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अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ complete

वो बाय्स चेज रूम में चला जाता है और उसके पीछे-पीछे ढेर सारी लड़कियाँ भी दौड़ती हैं।

जीशान जब बाय्स चेज रूम से बाहर निकलता है तो उसे लुबना उसका इंतजार करती हुई मिलती है। वो शायद बहुत गुस्से में थी। जैसे ही उसकी नजर जीशान पे पड़ती है वो उसपे टूट पड़ती है-“क्या ज़रूरत थी अपने कपड़े उतारने की? खुद को बहुत मसल-मैन समझते हो ना आप भाई?”

जीशान-“कपड़े कहाँ उतारे? मैंने सिर्फ़ टीशर्ट तो निकाला था वो भी दोस्तों के कहने पे…”

लुबना-“हाँ… वो जो कहेंगी, वैसे आप करोगे, है ना… कल वो कहेंगे यहाँ से कूद जाओ तो आप कूद जाओगे क्या?”

जीशान-“मैं तेरी तरह बेवकूफ़ थोड़ी हूँ । और तू क्यों इतनी गरम हो रही है? बाडी है तो दिखाउन्गा है ना?”

लुबना बुरा सा मुँह बनाते हुये-मुझे अच्छा नहीं लगता।

जीशान उसकी आँखों में झाँकते हुए कहता है-क्यूँ ?

लुबना के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। वो जीशान को घूर ते हुये अपनी क्लास में चली जाती है। तभी वहाँ रूबी और उसकी मोम डाक्टर सोनिया आ जाते हैं।

रूबी-जीशान।

जीशान पलटकर रूबी की तरफ देखता है-जी, कहें।

रूबी-“हाई… जी मेरा नाम रूबी ख़ान है और ये मेरी अम्मी डाक्टर सोनिया ख़ान हैं मैंने इसी साल एडमिशन लिया है। आपकी परफामेंस देखी तो आपको मुबारकबाद कहने चल आई…”

जीशान अपना हाथ रूबी की तरफ बढ़ाते हुये-“हेलो, मेरा नाम जीशान ख़ान है…”

डाक्टर सोनिया-बेटा, आपके फादर का क्या नाम है?

जीशान-अमन ख़ान।

डाक्टर सोनिया की आँखें मोटी हो जाती हैं-“मतलब आप अमन ख़ान जिनकी यहाँ गारमेंट्स की फॅक्टरी है, उनके साहबजादे हो?”

जीशान-बिल्कुल सही पहचाने आपने। आप मेरे अब्बू को जानते हैं?

डाक्टर सोनिया-“बहुत अच्छी तरह से। मेरा मतलब है काफी वक्त पहले जानती थी, आजकल कहाँ है, कोई खैर खबर नहीं …”

जीशान-जी वो बिल्कुल ठीक हैं।

डाक्टर सोनिया की नजरे जीशान से हट ही नहीं रही थी। वो तो जीशान को देखते ही पहचान गई थी। जीशान अपने अब्बू की कार्बन कापी जो था, वही आँखें, वही होंठ, वही बात करने का अंदाज, किसी को भी अपनी तरफ आकर्षित कर लेने वाली वही मुस्कान।

रूबी-अम्मी चलें?

डाक्टर सोनिया-बेटा, अब मैं घर जाउन्गी। मुझे ज़क्लनिक भी जाना है। तुम कार लेकर आ जाना।

रूबी-तो आप घर कैसे जाएँगी?

डाक्टर सोनिया-मैं आटो से चले जाउन्गी।

जीशान-“एक्स क्यूज मी, बुरा ना मानें तो मैं आपको आपके घर तक ड्रॉप कर देता हूँ । वैसे भी मुझे घर जाना था इफ यू डोन्ट माइंड…”

डाक्टर सोनिया-ओके।

रूबी कुछ बोलती उससे पहले ही सोनिया ने हाँ कह दी थी। वो तो चाहती भी यही थी कि जीशान से अकेले में कुछ बात करे। दोनों रूबी को बाइ कहकर कालेज के बाहर निकल जाते हैं।

जीशान कार में बैठते हुये-तो आंटी आपका घर कहाँ है?

सोनिया-“प्लीज़्ज़… तुम मुझे आंटी मत कहो। बहुत ओल्ड सा लगता है। अभी मेरी उमर ही क्या है?” दोनों हँसते हुये बातें करने लगते हैं और कार डाक्टर सोनिया के घर की तरफ बढ़ जाती है। कुछ ही पलों में वो दोनों एक दूसरे से काफी घुल मिल गये थे।

घर के सामने पहुँचकर डाक्टर सोनिया कार से बाहर उतर जाती है।

जीशान-अच्छा सोनिया जी, मैं चलता हूँ ।

सोनिया-ऐसे कैसे? पहल बार घर आए हो एक कप कोफी तो पीकर जाओ।

जीशान कार से उतर जाता है और दोनों घर के अंदर दाखिल हो जाते हैं। सोनिया कहती है-“तुम बैठो, मैं जरा चेज करके आती हूँ …”

जीशान इधर-उधर देखते हुई सोफे पे बैठ जाता है। घर काफी खूबसूरत था, अच्छी तरह सजा हुआ। कुछ देर बाद जब सोनिया काफी का कप लेकर वहाँ आई तो जीशान के होश उड़ गये। एक पतली सी नाइटी में वो अपनी गाण्ड मटकाते हुई चली आ रही थी, अंदर शायद कुछ भी नहीं पहना था।

 
जीशान को पशीने छूटने लगते हैं। वो बेचारा अभी तक कुंआरा था। जिस तरह कोई कुआँरी लड़की सुहागरात के दिन नर्वस महसूस करती है, वही हाल इस वक्त जीशान का था।

जीशान-मैं चलता हूँ सोनिया जी।

सोनिया उसका हाथ पकड़कर वापस बैठा देती है-क्या चलता हूँ । चलता हूँ ? 5 मिनट तो बैठो।

जीशान-“नहीं , मुझे कुछ ज़रूर काम है…”

सोनिया उसे रोकती है और इसी चक्कर में उसके हाथ में का कप जीशान की जाँघ पे गिर जाता है। गरम काफी वाला वो कप जैसे ही जीशान की जीन्स पे गिरता है वो चीख पड़ता है-“उऊउचह…”

सोनिया-“ओह्ह… माई गोड, आई एम सो सारी बेटा, तुम बैठो मैं ठंडा पानी लेकर आती हूँ …”

जीशान तड़प रहा था। सोनिया बर्फ क्यूब लेकर वहाँ आती है और नीचे बैठकर जीशान की जीन्स उतारने लगती है।

जीशान-“ये आप क्या कर रही हैं?”

सोनिया-“जीन्स नहीं उतारोगे तो ये ठंडी बर्फ कैसे लगा पाउन्गि? मैं डाक्टर हूँ , मुझे अपना काम करने दो और चुपचाप बैठो…”

जीशान दर्द से हल्का-हल्का चिल्ला रहा था। जैसे ही उसकी जीन्स उतरती है, सोनिया की आँखों के सामने जीशान का लण्ड आ जाता है। वो अभी ढीला था, पर इस हालत में भी वो अपना साइज बता रहा था। सोनिया अमन का लण्ड ले चुकी थी पर जीशान तो लम्बाई और मोटाई के मामले में अपने बाप का भी बाप था।

सोनिया बर्फ को जीशान के जाँघ पे घिसने लगती है।

जीशान-“अह्ह… ऊह्ह… ठंडा ठंडा वो बर्फका टुकड़ा उसके जाँघ में सरसराट पैदा कर रहा था और सामने बैठी हुई सोनिया उसपे और सितम ढा रही थी। वो कुछ ऐसे झुकी हुई थी कि अंदर का सारा माल साफ-साफ दिखाई दे रहा था।

सोनिया अचानक जीशान के लण्ड को हाथ में लेकर सहलाने लगती है।

जीशान-“आह्ह… सोनिया, ये आप क्या कर रही हो? प्लीज़्ज़ ऐसा मत करो…”

सोनिया कुछ नहीं कहती और अपना काम जार रखती है। वो जीशान के आँखों में देखती हुई उसके लण्ड को हल्के-हल्के सहलाए जा रही थी।

जीशान-“प्लीज़्ज़ सोनिया ज…जी, आपके पति आ जाएँगे। प्लीज़्ज़… मुझे जाने दो…”

सोनिया-“वो पिछले दो महीने से सऊदी गये हुये हैं। बस मैं हूँ और तुम हो…”

जीशान के लण्ड के साइज में धीरे धीरे बढ़ोतरी हो रही थी। आखिरकार वो भी तो अमन ख़ान की औलाद था फ़र्क बस इतना था कि जीशान इन सब बातों से अंजान था।

सोनिया-“अघह… जीशान, तेरा तो तेरे अब्बू से भी बड़ा है र ईई…”

जीशान चौंकते हुये-“तो क्या आप और अब्बू ?”

सोनिया-“हाँ… एक बार वो मेरे साथ सो चुके हैं, बहुत जबरदस्त और ताकतवर मर्द हैं तेरे अब्बू …”

ये सुनकर जीशान के लण्ड में इस कदर खिचाव आता है कि वो पूरी तरह तन जाता है, 8” इंच लंबा और 4 इंच मोटा जीशान का लण्ड सोनिया के हाथों में भी समा नहीं रहा था। जीशान अपनी आँखें बंद कर लेता है।

सोनिया जीशान के लण्ड को अपने मुँह में ले लेती है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

जीशान-“अह्ह… ये क्या कर रही हो तुम? अह्ह…” पहल बार किसी ने जीशान के लण्ड को अपने मुँह में लिया था और वो भी इस जबरदस्त अंदाज में।

सोनिया लण्ड को मुँह में खींचती हुई आंडो को मरोड़ रही थी, जिससे जीशान के लण्ड में और तनाव आने लगता है। सोनिया लण्ड को पकड़कर अपनी चुचि के बीच में घुसा लेती है और दोनों हाथों से चुची पकड़कर नीचे ऊपर होने लगती है।

जीशान पहली बार अपने दोनों हाथों से सोनिया की चुची पकड़ता है।

सोनिया-“अह्ह… दबा ना साले, तू अमन ख़ान की औलाद है लगता नहीं मुझे? कोई और आया होगा तेरे टाइम पे?”

जीशान-“तेरी माँ की चूत … ये ले। वो दोनों हाथों से सोनिया की चुची को मरोड़ने लगता है और अपने लण्ड को उसके बीच में नीचे-ऊपर घुसाने लगता है अह्ह…”

देखते ही देखते दोनों अपने कपड़े उतारकर फेंक देते हैं। जीशान के दिमाग़ में सोनिया की वही बात घूम रही थी कि तू अमन ख़ान की औलाद नहीं लगता…”

पठान भाई, पठान एक बार सटक गये तो मतलब सामने वाले की गई।

 
जीशान सोनिया को अपने ऊपर खींच लेता है और उसकी चुची को मुँह में भरकर जोर-जोर से चूसने लगता है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

सोनिया-“अह्ह… दबा ना साले… तू अमन ख़ान की अगर सच में औलाद है तो साबित कर… ऐसे ले मेरे को कि मैं मूत दूं तेरे नीचे अह्ह… चूसता क्या है अंदर घुसा के चोद मुझे…”

कुछ वक्त पहले मिल वो औरत जीशान को खुले आम चैलेंज कर रही थी। पर वो नहीं जानती थी कि जीशान क्या बला है?

जीशान सोनिया को बेड पे लेटा देता है और दोनों पैर खोलकर अपने लण्ड को हाथ में पकड़कर चूत के पास लाता है। पर उसने इससे पहले किसी को नहीं चोदा था, इसलिये लण्ड चूत में ठीक तरह से घुस नहीं पाता। सोनिया उसके लण्ड को हाथ में पकड़कर चूत के मुँह पे लगा देती है और आँखों में देखते हुये कहती है-“डाल दे डंडा अंदर…”

जीशान आओ देखता है ना ताओ और सीधा किसी रंडी को कोई कैसे चोदता है, बस उसी तरह पहला झटका सोनिया को माँ की याद दिला देता है।

सोनिया-“ओ माँ, इतने जोर से हरामी… चोद रहा है कि फाड़ रहा है?”

जीशान-“तेरे माँ को चोदु साली … मुझे गान्डू समझा क्या तूने ? ले अब्बू…” ना दाहने ना बायें बस सटासट जीशान का लण्ड सोनिया की चूत में अंदर-बाहर हो रहा था।

सोनिया अपनी आँखें बंद कर लेती है। बड़ा सकून मिल रहा था उसे जीशान के लण्ड से।

कभी एक करवट लेकर, तो कभी एक पैर अपने कंधे पे रख कर जीशान सोनिया को 10 मिनट तक ऐसे अंदाज में चोदता रहा जैसे कोई एक्सपर्ट हो। पर नया होने की वजह से वो ज्यादा देर टिक नहीं पाया और अपना पानी सोनिया की चूत में छोड़ देता है।

जीशान का पानी निकल चुका था और साथ में हिम्मत भी जवाब दे चुकी थी। वो घर जाना चाहता। पहली चुदाई करने के बाद हर मर्द का यही हाल होता है, डर, पछतावा और घबराहट।

पर सोनिया एक मेच्योर औरत थी। वो जीशान के होंठ चूम लेती है और उसे कपड़े पहनने को कहती है। जब जीशान कपड़े पहनकर जाने लगता है तो सोनिया उसका हाथ पकड़कर उससे कहती है-“ये बात सिर्फ़ हम दोनों तक रहनी चाहिए जीशान। तुम्हें जब भी मेरी ज़रूरत महसूस हो, मुझे इस नंबर पे काल करना…” वो जीशान के हाथ में अपना कार्ड थमाकर उसे जाने देती है।

अपने चेहरे पे एक हल्की सी मुस्कान लिए जीशान अपने घर की तरफ निकल जाता है। रास्ते में वो अपने दिल को किसी तरह संभाले हुये था। उससे बार-बार कुछ देर पहले का मंज़र याद आ रहा था। दिल की धड़कनें तेज थीं और एक मीठी-मीठी सी खुशी दिल के किसी कोने में हलचल मचा रही थी। वो किसी तरह घर पहुँच जाता है

और सीधा अपने रूम में जाकर कपड़े उतारने लगता है। जैसे है वो आईने के सामने आता है उसे उसके सीना पे लिपीसटिक के निशान दिखाई देते हैं। जिसे देखकर वो थोड़ा ठिठक जाता है और मुस्कुराता हुआ बाथरूम में घुस जाता है।

कुछ देर बाद जब वो बाहर आता है तो खुद को काफी रिलेक्स महसूस करता है। जिस्म में जो हमेशा अकड़न महसूस होती थी वो जा चुकी थी और लण्ड अपने आप तौलिया के नीचे खड़ा होने लगा था। दिल कह रहा था कि जल्द से सोनिया के पास चला जाए और एक बार फिर से वो खेल दुबारा खेला जाए। पर वो थक चुका था। वो उसी हालत में बेड पे लेट जाता है।

उधर नीचे अनुम खाना बना रही थी कि तभी उसके पीछे से शीबा आ जाती है, और पीछे से अनुम की मोटी मोटी चुचियाँ अपने दोनों हाथों में लेकर मसलने लगती है।

अनुम-औउचह… ये क्या बदतमीजी है शीबा?

शीबा-“देख रही हूँ , क्या साइज है मेरी ननद का?”

अनुम उसे घुरने लगती है-पीछे हटो, मुझे काम करने दो।

शीबा-तुम करो काम, हम तो चले जीशान के पास।

ये सुनकर अनुम के कान खड़े हो जाते हैं और दिल शीबा को रोकना चाहता है पर वो खुद को संभाल लेती है और चुपचाप खाना बनाने लगती है।

शीबा उसकी कमर पे हाथ फेरते हुये जीशान के रूम की तरफ बढ़ जाती है। जीशान अपने बेड पे लेटा हुआ था आँखें खुली थी, पर ध्यान कहीं और था।

शीबा उसके पास आकर बैठ जाती है। पर तब भी जीशान कोई नोटिस नहीं लेता।

शीबा जीशान की चौड़ी छाती पे हाथ फेरने लगती है-क्या हुआ बेटा, थक गये क्या?

जीशान किसी ख्वाब से जागते हुये-“ना… हाँ… नहीं तो अम्मी, आप इस वक्त… मेरा मतलब है कुछ काम था क्या?”

शीबा-“क्या मैं बस तुम्हारे रूम में तभी आ सकती हूँ जब मुझे कुछ काम होगा?”

जीशान बेड पे बैठ जाता है और अपनी टीशर्ट पहन लेता है-“नहीं तो, मेरा वो मतलब नहीं था, बोलिये…”

शीबा-“बस बोर हो रही थी तो चली आई तुमसे बातें करने…” वो अपनी छाती को कुछ ज्यादा ही सामने की तरफ झुका रही थी।

जिससे जीशान का ध्यान बार-बार शीबा की नरम बड़ी-बड़ी चुचियों की तरफ जा रहा था।

शीबा-“तुम मुझसे नाराज तो नहीं हो ना जीशान बेटा?”

जीशान-“जी हाँ… नहीं , किस बात के लिए अम्मी?”

शीबा अपनी आँखें जीशान की आँखों में गड़ाती हुई-“सुबह वाली बात को लेकर…”

जीशान के चेहरे पे मुस्कान आ जाती है-“नहीं , बिल्कुल नहीं …”

शीबा-“इसका मतलब तुम्हें और चाहिए?”

जीशान कुछ नहीं बोलता, हालाँकि उसका दिल तो कह रहा था कि काश वो पल फिर से लौट आए और शीबा उसे वही गरम किस दुबारा दे दे।

शीबा अपनी चुची जीशान के छाती से लगा देती है और अपने होंठों को जीशान के कान के पास लाकर धीरे से कहती है-“क्या मैं अपने बेटे को किस कर सकती हूँ ?”

जीशान अपना एक हाथ शीबा की गर्दन के पीछे लगा देता है। दोनों की आँखें बंद हो जाती हैं और धीरे-धीरे होंठ करीब… और करीब… और करीब… और फिर एक दूसरे से चिपक जाते हैं। जीशान की साँसे तेज थीं। वो अपने हाथ को नीचे लाता जाता है और उसे शीबा की चुचियों पे रख देता है। उसे उस वक्त सामने शीबा नहीं बल्की सोनिया की नंगी चुची नजर आ रही थी। वो उन्हें दबा देता है।

शीबा अपना मुँह जीशान के मुँह से हटा लेती है-“चल हट बदमाश… उंगली क्या दी , तू तो पूरा हाथ पकड़ रहा है और दबा भी रहा है…”

जीशान घबराहट के मारे कुछ नहीं बोल पाता। वो एक टक शीबा को देखता रहता है। और शीबा मुश्कुराके उठकर बाहर चल जाती है। उसके जाने के बाद जब जीशान खिड़की की तरफ देखता है तो हैरान रह जाता है। उसे वहाँ अनुम खड़ी दिखाई देती है। जीशान-के हाथ पैर काँपने लगते हैं। दिल में सोचने लगता है कि कहीं फुफु अब्बू को ना बता दें, वरना शामत आ जाएगी।

वो उठकर अनुम के पास जाता है। पर अनुम अपने रूम की तरफ बढ़ जाती है।

जीशान अनुम के रूम में जाकर अनुम का हाथ पकड़ लेता है-“प्लीज़्ज़ फुफु, मुझे माफ कर दो। आइन्दा ऐसे कोई हरकत नहीं करूँगा मैं प्रोमिस…”

अनुम झटके से अपना हाथ छुड़ा लेती है और पलटकर एक जोरदार चाँटा जीशान के गाल पे जड़ देती है-“निकल जा मेरे रूम से जीशान, वरना अच्छा नहीं होगा…”

जीशान अपने गाल पे हाथ रख कर वहाँ से जाने में हीभलाए समझता है। पर उसके दिल में एक बात आते है कि फुफु ने उसे क्यों मारा जबकि गलती तो अम्मी की भी थी ना? तो उन्होंने अम्मी को कुछ क्यों नहीं कहा?

अमन आज घर जल्द आ गया था। वो जब भी घर में आता सबसे पहले रज़िया से मिलता था। रज़िया जब अमन को इस वक्त अपने रूम में देखती है तो हैरान रह जाती है-“क्या बात है, तबीयत तो ठीक है ना? आप इस वक्त घर पे कैसे?”

अमन रज़िया को अपनी तरफ खींचते हुये-“क्या करूँ? मेरी अम्मी की चूत की खुश्बू फॅक्टरी में रहने नहीं देती, तो चला आया आपकी लेने…”

रज़िया मुश्कुराते हुई-“शरम करो, बच्चे घर पे हैं। किसी ने आपकी ये गंदी -गंदी बातें सुन लिया तो क्या सोचेगा?”

अमन-“क्या सोचेगा? यही कि अब्बू दादी को चोद रहे हैं…”

रज़िया एक हल्का सा मुक्का अमन के सीने पे मारती हुई-“बेशर्म होते जा रहे हो अमन, तुम दिन-बा-दिन…"

अमन-रज़िया को बाहो में कस लेता है-“बहुत दिल कर रहा है रज़िया मेरा। चल जल्द से कपड़े उतार और खोल दे दोनों पैर…”

रज़िया अमन के कानों की लोलकी को मुँह में लेकर चूसती हुई-“आप ही नंगी करो अपनी रज़िया को…”

अमन रज़िया की कमर में हाथ डालकर पीछे से उसकी गाण्ड मसलने लगता है, और रज़िया अमन के कपड़े उतारने लगती है। धीरे-धीरे रज़िया नीचे बैठ जाती है और अमन की पैंट नीचे खींच लेती है। सामने अमन का लण्ड आते ही उसके मुँह में पानी आने लगता है। और झट से वो अमन के लण्ड को अपने मुँह में भर लेती है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

अमन-नीचे झुक के रज़िया की नाइटी खोलने लगता है।

रज़िया जोर से अमन का लण्ड अपने गले में खींच रही थी। आज शायद उसकी चूत को शिद्दत से अमन की याद सता रही थी। जैसे है अमन रज़िया की ब्रा का वो आख़िरी हुक भी खोल देता है, रज़िया पूरे तरह नंगी हो जाती है।

अमन रज़िया को झुकाकर पीछे से अपना लण्ड उसकी गाण्ड और चूत दोनों पे घिसने लगता है।

रज़िया-“उम्ह्ह… पीछे से नहीं , आज सिर्फ़ आगे से चूत में डालो अह्ह… डालो… डालो ना क्यों सताते हो…”

अमन अपने लण्ड को रज़िया की गाण्ड पे जानबूझ के रगड़ता है।

रज़िया-“अह्ह… अमन चूत में आग लगी है और तुम गाण्ड में घुसाना चाहते हो…” और वो अमन के लण्ड को हाथ में पकड़कर चूत के मुँह पे लगा देती है।

 
अमन हमेशा से ऐसे ही करता था। वो रज़िया की चूत की आग को इतना भड़काता कि वो खुद अपनी चूत का मुँह खोलकर उसमें अमन को जगह दे देती आगे चलने के लिए। अमन रज़िया के दोनों बड़े-बड़े चौड़े चूतड़ों को हाथ में थामकर पीछे सटासट करके अपने लण्ड को चूत में घुसा देता है।

रज़िया-“अह्ह… ये लौड़ा तो मुझे दिन रात याद आता है अह्ह… दिल तो करता है कि बाहर निकालने हि ना दूं तुम्हें अह्ह…”

अमन-“तेरी चूत की कसम रज़िया, मुझे ऐसी चूत आज तक नहीं मिली । जितना चोदता हूँ उतनी टाइट होती जाती है अह्ह…”

रज़िया-“उम्ह्ह… मेरे बेटे के लिए बनी है ये चूत । चोदो ना कस के अमन बेटा अह्ह…”

अमन-“रज़िया मेरी अम्मी, मेरी जानेमन अह्ह… जितना चोदु उतना कम है तुझे अह्ह…”

वो अपनी गंदी बातों में मगन दुनियाँ की परवाह ना करते हुये अपनी रासलीला में लगे हुये थे। अमन का लण्ड जब भी रज़िया की चूत की दीवार से टकराता, रज़िया किसी कुँवारी की तरह गाण्ड को ऊपर झटका देती। अमन रज़िया की कमर को दबोचते हुये सटासट अपनी अम्मी की चूत मारे जा रहा था। खड़े-खड़े रज़िया के पैर काँप रहे थे। अमन के धक्कों की वजह से उसे ठीक से एक जगह खड़े रहना काफी मुश्किल हो रहा था।

अमन रज़िया को अपने नीचे ले लेता है और ऊपर से पूरी तरह उसे ढक के अपने लण्ड को रज़िया की चूत के आख़िर तक पेलने लगता है-“आह्ह… अम्मी आपने आपकी चूत मुझे देकर मेरी जिंदगी बना दी अह्ह…”

रज़िया काँपती आवाज़ में-“तुझे नहीं देती तो जिंदगी भर पछताती रहती अमन अह्ह…”

पिछले 30 मिनट से अमन रज़िया को लगातार चोद रहा था। जिस्म पशीने से पूरी तरह भीग चुका था। दो जोरदार झटकों के बाद अमन अपनी रज़िया की चूत को पूरी तरह भर देता है और साथ-साथ रज़िया भी अमन के लण्ड को नहला देती है।

दोनों एक दूसरे को चूमते हुये वहाँ एक दूसरे की बाहो में शांत हो जाते हैं।

रज़िया अमन को चूमती हुई-“सच बताओ ना आज इतनी जल्द कैसे आ गये?”

अमन-“अरे मेरी जान, मुझे आज शाम को 7:00 बजे की फ्लाइट से दिल्ली जाना है। वहाँ एक बहुत बड़ा प्रॉजेक्ट मिला है गारमेंट्स का…”

रज़िया-“ह्म्म्म्मम… तभी तो मैं सोचूँ कि आज अपनी अम्मी की याद इतनी जल्द कैसे आ गई। वैसे कितने दिनों के लिए जा रहे हो?”

अमन-एक हफ़्ता लग सकता है

रज़िया-“एक हफ़्ता… आप अनुम को साथ लेकर जाओ क्योंकि वहाँ कोई तो चाहिए जो खाने पीने का ख्याल रख सके? वरना आप तो बस काम काम में ऐसे बिजी हो जाते हो कि खाने के लिए टाइम है नहीं निकाल पाते…”

अमन-“एक काम करता हूँ , सोफिया को लेकर चला जाता हूँ । वो कुछ दिन पहले कह रही थी कि घर में बोर हो जाती हूँ । उसे एक हॉलीडे भी मिल जाएगा और शॉपिंग भी करवा दूँगा उसे…”

रज़िया-“ये ठीक रहेगा। अच्छा मेरे लिए क्या लाओगे वहाँ से?”

अमन-ब्रा और पैंट ।

रज़िया-“हेहेहेहे… हमेशा बस यही कहते हो, बेशरम कहीं के… अब जल्द से तैयार हो जाओ, मैं सोफिया को ये बात बताकर आती हूँ …”

अमन फ्रेश होने बाथरूम में चला जाता है और रज़िया सभी घर वालों को ये खबर बता देती है कि अमन एक हफ्ते के लिए दिल्ली जा रहा है। ये कोई नई बात नहीं थी घर वालों के लिए। अमन इससे पहले भी कई बार 10-15 दिनों के लिए बाहर जाया करता था।

जीशान अपने रूम में बैठा था, जब उसके कानों तक ये बात पहुँची थी। वो उठकर रज़िया के पास आता है-“ दादी , और कौन साथ जा रहा है?”

रज़िया-“सोफिया भी साथ जा रही है। क्यूँ तुझे भी जाना है क्या?”

जीशान-“नहीं , मेरा तो कालेज है ना…” दोनों दादी पोते बातें कर रहे थे कि तभी वहाँ लुबना आती है वो अभी-अभी कालेज से आई थी। चेहरे पे गुस्सा था जो जीशान के लिए था।

लुबना-“भाई आप कितने लापरवाह हो गये हो, कम से कम मुझे बताकर तो जाते कि घर जा रहे हो। मैं एक घंटे से आपका इंतजार कर रही थी आखिरकार मुझे आटो से आना पड़ा…”

जीशान-“फोन है ना तेरे पास, इश्तेमाल क्यों नहीं करती? इडियट…”

लुबना दाँत पीस के रह जाती है, और रज़िया की तरफ देखने लगती है-“देखा दादी , ये भाई अपनी गलती मानने के बजाए खुद मुझे इडियट कह रहे हैं…”

रज़िया मुस्कुराते हुये-“भाई, मुझे तुम दोनों के चक्कर में नहीं पड़ना। अभी लड़ते हो और दूसरे ही पल मिल जाते हो। मुझे बहुत काम है मैं चलती हूँ …”

सोफिया अपने रूम में, दिल्ली जाने के लिए पेकिंग कर रही थी, उसके चेहरे पे खुशी साफ झलक रही थी। लुबना उसके रूम में आकर उसके बेड पे बैठ जाती है। वो अभी भी जीशान के बारे में सोच रही थी। उसे पता भी नहीं था कि सोफिया बाहर जा रही है।

सोफिया उसका कंधा हिलाती है-“क्या हुआ लुबु, क्या सोच रही है?”

लुबना-“हाँ… नहीं कुछ नहीं , ये आप क्या कर रही हो? कहीं जा रहे हैं क्या हम?

सोफिया-“हम नहीं , सिर्फ़ मैं अब्बू के साथ दिल्ली …”

लुबना-“क्या? क्यों मैं क्यों नहीं ?”

सोफिया-“अरे बाबा, दादी ने अब्बू के खाने का ख्याल रखने के लिए मेरी ड्यूटी उनके साथ लगा दी है, पर मैं बहुत खुश हूँ । अब्बू के साथ खूब शॉपिंग करूँगी वहाँ…”

लुबना बुरा सा मुँह बनाकर अपने रूम में चल जाती है।

शाम 5:00 बजे-

अमन अनुम और शीबा का मूड ठीक करके और उनका मुँह मीठा कराके जब हाल में आता है तो वहाँ सभी उसका इंतजार कर रहे होते हैं-“अरे जीशान बेटा, वो जरा मेरे रूम की अलमारी से ऑफिस की रेड कलर की फाइल तो लेकर आना…”

जीशान-“जी अब्बू …” और वो अमन के रूम में जाकर अलमारी खोलने लगता है। इधर-उधर देखने के बाद फाइल कहीं नहीं मिलती तो वो लाकर खोलकर देखता है। उसे वहाँ रेड फाइल तो नहीं बल्की ब्लू कलर की फाइल मिलती है, जिसपे लिखा हुआ था ‘ओफीशियल’

जीशान उसे खोलकर देखता है तो आँखें चौंधिया जाती हैं। वो अमन की पर्सनल फाइल थी और सभी पर्सनल दस्तावेज़ थे। पहला पेज देखते ही जीशान सदमे में पड़ जाता है, वो अमन और अनुम का निकाहनामा था।

अमन-“जीशान बेटा, फाइल मिल की नहीं ?”

जीशान हड़बड़ाकर देखते हुए -“जी अब्बू लाया…” इधर-उधर देखने के बाद उसे रेड कलर की वो फाइल भी मिल जाती है। वो लाकर बंद करता है और वो ब्लू फाइल को अलमारी के ऊपर रख कर रेड वाली फाइल हाल में ले आता है।

जीशान-ये लीजिए अब्बू ।

अमन और सोफिया घर के सभी लोगों से मिलकर दिल्ली के लिए निकल जाते हैं।

जीशान के चेहरे पे अजीब से भाव थे। वो एकटक अनुम को देख रहा था। जब अनुम की नजरें जीशान से मिलती हैं तो कुछ पल के लिए दोनों खामोशी से एक दूसरे को देखे जाते हैं।

किसी के खांसने से दोनों वापस इस दुनियाँ में आ जाते हैं, और जीशान सर खुजाता हुआ अपने रूम में चला जाता है।

 
रात 10:00 बजे-

सभी अपने-अपने रूम में जा चुके थे। शीबा दूध का ग्लास लेकर जीशान के रूम में जाती है। जीशान कंप्यूटर पे कुछ नोट्स बना रहा था। पर दिमाग़ तो अभी भी उस फाइल पे टिका हुआ था।

शीबा-“जीशान बेटा, दूध पीलो…” वो अपनी बड़ी-बड़ी चुचियों के सामने दूध का ग्लास लिये खड़ी थी।

जीशान उठकर शीबा के पास आता है। दोनों की आँखें मिलती हैं और साँसे भी।

जीशान शीबा से कुछ पूछना चाहता था… शायद फाइल वाली बात। पर कुछ सोचकर खामोश रह जाता है।

शीबा-क्या हुआ जीशान , गरम दूध चाहिए?

जीशान-“हाँ… एकदम गरम ताजा…”

शीबा-“इस वक्त गरम दूध कहाँ मिले गा बेटा?”

जीशान अचानक दोनों हाथ शीबा की चुची पे रख देता है-“यहाँ…”

शीबा सिहर जाती है-“अह्ह… छोड़ मुझे… अपनी अम्मी के साथ भला कोई ऐसी हरकत करता है क्या?”

जीशान एक बार फिर से शीबा की चुची मसलता है, और अपने होंठ शीबा के होंठों के पास लाकर छोटी सी किस करता है-“गुडनाइट अम्मी…”

शीबा के होंठ लरज के रह जाते हैं। वो दूध का ग्लास टेबल पे रख देती है और जीशान की गर्दन के पीछे अपना हाथ डालकर एक ही पल में जीशान के होंठों को अपने मुँह में ले लेती है। वो जीशान के होंठों को इतने आवेश में किस करती है कि जीशान को अनुम के वो लाल रसीले होंठ जो उसे बचपन से परेशान करते आये हैं, जिन्हें चूमने की ख्वाहिश में अब तक जीता आया है, वो नजरों के सामने घूम जाते हैं और वो अनुम समझ के शीबा के होंठों को चूसने लगता है।

5 मिनट के बाद पता नहीं शीबा को क्या होता है कि वो जीशान से अलग हो जाती है और बाथरूम में चल जाती है।

जीशान के पास यही वक्त था। वो भागकर शीबा के रूम में जाता है और वो फाइल निकालकर वापस अपने रूम में आकर बेड के नीचे छुपा देता है।

कुछ देर बाद शीबा जीशान के बाथरूम से बाहर निकलती है और बिना कुछ बोले अपने रूम में चल जाती है।

जीशान को यकीन नहीं हो रहा था कि शीबा, उसकी अम्मी उसके साथ ये कैसा व्यवहार कर रही है? पर दिल ही दिल में वो इन सब बातों से बहुत खुश था। भला कौन कम्बख़्त चूत की खुश्बू से खुश नहीं होगा? वो दरवाजा बंद कर देता है और वो फाइल बेड के नीचे से निकालकर देखने लगता है।

पहला दस्तावेज़ अमन और अनुम के निकाहनामा था।

दूसरा अमन और रज़िया का निकाहनामा था।

तीसरा अमन और शीबा के निकाहनामे का था।

उसका दिमाग़ चकरा जाता है।

उसके नीचे जीशान का बर्थ सर्टिफिकेट था।

उसके नीचे सोफिया, फिर लुबना और एक नग़मा का बर्थ सर्टिफिकेट था।

जीशान खुद की डेट आफ बर्थ जानता था। पर जब वो सोफिया और लुबना की बर्थ डेट नग़मा के बर्थ डेट के साथ मैच करता है तो दिमाग़ की घंटियाँ बजने लगती हैं।

सोफिया की डेट आफ बर्थ 20 अप्रेल 1980 थी।

जीशान की 25 अप्रेल 1980।

नग़मा की 7 जुलाइ 1980।

और लुबना की 2 फ़रवरी 1982।

वो सोच में पड़ जाता है कि ये कैसे हो सकता है? उसे सारी बात समझ में आ जाती है। वो ये बात तो जान चुका था कि उसके अब्बू ने अपनी अम्मी और बहन से भी शादी की थी और उन्हें प्रेग्नेंट भी किया था। बस उसे ये पता करना था की रज़िया, अनुम, और शीबा में से उसकी अम्मी कौन सी है?

दिमाग़ में बहुत कुछ चल रहा था। उसे पूरा यकीन था कि हो ना हो रज़िया या अनुम इन दोनों में से कोई एक उसकी अम्मी ज़रूर है। और यही बात उसे अमन के लौटने से पहले पता करनी थी। वो इन्ही बातों के साथ बेड पे लेट जाता है और थकान की वजह से फौरन सो जाता है।

सुबह जब जीशान की आँख खुली तो सुबह के 9:00 बज रहे थे। उसके सर में बहुत दर्द था। वो फ्रेश होने बाथरूम में घुस जाता है। जब वो बाहर आता है तो उसे नग़मा और लुबना रूम में बैठी मिलती हैं।

लुबना-“भाई, आप जल्द से नाश्ता कर लो…”

जीशान-क्यों, क्या बात है?

लुबना-“नग़मा, मैं, दादी और अम्मी फ़िज़ा आंटी के यहाँ जा रहे हैं…”

जीशान-फुफुई नहीं जा रही क्या?

नग़मा-“नहीं भाई, उन्हें घर पे कुछ काम है, वो नहीं आएँगी। आप फटाफट नाश्ता कर लो और हमें फ़िज़ा आंटी के यहाँ ड्रॉप कर दो…”

जीशान पैंट पहनकर डाइनिंग टेबल की तरफ बढ़ जाता है। नाश्ता करने के बाद सभी बाहर जीशान की कार में इंतजार कर रहे थे।

अनुम घर पे रुकने वाली थी।

जीशान कार की ड्राइविंग सीट पे बैठ जाता है। पास में लुबना बैठी हुई थी, उसके चेहरे पे मुस्कान थी। पर जीशान अंदर ही अंदर जल रहा था। उसका दिल तो चाह रहा था कि कार किसी ट्रक से दे मारे और हमेशा-हमेशा के लिए इस दुनियाँ से निजात पा ले। पर उसे पहले सच जानना था, वो सच जो उसकी जात से तालुक रखता था। वो बोझिल मन से कार फ़िज़ा के घर की तरफ दौड़ा देता है। जब कार फ़िज़ा के घर पहुँचती है तो सभी नीचे उतर जाते हैं, और जीशान को भी अंदर चलने के लिए कहते हैं।

पर जीशान दोस्त से मिलने का बहाना बनाकर अपने घर की तरफ निकल जाता है।

अनुम अपने बेडरूम में बैठी हुई थी। उसे उस बात का अफसोस था कि उसने अपने बेटे के गाल पे थप्पड़ क्यों मारा?

जीशान अपने हाथ में अनुम और अमन के निकाहनामे के वो कागज लेकर अनुम के रूम में पहुँचता है।

अनुम जीशान को देखकर खड़ी हो जाती है। वो उसकी तरफ बढ़ती है उसे मनाने के लिए।

पर जीशान अनुम को हाथ के इशारे से अपनी तरफ आने से रोक देता है-“मैं यहाँ कुछ पूछने आया हूँ , उम्मीद करता हूँ आप मुझे सच बताएँगी…”

अनुम धीमी आवाज़ में कहती है-“पूछो क्या पूछना चाहते हो?”

जीशान अपने हाथ में का वो कागज अनुम के हाथ में दे देता है।

उस कागज पे जैसे ही अनुम की नजर पड़ती है, उसके होश उड़ जाते हैं। वो खुद को किसी खाई में गिरता महसूस करती है, साँस लेना मुहाल हो जाता है और वो मुँह खोलकर जीशान की तरफ देखने लगती है।

जीशान आगे बढ़ता है-“मैं जान चुका हूँ कि आज से 20 साल पहले आपने और अब्बू ने शादी की थी। मुझे उस शादी की वजह बताओ और ये भी बताओ कि मैं आप तीनों में से किसका बेटा हूँ ?”

अनुम काँपने लगती है। उसे समझ में नहीं आता कि वो क्या कहे? वो सभी मिलकर जिस तूफान को पिछले 20 सालों से रोके हुये थे, आज वो तूफान आ चुका था और आज वो अपने साथ सभी को ले जाने वाला था, जो भी उसके रास्ते में आता फना हो जाता। अनुम साँस लेने के लिए खिड़की के पास आ जाती है।

जीशान झटके से उसे अपनी तरफ मोड़ देता है, और एक गरजदार आवाज़ जीशान के मुँह से निकलती है-“मुझे बताओ, आखिर वो क्या वजह थी? और किसका बेटा हूँ मैं?”

अनुम काँपती हुई आवाज़ में कहती है-“मेरे बेटे हो तुम जीशान…”

जीशान एक बार और चिल्लाता है-“अम्मी, तुमने ऐसा क्यों किया?”

अनुम रोने लगती है। पर आज उसे समझाने वाला कोई नहीं था। वो सिसकती रही , पर जीशान ने उसे नहीं मनाया। वो उसी तरह खड़ा रहा।

अनुम-“तुम जानना चाहते हो ना मैंने ऐसा क्यों किया? तो सुनो…” और अनुम अपने पास्ट की वो किताब खोल देती है। उस किताब के हर पन्ने पे अमन और अनुम की मोहब्बत दर्ज थी। वो सारे जज़्बात खिले हुये थे जो अनुम अमन के लिए महसूस करती थी। अनुम अपनी जिंदगी की बातें जीशान के सामने खोल रही थी और जीशान के चेहरे के आसार बदलते चले जा रहे थे।

जब अनुम खामोश होती है तो उसके चेहरे पे सकून था। वो खुश थी कि आज उसने अपने अंदर छुपे हुये उस राज को बाहर निकालकर फेंक दिया, जो उसे तिल-तिल मार रहा था।

जीशान चुपचाप वहाँ से चला जाता है।

और अनुम भीगी पलकों से जीशान, अपने बेटे को जाता देखती रह जाती है। दिल के किस्से ज़ुबान पर आ चुके थे

***** *****

 


उधर दिल्ली में सोफिया और अमन अपने होटेल के रूम में बैठे हुये थे।

अमन-“बेटा मैं फ्रेश हो जाता हूँ उसके बाद तुम भी फ्रेश हो जाना…”

सोफिया-“जी अब्बू …”

और अमन बाथरूम में चला जाता है। वो रात के थके हुये थे इसलिए आज सुबह देर तक सोए थे। अमन बाथरूम से सोफिया को आवाज़ देता है-“सोफिया बेटा, जरा तौलिया तो देना मैं लाना भूल गया…”

सोफिया-“जी अब्बू …” और सोफिया तौलिया लेकर बाथरूम के पास जाती है-“ये लो अब्बू तौलिया…”

अमन जैसे ही तौलिया लेने हाथ बाहर निकालता है उसका पैर स्लिप हो जाता है और दरवाजा खुल जाता है। अमन बिल्कुल नंगा अपनी बेटी सोफिया के सामने आ जाता है। सोफिया की नजर जैसे ही अमन के लण्ड पे पड़ती है, वो चीख पड़ती है।

अमन बाथरूम में रज़िया को सोच-सोचकर लण्ड की मालिश कर रहा था, जिसकी वजह से उसका लण्ड एकदम खड़ा हुआ था। वही खड़ा लण्ड सोफिया ने देख लिया था।

सोफिया भागकर बेड पे बैठ जाती है।

कुछ देर बाद जब अमन बाहर आता है तो उसके चेहरे पे हल्की सी मुस्कान थी। वो सोफिया से नजरें नहीं मिला पाता और नाश्ता करने लगता है।

सोफिया उठकर बाथरूम में घुस जाती है। वो अपने कपड़े उतारकर तौलिया जिस्म से लपेट लेती है। उसके दिल की धड़कनें आज उसका साथ नहीं दे रही थीं। जिंदगी में पहली बार उसने इतना मोटा, इतना लम्बा लण्ड देखा था। वो तौलिया निकालकर बाथटब में बैठ जाती है। जैसे ही जिस्म से पानी छूता है एक दिलफरेब सरसराहट पूरे जिस्म में दौड़ जाती है। उसके हाथ खुद-बा-खुद अपनी जाँघ की तरफ बढ़ जाते हैं, और धीरे-धीरे वो उंगलियाँ सोफिया की चिकनी कुँवारी चूत पे जाकर रुक जाती है।

सोफिया के साँस अटक जाती है। धीरे-धीरे वो आँखें बंद कर लेती है, और उसे वही खड़ा लण्ड अपनी नजरों के सामने दिखने लगता है। चूत पे हाथ का दवाब बढ़ता जाता है और कुछ ही देर में सोफिया की चूत से अपने अब्बू के नाम का पानी बहने लगता है। सोफिया घबराकर बाथटब में बैठ जाती है।

तभी बाहर से अमन की आवाज़ आती है-“सोफिया बेटा, मैं बाहर जा रहा हूँ दो घंटे में वापस आ जाऊूँगा…”

सोफिया-“जी अब्बू …” सोफिया की चुचियाँ तन चुकी थी और हवा में झूल रही थीं। वो किसी तरह नहाकर बाहर आ जाती है। रूम बिल्कुल वाली था। वो दरवाजा बंद कर देती है। उसे घबराहट भी हो रही थी और दिल पता नहीं किस बात पे मचल भी रहा था।

वो कुछ देर सोना चाहती थी। वो बेड पे लेट जाती है। और कुछ ही पलों में उसकी आँख भी लग जाती है। उसे बड़ी गहरी नींद लगी हुई थी। जिस्म बिल्कुल शांत था पर दिमाग़ में वही सब घूम रहा था। उसे एक ख्वाब दिखाई देता है। ख्वाब में वो खुद को सोता हुआ पाती है। वो देखती है कि उसके अब्बू उसके पास बैठे हुये हैं, और अपना लण्ड बाहर निकालकर सोफिया के मुँह के करीब ला रहे है। सोफिया का मुँह अपने आप खुल जाता है और वो लण्ड उसके मुँह में जाने लगता है।

फिर वो देखती है कि उसके अब्बू उसके मुँह में अपना लण्ड अंदर-बाहर कर रहे हैं, और वो भी अपने अब्बू के लण्ड को बड़े प्यार से चूसरही है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

कुछ देर बाद उसके अब्बू उसे उल्टा करके उसकी पैंट नीचे खींच लेते हैं, और वो कुछ नहीं कह पाती। सोफिया की साँसें ख्वाब में तेज चलने लगती हैं। वो ऐसे महसूस करती है जैसे अमन उसकी गाण्ड में अपना लण्ड रगड़ रहा है और उसके पैर खुद-बा-खुद खुलते चले जाते हैं। वो देखती है कि अमन उसके पैर चौड़े करके अपना लण्ड उसकी चूत में डालकर उसे चोदने लगता है।

और सोफिया हड़बड़ाकर उठ जाती है। पूरा जिस्म पसीने में नहा चुका था। उसका दिल इससे पहले कभी इतने जोरों से नहीं धड़का था। वो जल्द से उठकर बैठ जाती है और पानी पीने लगती है। उससे यकीन नहीं हो रहा था कि उसने ख्वाब में ये सब देखा।

पर आज पहली बार सोफिया का दिल बहुत खुश था। एक अींजना सा एहसास उसे सता रहा था। वो गाना गुनगुनाती हुई अपने अब्बू का इंतजार करने लगती है।

सोफिया अपने ख्यालों में वोई हुई थी। तकरीबन दो घंटे बाद जब अमन रूम में आता है तो वो बहुत खुश लग रहा था। सोफिया अपने अब्बू के पास जाती है। आज पहली बार वो अमन से नजरें नहीं मिला पा रही थी, बल्की आज उसकी आँखों में शर्म-ओ-हया के हल्के-हल्के भाव थे।

सोफिया-“क्या बात है अब्बू , आप बहुत खुश लग रहे हैं?”

अमन सोफिया को अपने पास खींच लेता है-“हाँ बेटा, आज मैं बहुत खुश हूँ । मैं जिस काम के लिए यहाँ आया था, वो गारमेंट्स का प्रॉजेक्ट मुझे मिल गया…”

सोफिया उछलते हुये-“ओऊऊओि… ये तो बहुत अच्छी बात है। इस बात पे पार्टी तो बनती है…” दोनों बाप-बेटी हँसने लगते हैं।

अमन-“हाँ ज़रूर… आज लंच के बाद हम शॉपिंग करने चलेंगे। उसके बाद किसी अच्छे से होटेल में डिनर ओके…”

सोफिया अपने अब्बू के सीने से लग जाती है। आज ये सीने से लगना आम दिनों जैसा नहीं था, आज उसमें मोहब्बत थी, एक बाप-बेटी की नहीं बल्की इसमें कोई और ही रंग था।

अमन-“एक सरप्राइज भी है तुम्हारे लिए…”

सोफिया-“वो क्या अब्बू ? प्लीज़ प्लीज़ … जल्द बताइए ना…”

अमन सोफिया का हाथ अपने हाथ में लेता है-“वो तो आपको डिनर के बाद ही पता चलेगा…”

सोफिया बहुत खुश थी। वो अपने अब्बू से इतनी फ्री कभी नहीं हो पाई थी। आज वो जिंदगी जीना चाहती थी। लंच के बाद दोनों बाप-बेटी शॉपिंग करने निकल पड़ते हैं। सोफिया को जो ड्रेस पसंद आती अमन उससे वो खरीद लेता। अमन कुछ देर के लिए सोफिया को एक शाप में छोड़कर पास की शाप में चला जाता है और जब वो वापस आता है तो उसके पास एक पैकेट होता है।

सोफिया वो पैकेट देख लेती है-अब्बू , क्या है इसमें?

अमन-तुम्हारा सरप्राइज।

सोफिया की आँखें चमक उठती हैं। पता नहीं अब्बू क्या लाए होंगे मेरे लिए? वो जल्द से जल्द उस पैकेट को खोलकर देखना चाहती थी। पर अमन उसे ऐसा करने नहीं देता। रात के 8:00 बज चुके थे और दोनों बाप-बेटी वापस होटेल आ जाते हैं।

अमन ने खुद के लिए एक शर्ट-पैंट और उसपे कोट खरीदा था। जब वो उसे पहनकर रूम में आता है, जहाँ सोफिया तैयार खड़ी थी तो सोफिया अमन को देखती रह जाती है। अमन एक खूबसूरत शख्शियत का आदमी था। वो हर ड्रेस में किसी फिल्म स्टार से कम नहीं लगता था। ऊूँचा लंबा क़द उसपे मस्क्युलर बाडी, चेहरे पे हमेशा एक दिलकश मुस्कान लिए अमन अपनी बेटी के सामने खड़ा था, पूछा -कैसा लग रहा हूँ ?

सोफिया दिल में सोचती है-“बिल्कुल मेरे सपनों का राजकुमार…” फिर बोल -“बहुत अच्छे लग रहे हैं आप अब्बू …”

अमन अपने बेटी का हाथ पकड़कर उसे डांसिंग स्टेप करते हुये झुका देता है-तो डिनर के लिए चलें?

सोफिया अपने अब्बू के हाथ में हाथ डाले एक फ़ाइव स्टार होटेल में डिनर के लिए चल देती है। जब वो होटेल में पहुँचते हैं तो सोफिया वहाँ की रौनके देखती ही रह जाती है। इससे पहले वो कभी इस तरह के होटेल में खाना खाने के लिए नहीं आई थी।

बेहद डेकरेटेड होटेल था जिसमें एक तरफ कपल्स डिनर का मजा ले रहे थे और दूसरी तरफ कुछ कपल्स डान्स कर रहे थे। एक मुलाज़िम अमन और सोफिया को एक टेबल की तरफ ले जाता है जो पहले से अमन ने बुक की हुई थी। अमन और सोफिया चेयर पे बैठ जाते हैं।

अमन-कैसा लग रहा है सोफिया?

सोफिया-“बहुत खूबसूरत होटेल है अब्बू । थैंक यू सो मच, मुझे आपके साथ लाने के लिए…”

अमन-“पर बेटा, तुमने ये शाल क्यों ओढ़ रखी है, इतने सारे ड्रेस तो खरी दे हैं हमने…”

सोफिया-“आपको सरप्राइज देने के लिए…” और फिर सोफिया अपने जिस्म पे लिपटी हुई वो पतली सी शाल निकालकर पास की चेयर पे रख देती है।

सफेद कलर के उस खूबसूरत ड्रेस में सोफिया को जब अमन देखता है तो देखता ही रह जाता है। कुछ पलों के लिए तो उसे ऐसे महसूस होता है, जैसे रज़िया उसके सामने बैठी हुई है।

सोफिया इतराते हुये अमन की आँखों में देखते हुये पूछती है-कैसी ड्रेस है?

अमन-ड्रेस तो फॉर्मल है, पर उसे पहनने वाली लड़की जन्नत की हूर से कम नहीं लग रही है।

सोफिया का चेहरा इतने तारीफ़ सुनकर टमाटर के तरह लाल हो जाता है। और फिर सोफिया अमन से नजरें नहीं मिल पाती। वो बस चुपचाप डिनर करने लग जाती है। क्योंकी उसका दिल इतने जोरों से धड़क रहा था कि अगर अमन उसकी थोड़ी और तारीफ़ कर देता तो शायद वो धड़कना बंद कर देता।

डिनर के बाद अमन सोफिया को उस डान्स फ्लोर पे ले जाता है। कोई भी आज उन दोनों को देखकर ये नहीं कह सकता था कि ये दोनों बाप-बेटी हैं। बल्की जिस किसी की भी नजर उनपे पड़ती वो यही समझता कि ये दोनों पति-पत्नी हैं और वो देख भी कुछ ऐसे ही रहे थे।

अमन के मजबूत हाथों में जब सोफिया अपना हाथ देकर उसके पास खड़ी हो जाती है तो आस-पास के डान्स करने वालों के सीने जल के राख हो जाते है। सोफिया की खूबसूरती और अमन की पर्सनलटी जैसा कोई कपल उस वक्त वहाँ मौजूद नहीं था।

दोनों एक दूसरे की आँखों में देखने लगते हैं।

सोफिया-अब्बू , आपको अम्मी की याद आ रही होगी? है ना?”

अमन-“बिल्कुल नहीं , क्योंकी मेरी प्यारी सी परी मेरे साथ है और सच कहूँ तो जब तू मेरे साथ होती है तो दुनियाँ का कोई शख्स मुझे याद नहीं रहता…”

सोफिया-“अह्ह… आप बातें बड़ी रोमांटिक करते हैं। अम्मी तो आपकी फैन रही होंगी, जब आप उनसे पहली बार मिले होंगे?”

अमन-“नहीं , मैं तेरी अम्मी का बहुत बड़ा फैन हूँ …”

दोस्तों, उस वक्त अमन के दिमाग़ में रज़िया के तस्वी”र थी और सोफिया के दिमाग़ में शीबा की।

दोनों एक दूसरे से चिपक के डान्स करने में खो जाते हैं। तभी एक रोमांटिक गाना बजने लगता है और सभी रोशनियाँ कम कर दी जाती हैं। कोई एक दूसरे को नहीं देख पा रहा था बस हर कोई अपने साथी के साथ इस मौके का फायदा उठा रहा था, कोई किस करने में लगा हुआ, था तो कोई मसलने में।

अमन और सोफिया भी इस माहौल का शिकार हो गये थे। वो डान्स करते-करते एक दूसरे के इतने करीब आ चुके थे कि उन दोनों की साँसे एक दूसरे से टकरा रही थीं।

सोफिया के होंठ कंपकंपा रहे थे और अमन का एक हाथ नीचे सरकते-सरकते सोफिया की कमर तक पहुँच चुका था। अमन के होंठ धीरे-धीरे आगे की तरफ बढ़ते चले जाते हैं और कुछ पालों बाद वो सोफिया के नाजुक गुलाबी होंठों से चिपक जाते हैं।

सोफिया का पहला किस अपने अब्बू के नाम।

 
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