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जीशान-“इधर आओ मेरी जानेमन…” वो दोनों को अपने पास हाथ बढ़ाकर बुलाता है।
सोफिया बेझिझक जीशान के पहली में आकर बैठ जाती है मगर नग़मा वहीं बुत की तरह खड़ी रहती है।
जीशान-“नग़मा, शौहर की बात एक आवाज़ में सुनना चाहिए बीवी ने…”
नग़मा डरते-डरते जीशान के सामने आकर खड़ी हो जाती है। जीशान रज़िया की तरफ देखता है। रज़िया उस वक्त जीशान से सबसे ज्यादा डर रही थी।
जीशान रज़िया के चेहरे को अपने हाथों में थाम लेता है-“देखो सोफिया और नग़मा मैं क्या करने आया हूँ यहाँ?” और वो बेसाख्ता अपने होंठ रज़िया के काँपते होंठों से मिला देता है।
जीशान के होंठों से चिपकते ही रज़िया किसी शराबी की तरह बहक जाती है, और अपनी बाहें जीशान की बाहों में डालकर आँखें बंद कर लेती है। ये वही जज़्बा था रज़िया का जो उसे किसी के साथ भी महसूस नहीं हुआ था। ये कशिश थी जीशान की या जज़्बात-ए-मोहब्बत? रज़िया अपने पोते की बाहों में सब कुछ भूल जाती थी
सोफिया ये नजारा पहले भी देख चुकी थी। मगर नग़मा के लिए ये अनोखा नजारा था, और उसे इसमें बहुत मजा आ रहा था। जीशान अपने मुँह में रज़िया के होंठों को लेकर इस तरह चूस रहा था कि सोफिया के साथ-साथ नग़मा भी बेचैन हो उठी थी। वो दोनों एक दूसरे को देखने लगते हैं।
सोफिया से रहा नहीं जाता और वो जीशान के चेहरे को रज़िया के मुँह से हटाकर अपनी तरफ घुमा लेती है, और अपने होंठों की गर्मी से जीशान के होंठों को ठंडक पहुँचाने लगती है। जीशान जब सोफिया के होंठों से अलग होता है, तब तक तीनों के जज़्बात उमड़ चुके थे। बस एक हवा की ज़रूरत थी, जो उस उठते हुये तूफान को और उँचाइयों पर पहुँचा दे , जहाँ सब कुछ फन्ना हो जाता है। रिश्ते-नाते, भाई-बहन का रिश्ता, हर एक जज़्बात जिसमें इंसान बधकर ये सब करने से गुरेज करता है।
जीशान रज़िया की नाइटी को खोल देता है और रज़िया भी हाथ उठाकर उसे नाइटी उतारने में मदद करती है। रज़िया अब सिर्फ़ ब्रा और पैंट में बैठे हुई थी। जीशान खड़ा हो जाता है और अपने हाथों से रज़िया की ब्रा को खोल देता है।
रज़िया ना सोफिया की तरफ देख रही थी और ना उसे नग़मा की कोई परवाह थी, वो तो अपने महबूब के नीचे कुचलने के लिए बेताब थी।
जीशान रज़िया के जिस्म से आख़िरी कपड़ा भी निकालकर फेंक देता है, और वहीं खड़े-खड़े अपनी शर्ट-पैंट निकालकर खुद भी नंगा हो जाता है। उसका झूलता हुआ लण्ड रज़िया की आँखों के सामने था, मगर रज़िया उसे हाथ नहीं लगा रही थी, शायद नग़मा की वजह से।
जीशान-“अगर तुम दोनों ने एक मिनट में अपने कपड़े नहीं उतारे तो मैं तुम दोनों को रूम से बाहर कर दूँगा…” ये कहकर जीशान रज़िया के चेहरे को दोनों हाथों में थामकर अपने लण्ड को उसके होंठों पर रगड़ने लगता है।
रज़िया अपने होंठों पर लण्ड की गर्मी महसूस करते ही मुँह खोल देती है, और फौलाद जीशान का लण्ड अपनी रज़िया के मुँह में चला जाता है। रज़िया जीशान के आंडो को मरोड़ती हुई लण्ड को मुँह के गहराईयों में लेकर चूसने लगती है-“गलपप्प-गलपप्प… आह्ह… गलपप्प… कहाँ थे जीशान, तुम इतने दिनों से? गलपप्प-गलपप्प…”
जीशान-“आह्ह… मेरी जान तेरी पोती की चूत में था आह्ह… आराम से रज्जो आह्ह…”
एक बादशाह के हुकुम की तामील जिस तरह होती है, उसी तरह जीशान का हुकुम भी सुनकर सोफिया और नग़मा दोनों बहनें एक मिनट से भी कम वक्त में नंगी हो जाती हैं, और अपनी दादी को लण्ड चूसते हुई देखने लगती हैं।
जीशान दोनों के बाल पकड़कर उन्हें भी नीचे रज़िया के पास बैठा देता है-“चल मुँह खोलो दोनों…”
सोफिया और नग़मा दोनों अपनी दादी के होंठों के पास मुँह लाकर मुँह खोल देती हैं, जैसे अपनी बारी का इंतजार कर रही हों कि कब ये जानदार लण्ड उनके गले को सकून पहुँचाता है?
जीशान अपने लण्ड को हाथ में पकड़कर कभी सोफिया के मुँह में डालकर अंदर-बाहर करने लगता है, तो कभी नग़मा के मुँह में उसकी मिठास घोलने लगता है। सोफिया इतनी गरम हो चुकी थी कि वो बेखयाली में अपना एक हाथ रज़िया की नंगी कमर पर रख देती है और रज़िया के कुछ कहने से पहले अपने दोनों उंगलियाँ रज़िया की चूत में डाल देती है।
अपनी बेटी की उंगलियों को अपनी चूत की गहराईयों में पाते ही रज़िया उछल पड़ती है और अपने होंठ जीशान के लण्ड से हटाकर सोफिया के होंठों से मिला देती है। दोनों माँ-बेटी एक दूसरे को चूमती हुई चूत को सहलाने लगती हैं।
नग़मा अपने जीशान के लण्ड को पूरा का पूरा मुँह में लेकर चूसती रहती है। जीशान से बर्दाश्त नहीं होता वो रज़िया को बेड पर लेटा देता है, और उसके दोनों पैर खोल देता है।
रज़िया अपने ऊपर अपने जीशान को खींचकर उसके लण्ड को हाथ में पकड़कर अपनी चूत के मुहाने पर लगा देती है-“आह्ह… यहाँ जल्दी से डालो ना…”
सोफिया अपनी अम्मी के मुँह के पास अपनी चूत ले आती है और रज़िया भी चूत की गर्मी की तपिश में अपने होंठों से सोफिया की चूत चिपका लेती है। ठीक उसी वक्त जीशान एक जोरदार झटका रज़िया की चूत पे देता है और उसका लण्ड अपनी रज्जो की चूत में चला जाता है।
जीशान नग़मा को सोफिया की चूत पर झुकता है, और नग़मा भी उस वक्त अकेली नहीं रह पाती, वो सोफिया की चिकनी चूत को चाटने लगती है।
सटासट चूत पर पड़ती जीशान के लण्ड के धक्कों से रज़िया कमर उछालने पर मजबूर हो जाती है। इधर जीशान अपने लण्ड से रज़िया की चूत में कोहराम मचाने लगता है, और उधर दोनों लड़कियाँ चूत की आग को किसी तरह कम करने की कोशिश करने लगती हैं।
नग़मा अपनी एक उंगली सोफिया की गाण्ड में डालकर चूत को अंदर तक चाटने लगती है।
सोफिया-“आह्ह… नग़मा ऐसे नहीं आह्ह… अम्मी उन्ह… और अंदरतर नग़मा…”
नग़मा दूसरी उंगली भी सोफिया की छोटी सी गाण्ड में डालकर जल्दी -जल्दी अंदर-बाहर करने लगती है।
रज़िया की चूत जीशान के लण्ड से जितनी खुल रही थी, उतना ही उसका मुँह भी खुल रहा था और वो सोफिया की चूत के दाने को काटती हुई अपनी बेटी की चूत को चाटती जा रही थी। पूरे रूम में साँस की और पच-पच की आवाज़ गूंजने लगती है।
रज़िया-“जीशान आराम से ना… मार दोगे क्या? आह्ह… अंदर तक चुभ रहा है आह्ह… गलपप्प…” जितने जोर से जीशान रज़िया की चूत में धक्का मारता, उतने जज़्बात से रज़िया सोफिया की चूत को मुँह में पकड़कर चाटने लगती
जीशान-“रज्जो आज मैं बहुत खुश हूँ आह्ह… आज मत रोक मुझे आह्ह…”
रज़िया-“रोक कौन रहा है जी… बस थोड़ा धीरे करो ना उन्ह… बच्चेदानी तक पहुँच रहा है ईईई आह्ह…”
जीशान-“क्या कभी मेरे अब्बू यहाँ तक पहुँच पाए थे रज्जो?”
रज़िया-“नहीं , कभी नहीं । वो यहाँ तक कभी नहीं पहुँच सके आह्ह…” जीशान के दमदार झटकों के ताव ना संभालती हुई रज़िया जीशान को अपनी छाती से चिपका लेती है, और उसके लण्ड पर इतनी जोर से झड़ने लगती है, जैसे मूत रही हो।
रज़िया का जिस्म झटके खाने लगता है। अपनी दोनों पोतियों के सामने इस तरह पोते से चुदना ये हर किसी को नशीब नहीं होता। इस ख्याल से ही उसके चूत ढेर सारा पानी छोड़ने लगती है।
मगर जीशान एक पठान की औलाद था। वो इतने जल्दी मैदान छोड़ने वालों में से नहीं था। जीशान रज़िया की चूत से लण्ड बाहर निकालकर सोफिया के मुँह में ठूँस देता है-“ले चाट इसे… आपी इसमें तेरी अम्मी की चूत का रस भी लगा हुआ है। पीकर बता मुझे कैसा है?”
सोफिया एक नजर रज़िया की तरफ देखती है और दूसरे ही पल जीशान का लण्ड उसके मुँह में होता है। वो चटखारे मारती हुई जीशान के लण्ड पर से रज़िया की चूत का सारा पानी चाटने लगती है-गलपप्प-गलपप्प। सोफिया कहती है-“इससे मीठी चीज मैंने आज तक नहीं चखि जीशान गलपप्प-गलपप्प…”
नग़मा सोफिया की चूत चाट-चाटकर इतनी गरम कर चुकी थी कि उसपर अगर हाथ रखे तो वो भी जल जाए। उस वक्त उसे सिर्फ़ एक चीज राहत दे सकती थी, और वो था जीशान का लौड़ा। और जीशान भी वही करता है, वो सोफिया को कुतिया बनाकर पीछे से दोनों चूत ड़ों को हाथ में थामकर दन्न से अपने लण्ड को सोफिया की चूत में उतार देता है।
सोफिया-“अम्म्मी आह्ह… और जोर से आह्ह… मुझे अपनी कोख में आपकी निशानी चाहिए जीशान… ऐसे करो मुझे कि मैं बहोश हो जाऊूँ उन्ह…”
सोफिया बेझिझक जीशान के पहली में आकर बैठ जाती है मगर नग़मा वहीं बुत की तरह खड़ी रहती है।
जीशान-“नग़मा, शौहर की बात एक आवाज़ में सुनना चाहिए बीवी ने…”
नग़मा डरते-डरते जीशान के सामने आकर खड़ी हो जाती है। जीशान रज़िया की तरफ देखता है। रज़िया उस वक्त जीशान से सबसे ज्यादा डर रही थी।
जीशान रज़िया के चेहरे को अपने हाथों में थाम लेता है-“देखो सोफिया और नग़मा मैं क्या करने आया हूँ यहाँ?” और वो बेसाख्ता अपने होंठ रज़िया के काँपते होंठों से मिला देता है।
जीशान के होंठों से चिपकते ही रज़िया किसी शराबी की तरह बहक जाती है, और अपनी बाहें जीशान की बाहों में डालकर आँखें बंद कर लेती है। ये वही जज़्बा था रज़िया का जो उसे किसी के साथ भी महसूस नहीं हुआ था। ये कशिश थी जीशान की या जज़्बात-ए-मोहब्बत? रज़िया अपने पोते की बाहों में सब कुछ भूल जाती थी
सोफिया ये नजारा पहले भी देख चुकी थी। मगर नग़मा के लिए ये अनोखा नजारा था, और उसे इसमें बहुत मजा आ रहा था। जीशान अपने मुँह में रज़िया के होंठों को लेकर इस तरह चूस रहा था कि सोफिया के साथ-साथ नग़मा भी बेचैन हो उठी थी। वो दोनों एक दूसरे को देखने लगते हैं।
सोफिया से रहा नहीं जाता और वो जीशान के चेहरे को रज़िया के मुँह से हटाकर अपनी तरफ घुमा लेती है, और अपने होंठों की गर्मी से जीशान के होंठों को ठंडक पहुँचाने लगती है। जीशान जब सोफिया के होंठों से अलग होता है, तब तक तीनों के जज़्बात उमड़ चुके थे। बस एक हवा की ज़रूरत थी, जो उस उठते हुये तूफान को और उँचाइयों पर पहुँचा दे , जहाँ सब कुछ फन्ना हो जाता है। रिश्ते-नाते, भाई-बहन का रिश्ता, हर एक जज़्बात जिसमें इंसान बधकर ये सब करने से गुरेज करता है।
जीशान रज़िया की नाइटी को खोल देता है और रज़िया भी हाथ उठाकर उसे नाइटी उतारने में मदद करती है। रज़िया अब सिर्फ़ ब्रा और पैंट में बैठे हुई थी। जीशान खड़ा हो जाता है और अपने हाथों से रज़िया की ब्रा को खोल देता है।
रज़िया ना सोफिया की तरफ देख रही थी और ना उसे नग़मा की कोई परवाह थी, वो तो अपने महबूब के नीचे कुचलने के लिए बेताब थी।
जीशान रज़िया के जिस्म से आख़िरी कपड़ा भी निकालकर फेंक देता है, और वहीं खड़े-खड़े अपनी शर्ट-पैंट निकालकर खुद भी नंगा हो जाता है। उसका झूलता हुआ लण्ड रज़िया की आँखों के सामने था, मगर रज़िया उसे हाथ नहीं लगा रही थी, शायद नग़मा की वजह से।
जीशान-“अगर तुम दोनों ने एक मिनट में अपने कपड़े नहीं उतारे तो मैं तुम दोनों को रूम से बाहर कर दूँगा…” ये कहकर जीशान रज़िया के चेहरे को दोनों हाथों में थामकर अपने लण्ड को उसके होंठों पर रगड़ने लगता है।
रज़िया अपने होंठों पर लण्ड की गर्मी महसूस करते ही मुँह खोल देती है, और फौलाद जीशान का लण्ड अपनी रज़िया के मुँह में चला जाता है। रज़िया जीशान के आंडो को मरोड़ती हुई लण्ड को मुँह के गहराईयों में लेकर चूसने लगती है-“गलपप्प-गलपप्प… आह्ह… गलपप्प… कहाँ थे जीशान, तुम इतने दिनों से? गलपप्प-गलपप्प…”
जीशान-“आह्ह… मेरी जान तेरी पोती की चूत में था आह्ह… आराम से रज्जो आह्ह…”
एक बादशाह के हुकुम की तामील जिस तरह होती है, उसी तरह जीशान का हुकुम भी सुनकर सोफिया और नग़मा दोनों बहनें एक मिनट से भी कम वक्त में नंगी हो जाती हैं, और अपनी दादी को लण्ड चूसते हुई देखने लगती हैं।
जीशान दोनों के बाल पकड़कर उन्हें भी नीचे रज़िया के पास बैठा देता है-“चल मुँह खोलो दोनों…”
सोफिया और नग़मा दोनों अपनी दादी के होंठों के पास मुँह लाकर मुँह खोल देती हैं, जैसे अपनी बारी का इंतजार कर रही हों कि कब ये जानदार लण्ड उनके गले को सकून पहुँचाता है?
जीशान अपने लण्ड को हाथ में पकड़कर कभी सोफिया के मुँह में डालकर अंदर-बाहर करने लगता है, तो कभी नग़मा के मुँह में उसकी मिठास घोलने लगता है। सोफिया इतनी गरम हो चुकी थी कि वो बेखयाली में अपना एक हाथ रज़िया की नंगी कमर पर रख देती है और रज़िया के कुछ कहने से पहले अपने दोनों उंगलियाँ रज़िया की चूत में डाल देती है।
अपनी बेटी की उंगलियों को अपनी चूत की गहराईयों में पाते ही रज़िया उछल पड़ती है और अपने होंठ जीशान के लण्ड से हटाकर सोफिया के होंठों से मिला देती है। दोनों माँ-बेटी एक दूसरे को चूमती हुई चूत को सहलाने लगती हैं।
नग़मा अपने जीशान के लण्ड को पूरा का पूरा मुँह में लेकर चूसती रहती है। जीशान से बर्दाश्त नहीं होता वो रज़िया को बेड पर लेटा देता है, और उसके दोनों पैर खोल देता है।
रज़िया अपने ऊपर अपने जीशान को खींचकर उसके लण्ड को हाथ में पकड़कर अपनी चूत के मुहाने पर लगा देती है-“आह्ह… यहाँ जल्दी से डालो ना…”
सोफिया अपनी अम्मी के मुँह के पास अपनी चूत ले आती है और रज़िया भी चूत की गर्मी की तपिश में अपने होंठों से सोफिया की चूत चिपका लेती है। ठीक उसी वक्त जीशान एक जोरदार झटका रज़िया की चूत पे देता है और उसका लण्ड अपनी रज्जो की चूत में चला जाता है।
जीशान नग़मा को सोफिया की चूत पर झुकता है, और नग़मा भी उस वक्त अकेली नहीं रह पाती, वो सोफिया की चिकनी चूत को चाटने लगती है।
सटासट चूत पर पड़ती जीशान के लण्ड के धक्कों से रज़िया कमर उछालने पर मजबूर हो जाती है। इधर जीशान अपने लण्ड से रज़िया की चूत में कोहराम मचाने लगता है, और उधर दोनों लड़कियाँ चूत की आग को किसी तरह कम करने की कोशिश करने लगती हैं।
नग़मा अपनी एक उंगली सोफिया की गाण्ड में डालकर चूत को अंदर तक चाटने लगती है।
सोफिया-“आह्ह… नग़मा ऐसे नहीं आह्ह… अम्मी उन्ह… और अंदरतर नग़मा…”
नग़मा दूसरी उंगली भी सोफिया की छोटी सी गाण्ड में डालकर जल्दी -जल्दी अंदर-बाहर करने लगती है।
रज़िया की चूत जीशान के लण्ड से जितनी खुल रही थी, उतना ही उसका मुँह भी खुल रहा था और वो सोफिया की चूत के दाने को काटती हुई अपनी बेटी की चूत को चाटती जा रही थी। पूरे रूम में साँस की और पच-पच की आवाज़ गूंजने लगती है।
रज़िया-“जीशान आराम से ना… मार दोगे क्या? आह्ह… अंदर तक चुभ रहा है आह्ह… गलपप्प…” जितने जोर से जीशान रज़िया की चूत में धक्का मारता, उतने जज़्बात से रज़िया सोफिया की चूत को मुँह में पकड़कर चाटने लगती
जीशान-“रज्जो आज मैं बहुत खुश हूँ आह्ह… आज मत रोक मुझे आह्ह…”
रज़िया-“रोक कौन रहा है जी… बस थोड़ा धीरे करो ना उन्ह… बच्चेदानी तक पहुँच रहा है ईईई आह्ह…”
जीशान-“क्या कभी मेरे अब्बू यहाँ तक पहुँच पाए थे रज्जो?”
रज़िया-“नहीं , कभी नहीं । वो यहाँ तक कभी नहीं पहुँच सके आह्ह…” जीशान के दमदार झटकों के ताव ना संभालती हुई रज़िया जीशान को अपनी छाती से चिपका लेती है, और उसके लण्ड पर इतनी जोर से झड़ने लगती है, जैसे मूत रही हो।
रज़िया का जिस्म झटके खाने लगता है। अपनी दोनों पोतियों के सामने इस तरह पोते से चुदना ये हर किसी को नशीब नहीं होता। इस ख्याल से ही उसके चूत ढेर सारा पानी छोड़ने लगती है।
मगर जीशान एक पठान की औलाद था। वो इतने जल्दी मैदान छोड़ने वालों में से नहीं था। जीशान रज़िया की चूत से लण्ड बाहर निकालकर सोफिया के मुँह में ठूँस देता है-“ले चाट इसे… आपी इसमें तेरी अम्मी की चूत का रस भी लगा हुआ है। पीकर बता मुझे कैसा है?”
सोफिया एक नजर रज़िया की तरफ देखती है और दूसरे ही पल जीशान का लण्ड उसके मुँह में होता है। वो चटखारे मारती हुई जीशान के लण्ड पर से रज़िया की चूत का सारा पानी चाटने लगती है-गलपप्प-गलपप्प। सोफिया कहती है-“इससे मीठी चीज मैंने आज तक नहीं चखि जीशान गलपप्प-गलपप्प…”
नग़मा सोफिया की चूत चाट-चाटकर इतनी गरम कर चुकी थी कि उसपर अगर हाथ रखे तो वो भी जल जाए। उस वक्त उसे सिर्फ़ एक चीज राहत दे सकती थी, और वो था जीशान का लौड़ा। और जीशान भी वही करता है, वो सोफिया को कुतिया बनाकर पीछे से दोनों चूत ड़ों को हाथ में थामकर दन्न से अपने लण्ड को सोफिया की चूत में उतार देता है।
सोफिया-“अम्म्मी आह्ह… और जोर से आह्ह… मुझे अपनी कोख में आपकी निशानी चाहिए जीशान… ऐसे करो मुझे कि मैं बहोश हो जाऊूँ उन्ह…”