ.." जैसे उनकी पुरानी जान पहचान हो...

लेकिन शेखर को अब की बार गुस्सा नही आया.. वा बस रवि को देखकर मुस्कुराता रहा...

रवि के आवाज़ लगते ही उन्न दोनो लड़कियों को छ्चोड़कर सभी सवारियाँ भागी भागी आई...

"थॅंकआइयू भाई साहब!" उनमें से एक सवारी ने बाहर पास आते ही कहा...

"अरे भाई.. किराए की नही है.. अपनी है अपनी.." रवि ने कहा और गाड़ी से उतर कर उन्न लड़कियों की और चला गया," आ भी जाओ.. कब तक खड़ी रहोगी.. बस तो एक घंटे के बाद आएगी ना..."

 
दोनो लड़कियों ने लज्जित होकर अपना मुँह फेर लिया.. कुच्छ देर पहले ही तो ऋतु ने उसका उल्लू बनाया था...

"सोच क्या रही हो अनारकली & पार्टी... ये सोचने का नही गाड़ी में बैठने का टाइम है.. जल्दी करो.. आ जाओ.. मैं गाड़ी को 2 मिनिट से ज़्यादा रुकवा नही पाउन्गा.." रवि ने कहा और घूम कर वापस चला गया....

"क्या करें? चलें?" ऋतु ने पूचछा...

"तू पागल है क्या? दिमाग़ तो नही सटाक गया है..? अंजान लड़कों के साथ.. हम गाड़ी में बैठेंगे.. ज़रा सोच के बोला कर यार..." दूसरी लड़की ने सॉफ मना कर दिया...

"अर्रे अंजान वंजान कुच्छ नही हैं... और फिर अब अंधेरा भी होने लगेगा.. सारी बसें भरी हुई आ रही हैं... कब तक वेट करेंगे...? जहाँ तक इस लल्लू की बात है.. इसको मैं अच्च्ची तरह समझ गयी हूँ.. इसकी बस बोलने की आदत है.. कुच्छ करने वरने का दम नही है इसमें.. और दूसरा लड़का तो एकद्ूम शरीफ है.. शोले के अमिताभ जैसा.. वो तो कुच्छ बोलता भी नही.. चल ना कुच्छ नही होता.." ऋतु ने उसका हाथ पकड़ते हुए बोला...

लड़की ने गर्दन घूमाकर गाड़ी की और देखा.. और कुच्छ देर रुक'कर साथ साथ चलने लगी.. उनके गाड़ी के पास जाते ही रोहन ने खिड़की खोल दी और एक तरफ हो गया..

"तू बैठ पहले.." लड़की ने ऋतु से कहा..

"ठीक है.." ऋतु रोहन के साथ बीच में बैठ गयी.. और उस लड़की के बैठने के साथ ही शेखर ने गाड़ी चला दी.. उसकी समझ में अब तक नही आया था कि माजरा क्या है..

पर रवि था ना.. गाड़ी के चलते ही शुरू हो गया," इनसे मिलिए भाई साहब.. एक है अनारकली और दूसरी गुलबो.. अगर आज ये ना होती तो ना तो हम और आप मिल पाते.. और ना ही हमारा बतला में रहने का इतना अच्च्छा इंतज़ाम होता..." कहकर रवि हँसने लगा...

"ऐसा क्यूँ?" शेखर ने उत्सुकतावश पूचछा...

"वो तो तुम इन्ही से पूच्छ लो.. वरना तो में बताउन्गा ही.. नमक मिर्च लगाकर.. बता दो अब.. अंजान मुसाफिरों के साथ की गयी अपनी करतूत..."

लड़कियाँ सिर झुकाए बैठी थी.. उनसे कुच्छ बोला ही नही जा रहा था... शेखर ने बात को वहीं छ्चोड़ दिया और पूच्छने लगा," वैसे जाना कहाँ तक है आपको?"

"जी बतला.." ऋतु ने सिर झुकाए हुए ही जवाब दिया...

"हूंम्म.. मतलब एक ही मंज़िल के मुसाफिर हैं.." शेखर ने कहा और गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी....

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"कहो तो घर छ्चोड़ आयें.." बतला पहुँचते ही लड़कियों ने गाड़ी रोकने को कहा तो रवि ने चटखारा लिया...

बिना कुच्छ बोले लड़कियाँ गाड़ी से उतर गयी.. फिर अचानक वापस मुड़ते हुए ऋतु आगे गयी और बोली," थॅंक्स..... आंड सॉरी!"

"क्या लड़कियाँ थी यार...? ये कहाँ मिल गयी तुम्हे?" शेखर ने लड़कियों के जाते ही रवि को देखते हुए सवाल किया..

"कहाँ लड़कियाँ थी यार...? अहसानमंद होना चाहिए था इनको.. मैं ले आया.. खाली थॅंक्स बोल कर चली गयी.. कम से कम अपना मोबाइल नंबर. तो देकर जाती..." रवि ने कहते हुए इस तरह मुँह बनाया मानो सच में ही उसको उनका चले जाना अच्च्छा नही लगा हो...

मोबाइल शब्द सुनकर रवि को एक फोन करने की सूझी.. और जेब को हाथ लगाते ही वह उच्छल पड़ा," ओये.. मेरा फोन?"

"क्या हुआ? शेखर और रवि एक साथ बोल पड़े...

"फोन गया.. कहीं निकल गया शायद.." अपनी शर्ट और जीन की सभी जेबों में टटोलने के बाद रवि हताशा से भर गया....

"श..!" रवि के मुँह से निकला..,"अब?"

"एक मिनिट.. नंबर. बताना.." शेखर ने अपना मोबाइल निकालते हुए कहा...

रोहन के नंबर. बताने पर शेखर ने डाइयल किया..," हुम्म.. फोन तो यार किसी ग़लत आदमी के हाथ लग गया.. स्विच्ड ऑफ आ रहा है..!" कहते हुए अचानक मोबाइल स्क्रीन पर देखते हुए शेखर लगभग उच्छल ही पड़ा," आप.. रोहन हैं?"

"और मैं रवि.. अभी बताया तो था भाई..." रोहन के बोलने से पहले ही रवि ने जवाब दे दिया...

"नही.. मतलब मेरा मतलब आप स्काइ व्यू एस्टेट के मलिक रोहन हैं?" शेखर ने चौंकते हुए गाड़ी को ब्रेक लगा दिए...

"मलिक तो मेरे पिताजी हैं.. मैं तो सिर्फ़ उनका वारिस हूँ.. अभी मैने ऑफीस देखना शुरू नही किया.. पढ़ ही रहा हूँ अभी... पर... आपको ये सब कैसे पता?" रोहन की दिलचस्पी अपने मोबाइल से हटकर शेखर पर आ गयी...

"मेरी आपसे बात हुई थी.. कुच्छ दिन पहले.. गुड़गाँवा में आपकी नयी कन्स्ट्रक्षन में हिस्सेदारी को लेकर.. याद है? आपने अपने फादर का नंबर. दिया था.. और हां.. आपने अपना नाम भी रोहन ही बताया था..." शेखर हतप्रभ सा उसको देख रहा था...

"सॉरी.. मुझे याद नही है.. आक्च्युयली पिताजी ने मेरा नंबर. भी विज़िटिंग कार्ड्स पर डाल रखा है... इसीलिए अक्सर जब उनका फोन ऑफ रहता है तो मेरे पास कॉल आ जाते हैं..."

"हुम्म.. मैने भी आपका नंबर. कार्ड्स से ही निकाला था.. और आपके नाम बताने पर मैने नंबर. को रोहन एस.वी. एस्टेट नाम से सेव कर लिया था.. कमाल हो गया यार.. मुझे अब भी विस्वास नही हो रहा की मैं इतने बड़े आदमी के साथ बैठा हूँ..." शेखर वास्तव में ही आसचर्यचकित था... उसने अपना हाथ रोहन की और बढ़ा दिया जिसे रोहन ने दोनो हाथों से पकड़ लिया...

"फिर बात बनी की नही...?" रवि ने शेखर को टोका...

"किस बारे में?" शेखर ने उसकी और देखते हुए पूचछा...

"पार्ट्नरशिप के बारे में.. और क्या?"

"हां.. वो तो पहले ही डन थी.. सिर्फ़ कुच्छ फॉरमॅलिटीस बाकी थी..." शेखर ने गाड़ी चला दी...

"फिर तो बहुत अच्च्छा हो गया यार... अब हम तीनो पार्ट्नर हैं.. अब तुम्हारे पास रहकर मुफ़्त का खाते हुए शर्म नही आएगी... हा हा हा!" रवि ने अपना हाथ बढ़ा उस'से हाथ मिलाया...

"पर एक बात समझ में नही आई यार... यहाँ बतला में? और वो भी बस से?" शेखर के दिमाग़ में अभी भी काफ़ी सवाल थे....

"सब इसकी करतूत है.. बोला ड्राइवर को लेकर नही चलना.. और इतनी दूर गाड़ी चलाने में दिक्कत होगी...!" रवि ने मुँह बनाते हुए कहा...

"पर फिर भी यार.. यहाँ इस छ्होटे से शहर में ऐसा क्या काम निकल आया..?" शेखर ने पूचछा...

रवि ने पिछे मुड़कर रोहन की और हाथ जोड़कर चेहरा झुका लिया," अब तो बता दो गुरुदेव! अब तो आपका बतला भी आ गया..."

रवि को तो बताना ही था.. अपने हम उमरा शेखर को बताने में भी रोहन को कोई नुकसान नज़र नही आया...," दरअसल मैं एक लड़की के लिए यहाँ आया हूँ...!"

"ओये.. तेरी तो.. तूने लड़की के लिए मुझे इतनी दूर घसीटा... ये दुर्गति की.. वहाँ लड़कियों की कमी है क्या... जिसकी बोलता उसकी.... और कॉलेज में तुझ पर लट्तू लड़कियों की गिनती भी याद है तुझे..? वहाँ तो बाजर्भट्टू बना बैठा रहता है.. लड़की के लिए आया है यहाँ... मुझे नही चलना तेरे साथ.. उतार नीचे अभी... गाड़ी रोक शेखर भाई.. अभी के अभी गाड़ी रोक..." रवि जाने क्या क्या बोलने लगा...

शेखर ने सच ही गाड़ी के ब्रेक लगा दिए..

"मज़ाक कर रहा हूँ यार... चल ना जल्दी.. बहुत भूख लगी है.. हे हे हे.. और प्यास भी..." रवि ने शेखर को चलने का इशारा किया और हँसने लगा....

शेखर भी मुस्कुरा दिया...," और कहाँ चलें.. आ तो गये...!"

"श.. मुझे लगा अभी तुम दोनो मुझे ज़बरदस्ती उतार दोगे.." रवि मुस्कुराया और गाड़ी से उतर गया... रोहन के बाहर निकलते ही रवि उसके कंधे पर हाथ रख कर उसको एक तरफ ले गया," ये लड़की का क्या माम'ला है वीरे..?"

"बताता हूँ यार.. सब बताता हूँ..." रोहन ने कहा और तीनो मिलकर सामने वाली तिमन्जिला सफेद कोठी में चले गये... गेट पर ही उन्हे गेट्कीपर ने रोक लिया..," किस'से मिलना है सर?"

"उसी उल्लू के पत्थे से... जो इस घर का मलिक है.. अमन से.. खोल भी दे अब यार..." शेखर ने चिदते हुए कहा.....

"पर.. पर साहब बिज़ी हैं सर.. किसी को भी नही आने देने के लिए बोला है.. एक घंटे तक और..."

"साला.. लड़की लिए पड़ा होगा.. दारू और लड़की के अलावा वो कुच्छ करता भी है.." शेखर मंन ही मंन बड़बड़ाया और फोन निकाल कर उसका नंबर डाइयल करने लगा....

"ओये यार शेखर!" अमन तेज़ी से चलता हुआ नीचे उतर कर आ ही रहा था कि शेखर उन्न दोनो को लेकर उपर ही पहुँच गया.. बरमूडे और बनियान में वह आते ही शेखर से लिपट गया...

"साले नांग्दे.. आज तो कम से कम इंतजार कर लेता.. सुबह सुबह ही चालू हो गया था क्या?" शेखर ने मज़ाक में कहा...

"हे हे हे.. नही तो!" अमन ने हंसते हुए कहा...

"नही तो मतलब? और क्या शराब की स्मेल का पर्फ्यूम लगाने लगा है क्या?" शेखर ने उसके मुँह के पास मुँह लाकर सूंघते हुए कहा...

"हां.. यार.. वो छ्होटा सा प्रोग्राम बन गया था..." अमन ने कहा और रोहन और रवि से हाथ मिलाता हुआ बोला," ये भाई?"

"भाई ही समझ ले.." शेखर कहते हुए उसके बेडरूम की और जाने लगा...

"नही यार.. यहाँ नहीं.. चल.. नीचे ही बैठते हैं.." अमन ने शेखर का हाथ पकड़ लिया...

"क्यूँ? यहाँ क्यूँ नही? देखू तो सही.. ब्रांड कौनसा ले रहा है आजकल.." शेखर ने कहा और ज़बरदस्ती बेडरूम में घुस गया.. अंदर जाते ही बाहर खड़े तीनो लोगों को उसके जोरदार ठहाके की आवाज़ सुनाई दी.. अगले ही पल वह वापस बाहर था.. उसकी हँसी थमने का नाम नही ले रही थी.. हंसते हंसते ही बोला," आबे.. 2 -2 एक साथ.." फिर पास आकर धीरे से बोला," मुझे नही पता था तू इतना कमीना हो जाएगा एक दिन.. अब रंडिया भी लानी शुरू कर दी..."

अमन रवि और रोहन के सामने कुच्छ शर्मा सा रहा था," ऐसा मत बोल यार.. तुझे रंडिया लगती हैं वो.. गर्लफ्रेंड्स हैं मेरी..."

"मैने चेहरा नही देखा...!" शेखर कहकर चुप हुआ ही था कि रवि ने बीच में टाँग घुसा दी," 2-2 गर्लफ्रेंड्स एक साथ? कैसे मॅनेज करता है भाई?"

"क्या करें यार... अपना दिल ही इतना बड़ा है! हा हा हा.. चलो नीचे चलते हैं.. इनको आराम करने दो यहीं" अमन ने कहा और उनको लेकर नीचे चला आया..."

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नीचे जाते ही उनको ड्रॉयिंग रूम में बैठते ही अमन ने रोहन और रवि से मुखातिब होते हुए पूचछा," थोड़ी बहुत चलेगी क्या? या खाना लगाने को बोल दूँ..."

रोहन ने कोई प्रतिक्रिया नही दी पर रवि का ध्यान उपर से नीचे नही आ पा रहा था,"वो दोनो पर्सनल है या टाइम पास?"

अमन पर नशे का हूल्का हूल्का सुरूर तो था ही.. उसने किसी दार्शनिक की तरह से लंबा चौड़ा भासन देना शुरू कर दिया," मेरा तो मैं खुद ही पर्सनल नही हूँ यार.. लड़कियाँ क्या खाक पर्सनल होंगी.. बस जिंदगी जैसे चला रही है.. वैसे चल रहा हूँ.. सूरत देखकर लड़कियाँ पट जाती हैं और पैसा देखकर नंगी हो जाती हैं.. लड़कियों के मामले में सीरीयस होना तो मैं एकद्ूम पागलपन मान'ता हूँ..."

"ये हुई ना बात यार... तू एकदम सही आदमी है.. एक इसको देखो.. एक लड़की के चक्कर में धक्के ख़ाता हुआ यहाँ आ गया है..." रोहन के लाख इशारे करने पर भी रवि कहे बिना नही माना...

पर अमन समझदार लड़का था.. दो मिनिट पहले ही कही गयी अपनी बात से मुकर गया," वो तो अपनी अपनी मेनटॅलिटी होती है यार.. और हो सकता है इसको किस्मत से कोई सच्चा प्यार करने वाली मिल गयी हो.. पर ऐसी होती हज़ारों में एक आध ही है.. वरना तो.. अब बस क्या कहूँ.. इन्न उपर वाली लड़कियों को ही देख लो!"

"देख लूँ?" रवि तो जैसे इसी बात को पकड़ने के लिए मुँह खोले बैठा था.. जैसे ही अमन ने एग्ज़ॅंपल के तौर पर उन्न लड़कियों का नाम लिया.. झट से रवि ने 'देख लो' पकड़ लिया...

"क्या?" अमन ने रवि की और देखा...

"लड़कियों को.. आपने ही तो कहा है.. अपर वाली लड़कियों को देख लो..." रवि ने बत्तीसी निकालते हुए कहा...

"हाहहाहा.. तू एक नंबर. का आदमी है यार.. जाओ देख लो.. पर देख भाई.. कोई ऊँच नीच होती दिखाई दे तो चुप चाप वापस आ जाना... इन्न साली लड़कियों का कोई भरोसा नही होता.. कब साली नाटक करने लग जायें.. कब पिच्छड़ी मार दें..." अमन ने हंसते हुए रवि को अंदर से ही उपर जाने का रास्ता दिखा दिया... " मैं चलूं क्या एक बार साथ..?"

"नही यार.. तुम बैठो.. तुम्हारा दोस्त आया है.. मैं अकेला ही ट्राइ करके देखता हूँ.." रवि ने कहा और मस्ती से गुनगुनाते हुए उपर चला गया...

"कमाल का आदमी है यार.. मेरी ऐसे लोगों से बहुत बनती है..." अमन ने कहा और फिर रोहन को देखते हुए बोला," तुम ऐसे गुम्सुम क्यूँ बैठ गये यार.. आज मस्ती करो.. कल लड़की से भी मिल लेना... ठीक है ना..?"

"ऐसी कोई बात नही है यार.. बस मैं ठीक हूँ.. रवि की बातों का बुरा मत मान'ना यार.. ये ज़रा मुँहफट है.. जो मन में आए बोल देता है.." रोहन ने कहा...

"ये क्या बात कह दी यार.. अगर दोबारा ऐसा बोला तो तुझसे बुरा ज़रूर मान जाउन्गा.. हम तो यारों के यार हैं यार.. और फिर शेखर के यार तो मुझे उस'से भी अज़ीज होंगे कि नही... ये.. शेखर कहाँ चला गया?" अचानक अमन का ध्यान शेखर पर गया," कहीं वो भी उपर ही तो नही पहुँच गया...?"

"यहीं हूँ बे.. फ्रेश हो रहा था.. सुबह से चला हुआ हूँ.. पेशाब तक नही किया था रास्ते भर.." शेखर बाथरूम से निकलते हुए बोला...

"साले.. मुझे पता है तू अंदर क्या कर रहा होगा... लड़कियाँ देख कर खड़ा हो गया था क्या?" और अमन कहते ही ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा...

"सला.. पियाक्कड़.. हमेशा बकवास करता रहता है... वो.. रवि भाई कहाँ गया.." शेखर ने रोहन के पास बैठते हुए पूचछा....

"उपर..!" रोहन कहते हुए मुस्कुराहट को चेहरे पर आने से नही रोक पाया.....

 
अधूरा प्यार--7 एक होरर लव स्टोरी

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा इस कहानी मैं रहस्य रोमांच सेक्स भय सब कुछ है मेरा दावा जब आप इस कहानी को पढ़ेंगे तो आप भी अपने आप को रोमांच से भरा हुआ महसूस करेंगे दोस्तो कल का कोई भरोसा नही.. जिंदगी कयि बार ऐसे अजीब मोड़ लेती है कि सच झूठ और झूठ सच लगने लगता है.. बड़े से बड़ा आस्तिक नास्तिक और बड़े से बड़ा नास्तिक आस्तिक होने को मजबूर हो जाता है.. सिर्फ़ यही क्यूँ, कुच्छ ऐसे हादसे भी जिंदगी में घट जाते है कि आख़िर तक हमें समझ नही आता कि वो सब कैसे हुआ, क्यूँ हुआ. सच कोई नही जान पाता.. कि आख़िर वो सब किसी प्रेतात्मा का किया धरा है, याभगवान का चमत्कार है या फिर किसी 'अपने' की साज़िश... हम सिर्फ़ कल्पना ही करते रहते हैं और आख़िर तक सोचते रहते हैं कि ऐसा हमारे साथ ही क्यूँ हुआ? किसी और के साथ क्यूँ नही.. हालात तब और बिगड़ जाते हैं जब हम वो हादसे किसी के साथ बाँट भी नही पाते.. क्यूंकी लोग विस्वास नही करेंगे.. और हमें अकेला ही निकलना पड़ता है, अपनी अंजान मंज़िल की तरफ.. मन में उठ रहे उत्सुकता के अग्यात भंवर के पटाक्षेप की खातिर....

कुच्छ ऐसा ही रोहन के साथ कहानी में हुआ.. हमेशा अपनी मस्ती में ही मस्त रहने वाला एक करोड़पति बाप का बेटा अचानक अपने आपको गहरी आसमनझास में घिरा महसूस करता है जब कोई अंजान सुंदरी उसके सपनों में आकर उसको प्यार की दुहाई देकर अपने पास बुलाती है.. और जब ये सिलसिला हर रोज़ का बन जाता है तो अपनी बिगड़ती मनोदशा की वजह से मजबूर होकर निकलना ही पड़ता है.. उसकी तलाश में.. उसके बताए आधे अधूरे रास्ते पर.. लड़की उसको आख़िरकार मिलती भी है, पर तब तक उसको अहसास हो चुका होता है कि 'वो' लड़की कोई और है.. और फिर से मजबूरन उसकी तलाश शुरू होती है, एक अनदेखी अंजानी लड़की के लिए.. जो ना जाने कैसी है...

इस अंजानी डगर पर चला रोहन जाने कितनी ही बार हताश होकर उसके सपने में आने वाली लड़की से सवाल करता है," मैं विस्वाश क्यूँ करूँ?" .. तो उसकी चाहत में तड़प रही लड़की का हमेशा एक ही जवाब होता है:

'' मुर्दे कभी झूठ नही बोलते "

दोस्तों कहानी का ये पार्ट पढ़ने के बाद कमेन्ट जरूर देना इस कहानी को आगे भी पोस्ट करू या नही

गतांक से आगे ............................

रवि दबे कदमों से चलता हुआ बेडरूम के करीब आया.. दरवाजे के सामने आते ही लड़कियों से उसकी टक्कर होते होते बची.. शायद वो निकलने की तैयारी कर ही रही थी.. अंजान लड़के को सामने पाकर वो चौंक उठी और एकदम से अपना चेहरा घुमा उसकी तरफ पीठ करके खड़ी हो गयी.. उधर लड़कियों का हुष्ण और करारा बदन देखकर रवि भी हक्का बक्का रह गया.. लगभग एक ही कद काठी की वो लड़कियाँ बमुश्किल 20-21 साल की होंगी... एक दम गोरी चित्ति लंबी लड़कियों का भरा भरा बदन देख रवि के मुँह में पानी आ गया..

दोनो ने जीन पहन रखी थी.. एक लड़की ने उपर जांघों तक का कुर्ता डाल रखा था.. इसीलिए वह उसके पिच्छवाड़े का क्ष-रे नही कर पाया पर दूसरी लड़की, जिसने स्लीवलेशस टॉप डाल रखा था.. उसके नितंबों को देखते ही रवि का बॅमबू खड़खड़ा उठा.. आख़िर उम्मीद तो थी ही, कुच्छ हासिल होने की वहाँ से.... भरे भरे पिछे की और काफ़ी उभरे हुए उसके नितंब एकदम गोलाई में तराशे हुए से थे.. और जीन उनकी गोलाई और बीच की खाई से चिपकी हुई उसके जर्रे जर्रे के आकर का जयजा दे रही थी.. योनि से नीचे हुल्की सी झिर्री के बाद कुच्छ इंच तक उसकी जांघें एक दूसरी से चिपकी हुई सी थी.. हाँ.. कमर दोनो की ही कहर ढा-ने वाली थी.. बमुश्किल 27" की होगी... यूँही मस्ती करने के लिए आया रवि उनको 'उसे' करने को लालायित हो उठा...," हेलो!"

जब लड़कियों को निकलने का और कोई रास्ता नही सूझा तो मजबूरन उनको पलट'ना ही पड़ा.. जवाब में 'हाई' कहा और रवि की बराबर से निकलने की कोशिश करने लगी..

रवि ने बीचों बीच खड़े होकर दरवाजे की चौखट पर हाथ रख लिए," ऐसे कहाँ भागी जा रही हो यार.. इंट्रोडक्षन तो हो जाए एक बार..!"

कुर्ते वाली ने चेहरा नीचे किए हुए ही नज़रें उठाकर देखने की कोशिश की," हमें जाने दो.. हम लेट हो रही हैं...!" उनके चेहरे से सॉफ झलक रहा था कि वो सहमी हुई सी हैं...

"नाम क्या है तुम्हारा?" रवि ने कुर्ते वाली की ही कलाई पकड़ ली... दूसरी डर कर पिछे हट गयी.. दोनो के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था...

" अमन!" लड़की हुल्की सी चीखी और कोई और रास्ता ना पाकर टोन बदल ली," प्लीज़.. जाने दो ना.. सच्ची में हम लेट हो रही हैं.. घर जाना है..!" कलाई मोड़ कर अपना हाथ च्छुदाने की कोशिश करते हुए उसने मायूसी से रवि के चेहरे की और देखा....

"और अगर ये टूट गयी तो? इतनी नाज़ुक है.. क्यूँ परेशान हो रही हो..? 2-4 मिनिट में कुच्छ नही होता.. आओ.." रवि ने दूसरी लड़की का हाथ भी पकड़ लिया.. और ना चाहते हुए भी दोनो उसके साथ चलते हुए बिस्तेर पर जाकर बैठ गयी.. तीनो के पैर लटके हुए थे.. रवि दोनो के बीच बैठा था...

"प्लीज़.. हाथ हटाओ.. हम ऐसी लड़की नही हैं..!" टॉप वाली ने अपनी कमर को हिलाते हुए रवि से दूर होने की कोशिश की.. पर रवि ने एक ही झटके में दोनो को अपनी और खींच लिया..," आए हाए.. मैं सदके जावां.. और कैसी लड़की हो तुम?" रवि ने टॉप वाली के गाल की चुम्मि ले ली.. गुस्से और अंजाने से डर की वजह से उसके आँसू निकल आए..

"तुम होते कौन हो हमसे ऐसी बात करने वाले.. हम आपको जानती भी नही हैं... अमन किधर है? उसको बुलाओ.." कुर्ते वाली ने बंदर घुड़की दी....

"क्या? तुम सच में मुझे नही जानती.. अमन ने तुम्हे बताया नही...?" रवि ने आसचर्यचकित सा होने का नाटक किया...

दोनो लड़कियों ने चौंक कर उसको देखा.. पर उनकी समझ में बात आई नही..," क्यूँ? हमें क्यूँ बताएगा..? हमें आपसे क्या लेना देना...?" वो लगातार उसकी बाहों के घेरे से छ्छूटने की कोशिश कर रही थी..

"अरे.. तुम्हे मेरे लिए ही तो बुलाया था उसने.. और तुम्हे बताया भी नही? बताना चाहिए था यार उसको..." उनकी गरमागरम मस्त चूचियो का रह रह कर स्पर्श पाकर रवि अधीर होता जा रहा था.. पर दोनो लड़कियाँ लगातार उस'से बचे रहने की कोशिश कर रही थी... यूँ कहें की एक तरह की कसंकस सी चल रही थी... रवि और लड़कियों के बारे में...

पर अचानक रवि की ये बात सुनकर वो अजीब सी नज़रों से उसको देखते हुए विरोध करना भूल गयी..," आपके लिए? क्या बकवास कर रहे हो? वो.. वो मुझसे बहुत प्यार करता है..." कुर्ते वाली ने कहा...

"हां.. मुझे भी पता है.. और तुम भी उस'से बहुत प्यार करती हो..इसीलिए तो तुम्हे मेरे लिए बुलाया है.. तुम्हारी खातिर ही.." रवि ने बारी बारी से दोनो के चेहरों को देखा... पर बात शायद उनके सिर के उपर से निकल गयी थी....

"ये क्या बात हुई..? आप क्यूँ हमें परेशान कर रहे हैं... प्लीज़.. जाने दीजिए ना.." कुर्ते वाली लड़की ने अपना हाथ च्छुदाने की एक और कोशिश करते हुए कहा....

"हद है यार.. लगता है मुझे ही सब कुच्छ बताना पड़ेगा अब... वो क्या है की पिच्छली बार जब तुम आई थी तो मैने चुपके से पर्दे के पिछे खड़ा होकर तुम्हारी फिल्म बना ली थी..." रवि ने अंधेरे में तीर छ्चोड़ा जो सीधा निशाने पर जा लगा....उसकी बात सुनकर तो जैसे कुर्ते वाली लड़की को झटका सा लगा.. उसके चेहरे का रंग यकायक पीला पड़ गया...," क्कक्या?"

"हाँ.. और नही तो क्या? मैं तो आज फ्री भी नही था... एक दोस्त का उसकी गर्लफ्रेंड के साथ पार्क में एम्म्स बनाने जाना था मुझे.. पर अमन अड़ गया.. बोला आज ही आ जाओ.. मैने बुला लिया लड़कियों को... अब वो तुमसे प्यार ही इतना करता है.. वो नही चाहता कि तुम्हारी 'वो' फिल्म घर घर में देखी जाए... मेरा नुकसान तो बहुत है.. पर क्या करूँ? अमन भी खास यार है अपना.. उसकी और उसके 'प्यार' की इज़्ज़त का ख़याल तो रखना ही पड़ेगा...." कहता हुआ रवि हँसने लगा..

"पर.. आप तो उस दिन यहाँ थे ही नही..!"

"हां.. पहले अमन भी यही कह रहा था.. जब उसको मूवी दिखाई तब जाकर यकीन हुआ.. दरअसल मुझे अमन ने बता रखा था कि उस दिन उसके साथ तुम आने वाली हो.. मैं पिछे से आया और गेट्कीपर को बोल दिया कि अमन को कुच्छ ना बताए.. मुझे सुरपरिज़े देना है.. अब भला वो दोस्तों के बीच कैसे आता.. और मैं छिप्कर अपना काम करके ले गया.." रवि ने कलाकारी दिखाई...

लड़कियों को काटो तो खून नही.. कुर्ते वाली तो अपने सारे बदन को ढीला छ्चोड़ उसस्पर ही झुक गयी.. और काँपने सी लगी...

टॉप वाली लड़की की मुश्किल से आवाज़ निकली," पर... पर मैं तो आज पहली बार आई हूँ.. बाइ गॉड! है ना सलमा!"

"मुझे सब पता है यार.. मुझे क्यूँ बता रही हो.. मुझे तो वो मूवी देखे बिना नींद ही नही आती.. पर अब तो आज के दिन की यादें ही बची रहनी है बस.. सी.डी. तो मैं दे ही दूँगा आज अमन को...!" रवि ने कुर्ते वाली के गाल को चूमते हुए कहा.. पर वह तो बर्फ की तरह ठंडी हो चुकी थी.. उसने इस बार कतयि बुरा नही माना," एक रिक्वेस्ट करूँ तो मान लोगे ना प्लीज़...!"

"हाँ हाँ.. क्यूँ नही जान.. हज़ार बातें बोलो...!" रवि अब अपने हाथ से जीन के उपर से उसकी जांघों को सहलाने लगा.. मज़े से.. बिना किसी विरोध के...

"ववो.. सी.डी. अमन को मत देना प्लीज़.. मुझे दे देना..." सलमा ने अपनी शोख नज़रों का जादू उस पर चलाने की कोशिश की...

"क्या फ़र्क पड़ता है? अमन तुम्हे इतना प्यार करता है.. एक ही बात है.. तुम रखो या वो..!" कहते कहते रवि ने अपनी उंगलिया धीरे धीरे सरकाते हुए सलमा की जांघों के बीच फँसा दी.. सलमा ने कसमसकर अपनी जांघें भींच ली.. पर कुच्छ बोली नही..... पर जैसे ही रवि ने दूसरा हाथ टॉप वाली लड़की की जांघों के बीच फँसना चाहा.. वह बिदक कर खड़ी हो गयी.. और उसको घूरते हुए सोफे पर जा बैठी..

"कमाल है यार.. गरम क्यूँ होती हो..?" रवि ने मुस्कुराते हुए टॉप वाली लड़की को आँख मारी...

" छ्चोड़ो ना... वो सी.डी. तुम मुझे ही दोगे ना प्लीज़..." सलमा ने प्यार से रवि के गाल पर हाथ रखकर चेहरा अपनी और घूमाते हुए कहा...

" हाँ मेरी जान...." रवि ने कहा और अपने दोनो हाथों में उसका चेहरा लेकर उसके होंटो को चूसने लगा... सलमा की अब क्या मज़ाल थी जो हूल्का सा भी विरोध करती.. अपना शरीर ढीला छ्चोड़ वह सी.डी. के बारे में सोचने लगी....

"मैं जाउ सलमा? तू आ जाना बाद में..." टॉप वाली लड़की का शरीर भारी भारी होने लगा था.. उसको अहसास हो चुका था की थोड़ी देर और यहाँ रुकी तो उसके लिए खुद को संभालना मुश्किल हो जाएगा...

"ना साना.. मुझे छ्चोड़ कर मत जा प्लीज़.. सिर्फ़ 2 मिनिट.." सलमा ने कहा और रवि की और देखते हुए बोली," अब तो वो सी.डी. दे दो प्लीज़.. मेरी जिंदगी तबाह हो जाएगी.. मैं मुँह दिखाने के लायक नही रहूंगी..."

"पहले साना को बोलो यहाँ से हिलने की कोशिश ना करे.. जब तक मैं ना कहूँ.. तभी मैं सी.डी. तुम्हे देने के बारे में सोचूँगा..." रवि के हाथ शानदार हथियार लग गया था...

"बोल तो रही हूँ.. एक मिनिट.." सलमा रवि के पास से उठी और साना को एक कोने की तरफ ले गयी..," देख साना.. मेरी इज़्ज़त का सवाल है.. प्लीज़ यार.. थोड़ी देर की बात है... मान जा..मैं इसको चुम्मा चाती में ही ढीला कर दूँगी... तू देखती जा.. और आइन्दा कभी तुझे यहाँ लेकर नही आउन्गि.. प्रोमिस!" सलमा ने साना को भरोसा दिलाने की कोशिश की....

"वो तो ठीक है यार.. पर तुझे पता है कि मैने ये सब कभी नही किया... तुम्हारे कहने पर ही मैं यहाँ आ गयी.. अगर कहीं इसने मुझसे भी ज़बरदस्ती करने की कोशिश की तो?" साना ने कहा...

" नही यार.. तू देख तो मैं क्या करती हूँ....! बस 5 मिनिट में ही नही झाड़ गया तो मेरा नाम बदल देना... बैठ तू आराम से.. और देख मेरा कमाल..." सलमा के कहने पर साना अजीब सी निगाहों से रवि को देखती हुई सोफे पर जा बैठी....

"क्या करोगे?" सलमा ने जाते ही रवि से सीधा सीधा पूच्छ लिया कि उसका इरादा क्या है आख़िर...

"हे हे हे.. हिन्दी में बताउ या अँग्रेज़ी में.." रवि कहकर मुस्कुराने लगा...

"किसी में भी बताओ यार.. पर जल्दी करो प्लीज़..... हम सच में लेट हो रहे हैं..." सलमा ने खीजते हुए पूचछा.......

"नही, जिसमें तुम कहो!" रवि ने उसके उरजों को मसालते हुए बत्तीसी निकाल दी....

"ओह, कॉम'ऑन यार.. चलो हिन्दी में ही बता दो... बट बी फास्ट!" सलमा जल्द से जल्द सी.डी. हासिल करना चाहती थी...

"चोदून्गा!" रवि के मुँह से बेबाक ढंग से कहे गये इस शब्द ने दूर बैठी साना की भी सीटी सी बजा दी... हालाँकि सलमा को शायद ऐसे शब्द सुन'ने की आदत थी....

सलमा ने एक बार साना की और देखा और फिर तपाक से बोली," चलो पॅंट उतारो....!"

"कमाल है? मारनी मुझे है या तुझे.. कपड़े तो पहले तुम्हारे ही उतरेंगे...."

सलमा खिन्न होकर खुद एकद्ूम नीचे बैठ गयी.. और घुटनो के बल होकर रवि की पॅंट का हुक खोलने लगी... साना ने शर्मकार अपना चेहरा घुमा लिया.....

सलमा ने पॅंट की ज़िप खोली और बिना देर किए उसको नीचे सरका दिया. इतनी गरम लड़की के इस अदा से उनका नंगा करते ही रवि के अंडरवेर में तंबू सा तन कर खड़ा हो गया.. जैसे ही सलमा ने अंडरवेर के बाहर से ही रवि के तने हुए लंड को अपनी मुट्ठी में लेने की कोशिश की, रवि सिसक उठा.. और अपनी आइडियाँ उठाकर आँखें बंद कर ली.. सलमा ने बाहर से ही महसूस कर लिया.. उसका भी अमन की तरह अच्च्छा ख़ासा मोटा और लंबा है.. रवि को एक एक करके अपने पैर आगे पिछे सरकाते हुए सिसकियाँ लेते देख सलमा समझ गयी की लोहा पहले ही काफ़ी गरम है.. पिघलने के लिए ज़्यादा आग नही जलानी पड़ेगी...

सलमा ने अपनी नज़रें तिर्छि करके एक बार साना को देखा.. वह भी कुच्छ इसी तरह से तिर्छि नज़रों से उनकी ही और देख रही थी.. पर बहुत शरमाई हुई.. और थोड़ी ललचाई हुई.. कहने को तो उसने अपना चेहरा दूसरी और कर रखा था.. पर उसकी नज़रों का निशाना रवि के कच्च्चे का उभार ही था..... उसके मन में वासना की हल्की हल्की लहरें उठने लगी थी.. यही कारण था कि अंजाने में ही उसने अपने दोनो हाथ जोड़ कर अपनी जांघों के बीच फँसा लिए थे..

सलमा का हाथ अभी भी कच्च्चे के उपर से रवि के लंड को सहला रहा था.. उस ने अपनी गर्दन उठा आँखें बंद करके सिसक रहे रवि को देखा और मुस्कुरा उठी.. वो तो अपने आपे में ही नही था..

वो झुकी और अंडरवेर के 'उस' खास उभरे हुए हिस्से पर अपने दाँत गाड़ने लगी..

"उफफफ्फ़" मारे गुदगुदी और आनंद के रवि उच्छल सा पड़ा और बिस्तर पर पैर नीचे करके जंघें चौड़ी करके बैठ गया.. पर सलमा उसको जल्द से जल्द टपकाने के मूड में थी.. वह तपाक से उसकी जांघों के बीच आई और अपनी कोहनियाँ उसकी जांघों पर रख कर जितना करीब हो सकती थी हो गयी... अब वो दोनो बिल्कुल साना की नज़रों के सामने बैठे थे...

"क्या बात है छम्मक छल्लो.. अंदर ही रस निकालने का इरादा है क्या? सलमा के गरम हाथों से 2 पल के लिए निजात पा कर रवि को ज़ुबान खोलने का मौका मिल गया..

सलमा ने उसकी आँखों में आँखें डाली और कामुक ढंग से मुस्कुराने लगी," क्यूँ? अच्च्छा नही लग रहा क्या?" सलमा ने कहते हुए उसका मोटा ताज़ा लिंग अंडरवेर की झिर्री से निकाल कर अपनी और साना की नज़रों के सामने बेपर्दा कर दिया.. साना खुद को एक लंबी साँस लेने से ना रोक सकी.. और जांघों के बीच छीपी बैठी उसकी कामुक तितली तड़प उठी....

हल्क भूरे रंग का रवि का 7.5" अब सीधे तौर पर सलमा के हाथों की थिरकन महसूस कर रहा था... क्या गजब का अहसास था.. रवि एक बार फिर मदहोश होने लगा... लगभग सिसकते हुए उसने कहा," हाईए.. मुँह में ले ले ना! और जो अंदर समान बच गया.. उसको तो बाहर निकाल.. वहाँ खुजली हो रही है..!"

"इतना मोटा मेरे मुँह में नही आएगा.." उपर नीचे करके सलमा उसकी मोटाई का अंदाज़ा लेते हुए बोली.. और हाथ अंदर करके उसके 'गोलों' को भी बाहर निकाल लिया....

"आ जाएगा.. ट्राइ तो कारर्र...!" रवि के लिंग में रह रह कर उफान सा आ रहा था...

साना ने शायद मर्द का लंड या कूम से कूम इश्स तरह का लंड पहली बार देखा था... लगातार उसकी और देखे जा रही साना की फटी हुई सी सेक्सी आँखों से तो यही अंदाज़ा लग रहा था...

रवि के दबाव डालने पर सलमा ने अपने मुँह को जितना हो सकता था उतना खोला और हाथ में पकड़े हुए रवि के लिंग के सूपदे को अंदर निगल लिया.. उसकी जीभ सूपदे के नीचे थी और होन्ट लगभग फटने को हो गये..

अचानक सिसकियाँ ले रहे रवि को शरारत सूझी.. उसने सलमा का सिर अपने दोनो हाथों से पकड़ा और खुद थोड़ा आगे होते हुए सलमा का चेहरा ज़ोर से अपनी तरफ खींच लिया...

सलमा की तो जान निकल गयी होती.. उसके नथुने अचानक फूल गये और आँखों से आँसू निकल गये.. असहाया सी सलमा ने 'गों..गों..गों..' की आवाज़ निकालते हुए रवि को प्रार्थना की नज़र से देखा... लंबी सी आआआः भर कर रवि ने उसको ढीला छ्चोड़ दिया और हँसने लगा," चला गया था ना पूरा.. तुम तो खम्खा डर रही थी... हे हे हे"

सलमा लंड से निजात पाते ही बुरी तरह खांसने लगी.. आँखों में अब भी नमी थी..," अब नही लूँगी..!" सलमा ने एलान कर दिया...

"चाट तो सकती हो ना.. उपर से नीचे तक.." रवि ने दया करते हुए उसको आसान रास्ता बता दिया...

"हूंम्म..!" बेचारा सा मुँह बनाकर सलमा ने कहा और अपनी नज़रों के सामने फुफ्कार रहे लंड को देखने लगी.. उसकी लार से पूरा सना हुआ रवि का लिंग ट्यूबलाइज्ट की रोशनी में चमक सा रहा था.. सलमा एक बार फिर झुकी और जीभ बाहर निकाल कर रवि के लिंग पर लगी हुई अपनी ही लार सॉफ करने लगी.. उपर से नीचे तक.. ऐसा करते हुए उसने रवि के गोलों को हाथों में पकड़ रखा था और हौले हुले सहला रही थी.. उत्तेजना की अग्नि में तड़प रहा रवि पिछे बिस्तेर पर लुढ़क गया और उसका लिंग सीधा तना हुआ छत की और निहारने लगा.. साना तब तक बुरी तरह मचलने सी लगी थी और समझ नही पा रही थी की अपने बदन में उठ रही इन्न झुझूरियों को कैसे शांत करे...

सलमा ने रवि को जैसे ही अपने आपे से बाहर देखा.. लिंग को चाटना छ्चोड़ वा तेज़ी से उसको अपने हाथ में ले उपर नीचे करने लगी... गोले अभी भी उसके दूसरे हाथ की सेवा से अभिभूत से थे...

अचानक रवि कोहनियाँ बिस्तेर पर टीका आगे से थोड़ा उठ गया," ये तुमने कहाँ से सीखा.. आ?"

"क्या?" हिलाना छ्चोड़ सलमा ने उसकी आँखों में देखा...

"मूठ मारना.. और क्या?" और रवि हँसने लगा...

सलमा अचानक किए गये इस अप्रत्याशित सवाल से बौखला गयी," चुप रहो ना.. मुझे अपना काम करने दो...!"

"अरे वा.. खुद तो बेवजह देरी करने में लगी हो.. इसकी ज़रूरत क्या है.. ये तो पहले ही पूरी तरह खड़ा है.. और कितना खीँचोगी इसको.. सीधे सीधे कपड़े निकल कर लेट क्यूँ नही जाती.. अगर काम जल्दी ख़तम करना है तो?" रवि ने हंसते हुए कहा....

"और अगर मैं ऐसे ही निकलवां दूं तो..?" सलमा की बात में प्रशन और प्रार्थना दोनो थे...

"ये भी कोई बात हुई भला.. ऐसे ही निकालना होता तो मेरे पास हाथ नही हैं क्या?"... और थोड़ा रुक'कर सोचते हुए बोला..," वैसे भी तुम्हारे ऐसे करने से इसमें से कुच्छ नही निकलने वाला.. इसको मेरे हाथों की आदत पड़ी हुई है.. हे हे हे.. चाहो तो कोशिश करके देख लो.. पर इसमें तुम्हारा ही नुकसान होगा.. बेवजह की देरी होगी.. पहले बता रहा हूँ..."

सलमा को उसकी बात में कोई दम नज़र नही आया.. उसको अपने हाथों की काबिलियत पर पूरा विस्वास था..," अब तक तो निकल चुका होता.. अगर तुम बीच में नही बोलते.. ठीक है.. मुझे 5 मिनिट और दे दो.. फिर जो चाहे कर लेना.."

"ठीक है.. जैसी तुम्हारी मर्ज़ी.. तुम्हारे 5 मिनिट और खराब सही..!" कहकर रवि फिर से सीधा लेट गया...

"बस थोड़ी देर और साना...," कहते हुए उसने जैसे ही साना को देखा.. वह चौंक पड़ी," आ.. तुम्हे क्या हुआ ?"

पसीने से लथपथ साना ने अपनी जीन1414016176

की जीप खोलकर उंगली अंदर फँसा रखी थी और बुरी तरह हाफ रही थी," कुच्छ.. नही.. कुच्छ नही.. हाआआ.. हययाया... ह्बीयेययाया!"

सलमा को एक बार हँसी आने को हुई पर मिले हुए पाँच मिनिट का पूरा फायडा उठाने के लिए वह उसको नज़रअंदाज करके तेज़ी से अपने काम में जुट गयी.. सलमा ने अपने होंटो को रवि के सूपदे पर रखा और जीभ से वहाँ अठखेलियन करती हुई एक हाथ से तेज़ी से लिंग की खाल को उपर नीचे करने लगी.. कामोत्तेजना बढ़ाने के लिए वह रह रह कर सिसकियाँ ले रही थी.. हालाँकि उसका इसमें इतना इंटेरेस्ट नही था.. जितना सी.डी. पाने में था... रवि भी अब तक बेकाबू हो चुका था.. कमसिन हाथों, होंटो और जीभ के एक साथ हम'ले ने उसको पागल सा कर दिया था... सिर घूमाते ही उसकी नज़र अपनी पॅंट में उंगली अंदर बाहर कर रही साना पर पड़ी और इतना शानदार मंज़र देखते ही उसकी साँसें तक खिंचने लगी.. उसको लगा वह अब टिक नही पाएगा.. पर अब वो रुकना चाहता भी नही था.. अचानक उठा और फिर से उतनी ही बेदर्दी के साथ अपना लंड सलमा के मुँह में ठोक कर गहरी साँसें लेने लगा.. वीरया की तेज धार पिचकारियाँ सलमा के गले को तर करती चली गयी... और सलमा चाहते हुए भी अपना मुँह बाहर नही निकाल सकी.. जब तक की खुद रवि ने उसको नही छ्चोड़ा....

 
एक पल को मुँह खट्टा सा बनाती हुई सलमा अचानक छाती तान कर बोली," देखा.. निकलवा दिया ना.. अब लाओ वो सी.डी."

"कौनसी सी.डी.?" बिस्तेर पर निढाल पड़ा हुआ रवि अचानक उठ बैठा...

"अब प्लीज़.. ऐसे मत करो.. मैने अपना काम कर दिया है.. " सलमा खुद को ठगा हुआ सा महसूस करते हुए बोली....

"मैं तो मज़ाक कर रहा था यार.. मैं क्या तुम्हे ब्लू फिल्मों का दल्ला लगता हूँ.. सूरत तो देखो एक बार.. कितनी भोली है यार...!" रवि ने मुस्कुराते हुए उसके दोनो हाथ पकड़ लिए....

"तो क्या वो सब...?" सलमा ने हैरत से पूचछा...

"हां.. झूठ था.. पर ये सच है कि तुम बहुत ही गरम और सेक्सी माल हो.. एक बार अंदर बाहर खेल लो यार... प्लीज़!" रवि ने उसके हाथों को पकड़े हुए उसको अपनी और खींचने की कोशिश की....

"कुत्ता.. कमीना..!" सलमा को अब पहले से कहीं अधिक अफ़सोस हो रहा था..," खाली फोकट में मेरे हाथ तुड़वा दिए... चल साना.. जल्दी चल..!"

"मान भी जाओ यार.. अब अगर मैं तुमको सच नही बताता, तब भी तो तुम सब कुच्छ करती.. जो मैं चाहता...!" रवि ने शराफ़त से कहा...

"नही मुझे कुच्छ नही करना.. छ्चोड़ो मेरा हाथ.." सलमा ने गुस्से से कहा...

"मुझे करना है!" साना की आवाज़ सुनकर दोनो ने चौंक कर उसको देखा.. वह सिर झुकाए बैठी थी......

ओह वाउ.. ये तो कमाल ही हो गया.." रवि झूमते हुए उठा और सलमा को भूल कर साना को अपनी बाहों में उठा लिया.. उसका बदन तप रहा था.. आँखें बंद थी और पूरा बदन रवि की बाहों में उसने ढीला छ्चोड़ दिया था... रवि ने उसको प्यार से बिस्तेर पर लिटा दिया और उसके उपर आकर उसके होंटो को चूमने लगा...

"साना! ये क्या कर रही हो तुम?.. और वो भी...इस चीटर के साथ!" सलमा को जलन सी महसूस हुई.. वह पहले सी.डी. के लिए जल्दबाज़ी कर रही थी और बाद में साना के लिए.. वरना जिसको देखकर साना गरम हो गयी थी, सलमा ने तो उसका च्छुआ था.. चूमा था.. चॅटा था.. चूसा था.. और निगला भी..

पर जिसके लिए उसने अपने जज्बातों पर काबू रखा, खुद उसी को मैदान में कूदते पाया तो उसकी हैरानी का ठिकाना ना रहा.. उसने दो बार और साना को पुकारा.. पर साना तो जैसे वहाँ थी ही नही.. वह तो कहीं उपर मस्तियों के सागर में डुबकी सी लगा रही थी.. आसमान में तेर सी रही थी..

"इस'से अच्च्छा तो मैं ही ना कर लेती..."सलमा बड़बड़ाती हुई सोफे पर जाकर पसर गयी और अपने कपड़े निकालने लगी....

उधर रवि का ध्यान अब पूरी तरह उसके नीचे लेटी सिसकियाँ ले रही साना पर था... उसके गालों, गर्दन, होंटो को चूमते हुए धीरे धीरे रवि उसके मादक उरजों से खेल रहा था.. उसकी हर हरकत के साथ साना की हालत खराब से और खराब होती जा रही थी... और अब वह इंतजार करने की हालत में नही थी... उसने अपना हाथ लंबा करके रवि के अंडरवेर में हाथ घुसा लंड को अपने हाथ में पकड़ लिया.. वह फिर से अकड़ चुका था...

"ज़्यादा जल्दी है क्या?" रवि ने साना के होंटो पर उंगली फेरते हुए कहा....

"हां.. प्लीज़.. मुझे कुच्छ अजीब सा हो रहा है.. जल्दी कुच्छ करो.." 2-3 लंबी लंबी साँसे लेती हुई साना ने इस छ्होटी सी बात को पूरा किया...

अब रवि को टाइम बिताने का कोई फायडा लग भी नही रहा था.. उसने झट से बैठते हुए साना का टॉप उपर खिसकाकर निकाल दिया.. और पलटी खाकर उसको अपने उपर ले आया.. साना के गोल मटोल ब्रा में क़ैद संतरों की भीनी भीनी खुसबू पाकर निहाल हो गया... उसकी कमर में हाथ डालते हुए उसने उन्न कबूतर के बच्चों को ब्रा से भी निजात दिला दी...

नग्न होते ही साना की दोनो मस्त चूचियाँ पेड़ से लटके फलों की भाँति रवि के चेहरे के सामने लटक गयी.. ऐसे कुंवारे फल जिन्हे किसी ने आज तक चखा नही था.. तोड़ा नही था.. आज टूटने ही थे!

रवि ने साना की गोल चूची के गुलाबी रंगत लिए हुए एक दाने को अपने होंटो में दबाया और उनसे रस निकालने की कोशिश करने लगा... वहाँ तो रस नही निकला, अलबत्ता साना को अपनी कुँवारी चूत फिर से बहती हुई महसूस हुई... लगातार तेज होती जा रही सिसकियों को काबू में रखने के चक्कर में साना पागल सी हो गयी थी.. उसने झट से बिस्तेर पर घुटने टेक अपने नितंब उपर उठा लिए और अपना सीना रवि भरोसे छ्चोड़ती हुई दोनो हाथ पिछे लेजाकार अपनी पॅंट का हुक खोला और हाथों से ही थोड़ा नीचे सरकाकर पैरों से खिसका खिसका कर बाहर निकाल दिया... अब सिर्फ़ उसकी नाभि रंग की पॅंटी ही उसके नितंबों और योनि को ढके हुए थी..

जैसे ही रवि के हाथों ने उसके नंगे बदन पर लहराते हुए साना के नितंबों की गोलाई और ठरकं को महसूस किया.. वह पागल सा हो गया.. उसके दाने से मुँह हटा उसने फिर से साना को नीचे गिरा लिया और लपकते हुए उसकी जांघों के बीच आ गया...

साना अब तक इतनी उत्तेजित हो रही थी कि रवि के कुच्छ करने का इंतज़ार किए बगैर ही अपनी पॅंटी में हाथ घुसा दिया.. रवि की मौजूदगी का वहाँ अहसास होते ही लगातार मीठी सिसकियाँ अपने होंटो से उत्सर्जित करती हुई साना ने अपनी जांघों को पूरी तरह खोल दिया.. उसकी योनि के बराबर के उभार की लाली पॅंटी से बाहर झाँकने लगी.. इसके साथ ही हुल्के हुल्के बॉल भी वहाँ से अपना सिर बाहर निकालने लगे...

रवि ने झटका देते हुए उसके नितंबों को उठाया और पॅंटी खींच ली.. योनि की सुंदरता और पतली झिर्री के बीच लाल रंग की खुल सी गयी फांकों को देखकर वह पागल सा हो गया.. पॅंटी को पूरी तरह बाहर निकालने की जहमत उठाए बिना ही उसने साना की टाँगों को उपर उठाकर पिछे किया और थोड़ी और खुल चुकी योनि पर अपने होन्ट सटा दिए.. साना उच्छल पड़ी..," ऊओईईईई... आआआआहह!"

मादक रस की भीनी भीनी खुश्बू तो गजब ढा ही रही थी.. उस पर उसकी सिसकती हुई आवाज़ ने रवि को और उकसा दिया... झट से उसने पूरी योनि को मुँह में लिया और अपनी जीभ गोल करके अंदर डालने की कोशिश करने लगा...

साना इस अभूतपूर्व आनंद को सहन नही कर पा रही थी.. बचने की कोशिश में उससने च्चटपटाते हुए अपने चूतदों को इधर उधर हिलाना शुरू कर दिया.. रवि ने उसके नितंबों की दोनो फांकों को अपने हाथों में पकड़कर वहीं दबा लिया.. साना तो जैसे पागल ही हो रही थी.. पूरे कमरे में उसकी मादक सिसकियाँ गूंजने लगी... और बीच बीच में आधा अधूरा.. 'प्लीज़' भी उसकी आवाज़ में सुनाई देने लगा....

अचानक उसको अहसास हुआ कि सलमा उसके लंड को अंडरवेर से निकाल कर उसको चूसने में लगी हुई है.... सलमा ने लंड को पूरी तरह बाहर निकाल कर पिछे की तरफ घुमाया हुआ था और अब तो वो बार बार सूपदे को मुँह में भी लेकर चूस रही थी... रवि तो मानो धान्या हो गया.....

जी भरकर उसके रस का स्वाद लेते हुए उसको तडपा तडपा कर झड़ने के बाद जैसे ही रवि होश में आया.. वह उठा और साना की पॅंटी पूरी तरह उसकी जांघों से निकाल फर्श पर फैंक दी... जीभ को स्वाद चखा चखा कर उसकी योनि लाल हो चुकी थी और जैसे अंदर लेने को मरी जा रही थी... रवि ने जैसे ही उसकी टाँगों को मोड़ उसकी छाती से लगाया.. योनि की फांकों ने पूरी तरह मुँह खोल उसके स्वागत के लिए खुद को तैयार करार दिया....

अब देर किस बात की थी.. किस्मत से मिले इस खजाने के चप्पे चप्पे को तो वो चूस ही चुका था.. अब अंदर जाने की तैयारी में वह आगे खिसका और अपना लंड साना की फांकों के बीच रख दिया...

सूपदे की मौजूदगी को साना सहन नही कर पाई और एक बार फिर रस छ्चोड़ दिया.. सिसकते हुए..," आआआआअहूऊऊऊऊओ!"

"हुम्म.. ये ले.." रवि ने जैसे ही दबाव बनाया.. साना की चीख निकल गयी.. इस चीख को यक़ीनन नीचे बैठे लोगों ने भी सुना होगा.. सूपड़ा 'पक' की आवाज़ के साथ योनि में जाकर फँस गया.. साना की आँखें निकल कर बाहर आने को हो गयी.. अगर रवि उसके होंटो को अपने हाथ से दबा नही लेता तो उसकी चीखें अभी काई मिनिट तक गूँजनी थी...

मुँह पर हाथ रखे हुए ही रवि उसकी छतियो पर झुक गया.. और बेदर्दी से उन्हे चूसने लगा...

सलमा अपने आपको अकेला पाकर फिर से भनना गयी.. आख़िर उसके पास भी तो तराशा हुआ माल था.. बड़ी ही बेशर्मी के साथ वह उठकर रवि के आगे साना के दोनो और घुटने टेक आगे की और झुक गयी.. और अपने मोटी मोटी हुल्की सी खुली हुई फांकों वाले 'माल' का पारदर्शन रवि को रिझाने के लिए करने लगी...

नेकी और पूच्छ पूच्छ.. रवि ने 'इस' माल का स्वागत भी उतनी ही इज़्ज़त और तत्परता के साथ किया... साना की जांघों में भी अब दर्द कम होने लगा था.. साना की छातियो को छ्चोड़ वह थोड़ा उपर उठा और सलमा को पीछे खींच लिया...नितंबों को मसालते हुए उसने सलमा की बॉल कटी हुई योनि को अपने हाथ में लेकर मसल सा दिया.. सलमा उच्छल पड़ी...," आ.. दर्द होता है ऐसे!"

"और ऐसे!" जैसे ही रवि ने अपनी एक उंगली उसकी चूत में घुसाई.. वो पूरी थिरक उठी .. एक बार कमर को लारजते हुए उपर उठी और तुरंत ही नीचे झुक कर साना के मुँह में अपनी एक चूची दे दी... साना पूरे मज़े से किसी बच्चे की तरह उसको चूसने लगी...

रस से सनी उंगली निकाल कर रवि ने रस को सलमा की गांद के छेद पर लगा दिया.. सलमा समझ गयी कि अब क्या होने वाला है.. दाँत भींच कर उसने अपने आपको इस आघात के लिए पहले ही तैयार कर लिया...

रवि ने छेद को उंगली से उपर से ही कूरेदना शुरू कर दिया.. सलमा निहाल हो गयी.. उसने अपने नितंबों को ढीला छ्चोड़ दिया.. तब तक साना भी अपने नितंबों को थिरकने लगी थी.. रवि ने धीरे धीरे वहाँ दबाव बनाना शुरू किया और जैसे ही मौका मिला.. एक दम से नीचे होकर पूरा लिंग घुसकर साना को उच्छालने की कोशिश करने पर मजबूर कर दिया.. पर अब चीख नही निकली.. उसके मुँह में तो सलमा की चूची फँसी हुई थी.... सो अंदर ही घुट कर रह गयी होगी....

अब उच्छलने की बारी सलमा की थी.. अचानक रवि की उंगली के दो परवे उसके छेद में घुस गये.. और झटके के साथ उसने अपने चूतदों को कस कर भींच लिया.. पर अब तो उंगली जा ही चुकी थी..

सलमा की टाँगों को एक एक करके रवि ने हवा में उठी हुई साना की जांघों से पिछे कर दिया... साना की जांघें अब सलमा की कमर से सटी हुई उपर की और उठी थी...

रवि ने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू किए.. पर अब तक साना के बदन में इतनी गर्मी भर चुकी थी कि सहज धक्कों से कुच्छ नही होना था.. साना ने भी अपनी टाँगों को हिला हिला कर चूतादो को धक्कों के साथ ले मिलाते हुए थिरकना शुरू कर दिया... इस'से उत्तेजित होते हुए रवि ने अपनी पूरी उंगली सलमा के अंदर घुसेड दी.. सलमा काँप उठी.. दर्द के मारे नही.. आनंद के मारे.. अपना हाथ नीचे लाकर वह खुद ही अपनी योनि को बुरी तरह मसले जा रही थी....

धीरे धीरे करते हुए रवि ने धक्कों की रफ़्तार बढ़ा दी.. इसी बीच रवि की उंगली की जगह उसका अंगूठा ले चुका था.. पर अब तो सलमा पूरी तरह मस्त थी.. और भी कुच्छ होता तो शायद ले लेती....

एक बार और सखलन के करीब आकर साना बुरी तरह हाँफने लगी थी.. सारा शरीर अकड़ गया था और सलमा की चूची मुँह से निकाल अब वह छ्चोड़ देने की गुहार लगाई...

रवि ने 2 पल के लिए धक्के लगाते हुए सोचा.. साना की चूत में अंदर आते जाते उसको अपनी कल्पना से भी कहीं अधिक आनंद आ रहा था... पर उसने साना पर अहसान करने का निर्णय कर ही लिया... आख़िर उसके पास स्पेर में दूसरा 'माल भी तो था....

जैसे ही रवि ने अपना लिंग साना की योनि से बाहर निकाला.. वह गहरी साँस लेते हुए सलमा के नीचे से निकल कर आँखें बंद करके बिस्तेर पर सीधी पड़ी हुई लंबी लंबी साँसे लेने लगी....

अब रवि का निशाना सलमा थी.. पर जैसे ही उसको नीचे झुका रवि ने लंड उसकी गांद के छेद पर रखने की कोशिश की.. सलमा तड़प उठी," प्लीज़.. यहाँ ये नही.. नीचे घुसा दो.. मैं कब से तड़प रही हूँ...!"

"अच्च्छा.. पहले क्यूँ नही बताया..!" रवि ने मुस्कुराते हुए अपना इरादा बदल दिया और उसको थोड़ा सा उपर उठा, एक ही धक्के में लंड आधे से ज़्यादा उसकी योनि में उतार दिया...

"आआआहह!" सलमा सिसक उठी... आनंद के मारे अपनी छातियो को अपने आप ही मसल्ने लगी..," कर दो नाआ!"

"ये ले..!" और अगले ही झटके में रवि का लिंग पूरा अंदर गया और इसके साथ ही अंदर बाहर होने लगा... सलमा पर मदहोशी का सुरूर छाया हुआ था.. हर धक्के का जवाब वह अपने पिछे की ओर धक्के और 'आह' के साथ दे रही थी... मुश्किल से 4-5 मिनिट हुए होंगे की उसने भी हिचकियाँ सी लेते हुए जवाब दे दिया... ," आ.. बस.. थॅंक्स याआआर!" और सलमा अपने को छुड़ाने की कोशिश करने लगी....

"सीधी हो जाओ.. पर मेरा काम तो पूरा करवा दो.." रवि ने मिन्नत सी करते हुए कहा....

"नही यार.. बस.. और सहन नही कर सकती..!" सलमा ने सॉफ जवाब दे दिया...

रवि ने मायूसी से साना की और देखा.. वह उसका इशारा समझते ही मुस्कुराइ और सलमा वाली पोज़िशन में उसकी तरफ चूतड़ उठाकर घूम गयी... रवि की बाँच्चें खिल गयी.. आख़िर पहली बार वाली तो पहली बार वाली ही होती है... वह घूमा और उसके पिछे जाकर खड़ा हो गया...

रवि ने झुककर उसकी छतियो को दोनो हाथों में पकड़ा और कमर पर गर्दन के पास चुंबन अंकित करके अपना धन्यवाद प्रकट किया... इस स्थिति में लंड को अपने योनि द्वार पर टक्कर मारते देख साना निहाल हो गयी..

रवि ने उठकर उसकी कमर को झुकाया और उसके उपर की और उठ गये नितंबों को पकड़ कर एक दूसरे से दूर खींचा.. योनि का मुँह खुल गया.. रवि ने छेद के मुँह पर लिंग का सूपड़ा रखा और उसकी मखमली जांघें कसकर पकड़ ली...

"आउच..!" साना के मुँह से निकला...

"बस एक मिनिट... !" रवि भी उत्तेजना की प्रकस्था तक पहुँचने ही वाला था.. जांघों को कसकर पकड़े हुए उसने लिंग पूरा उतारा और तुरंत ही बाहर खींचते हुए तेज़ी से अंदर ठोंक दिया.. साना तो अब मज़े के मारे मरी जा रही थी... हर झटका उसको आनंद सागर के पार लगा रहा था मानो... उसने पूरा सहयोग करना शुरू कर दिया और सलमा की और मुस्कुराते हुए और ज़्यादा उत्तेजित होकर झटके लगाती रही.. लगवाती रही...

आख़िर कार रवि के सखलन का समय आ गया... तेज़ी से धक्के लगाता लगाता वह एक दम रुक गया और साना के उपर झुक कर उसकी छातियो को कसकर मसालने लगा... साना ने उसके वीरया की बूँदों को अपने अंदर महसूस किया और रवि के आलिंगन से मदहोश होकर किलकरियाँ सी लगानी शुरू कर दी... अब तो रवि भी बुरी तरह हाँफ रहा था....

तीनो काफ़ी देर तक एक दूसरे के बाजू में आँखें बंद किए पड़े रहे.. अचानक सलमा ने पूचछा," सच में तुमने कोई सी.डी. नही बनाई है ना.....

"बनाई है... अगली बार दूँगा.." कहकर रवि खिलखिला कर हँसने लगा....," नही यार.. ऐसा कुच्छ नही है.. बट थॅंक्स फॉर एवेरितिंग.. ये मेरे जीवन का पहला सेक्स था...

साना ने पलटे हुए अपनी छाती रवि से सटा'ते हुए अपनी नंगी जाँघ उस'की जांघों पर रख ली," मेरा भी!" उसने कहा और रवि के होंटो को चूसने लगी.......

नीचे महफ़िल जम चुकी थी.. कुच्छ देर रवि का इंतजार करने के बाद अमन ने वहीं प्रोग्राम जमा लिया.. गिलासों को खड़खड़ते अब करीब आधा घंटा हो चुका था.. शराब के नशे में रोहन वो सब कुच्छ बोलने लगा था जिसको बताने में अब तक वो हिचक रहा था...

"ओह तेरी.. फिर क्या हुआ?" अमन जिगयासू होकर आगे झुक गया...

"छ्चोड़ो यार.. क्यूँ टाइम खोटा कर रहे हो.. आइ डॉन'ट बिलीव इन ऑल दीज़ फूलिश थिंग्स.. एक सपने को लेकर इतना सीरीयस और एमोशनल होने की ज़रूरत नही है.. " शेखर सूपरस्टिशस किस्म की बातों में विस्वास नही कर पा रहा था...

"पूरी बात तो सुन ले डमरू... रोहन ने शेखर को डांटा और कहानी सुनने लगा....

"कौन डमरू.. मैं.. हा हा हा...!" शेखर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा...," डमरू.. हा हा हा!"

"तुझे नही सुन'नि ना.. चल.. जाकर सामने बैठ.. और अपना मुँह बंद रख.. मैं मानता हूँ.. और मुझे सुन'नि हैं..." अमन आकर सामने वाले सोफे पर शेखर और रोहन के बीच में फँस गया.. शेखर उठा और बड़बड़ाता हुआ सामने चला गया," डमरू.. हा हा हा!"

बातें अभी चल ही रही थी कि मुस्कुराते हुए रवि ने कमरे में प्रवेश किया..," अच्च्छा.. अकेले अकेले..!"

शेखर उसके आते ही खड़ा हो गया," साले डमरू! अकेले अकेले तू फोड़ के आया है या हम.. ? बात करता है...

"भाई तू मेरे को डमरू कैसे बोल रहा है.. वो तो रोहन बोलता है..." रवि ने उसके पास बैठते हुए कहा...

"क्यूंकी मेरे अंदर रोहन का भूत घुस आया है.. हे हे हा हा हो हो!" शेखर ने भूतों वाली बात का मज़ाक बना लिया....

"चुप कर ओये जॅलील इंसान.. ऐसी बातों को मज़ाक में नही लेते.. किसी के साथ भी कुच्छ भी हो सकता है..." अमन ने प्यार से उसको दुतकारा...

"किस के साथ क्या हो गया भाई? मुझे भी तो बता दो.." रवि ने अपना गिलास उठाया और सबके साथ चियर्स किया...

"वो बात बाद में शुरू से शुरू करेंगे.. अब सबको सीरीयस होकर सुन'नि हैं.. पहले तू बता.. दी भी या नही.. मुझे तो उसकी चीख सुनकर ऐसा लगा जैसे तू अपना हाथ में पकड़े उसके पिछे दौड़ रहा है.. और वो बचने के लिए चिल्लती हुई कमरे में इधर उधर भाग रही है...हा हा हा.. साली ने नखरे बहुत किए थे पहले दिन... मैं ऐसी नही हूँ.. मैं वैसी नही हूँ.. पर डालने के बाद पता लगा वो तो पकई पकाई है..." अमन ने अपना अनुभव सुनाया....

रवि ने छाती चौड़ी करके अपने कॉलर उपर कर लिए," देती कैसे नही... !"

"अरे... सच में.. चल आ गले लग जा.. बधाई हो बधाई.." अमन आकर उसके गले लग गया..," हां.. यार.. बात तो तू सही कह रहा है.. सलमा की खुश्बू आ रही है तेरे में से.... पर वो चिल्लाई क्यूँ यार.. साली एक नंबर. की नौटंकी है.. तुझे भी यही कह रही थी क्या की पहली बार मरवा रही हूँ.." अमन ने वापस रोहन के पास बैठते हुए कहा...

" नही यार.. वो तो साना की चीख थी... उसकी पहली बार फटी है ना आज!" रवि ने अपनी बात भी पूरी नही की थी की अमन ने गिलास रखा और उच्छल कर खड़ा हो गया..," तूने साना की मार ली????"

"हां.. कुच्छ ग़लत हो गया क्या?" रवि ने मारा सा मुँह बनाकर कहा...

"ग़लत क्या यार..? ये तो कमाल हो गया.. साली को तीन बार बुला चुका हूँ.. सलमा के हाथों.. पर वो तो हाथ ही नही लगाने देती थी यार.. तूने किया कैसे.. अब तो ज़ोर की पार्टी होनी चाहिए यार.. ज़ोर की.. तूने मेरा काम आसान कर दिया...!" अमन जोश में पूरा पैग एक साथ पी गया...

"वो कैसे? " रवि की समझ में नही आई बात....

"क्या बताउ यार.. तुझे तो पता होगा.. वो और सलमा दोनो सग़ी बेहन हैं..!"

अमन को रवि ने बीच में ही टोक दिया," क्या? सग़ी बेहन हैं.. ?"

"हां.. चल छ्चोड़ यार.. लंबी कहानी है.. उसके बारे में बाद में बात करेंगे... पहले रोहन भाई की सुनते हैं.. चल भाई रोहन.. अब सब इकट्ठे हो गये हैं.. शुरू से शुरू करके आख़िर तक सुना दे.. पहले बोल रहा हूँ शेखर.. बीच में नही बोलेगा.. देख ले नही तो...!" अमन शेखर को चेतावनी सी देते हुए बोला..

"नही बोलूँगा यार... चलो सूनाओ!" कहकर शेखर भी रोहन की और देखने लगा....

रोहन ने कहानी सुननी शुरू कर दी.....

 
कुच्छ ऐसा ही रोहन के साथ कहानी में हुआ.. हमेशा अपनी मस्ती में ही मस्त रहने वाला एक करोड़पति बाप का बेटा अचानक अपने आपको गहरी आसमनझास में घिरा महसूस करता है जब कोई अंजान सुंदरी उसके सपनों में आकर उसको प्यार की दुहाई देकर अपने पास बुलाती है.. और जब ये सिलसिला हर रोज़ का बन जाता है तो अपनी बिगड़ती मनोदशा की वजह से मजबूर होकर निकलना ही पड़ता है.. उसकी तलाश में.. उसके बताए आधे अधूरे रास्ते पर.. लड़की उसको आख़िरकार मिलती भी है, पर तब तक उसको अहसास हो चुका होता है कि 'वो' लड़की कोई और है.. और फिर से मजबूरन उसकी तलाश शुरू होती है, एक अनदेखी अंजानी लड़की के लिए.. जो ना जाने कैसी है...

इस अंजानी डगर पर चला रोहन जाने कितनी ही बार हताश होकर उसके सपने में आने वाली लड़की से सवाल करता है," मैं विस्वाश क्यूँ करूँ?" .. तो उसकी चाहत में तड़प रही लड़की का हमेशा एक ही जवाब होता है:

'' मुर्दे कभी झूठ नही बोलते "

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गतांक से आगे ............................

" ओह माइ गॉड! मतलब तुम्हारे लिए कोई लड़की सदियों से तड़प रही है.. आज तक!" अमन ने पूरी कहानी सुन'ने के बाद ही प्रतिक्रिया दी..," मैने तो ऐसा सिर्फ़ कहानियों में ही सुना था.. आज पहली बार जीता जागता सबूत देख रहा हूँ..."

"अबे घोनचू! ये भी तो कहानी ही है.." नशे और मस्ती में झूल रहे शेखर ने पनीर का टुकड़ा प्लेट से उठाकर उसके मुँह पर दे मारा...

"मतलब? ... ये कहानी है रोहन?" अमन ने रोहन की और अचरज से देखा...

रोहन कुच्छ नही बोला.. पिच्छली बातें याद करते करते उसके चेहरे पर पसीना छलक आया था.. शरीर में रह रह कर अंजान सी सिहरन सी दौड़ जाती थी.... वह सिर झुकाए बैठा रहा....

"अरे यार.. सपने कहानियाँ ही तो होते हैं.. सपने में ही तो आती है ना वो.. और जो कुच्छ जीते जागते में हुआ है.. उसके बारे में नितिन भाई ठीक ही कह रहा है.. वो ज़रूर उस बुड्ढे और लौंडिया की साज़िश है.. ज़रूर किसी मन्त्र तन्त्र का सहारा लेकर इसके सपने में आ जाती होगी... तू क्या कहता है रवि?" शेखर ने सबके लिए एक एक पैग और बना दिया.....

"साला! कुत्ता! कमीना.... 2 महीने से ऐसे ही रोनी सी सूरत बनाए हुए है.. कभी मुझे दोस्त नही समझा... मुझे आज तक कुच्छ भी नही बताया इसने..!" अब तक चुप चाप गौर से सारी बातें सुन रहा रवि उठा और रोहन के पास बैठकर उसकी छाती से लग गया...," पहले क्यूँ नही बताया यार... मैं चलता तुम्हारे साथ.. हर जगह.. तूने मुझे अपना नही माना यार... मुझे अपना नही माना ओये!"

"अब चुप भी कर यार.. ज़रा सी चढ़ते ही शुरू हो जाता है.." रोहन ने भी उसके गले लग कर उसकी कमर थपथपाई....

"आज मैं उस तरह से शुरू नही हुआ हूँ यार.. कितना हंसता था तू.. कितनी मस्ती करते थे हम दोनो.. पर दो महीने से तू पता नही कैसा हो गया है.. ना कहीं घूमने चलता.. ना कभी फोन उठता.. और मिलता भी है तो दिलीप कुमार की स्टाइल में.. मैं सोचता तो था कि कहीं तेरा कुच्छ चक्कर तो नही चल गया है.. पर ये तो मैने सपने में भी नही सोचा था की ये सारा चक्कर सपने का है... पर अब चिंता मत कर.. यहाँ बतला में ही है ना वो...?" रवि भावुक होते हुए बोला...

"हूंम्म.." रोहन ने हामी भारी...

"उसको ढूँढना ही है ना बस.. बाकी काम तो तू कर लेगा?" रवि ने पूचछा...

"सिर्फ़ ढूँढना नही है यार... उसको वहाँ लेकर भी जाना है.. उसी टीले पर.." रोहन ने सपस्ट किया...

"तो वो तो चल ही पड़ेगी ना... जब तुझसे इतना प्यार करती है.. तेरे लिए तो वो सारी दुनिया को छ्चोड़ सकती है भाई.. फिर बतला में क्या रखा है? पुराने टीले पर रहेंगे चलकर.. एक छ्होटा सा मकान बना लेंगे यहाँ..." रवि ने अपनी बटेर जैसी मोटी आँखें रोहन के सामने पूरी खोल दी....

"तुझसे तो बात करना ही बेकार है यार.. भेजे में तो मुर्गियों ने अंडे दे रखे हैं तेरे में.. कुच्छ समझ में तो आता नही .. तेरे को क्या घंटा बताता में...." रोहन उसकी ऊल-जलूल बातें सुनकर झल्ला उठा...

"ऐसे क्यूँ बोल रहा है यार.. चल अच्छे से एक बार और सुना दे पूरी कहानी.. इस बार में ज़रूरी बातें नोट करता रहूँगा अपनी डाइयरी में.. मेरी डाइयरी कहाँ गयी?" रवि ने भोलेपन से कहा और सभी ठहाका लगाकर हंस पड़े..

"तुझे कहानी सुन'ने की कोई ज़रूरत नही है.. आगे की सुन ले बस.. पहले नीरू को ढूँढना है.. फिर उस'से दोस्ती करनी है.. फिर सारी बातें उसको बतानी हैं और उसको अपने साथ एक बार पुराने टीले पर चलने के लिए मनाना है... समझ गया! और अब वहाँ मकान बनाने की प्लॅनिंग शुरू मत करना.. वहाँ रहना नही है हमें..." रोहन ने खास खास बातें दोहरा दी....

"रहना नही तो फिर क्यूँ चलना है वहाँ.. क्यूँ बेचारी भाभी को डरा रहे हो यार.." रवि के दिमाग़ में एक और सवालों का लट्तू जगमगा उठा...

"अबे डमरू.. वहीं चलकर उसको सब कुच्छ याद आएगा.. समझा.." रोहन ने गुस्से से कहा...

"ऊहह.. अच्च्छा...... ठीक है...एक मिनिट.....पर तुझे कैसे पता कि उसको वहीं सब कुच्छ याद आएगा..." रवि ने एक और सवाल दागा...

"खुद नीरू ने ही बताया है मुझे, सपने में.... याअर.." रोहन समझाते समझाते थक गया....

"जब उसको पता ही है तो याद दिलाने की क्या ज़रूरत है.. ? बस ये एक लास्ट बात और क्लियर कर दे..."

"साले.. तेरे दिमाग़ में चढ़ गयी है दारू.. यहाँ वाली नीरू को कुच्छ पता नही है... वो टीले पर जो है.. वो केयी जनम पहले की प्रिया का दिल है.. जो कहती है कि मैं देव था और वो प्रिया.. हम एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे.. इस जनम में प्रिया नीरू है और और देव रोहन.. यानी की मैं.. इस'से ज़्यादा मुझे कुच्छ नही पता.. मैं सिर्फ़ देखना चाहता हूँ कि ये सब सच भी है या नही.. कल सुबह नीरू को ढूँढने चलेंगे.. अब इसके बाद कोई सवाल किया ना तो... देख ले फिर.." रोहन बोलते बोलते तक गया....

"एक मिनिट रोहन..मान लो तेरा सपना हक़ीकत है.... शहर में तो काई नीरू हो सकती हैं.. तू उसको ढूंढेगा कैसे...?"

"उसका घर गवरमेंट. कॉलेज के पास है.. वहीं पता करेंगे कोई नीरू वहाँ है भी या नही...." रोहन ने जवाब दिया....

"गूव्ट. कॉलेज के पास? वहाँ का तो मैं अभी पता लगा सकता हूँ.. आक्च्युयली सलमा और साना वहीं रहती हैं...!"

रोहन और रवि एक साथ बोल पड़े," पता कर ना यार..!"

"हां.. अभी पता करो यार.. पता चल जाएगा कि सपना हक़ीक़त है या फसाना...!" शेखर भी उत्सुक होकर मोबाइल निकाल रहे अमन की और देखने लगा...

अमन ने उनके बीच बैठे बैठे ही सलमा को कॉल की ओर स्पीकर ऑन कर लिया.. काफ़ी लंबी बेल जाने के बाद सलमा ने फोन उठाया," जानू.. अम्मी यहीं पर हैं.. मैं उपर जाती हूँ.. 5 मिनिट बाद फोन करना" खुस्फुसती हुई आवाज़ में कहते हुए सलमा ने झट से फोन काट दिया..

"अम्मी! साना कहाँ है?" सलमा ने फोन अपनी जेब में डाला और किचन से बाहर आते हुए बोली..

"उपर पढ़ रही होगी.. क्यूँ?" अम्मी ने काम करते करते ही जवाब दिया...

"मैने दूध गॅस पर रख दिया है अम्मी.. एक बार देख लेना.. मैं अभी आती हूँ.." सलमा ने सीढ़ियाँ चढ़ते हुए कहा...

सलमा उपर गयी तो कमरे का दरवाजा अंदर से बंद मिला.. उसने झिर्री से अंदर झाँका.. बिस्तेर पर टांगे लंबी किए हुए साना ने अपने लोवर को घुटनो तक नीचे किया हुआ था और झुक कर वहाँ कुच्छ ढूँढ सी रही थी.. अचानक सलमा की हँसी सुनकर वह हड़बड़ाती हुई उच्छल सी गयी.. और झट से अपना लोवर उपर सरका लिया...

"क्या कर रही है बन्नो.. चल दरवाजा खोल!" सलमा ने हंसते हुए कहा...

"क्कुच्छ नही.. वो पॅड बदल रही थी..!" साना ने दरवाजा खोलते हुए कहा...

"हाअ? थोड़ी देर पहले तो ठीक थी तू.. 'डेट्स' आ गयी क्या?" सलमा जाकर बिस्तेर पर दीवार के साथ सिरहाना लगाकर बैठ गयी और अपना मोबाइल निकाल लिया...

"पता नही.. पर 'उसके' बाद थोड़ी थोड़ी देर में खून आ रहा है.. 'डेट्स' तो अभी 10 दिन पहले ही गयी हैं... ऐसा होता है क्या?" साना ने जिगयसा से पूचछा...

"मुझे तो नही हुआ था... छिल विल गयी होगी.. हो जाएगी ठीक.. अमन का फोन आया था.. मैं उसके पास कॉल कर रही हूँ.. एक बार...!" सलमा ने जवाब दिया...

"मैं नही जाउन्गि वहाँ.. आज के बाद!" साना ने उसके पास बैठते हुए कहा...

"क्यूँ? मज़ा नही आया क्या?" सलमा ने हंसते हुए पूचछा...

"वो बात नही है.. पर अब में किसी और के साथ 'ये' नही करूँगी!" साना ने निस्चय सा करते हुए बोला...

"क्यूँ.. ? प्यार हो गया क्या उस'से?" सलमा ने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए पूचछा....

"नही... बस ऐसे ही.. मेरा मन नही मान'ता..." साना ने कहते हुए नज़रें फेर ली...

"निकाह के बाद तो करना ही पड़ेगा ना..? फिर 2 से करो या 100 से.. क्या फरक पड़ता है अब?" सलमा ने अपना नज़रिया उसपर थोंपा...

"मैं निकाह करूँगी ही नही!" साना की आँखों में आँसू आ गये...

"आ.. तू तो सेंटी हो गयी यार.. भूल जा.. आजकल ये सब तो चलता ही रहता है.. इसमें शादी ना करने वाली कौनसी बात हो गयी... 'वो' क्या अब शादी नही करेगा?" सलमा ने उसको कंधों से पकड़ कर अपने सीने की और झुका लिया....

"मुझे उस'से क्या मतलब? छ्चोड़.. मुझे नींद आ रही है.." साना ने कहा और उसके सीने से हटकर दूसरी और करवट लेकर लेट गयी.....

सलमा कुच्छ पल उसको अजीब सी प्यार भरी निगाहों से देखती रही.. तभी अमन की कॉल दोबारा आ गयी...

"अमन.. तुम्हे पता है? आज तुम्हारे दोस्त ने हमारा रेप कर दिया...

"किसने? कब" अमन ने फोन पर आस्चर्य और गुस्सा सा दिखाते हुए वहाँ सबकी और देख कर बत्तीसी निकाली....

"मुझे नाम नही पता... पर जब तुम नीचे चले गये थे तो कोई दूसरा उपर आ गया था.. कहने लगा मैने तुम्हारी अमन के साथ मूवी बना रखी है.. और फिर ब्लॅकमेल करने लगा.. मजबूरन उसने जो कुच्छ कहा, हमें करना पड़ा... साना तो अब तक रो रही है बेचारी..." सलमा बात कर ही रही थी कि अचानक फोन पर सबको एक दूसरी आवाज़ सुनाई दी...," झूठ क्यूँ बोल रही है..? मैने तो अपनी मर्ज़ी से प्यार किया था उसके साथ... ज़बरदस्ती की होगी तुम्हारे साथ..."

"हां.. वो.. ज़बरदस्ती तो मेरे साथ ही की थी.. इसको पता नही क्या हो गया था अचानक.. ये भी बीच में कूद पड़ी.." सलमा ने अपनी बात से पलट'ते हुए कहा...

" पर यार.. तुम इतनी पागल कैसे हो? ऐसे कैसे कोई हमारी मूवी बना लेगा.. वो भी 2न्ड फ्लोर पर.. चल छ्चोड़ अभी.. इसको बाद में देखेंगे.. मुझे तुमसे एक बात पूछनी है..." अमन ने काम की बात करते हुए कहा....

"हुम्म.. बोलो जानू!" सलमा की टोन अचानक बदल गयी....

"ये.. तुम्हारे आसपास कोई 'नीरू' नाम की लड़की रहती है क्या?" अमन ने कहा...

"बड़े बेशर्म हो तुम.. मुझसे काम नही चलता क्या?" सलमा ने आवाज़ में गुस्सा सा लाते हुए कहा...

"क्यूँ? लड़कियाँ क्या सिर्फ़ इसी काम के लिए होती हैं..? तुम बताओ ना जल्दी...." अमन चिदता हुआ सा बोला....

"हूंम्म्ममम... ओके! किस एज की है..?" सलमा ने पूचछा...

अमन ने हाथ से इशारा करके रोहन से एज का आइडिया पूचछा.. और रोहन के 'ना' में गर्दन हिलने पर बोला," यही कोई.. तुम्हारी उमर की होगी...!"

सलमा ने अपना दिमाग़ चारों और दौड़ाया और बोली," ना.... हमारी उमर की क्या? मेरे ख़याल से तो किसी उमर की लड़की इस नाम की नही है कोई...!"

सलमा का जवाब सुनकर रोहन के अरमानो पर पानी सा फिर गया.. ," पक्का ये गवरमेंट. कॉलेज के पास ही रहती है ना...!"

सलमा ने उसकी आवाज़ सुन ली...," हां यार.. कुल मिलाकर 40-50 घर ही तो हैं यहाँ.. सब एक दूसरे को जानते हैं... कोई इस नाम की नही है यहाँ पर..."

"चल ठीक है.. अभी रखता हूँ.. कल बात करूँगा... ओके! बाइ" और अमन ने उसकी बात सुने बिना ही फोन काट दिया...

"मैने बोला नही था.. सपने सपने ही होते हैं यार.. जस्ट चिल आंड एंजाय दा लाइफ!" शेखर ने कहा....

अब किसी के पास बोलने को कुच्छ बचा नही था.. रोहन ने सोफे पर सिर टीकाया और आँखें बंद कर ली... वहाँ एकद्ूम सन्नाटा सा पसर गया....

"तूने ये क्यूँ बोला कि उसने रेप किया था..? अपनी मर्ज़ी से गयी थी मैं तो.. और तू भी तो बाद में अपनी मर्ज़ी से ही गयी थी उसके पास...!" साना ने सलमा के फोन रखते ही गुस्से से कहा....

"तो क्या हो गया? तू तो ऐसे कर रही है जैसे तुझे उस'से प्यार हो गया हो... उसके दोस्त ने भी तो बताया होगा उसको नीचे जाकर.. अमन क्या सोचता मेरे बारे में.. मैने तो उसको यकीन दिलाने के लिए कहा था कि हमने अपनी मर्ज़ी से वो सब नही किया.. उसने डरा दिया था हमको.. तू क्या सोच रही है? मुझे सी.डी. वाली बात पर यकीन हो गया था... मेरा तो दिल कर रहा था..पर तेरी वजह से शर्मा रही थी..." सलमा बोलकर मुस्कुराने लगी...

"चल छ्चोड़.. किस लड़की के बारे में पूच्छ रहा था अमन?" साना ने बात को टालते हुए कहा..

"वो!.. पता नही.. याद नही आ रहा.. पर अपने लिए नही पूच्छ रहा था.. किसी और ने पुच्छवाया होगा.. पर अपनी कॉलोनी में तो कोई नीरू... हां.. नीरू नाम की लड़की पूच्छ रहा था... अपने यहाँ नही है ना कोई...?" सलमा को बोलते बोलते नाम याद आ गया...

"अरे.. वो शीनू.. जो कोने वाले बड़े से घर में रहती है.. उसी का तो नाम है नीरू..!" साना कहते कहते बैठ गयी...

"अच्च्छा! ... पर तुझे कैसे पता? उसको यो सब शीनू ही कहते हैं... वो तो बहुत प्यारी है यार.. किसकी किस्मत जाग गयी? ... ना.. पर मुझे नही लगता ये बात होगी.. वो तो घर से ही बहुत कम निकलती है.. और लड़कों की और तो देखती तक नही.. वो नीरू नही होगी.. या फिर कोई दूसरी ही बात होगी.. इस चक्कर में तो कतयि नही पूचछा होगा अमन ने... पक्का नीरू ही है ना वो?" सलमा ने बोलते बोलते फोन निकाल लिया....

"अरे हां... पक्का पता है मुझे.. अपनी कॉलोनी में तो बस वही एक नीरू है.." साना ने ज़ोर देकर कहा....

"ठीक है.. एक मिनिट.. मैं अमन को बता दूं.." कहकर सलमा ने अमन का नंबर. डाइयल कर दिया.....

अमन ने फोन उठाकर देखा और वापस रख दिया....

"क्या हुआ? किसकी कॉल है?" शेखर ने अमन को कॉल रिसीव ना करते देख पूचछा...

"वही यार.. सलमा.. ये लड़कियाँ पका देती हैं फोन कर कर के.. नही? कयि बार तो रात के 2-2 बजे फोन करके पूछेन्गि," क्या कर रहे हो जानू? हा हा हा..." अमन हंसते हंसते रोहन का गमगीन सा चेहरा देख कर चुप हो गया," तो क्या हो गया यार...? हो जाता है.. तू इतना सेंटी क्यूँ हो रहा है? तेरे को एक से एक अच्च्ची लड़की मिल जाएगी.. टाइम पास के लिए भी और पर्मनेंट भी.. कहो तो आज ही बुलाउ एक टाइम पास.. मस्त लड़की है.. देखते ही घूँघरू बज़ेंगे दिल में..."

"हां.. बुला ले यार..!" रवि चहकते हुए बोला...

"तेरा भरा नही अभी भी.. एक का तो आज रिब्बन काटा है साले ने... बोल रोहन! क्या कहता है..?" शेखर ने रवि को दुतकरते हुए रोहन से पूचछा....

"सोना है मुझे..!" रोहन ने इतना ही कहा था कि अमन का फोन फिर बज उठा...

"क्या है यार? तुम्हे पता है ना की आज यार दोस्त आए हैं.. दोबारा फोन मत करना.." अमन ने कॉल रिसीव करते ही कहा...

"एक मिनिट.. एक मिनिट... वो नीरू है एक हमारी कॉलोनी में.. क्या करना था उसका..? सलमा ने कहा ही था कि अमन आस्चर्य और खुशी से उच्छलता हुआ खड़ा हो गया," व्हत? नीरू मिल गयी?"

अमन की प्रतिक्रिया सुन सबके चेहरे खिल उठे.. और वो सब भी अमन के साथ खड़े हो गये.. रोहन का चेहरा अप्रत्याशित रूप से चमक उठा...

सलमा उसके आस्चर्य को समझ नही पाई," ऐसा क्या हो गया?"

"पर पहले तुमने मना क्यूँ कर दिया था.. ?" अमन ने उसकी ना सुनते हुए अपना सवाल किया...

"वो यहाँ सब उसको शीनू कहते हैं.. मुझे नही पता था कि उसका असली नाम नीरू है.. अभी साना ने बताया..." सलमा ने अपनी बात पूरी भी नही की थी कि रोहन ने अमन के हाथ से फोन छ्चीन सा लिया," कककैसी है वो.. मतलब दिखने में..?"

"कौन हो तुम?" आवाज़ बदली देख सलमा ने पूचछा...

"मैं.. रोहन!" रोहन का कलेजा उच्छल रहा था.. बोलते हुए...

"क्यूँ? रिश्ता आया है क्या उसका.. तुम्हारे लिए?" सलमा ने सीरीयस होकर पूचछा...

"नही.. वो.. पर..!" रोहन की समझ में नही आ रहा था कि वो क्या बोले...

"नही? तो ऐसा करो उसका ख़याल भी अपने दिमाग़ से निकाल दो.. वो ऐसी नही है.. बिल्कुल अलग टाइप की है.. सारी लड़कियों से अलग.. तुम समझ रहे हो ना... वो कभी कभार ही घर से निकलती है.. सीधी कॉलेज जाती है.. सीधी आती है... लड़कों की तरफ देखती भी नही.. और ना ही कभी उन्हे अपने पास फटक'ने देती... वहाँ कोशिश करोगे तो अपना टाइम ही बर्बाद करोगे.. समझ गये..?" सलमा ने अपनी तरफ से कोई कसर नही छ्चोड़ी.. रोहन को समझने में...

"हुम्म.. पर दिखती कैसी है? ये तो बता दो..?" रोहन का मन अब भी ना माना...

"लड़कियाँ लड़कों के सामने दूसरी लड़कियों की तारीफ़ नही किया करती.. खास तौर से जब वो उस'से उपर हो.. हे हे हे.. ऑल दा बेस्ट! अमन को फोन देना..." सलमा ने कहा..

रोहन ने फोन अमन को पकड़ाया और सोफे पर जाकर बैठ गया... अमन ने फोन लेते ही कान से लगा लिया," हां...!"

"क्या मामला है? मेरी तो कुच्छ समझ में नही आया..." सलमा ने अमन से कहा...

"तुम इस बात को छ्चोड़ो.. तुम्हे मेरा एक काम करना होगा..." अमन ने सलमा से कहा..

"क्या?" सलमा ने पूचछा...

"नीरू को बताना है कि उस'से कोई मिलने आया है.. और हो सके तो उसको बुलाकर लाना है..." अमन ने कहा....

"नही यार.. मैं बता तो रही हूँ.. बुलाकर लाना तो दूर.. अगर उसके सामने इस तरह की बात भी कर दी तो बात घर तक पहुँच जाएगी..... मैं कुच्छ नही कर सकती... सॉरी..!" सलमा ने मायूस सा होकर कहा...

"सॉरी का क्या मैं आचार डालूँगा अब!" अमन ने गुस्सा होते हुए फोन काट दिया.....

ओये देखो ओये.. मेरे यार का चेहरा कितने दीनो बाद फिर से खिला है... अब तो नीरू भाभी को यहाँ से लेकर ही जाएँगे.. टीले पर.." रोहन के चेहरे पर खुशी देखकर नशे ने रवि का सुरूर और बढ़ा दिया...

"पर यार, सलमा ने तो सॉफ मना कर दिया.. हम उस तक पहुँचेंगे कैसे? आइ मीन.. बात कैसे करेंगे.. वैसे भी सलमा बता रही थी कि वो तो निहायत ही शरीफ लड़की है.. कोई ना कोई तो लिंक ढूँढना ही पड़ेगा...!" अमन ने अपने दिमाग़ पर ज़ोर देते हुए कहा...," चलो छ्चोड़ो.. अब आराम से सो जाओ.. कल सुबह देखेंगे..!"

"अमन भाई.. एक बार उसका घर पूच्छ लेते तो.. अभी जाकर देख आते...!" रोहन उतावला सा हो गया...

"कमाल करता है यार.. रात के 9:00 बजे.. और वो भी ऐसी लड़की जो बेवजह बाहर निकलती ही नही.. तुझे घर के बाहर मिलेगी.. तुझे शकल दिखाने के लिए..?" अमन ने अपनी बात ज़ोर देकर कही....

"नही वो... बस ऐसे ही.. बाहर से यूँही देख आते..." रोहन ने अपना सिर खुजाते हुए शेखर और अमन को देखा....

"चलो भाई.. गाड़ी बाहर निकालो.. भाभी जी का घर देख कर आएँगे... अभी के अभी.." नशे में झूमते हुए रवि खड़ा हो गया...

शेखर ने भी कंधे उचका दिए तो अमन खड़ा हो गया," चलो फिर.. बाहर की हवा खाकर आते हैं...

गाड़ी में चलते हुए अमन ने सलमा को फोन किया...," सलमा!"

"अब कैसे आ गयी मेरी याद जानू? दोस्त गये क्या?" सलमा ने अंगड़ाई लेते हुए सीधे लेट कर किताब अपनी छाती पर रखी और मस्ती सी करने लगी.. साना पास ही बैठी थी...

"मुझे थोड़ी जल्दी है.. वो नीरू के घर की लोकेशन बताना..?" अमन सीधे मतलब की बात पर आ गया...

"यहाँ आ रहे हो क्या?" सलमा खुशी से उच्छल पड़ी...

"हुम्म.. बताओ भी.."

"मुझे भी ले चलना अपने साथ..." सलमा की जवानी अंगड़ाई ले उठी...

"पागल तो नही हो.. कैसे ले जा सकता हूँ मैं?" अमन खिज सा उठा...

" उस दिन भी तो लेकर गये थे रात को.. साना यहाँ संभाल लेगी.. मुझे सवेरा होने से पहले छ्चोड़ जाना...लगता है तुम्हारा अब मुझसे मंन भर गया है.." सलमा का चेहरा उतर गया...

"यार, समझने की कोशिश करो.. मेरे दोस्त आए हुए हैं.. उन्हे छ्चोड़ कर... आज सब्र कर लो.. एक दो दिन में वादा रहा.. अब तुम मुझे जल्दी से नीरू का घर बता दो.. हम गवरमेंट. कॉलेज के पास पहुँच गये..." अमन ने आख़िरकार उसको वादा कर ही दिया...

"हमारा घर याद है ना?"

"हां...!"

"उसी गली में जब तुम हमारे घर की तरफ आओगे तो जो चौंक दूसरे नंबर. पर है.. उस चौंक के उपर ही उनका घर है.. बड़ा सा.. डार्क ग्रे कलर का पैंट है.. पर अभी वहाँ जाकर करोगे क्या?" सलमा ने घर बताने के बाद सवाल किया...

"ओक, बाइ थॅंक्स" अमन ने कहा और फोन काट दिया....

चौंक पर जाते ही अमन को सलमा के बताए अनुसार घर मिल गया.. दो गलियों से लगते हुए खूबसूरत 2 मंज़िला घर के दोनो ओर गेट थे..," ले भाई रोहन.. मिल गया नीरू का घर.. अब बोल क्या करना है?" अमन ने गाड़ी चौंक से पहले ही रोक दी...

नीरू का घर मिलने की बात सुनते ही रोहन सिहर सा गया.. उसकी धड़कने बढ़ने लगी.. उसको मन ही मन आभास हुआ जैसे वो पुराने टीले पर खड़ा है और नीरू दूर से उसको पुकार रही है.. रोहन ने घर देखते ही आँखें बंद कर ली.. पर नीरू की उसके दिमाग़ में जो तस्वीर उभरी, वह श्रुति की थी..," वापस चलो..!" रोहन के माथे पर पसीना छलक आया...

"अब क्या हुआ?" शेखर ने पूचछा...

"कुच्छ नही.. बस घर देखना था.. देख लिया.. चलो अब!" रोहन ने कहा और अमन ने चौंक से गाड़ी घुमा दी....

 
प्यार--9 एक होरर लव स्टोरी

" कहाँ है तू यार? कल सुबह से तेरा फोन ट्राइ कर रहा हूँ.. फोन ऑफ क्यूँ कर रखा है?" नितिन के पास जैसे ही सुबह उठते ही रोहन ने रवि के नंबर. से फोन किया तो वह खुशी से झूम उठा...

"वो.. फोन खो गया है भाई.. मैने आपको बताया तो था कि मैं रवि के साथ बतला जा रहा हूँ.. वहीं हूँ मैं अभी..." रोहन ने जवाब दिया...

"हां.. बताया था.. पर रवि का नंबर. मेरे पास कहाँ है.. घर भी गया था.. वहाँ से भी नही मिला.. तू पहले भी तो फोन कर सकता था.. पता है कितना परेशान हूँ मैं तेरे लिए.." नितिन ने ढीली आवाज़ में रोहन के लिए फ़िकरमंद होने का नाटक किया...

"पता है भाई! पर यहाँ आने के बाद समय ही नही मिला.. अभी सुबह उठते ही सबसे पहले आपको फोन किया है... पता है..." रोहन चहकति हुई आवाज़ में बोलने लगा था कि नितिन ने उसको टोक दिया..," सुन.. वो मैने श्रुति से सब उगलवा लिया है.. दरअसल तेरे सपने के पिछे और कोई नही.. वही है.. मैं उस तांत्रिक से भी मिल आया हूँ, जिसने उसकी मदद की.... तू अपना वहाँ छ्चोड़ और वापस आजा..!"

नितिन की बात ने रोहन को झटका सा दिया.. वह बौखलता हुआ सा बोला," पर... ये कैसे हो सकता है...?"

नितिन ने एक बार फिर उसको बीच में ही रोक दिया," हो सकता है नही यार.. यही हुआ है.. तू वापस आएगा तो मैं तुझे सब समझा दूँगा... पर यार उसकी नियत ग़लत नही है.. वो तुझसे बे-इंतहा प्यार करती है.. सच में... तुझ पर जान देती है वो.. कल जब बोल रही तो बिलख बिलख कर रो रही थी.. तुम्हारे लिए... अब तू जल्दी वापस आकर उस'से मिल ले.. फिर मैं घर वालों से बात कर लूँगा.. आ रहा है ना.."

"पर भाई.. मुझे यहाँ नीरू मिल गयी है.. और जैसा मुझे सपना आया था.. ठीक उसी जगह.. !" रोहन की इस बात ने नितिन के प्लान पर जैसे घाड़ों पानी डाल दिया..," ये कैसे हो सकता है?" वह आस्चर्य चकित तो हुआ ही था....

"हां.. भाई.. बिल्कुल उसी जगह उसका घर है.. एक बात और बताऊं.. मुझे सपने में भी अक्सर यही घर दिखाई देता था.. एक दम डिटो.. मुझे तो पसीना आ गया था वो घर देखा जब कल...!" रोहन ने अपनी बात पूरी की...

"दिखने में कैसी है?" नितिन मन मसोस कर बोला...

"मैने देखा नही है भाई.. पर सब पता कर लिया है.. उसका नाम नीरू ही है.. पर सब यहाँ उसको शीनू कहते हैं.. बहुत शरीफ लड़की है.. कभी घर से बाहर नही निकलती बेवजह.. और कहते हैं कि बहुत सुन्दर भी है..." कहते हुए रोहन की आँखें चमकने लगी....

"देख.. तू मुझे भाई कहता है.. इसीलिए बड़े भाई के नाते समझा रहा हूँ.. अभी के अभी वापस आ जा.. वरना किसी बड़े पंगे में फँस जाएगा... श्रुति कम सुंदर है यार? और मैं दावा कर सकता हूँ कि तेरी नीरू उस'से सुन्दर नही हो सकती.. तुझे इतना प्यार करती है कि क्या बताउ... और उसकी शराफ़त तो तू देख ही चुका है.. उसका कुसूर सिर्फ़ इतना ही है कि वो तुझसे पागलों की तरह प्यार करती है.. बस कहने से शर्मा रही थी....." नितिन अपनी बात के पक्ष में तर्क देता ही जा रहा था कि रोहन ने उसको टोक दिया...," पर भाई.. उसने तो मुझे पहले कभी देखा भी नही था.. फिर वो मुझसे प्यार कब करने लगी.. और मान लो मुझे कहीं देखा भी होगा तो बिना जाने मेरे लिए तांत्रिक वंतरिक के पास क्यूँ जाएगी.. बता..!"

नितिन ने इन्न बातों का कोई जवाब तैयार नही किया था.. उसके मन में तो यही था की रोहन को कोई नीरू मिलने वाली नही है.. और जैसे ही उसको वह बताएगा कि श्रुति ही वो सब कर रही थी.. वह उस पर विस्वास करके दौड़ा चला आएगा वापस..

"तू आएगा तभी तो बतावँगा ना.. यहाँ फोन पर कैसे समझाऊं.. बहुत लंबा मा'म्ला है.. चल रहा है ना आज ही...?"

रोहन की समझ में कुच्छ नही आ रहा था," मैं.. मैं थोड़ी देर बाद फोन करता हूँ भाई.."

"जैसी तेरी मर्ज़ी.. पर मैं इंतजार करूँगा तेरे फोन का..." नितिन ने फोन काटा और गुस्से और हताशा में बेड पर पटक दिया..," उसको आज फिर श्रुति से मिलने जाना था...

"क्या हुआ भाई!" रोहन के चेहरे पर असमन्झस के भाव देखकर रवि ने उस'से पूचछा...

"क्या बताउ यार.. कुच्छ समझ में ही नही आ रहा" और रोहन ने उसको नितिन के साथ हुई पूरी बात का सर सुना दिया....

"एक बात बोलूं?" रवि संजीदा होकर बोला....

"हां.. बोलो ना!" रोहन उसकी और देखने लगा...

"देख.. दिल से बड़ा कुच्छ नही होता.. तू अपने दिल की बात सुन.. और खुद डिसाइड कर.. नितिन भाई की बात मान भी लें तो फिर भी एक सवाल का जवाब तो नही मिलता ना!" रवि ने कहा...

"वो क्या?" रोहन ने गौर से उसकी तरफ देखा...

"वो ये कि अगर मान भी लें कि श्रुति तुम्हारे प्यार में ये सब टोटके करवा रही थी.. तो वो अपना नाम नीरू क्यूँ बताती.. श्रुति ना बताती.. और बतला का अड्रेस क्यूँ देती.. बोल.. सोचने की बात है कि नही.. और यहीं बतला में हमें नीरू मिल भी गयी है.. और उसका घर.. सबसे बड़ी बात तो उसका घर मिलना है.. जिसके बारे में तूने कल आकर बताया था कि तुझे सपने में वही घर दिखाई देता था.. इसीलिए तुझे डर कर पसीना आ गया..." रवि ने बात पूरी करके कहा," अब बोल.. क्या कहता है तेरा दिल...?"

"अपना फोन ऑफ कर दे!" कहकर रोहन मुस्कुराने लगा...," तुझमें इतनी अकल आई कहाँ से यार.. मैने तो ये सब सोचा ही नही.. फोन ऑफ कर दे.. अभी हमें वहीं चलना है.. नहा धो ले...!"

"कहाँ चलना है?" रवि ने पूचछा...

"वहीं यार.. मेरी ससुराल.. तेरी भाभी को देखकर आएँगे आज.. चाहे पूरा दिन वहीं बीत जाए..." रोहन हँसने लगा.. उसके चेहरे की खोई हुई रौनक लौट आई थी...

रोहन और रवि चौंक पर खड़े थे.. अमन और शेखर को उन्होने जानबूझ कर गली के कोने से ही वाहा भेज दिया.. खिड़कियों के अंदर लहरा रहे पर्दे, कॉपर कलर का गेट और दीवारों पर पुता रंग.. सब कुच्छ रोहन का जाना पहचाना सा था.. इसीलिए थोड़ा विचलित था...

"यार किसी ना किसी को तो बाहर आना चाहिए था... पता नही अंदर कोई है भी या नही...!" रोहन ने हताश होते हुए कहा...

"आ जाएगा यार.. यहाँ बैठकर आराम से मूँगफली ख़ाता रह.. कभी ना कभी तो भाभी जी दिख ही जाएँगी...." रवि ने कहा... एक मूँगफली की रेहदी के पास सामने वाले घर के चबूतरे पर दोनो बैठे थे...

अचानक घर के अंदर से आई आवाज़ ने दोनो को उच्छलने पर मजबूर कर दिया...

"नीरू बेटी.. मैं मार्केट जा रही हूँ.. आकर दरवाजा बंद कर ले...!"

"आई मम्मी... जाओ आप.. मैं कर लूँगी.. जल्दी आना.. मुझे टूवुशन जाना है.." बाहर बैठकर आवाज़ पर कान लगाए बैठे रोहन और रवि को अंदाज़ा लगाने में देर ना हुई कि बाद में आई निहायत ही सुरीली आवाज़ सिर्फ़ और सिर्फ़ नीरू की ही थी..," यार.. आवाज़ तो बड़ी प्यारी है.. भगवान करे.. शकल भी आवाज़ के मुताबिक ही हो...!" रवि ने दुआ की...

"पता है रवि.. जब हम बतला के लिए चले थे तो मैं सिर्फ़ यही सोच रहा था कि एक बार सिर्फ़ देख कर आना है.. कि मेरे सपने में कुच्छ सच्चाई भी है या नही.. सीरियस्ली नीरू से मुझे कोई लेना देना नही था... पर यार.. यहाँ की आबो-हवा, ये घर.. ये चौंक.. और ये आवाज़.. सब कुच्छ अपना सा लग रहा है यार.. ऐसा लगता ही नही कि ये सब मेरे लिए नया है... ऐसा लग रहा है जैसे.. यहीं पर रहने लग जाउ.. ये आवाज़ सुनता रहूं.. सच यार.. मुझे यहाँ बहुत अपनापन महसूस हो रहा है.. कोई तो बात होगी ना..? वो भी मेरा यूँही इंतजार कर रही होगी या नही? ... अगर उसने मेरी बात सुन'ने से सॉफ मना कर दिया तो...!" रोहन आँखों ही आँखों में कहीं और ही खोया हुआ था...

"अभी से इतनी लंबी मत सोच यार.. देख.. आंटी जी आ रही हैं... ये ही तेरी सासू मा है.. गौर से देख ले.." कहते ही रवि खड़ा हो गया और सिर झुका कर दोनो हाथ जोड़ लिए," नमस्ते आंटी जी!" रोहन घबराकर पलटी मार गया

"नमस्ते बेटा जी!" कहकर माताजी रुक गयी..," कुच्छ काम है बेटा?"

"नही.. बस आंटीजी.. यूँ ही.. आप बड़े हैं.. बुजुर्ग हैं हमारे.. बस इसीलिए..." रवि अभी भी हाथ जोड़े खड़ा था...

"भगवान तुम्हारा भला करे बेटा.. जुग जुग जियो!" कहकर माताजी मुस्कुराइ और आगे बढ़ गयी...

"ओये.. मरवाएगा क्या साले..? ऐसे क्यूँ टोका?" रोहन ने उनके जाते ही रवि को लताड़ लगाई...

"हे हे हे.. भाई.. मैं तो अभी से जान पहचान कर रहा हूँ.. शादी के बाद भाभी जी को लेने तुम्हारे साथ मुझे ही तो आना है.. और फिर देख.. आशीर्वाद भी मिल गया..!" रवि को रोहन की लताड़ से कोई फ़र्क़ नही पड़ा....

"तू भी घम्चक्कर है पूरा.. अगर आज नीरू नही दिखाई दी तो? इन्होने अब तेरा चेहरा भी याद कर लिया होगा.. आज के बाद मेरे साथ यहाँ मत आना....!" रोहन ने गुस्सा होते हुए कहा....

"छ्चोड़ ना यार.. आज के बाद यहाँ आना ही नही पड़ेगा तुझे.. बाहर ही मिलना भाभी जी से.. एक मिनिट.. मैं अभी आया...." रवि ने कहा और दरवाजे की और बढ़ गया...

"ओये रवि.. मरवाएगा क्या? कहाँ जा रहा है..? वापस आ..!" रोहन हड़बड़कर खड़ा हो गया...

रवि ने वापस मुड़कर बत्तीसी दिखाई और रोहन की परवाह ना करते हुए गेट पर पहुँच गया और बेल बजा दी....

तभी उसको गेट की झिर्रियों के बीच से लड़की के आ रहे होने का अहसास हुआ.. मन ही मन उसने भगवान को याद किया और गेट खुलने का इंतजार करने लगा....

"हां जी.. तूमम्म्म?" हां जी सिर्फ़ लड़की ने बोला था.. पर 'तूमम्म्म' दोनो के मुँह से एक साथ निकला... रवि दो कदम पिछे हट गया.. दरवाजे पर ऋतु खड़ी थी.. वही पतली और लंबी सुंदर सी लड़की जिसके साथ रवि की बस में और फिर कार में मुठभेड़ हुई थी.....

"आ.. आ.. हांजी.. पर आपका नाम तो ऋतु है ना?" रवि बौखलते हुए बोला...

"हां.. तो? यहाँ क्या लेने आए हो..? तुम्हे कैसे मिला ये घर..." ऋतु ने तुनक्ते हुए अपने दोनो हाथ कुल्हों पर जमा लिए....

"ववो.. हम तो.. ऐसे ही आ गये थे जी.. भटकते हुए.. माफ़ करना.. पर ववो.. कहाँ हैं?" रवि ने गिरते पड़ते अपनी बात पूरी की....

"वो कौन? तुम्हे चाहिए क्या?" ऋतु की आवाज़ तेज होकर अब रोहन के भी कानो में पड़ने लगी थी....

ऋतु के गुस्से से बोलते रहने के कारण रवि अभी तक संभाल नही पाया था..," ववो.. बभ.. भाभी जी!"

"कौन भाभी जी.. ? तुम्हारा दिमाग़ खराब है क्या? यहाँ कोई भाभी जी नही रहती... तुम आख़िर आए क्या लेने हो?" जैसे ही ऋतु ने उसको खरी खरी सुनाते हुए अपना हाथ आगे किया.. रवि को गजब का बहाना मिल गया," हमारा फोन! ओये रोहन.. आजा.. मिल गया तेरा फोन.. मेरा शक सही था.. इन्होने ही चुराया है.. शकल से ही पता लग रहा था... कि इन्ही का काम है?" रवि अब उसको हावी होने का मौका नही देना चाहता था..

"फोन?" रोहन की समझ में अभी तक नही आया था कि वो किसलिए गया था और अब क्या बक रहा है.. पर रवि के बुलाने पर वह मॅन ही मॅन उसको गलियाँ देता हुआ गेट पर ही पहुँच गया," क्या हुआ?"

"अरे.. तेरा फोन.. ये देख इसके हाथ में..!" रवि ऋतु के हाथ में रोहन के जैसा फोन देखा तो उसके सिर पर चढ़ने को उतारू हो गया...

अब हड़बड़ाने की बारी ऋतु की थी.. इस तरह से खुद पर गली में इल्ज़ाम लगते देख वह हड़बड़ा गयी..," हमें तो ये.. बस में मिला था...!" ऋतु की नज़रें झुक गयी...

"अच्च्छा.. बस में मिला था.. बस में तो मैं भी बैठा था... मुझे क्यूँ नही उठा लाई तुम.. बोलो.. कह देती मिल गया था बस में...!" रवि लगातार उसके सिर पर चढ़ता जा रहा था...

"चुप भी कर यार अब.. इतना बोलने की ज़रूरत क्या है?" रोहन ने उसको शांत करने की कोशिश की....

"क्यूँ ना बोलूं मैं? घर आए मेहमान को पानी पूच्छना तो दूर.. इज़्ज़त उतारने पर उतर आई ये...! इसको तो ये भी याद नही रहा कि कैसे मैने इनको लिफ्ट दिलवाई थी...." रवि की आवाज़ और ऊँची हो गयी....

"आ..आप प्लीज़ अंदर आ जाइए.. यहाँ तमाशा क्यूँ कर रहे हैं..?" ऋतु ने पूरी नज़ाकत के साथ कहा....

"नही.. हमें नही आना... " रवि बोल ही रहा था कि रोहन ने उसको पिछे से धक्का मारा," चल रहा हूँ ना यार.. धक्का क्यूँ मार रहा है.." और फिर ऋतु को घूरते हुए इस अंदाज में उस'से भी आगे बढ़ गया जैसे वो उनका नही, उसका घर हो...

"आ जाइए.. आप अंदर बैठिए.. मैं अभी आती हूँ..!" कहकर ऋतु उपर भाग गयी...

"तू इतना चिल्ला क्यूँ रहा था बे? मेरा पत्ता सॉफ करवाना है क्या?" रोहन ने अंदर जाकर सोफे पर बैठते ही रवि को कोसा....

"अच्च्छा.. तुझे मेरा चिल्लाना सुन गया.. उसका नही सुना किस तरह मेरी इज़्ज़त तार तार कर रही थी.. फिर मुझे उसके हाथ में तेरा फोन दिख गया.. मैं इतना सुनहरा मौका कैसे जाने देता.. हे हे हे!" रवि ने हंसते हुए अपनी छाती चौड़ी कर ली...

" ठीक है यार.. पर हम यहाँ नीरू के लिए आए थे.. भूल गया क्या?" रोहन ने शांत होते हुए कहा....

"ओह तेरी.. मैं तो सच में ही भूल गया था.. सॉरी यार.. अरी.. हम तो घर के अंदर आ गये.. देख!" रवि सोफे से उच्छल पड़ा....

"चुप.. कोई आ रहा है.." रोहन के कहते ही दोनो शांत हो गये....

और नीरू के कमरे में कदम रखते ही रोहन सुध बुध खोकर खड़ा हो गया और उसको अपलक देखने लगा.. हालाँकि वो इस परी को पहले देख चुका था.. पर अब की तो बात ही दूसरी थी... पटियाला हल्का नीला कढ़ाई वाला सूट डाले हुए वो सचमुच किसी परी से कम नही लग रही थी.. उसके अंग अंग से नज़ाकत टपक रही थी... रोहन का मन मयूर थिरक उठा.. हुश्न ऐसा की कुर्बान होने को दिल करे.. फिर रोहन तो उसको देखने से पहले ही अपना मान चुका था.. इस असीम खुशी को सहन नही कर पा रहा उसका दिल बल्लियों पर आ टंगा..

धीमे धीमे कदमों से नज़रें झुकाए हुए वो चलकर उनके पास आई और जैसे ही झुक कर उसने ट्रे टेबल पर रखी.. रेशमी बालों की एक लट उसकी आँखों के सामने लुढ़क आई...

खड़ी होकर उसने अपनी लट को कान से पिछे ले जाते हुए मधुर आवाज़ में आग्रह किया..," बैठिए ना...!"

रोहन तो खड़ा होकर जैसे बैठना ही भूल गया.. अपलक उसको देखते हुए बोला," जी.. थॅंक्स!" पर खड़ा ही रहा...

"अरे.. बैठिए तो सही.. ठंडा लीजिए...!" नीरू ने उसको फिर टोका....

"जी.. बैठ रहा हूँ..!" नीरू के चेहरे पर बरस रहे सौंदर्या के अनुपम नूर में रोहन इस कदर खो गया था कि इस बार भी खड़ा ही रहा... रवि ने उसका हाथ पकड़ कर खींच लिया.." बैठ जा यार...!"

"ओह हां..!" रोहन नीरू के मोह्पाश से जैसे अभी मुक्त हुआ...

"आप लीजिए हम आते हैं.." कहकर नीरू जाने लगी....

"आप ही नीरू भ.. जी हैं ना..!" रवि के मुँह से भाभी जी निकलता निकलता रह गया..

इतना सुनते ही नीरू चौंक कर पलटी...," आपको मेरा नाम कैसे मालूम? ये नाम तो कोई लेता ही नही.. यहाँ पर.. बचपन में था मेरा ये नाम...!" नीरू ने अचरज से रवि के मुँह की और देखा....," मेरा नाम अब शीनू है.. प्लीज़ दोबारा वो नाम मत लेना....

"देख लो जी.. हैं ना हम कमाल के.. हम तो आपके पिच्छले जन्मों की बात भी जानते हैं...!" रवि ने मुस्कुराते हुए कहा...

नीरू ने इस बात को मज़ाक में लिया.. रवि के मज़ाक को इज़्ज़त देने के लिए हल्का सा मुस्कुराइ और बाहर निकल गयी....

"कैसी लगी भाभी जी?" उसके जाते ही रवि ने रोहन के कंधे से कंधा भिड़ाया...

"ये तो मैने कभी सपने में भी नही सोचा था यार... इतनी सुंदर लड़की मैने आज तक नही देखी..!" रोहन सातवें आसमान पर था....

"देखी क्यूँ नही? उस दिन बस में नही देखी थी क्या?" रवि ने याद दिलाया...

"हां पर.. उस दिन मैने इस नज़र से नही देखा था यार.. बस एक पल के लिए ही नज़रें ठहरी होंगी इस पर...!" रोहन ने अपनी बात भी पूरी नही की थी कि ऋतु और नीरू दोनो कमरे में आ गयी," ये लीजिए आपका फोन..!"

"थॅंक्स.." फोन लेते हुए जैसे ही रोहन की उंगलियों ने नीरू के हाथ को स्पर्श किया.. उसके दिल के सभी तार मानो झंझणा उठे.. इतना जादू था उसके हाथों में...

तभी ऋतु भरभराती हुई बोल पड़ी," हमने चोरी नही किया था.. सीट के नीचे पड़ा था.. हमने सोचा सरदार जी का होगा.. हमने वहीं ड्राइवर को भी देने की सोची थी.. पर हमें लगा ये ठीक नही.. जिसका भी होगा वो फोन तो करेगा ही.. तभी उसको बता देंगे.. घर आकर देखा तो इसकी बॅटरी डेड हो चुकी थी.. हमारे पास चारजर भी नही था इसका... चाहो तो आंटिजी से पूच्छ लेना.. हमने आते ही उनको बता दिया था...."

"ओहो.. आप तो दिल पे ले गयी.. आपको पता है ना कि मेरी मज़ाक करने की आदत है.." रवि कहकर मुस्कुराने लगा....

"तुमसे कौन बात कर रहा है?" ऋतु ने गुस्से से कहा तो नीरू हंस पड़ी...

"ठीक है.. थॅंक्स.. हम चलते हैं.." कहते हुए रोहन उठ खड़ा हुआ...

बाहर निकलने से पहले रोहन ने मुड़कर देखा.. पर नीरू तो उसको छ्चोड़ने बाहर तक भी नही आई.. वह दूसरी ओर मुँह किए सीढ़ियाँ चढ़ रही थी.....

"अब क्या इरादा है बॉस?" सारी कहानी बड़ी दिलचस्पी से सुन'ने के बाद अमन ने रोहन से पूचछा....

"इरादा क्या होना है.. उसके सामने बार बार जाना है.. उसके दिल में उतर कर अपना बनाना है और साथ चलने के लिए मनाना है.. और क्या?" रोहन ने चहकते हुए जवाब दिया....

"मतलब आज से तू पूरा लड़कीबाज हो जाएगा.. हे हे हे!" रवि ने जुमला ठोंका...

"लड़कीबाज नही.. नीरुबाज बोल.. मैने आज तक किसी लड़की के बारे में ऐसा वैसा सोचा भी है.. बता?" रोहन ने जाकर उसकी गर्दन पकड़ ली...

"छ्चोड़ सा... जान लेगा क्या?" रवि अपने आपको छुड़ाते हुए बोला," तो कौनसा तीस्मारखा बन गया तू.. तेरे उपर मरने वाली लड़कियाँ तुझे 'नल्ला' समझने लगी होंगी अब तक हाँ.. हा हा हा!" रवि ताली बजाकर हँसने लगा...

"मेरी शराफ़त को कोई नल्लगिरी समझे तो समझे.. मैं तो शुरू से ही मानता आया हूँ कि अगर आदमी अपनी बीवी से वफ़ा की उम्मीद करता है तो उसको भी तो उसके लिए वफ़ादार होना चाहिए.. इंतजार करना चाहिए...!" रोहन ने तर्क दिया...और चार्जिंग पर लगाया हुआ अपना फोन ऑन कर लिया....

"एक दम सॉलिड बात बोली रोहन भाई.. पर लड़कियाँ कहाँ कुँवारी रहती हैं आज कल.. शादी से पहले ही भोंपु बज जाता है बहुतों का.. तू किस्मत वाला है जो तुझे नीरू मिल गयी..!" अमन ने भी बहस में ताल ठोनकी...

"अभी कहाँ मिल गयी यार.. अभी तो सिर्फ़ देखा है.. कहानी लंबी चलेगी लगता है!", शेखर ने पटाक्षेप किया...

"हुम्म.. डॉन'ट वरी रोहन.. जब तक तुम्हे मंज़िल नही मिल जाती.. तुम यहीं रहोगे.. मेहमान बनकर नही.. अपना घर समझकर.. मैं ज़रा बाहर जाकर आता हूँ.. एंजाय करो..!" कहकर अमन खड़ा हो गया...

"और मैं? मैं कहाँ रहूँगा...!" रवि ने मज़ाक किया...

"तुम सलमा की बाहों में रहो यार.. मेरा उस'से मन भर गया है.. बहुत पकाती है साली.. उसको संभलो तुम.. आज भी आने को बोल रही है.. बुला लूँ?"

"बुला लो यार.. नेक काम में देरी कैसी? हे हे हे" रवि ने ताल से ताल ठोनकी...

अमन बाहर निकला ही था कि रोहन का फोन बज उठा.. नितिन का नंबर. देख रोहन ने फोन उठा लिया," हां.. भाई.. वो नीरू मिल गयी..!"

"व्हत? क्या बकवास कर रहे हो यार..? ये कैसे हो सकता है..?" नितिन की फटी हुई सी आवाज़ फोन पर उभरी....

"हाँ भाई सच में... मैने उसको देख भी लिया है.. जैसा उसने मुझे सपने में बताया था.. बिल्कुल उसी जगह पर है उसका घर...!" रोहन रोमांचित सा हो उठा...

"मुझे यकीन हो गया है कि इस सपने के चक्कर में अपनी जिंदगी बर्बाद कर लोगे... मैने बताया तो था की सब कुच्छ श्रुति का किया धरा था.. और नीरू नाम की हज़ार लड़कियाँ दिखा सकता हूँ में.. क्या नाम के चक्कर में तुम किसी भी नीरू को अपना सब कुच्छ सॉन्प दोगे....?" नितिन का इशारा उसकी जायदाद की ओर था...

"पर भाई वो बहुत सुंदर है.. इतनी प्यारी है कि.. बस.. और नेच्रिवाइज़ तो और भी खास है.. और..." रोहन कुच्छ बोल ही रहा था कि नितिन ने बीच में ही टोक दिया," मैं वहीं आ रहा हूँ.. श्रुति भी मेरे साथ ही आ रही है..!" नितिन ने कहा....

"क्या? पर यहाँ कैसे? ... और वो श्रुति कैसे आ गयी...? तुम लोग रहोगे कहाँ?" एक ही साँस में आसचर्यचकित रोहन ने सवालों की झड़ी लगा दी....

"जहाँ तू रहेगा वहाँ हम नही रह सकते क्या? बाकी बातें आने के बाद बताउन्गा.. हम कल सुबह निकलेंगे.. घर से कुच्छ लेकर आना है ना..?" नितिन ने जल्दी में कहा....

"हां भाई.. मेरा पर्स लेते आना.. जल्दी में मैं घर ही भूल आया.. मेरे एटीएम वग़ैरह सभी कुच्छ उसमें है.. और हां.. 5-7 ड्रेस लेते आना.. पर श्रुति कैसे आ सकती है भाई.." रोहन की समझ में कुच्छ नही आ रहा था...

"बोला ना यार.. सबकुच्छ आकर बताउन्गा..!" नितिन ने कहते ही फोन काट दिया....

श्रुति उसके साथ ही बैठी थी..."मुझे बहुत डर लग रहा है.. बापू को अगर ये पता चल गया कि कॉलेज से कोई टूर नही जा रहा तो?" श्रुति का दिल बैठा हुआ था.. नितिन ने साथ चलने की बात जब से कही थी.. वह अंदर ही अंदर घुट रही थी..

"क्यूँ बेवजह अपना दिमाग़ खराब कर रही है..? इसका तुझे बतला में बहुत यूज़ करना है.. ले.. तेरा गाँव आ गया.. भूलना मत.. कल सुबह 8:30 पर.. यहीं.." कहते हुए नितिन ने उसकी जांघों पर चिकौती काट ली... श्रुति जैसे रो ही पड़ी थी.. पर आँसुओं को उसने सिसकियाँ ना बन'ने दिया... चुपचाप गाड़ी से उतरी और अपने घर की और चल पड़ी.. भारी भारी कदमों से...

अमन शहर के बीचों बीच धीरे धीरे गाड़ी चलते हुए आगे बढ़ता जा रहा था.. उसके मन में रह रहकर रोहन के अजीब से सपने को लेकर ख़याल आ रहे थे.. और सपना भी ऐसा जो सच हो गया... पूर्वज़नम होता है.. ये उसने बहुतों से सुना था.. पर इसको साक्षात सच होता हुआ वो पहली बार ही देख रहा था.. उसको रोहन की किस्मत पर नाज़ था और इसीलिए शायद उस'से लगाव सा भी हो गया था.. यादों के भंवर में उलझे अमन को अचानक अपने पहले प्यार की याद आ गयी और बरबस ही उसकी आँखों से आँसू छलक उठे.. कितनी प्यारी थी वो! एक दम फूल सी नाज़ुक.. दोनो को एक दूसरे से प्यार हो गया था.. पर इकरार कभी नही कर पाए.. वो उसको देख कर रह जाता.. और वो उसको देख कर रह जाती.. घर की मुंडेर पर खड़े होकर घंटों एक दूसरे को निहारते रहने का सिलसिला एकद्ूम बंद हो गया.. उस दिन अमन रात होने तक वहीं खड़ा रहा था.. अगले दिन जब उसको पता चला क़ि 'वो' अपने मा बाप के साथ शहर छ्चोड़कर चली गयी है तो अमन तड़प उठा.. 2 दिन तक खाना भी नही खा पाया.. कम से कम बता तो देती... पर हो भी क्या सकता था.. वो उसको रोक थोड़े ही लेता.. आख़िर उम्र ही क्या थी उनकी उस वक़्त.. पर प्यार उम्र देखकर थोड़े ही होता है.. 'वो' तो बस हो जाता है.. कहीं भी.. किसी से भी.. अचानक!

अचानक अमन ने गाड़ी साइड में रोकी और एक फोटोकॉपी निकाल कर पढ़ने लगा...

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"हाई अमन!

जिस दिन तुमने मुझे पहली बार छत पर खड़े देखा था.. शायद पहली बार देखा था... पर मैने पहली बार नही.. मैं तो तुम्हे कितने ही दीनो से गली में क्रिकेट खेलते हुए देखती आ रही थी.. अपने घर की खिड़की से तुम्हे छत पर खड़े हो पतंग उड़ाते हुए देखती आ रही थी... पतंग उड़ाते हुए तुम जब भी पिछे हट'ते हुए बिल्कुल मुंडेर के पास आ जाते थे तो मेरा नन्हा सा दिल धड़क उठता था.. कहीं तुम गिर ना जाओ.. मेरा तुम्हे पुकार कर वहाँ से हट जाने के लिए कहने को मन करता.. पर कभी आवाज़ ही नही निकल पाई.. तुम्हारा नाम लेना शायद मेरे वश में था ही नही.. और शायद मेरी किस्मत में भी नही...

तुम्हे याद है एक बार अंकल ने तुम्हे तुम्हारी छत पर आकर चांटा लगाया था.. (पता नही क्यूँ) तुम तो सिर्फ़ रोए थे.. पर मेरी चीख निकल गयी.. मेरी मम्मी दौड़ी हुई आई थी छत पर.. क्या बताती उनको?

साल पूरा होने को है.. तुम रोज़ छत पर आते हो.. पर हमेशा मुझसे लेट. हमेशा मैं ही तुम्हारा इंतजार करती हुई मिलती थी.. है ना? कयि बार तो तुम आधा आधा घंटा इंतजार करवा कर आते.. मेरा तुमसे रूठने को मन करता.. पर फिर मनाता कौन? तुम्हे देखकर ही इतना सुकून मिलता था कि हर रोज़ नीचे जाते ही अगले दिन की शाम का इंतजार करना मुश्किल हो जाता था.. तुमसे मिलने को इतनी तड़प रही थी कि सोते हुए तकिया सिर से निकाल कर सीने पर चिपका लेती थी.. पर तुम्हारा सीना कभी उस 'तकिये' की जगह नही ले पाया...

कितनी ही बार तुम्हारे आगे से गुज़री.. पर तुमने रोका ही नही.. कितनी ही बार जानबूझ कर तुम्हारी बॅटिंग या बॉलिंग के टाइम विकेट्स के बीच जाकर खड़ी हुई.. पर कभी तुमने टोका ही नही...
 
तुम्हे याद है जब एक दिन हम दोनो एक ही कलर की शर्ट पहन कर छत पर आ गये थे तो दोनो कितना हँसे थे..? कलर याद होगा ना? उसके बाद तुम्हारी सभी शर्ट्स के कलर मैने याद कर लिए थे.. रोज़ सोचकर पहनती और उपर आती की तुमने शायद यही कलर डाल रखा हो.. पर उसके बाद कभी कलर नही मिले.. एक दिन तुम्हारे उपर आते ही मैं भाग कर नीचे गयी थी.. पता है क्यूँ? तुम्हारी शर्ट के कलर का सूट डालने.. हे हे..

तुम आज शाम आए ही नही छत पर.. आज तो तुम्हारा आना सब से ज़्यादा ज़रूरी था.. आज मैं तुमसे कुच्छ बोलना चाहती थी.. पहली बार.. और शायद आख़िरी बार भी.. पर मेरी किस्मत में शायद था ही नही.. एक बार तुमसे बोलना.. तुमहरा हाथ पकड़ कर रोना.. और बताना कि आँखों ही आँखों में तुम मेरे क्या बन गये हो....

मैं कल जा रही हूँ.. हमेशा के लिए.. पापा का ट्रान्स्फर हो गया है.. अब छत पर नज़र नही आऊँगी कभी.. पर तुम्हे भूल भी नही पाउन्गि.. तुम भी नही भूलोगे ना?

तुम सुबह देर से उठते हो.. इसीलिए लेटर तुम्हारे दोस्त बबलू को देकर जाउन्गि.. उम्मीद है वो तुम्हे दे देगा..

कभी बोल नही पाई तुमसे.. बोलने का बड़ा मन करता था.. कभी मिल नही पाई.. मिलने का बड़ा मन करता था.. कभी कह नही पाई.. कहने का बड़ा मन करता था.. आइ लव यू!

मैं बिल्कुल भी नही रो रही.. तुम भी रोना मत प्लीज़!

तुम्हारी,

(नाम मिट गया था.. शायद आँसुओं ने मिटा दिया,)

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अमन कागज को वापस पर्स में रखते हुए मुस्कुरा उठा.. पर उसकी आँखें तो छलक आई थी.. मुस्कुराहट शायद बेबस आँखों को दिलासा देने के लिए ही आई होगी...

आँखों से आँसू पोंचछते हुए जैसे ही वो गवरमेंट. कॉलेज के सामने से गुजरा, उसकी नज़र बाबबलू पर पड़ गयी," ओये बाबबलू!" अमन ने चिल्लाकर उसको पुकारा..

बाबबलू भागा हुआ उसके पास आया और खिड़की खोलकर गाड़ी में बैठ गया," क्या चक्कर है यार.. आजकल अंदर ही अंदर रहता है?"

"तू बता पहले? यहाँ लड़कियों के कॉलेज के गेट पर क्या काम है तेरा.. नौकरी माँगने आया है क्या?" अमन ने मज़ाक किया...

"अरे नौकरी करें हमारे दुश्मन.. मैं तो लाइन मार रहा हूँ... हे हे!"

"किस पर.. कोई दे रही है क्या..... लाइन?" अमन हंसा...

"दे देगी यार.. मैं तो अपना कर्म कर रहा हूँ.. देना दिलवाना तो प्रभु के हाथ में है.. क्या पता किस घड़ी किसी नजनीन को तरस आ जाए.. मेरी भारी जवानी पर... हे हे हे.. बता ना.. कहाँ जा रहा है?" बाबबलू ने आख़िर में पूचछा...

"ओह तेरी भरी जावाअनी.. कहीं चलकर आना है.. तेरे कर्म तो फिर भी होते रहेंगे.. चलें?" अमन ने पूचछा...

"चलो यार.. कभी तुझे मना किया है?" बाबबलू ने बाहर निकल कर वक़ार को पुकारा," मेरी गाड़ी ले जाना भाई.." फिर बैठकर खिड़की बंद कर ली और गाड़ी चल पड़ी.....

"अरे आंटी जी.. कोई है क्या?" अमन ने एक घर के बाहर जाकर आवाज़ लगाई...

"कौन है?" अंदर से लगभग भागती हुई एक छर्हरे बदन की लंबी सी गोरी लड़की दरवाजे तक आते हुए बोली और अमन को देखते ही खुश हो गयी,"अमन! आज कैसे याद आ गयी इस घर की.. आज तो बारिश होनी चाहिए!" और खिलखिलाते हुए दरवाजा खोल दिया...," आओ!"

अमन और बाबबलू दोनो टहलते हुए घर के अंदर जा पहुँचे..," आंटी जी कहाँ है गौरी?"

"वो तो नही हैं.. शाम तक आएँगी.. कुच्छ काम था?" गौरी ने उनको पानी देते हुए कहा...

"नही.. कुच्छ खास नही था.. मैं फिर आ जाउन्गा.. अच्च्छा!" अमन ने पानी पीकर गिलास टेबल पर रखा और खड़ा हो गया... बाबबलू ने भी वैसा ही किया....

"अर्रे.. ये भी कोई बात हुई... अभी आए और चल भी दिए.. बैठो ना.. चाय लाती हूँ बनाकर.." गौरी हक़ सा जताते हुए दरवाजे पर खड़ी हो गयी...

"नही गौरी.. आज जल्दी में हूँ.. वो शेखर आया है.. ज़्यादा देर अकेला छ्चोड़ा तो बुरा मान जाएगा.. मैं बाद में आउन्गा..." अमन ने उसको समझते हुए कहा..

शेखर का नाम अमन के मुँह से सुनकर गौरी के कान खड़े हो गये.. अचानक ही अस्चर्य की एक मीठी सी लहर उसके चेहरे पर दौड़ गयी.. फिर संभालते हुए बोली," शेखर आया है? कब? उसको क्यूँ नही लेकर आए..? कितने साल हो गये उसे शकल दिखाए हुए..?"

"वो.. दरअसल कुच्छ और भी दोस्त हैं वहाँ.. उनको अकेला छ्चोड़ना तो बिल्कुल ही अच्च्छा नही लगता.. शाम को भेज दूँगा.. अगर आया तो.." गौरी की बाजू से बाहर निकलता हुआ अमन बोला..," दरवाजा बंद कर लो.. हम जा रहे हैं..."

"ठीक है.. " गौरी चहकति हुई उनके साथ आई और दरवाजा बंद करते ही बदहवासी में अंदर की और दौड़ पड़ी... अंदर जाते ही उसने फोन उठाकर एक नंबर. मिलाया...

"गौरी, मैं क्लास में हूँ.. बाद में बात करती हूँ..." खुस्फुसती हुई सी आवाज़ फोन पर उभरी...

"शिल्पा, सुन तो.. फोन मत रखना.. बाद में पछ्तयेगि नही तो?" गौरी ने कहा...

"क्या हुआ.. ? तुम्हारी साँसें तेज क्यूँ चल रही हैं.. सब ठीक तो है.." शिल्पा की आवाज़ अब भी बहुत धीमी थी....

गौरी ने आँखें बंद करके अपनी छातियो पर हाथ रखा और बढ़ चली धड़कनो को काबू में करने की कोशिश की," हां.. बस क्या बताउ...? सुन.. वो.. शेखर आया हुआ है...!"

"क्य्ाआआअ?" शेखर का नाम सुनकर शिल्पा भूल ही गयी कि वो क्लास में है.. फिर हड़बड़ते हुए उसने फोन को छिपाने की कोशिश की तो पूरी क्लास में ठहाका गूँज उठा...

"गेट आउट ऑफ दा क्लास!" लेक्चरर ने पढ़ाना छ्चोड़ उसको एक लाइन का आदेश सुना दिया...

पूरी क्लास उम्मीद कर रही थी कि शिल्पा अब माफ़ कर देने के लिए गिड़गिडाएगी.. सब उसी की और देख रहे थे.. पर उसका जवाब सुनकर सभी चौंक पड़े," थॅंक्स सिर.. थॅंक यू वेरी मच!" शिल्पा ने ये सब भागते भागते ही कहा और क्लास से गायब हो गयी.. क्लास में सन्नाटा छा गया.. सब आँखें फाडे लेक्चरर की और देख रहे थे और लेक्चरर आँखें फाडे दरवाजे की और...

शिल्पा ने भागते भागते ही गेट पर आते ही ऑटो पकड़ी और बिना तोल मोल किए बोली," जल्दी चलो.. सीधे..!"

"कहाँ है वो?" गिरते पड़ते संभालते शिल्पा गौरी के घर पहुँची.. बड़ी मुश्किल से धौकनी की तरह चल रही अपनी साँसों पर काबू पाने की कोशिश करती हुई वह अंदर पहुँची और गौरी के अलावा किसी को भी वहाँ ना पाकर खिन्न हो गयी...

गौरी लगातार उसकी और देख कर मुस्कुरा रही थी.. शिल्पा के सोफे पर पसरते ही वो बोली," पूरी बात सुन तो लेती.. मुझे पता था.. तुम अब सीधे यहीं आओगी...!"

"नही.. वो तो प्रोफेसर ने निकाल दिया.. पर है कहाँ शेखर?" टेबल पर रखे जग को उठाकर गतगत पानी पीते हुए वो बोली....

"अमन आया था.. उसी ने बताया कि शेखर आया हुआ है.. अभी वो उसी के पास है.. शाम को आएगा शायद...!" गौरी उठकर जग को फ्रीज़ के उपर रखते हुए बोली...

"कौन अमन?" शिल्पा ने पूचछा....

"अरे वही यार.. जो पहले हमारे घर के पास रहते थे... याद नही?"

"ओह हां... पर शेखर उसका दोस्त है क्या?" शिल्पा ने उत्सुकतावश पूचछा...

"हां.. वो तो बचपन से ही अच्छे दोस्त हैं.. तुझे अमन का नाम याद नही है.. शकल से ज़रूर पहचान लोगि..." गौरी ने बताया...

"अभी रहेगा क्या यहीं.. शेखर!" शिल्पा उठकर उसके पास आ गयी...

"मुझे क्या पता? उसी से पूच्छ लेना...!" गौरी शरारत से मुस्कुराने लगी....

शिल्पा ने अपने चेहरे पर तेर गयी शरम की लाली छिपाने के लिए तकिया उठाकर गौरी के मुँह पर दे मारा," क्या अब भी वो इतना ही शर्मिला होगा? 3 साल हो गये उसको देखे हुए... तुझे याद है जब एक बार हम हाइड आंड सीक खेल रहे थे तो ग़लती से वो उसी रज़ाई में घुस गया था जिसमें मैं छिपि हुई थी.. हे हे हे हे.. पता है कैसे उच्छल पड़ा था.. जैसे उसको किसी बिच्छू ने काट लिया हो.. उसके बाद वो कभी हमारे साथ नही खेला... मैं वो दिन कभी नही भूल सकती गौरी.. पूरी जिंदगी नही भूल सकती..." कहते हुए गौरी ने पिछे सिर टीका मंद मंद मुस्कुराते हुए आँखें बंद कर ली..

"हां.. तूने बताया था.. वो पूरा का पूरा तेरे उपर लेट गया था... !" गौरी ने कुच्छ और भी याद दिलाने की कोशिश की.. पर शायद शिल्पा तो पहले से ही उसी पल में खोई हुई थी... कैसे अंजाने में ही रज़ाई में घुसते हुए उसका एक हाथ सीधा शिल्पा की उभरती हुई छाती पर आकर जम गया था और उसके मुँह से कामुक सिसकी निकल गयी थी... पर वो झटका बिजली के झटके जैसा ही था.. जितनी तेज़ी से उसके हाथ ने उस के लड़कीपाने के अहसास को जगाया था.. उतनी ही तेज़ी से वो वापस भी हट गया.. और शिल्पा तड़प उठी थी.. वो तड़प आज तक उसके सीने में आग लगाए हुए थी.. पर उस आग को बुझाने के लिए उसको 20 की होने पर भी कोई और हाथ गवारा नही था.. उसको सिर्फ़ वही हाथ चाहिए था.. वो उस'से तब भी प्यार करती थी.. और आज भी करती है.. सिर्फ़ कभी बोल नही पाई थी...

"चार साल बाद!" आँखें बंद किए हुए ही शिल्पा के मुँह से निकला...

"क्या?" गौरी ने पूचछा...

"आज चार साल बाद वो मुझे दिखाई देगा.. भूल तो नही गया होगा ना...!" शिल्पा ने दोहराया.. और आँखें खोल दी...

"तुझे कैसे भूल सकता है वो? तू ही तो उस'से सबसे ज़्यादा झगड़ा करती थी.. और फिर मनाती भी तो तू ही थी... और भूल भी गया हो तो तू याद दिला देना.. रज़ाई वाली बात बताकर.. हे हे हे...!" गौरी हँसने लगी....

"वो फिर भाग जाएगा.. रज़ाई वाली बात याद दिला दी तो.. झेँपू कहीं का.. हे हे.. कितना प्यारा था ना वो.." शिल्पा की आँखें चमक उठी....

"था क्यूँ बोल रही है पागल... वो तो अभी भी है.." गौरी ने उसको टोका....

"हे हे हे.. पर क्या वो अब भी इतना ही क्यूट होगा.. लल्लूराम!" खुद ही कहकर शिल्पा खुद ही शर्मा गयी.. तकिया उठाकर अपने चेहरे को ढक लिया...

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यार.. मेरी तो समझ में नही आ रहा कि नितिन आख़िर यहाँ आ क्यूँ रहा है? और वो भी श्रुति को लेकर?" रोहन विचलित सा बैठा कुच्छ सोचते सोचते अचानक बोल पड़ा...

"अरे भाई इसमें इतना दिमाग़ खपाने वाली बात कौनसी है.. आ रहा है तो आने दे.. उसकी भी सुन लेना.. दिक्कत क्या है?" शेखर ने रोहन के पास बैठकर उसके कंधे पर हाथ रख लिया...

"वो बात नही है यार... पर वो रहेंगे कहाँ? नितिन को भी अड्जस्ट कर लेते.. पर श्रुति...!" बोलते बोलते वह अचानक रुक गया...

पास बैठा रवि मौके का फायडा उठाने से नही चूका," यार, लड़की की इतनी दिक्कत मान रहा है तो मैं रख लूँगा ना, अपने रूम में.. हे हे हे...!"

"तुझे इसके अलावा भी कोई काम है कि नही.. जब देखो..." रोहन बौखला सा गया...

"यार, इस बात को तो भूल ही जाओ.. इतनी बड़ी कोठी मैं क्या 6 लोग भी नही रह सकते..?" शेखर ने उसको फिर समझाने की कोशिश की...," अगर ज़रूरत हुई भी तो हम रूम शेर भी तो कर सकते हैं.. लड़की अकेली रह लेगी... क्या दिक्कत है.."

"वो बात नही है यार.. पहले ही आपने और अमन भाई ने हम पर अहसान कर रखा है...." रोहन बोल ही रहा था कि शेखर ने उसको प्यार से लताड़ लगाई..," तुमने खूब दोस्त माना भाई.. अहसान की बात कहकर तो मुझे शर्मिंदा ही कर दिया.. अमन को तुम ठीक से जानते नही हो.. यारों का यार है वो.. अगर तुम पूरी जिंदगी भी यहाँ रहना चाहो तो उसके चेहरे पर शिकन नही आएगी.. बुल्की वो तो और भी खुश होगा.. अकेला रह रह कर ही तो वो शराब का सहारा लेने लग गया.. उस जैसा 'दोस्त' ना मैने कभी देखा है.. और शायद ना ही तुम कभी देख पाओगे.. जस्ट रिलॅक्स आंड कॉन्सेंट्रेट ऑन नीरू, ओके?"

"ठीक है यार... पर मैं कोशिश करूँगा उन्हे जल्द वापस भेजने की..." रोहन ने कहा ही था कि अमन कमरे में आ गया," किसको जल्दी भेज रहे हो भाई?"

"वो यार.. मेरा एक दोस्त और आ रहा है कल.. एक लड़की भी है साथ में...!" रोहन ने जवाब दिया...

"अरे वाह.. फिर तो पार्टी होनी चाहिए यार... वो.. लड़की पर्सनल है क्या?" अमन ने कुच्छ रुककर पूचछा...

"नही यार.. वो ऐसी नही है.. बहुत ही शरीफ और भोली है.. उसके साथ कोई लाफदा नही प्लीज़... मुझे तो यही समझ नही आ रहा की नितिन उसको लाएगा कैसे? मतलब उसके घर पर क्या कहेगा....?" रोहन ने अमन की और देखते हुए कहा...

"शरीफ लड़कियों से तो मुझे वैसे ही डर लगता है भाई.. मैं तो चालू लड़कियों से ही काम चला लेता हूँ.. चल आने दे.. देखते हैं तेरी उस शरीफ और शर्मीली लड़की को भी.. आज का क्या प्रोग्राम है.. पार्टी करते होगे ना?" कहकर अमन हँसने लगा...," और तेरा क्या ख़याल है.. सलमा को बुलाउ कि नही.. रात को आने को बोल रही है?" उसने रवि की और आँख मारी....

"कितने बजे तक आ जाएगी..? हा हा हा!" रवि ने कहकर ठहाका लगाया...

उसकी बात का जवाब देने ही वाला था कि अमन को गौरी की बात याद आ गयी, उसने अमन की और देखा और बोला," गौरी याद है तुम्हे?"

"गौरी? ... अच्च्छा गौरी.. हा...हां.. याद है.. क्या हुआ?" शेखर को अचानक याद आ गया...

"तुम्हे बुला रही थी.. घर पर..! शाम को चले जाना... एक बार.." अमन ने कहा..

"मुझे? .. पर मुझे क्यूँ?" शेखर ने अचंभित होते हुए पूचछा...

"ये ले! ये भी मैं ही बताउन्गा.. कुच्छ चक्कर होगा तुम्हारा उसके साथ.. जाने से पहले...!" अमन ने चटखारा लिया...

"नही यार.. ऐसी तो कोई बात थी ही नही... जहाँ तक मुझे याद है.. और एक और भी तो लड़की रहती थी उनके साथ वाले घर में.. उम्म्म्म...शिल्पा!" शेखर को नाम अच्छि तरह याद था.. पर जान बूझ कर उसने याद सा करने का नाटक किया.. नही तो अमन उसकी अभी लेनी शुरू कर देता... 'रज़ाई' वाली बात वो भी आज तक नही भूला था.. आख़िर पहली बार उसने लड़की की नरम और गरम गोलाइयों को च्छुआ था.. पहला स्पर्श कौन भूल सकता है भला...

"हुम्म.. वो भी वहीं रहती होगी अब भी.. उसकी मम्मी को देखा था मैने.. गाड़ी से उतरते हुए.. उसके साथ कुच्छ पंगा था क्या?" अमन ने पूचछा...

"सबको अपने जैसा नंगा क्यूँ समझता है तू.. लड़की का नाम आते ही तुझे 'पंगा' नज़र आने लगता है.." शेखर कहते ही हँसने लगा....

"ठीक है.. चला जाएगा ना... चला जाना यार एक बार.. नही तो वो समझेगी मैने बोला ही नही होगा...!" अमन ने सीरीयस होते हुए कहा...

"हुम्म.. चला जवँगा...!" शेखर की आँखों में शिल्पा को देखने की ललक उभर आई थी.....

करीब 5 बजे एक गाड़ी गौरी के घर के सामने रुकी.. शेखर का पलकें बिच्छायें इंतजार कर रही शिल्पा की दिल की धड़कने अचानक बढ़ गयी,"गौरी, देख तो! आ गया क्या?"

"आया होगा तो अंदर ही आएगा.. वो क्या घर भूल गया होगा?" गौरी ने मज़ाक में कहा और खिड़की खोल कर बाहर झाँकने लगी....

शेखर ने गाड़ी से उतरते ही शिल्पा के घर पर निगाह डाली.. कोई नज़र नही आया.. बेताब निगाहों से बार बार उधर ही देखते हुए वो गौरी के घर के दरवाजे पर जाकर खड़ा हो गया.. अपने कपड़े दुरुस्त किए और धीरे से नॉक किया...

"आ गया.. जा.. तू ही उसका स्वागत कर..!" गौरी हँसने लगी...

"नही यार.. मुझे शर्म आ रही है.. जा ना.. जल्दी जा..!" शिल्पा ने हड़बड़ाहट में अपने आपको उपर से नीचे तक देखा.. उसका ध्यान सबसे पहले अपनी मस्त सुडौल चूचियो पर ही गया. 4 साल पहले से शेखर के हाथों के स्पर्श को संजोए उसके 2 छ्होटे अमरूद अब रसीले दानो वाले अनार बन चुके थे.. ब्रा ना होने की वजह से टॉप के उपर से ही दानो की सीधी नोक हल्की सी महसूस की जा सकती थी... "हाए राअं.. मैं क्या करूँ..?" आनन फानन में खुद से ही सवाल करती हुई शिल्पा शेखर को गौरी के साथ आता देख ड्रॉयिंग रूम के साथ वाले कमरे में छिप गयी...

शेखर को नज़र भर देखने से ही शिल्पा के दिल में हुलचल सी मच गयी.. कल तक जिसको वो लल्लूराम कहकर चिड़या करती थी, आज शारीरिक सौष्ठव और सौंदर्या में किसी फिल्मी हीरो से कम नही लग रहा था.. शिल्पा दरवाजे के पिछे च्चिप कर अपनी साँस रोक कर खड़ी हो गयी...

गौरी शेखर को शिल्पा के रूप में सर्प्राइज़ देना चाहती थी.. पर अंदर आते ही जब उसने शिल्पा को ही गायब पाया तो उसकी हँसी छ्छूट गयी....

"क्या हुआ?" शेखर ने बैठते हुए पूचछा..," अंकल आंटी जी नही हैं क्या?"

"नही.. कुच्छ नही..!" गौरी ने मंद मंद मुस्कुराते हुए कहा," मम्मी बाहर गयी हैं.. और पापा तो हफ्ते में ही आते हैं.. ये लो!" गौरी पानी लेकर आई थी..

"ओह थॅंक्स.. यहाँ तो कुच्छ भी नही बदला.. सब कुच्छ वैसा का वैसा ही है..!" शेखर शिल्पा के बारे में पूच्छने के लिए भूमिका बनाने लगा...

"पर तुम तो बहुत बदल गये हो शेखर.. मॉडेलिंग की तैयारी कर रहे हो क्या? हे हे हे..." गौरी ने उसके सामने बैठते हुए अपरोक्ष रूप से शेखर के डील डौल और शकल सूरत की सराहना की...

"अरे नही यार.. कहाँ मॉडेलिंग? इंसान तो बदलते ही रहते हैं.. वक़्त के साथ.." शेखर ने दार्शनिक नज़रिए से कहा....

"सच! पर अगर कोई अब तक भी नही बदला हो तो?.." गौरी के चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान तेर गयी...

"क्या मतलब? शेखर सचमुच कुच्छ नही समझा था...

"एक मिनिट.." कहकर हंसते हुए गौरी अंदर गयी और दरवाजे के पिछे खड़ी शिल्पा को पकड़ कर बाहर खींचने लगी... शिल्पा लज्जा से मरी जा रही थी," आ.. छ्चोड़ मुझे.. प्लीज़.. छ्चोड़ दे ना..!"

 
पर गौरी पर शिल्पा की अनुनय का कोई असर नही हुआ.. ज़बरदस्ती खींचने की वजह से इस आपा धापी में शिल्पा का टॉप उसकी नाभि तक उपर खींच गया.. एक दूसरे से खींचतान में लगी दोनो लड़कियाँ जैसे ही शेखर के सामने आई.. उसकी तो मानो धड़कन ही थम गयी..पहली ही नज़र में उसने शिल्पा को पहचान लिया... लंबे काले खुले हुए बालों में उसका चेहरा बादलों की आड़ में छिपे चाँद की सुंदरता को भी मात दे रहा था.. पूरा का पूरा बदन यौवन रस से लबरेज और एक दम लचीला था... शेखर का ध्यान उसके नाभि स्थल पर भी गया.. पेट इतना चिकना और पतला था कि उसकी नशें भी बारीक रेशों के रूप में बाहर द्रिस्तिगोचर हो रही थी.. वो तो पूरी की पूरी ही चिकनी थी.. एकदम मस्त!

जैसे तैसे खुद को छुड़ा कर शिल्पा वापस अंदर भाग गयी... गौरी हान्फ्ते हुए बाहर आई," पहचाना इसको?"

"हां.. शिल्पा थी ना?" शेखर ने जवाब देने के साथ ही उसका कन्फर्मेशन भी लेना चाहा...

"हूंम्म.. बाहर आओ ना.. शिल्पा.. ये क्या बचपाना है?" गौरी ने बाहर से ही उसको प्यार भरी फटकार लगाई...

"एक मिनिट.. अंदर आना गौरी.." शिल्पा ने आवाज़ लगाई...

अंदर जाते ही गौरी ने हुल्के स्वर में उसको डांटा," क्या है ये? क्या समझेगा वो.. तू कोई बच्चि नही है अब.. चल बाहर..."

"बच्ची नही हूँ, तभी तो!" शिल्पा ने मन ही मन कहा और बोली," एक मिनिट.. यहाँ तेरी कोई ब्रा है क्या? मैं जल्दी में पहन'ना भूल गयी.." उसने सकुचते हुए कहा...

"कुच्छ नही होता.. सब ठीक है.. तू आ ना.." गौरी ने उसका हाथ पकड़ा और बाहर खींच लाई...

शिल्पा का चेहरा देखने लायक था.. वह आकर बैठ तो गयी थी पर शेखर से नज़रें नही मिला पा रही थी... यूँ ही पलकें झुकाए वह अपनी दोनो छातियो के उपर से एक हाथ ले जाकर अपनी दूसरी बाजू को पकड़े रही...

"हेलो!" शेखर ने ही उसका मौन तोड़ने की कोशिश की...

"हाई!" बोलते हुए शिल्पा ने अपनी पलकों को उठाने की कोशिश की पर शेखर से नज़रें मिलते ही हया के बोझ से वापस झुक गयी," कैसे हो? शेखर!"

"नज़रें उठाकर खुद ही देख लो ना, कैसा हूँ! हा हा हा" शेखर ने मज़ाक किया...

"मैं एक मिनिट में आई.." कहकर गौरी वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गयी...

"तुम तो एकद्ूम बदल गयी हो शिल्पा.. ये सब कैसे हुआ..?" शेखर ने गौरी के जाते ही उसको छेड़ा....

शिल्पा को महसूस हुआ कि शेखर उसके उरजों में बदलाब की ही बात कर रहा है शायद.. वह ऐसा कहते ही और भी ज़्यादा सिकुड गयी," और सूनाओ! क्या करते हो आजकल.. काफ़ी स्मार्ट हो गये हो.. पहले जैसे नही रहे.. लल्लूराम!" कहते ही शिल्पा ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया.. धीरे धीरे उसकी झिझक खुल रही थी...

"तुम भी तो शादी के लायक हो गयी हो.. कोई लड़का देखना है क्या?" शेखर की इस बात ने उसके जज्बातों को झनझणा दिया.. वह भड़कना चाहती थी.. पर भड़क नही पाई... पहले भी शेखर अक्सर यही मज़ाक उसके साथ किया करता था.. पर उस वक़्त तो वो कहने के साथ ही रफूचक्कर हो जाता था.. वरना उसको पता होता था कि शिल्पा रो रो कर.. सारे मोहल्ले को खड़ा कर लेगी....

"तुम बिल्कुल वैसे ही हो!" शिल्पा ने रूठने की आक्टिंग करते हुए अपने रसीले होंटो को बाहर निकाल लिया.. पर मुस्कान को अपने चेहरे से हटा नही पाई.. और ना ही नज़रें उठा पाई....

"पर तुम अब वैसी नही रही शिल्पा.. तुम तो शरमाने लगी हो... अब तो झगड़ा भी करना बंद कर दिया है शायद.. वरना इस बात पर तो मेरे उपर चढ़ कर बालों को नोचने लग जाती.." शेखर ने मुस्कुराते हुए कहा...

क्या कहती शिल्पा, उपर तो वो अब भी चढ़ना चाहती थी.. पर बदन पर यौवन का बढ़ा हुआ वजन उसको आगे बढ़ने से रोक रहा था...," कितने दिन हो अभी.. यहाँ पर...?"

"पता नही.. सोचकर तो हफ्ते भर की आया था.. देखते हैं... " शेखर ने बात पूरी भी नही की थी कि गौरी अपनी मम्मी के साथ अंदर आती हुई दिखाई दी.. ये दोनो की पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए एक दूसरे के नज़दीक आने की कोशिशों पर विराम जैसा था.. दोनो सामान्य हो गये...

"नमस्ते आंटी जी..!" शेखर ने खड़े हो उसका अभिवादन किया...

"नमस्ते बेटा.. बड़े दीनो बाद याद किया अपना शहर.. अरे कुच्छ खाने पीने को भी दिया है कि नही तुम लोगों ने!" आंटी जी ने पूचछा....

"वो.. मैं ठंडा लेने ही गयी थी मम्मी.. अभी देती हूँ....

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अमन की कोठी पर उपर बेडरूम में बैठी साना अमन को अंदर आते देख चौंक गयी और खड़ी होकर एक कोने में जा सिमटी...

"क्या हुआ साना, मेरी जान? तुम्हे मुझसे क्या नाराज़गी है?" अमन ने छक कर पी रखी थी... बिस्तेर पर बैठते ही उसने उंगली का इशारा कर साना को अपने पास बुलाया...

"पर.. पर तुमने कहा था कि तुम मेरे पास नही आओगे.. तुमने वादा किया था!" साना नज़रें झुकाए कोने में ही खड़ी रही....

"छ्चोड़ो ना ये वादे कस्में.. आओ ना डियर.. प्यार करते हैं.. लेट'स मेक लव, कम ऑन बेबी!" अमन अब भी बिस्तेर पर ही पसरा हुआ था....

"नही.. मुझे नही करना प्यार.. तुम प्लीज़ जाओ यहाँ से..." साना ने हाथ जोड़ लिए...

"कमाल है यार... प्यार नही करना तो रात को छुप कर घर से आने का ख़तरा क्यूँ मोल लिया.. वहीं सो जाती आराम से... बोलो?"

इस बात का साना के पास भी कोई जवाब नही था... ," ठीक है.. मुझे घर छ्चोड़ आओ.. सलमा कहाँ है? उसको बुला दो प्लीज़ एक बार.." साना लचर सी वहाँ खड़ी थी....

"सलमा रवि के साथ ऐश कर रही है जानेमन.. उसने मुझे सब बता दिया है.. वो तुमको लाना नही चाहती थी..मैने भी तुम्हे नही बुलाया.. पर तुम ज़बरदस्ती करके आई हो.. अब प्राब्लम क्या है?" अमन खड़ा होकर उसके पास आ गया....

साना कोने में और ज़्यादा दुबक गयी.. वह नही चाहती थी की अमन उसको हाथ भी लगाए," हां.. पर मैने बोल दिया था कि तुम मेरे पास नही आओगे... पूच्छ लो उस'से....!"

"अब ये तो हद हो गयी यार.. मैं तुम्हारे पास आता भी नही.. पर वो सलमा ने बोला कि तुम सेक्स करना नही चाहती तो रवि उसी के बेडरूम में घुस गया.. तो फिर मैं क्या अपने हाथ में लेकर हिलाता रहता.. एक बात बताओ.. आज तक मैने तुम्हे हाथ लगाया है?"

साना ने अपना सिर झुकाकर इनकार में हिला दिया....

"मैने आज तक किसी के साथ ज़बरदस्ती नही की.. हालाँकि मुझे तुम पहले दिन से ही प्यारी लगती हो.. पर तुम्हे तुम्हारी मर्ज़ी के खिलाफ छ्छू कर भी नही देखा मैने.. सच तो ये है कि मैने सलमा से दोस्ती भी तुम्हारे ही कारण की थी.. ताकि तुम्हे हासिल कर सकूँ... पर देख लो.. आज 6 महीने के करीब हो गये हैं.. तुम यहाँ 3-4 बार आ चुकी हो... तुमने मुझे हाथ लगाने की इजाज़त नही दी और मैने कभी लगाया भी नही.. है ना...?" अमन अब भी उसके ठीक सामने खड़ा था...

"आ..हां!" साना सकुचती हुई बोली....

"पता है क्यूँ?" अमन ने फिर सवाल किया...

साना ने नज़रें उठाकर झुका ली.. पर कोई जवाब नही दिया....

अमन ने उसको अपनी गोद में उठा लिया.. वो च्चटपताई; पर बलिशट हाथों में कुच्छ और ना कर सकी.. अमन ने उसको बिस्तेर पर ले जाकर लिटा दिया.. पर उसके छ्चोड़ते ही वह उठ कर खड़ी हो गयी..

"क्यूंकी तुम्हारा नाम मुझे किसी की याद दिलाता है.. जो मेरे दिल में उतर गयी थी.. और जिसके चाहने के बावजूद मैं उसको कभी छ्छूकर नही देख पाया... हम यूँही जुदा हो गये.. एक दूसरे को देखते देखते.... मैं एक बार 'साना' को पाना चाहता हूँ.. पर ज़बरदस्ती नही..." अमन नशे में भावुक हो गया और उसकी तरफ कमर किए खड़ी साना को बिस्तेर पर बैठे बैठे ही अपनी बाहों में भर लिया.. साना के नितंब अमन की छाती से लगते ही थिरक उठे.. इस थिरकन को अमन ने भी महसूस किया और साना ने भी....

"पर... पर मैं तुम्हारी साना नही हूँ... सिर्फ़ नाम मिलने से क्या होता है...?" साना तड़प सी उठी और अपने आपको उसके बहुपाश से छुड़ाने की कोशिश में उसकी और ही घूम गयी..उसको अमन की आँखों में आँसू तैरते नज़र आए...

"ठीक कहती हो.. नाम मिलने से कुच्छ नही होता... पर कुच्छ भी ना मिलने से कुच्छ मिल ही जाए, तो बेहतर है.. और तुम्हारा नाम ही नही मिलता उस'से.. तुम्हारी आँखें भी मिलती हैं.. इनमें जो कशिश है वो मैने बहुत पहले साना की आँखों में देखी थी.. तुम्हारी आँखें मुझे अपनी और खींचती हैं.. जैसे कभी उसकी आँखें खींचती थी... मेरा जर्रा जर्रा उस पल को कोसता है जब वो अपने घर में अकेली थी.. और मुझे उसने इशारे भी किए.. पर मैं कभी उन इशारों को समझ नही पाया.. उसको कभी छ्छू नही पाया... मुझे एक बार साना को छ्छू कर देखने दो प्लीज़.. दोबारा कभी नही बोलूँगा...." अमन ने साना को अपनी और खींचा और उसकी चूचियो के बीच चेहरा घुसा दिया..

अमन की नशीली साँसों को अपने सीने में पेबस्त होता देख साना के शरीर में अजीब सी खलबली मच गयी.. पर वह अपने आपको संभाले हुए थी....," अब तो छ्छू लिया ना.. छ्चोड़ दो प्लीज़.. मैं और आगे बढ़ना नही चाहती....छ्चोड़ दो मुझे.." वह अपने आपको च्छुदाने के लिए छट-पटाने लगी.. और अपने हाथ अमन के चेहरे पर लगा उसको पिछे धकेलने लगी....

अमन उसकी इस हरकत पर बौखला उठा.. नशे का सुरूर तो था ही," तूने मुझे समझ क्या रखा है लड़की.. मैं 6 महीने से तेरा इंतजार कर रहा हूँ.. और तू नखरे करती जा रही है... रवि का तूने पहले ही दिन पूरा का पूरा अपनी चूत में उतरवा लिया.. और सलमा बता रही थी कि तू खूब मज़े से उच्छल रही थी.. मेरे साथ क्या दुश्मनी है तुझे..?" अमन उसकी कमर पर टिकाए हुए अपने हाथों को नीचे ले गया और उसके मदमस्त किसी तरबूज की तरह बाहर उभरे हुए उसके नितंबों को दोनो हाथों में पकड़ कर मसालने लगा....

साना सिसक उठी.. उसकी हालत खराब होती जा रही थी.. हालाँकि उसके पास अमन के सवाल का कोई जवाब नही था.. फिर भी वो यही चाहती थी की अमन उसको छ्चोड़ दे," प्लीज़... अया.. ऐसा मत करो.. छ्चोड़ दो मुझे...प्लीज़!"

पर अमन के हाथ नही थामे... नितंबों को हथेलियों से मसालते हुए अब उसकी उंगलियाँ दरार के बीचों बीच सलवार और पॅंटी के उपर से उसको काफ़ी अंदर तक कुरेदने लगी थी.... साना की सिसकियाँ अब उसके विरोध के साथ साथ सुनी जा सकती थी...," क्यूँ नही.... छोड़'ते हो मुझे.. जब मैं कुच्छ.. आआहह.. आअहह.. करना ही नही चाहती..... छ्चोड़ो ना..!" साना मचल उठी और उसके हाथ अब अपने गुदज नितंबों को अमन की क़ैद से मुक्त करवाने की कोशिश कर रहे थे....

"ना.. आज तुझे छोड़ूँगा नही बुल्की प्यार से चोदून्गा... आज या तो तू नही या मैं नही.. अगर तू कुँवारी होती तो मैं तुझे तेरी मर्ज़ी के खिलाफ कभी हाथ ना लगाता... पर जब रवि पहले ही दिन तेरी गांद मार सकता है तो फिर मुझसे तुझे क्या दिक्कत है..." अमन की भाषा भी उसकी हरकतों की तरह अश्लीलता की हदों को पार करती जा रही थी.. सब नशे का असर था....

साना ने अपने आपको च्छुदाने का भरसक प्रयास किया, पर सफल ना हो सकी.. ज़ोर लगाते हुए जब उसने महसूस किया की अमन की उंगलियों की पकड़ भी उसकी कोशिशों के साथ बढ़ती जा रही है तो उसने मजबूरन अपने आपको ढीला छ्चोड़ दिया..," मान जाओ ना.. अमन.. प्लीज़.." उसने अपने हाथ अमन के कंधों पर टीका लिए...

"पर क्यूँ साना? जब रवि कर सकता है तो मैं क्यूँ नही..?" अमन तड़प कर बोला.. उसने साना के नितंबों को छ्चोड़ कमर से उसको पकड़ लिया...

"एम्म..मुझे नही पता.. पर मैं तुमसे प्यार नही कर सकती.. सॉरी अमन.. तुम बहुत अच्छे हो.. पर.. प्लीज़.. समझने की कोशिश करो..!" साना ने उसको प्यार से बोलकर मनाने की कोशिश की...

"मैं ये थोड़े ही कह रहा हूँ कि मुझसे प्यार करो.. मैं तो.. मैं तो तुम्हारे बेपनाह हुश्न में बस एक बार उतर कर देखना चाहता हूँ.. और तुम्हारे हर इनकार के साथ मेरी लालसा और बढ़ जाती है.. एक बार मुझे मनमर्ज़ी करने दो.. फिर नही टोकंगा...." अमन ने तर्क दिया...

"मैं.. इसी प्यार की बात कर रही हूँ.. मैं तुम्हारे साथ ये सब नही कर.. करना चाहती.. समझने की कोशिश करो...!" साना जाने क्या समझाने की कोशिश कर रही थी....

"ठीक है.. मैं तुम्हारी आधी बात मान लेता हूँ.. आधी बात तुम मेरी मान लो.. बोलो मंजूर है?" अमन ने उसको छ्चोड़ दिया...

"क्क्या?" साना असमन्झस से उसकी आँखों में देखने लगी...

"मुझे तुम्हारा बदन देखने दो.. जी भर कर.. छ्छूने दो.. मैं आगे नही बढ़ूंगा.. अगर तुम्हारी मर्ज़ी नही होगी तो..!"

"नही!" साना इस बात के लिए भी तैयार नही थी....

"नही तो फिर मुझे दोष मत देना.. अब कुच्छ भी हो सकता है..!" अमन ने खड़ा हो अपनी शर्ट और बनियान उतार फैंकी..और उसकी और बढ़ा... गतीले बदन पर उसका फड़कता हुआ सीना साना को अहसास करा रहा था कि ज़बरदस्ती कुच्छ भी हो सकता है.. और वो कुच्छ नही कर पाएगी...

"एक.. मिनिट... ठीक है.. पर..." साना डरकर बोली...

"अब पर वर कुच्छ नही.. मंजूर है तो कपड़े निकालो.. वरना मैं इन्हे चीर दूँगा...!" अमन की आँखें गुस्से, ज़ज्बात और वासना में से लाल हो चुकी थी...

साना के पास विरोध करने के लिए अब कोई रास्ता बचा भी नही था.. 2 दिन पहले ही तो वो इसी रूम में रवि के साथ हुमबईस्तेर हुई थी.. एकद्ूम अंजान लड़के के साथ.. अब मना करती तो कैसे करती.. गनीमत थी कि अमन 'कम कीमत' पर राज़ी हो गया था.. वरना वह तो हिम्मत छ्चोड़ ही चुकी थी... उसने अपने कमीज़ के पल्लू पकड़े और आख़िरी बार अमन की आँखों में देखते हुए रहम की भीख सी माँगी...

"क्या सोच रही हो.. निकालो भी अब!" अमन तरस रहा था उसके अल्हड़ जिस्म को देखने के लिए...

साना ने एक लंबी साँस ली और घूम गयी.. अपनी लचीली कमर अमन की और करते हुए उसने अपना कमीज़ उतार कर अपनी छाती से लगा लिया...

"वाउ! सो नाइस... !" अमन उसके फिगर का दीवाना सा हो गया..गोरी और चिकनी उसकी कमर मुश्किल से 28" की होगी... अमन ने नंगी कमर को हाथों में पकड़ा.. और अपनी तरफ खींच लिया.. लड़खड़ाते हुए साना उसकी जांघों में जा बैठी.. अमन का तना हुआ लंड पाजामे के अंदर से ही साना के नितंबों के बीच फुफ्कारने लगा.. साना असहाय सी अपने दिमाग़ पर वासना के भूत सवार होने से रोकने की कोशिश करती हुई बोली," आ..तुमने सिर्फ़ देखने को बोला था...!"

अमन ने उसको और पिछे खींचते हुए उसकी नंगी कमर को अपने नंगे जिस्म से सटा लिया..," मैने देखने और छ्छूने की बात कही थी साना.. भूल गयी?" कहते हुए उसने अपने होन्ट साना की कमर पर चिपका दिए.. साना सिसक उठी..," आ.. नही प्लीज़.." बोलते हुए साना ने उचक कर अपने नितंबों को अमन के फड़फदते कहर से बचाने की कोशिश की.. पर दोबारा फिसल कर वहीं आ गयी...

अमन ने अपने हाथ आगे ले जाते हुए साना की चूचियो को पकड़ने की कोशिश की.. पर साना वहाँ अपने हाथों की कुंडली मारे बैठी थी...," अब क्या....?" साना बोलती बोलती रुक गयी....

"देखो.. बगैर छ्छूकर देखे तो मैं मान'ने वाला हूँ नही.. ज़बरदस्ती करनी पड़ी तो तुम्हारा ही नुकसान होगा... तुम्हारी मर्ज़ी है...!" अमन ने सपस्ट रूप से कहा..

"..... पर ऐसा वैसा कुच्छ नही करोगे ना!" साना ने अपनी गर्दन घूमकर प्रार्थना सी की.. और कुच्छ वह कर ही नही सकती थी....

" जब कह दिया कि छ्छूने से ज़्यादा कुच्छ नही करूँगा तो अब और पूच्छने वाली बात क्या है..." साना के नितंबों की गर्मी से अमन अपना धर्य खोता जा रहा था...

"सिर्फ़ उपर ही..." कहते हुए साना ने अपने हाथ ढीले छ्चोड़ दिए और उसके ऐसा करते ही अमन के हाथों ने उसकी चूचियो पर कब्जा सा कर लिया... और अमन के मर्दाने हाथों की गिरफ़्त में अपना यौवन सौंप कर साना छॅट्पाटा सी उठी....

दोनो हाथों में एक एक रसीली गोलाई थाम कर अमन सिसकियाँ लेते हुए उनका मर्दन करने लगा.. साना की आँखें बंद हो गयी.. पर अपनी साँसों पर काबू रखने की वह कोशिश करती ही रही...

अचानक साना को पकड़े पकड़े अमन बिस्तेर पर पिछे की और लुढ़क गया.. और बिना एक भी पल गँवाए उसको पलट कर अपने सामने कर लिया.. साना की आँखें बंद थी.. पर अपनी छलक्ति जवानी को शर्म से उसने अमन की निगाहों से बचाने के लिए अपने हाथों को वहाँ ले जाने की हुल्की सी कोशिश की... पर अमन ने हाथों को बीच में ही पकड़ लिया और साना को सीधी लिटाते हुए उसके उपर आ जमा...

साना के होन्ट कंपकपा रहे थे... चेहरे पर अब विरोध के भाव नही थे.. पर हया की लाली अब भी उसको समर्पण करने से रोक रही थी.. अमन ने उसके दोनो हाथ पिछे करके उसकी मस्ती से तन गयी चूचियो और गुलाबी दानो को निहारा और झुक कर एक दाने को अपने मुँह में दबा लिया... साना तड़प उठी... वासना की एक तेज लहर उसके पूरे जिस्म में पसर गयी और कसमसाते हुए वो अपने हाथों को छुड़ाने का प्रयास करने लगी... उसकी हालत लगातार बद से बदतर होती जा रही थी.. पर अमन तो जैसे आज उसका कतरा कतरा पीने को व्याकुल था..

काफ़ी देर तक उसके अंगों को चूस्ते रहने के बाद जब अमन से ना रहा गया तो वह उस पर से उठ बैठा और अपना पाजामा उतार कर फैंक दिया... ," लो.. तुम तो छ्छू कर देखो इसे.. इसको क्यूँ तड़पा रही हो? कहते हुए आँखें बंद किए लेटी साना का हाथ अमन ने पकड़ा और अंडरवेर से बाहर निकाल कर अपना मोटा तना हुआ लिंग उसको पकड़ा दिया...

साना ने तुरंत अपना हाथ वापस खींच लिया.. हाथ लगते ही वह समझ गयी थी कि 'वो' क्या है..," नही.. मुझे नही छ्छूना कुच्छ..!" कहते हुए उसने फिर से अपनी चूचियो को ढक लिया....

"ये सब नही चलेगा देखो.. तुम्हे नही छ्छूना तो मत च्छुओ.. पर मुझे क्यूँ रोक रही हो.. बैठकर पाकड़ो इसको...!" अमन के सख़्त आवाज़ में कहते ही साना झट से उठ बैठी.. और काँपते हाथों से उसका लिंग हाथ में पकड़ कर चेहरा दूसरी और घूमा लिया....

"अब ये नाटक बाजी बंद करो यार.. ये तुम्हे खा नही जाएगा.. और ना ही तुमने इसको पहली बार देखा है.. अभी तो तुम्हे इसके साथ बहुत कुच्छ करना है..." अमन ने आवेग में अपने लिंग के उपर रखा साना का हाथ पकड़ कर मसल दिया....

"क्या?.. और क्या.. करना है..!" साना ने घबराकर उसकी आँखों में देखा...

"होन्ट खोलो अपने.. इनका रस तो लगा दो ज़रा इस पर याआअर.. कितनी कमसिन है तू.. सच्ची..!" अमन कहते ही घुटनो के बल सरक कर थोड़ा आगे हो गया.. अब लिंग साना की आँखों के सामने उसके होंटो के पास लहरा रहा था....

साना उसका इशारा समझ गयी.. हुल्की सी पिछे होकर उसने निगाहें झुकाई और लिंग को गौर से देखा.. उपर वाला हिस्सा किसी देशी टमाटर की तरह चमक रहा था.. और अंदर से निकल कर एक दो बूँद उसके मुँह पर रखी थी...

"क्या करूँ..?" साना ने बेचैनी से नज़रें उठाकर अमन की तरफ देखा.. हालाँकि उसको पता था कि अब क्या करना है...

"चूसो मेरी जान.. इसको चख कर देखो.. लगता है रवि ने तुम्हे पूरी ट्रैनिंग नही करवाई..." अमन सिसकते हुए उसके और ज़्यादा करीब हो गया...

साना ने अटपटे ढंग से अपने हाथ से सूपदे के मुँह पर लगी बूँदें पूछि और आँखें बंद करके अपने तपते होंठ खोल कर उस पर रख दिए.. अमन बुरी तरह सिसक उठा," इसस्सकॉ मुँह में ले लो ना.." और कहते ही साना का सिर पकड़ कर अपना लिंग अंदर थूस दिया.. सूपदे समेत करीब 3 इंच लिंग अंदर जाते ही साना का दम सा घुट गया.. उसने अपनी फटी हुई आँखें उठाकर अमन को देखा. अमन को उस पर रहम आ गया.. लिंग को वापस खींचते हुए वह बोला," सॉरी.. मुझे लगा तुम्हे लेना आता होगा.. मैं तुम्हे परेशान नही करना चाहता.. इसको बाहर से ही चाट लो..!"

अमन की बातों में हुम्दर्दि की महक आते ही साना की आँखों में आँसू आ गये.. पर उसने इस बार कोई शिकायत नही की और जीभ बाहर निकाल कर अपने काम में जुट गयी.. दरअसल वह भी अब तक नीचे से पूरी तरह गीली हो चुकी थी...

"ओके.. अब मेरी बारी.. सलवार निकाल दो.." जी भरकर आनंद के छणो को जी कर अमन वापस हट गया... और अपना हथियार अंडरवेर में छिपा लिया.. तना हुआ ही..

"साना ने सहमी हुई निगाहों से उसकी और देखा.. पर कुच्छ बोली नही.. शायद वह भी अब खुद पर काबू रखने की सीमा से काफ़ी आगे निकल चुकी थी.. नडे को खींचते हुए उसने सलवार को ढीला किया और उचक कर उसको घुटनो तक सरका, सिर झुका कर बैठ गयी.. बाकी काम अमन ने खुद ही पूरा कर दिया.. सलवार निकाल कर बेड पर रख दी और उसकी टाँगें फैलाकर उनके बीच आ गया..... साना अपना शरीर ढीला छ्चोड़ बेड पर लेट गयी.. उसकी साँसे धौकनी की तरह चल रही थी.. आँखें बंद थी और चूचिया तेज़ी से उपर नीचे हो रही थी....

"वाउ यार.. सो स्वीट.. सच कहूँ तो मैने ऐसी आज तक नही देखी..." पॅंटी के किनारों में उंगली डाल जैसे ही उसने साना की योनि को बेनकाब करके देखा.. उसके मुँह में पानी भर आया.. साना तो आनंद के मारे उच्छल ही पड़ी थी... अमन उसको बिल्कुल नंगी करने से खुद को रोक ना पाया और अगले ही पल पॅंटी भी बिस्तेर पर पड़ी नज़र आई...

अमन साना की जांघों पर हाथ फेरता हुआ मुँह खोले उसकी योनि को देखता ही रह गया.... मुलायम हुल्के बालों वाली उसकी योनि भी उतनी ही मुलायम थी.. मोटी मोटी फांकों के बीच पतली सी झिर्री और उसमें से झाँक रही योनि की पंखुड़ीयाँ रसीली और बहुत ही नाज़ुक सी थी... उसके गोरे शरीर की अपेक्षा योनि का रंग हूल्का भूरा सा था.. और बहुत ही मादक ढंग से साना की सिसकियों के साथ ही योनि भी धीरे धीरे फुदाक रही थी...

अमन ने टाँगों को पिछे किया और उनके बीच पूरा लेट गया... अब अमन की साँसों के योनि में मच रही खलबली से साना पागल सी हो उठी थी.. और जैसे ही अमन ने योनि की बंद फांकों को जीभ बाहर निकाल कर चाता.. साना ने पागलपन में ही अपने हाथ को काट खाया.. अपनी निकल रही सिसकियों पर काबू पाने के लिए...

अमन उसकी ये हालत देख कर फूला नही समा पा रहा था.. उत्साहित होकर उसने साना को और गरम करने के लिए योनि को पूरी तरह बाहर से अपने थूक से लथपथ कर दिया.. साना की मदहोश सिकियाँ अब पूरे कमरे में गूँज रही थी...

अचानक की गयी अमन की हरकत से तो वो पूरी तरह तिलमिला ही उठी... अपने हाथों की अंगुलियों से अमन ने योनि की फांकों को अलग किया और योनि के छेद में अपनी जीभ घुसेड दी... साना अधमरी हो गयी," जल्दी कर लो प्लीज़.. जो करना है.. मैं मरी जा रही हूँ...!"

अमन अपना सिर उठाकर बोला..," सच्ची.. कुच्छ भी कर लूँ?"

साना ने अपने हाथ नीचे ले जाकर वापस उसका सिर दबा अपनी योनि से सटा दिया.. मतलब सॉफ था.. उसकी तिलमिलाहट में, उसकी च्चटपटाहत में अब उसकी सहमति साथ थी.. और साना पूरी तरह बेसबरा हो चुकी थी....

अब अमन ने भी देर करना उचित नही समझा.. एक बार और सखलन होने पर साना का मूड बदल सकता था... अपनी जांघों पर साना की गुदज जांघें चढ़ाते हुए अमन ने अपना लिंग योनि मुख पर रखा और साना की चूचियो को दबाता हुआ बोला," साना.. एक बार आँखें खोलो ना प्लीज़.."

साना ने एक पल के लिए अपनी अधखुली आँखों से अमन की और देखा और सिसकी के साथ हुल्की सी मुस्कुराहट उसकी और फैकते हुए आँखें फिर से बंद कर ली...

अमन उस पर झुका और उसके अंदर उतरता चला गया.. साना के होंटो से निलकली कामुक चीख को अमन ने अपने होंटो में ही क़ैद कर लिया...

 
अधूरा प्यार--10 एक होरर लव स्टोरी

अमन जब बाहर निकला तो रवि और सलमा बाल्कनी में एक दूसरे से अठखेलिया कर रहे थे.. सलमा भागते हुए जाकर उस'से लिपट गयी,"ओह डार्लिंग! आइ मिस्ड यू सो मच.." और फिर अचानक ही अमन के चेहरे पर शिकन देख उसके चेहरे के भाव बदल गये," क्या हुआ ? बात आज भी नही बनी क्या?"

अमन उसको दूर सा करते हुए बोला," जाओ संभाल लो उसको.. और आइन्दा मेरा नाम और नंबर. दोनो भूल जाना!"

सलमा उसकी बात सुनकर चौंक पड़ी," पर हुआ क्या? मैं तो कब से कह रही हूँ.. एक बार ज़बरदस्ती कर लो.. बाद में अपने आप दौड़ी चली आएगी.. आओ.. मैं बताती हूँ उसको!" सलमा ने अमन का हाथ पकड़ कर खींचा....

"हो गया यार.. सब कुच्छ हो गया.. रो रही है अब वो बैठी बैठी.. जाओ संभाल लो उसको और बाहर निकल लाओ.. छ्चोड़ आता हूँ तुम्हे.. सोना भी है फिर..!" अमन ने कहते हुए सलमा से मुँह फेर लिया..

सलमा अमन के पास ही खड़ी रही.. पर साना के रोने की बात सुनकर उत्सुकतावश रवि बिना कुच्छ कहे ही उसके रूम में चला गया.. साना ने कपड़े पहन लिए थे और बिस्तेर पर बैठी घुटनो में सिर देकर सूबक रही थी..

"क्या हुआ?" रवि बस यूँही उसके पास बैठ उसके बालों में हाथ फेरने लगा...

साना ने आवाज़ सुनते ही अपना चेहरा उपर उठा लिया.. रवि की आँखों में देखा और अचानक उसका सुबकना बिलखने में बदल गया.. छ्होटे बच्चे की तरह रवि की छाती से जा चिपकी और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी.. रवि का मॅन द्रवित हो उठा," अगर तुम्हे ये सब पसंद नही है तो यहाँ आना ही नही चाहिए!"

ये बात का तो साना पर उल्टा ही असर हुआ.. कोई जानता ही नही था कि वा यहाँ आई क्यूँ थी.. किसके लिए आई थी.. साना ने अपने दोनो हाथ रवि की कमर पर चिपका लिए और अपनी छातियो को रवि की छाती में गाड़ा दिया.. वह अब भी रो रही थी.. लगातार...

तभी कमरे में सलमा ने प्रवेश किया," क्या नाटक है साना? ये सब क्या है? चलो उठो.. देर हो रही है..!"

साना की तरफ से तनिक भी हुलचल ना हुई.. वो रवि ही था जो उस'से जैसे तैसे अलग हुआ और बाहर चला गया...

"चलो भी अब! क्या हो जाता है तुम्हे? कल तो अपने आप ही बीच में कूद पड़ी थी और आज ऐसे रो रही हो.. चल आजा अब.. आजा यार.. अमन ने कह दिया है कि अब वो कभी तुम्हे हाथ नही लगाएगा.. सॉरी भी बोल रहा था.. आजा.. आजा मेरी सन्नो!" सलमा ने उसको बातों ही बातों में उठाया और नीचे गाड़ी में इंतजार कर रहे अमन के पास ले गयी.. रवि शायद नीचे जाकर लेट चुका था.....

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अगली दोपहर करीब 12:30 पर बतला हाइवे पर खड़े रोहन और शेखर नितिन के आने का इंतजार कर रहा थे. नितिन की कार को रोहन ने दूर से ही पहचान लिया.. और शेखर की कार से उतर कर उसको रुकने का इशारा किया.. नितिन ने कार रोक दी.. रोहन ने नितिन से हाथ मिलाया, साथ बैठी श्रुति को अटपटे ढंग से हेलो बोला और पिछे वाली सीट पर जा बैठा," अगली गाड़ी के पिछे पिछे चलाना भाई..."

"तो... आपका कहना ये है कि मेरे सपने की वजह आप ही हैं.." रोहन ने श्रुति से पूचछा.. वो और श्रुति कोठी के ड्रॉयिंग रूम में अकेले आमने सामने बैठे थे.. नितिन रवि को लेकर जानबूझ कर बाहर निकल गया था ताकि श्रुति भोले भाले रोहन को आसानी से उसके द्वारा रटाई गयी बातें बोल सके.. रवि नितिन के प्लान में अड़ंगा डाल सकता था...

श्रतु रोहन के सवाल पर कुच्छ देर चुप्पी साधे रही.. फिर पहले हाँ में सिर हिलाया और नज़रें उठाकर बोली," हाँ!"

श्रुति की शकल सूरत इतनी प्यारी और मासूम थी कि अगर रोहन ने नीरू को ना देखा होता तो शायद वो उसके इसी जवाब को 'आख़िरी जवाब' मान लेता.. पर अब दुविधा में उसके पास पूच्छने के लिए और भी बहुत सारी बातें थी," पर क्यूँ? मेरा मतलब है कि मैने तुम्हे पहली बार तुम्हारे घर ही देखा था.. और शायद तुमने भी.. फिर ऐसा क्यूँ कर रही थी.. और ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई जिंदा लड़की किसी के सपने में आकर जो कहना चाहती है वो कह सके, उसके अपने पास बुलाने के लिए बाध्य कर सके..? प्लीज़ मुझे सारी बातें डीटेल में समझाओ.. मैं बहुत कन्फ्यूषन में हूँ..."

बोलने के लिए मुँह खोलते हुए श्रुति के चेहरे पर शिकन उभर आई. वह जानती थी कि अब जो कुच्छ भी वह बोलेगी, झूठ ही बोलेगी.. नितिन के कहे अनुसार.. जो कुच्छ उसने याद कर रखा था.. वह एक स्वर में बोलती चली गयी.. बिना रुके

"दरअसल जो कुच्छ भी हुआ है, वो आधा मैने किया है और आधा भगवान ने.. पहले मेरे सपनों में तुम दिखने लगे थे.. मैं बेचैन रहने लगी.. तुम भी अक्सर वही बातें कहा करते थे जो मैने तुम्हे सपनो में कही हैं अभी तक.. ये सिलसिला जब महीनो तक चलता रहा तो हार कर में अपने गाँव के पास एक तांत्रिक के पास गयी.. इन्न सपनों की वजह जान'ने के लिए.. उस ने मुझे बताया की हमारा पिच्छले जन्मों का कोई संबंध है.. और इसीलिए मुझे ऐसे सपने आते हैं. साथ ही उन्होने कहा कि वो 21 दिन का अखंड यग्य करके हमारी आत्माओ को एक दूसरे से अलग कर सकते हैं ताकि फिर कभी मुझे ऐसे सपने ना आयें...." कहते हुए श्रुति अचानक चुप हो गयी.. नितिन ने उसको ऐसा ही करने के लिए बोला था..

"फिर?" रोहन बड़ी लगन से उसके हर शब्द पर विस्वास करता हुआ सुन रहा था.. श्रुति के रुकते ही वा बेचैन हो गया," आगे बताओ ना!"

"उन्होने तुम्हे हमेशा के लिए मेरी जिंदगी से दूर करने का आसवसन दिया था.. पर.." श्रुति फिर चुप हो गयी.. इस बार नितिन की मर्ज़ी के मुताबिक नही.. पर जो उसको बोलने को कहा गया था.. श्रुति उसकी हिम्मत नही जुटा पा रही थी...

"पर क्या? बोलो ना!" रोहन विचलित होते हुए बोला....

"पर.. मुझे तब तक तुमसे.. प्यार हो गया था.. रात को ही नही.. मैं दिन में भी तुम्हारे सपने देखने लगी थी.. मुझे पता नही चला की कब ऐसा हुआ.. पर जब तांत्रिक ने मेरी जिंदगी से तुम्हे निकाल देने की बात कही तो मैने मना कर दिया.." श्रुति ने कहा...

"तुम रुक क्यूँ रही हो बीच बीच में.. सारी बात बताओ ना.. आगे क्या हुआ?" रोहन खुद ऐसा सपने देख चुका था इसीलिए श्रुति की बातों पर विस्वास ना करने का कोई मतलब ही नही था...

"मैने उनको बताया की मैं आपसे प्यार करने लगी हूँ.. और अगर हमारा पिच्छले जन्मों का कोई संबंध है तो हम इस जनम में क्यूँ नही मिल सकते..? उन्होने कहा मिल सकते हो! मैने ज़रिया पूचछा तो उन्होने एक ही रास्ता बताया.. उन्होने कहा कि वो मुझे सपनो में आपके पास भेज सकते हैं.. उन्होने कहा की मैं जो चाहो सपने में कह सकती हूँ.. बाकी आप पर निर्भर करता है कि आप सपने को कैसे लेते हैं... फिर मेरे कहने पर उन्होने यग्य शुरू कर दिया.. और मैं आपके सपनो में आने लगी.." श्रुति की आँखों से आँसू लुढ़क गये.. रोहन के प्यार में नही.. एक निहायत ही शरीफ लड़के के सामने झूठ पर झूठ बोलते हुए....

"श! आप ऐसे रो क्यूँ रही हैं..?" रोहन ने उसके रोने को उसके बे-इंतहा प्यार का परिणाम माना.. सच में! रोहन का दिल पिघल गया था उसकी बात सुनकर.. श्रुति ने रुमाल निकाला और अपने आँसुओं को पोंच्छ लिया.. पर पुराने आँसू अभी सूखे भी नही थे कि श्रुति अचानक फुट पड़ी.. अपने पैर सोफे पर चढ़ाए और सिर घुटनो में दे लिया...

रोहन उसके पास आया और उसके सिर पर हाथ रख कर समझाने लगा," प्लीज़.. आप रोइए मत.. मैं आपकी हालत समझ सकता हूँ.. दरअसल मैं भी प्यार का मतलब कुच्छ दिन पहले ही समझा हूँ, नीरू.. सॉरी.. तुम्हारे सपने में आने के बाद.. आप रोइए मत प्लीज़.. मेरा भी दिल दुख रहा है आपको रोते देख कर..."

'कितना फ़र्क था रोहन और नितिन में; एक तो वो इंसान की खाल में छिपा भेड़िया, जिसके लिए ना तो दोस्ती के मायने हैं और ना ही ज़ज्बात की कोई कद्र.. एक तरफ रोहन, इंसान के रूप में देवता! कितनी शराफ़त और इंसानियत भरी हुई है इसके दिल में..'

ये सब सोचती हुई श्रुति ने अपने शरीर को ढीला छ्चोड़ सिर उसके कंधे पर टीका दिया.. आँखें यूँही बरसती रही...

रोहन ने उसके हाथ से रुमाल लिया और उसके गालों पर आँसुओं की बनी कतार को सॉफ करते हुए रोकने की कोशिश करने लगा.. श्रुति को उसकी नज़रों में वासना का कतरा भी दिखाई नही दिया.. उसके दिल में तो सिर्फ़ प्यार ही प्यार भरा हुआ था.. धीरे धीरे श्रुति की सुबाकियाँ बंद हो गयी और अपने हाथ का सहारा लेकर वह सीधी बैठ गयी...

श्रुति के सामान्य होते ही रोहन अपने मन में उपजे कुच्छ अनसुलझे सवालों का जवाब जान'ने की कोशिश करने लगा," अगर आप नॉर्मल हों तो एक बार पूच्छू.."

श्रुति उसको सब कुच्छ सच सच बता देना चाहती थी.. पर उसका मतलब सिर्फ़ उसकी जिंदगी बर्बाद होना ही होता.. थोड़ी देर चुप रहकर उसने संभालते हुए उन्न संभावित सवालों को याद किया और रोहन की आँखों में आँखें डाल बोली," हां.. मैं ठीक हूँ..!"

"आपने मुझे टीले पर क्यूँ बुलाया? घर क्यूँ नही..?" रोहन वापस उठकर सामने चला गया...

"वो मुझे उस तांत्रिक ने ही ऐसा करने के लिए बोला था.. दरअसल 'यग्य' वहीं चल रहा था.. और यग्य संपन्न करने के लिए एक बार आपकी उपस्थिति ज़रूरी थी... इसीलिए उन्होने आपको वहाँ बुलाया था..." इस सवाल का जवाब श्रुति पहले ही याद किए हुए थी.. इसीलिए बोलते हुए वह कहीं नही अटकी...

"श.. इसका मतलब जब हम वहाँ गये तो और कोई भी वहाँ आसपास था.. गाड़ी की हवा भी उसने ही निकाली होगी.. क्या नाम है तांत्रिक का?" रोहन ने यूँही पूच्छ लिया...

"पता नही...लोग उनको अग्यात बाबा कहते हैं.. !" श्रुति ने पहले से ही याद किया हुआ नाम भी बता दिया...

"एक बात मेरी समझ में अभी तक नही आई.. जब आप ही मेरे सपनो में आती थी.. और आप ही मुझे बुलाना चाहती थी.. तो ये 'नीरू' नाम का क्या चक्कर है?" रोहन को ये सवाल सबसे अधिक कचोट रहा था...

"वो बाबा ने ही मुझे ऐसा करने को बोला था.. दरअसल उन्होने मुझे बताया था कि मेरा नाम पिच्छले जनम में नीरू था.. इस नाम के कारण आप ना चाहते हुए भी खींचे चले आएँगे.. इसीलिए.."

"फिर आपने सपने में ये क्यूँ कहा की मैं नीरू नही हूँ.. नीरू तो बतला में रहती है.. !" एक और सवाल श्रुति के सामने मुँह बाए खड़ा था...

 
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