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अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ complete

ईद का चाँद नजर आ चुका था। सारी रौनक बाजारों में जमा हो गई थी। हर तरफ कल की तैयारी की धूम थी। हर कोई ईद के दिन खूबसूरत दिखना चाहता था और इसी वजह से अमन ख़ान का खानदान शॉपिंग के लिए घर से निकल चुका था।

रज़िया अपनी बेटी अनुम और बहू शीबा के साथ कार में बैठी हुई थी और सोफिया की निगरानी में लुबना और नग़मा अपनी पसंद की चूड़ियाँ खरीद रही थीं।

लुबना सोफिया को चुटकी लेती हुई धीमी आवाज़ में कहती है-“आपी, क्या आप भी बाबा आदम के जमाने की चूड़ियाँ देख रही हो। चलो ना… वहाँ सामने देखो ना कितनी प्यार चूड़ियाँ दिख रही है चलो ना…”

नग़मा-हाँ आपी चलकर देखते हैं।

सोफिया-“उफफ्फ़ हो अच्छा बाबा चलो…” और तीनों एक दूसरे का हाथ पकड़कर उस भीड़-भाड़ वाले हिस्से की तरफ चल देती हैं, जहाँ पता नहीं किस वजह से इतनी भीड़ जमा थी।

लुबना-“ये जेशु भाई को भी आज ही जाना था अपने दोस्त के साथ। क्या हो जाता अगर वो हमें शॉपिंग करवाने लाते…”

सोफिया-“हाँ यार, देख ना कितनी भीड़ जमा है यहाँ। पता नहीं ऐसी कौन सी चूड़ियाँ मिल रही हैं?” वो तीनों लोगों को धकेलते हुये उस दुकान के पास आ जाती हैं। तीनों की नजरें सामने पड़ी हुई चूड़ियों पे पड़ती है। रंग-बिरंगी हर कलर की खूबसूरत चूड़ियाँ । लुबना के साथ-साथ नग़मा और सोफिया की आँखें भी चमक जाती हैं। तीनों इतने खुश थे कि बस पूछो मत।

पाँच जवान लड़के मिलकर ये दुकान संभाले हुये थे। चार की शकलें देखाई दे रही थीं, पर वो पाँचवाँ बंदा उन तीनों की तरफ पीठ करके बैठा हुआ था और उसके पास सबसे ज्यादा भीड़ लगी हुई थी। जवान, कम उमर से लेकर मेच्योर उमर की हर ख़ातून (विमन) उस शख्स को घेरे हुई थीं।

नग़मा आँखों के इशारे से सोफिया और लुबना को दिखाती है सामने का नजारा।

बस एक पल के लिए वो शख्स अपना चेहरा घुमाकर देखता है।

और लुबना के मुँह से एक खौफनाक चीख निकलती है– “जीश उउ भाईई…” वो इतने जोरों से चीखी थी कि पास में खड़े हुये हर इंसान पे खौफ तरी हो गया था।

सोफिया और नग़मा बुरी तरह डर गई थी कि पता नहीं अचानक ये लुबना को हो क्या गया है? वो दोनों लुबना के चेहरे को देख रही थीं और लुबना सामने उस शख्स के चेहरे को।

जब सोफिया और नग़मा-लुबना की आँखों का पीछा करती हुई अपनी गर्दन घुमाकर वहाँ देखती हैं, जहाँ लुबना देख रही थी तो मारे हैरत के उन दोनों के मुँह से भी बस यह निकलता है-

“जीशान भाई…”

सामने बैठा वो पाँचवाँ शख्स और कोई नहीं बल्की अमन विला का एकलौता चश्मो चिराग और अमन ख़ान का बेटा जीशान ख़ान था जो अपने चारों दोस्तों के साथ सिर्फ़ और सिर्फ़ आज की रात ये मशहूर-ओ-मारूफ़ बिजनेस करने चाँदनी चौक में डेरा जमाए हुये था।

नग़मा और सोफिया के चेहरे पे पहले खौफ और फिर हँसी के बादल छा गये थे।

दोनों लड़कियाँ बुरी तरह हँसे जा रही थी उन्हें यकीन नहीं हो रहा था की जीशान ऐसा कोई काम भी कर सकता है। पर लुबना जीशान की सगी छोटी बहन… उसके दिल पे तो जैसे साँप रेंग रहे थे। वो आग का गोला हो चुकी थी, जिसे छूते ही कोई भी चीज बच ना पाए।

लुबना की आँखों की चमक देखकर जीशान का दिल बुरी तरह धड़क रहा था। वो जानता था की अगर एक मर्तबा लुबना नाराज हो जाये तो उसे मनाना मतलब लोहे के चने चबाना। वो लुबना की तरफ बढ़ता है। पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लुबना पैर पटकती हुई अपनी कार की तरफ बढ़ जाती है, जहाँ रज़िया, अनुम और शीबा बैठी हुई थीं।

जीशान लुबना का हाथ पकड़ लेता है-“अरे लुबु मेरी बात तो सुन… जरा देख कितनी प्यार चूड़ियाँ लाया हूँ तेरे लिए…”

लुबना अपने हाथ में चूड़ियाँ लेकर फेंक देती है-“ये चूड़ियाँ उन तितलियों को पहनाओ जो तुम्हारे आस-पास मंडरा रही थीं। मुझे नहीं चाहिए छोड़ो मेरा हाथ…”

जीशान-“इतना गुस्सा अच्छा नहीं बेबी…”

लुबना उस वक्त किसी की बात नहीं सुनने वाली थी। वो जीशान की आँखों में देखती हुई कहती है-“छोड़ो मेरा हाथ वरना अच्छा नहीं होगा…”

जीशान थोड़ा आगे बढ़ता है और लुबना की पेशानी से अपनी पेशानी टिका देता है और उसकी आँखों में देखने लगता है-“मेरी प्यार लुबु इधर देखो…”

ना जाने क्या था उन आँखों में की उसकी तपिश लुबना बर्दाश्त नहीं कर पाती और जोर से अपना हाथ छुड़ा के वहाँ से चल देती है।

सोफिया और नग़मा पीछे हल्के-हल्के कदम के साथ चल आ रही थी।

जीशान फिर से लुबना के सामने आ जाता है-“अरे यार, बस भी करो लुबना… मैंने कहा ना, मैं अपनी मर्ज़ी से यहाँ नहीं आया था। वो मेरा दोस्त जावेद, मुझे जबरदस्ती मुझे साथ ले आया।

लुबना इधर-उधर देखती है। उसे पास में एक पुलिस वाला खड़ा दिखाई देता है जो शायद काफी वक्त से इन दोनों की तरफ ही देख रहा था।

लुबना उस पुलिस वाले को देखकर दिल में खुश हो जाती है और फिर जोर से चिल्लाती है-“बचाओऊ बचाओऊ…”

डर के मारे जीशान फौरन लुबना का हाथ छोड़ देता है और उसे फटी-फटी नजरों से देखने लगता है-“अरे कमबख्त मारी चुप हो जा, क्या हुआ है तुझे?”

लुबना की आवाज़ सुनकर वो पुलिस वाला दौड़ता हुआ उनके पास आ जाता है-

पुलिस-“क्या बात है मेडम कोई प्राब्लम है?”

लुबना-“ये शख्स मुझे परेशान कर रहा है सर…”

जीशान की पलकें झपकना बंद हो जाती हैं आँखों के सामने अंधेरा छा जाता है और मुँह खुला का खुला रह जाता है-“क्या?”

पुलिसवाला जीशान का कलर पकड़ लेता है और उसे ऐसी नजरों से देखता है जैसे लुबना उस पुलिस वाले की बहन हो और जीशान कोई आवारा लोफर जो उसे छेड़ रहा था।

जीशान पुलिस वाले को समझाता है-“देखिये सर, ये लड़की मेरी बहन है और ये मुझसे बदला लेने के लिए ये सब कह रही है। बोलो ना लुबना?”

लुबना इधर-उधर देखते हुये-कौन लुबना?

जीशान को दूसरा झटका लगता है।

पुलिस वाला -“मैं अच्छी तरह जानता हूँ तुम जैसे रोड साइड रोमियो को। पहले लड़की को परेशान करते हो, उसके बाद कोई मामा दिख जाए तो उसे बहन बना लेते हो। चलो हवालात…”

जीशान खुद को संभालता हुआ-“माइींड योर लैंग्वेज इनस्पेक्टर। डू यू नो हू आई एम?”

इनस्पेक्टर-“ओह्ह… क्या बात है? इंग्लिश? तू चल मेरे साथ हवालात, तेरी सारी इंग्लिश विंग्लिश ऐसे बाहर निकाल दूँगा कि फिर कभी किसी लड़की की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखेगा…”

जीशान लाख कोशिश करता है लुबना को समझाने की, पर लुबना के कानों पे तो जैसे जूँ तक नहीं रेंग रही थी। वो टस से मस नहीं हुई। और वो पुलिस वाला अपने दो और साथियों की मदद से जीशान को पास के पुलिस स्टेशन ले जाता है।

सोफिया और नग़मा-लुबना के पास पहुँचती हैं और जब उन्हें पता चलता है कि इस बेवकूफ़ ने अपने गुस्से की वजह से जीशान को हवालात की सैर करवा दी तो वो फौरन अमन ख़ान को फोन करके सारा माजरा बताती हैं।

अमन ख़ान की शिमला में काफी इज़्ज़त थी। अमन अपने दोस्त और उस इलाके के डी॰एस॰पी॰ को फोन करता है। तकरीबन 3 घंटे के बाद जीशान फटे कपड़ों के साथ पुलिस स्टेशन से बाहर निकलता है। अंदर उसकी कुछ पुलिस वालों के साथ हाथा-पाइ हो गई थी। वो तो शुकर रहा की अमन सही वक्त पे वहाँ पहुँच गया वरना फिर बात बिगड़ते देर ना लगती।

अमन जीशान को कार में बैठने के लिए कहता है। दोनों बाप बेटे घर की तरफ रवाना हो जाते हैं। जबसे ये खबर घर की औरतों को पता चली थी उनकी बेचैनी का ठिकाना नहीं था। अनुम तो जैसे तड़प सी गई थी। उसने गुस्से में एक जोरदार थप्पड़ भी लुबना को रसीद कर दी थी।

 
रज़िया अपने रूम में बैठी दुआ माँग रही थी कि तभी दरवाजे की बेल बजती है और सोफिया दौड़ते हुई दरवाजा खोलती है तो सामने मुँह लटकाए जीशान खड़ा था।

अमन उसे अंदर ले आता है और आराम करने के लिए कहता है।

जीशान सीधा अपने रूम में चला जाता है और धड़ाम से दरवाजा बंद कर देता है। सभी उसके गुस्से की लिमिट उसके दरवाजा बंद करने के अंदाज से जान गये थे।

लुबना अपने रूम में लेटी हुई थी। जीशान के घर आने की खुशी में दो आँसू उसकी पलकों से होते हुये तकिये में जज़्ब हो जाते हैं। ये लुबना के लिये हमेशा की बात थी। वो बिल्कुल अपनी अम्मी अनुम पे गई थी। जिस तरह अनुम ये कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती थी कि अमन किसी और से बात करे, किसी और का हाथ पकड़े।

अमन अनुम की तरफ देखता है।

अनुम-“क्या बात है? जीशु इतना गुस्से में क्यूँ है? कुछ किया क्या उसने वहाँ पुलिस स्टेशन में?”

अमन-“नहीं , कुछ नहीं । तुम और तुम्हार बेटी दोनों एक जैसे हो। जाओ आराम करो रात बहुत हो गई है…”

अनुम शरारती अंदाज में-“नींद नहीं आ रही । कुछ काम बाकी है उसके बाद सो जाऊूँगी। आप जाओ, कल सुबह जल्द उठना भी है ना…”

अमन अपनी खूबसूरत बीवी अनुम के होंठों को चूमते हुये निच ले होंठ को काट लेता है। पिछले एक महीने से ये सभी शेर और शेरनियाँ भूखे थे।

रात 12:00 बजे-

सभी अपने-अपने कमरे में जा चुके थे। सभी के अपने अलग-अलग कमरे थे। अमन के रूम में अनुम और रज़िया के रूम का दरवाजा खुलता था। तीनों बेडरूम एक साथ जुड़े थे। अमन का जिस रूम में जाने को दिल करता, वो वहीं रात गुजारता था। ये बात घर के जवान नहीं जानते थे। अमन बीच के रूम में जाता है जहाँ वो और शीबा रहते थे।

शीबा बेड पे बैठी अमन का ही इंतजार कर रही थी। अमन शर्ट के दो बटन खोल कर वहीं बैठ जाता है। शीबा अपने शौहर की परेशानी जानती थी। वो अपनी बाहों का हार उसके गले में डालकर अमन के कान को चूमती हुई काटती है।

पर अमन उठकर पास वाले रज़िया के रूम में चला जाता है और शीबा अपनी किश्मत को कोसती हुई रह जाती है। अमन अपनी ज्यादातर रातें रज़िया या फिर अनुम या दोनों के साथ गुजारता था। यही चीज थी जो शीबा के तन-बदन में आग लगा देती थी।

शीबा दिल में सोचती है-“बस कुछ दिन और रज़िया, बस कुछ दिन और…”

जब अमन रज़िया के रूम में पहुँचता है तो रज़िया उससे लिपट के जीशान की खैर ख़ैरियत पूछती है।

अमन उसे सारा माजरा बताता है और ये भी बताता है की जीशु ठीक है। ये खबर सुनकर रज़िया के चेहरे पे सकून आ जाता है। रज़िया अमन की बाहों में सिमट जाती है। एक महीने की भूखी प्यासी रज़िया अपने अमन से लिपट के गर्दन को चूमने लगती है।

अमन-“अम्मी, आज सिर्फ़ मुझे प्यार करने दो…”

रज़िया-“हाँ अमन, कर लो जो करना है। आज भी रज़िया तुम्हें वैसे ही मिले गी जैसे 20 साल पहले मिलती थी…” दोनों एक दूसरे के होंठों को मुँह में लेकर खो जाते हैं।

प्यार की अजीम शिद्दत जोश का वो जज़्बा आज तक ठंडा नहीं पड़ा था, वो आग आज भी उसी तरह अपने पूरे शबाब पे थी। कुछ पलों में रज़िया अपने कपड़ों से निजात पा लेती है। आज अमन और रज़िया एक दूसरे से बातें नहीं कर रहे थे वो बस प्यार कर रहे थे।

अमन रज़िया के चूत से लेकर मुँह तक उसे चाटने लगता है और रज़िया अपनी साँसे रोके अमन की हर उस अदा पे मरती मिटती जाती है।

रज़िया-“अह्ह… बेटा अमन, चलो ना जल्द से आ जाओ ना ऊपर अपनी रज्जो के उम्ह्ह…”

ये शब्द नहीं रज़िया का हुकुम था, जिसे अमन हर हालत में पूरा करता था। वो अपनी जान, अपनी अम्मी रज़िया की चूत पे अपना लण्ड घिसते हुये अंदर डाल देता है।

रज़िया-“उम्ह्ह… मेरा बच्चा… मर जाऊूँ तेरी जवानी पे अमन। आज भी वही जोश है तुझमें, ऐसा लगता है मैं सुहागरात मना रही हूँ । मेरी चूत आज भी तेरे लौड़े से चिर जाती है उम्ह्ह… अमन बेटा…”

अमन-“अह्ह… अम्मी, आपकी चूत में जो बात है वो ना अनुम की चूत में है, और ना शीबा की… दिल तो करता है ऐसे ही तुझे हमेशा नीचे लेकर चोदता रहूं अह्ह…”

रज़िया अपनी चूत की दीवारों में अमन के धक्कों से सिहर उठती है और जोश के आलम में दोनों बस एक दूसरे को मसलते चले जाते हैं। मोहब्बत की ये पहली रात ऐसे ही रात भर रवाँ रहती है और देखते ही देखते सुबह का सूरज अपने साथ ईद की खुशियाँ लेकर अमन विला पे चमकता है।

***** *****ईद का दिन

ईद का दिन अपने साथ कई खुशियाँ लेकर आया था। सुबह से पूरा खानदान इसकी तैयारी में लगा हुआ था। पर लुबना और जीशान के लिए तो जैसे आज का दिन रोज की तरह ही नजर आ रहा था।

लुबना किचेन में बर्तन साफ कर रही थी। उसके चेहरे पे उदासी साफ देखी जा सकती थी। कोई गम उसे अंदर ही अंदर मारे जा रहा था वो बार-बार मुड़कर जीशान के रूम की तरफ देखती।

पास में सोफिया खड़े कब से ये सब देख रही थी। सोफिया उसे छेड़ती है-“क्या बात है शहज़ादी साहिबा, आज आपका मूड इतना रूखा - रूखा क्यूँ है? चलो जल्द से ये सब रखो और चलो मेरे साथ…”

लुबना-कहाँ आपी?

सोफिया-जीशान के रूम में।

लुबना डर के मारे दो कदम पीछे हो जाती है-“नहीं नहीं , मुझे नहीं जाना वहाँ…”

सोफिया बड़े प्यार से उसका चेहरा अपनी तरफ करती है और उसकी आँखों में रुके हुये आँसुओं को देखती हुई कहती है-“सुबह से तू कई मर्तबा उसके रूम में झाँक चुकी है। मैं जानती हूँ , तू कल की बात को लेकर शर्मिंदा है। अगर तू उसे नहीं मनाएगी, तो वो बेवकूफ़ आज ईद के दिन भी अपने रूम से बाहर नहीं निकलेगा। तू तो जानती है ना उसे। चल अब…”

लुबना-“पर आपी, वो… मैं… मुझे तो मुझे डर लग रहा है, ना प्लीज़ …”

 
सोफिया उसकी पेशानी पे चपत मारते हुये-“बेवकूफ़ कहीं की… वो भी हमारी तरह इंसान है, कोई भूत नहीं । जो तुझे डर लग रहा है। अब चलती है कि नहीं ?” और सोफिया उसका हाथ पकड़कर उसे जीशान के रूम में ले जाती है।

जीशान बेड पे उल्टा लेटा हुआ था। तीन तकिये उसके नीचे थे। ये देखकर सोफिया को हँसी आ जाती है।

जीशान जाग चुका था, पर रात की बात का गुस्सा उसके पूरे जिस्म पे नजर आ रहा था। वो उठकर बेड पे बैठ जाता है और सामने खड़ी लुबना को घुरने लगता है।

सोफिया-“ये लो जेशु मियाँ, ले आई मैं तुम्हारी मुजरिम को। अब जो सजा देनी हो दो। पर प्लीज़्ज़… जल्द , वरना तुम दोनों के चक्कर में मेरी ईद रह जाएगी…” और ये कहते हुये सोफिया जीशान के रूम से बाहर निकल जाती है।

लुबना सोफिया को रोकना चाहती थी। पर जीशान को अपनी तरफ बढ़ता देखकर वो सहमकर वहीं रुक सी जाती है। जीशान लुबना के एकदम करीब पहुँचकर उसके बाल अपने हाथ में लेकर उसका चेहरा ऊपर उठाता है। लुबना दर्द के मारे कराहने लगती है, पर वो जानती थी कि वो जितना कमजोर दिखाएगी उतनी जल्द जीशान का गुस्सा कम होगा।

लुबना-“अह्ह… जीशान भाई, आई एम सॉरी …”

जीशान अपने दाँत पीसते हुये-“कौन जीशान… मैं तुझे नहीं जानता, तू है कौन? और यहाँ क्या कर रही है? चल जा वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा…”

लुबना की आँखे किसी भी वक्त छलक सकती थीं। पर वो उसे जप्त किए हुई थी। वो खुद को और मजबूत दिखाना चाहती थी। पर जीशान की आँखों की तपिश उसे कभी रास ना आती थी। वो जब भी उसकी आँखों में देखती, दुनियाँ को भूल जाती-“प्लीज़्ज़… भाई, मुझे माफ कर दो। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई ना प्लीज़्ज़… मुझे एक आखिर बार माफ कर दो…”

जीशान-“कभी नहीं … जिस तरह तू मुझे नहीं पहचानती, उसी तरह मैं भी तुझे नहीं जानता। अच्छा यही होगा लुबना कि तू यहाँ से चल जा, कोई नहीं लगती तू मेरी , कोई रिश्ता नहीं तेरा मेरा।

लुबना को ये शब्द तीर की तरह चुभे थे। वो नीचे फर्श पे बैठ जाती है और आँसू उसकी आँखों की दीवार तोड़कर जोरों से बहने लगते हैं। वो कुछ ही पलों में इतनी दुखी हो गई थी कि उसकी साँसें अटकने लगी थीं। जीशान की कही बातों ने उसे अंदर तक हिला दिया था।

जीशान उसकी आँखों में एक आँसू नहीं देख सकता था। आखिरकार वो उसकी सगी बहन थी, एक माँ के पेट से पैदा हुई, उसकी अपनी बहन। जिसकी जगह उसके दिल में कुछ ऐसी थी जैसे फूल और खुश्बू । वो लुबना को अपने हाथों से पकड़कर उठा लेता है और अपने एक हाथ से उसके आँसू साफ करने लगता है-“बस चुप हो जा माफ किया मैंने तुझे…”

पर लुबना रोए जा रही थी।

जीशान-“मैंने कहा ना तुझे, मेरी कसम लुबु रोना बंद कर दे…”

लुबना के कानों में जब कसम वाले शब्द पहुँचे, तो वो ऐसे रोना बंद हुई जैसे अचानक किसी ने ओन बटन को आफ कर दिया हो, आँसू बहना बंद हो गये थे और चेहरे पे कोई उदासी नहीं थी। जीशान उसके चेहरे को गौर से देखने लगता है और फिर उसे अपनी छाती से लगा लेता है। ये प्यार अब तक भाई बहन के ररश्ते से आगे नहीं बढ़ा था। लुबना अभी तक ये बात खुद को समझाने से नाकाम रही थी कि आखिर क्यूँ वो जीशान को दुनियाँ में सबसे ज्यादा चाहती है? आखिर वो क्यूँ जीशान के करीब किसी को भी देख नहीं पाती? आखिर वो क्या वजह है कि वो जीशान की हर बात को मानती है, बिना सोचे समझे।

जीशान अपनी बहन से बेपनाह मोहब्बत करता था। उसकी हर छोटी बड़ी ज़रूरतें वो पूरी करता था। एक बार को वो सोफिया या नग़मा को मना कर देता पर लुबना के लिए वो कभी ना नहीं कहता। दोनों भाई बहन के ररश्ते में आई वो छोटी सी खटास भी आँसू ने धो दी ।

जीशान-“मोटी अगर तेरी जगह कोई और होता ना तो कसम से वो आज हॉस्पीटल में होता…”

लुबना के चेहरे पे आज सुबह की पहले मुश्कान नजर आई थी-“जानती हूँ , मगर एक बात अच्छे से सुन लो, अगर आपने आइींदा ऐसी वैसी कोई हरकत की ना तो सीधा एस॰पी॰ ऑफिस जाऊूँगी और वहाँ फिर मैं खुद लिखवाउन्गी…” ये कहती हुई वो दरवाजे की तरफ लपकती है और जीशान उसे पकड़कर मारने के लिए उसके पीछे भागता है।

तभी रूम में सोफिया दाखिल होती है-“अरे र … ये क्या हो रहा है भाई? कुछ देर पहले तो एक दूसरे के जान के दुश्मन बने हुये थे और अब फिर से शैतानी…”

जीशान-“आप बीच में से हट जाओ आपी, मैं इस मोटी को ठीक करता हूँ …”

लुबना सोफिया के पीठ पीछे छुपकर जीशान को जुबान से चिढ़ाने लगती है-“लगता है आपी ये चूड़ियों वाला अपनी औकात भूल गया है…” लुबना और सोफिया दोनों खिलखिलाकर हँसने लगती हैं।

और जीशान गुस्से से लुबना के बाल खींचते हुये कहता है-“ये चूड़ियों वाला तुम्हें अपनी औकात के साथ बहुत महँगा पड़ेगा लुबना बेबी…”

सोफिया-“बस-बस बहुत हुआ, चलो जीशान तुम फ्रेश हो जाओ और जल्द से नीचे नाश्ता करने आ जाओ…” ये कहती हुई वो लुबना को अपने साथ बाहर ले जाती है।

लुबना खुशी में झूमती हुई आ रही थी और सीधा वो अनुम से टकरा जाती है-“ओह्ह… सारी फुफु…”

अनुम प्यार भरा हाथ लुबना के सर पे फेरते हुये-“कोई बात नहीं बेटा…” और अपनी बेटी लुबना के मासूम चेहरे को देखते हुये जीशान के रूम की तरफ चल देती है।

लुबना सर झटकते हुये सोफिया के साथ अपने रूम में घुस जाती है।

जीशान बाथरूम में नहा रहा था। उसे पता नहीं था कि अनुम उसके रूम में उसके कपड़े प्रेस कर रही है। वो एक छोटी सी तौलिया लपेटे हुये सीधा बाथरूम से बाहर निकलता है और जैसे ही वो सामने अनुम को खड़ी पाता है तो घबरा जाता है और इसी घबराहट में उसकी वो छोटी सी तौलिया उसका साथ छोड़कर नीचे जमीन पे गिर जाती है-“आई एम सारी फुफु…” और वो सीधा किसी तरह वापस बाथरूम में घुस जाता है। पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

अनुम उन 7 सेकेंड में जीशान का वो खूबसूरत हथियार देख चुकी थी। जो शायद उसे नहीं देखना चाहिए था। वो मुँह पे हाथ रखे वहाँ से अपने रूम में चल जाती है।

अनुम अपने दिल की तेज धड़कनें संभालने के लिए लेट जाती है और जैसे ही वो आँखें बंद करती है, वही सीन उसकी आँखों के सामने आ जाता है। वो उठकर वापस बेड पे बैठ जाती है।

नहीं नहीं , ये नहीं होने दूँगी मैं। मैं अम्मी के रास्ते पे नहीं चलूंगी । चाहे कुछ भी हो जाये मैं ये सब दुबारा इस घर में किसी कीमत पे नहीं होने दूँगी । वो खुद से बातें करने लगती है की तभी अमन उसके रूम में आता है। अनुम उससे देखकर खुद को संभालती है-“अरे, आप यहाँ?”

अमन-“हाँ, वो शीबा पता नहीं कब से बाथरूम में घुसके बैठी है। सोचा चलो तुम्हारे रूम का बाथरूम इश्तेमाल किया जाए…”

अनुम मुश्कुराते हुई अमन की बाहों में सिमट जाती है-“सिर्फ़ बाथरूम ही क्यों जी…”

अमन उसे अपनी छाती से कसते हुये-“ह्म्म्म्म… सही कह रही है तू । पहले मेरी जान को इश्तेमाल किया जाए, उसके बाद बाथरूम शेयर किया जाए। क्यों सही कहा ना मैंने?”

अनुम अमन से चिपकते हुई-“जैसी आपकी मर्ज़ी जान …” शायद रात भर वो अमन के लिए जागी थी इसलिये जिस्म टूट रहा था, शमा पिघलने के लिए बेकरार थी।

अमन रूम लाक करके वापस मुड़ता है तो सामने अनुम को कपड़े उतारता देखकर दिल ही दिल में खुश हो जाता है। वो टापलेश हो चुकी थी और अमन के कपड़े उतारने के इंतजार में थी। जब अमन कोई हरकत नहीं करता तो वो खुद आगे बढ़कर उसका पैंट नीचे खेंच लेती है और साथ में उसकी अंडरवेयर भी।

अनुम-“आज सबसे पहले मैं मुँह मीठा करूँगी…”

अमन-“हाँ अनुम, आज सबसे पहले तू …” और ये कहते हुये अमन अनुम को नीचे बैठा देता है।

अनुम के हाथ में अमन का लण्ड आते ही उसमें जैसे हलचल सी पैदा होने लगती है। वो उसे पहले चूमती है और फिर अपने शौहर के उस हिस्से को, जिसे वो सबसे ज्यादा चाहती थी। अपने मुँह में लेकर चूसने लगती है-“गलप्प्प गलप्प्प गलप्प्प गलप्प्प…”

अमन-“अह्ह… ऐसे मत कर अनुम अह्ह…”

अनुम दोनों हाथों से अमन की कमर पकड़कर लण्ड गले में घुसा लेती है और अपनी आँखो से अमन को देखते हुये लण्ड को और अंदर लेती चल जाती है। उसकी आँखें साफ कह रही थीं अमन से-“कि खबरदार जो मना किया तो… पूरा का पूरा खा जाऊूँगी…”

अमन उसे अपनी गोद में लेकर बेड पे पटक देता है। उसके पास वक्त कम था और काम ज्यादा। वो अनुम के उठने से पहले अपनी जुबान को उसकी चूत पे लगा देता है, जिससे अनुम वापस बेड पे लेट जाती है। उसकी आँखें हमेशा की तरह बंद हो जाती हैं। पर आज न जाने क्यों फिर से उसे जीशान का वही लण्ड नजर आ रहा था। वो आँखें खोलती है और फिर से बंद कर देती है। इस बार उसे अलग सा नशा चढ़ने लगता है जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।

अनुम-“अह्ह… जान मुँह में डालो ना…”

अमन उसे अपने ऊपर आने के लिए कहता है और दोनों 69 की पोजीशन में आ जाते हैं। अमन तो अपनी बीवी अनुम की चूत चाट रहा था। पर अनुम क्या सोचकर अमन के लण्ड को मुँह की गहराईयों में उतार रही थी। ये सिर्फ़ अनुम जानती थी। उसका जिस्म झटके खाने लगता है। शायद वो बहुत जोश में आ चुकी थी। वो नीचे उतरकर अमन के लण्ड को हाथ में ले लेती है और उसकी आँखों में देखने लगती है। मुँह से तो कुछ नहीं कह पा रही थी वो पर हाले दिल अमन को बखूबी सुना रही थी।

अमन उसके साथ पिछले 20 साल से जिंदगी गुजार रहा था। वो जानता था अनुम को कब प्यास लगती है और कब भूख वो अनुम की चूत पे लण्ड घिसने लगता है जिससे अनुम तड़प उठती है।

अनुम-“अह्ह… घिस मत घुसा दो उम्ह्ह… क्यों सताते हो जी, अपनी जान सी प्यार बीवी को उम्ह्ह…”

अमन-“क्या करीं अनुम तेरी चूत है ही इतने छोटी की ये अंदर ही नहीं घुसता ना…”

अनुम-“अह्ह… दो-दो बच्चे निकाल चुके हो इससे, और आप कहते हो छोटी है अह्ह… छोटी है तो बड़ी कर दो ना…”

अमन मुश्कुराता हुआ अपने लण्ड को उसकी चूत में घुसा देता है।

अनुम-“अह्ह… जान … मुझसे यहाँ अकेले नहीं सोया जायेगा, मैं कल से अम्मी के साथ सोऊूँगी अह्ह… ओह्ह…”

अमन-“ठीक है मेरी गुड्डो अह्ह…”

अनुम के चेहरे पे मुश्कान आ जाती है पर अगले ही पल अमन के झटके से वो कहीं गायब हो जाती है। आज अनुम के दिल की हालत कुछ और थी। आँखें बंद करती तो जीशान नजर आता। आँखें खोलती तो अमन उसपे झुका हुआ सटासट अपना लण्ड चूत में पेलता हुआ। पर इन सब बातों का उसके जिस्म पे ये असर हुआ था कि कई सालों बाद वो जिस सेक्स को कम महसूस करने लगी थी, आज वही जोश, वही जुनून जो आज से ठीक 20 साल पहले अमन से पहल बार उससे चुदते वक्त महसूस हुआ था। वही जज़्बात वो आज महसूस कर रही थी।

अमन 10 मिनट बाद अपने लण्ड का पानी अनुम की चूत में निकालकर बाथरूम में घुस जाता है। और अनुम अपनी चूत में उंगल डालकर वही पानी होंठों से लगाकर चाटती है।

 
जीशान जब स्काइ ब्लू कलर का पठानी कुर्ता पहनकर हाल में दाखिल होता है तो सोफिया और लुबना की आँखो में जैसे नूर आ जाता है। वो कमाल की पर्सनाल्टी वाला बंदा था गोरा-चिट्टा रंग, चेहरे पे हमेशा मुस्कान, जब भी मुस्कुराता गाल में दो छोटे-छोटे डिंपल पड़ते थे। वो सोफिया को सलाम करके उसकी तरफ बढ़ता है।

सोफिया और वो तकरीबन एक क़द के थे। सोफिया अपनी अम्मी रज़िया की जवानी थी तो वहीं जीशान अमन ख़ान की।

जीशान सोफिया को गले लगाकर ईद की मुबारक बाद देता है

सोफिया भी अपने हैंडसम भाई की छाती से चिपक के बहुत खुश थी। कहते हैं लड़कियाँ लड़कों से खूबसूरत होती हैं। पर हश-ओ-जमाल के मामले में जीशान से खूबसूरत अमन विला में कोई नहीं था। जीशान अपनी बहन सोफिया की पेशानी चूमते हुये उसे ईद की मुबारक बाद देता है। दोनों भाई-बहन सोफिया की तरफ देखते हैं, जो उन दोनों पे नजरें गढ़ाए खड़ी थी।

लुबना जीशान से क़द में थोड़ी छोटी थी। वो जीशान के जब गले लगती है तो जीशान उसे अपनी छाती से लगाकर थोड़ा सा ऊपर उठा लेता है, जिससे लुबना की छोटी -छोटी कड़क चुचियाँ जीशान की चौड़ी छाती से रगड़ खाने लगती हैं।

जीशान-ईद मुबारक हो लुबु।

लुबना-आपको भी भाई।

तभी वहाँ रज़िया आ जाती है। रज़िया सबसे पहले अपने पोते जीशान से मिलती है। नरम मगर बड़ी-बड़ी चुचियाँ जीशान की छाती से चिपक की ओर अंदर धँस जाती हैं।

रज़िया जब भी जीशान से मिलती थी वो उसे किसी ना किसी बहाने से कस लेती थी। आज भी वो उसे अपने से अलग करने के मूड में नहीं थी, वजह ये थी कि जीशान अमन की जवानी का आक्स था और हर औरत अपने शौहर को जवान देखना पसंद करती है।

जीशान रज़िया को नॉर्मल तरीके से पकड़े हुये था। पर रज़िया की नीयत का कोई सही तरह से अींदाजा नहीं लगा सकता था।

जीशान बार -बार सभी से मिलता है पर जब वो अनुम के रूम में मिलने जाता है तो उसकी साँसे धीमी रफ़्तार से चलने लगती हैं। पटियाला सूट में अनुम किसी संतराश की सूरत से कम नहीं लग रह थी।

अनुम-कैसे लग रही हूँ मैं जीशान बेटा?

जीशान थूक निगलते हुये- बूम

अनुम-क्याआअ?

जीशान-बहुत-बहुत खूबसूरत फुफु।

अनुम बनावटी गुस्सा दिखाती हुई-“बस बस सबसे आखिर में मुझसे मिलने आए हो तुम…”

जीशान-“फुफु सच कहूँ तो जब भी आपसे गले मिलता हूँ ना दिल में एक अजीब सा सकून महसूस होता है जो अम्मी से मिलने पे भी नहीं होता। काश आप मेरी अम्मी होतीं…”

अनुम की पलकें भीगने के कगार पे थीं पर वो वक्त और हालत को देखते हुये खुद को संभाल लेती है-“मैं भी तो तेरे अम्मी हूँ ना… अगर तुझे ऐसा महसूस होता है तो तू अकेले में मुझे अम्मी कहा कर…” आज माँ की छाती से ममता की आवाज़ निकली थी।

अनुम के मुँह से ये शब्द तो अदा हो गये थे। पर वो जानती थी कि जीशान कभी उसे अम्मी नहीं कहेगा। दोनों एक दूसरे के गले मिलकर ऐसे खो जाते हैं, जैसे हीर और राझा मरने से पहले आख़िरी बार मिले थे। दोनों के जज़्बात बयान करना बहुत मुश्किल था। अनुम जो पिछले 20 साल से जीशान के मुँह से अम्मी लफ़्ज सुनने के लिए तरस गई थी।

जीशान अनुम को इस कदर अपने से जकड़ लेता है कि अनुम की चुचियाँ , कमर और पेट उससे एकदम चिपक जाते हैं ‘उम्ह्ह’ की सिसकी अनुम के होंठों से निकलती है और जीशान अनुम को छोड़ देता है। दोनों एक दूसरे को देखने लगते हैं और अनुम आगे बढ़कर जीशान की पेशानी चूम लेती है-“ईद मुबारक हो बेटा…”

जीशान मुस्कुराता हुआ वहाँ से चला जाता है।

उधर रज़िया के रूम में अमन और रज़िया ना सिर्फ़ एक दूसरे को मुबारक बाद दे रहे थे बल्की एक दूसरे का मुँह भी मीठा करा रहे थे। रज़िया की जुबान अमन के मुँह में मिठास घोल रही थी और अमन रज़िया की कमर को सहलाता हुआ उसका साथ दे रहा था। वो सबसे पहले रज़िया से ही मिलता था। उन्हें किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई देती है और दोनों एक दूसरे से अलग हो जाते हैं।

सोफिया-दोनों के प्यार की निशानी वहाँ अपनी तमामतर खूबसूरतियों के साथ उनके सामने आ जाती है-

“ईद मुबारक हो अब्बू …”

“ईद मुबारक हो दादी जान…”

अमन अपनी प्यार बेटी को गले लगाकर ईद की मुबारक बाद देता है।

सोफिया-मैं कैसी लग रही हूँ अब्बू ?

अमन उसे अपनी छाती से चिपका के सामने खड़ी रज़िया की आँखो में देखते हुये-“बिल्कुल अपनी अम्मी की तरह जन्नत की हूर …”

सोफिया से ज्यादा रज़िया शरमा जाती है।

सोफिया जब वहाँ से बाहर जाती है तो अमन फिर से रज़िया को बाहो में भर लेता है।

रज़िया-“अह्ह… बस भी करो अमन, रात में ना…”

अमन-क्या करूँ रज़िया, तू सामने होती है तो ये काबू में नहीं रहता।

रज़िया अमन के लण्ड को पैंट के ऊपर से सहलाते हुये-“इस बेकाबू ही रहने दो, मैं करूँगी इसे काबू आज रात…”

अमन-“आप और आपकी बेटी अनुम दोनों। वो भी आपके साथ यही सोएगी…”

दोनों फिर से एक दूसरे को चूमने लगते हैं।

जीशान अपने दोस्तों से मिलने बाहर चला जाता है।

रात 10:00 बजे-

लुबना इधर से उधर टहल रही थी और नग़मा सोफिया के साथ टीवी देखने में मस्त थी।

सोफिया-“अरे लुबु, देख ना तेरा पसंदीदा सीरियल शुरू होने वाला है…”

लुबना परेशान सी घड़ी की तरफ देखती हुई-“पता नहीं ये जीशान भाई भी कहाँ रह गये?”

तभी जीशान हाल में दाखिल होता है। उसका चेहरा बता रहा था कि वो बहुत थक चुका है।

लुबना उसके पीछे-पीछे रूम में चली जाती है-“क्या हुआ भाई आप ठीक तो हैं ना? बहुत थके-थके से लग रहे हो…”

जीशान-“हाँ लुबु, पता नहीं सर बहुत दर्द कर रहा है…”

लुबना-अरे, अल्लाह आपको तो नजर लग गई है। आप ऐसे करो लेट जाओ, मैं नजर की दुआ पढ़कर फूँक देती हूँ …”

जीशान बिना कुछ कहे वहीं बेड पे धड़ाम से गिर जाता है। लुबना उसकी पेशानी पे हाथ फेर-फेर के दुआ पढ़ती जाती है और फूँक ती जाती है। वो तो उसी वक्त सो जाता है। पर लुबना उसके जूते निकालकर बाहर रखती है, उसे ठीक तरह से लेटाती है, रूम का ए सी ओन करके उसकी पेशानी दबाते हुये वहीं उसके पास सो जाती है।

अमन जब रूम में पहुँचता है तो शीबा बाथरूम से फ्रेश होकर बाहर निकल रही थी। शीबा अपने शौहर के गले लगकर उसपे अपना जादू चलाने लगती है। वो जानती थी कि अगर वो ऐसा नहीं करेगी तो रोज की तरह आज भी अमन रज़िया या अनुम के रूम का रुख़ करेगा।

अमन-क्या बात है जानेमन बहुत प्यार आ रहा है?

शीबा-“हम तो जान देते हैं आप पे, पर आपको दिखाई दे तब ना?” वो अमन की शर्ट के बटन खोल ने लगती है।

अमन-नहीं , आज नहीं शीबा।

शीबा-क्यों, तबीयत खराब है क्या?

अमन-नहीं तो… ऐसी कोई बात नहीं मैं थक गया हूँ , आराम करना चाहता हूँ ।

शीबा-“ह्म्म्म्म… मेरा शेर बूढ़ा और कमजोर हो गया है। शायद अब इसमें वो शिकार करने की क्षमता नहीं रही । और वो खिलखिाकर हँसने लगती है।

और अमन के दिमाग़ का पारा चढ़ने लगता है।

ये शीबा के शैतानी दिमाग़ की एक चाल थी। वो जानती थी अमन एक पठान है और पठानों की अकल घुटनों में होती है। उन्हें बस थोड़ा सा छेड़ो। वो छेड़ देती हैं। और शीबा का तीर सही निशाने पे लग जाता है।

अमन-“साल तुझे अभी दिखाता हूँ कि ये शेर क्या कर सकता है?” वो शीबा को पीछे से पकड़कर वहीं बेड पे झुका देता है, दोनों हाथ पीछे मोड़कर उसके कान में कहता है-“ तू आज ऐसे चुदेगी शीबा कि तुझे अपनी माँ हिना याद आ जायेगी…”

अमन एक पंजा शीबा की नाइटी पे मारता है और वो जिस्म से अलग हो जाती है। ब्रा का हुक खुलते ही शीबा ऊपर से एकदम नंगी हो चुकी थी। वो दिल ही दिल में बहुत खुश थी और चूत तो उसकी मारे जोश के मचलने लगी थी।

शीबा-“अह्ह… जान से मारने का इरादा है क्या जी…”

अमन-“हाँ… मुँह खोल, साली मुँह खोल … आज तूने अमन की मर्दानगी को ललकारा है। अब देख तेरे साथ मैं क्या करता हूँ ?”

जैसे ही शीबा मुँह खोलती है, अमन उसके मुँह के सामने अपना कड़क लण्ड लहराने लगता है। शीबा उसे हाथ में पकड़कर हिलाते हुये अपने होंठों पे लगाकर चूमती है-“उम्ह्ह… मुआह्ह…”

अमन-मुँह में ले इसे।

शीबा का मुँह खुलता है और वो तेज धारदार तलवार उसके गले में घुस जाती है-“गलप्प्प गलप्प्प गलप्प्प…” उससे ना साँस ली जा रही थी और ना थूक निगला जा रहा था। अमन का लण्ड शीबा के गले में फँसा पड़ा था और वो वहीं अपने खौफनाक अंदाज में अंदर-बाहर हो रहा था। शीबा एक पल के लिए उसे बाहर निकालती है और फिर दूसरे ही पल दुबारा मुँह में ले लेती है-“गलप्प्प… गलप्प्प… दिखाओ मुझे आपकी वही मर्दानगी, जिससे आप मेरी अम्मी और मुझे चोदा करते थे गलप्प्प गलप्प्प…”

अमन उसे झुकाकर खड़ा कर देता है और एक झटके में अपने लण्ड को उसकी चूत के अंदर तक घुसा देता है।

शीबा-“अह्ह… मार डालोगे क्या मुझे? अह्ह… नहीं , इतने जोर से नहीं ना जान अह्ह… उम्ह्ह…”

अमन-“अह्ह… चिल्ला मत साली … अब् क्या हुआ? मुझे ललकारती है? ले… आज तेरी चूत को सुजा ना दूं तो मेरा नाम भी अमन नहीं अह्ह… अह्ह…”

शीबा-“नहीं … ना जी… मुझे माफ कर दो ना अह्ह… प्लीज़्ज़… आराम से ना अह्ह… उम्ह्ह…”

कोई पिस्टन भी कम रफ़्तार से बाइक में घूमता होगा। अमन की रफ़्तार उससे भी ज्यादा तेज थी। शीबा को सच में बहुत दर्द हो रहा था। वो पागल ये समझ बैठी थी कि अमन ज्यादा से ज्यादा 10 मिनट चोद पाएगा उसे, पर पिछले 15 मिनट से एक रफ़्तार से एक फ्लो में चोदने की वजह से शीबा की चूत अब चरचराने लगी थी।

अमन उसकी आवाज़ सुनकर उसकी पैंटी उठाकर उसके मुँह में ठूँस देता है और फिर से उसे पीछे से चोदने लगता है।

शीबा-“अह्ह… निकालो ना अह्ह… अब नहीं कहूँ गी ना अह्ह…”

अमन-“आज तो तू मर भी जाए तो कोई गम नहीं मेरी जान अह्ह…” वो शीबा का मुँह पकड़कर सटासट अपने लण्ड को उसकी बच्चेदानी पे मार रहा था जैसे कोई मूसल ओखली में मारता है। 45 मिनट चली इस धुआँधार चुदाई के बाद अमन अपना लण्ड बाहर निकाल लेता है और शीबा को नीचे बैठाकर उसके मुँह में अपने लण्ड की धार छोड़ने लगता है।

आज कई दिनों बाद अमन ने शीबा को इतनी बुरी तरह किसी रंडी की तरह चोदा था। इस चुदाई का असर अमन पे ये हुआ था कि वो गहर नींद में सो जाता है और शीबा उसके पास लेटी हुई दिल में जश्न मनाने लगती है कि आज की रात रज़िया और अनुम अपनी चूत को घिसते-घिसते गुजारेंगी।

शैतानी दिमाग़ की ये चाल तो कामयाब रही । पर आने वाला वक्त ही बताएगा की कौन किस हद तक अपनी साज़िशों में कामयाब होता है।

 
***** *****सुबह 8:00 बजे-

अमन फ्रेश होकर सीधा रज़िया के रूम में चला जाता है। रज़िया अभी-अभी नहाकर बाथरूम से निकल थी और आईने के सामने खड़ी बाल सुखा रही थी। अमन पीछे से जाकर रज़िया को बाहो में जकड़ लेता है।

रज़िया-“उऊचह ओह्ह… तुम हो? रात में कहाँ गायब थे जनाब? हम तो तरसते ही रह गये…”

अमन रज़िया को अपनी तरफ मोड़ते हुये उसके होंठों पे किस कर देता है-“गुड मॉर्निंग मेरी जान, शीबा ने ऐसा पकड़ा की रूम से निकलने ही नहीं दिया, और थकान भी बहुत थी इसलिये…”

रज़िया-“ह्म्म्म्म… कोई बात नहीं । शीबा का भी तुम पे उतना ही हक है जितना मेरा और अनुम का…”

अमन-“पर मैं जिससे सबसे ज्यादा मोहब्बत करता हूँ वो तुम हो, उसके बाद अनुम, तुम दोनों की जगह मेरे दिल में इतनी है की तीसरे की जगह बनते ही नहीं है। अगर नाना जान मरते वक्त शीबा से मेरा रिश्ता नहीं करवाते तो मैं कभी उससे शादी नहीं करता… कोई कुछ भी कहे, पर तुम दोनों की जगह कोई तीसरा नहीं … कभी नहीं …”

रज़िया अपने अमन की बातें सुनकर उसपे निहाल हो जाती है और दोनों एक दूसरे के मुँह में मुँह डाले सुबह की मीठी-मीठी सलाइवा की चुस्कियाँ लेने लगते हैं।

शीबा बाहर खड़ी ये सब तमाशा देख रही थी और दिल ही दिल में रज़िया को जान से मार देने तक पहुँच गई थी। वो पैर पटकते हुई जीशान के रूम के सामने से गुजरती है कि तभी उसकी नजर, अंदर रूम में पड़ती है। जीशान अपने बेड पे बड़े सकून की नींद सो रहा था। उसके चेहरे पे मासूमियत और भोलापन साफ नजर आता था।

शीबा कुछ सोचते हुये उसके रूम में कमर हिलाती हुई घुस जाती है। जीशान के चेहरे पे हाथ फेरते हुये शीबा की नजर उसकी जाँघो के बीच पे पड़ती है, जहाँ कुछ उभार सा दिखाई दे रहा था। बेडशीट होने की वजह से जीशान का लण्ड उसे साफ-साफ नजर नहीं आ रहा था। वो जीशान के चेहरे पे झुकती है कि तभी जीशान नींद से जाग जाता है और अपने इतने करीब शीबा को इस हालत में देखकर थोड़ा सहम सा जाता है।

जीशान-“अरे अम्मी आप?”

शीबा-“उठो भी बेटा, कितना सोओगे? चलो फ्रेश हो जाओ…”

जीशान-ओके अम्मी।

शीबा उठकर बाहर जाने ही वाली थी कि उसे अनुम दरवाजे के पीछे छुपी हुई नजर आती है।

अनुम भी जीशान को उठाने के लिए उसके रूम में आई थी, पर शीबा को वहाँ देखकर वो दरवाजे के पास ही रुक गई थी।

शीबा का शैतानी दिमाग़ कुछ सोचता है और वो वापस पलटकर बेड पे बैठ जाती है।

जीशान-क्या हुआ अम्मी, आप ठीक तो हैं ना?

शीबा-नहीं बेटा, कल रात से सर बहुत दर्द कर रहा है चक्कर से आ रहे हैं।

जीशान घबराकर शीबा के पास आ जाता है और उसके बगल में बैठाकर उसे सहारा देता है-“आपने डाक्टर को बताया?”

शीबा-“नहीं , मैं ठीक हूँ जीशान बेटा तुम परेशान मत हो…”

जीशान-“कैसी बात कर रही हैं आप अम्मी? परेशानी की क्या बात है, आप चलिए मैं डाक्टर को फोन करके बुलाता हूँ …”

शीबा-“नहीं नहीं जीशान, मैं ठीक हूँ …” और ये कहते हुये वो जीशान के सीने से लिपट जाती है-“कितना ख्याल रखता है मेरा बेटा, तू अपनी अम्मी का?”

जीशान-“मैं आपका ख्याल नहीं रखूँगा तो कौन रखेगा अम्मी?

शीबा नजरें उठाकर जीशान की तरफ देखती है और उसके होंठों को अपने होंठों में कैद कर लेती है।

जीशान के लिए ये बात एकदम नई थी। वो तो सोच भी नहीं सकता था कि शीबा, उसकी अम्मी ऐसी कोई हरकत भी कर सकती है।

कुछ देर बाद शीबा अपने होंठ जीशान के होंठों से अलग करके खड़ी हो जाती है-“ओह्ह… मुझे माफ कर दो बेटा पता नहीं ये सब… आई एम सो सारी …” और वो रूम से बाहर निकल जाती है।

जीशान हैरतजदा सा उसे जाता देखता रह जाता है, और फिर फ्रेश होने बाथरूम में चला जाता है।

जब शीबा जीशान के रूम से निकलकर अपने रूम में जाती है तो अनुम उसका हाथ पकड़कर उसे अपनी तरफ खींचती है-“क्या हरकत कर रही थी तुम जीशान के रूम में?”

शीबा-“कुछ भी तो नहीं …” उसके चेहरे पे कातिल मुस्कान थी।

और अनुम की आँखें शोला बनी हुई थीं-“सच-सच बता दो, वरना अच्छा नहीं होगा शीबा?”

शीबा आगे बढ़ती है और अनुम के रसीले होंठों को चूम लेती है। कुछ पलों के लिए अनुम की आँखें बंद हो जाती हैं और वो पता नहीं किस दुनियाँ में खो जाती है। पर अगले ही पल वो शीबा को पीछे धकेल देती है।

शीबा-“ये हरकत कर रही थी मैं, अब पता चल गया?”

अनुम-“तुम्हारी ये जलील हरकत मैं अभी अमन को बताने वाली हूँ …”

शीबा-“ओके जाओ, तो मैं भी जीशान से कह देती हूँ की तुम्हारी फुफु ने क्या-क्या गुल खिलाए हैं अपने भाई अमन के साथ और उसी का नतीजा जीशान और लुबना की शक्ल में हमारे सामने है…”

अनुम सहम जाती है-“तुम ऐसा कुछ नहीं कहोगी जीशान से…”

शीबा-“एक शर्त पे कि तुम अपनी ये नाक मेरे और जीशान के बीच में अड़ाना बंद कर दोगी। मैं जीशान के साथ कुछ भी करूँ, तुम चुपचाप सब देखोगी और अगर तुमने अपनी चोंच खोलने के कोशिश भी की ना अनुम बेगम तो मैं अपना ये बड़ा सा मुँह खोल दूँगी , सारी दुनियाँ के सामने…”

अनुम उसे कुछ कहने वाली थी कि उन्हें अमन उनकी तरफ आता हुआ नजर आता है वो दोनों चुप हो जाती है।

जीशान तैयार होकर कालेज जाने के लिए पोर्च के नीचे खड़ा था। उसे इंतजार था लुबना का और लुबना हमेशा की तरह तैयार हो रही थी। जीशान हॉर्न पे हॉर्न बजा रहा था कि तभी लुबना अपना छोटा सा कालेज बैग लिए वहाँ आती है।

 
लुबना-“उफफ्फ़ हो जरा सी देर क्या हो गई कि शुरू हो जाते हो…”

जीशान-“अरे यार चलो भी, मेरा स्टेज प्रोग्राम है 9:30 पे…”

लुबना कार में बैठती हुई-“अरे हाँ, क्या परफॉर्म करने वाले हो आज गेट-टुगेदर प्रोग्राम में?”

जीशान-“वो तो तुम्हें वहीं पता चलेगा…” और दोनों भाई-बहन कालेज के लिए निकल जाते हैं।

रास्ते में जीशान को रह-रहकर सुबह वाली बात याद आ रही थी। पर वो अपने स्टेज प्रोग्राम को लेकर काफी उत्तेजित था, इसलिए वो सर झटक के अपना ध्यान ड्राइविंग में लगा देता है। जीशान के कालेज में आज गेट-टुगेदर प्रोग्राम था जिसमें पिछले बैचेस के और फ्रेशर सब मिलकर ये प्रोग्राम करने वाले थे। सभी ने इसमें पार्टीसिपेट किया था। और जीशान तो कालेज की शान था स्पोर्ट्स से लेकर डांसिंग, सिंगिंग सब में वो कालेज में सबसे ज्यादा पापुलर था। आज फ्रेशर के बैच का पहला दिन था और इस फ्रेशर की बैच में एक खूबसूरत चेहरा सभी की आकर्तण का केंद्र बना हुआ था।

वो थी डाक्टर सोनिया के बेटी रूबी। रूबी निहायत ही हसीन लड़की थी उसे ये मौका और किसी ने नहीं बल्की खुद अमन ख़ान की वजह से मिला था। आज से 20 साल पहले अमन ने डाक्टर सोनिया को जो प्यार की निशानी दी थी, वो रूबी के रूप में दुनियाँ में आई थी।

जीशान अपने परफामेंस का इंतजार कर रहा था कि तभी अनाउन्सर जीशान का नाम पुकारता है, और तालियों के साथ जीशान का सभी स्टेज पे स्वागत करते हैं। सब यही सोच रहे थे कि शायद जीशान कोई गाना या कोई एथलेटिक परफामेन्स देगा पर जो जीशान करने वाला था वो सभी के होश उड़ा देने वाला परफामेन्स था।

जीशान स्टेज पे-“हेलो 123 माइक ह्म्म्म्मम…”

दोस्तों, आज मैं आपको जो कविता सुनाने जा रहा हूँ , वो मेरी लिखी हुई नहीं है। वो एक मशहूर-ओ-मारूफ़ शायर सुनील जोगी की है। ये कविता मैं अपने सारे बैचलर दोस्तों को समर्पित करना चाहूँगा । जितने भी दोस्त यहाँ कुंआरे बैठे हैं, ये कविता उनकी नजर है।

जीशान एक पल के लिए लुबना को देखता है।

सारे हाल में खामोशी छाई हुई थी, सभी जीशान को देख रहे थे। जीशान गला साफ करता है और अपनी कविता शुरू करता है।

यारों! शादी मत करना, ये है मेरी अर्ज़ी

फिर भी हो जाए तो ऊपर वाले की मर्ज़ी।

लैला ने मजनूँ से शादी नहीं रचाई थी

शीरी भी फरहाद की दुल्हन कब बन पाई थी

सोहनी को महिवाल अगर मिल जाता, तो क्या होता

कुछ न होता बस परिवार नियोजन वाला रोता

होते बच्चे, सिल-सिल कच्छे, बन जाता वो दर्ज़ी।

सक्सेना जी घर में झाड़ू रोज़ लगाते हैं

वर्मा जी भी सुबह-सुबह बच्चे नहलाते हैं

गुप्ता जी हर शाम ढले मुर्गासन करते हैं

कर्नल हों या जनरल सब पत्नी से डरते हैं

पत्नी के आगे न चलती, मंत्री की मनमर्ज़ी।

बड़े-बड़े अफ़सर पत्नी के पाँव दबाते हैं

गूंगे भी बेडरूम में ईलू-ईलू गाते हैं

बहरे भी सुनते हैं जब पत्नी गुर्राती है

अंधे को दिखता है जब बेलन दिखलाती है

पत्नी कह दे तो लंगड़ा भी, दौड़े इधर-उधर जी।

पत्नी के आगे पी.एम., सी.एम. बन जाता है

पत्नी के आगे सी एम, डी.एम. बन जाता है

पत्नी के आगे डी. एम. चपरासी होता है

पत्नी पीड़ित पहलवान बच्चों सा रोता है

पत्नी जब चाहे फुड़वा दे, पुलिसमैन का सर जी।

पति होकर भी लालू जी, राबड़ी से नीचे हैं

पति होकर भी कौशल जी, सुषमा के पीछे है

मायावती कुँवारी होकर ही, सी.एम. बन पाई

क्वारी ममता, जयललिता के जलवे देखो भाई

क्वारे अटल बिहारी में, बाकी खूब एनर्जी।

पत्नी अपनी पर आए तो, सब कर सकती है

कवि की सब कविताएं, चूल्हे में धर सकती है

पत्नी चाहे तो पति का, जीना दूभर हो जाए

तोड़ दे करवाचौथ तो पति, अगले दिन ही मर जाए

पत्नी चाहे तो खुदवा दे, घर के बीच क़बर जी।

शादी वो लड्डू है जिसको, खाकर जी मिचलाए

जो न खाए उसको, रातों को, निंदिया न आए

शादी होते ही दोपाया, चोपाया होता है

ढेंचू-ढेंचू करके बोझ, गृहस्थी का ढोता है

सब्ज़ी मंडी में कहता है, कैसे दिए मटर जी।

और… पूरा रूम तालियों की आवाज़ से गूँज उठता है। हर कोई हँस रहा था, वो जिनकी शादी हो चुकी थी वो भी और जो अभी इस बंधन में बँधे नहीं थे वो भी।

जीशान ने आज सभी का दिल जीत लिया था और ख़ासकर रूबी का। वो अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से जीशान के खूबसूरत चेहरे को घूर रही थी।

कुछ लड़कियाँ चिल्ला रही थीं-“ वी वोंट सिक्स पैक… वी वोंट सिक्स पैक…”

उसके बाद पूरा रूम एक आवाज़ में जीशान को अपनी टीशर्ट उतारकर अपने सिक्स पैक दिखाने की माँग करने लगता है। और आखिरकार जीशान अपनी टीशर्ट उतार देता है। हर लड़की उसके इस अंदाज पे मर मिटने को तैयार थी।

 
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