लुबना-वो… वो तो शादी वाले दिन पहनूँगी। रिशेप्शन वाले दिन के लिए नहीं ली ना।
जीशान-तुझ पर तो कोई भी ड्रेस जँचता है।
लुबना-सच्ची?
जीशान-मुच्ची।
लुबना-“ह ह ह …” वो हँसती हुई ड्रेस चेज करने अपने रूम में चली जाती है।
जीशान दिल ही दिल में रज़िया को दुआएँ देता हुआ अपने रूम में चला जाता है।
थोड़े देर बाद रज़िया जीशान को बताने उसके रूम में आती है कि वो जा रहे हैं।
जीशान उठकर उनके साथ बाहर तक आता है और उनके जाने के बाद सभी दरवाजे लाक कर देता है, और बड़े-बड़े कदमों से नग़मा के रूम में चला जाता है।
नग़मा बाथरूम में नहा रही थी। जीशान अपनी पैंट शर्ट उतारकर वहीं बेड पर लेट जाता है। थोड़ी देर बाद जब नग़मा सिर्फ़ तौलिया लपेटे बाहर आती तो तो पहले तो वो बुरी तरह डर जाती है जीशान को वहाँ देखकर। उसके बाद उसे अनदेखा करती हुई आईने के सामने बाल सूखाने लगती है, जैसे उसे कोई परवाह ना हो जीशान की मौजूदगी की।
जीशान उठकर नग़मा के पीछे जाकर उसकी कमर से चिपक के खड़ा हो जाता है।
नग़मा-“हटिए जाइए अपनी सोफिया आपी के पास, यहाँ क्यों आए हैं?”
जीशान-तुझे पता है नग़मा, सभी शॉपिंग करने गये हैं। सिर्फ़ तू और मैं है इस वक्त घर में।
नग़मा पलटकर जीशान की तरफ देखती हुई कहती है-“मुझे पता है, मैं क्या करूँ फिर?”
जीशान-“रात में तू कह रही थी ना कि तू मेरे नीचे बिल्कुल नंगी सोना चाहती है, बस हम दोनों और कोई नहीं …”
नग़मा बुरी तरह शरमा जाती है और अपनी शर्म छुपाने के लिए वो जीशान की तरफ पीठ करके खड़ी हो जाती है-“मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा था रात में…”
जीशान नग़मा का वो तौलिया खींच लेता है, और दिन की रोशनी में जीशान की आँखें जैसे और ज्यादा चमक उठती हैं, नग़मा का नंगा जिस्म देखकर।
नग़मा-“आह्ह… हटिए, जाइए यहाँ से…”
जीशान उसे अपने तरफ घुमाकर अपने बाहों में समेट लेता है-“आज नहीं , नग़मा आज नहीं । आज अपने भाईजान को जी भरकर प्यार करने दे, आज मत रोक मुझे गलपप्प-गलपप्प…” जीशान अपने गुलाबी होंठ नग़मा के मखमली होंठों पर रख कर निच ले होंठ को चूमने लगता है।
नग़मा भी जैसे उस चूमने भर से पिघलकर जीशान की बाहों में सिमट जाती है-“भाईजान सोची थी आपसे बहुत लड़ूँगी, मगर पता नहीं क्या बात है? जब भी आपकी बाहों में आती हूँ सब गुस्सा हवा हो जाता है…”
जीशान-मेरी मोहब्बत है नग़मा ये।
नग़मा-हाँ भाईजान, सच कह रहे हैं आप।
जीशान नग़मा के नंगे जिस्म को अपनी गोद में उठाकर उसे बेड पर लेटा देता है। जीशान की नजरें नग़मा की चूत पर आकर रुक जाती हैं। उससे रहा नहीं जाता और वो उसकी कमर के पास आकर बैठ जाता है। सुबह की रोशनी में नग़मा की गुलाबी पंखुड़ियों वाली चूत जुगुनू की तरह चमक रही थी। जीशान जैसे ही अपनी उंगली उसकी चूत पर लगाता है।
नग़मा सुलग उठनत है-“आह्ह… भाई जान्न…”
जीशान नग़मा के दोनों पैरों को खोल देता है और साथ में उसकी चूत के होंठों को भी।
नग़मा-“आह्ह… क्या कर रहे हैं?”
जीशान-“देख रहा हूँ मेरी नग़मा कितनी खूबसूरत है?” ये कहते हुये जीशान नग़मा की चूत पर अपने होंठ लगा देता है। नग़मा की चूत सोफिया की चूत से भी ज्यादा खूबसूरत थी, ना कोई बाल, और ना कोई कटाओ, एकदम मखमली की तरह जैसे किसी की तराश की तराशी हुई।
नग़मा-“आह्ह… अम्मी ऐसा मत करिये आह्ह…” अपनी चूत पर गरम जीशान की जीभ को महसूस करके नग़मा जैसे पागल सी हो जाती है। कितने दिन से अपने दिल में इस वक्त के सपने वो सजोकर बैठे थी, वो आज पूरे होने वाले थे। वो दोनों हाथों से जीशान के सिर को पकड़कर अपनी चूत पर दबाती है।
जीशान और अंदर तक अपनी जीभ डालकर नग़मा की चूत को चाटने लगता है-“गलपप्प-गलपप्प… बहुत मीठी है नग़मा ईईईईई गलपप्प…”
नग़मा-“आह्ह… चाटिये ना जी आह्ह… अम्मी उन्ह…” नग़मा ज्यादा देर तक जीशान की जीभ को बर्दाश्त नहीं कर पाती और अपनी मोहब्बत का पहला जाम जीशान को पिलाने लगती है।
जिसे जीशान भी बड़े चाओ से पीने लगता है। जब जीशान अपने गीले होंठों से नग़मा के होंठों को दुबारा चूमता है, तो नग़मा बेचैन सी हो उठती है और जीशान को धकेलकर उसके लण्ड को अपनी मुट्ठी में पकड़ लेती है।
नग़मा-“आपी मुझे इससे दूर रख रही थी ना? अब ये मेरा हो जाएगा आज से। गलपप्प-गलपप्प…” और बिना देर किए वो जीशान के गुलाबी लण्ड के सुपाड़े को अपने मुँह में ले लेती है।
जीशान-“आह्ह… नग़मा मेरी बहन…”
नग़मा-“कुछ मत कहें भाई जान्न… गलपप्प कुछ भी नहीं गलपप्प-गलपप्प…”
जीशान के लण्ड को कई बार सोफिया ने चूसा था, मगर जिस तरह से आंडो को मरोड़ती हुई नग़मा चूस रही थी, उसे ऐसा नहीं लग रहा था कि वो कुँवारी है। शायद अपनी अम्मी शीबा को कई बार देख चुकी थी नग़मा, और वो जीशान को बतलाना भी चाहती थी कि सोफिया से बेहतर वो है।
जीशान नग़मा के मुँह से लण्ड निकालकर उसे लेटा देता है और उसकी चूत पर अपना लण्ड रख कर आगे पीछे घिसने लगता है।
नग़मा-“अब मत तड़पाओ मुझे जीशान , बना लो नग़मा को अपनी…”
जीशान-मेरी आँखों में देख नग़मा।
नग़मा-हाँ।
जीशान-डाल दूं ?
नग़मा फौरन गर्दन हिलाकर हाँ में कहती है और ये देखते ह जीशान का फौलाद लण्ड अपनी बहन नग़मा की चूत में उसके पर्दे को फाड़ता हुआ अंदर तक घुसता चला जाता है।
नग़मा-“भाई जान्न… आह्ह… नहीं आह्ह… अम्मी जी आह्ह… नहीं ना, निकाल लो ना आह्ह… मैं गई…”
जीशान एक और धक्का अंदर देता है और बचा हुआ हाइमेन भी नग़मा का फट जाता है अपने भाईजान के लण्ड की तेज धार से खून से भरा हुआ लण्ड जब बाहर की तरफ आता है तो नग़मा की आँसू भरी आँखें उसे देखती रह जाती हैं।
जीशान अपने होंठों से नग़मा के निप्पल को पकड़ लेता है-“बस हो गया ना? हो गया ना, चुप हो जा मेरी जान, चुप हो जा…”
नग़मा-“नहीं मुझे नहीं करवाना आह्ह… निकाल ले आह्ह… इतने अंदर मत डालो, बाहर-बाहर आह्ह…”
जीशान किसके बाप की सुनता था जो वो अपने लण्ड से नग़मा की चूत को सटासट दबाता चला जाता है। उसके होंठ नग़मा की आवाज़ को चुप करा देते हैं, और उसके हाथ नग़मा के नरम निपल्स को मरोड़ने लगता हैं।
नग़मा-“भाई जान्न मुबारक हो… आपको एक नई दुल्हन मुबारक हो आह्ह…”
जीशान-“आह्ह… मेरी नग़मा ओह्ह…” जीशान अपनी नई दुल्हन की चूत में दनादन लण्ड पेलता हुआ उसकी कमर हिलने के ताल में अपने ताल मिलाने लगता है।
नग़मा की खुशी उसकी चूत से और चेहरे से साफ झलक रही थी। वो जीशान की कमर से अपनी टाँगे लपेट लेती है, और चीखती हुई जीशान के लण्ड पर अपनी चूत का गाढ़ा-गाढ़ा पानी छोड़ती हुई झड़ने लगती है।
जीशान भी अपने बहन नग़मा के जलते हुये बदन को अपने वजूद में मजबूती से समा लेता है, और दोनों एक साथ एक दूसरे को चूमते हुये अपनी मोहब्बत की तकमील करने लगते हैं।
जब जीशान अपना सारा पानी नग़मा की चूत में निकालकर करवट लेकर साइड में लेटता है तो नग़मा उसके सीने पर सिर रख देती है-“भाईजान आज आपने मुझे वो खुशी दी हैं कि मैं बयान नहीं कर सकती…”
जीशान अपनी नग़मा के बालों को सहलाते हुये उसके माथे को चूम लेता है-“शुक्रिया मुझे तेरा अदा करना चाहिए मेरी जान… तूने मुझ पर भरोसा करके अपनी सबसे कीमती चीज मुझे दी है…”
नग़मा-बहन की हर चीज भाई की होती है, उसमें शुक्रिया कैसा?
जीशान-अच्छा ये बात है?
नग़मा-“हुम्म…”