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अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ complete

जीशान-“इधर आओ मेरी जानेमन…” वो दोनों को अपने पास हाथ बढ़ाकर बुलाता है।

सोफिया बेझिझक जीशान के पहली में आकर बैठ जाती है मगर नग़मा वहीं बुत की तरह खड़ी रहती है।

जीशान-“नग़मा, शौहर की बात एक आवाज़ में सुनना चाहिए बीवी ने…”

नग़मा डरते-डरते जीशान के सामने आकर खड़ी हो जाती है। जीशान रज़िया की तरफ देखता है। रज़िया उस वक्त जीशान से सबसे ज्यादा डर रही थी।

जीशान रज़िया के चेहरे को अपने हाथों में थाम लेता है-“देखो सोफिया और नग़मा मैं क्या करने आया हूँ यहाँ?” और वो बेसाख्ता अपने होंठ रज़िया के काँपते होंठों से मिला देता है।

जीशान के होंठों से चिपकते ही रज़िया किसी शराबी की तरह बहक जाती है, और अपनी बाहें जीशान की बाहों में डालकर आँखें बंद कर लेती है। ये वही जज़्बा था रज़िया का जो उसे किसी के साथ भी महसूस नहीं हुआ था। ये कशिश थी जीशान की या जज़्बात-ए-मोहब्बत? रज़िया अपने पोते की बाहों में सब कुछ भूल जाती थी

सोफिया ये नजारा पहले भी देख चुकी थी। मगर नग़मा के लिए ये अनोखा नजारा था, और उसे इसमें बहुत मजा आ रहा था। जीशान अपने मुँह में रज़िया के होंठों को लेकर इस तरह चूस रहा था कि सोफिया के साथ-साथ नग़मा भी बेचैन हो उठी थी। वो दोनों एक दूसरे को देखने लगते हैं।

सोफिया से रहा नहीं जाता और वो जीशान के चेहरे को रज़िया के मुँह से हटाकर अपनी तरफ घुमा लेती है, और अपने होंठों की गर्मी से जीशान के होंठों को ठंडक पहुँचाने लगती है। जीशान जब सोफिया के होंठों से अलग होता है, तब तक तीनों के जज़्बात उमड़ चुके थे। बस एक हवा की ज़रूरत थी, जो उस उठते हुये तूफान को और उँचाइयों पर पहुँचा दे , जहाँ सब कुछ फन्ना हो जाता है। रिश्ते-नाते, भाई-बहन का रिश्ता, हर एक जज़्बात जिसमें इंसान बधकर ये सब करने से गुरेज करता है।

जीशान रज़िया की नाइटी को खोल देता है और रज़िया भी हाथ उठाकर उसे नाइटी उतारने में मदद करती है। रज़िया अब सिर्फ़ ब्रा और पैंट में बैठे हुई थी। जीशान खड़ा हो जाता है और अपने हाथों से रज़िया की ब्रा को खोल देता है।

रज़िया ना सोफिया की तरफ देख रही थी और ना उसे नग़मा की कोई परवाह थी, वो तो अपने महबूब के नीचे कुचलने के लिए बेताब थी।

जीशान रज़िया के जिस्म से आख़िरी कपड़ा भी निकालकर फेंक देता है, और वहीं खड़े-खड़े अपनी शर्ट-पैंट निकालकर खुद भी नंगा हो जाता है। उसका झूलता हुआ लण्ड रज़िया की आँखों के सामने था, मगर रज़िया उसे हाथ नहीं लगा रही थी, शायद नग़मा की वजह से।

जीशान-“अगर तुम दोनों ने एक मिनट में अपने कपड़े नहीं उतारे तो मैं तुम दोनों को रूम से बाहर कर दूँगा…” ये कहकर जीशान रज़िया के चेहरे को दोनों हाथों में थामकर अपने लण्ड को उसके होंठों पर रगड़ने लगता है।

रज़िया अपने होंठों पर लण्ड की गर्मी महसूस करते ही मुँह खोल देती है, और फौलाद जीशान का लण्ड अपनी रज़िया के मुँह में चला जाता है। रज़िया जीशान के आंडो को मरोड़ती हुई लण्ड को मुँह के गहराईयों में लेकर चूसने लगती है-“गलपप्प-गलपप्प… आह्ह… गलपप्प… कहाँ थे जीशान, तुम इतने दिनों से? गलपप्प-गलपप्प…”

जीशान-“आह्ह… मेरी जान तेरी पोती की चूत में था आह्ह… आराम से रज्जो आह्ह…”

एक बादशाह के हुकुम की तामील जिस तरह होती है, उसी तरह जीशान का हुकुम भी सुनकर सोफिया और नग़मा दोनों बहनें एक मिनट से भी कम वक्त में नंगी हो जाती हैं, और अपनी दादी को लण्ड चूसते हुई देखने लगती हैं।

जीशान दोनों के बाल पकड़कर उन्हें भी नीचे रज़िया के पास बैठा देता है-“चल मुँह खोलो दोनों…”

सोफिया और नग़मा दोनों अपनी दादी के होंठों के पास मुँह लाकर मुँह खोल देती हैं, जैसे अपनी बारी का इंतजार कर रही हों कि कब ये जानदार लण्ड उनके गले को सकून पहुँचाता है?

जीशान अपने लण्ड को हाथ में पकड़कर कभी सोफिया के मुँह में डालकर अंदर-बाहर करने लगता है, तो कभी नग़मा के मुँह में उसकी मिठास घोलने लगता है। सोफिया इतनी गरम हो चुकी थी कि वो बेखयाली में अपना एक हाथ रज़िया की नंगी कमर पर रख देती है और रज़िया के कुछ कहने से पहले अपने दोनों उंगलियाँ रज़िया की चूत में डाल देती है।

अपनी बेटी की उंगलियों को अपनी चूत की गहराईयों में पाते ही रज़िया उछल पड़ती है और अपने होंठ जीशान के लण्ड से हटाकर सोफिया के होंठों से मिला देती है। दोनों माँ-बेटी एक दूसरे को चूमती हुई चूत को सहलाने लगती हैं।

नग़मा अपने जीशान के लण्ड को पूरा का पूरा मुँह में लेकर चूसती रहती है। जीशान से बर्दाश्त नहीं होता वो रज़िया को बेड पर लेटा देता है, और उसके दोनों पैर खोल देता है।

रज़िया अपने ऊपर अपने जीशान को खींचकर उसके लण्ड को हाथ में पकड़कर अपनी चूत के मुहाने पर लगा देती है-“आह्ह… यहाँ जल्दी से डालो ना…”

सोफिया अपनी अम्मी के मुँह के पास अपनी चूत ले आती है और रज़िया भी चूत की गर्मी की तपिश में अपने होंठों से सोफिया की चूत चिपका लेती है। ठीक उसी वक्त जीशान एक जोरदार झटका रज़िया की चूत पे देता है और उसका लण्ड अपनी रज्जो की चूत में चला जाता है।

जीशान नग़मा को सोफिया की चूत पर झुकता है, और नग़मा भी उस वक्त अकेली नहीं रह पाती, वो सोफिया की चिकनी चूत को चाटने लगती है।

सटासट चूत पर पड़ती जीशान के लण्ड के धक्कों से रज़िया कमर उछालने पर मजबूर हो जाती है। इधर जीशान अपने लण्ड से रज़िया की चूत में कोहराम मचाने लगता है, और उधर दोनों लड़कियाँ चूत की आग को किसी तरह कम करने की कोशिश करने लगती हैं।

नग़मा अपनी एक उंगली सोफिया की गाण्ड में डालकर चूत को अंदर तक चाटने लगती है।

सोफिया-“आह्ह… नग़मा ऐसे नहीं आह्ह… अम्मी उन्ह… और अंदरतर नग़मा…”

नग़मा दूसरी उंगली भी सोफिया की छोटी सी गाण्ड में डालकर जल्दी -जल्दी अंदर-बाहर करने लगती है।

रज़िया की चूत जीशान के लण्ड से जितनी खुल रही थी, उतना ही उसका मुँह भी खुल रहा था और वो सोफिया की चूत के दाने को काटती हुई अपनी बेटी की चूत को चाटती जा रही थी। पूरे रूम में साँस की और पच-पच की आवाज़ गूंजने लगती है।

रज़िया-“जीशान आराम से ना… मार दोगे क्या? आह्ह… अंदर तक चुभ रहा है आह्ह… गलपप्प…” जितने जोर से जीशान रज़िया की चूत में धक्का मारता, उतने जज़्बात से रज़िया सोफिया की चूत को मुँह में पकड़कर चाटने लगती

जीशान-“रज्जो आज मैं बहुत खुश हूँ आह्ह… आज मत रोक मुझे आह्ह…”

रज़िया-“रोक कौन रहा है जी… बस थोड़ा धीरे करो ना उन्ह… बच्चेदानी तक पहुँच रहा है ईईई आह्ह…”

जीशान-“क्या कभी मेरे अब्बू यहाँ तक पहुँच पाए थे रज्जो?”

रज़िया-“नहीं , कभी नहीं । वो यहाँ तक कभी नहीं पहुँच सके आह्ह…” जीशान के दमदार झटकों के ताव ना संभालती हुई रज़िया जीशान को अपनी छाती से चिपका लेती है, और उसके लण्ड पर इतनी जोर से झड़ने लगती है, जैसे मूत रही हो।

रज़िया का जिस्म झटके खाने लगता है। अपनी दोनों पोतियों के सामने इस तरह पोते से चुदना ये हर किसी को नशीब नहीं होता। इस ख्याल से ही उसके चूत ढेर सारा पानी छोड़ने लगती है।

मगर जीशान एक पठान की औलाद था। वो इतने जल्दी मैदान छोड़ने वालों में से नहीं था। जीशान रज़िया की चूत से लण्ड बाहर निकालकर सोफिया के मुँह में ठूँस देता है-“ले चाट इसे… आपी इसमें तेरी अम्मी की चूत का रस भी लगा हुआ है। पीकर बता मुझे कैसा है?”

सोफिया एक नजर रज़िया की तरफ देखती है और दूसरे ही पल जीशान का लण्ड उसके मुँह में होता है। वो चटखारे मारती हुई जीशान के लण्ड पर से रज़िया की चूत का सारा पानी चाटने लगती है-गलपप्प-गलपप्प। सोफिया कहती है-“इससे मीठी चीज मैंने आज तक नहीं चखि जीशान गलपप्प-गलपप्प…”

नग़मा सोफिया की चूत चाट-चाटकर इतनी गरम कर चुकी थी कि उसपर अगर हाथ रखे तो वो भी जल जाए। उस वक्त उसे सिर्फ़ एक चीज राहत दे सकती थी, और वो था जीशान का लौड़ा। और जीशान भी वही करता है, वो सोफिया को कुतिया बनाकर पीछे से दोनों चूत ड़ों को हाथ में थामकर दन्न से अपने लण्ड को सोफिया की चूत में उतार देता है।

सोफिया-“अम्म्मी आह्ह… और जोर से आह्ह… मुझे अपनी कोख में आपकी निशानी चाहिए जीशान… ऐसे करो मुझे कि मैं बहोश हो जाऊूँ उन्ह…”
 
जीशान रज़िया की तरफ देखते हुये अपनी रफ़्तार बढ़ा देता है। उसका लण्ड फौलाद की तरह सख़्त था, और किसी हथौड़े की तरह जानलेवा। वो सोफिया की नाजुक चूत की धज्जियाँ उड़ाने लगता है। इतने जोर से सोफिया की चूत में लण्ड अंदर-बाहर होने लगता है कि सोफिया गधी की तरह मुँह खोल देती है, उसके मुँह से सिर्फ़ हवा बाहर निकल रही थी उससे कुछ बोला भी नहीं जा रहा था। वो अपने सिर को इधर-उधर पटकती हुई चूत मरवाये जा रही थी।

सोफिया की चीखें दबाने के लिए नग़मा अपनी चूत का सहारा लेती है, और उसे सोफिया के मुँह से लगा देती है। और सोफिया-“गलपप्प-गलपप्प-गलपप्प… आह्ह… अम्मी रोकिये ना इन्हें आह्ह… मैं मर जाउन्गी…”

रज़िया-“तुझे कैसे शौक है? ले अब्बू…”

सोफिया-“सुनो जीशान आह्ह… नहीं आह्ह… गलपप्प-गलपप्प…” करके सोफिया अपनी चूत का गुस्सा नग़मा की चूत पर निकालने लगती है। वो नग़मा की क्लोटॉरिस को दाँतों से दबाती हुई सिसकने लगती है।

नग़मा-“अप्पीई आह्ह… मेरी क्लिट अम्मी जी…”

जीशान सना-सन सोफिया की चूत को कूट- कूटकर उसे रोने पर मजबूर कर देता है। एक तरफ सोफिया की चूत जीशान के लण्ड से रोने लगती है, और दूसरी तरफ नग़मा की चूत सोफिया के काटने से तिलमिला जाती है। दोनों भाई-बहन हाँफते हुई एक साथ एक दूसरे के अंदर झड़ने लगते हैं।

जीशान के लण्ड पर सोफिया का गरम-गरम लावा गिरने लगता है, और सोफिया की चूत अपने भाई जीशान के बीज को अपनी चूत में बो लेती है। जब दोनों एक दूसरे से अलग होते हैं तो दोनों इतनी लम्बी-लम्बी साँसें ले रहे थे कि नग़मा को डर लगता है कि कहीं दोनों का दिल बाहर को ना निकल जाए?

नग़मा जीशान के ऊपर आकर उसकी छाती से चिपक जाती है, और अपनी नरम -नरम चुचियों को जीशान की बालों वाली छाती से रगड़ने लगती है। नग़मा जीशान की आँखों में हसरत भर नजरों से देखने लगती है और जीशान भी उसकी बातों को समझते हुये उसे उस रात प्यासानहीं रखता। वो नग़मा को भी अपने ऊपर चढ़ाकर उसके चूत को अपने लण्ड से खोलकर रख देता है।

उस रात दोनों लड़कियों की अपनी दादी के सामने शर्म के सारे पर्दे गिर चुके थे और सुबह होने तक वो एक दूसरे से इस कदर खुल चुकी थीं, मानो कई दिनों से साथ-साथ नंगी रहकर जीशान से चुद रही हों। सुबह होने से पहले जीशान अपने रूम में जाकर लेट जाता है।

सुबहनाश्ते की टेबल पर-अनुम रात वाले वाकिये से थोड़ा सी नर्वस थी। वो जीशान से नजरें नहीं मिला पा रही थी। मगर रज़िया के साथ-साथ सोफिया और नग़मा ऐसे खिली - खिली लग रही थी जैसे को महताब हो।

अनुम-“जीशान, शादी की बाकी तैयारियों का क्या हुआ?”

जीशान-आप फिकर ना करें फर्नीचर वाले से मैंने बात कर ली है, वो सीधा आपी के फ्लेट पर और नग़मा की ससुराल सामान पहुँचा देगा। आज से बाकी सारे काम भी निपटाना शुरू कर देता हूँ । शादी तक हो जाएगा सब।

अनुम हल्की सी मुस्कान लिए जीशान को देखती है। उसे आज जीशान पर फख्र महसूस हो रहा था। जहाँ एक दिन वो अमन के गुजर जाने से पूरी तरह टूट चुकी थी, आज वहाँ वो जीशान की मौजूदगी में रिलेक्स महसूस कर रही थी।

जीशान अनुम को ऐसे अपनी तरफ घूर ता देखकर अचानक अनुम को आँख मार देता है, और अनुम बुरी तरह शरमाकर रुख़ जीशान की तरफ से फेर लेती है। उस दिन से जीशान शादी की तैयारियों में लग जाता है। वो सारी ज़िम्मेदारी अपने सिर लेकर हर काम वक्त से पहले करवा देता है, और देखते ही देखते शादी का वो दिन भी आ जाता है, जिसका अमन विला में रहने वालों को बेसबरी से इंतजार था।

अगले दिन नग़मा और सोफिया अमन विला को रुख़सत करके अपनी नई जिंदगी शुरू करने वाली थी। सभी मेहमान घर में आ चुके थे। नग़मा ने अपने सहेली रूबी और उसके अम्मी डाक्टर सोनिया को भी मेहंदी के दिन से इन्वाइट की थी। सारे घर में चहल-पहली थी। पूरा अमन विला आज दुल्हन की तरह सजा हुआ था

अमन विला-अमन ख़ान के जाने के बाद पहली बार इतनी खुशियाँ मना रहा था। घर के सारे लोग बेहद खुश थे। जीशान को घड़ी भर की फुरसत भी नहीं थी।

नग़मा और सोफिया को औरतें हल्द लगा रह थीं, और एक दूसरे के साथ हँसी मजाक भी कर रह थीं। लुबना और अनुम सोफिया और नग़मा के पास बैठी हुई थी, पास ही में डाक्टर सोनिया और उनकी बेटी रूबी थी।

जब से रूबी अमन विला में आई थी, लुबना के सीने पर तो जैसे साँप लोट रहे थे। अपने तल्खिया अंदाज में उसने रूबी से सलाम कलाम ज़रूर किया, मगर रूबी उसके लिए वो मील का पत्थर थी, जिसे वो जीशान से दूर रखना चाहती थी। लुबना के नजर रूबी पर ही थी कि कहीं वो मौका देखकर जीशान के करीब जाने की कोशिश ना कर बैठे।

मगर वो नहीं जानती थी कि जीशान ख़ान पर किसी और की भी गहरी नजर जमी हुई है, और वो हसीन महजबीन काफी देर से जीशान को घुरे जा रही थी।

 


डाक्टर सोनिया के हाथों में यूँ तो शरबत का ग्लास था, मगर वो हर घूँट के साथ सामने बैठे हुये जीशान को ऐसे देख रही थी, जैसे अगर उसे और जीशान को बस कुछ पलों के लिए अकेला छोड़ दिया जाए तो वो जीशान को कच्चा ही खा जा ए।

जीशान भी इस बात से वाकिफ़ था। मगर अनुम और लुबना की मौजूदगी में वो कोई भी कदम नहीं बढ़ाना चाहता था। जीशान के वालिद के हाथों चोदि हुई इस नायाब चीज डाक्टर सोनिया के जिस्म की खुश्बू जीशान की नाक में इस कदर हलचल मचा रही थी कि जिस्म एक पल के लिए लरज जाता, मगर अपने जज़्बातों पर वो किसी तरह कंट्रोल कर रहा था।

सोनिया लाल कलर के साड़ी पहने हुई थी, लो-कट के ब्लाउज में कयामत लग रही थी, मरहूम अमन की महबूबा। डाक्टर सोनिया अनुम से मुखातिब होती हुई-“अनुम जी, अब हमें इजाजत दीजिए। हम कल सुबह फंक्शन हाल में आ जाएँगे…”

नग़मा-“आंटी आज की रात रुक जाइए ना हमारे साथ…”

सोनिया-“सो स्वीट बेटा, मगर आप तो जानते हो कि हमें आपकी शादी के लिए कुछ तैयारियाँ भी करनी हैं…”

नग़मा-“तो आंटी रूबी को रहने दीजिए ना…”

लुबना-“नग़मा उन्हें ज़रूर काम होगा, वरना वो तुम्हें फोर्स नहीं करने देते…”

सोनिया-“बिल्कुल बेटा, अच्छा हम चलते हैं… तुम चल रही हो ना रूबी?”

रूबी-“अम्मी आप जाइए, मैं आ जाउन्गी…”

अनुम-“आप इतनी रात गये अकेली किसके साथ जाएँगी? एक मिनट… जीशान बेटा?”

जीशान-जी अम्मी।

अनुम-सोनिया आंटी को घर ड्राप कर दो।

जीशान सोनिया की तरफ देखता है और फिर रूबी की तरफ-“चलिये आंटी …”

और सोनिया जीशान के साथ बाहर निकल जाती है। कार जीशान चला रहा था और पास में बैठी सोनिया बेचैन हो रही थी, अपनी चूत में वो मोटा सा लण्ड लेने के लिए, जिसे जीशान पैंट में छुपाए बैठा हुआ कार चला रहा था। आखिरकार, सोनिया से बर्दाश्त नहीं होता और वो झुक कर अपना सिर जीशान की जाँघ पर रख देती है।

जीशान उछल पड़ता है-“आह्ह… क्या कर रही हो आप?”

सोनिया जिप खोलकर जीशान का लण्ड बाहर निकाल देती है, और उसपर किस करती हुई बिना जीशान को जवाब दिए मुँह में डाल लेती है-“गलपप्प-गलपप्प…”

जीशान-“आह्ह… बर्दाश्त करो मुझे कार चलाने में दुश्वारी हो रही है आह्ह…”

सोनिया-“मुझसे कंट्रोल नहीं होता, मुझे अभी के अभी चोदो जीशान…”

जीशान किसी तरह कार को सोनिया के घर पहुँचा देता है, और पूरे रास्ते सोनिया जीशान के लण्ड को चूस-चूसके खड़ा कर देती हैं जीशान किसी तरह अपनी जिप लगाकर कार के बाहर आ जाता है। सोनिया उसका हाथ पकड़कर उसे घर के अंदर अपने बेडरूम में ले जाती है। अपने जिस्म पर के कपड़े उतारने में उसे जरा भी देर नहीं लगती। मगर जीशान अब भी वैसे ही खड़ा था।

सोनिया जीशान के सामने खड़ी हो जाती है। दोनों एक दूसरे की आँखों में देखने लगते हैं, और फिर जीशान सोनिया को बेड पर गिराकर उसके होंठों पर टूट पड़ता है। अपने मुँह में कभी सोनिया की जीभ लेकर, तो कभी उसके मुँह में अपने जीभ डालकर दोनों एक दूसरे से जिस्म रगड़ते हुये जोश की इंतिहा तक पहुँच जाते हैं सोनिया उसी आलम में जीशान के भी कपड़े निकालकर बेड के नीचे फेंक देती है। दोनों नंगे हो चुके थे।

जीशान का लण्ड तो सोनिया ने कार में खड़ा कर ही दिया था, बस उसे अब आराम करना था, सोनिया के चूत में। और जीशान वही करता है, वो अपने लण्ड को हाथ में पकड़कर सोनिया की चूत पर लगाकर जोरदार झटका सोनिया की चूत में दे देता है।

सोनिया-“आह्ह… जीशान उन्ह… इतने जोर से आह्ह…”

जीशान-तुझे ऐसे ही चाहिए ना मेरी रानी?

सोनिया-“हाँ ऐसे ही आह्ह… यहाँ क्यों नहीं रोज आ जाते तुम आह्ह… मैं भी तो तुम्हारे हूँ न्ने्ीं आह्ह…

उन्ह…”

जीशान-“रूबी की वजह से नहीं आता मैं यहाँ…”

सोनिया-क्यूँ आह्ह… क्या बात है?

जीशान-“समर कैम्प में उसने मुझसे वादा लिया था कि मैं उसे चोदु तुम्हारे सामने…”

सोनिया के जैसे होश उड़ जाते हैं, और वो बुरी तरह सकते में आ जाती है। जीशान भी सोनिया को चोदना बंद करके उसकी आँखों में देखने लगता है। उस वक्त सोनिया पीक पर पहुँच चुकी थी जीशान का रुकना उसकी जान निकालने लगता है।

सोनिया-रुक क्यों गयेऽऽ?

जीशान-“अब तभी चोदुन्गा जब तुम राजी हो जाओगी…”

सोनिया-“आऽ आह्ह… ओह्ह… अपने बाप के जैसा हरामी है तू भी… जब भी चोदता है शतें रख कर आह्ह… कर ना बेटा…”

जीशान-“बोल पहलेऽऽ?”

सोनिया-नहीं , वो मैं कभी नहीं होने दूँगी ।

जीशान-क्योंन्न?

सोनिया-“क्योंकी वो तेरी बहन है, तेरे अब्बू की नाजायज औलाद। वो मेरे शौहर से नहीं हुई थी, तेरे अब्बू से इस दुनियाँ में आई थी…”

जीशान को झटका सा लगता है। मगर उसे कुछ हद तक इस बात का अंदाज़ा पहले से ही था-“फिर तो और मजा आएगा। दोनों माँ-बेटी एक बिस्तर पर नंगी मेरे लण्ड को चुसेंगी हाँ…”

 
सोनिया मछली की तरह तड़प रही थी। उसे दो-तीन जोरदार झटके चाहिए थे, जो उसकी चूत का रुका हुआ लावा बाहर बहा दे। मगर जीशान ने ऐन वक्त पर चूत का मुहाना अपने लण्ड से बंद करके लावा बहने से जैसे रोक सा दिया था।

वो दोनों ये नहीं जानते थे कि रूबी भी उनके पीछे-पीछे घर पहुँच चुकी है और रूम के बाहर खड़ी होकर सारी बातें और नजारा देख रही है।

जीशान सोनिया के चूत से लण्ड बाहर निकाल लेता है। सोनिया की चूत में तेज जलन होने लगती है, जैसे किसी ने लाल मिर्च उसकी चूत में ठूँस दी हो।

सोनिया-“हरामी कुत्ते, मुझे ऐसे अधूरा छोड़कर नहीं जा सकता तू … रुक जा जीशान ईईई…”

ठीक उसी वक्त रूबी रूम में दाखिल होती है। सोनिया और जीशान उसे उस वक्त वहाँ देखकर चकित रह जाते हैं। सोनिया अपने जिस्म पर चादर ओढ़ लेती है, मगर उसके अगले ही पल झटका सा लगता है जब उसे रूबी अपने कपड़े उतारती हुई दिखती है।

रूबी जीशान के सामने खड़े होकर अपने सारे कपड़े उतरने लगती है।

जीशान-ये तुम क्या कर ही हो रूबी?

रूबी-“तुम डरो मत जीशान, मैं सब सुन भी चुकी हूँ और मुझे ये बात पहले से पता भी थी। तुम डरो मत मैंने तुमसे कहा था ना कि मैं अम्मी के सामने तुमसे अपना कुँवारापन ख़तम करना चाहती हूँ । उसके पीछे एक वजह भी है। मैं अम्मी को कई बार गैरमदों के साथ देख चुकी हूँ । जब भी अब्बू अम्मी और मुझे बाहर घुमाने ले जाया करते थे, तब अम्मी किसी ना किसी मर्द के साथ अपनी आग बुझाया करती थी। मैं उन्हें दिखाना चाहती थी कि मैं जब उनकी आँखों के सामने ऐसा करूँगी तो उन्हें कैसा महसूस होगा?”

सोनिया रोने लगती है-“तुमने बिल्कुल ठीक कहा रूबी। मैं कई मदों के साथ सो चुकी हूँ । मगर तुम ये नहीं जानती कि मैंने ऐसा क्यों किया?”

रूबी तल्खिया अंदाज में सोनिया से कहती है-“अपने जिस्म की आग बुझाने के लिए, और किसलिए?”

सोनिया-“नहीं रूबी, तुम्हारे अब्बू मुझसे ये सब करवाया करते थे। उनका रीयल स्टेट का भी बिजनेस है, और वो अपने अमीर दोस्तों के सामने मुझे पेश करके अपने काम निकाला करते थे। जब भी वो मुझे बाहर घुमाने ले जाने की बात करते, मैं समझ जाती की मुझे क्या करना है?”

जीशान सामने खड़ा ये पारवारिक नाटक गौर से सुन रहा था, और उसे उस बात पर हँसी भी आ रही थी और सोनिया के शौहर पर गुस्सा भी।

रूबी अपनी अम्मी सोनिया की बात सुनकर उसके पास दौड़कर चली जाती है, और सोनिया रूबी को अपनी बाहों में समेट लेती है। दोनों एक दूसरे से माफी तलफी करने लगते हैं।

तभी जीशान उन दोनों के सामने आकर खड़ा हो जाता है। वो तीनों उस वक्त नंगे थे। मगर जैसे उन्हें इस बात की परवाह ही नहीं थी।

जीशान-“तो मुझे चलना चाहिए, है ना?”

सोनिया जीशान की तरफ घूर ती हुई देखती है और मुश्कुरा के कहती है-“मेरी रूबी की ख्वाहिश पूरी करके जाओ जीशान …”

जीशान दोनों को देखकर हँस देता है और अगले ही पल दोनों के सिर को पकड़कर अपने लण्ड से लगा देता है। दोनों माँ-बेटी लण्ड को किस करती हुई एक दूसरे के जिस्म से चिपक के जीशान के औजार की धार को तेज करने लगती हैं-“गलपप्प-गलपप्प-गलपप्प…”

सोनिया तो वैसे ही जल रही थी। वो जीशान को धक्का देकर बेड पर गिरा देती है, और जल्दी से उसके लण्ड पर सवार होकर अपनी चूत में उसे घुसाकर जीशान की सवार करने लगती है। जीशान रूबी की कमर में हाथ डालकर उसे अपने मुँह की तरफ खींच लेता है, और उसकी चूत पर होंठ रख कर सफेद मखमली बिना चुद चूत को चाटने लगता है-गलपप्प।

एक तरफ से सोनिया जीशान की सवार करने लगती है, और दूसरे तरफ रूबी अपनी चूत चटवाने लगती है।

सोनिया-“आह्ह… मुझे पहले बता देती रूबी, मैं तुझे इतना नहीं तरसाती आह्ह…”

रूबी-अम्मी हर चीज सही वक्त पर अच्छी लगती है।

सोफिया और नग़मा की शादी से पहले एक और बहन की सुहागरात हो रही है, वो भी एक भाई से।

सोनिया-“आह्ह… आराम से जीशान ईईईई…”

जीशान सटासट सोनिया की चूत में लण्ड घुसा-घुसाकर उसकी चूत का पानी बहा देता है, और उसे अपने जिस्म पर से उतारकर रूबी को नीचे लेटा देता है। वो कब से बेचैन था रूबी की चूत को खोलने के लिए। आखिरकार, एक भाई का फर्ज़ भी तो उसे निभाना था।

रूबी-“आराम से करना भैयाऽऽ पहली बार है…”

जीशान-“पहली बार है तो मैं क्या करूँ? दर्द बर्दाश्त नहीं करना तो जाकर अपने रूम में सो जा, मैं ऐसे ही करूँगा…” कहकर वो अपने लण्ड पर थूक लगा देता है और सोनिया अपने बेटी को सहारा दे देती है। जीशानरूबी की एक टाँग कंधे पर रख कर जैसे ही लण्ड रूबी की चूत पर लगता है।

रूबी ‘भैयाअ’ कहती हुई आँखें बंद कर लेती है, और अगले ही पल उसकी आँखें फटी की फटी रह जाती है। जीशान अपनी बहन रूबी की चूत की सील जोरदार धक्के से तोड़ देता है।

रूबी-“अम्मी जी आह्ह… नहीं ना…”

सोनिया अपने होंठ रूबी के होंठों से लगा देती है और जीशान को इशारे से जल्दी -जल्दी करने के लिए कहती है। जीशान भी जानवर की तरह बिना रुके दोनों हाथों में पैर पकड़कर सटासट सटासट लण्ड को चूत में घुसा-घुसा के हर रुकावट ख़तम कर देता है। बेडशीट खून से लतपथ हो जाती है।

रूबी सिसकने लगती है। मुँह बंद होने की वजह से वो चिल्ला भी नहीं पाती।

सोनिया रूबी की चुचियों को सहलाने लगती है। जीशान के धक्के रूबी को सकून पहुँचने लगते हैं। वो धीरे-धीरे खामोश होने लगती है, और अपनी कमर को उठाने लगती है।

सोनिया अपने होंठों को रूबी के होंठों से अलग करती है। एक लम्बी साँस रूबी लेती है और सोनिया की तरफ देखती हुई अपने मुँह में सोनिया के निपल्स को लेकर चूसने लगती है। एक तरफ एक भाई अपनी बहन को चोद रहा था, वहीं एक बेटी अपनी अम्मी की जवानी में दूध पीने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

जीशान तकरीबन 15 मिनट तक रूबी को चोदता रहता है और जब वो झड़ने के करीब पहुँचता है तो अपने लण्ड को बाहर निकालकर दोनों माँ-बेटी के मुँह में गाढ़ा-गाढ़ा पानी निकाल देता है।

जीशान का सेल उसी वक्त बजता है। काल लुबना का था। उसे जीशान की फिकर हो रही थी।

 
जीशान-हाँ लुब बोलो।

लुबना-कहाँ हैं आप?

जीशान-“मैं अपने दोस्त शमस के साथ हूँ , बस आ ही रहा हूँ …” जीशान झूठ बोलता है कि वो अपने बचपन के दोस्त शमस ख़ान के साथ है।

रूबी और सोनिया के साथ कुछ वक्त गुजारने के बाद जीशान अमन विला लौट जाता है।

सुबह का सूरज दोनों बहनों के लिए नई उम्मीदें लेकर आया था। एक खूबसूरत फनक्सन हाल में सोफिया और नग़मा का निकाह होता है, और सभी एक दूसरे को मुबारकबाद देते हैं। मगर अंदर ही अंदर सोफिया अपने महबूब से अलग होने के गम में रो रही थी। किस्मत के आगे वो भी मजबूर थी। सारे मेहमानों के खाना खाने के बाद सोफिया और नग़मा को उनके हमसफर के साथ अमन विला से रुख़सत कर दिया जाता है।

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अब अमन विला में जीशान ख़ान, रज़िया बेगम, लुबना और अनुम रह जाते हैं।

सोफिया और नग़मा की रुख़सती के बाद से जीशान थोड़ा गुमसुम सा रहने लगा था। वो रोज सुबह फॅक्टरी चला जाता और शाम में थका हरा आकर सीधे अपने रूम में चला जाता।

पहले-पहले तो रज़िया अनुम और लुबना को लगा कि वो सोफिया और नग़मा की वजह से थोड़ा डिप्रेस है। मगर उसका इस तरह इतना ज्यादा बिजी हो जाना तीनों को रास नहीं आ रहा था। अनुम रज़िया के पास बैठी उससे बात कर रही थी

अनुम-“अम्मी क्या हो गया है जीशान को? सुबह से लेकर शाम तक बस काम ही काम। घर में तो दिखाई नहीं दे रहा मुझे, आप उससे बात करो ना…”

रज़िया-“अम्मी मैं हूँ या तू ? और वैसे भी तेरे आस-पास घूमता था तो वो तुझे अच्छा नहीं लगता था। अब अपने काम में मन लगा रहा है तो वो भी तुझे नहीं अच्छा लग रहा। आखिर बात क्या है?”

अनुम चुप हो जाती है। उसे रज़िया की बात सही भी लगती है। जब जीशान अनुम के पीछे-पीछे एक किस के लिए, उससे बात करने के लिए घूमता फिरता था, तो अनुम नखरे करती फिरती थी और आज जब वो सारा ध्यान फॅक्टरी के कामों में लगा रहा है तो अनुम को वो भी नहीं भा रहा।

रज़िया-उसकी शादी करवा देते हैं।

अनुम-शादी ? पता नहीं क्यों शादी का नाम सुनकर अनुम का दिल बेचैन हो उठा था।

रज़िया-“मुझे लगता है उसे कोई लड़की पसंद आ गई है उसके साथ वक्त गुज़ारता होगा वो…”

अनुम-नहीं नहीं अम्मी, जीशान ऐसा नहीं है।

रज़िया दिल में सोचने लगती है। अपने बाप पर गया है वो भी तू क्या नहीं जानती?

अनुम-मैं बात करूँगी आज रात उससे।

रात जब जीशान घर आता है तो काफी खुश लग रहा था। उसके चेहरे की खुशी साफ बता रही थी कि वो दिल से किसी चीज को लेकर बहुत खुश है।

लुबना उसे देखकर उसके पीछे-पीछे रूम में चली जाती है। लुबना जीशान की टाई खोलती हुई-“क्या बात है जीशान, आज बड़े खुश लग रहे हो?”

जीशान-हाँ बात ही कुछ ऐसी है।

लुबना-बोलो ना क्या बात है?

जीशान-अभी नहीं , वक्त आने पर बताऊँगा।

लुबना-“प्लीज़्ज़… प्लीज़्ज़… बोल दो ना, देखो मैं किसी से कुछ नहीं बताऊँगी…”

जीशान-“तेरे पेट में एक मिनट बात नहीं पचती। तू मुझे कह रही है किसी से नहीं बताऊँगी। बोला ना बाद में, मुझे फ्रेश होने दे…” कहकर जीशान बाथरूम में घुस जाता है।

लुबान सोच में पड़ जाती है कि आखिर ऐसी कौन सी बात हो सकती है, जिसे लेकर जीशान इतना खुश है? लुबना के पेट में सच में कोई बात नहीं रहती। वो रज़िया और अनुम को बता देती है कि आज जीशान हद से ज्यादा खुश नजर आ रहा है।

अनुम-तुझे क्या कोई काम नहीं है लुब ? चल मेरा हाथ बटा खाना बनाने में।

लुबना बुरा सा मुँह बनाकर रोटियाँ बेलने लगती है। मगर अनुम बेचैन हो उठती है। उसे रज़िया की सुबह की बात याद आ जाती है कि कहीं जीशान ने बाहर कोई गलतफ्रेंड तो नहीं बना लिया है? रात का खाना खाने के बाद अनुम जीशान के रूम में जाकर उसके पास बैठ जाती है।

 
जीशान अपने लैपटाप पर काम कर रहा था-“अरे वाह क्या बात है? आज जन्नत की हूर खुद चलकर हमारे ग़रीब के रूम में आई हैं, बात क्या है?”

अनुम-“बस-बस… दिन भर कहाँ रहने लगे हो तुम?” वो सीधा पॉइंट के बात करती है

जीशान अपना ध्यान वापस लैपटाप में लगा देता है।

अनुम-मैं कुछ पूछ रही हूँ जीशान ?

जीशान-फॅक्टरी और कहाँ?

अनुम-“नहीं तुम फॅक्टरी के अलावा भी और कहीं रहने लगे हो। मैंने काल की थी 5: बजे पता चला तुम वहाँ नहीं हो। कहाँ थे?”

जीशान-“उफफ्फ़हो… आप तो किसी बच्चे की तरह मेरी परीक्षा लेने लगी? अपने दोस्तों के साथ था मैं और कहाँ होऊूँगा?”

अनुम का ध्यान जीशान के पास में पड़े एक डब्बे पर जाता है। वो लपक के उसे उठा लेती है।

जीशान-“ये क्या है? लाइए मेरी चीज वापस करिये…”

मगर उससे पहले अनुम उसे खोल देती है। उस डब्बे में एक हीरे की रिंग थी बेहद खूबसूरत और बेशकीमती। अनुम की आँखें चमक उठती हैं।

जीशान उससे वो डब्बा छीन लेता है-“बिना इजाजत किसी दूसरे की चीज को हाथ नहीं लगाया करते…”

अनुम-“रिंग किसकी है? मुझे साफ-साफ बताओ जीशान , और हाँ झूठ बोलने की कोशिश भी मत करना…”

जीशान अनुम की बात सुनकर बेड से टेक लगाकर लंबे पैर करके लेट जाता है और ऐसे ढीठ बन जाता है कि अनुम के लाख पूछने पर भी उसके मुँह से एक लफ़्ज नहीं निकलता।

आखिरकार, अनुम झुजलाकर वहाँ से अपने रूम में चली जाती है। उसके जाने के बाद जीशान दिल ही दिल में मुश्कुरा देता है।

रात के 1:00 बजे

अनुम अपने रूम में जाग रही थी और लुबना गहरी नींद में सो चुकी थी। अनुम के रूम का दरवाजा थोड़ा सा खुला था के तभी उसे बाहर किसी का साया नजर आता है, और वो साया सीधा जीशान के रूम की तरफ तेजी से जा रहा था। कुछ देर बाद अनुम को दरवाजा बंद होने की आवाज़ सुनाई देती है। वो उठकर बाहर आ जाती है मगर वहाँ कोई नहीं था। वो दबे पाँव जीशान के रूम के बाहर खड़ी हो जाती है। अंदर से उसे जानी पहचानी आवाज़ सुनाई देती है।

रज़िया नाइटी पहनकर जीशान के रूम में आई थी, उसने ना ब्रा पहनी थी और ना पैंट । बूढ़ी चूत जवान लण्ड का रस पीने आई थी।

जीशान रज़िया को देखकर लैपटाप साइड में रख देता है-“क्या हुआ, मेरी जान को नींद नहीं आ रही क्या दादी ?”

रज़िया-“रज्जो बोलो जीशान, दादी मत बोला करो। कितनी बार कहा है…”

जीशान-इधर आओ यहाँ मेरी बाहों में।

रज़िया जीशान के पास पहुँच जाती है।

जीशान-“क्या बात है बहुत दिनों बाद मेरी याद आई?”

रज़िया-“याद तो रोज आती है मुझे भी और मेरी चूत को भी। मगर क्या करें किस्मत खराब चल रही है आजकल। हट्टा-कट्टा जवान पोता होने के बाद भी उसकी रज्जो सूखी-सूखी सो रही है। तुम्हें पता है ना मुझे गीली चूत रहने पर ही नींद आती है…”

जीशान-आज तेवर कुछ ज्यादा ही ख़तरनाक लग रहे हैं आपके?

रज़िया-“मैं क्या चीज हूँ , ये तुम्हें अब पता चलेगा जीशान ख़ान? जवान बेटी घर में थी इसलिए ये रज़िया भी खामोश थी, मगर अब मैं तुम्हें बताती हूँ कि क्यों तुम्हारे अब्बू मेरी चूत में दिन रात पड़े रहते थे?” और रज़िया जीशान को नीचे गिराकर उसके होंठों को चूसती चली जाती है और दोनों हाथों से जीशान को नंगा करने लगती है।

रज़िया-“आज के बाद ये मेरी चूत में रहना चाहिए। रात में सारा पानी अंदर गिराना होगा, वरना जीना मोहाल कर दूँगी आपका…”

जीशान भी अपनी रज़िया की बातें सुनकर भड़क उठता है और दोनों हाथों से पहले तो रज़िया की नाइटी उतारकर फेंक देता है। उसके बाद दोनों हाथों में रज़िया की कमर पकड़कर उसे दबाने लगता है। दोनों दादी पोते नंगे हो जाते हैं चूत लण्ड पर घिसने लगती है।

रज़िया-“जीशान मेरे मुँह में तुम्हारा लौड़ा डालो ना…”

जीशान-ये ले।

रज़िया झुकती है और जीशान के लण्ड को अपने गले में गायब कर देती है-गलपप्प-गलपप्प-गलपप्प।

जीशान-मेरी तरफ अपनी कमर कर मेरी जान।

रज़िया 69 की पोजीशन में आ जाती है और जीशान अपनी रज़िया की चूत से लेकर गाण्ड तक चाटने लगता है-गलपप्प-गलपप्प। दोनों एक दूसरे को खा जा ने वाले अंदाज में चूम और चाट रहे थे। जवान लण्ड अपनी जवान होती जा रही रज़िया की चूत में घुसने को बेचैन था। वहीं रज़िया भी तड़प रही थी जीशान के नीचे पिसने को। रज़िया जीशान के ऊपर से उठकर बेड पर लेट जाती है और अपनी दोनों टाँगे खोल देती है। जीशान एक पैर को अपने कंधे पर रख कर अपना लण्ड रज़िया की चूत पर घिसने लगता है।

रज़िया-“डाल दे जीशान और देर मत कर…”

जीशान-कहाँ?

रज़िया हाथ में लण्ड पकड़कर चूत के मुहाने पर लगा देती है-“ यहाँ न्न…”

जीशान जोर से धक्का लगाता है।

रज़िया-“आह्ह… मर गई र ईई… इतने जोर से पहला धक्का ना दिया कर आह्ह…” और रज़िया जीशान को अपने ऊपर खींच लेती है, और दोनों टाँगे उसकी कमर से लपेट लेती है-“आह्ह… ऐसे ही एक बार मेरी अनुम को भी मेरे ऊपर नंगी लेटाकर कब चोदोगे? आह्ह…”

जीशान-ऐसे?

रज़िया-“हाँ। मैं अनुम को अपने ऊपर नंगी लेकर तुमसे अपनी चूत और मेरी अनुम की चूत मरवाना चाहती हूँ । मेरी ये ख्वाहिश जल्दी पूरे कर दो जीशान आह्ह…”

जीशान के धक्के अनुम का नाम सुनकर बढ़ जाते हैं, और रज़िया समझ जाती है कि जीशान की चार्जिंग कैसे करनी है।

 
जीशान-“रज्जो मैं भी अम्मी को दिन रात चोदना चाहता हूँ , नहाते होये, खाते हुये, पिशाब करते हुये गोद में बैठाकर, कुतिया बना कर, हर तरह से। मगर वो मुझे अपनी चूत नहीं दे रही है रज्जो आह्ह…”

रज़िया-“उसकी चूत भी बहुत प्यासी है जीशान… रगड़ के चोद डालो अपने दमदार लौड़े से एक बार। रोज रात में खुद चलकर आएगी वो तुम्हारे नीचे, उसे अपना ये औजार दिखा दो, उन्ह… जैसे तुमने अपनी रज़िया की चूत पर कब्जा किया है, उसी तरह अनुम पर भी कर लो। मेरी बेटी तड़प रही है, कई सालों से। उसकी चूत पर गाण्ड पर तरस खाओ जीशान… आअह्ह… इतनीईई जोर सेईई…”

जीशान-“हाँ रज्जो… बहुत जल्दी मैं अम्मी और तुझे एक साथ एक बेड पर नंगी करके चोदुन्गा, ये मेरा वादा है आज तुझसे। आह्ह…”

रज़िया-“उसकी गाण्ड में भी डाल देना, जैसे मेरी गाण्ड मारते हो आह्ह… मेरी अनुम की बंजर जमीन पर फिर से फूल खिला दो मेरे जान आह्ह…”

जीशान अनुम के ख्याल में रज़िया की चूत की धज्जियाँ उड़ाने लगता है। वो आँखें बंद करके सटासट-सटासट रज़िया की चूत को उधेड़कर रख देता है।

रज़िया-“आह्ह… मेरी गाण्ड मेंन्न डालो आह्ह…”

जीशान चूत में से लण्ड निकालकर गाण्ड पर लगा देता है, और वो ऐसे गाण्ड में लण्ड घुसाता है आज, जैसे चूत में घुसा रहा हो। वो ये भूल गया था कि रज़िया की गाण्ड का सुराख चूत के मुकाबूले बहुत छोटा है। रज़िया जोर से चीखना चाहती है, मगर किसी तरह तकिये को मुँह में ठूँस कर अपनी चीख दबा देती है। घुऊूँ घ ऊूँ की आवाज़ बाहर तक सुनाई दे रही थी

जीशान का फौलाद लण्ड रज़िया की नाजुक गाण्ड के अंदर तक घुसता चला जा रहा था। जीशान बोला-“रज्जो, मुझे अम्मी बेटा देगी क्या?”

रज़िया-“हाँ ज़रूर देगी। अगर मैं बच्चा पैदा करने लायक होती तो सबसे पहला बेटा मैं जनती मेरे जीशान ख़ान का आह्ह… मगर अनुम ज़रूर आपका बेटा पैदा करेगी, मुझे पूरा यकीन है आह्ह…”

जीशान के होश उड़ चुके थे। उसे सामने रज़िया नहीं अनुम नजर आ रही थी। जो इंसान अनुम का सोच-सोचकर रज़िया की ये हालत कर सकता है, वो असल में अनुम की चूत और गाण्ड का क्या हाल करेगा? यही ख्याल ना सिर्फ़ रज़िया को बल्की बाहर खड़ी अनुम को भी आ रहा था, जिसने सब कुछ सुन लिया था।

अनुम की चूत से लगातार गिरता हुआ पानी शलवार भिगा रहा था। वो किसी तरह अपनी चूत पर हाथ रख कर अपने रूम में चली जाती है और दरवाजा बंद करके आँखें भी बंद कर लेती है। उसके कानों में जीशान की कही गई बातें गूंजने लगती है और तभी कई सालों बाद अनुम की चूत से गाढ़ा-गाढ़ा चिपचिपा पानी बहने लगता है। उसकी पैंटी इतना ज्यादा गीली हो चुकी थी कि ऐसा लग रहा था जैसे अनुम ने पेशाब कर दिया हो। उसे जीशान की बात पर गुस्सा भी आ रहा था और एक सकून सा दिल-ओ-दिमाग़ में छा सा गया था, जिसकी यादों में वो नींद की आगोश में चली जाती है।

प्यार की आग में दो बदन रात भर जलते रहे।

जीशान ख़ान और रज़िया जहाँ एक तरफ अपनी मोहब्बत की ऊँचाई छू रहे थे, वहीं दूसरी तरफ अपने रूम में करवटें बदलती हुई अनुम के दिल पर छुरियाँ चल रही थीं। जैसे तैसे रात गुजर गई और सुबह का सूरज अनुम के लिए भी एक नई रोशनी की किरण लेकर आया था।

जीशान लुबना और रज़िया के साथ नाश्ता कर रहा था और अनुम पास में खड़ी बर्तन साफ कर रही थी। अनुम का दिल-ओ-दिमाग़ जीशान की तरफ था। जीशान के मुँह से निकलते शब्द, उसकी बात बेबात पर कहकहे लगाना, पता नहीं क्यों आज अनुम को बहुत अच्छा लग रहा था।

जीशान भी चोर नजरों से अनुम को देख रहा था।

रज़िया और उसके बाद लुबना भी नाश्ता करके अपने-अपने रूम में चले जाते हैं। जीशान टेबल पर से खड़ा होता है और अनुम के पास चला जाता है।

अनुम-और कुछ चाहिए?

जीशान-आप।

अनुम-क्या?

जीशान-आपने नाश्ता क्यों नहीं किया अम्मी?

अनुम-कर लूँगी थोड़ी देर से। अच्छा वो रिंग वाली बात तुमने मुझे बताई नहीं , किसके लिए है वो बताओ ना?

जीशान गहरी नजरों से अनुम को देखने लगता है। अनुम उसकी आँखों की तपिश बर्दाश्त नहीं कर पाती और उसकी नजरें झुकती चली जाती हैं।

अनुम-बताना नहीं चाहते मुझे भी?

जीशान-आप सच में जानना चाहती हैं वो रिंग किसके लिए है?

अनुम-“हुम्म…”

जीशान-“चलिए मेरे साथ…” वो अनुम का हाथ पकड़कर उसे अपने रूम में ले जाता है, और दरवाजा बंद करके रिंग अपने कपबोर्ड में से निकाल लाता है।

अनुम बड़े गौर से उसे देखने लगती है।

जीशान अनुम के सामने आकर खड़ा हो जाता है, और फिर अचानक ही वो अपने घुटनों पर बैठकर सिर झुकाकर अनुम का हाथ अपने हाथों में लेकर सिर उठाकर धीरे से कहता है-“ये मेरी जान के लिए है, आपके लिए है, अनुम के लिये है। क्या आप मुझसे शादी करोगी?”

 
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