जीशान का इंतजार घर में हो रहा था। मगर जीशान का कोई अता-पता नहीं था, उसका सेल भी आफ आ रहा था। एक तरफ जहाँ अनुम और रज़िया परेशान थे, वहीं लुबना का दिल भी जोर-जोर से धड़क रहा था। वो जीशान से सख़्त नाराज थी, मगर उसकी गैर मौजूदगी उसे भी अंदर ही अंदर खाये जा रही थी।
रात के 12:00 बजे
डोरबेल बजते ही अनुम लपक के दरवाजा खोलती है, सामने जीशान खड़ा था।
उसके चेहरे से साफ दिखाई दे रहा था कि उसका मूड सख़्त आफ है। जीशान अंदर आता है और बिना कुछ बोले, बिना किसी से मिले , सीधा अपने रूम में चला जाता है।
रज़िया उसके पीछे जाती है। मगर जीशान दरवाजा जोर से बंद कर लेता है।
अनुम और रज़िया एक दूसरे को देखते रह जाते हैं। रज़िया इशारे से अनुम को कहती है-“सबर कर अभी वो गुस्से में है, सुबह बात करेंगे…”
रज़िया किसी तरह समझा बुझा के लुबना को खाना खिलाने में कामयाब तो हो जाती है, मगर हर निवाले के साथ लुबना के आँसू भी आँखों से बह रहे थे। रज़िया उसे जी भरकर रो लेने देना चाहती थी। किसी तरह वो मनहूस रात तो गुजर जाती है।
जब सुबह अनुम जीशान के रूम का दरवाजा धकेलती है तो उसे दरवाजा खुला मिलता है। अनुम अंदर जाकर देखती है, तो जीशान गहरी नींद में सोया हुआ था। अनुम उसके पास आकर बैठ जाती है। बड़े ही गौर से वो जीशान का चेहरा देखने लगती है। आज उसे जीशान के चेहरे में अमन ख़ान नहीं बल्की अपना हमसफर नजर आ रहा था। आज जीशान का चेहरा उसके दिल की गहराईयों में समाता चला जा रहा था। वो जीशान के माथे को जैसे ही चूमती है, उसके होंठ जैसे जल जाते हैं।
अनुम रज़िया के पास भागती हुई किचेन में आती है। वहीं लुबना भी थी और रज़िया के साथ काम में हाथ बटा रही थी।
रज़िया-क्या हुआ अनुम?
अनुम-अम्मी अम्मी वो?
रज़िया-अरे बता भी क्या हुआ?
अनुम-अम्मी आप मेरे साथ चलिए।
रज़िया अनुम के साथ जीशान के रूम में चली जाती है। पीछे-पीछे लुबना भी चली आती है। रज़िया जैसे ही जीशान के माथे पर हाथ रखती है, उसका दिल जोर से धड़कता है। जीशान का माथा आग के गोले की तरह जल रहा था, उससे तेज बुखार था।
अनुम जल्दी से डाक्टर को काल करती है।
डाक्टर जब बुखार देखते हैं, तो पता चलता है कि जीशान को 105° बुखार है। डाक्टर कुछ इजेक्सन जीशान को लगाते हैं, और अनुम से उसके माथे पर गीली पट्टियाँ रखने के लिए कहते हैं।
एक तरफ से अनुम, दूसरी तरफ से रज़िया और पाँव की तरफ से लुबना बैठकर जीशान के जिस्म को ठंडा करने के कोशिश करने बैठ जाते हैं। तीनों औरतें लगातार जीशान के माथे और पैर के तलवो को ठंडे पानी से गीले कपड़े से ठंडा करती रहती हैं। आखिर एक घंटे बाद जीशान का बुखार कुछ कम हो जाता है।
जब जीशान आँखें खोलता है तो अपने आस-पास सभी को देखकर हैरान हो जाता है।
अनुम-अब कैसा लग रहा है जीशान ?
जीशान-चले जाइए आप दोनों मेरे रूम से।
रज़िया-“जीशान , क्या हुआ बेटा? तुम्हें तेज बुखार आ गया था, सभी कब से तुम्हारे सिर पर ठंडा कपड़ा रख कर बुखार कम कर रहे हैं…”
जीशान चिल्लाते हुये-“मैं कहता हूँ चले जाइए आप दोनों यहाँ से अभी के अभी, वरना मैं खुद बाहर चला जाउन्गा घर के…”
अनुम और लुबना बेड से उठ जाती हैं, और बड़ी उम्मीद भरी नजरों से जीशान की तरफ देखने लगती हैं।
रज़िया-ऐसा क्या हो गया जीशान ? क्यों ऐसा कह रहे हो?
जीशान-“बे-मुरव्वत बे-हिस लोगों को मैं देखना भी नहीं चाहता। और तुम लुबना, तुम्हें तो मुझ पर बहुत गुस्सा था ना, चली जाओ और आइन्दा मेरे सामने भी मत आना। आप भी जाइए यहाँ से, कोई नहीं चाहिए मुझे। जिंदा हूँ , मैं मर जाउन्गा तो पता चल जाएगा आप दोनों को…”
अनुम मुँह पर दुपट्टा रख कर रोती हुई वहाँ से चली जाती है। लुबना भी आँखों में आँसू लिए अपने रूम में जाकर सिसक के रोने लगती है।
रज़िया-मैं भी जाऊूँ?
जीशान-नहीं , आप मत जाओ।
रज़िया गीला कपड़ा जीशान के माथे पर रखती हुई-“क्या गलती हो गई मेरी बच्चियों से, जो तुम उन्हें इतना डाँट रहे हो?”
जीशान-“आपकी बेचारी बच्ची को मैंने रिंग पहनाया था, मगर उन्हें अपनी बेटी की मोहब्बत याद आ गई, और मेरी रिंग निकालकर मेरे मुँह पर दे मारी आपके बेटी ने, और आप उनकी हिमायत कर रही हैं…”
अनुम दरवाजे के पास से-“मैंने रिंग नहीं फेंकी थी आपके मुँह पर…” उसकी आवाज़ भरी थी, जैसे बहुत जब्त करके कह रही हो।
रज़िया उठकर अनुम के पास चली जाती है, और धीरे से अनुम को कहती है-“अनुम, तुम अभी अपने रूम में जाओ, मैं जीशान से बात करती हूँ …”
अनुम अपने रूम में चली जाती है, और रज़िया बेड पर आकर बैठ जाती है। वो जीशान की टाँगों के पास बैठी हुई थी।
रज़िया-“मेरी जान को बुखार चढ़ गया है, अभी सारी गर्मी खींच लेती हूँ मेरी जान की…” कहकर रज़िया जीशान की पैंट शर्ट निकालकर फेंक देती है, और अपने ऊपर के कमीज भी उतार देती है।
जीशान रज़िया को ही देख रहा था-बुखार है मुझे?
रज़िया जीशान का लण्ड पकड़ती हुई-“बुखार में तो मर्द ख़ूँख़ार हो जाते हैं। मेरी जान के होंठ बुखार से सूख गये हैं…”
जीशान रज़िया को अपने ऊपर खींच लेता है-“तो अब गीले कर इसे रज्जो…”
रज़िया-“वही तो करने आई हूँ जी…” और रज़िया अपनी शलवार का नाड़ा खोलकर नीचे गिरा देती है। फिर पैर घुमाकर अपनी चूत को जीशान के होंठों की तरफ कर देती है। जीशान का लण्ड रज़िया के मुँह की तरफ और रज़िया के गीली चमकती हुई चूत जीशान के होंठों के तरफ आ जाती है।