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अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ complete



फ़िज़ा-“ईईई क्या है जीशान ?”

जीशान-“एक भतीजे की तरफ से फुफु को तोहफा…”

फ़िज़ा-“मुझे बहुत पसंद आया ये तोहफा गलपप्प-गलपप्प…”

जीशान-आह्ह… फुफु जान्न।

फ़िज़ा-“फुफु नहीं जीशान सिर्फ़ फ़िज़ा हूँ मैं आह्ह… गलपप्प-गलपप्प। जब औरत के मुँह तक मर्द का लौड़ा पहुँच जाता है तो कोई और रिश्ता बाकी नहीं रहता गलपप्प-गलपप्प…”

जीशान-“फ़िज़ा हाँ स्लॉव्व स्लॉव्व आह्ह…”

फ़िज़ा खड़ी हो जाती है और जीशान के लण्ड को हाथ में पकड़कर उसे बेड पर लेटा देती है-“बहुत खूबसूरत है जीशान आपका गलपप्प-गलपप्प…”

जीशान के लण्ड की नशें अपनों के हाथ लगने से काफी फूल जाती थी। डाक्टर सोनिया की चूत में डालते वक्त भी ये लण्ड इतना मोटा नहीं हुआ था, जो फ़िज़ा के मुँह में जाने भर से हो गया था। जीशान जल्दी से जल्दी फ़िज़ा को मुकम्मल कर देना चाहता था, जो काम उसके अब्बू ने शुरू किए थे, उस काम को अंजाम तक जीशान को ही पहुँचना था। वो फ़िज़ा को अपने पास खींच लेता है और उसकी चूत पर अपना लण्ड लगाकर ऊपर-नीचे घिसने लगता है।

फ़िज़ा-“आह्ह… अब डाल भी दो ना जीशान…”

जीशान-क्या? मेरी फ़िज़ा ह्म?

फ़िज़ा-“आपका लौड़ा मेरी चूत में डाल दो ना जीशान…”

जीशान मूसल लण्ड को चिकनी फ़िज़ा के चूत में घुसा देता है, और फ़िज़ा अपने अमन के याद में वो जाती है। अमन का भी इतना बड़ा नहीं था, और इतनी गहराई तक नहीं गया होगा फ़िज़ा के चूत में, जहाँ आज जीशान ने दस्तक दिया था। फ़िज़ा का पूरा जिस्म काँप सा जाता है और वो जीशान के होंठों से होंठ लगा देती है।

अपने हाथों में फ़िज़ा की कमर को पकड़कर जीशान फ़िज़ा की चूत में लण्ड डालकर उसे दनादन जोर-जोर से चोदने लगता है।

फ़िज़ा-“आह्ह… कामरान भी नहीं पहुँचा अब तक यहाँ तक? उनने्ीं… मेरे प्यार की निशानी ने वो काम कर दिखाया आज आह्ह…”

जीशान-कामरान भी आपके साथ?

फ़िज़ा-“हाँ रे… आखिर मैं भी अमन विला की बेटी हूँ । जब तक अपने किसी खून का लौड़ा अपनी चूत में नहीं ले लेती, मुझे नींद नहीं आती आह्ह… अब से दो-दो लौड़े मेरी चूत की प्यास बुझायेंगे आह्ह… चोदो जालिम आह्ह…”

जीशान को यकीन आ जाता है। वो जानता था इस घर की औरत कुछ भी कर सकती है। उसे नग़मा को चोदने की एक और वजह भी मिल जाती है, और वो अपने होश खोता चला जाता है और फ़िज़ा चीखती चली जाती है। फ़िज़ा के चीखें उसके वजूद को भी हिलाकर रख देती हैं। जीशान फ़िज़ा के निप्पल को अपने मुँह में लेकर उसे चोदने लगता है।

फ़िज़ा-“हाँ पी ले दूध अपनी फ़िज़ा का…”

जीशान सफेद भूरे भूरे निपल्स को काटने लगता है।

फ़िज़ा-“अज़ज्जई अजी काटो मत ना आह्ह… उन्ह…”

मगर जीशान को कौन रोक सकता था-“आज जब कामरान भाई आपको चोदेंगे तो उन्हें ये निशान नजर आना चाहिए…” ये कहते हुई जीशान बुरी तरह से फ़िज़ा के निपल्स को काट लेता है। उसके दाँतों के निशान फ़िज़ा के निपल्स पर गड़ जाते हैं।

और फ़िज़ा रुआंसी सी हो जाती है-“बाप भी दर्द देकर चोदता था, बेटा भी कम नहीं है उन्ह…”

जीशान का सेल फोन फिर से बजता है। मगर उस वक्त वो इस हालत में नहीं था कि किसी से बात कर सके। वो अपनी रफ़्तार बढ़ा देता है और फ़िज़ा की चूत को अंदर तक खोल देता है।

फ़िज़ा अपने भतीजे के लण्ड के आगे हार जाती है, और उसकी चूत चीखते हुई पानी छोड़ने लगती है। जीशान भी अपनी फ़िज़ा की चूत में अपना पानी उड़ेलने लगता है। दोनों एक दूसरे को कसकर दबोच लेते हैं, और देखते ही देखते अचानक से उमड़ा हुआ वो सैलाब शांत हो जाता है।

फ़िज़ा उठकर कपड़े पहनने लगती है। मगर जीशान उसका हाथ पकड़कर उसे अपने ऊपर गिरा देता है।

फ़िज़ा-“आह्ह… मुझे जाना होगा जीशान। अब तो यहाँ आना जाना लगा रहेगा, जब तक सोफिया की शादी नहीं हो जाती। उसके बाद हम कहीं और फ्लेट ढूँढ लेंगे…”

जीशान फ़िज़ा के होंठों को चूमते हुये उसे छोड़ देता है-“बिल्कुल मेरी जान…”

फ़िज़ा कपड़े पहन लेती है और जीशान अपने कपड़े पहनकर काल देखता है। काल अनुम का था, वो काल-बैक करता है।

अनुम-“कहाँ थे तुम? कब से काल कर रही हूँ , लंच किए की नहीं ?”

जीशान-पेट भरकर कर लिया अम्मी जान्न आज तो।

अनुम-ठीक है, और अनुम काल रख देती है।

फ़िज़ा-“अनुम बहुत प्यार करती है जीशान तुमसे…”

जीशान-हाँ, मगर उतना नहीं जितना मैं उनसे करता हूँ ।

फ़िज़ा मुश्कुरा देती है और दोनों एक दूसरे का हाथ थामे फॅक्टरी की तरफ निकल जाते हैं। जीशान फ़िज़ा को घर ड्रॉप करके फॅक्टरी चला जाता है।

शाम 5:00 बजे जब जीशान फॅक्टरी से घर आता है तो उसे हाल में सभी घर की औरतें बैठी हुई मिलती हैं। शॉपिंग करके वो लोग अभी-अभी लौटे थे। जीशान भी उनके पास आकर बैठ जाता है।

लुबना-ये लाई हूँ मैं।

जीशान-“हाँ सच में बहुत अच्छे लगेगी तू लुब इसमें…” सभी एक-एक करके जीशान को ड्रेस दिखाने लगते हैं-“अम्मी आप क्या लाए हैं अपने लिए?”

अनुम-वक्त ह नहीं मिला इन लोगों की शॉपिंग में।

जीशान-कोई बात नहीं कल आप मेरे साथ चलियेगा।

अनुम-कोई ज़रूरत नहीं । तुम फॅक्टरी संभालो, मैं चली जाउन्गी अम्मी के साथ।

जीशान आँखें दिखाकर अनुम को डराना चाहता है। मगर अनुम उसकी धमकियों से डरने वालों में से नहीं थी-“क्या हुआ?”

जीशान-“कुछ नहीं …” वो उठकर अपने रूम में फ्रेश होने चला जाता है।

सोफिया नग़मा से आँखों-आँखों में कुछ बात करती है और नग़मा के चेहरे पर मुस्कान फैल जाती है। रात के खाने के बाद रज़िया अनुम के साथ रूम में बैठकर फक्सन के बारे में बातें करने बैठ जाती है। लुबना अपने दोस्तों से बात कर रही थी और जीशान अपने रूम में लैपटाप पर कुछ काम कर रहा था। सोफिया उसके रूम में आती है और उसके पास आकर बैठ जाती है।

जीशान-क्या हाल है सोनीया?

सोफिया-चगा जी।

जीशान-“अह्ह… और बताओ क्या-क्या शॉपिंग किया आप लोगों ने?”

सोफिया-“छोड़ो ना जीशान उन बेकार सी बातों को। मैं क्या कह रही थी?”

जीशान-हाँ बोलो ना जी।

 
सोफिया-वो मेरी सौतन आपसे अकेले में मिलना चाहती है।

जीशान-सौतन? कौन सौतन?

सोफिया-नग़मा।

जीशान मुश्कुरा देता है-“वो तुम्हारी सौतन कब से बन गई?”

सोफिया-“आप पर जो भी डोरे डाले वो मेरी सौतन हुई ना? अब बहन है इसलिए माफ किए देती हूँ …”

जीशान-और अगर बाहर वाली ने डाली तो?

सोफिया-जान से मार दूँगी उसे भी और खुद को भी।

जीशान-ईईईई पागल इधर आ।

सोफिया अपने जीशान की बाहों में सिमट ती चली जाती है और जीशान अपने गरम होंठों से सोफिया के नर्म होंठों को सकून पहुँचाता चला जाता है। जब सोफिया जीशान से अलग होती है तो वो जीशान के कान में कुछ सरगोशी करती है, और दोनों एक दूसरे को देखकर मुश्कुरा देते हैं। सोफिया वहाँ से उठकर बाहर चली जाती है, और जीशान लैपटाप दुबारा खोल लेता है।

अनुम-“अम्मी, सोफिया और नग़मा के जाने के बाद घर कितना खाली खाली हो जाएगा ना?

रज़िया-हाँ वो तो है।

अनुम-बहुत खाली खाली ।

रज़िया अनुम की तरफ देखती है-“घर तो फिर भी भर जाएगा जीशान की शादी के बाद। मगर तेरी जिंदगी का क्या बेटी ?”

अनुम खामोश हो जाती है और उसकी नजरें नीचे जमीन पर कुछ तलाश करने लगती हैं।

रज़िया अनुम के सिर पर हाथ फेरती हुई उसे अपने सीने से लगा लेती है-“मेरी बेटी ऐसी तो ना थी? क्या हो गया है तुझे? क्यों खुद को तबाह करने पर तुली हुई है अनुम?”

अनुम-मेरी किस्मत में यही लिखा है अम्मी।

रज़िया-“नहीं बेटी , तेरी किस्मत में कुछ और लिखा है। और मुझे उम्मीद है वो तुझे ज़रूर मिले गा, बस तू थोड़ा सा पहली कर अपनी तरफ से…”

अनुम-मैं समझी नहीं अम्मी।

रज़िया-“मैं अपने जिंदगी गुज़ार चुकी हूँ , बहुत अच्छी तरह से। पहले तेरे अब्बू के साथ और फिर अमन के साथ

और अब…”

अनुम उसे देखने लगती है।

रज़िया-देख अनुम बेटी , मैं बस तुझे खुश देखना चाहती हूँ , और मुझे तेरी खुशी जीशान के साथ दिखाई देती है।

अनुम-अम्मी आप सब जानती है ना? मैं अमन के सिवा किसी और के साथ… वो भी अपनी औलाद के साथ?

रज़िया-“क्यों अमन भी तो तेरा भाई था? जब मैं तेरी अम्मी, अपने बेटे और पोते के साथ रह सकती हूँ तो तुझे क्या हुआ है? देख अनुम जीशान अपने बाप की औलाद है, वो शराफत से पेश आ रहा है, इसका मतलब ये नहीं कि वो कमजोर है। कल को मुझे मत कहना कि उसने कोई जोर जबरदस्ती की तेरे साथ?”

अनुम-आप मुझे उसके नाम से डरा रही हैं अम्मी?

रज़िया अपना हाथ सीधा अनुम की चूत के ऊपर रख देती है-“क्या करती मैं? इसे अपने होंठों की गर्मी देकर सुलाई हूँ । अब इसे जीशान को सौंप दो अनुम, बहुत हुई हठधम़ी…”

अनुम-“ओह्ह… अम्मी…” वो अपनी अम्मी की बाहों में सिमट जाती है और रज़िया की पकड़ अनुम की चूत पर कस जाती है…”

रात के 1:00 बजे-

अनुम रज़िया के रूम में ही सो चुकी थी और लुबना अपने रूम में। जीशान अपने रूम में अभी भी लैपटाप पर बैठा हुआ था कि तभी उसके रूम का दरवाजा खुलता है और अंदर नग़मा दाखिल होती है। उसके हाथ में दूध का ग्लास था।

जीशान लैपटाप बंद कर देता है-“अरे नग़मा तुम सोई नहीं अब तक?”

नग़मा दरवाजा बंद करके जीशान की तरफ पलटती है। उसने एक चद्दर अपने जिस्म पर ओढ़ रखी थी। जीशान बड़ी हैरत से उसे देखने लगता है। नग़मा की आँखें किसी शराबी की तरह नशीली लग रह थीं। वो जीशान की आँखों में देखती हुई अपनी चादर गिरा देती है और उसे देखकर जीशान का मुँह खुला का खुला रह जाता है। नग़मा ने जीशान की शर्ट पहन रखी थी, सिर्फ़ शर्ट ना पैंट और ना अंदर में कुछ। वो धीरे-धीरे चलकर जीशान के करीब आती है।

जीशान-ये सब क्या है नग़मा?

नग़मा-मोहब्बत आपसे। चाहत आपकी। मुझे मुकम्मल कर दो भाई जान, मैं और नहीं रह पाउन्गि इस आग में जलती हुई। इस जिस्म को रूह तक सकुन बख्स दो मेरे भाई जान।

जीशान नग़मा को अपने ऊपर खींच लेता है और उसके गुलाबी होंठों को अपने होंठों से लगाकर उसके नशे में डूब ने लगता है

नग़मा जैसे सोचकर आई थी कि आज वो अपने भाई को सब सौंप देगी, उसका जिस्म बिल्कुल ढीला पड़ा हुआ था। सब कुछ जीशान के नाम करने को तैयार, नग़मा दोनों हाथों से जीशान के सिर को पकड़कर उससे अपनी जीभ चुसवाने लगती है।

जीशान-“गलपप्प-गलपप्प… बहुत मीठी है नग़मा तेरी जीभ… तेरी चूत भी ऐसी है होगी ना?”

नग़मा-“खुद छू के देख लो भाई जान…”

जीशान नग़मा को लेटा देता है। उसके जिस्म से निकलती गर्मी जीशान को पिघलाने के लिए काफी थी। नग़मा ने अंडरवेअर भी नहीं पहनी थी। जब जीशान उसके दोनों पैर खोलता है तो देखता ह रह जाता है। खूबसूरत सफेद जिस्म में लिपटी हुई लाल गुलाब सी नाजुक नग़मा की चिकनी चूत ऐसी लग रही थी जैसे किसी ने कपास में जुगुनू पकड़ लिया हो। जीशान अपने होंठों से पहले नग़मा की चूत को चूमता है और फिर उसे चाटता चला जाता है।

नग़मा-भाई जान्न।

जीशान-“गलपप्प-गलपप्प… नग़मा मेरी बहन इतनी खूबसूरती मैंने आज तक नहीं देखा…” जीशान नग़मा की चूत को थोड़ा खोलकर देखता है तो उसे अंदर लाल परदा नजर आता है।

नग़मा अब तक कुँवारी थी-“भाईजान मुझे भी दो ना आपका मेरे मुँह में…”

जीशान-“क्या नग़मा? गलपप्प-गलपप्प…”

नग़मा-“भाई जान्न दो ना मुझे भी… अम्मी हाँ…”

जीशान-“पहले बोल क्या चाहिए? गलपप्प-गलपप्प…”

नग़मा-“लौड़ा भाईजान… आपका वो मोटा लौड़ा, जो मेरी चूत को खोलेगा आह्ह… डालो ना मुँह में अम्मी…”

जीशान अपनी पैंट उतार देता है और अंडरवेअर कमर से निकालकर फेंक देता है। वो बिंदास नग़मा की चूत से मुँह हटाए उसे अपने ऊपर खींच लेता है। दोनों भाई-बहन 69 की पोजीशन में आ जाते हैं, और नग़मा दूसरी बार जीशान के लौड़े को अपने मुँह में ले लेती है-गलपप्प-गलपप्प-गलपप्प।

नग़मा-“भाईजान मेरी आह्ह… मेरी चूत त्त आह्ह…”

जीशान-“तुझे सोफिया ने भेजा है ना? गलपप्प-गलपप्प…”

नग़मा-“नहीं , मैं उनके सोने के बाद आई हूँ यहाँ। मैं चाहती थी बस हम दोनों हों। जब आप मुझे अपना बनाओ और कोई तीसरा नहीं । इसलिए मैं उनके सोने के बाद आई हूँ …”

जीशान-“ऐसा क्यों गलपप्प नग़मा?”

नग़मा-“आप नहीं समझोगे भाईजान… सुहागरात में शौहर और बीवी के अलावा कोई तीसरा नहीं होता रूम में…”
 


जीशान फिर से नग़मा की चूत को चूमते हुये काटने लगता है, ये सोचते हुये कि आज उसे भी कुँवारी चूत मिलने वाली है। मगर तभी रूम का दरवाजा कोई खटखटाता है और दोनों बुरी तरह घबरा जाते हैं। नग़मा अपने कपड़े उठाकर बाथरूम में घुस जाती है और जीशान तौलिया लपेटकर दरवाजा खोलता है।

सोफिया-कहाँ है वो?

जीशान-कौन?

सोफिया-नग़मा।

जीशान-वो यहाँ नहीं है।

सोफिया-“मुझे पता है वो यहीं है। मुझसे कहती है, मैं सोने जा रही हूँ । मगर उसके रूम में तो कोई नहीं है…”

ये कहते हुये सोफिया बाथरूम का दरवाजा खोल देती है।

नग़मा वही खड़ी थी

सोफिया-“ओह्ह… क्यों री … मेरे साथ तुझे क्या हुआ था यहाँ आने को? मैं क्या तुझे मना करती चल बाहर आ…”

नग़मा चुपचाप बाहर आ जाती है।

सोफिया-“हुम्म… जीशान आपसे मिलने को तड़प रही थी ये महारानी, और मैंने जब पूछा कि तू भी आ जा मेरे साथ, तो बोली -नहीं नहीं दर्द होता होगा मुझे बहुत डर लगता है और अब?”

जीशान-“सोफिया तू क्या अनाप-शनाप बके जा रही है? कोई सुन लेगा। नग़मा यहाँ आ तू मेरे पास…”

सोफिया-नहीं , वो अपने रूम में जाएगी अभी चल निकल यहाँ से नग़मा वरना?

नग़मा की आँखों में आँसू आ जाते हैं, और वो जीशान को देखती हुई अपने रूम में भाग जाती है।

ये देखकर जीशान को बहुत गुस्सा आ जाता है, और वो दरवाजा बंद करके एक चपत सोफिया के मुँह पर लगा देता है।

सोफिया बेड पर जा गिरती है-“आह्ह…”

जीशान-“पागल हो गई है क्या तू ? क्यों किया ऐसा तूने ?”

सोफिया मुश्कुराती हुई-“मुझे जलन होने लगी है उससे अब, और हर उस लड़की से जो आपके करीब आना चाहती है…”

जीशान-“अच्छा अच्छा ये बात है? साली सिर पर चढ़ने लगते हो तुम लोग। तुझे अब बताता हूँ …” और सोफिया के कपड़े उतारकर जिस्म से अलग कर देता है और उसे उल्टा लेटा देता है।

सोफिया-“कमीनी कहीं की… मेरी जान के साथ अकेले में जो करवाना है मेरे सामने करो आह्ह…” उसके लफ़्ज रुक जाते हैं, क्योंकी जीशान का खड़ा लण्ड पीछे से सोफिया की गाण्ड छेदता हुआ अंदर घुस जाता है।

जीशान-बोल क्या कह रही थी तू ? हाँ बोल्ल्ल्ल?”

सोफिया-“आह्ह… कुछ नहीं ना जीशान आह्ह… अम्मी मर जाउन्गी ना मैं…”

जीशान-“मर जा साली आह्ह… अपनी बहन से जलती है ना तू ? जलने वालों को ऐसे ही सबक सिवाया जाता है आह्ह…”

सोफिया-“नहीं नहीं आह्ह…” वो चीखने लगती है।

मगर जीशान उसके ऊपर लेटकर, उसके मुँह को हाथों से दबाकर सटासट गाण्ड में लण्ड घुसाता चला जाता है। उसके जोरदार झटके सोफिया की चूत से पानी की बौछार बाहर गिरा देते हैं, और जीशान के लण्ड से सोफिया की गाण्ड पूरी तरह खुल से जाती है। जीशान की बाहों में रात भर सोफिया तो पिसती रह ।

मगर नग़मा अपनी चूत को सहलाते हुये भी बेचैन सी रह गई। सुबह नग़मा का मूड बहुत खराब था। वो नाश्ते के टेबल पर बैठे चुपचाप नाश्ता कर रही थी। पास में बैठी सोफिया उसे उस वक्त अपने सबसे बड़े दुश्मन की तरह नजर आ रही थी।

जीशान सनडे होने की वजह से देर तक सोकर उठा था, फ्रेश होकर वो सीधा हाल में आता है, और दोनों बहनों को चुपचाप नाश्ता करता देखकर उसे हँसी आ जाती है।

नग़मा और सोफिया एक साथ जीशान की तरफ देखते हैं और नग़मा बुरा सा मुँह बनाकर वापस नाश्ते में अपना ध्यान लगा देती है।

जीशान चेयर खींचकर उनके सामने बैठ जाता है-अम्मी और दादी कहाँ हैं?

सोफिया-बाहर गार्डन में हैं।

जीशान-नग़मा वो पानी का ग्लास देना तो।

नग़मा ग्लास में पानी डालकर जीशान की तरफ बढ़ाती है।

सोफिया-उन्होंने ग्लास माँगे हैं, पानी नहीं ?

नग़मा-“आपको क्यों तकलीफ़ हो रही है, अगर मैं पानी दूं तो?”

सोफिया इससे पहले नग़मा को जवाब देती, जीशान उन दोनों की तरफ देखकर कहता है-“बहुत अच्छा लगता है जब दो बहनें अपने भाई की मोहब्बत में इस तरह गिरफ्फतार हो जाती हैं…”

नग़मा-“मोहब्बत? माई फुट हुन्ने्ीं…” और वो उठकर बाहर अनुम और रज़िया के पास चली जाती है।

जीशान-कैसा लग रहा है?

सोफिया आँखें दिखाकर जीशान से कहती है-“दर्द देकर पूछते हैं कैसा लग रहा है?

आपकी रात की हरकत से मुझसे ठीक से चला भी नहीं जा रहा…”

जीशान-तो ठीक है आज से रात में मिलना बंद।

सोफिया-ऐसे कैसे बंद? जान से मार दूँगी अगर ऐसे बोले तो।

जीशान अपने पैंट के जिप खोलकर अपना लण्ड बाहर निकालता है।

सोफिया आँखें फाड़े उसे देखने लगती है-क्या कर रहे हो, कोई आ जाएगा जीशान?

जीशान-चल मुँह में ले।

सोफिया गर्दन हिलाकर नहीं कहती है।

जीशान आँखों से उसे धमकता है, और सोफिया इधर-उधर देखकर उसके पास खिसक जाती है। जीशान उसके बाल पकड़कर उसे अपने लण्ड पर झुकाता है

सोफिया-“सुनिये ना… कोई आ जाएगा ना?”

जीशान-मैं देख रहा हूँ ।

सोफिया ये सुनते ह जीशान के लण्ड पर झुकती चली जाती है, और सुबह की रोशनी में अपने महबूब के खूबसूरत लौड़े को अपने मुँह की गहराईयों में समाती चली जाते है-गलपप्प-गलपप्प।

जीशान की नजरें सामने की तरफ ह थीं। अनुम रज़िया और लुबना उसे बातें करती हुई साफ दिखाई दे रह थीं।

सोफिया मुँह में लेने के बाद ये भूल गई थी कि वो कहाँ बैठी हुई है?

जीशान नग़मा को उनकी तरफ आता हुआ देखता है, मगर वो सोफिया से कुछ नहीं कहता। आखिरकार, नग़मा उनके पास तक आ जाती है और जब वो सोफिया को जीशान के लौड़े को मुँह में लेकर चूसते देखती है तो उसका बुरा हाल हो जाता है।

जीशान नग़मा को इशारे से जाय्न करने के लिए कहता है। मगर नग़मा गुस्से में वहाँ से अपने रूम में चली जाती है।

अनुम, रज़िया और लुबना भी अपनी जगह से उठकर उनकी तरफ आते हैं। तभी जीशान सोफिया के मुँह से अपना लण्ड निकाल लेता है, और सोफिया उठकर बैठ जाती है।

जीशान-कैसा लगा?

सोफिया शरमा जाती है।

रज़िया-जीशान उठ गये?

जीशान-जी दादी ।

रज़िया-आज कहीं जाने का प्रोग्राम है क्या आपका?

जीशान-नहीं तो? आज शाम में दोस्त के घर जाउन्गा क्यूँ ?

रज़िया-ठीक है। तो फिर मैं, अनुम, लुब और सोफिया शॉपिंग कर आते हैं। नग़मा की शॉपिंग तो हो गई है। बस थोड़े सी बाकी है। उसे भी साथ ले जाते मगर उसके सिर में बहुत दर्द है।

जीशान-ठीक है आप हो आइए, मैं हूँ यहाँ।

अनुम-“कहीं बाहर मत निकल जाना…” जीशान अनुम की तरफ देखता है और बस मुश्कुरा देता है। आजकल अनुम से उसकी बहुत कम बातचीत हो रही थी। बर्फ की वो तह अभी काफी मोटी थी, उसे पिघलने में वक्त लगने वाला था। मगर जीशान बहुत सबर वाला बंदा था। अनुम सोफिया को तैयार होने के लिए कहती है।

और लुबना जीशान के पास आकर बैठ जाती है-“भाई मैं क्या लूँ फींक्सन में पहनने के लिए?”

जीशान-तूने ड्रेस तो ल है ना मुझे तो बता रही थी कल।

 
लुबना-वो… वो तो शादी वाले दिन पहनूँगी। रिशेप्शन वाले दिन के लिए नहीं ली ना।

जीशान-तुझ पर तो कोई भी ड्रेस जँचता है।

लुबना-सच्ची?

जीशान-मुच्ची।

लुबना-“ह ह ह …” वो हँसती हुई ड्रेस चेज करने अपने रूम में चली जाती है।

जीशान दिल ही दिल में रज़िया को दुआएँ देता हुआ अपने रूम में चला जाता है।

थोड़े देर बाद रज़िया जीशान को बताने उसके रूम में आती है कि वो जा रहे हैं।

जीशान उठकर उनके साथ बाहर तक आता है और उनके जाने के बाद सभी दरवाजे लाक कर देता है, और बड़े-बड़े कदमों से नग़मा के रूम में चला जाता है।

नग़मा बाथरूम में नहा रही थी। जीशान अपनी पैंट शर्ट उतारकर वहीं बेड पर लेट जाता है। थोड़ी देर बाद जब नग़मा सिर्फ़ तौलिया लपेटे बाहर आती तो तो पहले तो वो बुरी तरह डर जाती है जीशान को वहाँ देखकर। उसके बाद उसे अनदेखा करती हुई आईने के सामने बाल सूखाने लगती है, जैसे उसे कोई परवाह ना हो जीशान की मौजूदगी की।

जीशान उठकर नग़मा के पीछे जाकर उसकी कमर से चिपक के खड़ा हो जाता है।

नग़मा-“हटिए जाइए अपनी सोफिया आपी के पास, यहाँ क्यों आए हैं?”

जीशान-तुझे पता है नग़मा, सभी शॉपिंग करने गये हैं। सिर्फ़ तू और मैं है इस वक्त घर में।

नग़मा पलटकर जीशान की तरफ देखती हुई कहती है-“मुझे पता है, मैं क्या करूँ फिर?”

जीशान-“रात में तू कह रही थी ना कि तू मेरे नीचे बिल्कुल नंगी सोना चाहती है, बस हम दोनों और कोई नहीं …”

नग़मा बुरी तरह शरमा जाती है और अपनी शर्म छुपाने के लिए वो जीशान की तरफ पीठ करके खड़ी हो जाती है-“मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा था रात में…”

जीशान नग़मा का वो तौलिया खींच लेता है, और दिन की रोशनी में जीशान की आँखें जैसे और ज्यादा चमक उठती हैं, नग़मा का नंगा जिस्म देखकर।

नग़मा-“आह्ह… हटिए, जाइए यहाँ से…”

जीशान उसे अपने तरफ घुमाकर अपने बाहों में समेट लेता है-“आज नहीं , नग़मा आज नहीं । आज अपने भाईजान को जी भरकर प्यार करने दे, आज मत रोक मुझे गलपप्प-गलपप्प…” जीशान अपने गुलाबी होंठ नग़मा के मखमली होंठों पर रख कर निच ले होंठ को चूमने लगता है।

नग़मा भी जैसे उस चूमने भर से पिघलकर जीशान की बाहों में सिमट जाती है-“भाईजान सोची थी आपसे बहुत लड़ूँगी, मगर पता नहीं क्या बात है? जब भी आपकी बाहों में आती हूँ सब गुस्सा हवा हो जाता है…”

जीशान-मेरी मोहब्बत है नग़मा ये।

नग़मा-हाँ भाईजान, सच कह रहे हैं आप।

जीशान नग़मा के नंगे जिस्म को अपनी गोद में उठाकर उसे बेड पर लेटा देता है। जीशान की नजरें नग़मा की चूत पर आकर रुक जाती हैं। उससे रहा नहीं जाता और वो उसकी कमर के पास आकर बैठ जाता है। सुबह की रोशनी में नग़मा की गुलाबी पंखुड़ियों वाली चूत जुगुनू की तरह चमक रही थी। जीशान जैसे ही अपनी उंगली उसकी चूत पर लगाता है।

नग़मा सुलग उठनत है-“आह्ह… भाई जान्न…”

जीशान नग़मा के दोनों पैरों को खोल देता है और साथ में उसकी चूत के होंठों को भी।

नग़मा-“आह्ह… क्या कर रहे हैं?”

जीशान-“देख रहा हूँ मेरी नग़मा कितनी खूबसूरत है?” ये कहते हुये जीशान नग़मा की चूत पर अपने होंठ लगा देता है। नग़मा की चूत सोफिया की चूत से भी ज्यादा खूबसूरत थी, ना कोई बाल, और ना कोई कटाओ, एकदम मखमली की तरह जैसे किसी की तराश की तराशी हुई।

नग़मा-“आह्ह… अम्मी ऐसा मत करिये आह्ह…” अपनी चूत पर गरम जीशान की जीभ को महसूस करके नग़मा जैसे पागल सी हो जाती है। कितने दिन से अपने दिल में इस वक्त के सपने वो सजोकर बैठे थी, वो आज पूरे होने वाले थे। वो दोनों हाथों से जीशान के सिर को पकड़कर अपनी चूत पर दबाती है।

जीशान और अंदर तक अपनी जीभ डालकर नग़मा की चूत को चाटने लगता है-“गलपप्प-गलपप्प… बहुत मीठी है नग़मा ईईईईई गलपप्प…”

नग़मा-“आह्ह… चाटिये ना जी आह्ह… अम्मी उन्ह…” नग़मा ज्यादा देर तक जीशान की जीभ को बर्दाश्त नहीं कर पाती और अपनी मोहब्बत का पहला जाम जीशान को पिलाने लगती है।

जिसे जीशान भी बड़े चाओ से पीने लगता है। जब जीशान अपने गीले होंठों से नग़मा के होंठों को दुबारा चूमता है, तो नग़मा बेचैन सी हो उठती है और जीशान को धकेलकर उसके लण्ड को अपनी मुट्ठी में पकड़ लेती है।

नग़मा-“आपी मुझे इससे दूर रख रही थी ना? अब ये मेरा हो जाएगा आज से। गलपप्प-गलपप्प…” और बिना देर किए वो जीशान के गुलाबी लण्ड के सुपाड़े को अपने मुँह में ले लेती है।

जीशान-“आह्ह… नग़मा मेरी बहन…”

नग़मा-“कुछ मत कहें भाई जान्न… गलपप्प कुछ भी नहीं गलपप्प-गलपप्प…”

जीशान के लण्ड को कई बार सोफिया ने चूसा था, मगर जिस तरह से आंडो को मरोड़ती हुई नग़मा चूस रही थी, उसे ऐसा नहीं लग रहा था कि वो कुँवारी है। शायद अपनी अम्मी शीबा को कई बार देख चुकी थी नग़मा, और वो जीशान को बतलाना भी चाहती थी कि सोफिया से बेहतर वो है।

जीशान नग़मा के मुँह से लण्ड निकालकर उसे लेटा देता है और उसकी चूत पर अपना लण्ड रख कर आगे पीछे घिसने लगता है।

नग़मा-“अब मत तड़पाओ मुझे जीशान , बना लो नग़मा को अपनी…”

जीशान-मेरी आँखों में देख नग़मा।

नग़मा-हाँ।

जीशान-डाल दूं ?

नग़मा फौरन गर्दन हिलाकर हाँ में कहती है और ये देखते ह जीशान का फौलाद लण्ड अपनी बहन नग़मा की चूत में उसके पर्दे को फाड़ता हुआ अंदर तक घुसता चला जाता है।

नग़मा-“भाई जान्न… आह्ह… नहीं आह्ह… अम्मी जी आह्ह… नहीं ना, निकाल लो ना आह्ह… मैं गई…”

जीशान एक और धक्का अंदर देता है और बचा हुआ हाइमेन भी नग़मा का फट जाता है अपने भाईजान के लण्ड की तेज धार से खून से भरा हुआ लण्ड जब बाहर की तरफ आता है तो नग़मा की आँसू भरी आँखें उसे देखती रह जाती हैं।

जीशान अपने होंठों से नग़मा के निप्पल को पकड़ लेता है-“बस हो गया ना? हो गया ना, चुप हो जा मेरी जान, चुप हो जा…”

नग़मा-“नहीं मुझे नहीं करवाना आह्ह… निकाल ले आह्ह… इतने अंदर मत डालो, बाहर-बाहर आह्ह…”

जीशान किसके बाप की सुनता था जो वो अपने लण्ड से नग़मा की चूत को सटासट दबाता चला जाता है। उसके होंठ नग़मा की आवाज़ को चुप करा देते हैं, और उसके हाथ नग़मा के नरम निपल्स को मरोड़ने लगता हैं।

नग़मा-“भाई जान्न मुबारक हो… आपको एक नई दुल्हन मुबारक हो आह्ह…”

जीशान-“आह्ह… मेरी नग़मा ओह्ह…” जीशान अपनी नई दुल्हन की चूत में दनादन लण्ड पेलता हुआ उसकी कमर हिलने के ताल में अपने ताल मिलाने लगता है।

नग़मा की खुशी उसकी चूत से और चेहरे से साफ झलक रही थी। वो जीशान की कमर से अपनी टाँगे लपेट लेती है, और चीखती हुई जीशान के लण्ड पर अपनी चूत का गाढ़ा-गाढ़ा पानी छोड़ती हुई झड़ने लगती है।

जीशान भी अपने बहन नग़मा के जलते हुये बदन को अपने वजूद में मजबूती से समा लेता है, और दोनों एक साथ एक दूसरे को चूमते हुये अपनी मोहब्बत की तकमील करने लगते हैं।

जब जीशान अपना सारा पानी नग़मा की चूत में निकालकर करवट लेकर साइड में लेटता है तो नग़मा उसके सीने पर सिर रख देती है-“भाईजान आज आपने मुझे वो खुशी दी हैं कि मैं बयान नहीं कर सकती…”

जीशान अपनी नग़मा के बालों को सहलाते हुये उसके माथे को चूम लेता है-“शुक्रिया मुझे तेरा अदा करना चाहिए मेरी जान… तूने मुझ पर भरोसा करके अपनी सबसे कीमती चीज मुझे दी है…”

नग़मा-बहन की हर चीज भाई की होती है, उसमें शुक्रिया कैसा?

जीशान-अच्छा ये बात है?

नग़मा-“हुम्म…”

 


जीशान उसे अपने ऊपर खींच लेता है और नग़मा जीशान के लण्ड पर अपनी चूत को चिपका लेती है। दोनों एक दूसरे के होंठों को चूमते हुये जिस्म से जिस्म मसलते हुये मोहब्बत भर बातें करने लगते हैं।

तभी जीशान का सेल फोन बजता है। जीशान काल रिसीव करता है और हुम्म… हाँ करने के बाद काल डिसकनेक्ट कर देता है।

नग़मा-क्या हुआ? कौन था?

जीशान-अम्मी का काल था, मुझे शॉपिंग माल में बुलाया है, उनकी कार में कुछ प्राब्लम आ गई है।

नग़मा-अच्छा।

जीशान नग़मा को अपनी गोद में उठा लेता है-“अभी तुम आराम करो, रात में…”

नग़मा-“रात तक मुझसे अब सबर कैसे होगा?”

जीशान-“अह्ह… बड़ी बेसबर होती जा रही हो नग़मा इतने जल्दी ?”

नग़मा-भाई जान 20 साल से सबर ही करती आ रही हूँ , अब नहीं होता जल्दी आइएगा।

जीशान-“ओके…” वो नग़मा को चूमकर फ्रेश होने चला जाता है, और फ्रेश होकर शॉपिंग माल निकल जाता है।

शॉपिंग माल के बाहर सभी जीशान का ही इंतजार कर रहे थे। रज़िया ने कहा-बहुत देर लगा दी कहाँ थे?

जीशान-आँख लग गई थी मेरी ।

अनुम कार में बैठ जाती है और बाकी लोगों भी बैकसीट पर बैठ जाते हैं।

जीशान-क्या-क्या शॉपिंग हुई? बड़े जल्दी निपटारा हो गया, क्या बात है? कपड़े पसंद नहीं आए क्या?

लुबना-“और नहीं तो क्या? बड़े ही बोरिंग कलेक्सन रखते हैं ये लोग…”

जीशान-“ तू फिकर मत कर लुब , हम मुंबई से शॉपिंग कर लेंगे…”

लुबना-सच्ची?

जीशान-“हुम्म…”

अनुम-अब चलें कि यहीं से मुंबई जाने का इरादा है?

जीशान अनुम को देखकर मुश्कुरा देता है और कार अमन विला की तरफ मोड़ देता है। घर पहुँचकर सभी अपने-अपने ड्रेस पहनकर देखने लगते हैं, मगर सोफिया सीधा नग़मा के रूम में चली जाती है और जब वो नग़मा को देखती है तो उसका शक यकीन में बदल जाता है।

नग़मा एकदम गुलाब की कल केी तरह खिली हुई नजर आ रही थी। फ्रेश होने के बाद उसने पिंक कलर की ड्रेस पहनी थी और उसके चेहरे पर हँसी टिक नहीं रही थी ।

नग़मा-ऐसे क्या देख रह हो आपी?

सोफिया उसके करीब आते हुये-क्या बात है बड़ी चहक रह हो?

नग़मा-हाँ बात तो है।

सोफिया-क्या बात है?

नग़मा कुछ नहीं बोलती बस हँसती हुई किचेन में घुस जाती है। सोफिया का शक और पुख़्ता होता जाता है। वो उसके पीछे जाने लगती है। मगर उसके सामने जीशान आ जाता है और सोफिया का हाथ पकड़कर बेड पर बैठ जाता है।

जीशान-क्या हुआ, इतनी परेशान क्यों लग रह हो?

सोफिया क्या किया तुमने नग़मा के साथ?

जीशान-क्या?

सोफिया-क्या किया तुमने नग़मा के साथ?

जीशान-कुछ नहीं ।

सोफिया-मेरी कसम खाकर बोलो जीशान।

जीशान-वही जो बहुत पहले कर लेना चाहिए था।

सोफिया खड़ी हो जाती है।

जीशान-क्या हुआ, तुम इतना ओवर-रिएक्ट क्यों कर रह हो?

सोफिया-“कुछ नहीं …” और वो बाहर जाने लगती है।

मगर जीशान उसका हाथ पकड़कर उसे वापस अपने पास बैठा देता है-“इधर देखो मेरी तरफ…”

सोफिया जब जीशान की तरफ देखती है तो जीशान को उसकी आँखों में आँसू नजर आते हैं।

जीशान-“अरे पागल कहीं की? क्या हुआ, क्यों रो रही हो? इसलिए कि मैं नग़मा के साथ था?”

सोफिया-“हाँ। इसीलिए मुझे ये बिल्कुल भी पसंद नहीं है कि तुम किसी के भी साथ कहीं भी शुरू हो जाओ?”

जीशान-“अच्छा जी तो ये बात है? मतलब मेडम को जलन हो रही है? और शादी के बाद तुम जो खालिद के साथ करोगी उसका क्या? देखो आपी, मुझे रिश्तों में बाँधकर मत रखो। मैं आजाद पक्षी की तरह हूँ , आज इस डाल पर तो कल उस डाल पर…”

सोफिया-“तो क्या तुम मुझसे मोहब्बत नहीं करते?”

जीशान-“करता हूँ , मगर वैसे नहीं कि मैं तुम्हारे लिए दुनियाँ छोड़ दूं। हमें एक दूसरे की ज़रूरत है। मैं तुम्हारा भाई हूँ , शौहर नहीं । मैं तुम्हारे भले के लिए हर मुमकिन चीज करूँगा, मगर मोहब्बत नहीं । वो मैं सिर्फ़ एक इंसान से करता हूँ और हैरत की बात तो ये है कि वो शख्स मुझसे उतनी ही ज्यादा नफरत भी करता है…”

सोफिया-तुम ये कैसी बातें कर रहे हो जीशान ?

 
जीशान-सच कह रहा हूँ मैं आपी। इंसान मोहब्बत में नकारा हो जाता है। मैं खुद पर से बोल सकता हूँ । जिससे मैं प्यार करता हूँ , जब भी वो मुझे एक बार मुश्कुरा के देखती है तो मैं उसकी मुस्कान के सदके में अपनी जान देने को तैयार हो जाता हूँ , यही इंसानियत है। मैं नहीं चाहता कि आपका भी यही हाल हो? आपकी शादी होने वाली है और ये नहीं कि मैं शादी के बाद आपको भूल जाउन्गा। नहीं बिल्कुल नहीं । हाँ मगर मैं ये ज़रूर चाहता हूँ कि आप अपनी शादी शुदा जिंदगी में भी खुश रहें, ये नहीं कि मेरी याद में आँसू बहाती रहें। मैं आपको धोखा नहीं देना चाहता और दे भी नहीं सकता। मगर मेरी खुशी अगर आपको प्यार है तो, मेरी एक एक जरुर सुनिएगा। अपनी शादी शुदा जिंदगी को बर्बाद मत करिएगा। मैं देख रहा हूँ कि आप नग़मा को लेकर, लुबना को लेकर, थोड़ी ओवर होते जा रही हैं, ये सही नहीं है। मैं इस घर का एकलौता मर्द हूँ । इसका मतलब ये है कि मुझ पर हर किसी का उतना ही हक है, जितना कि आपका। मुझे एक के साथ इंसाफ़ और दूसरे के साथ नाइंसाफी करनी नहीं आती। और हाँ आइन्दा नग़मा का दिल मत दुखाइए। वो भी मुझे उतनी ही आजीज है जितनी की आप। वो रोए या आप रोए तकलीफ़ मुझे होगी…” कहकर जीशान वहाँ से चला जाता है।

और सोफिया उसे देखती रह जाती है। उसके दिल में भी जैसे सकून सा उतर आता है, और वो खुद से बातें करने लगती है-“सच ही तो कह रहे हैं जीशान । मैं अकेली नहीं हूँ जो उनपर अपना हक जमाते फिरू ।

मैं भी ना एकदम पागल हूँ …”

रात के खाने के बाद सोफिया का मूड काफी हद तक ठीक हो चुका था, और वो हँसकर सभी से बातें कर रही थी। मगर सबसे ज्यादा खुश नग़मा लग रही थी, और उसपर सुबह से नजर और किसी की नहीं , बल्की रज़िया की थी। पैरों की चाल से औरत का चरित्र बता देने वाली रज़िया को ये तो पता चल गया था कि चिड़िया दाना चुग चुकी है, मगर कब? ये उसे पता नहीं था। बस एक बात दिल में थी कि अगर ये दाना जीशान का हुआ तो ठीक है, या और अगर बाहर वाले का हुआ तो? यही बात उसे खाये जा रही थी।

खाना खाने के बाद एक-एक करके सभी अपने-अपने रूम में जाने लगते हैं, और जीशान अनुम के रूम में उसके जाने के थोड़े देर बाद चला जाता है। अनुम उस वक्त शायद ड्रेस चेज कर रही थी। वो अपनी ड्रेस की जिप खोलने ही वाली थी कि जीशान वहाँ पहुँच जाता है और जीशान को देखकर अनुम रुक जाती है और कपड़े ठीक करने लगती है।

अनुम-कुछ बात करनी है?

जीशान-“नहीं , मैं तो आपके कपड़े चेज करवाने आया था अह्ह…”

अनुम-जब देखो घटिया मजाक? शर्म करो थोड़ा।

जीशान-वही तो नहीं है मुझमें। आपके पास बहुत है, मुझे थोड़ा सा दे दो जी।

अनुम-“देखो मुझे नींद आ रही है । जाओ यहाँ से।

जीशान-मेरे होंठ सुख रहे हैं, उन्हें गीला करना है।

अनुम जीशान के बात समझकर दो कदम पीछे के तरफ हो जाती है, मगर मुँह से कुछ नहीं कहती।

जीशान-अरे आप डर क्यों रही हैं अम्मी? मैं तो पानी की बात कर रहा था। आप क्या समझी?

अनुम अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लेती है। जीशान अनुम के पीछे आकर उससे चिपक जाता है।

अनुम-“देखो जीशान मैं कई बार कह चुकी हूँ कि मुझे ये सब बिल्कुल पसंद नहीं है आह्ह…” पहली बार अनुम को अपने चूत ड़ों की दरार में कोई चीज चुभी थी। कई दिनों के बाद उस मखमली पर कोई कठोर पत्थर घिसा था।

अमन के जाने के बाद, एकदम खामोश सी उस झील में जैसे किसी ने हलचल मचा दिया था। जीशान का लण्ड सीधा अनुम की चूत ड़ों के दरार में जाकर धँसा था और उसकी इस हरकत से अनुम के तन बदन में चिंगारी सी फूट पड़ी थी।

अनुम-जाओ यहाँ सेईई।

जीशान उसे घुमाकर अपनी तरफ मोड़ लेता है-“इन झुकी हुई पलकों की कसम… अगर ये मुझे नहीं मिले तो मैं इस दुनियाँ फानी से चला जाउन्गा। अम्मी मेरे सबर का और इम्तिहान ना लो। मेरे जज़्बातों को और हवा मत दो आप, कह देता हूँ मैं। जब तक हो सकेगा मैं सबर रखूँगा , मगर जिस दिन सबर का पैमाना छलका उस दिन मुझे कसूरवार ना समझिएगा…”

अनुम-क्या मतलब है तुम्हारा?

जीशान अनुम की गर्दन पकड़कर उसके होंठों को अपने होंठों से लगा लेता है। अनुम जो हमेशा जीशान की इस हरकत से झुंझला उठती थी, आज पता नहीं उसे क्या हुआ था कि वो एकदम बुत की तरह खड़ी थी। शायद कुछ दिन पहले रज़िया ने उससे जो बातें कहे थी, ये उसका असर था। मगर उसकी इस हरकत से कहीं ना कहीं जीशान को अनुम के दिल में अपनी मोहब्बत की नई कोपलें नजर आने लगी थीं। वो अनुम के निच ले होंठ को अपने मुँह में लेकर उनपर अपने दाँत गड़ा देता है।

अनुम-“उन्ह… ओह्ह…”

जीशान कुछ देर बाद जब अनुम से अलग होता है तो अनुम भागकर बाथरूम में घुस जाती है, और जीशान अपनी किस्मत पर रश्क करता हुआ अपनी दादी रज़िया के रूम की तरफ चला जाता है।

वो रज़िया के दरवाजा पर पहुँचता ही है के पीछे से किसी के कदमों की आवाज़ सुनकर पीछे पलटकर देखता है तो नग़मा और सोफिया दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़े उसे ह देख रही थीं। दोनों के चेहरे पर लाली बिखरी हुई थी

सोफिया-कहाँ जा रहे हो जी?

जीशान-बस थोड़ा सा दादी से बात करने।

नग़मा-“हुम्म… बात करने या उउह ओ उहह ओ…” और दोनों खिल खिलाकर हँसने लगती हैं।

जीशान उनके पास आता है और दोनों को बिना कुछ बोले रज़िया के रूम में ले जाता है। रज़िया उस वक्त अपने बेड पर लेटी हुई कोई किताब पढ़ रही थी। उसने पिंक कलर की नाइटी पहन रखी थी। जीशान उन दोनों को रूम में लाने के बाद दरवाजा बंद कर देता है।

रज़िया हैरत से नग़मा की तरफ देखती है।

जीशान धड़ाम से रज़िया के पास आकर बैठ जाता है-“दादी मैं आपके पास आ रहा था तो ये दोनों मुझसे पूछने लगी कि मैं कहाँ और क्यों आपके रूम में जा रहा हूँ ?”

रज़िया-ह ह ह ऐसे क्यों पूछ रही थी?

जीशान-पूछो , आप ही पूछो इनसे?

सोफिया और नग़मा दोनों चुपचाप वहीं खड़ी हुई थी। कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं था।

जीशान-तुम दोनों जानना चाहती थी ना मैं यहाँ क्या करने आया हूँ ?

रज़िया डर के मारे जीशान की तरफ देखती है और उसका हाथ दबाकर उससे चुप रहने के लिए कहती है। वो सोफिया से नहीं बल्की नग़मा से कतरा रही थी।

जीशान-अरे मेरी जानेमन घबराती क्यों हो? नग़मा भी हमारे नक्शे कदम पर चल निकली है।

रज़िया-क्या मतलब?

जीशान धीरे से उसके कान में कहता है-“कल फूल बन चुकी है रज़िया…”

रज़िया ये सुनते ही नग़मा की तरफ ऐसे हैरत से देखती है, जैसे उसने कोई ऐसा गुनाह किया हो, जो आज से पहले इस घर में किसी ने नहीं किया।

नग़मा अपनी नजरें रज़िया से चुराने लगती है।

 
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