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अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ complete



सोफिया और अमन एक दूसरे की आँखों में देखने लगते हैं।

अमन-क्या हुआ सोफिया?

सोफिया-कुछ नहीं अब्बू घर की याद आ रही है।

अमन-“अरे मेरी गुड़िया बेटी , आ जा अब्बू के पास…” अमन सोफिया को अपनी छाती से चिपका लेता है जैसे वो बचपन में सोफिया के किसी चीज पे नाराज हो जाने पे उससे मनाने के लिए अपनी गोद में उठाकर सीने से चिपका लिया करता था।

पर आज सोफिया के दिल के जज़्बात अमन समझ नहीं सकता था। आज उन जज़्बातों पे तो खुद सोफिया का कंट्रोल नहीं था। सोफिया अमन की छाती में सिमट ती चली जाती है।

अमन-“बस कुछ दिन की बात है सोफिया हम घर चले जाएँगे…”

सोफिया दिल में सोचने लगती है-“घर कौन काफिर जाना चाहता है अब्बू …”

अमन-“अम्मी से बात करवा दूं तुम्हारी ?”

सोफिया-उन्हुहु ।

अमन-“क्या बात है सोफिया मुझे नहीं बताओगी? बचपन में तो हार बात आकर सबसे पहले मुझे बताया करती थी…”

सोफिया-“कोई बात नहीं है अब्बू । बस थोड़ा डर लग रहा था अकेलेपन से, अब ठीक हूँ …” वो अपने आपसे बातें करने लगती है। क्या बताऊँ अब्बू आपको कि आपकी बेटी गुनाह के दहलीज पे खड़ी है, आगे भी बढ़ना चाहती है। पर दिमाग़ साथ नहीं दे रहा।

अमन सोफिया का चेहरा अपने हाथ से ऊपर उठाता है और उसकी झील से आँखों में कुछ ढूँढने के कोशिश करने लगता है।

सोफिया-क्या देख रहे हैं अब्बू ?

अमन-देख रहा हूँ मेरी बिटिया कितनी खूबसूरत हो गई है। तेरी अम्मी भी बिल्कुल तेरी तरह लगती थी।

सोफिया-“अब्बू , आप अम्मी से बहुत प्यार करते हैं?”

अमन-“बहुत… एक वही तो वजह है मेरे जीने की, वरना मैं शायद आज जिस मुकाम पे खड़ा हूँ वहाँ नहीं होता। बेटी इंसान हमेशा किसी चीज को पाने के लिए मेहनत करता है…”

सोफिया-“तो आपने अम्मी के लिए ये सब किया?”

अमन-“नहीं , सिर्फ़ तेरी अम्मी के लिए नहीं , बल्की मेरी बाग के इन प्यारे-प्यारे फूलों के लिए भी…”

सोफिया-“अब्बू , अम्मी के बाद आप सबसे ज्यादा किससे प्यार करते हैं?”

अमन-“ह्म्म्म्मम… तुझसे…” ये अमन ने भले ही सोफिया का दिल रखने के लिए कहा था। पर इस बात का सोफिया पे इस कदर असर हुआ कि वो अमन की छाती में खुद को छुपा लेती है।

अमन के हाथ सोफिया की पीठ पे घूम जाते हैं और एक जज़्बा-ए- जुनून जो सिर्फ़ अमन रज़िया के साथ होने पे महसूस करता था, आज अमन को होने लगता है।

सोफिया के होंठ अमन की गर्दन को चूम लेते हैं। गरम थरथराती हुई साँसे अमन की गर्दन से होती हुई रूह तक को मुनावर करने लगती हैं।

अमन सोफिया के चेहरे को अपने हाथ में थाम लेता है। सोफिया की आँखें बंद थीं, होंठ लरज रहे थे एक जुम्बिश के लिए। अमन रज़िया का धुँधला सा अक्स सोफिया के चेहरे पे महसूस करता है और बेसाख्ता उसके होंठ सोफिया के काँपते हुये होंठों से टकरा जाते हैं।

सोफिया के मुँह से बस अब्बू की एक हल्की सी आवाज़ निकलती है। उसका दिल बहुत जोर से धड़कने लगता है और वो खुद को इस तूफान से बचने के लिए उठकर बैठ जाती है। पर शायद तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अमन का दिल उसके बस में नहीं था, उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं, और कई दिन का भूका शेर आज इस कुँवारी कली को शायद महकता हुआ गुलाब बनाने की सोच चुका था।

अमन सोफिया की पीठ पे चूमता है, फिर गर्दन पे, फिर अपने दोनों हाथों से सोफिया की नाजुक अनछुई चुची को पहली बार अपने हाथ में लेकर हल्के से मसल देता है।

सोफिया-“अह्ह… अब्बू नहीं ना…”

अमन-“रज़िया, आज मत रोक मुझे अह्ह…”

सोफिया इश्क़-ए-जुनून में इस कदर खोई हुई थी कि वो अमन के मुँह से निकले हुई शब्द ठीक तरह से सुन भी नहीं पाती।

अमन को सोफिया नहीं बल्की रज़िया नजर आ रही थी। और सोफिया अपने आपसे लड़ रही थी कि वो क्या करे? अमन सोफिया को लेटा देता है और जो पतली से नाइटी सोफिया पहने हुई थी वो निकाल देता है।

सोफिया-“नहीं अब्बू अह्ह…”

अमन के होंठ दुबारा सोफिया के होंठों से मिलते हैं और इस बार सोफिया भी फैसला कर लेती है कि वो दिल का साथ देगी।

दोनों एक दूसरे के होंठों के बड़ी शिद्दत से चूमने लगते हैं। अमन के हाथ सोफिया की ब्रा के हुक को खोलना चाहते थे, पर ब्रा बहुत टाइट थी, बिना सोफिया की मदद के उसे निकालना नामुमकिन था।

 
Viraj raj wrote: ↑ 25 Feb 2018 08:22
Superbly update.....Raj bhai //cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f44c.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f60d.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f49d.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f49e.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f496.svg
 
सोफिया अपने जिस्म को थोड़ा आगे की तरफ मोड़ देती है और अमन हाथ पीछे ले जाकर हुक खोलने लगता है। सोफिया की आँखें बंद हो जाती हैं। उसकी गोरी -गोरी चुची पहली बार किसी मर्द की गिरफ़्त में थी। अपने अब्बू के नीचे इस हालत में लेटने के ख्याल से ही सोफिया की चूत हल्का सा झटका मारती है और पानी के कुछ कतरे चूत के बाहर छलक जाते हैं।

अमन सोफिया की चुची को दोनों हाथों में पकड़कर हल्के-हल्के दबाने लगता है।

सोफिया-“अह्ह… अब्बू ओह्ह… अम्मी ज्ज्जी…”

अमन उसकी गर्दन को चूमते हुये उसके निप्पल के पास अपने होंठों ले आता है और फिर वो होता है जिसका हर कुँवारी लड़की को बेसब्री से इंतजार रहता है कि कोई उनकी कुँवारी चुची को मुँह में ले। सोफिया के होंठ से लेकर गले तक सूख चुका था, ना शब्द बाहर आ रहे थे, और ना साँस बाहर ठीक से निकल रही थी।

अमन के मुँह में सोफिया की चुची थी और वो एक माहिर खिलाड़ी की तरह दूसरे निप्पल को मरोड़ता हुआ पहले वाले को चूसरहा था।

सोफिया जल्दी से जल्दी नंगी होना चाहती थी। आज वो कयामत को झेलना चाहती थी, उस तूफान में खेलना चाहती थी, जो उसे पिछले कई दिनों से परेशान कर रहा था।

अमन के इस कदर चुची मसलने से उसका जिस्म रह-रहकर झटके मारने लगता है। वो मुँह से तो कुछ नहीं कह पा रही थी पर दिल शोर मचा रहा था कि अब्बू अब और सहा नहीं जाता मुझसे, कुछ करो ना अब्बू , वरना मैं मर जाउन्गी।

अमन सोफिया के कानों को चूमते हुये धीरे से कहता है-“आइ लव यू रज़िया…”

ये तीन शब्द उस बवंडर को एक झटके में शांत कर देते है। सोफिया अपनी आँखें खोल देती है और अमन भी अर्श से फर्श पे आ जाता है। दोनों एक दूसरे की गिरफ़्त से एक झटके से अलग हो जाते हैं।

अमन-“मुझे माफ कर दो बेटी …” अमन को अपनी गलती का एहसास होता है जो वो सोफिया के साथ रज़िया समझकर करने जा रहा था।

सोफिया भागकर बाथरूम में घुस जाती है। उससे यकीन नहीं हो रहा था कि कुछ देर पहले एक बाप-बेटी का रिश्ता अचानक क्या से क्या हो गया था और क्या होने जा रहा था? दिमाग़ सोफिया को कोस रहा था पर दिल खुशियाँ मना रहा था। कुछ पल के लिए जज़्बात जिस्म पे हावी हो गये थे।

सोफिया खुद को सामने लगे हुये आईने में देखती है। उसकी नजर अपनी चुची पे जाती है जिसे कुछ देर पहले अमन अपने मुँह में लेकर चूसरहा था। वो हल्के से निप्पल को छूती है और फिर मजबूती से पकड़कर मसलने लगती है। आँखें बंद करके वो अमन और अपने बीच हुई कुछ देर पहले हुये हालात को सोचने लगती है। और जो नहीं हुआ, अगर वो हो जाता तो कैसा होता?

बस यही ख्यालात उसके जिस्म को अकड़ाने के लिए काफी थे और उस कुँवारी चूत से दूध बहाने के लिए भी। चिपचचपे दूध की तरह गाढ़ा पानी सोफिया की चूत से बहने लगता है। और होंठों पे सिर्फ़ एक नाम बार-बार आने लगता है-अब्बू उ अब्बू ।

काफी देर के बाद जब सोफिया बेडरूम में आती है तो उसे अमन सोया हुआ मिलता है। वो भी चुपचाप अमन के पास लेट जाती है। उससे पता था, नींद तो रात भर नहीं आएगी। पर उसके ख्यालात इतने खूबसूरत थे कि वो नींद की परवाह भी नहीं करती और जागती आँखों से सपने देखने लगती है।

सुबह 8:00 बजे-अमन विला।

अनुम और रज़िया नाश्ता कर रहे थे। शीबा अपनी नाइटी में रूम से निकलती है। उसे देखकर लगा कि अच्छे से रात में सोई होगी।

शीबा रज़िया को सलाम करती है।

रज़िया जवाब तो दे देती है। पर उस जवाब में जो तल्ख़पन था वो शीबा भाँप लेती है।

अनुम उठकर शीबा का हाथ पकड़ लेती है और उसे अपने रूम में ले जाती है। उसके पीछे-पीछे रज़िया भी चली जाती है।

शीबा-“ये क्या बदतमीजी है अनुम? हाथ छोड़ो मेरा…”

अनुम ने रात कैसे गुजारी थी ये सिर्फ़ रज़िया जानती थी। सूजी हुई आँखों में अंगारे देखकर शीबा पहले ही समझ गई थी कि बात गम्भीर है।

शीबा-आखिरकार बात क्या है?

अनुम शीबा का मुँह अपने हाथ में पकड़ते हुये-“बदजात औरत, तुझे मेरा बेटा ही मिला ये सब करने के लिए?”

शीबा-“ओह्ह… तो इसका मतलब आपको सब पता चल गया है? तो इसमें बुरा क्या किया मैंने? जो आपने किया वही मैंने भी किया। जब एक माँ अपने बेटे और एक बहन अपने भाई के साथ रंगरेलियाँ मना सकते हैं तो एक माँ अपने बेटे के साथ क्यों नहीं ?”

रज़िया-“बदतमीज तू जानती भी है क्या कह रही है? निकाह किया है हमने अमन से…”

शीबा-गुनाह किया है आपने ।

अनुम एक थप्पड़ शीबा के मुँह पे जड़ देती है-“दुबारा तेरे मुँह से इस तरह की वाहियात बात अगर निकली ना शीबा तो याद रख मैं तेरी जीभ खीच लूँगी…”

शीबा-“अपने बेटे को मेरी बाहों में देखकर जलन हो रही है अनुम? यही हाल मेरा भी होता था जब मैं अपने शौहर को तुम दोनों की बाहो में देखती हूँ । पर वक्त और हालात अब मेरे साथ हैं। मेरे जो मर्ज़ी आएगी मैं वो करूँगी और अगर तुम दोनों ने उसमें अपनी टाँग अड़ाने की कोशिश भी की ना तो दुनियाँ वालों को मैं चीख-चीखकर बता दूँगी कि तुम्हारे और मेरे शौहर के बीच कौन सा रिश्ता है? तुम लोग घर की रहोगी ना घाट की सोच लेना…” शीबा वहाँ रुकती नहीं बल्की अपने रूम में वापस चली जाती है।

कुछ देर बाद जब जीशान नीचे आता है तो उसका सामना अनुम और उसके गुस्से से होता है। बिना कुछ कहे, बिना कोई सवाल किये अनुम सटासट-सटासट चार-पाँच थप्पड़ जीशान के गाल पे जड़ देती है और रोती हुई अपने रूम में भाग जाती है।

जीशान भौचक्का सा मुँह सुजाए दरवाजे की तरफ देखता रह जाता है।

जीशान अपने गाल पे हाथ लगाकर अपने रूम में आ जाता है। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अनुम ने उससे क्यों मारा।

***** *****

उधर दिल्ली में रात भर जागने की वजह से सोफिया को हल्का सा बुखार आ गया था। अमन फौरन वहाँ डाक्टर को बुलाकर सोफिया का चेकअप करवाता है।

डाक्टर अमन को सलाह देता है कि ठंडे पानी की पट्टियाँ सोफिया की पेशानी पे रखते रहें कुछ देर बाद फीवर कम हो जाएगा। डाक्टर के जाने के बाद अमन सोफिया के पास बेड पे बैठ जाता है और थोड़ी-थोड़ी देर बाद उसकी पेशानी पे ठंडे पानी की पट्टियाँ रखता जाता है।

तकरीबन एक घंटे बाद सोफिया का जिस्म नॉर्मल होता है। अमन सोफिया की पेशानी चूमते हुये-“अब कैसा लग रहा है हमारी जान को…”

सोफिया-“अब ठीक हूँ मैं अब्बू । आप तो किसी से मिलने जाने वाले थे ना काम के सिलसिले में?”

अमन-“मेरी गुड़िया को ऐसे हालत में छोदकर मैं कैसे जा सकता था? कुछ खाओगी?”

सोफिया-दिल नहीं कह रहा है अब्बू ।

अमन-“मैंने तुम्हारे लिए सूप मँगाया था। चलो आज मैं तुम्हें अपने हाथों से पिलाता हूँ …” और अमन सोफिया के सर के नीचे दो और तकिये लगा देता है, और अपने हाथों से सोफिया को सूप पिलाने लगता है। सोफिया तो अमन को कल रात ही अपना सब कुछ मान बैठी थी। बस उसे इंतजार था उन अल्फाज़ों का जो अमन की मोहब्बत को जाहिर करें।

हर लड़की की तरह सोफिया भी यही चाहती थी कि पहला कदम अमन आगे बढ़ाए। अमन बड़ी प्यार भरी नजरों से सोफिया के चेहरे को देख रहा था।

सोफिया-“अब्बू , आप मुझसे कितना प्यार करते हैं?”

अमन सोफिया की पेशानी को चूम लेता है-इतना।

सोफिया-बस इतना?

अमन दुबारा सोफिया की पेशानी को चूमता है पर इस बार उसके होंठ कुछ देर के लिए सोफिया की पेशानी पे चिपके रहते हैं-इतना।

सोफिया-“बस? मुझे लगा था आप मुझसे बहुत प्यार करते हैं पर आप…” वो आगे नहीं बोल पाती क्योंकि अमन इस बार अपने होंठ सोफिया के होंठों पे रख देता है।

कुछ देर बाद जब अमन अपने होंठ सोफिया के होंठों से हटाता है-“इतना प्यार करता हूँ , बस अब खुश?”

सोफिया-“नहीं , अभी नहीं …” और सोफिया ये कहती हुई अमन को अपने ऊपर झुका लेती है और अपनी जीभ को अमन के होंठों पे लगाकर चाटने लगती है-“आप मुझसे बहुत कम प्यार करते हैं। अब्बू , मैं आपको बताती हूँ कि मैं आपसे कितनी मोहब्बत करती हूँ …”

फिर सोफिया के होंठ अमन के होंठों से चिपक जाते हैं। उसकी जीभ अमन के मुँह में घुसकर अमन की जीभ को तलाश करने लगती है और जब सोफिया को अमन की जीभ मिल जाती है तो सोफिया उसे अपने मुँह में लेकर चूसने लगती है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

अमन के लिए अब सोचना मुश्किल नहीं था कि सोफिया उससे मोहब्बत करने लगी है और हकीकत तो यही थी की अमन भी जवान बेटी के प्यार में गिरफ्तार हो चुका था। वो सोफिया को अपने ऊपर खींच लेता है और सोफिया के चेहरे के एक-एक इंच हिस्से को चूमने लगता है।

सोफिया अपनी आँखें बंद कर लेती है और अमन की मोहब्बत की शिद्दत को महसूस करने लगती है।

अमन का लण्ड सोफिया की जाँघ में फँसा हुआ था और हर बढ़ते वक्त के साथ अमन के लण्ड में भी तनाव आने लगता है और ये तनाव सोफिया को चुभने भी लगता है। पहली बार लण्ड को अपनी जाँघ में महसूस करके सोफिया पागल सी हो जाती है।

वो अमन के चेहरे को अपने हाथों में लेकर चूमने चाटने लगती है-“गलप्प्प अब्बू , आइ लव यू अब्बू … मैं आपसे बेपनाह मोहब्बत करती हूँ । आपके बिना मैं कुछ भी नहीं । अब्भ, मुझे अपना बना लो… अब्बू बस एक बार मुझे अपनी मोहब्बत, अपनी उलफत दे दो… मेरे अब्बू अपनी सोफिया को प्यार करो ना अब्बू …”
 


अमन-“हाँ मेरी बच्ची, मेरी सोफिया, मेरी रज़िया की निशानी, आ जा अपने अब्बू से चिपक जा… तू मेरी है सोफिया गलप्प्प…”

सोफिया-“हाँ अब्बू आपकी। मुझे अपने अब्बू से प्यार करने की इस गुनाह की सजा दो… मुझे सजा दो अब्बू … मुझे इतना प्यार करो कि मैं आज मर जाऊूँ। मेरा कुँवारा पन मेरे अब्बू आपके नाम। जवान कर दो मुझे… लड़की से औरत बना दो गलप्प्प गलप्प्प…”

वो इस कदर गरम हो चुकी थी कि उससे कुछ भी होश नहीं था कि वो क्या बोल रही है। रात भर उसकी आँख एक पल के लिए भी नहीं लगी थी। कुँवारी चूत रह-रहकर पानी निकाल रह थी। वो अपने कुँवारेपन से परेशान हो चुकी थी। आज वो अमन को अपना सब कुछ देकर उसे अपना बनाना चाहती थी।

अमन सोफिया की टीशर्ट नीचे कर देता है और निप्पल को अपने मुँह में लेकर चूसने लगता है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

सोफिया-“अह्ह… काटो ना अब्बू , काटो इसे जोर से अह्ह…”

अमन सच में सोफिया के निप्पल को मुँह में लेकर काटने लगता है। सोफिया तिलमिला जाती है। निप्पल आज से पहले कभी इतने मोटे, इतने कड़क नहीं हुये थे। उसकी चूत पे रोंगटे खड़े हो चुके थे। जिस्म का हर एक हिस्सा अमन पे जान निछावर करने को बेताब था।

इससे पहले कि अमन सोफिया के बाकी के कपड़े उतारता उसका सेल फोन बजता है। बौखलाहट में अमन बेड से खड़ा हो जाता है और जब वो सामने वाले को हेलो कहता है तो बौखलाहट खामोशी में बदल जाती है। कुछ देर बाद जब काल डिसकनेक्ट होती है तो अमन का सारा जोश, सारा जलजला रेत के तूफान की तरह गायब हो चुका था।

सोफिया काँपते हुई आवाज़ में-क्या हुआ अब्बू ?

अमन-हम कल घर वापस जा रहे हैं।

सोफिया का चेहरा उतर जाता है-क्यूँ सब ख़ैरियत तो है?

अमन-“हाँ सब ठीक है। फॅक्टरी में कुछ प्राब्लम है। हमें कल सुबह ही जाना होगा। मैं अभी आता हूँ …” और अमन कपड़े पहनकर बाहर चला जाता है।

सोफिया अपनी किस्मत पे रोए या हँसे? उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। वो उसी तरह आधी नंगी बेड पे बैठी रहती है।

***** *****

इधर अमन विला में शीबा जीशान के रूम का दरवाजा खटखटाकर अंदर दाखिल होती है। जीशान बेड पे लेटा हुआ था। शीबा को देखकर वो उठकर बैठ जाता है।

शीबा-क्या बात है जीशान कब से रूम में बैठे हो बाहर भी नहीं आए?

जीशान सुबह जो उसके साथ हुआ वो शीबा को बताता है।

शीबा-“क्या? अनुम ने तुमपे हाथ उठाया? उसकी इतनी हिम्मत? जलती है वो तुमसे जीशान हमेशा से तुमसे नफरत करती है। वो तो चाहती भी नहीं थी तुम्हें जनम देना। तुम जानते हो जब तुम उसके पेट में थे तो उसने ऐसी कई दवाइयाँ खाई थी जिससे अबोर्शन हो जाये और तुम दुनियाँ में ना आ सको। तुम्हारे बर्थ के बाद भी उसकी नफरत कम नहीं हुई। बेटा, वो तुम्हें कभी अपनी छाती का दूध नहीं पिलाती थी। वो तो मैं थी जिसने तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया बेटा। तुम अनुम से बात भी मत करना। वो तुमसे जब इतनी नफरत करती है तो तुम उसे क्यों इतना रेस्पॉन्स देते हो? पड़े रहने दो उसे एक तरफ। तुम बस मेरे पास रहो बेटा अपनी अम्मी की बाहों में…”

जीशान जब शीबा के मुँह से ये झूठी बातें सुनता है तो उसे ये सब सच लगता है और वो उन बातों पे यकीन भी कर लेता है-“जब ऐसी बात है तो आपकी कसम अम्मी, मैं उनसे कभी बात नहीं करूँगा… कभी नहीं …”

शीबा-“शाबाश मेरा बच्चा, मुझसे तुझसे यही उम्मीद थी। अपनी अम्मी को प्यार कर जीशान बेटा अह्ह…”

जीशान शीबा की गर्दन चूमने लगता है। शीबा की आँखों में मक्कारी साफ दिखाई दे रही थी। उसे यकीन हो चला था कि वो अपने मकसद में कामयाब ज़रूर होगी।

वो अमन के कपड़े उतार देती है और खुद नीचे बैठकर अपनी नाइटी को नीचे सरका के अमन के लण्ड को पहले अपनी दोनों चुचियों के बीच में घिसती है और फिर गलप्प्प गलप्प्प।

जीशान-“अह्ह… अम्मी जीईई…”

शीबा को नंगे होने में वक्त नहीं लगता। वो जीशान को अपने जिस्म का आदी बना देना चाहती थी। वो चाहती थी कि जीशान बस उसकी चूत सूँघता हुआ कहीं से भी उसके पास चला आए। पर वो एक बात भूल गई थी कि जीशान के जिस्म में अमन का खून दौड़ रहा है।

शीबा जीशान को अपने ऊपर आने को कहती है और जब जीशान उसके ऊपर चढ़ता है तो वो दोनों हाथों में लण्ड को पकड़कर पहले चूत पे घिसता है जिससे क्लटोरस और शोर मचाने लगती है और देखते ही देखते जीशान का लण्ड शीबा की चूत में आगे पीछे होने लगता है।

शीबा-“अह्ह… जीशान बेटा, तू बस यहीं रहा कर मेरे ऊपर… ऐसे ही । तुझे किसी अनुम की बात सुनने की ज़रूरत नहीं अह्ह… मेरा बेटा अह्ह… माँ… तुझे जो चाहिए, जितना चाहिए मैं दूँगी … जब कहेगा तब दूँगी … बस तू वही कर जैसा मैं तुझसे कहती हूँ । करेगा ना बेटा? अह्ह…”

जीशान-“हाँ अम्मी, जो आप कहेंगी मैं वही करूँगा अह्ह…”

बाहर खड़ी रज़िया के कानों में ये बात पहुँच चुकी थी। रज़िया अपने रूम में जाकर बेड पे बैठ जाती है। आज बरसों बाद उसे अमन विला की मजबूत दीवारों में हल्की-हल्की दरारें पैदा होती हुई नजर आ रही थीं। वो घर की सबसे अहम और ज़िम्मेदार औरत थी। वो ये कभी नहीं होना देना चाहती थी कि एक छत के नीचे रहने वाले लोगों के दिलों के बीच नफरत और खुदगर्जी पैदा हो।

शीबा नहाकर जब किचेन की तरफ जाने लगती है, तब रज़िया उसे देखकर उसे अपने रूम में बुला लेती है, और दरवाजा बंद कर देती है।

शीबा-क्या बात है?

रज़िया-तुम ये गलत कर रही हो शीबा?

शीबा-“उफफ्फ़ हो… फिर से? नहीं अम्मी जान, ये एमोशनल अत्याचार दुबारा शुरू मत कर दो आप। मुझे पता है, मैं क्या कर रही हूँ । और वैसे भी बड़ों के नक्शे कदम पे चलने में कोई बुराई नहीं …”

रज़िया-“सुनो शीबा, सबसे पहले तो तुम मुझसे ऊूँची आवाज़ में बात करना बंद कर दो, वरना ये जो तुम्हारे जीभ है ना… इसे मैं गले से खींच लूँगी। तुम मेरी भतीजी हो, इसका मतलब ये नहीं है कि मैं तुम्हारी हर बात सुन लूँ । और हाँ मैंने और अनुम ने जो किया वो अमन की मर्ज़ी से हुआ था। पर तुम जो जेशु के साथ कर रही हो वो शायद अमन को पसंद ना आए? सोचो अगर अमन को तुम्हारे और जीशान के नाजायज रिश्तों के बारे में भनक भी लग गई… तो हो सकता है वो तुम्हें तलाक दे दे, या जान से भी मार दे। आखिरकार उसके रगों में मेरा खून दौड़ रहा है।

शीबा ये सुनकर सुन्न पड़ जाती है। हवस के नशे में वो ये बात सच में भूल ही गई थी।

रज़िया-“मैं फिर भी तुम्हें एक आख़िरी मौका देती हूँ , सुधर जाओ और अपनी ये नापाक हरकतों से बाज आ जाओ। वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। इसे धमकी समझो, वॉर्निंग नहीं …” रज़िया बाहर अनुम के रूम में चली जाती है।

शीबा दिल में सोचने लगती है-“सासूजी शायद आप ये बात भूल गई हैं कि तुरुप का पत्ता मेरे पास है, और मैं इसे जिस बात में इश्तेमाल करूँगी वो बात मेरी हो जाएगी…”

फिर शीबा जीशान के रूम की तरफ चले जाती है। वो अपने रूम में बैग पैक कर रहा था, समर कैम्प जाने के लिए। शीबा रूम में आते ही दरवाजा बंद करके बेड पे बैठ जाती है और अपना सर दोनों हाथों से पकड़ लेती है।

जीशान-“क्या बात है अम्मी आप परेशान लग रही हैं?”

शीबा-“हाँ बेटा, तुम्हारी दादी ने मुझसे अभी-अभी ये कहा है कि वो हमारे रिश्ते के बारे में तुम्हारे अब्बू को बता देंगी। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा बेटा। तुम अपने अब्बू का गुस्सा तो जानते हो, वो हम दोनों को जान से मार देंगे…”

जीशान-“अम्मी आप खामखाह फिकर कर रही हैं, मैं हूँ ना आपका बेटा…”

शीबा-“हाँ जीशान, बस तुझपे ह भरोसा कर सकती हूँ । तेरी दादी का मुँह बंद करने का बस एक ही रास्ता है…”

जीशान-वो क्या अम्मी?

शीबा-“तेरे दादी का मुँह बस एक कीमत पे बंद हो सकता है। अगर तू अपना ये तेरी दादी के मुँह में डाल दे। फिर वो चाहकर भी किसी को हमारे रिश्ते के बारे में नहीं बता सकेंगी और अगर बताने की कोशिश भी करेगी तो हम इन्हें ब्लैकमेल कर सकते हैं…”

जीशान-“पर अम्मी, दादी के साथ… नहीं नहीं ये मुझे ठीक नहीं लगता…”

शीबा-“अरे बेटा, बड़ी कमीनी है तेरे दादी । जवानी में कई लण्ड खा चुकी है, तेरे दादा का, उनके दोस्तों का, तेरे अब्बू का और हाँ बेटा ये जो बिजनेस इतना बड़ा कर पाए हैं ना तेरे अब्बू , ये सब तेरी दादी के पैर खोलने से ही तो हुआ है…”

जीशान-सच अम्मी, दादी ऐसी थीं?

शीबा-“हाँ बेटा, मैं क्या तुझसे झूठ बोलूँगी भला? बोल करेगा ना मेरा ये काम? अरे जीशान तेरी दादी तो तेरे नीचे कुचलकर निहाल हो जाएगी। वो तो खुद उकता गई है तेरे अब्बू का ले लेके। एक बार वो मेरे गबरू जवान से चुद जाए… उसके बाद तुम देखना कि वो कैसे हमारी उंगलियों पे नाचती है…”

जीशान-“अम्मी, मुझे समर कैम्प से आने दो आप। उसके बाद जो आप कहोगी वही होगा…”

शीबा-“मेरा बच्चा, आ जा मेरे पास…” और दोनों के होंठ एक दूसरे में घुलते चले जाते हैं। शीबा की आँखों में चमक आ जाती है। उसे रज़िया और अनुम से अपना बदला पूरा होता हुआ दिखाई दे रहा था और अमन हमेशा हमेशा के लिए उसकी बाहो में महसूस होने लगता है।

***** *****

उधर दिल्ली के होटेल के कमरे में सोफिया बेड पे बैठी अमन का कब से इंतजार कर रही थी। कुछ देर बाद अमन रूम में दाखिल होता है, उसकी पेशानी पे रुमाल बँधा हुआ था जो आम तौर पे सर दर्द होने पे लोग बाँधते हैं।

सोफिया-अब्बू , आप ठीक तो हैं ना?

अमन-“हाँ…” बस इतना कहकर वो बेड के दूसरी तरफ लेट जाता है।

सोफिया की आग में अभी वो शिद्दत नहीं थी, पर वो अभी तक बुझी भी नहीं थी। वो अमन के ऊपर अपना एक हाथ रख देती है-“अब्बू , मैं आपका सर दबा दूँ?”

अमन-“नहीं सोफिया, सो जाओ हमें कल सुबह जल्दी जाना है…”

सोफिया की पलकें भीग जाती हैं और वो रुआंसी हो जाती है-“अब्बू , आप मुझसे ठीक से बात क्यों नहीं कर रहे हैं?”

अमन सोफिया की तरफ करवट लेते हुये-“बेटा रात बहुत हो गई है और मुझे सच में बहुत नींद भी आ रही है…”

सोफिया-“आप सो जाओ। मैं अब आपको परेशान नहीं करूँगी, कभी नहीं …”

अमन-“बस बहुत हुआ सोफिया, वरना मेरा हाथ उठ जाएगा तुमपे… पता नहीं मुझे क्या हो गया था? मुझसे गलती हो गई। आगे से ऐसा कुछ नहीं होगा हमारे बीच। अब सो जाओ…”

सोफिया रोने लगती है और रोते-रोते ही अमन से बात करने लगती है-“हाँ, आपसे गलती हुई होगी और शायद आपको उस बात का मलाल भी है। पर मैं आपसे प्यार करने लगी हूँ अब्बू और ये मेरे इख्तियार में नहीं है। अब मुझे हर जगह बस आप नजर आते हैं, खाना खाने में दिल नहीं लगता, किसी काम में दिल नहीं लगता मेरा, मुझे लगने लगा है मैं शायद पागल हो जाउन्गी, और ऐसे ही घुट-घुटकर एक दिन मर भी जाउन्गी। मैं ये भी जानती हूँ कि आप भी मुझसे प्यार करते हैं… एक बेटी की तरह नहीं , बल्की ये वो मोहब्बत है… जो आपकी आँखों में मैंने देखी थी अम्मी के लिए। पर आप कभी नहीं मानेंगे क्योंकी आप सिर्फ़ अम्मी से प्यार करते हैं। मैं तो आपके लिए कुछ भी नहीं हूँ ना?”

अमन-“सोफ , इधर आ मेरे पास…”

 
 


सोफिया-“नहीं नहीं , मैं नहीं आउन्गि। मुझे अकेला छोड़ दीजिए । इस दुनियाँ में मैं अकेली रह गई हूँ । अब्बू , मेरा गुनाह सिर्फ़ इतना है कि मुझे आपसे मोहब्बत हो गई, अपने अब्बू से। रहने दो, मुझे अकेला मरने दो घुट-घुटकर, दफना देना मुझे…” और वो सिसक-सिसक के रोने लगती है। आज उसने चन्द लफ़्ज़ों में अपना हाल-ए-दिल अमन के सामने रख दिया था।

अमन तो सोफिया से मोहब्बत करता ही था। पर वो इस रिश्ते को कभी अमल -जामा पहनना नहीं चाहता था।

सोफिया रोते-रोते अब हिचक़ियों पे आ गई थी और जब वो ऐसी हालत में होती है तो उसे साँस लेने में मुश्किल होने लगती है, इस बात से अमन भली भाँति वाकिफ़ था। वो सोफिया को अपनी तरफ खींचता है पर सोफिया भी अपने बाप की बेटी थी जिद्दी । वो अमन का हाथ झटक देती है।

अमन-सोफिया, इधर देख मेरी तरफ।

सोफिया भीगी पलकों से अमन की तरफ देखती है।

अमन-“आइ लव यू …”

सोफिया जोर से हँसती है और फिर हँसती ही चली जाती है। अमन उसे अपने पास खींचकर उसके गुलाबी-गुलाबी होंठों को अपने होंठों से लगाकर चूमने लगता है। और सोफिया अपनी मोहब्बत को पाकर जन्नत की दहलीज पे पहला कदम रख देती है।

सोफिया-“अह्ह… अब्बू , मुझे बेपनाह प्यार करिए ना अह्ह… अब्बू …”

अमन-“गलप्प्प गलप्प्प…”

सोफिया-“अब्बू , जैसे आप पहली बार अम्मी को प्यार किए थे मुझे भी प्यार करिए ना… आपकी बेटी आपसे अपने कुँवारेपन को हमेशा-हमेशा के लिए ख़तम करने की भीख माँगती है। मुझे सब कुछ दे दो, अब्बू मुझे अपना बना लो। अपनी सोफिया की इतनी सी बात मान लो अब्बू …”

अमन-“हाँ मेरी जान, तू तो मेरी जान की और मेरे प्यार की निशानी है, तेरे लिए तो सब कुछ कुर्बान…” और अमन सोफिया के बचे हुई कपड़े भी निकाल देता है। आज पहली बार वो सोफिया को इस हालत में देख रहा था। आज वो खुद को वही 18 साल वाला अमन महसूस कर रहा था, जिसने अपनी बर्थडे पर रज़िया से ऐसा गिफ्ट लिया था, जिसने इस खानदान की तकदीर बदलकर रख दी थी। और आज उसी दिन का अमन का बर्थ-डे गिफ्ट, रज़िया और अमन के प्यार की निशानी सोफिया अपनी तमामतर खूब सुरतियों के साथ अमन को अपना सब कुछ देने के लिए बेताब थी।

अमन सोफिया को लेटा देता है और उसकी जाँघ पे चूमते हुये पहली बार अपनी बेटी की कुँवारी चूत का दीदार करता है। लाल गुलाबी होंठों वाली सोफिया की चूत अमन को रज़िया और अनुम की याद दिला देती है। जब पहली बार अमन ने अनुम की चूत पे अपने होंठ रखे थे, उस वक्त भी उसका दिल इतने ही तेजी से धड़का था जितने तेजी से आज धड़क रहा था।

सोफिया की आँखें बंद थीं। उसे अपने अब्बू पे पूरा भरोसा था। वो हर काम अमन की मर्ज़ी के मुताबिक करवाना चाहती थी।

अमन अपनी जीभ से जैसे ही सोफिया की गुलाबी चूत के अन्द्रुनी हिस्से को चूमता है, दोनों के जिस्मों में बिजली दौड़ जाती है। अपनी बेटी की चूत को चाटना… ये ख्याल ही अमन के जिस्म में सनसनी फैलाने के लिए काफी था।

और सोफिया जो जज़्बात में अमन को सब कुछ देने का कह तो चुकी थी। पर जब अमन ने उसे वहाँ छुआ, जहाँ किसी ने नहीं छुआ था तो एक अजीब सा डर, कुँवारापन टूटने का डर, लड़की से औरत बनने का डर, चूत के अंदर तक चिर जाने का डर, सोफिया के जिस्म को थर्रा के रख देता है। पर मोहब्बत ही इतनी गहरी थी सोफिया की कि वो आज हर दर्द बर्दाश्त करने को तैयार थी।

अमन सोफिया की चूत को अंदर से बाहर से हर तरफ से चाटता चला जाता है। सोफिया का जिस्म पहला झटका खाता है और पानी के कुछ छीटे अमन के चेहरे को गीला कर देते हैं। सोफिया झट से उठकर बैठ जाती है और अमन को नीचे करके काँपते हाथों से पहली बार उस तलवार को थामती है, जिससे ना जाने कितने बेगुनाह कतल हो चुके थे। वो खूबसूरत अमन का लण्ड जब सोफिया की नरम -नरम मुट्ठी में आता है तो उसे सोफिया के मुँह में जाते देर नहीं लगती।

अमन-“अह्ह… सोफिया बेटी … तू बिल्कुल अपनी अम्मी पे गई है अह्ह… वो भी ऐसे ही चूमते हुये चूसती है…”

सोफिया-“अब्बू , मैं अम्मी की बेटी ज़रूर हूँ पर मैं हर काम ऐसे करूँगी कि आप अम्मी को भूल जाओगे…” और सोफिया अमन के लण्ड को गले के अंदर तक घुसाकर इतने जोर से खींचती है कि अमन बर्दाश्त नहीं कर पाता और उसकी कमर अपने आप ऊपर उठती चली जाती है। वो सोफिया के मुँह में लण्ड अंदर-बाहर करने लगता है। सोफिया गलप्प्प घ न्न गलप्प्प, ना साँस ले पा रही थी, ना ठीक से बोल पा रही थी। पर लण्ड को इस कदर चूस रही थी, जैसे उसने जिंदगी में कई लण्ड खाये हैं।

अमन सोफिया के मुँह से लण्ड बाहर निकाल लेता है और उसे लेटा देता है-“बेटी थोड़ा दर्द होगा, तुम सह लोंगी ना?”

सोफिया-“अब्बू , आप मेरी फिकर मत करो। बस जल्दी करो अब्बू , जल्दी से अह्ह…”

अमन पहले थोड़ा रगड़ता है और फिर सोफिया की चूत के पर्दे तक लण्ड को घुसा देता है। अब तक सोफिया खुश थी। अमन सोफिया की आँखों में देखता है और अपने होंठ उसके होंठों से मिलाकर दोनों हाथों से उसकी चुचियों को दबाते हुये जोर से एक झटका अंदर देता है, और सोफिया अमन के मुँह के अंदर चीखती चली जाती है।

खून से लथफथ चूत के अंदर अमन अपने लण्ड को नहीं रोकता, वो धीरे-धीरे लण्ड अंदर-बाहर करने लगता है और सोफिया तड़पती रहती है, मचलती रहती है। थोड़ी देर बाद जब अमन अपने होंठ सोफिया के होंठों से अलग करता है, तब सोफिया रो भी रही थी और हँस भी रही थी-“अह्ह… अम्मी, मैंने आपके शौहर को अपना बना लिया। अब उन्हें मुझसे कोई अलग नहीं कर सकता… अमन ख़ान आज से मेरे हैं। आप सुन रही हो ना अम्मी… अब्बू आराम से अन्न्नने्…”

अमन कुँवारी चूत खोलने में महारत रखता था। पर आज सोफिया की चूत के पर्दे को हटाने में उसका दिल भी एक पल के लिए धड़कना बंद कर चुका था। वो सोफिया को ऐसे चोदने लगता है जैसे रज़िया और अनुम को चोदा करता था। वो ये भी भूल गया था कि सोफिया की चूत अब तक इतनी खुली नहीं है। पर अमन ख़ान तो अमन ख़ान था।

सोफिया अपनी दोनों टाँगे खोलकर अमन का साथ देने लगती है। रात तो अभी जवान हुई थी।

सुबह 7:00 बजे-दिल्ली होटल रूम

अमन बाथरूम से नहाकर बाहर निकलता है। रात उसे सोफिया ने बहुत कम आराम करने दिया था। पर कहते हैं जवान चूत हो या लण्ड जितना चुदाई करे उतना और करने को दिल चाहता है और यही हाल सोफिया का था। वो बेड पे ब्रा और पैंटी में लेटी हुई अमन के बाहर निकलने का इंतजार कर रही थी।

जैसे ही अमन बाहर निकलता है, उसकी नजर सोफिया पे पड़ती है। सोफिया की खूबसूरत जवानी का मजा तो वो रात में ले ही चुका था। अपने बेटी को इस तरह मचलता देखकर उसका दिल भी झूम उठता है।

सोफिया-“अब्बू क्या बात है, बड़े थके-थके से लग रहे हैं?”

अमन सोफिया की खुली हुई ब्रा को निकालकर फेंक देता है और नरम मुलायम चुचियों को मसलने लगता है।

सोफिया-“अब्बू , एक रात में आपने मुझे क्या से क्या कर दिया। देखिये ना मेरा जिस्म कुछ और कह रहा है और रह कुछ और…”

अमन-“मुआह्ह… मेरी जान, बहुत खूबसूरत जिस्म है तेरा। दिल तुझसे अलग होने को करता ही नहीं …”

सोफिया-“तो मत होइये अलग, कौन आपको कह रहा है? बस इसी तरह अपनी बाहों में समेटे रखिए, अपनी बेटी को प्यार कीजिए ना अब्बू …”

अमन सोफिया की चुचियों को मुँह में लेकर चूमते हुए, चूसने लगता है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

सोफिया का जिस्म फिर से ढीला होने लगता है। वो खुद को अमन के हवाले कर देती है-“अब्बू , मैं घर नहीं जाना चाहती। हम कुछ दिन और यहाँ नहीं रुक सकते?”

अमन सोफिया की पैंटी निकालकर फेंक देता है और गुलाबी पंखुड़ियाँ अमन के मुँह के सामने आ जाती हैं। मैं भी कुछ दिन अपनी बेटी के साथ गुजारना चाहता हूँ । आखिरकार मुझपे तेरा भी तो हक उतना ही है जितना औरों का है।

सोफिया-“अह्ह… अब्बू जी क्या करते है? उसे ऐसे मत सहलाइए ना अह्ह…”

अमन सोफिया को उल्टा लेटा देता है और चूत के साथ-साथ सोफिया की साफ चिकनी गाण्ड को भी चाटने लगता है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

सोफिया बेडशीट को जोर से पकड़ लेती है-“अब्बू जी नहीं ना अह्ह… अब्बू जी मुझे क्या कर रहे हैं? मेरे अब्बू अह्ह…”

अमन-“गलप्प्प तेरी चूत चाट रहा हूँ मेरे बच्ची…” अमन सोफिया को भी रज़िया, अनुम और शीबा की तरह गंदी -गंदी बातें करते हुये चोदना चाहता था। वो जानता था कि सोफिया भी रज़िया का खून है और जिस तरह रज़िया को पीछे से गाण्ड में लेना बहुत अच्छा लगता था, उसी तरह सोफिया भी कहीं ना कहीं ये ज़रूर चाहती होगी। पर गुलाब अभी पूरी तरह नहीं खिला था। थोड़ी पंखुड़ियाँ खुलना बाकी थीं और अमन के पास सबर बहुत था। वो सोफिया की चूत के अंदर तक जीभ घुसाकर सोफिया की चूत को तर-बतर कर देता है…”

सोफिया की चूत से पानी का एक-एक कतरा बाहर निकलकर अमन के मुँह में गिरने लगता है। और जितना अमन चाटता है, उतना सोफिया की चूत पानी छोड़ती है। आखिरकार सोफिया से बर्दाश्त नहीं होता और वो अमन से बदला लेने के लिए उसका तौलिया निकाल देती है। चमकता हुआ खूबसूरत अमन का लण्ड सोफिया की आँखों की रोशनी और बढ़ा देता है। वो उसे अपनी नाजुक से मुट्ठी में लेकर सहलाने लगती है।

अमन सोफिया को अपनी आँखों के इशारे से कुछ कहता है।

और सोफिया अपने अब्बू की बात मानते हुये उसे अपने मुँह में ले लेती है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

अमन-“अह्ह… सोफी बेटी … तेरी अम्मी भी ऐसे नहीं चूसती है अह्ह…”

सोफिया-“गलप्प्प मैंने आपसे कल रात ही कह थी अब्बू , मैं आपको इतनी मुहब्बत करूँगी कि आप सबको भूल जाओगे गलप्प्प गलप्प्प…”

अमन-“अह्ह… इधर आ जा, अपने अब्बू के पास मेरी जान अह्ह…”

सोफिया-“अभी नहीं … अभी मुझे इसे प्यार करने दीजिए गलप्प्प गलप्प्प…”

अमन-“अह्ह… बस कर गुड़िया अह्ह…”

सोफिया-“नहीं अब्बू , ये मेरे अब्बू की सबसे खूबसूरत चीज है। इसे मैं इतनी आसानी से नहीं छोड़ने वाली । इसे मैं हमेशा ऐसे ही प्यार करती रहूंगी गलप्प्प गलप्प्प…”

अमन का दिल सोफिया की इन बातों से इस कदर बदलने लगा था कि उसे अब ना रज़िया याद आ रही थी, और ना शीबा। वो अपनी नई दुल्हन, बेटी के प्यार में डूबा हुआ महसूस कर रहा था खुद को। जब सोफिया अमन की बात नहीं सुनती और अमन से एक-एक लम्हा इस तरह सोफिया के मुँह में गुजारना मुश्किल हो जाता है तो अमन सोफिया को अपने तरफ खींच लेता है और उसकी कमर को दोनों हाथों में लेकर पीछे से अपना लण्ड उसकी चूत में बिना सोफिया को कुछ कहे डाल देता है।

सोफिया-“अब्बू उुउउ जीईई… मेरे अब्बू अह्ह…”

अमन-“जो मेरी बात नहीं सुनते, मैं उसे ऐसी ही सजा देता हूँ सोफिया अह्ह…”

सोफिया-“अगर ऐसी बात है तो मैं आपकी बात बिस्तर पे कभी नहीं सुनूँगी । ताकी आप इसी तरह… मुझे सजा देते रहें अह्ह… ये सजा मुझे हमेशा इसी तरह चाहिए… जीईई अब्बू अह्ह…”

अमन के लण्ड के नीचे हर औरत और लड़की पनाह माँगती थी। सोफिया ही वो लड़की थी जो अमन के लण्ड से भी नहीं घबराई। सोफिया को चोदते हुये अमन को खुद पे बहुत नाज होने लगता है। आखिरकार एक ख़ूँख़ार शेर और मजबूत कलेजे वाली रज़िया के मिलाप से वजूद में आई थी सोफिया। उसमें दोनों के खून की झलक साफ-साफ नजर आती थी।

जितने जोर से अमन सोफिया को चोद रहा था उतने ताकत से सोफिया अपनी कमर को पीछे अमन के लण्ड की तरफ धकेलने लगती है।

***** *****

इधर अमन विला में जीशान शीबा के रूम में चला जाता है।

आज दोपहर में वो और लुबना समर कैम्प जाने वाले थे। इसी लिए जीशान शीबा को चलते-चलते लण्ड की सलामी देने की नीयत से उसके बेड पे उसके पीछे जाकर शीबा से चिपक जाता है। शीबा गहरी नींद में सोई हुई थी। पर जैसे ही जीशान उसकी चूत को पैंट के ऊपर से छूता है, वो अपने आँखें खोल देती है।

जीशान-गुड मॉर्निंग अम्मी।

शीबा-“गुड मॉर्निंग मेरे सरताज। आज इतनी सुबह-सुबह अम्मी की याद… ख़ैरियत तो है ना?”

जीशान शीबा के निप्पल को अपने मुँह में लेकर चूसने लगता है-“भूक लगी थी अम्मी। घर में दूध ठंडा है, सोचा सीधा ताजा ताजा, गरम दूध पिया जाए गलप्प्प गलप्प्प…”

शीबा-“अह्ह… पी ले ना, तुझे रोका किसने है? अह्ह… तू आज समर कैम्प जाने वाला है ना? अह्ह…”

जीशान-हाँ अम्मी दोपहर में।

शीबा-“मुझे एक हफ्ते के लिए छोड़कर जा रहा है…”

जीशान-“बस एक हफ्ते की तो बात है अम्मी…”

शीबा-“मैं तुझे रोकूंगी नहीं , पर मुझे एक हफ्ते का कोटा अभी चाहिए…”

जीशान शीबा के होंठों को चूमते हुये-“जो हुकुम मालकिन…”

शीबा अपनी नाइटी के बटन खोल देती है और जीशान अपना अंडरवेअर निकाल देता है। उनके पास वक्त की कमी थी, और मोहब्बत और हवस की शिद्दत बहुत ज्यादा। बिना देर किए जीशान अपने लण्ड को शीबा की चूत की गहराईयों में उतार देता है।

शीबा-“अह्ह… जीशान बेटा ऐसा कर अपनी अम्मी को कि मुझे तेरे अब्बू के पास ना सोना पड़े… भुला दे मुझे कि मैं अमन ख़ान की बीवी हूँ । बस मुझे याद रहे तो सिर्फ़ तू अह्ह…”

जीशान-“अम्मी इस चूत पे अब सिर्फ़ जीशान ख़ान का हक है और आप पूरी की पूरी मेरी हो, मेरी अम्मी जान्नने्…”

दोनों एक दूसरे को चूमने लगते हैं। देखते ही देखते दोपहर भी हो जाती है। जीशान और लुबना घर के सभी लोगों से मिलकर समर कैम्प के लिए निकल जाते हैं।
 


अनुम भीगी पलकों से जीशान को जाता देखती रह जाती है। रज़िया उसके कंधे पे हाथ रखती है और उसे अपनी ममता के आूँचल में छुपा लेती है-“मेरे बच्चे तू रो मत, करने दे जालिम को कितने भी सितम। पर मेरी बात याद रखना… वो अभी तुझसे नफरत करता है और जहाँ नफरत ज्यादा होती है, वहीं मोहब्बतू भी शिद्दत से होती है…”

जीशान और लुबना समर कैम्प के लिए निकल जाते हैं। जब वो कालेज पहुँचते हैं तो सभी समर कैम्प जाने वाले स्टूडेंट्स वहाँ पहुँच चुके थे।

रूबी बड़ी बेताबी से जीशान का इंतजार कर रही थी। जैसे ही उसकी नजर जीशान पे पड़ती है, वो खुशी के मारे उछल पड़ती है और भागते हुये जीशान और लुबना के पास पहुँच जाती है-“कितनी देर कर दी आपने? मैं कब से आपका इंतजार कर रही हूँ …”

लुबना-“ना सलाम, ना कलाम बस आते ही मक्खी की तरह गुन-गुन शुरू कर दी तुमने रूबी…”

रूबी-“सलाम बाजी, सलाम जीशान, कैसे हैं आप?”

लुबना की बात रूबी के साथ-साथ जीशान को भी नागवार गुज़री थी पर जीशान बात को हँसी में टाल देता है।

कालेज के सर जो समर कैम्प में स्टूडेंट्स के साथ जाने वाले थे, सभी स्टूडेंट्स को बस में बैठने के लिए कहते हैं। रूबी सबसे पहले बस में चढ़ती है, और अपने पास की सीट पे किसी को बैठने नहीं देती। लास्ट में जब जीशान चढ़ता है तो वो जीशान को अपने पास बैठने के लिए कहती है।

जीशान तो बैठ जाता है पर लुबना के कलेजे पे साँप रेंगने लगता है। वो बुरा सा मुँह बनाकर जीशान और रूबी के पीछे वाली सीट पे बैठ जाती है। सफर शुरू हो जाता है और बस में हंगामा भी। फस्ट एअर के स्टूडेंट्स नाच गाना शोर मचाना शुरू कर देते हैं।

रूबी जीशान से इतनी चिपक के बैठी थी कि लुबना को ऐसे दिखाई दे रहा था, जैसे रूबी जीशान के गोद में बैठी हो।

लुबना के पास में एक लड़का बैठा हुआ था, जिसका नाम फ़राज़ था, देखने में अच्छा ख़ासा था। लुबना उसका कोई नोटिस नहीं लेती। उसकी नजर तो जीशान और रूबी की तरफ थी और कान गौर से उन दोनों की बातें सुनने में मसरूफ़।

फ़राज़-“ एक्सक्यूज मी, क्या मैं खिड़की की तरफ बैठ सकता हूँ , मुझे थोड़ा सिर दर्द हो रहा है…”

लुबना-“सर में दर्द हो रहा है तो मेरे सर पे बैठ जाओ। चुपचाप बैठे रहो वरना बाहर फेंक दूँगी …” वो इतने जोर से बोली थी कि आस-पास के स्टूडेंट्स ख़ौफ़ जदा से हो जाते हैं।

और बेचारा फ़राज़ तो भीगी बिल्ली की तरह दुबक जाता है।

जीशान एक नजर पीछे पलटकर लुबना की तरफ देखता है-“क्या बात है लुबु आर यू आल राइट?”

लुबना-“जी भाई, मैं बिल्कुल ठीक हूँ , आप लगे रहो…”

जीशान लुबना को घूर ता हुआ फिर से रूबी से बातें करने लग जाता है।

लुबना का पारा इतना चढ़ा हुआ था की उसे कुछ अच्छा नहीं लगता और वो अपनी आँखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगती है। रास्ता काटना लुबना के लिए दुश्वार था। वो बस दुआ कर सकती थी कि किसी तरह वो जल्दी से जल्दी कैम्प पहुँच जाए।

3 घंटे बाद उनकी प्राइवेट बस समर कैम्प, जो एक छोटा सा मगर बहुत खूबसूरत टूरिस्ट स्पॉट भी था, वहाँ रुक जाती है। सभी स्टूडेंट्स नीचे उतर जाते हैं। उन लोगों के रुकने के लिए वहाँ एक होटेल में पहले से कमरे बुक्ड थे। लड़के एक तरफ और लड़कियाँ दूसरे तरफ के कमरे में रुकने वाले थे। पर होटेल में रुकने कौन आया था? सभी अपने-अपने दोस्तों के साथ कुदरत के नजारे देखने निकल जाते हैं।

रूबी और जीशान वहीं खड़े थे।

तभी वहाँ लुबना भी आ जाती है-“चलो ना भाई, घूमने चलते हैं…”

जीशान-“चलो, तुम चल रही हो रूबी?”

रूबी मुश्कुराते हुये उन दोनों के साथ चल देती है। तीनो खामोशी से चल रहे थे।

लुबना की वजह से रूबी और जीशान को प्राईवेसी नहीं मिल पा रह थी।

जीशान-“लुबु, देखो सामने इतना खूबसूरत झरना है (वॉटरफाल)…”

लुबना-“हाँ भाई, चलो जल्दी से मेरी एक अच्छी सी फोटो निकाल दो…”

जीशान लुबना को थोड़ा आगे जाने के लिए कहता है और उसके दो-तीन फोटोस निकाल देता है।

जीशान-“रूबी तुम भी निकाल लो ना…”

रूबी-“नहीं अभी नहीं , बाद में…”

लुबना को एहसास होता है कि वो कबाब में हड्डी बन रही है, क्योंकि जीशान और रूबी बातें तो लुबना से भी कर रहे थे पर उनकी नजरें एक दूसरे से हट नहीं रही थी । लुबना बहाना बनाकर वहाँ से निकल जाती है।

रूबी और जीशान आगे चलने लगते हैं, और लुबना दबे पाँव उनका पीछा करने लगती है।

रूबी-“जीशान, मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ …”

जीशान-हाँ बोलो ना।

रूबी-“तुम एक लड़के हो, पता नहीं तुम्हें ये बात कैसी लगे? आम तौर पे ये बात लड़के लड़कियों से कहते हैं। पर मैं क्या करूँ जीशान मेरे जज़्बात अब मेरे बस में नहीं हैं…”

जीशान रुक जाता है और रूबी की आँखों में देखने लगता है। वो धीरे से रूबी का हाथ अपने हाथ में ले लेता है-“बोलो भी, क्या कहना चाहती हो?”

रूबी-“मुझे शर्म भी आ रही है और मैं नर्वस भी महसूस कर रही हूँ जीशान। मगर फिर भी मैं तुम्हें कहना चाहती हूँ कि ‘आइ लव यू …” और वो शरमाकर जीशान के सीने से चिपक जाती है।

कुछ देर खामोशी रहने के बाद रूबी को जीशान के हँसने की आवाज़ सुनाइ देती है।

जीशान रूबी के इस तरह अचानक प्रपोज करने पे हँस रहा था।

रूबी की आँखें नम होने लगती हैं-“तुम्हें हँसी क्यों आ रही है ?”

जीशान-“हेहेहेहे… कुको-रुको, मैं इस बात पे नहीं हँस रहा हूँ कि तुम मुझसे प्यार करती हो। बल्की मुझे इस बात पे हँसी आ रही है कि ये पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी लड़की ने लड़के को प्रपोज किया हो…”

रूबी-“तुम मुझसे प्यार नहीं करते जीशान?”

जीशान-“रूबी तुम बहुत प्यारी लड़की हो, मुझे बहुत अच्छी लगती हो। पर सच कहूँ तो मैं प्यार व्यार को नहीं मानता। मुझे इन सब बातों में बिल्कुल विश्वास नहीं है। मुझे आज तक प्यार हुआ भी नहीं । मगर मैं तुम्हारे जज़्बात की कदर करता हूँ । तुम मुझसे प्यार करती हो, बहुत अच्छी बात है। पर अभी मैं तुमसे प्यार नहीं करता, हो सकता है किसी दिन हमारे बीच प्यार हो जाए, उस दिन देखेंगे। तब तक तुम मेरी सबसे अच्छी फ्रेंड बनकर रह सकती हो…”

रूबी-“एक दिन मेरी मोहब्बत तुम्हारे दिल में ज़रूर पैदा हो जाएगी जीशान… और मुझे उस दिन दुनियाँ की हर चीज मिल जाएगी। मुझे इंतजार रहेगा उस दिन का…”

जीशान-मुझे भी, अब चलें।

रूबी का प्यार जीशान ने ठुकराया भी नहीं था और ना स्वीकार ही किया था। वो खुद को संभाल लेती है और दोनों हँसते हुये आगे बढ़ने लगते हैं। कुछ दूर चलने के बाद रास्ता थोड़ा पथरीला हो जाता है, और रास्ते में जगह-जगह काँटे भी बिछे हुये थे।

जीशान रूबी का हाथ पकड़ लेता है।

रूबी-क्या हुआ?

जीशान-तुम मुझसे प्यार करती हो ना?

रूबी-हाँ।

जीशान-“तो क्या तुम मेरे लिए नंगे पाँव इन काँटों पे चल सकती हो?”

रूबी-“क्या जीशान, कुछ भी कहते हो? मैं क्या पागल हूँ जो मोहब्बत दिखाने के लिए ऐसे काँटों भरे रास्ते पे चलूंगी । ये सब बातें लैला मजनूं को सूट करती थीं…”

जीशान रूबी को कुछ बोलने वाला था कि उसे पीछे से लुबना आती हुई दिखाई देती है उसने जीशान और रूबी की बातें सुन ली थी।

लुबना चुपचाप जीशान और रूबी के पास तक आती है और उनके पास पहुँचकर अपने सैंडल उतार देती है। तीनों के सामने काँटों भरा रास्ता था।

जीशान-क्या हुआ लुबु, तुमने सैंडल क्यों निकाल दी ?

लुबना एक नजर जीशान की आँखों में झाँकती है और फिर दूसरे ही पल वो अपने कदम उन काँटों भरे रास्ते पे बढ़ा देती है

जीशान देखता रह जाता है। साथ में खड़ी रूबी की आँखें फटी की फटी रह जाती है

लुबना पैरो में चुभते हुये काँटों का दर्द सहती हुई आगे बढ़ती रहती है और आखिरकार उसके पैरो में से खून निकलने लगता है। वो हर कदम के साथ लड़खड़ा जाती है पर वो आगे बढ़ना जारी रखती है।

जीशान-“पागल हो गई हो क्या लुबु? वहीं रुक जाओ…”

लुबना रुक जाती है।

जीशान भागता हुआ उसके पास पहुँचता है और उसे अपनी गोद में उठा लेता है।

आँसू लुबना की आँखों से लगातार बह रहे थे। ये दर्द के आँसू नहीं थे, बल्की खुशी के थे। उसे खुद पे फख्र महसूस हो रहा था। जीशान उसे अपनी बाहों में उठाकर रूम में ले आता है और भागकर सिर के पास से फस्ट-एड किट ले आता है। लुबना के पैर में अभी भी काँटे धसे हुये थे। वो उन्हें निकाल भी नहीं रही थी ।

जीशान लुबना को डाँटता हुआ एक-एक काँटा उसके पाँव से निकालने लगता है।

जीशान उससे क्या कह रहा था ये तो उसे जैसे सुनाई ही नहीं दे रहा था। वो एक टकटकी लगाए जीशान के हिलते होंठों को देख रह थी।

जीशान-“पागल लड़की, क्यों किया तुमने ऐसा?”

लुबना-“ये इश्क़ नहीं आसान, बस इतना समझ लीजिये एक आग का दरिया है और डूब के जाना है…”

जीशान लुबना का चेहरा देखता रह जाता है।

***** *****

उधर दिल्ली में अमन सोफिया के लिए एक खूबसूरत साड़ी लेकर रूम पे आता है। सोफिया अमन का ही इंतजार कर रह थी। वो उछलकर अमन की गोद में चढ़ जाती है।

अमन सोफिया को चूमते हुये उसे साड़ी देता है-“जल्दी से इसे पहनकर मुझे दिखाओ …”

सोफिया हाथ में साड़ी लेते हुये-“अब्बू बाकी के अंडरगामेंटस कहाँ हैं?”

अमन सोफिया के कान में धीरे से कहता है-“मैं चाहता हूँ तुम सिर्फ़ इसे पहनो बिना पैंटी बिना ब्रा के, और हाँ साड़ी अपनी नाभि के एकदम नीचे और चूत के थोड़े ऊपर बाँधना…”

अमन के मुँह से निकले ये शब्द सोफिया की चूत में हलचल मचा देते हैं, और वो शरमाते हुई बाथरूम में घुस जाती है।

अमन सोफिया की सारी शर्म-ओ-हया निकालकर फेंक देना चाहता था।

कुछ देर बाद सोफिया साड़ी पहनकर बाहर आती है। अमन उसे देखता रह जाता है। जैसे उसने कहा था सोफिया ने बिल्कुल वैसे ही साड़ी पहनी थी। अमन अपनी बेटी को अपनी छाती से लगाकर चूमने लगता है। सोफिया भी अमन में पिघलते चली जाती है।

सोफिया-“अह्ह… अब्बू मुझे बेपनाह प्यार कीजिए ना…”

अमन सोफिया की चुचियाँ जो कि एकदम नंगी थीं, मसलने लगता है और सोफिया अमन की पैंट की जिप खोलने लगती है। कुछ देर बाद दोनों फिर से नंगे हो जाते हैं। आज सोफिया बिना अमन से पूछे नीचे बैठकर उसका मोटा लण्ड अपने मुँह में लेकर चूसने लगती है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

अमन सोफिया के बाल पकड़कर लण्ड को और अंदर डालने लगता है। बाप-बेटी का रिश्ता कब का ख़तम हो चुका था। अब इसमें कुछ और रंग भरने लगे थे।

सोफिया अपनी चूत को सहलाते अमन के लण्ड को आंडो तक चूसने लगती है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

अमन सोफिया को गोद में उठाकर बिस्तर पे लेटा देता है और उसकी चुचियों को मुँह में लेकर चूसने लगता है-“गलप्प्प गलप्प्प…”

सोफिया-“अह्ह… अब्बू इनमें दूध भर दो, मैं आपको दूध पिलाऊूँगी। अह्ह… और जोर से चूसो अब्बू काटो ना जीईई…”

अमन निपल्स को काटता हुआ अपना लण्ड सोफिया की चूत में डाल देता है।

एक पल के लिए सोफिया साँस लेना भूल जाती है और दूसरे ही पल कमर उछाल-उछाल के अमन को अपने अंदर जाने देती है-“हाँने्… अब्बू ऐसे ही … अपनी बेटी को माँ बना दो जीईई… मुझे भी बच्चा दे दो मेरे अब्बू । अपने अब्बू का बच्चा चाहिए मुझे अह्ह…”

अमन दोनों चुचियों को मसलता हुआ सटासट अपना लण्ड सोफिया की चूत के अंदर तक उतारने लगता है। ऐसा लगता है जैसे मोहब्बत और हवस की ये रात कभी ख़तम नहीं होगी। दोनों एक दूसरे को चूमते चाटते नोंचते हुये एक दूसरे को मुकम्मल करने लगते हैं।

सोफिया की चूत को ज्यादा से ज्यादा देर तक लण्ड चूत में चाहिए था। और अमन को ऐसी ह टाइट चूत जो उसे अपनी जवानी के दिन याद दिलाती रहे। दोनों हाँफने लगते हैं पर ना अमन अपनी स्पीड कम करता है और ना सोफिया कमर उछालना बंद करती है

दोनों के होंठ एक दूसरे को चूमते -चूमते लाल हो चुके थे और चूत से कितनी बार पानी बाहर निकल चुका था ये सोफिया को भी याद नहीं था। रात कटती रही और सोफिया अपने अब्बू के पानी और प्यार से शराबोर होती रही ।

 
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