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अमन की जुबान सोफिया का मुँह खोलकर उसके अंदर जाने ही वाली थी कि लाइटें फिर से रोशन हो जाती हैं और अमन सोफिया से अलग हो जाता है। दोनों इधर-उधर देखकर खुद को अड्जस्ट करने की कोशिश करने लगते हैं।
सोफिया-अब्बू , अब चलते हैं।
अमन-“ठीक है…” और दोनों वापस होटेल लौट जाते हैं।
जब दोनों होटेल के रूम में पहुँचते हैं तो सबसे पहले सोफिया उस पैकेट को लेकर अमन के पास आती है। कहती है-“अब्बू , अब इसे वोलो ना…”
अमन-तुम खुद खोल लो और उसे पहनकर यहाँ आओ।
सोफिया-इसका मतलब इसमें एक और ड्रेस है?
अमन-खुद देख लो।
सोफिया वो पैकेट लेकर बाथरूम में घुस जाती है, और जब वो उसे खोलती है तो मारे शर्म के उसकी चूत के चिपके हुये होंठ एक दूसरे से अलग हो जाते है। जिस्म में एक अजीब सा एहसास होने लगता है। उसे यकीन नहीं होता कि उसके अब्बू उसके लिए ये लाए हैं। वो अपना ड्रेस उतार देती है। जब वो ब्रा खोलने लगती है तो उसके हाथ आज खुद-बा-खुद उसकी चुचियों को दबाने लगते हैं। जिस्म की वो भूक पहली बार बहुत शिद्दत से जागी थी। वो अमन के लाए हुये गिफ्ट को पहन तो लेती है, पर अमन का सामना करने से उसकी रूह तक घबरा रही थी। वो दरवाजे के पास रुक जाती है, और हल्के से बाथरूम का दरवाजा खोलकर रूम में आ जाती है।
अमन उसे देखकर अपने होश वो बैठता है-“यहाँ आओ सोफिया…”
सोफिया अपने अब्बू के पास आकर बैठ जाती है। अमन उसके लिए एक ब्लू कलर की लींगर लाया था और उसपे मेचिंग पारदर्शी पैंट और ब्रा। अमन अपनी बेटी का चेहरा उठाकर उसके गाल पे हल्के से किस कर देता है-“बहुत-बहुत-बहुत हसीन लग रही हो सोफिया…”
सोफिया की आँखें खुद-बा-खुद बंद हो जाती हैं।
***** *****
इधर अमन विला में सभी खाना खाकर अपने-अपने रूम में जा चुके थे।
जीशान किचेन में बैठा चाय पी रहा था। शीबा नाइटी में उसके सामने आती है-“जीशान बेटा, मेरे रूम में पानी नहीं आ रहा है जरा चल के देखो ना कहीं कुछ अटक तो नहीं गया?”
जीशान चुपचाप उठकर शीबा के रूम में चला जाता है। उसके पीछे-पीछे शीबा भी रूम में घुस जाती है और रूम का दरवाजा बंद कर देती है।
जीशान-दरवाजा क्यों बंद किया आपने?
शीबा-अपने बेटे से कुछ पर्सनल बातें करने थी इसलिए।
जीशान का मूड पहले से आफ था। उसे इस बात पे और ज्यादा गुस्सा आ जाता है-“पीछे हटिए, मुझे जाने दीजिए…”
शीबा-“क्या बच्चों जैसे डरते हो? मैं तुम्हारी अम्मी हूँ तुम्हें खा थोड़ी जाउन्गी? बस थोड़ी देर मेरे पास बैठो तो सही …”
जीशान शीबा को घुरने लगता है-“मुझे बाहर जाना है, मुझे नींद आ रही है…”
शीबा और इतराने लगती है। उसे पता नहीं था कि जीशान सब जान चुका है। उसे तो बस जीशान पे काबू पाना था-“दुध पीने जाना है? मेरा सोना बच्चा, छोटा सा प्यारा सा बेबी…”
जीशान के लिए ये किसी टॉर्चर से कम नहीं था। एक बार फिर उसके अंदर का पठान जाग जाता है और वो शीबा को धकेलकर दीवार से चिपका देता है, और कहता है-“प्यार से बोलो तो साली तुम्हें समझ नहीं आता है ना?”
शीबा-“अह्ह… छोड़ मुझे, अपनी अम्मी के साथ भला कोई ऐसा करता है क्या? अह्ह… छोड़ दर्द हो रहा है…”
जीशान-“दर्द हो रहा है ना, तो होने दो अम्मी…”
शीबा-“अह्ह… मैं चिल्लाउन्गी। जीशान अच्छा नहीं होगा, बोल देती हूँ ? तेरे अब्बू तुझे जान से मार देंगे, अगर उन्हें ये बात पता चली तो?”
जीशान-“अच्छा… जान से मार देंगे। ठीक है मारने दो…” और जीशान गुस्से में आकर शीबा को झुका देता है। जो गाण्ड मटका-मटका के शीबा चलती थी और जिससे वो जीशान को फँसाना चाहती थी। जीशान उसी गाण्ड पे सटासट थप्पड़ बरसाने लगता है।
शीबा-“अह्ह… तुझे शर्म है की नहीं ? अह्ह… छोड़ दे ना अह्ह…”
जीशान-“जब अब्बू जान से मारने ही वाले हैं तो कुछ गुनाह मैं भी कर लूँ…” और जीशान शीबा की पैंट हटाकर अपनी दो उंगलियाँ शीबा की चूत में घुसा देता है।
शीबा की आँखें बंद हो जाती हैं-“अह्ह… जीशान छोड़ मुझे। पागल तो नहीं हो गया ना तू ?”
जीशान की उंगलियाँ शीबा की चूत के अंदर तक पहुँच चुकी थी। वो उन्हें वहीं झटके देने लगता है, जिससे शीबा की आवाज़ में नम़ी आने लगती है।
शीबा-“मैं चिल्लाउन्गी, जीशान छोड़ दे मुझे…”
जीशान-“चिल्ला, जितना चिल्लाना है चिल्ला, मैं आज आपको ऐसा सबक सिखाउन्गा अम्मी कि आप मेरे आस-पास भी नहीं फटकोगी…”
शीबा जीशान की आँखों में देखने लगती है और जीशान शीबा को उठाकर बैठा देता है। दोनों एक दूसरे की आँखों में देख रहे थे। जीशान की उंगलियाँ अब भी शीबा की चूत में थी और अंदर-बाहर होने की वजह से शीबा के चेहरे के भाव बदलते जा रहे थे। गुस्से की जगह अब जोश उमड़ने लगा था। पर वो उसे जाहिर नहीं कर रही थी।
सोफिया-अब्बू , अब चलते हैं।
अमन-“ठीक है…” और दोनों वापस होटेल लौट जाते हैं।
जब दोनों होटेल के रूम में पहुँचते हैं तो सबसे पहले सोफिया उस पैकेट को लेकर अमन के पास आती है। कहती है-“अब्बू , अब इसे वोलो ना…”
अमन-तुम खुद खोल लो और उसे पहनकर यहाँ आओ।
सोफिया-इसका मतलब इसमें एक और ड्रेस है?
अमन-खुद देख लो।
सोफिया वो पैकेट लेकर बाथरूम में घुस जाती है, और जब वो उसे खोलती है तो मारे शर्म के उसकी चूत के चिपके हुये होंठ एक दूसरे से अलग हो जाते है। जिस्म में एक अजीब सा एहसास होने लगता है। उसे यकीन नहीं होता कि उसके अब्बू उसके लिए ये लाए हैं। वो अपना ड्रेस उतार देती है। जब वो ब्रा खोलने लगती है तो उसके हाथ आज खुद-बा-खुद उसकी चुचियों को दबाने लगते हैं। जिस्म की वो भूक पहली बार बहुत शिद्दत से जागी थी। वो अमन के लाए हुये गिफ्ट को पहन तो लेती है, पर अमन का सामना करने से उसकी रूह तक घबरा रही थी। वो दरवाजे के पास रुक जाती है, और हल्के से बाथरूम का दरवाजा खोलकर रूम में आ जाती है।
अमन उसे देखकर अपने होश वो बैठता है-“यहाँ आओ सोफिया…”
सोफिया अपने अब्बू के पास आकर बैठ जाती है। अमन उसके लिए एक ब्लू कलर की लींगर लाया था और उसपे मेचिंग पारदर्शी पैंट और ब्रा। अमन अपनी बेटी का चेहरा उठाकर उसके गाल पे हल्के से किस कर देता है-“बहुत-बहुत-बहुत हसीन लग रही हो सोफिया…”
सोफिया की आँखें खुद-बा-खुद बंद हो जाती हैं।
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इधर अमन विला में सभी खाना खाकर अपने-अपने रूम में जा चुके थे।
जीशान किचेन में बैठा चाय पी रहा था। शीबा नाइटी में उसके सामने आती है-“जीशान बेटा, मेरे रूम में पानी नहीं आ रहा है जरा चल के देखो ना कहीं कुछ अटक तो नहीं गया?”
जीशान चुपचाप उठकर शीबा के रूम में चला जाता है। उसके पीछे-पीछे शीबा भी रूम में घुस जाती है और रूम का दरवाजा बंद कर देती है।
जीशान-दरवाजा क्यों बंद किया आपने?
शीबा-अपने बेटे से कुछ पर्सनल बातें करने थी इसलिए।
जीशान का मूड पहले से आफ था। उसे इस बात पे और ज्यादा गुस्सा आ जाता है-“पीछे हटिए, मुझे जाने दीजिए…”
शीबा-“क्या बच्चों जैसे डरते हो? मैं तुम्हारी अम्मी हूँ तुम्हें खा थोड़ी जाउन्गी? बस थोड़ी देर मेरे पास बैठो तो सही …”
जीशान शीबा को घुरने लगता है-“मुझे बाहर जाना है, मुझे नींद आ रही है…”
शीबा और इतराने लगती है। उसे पता नहीं था कि जीशान सब जान चुका है। उसे तो बस जीशान पे काबू पाना था-“दुध पीने जाना है? मेरा सोना बच्चा, छोटा सा प्यारा सा बेबी…”
जीशान के लिए ये किसी टॉर्चर से कम नहीं था। एक बार फिर उसके अंदर का पठान जाग जाता है और वो शीबा को धकेलकर दीवार से चिपका देता है, और कहता है-“प्यार से बोलो तो साली तुम्हें समझ नहीं आता है ना?”
शीबा-“अह्ह… छोड़ मुझे, अपनी अम्मी के साथ भला कोई ऐसा करता है क्या? अह्ह… छोड़ दर्द हो रहा है…”
जीशान-“दर्द हो रहा है ना, तो होने दो अम्मी…”
शीबा-“अह्ह… मैं चिल्लाउन्गी। जीशान अच्छा नहीं होगा, बोल देती हूँ ? तेरे अब्बू तुझे जान से मार देंगे, अगर उन्हें ये बात पता चली तो?”
जीशान-“अच्छा… जान से मार देंगे। ठीक है मारने दो…” और जीशान गुस्से में आकर शीबा को झुका देता है। जो गाण्ड मटका-मटका के शीबा चलती थी और जिससे वो जीशान को फँसाना चाहती थी। जीशान उसी गाण्ड पे सटासट थप्पड़ बरसाने लगता है।
शीबा-“अह्ह… तुझे शर्म है की नहीं ? अह्ह… छोड़ दे ना अह्ह…”
जीशान-“जब अब्बू जान से मारने ही वाले हैं तो कुछ गुनाह मैं भी कर लूँ…” और जीशान शीबा की पैंट हटाकर अपनी दो उंगलियाँ शीबा की चूत में घुसा देता है।
शीबा की आँखें बंद हो जाती हैं-“अह्ह… जीशान छोड़ मुझे। पागल तो नहीं हो गया ना तू ?”
जीशान की उंगलियाँ शीबा की चूत के अंदर तक पहुँच चुकी थी। वो उन्हें वहीं झटके देने लगता है, जिससे शीबा की आवाज़ में नम़ी आने लगती है।
शीबा-“मैं चिल्लाउन्गी, जीशान छोड़ दे मुझे…”
जीशान-“चिल्ला, जितना चिल्लाना है चिल्ला, मैं आज आपको ऐसा सबक सिखाउन्गा अम्मी कि आप मेरे आस-पास भी नहीं फटकोगी…”
शीबा जीशान की आँखों में देखने लगती है और जीशान शीबा को उठाकर बैठा देता है। दोनों एक दूसरे की आँखों में देख रहे थे। जीशान की उंगलियाँ अब भी शीबा की चूत में थी और अंदर-बाहर होने की वजह से शीबा के चेहरे के भाव बदलते जा रहे थे। गुस्से की जगह अब जोश उमड़ने लगा था। पर वो उसे जाहिर नहीं कर रही थी।