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अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ complete



रज़िया के मुँह से बस यही निकलता है-“इतना बड़ाऽऽऽ?”

जीशान अभी भी चीख रहा था। रज़िया को जैसे होश आता है और वो काँपते हाथों से जीशान के लण्ड को पकड़ लेती है। रज़िया के हाथ में लेते ही जीशान अपने लण्ड को छोड़ देता है।

रज़िया-“कहाँ काटा? मुझे तो कुछ नहीं दिखाई दे रहा…” रज़िया की आँखें जीशान के लण्ड को हर तरफ से देखने लगती हैं। अपनी दोनों मुत्ठियों में लण्ड को पकड़कर जैसे रज़िया उसका साइज नापने की कोशिश कर रही थी।

जीशान-“मुझे काटा है और आप कुछ नहीं कर रह हो दादी …”

रज़िया-“मैं क्या?” वो जैसे ही बोलने के लिए मुँह खोलती है, जीशान अपने लण्ड को सीधा रज़िया के गले में उतार देता है-गलप्प्प गलप्प्प।

जीशान-“दादी बहुत तड़पाया है मुझे आपने अह्ह… मगर आज नहीं । आज मेरी रात है जो मैं आपके साथ गुजारना चाहता हूँ …”

रज़िया अपने मुँह से लण्ड निकालकर जोर-जोर से साँस लेने लगती है-“अह्ह… मुझे पता था त नाटक कर रहा है जीशान… मगर मैं भी इसे अपने मुँह में लेने के लिए तड़प गई थी गलप्प्प-गलप्प्प। मेरे अमन की याद दिला दिया तूने मुझे… गलप्प्प-गलप्प्प…”

जीशान को यकीन नहीं होता कि रज़िया भी वही चाहती थी, जो वो चाहता था। उसे तो लग रहा था कि उसे कई पापड़ बेलने पड़ेंगे। मगर रज़िया की बातों से साफ जाहिर हो रहा था कि आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी। जीशान अपनी लाई हुई वो नाइटी रज़िया के जिस्म से अलग कर देता है और रज़िया भी सिर्फ़ पैंटी में रह जाती है। रज़िया तो जैसे लण्ड छोड़ने के लिये तैयार ही नहीं थी।

जीशान-“अह्ह… दादी बस भी करो, पानी तुम्हारे मुँह में निकल जाएगा…”

रज़िया-“मुझे वही पीना है पहले। मैं जानती हूँ तेरा पहला पानी बहुत जल्दी निकल जाएगा, मगर दूसरी बार तू जल्दी ठंडा नहीं होगा गलप्प्प… मैं भी तो देखूं मेरे पोते के पानी में कितनी मिठास है गलप्प्प…”

जीशान सच में काँपने लगता है और झटके मारते हुई पानी अपनी दादी के मुँह में छोड़ने लगता है-“अह्ह… दादी अह्ह…”

रज़िया इस खेल की माहिर खिलाड़ी थी। वो पानी पीने के बाद फिर से जीशान के लण्ड पर मेहनत करने लगती है और उसे अपनी पैंटी निकालकर अपनी चूत दिखाते हुई उसके लण्ड को फिर से चूसने लगती है गलप्प्प-गलप्प्प। छोटा जीशान अपनी दादी की चूत को देखकर फिर से खड़ा होने लगता है, और फिर से अपने असल आकर में आ जाता है।

रज़िया बेड पर लेट जाती है-“चल आ जा…”

जीशान रज़िया को एक करवट लेटा देता है और पीछे से उसे चिपक जाता है।

रज़िया-“उम्ह्ह… अब डाल भी दे… तू भी अपनी रज़िया का मजा चख ले जीशान… तेरे अब्बू ने तो मुझे जवान किया था, अब तेरी बारी है मेरे लाल। कर दे अपनी रज़िया की चूत में तेरे लण्ड के धक्कों के बारिश अह्ह…"

जीशान अपने लण्ड को अपने दादी की चूत में डाल देता है-“दादी जीईई अह्ह… आपकी चूत अह्ह…”

रज़िया-“दादी नहीं , रज़िया जीशान… इस चूत में जो भी आया वो मेरा हो गया हमेशा-हमेशा के लिए… तेरे अब्बू ने मुझे चोदा, वो बेटे से शौहर बन गये। अब तू मेरा पोता इसमें आया है, आज से मैं तेरी दादी नहीं और तू मेरा पोता नहीं अह्ह… बस मैं तेरी गुलाम हूँ , जो करना है कर ले, जैसे करना है कर ले अह्ह… ये रज़िया अब मरते दम तक तुझसे चुदेगी राजा अह्ह… सच कहूँ तो इतनी गहराई तक तो अमन भी नहीं गया कभी उम्ह्ह…”

जीशान अपनी रज़िया को अपने लण्ड के लम्बाई बताने के लिए उसे अपने ऊपर बैठा देता है और लण्ड को और अंदर तक घुसाकर रज़िया को चोदने लगता है-

“रज़िया मेरी जान, मुझे पहले बोल देती तो मैं तुझे कब का चोद देता अह्ह…”

रज़िया-“उम्ह्ह… अब भी देर नहीं हुई… अमन ने मुझे वो तोहफा दिया है तेरी सूरत में उम्ह्ह… मैं भी तुझे पाने के लिए तड़प रही थी, बस अपने दिल के हाथों मजबूर थी बेटा अह्ह…”

अपनी रज़िया की चूत की गर्मी और पहली बार दादी को चोदने के जोश में जीशान का पानी दूसरी बार बाहर निकालने लगता है, और रज़िया की चूत पहली बार अपने जीशान के पानी से नहा लेती है। मगर दोनों जानते थे कि रात तो अभी जवान हुई है, अभी पूरी रात बाकी है, और ये रात रज़िया जीशान को सोने देने वाली नहीं थी। दोनों एक दूसरे के होंठों को चूमते हुये अपने रिश्ते को मुकम्मल करने लगते हैं। जीशान बहुत जल्दी दो बार झड़ चुका था। वो रज़िया के बगल में लेटकर लम्बी -लम्बी साँसे लेने लगता है।

रज़िया उसकी छाती पर के घने बालों में अपने उंगलियाँ डालकर उसके गाल को चूमने लगती है-“क्या बात है मेरा शेर तो बड़ी जल्दी थक गया है?”

जीशान रज़िया की तरफ देखता है-“थका नहीं हूँ , बस उत्तेजना में साँस फूल गई है…”

रज़िया-“कोई बात नहीं , मैं हूँ ना अपने इस जवान शेर को ऐसा ख़ूँख़ार बना दूँगी कि तेरी बीवी तुझसे पनाह माँगेगी…”

जीशान रज़िया को अपने ऊपर खींच लेता है, और दोनों हाथों से उसकी कमर को मसलने लगता है।

रज़िया-“आज तूने मुझे खुश कर दिया है जीशान… बोल तुझे क्या चाहिए? जो माँगेगा वो मैं तुझे दूँगी …”

जीशान-“सोच लो, जान भी माँग सकता हूँ ?”

रज़िया-“माँगकर तो देख? अगर नहीं दूँगी तो मेरा नाम रज़िया नहीं …”

जीशान रज़िया के हाथ में अपना लण्ड थमा देता है-“मुँह में लो इसे…”

रज़िया जीशान के लण्ड के पास बैठ जाती है और अपना सलाइवा उसके लण्ड पे गिराकर उसे मसलने लगती है। जीशान रज़िया को देखकर सोचने लगता है कि सही कहते है लोग कि मरना है तो अच्छे डाक्टर के पास मरो, और चोदना है तो पहले किसी बड़ी औरत को चोदो। रज़िया के हाथों में तो जैसे जादू था जीशान के लण्ड में इतने तेज़ी से जान आने लगती है।

रज़िया जीशान के लण्ड को देखकर मुश्कुरा देती है।

जीशान-क्या हुआ मेरी जान?

रज़िया-कुछ नहीं , आजकल के बच्चे भी ना बहुत जल्दी बड़े हो जाते हैं।

जीशान जोर से रज़िया के निपल्स को मरोड़ देता है और रज़िया अपनी चीख को छुपाने के लिए जीशान के लण्ड को मुँह में लेकर चूसने लगती है-गलप्प्प गलप्प्प।

जीशान-“अह्ह… दादी सच कहूँ आज तक किसी ने ऐसे मुँह में नहीं ल …”

रज़िया-“ओह्ह…” और अपने दाँतों से हल्के से जीशान के लण्ड को काट लेती है-“ऐसे कितनी चूतों में घुस चुका है ये?”

जीशान-“अह्ह… तेरी बेटी को चोदु , काट क्यों रही है?”

रज़िया-गलप्प्प-गलप्प्प।

जीशान के होंठ अपनी रज़िया की चूत को देखकर सूखने लगते हैं वो रज़िया की कमर अपनी तरफ कर लेता है और जैसे ही उसके मुँह के सामने रज़िया की चिकनी चूत और नरम गाण्ड आती है, वो भूखे भेड़िए की तरह उसपे अपना मुँह लगा देता है।

दोनों एक दूसरे की चूत और लण्ड को बुरी तरह चूसने लगते हैं। रज़िया अमन के साथ कई बार ऐसा कर चुकी थी। अमन उसकी गाण्ड को कई बार चाट चुका था, मगर आज उसकी गाण्ड में बेहद उतावलापन रज़िया महसूस कर रही थी। वो अक्सर अमन से कहती भी थी कि उसे चूत से ज्यादा गाण्ड में लेना पसंद है, मगर अमन चूत का भूका था।

पर आज जिस तरह से जीशान अपनी दादी की गाण्ड के पीछे पड़ा हुआ था, उससे रज़िया को समझते देर नहीं लगती कि जीशान उसकी हर ख्वाहिश को बिना बोले पूरे करेगा। जीशान रज़िया को कुतिया की तरह बनने को कहता है। रज़िया जैसे ही अपनी कमर को ऊपर उठाकर जीशान को दिखाती है, जीशान अपने उंगली को पहले अपने मुँह में लेकर गीला करता है, और फिर बिना रज़िया से कुछ कहे वो उंगली उसकी गाण्ड में डाल देता है।

रज़िया-“आह्ह… जीशान शन्न्न उन्ह…”

जीशान की वो उंगली इतनी तेज़ी से अंदर-बाहर होने लगती है कि रज़िया की चूत में पानी आते देर नहीं लगती और टप-टप करके उसकी चूत से चिकने पानी के की बूँदें बेड पर गिरने लगती हैं। रज़िया की गाण्ड चीख-चीख कर जीशान के लण्ड को बुला रही थी। रज़िया चुप थी। वो देखना चाहते थी कि जीशान क्या करता है?

अपने लण्ड को रज़िया की चूत से गीला करने के बाद जीशान उसे रज़िया के दोनों सुराखों पर घिसने लगता है।

रज़िया-“उन्ह… डाल भी दे अब आह्ह…”

जीशान-किसमें डालूँ रज़िया?

रज़िया-“उन्ह… जिसमें तेरे दिल कहे आज से हर सुराख तेरा है आह्ह…” रज़िया का दिल खुश हो जाता है क्योंकी जीशान ने भी वही सुराख चुना था जिसमें रज़िया उसका लण्ड लेना चाहती थी-“आह्ह… अजइईई आराम से ना आह्ह…”

रज़िया के आँखों के सामने अपने दोनों शौहर घूम जाते हैं। अमन और उसके अब्बू ने कभी रज़िया की इस बेरहमी के साथ गाण्ड नहीं मारी थी जिस अंदाज में जीशान रज़िया की गाण्ड मार रहा था।

जीशान रज़िया के बाल पकड़कर सटासट अपने लण्ड को उसकी गाण्ड में धूँसाते चला जा रहा था। रज़िया अपने मुँह में तकिया फँसाए अपनी चीखों को किसी तरह छुपा रही थी, मगर जीशान के झटके इतने तेज थे कि बार-बार उसका मुँह खुल जाता और वो अपने सिर को इधर-उधर पटक पटक के अपनी गाण्ड के दर्द को बर्दाश्त करने लगती

जीशान-“रज़िया, मैं जो माँगूंगा मुझे तू वो देगी ना? हाँ…”

रज़िया-“हाँ दूँगी दूँगी मेरे राजा आह्ह…”

जीशान-“मुझे सोफिया को चोदना है तेरे साथ एक बिस्तर पर पूरी नंगी करके आह्ह…”

रज़िया-“उन्ह… नहीं , उसे नहीं जीशान…”

जीशान-“क्या नहीं ? आह्ह…”

रज़िया की गाण्ड से पच-पच की आवाज़ें निकलने लगती हैं। चूत से लगातार पानी नीचे गिरने लगता है। उसे महसूस होने लगता है कि आज जीशान उसे जान से मार देगा।

जीशान-“अगर नहीं बोलेगी तो समझ ले ये आख़िरी बार इसमें गया है, आइन्दा नहीं जाएगा…”

रज़िया-“नहीं नहीं … ऐसा मत बोल्ल्ल्ल्ल बेटा, सोफिया क्या तू जिससे कहेगा मैं उसके सामने तुझसे चुदूँगी , बस अपने लण्ड को कभी दूर मत रखना मेरे से आह्ह…”

रज़िया जानती थी कि अगर उसने जीशान को मना भी किया तो जीशान उसकी बात मानेगा नहीं , और एक ना एक दिन वो सोफिया को ज़रूर चोदेगा। ये जानकर उसकी चूत और पनिया गई थी कि जीशान बहुत जल्दी माँ-बेटी को एक बिस्तर पर लेकर चोदेगा। वो रात रज़िया की एक हसीन तरीन रात साबित हुई। अपने पोते की बाहों में रज़िया को कई दिनों बाद बहुत सकून मिला था। अमन के जाने के बाद जो बिस्तर उसे काटने को दौड़ता था, आज उसी बिस्तर पे अमन का बेटा अपनी रज़िया को सकून पहुँचा रहा था। दोनों की आँखों से नींद गायब हो चुकी थी।

एक दूसरे के इतने करीब वो दोनों कभी नहीं आए थे और जब आए तो एक दूसरे से अलग होने को उनका दिल नहीं कर रहा था। जीशान सुबह के 4:00 बजे तक रज़िया को रूम में हर जगह चोदता रहा। आखिरकार, रज़िया को ही उसे कहना पड़ा कि जा जाकर सो जा वरना सुबह देर से उठेगा। रज़िया एक पेशेवर घुड़सवार की तरह अपने घोड़े को पहली ही रेस में थका देना नहीं चाहती थी। जीशान को वो लम्बी रेस का घोड़ा बनाना चाहती थी।

 
सुबह 6:00 बजे-

जीशान अपने रूम में अभी-अभी गया था, उसे बहुत प्यास लगती है तो वो उठकर किचेन में पानी पीने आता है। किचेन में सोफिया खड़ी पानी पी रही थी। जीशान को उस वक्त वहाँ देखकर उसे थोड़े हैरानी होती है, क्योंकी जीशान हमेशा अपने रूम में पानी की बोतल रखता था।

सोफिया उसे देखकर मुश्कुरा देती है-पानी रूम में रखना भूल गये थे क्या?

जीशान-हाँ, अम्मी ने भी नहीं रखी।

सोफिया-तुम रूम में थे नहीं ना? इसलिए शायद नहीं रखी अम्मी ने।

जीशान पानी पीते-पीते सोफिया की तरफ देखने लगता है। सोफिया के चेहरे पे कुछ था जिसे जीशान पढ़ नहीं पा रहा था, वो मुस्कान के पीछे कुछ छुपा रही थी।

जीशान को लगने लगता है कि शायद सोफिया को पता चल गया है कि मैं किसके साथ था और क्या कर रहा था?

सोफिया जाते-जाते जीशान के पास रुक जाती है-किसके साथ थे तुम?

सोफिया का ये सीधा सवाल जीशान को गड़बड़ा देता है, और उसके मुँह से पानी तस्के के रूप में बाहर गिर जाता है।

सोफिया को हँसी आ जाती है।

जीशान-कहाँ जाउन्गा? मैं अपने रूम में था।

सोफिया-झूठ बोल रहे हो तुम। मैं तुम्हारे रूम में गई थी, मगर तुम वहाँ नहीं थे।

जीशान-अच्छा… क्यों गई थी आप मेरे रूम में?

सोफिया-वो मैं ऐसे ही पानी पीने उठी थी तो देख लिया तुम्हारे रूम में भी झाँक के की तुम ठीक से सोए हुये हो की नहीं ?

जीशान सोफिया का हाथ पकड़कर उसे अपने तरफ खींच लेता है-झूठ बोल रह हो अब आप?

सोफिया-मैं क्यों झूठ बोलूँगी भला?

जीशान-“अच्छा तो फिर ये दिल क्यों इतने जोर से धड़क रहा है?” कहकर वो अपना हाथ सोफिया के दिल पर रख देता है।

सोफिया की टाँगे काँप जाती हैं।

जीशान-मुझे ऐसा क्यों लगता है कि आप मुझसे प्यार करने लगी हो?

सोफिया-छोड़ मेरा हाथ, जब देखो बकवास करता रहता है।

जीशान-मेरी आँखों में देखकर बोलो कि मैं बकवास कर रहा हूँ ।

सोफिया जीशान की आँखों में नहीं देखती।

जीशान अपने दोनों हाथों से सोफिया के चेहरे को थामकर अपने होंठों से उसका मुँह खोल देता है। सोफिया के हाथ जीशान के कंधे पर चले जाते हैं, और जीशान के सोफिया की कमर पर।

सोफिया की चूत पिछले 7 दिनों से एम॰सी॰ पीरियड की वजह से परेशान थी, और आज जब उसकी चूत को राहत मिली थी तो अमन के साथ गुजारे हुये वो हसीन पल उसे फिर से परेशान करने लगे थे। अपनी इस परेशानी को दूर करने के लिए वो जीशान से मिलने आई थी। मगर जीशान उस वक्त अपनी दादी के रूम में कैद था। उन दोनों की आवाज़ें रूम के बाहर तक और सोफिया के कानों तक पहुँच चुकी थीं।

मगर कहते हैं ना औरत का दिल समुंदर की तरह होता है जिसकी तह में कई राज दबे होते हैं। सोफिया अपने होंठों को साफ करके चुपचाप अपने रूम में चली जाती है, और जीशान भी उसे थकान की वजह से जाने देता है।

सुबह का सूरज जीशान के लिए जैसे नई उम्मीदें लेकर आया था। जब उसकी आँख खुली तो वो खुद को बहुत फ्रेश महसूस कर रहा था। अपनी दादी रज़िया की मोहब्बत में गिरफ्तार होता जीशान खुद को बहुत किस्मतवाला महसूस करने लगा था, जो कि वो था भी। उसके आस-पास इतनी खूबसूरत और हसीन तरीन औरतें जो थी, मगर एक ख्वाहिश उसके दिल में अब भी थी; एक कसक, एक तड़प, एक चाहत जिसे वो हमेशा से पाना चाहता था।

अपनी अम्मी अनुम को अमन ख़ान का खून होने की वजह से उसकी ऐसी सोच लाजमी भी थी। मगर अनुम उसे मोहब्बत तो करती थी, मगर ये वो मोहब्बत नहीं थी, जो दो जिस्म को एक बना दे।

जीशान बेड से खड़ा हो जाता है और फ्रेश होने बाथरूम में चला जाता है। नहाते वक्त वो अपने लण्ड को हाथ में लेकर उसपे लगा रज़िया की चूत का गाढ़ा-गाढ़ा पानी साफ करने लगता है। एक अजीब सी सरसराहट उसके पूरे जिस्म में दौड़ जाती है, और उसकी आँखें खुद-बा-खुद बंद हो जाती हैं।

वो रज़िया के बारे में सोचने लगता है। मगर उसके लण्ड में कुछ ख़ास हरकत नहीं होती। सोफिया के चेहरे को सोच करके वो लण्ड को सहलाने लगता है, तब थोड़ा बहुत खिंचाव उसे महसूस होता है। फिर अचानक अनुम का मुस्कुराता हुआ चेहरा उसकी बंद आँखों के सामने आ जाता है, और देखते ही देखते उसके मुरझाए हुये लण्ड में बिजली की तेजी से जान आने लगती है, फनफनाता हुआ उसका जवान लण्ड पूरी तरह कड़क हो जाता है, उसके खूबसूरत लण्ड पे मौजूद मोटी -मोटी नसें तन जाती हैं और जिस्म झटके मारने लगता है।

जीशान-“आह्ह… अम्मी जी आह्ह… आह्ह… अम्मी जान्न…” और गाढ़ा-गाढ़ा सफेद पानी बाथरूम के फर्श पर गिरने लगता है।

कुछ देर बाद जब वो नहाकर रूम के बाहर आता है तो उसे बड़ी हैरानी होती है। उसका पानी निकल चुका था मगर लण्ड अब भी उसी तरह तना हुआ था। वो अपने लण्ड को हाथ में पकड़कर दोनों जांघों के बीच में डालकर उसे नॉर्मल करने के कोशिश करने लगता है, मगर वो फिर से सामने के तरफ किसी तीर की तरह आ जाता है। वो अपने रूम में खड़ा था और रूम का मेनडोर खुला था। अपने लण्ड को अड्जस्ट करने में वो ये तक भूल गया था कि दरवाजा खुला है और बाहर कोई खड़ा है।

नग़मा जीशान का बेड ठीक करने जैसे ही उसके रूम के तरफ आई थी उसके पैर वहीं जम गये थे, क्योंकी उसी वक्त जीशान भी अपने बाथरूम से बाहर निकला था और अपने भाई को इस तरह देखकर उससे आगे नहीं बढ़ा गया। नग़मा एक 18 साल की जवान खूबसूरत लड़की थी, उसने अपनी 12 वीं की किताबों में सेक्स के बारे में पढ़ा ज़रूर था, मगर हकीकत में एक जवान तना हुआ लण्ड उसने आज पहली बार देखा था, वो भी अपने भाई का।

नग़मा का जिस्म जैसे बर्फ की तरह ठंडा पड़ चुका था, बस चूत जल रही थी और उस चूत की गर्मी से पूरा जिस्म थरथरा रहा था, काँप रहा था।

रूम के अंदर जीशान अंडरवेअर नहीं पहन पा रहा था क्योंकी उसके लण्ड में अब भी कोई नर्मी नहीं आई थी।

अचानक कोई नग़मा की पीठ पे पीछे से थप्पड़ मारता है और नग़मा बुरी तरह चौंक के पीछे देखती है, तो उसके पीठ के पीछे सोफिया खड़ी थी। सोफिया उससे आँखों के इशारे से पूछती है कि यहाँ क्या कर रही है?

नग़मा का जिस्म काँप रहा था और चेहरे पे पसीना साफ नजर आ रहा था। वो अपने मुँह पर दुपट्टा रख कर बिना कुछ कहे वहाँ से भाग जाती है। उसके इस तरह भागने से सोफिया को कुछ शक सा होता है और जब वो जीशान के रूम में देखते है तो…

सोफिया-“अम्मी जीई…” और वो झट से अपने मुँह पर दुपट्टा रख कर चीख को दबा देती है।

अमन का लण्ड भी जीशान के लण्ड के सामने कुछ नहीं था, और सबसे दिलकश बात ये थी कि जीशान के लण्ड की चमड़ी सफेद होने के साथ-साथ सामने का सुपाड़ा गुलाबी था, बिल्कुल पठानों के लण्ड के तरह। 7 इंच लंबे उस लण्ड को देखकर सोफिया के पैर भी लड़खड़ा जाते हैं। उसे किसी के कदमों के आवाज़ सुनाई देती है और वो पर्दे के पीछे छुप जाती है।

रज़िया अपना दुपट्टा ठीक से सिर पर रखे सीधा जीशान के रूम में दाखिल होती है-“जीशान ये क्या कर रहे हो?” ये कहती हुई रज़िया झट से दरवाजा बंद कर देती है।

जीशान-“दादी देखो ना, साला ये बैठने का नाम है नहीं ले रहा…”

रज़िया उसके पास आकर खड़ी हो जाती है-“जीशान बेटा दरवाजा बंद कर लिया करो, जवान लड़कियाँ हैं अपने घर में। तुम भी ना… क्या हुआ??

जीशान अपने लण्ड को रज़िया को दिखाने लगता है-“जब से नहाकर आया हूँ तब से ये खड़ा का खड़ा है अंडरवेअर भी नहीं पहनी जा रही …”

रज़िया अपने मखमली हाथों में जीशान के लण्ड को पकड़ लेती है।

जीशान-“आह्ह… रज़ियाऽऽ आऽऽऽ…”

रज़िया मुश्कुरा देती है और नीचे बैठ जाती है। जीशान रज़िया की तरफ देखने लगता है। रज़िया जीशान की आँखों में देखते हुई उसके लण्ड को पूरी तरह मुट्ठी में पकड़ लेती है और फिर अचानक जीशान के गुलाबी सुपाड़े को चूम लेती है मुआह्ह।

जीशान-“रज़ियाऽऽ आह्ह…”

रज़िया अपनी जीभ बाहर निकालकर जीशान के लण्ड पर फेरने लगती है, जैसे कोई छोटा सा बच्चा अपनी कुलफी चाट रहा हो-“बहुत मीठा है जीशान तेरा, दिल तो करता है खा जा ऊूँ इसे…”

जीशान-“खा जा ना मेरी जान रोका किसने है आह्ह…”

जीशान का ये बोलना था कि रज़िया अपना मुँह खोल देती है और जीशान के लण्ड को अपने गले में लेकर चूसने लगती है-“गलपप्प-गलपप्प-गलपप्प आह्ह… गलपप्प…”

जीशान-“आह्ह… रज़िया उन्ह… रात में इतनी बुरी तरह चूसा तूने कि अब तक दुख रहा है आह्ह…”

रज़िया-“इस ख़ानदान के हर लण्ड पे मेरा सबसे पहला हक है, कुछ भी करूँ तुझे क्या? गलपप्प-गलपप्प…”

जीशान दोनों हाथों से रज़िया के सिर को पकड़ लेता है और अपने लण्ड को आगे पीछे करने लगता है। रज़िया अपने मुँह को पूरी तरह खोल देती है जिसके वजह से जीशान का लण्ड पूरा तरह अंदर तक जाने लगता है। रज़िया के मुँह से लार नीचे गिरने लगती है, मगर उसे इस सबकी कोई परवाह नहीं थी। उसे जो जवान लण्ड मिला था, वो बेशकीमती था

बाहर के छेद से देखते हुये सोफिया की चूत से पानी बहने लगता है। अपनी अम्मी को अपने ही पोते के लण्ड को इस तरह मुँह में लेकर चूसती हुई वो सोच भी नहीं सकती थी मगर ये हकीकत वो अपनी आँखों से देख रही थी। जब अमन सोफिया को चोदता था तब भी सोफिया इतनी उत्तेजित नहीं होती थी, जितनी की आज वो इन दोनों को देखने के बाद हुई थी। उसका तो दिल कर रहा था कि दरवाजा खोलकर अंदर चली जाए और अपनी शलवार उतारकर पहले रज़िया से अपने चूत चटवाए और खुद जीशान का लण्ड मुँह में लेकर चूसे। मगर वो इस वक्त सिर्फ़ अपनी चूत को सहला सकती थी

अंदर रज़िया के लण्ड चूसने से धीरे -धीरे सारा पानी रज़िया के मुँह में गिरने लगता है।

जीशान-“अगर एक कतरा भी नीचे गिरा तो आज नहीं करूँगा रज़िया तुझे…”

रज़िया जीशान का पूरा पानी पीने लगती है। वो अपने जीभ से बाकी का सारा पानी भी चाटने लगती है, इस डर से कि कहीं जीशान सच में अपनी बात कर ना बैठे, और आज की रात उसकी चूत सुखी - सुखी ना रह जाए।

सोफिया अपने रूम में भाग जाती है और बेड पर लेट जाती है। उसकी चुची इतने तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी कि जैसे अगर उन्हें कंट्रोल ना किया जाए।

वही हाल नग़मा की भी थी। शावर के नीचे खड़ी रहकर नग़मा नहा तो रही थी, मगर उसकी चूत से लगातार पानी रिस रहा था, निप्पल तन के कड़क हो चुके थे।

जीशान कुछ देर बाद नाश्ता करने आ जाता है, साथ में उसके रज़िया भी थी। अनुम और लुबना दोनों नाश्ते की तैयार कर रही थी।

अनुम-अरे वाह… दोनों दादी पोते एक साथ? क्या खिचड़ी पक रह है भाई?

जीशान-खिचड़ी नहीं अम्मी, शोरबा।

रज़िया-ऊहहो ओह ओ।

अनुम-क्या?

रज़िया-“क्या तुम भी इस बेवकूफ़ की बातों को लेकर बैठ गये बेटे? लाओ नाश्ता दो आज तो बहुत भूक लगी है…” कहकर वो जीशान को घुरने लगती है, और जीशान बेशर्म की तरह चेयर खींचकर नाश्ता करने बैठ जाता है।

सोफिया और नग़मा भी नाश्ता करने बैठ जाते हैं।

 
अनुम-अरे लुब बेटा, आओ तुम भी बैठ जाओ।

लुबना-“जी अम्मी…” और एक नजर जीशान पर डालने के बाद लुबना भी नाश्ता करने बैठ जाती है।

अनुम और रज़िया आस-पास बैठी थी और जीशान उन दोनों के सामने। जीशान के बगल में सोफिया और उसके बगल में नग़मा। जीशान के दूसरी तरफ लुबना बैठे हुई थी। सभी चुपचाप नाश्ता कर रहे थे।

तभी अनुम को अपने पैरों पे कुछ महसूस होता है। वो और कोई नहीं बल्की जीशान था, जो अनुम के पैरों को टेबल के नीचे से रज़िया के पैर समझकर सहला रहा था। अनुम जीशान के तरफ देखने लगती है।

जीशान-क्या हुआ अम्मी, आप रुक क्यों गये?

अनुम-कुछ नहीं ।

जीशान अपने पैर के अंगूठे से अनुम की शलवार को ऊपर उठाने लगता है। अनुम जीशान को घुरने लगती है, मगर अपने पैरों को पीछे नहीं खींचती। जीशान धीरे-धीरे अपने पैर को ऊपर बढ़ाता चला जाता है। अब उसके पैर का अंगूठा अनुम की जाँघ के निच ले हिस्से को टच होने लगता है। नरम जिस्म पर जैसे ही जीशान के पैर पड़ते हैं, उसका जोश और बढ़ जाता है।

मगर इधर अनुम की हालत खराब होने लगती है। जैसे-जैसे जीशान के पैर ऊपर चढ़ रहे थे वैसे-वैसे अनुम की साँस नीचे की तरफ होने लगती है। आखिरकार, उससे बर्दाश्त नहीं होता और वो अपना नाश्ता करके खड़ी हो जाती है।

धीरे-धीरे करके सभी अपना नाश्ता ख़तम कर लेते है और डाइनिंग टेबल पर सिर्फ़ जीशान और रज़िया ही रह जाते हैं। जीशान रज़िया की तरफ देखने लगता है।

मगर रज़िया तो अपने नाश्ते में मगन थी, जब वो सिर उठाकर जीशान की तरफ देखती है तो जीशान को अपने चेहरे की तरफ मुस्कुराता देखकर हैरान रह जाती है-“क्या?”

जीशान फिर से उसी जगह अपना पैर ले जाता है जहाँ थोड़ी देर पहले उसने रख था, उसे वहाँ कोई चीज टच नहीं होती। वो गर्दन टेबल के नीचे डालकर रज़िया के पैर देखने लगता है, तो रज़िया अपने दोनों पैरों को पीछे रखी हुई थी।

जीशान-दादी आप ऐसे कब से बैठे हुई हो?

रज़िया-कैसे?

जीशान-ऐसे पैरों को पीछे लेकर?

रज़िया-पहले से, क्यों क्या हुआ?

जीशान-“नहीं कुछ नहीं …” अगर दादी के पैर पीछे हैं तो वो किसके पैर थे? अम्मी के? ओह्ह… माई गोड।

अनुम-जीशान हुई नाश्ता हो गया होगा तो फॅक्टरी चलें?

जीशान-“जी आया मम्मी…” और जीशान रज़िया को फ्लाइंग किस करता हुआ अनुम की तरफ बढ़ जाता है।

अनुम अपने रूम में ड्रेस चेज कर रही थी, जब जीशान वहाँ पहुँचता है। अनुम की पीठ जीशान की तरफ थी और वो अपना हाथ पीछे करके अपनी कमीज के चैन लगा रही थी। जीशान धीरे से आगे बढ़ता है, चैन पकड़कर ऊपर खींच लेता है। अनुम चौक के पीछे देखती है। सामने जीशान एक दिलकश मुस्कान लिए खड़ा था।

जीशान-आपने मुझे बुलाया था अम्मी।

अनुम-शुक्रिया।

जीशान-किसलिए?

अनुम अपना दुपट्टा ठीक करती हुई-तैयार हो गये हो तो फॅक्टरी चलें?

जीशान-मैं तो तैयार ही हूँ । वैसे एक बात कहूँ अम्मी।

अनुम-ह्म।

जीशान-आप ना इस पिंक सूट में बहुत बहुत-बहुत खूबसूरत लग रह हो किसी फिल्म स्टार की तरह।

अनुम गौर से जीशान की आँखों में देखने लगती है और फिर अचानक ही उसके चेहरे पे मुस्कान फैल जाती है-

“अच्छा जी। चलो हटो, बहुत बदमाश होते जा रहे हो तुम जीशान किसी दिन जम के पिटाई करनी पड़ेगी तुम्हारी …”

जीशान अनुम के दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर अपनी छाती पे मारने लगता है।

अनुम-ये क्या कर रहे हो?

जीशान-“आप ह ने तो कहा कि आप मुझे मारना चाहती हो। मैं आपके दिल की हर मुराद पूरी करना चाहता हूँ , चाहे वो अच्छी हो या बुरी …”

अनुम-चल हट बदमाश कहीं के, और आजकल मैं देख रही हूँ तुम मुझे घूर ते क्यों रहते हो?

जीशान अचानक से अनुम के बिल्कुल करीब पहुँच जाता है जिसकी वजह से अनुम हड़बड़ा जाती है और पीछे हटने लगती है मगर जीशान उसका हाथ पकड़कर अपने छाती पे रख देता है-“इस कम्बख़्त की वजह से मैं आपको घूर ता रहता हूँ …”

अनुम की आँखें झुक जाती हैं-क्या मतलब?

जीशान अनुम की ठोड़ी को ऊपर उठाकर उसकी आँखों में देखते हुये बड़े प्यार से कहता है-“आप बहुत हसीन हो अम्मी। मेरी जिंदगी की वो औरत जो मेरी रूह तक बसी हुई है, जिसके बिना जिंदगी गुजारना मेरे लिए मुमकिन नहीं , जिसकी हर ख्वाहिश मेरे लिए हुक्म की तरह है। आपकी हसीन आँखों की कसम मुझे इनमें डूब कर एक बार मर जाने दो। आपके लरजते हुये इन होंठों की कसम मुझे जी भरकर बहक जाने दो। आप जानते हो मैं आपसे कितनी मोहब्बत करता हूँ । मगर आप क्यों अपने दिल की बात मुझे नहीं बताती…”

अनुम की टाँगे काँप जाती हैं, लाल गुलाबी होंठ लरज जाते हैं, होंठ सूखने लगते हैं, और जीभ मुँह में हिल भी नहीं पाती। अपनी भीगी हुई पलकों से वो जीशान की तरफ देखती हुई बस इतना ही कहती है-“मैं तेरी अम्मी हूँ , बस अम्मी और कुछ नहीं …”

जीशान-“जानता हूँ आप मेरी अम्मी हो, और मैं ये भी जानता हूँ कि अब्बू के बाद आप सिर्फ़ और सिर्फ़ मुझसे मोहब्बत करती हो। क्या मैं अपनी अम्मी को गले लगा सकता हूँ ?”

अनुम बिना जवाब दिए अपनी बाहें खोल देती है और जीशान अनुम को पहली बार इतने कस के अपने छाती से चिपकाता है कि एक हल्की सी चीख अनुम की छाती से निकल पड़ती है-“उउउन्ह…”

जीशान हालत का फायेदा उठाकर अपने होंठों को अनुम के गाल के पास लाता है और एक हल्की सी किस अनुम के गाल पे कर देता है। अनुम चौंक के जीशान की तरफ देखती है।

जीशान-क्या? अपनी अम्मी को गाल पे चूम भी नहीं सकता क्या?

अनुम फिर से अपनी आँखें बंद कर लेती है।

 
जीशान कुछ सोचते हुये अपने होंठों को अनुम के होंठों की तरफ बढ़ाता है। जीशान की साँसें अपने होंठों पे महसूस करके, अनुम आँखें खोल देती है और पीछे हटकर एक जोरदार थप्पड़ जीशान के गाल पे रसीद कर देती है। जीशान हक्का बक्का सा रह जाता है।

अनुम-“अब तुम जो करने जा रहे हो, वो माँ बेटे के बीच नहीं होता, और हाँ आइन्दा मेरे इतने करीब भी आने की कोशिश मत करना, वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। समझे?”

जीशान अपने कान पकड़ने के बजाए अनुम के दोनों कान पकड़कर कहता है-सो सारी अम्मी और जान शब्द वो थोड़ा लंबा कहता है।

अनुम जीशान को घूर ती हुई बाहर की तरफ चल देती है

जीशान अपने गाल को सहलाने लगता है कि तभी उसे किसी के हँसने की आवाज़ सुनाई देती है। जैसे ही वो गर्दन मोड़कर खिड़की की तरफ देखता है तो चौंक जाता है।

सोफिया अपने मुँह को दुपट्टे से छुपाए वहाँ खड़ी थी। जीशान को अपने तरफ देखता पाकर वो जल्दी से वहाँ से भाग जाती है।

लुबना-“भाई भाई कहाँ हो आप?” लुबना जीशान को आवाज़ देती हुई अनुम के रूम में चली आती है-“आवाज़ भी नहीं देते कब से चिल्ला रही हूँ …”

जीशान-“भैया नहीं कह सकती? भाई भाई लगा रखी है…”

लुबना जीशान के हसीन चेहरे को अपने आँखों में बसाकर धीरे से कहती है-“आप मेरे भाई हो भैया नहीं …”

जीशान-क्या मतलब?

लुबना-“भाई मीन्स-बेस्ट पति अवलेवल इन इंडिया…”

जीशान लुबना की तरफ बढ़ता है। मगर इस बार लुबना वहाँ से भागने के बजाए वहीं खड़ी रहती है

लुबना-“बहुत हैंडसम लग रहे हो आज आप तो… भाई…”

जीशान-“भूत नी की सूरत… मैंने तुझसे पूछा क्या कि मैं कैसा लग रहा हूँ ?” जब देखो अपना सड़ा सा मुँह उठाए मेरे पास चली आती है। नफरत है मुझे तुझसे…”

लुबना नफरत लफ़्ज सुनकर सहम जाती है, उसकी आँखों में आँसू तैर जाते हैं। जिसे जीशान भी देख लेता है-“तो आपको मुझसे नफरत है भाई?”

जीशान दाँत पीसकर उससे कहता है-“हाँ नफरत है मुझे तुझसे…”

लुबना टेबल पे पड़ा हुआ चाकू हाथ में उठा लेती है और अपने हथेली पर रख कर फिर से जीशान से पूछती है-“ आख़िरी बार पूछ रही हूँ नफरत करते हो आप मुझसे?”

जीशान-“जा जा मैं तेरी इन धमकियों में आने वाला नहीं हूँ …”

लुबना वो तेज चाकू अपनी हथेल पे घुमा देती है, और खून की एक धार उसके हाथ से निकलने लगती है।

जीशान-लुब , ये तूने क्या किया पागल? मैं तो मजाक कर रहा था। मैं तुझसे नफरत नहीं करता।

लुबना-“नहीं बहने दो ये खून , मर जाने दो मुझे। जब आप मुझसे नफरत करते हो तो मैं क्यों जिंदा रहूं ? कई दिनों से देख रही हूँ कि आप मेरी तरफ देखते भी नहीं , मुझसे ठीक तरह से बात भी नहीं करते, इतनी ही बुरी हूँ तो मर जाने दो मुझे आज…”

जीशान एक थप्पड़ लुबना के गाल पे जड़ देता है-“बेवकूफ़ कितना खून बह रहा है तेरा?” वो अपने पाकेट से रुमाल निकालकर उसके हाथ पे बाँधने लगता है-“मैंने मजाक में कहा था लुब , अम्मी के बाद तुझसे ही तो मैं सबसे ज्यादा प्यार करता हूँ …”

लुबना जीशान की छाती से चिपक जाती है-“सच भाई, आप मुझसे मोहब्बत करते हो?”

जीशान-“हाँ बहुत…” आज अपने दिल की बात ऐसे हालत में जीशान ने लुबना से कहा था कि उसे भी यकीन नहीं हो रहा था कि ये सब इतनी जल्दी कैसे हो गया।

जीशान-अम्मी यहाँ जल्दी आएँ।

अनुम-क्या हुआ? अरे लुबना बेटे ये क्या इतना खून ?

जीशान-“बेवकूफ़ लड़की को चाकू लग गया। आप जल्दी से फर्स्ट एड किट ले आएँ…”

अनुम कपबोर्ड में से पट्टी निकाल लेती है। तब तक वहाँ सोफिया, रज़िया और नग़मा भी आ चुकी थीं, सभी लुबना को ठीक से काम करने की नसीहतें देने लगती हैं। मगर उन सबमें से किसी की भी आवाज़ लुबना को सुनाई नहीं दे रही थी। उसके कानों में तो बस जी शान के वो शब्द गूँज रहे थे, जो उसने कुछ देर पहले उससे कहे थे।

फ़िज़ा-“अरे भाई कहाँ हो सबके सब?” फ़िज़ा आज अमन विला आई हुई थी, साथ में कामरान भी था।

रज़िया और अनुम उनके पास चले जाते हैं।

फ़िज़ा-सलाम, कहाँ थे आप सब? पूरा घर वाली पड़ा है।

रज़िया-बैठो फ़िज़ा बेटी । अरे कामरान भी आया है बैठो बैठो। वो लुबना के हाथ में चाकू लग गया था जीशान उसे पट्टी कर रहा था, वहीं थे।

फ़िज़ा-ज्यादा तो नहीं लगा ना?

अनुम-नहीं नहीं , बस थोड़ा सा कट गया है।

नग़मा और सोफिया भी फ़िज़ा के पास आकर बैठ जाते हैं। कामरान की नजरें नग़मा से टकराती हैं, और दो जवान दिल जोर से धड़कने लगते हैं। इधर-उधर के बातें करने के बाद फ़िज़ा असल बात के तरफ आती है

फ़िज़ा-“बाजी, भाई और भाभी को गुजरे अब एक साल से ऊपर हो गया है। आपको शायद पता नहीं मगर भाभी और मेरे बीच कुछ बातें हुई थी…”

अनुम-कैसे बातें फ़िज़ा?

फ़िज़ा-“वो मैं उनसे नग़मा का हाथ माँगी थी अपने बेटे कामरान के लिए। वो तो अब नहीं रहे मगर उन्होंने अपनी खुशी जाहिर की थी इस रिश्ते के लिए। कामरान के अब्बू अब कामरान की शादी करवा देना चाहते है। मैं उनसे साफ-साफ कह दी हूँ की बहू आएगी तो नग़मा…”

फ़िज़ा की बात सुनकर जहाँ नग़मा शरमाकर अपने रूम में भाग जाती है, वहीं घर के सभी लोग खुश हो जाते हैं। कामरान एक सुलझा हुआ लड़का था। भला उससे अच्छा रिश्ता नग़मा के लिए और हो भी क्या सकता था?

अनुम रज़िया और जीशान से पूछती है। वो दोनों फौरन हाँ कह देते हैं, और देखते ही देखते नग़मा और कामरान की बात पक्की हो जाती है।

अनुम सोफिया की तरफ देखती है जो सिर झुकाए वहीं बैठी हुई थी। अपना हाथ सोफिया के सिर पर फेरती हुई अनुम फ़िज़ा से कहती है-“शादियाँ एक नहीं दो होंगी अमन विला में, हमारी गुड़िया सोफिया की भी अब मैं शादी करवा देना चाहती हूँ । खालिद बहुत अच्छा लड़का है। मैं अब इन दोनों को एक पाकीजा रिश्ते में बाँध देना चाहती हूँ …”

सोफिया सिर उठाकर अनुम की तरफ देखती है और फिर मुश्कुराती हुई वो भी अपने रूम में भाग जाती है।

जीशान-“अम्मी लगे हाथों इस मोटी की भी बात कहीं तय कर दीजिए ना?”

लुबना-“क्यों, क्या मैं आप पे बोझ हो गई हूँ भाई?”

जीशान दाँत पीस के रह जाता है।

रात के खाने के बाद सभी हाल में बातें करते बैठ जाते हैं।

सोफिया अपने बाथरूम में फ्रेश होने जाती है और उसे जाता देखकर जीशान भी उसके पीछे-पीछे बाथरूम में घुस जाता है। सोफिया जीशान को अपने रूम के बाथरूम में इस तरह अचानक देखकर डर जाती है-“क्या है? यहाँ क्या कर रहे हो?”

जीशान-मुबारक बाद देने और मुँह मीठा करने आया हूँ आपी।

सोफिया-किस चीज के लिये?

जीशान-लो जी अगले महीने आपकी शादी होने वाली है, और आप पूछ रहे हो किस चीज के लिये?

सोफिया-“हाँ। मगर तुम यहाँ क्यों आ गये? जाओ यहाँ से अम्मी या आंटी ने देख लिया तो?”

जीशान सोफिया का हाथ पकड़कर अपनी तरफ घुमा लेता है-“मुझे मुँह मीठा करना है…”

सोफिया-यहाँ कैसे?

जीशान-आपके होंठों से।

सोफिया-पागल हो गये हो क्या? निकलो यहाँ से बेशर्म इंसान।

जीशान एक हाथ सोफिया की गर्दन में डालकर उसका चेहरा अपनी तरफ घुमाकर अपने होंठ उसके होंठों पे रख देता है।

सोफिया-“उन्ह… घुऊऊन्ने्ीं… घ न्ने्ीं… क्या है? गलपप्प…”

जीशान दुबारा फिर से अपने होंठ सोफिया के मुँह पे रख देता है। सोफिया अपने होंठों को जीशान के होंठों से अलग कर देती है, और घूमकर जीशान की आँखों में देखने लगती है। ऐसा लगता है जैसे वो जीशान को थप्पड़ मारने वाली है। मगर इसके बिल्कुल उलट वो खुद अपने होंठों को जीशान के लबों से लगा देती है और जीशान की चौड़ी छाती से चिपक जाती है।

जीशान भी अपने दोनों हाथों को सोफिया की कमर पर रख कर दोनों हाथों से कमर को दबाते हुये अपनी जीभ सोफिया के मुँह में डालकर उसके होंठों को चूमने लगता है। दोनों एक दूसरे में खोए हुये थे। जीशान अपने एक हाथ से अपनी पैंट की जिप खोलकर लण्ड बाहर निकाल देता है। जैसे है जीशान का लण्ड बाहर निकलता है, वो सीधा सोफिया की जांघों में चुभने लगता है।

सोफिया नीचे देखती है और हैरान रह जाती है। जीशान सोफिया का हाथ अपने लण्ड पे रखने लगता है, मगर सोफिया अपना हाथ हटा देती है। जीशान फिर से उसे अपने लण्ड पे रख देता है। इस बार सोफिया बड़ी मजबूती से जीशान के लण्ड को पकड़ लेती है।

जीशान-आपी मुँह में लो ना।

सोफिया-नहीं , कभी नहीं ।

जीशान अपना हाथ सोफिया की कमीज में डालकर उसकी नरम चुचियाँ मसलने लगता है-“प्लीज़्ज़… आपको मेरे कसम…” और ये कहते हुये वो सोफिया की कमीज जिस्म से अलग कर देता है। अंदर सोफिया ने कुछ भी नहीं पहना था। अपनी बहन की दोनों चुचियों को मसलते हुये वो पीछे से अपना लण्ड उसकी गाण्ड की दरार में चुभाने लगता है।

सोफिया-“उन्ह… स्शस्स्स्स्सी… जीशान आह्ह…”

जीशान-जल्दी लो ना आपी, कोई देख लेगा।

सोफिया-“मुझे नहीं करना, छोड़ मुझे…” वो हल्की आवाज़ में बोल रही थी।

जीशान-“ऐसे कैसे नहीं लेगी? चल बैठ नीचे…” अपने पठानी रुख़ाब का इश्तेमाल करते हुये जीशान सोफिया को नीचे बैठा देता है और अपना गुलाबी लण्ड का सुपाड़ा सोफिया के नरम होंठों पे घिसने लगता है।

सोफिया जीशान की -आँखों में आँखें डालकर अपना मुँह खोल देती है-“गलपप्प-गलपप्प…”

आखिरकार, सोफिया भी तो रज़िया की बेटी थी। अपनी अम्मी रज़िया को जब से उसने ये लण्ड चूसते देखा था तब से उसका मुँह इसे अपने मुँह लेने के लिए तड़प रही थी गलपप्प।

सोफिया अपना मुँह खोल देती है और जीशान का तना हुआ लण्ड उसके मुँह की गहराईयों में चला जाता है। अब तक सोफिया सिर्फ़ अपने अब्बू अमन ख़ान के लण्ड को चुसी थी। मगर आज पहली बार वो अपने भाई के लण्ड से, उसकी महक से, उसके मीठे-मीठे पानी से सराबोर हो रही थी। जीशान के लण्ड की खुश्बू सोफिया को इतनी पसंद आती है कि वो उसे चूसती ही चली जाती है।

जीशान-“आह्ह… आपी मार डालोगी क्या? आह्ह…”

सोफिया-“हुन्ने्ीं… गलपप्प-गलपप्प मुझे जो चीज पसंद आ जाती है वो मेरी हो जाती है और मैं उसे अपने से कभी अलग नहीं होने देती गलपप्प-गलपप्प…”

जीशान के लण्ड की नशें और ज्यादा मोटी होने लगती हैं। लाल चमकता हुआ सामने का सुपाड़ा और ज्यादा टमाटर की तरह लाल हो जाता है। जीशान अपने आँखें बंद कर लेता है और जैसे उसकी आँखें बंद होती हैं, उसकी आँखों के सामने अनुम का चेहरा आ जाता है। अनुम को देखते ही जीशान के लण्ड से तेज गाढ़े-गाढ़े पानी की एक धार सीधा सोफिया के मुँह में गिरने लगती है।

जीशान-“आह्ह… अम्मी आह्ह…”

वो पानी इतना ज्यादा था कि सोफिया के मुँह से बाहर छलकने लगता है और पूरा चेहरा गीले चिपचिपे पानी से भर जाता है। सोफिया अपने भाई की आँखों में देखती हुई अपने होंठों पर जीभ फेरने लगती है गलपप्प-गलपप्प।

जीशान-कैसा लगा आपी?

सोफिया मुश्कुराती हुई-मीठा-मीठा।

जीशान अपने लण्ड को हाथ में पकड़कर उसे सोफिया के गाल पे पोंछने लगता है। सोफिया जग में पानी लेती है और जीशान के लण्ड को साफ करती है।

सोफिया-अब जा मुझे नहाने दे।

जीशान-मेरे साथ नहा लो ना आपी।

सोफिया-नहीं जीशान , मेहमान घर में हैं। तू जा ना अभी कोई सच में देख लेगा।

जीशान हाथ पकड़कर सोफिया को उठाता है और अपने होंठ उसके गीले होंठों पर रख कर उसके मुँह से अपना वीर्य चखने लगता है। सोफिया अपनी जीभ जीशान के मुँह में डाल देती है और दोनों एक दूसरे की लार एक दूसरे के मुँह से पीने लगते हैं।

थोड़े देर एक दूसरे को कस के मसलने के बाद जीशान बाथरूम से बाहर निकल जाता है और सोफिया शावर के नीचे खड़ी हो जाती है।

 
जीशान अपने पैंट की जिप लगाता हुआ बाथरूम से बाहर निकलता है तो सकपका जाता है, क्योंकी सामने नग़मा खड़ी थी। नग़मा ने शायद सब बातें सुन ली थी। उसकी लाल चमकती हुई आँखें साफ बता रही थी कि वो क्या सोचकर यहाँ खड़ी है?

जीशान-अरे नग़मा तुम यहाँ?

नग़मा-“वही तो मैं भी सोच रही हूँ भैया कि आप यहाँ? और हैरत की बात है कि आपी भी अंदर है…”

जीशान-वो मैं… नग़मा मैं तो शावर का वाल्व ठीक करने अंदर गया था।

नग़मा आगे बढ़ती है और जीशान के गाल पे उंगली लगाकर वो चिपचिपा वीर्य उंगली पर लेकर जीशान को दिखाती है-“ये क्या है भाई जान?”

जीशान अपने गाल को साफ करता हुआ आगे बढ़ने लगता है-“मुझे नहीं पता, मुझे बहुत काम है…”

नग़मा-मैं अम्मी से पूछने जा रह हूँ ।

जीशान के पैर थम जाते हैं, साँसें उखड़ने लगती हैं। वो पीछे पलटकर देखता है और नग़मा के होंठों पर कातिलाना हँसी देखकर उसे भी समझते हुये देर नहीं लगते कि नग़मा क्या चाहती है?

नग़मा-क्यों क्या हुआ जाओ ना? आपको तो बहुत काम है ना?

जीशान दरवाजा बंद कर देता है और नग़मा के पास आकर खड़ा हो जाता है। दोनों एक दूसरे की आँखों में देखने लगते हैं।

जीशान-तुम अम्मी के पास नहीं जाउन्गी नग़मा।

नग़मा-जाउन्गी, ज़रूर जाओगी ।

जीशान नग़मा का हाथ पकड़कर उसे दीवार से लगा देता है और अपने होंठों को उसके गाल पे लगाकर धीरे से उसके कान में कहता है-“जो आपी को मिला है तुझे भी मिल सकता है अगर तू अपना मुँह बंद रखेगी…”

नग़मा-“उन्ह… छोड़ो मुझे। मुझे कुछ नहीं चाहिए आपसे, छोड़ो मेरा हाथ…”

जीशान अपने हाथ में नग़मा की चुची पकड़ लेता है-“अगर नहीं चाहिए तो ये इतने मोटी -मोटी कैसे हो गई हैं?” कहकर वो निप्पल को मरोड़ने लगता है।

नग़मा तो पहले से ह गरम थी, ऊपर से जीशान के पत्थर से हाथों की पकड़ से वो मोम की तरह पिघलने लगती है-“आप बड़े खराब हो भाई… आपने अम्मी के साथ भी ऐसा ही किया था…”

जीशान जोर से नग़मा की चुची मरोड़ने लगता है-“तुझे कैसे पता? हाँ, बोल तुझे कैसे पता?”

नग़मा-“उन्ह… मैं देखी थी आपको और अम्मी को रूम में बिना कपड़ों के वो गंदा काम करते हुये…”

जीशान इस बात से अंजान था कि नग़मा ने उसे और शीबा को चुदाई करते हुये देख चुकी थी और यही वजह थी की उसका नज़रिया जीशान के लिए बदल चुका था। जबसे उसने जीशान के मोटे मूसल जैसे लण्ड को अपने अम्मी शीबा की चूत में घुसते हुये देखी थी, तबसे उसकी चूत भी खुद पर सितम ढाने के लिए तैयार बैठी हुई थी। मगर हालत ऐसे नहीं थे कि नग़मा कुछ कह पाती।

शीबा की मौत के बाद से जीशान भी उससे दूर -दूर रहने लगा था। मगर जब आज उसने जीशान और सोफिया को फिर से वही गंदा काम करते हुये देखा तो, उसके चूत में चिंगारी फिर से जल उठी थी।

जीशान धीरे से अपने हाथ का पंजा नग़मा की शलवार पर रख देता है। उसकी उंगलियाँ ठीक नग़मा की चूत के क्लोटॉरिस के ऊपर थीं, और वो हल्के-हल्के उसे सहला रहा था।

नग़मा-भाई क्या करते हो, मत करो ना?

जीशान-तुझे भी करना है ना मेरे साथ वो सब जो अम्मी करती थी?

नग़मा-“उन्ह… नहीं करना आह्ह…”

जीशान-“ये गीली क्यों हो गई है? नग़मा हाँ बोल?”

नग़मा-“आह्ह… वो तो हमेशा ह गीली रहती है आह्ह… भाई…”

जीशान-कैसे मेरी बहन?

नग़मा-“उन्ह… आपका सोच-सोचकर भाई आह्ह… अम्मी जीई…”

ये सुनकर जीशान अपनी बहन नग़मा को अपने तरफ घुमा लेता है और अपने रसीले होंठों में उसके नाजुक होंठों को पकड़ लेता है। नग़मा अपने आँखें बंद कर लेती है। क्लोटॉरिस की घिसाई से वो अपने होश-ओ-हवास में नहीं थी। उसका जिस्म थरथर काँप रहा था। वो मुँह वोले बसूजी शान के आगे खड़ी थी। जो कर रहा था जीशान कर रहा था।

जीशान को महसूस हो रहा था जैसे वो शीबा के होंठों को चूम रहा हो, उसे बहुत खुशी थी कि घर की लड़कियाँ उसके दीवानी हैं, मगर वो जिसका दीवाना है वो अब तक उसके इश्क़ से बेमहसूस है। बाहर से किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई देती है और जीशान नग़मा को छोड़ देता है।

नग़मा अपने मुँह पर दुपट्टा रख कर वहाँ से निकल जाती है।

नग़मा के जाने के बाद वहाँ फ़िज़ा आती है-“अरे जीशान , तुम यहाँ हो। क्या बात है भाई, अपनी आंटी से मिलने की फुरसत भी नहीं है तुम्हें?”

जीशान-नहीं आंटी , ऐसे बात नहीं है। मैं आपकी ही तरफ आ रहा था।

फ़िज़ा नीचे से ऊपर तक जीशान को देखती है-“बहुत कम मर्द देखे हैं मैंने तुम्हारी तरह जीशान …”

जीशान-क्या मतलब आंटी ?

फ़िज़ा अपना एक हाथ जीशान की छाती पर रख कर धीरे से कहती है-“मर्द तो कई हैं दुनियाँ में, मगर जो इस निगाह को भा जाए वो तुम हो…”

जीशान आँखें फाड़े फ़िज़ा को देखता रह जाता है।

तभी अनुम-“अरे फ़िज़ा, चलो अम्मी तुम्हें बुला रही हैं। और जीशान तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

उन दोनों के बीच की बात अधूरी रह जाते है अनुम के वहाँ आने से। और दोनों एक दूसरे को आँखों-आँखों में कुछ कहते हुये हाल में चले जाते हैं।

रज़िया हाल में हीबैठे हुई थी-“फ़िज़ा तुम और कामरान सोफिया के रूम में सो जाओ, और सोफिया मेरे साथ सो जाएगी…”

कामरान अपनी अम्मी फ़िज़ा की तरफ देखकर मुश्कुरा देता है, जैसे कह रहा हो चल मेरी जान तेरी चूत कुटाई का वक्त हो गया है।

फ़िज़ा भी सभी को शब्बा खैर कहकर सोफिया के रूम में चली जाती है।

तब तक सोफिया भी फ्रेश होकर हाल में आ चुकी थी।

रज़िया-सोफिया तुम मेरे साथ रूम में सो जाओ।

सोफिया-ठीक है दादी ।

जीशान रज़िया की तरफ ह देख रहा था, और रज़िया बड़े दिलकश अंदाज में जीशान की तरफ देखकर मुश्कुरा रही थी। वो एक तरह से जीशान को चिढ़ा रही थी।

धीरे-धीरे सभी अपने-अपने रूम में चले जाते हैं, और जीशान हाल में बैठा टीवी देखता रहता है। तकरीबन एक घंटे बाद जीशान उठकर अपनी दादी के रूम में चला जाता है। जब वो रूम में दाखिल होता है तो सामने दोनों खूबसूरत औरतों को देखकर मचल जाता है। सोफिया बेड के एक कॉर्नर में गहरी नींद में सो चुकी थी और रज़िया कोइ किताब पढ़ रही थी, जीशान को अपने रूम में देखकर वो इशारे से यहाँ आने की वजह पूछती है।

जीशान दरवाजा बंद कर देता है और नाइटी लाइट ओन करके रज़िया की आँखों में आँखें डालकर पहले अपनी शर्ट उसके बाद अपनी पैंट उतार देता है। रज़िया का दिल जोर से धड़कने लगता है। वो शायद नहीं चाहती थी कि अपने बेटी सोफिया के सामने अपने पोते जीशान के साथ चुदाई करे।

मगर जीशान अमन ख़ान की औलाद था। डर उसे किसी चीज का नहीं था और बेशर्म वो अपने बाप से भी ज्यादा था। जीशान आगे बढ़ता है और रज़िया की बगल में आकर लेट जाता है।

रज़िया धीमी आवाज़ में उससे कहती है-“ये क्या कर रहे हो? पैंट तो पहन लो, सोफिया उठ जाएगी…”

जीशान रज़िया की गर्दन में हाथ डालकर उसके गाल को चूम लेता है और अपने होंठों को रज़िया के कान में लगाकर धीरे से कहता है-“मैं हूँ अमन विला का एकलौता मालिक मैं तुम सब औरतों का एकलौता मर्द

मैं, जहाँ चाहूं वहाँ जा सकता हूँ । तुम ना सिर्फ़ मेरी दादी हो बल्की बहुत जल्दी मेरी शरीक -ए-हयात भी बनोगी दादी …”

रज़िया फटी-फटी आँखों से जीशान की तरफ देखने लगती है। जीशान ने खुले आम आज रज़िया से शादी की बात कहकर उसे चौंका दिया था।

जीशान रज़िया के होंठों को चूम लेता है-“हाँ दादी , मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ , तुम्हें अपनी पहली बीवी बनाना चाहता हूँ । तुम्हारे दिल-ओ-दिमाग़ से अमन ख़ान का नाम-ओ-निशान मिटा देना चाहता हूँ । इस जिस्म पर आज के बाद सिर्फ़ एक इंसान का कब्जा होगा, मेरा। मैं आज के बाद आपको अपनी दादी की तरह नहीं बल्की अपनी बीवी की तरह देखना चाहता हूँ , अपनी बीवी की तरह चोदना चाहता हूँ । जिस चूत से मेरे अब्बू निकले थे, आज के बाद उस चूत में मेरा, यानी तुम्हारे शौहर जीशान ख़ान का लण्ड रहेगा। तुम रात में अकेले नहीं सोओगी। आज के बाद तुम्हारी ये चूत तरसेगी नहीं । इसका मालिक मैं बनना चाहता हूँ हमेशा-हमेशा के लिए । बोलो दादी करोगी मुझसे शादी ?”

रज़िया की आँखें गीली हो जाती हैं वो अपने हाथ में की किताब फेंक देती है और दोनों हाथों से जीशान के चेहरे को पकड़कर बेसाखता जीशान के होंठों को चूमने लगती है।

 
रज़िया-“हाँ हाँ मेरे सरताज, मैं करूँगी आपसे शादी । मैं कहलाना चाहती हूँ आज से जीशान ख़ान की बीवी। बना लो मुझे अपना शरीक-ए-हयात, और मेरे जिस्म को हमेशा-हमेशा के लिये अपना बना लो। जीशान गुलामी करूँगी मैं आज से आप जैसा कहोगे वैसा करूँगी। मेरा जवान पोता आज मेरा शौहर हुआ। आज से रज़िया ख़ानम आपकी बीवी हुई।

जीशान-“रज़िया मेरे जान…” कहकर वो अपनी दादी के होंठों को चूमता चला जाता है।

और ये सुनकर पास में लेटी हुई सोफिया के जिस्म में सरसराहट सी पैदा हो जाती है।

जीशान-“रज़िया मैं आज तुम्हें दिल-ओ-जान से प्यार करना चाहता हूँ , हर उस जगह से अमन ख़ान का नाम मिटा देना चाहता हूँ । बस आज से इस जिस्म पर एक नाम होगा मेरा…”

रज़िया-“कर लो जो करना है, शौहर बीवी से इजाजत नहीं लेता जान … बस करता है उन्हें जो करना होता है…”

रज़िया की आँखों में आज वही चमक थी जो कभी अमन के साथ रहने पर दिखाई देती थी। अपने हुश्न से रज़िया ने अपने 20 साल के जवान पोते को अपनी तरफ इस तरह आकर्षित कर लिया था कि जीशान को रज़िया के हुश्न के सिवा कोई और हसीन चीज उस वक्त नजर नहीं आ रही थी।

जीशान रज़िया को लेटा देता है और उसके ऊपर लेट जाता है-“मैं भारी तो नहीं हूँ ना दादी ?”

रज़िया-“बिल्कुल नहीं और खबरदार जो आज के बाद अकेले में मुझे दादी कहकर बुलाए तो? वो औरत ही नहीं जो अपने शौहर को अपने ऊपर लेने से थक जाए। मैं रात भर तुम्हें अपने ऊपर रखना चाहती हूँ , ऐसे ही बिल्कुल अपने सीने से चिपकाए…”

जीशान-ऐसे ही ?

रज़िया-हाँ ऐसे ही ।

जीशान-ऐसे नहीं रजो।

रज़िया-तो फिर कैसे जीशान ?

जीशान-“बिल्कुल नंगी करके मैं तुम्हारे ऊपर सोना चाहता हूँ , अपने लौड़े को तुम्हारी चूत के अंदर तक रख कर सोना चाहता हूँ , जब चुदाई के बाद मेरी आँख लगे तो मैं चाहता हूँ मेरा लौड़ा तुम्हारी गरम चूत के अंदर ही रहे। जब मैं सुबह उठु तो उस वक्त भी वो अंदर ही हो, ताकी मैं सुबह की रोशने में भी तुम्हें चोद सकूँ …”

रज़िया अपने जीशान के होंठों को चूम लेती है-“हाँ मेरे सरताज रखूँगी, आज के बाद ये चूत कभी वाली मत रखना। रात भर मैं तुम्हें अपने अंदर महसूस करना चाहती हूँ । सुबह भी तुम्हारे साथ उठना चाहती हूँ और तुम्हारे साथ ह नहाना चाहती हूँ … मैं चाहती हूँ तुम मुझे बाथरूम में भी करो…”

जीशान-कैसे रजो?

रज़िया अपने दोनों हाथ जीशान के अंडरवेअर में डालकर दोनों हाथों से जीशान की कमर थाम लेती है-“आह्ह… बाथरूम में नहाते हुये मेरे चूत के अंदर अपना लौड़ा रख कर अंदर-बाहर करते हुये दोनों के जिस्म पर शावर से पानी गिरते हुये, हर वक्त हर जगह मैं तुमसे चुदना चाहती हूँ जीशान , पेशाब करते हुये भी…”

जीशान-पेशाब करती हुई भी?

रज़िया-“हाँ मेरे जान पेशाब करते हुई भी… पीछे से उन्ह… मेरी गाण्ड में अपना लौड़ा डालकर मुझे चोदोगे ना। मैं अपनी गाण्ड में इसे लेकर पेशाब करना चाहती हूँ , मैं जीना चाहती हूँ । हर ख्वाहिश पूरी करना चाहती हूँ वो भी जो तुम्हारे अब्बू नहीं कर पाये, और वो भी जो तुम मेरे साथ अपने खुशी से करना चाहते हो…”

जीशान अपनी रज़िया की बातों से इस कदर गरम हो चुका था कि वो रज़िया की नाइटी को एक झटके में उसके जिस्म से निकालकर फेंक देता है। रज़िया अंदर कुछ नहीं पहनी थी, जीशान को हैरानी होती है। जीशान सवालिया नजरों से रज़िया से पूछ लेता है कि उसने अंदर पैंट और ब्रा क्यों नहीं पहनी?

रज़िया मुश्कुरा देती है और जीशान को अपने से चिपका के धीरे से उसके कान में कहती है-“मैं जानती थी तुम मुझे चोदने ज़रूर आओगे जान मुऊआह्ह…”

जीशान अपने अंडरवेअर को कमर से निकाल देता है दोनों उस वक्त पूरी तरह नंगे हो चुके थे। जीशान का जवान लण्ड तो रज़िया की बात सुनकर ही तन चुका था, और अब वो सीधा रज़िया की चूत पे आगे पीछे घिस रहा था।

रज़िया-“उन्ह… मुँह में डालिए ना…”

जीशान लेट जाता है और रज़िया उठकर बैठ जाती है। उसे कोई परवाह नहीं थी की पास ही में सोफिया भी लेटी हुई है, जो उस वक्त तक जाग चुकी थी और अपनी अम्मी की बातें सुनकर पूरी तरह गीली हो चुकी थी। आज सोफिया को पता चला था कि उसका जिस्म इतना जोशीला क्यों है? क्यों वो अमन की तरफ आकर्षित हुई थी? ये उसके खून में था।

जीशान-“अपनी कमर मेरी तरफ करो…”

रज़िया 69 की पोजीशन में आती हुई अपनी कमर को जीशान के चेहरे के तरफ झुका देती है और झट से जीशान के लण्ड को चूम लेती है। कहती है-“इतना खूबसूरत तो तेरे अब्बू और दादी का भी नहीं था…”

जीशान-“ले मुँह में मेरी जान…”

रज़िया-“गलपप्प-गलपप्प-गलपप्प…” जीशान के लण्ड को आंडो तक अपने मुँह में ले लेती है और नीचे के लटकते हुये आंडो को अपनी मुट्ट में लेकर मरोड़ने लगती है।

जीशान अपने होंठ रज़िया की चूत पर रख कर जीभ को अंदर घुसा देता है। इतने दिनों तक अमन के अब्बू से और फिर अमन से चुदने के बाद भी रज़िया की चूत इस कदर कसी हुई थी, जैसे कुँवारी चूत हो। और यही वजह भी थी जीशान के उसकी तरफ आकर्षित होने की।

रज़िया-“आह्ह… मेरे जान आह्ह… खोल दो अपनी रज़िया के चूत को… ऐसे तो अमन भी ना कर सका आह्ह…”

जीशान-“गलपप्प भूल जाओगी रज़िया तुम अमन ख़ान को आज के बाद गलपप्प-गलपप्प…”

 
रज़िया-“हाँ भुला दो मुझे अपना वजूद भी भुला दो तुम मुझे आह्ह… गलपप्प-गलपप्प…” रज़िया की चूत से पानी बहने लगता है, मगर वो पानी बहने से ठंडी नहीं पड़ती थी, बल्की उसकी चूत और ज्यादा ख़ूँख़ार हो जाती थी। वो जीशान के आंडो को मरोड़ते हुये उसे चूसने लगती है गलपप्प-गलपप्प।

पास में लेटी हुई सोफिया का हाथ अपनी चूत के ऊपर चला जाता है और वो शलवार के ऊपर से ही अपनी चूत को सहलाने लगती है।

रज़िया अपनी एक उंगली जीशान की गाण्ड में डालकर उसका लण्ड चूसने लगती है। जीशान के उत्तेजना की इंतिहा नहीं थी, जिस्म था कि झटके पे झटके खाने लगता है

रज़िया-“उन्ह… चोदिए ना मुझे, बर्दाश्त नहीं होता जीशान आह्ह… चोदो मुझे, मेरी चूत नहीं रह पा रही है उन्ह…”

जीशान रज़िया को सोफिया के एकदम पास लेटा देता है ऐसे कि उसका जिस्म सोफिया की पीठ से टच होने लगता है।

अपनी पीठ पर अपनी अम्मी का नंगा जिस्म महसूस करके सोफिया की हालत और खराब होने लगती है।

जीशान रज़िया की दोनों टाँगों को अपने कंधे पर रख लेता है और अपने लण्ड को हाथ में पकड़कर उसे चूत पर घिसने लगता है।

रज़िया-“आह्ह… डाल भी दो, जालिम ऐसा मत कर आह्ह…”

जीशान अपनी दादी की बेचैनी देखकर मुश्कुरा देता है और लण्ड का सुपाड़ा रज़िया की चूत के अंदर घुसा देता है। लण्ड का सुपाड़ा अंदर जाते ही रज़िया और बेचैन हो जाती है, उसे तो पूरा का पूरा अपने अंदर चाहिए था, इसी लालच में वो अपनी कमर को ऊपर की तरफ उठा देती है और उसी वक्त जीशान भी जोर का झटका नीचे की तरफ देता है। दोनों की जांघे एक दूसरे से टकरा जाती हैं, और लण्ड रज़िया की चूत को चीरता हुआ अंदर तक घुसता चला जाता है।

जीशान-“रज़िया आह्ह… दादी ई आह्ह…”

रज़िया-“जीशान आआऽऽ मार डाला रे आह्ह… ये लौड़ा है कि फौलाद की कोई सलाख है मेरे बच्चे आह्ह…”

जीशान-“लौड़ा है दादी तुम्हारे लिए आह्ह…” और रज़िया के दोनों पैरों को कंधे पर टिकाए दनादन वो अपने लण्ड को रज़िया की चूत की गहराईयों में पेलता चला जाता है।

इधर रज़िया के पास लेटी सोफिया की हालत इस कदर खराब हो चुकी थी कि अब हाथ से काम चलाना उसके लिए मुश्किल हो चुका था।

रज़िया की आँखें बंद थी और वो अपने जीशान के लण्ड को अपनी चूत की गहराईयों में महसूस करके जन्नत में पहुँच चुकी थी।

जीशान अपना हाथ सोफिया की कमर पर रख देता है। नरम कमर के ऊपर जैसे ही जीशान का हाथ पड़ता है, सोफिया की चूत से पानी और जोर से बहने लगता है।

रूम में अंधेरा काफी था उसी का फायेदा उठाकर जीशान हाथ को आगे बढ़ाता हुआ सोफिया की चूत तक पहुँच जाता है, और जैसे ही उसके उंगलियाँ सोफिया की चूत के ऊपर पहुँचती हैं, गीला-गीला चिपचिपा सा रस उसकी उंगलियों से चिपक जाता है। वो समझ जाता है कि सोफिया जाग रही है।

वो रज़िया के ऊपर और झुकता है, जिससे रज़िया की दोनों टाँगे जीशान की कमर से लिपट जाती हैं। जीशान अपने लण्ड को सटासट रज़िया की चूत में अंदर-बाहर करते हुये अपने हाथ की पकड़ सोफिया की चूत पर बढ़ा देता है।

सोफिया भी अपना हाथ जीशान के हाथ पर रख देती है जैसे उससे कह रह हो कि तुम मेरी चूत में कब डालोगे?

जीशान-“रज़िया, ये चूत किसकी है?”

रज़िया-“तुम्हारी उन्ह…”

जीशान-“और इस चूत से निकली हुई?”

रज़िया-वो भी तुम्हारी ।

जीशान-“यानी अम्मी और सोफिया भी मेरी ?”

रज़िया-“हाँ मेरे बच्चे, तुम इस घर के सरदार हो। हर औरत तुम्हारी है, उसपर सबसे पहला हक तुम्हारा है। तुम अमन विला के बादशाह हो और हम सब तुम्हारे गुलाम हैं, जो करना है कर सकते हो तुम हमारे साथ। हम उफफ्फ़ तक नहीं करेंगे उन्ह…”

जीशान यही सुनना चाहता था और सोफिया को भी सुनाना चाहता था।

अपनी अम्मी के मुँह से ये सब सुनकर सोफिया की पकड़ जीशान के हाथ पर हल्की पड़ जाती है और वो अपना हाथ जीशान के हाथ पर से हटा लेती है।

जीशान सोफिया की शलवार का नाड़ा खोल देता है और रज़िया को चोदते हुये अपना हाथ उसकी पैंटी के अंदर घुसा देता है।

अपनी चूत पर जीशान का गरम हाथ पड़ते है सोफिया की सारी शर्म-ओ-हया जैसे गायब हो जाती है, और वो भी रज़िया ख़ानम की सगी बेटी की तरह खुद को महसूस करने लगती है, वो बेटी जिसका कोई भाई नहीं , बस एक मालिक है, एक सरदार है, एक बादशाह है, और वो है जीशान। जिसकी वो भी अपनी अम्मी की तरह गुलाम है।

जीशान अपनी उंगलियों से सोफिया की क्लोटॉरिस को सहलाने लगता है और रज़िया के होंठों को अपने मुँह में लेकर चूसने लगता है



जीशान का लण्ड रज़िया की चूत में अंदर-बाहर हो रहा था। मगर वो महसूस सोफिया को हो रहा था, हर झटका सोफिया अपनी चूत में महसूस कर रही थी, उसकी चूत से इतना पानी बह चुका था, जितना कि रज़िया की चूत से भी नहीं निकला था।

रज़िया-“आह्ह… जीशान , लौड़ा घुमाकर चोदो मुझे, जैसे मेरी चूत को अपने लौड़े से मथ रहे हो तुम…”

जीशान अपनी दादी की, अपनी रज़िया की हर मुराद पूरा करने की कसम खा चुका था। वो अपनी कमर को घुमाते हुये रज़िया को चोदने लगता है। उसका मोटा लण्ड पहले तो रज़िया की चूत में पूरी तरह अटक रहा था, उसपर जब वो अपनी कमर को घुमाते हुये रज़िया को चोदने लगता है।

रज़िया को ऐसे महसूस होता है जैसे जीशान का लण्ड नहीं कोई स्क्रु -ड्राइवर हो जिससे वो उसकी चूत को कस रहा हो। वो चीख पड़ती है और जीशान को बेतहाशा चूमने लगती है।

जीशान एक हाथ से रज़िया के निप्पल को मरोड़ने लगता है और दूसरे हाथ की उंगलियाँ सोफिया की चूत के अंदर डाल देता है।

सोफिया के मुँह से ‘उन्ह’ की सिसकी निकल जाती है, जो रज़िया के कानों तक पहुँच जाती है। वो अपनी गर्दन उठाकर जब देखती है तो हैरान रह जाती है कि सोफिया की सलवार कमर के नीचे सरकी हुई है और जीशान का एक हाथ उसकी चूत के पास है और वो अपनी उंगलियाँ अंदर-बाहर कर रहा है। अपनी बेटी के सामने चुदने से रज़िया का जोश और बढ़ जाता है और वो अपनी कमर को ऊपर तक उठा-उठाकर जीशान का साथ देने लगती है।

जीशान रज़िया को देखकर मुश्कुरा देता है और इधर अपने लण्ड से और उधर अपने हाथ से दोनों माँ-बेटी की चुदाई जम के करने लगता है। तीनों इस कदर जोश में पहुँच जाते हैं कि तीनों एक साथ चीखते हुये झड़ने लगते हैं। जीशान के लण्ड का पानी रज़िया की चूत में, और रज़िया का पानी जीशान के लण्ड के साथ नीचे जांघों से होता हुआ बेडशीट पर गिरने लगता है।

वहीं सोफिया की चूत अपना लावा जीशान के हाथों पर उड़ेल देती है।

तीनों हाँफने लगते हैं। जहाँ एक तरफ दो प्यार करने वाले इंतिहा तक पहुँच गये थे, वहीं जीशान का हाथ अपनी बहन की चूत के अंदर तक पहुँच गया था। अब वो वक्त दूर नहीं था, जब ये लण्ड भी चूत के अंदर जाने वाला था।

जीशान करवट लेकर सोफिया और रज़िया के बीच में आकर लेट जाता है। उसका लण्ड एकदम खड़ा था। रज़िया अपना एक पैर उसके ऊपर डालकर अपनी चूत की गर्मी जीशान के लण्ड को देने लगती है। दोनों एक दूसरे की आँखों में देखने लगते हैं, और रज़िया थोड़ा आगे की तरफ बढ़ती है, और जीशान अपनी रज़िया के होंठों को अपने होंठों में ले लेता है। दोनों कितनी ही देर एक दूसरे का लार पीते रहते हैं

 
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