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अलिफ लैला की रहस्यमई कहानियाँ

किस्सा काले द्वीपों के बादशाह का

उस जवान ने अपना वृत्तांत कहना आरंभ किया। उसने कहा 'मेरे पिता का नाम महमूद शाह था। वह काले द्वीपों का अधिपति था, वे काले द्वीप चार विख्यात पर्वत हैं। उसकी राजधानी उसी स्थान पर थी जहाँ वह रंगीन मछलियों वाला तालाब है। मैं आपको ब्योरेवार सारी कहानी बता रहा हूँ जिससे आपको सारा हाल मालूम हो जाएगा। जब मेरा पिता सत्तर वर्ष का हुआ तो उसका देहांत हो गया और उसकी जगह मैं राजसिंहासन पर बैठा। मैंने अपने चाचा की बेटी के साथ विवाह किया। मैं उसे बहुत चाहता था और वह भी मुझे बहुत चाहती थी।

'पाँच वर्ष तक हम लोग सुखपूर्वक रहे फिर मुझे आभास हुआ कि उसका मेरे प्रति पहले जैसा प्रेम नहीं है। एक दिन दोपहर के भोजन के पश्चात वह स्नानगृह को गई और मैं अपने शयन कक्ष में लेटा रहा। दो दासियाँ जो रानी को पंखा झला करती थीं मेरे सिरहाने-पैंतानें बैठ गईं और मुझे आराम देने के लिए पंखा झलने लगीं। वे मुझे सोता जान कर धीमे-धीमे बातचीत करने लगीं। मैं सोया नहीं था किंतु उनकी बातें सुनने के लिए सोने का बहाना करने लगा। एक दासी बोली कि हमारी रानी बड़ी दुष्ट है कि ऐसे सुंदर और सुशील पति को प्यार नहीं करती। दूसरी बोली तू ठीक कहती है; रात में बादशाह को अकेला सोता छोड़ कर रानी न जाने कहाँ जाती हैं और बेचारे बादशाह को कुछ पता नहीं चलता। पहली ने कहा यह बेचारा जाने भी कैसे, रानी रोज रात को उसके शर्बत में कोई नशा मिलाकर उसे दे देती है, यह नशे से बिल्कुल बेहोश हो जाता है और रानी जहाँ चाहती है चली जाती है और प्रातः काल के कुछ पहले आकर इसे होश में लाने की सुगंधि सुँघा देती है।

'मेरे बुजुर्ग दोस्त, मुझे यह सुनकर इतना दुख हुआ कि उसे वर्णन करना मेरी सामर्थ्य के बाहर है। उस समय मैंने अपने क्रोध को सँभालना उचित समझा और, कुछ देर में इस तरह अँगड़ाइयाँ लेता हुआ उठा जैसे सचमुच सो रहा था। कुछ देर में रानी भी स्नान करके वापस आ गई। उस रात को भोजन के उपरांत में शयन करने के लिए लेटा तो रानी हमेशा की तरह मेरे लिए शर्बत का प्याला लाई। मैंने प्याला ले लिया और उसकी आँख बचा कर खिड़की से बाहर फेंक दिया और खाली प्याला उसके हाथ में ऐसे दे दिया जैसे कि मैंने पूरा शर्बत पी लिया है। फिर हम दोनों पलँग पर लेट गए। रानी ने मुझे सोता समझ कर पलँग से उठकर एक मंत्र जोर से पढ़ा और मेरी तरफ मुँह फेर कर कहा कि तू ऐसा सो कि कभी न जागे।

'फिर वह भड़कीले वस्त्र पहन कर कमरे से निकल गई। मैं भी पलँग से उठा और तलवार लेकर उसका पीछा करने लगा। वह मेरे केवल थोड़ा ही आगे थी और उसकी पग ध्वनि मुझे सुनाई दे रही थी। लेकिन मैं ऐसे धीरे-धीरे पाँव रख कर उसके पीछे-पीछे चल रहा था कि उसे मेरे आने का कोई आभास न मिले। वह कई द्वारों से होकर निकली। उन सभी में ताला लगे थे किंतु उसकी मंत्र-शक्ति से सभी ताले खुलते जा रहे थे। आखिरी दरवाजे से निकलकर जब वह बाग में गई तो मैं दरवाजे के पीछे छुप कर देखने लगा कि क्या करती है। वह बाग से आगे बढ़कर एक छोटे से वन के अंदर चली गई जो चारों ओर झाड़ियों से घिरा हुआ था। मैं भी एक अन्य मार्ग से होकर उस वन के अंदर चला गया और इधर-उधर आँखें घुमाकर उसे ढूँढ़ने लगा।

'कुछ देर में मैंने देखा कि वह एक पुरुष के साथ, जो हब्शी गुलाम लग रहा था, हाथ में हाथ दिए टहल रही है और शिकायत कर रही है कि मैं तो तुम्हें प्राणप्रण से प्रेम करती हूँ और रात-दिन तुम्हारे ही ध्यान में मग्न रहती हूँ और तुम्हारा यह हाल है कि मुझसे सीधे मुँह बात नहीं करते, हमेशा मुझे बुरा-भला कहा करते हो। आखिर तुम क्या चाहते हो? क्या तुम मेरे प्रेम की परीक्षा लेना चाहते हो? तुम मेरी शक्ति जानते हो। मेरे अंदर इतनी शक्ति है कि कहो तो सूर्योदय के पहले ही इन सारे महलों को भूमिगत कर दूँ और यह सारा ठाट-बाट बिल्कुल वीरान कर दूँ और यहाँ भेड़िये और उल्लुओं के अलावा कोई नहीं दिखाई दे और जो पत्थर यहाँ महलों में लगे हैं वह काफ पर्वत पर वापस उड़कर चले जाएँ। इतनी शक्ति रखते हुए भी मैं प्रेम के कारण तुम्हारे पैरों पर गिरी रहती हूँ और तुम्हें मेरी परवा ही नहीं।

'रानी यह बातें करती हुई अपने हब्शी प्रेमी के हाथ में हाथ दिए टहलती आ रही थी। जब वे लोग उस झाड़ी के पास पहुँचे जहाँ मैं छुपा हुआ था तो मैंने बाहर निकल कर हब्शी की गर्दन पर पूरे जोर से तलवार का वार किया। वह लड़खड़ा कर गिर गया। मैंने समझा कि वह मर गया और मैं अँधेरे में वहाँ से खिसक गया। मैंने रानी को छोड़ दिया क्योंकि वह मुझे प्यारी भी थी और मेरे चचा की बेटी भी। रानी अपने प्रेमी को गिरता देख कर विह्वल हो गई। उसने मंत्र बल से अपने प्रेमी को स्वस्थ करना चाहा किंतु वह केवल उसे मरने से बचा सकी। उस हब्शी की हालत ऐसी हो गई थी कि उसे न जीवित कहा जा सकता था न मृत। मैं धीरे-धीरे महल को लौटा। लौटते समय भी मैंने सुना कि रानी अपने प्रेमी के घायल होने पर करुण क्रंदन कर रही है। मैं उसे उसी तरह रोता-पीटता छोड़कर अपने शयन कक्ष में आया और पलँग पर लेट कर सो रहा।

'प्रातःकाल जागने पर मैंने रानी को फिर अपनी बगल में सोता पाया। यह स्पष्ट था कि वह वास्तव में सो नहीं रही थी केवल सोने का बहाना कर रही थी। मैं उसे यूँ ही छोड़ कर उठ खड़ा हुआ मैं अपने नित्य कर्मों को पूरा करके राजसी वस्त्र पहन कर अपने दरबार को चला गया। जब दिन भर राजकाज निबटाने के बाद मैं अपने महल में आया कि रानी ने शोक संताप सूचक काले वस्त्र पहन रखे हैं और बाल बिखराए हुए हैं और उन्हें नोच रही है। मैंने उससे पूछा कि यह तुम कैसा व्यवहार कर रही हो, यह संताप प्रदर्शन किस कारण है। वह बोली बादशाह सलामत, मुझे क्षमा करें मैंने आज तीन शोक समाचार पाए हैं इसीलिए काले कपड़े पहन मातम कर रही हूँ। मैंने पूछा कि वे कौन से समाचार हैं तो उसने बताया कि मेरी माता का देहांत हो गया, मेरे पिताजी एक युद्ध में मारे गए और मेरा भाई ऊँचाई से गिर कर मर गया। मैंने कहा समाचार बुरे हैं लेकिन तुम्हारे इस प्रकार मातम करने के लायक नहीं हैं, फिर भी वे तुम्हारे संबंधी थे और तुम्हें उनकी मृत्यु का शोक होना ही चाहिए।

'इसके बाद वह अपने कमरे में चली गई और मुझसे अलग होकर उसी प्रकार रोती-पीटती रही मैं उसके दुख का कारण जानता था इसलिए मैंने उसे समझाने बुझाने की चेष्ट भी न की। एक वर्ष तक यही हाल रहा। फिर उसने कहा कि मुझसे दुख नहीं सँभलता, मैं एक मकबरा बनवाकर उसमें रात दिन रहना चाहती हूँ। मैंने उसे ऐसा करने की भी अनुमति दे दी। उसने एक बड़ा भारी गुंबद वाली मकबरे जैसी इमारत बनवाई जो यहाँ से दिखाई देती है और उसका नाम शोकागार रखा। जब वह गृह बन चुका तो उसने अपने घायल प्रेमी हब्शी को वहाँ लाकर रखा और स्वयं भी वहाँ रहने लगी। वह दिन में उसे एक बार कोई औषधि खिलाती थी और जादू-मंत्र भी करती थी। फिर भी उसे ऐसा प्राणघातक घाव लगा था कि औषधि और मंत्रों के बल पर उसके केवल प्राण अटके हुए थे। वह न चल पाता था, न बोल पाता था, सिर्फ रानी की ओर टुक-टुक देखा करता था।

'रानी के प्रेम को जीवित रखने के लिए इतना ही यथेष्ट था। वह उससे घंटों प्रेम की बातें करके अपने चित्त को सांत्वना दिया करती थी। दिन में दो बार उसके समीप जाती थी और देर तक उसके पास बैठी रहती थी। मैं जानता था कि वह क्या करती है फिर भी सारे कार्य कलाप ऐसे साधारण रूप से करता रहा जैसे मुझे कोई बात विदित नहीं है। किंतु एक दिन मैं अपनी उत्सुकता नहीं रोक सका और मैंने जानना चाहा कि वह अपने प्रेमी के साथ क्या करती है। मैं उस मकबरे में ऐसी जगह छुप कर बैठ गया जहाँ से रानी और उसके प्रेमी की सारी बातें दिखाई-सुनाई दें लेकिन उनमें से कोई मुझे न देख सके।

'रानी अपने प्रेमी से कहने लगी कि इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि मैं तुम्हें ऐसी विवशता की अवस्था में देखती हूँ। तुम सच मानो, तुम्हारी दशा देखकर मुझे इतना कष्ट होता है कि जितना स्वयं तुम्हें भी नहीं होता होगा। मेरे प्राण, मेरे जीवनधार, मैं तुम्हारे सामने घंटों बैठी बातें करती हूँ और तुम मेरी एक बात का भी उत्तर नहीं देते। अगर तुम मुझसे एक बात भी करो तो मेरे चित्त को बड़ा धैर्य मिले बल्कि मुझे बड़ी प्रसन्नता हो। खैर, मैं तो तुम्हें देखकर ही धैर्य धारण किए रहती हूँ।

'रानी इसी प्रकार अपने प्रेमी के सम्मुख बैठ कर प्रलाप करती रही। मुझ मूर्ख से अपने रानी की यह दशा न देखी गई और उसका प्रेम मेरे हृदय में फिर उमड़ आया। मैं चुपचाप अपने महल में आ गया। कुछ देर में वह किसी काम से महल में आई तो मैंने कहा कि अब तुम ने अपने सगे संबंधियों के प्रति बहुत शोक व्यक्त कर लिया, अब साधारण रूप से रानी जैसा जीवन बिताओ। वह रोकर कहने लगी कि बादशाह सलामत मुझसे यह करने के लिए न कहें। मैं उसे जितना समझाता-बुझाता था उतना ही उसका रोना-पीटना बढ़ता जाता था। मैंने उसे उसके हाल पर छोड़ दिया।

'वह इसी अवस्था में दो वर्ष और रही। मैं एक बार फिर शोकागार में गया कि रानी और हब्शी का हाल देखूँ। मैं फिर छुप कर बैठ गया और सुनने लगा। रानी कह रही थी कि प्यारे, अब तो दो वर्ष बीत गए हैं और तीसरा वर्ष लग गया है तुमने मुझसे एक बात भी नहीं की। मेरे रोने-चिल्लाने और विलाप करने का तुम्हारे हृदय पर कोई प्रभाव नहीं होता। जान पड़ता है कि तुम मुझे बात करने के योग्य नहीं समझते। इसीलिए तुम अब मुझे देखकर आँखें भी बंद कर लेते हो। मेरे प्राणप्रिय, एक बार आँखें खोल कर मुझे देखो तो। मैं तुम्हारे प्रेम में कितनी विह्वल हो रही हूँ।

'रानी की यह बातें सुनकर मेरे तन बदन में आग लग गई। मैं उस मकबरे से बाहर निकल आया और गुंबद की तरफ मुँह करके कहा ओ गुंबद तू इस स्त्री और उसे प्रेमी को जो मनुष्य रूपी राक्षस है निगल क्यों नहीं जाता। मेरी आवाज सुनकर मेरी रानी जो अपने हब्शी प्रेमी के पास बैठी थी क्रोधांध हो कर निकल आई और मेरे समीप आकर बोली अभागे दुष्ट तेरे कारण ही मुझे वर्षों से शोक ने जकड़ रखा है, तेरे ही कारण मेरे प्रिय की ऐसी दयनीय दशा हो गई है और वह इतनी लंबी अवधि से घायल पड़ा है। मैंने कहा हाँ मैंने ही इस कुकर्मी राक्षस को मारा है, यह इसी योग्य था और तू भी इस योग्य नहीं कि जीवित रहे क्योंकि तूने मेरी सारी इज्जत मिट्टी में मिला दी है।

'यह कहकर मैंने तलवार खींच ली और चाहा कि रानी की हत्या कर दूँ किंतु उसने कुछ ऐसा जादू किया कि मेरा हाथ उठ ही न सका। फिर उसने धीरे-धीरे कोई मंत्र पढ़ना आरंभ किया जिसे मैं बिल्कुल न समझ पाया। मंत्र पढ़ने के बाद वह बोली अब मेरे मंत्र की शक्ति देख, मैं आज्ञा देती हूँ कि तू कमर से ऊपर जीवित मनुष्य रह और कमर से नीचे पत्थर बन जा। उसके यह कहते ही मैं वैसा ही बन गया जैसा उसने कहा था अर्थात मैं न जीवित लोगों में रहा न मृतकों में। फिर उसने शोकागार से उठवाकर मुझे इस जगह लाकर रख दिया। उसने मेरे नगर को तालाब बना दिया और वहाँ एक भी मनुष्य नहीं रहने दिया। मेरे सभी दरबारी, प्रजाजन मेरे प्रति निष्ठा रखते थे अतएव उसने उन सबको अपने जादू से मछलियों में बदल दिया। इन में जो सफेद रंग की मछलियाँ हैं वे मुसलमान हैं, लाल रंग वाली अग्निपूजक, काली मछलियाँ ईसाई और पीले रंग वाली यहूदी हैं।

'मैं जिन चार काले द्वीपों का नरेश था उन्हें उस स्त्री ने चार पहाड़ियाँ बनाकर तालाब के चारों ओर स्थापित कर दिया। मेरे देश को उजाड़ और मुझे आधा पत्थर का बनाकर भी उसका क्रोध शांत नहीं हुआ। वह यहाँ रोज आती है और मेरे कंधों और पीठ पर सौ कोड़े इतने जोर से मारती है कि हर चोट पर मेरे खून छलछला आता है। फिर वह बकरी के बालों की बनी एक खुरदरी काली कमली मेरे कंधों की ओर पीठ पर डालती है और उसके ऊपर सोने की तारकशी वाला भारी लबादा डालती है। यह वस्त्र वह मेरे सम्मान के लिए नहीं बल्कि मुझे पीड़ा पहुँचाने के लिए करती है और मेरा मजाक उड़ाकर कहती है कि दुष्ट तू तो चार-चार द्वीपों का बादशाह है फिर अपने को इस अपमान और दुर्दशा से क्यों नहीं बचाता।'

शहरजाद ने कहानी जारी रखते हुए कहा कि इतना वृत्तांत बताने के बाद काले द्वीपों के बादशाह ने दोनों हाथ आकाश की ओर उठाए और बोला, 'हे सर्वशक्तिमान परमात्मा, हे समस्त विश्व के सिरजन हार, यदि तेरी प्रसन्नता इसी में है कि मुझ पर इसी प्रकार अन्याय और अत्याचार हुआ करे तो मैं इस बात को भी प्रसन्नता से सहूँगा। मैं हर हालत में तुझे धन्यवाद दूँगा। मुझे तेरी दयालुता और न्याय प्रियता से पूर्ण आशा है कि तू एक न एक दिन मुझे इस दारुण दुख से अवश्य छुड़ाएगा।

वहाँ आने वाले खोजकर्ता बादशाह ने जब यह सारी कहानी सुनी तो उसे बड़ा दुख हुआ और वह विचार करने लगा कि इस निर्दोष जवाब बादशाह का दुख कैसे दूर किया जाए और उसकी कुलटा रानी को कैसे दंड दिया जाए। उसने उससे पूछा कि तुम्हारी निर्लज्ज रानी कहाँ रहती है और उसका अभागा प्रेमी जिसके पास वह रोज जाती है किस स्थान पर पड़ा हुआ है। जवान बादशाह ने उससे कहा कि मैंने आपको पहले ही बताया था कि वह उस शोकागार में रखा गया है जिस पर एक गुंबद बना हुआ है। उस शोकागार को एक रास्ता इस कमरे से नीचे होकर भी है जहाँ इस समय हम लोग हैं। वह जादूगरनी कहाँ रहती है यह बात मुझे ज्ञात नहीं है, किंतु प्रति दिवस प्रातः काल वह मेरे पास मुझे दंड देने के लिए आती है और मेरी मारपीट करने के बाद फिर अपने प्रेमी के पास जाकर उसे कोई अरक पिलाती है जिससे वह जीवित बना रहता है।

आगंतुक बादशाह ने कहा कि वास्तव में तुमसे अधिक दया योग्य व्यक्ति नहीं होगा, तुम्हारा जीवन वृत्त तो ऐसा है कि इसे इतिहास में लिख कर अमिट कर दिया जाए। तुम अधिक चिंता न करो। मैं तुम्हारे दुख के निवारण का भरसक प्रयत्न करूँगा। इसके बाद आगंतुक बादशाह उसी कक्ष में सो रहा। क्योंकि रात का समय हो गया था। बेचारा काले द्वीपों का बादशाह उसी प्रकार बैठा रहा और जागता रहा। स्त्री के जादू ने उसे लेटने और सोने के योग्य ही नहीं रखा था।

दूसरे दिन तड़के ही आगंतुक बादशाह गुप्त मार्ग से शोकागार में प्रविष्ट हो गया। शोकागार में सैकड़ों स्वर्ण दीपक जल रहे थे और वह ऐसा सजा हुआ था कि बादशाह को अत्यंत आश्चर्य हुआ। फिर वह उस स्थान पर गया जहाँ घायल अवस्था में रानी का हब्शी प्रेमी पड़ा हुआ था। वहाँ जाकर उसने तलवार का ऐसा हाथ मारा कि वह अधमरा आदमी तुरंत मर गया। बादशाह ने उसका शव घसीट कर पिछवाड़े बने हुए एक कुएँ में डाल दिया और शोकागार में वापस आकर नंगी तलवार अपने पास छुपाकर उस हब्शी की जगह खुद लेटा रहा ताकि रानी के आने पर उसे मार सके।

थोड़ी देर में जादूगरनी उसी भवन में पहुँची जहाँ काले द्वीपों का बादशाह पड़ा हुआ था। उसने उसे इस बेदर्दी से मारना शुरू किया कि सारी इमारतें उसकी चीख पुकार और आर्तनाद से गूँजने लगीं। वह चिल्ला-चिल्ला कर हाथ रोकने और दया करने की प्रार्थना करता रहा किंतु वह दुष्ट उसे बगैर सौ कोड़े मारे न रही। इसके बाद सदा की भाँति उस पर खुरदरी कमली और उसके उपर जरी का भारी लबादा डाल कर शोकागार में आई और बादशाह के सन्मुख, जिसे वह अपना प्रेमी समझी थी, बैठकर विरह व्यथा कहने लगी।

वह बोली, 'प्रियतम मैं कितनी अभागी हूँ कि तुझे प्राणप्रण से चाहती हूँ और तू है मुझ से तनिक भी प्रेम नहीं करता। मेरा दिन रात चैन हराम है। तू अपने कष्टों का कारण मुझे ही समझा करता है।

यद्यपि मैंने तेरे लिए अपने पति पर कैसा अत्याचार और अन्याय किया है। फिर भी मेरा क्रोध शांत नहीं हुआ है और मैं चाहती हूँ कि उसे और कठोर दंड दूँ क्योंकि उसी अभागे ने तेरी ऐसी दशा की है। लेकिन तू तो मुझसे कुछ कहता ही नहीं, हमेशा होठ सिए रहता है। शायद तू चाहता है कि अपनी चुप्पी से ही मुझे इतना व्यथित कर दे कि मैं तड़प कर मर जाऊँ। भगवान के लिए अधिक नहीं तो एक बात तो मुझसे कर ले कि मेरे दुखी मन को सांत्वना मिले।'

बादशाह ने उनींदे स्वर में कहा, 'लाहौल बला कुव्वत इला बिल्ला वहेल वि अली वल अजीम (सर्वोच्च और महान परमात्मा के अलावा कोई न शक्तिमान है न डरने योग्य) बादशाह ने घृणा पूर्वक यह आयत पढ़ी थी क्योंकि इस्लामी विश्वास के अनुसार इस आयत को पढ़ने से शैतान भाग जाता है; किंतु रानी के लिए कुछ भी सुनना सुखद आश्चर्य था। वह बोली कि प्यारे यह सचमुच तू बोला था कि मुझे कुछ धोखा हुआ है। बादशाह ने हब्शियों के से स्वर में घृणा पूर्वक कहा, 'तुम इस योग्य नहीं हो कि तुम से बात करूँ या तुम्हारे किसी प्रश्न का उत्तर दूँ।' रानी बोली 'प्राण प्रिय, मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ है जो तुम ऐसा कह रहे हो।' बादशाह ने कहा, 'तुम बहुत जिद्दी हो, किसी की नहीं सुनती इसलिए मैंने कुछ नहीं कहा। अब पूछती हो तो कहता हूँ। तुम्हारे पति के रात दिन चिल्लाने से मेरी नींद हराम हो गई है। अगर उसकी चीख पुकार न होती तो मैं कब का अच्छा हो गया होता और खूब बातचीत कर पाता। लेकिन तूने एक तो उसे आधा पत्थर का बना दिया है और फिर उसे रोज इतना मारा भी करती है। वह कभी सो नहीं पाता और रात दिन रोया और कराहा करता है और मेरी नींद भी नहीं लगने देता। अब तू खुद ही बता क्या तुझसे बोलूँ और क्या बात करूँ।

जादूगरनी ने कहा कि तुम क्या यह चाहते हो कि मैं उसे मारना बंद कर दूँ और उसे पहले जैसी स्थिति में ले आऊँ। अगर तुम्हारी खुशी इसी में है तो मैं अभी ऐसा कर सकती हूँ। हब्शी बने हुए बादशाह ने कहा कि मैं सचमुच यही चाहता हूँ कि तू इसी समय जाकर उसे दुख से पूरी तरह छुड़ा दे ताकि उसकी चीख पुकार से मेरे आराम में विघ्न न पड़े। रानी ने शोकागार के एक कक्ष में जाकर एक प्याले में पानी लेकर उस पर कुछ मंत्र फूँका कि वह उबलने लगा। फिर वह उस कक्ष में गई जहाँ उसका पति था और उस पर वह पानी छिड़क कर बोली, 'यदि परमेश्वर तुझसे अत्यंत अप्रसन्न है और उसने तुझे ऐसा ही पैदा किया है तो इसी सूरत में रह किंतु यदि तेरा स्वाभाविक रूप यह नहीं है तो मेरे जादू से अपना पूर्व रूप प्राप्त कर ले।' रानी के यह कहते ही वह बादशाह अपने असली रूप में आ गया और प्रसन्न होकर उठ खड़ा हुआ। रानी ने कहा कि तू खैरियत चाहता है तो फौरन यहाँ से भाग जा, फिर कभी यहाँ आया तो जान से मार दूँगी। वह बेचारा चुपचाप निकल गया और एक और इमारत में छुप कर देखने लगा कि क्या होता है।

रानी वहाँ से फिर शोकागार में आई और हब्शी बने हुए बादशाह से बोली कि जो तुम चाहते थे वह मैंने कर दिया अब तुम उठ बैठो जिससे मुझे चैन मिले। बादशाह हब्शियों जैसे स्वर में बोला, 'तुमने जो कुछ किया है उससे मुझे आराम तो मिला है लेकिन पूरा आराम नहीं। तुम्हारा अत्याचार अभी पूरी तरह से दूर नहीं हुआ है और मेरा चैन अभी पूरा नहीं लौटा है। तुमने सारे नगर को उजाड़ रखा है और उसके निवासियों को मछली बना दिया है। हर रोज आधी रात को सारी मछलियाँ पानी से सिर निकाल निकाल कर हम दोनों को कोसा करती हैं इसी कारण मैं निरोग नहीं हो पाता। तुम पहले शहर और उसके निवासियों को पहले जैसा बना दो फिर मुझसे बात करो। यह करने के बाद तुम अपनी बाँह का सहारा देकर मुझे उठाना।'

रानी इस बात पर भी तुरंत राजी हो गई। वह तालाब के किनारे गई और थोड़ा सा अभिमंत्रित जल उस तालाब पर छिड़क दिया। इससे वे सारी मछलियाँ नर नारी बन गई और तालाब की जगह सड़कों, मकानों और दुकानों से भरा नगर बन गया। बादशाह के साथ आए दरबारी और अंग रक्षक जो उस समय तक वापस अपने नगर नहीं गए थे इस प्रकार अपने को अपने देश से बहुत दूर एक बिल्कुल नए शहर में देखकर अत्यंत आश्चर्यन्वित हुए।

सब कुछ पहले जैसा बना कर वह जादूगरनी फिर शोकागार में गई और हँसी खुशी से चहकते हुए कहने लगी कि प्यारे तुम्हारी इच्छानुसार मैंने सब कुछ पहले जैसा ही कर दिया है ताकि तुम पूर्णतः स्वस्थ और निरोग हो जाओ। अब तुम उठो और मेरे हाथ में हाथ देकर चलो। बादशाह ने हब्शियों के स्वर में कहा कि मेरे पास आओ। वह पास गई। बादशाह बोला और पास आओ। वह उसके बिल्कुल पास आ गई। बादशाह ने उछल कर जादूगरनी की बाँहें जकड़ ली और उसे एक क्षण भी सँभलने के लिए न दिया और उस पर इतने जोर से तलवार चलाई कि उसके दो टुकड़े हो गए। बादशाह ने उसकी लाश भी उसी कुएँ में डाल दी जिसमें हब्शी की लाश फेंकी थी। फिर बाहर निकल कर काले द्वीपों के बादशाह को खोजने लगा। वह भी पास के एक भवन में छुपा हुआ उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। आगंतुक बादशाह ने उससे कहा अब किसी का डर न करो, मैंने रानी को ठिकाने लगा दिया है।

काले द्वीपों के बादशाह ने सविनय उसका आभार प्रकट किया और पूछा अब आप का इरादा क्या अपने नगर को जाने का है। उसने जवाब दिया कि नगर ही जाऊँगा लेकिन तुम अभी हमारे साथ चलो, हमारे महल में कुछ दिन भोजन और आराम करो, फिर अपने काले द्वीपों को चले जाना।

जवान बादशाह ने कहा क्या आप अपने नगर को यहाँ से निकट समझे हुए हैं। उसने कहा इसमें क्या संदेह है? मैं तो चार पाँच घड़ी के अंदर ही तुम्हारे महल में आ गया था। काले द्वीपों के बादशाह ने कहा, 'आपका देश यहाँ से पूरे एक वर्ष की राह पर है, उस जादूगरनी ने अपने मंत्र बल से मेरे देश को आपके देश के निकट पहुँचा दिया था। अब मेरा देश फिर अपनी जगह पर वापस आ गया है।'

आगंतुक बादशाह को कुछ चिंता हुई। काले द्वीपों के बादशाह ने कहा, 'यह दूरी और निकटता कुछ बात नहीं है। मैं आपके उपकार से जीवन भर उॠण नहीं हो सकता। आगंतुक बादशाह अब भी चकराया हुआ था कि अपने देश से इतनी दूर कैसे पहुँच गया। काले द्वीपों के बादशाह ने कहा कि आप को इतना आश्चर्य क्यों हो रहा है, आप तो उस स्त्री की जादू की शक्ति स्वयं ही देख चुके हैं। आगंतुक बादशाह ने कहा कि खैर अगर दोनों देशों में इतनी दूरी है तो तुम मेरे देश न जाना चाहो तो न चलो; लेकिन मेरे कोई पुत्र नहीं है इसलिए मैं चाहता हूँ कि मैं तुम्हें अपने देश का युवराज भी बना दूँ ताकि मेरे मरणोपरांत मेरे राज को भी तुम सँभालो।

काले द्वीपों के बादशाह ने यह स्वीकार कर लिया और तीन सप्ताह की तैय्यारी के बाद सेना और कोष का प्रबंध करके आगंतुक बादशाह के साथ उसकी राजधानी के लिए उसके साथ रवाना हुआ। उसने सौ ऊँटों पर भेंट की बहुमूल्य वस्तुएँ लदवाई और अपने पचास विश्वस्त सामंतों और भेंट का सामान लेकर वह आगंतुक बादशाह के साथ उसकी राजधानी की ओर रवाना हुआ। जब उस बादशाह की राजधानी कुछ दिन की राह पर रह गई तो हरकारे भेज दिए गए कि बादशाह के पुनरागमन का निवास उसके भृत्यों और नगर निवासियों को दे दें।

जब वह अपने नगर के निकट पहुँचा तो उसके सारे सरदार और दरबारी उसके स्वागत को नगर के बाहर आए और बादशाह की वापसी पर भगवान को धन्यवाद देने के बाद बताया कि राज्य में सब कुशल है। नगर में पहुँचने पर बादशाह का नगर निवासियों ने हार्दिक स्वागत किया।

बादशाह ने पूरा हाल कह कर काले द्वीपों के बादशाह को अपना युवराज बनाने की घोषणा की और दो दिन बाद उसे समारोह पूर्वक युवराज बना दिया और सामंतों, दरबारियों ने युवराज को भेंट दी। कुछ दिन बाद बादशाह और युवराज में मछुवारे को बुलाकर उसे अपार धन दिया क्योंकि उसी के कारण युवराज का कष्ट कटा था।
 
किस्सा तीन राजकुमारों और पाँच सुंदरियों का

शहरजाद की कहानी रात रहे समाप्त हो गई तो दुनियाजाद ने कहा - बहन, यह कहानी तो बहुत अच्छी थी, कोई और भी कहानी तुम्हें आती है? शहरजाद ने कहा कि आती तो है किंतु बादशाह की अनुमति हो तो कहूँ। बादशाह ने अनुमति दे दी और शहरजाद ने कहना शुरू किया।

खलीफा हारूँ रशीद के राज्य में बगदाद में एक मजदूर रहता था। वह स्वभाव का बड़ा हँसमुख और बातूनी था। एक दिन प्रातःकाल वह बाजार में एक बड़ा टोकरा लिए मजदूरी की आशा में खड़ा था। कुछ देर बाद एक परम सुंदरी स्त्री, जिसके मुँह पर जाली का नकाब पड़ा हुआ था, वहाँ आई और मुस्करा कर मजदूर से कहने लगी कि अपना टोकरा उठा और मेरे साथ चल। मजदूर अच्छी मजदूरी मिलने की आशा और स्त्री के मधुर व्यवहार से प्रसन्न होकर उसके साथ चल दिया। वह इस बात से बहुत ही प्रसन्न हुआ कि सुबह-सुबह ही अच्छा काम मिल गया था। कुछ दूर जाकर स्त्री ने एक मकान के सामने खड़े होकर ताली बजाई। कुछ देर में एक सफेद लंबी दाढ़ी वाले ईसाई ने द्वार खोला। स्त्री ने उसे कुछ रुपए दिए और ईसाई बूढ़े ने उसका आशय समझ कर घर के अंदर से उत्तम मदिरा का एक घड़ा उसे दे दिया। स्त्री ने घड़ा मजदूर के टोकरे में रखवाया और बाजार में आ गई।

बाजार में उसने बहुत-सी वस्तुएँ खरीदीं। इनमें स्वादिष्ट फल यथा सेब, नाशपाती आदि तथा भाँति-भाँति के सुंदर सुगंध वाले फूल, इत्र, स्वादिष्ट अचार, चटनियाँ और मुरब्बे, माँस, सूखे मसाले आदि घूम-घूम कर कई दुकानों से खरीदे। इतनी चीजें उसने लीं कि टोकरे में बिल्कुल जगह न रही। मजदूर कहने लगा, अगर मुझे मालूम होता कि आप इतना सामान खरीदेंगी तो मैं अपने साथ एक घोड़ा बल्कि ऊँट रख लेता।

खैर, मजदूर टोकरा उठाकर स्त्री के साथ चला। काफी दूर जाने के बाद वे दोनों एक विशाल भवन के पास पहुँचे जिसके शिखर बड़े सुंदर बने थे और दरवाजे हाथी दाँत से निर्मित थे। स्त्री ने दरवाजे के आगे खड़े हो कर ताली बजाई। दरवाजा जब तक खुले तब तक मजदूर सोचता रहा कि न मालूम यह स्त्री घर की नौकरानी है या मालकिन, इसके साज-सिंगार से तो यह नहीं मालूम होता कि यह नौकरानी होगी। कुछ ही देर में एक स्त्री ने दरवाजा खोला। मजदूर उसका अनुपम सौंदर्य और मनोहारी भाव देख कर बेसुध-सा होने लगा और सामान से लदा टोकरा उसके सिर से गिरने-गिरने को होने लगा। जो स्त्री उसे बाजार से लाई थी वह कौतुकपूर्वक उसकी बदहवासी का तमाशा देखने लगी लेकिन घर के अंदर से आई हुई स्त्री ने उससे कहा, 'तू खड़ी-खड़ी क्या देख रही है, यह बेचारा सामान के भार से दबा जा रहा है। तू जल्दी से इसे अंदर ले जा और इसका सामान उतरवा।'

मजदूर अंदर गया तो दोनों स्त्रियों ने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया और उसे ले कर एक बड़े मकान में आई। इसके खंभे कीमती लकड़ी के बने थे और एक बड़ा कक्ष था जिसके चारों ओर दालान थे। दालान में एक और बैठने का स्थान था जहाँ पर बहुत-से मूल्यवान नर्म आसन बिछे थे और सुविधा के भाँति-भाँति के मूल्यवान पात्र रखे हुए थे। सब के बीच में चंदन और अगर की लकड़ी का बना एक बड़ा सिंहासन था। उस पर एक बहुत ही मूल्यवान आसन पड़ा था जिसमें चारों ओर मोतियों और माणिकों की झालर लटक रही थी। इसके अलावा उस विशाल कक्ष में एक संगमरमर का बना हौज था जिसमें फव्वारे छूट रहे थे।

मजदूर यद्यपि दूर तक भारी बोझ लेकर चलने के कारण बहुत थक गया तथापि उस कमरे की सामग्री और सजावट देख कर अपना श्रम भूल गया और वह प्रसन्न चित से इस शोभा को देखने लगा। विशेषतः उसे सिंहासन पर बैठी हुई अतीव सुंदर स्त्री ने बहुत आकृष्ट किया। उसे बाद में मालूम हुआ कि सिंहासन पर बैठी स्त्री का नाम जुबैदा है, वह उस घर की मालकिन है। जिस स्त्री ने दरवाजा खोला था उसका नाम साफी था और जो स्त्री बाजार से उस पर सामान लदवाकर लाई थी उसका नाम अमीना था।

जुबैदा ने कहा, 'बीबियो, इस बेचारे मजदूर के सर से सामान तो उतारो। यह बोझ के मारे मरा जा रहा है।' साफी और अमीना ने मिलकर उसके सिर से टोकरा उतरवाया और उसमें से सामान निकालने लगीं। जुबैदा ने उसे इतना पैसा दिया जो उसकी साधारण मजदूरी से कहीं अधिक था। वह आशा से अधिक मजदूरी पाकर खुश तो बहुत हुआ लेकिन उसका मन वहाँ की वस्तुओं में इतना लगा था कि वह वापस न हुआ। इतने में ही अमीना ने अपने चेहरे से नकाब उतार दिया। मजदूर ने अब तक तो झलक भर देखी थी, अब तो उसे पूरी नजर भर देखा तो ठगा-सा खड़ा रह गया। उसे यह देखकर भी आश्चर्य हुआ कि यद्यपि घर में तीन स्त्रियाँ ही थीं तथापि खाने-पीने की सामग्री इतनी थी जो तीस व्यक्तियों को काफी होती।

मजदूर वहाँ से न हटा तो जुबैदा ने पहले तो सोचा कि वह कुछ देर और सुस्ताना चाहता है, लेकिन जब उसे बहुत देर हो गई तो उसने कहा कि 'क्या बात है, तू जाता क्यों नहीं? क्या तुझे मजदूरी कम मिली है? अमीना, इसे कुछ और पैसे देकर विदा करो।' मजदूर ने कहा, 'मालकिन, मैंने मजदूरी आशा से अधिक पाई है किंतु आपके सम्मुख कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ कि जो मैं कहना चाहता हूँ वह मेरी उद्दंडता है किंतु मुझे आशा है आप मुझे क्षमा करेंगी और मेरी बातों पर नाराज नहीं होंगी। मुझे यहाँ बहुत-सी बातें आश्चर्यजनक लग रही हैं। मैंने आप जैसी रूपवती कोई भी महिला नहीं देखी। मुझे यह देख कर भी बड़ा आश्चर्य हुआ है कि यहाँ कोई पुरुष नहीं है। बगैर पुरुष के स्त्रियों का रहना और बगैर स्त्रियों के पुरुषों का रहना दोनों ही बहुत अजीब बातें हैं।'

मजदूर बातूनी तो था ही इसलिए बोलता चला गया। उसने बगदाद नगर में प्रचलित तरह-तरह की कहावतें सुनाईं। इनमें से एक यह थी कि जब तक चार व्यक्ति एक साथ भोजन न करें भोजन में स्वाद नहीं आता और खाने वाले तृप्त नहीं होते। उसका आशय यह था कि उन स्त्रियों के बीच में वही पुरुष और दूसरे उन तीन के अलावा चौथा व्यक्ति भी वही है, इसलिए भोजन के समय उसे भी खाने के लिए बिठा लिया जाय। जुबैदा उसकी बातें सुन कर हँसने लगी और बोली, 'तू अपनी बेकार की बातें और सलाहें अपने पास रख, हम तीनों स्त्रियाँ बहिनें हैं और अपने सारे काम खुद ही अच्छी तरह चलाती हैं और इस तरह चलाती हैं कि किसी को पता नहीं चलता। हम लोग नहीं चाहते कि कोई हमारे भेद को जाने।'

मजदूर ने कहा, 'मेरी मालकिन, आप तो अत्यंत चतुर और बुद्धिमती हैं लेकिन आप मुझे भी निरक्षर और गँवार न समझें। यह तो भाग्य की बात है कि मुझे पेट पालने के लिए मजदूरी करनी पड़ती है वरना मैंने बहुत-सी इतिहास और ज्ञान की पुस्तकें पढ़ी हैं। आप कहें तो आपको एक कहावत आपकी सेवा में उपस्थित करूँ। यह कहावत है कि बुद्धिमान को चाहिए कि चतुर व्यक्ति से अपना भेद न छुपाए क्योंकि चतुर व्यक्ति को किसी का भेद छुपाए रखना आता है। अगर आप मुझ पर अपना कोई भेद प्रकट करेंगी तो वह ऐसा ही होगा जैसे कोई चीज किसी कमरे में बंद करके ताला लगा दिया जाए और ताले की चाबी खो जाए।

जुबैदा समझ गई कि यह मजदूर बुद्धिमान और पढ़ा-लिखा है और इसका साथ करने में कोई बुराई नहीं और इसे अपने साथ बिठा कर खाना भी खिलाया जा सकता है। फिर भी उसने उसकी बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए मजाक में कहा, 'देखो भाई, हमने तो पैसा और मेहनत लगा कर इस भोजन को तैयार किया है, तुमने तो इस पर कुछ खर्च नहीं किया। फिर तुम्हें अपने खाने में क्यों सम्मिलित करें?' साफी ने भी उससे कहा, 'तुमने यह कहावत तो सुनी होगी कि छूछा किन पूछा।'

इन बातों का बेचारे मजदूर के पास कोई उत्तर न था और उसने कहा कि आप लोग ठीक कहती हैं, मैं जा रहा हूँ। लेकिन अमीना ने अपनी बहनों से उसकी वकालत की और कहा, 'इसे यहीं रहने दो। यह अपनी बातों से हमारा मनोरंजन करेगा और अपने विनोदी स्वभाव के कारण हमें हँसाता रहेगा। तुम्हें नहीं मालूम यह जबर्दस्त किस्म का मसखरा है। बाजार में यहाँ तक सारे रास्ते यह हँसी-मजाक की बातों से मुझे हँसाता आया है।' मजदूर को अमीना की बातें सुनकर बड़ा संतोष हुआ। उसने कहा, 'आप लोगों की बड़ी कृपा होगी अगर मुझे अपने साथ रहने दें। मैं गरीब हूँ किंतु किसी का उपकार मुफ्त में नहीं लेना चाहता। और तो मेरे पास कुछ नहीं लेकिन अपनी कृपा के बदले यह मजदूरी जो आपने मुझे दी है वह स्वीकार कर लीजिए।' यह कहकर मजदूर ने जुबैदा के सामने मजदूरी के पैसे बढ़ा दिए।

जुबैदा ने मुस्कराकर कहा, 'हम दी हुई चीज वापस नहीं लेते। तुम हमारे साथ रह कर हमारे खान-पान में सम्मिलित हो सकते हो। लेकिन शर्त यह है कि हम लोग चाहे जो कुछ करें उसके बारे मे तुम हमसे कुछ नहीं पूछोगे।' मजदूर ने यह स्वीकार कर लिया।

इतने में अमीना ने अपनी बाहर जाने वाली पोशाक उतार दी और तंग कपड़ों में कमर कसे हुए उसने नाना प्रकार के व्यंजन - कलिया, कीमा, कोफ्ता, कोरमा, कबाब और अन्य कई प्रकार के सामिष व्यंजन और उनके अलावा अन्य स्वादिष्ट वस्तुएँ और मदिरा की सुराही और प्याले लाकर उचित स्थानों पर रख दिए। फिर तीनों बहिनें वहाँ आकर बैठ गई और चौथी ओर मजदूर को भी बिठा लिया। मजदूर बड़ा ही प्रसन्न हुआ। उसने थोड़ा-सा भोजन किया। फिर अमीना ने मदिरा की सुराही उठाकर प्याला भरा और अपने देश की रीति के अनुसार पहले स्वयं पिया, फिर अपनी बहनों को दे दिया और चौथा प्याला मजदूर को दिया।

मजदूर ने अमीना का आदरपूर्वक हाथ चूमकर प्याला ले लिया और उसे पीने के पहले इस आशय का एक गीत गाया कि जिस प्रकार इत्र से वायु सुगंधित हो जाती है उसी प्रकार अगर पिलाने वाला मनोरम हो तो मदिरा में नई सुगंध आ जाती है। यह गीत सुनकर तीनों स्त्रियाँ बहुत प्रसन्न हुईं और उन्होंने एक दूसरे के बाद कई गीत शराब के नशे में गाए। इस राग-रंग में बहुत देर हो गई और रात हो गई। साफी ने अपनी बहनों से कहा कि अब तो इस मजदूर को हमने खिला-पिला दिया है, अब इसका कोई काम नहीं, इससे कहो अपने घर जाए। मजदूर को ऐसा सुखद संग छोड़ने में बड़ा दुख हुआ। उसने कहा कि यह मेरे लिए बड़े दुर्भाग्य की बात है कि ऐसी हालत में मुझे घर से निकाला जा रहा है, मैं इस नशे की दशा में किस प्रकार अपने घर पहुँच सकूँगा। कृपया रात भर मुझे यहाँ रहने की अनुमति दें, यहीं किसी कोने में पड़ा रहूँगा।

अमीना ने फिर उसकी वकालत की और कहा, यह बेचारा ठीक कहता है, कहाँ अँधेरे में ठोकरें खाता फिरेगा, हम लोगों ने पहले तो इसे अपने साथ खाने-पीने की अनुमति दे ही रखी है, अब इसे निराश न करो, यहीं पड़ा रहने दो। जुबैदा ने अमीना के कहने पर उसे रहने की अनुमति दे दी लेकिन फिर कहा कि शर्त यही है कि हम भला- बुरा जो भी करें तुम उसके बारे में कुछ पूछताछ नहीं करोगे। मजदूर ने कहा, आप मुझ पर जो भी शर्त लगाएँगी मैं मानूँगा। जुबैदा ने कहा कि हम तुम पर कोई नई शर्त नहीं लगा रहे हैं, उधर देखो क्या लिखा है। मजदूर ने एक दरवाजे के अंदर जाकर देखा तो मोटे-मोटे सुनहरे अक्षरों में लिखा था, 'इस भवन के अंदर जाने वाला कोई व्यक्ति यदि ऐसी बातों के बारे में पूछेगा जिनसे उसका कोई संबंध नहीं है तो उसे बड़ी क्लेशकारक बातें सुनने को मिलेंगी, उसे बड़ा कष्ट होगा और वह बहुत पछताएगा।' मजदूर ने कहा, आप चिंता न करें, मैं अपना मुँह बंद रखूँगा।

फिर अमीना रात का भोजन लाई और चारों ओर दीपक और सुगंधियाँ जलाईं। इससे सारा भवन आलोकित और सुवासित हो गया। इसके बाद तीनों स्त्रियाँ और मजदूर भोजन करने लगे और मदिरा पीकर अपने-अपने क्षेत्र की भाषाओं के गीत गाने लगे और राग-रागिनियाँ छेड़ने लगे। थोड़ी ही देर में ज्ञात हुआ जैसे कोई दरवाजा खोलने को कह रहा है। यह शब्द सुन कर साफी खड़ी हो गई क्योंकि दरवाजा खोलने वही जाती थी। उसने जाकर दरवाजा खोला और कुछ देर में वापस आकर कहा, 'दरवाजे पर एक ही जैसे लगने वाले तीन फकीर खड़े है जुबैदा, तुम उन्हें देख कर बहुत हँसोगी। वे तीनों ही दाहिनी आँख से काने हैं और सभी के सिर, दाढ़ी, मूछें यहाँ तक कि भवें भी मुड़ी हुई हैं। वे इसी समय बगदाद में प्रविष्ट हुए हैं और चाहते हैं कि उन्हें एक रात ठहरने के लिए जगह दे दी जाए, सुबह वे चले जाएँगे। बहन, मेरी प्रार्थना है कि उन्हें यहाँ रहने की अनुमति दे दो। वे रात को यहाँ रह कर हम लोगों का कुछ भला ही करेंगे, हमें किसी प्रकार कष्ट न पहुँचाएँगे।'

जुबैदा ने साफी से कहा, अगर तुम यही चाहती हो तो उन्हें ले आओ लेकिन उन्हें भी हमारे घर पर मेहमानी की शर्त बता देना और कह देना कि अंदर दीवार पर जो कुछ लिखा है उसे पढ़ लें। साफी बहन की अनुमति पाकर प्रसन्नतापूर्वक दौड़ी गई और तीनों फकीरों को लेकर अंदर आ गई। फकीरों ने जुबैदा और अमीना को झुककर सलाम किया। दोनों ने सलाम का जवाब देकर उनकी कुशल-क्षेम पूछी। इसके बाद उन्होंने फकीरों से भोजन करने को कहा।

फकीरों ने मजदूर को देखकर कहा कि यह तो अरब का मुसलमान मालूम होता है। अरब के लोग धर्म के बड़े पक्के होते हैं किंतु यह तो धर्म-विरुद्ध मदिरा पान कर रहा है। मजदूर यह सुनकर बड़ा क्रुद्ध हुआ और बोला, 'तुम लोग कौन बड़े धर्माचारी हो। तुम लोगों ने दाढ़ी-मूँछें मुड़ाकर इस्लाम के नियमों का उल्लंघन नहीं किया? तुम्हें मेरे व्यवहार पर आपत्ति करने और मुझे नसीहत देने का क्या अधिकार है?' स्त्रियों ने कहा कि तुम लोग यह बेकार की बहस छोड़ो और रंग में भंग न करो; लो खाओ-पिओ। फकीर लोग नशे में आए तो बोले, यहाँ कोई बाजा हो तो हम लोग कुछ गाएँ-बजाएँ। साफी ने उन्हें वाद्य ला कर दिए और वे बजाने लगे और वाद्यों के सुरों से सुर मिलाकर गाना शुरू किया। वे लोग इस गाने-बजाने के दरम्यान हँसी-ठट्ठा भी करते और ऊँचे स्वर में वाह- वाह भी करते। इस सबसे बड़ा शोर होने लगा और सारा भवन गूँजने लगा। इसी बीच उन्होंने सुना कि दरवाजे पर फिर कोई ताली बजा रहा है। साफी सदा की भाँति दौड़कर गई कि देखें, अब कौन दरवाजे पर आया है।

शहरजाद ने शहरयार से कहा कि इस जगह कहानी रोक कर मैं आप को यह बताना चाहती हूँ कि इस बार ताली बजाने वाला स्वयं खलीफा हारूँ रशीद था। खलीफा का यह नियम था कि अक्सर रात को वेष बदलकर शहर में निकलता था कि प्रजा का हाल खुद अपनी आँखों से देखे। उस रात को वह अपने महामंत्री जाफर और जासूसों के सरदार मसरूर के साथ बगदाद की गलियों में घूम रहा था। वे तीनों व्यापारियों जैसे वस्त्र पहने हुए थे। जब वे लोग उन स्त्रियों के मकान के पास से गुजरे तो उन्होंने हँसी की ध्वनि और गाने-बजाने का स्वर सुना। खलीफा ने कहा कि घर का दरवाजा खुलवाओ, मैं देखूँ तो कि यहाँ क्या हो रहा है। जाफर ने कहा कि यहाँ कुछ स्त्रियाँ शराब पीकर हँसी- दिल्लगी कर रही हैं, गा-बजा रही हैं, आपका अंदर जाना शोभनीय नहीं है। यह भी हो सकता है कि वे अपने राग-रंग में विघ्न पड़ते देखकर नशे की हालत में आप का कुछ अपमान कर बैठें। किंतु खलीफा ने उसकी सलाह न मानी और आदेश दिया कि तुम जाकर दरवाजा खुलवाओ।

अतएव जाफर ने दरवाजा खुलवाया। साफी ने दरवाजा खोला तो जाफर उसके रूप को देखता रह गया, फिर उसने जल्दी से एक कहानी गढी। उसने कहा, 'सुंदरी, हम तीनों व्यापारी मोसिल नगर के निवासी हैं। हम व्यापार की वस्तुएँ लेकर यहाँ आए हैं और एक सराय में ठहरे हैं। आज की रात को यहाँ के एक व्यापारी ने हमें दावत दी थी। हम उसके घर गए। उसने हमें बड़ा स्वादिष्ट भोजन कराया और उत्तम मदिरा पीने को दी। हम लोग नशे में आ गए तो उसने नृत्यांगनाओं को बुलाकर नाचने की आज्ञा दी। इस राग-रंग में काफी समय हो गया और नशे की हँसी और नाच-गाने से बाहर काफी आवाज जाने लगी। उसी समय संयोगवश शहर का कोतवाल गश्त लेकर उधर से निकला और उसने उस घर पर छापा मार दिया। दरवाजा खुलवा कर उसने सब उलट-पलटकर दिया और कई आदमियों को गिरफ्तार कर लिया। हम लोग जान बचाकर एक दीवार से बाहर कूद गए।'

यह कहकर जाफर ने कहा, 'हम लोग इस शहर में किसी को नहीं जानते, न यहाँ के मार्ग पहचानते हैं। हमें डर लग रहा है कि हम इधर-उधर भटकते हुए सराय पर कैसे पहुँचेंगे। फिर संभव है सराय का दरवाजा बंद हो गया हो और हम रात भर गलियों में भटकते रहें। यह भी संभव है कि वही कोतवाल गश्त लगाता हुआ आ निकले और हम लोगों को बंद कर दे। हमारी दशा बड़ी दयनीय है। सुंदरी, तुम दया करके अनुमति दो तो हम रात भर के लिए तुम्हारे मकान में किसी जगह पड़े रहें। अगर तुम हमें अपनी संगति के योग्य समझो तो हमें अपने गाने-बजाने में शामिल कर लो। हम लोग यह तो समझ गए हैं कि तुम लोग गाने-बजाने में अति निपुण हो। हमें भी संगीत में रुचि है और हम भी अपनी कला से तुम्हारे आमोद-प्रमोद में योग दे सकते हैं।'

साफी ने कहा, मैं इस घर की मालकिन नहीं हूँ; तुम लोग जरा देर यहीं ठहरो, मैं मालकिन से तुम्हारी बात करती हूँ; अगर उसने अनुमति दे दी तो फिर कोई दिक्कत नहीं रहेगी और तुम लोग आराम से यहाँ रात बिता सकोगे। यह कह कर साफी अंदर गई और अपनी बहनों से नए व्यापारियों की दशा और उनकी प्रार्थना की बात की। उन दोनों ने आपस में और साफी के साथ मंत्रणा की और साफी से कहा कि उन्हें भी अंदर ले आओ।

अतएव साफी वहाँ जाकर खलीफा, जाफर और मसरूर को अंदर ले आई। तीनों ने बड़ी शिष्टता और सम्मान से स्त्रियों और फकीरों को प्रणाम किया। उन सब ने उन्हें व्यापारी समझ कर उनके अभिवादन का यथायोग्य उत्तर दिया। जुबैदा ने, जो तीनों बहनों में सब से बड़ी और सब से बुद्धिमान थी, उनसे उनकी कुशल-क्षेम पूछी और कहा कि हम लोग जो कुछ कहें उसका तुम लोग बुरा न मानना। जाफर ने कहा, तुम सुंदरियों के मुँह से ऐसी कौन-सी बात निकल सकती है जिसका किसी को भी बुरा लगे? जुबैदा ने कहा, 'मुझे यह कहना है कि तुम जहाँ तक हो सके चुप रहना और जिस बात का तुम से सीधा संबंध न हो उसके बारे में कोई प्रश्न न करना। अगर तुमने ऐसा न किया तो हम तुमसे क्रुद्ध हो जाएँगे और इसका फल तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा।' मंत्री ने कहा कि अगर तुम्हारा यही आदेश है तो हम ऐसा ही करेंगे और किसी बात के बारे में प्रश्न नहीं करेंगे। यह वादा लेकर जुबैदा ने उन सब के आगे खाद्य सामग्री रखी और मदिरा पिलाई।

जब मंत्री जुबैदा से बातें कर रहा था उस समय खलीफा आश्चर्यचकित होकर उन स्त्रियों के सौंदर्य और तीक्ष्ण बुद्धि को देख रहा था। उसे इस बात से भी बहुत आश्चर्य हो रहा था कि तीनों फकीर दाहिनी आँख से क्यों काने हैं। उसकी उत्कट इच्छा थी कि वह फकीरों से इस बात का रहस्य पूछे किंतु उसके दोनों साथियों ने इशारों ही में उसे ऐसा न करने के लिए कहा। मकान के अंदर की सारी रुपहली और सुनहरी सजावट को देखकर वह मन ही मन कह रहा था कि यह चीजें जादू ही की हो सकती हैं, वास्तविक नहीं हो सकतीं। इतने में एक फकीर ने उठकर अपने देश के ढंग पर नाचना शुरू कर दिया। स्त्रियों को वह नाच पसंद आया और सबने उसकी नृत्य कला की प्रशंसा की।

जब फकीरों का नाच हो चुका तो जुबैदा अपने स्थान से उठी और अमीना का हाथ पकड़ कर बोली, 'बहन, यह तो तुम जानती ही हो कि यहाँ पर उपस्थित सब लोग हमारे अधीन हैं और इनकी उपस्थिति हमें हमारे रोज के काम से नहीं रोक सकती।' अमीना ने उसका अभिप्राय समझ कर उस जगह की सफाई शुरू कर दी। उसने भोजन के पात्र और मदिरा की सुराहियाँ और प्याले उठाकर बावर्चीखाने में रख दिए और गाने बजाने का सामान हटाकर फर्श पर झाड़ू लगाई। इसके बाद उसने सारे दियों की बत्तियों के गुल काटे और कुछ और भी सुगंधित तेल के दिए जलाए और कमरे को नए ढंग से सजा दिया।

अमीना ने अब फकीरों और खलीफा तथा उसके साथियों को दालान में बिठाया। फिर मजदूर से कहा कि तुझ जैसे हट्टे-कट्टे आदमी को इन लोगों की तरह बैठना नहीं चाहिए, तू उठ कर हमारे काम में हाथ बँटा। मजदूर अभी तक ऊँघ-सा रहा था। वह अपनी हैसियत का खयाल करके रास-रंग में शामिल नहीं हुआ था। वह फौरन उठ खड़ा हुआ और अपने चोगे को कस कर कमर से बाँधने के बाद बोला कि बताओ क्या काम है, जो तुम कहोगी मैं करूँगा। साफी ने कहा, तुम कुर्ते की आस्तीन भी चढ़ा लो क्योंकि हाथों से काम करना है।

कुछ देर बाद अमीना ने दालान में एक चौकी बिछाई और मजदूर को अपने साथ ले जाकर एक कोठरी से दो काली कुतियाँ खींचती हुई लाई। दोनों कुतियों के गले में पट्टे बँधे थे और पट्टों में जंजीरें बँधी थीं। मजदूर उसकी आज्ञा के अनुसार दोनों कुतियों को दालान में ले गया। अब जुबैदा गुस्से में झटके के साथ उठ खड़ी हुई। उसने एक ठंडी साँस भरी और आस्तीन ऊपर चढ़ाई। फिर उसने साफी के हाथ से एक चाबुक लिया और मजदूर से कहा कि एक कुतिया की जंजीर अमीना के हाथ में दे और दूसरी को मेरे पास ले आ।

मजदूर उसकी आज्ञानुसार एक कुतिया को खींच कर जुबैदा के पास लाया तो कुतिया बड़े आर्त स्वर में चिल्लाने लगी। वह दयनीय दृष्टि से जुबैदा की तरफ देखती जाती थी और उसके पैरों पर अपना सिर भी रगड़ती जाती थी। जुबैदा ने उसके इस अनुनय पर कुछ ध्यान न दिया और सड़ासड़ उसे चाबुक मारना शुरू किया। मारते-मारते जब जुबैदा का दम फूल गया तो उसने मारना बंद कर दिया। फिर मजदूर के हाथ से कुतिया की जंजीर लेकर उसके अगले पंजे पकड़ कर पिछले पैरों पर खड़ा किया। कुतिया और जुबैदा एक-दूसरे को देखकर बड़े दुख के साथ आँसू बहाने लगीं। फिर जुबैदा ने रूमाल से कुतिया के आँसू पोंछे और उसे प्यार करके उसका मुँह चूमा। फिर मजदूर को उसकी जंजीर थमाकर कहा कि इस कुतिया को दालान में ले जा और दूसरी को यहाँ ला। मजदूर ने इस कुतिया को ले जाकर दालान में बाँधा और अमीना के हाथ से दूसरी कुतिया लेकर जुबैदा के पास लाया। जुबैदा ने इस कुतिया को भी पहली कुतिया की भाँति खूब मारा, फिर उसकी आँखों में आँखें डाल कर रोई और उसके आँसू पोंछ कर और मुँह चूम कर प्यार किया। इसके बाद मजदूर ने इस कुतिया को भी दालान में ले जाकर बाँध दिया।

तीन फकीरों, खलीफा और उसके साथियों को यह सब देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि पहले तो जुबैदा ने अत्यंत निर्दयता से कुतियों को पीटा फिर उनके साथ मिल कर रोई भी। इसके अलावा मुसलमानों के धर्म में कुत्ते अपवित्र जंतु माने जाते हैं। जुबैदा जैसी सुसंस्कृत महिला का कुतियों के आँसू पोंछकर उनका मुँह चूमना किसी की समझ में नहीं आ रहा था। विशेषतः खलीफा अपनी उत्सुकता नहीं रोक पा रहा था। उसने इशारे से मंत्री से कहा कि इस रहस्य को पूछना चाहिए। मंत्री ने पहले तो टाल-मटोल की और दूसरी ओर देखने लगा। लेकिन जब खलीफा संकेत से प्रश्न करता ही रहा तो उसने संकेत ही से विनय की कि इस समय इस बात को यहीं समाप्त कर दीजिए, कुछ पूछिए नहीं।

जुबैदा कुतियों को पीटने के बाद कुछ देर तक सुस्ताती रही। फिर साफी ने उससे कहा, बहन तुम अपने स्थान पर आ बैठो तो हम अगला काम करें। जुबैदा ने कहा, 'अच्छा।' फिर वह दालान में आकर एक पहले से बिछी हुई चौकी पर बैठ गई। उसने खलीफा और उसके साथियों को अपने दाईं ओर और फकीरों और मजदूरों को बाईं ओर बिठा लिया। चौकी पर बैठ कर वह कुछ देर और सुस्ताती रही। इसके बाद उसने अमीना से कहा कि बहन, उठो, तुम्हें मालूम है कि तुम्हें अब क्या करना है।

अमीना यह सुन कर उठी और बगल वाली कोठरी में जाकर वहाँ से एक संदूक उठा लाई जो पीले साटन में मढ़ा था और इसके ऊपर भी उस पर हरी कारचोबी का एक गिलाफ चढ़ा था। उसमें से एक बाँसुरी निकाल कर अमीना ने साफी को दी। साफी ने उस बाँसुरी से एक करुण वियोगात्मक राग निकाला और देर तक बजाती रही। खलीफा और अन्य उपस्थित लोग उस का कौशल देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। फिर साफी ने अमीना से कहा कि अब तुम बाँसुरी बजाओ, मैं बजाते-बजाते थक गई हूँ। अमीना ने बाँसुरी लेकर कुछ देर तक सुर मिलाया फिर एक बड़ा मधुर राग बजाना शुरू किया और बजाते-बजाते उसमें मग्न हो गई। जुबैदा ने उसके वादन की बड़ी प्रशंसा की और कहा कि अब बस करो, तुम्हारे दुख के कारण बड़ी दुखद दशा हो रही है। अमीना इतनी भाव-विह्वल हो गई कि जुबैदा की बात का कोई उत्तर न दे सकी बल्कि जान पड़ता था कि वह अपने होश-हवास खो बैठी थी क्योंकि उसने अपने ऊर्ध्व वस्त्र को उतार फेंका। अब सब लोगों ने देखा कि उस सुंदरी के दोनों कंधों पर काले-काले दाग पड़े हैं जैसे किसी ने उसे निर्दयता से मारा है।

दाग उसके कंधों ही पर नहीं, बाँहों पर भी पड़े थे। सब लोग इस कांड को देखकर और भी हैरान हुए। अमीना की हालत इतनी खराब हो गई थी कि वह डगमगाने लगी और गिरने-गिरने को हुई और जुबैदा और साफी ने दौड़कर उसे सँभाला।

एक फकीर ने धीमे से कहा, कितने दुख की बात है कि हम इतनी अद्भुत घटनाएँ देख रहे हैं और उनके बारे में किसी से पूछ भी नहीं सकते। खलीफा ने यह बात सुन ली और उन फकीरों के पास आकर उनसे पूछा कि क्या तुम लोगों में किसी को इन स्त्रियों का और कुतियों को पीटने का रहस्य ज्ञात है? फकीरों ने कहा, हम में से कोई भी इन बातों को नहीं जानता, हम लोग आज ही रात को तुम्हारे यहाँ आने से कुछ ही पहले यहाँ पहुँचे हैं। खलीफा की उत्सुकता और बढ़ी। उसने कहा, हो सकता है कि यह आदमी जो तुम्हारे पास बैठा है इसे कुछ ज्ञात हो। फकीर ने इशारे से मजदूर को अपने और निकट बुलाया और पूछा कि क्या तुम्हें मालूम है कि जुबैदा ने दोनों कुतियों को क्यों पीटा और अमीना के कंधों और बाँह पर काले दाग कैसे हैं।

मजदूर ने कहा कि मैं भगवान की सौगंध खाकर कहता हूँ कि मुझे कुछ भी नहीं मालूम। मैं तो इस घर में आज ही आया हूँ और इस घर में यही तीन स्त्रियाँ रहती हैं। खलीफा और फकीरों ने सोचा था कि वह आदमी उन स्त्रियों का सेवक होगा। अब सबको विश्वास हो गया कि भेद खुलने की कोई संभावना नहीं है।

लेकिन खलीफा हार मानने को तैयार नहीं हुआ। उसने कहा, हम लोग सात मर्द हैं और यह सिर्फ तीन औरतें। हम सब मिलकर इनसे इस भेद को पूछें। अगर यह लोग खुशी-खुशी बता दें तो ठीक है नहीं तो हम जोर-जबर्दस्ती करके भी इनसे बात उगलवा लेंगें।

मंत्री की राय इसके विपरीत थी। उसने खलीफा के कान में कहा, 'हम सबका यहाँ पर बड़ा स्वागत-सत्कार किया गया है ओर गाने-बजाने से भी हमारा मनोरंजन हुआ है। ऐसी दशा में जोर-जबर्दस्ती ठीक नहीं है। फिर आप यह भी देखें कि इन स्त्रियों ने किस शर्त पर हमें अपना अतिथि बनाया है; हमने भी उनकी यह शर्त मानी है कि हम कुछ पूछताछ नहीं करेंगे। अगर हम अपना यह वादा तोड़ेंगे तो यह लोग क्या हमें बेईमान नहीं कहेंगी? और उन्होंने हमारे लिए ऐसा कहा तो हमारे लिए डूब मरने की बात होगी।'

मंत्री ने आगे समझाया, 'आप यह भी विचार कर लें कि जब इन स्त्रियों ने हमारे सामने इतने आत्मविश्वास से चुप रहने की शर्त रखी है तो मालूम होता है कि इनके पास कोई ऐसी शक्ति है जिससे यह लोग शर्त तोड़ने वाले को दंड भी दे सकती हैं। ऐसा हुआ तो हमारे लिए और भी लज्जा की बात हो जाएगी चाहे हम बाद में इन्हें कितना भी दंड दे दें। ...मुझे यह भी कहना है कि अब रात बीता ही चाहती है। इस समय आप कुछ न कहें। सवेरा होने पर मैं इन सारी स्त्रियों को पकड़कर आपके दरबार में ले आऊँगा और आप जो चाहे इनसे पूछ लीजिएगा।'

खलीफा को ऐसी जिद सवार हुई कि उसने ऐसे सत्परामर्श पर कान न दिया और मंत्री को झिड़क दिया कि तुम चुप रहो, मैं सुबह तक प्रतीक्षा नहीं कर सकता। उसने फकीरों से कहा कि तुम इस बात को जुबैदा से पूछो। उन्होंने इनकार कर दिया कि हमारा साहस नहीं है। फिर उन सबने जोर देकर मजदूर को यह पूछने पर राजी कर लिया।

जुबैदा ने इन लोगों को खुसर-पुसर करते देखा तो उनसे पूछा कि तुम लोग आपस में क्या बात कर रहे हो। मजदूर ने कहा, 'सुंदरी, मेरे साथी जानना चाहते हैं कि आप दोनों कुतियों को निर्दयतापूर्वक पीटकर क्यों रोई और जो स्त्री अपनी सुध-बुध खो बैठी उसके कंधों और बाँहों पर काले दाग कैसे हैं।' जुबैदा यह सुनकर आग-बबूला हो गई। उसने सब लोगों से पूछा कि क्या तुम सब ने मजदूर से कहा था कि यह बातें मुझसे पूछे। सबने एकमत होकर कहा कि जाफर को छोड़कर हम सभी यह बातें जानना चाहते थे और हमने मजदूर से कहा था कि आपसे यह बातें पूछे। जुबैदा ने कहा, 'तुम सभी लोग बेईमान हो। तुम सब ने प्रतिज्ञा की थी कि यहाँ की किसी बात के बारे में कुछ न पूछोगे और तुम अपनी उत्सुकता पर बिल्कुल संयम न कर सके। हमने दया करके तुम सबको रात का ठिकाना दिया और तुम एक साधारण-सी प्रतिज्ञा न निभा सके। अब तुम्हारा सत्कार मेरे लिए बिल्कुल आवश्यक नहीं है और तुम लोगों को अपने किए का फल भुगतना चाहिए।'

यह कह कर जुबैदा ने धरती पर पाँव पटक कर तीन बार ताली बजाई और जोर से कहा, 'तुरंत आओ।' उसके यह कहते ही एक द्वार खुल गया और उसमें से सात बलवान हब्शी नंगी तलवारें लिए निकले और एक-एक हब्शी ने एक-एक आदमी को जमीन पर पटक दिया और उनके सीने पर चढ़ बैठे और सब की तलवारें म्यान से बाहर निकल आईं। खलीफा क्षोभ और लज्जा के मारे मरा जा रहा था, उसे ऐसे व्यवहार की क्या आशा हो सकती थी।

हब्शियों के मुखिया ने जुबैदा से पूछा, 'श्रेष्ठ सुंदरी, आपकी क्या आज्ञा है? क्या हम इन लोगों को यहीं खत्म कर दें?' जुबैदा ने कहा, 'नहीं, कुछ देर ठहर जाओ। पहले इन लोगों से यह तो पूछ लें कि यह कौन हैं और क्यों आए थे।' यह कहकर उसने सातों मेहमानों से कहा कि तुम लोग अपना-अपना हाल बताओ।

मजदूर ने रो कर कहा, 'भगवान के लिए मुझे छोड़ दो। मेरा कोई दोष नहीं है। मैं तो इन लोगों के बहकावे में आ गया। काने फकीर जहाँ जाएँगे वहीं दुर्भाग्य लाएँगे।' जुबैदा को यह सुनकर हँसी आ गई। वह बोली, 'ऐसे कोई नहीं छूटेगा। पहले हर आदमी अपना हाल बताए कि वह वास्तव में कौन है, कहाँ से आया है, उसमें क्या-क्या गुण हैं और यहाँ आने का क्या कारण है। इन बातों में जरा-सा भी झूठ हुआ तो फौरन उसकी गर्दन मारी जाएगी।'

परेशान तो सभी थे लेकिन खलीफा हारूँ की व्याकुलता स्वभावतः ही सबसे अधिक बढ़ी-चढ़ी थी। उसने एक बार सोचा कि वैसे तो इस स्त्री के पंजे से निकला नहीं जा सकता किंतु यदि वह अपना ठीक-ठीक परिचय तुरंत दे दे तो जरूर मेरा सम्मान करेगी। उसने धीमे से मंत्री से सलाह ली। उसने कहा कि आपके सम्मान की रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि अभी हम लोग चुप रहें। जुबैदा ने तीनों फकीरों से पूछा कि क्या तुम तीनों भाई हो? एक ने उत्तर दिया कि हम भाई नहीं हैं; एक-से कपड़े जरूर पहनते हैं और साथ रहते हैं। जुबैदा ने फिर पूछा कि क्या तुम लोग जन्मतः ही एकाक्ष हो। उनमें से एक ने कहा कि ऐसा नहीं है; हम पर ऐसी विपत्तियाँ पड़ीं जो न केवल जानने बल्कि इतिहास में लिखे जाने योग्य हैं, उन्हीं से हमारी आँखें जाती रहीं और उन्हीं के कारण हमने अपनी दाढ़ी-मूँछ और भवें मुँडवा डाली और फकीर बन गए।

जुबैदा ने एक-एक करके शेष दो फकीरों से भी यही प्रश्न किए और दोनों ने वही उत्तर दिए जो पहले फकीर ने दिए थे। तीसरे ने यह भी कहा, 'आप अनुमति दें तो हम लोग अपना वृत्तांत विस्तृत रूप से कहें। हम तीनों की भेंट आज ही शाम को इस नगर में हुई है क्योंकि हम तीनों बाहर से आए हैं। विश्वास मानिए कि हम तीनों ही राजकुमार हैं और हमारे पिता बड़े और प्रख्यात बादशाह हैं। हम सब चाहते हैं कि अपना वृत्तांत विस्तृत रूप से कहें।'

उन लोगों की बातों से जुबैदा का क्रोध कम हुआ। उसने हब्शियों से कहा, 'तुम लोग इनके सीने से उतर आओ। यह लोग बैठकर अपना-अपना हाल कहेंगे। जो-जो अपना पूरा हाल और इस घर में आने का कारण बताता जाए उसे छोड़ते जाओ ताकि वह जहाँ चाहे चला जाए। जो ऐसा न करे तुम उसका सिर उड़ा दो। अभी तुम इन लोगों के पीछे नंगी तलवारें लिए खड़े रहो।' चुनांचे उसी दालान में खलीफा और अन्य 6 लोगों को एक कालीन पर बिठा दिया गया। हर आदमी के पीछे एक हब्शी नंगी तलवार लेकर खड़ा हो गया ताकि जुबैदा का इशारा होते ही उसका वध कर दे। सबसे पहले मजदूर ने अपनी बात कही।
 
मजदूर का संक्षिप्त वृत्तांत

मजदूर बोला, 'हे सुंदरी, मैं तुम्हारी आज्ञानुसार ही अपना हाल कहूँगा और यह बताऊँगा कि मैं यहाँ क्यों आया। आज सवेरे मैं अपना टोकरा लिए काम की तलाश में बाजार में खड़ा था। तभी तुम्हारी बहन ने मुझे बुलाया। मुझे लेकर पहले वह शराब बेचने वाले के यहाँ गई। फिर कुँजड़े की दुकान पर उसने ढेर-सी तरकारियाँ खरीदीं और फल वाले के यहाँ से बहुत-से फल लिए। गोश्त वाले के यहाँ से उसने तरह-तरह का मांस खरीदा और अन्य दुकानों से भी बहुत कुछ लिया। फिर सारा सामान मेरे सर पर लदवाकर आपके घर में लाई। आपने कृपा कर के मुझे अब तक ठहरने दिया और खानपान दिया जिसके लिए मैं आपका आजीवन आभारी रहूँगा। यही मेरी राम कहानी है।'

मजदूर की बातें सुनकर जुबैदा ने कहा, 'तेरी बातें ठीक मालूम होती हैं। अब तू तुरंत यहाँ से चला जा और खबरदार आगे कभी मेरे सामने न आना।' मजदूर यद्यपि बड़ी मुसीबत से छूटा था किंतु उसकी चपलता न गई। उसने कहा कि यदि अनुमति दें तो मैं इन शेष लोगों की कहानियाँ भी सुन लूँ, फिर घर चला जाऊँगा। जुबैदा ने अनुमति दे दी और कहा, दालान के एक कोने में खड़े होकर चुपचाप सुन ले, कुछ बोलना-चालना नहीं। मजदूर ने ऐसा ही किया। फिर जुबैदा ने फकीरों को आत्मकथाएँ सुनाने का इशारा किया।
 
किस्सा पहले फकीर का

पहले फकीर ने अदब से घुटनों के बल खड़े होकर कहा 'सुंदरी, अब ध्यान लगाकर सुनो कि मेरी आँख किस प्रकार गई और मैं क्यों फकीर बना। मैं एक बड़े बादशाह का बेटा था। बादशाह का भाई यानी मेरा चचा भी एक समीपवर्ती राज्य का स्वामी था। मेरे चचा का एक बेटा मेरी उम्र का था और दूसरी संतान एक पुत्री थी। मैं अपने पिता के आदेशानुसार प्रति वर्ष अपने चचा के यहाँ जाया करता था और महीने-दो महीने वहाँ रहा करता था। कई बार इस प्रकार आने-जाने से मेरी अपने चचेरे भाई से मैत्री और प्रीति बहुत बढ़ गई।

'एक दिन मैंने देखा कि मेरा चचेरा भाई असाधारण रूप से प्रसन्न है। उसने सदा से अधिक मेरा सत्कार किया, स्वादिष्ट भोजन कराया और भाँति-भाँति के खेल-तमाशों से मेरा मनोरंजन किया। फिर मुझसे कहने लगा, 'पिछली बार तुम्हारे जाने के बाद मैने बड़ी जल्दी और बहुत ही सुंदर ढंग से एक महल बनवाया है। अब रात हो गई है, मैं सोना चाहता हूँ फिर तुम्हे नया महल दिखाऊँगा। लेकिन शर्त यह है कि तुम कसम खाओ कि यह भेद किसी से नही कहोगे।'

'मैने ऐसा करने से सौंगध खाई। वह उठकर गया और कुछ ही देर में एक सुंदरी स्त्री को साथ लेकर आ गया। न उसने बताया कि यह स्त्री कौन है न मैंने उसके बारे में पूछा। हम तीनों बैठ कर इधर-उधर की बातें करने लगे और पात्रों में भर-भर कर मदिरा पीने लगे। कुछ देर बाद मेरे चचेरे भाई ने कहा कि चलो यहाँ से चलें। उसने मुझसे कहा कि तुम इस स्त्री को लेकर कब्रिस्तान जाओ और कब्रिस्तान में जहाँ कहीं भी गुंबद वाली नई कब्र देखो तो समझ लो कि यह उसी महल का प्रवेश मार्ग है। तुम दोनों गुंबद के अंदर जाकर मेरी राह देखना।

'मैं उसी स्त्री के हाथ में हाथ देकर बाहर निकला और कब्रिस्तान की ओर चल दिया। चाँदनी रात थी इसलिए हम लोगों को गुंबद वाली नई कब्र ढूँढने में कोई कठिनाई नहीं हुई। हम गुंबद के अंदर गए तो देखा कि राजकुमार अकेला ही एक चूने की टोकरी, पानी की गागर और जरूरी औजार लिए खड़ा है। हमारे पहुँचने पर उसने फावड़े से जमीन खोदी। मिट्टी के नीचे पत्थरों की सिलें थीं जिन्हें निकाल कर उसने एक ओर रखा। पत्थरों के नीचे एक दरवाजा दिखाई दिया। दरवाजे का किवाड़ ऊपर उठाया तो नीचे जाने के लिए एक लकड़ी की सीढ़ी दिखाई दी।

'मेरे चचेरे भाई ने अब उस स्त्री से कहा कि इसी रास्ते पर चलकर वह द्वार मिलेगा जिसका मैंने तुमसे उल्लेख किया था। वह स्त्री यह सुनकर सीढ़ी से नीचे उतर गई। राजकुमार भी उसके पीछे चला गया। जाने के पहले मुझसे बोला कि तुमने हम लोगों के लिए जो परिश्रम किया है उसके लिए मैं तुम्हारा आभारी हूँ, लेकिन अब मैं तुमसे विदा लेता हूँ। हाँ, भगवान के लिए इस बात को गुप्त रखना। मैंने बहुत पूछा कि तुम कहाँ जा रहे और यह सब क्या हो रहा है किंतु उसने कुछ न बताया, केवल इतना कहा कि दरवाजे पर मिट्टी डालकर भूमि समतल कर देना और जिस रास्ते से आए हो उसी से वापस चले जाना।

'विवशतः मैं दरवाजे पर मिट्टी डालकर अपने चचा के महल को वापस हुआ। मुझे नशा उतरने के बाद खुमार की दशा थी और मेरे सिर में पीड़ा हो रही थी इसलिए मैं अपने कमरे में जाकर सो रहा। सुबह उठने पर रात के वृत्तांत का स्मरण कर के मैं बड़ा चिंतित था और यह भी सोचता था कि मैंने रात को जो देखा वह स्वप्न था या सत्य था। मैंने एक सेवक से कहा कि तू जाकर देख कि मेरे भाई ने उठकर कपड़े बदले हैं या सो ही रहा है। उसने लौट कर बताया कि वे तो रात को अपने शयन कक्ष में थे ही नहीं और किसी को यह भी नहीं मालूम है कि वे कहाँ गए हैं इसलिए उनके सेवक और संबंधी सब को बड़ी चिंता है और किसी की समझ में नही आ रहा है कि क्या करें।

'मुझे भी इस बात पर बड़ी चिंता हुई और मैं फिर कब्रिस्तान को गया। मैंने सारा दिन गुंबद वाली कब्र के खोजने में लगाया किंतु वह कब्र नहीं मिली। इसी प्रकार चार दिन तक मैं कब्रिस्तान जा कर अपने भाई की तलाश करता रहा लेकिन उसका या उसके मकान का कुछ पता न चला।

'सुंदरियो, यहाँ यह बता देना भी आवश्यक है कि उन दिनों मेरा चचा यानी वहाँ का बादशाह कई दिन से राजधानी में नहीं था क्योंकि वह शिकार पर गया था। उसकी वापसी में भी देर थी इसलिए मैं अत्यंत व्याकुल हुआ। मेरी इच्छा हुई कि अपने पिता के राज्य में वापस जाऊँ। मैंने मंत्री से कहा कि अब की बार मैं साधारण समय से अधिक यहाँ पर रहा और मेरे पिता को मेरी चिंता होगी इसलिए मैं जा रहा हूँ, आप बादशाह के आने पर उनसे यही कह दें। मंत्री स्वयं बड़ी चिंता में था क्योंकि शहजादे की कोई खोज- खबर नहीं मिल रही थी। मैं स्वयं उसे कुछ न बता सकता था क्योंकि शहजादे ने मुझे कुछ न कहने की कसम दिला रखी थी।

'जब मैं अपने पिता की राजधानी में आया तो महल के चारों ओर सेना की बड़ी जमात देखी। सैनिकों ने मुझे देखते ही बंदी बना लिया। मैंने बिगड़कर पूछा कि यह क्या करते हो, तो एक सरदार ने कहा, 'शहजादे, यह सेना तुम्हारी नहीं, तुम्हारे शत्रु की है। तुम्हारे पिता के मरने के बाद मंत्री ने तुम्हारे राज्य पर अधिकार कर लिया है। उसने तुम्हें गिरफ्तार करने की आज्ञा दी है और कहा है कि तुम जहाँ भी मिलो तुम्हें पकड़ लिया जाए। अब तुम हमारे भाग्य से स्वयं ही हमारे पास आ गए।

'यह कह कर वह सरदार मुझे अत्याचारी मंत्री के पास ले गया जो अब राज सिंहासन पर बैठा हुआ था। मुझे कितना दुख और कितनी ग्लानि हुई होगी यह आसानी से समझा जा सकता है। वह दुरात्मा आरंभ ही से मेरा शत्रु था। इसका कारण यह था कि बचपन में मुझे गुलेल चलाने का बड़ा शौक था। एक दिन मैं महल की छत पर गुलेल लिए खड़ा था कि एक चिड़िया सामने से उड़ती हुई निकली। मैंने गुलेल से उस पर पत्थर मारा। संयोगवश वह पत्थर का टुकड़ा उसी मंत्री की आँख पर लगा क्योंकि वह भी अपने निकटवर्ती भवन की छत पर टहल रहा था। उसकी आँख फूट गई। मुझे मालूम हुआ तो मैं स्वयं ही उसके पास गया और अनजाने में हुए अपराध के लिए उससे क्षमा माँगी। वह कुछ बोला नहीं किंतु उसने मुझे कभी क्षमा नहीं किया और बराबर इस ताक में रहता था कि कब अवसर पाए और मुझ से बदला ले। इसलिए जब मुझे असहाय और अशक्त देखा तो पुरानी बात याद करके क्रोध में भर कर सिंहासन से उतरा और झपट कर मेरे पास आया और मेरी दाहिनी आँख में उँगली घुसेड़ दी।

'उसने इतने ही पर बस नहीं की। उसने मुझे एक पिंजरे में बंद कर दिया और जल्लाद को आज्ञा दी कि इसे नगर के बाहर ले जा कर इसका वध कर दे और इसके शरीर के टुकड़े करके पशु-पक्षियों को खिला दे। जल्लाद घोड़े पर बैठकर शहर के बाहर आया और दूसरे घोड़े पर वह पिंजरा रखकर ले गया जिसमें मैं बंद था। उसकी सहायता को अन्य सेवक भी थे। जंगल में जाकर मेरे हाथ-पाँव बाँध कर मुझे मारने के लिए तलवार निकाली। मैं अत्यंत दीनता से रोने और प्राण भिक्षा माँगने लगा और जल्लाद को याद दिलाया कि उसने बरसों मेरे पिता का नमक खाया है। अंत में जल्लाद को मुझ पर दया आ गई। उसने मुझे छोड़ दिया और कहा, 'तुम तुरंत ही यह देश छोड़कर चले जाओ। इधर की तरफ भूलकर भी मुँह न करना। अगर तुम यहाँ आए तो तुम तो मारे ही जाओगे, मुझे भी प्राणदंड मिलेगा।'

'मैंने जल्लाद का बड़ा एहसान माना और भगवान को लाख-लाख धन्यवाद दिया कि भले ही आँख गई; लेकिन जान तो बच गई, काना होना मुर्दा होने से तो अच्छा है। मेरी भूख-प्यास और आँख की तकलीफ से बुरी हालत थी। मैं चलने-फिरने के लायक न था। दिन में जंगल की झाड़ियों में छुपा रहा। रात को धीरे-धीरे छुपता-छुपाता अनजाने रास्तों पर धीरे-धीरे चलता हुआ कई दिनों में अपने चाचा की राजधानी में पहुँचा। जब मैंने चाचा को अपने दुर्भाग्य का पूरा हाल बताया तो वह जैसे पछाड़ें खाने लगा और बोला, 'मुझ से अधिक अभागा कौन होगा। मैं अपने पुत्र के लापता होने से क्या कम दुखी था कि मुझे अपने भाई के, जिसे मैं प्राणों से भी अधिक चाहता था, प्राणांत की सूचना मिली। अब मैं अपने पुत्र को कहाँ खोजूँ।' और वह बहुत देर तक अपने पुत्र को याद करके घंटों रोता रहा।

'उसके निरंतर रोदन से मेरे धैर्य का बाँध टूट गया। मुझ में इतनी क्षमता न रही कि मैं अपने चचेरे भाई को दिए हुए वचन को निभाए रखता। अतएव मैंने वह सारा वृत्तांत अपने चाचा को कह सुनाया जो मैंने उस रात को देखा था। चाचा को यह सुन कर ढाँढ़स हुआ और उसने कहा, 'बेटे, तुम ठीक कहते हो। मुझे भी मालूम हुआ था कि उसने यहाँ से समीप ही एक गुंबददार कब्र यानी मजार बनवाया है। वह वहीं हो सकता है।' लेकिन उसने यह भेद किसी को नहीं बताया। रात को वेष बदलकर मैं और चचा महल के बाग के दरवाजे से निकल कर कब्रिस्तान में पहुँचे। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि हम लोगों को थोड़ी ही देर में कब्र मिल गई। शायद अकेले आने पर मैं ठीक स्थान पर नहीं पहुँच सका था।

'मैंने कब्र को फौरन पहचान लिया। हम लोग गुंबद के अंदर गए। वह लोहे का दरवाजा, जिसके नीचे सीढ़ी गई थी, बड़ी कठिनाई से खुला क्योंकि शहजादे ने उसे अंदर से चूना आदि लगाकर मजबूती से बंद कर दिया था। दरवाजा खुलने पर पहले चाचा नीचे उतरा फिर मैं गया। कुछ दूर जाकर देखा कि डयोढ़ी में बदबूदार धुआँ भरा है। आगे बढ़े तो देखा कि सुंदर बैठने का स्थान है और वहाँ कई दीपक यथेष्ट प्रकाश दे रहे थे। बीच में एक हौज बना हुआ था जिसके चारों ओर खाने-पीने की वस्तुएँ रखी थीं। किंतु वह स्थान बिल्कुल निर्जन था। फिर हमने देखा कि एक ओर चबूतरा-सा बना है और उसके बाद एक कक्ष है जिसके द्वार पर परदा पड़ा है।

'चचा सीढ़ी से चबूतरे पर चढ़ गए और परदा उठा कर अंदर गए। मैं भी पीछे- पीछे चला गया। हम लोगों ने देखा कि शहजादा उसी स्त्री के साथ, जिसे पहले मैंने देखा था, एक पलंग पर लेटा है। किंतु उस पर भगवान का ऐसा कोप हुआ था कि दोनों कोयले की तरह काले हो गए थे। ऐसा मालूम होता था जैसे किसी ने उन्हें जीवित ही धधकती आग में डाल दिया है और उनके राख हो जाने के पहले उन्हें निकाल कर पलंग पर लिटा दिया है।

'मेरे तो यह देख कर रोंगटे खड़े हो गए लेकिन मेरा चचा यह देख कर बिल्कुल विचलित नहीं हुआ। उसके चेहरे पर न दुख का कोई चिह्न था न आश्चर्य का। हाँ, उसका क्रोध बढ़ता जा रहा था।

'उसने शहजादे के मुँह पर थूक दिया और कहा, 'अभागे, तूने यहाँ तो दुख पाया ही है, परलोक में इससे अधिक पाएगा।' इस पर भी उस का क्रोध शांत न हुआ तो उसने पाँव से जूती निकाल कर कई बार शहजादे के मुँह पर मारी। मैंने क्रोध में आकर कहा, एक तो मुझे वैसे ही भाई के मरने का दुख है, फिर आप मरने पर उसका अपमान कर रहे हैं। ऐसा क्या अपराध उसने किया है जिससे आपकी क्रोधाग्नि इतनी भड़की है?

'बादशाह बोला, 'बेटे, तुम नहीं जानते कि क्या किस्सा है। यह आदमी इससे कहीं अधिक भर्त्सना और दंड का भागी है। यह शहजादा बचपन ही से अपनी सगी बहन पर आसक्त था। जब दोनों छोटे थे तो मैंने बच्चा समझ कर उनकी बातों पर कुछ ध्यान नहीं दिया। किंतु जब दोनों बड़े हो गए तब भी दोनों में घनिष्टता रही बल्कि बढ़ गई। अब मैंने उनके संबंध को रोकना चाहा। मैंने कड़े पहरे बिठाए कि भाई-बहन एक दूसरे के सामने न आएँ। शहजादा अकेला ही कुमार्गगामी होता तो बात आगे न बढ़ती लेकिन यह अभागी लड़की उससे भी अधिक नीच निकली। यह अपने भाई से मिलने के लिए तड़पती रहती थी। यद्यपि मेरी सख्ती के कारण खुलकर एक दूसरे के सामने न आते थे किंतु उनके हृदयों में एक दूसरे के प्रति आकर्षण कम नहीं होता था।

'अतएव बहन से सलाह करके शहजादे ने अपने लिए खास तौर से यह गुप्त आवास बनवाया ताकि अवसर मिलते ही दोनों विहार करें। जब मैं शिकार पर गया तो शहजादे को अवसर मिला और वह किसी तरह अपनी बहन को महल से निकाल कर यहाँ ले आया ताकि उसके साथ हमेशा यहाँ रहे। इसीलिए उसने बहुत अधिक मात्रा में खाद्य सामग्री भी यहाँ ला रखी। कुछ दिनों यह लोग एक-दूसरे के साथ आनंद से रहे होंगे, फिर उन पर ईश्वरीय प्रकोप हुआ और दोनों ने अपने पाप का समुचित फल पाया।'

'यह कहकर बादशाह का क्रोध दुख में बदल गया और वह अपने बेटे-बेटी की मृत्यु पर विलाप करके रोने लगा। मैं भी उसके साथ रोने लगा। हम लोग बहुत देर तक रोते रहे। फिर उसने मुझे अपने सीने से लगाकर कहा, 'अच्छा हुआ कि ये पापी मर गए। अब तुम ही मेरे पुत्र और मेरे उत्तराधिकारी हो।'

'फिर मैं और मेरा चाचा मृतक शहजादे की याद करके रोने लगे। कुछ देर बाद हम लोग सीढ़ी से ऊपर चढ़ आए और दरवाजा बंद करके उस पर मिट्टी डालकर बाहर आ गए। जब हम लोग राजमहल के पास पहुँचे तो हमने देखा कि फौजियों के घोड़ों के दौड़ने से उड़ी हुई धूल से आकाश अटा जा रहा है और युद्ध के बाजों की ध्वनि से कान फटे जा रहे हैं। मालूम हुआ कि मेरे पिता का वही मंत्री जिसने मेरा राज्य हड़प लिया था एक बड़ी सेना लेकर मेरे चाचा के राज्य पर भी चढ़ आया है। मेरे चाचा की सेना उसकी सेना से कम थी। उसकी सेना ने बगैर किसी कठिनाई के राजधानी और महल पर अधिकार कर लिया। मेरे चाचा ने अपने अधिकार की रक्षा का भरसक प्रयत्न किया और युद्ध क्षेत्र में कूद पड़ा। फिर भी वह सफल न हुआ और युद्ध में मारा गया। उसके मरने के बाद भी मैं शत्रु का सामना करता रहा और कुछ समय तक युद्ध भूमि में डटा रहा किंतु जब देखा कि बिल्कुल घिर गया हूँ तो निकल भागने की सोची। मंत्री की सेना के एक सरदार ने मुझे पहचाना और पुराने बादशाह की नमकहलाली के खयाल से मुझे बच निकलने का अवसर दे दिया।

'मैंने युद्धभूमि से निकलकर पहला काम तो यह किया कि दाढ़ी-मूँछें और भवें सफाचट करवा दीं ताकि दुश्मन मुझे पहचान न सके और फकीर के कपड़े पहन लिए। फिर बड़े कष्ट उठाता हुआ अनजाने रास्तों से होकर अपने चाचा के राज्य के बाहर निकला। फिर कई नगरों में फकीर बन कर घूमता रहा। घूमता-घामता मैं अति प्रतापी, दयावान, दीनवत्सल, न्यायप्रिय खलीफा हारूँ रशीद की राजधानी में आ पहुँचा। मेरा इरादा था कि मैं उदारमना खलीफा की सेवा में पहुँच कर अपनी व्यथा कथा सुनाऊँ। किंतु जब इस नगर में पहुँचा तो शाम ढल चुकी थी। मैं इस चिंता में आगे बढ़ा कि कहीं ठिकाना मिले तो रात व्यतीत करने का प्रबंध करूँ।

'कुछ दूर जाने पर मुझे यह दूसरा फकीर मिला। उसने मेरा अभिवादन किया। मैंने उसके अभिवादन का उत्तर देकर कहा कि तुम भी मेरी तरह परदेसी लगते हो। उसने कहा कि हाँ, मैं भी अभी-अभी इस नगर में आया हूँ। हम लोग बातें कर ही रहे थे कि यह तीसरा फकीर भी आ गया और हम दोनों का अभिवादन करके पास बैठ गया। उसने भी कहा कि मैं परदेसी हूँ और इस नगर में अभी आया हूँ। हम लोग चूँकि एक ही वेश में थे और तीनों की एक-सी दशा थी इसलिए हमने तय किया कि भाइयों की तरह मिल कर रहें और जहाँ जाएँ एक साथ ही जाएँ।

'हम लोग इस चिंता में निमग्न हो गए कि रात कहाँ बिताएँ क्योंकि हम तीनों में कोई भी यहाँ के किसी निवासी को नहीं जानता था न कभी पहले यहाँ आया था। अपने सौभाग्य से हम लोग घूमते-फिरते तुम्हारे दरवाजे पर आ निकले। तुमने भोजन और मनोरंजन से हमारा चित्त प्रसन्न किया इसके लिए हम सदा के लिए तुम्हारे आभारी रहेंगे। यही मेरा वृत्तांत है जिसे मैंने पूरी तरह बता दिया है।'

जुबैदा ने कहा कि हमने तुम्हें क्षमा किया और तुम जा सकते हो। किंतु फकीर ने कहा कि अगर तुम अनुमति दो तो मैं भी एक ओर बैठकर अपने दोनों साथियों की राम कहानी सुन लूँ, और इन तीन व्यापारियों की आप बीती भी सुन लूँ। इसके बाद मैं आपके घर से चला जाऊँगा। जुबैदा ने उसे एक ओर बैठकर दूसरों का वृत्तांत सुनने की अनुमति दे दी। वह मजदूर के पास जा बैठा।
 
किस्सा दूसरे फकीर का

अभी पहले फकीर की अद्भुत आप बीती सुनकर पैदा होने वाले आश्चर्य से लोग उबरे नहीं थे कि जुबैदा ने दूसरे फकीर से कहा कि तुम बताओ कि तुम कौन हो और कहाँ से आए हो। उसने कहा कि आपकी आज्ञानुसार मैं आप को बताऊँगा कि मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ और मेरी आँख कैसे फूटी। मैं एक बड़े राजा का पुत्र था। बाल्यकाल ही से मेरी विद्यार्जन में गहरी रुचि थी। अतएव मेरे पिता ने दूर-दूर से प्रख्यात शिक्षक बुलाकर मेरी शिक्षा के लिए रखे। थोड़े ही समय में मैंने न केवल लिखना-पढ़ना सीख लिया बल्कि कुरान शरीफ भी कंठस्थ कर लिया। इसके अतिरिक्त नबी के कथनों यानी हदीसों और धर्म और दर्शनशास्त्र की शिक्षा भी प्राप्त कर ली। इसके अतिरिक्त भाँति-भाँति के कला- कौशल भी सीख लिए और इतिहास, पहेली और मनोरंजन वार्ता में भी पारंगत हो गया। मैंने काव्यशास्त्र और गणित में भी अच्छा अभ्यास कर लिया जैसा एक राजकुमार होने के नाते मुझसे आशा की जाती थी। इन सबके साथ ही मैंने सुलेखन में भी दक्षता प्राप्त कर ली और अरबी लिपि की सातों लेखन पद्धतियों का मुझे ऐसा अभ्यास हो गया कि मेरे जैसा सुलेखक दूर-दूर तक नहीं पाया जाता था।

इतने गुणों और कौशलों को प्राप्त करने पर भी मैं अपने दुर्भाग्य के लेख को न मिटा सका और इस दुरवस्था में पहुँच गया जो तुम लोग देख रही हो। हुआ यह कि मेरे विद्यार्जन और कला-कौशल में पारंगत होने की ख्याति जब दूर-दूर पहुँची तो हिंदोस्तान के बादशाह ने मुझे देखने की इच्छा प्रकट की। उसने मुझे भेंट करने के लिए एक दूत के हाथ बहुत-सी बहुमूल्य वस्तुएँ भेजीं और संदेशा भिजवाया कि मैं जाकर उससे मिलूँ। मेरे पिता इस बात से बड़े प्रसन्न हुए क्योंकि एक तो एक महान सम्राट से उनके संबंध बन रहे थे, फिर राजकुमार होने के नाते मुझे देश-देश की जानकारी और राजाओं-महाराजाओं से मेल-जोल बढ़ाना ही चाहिए था।

अतएव मैं अपने पिता की आज्ञानुसार थोड़ी-सी यात्रा की सामग्री और कुछ चुने हुए सेवक लेकर हिंदोस्तान की ओर रवाना हुआ क्योंकि बड़ी सेना ले आने की न तो आवश्यकता ही थी न यह बात उचित ही होती। कुछ दिन तक चलने के बाद हम लोगों को पचास के लगभग घुड़सवार डाकुओं ने घेर लिया और सबसे पहले वे दस घोड़े पकड़ लिए जिन पर मेरे पिता की ओर से हिंदोस्तान के बादशाह को भेंट में दी जाने वाली बहुमूल्य वस्तुएँ लदी थीं। मेरे सेवकों ने कुछ देर तक डाकुओं का सामना किया किंतु हार गए। मैंने यह सोचकर कि डाकुओं पर रोब पड़ेगा, उनसे कहा कि मैं हिंदोस्तान के बादशाह का दूत हूँ। उसने घृणापूर्वक कहा, हमें हिंदोस्तान के बादशाह की क्या परवा है; हम न तो उसके शासित देश में रहते हैं न उसके नौकर हैं। फिर उन डाकुओं ने हम लोगों पर आक्रमण किया। हम भी कुछ देर तक लड़े लेकिन उनका क्या सामना करते। मेरे कई साथी मारे गए और मैं भी घायल हो गया और मेरा घोड़ा भी। नितांत मैं जान बचाकर अपने घोड़े पर भाग निकला और डाकुओं की पहुँच से दूर हो गया। कुछ दूर तक दौड़ने के बाद मेरा घोड़ा भी थकन और घावों के कारण गिर कर मर गया। मैंने भगवान को धन्यवाद दिया कि माल-असबाब जाता रहा लेकिन जान तो बच गई।

किंतु मैं नितांत अकेला और द्रव्यहीन था। यह डर भी था कि कहीं डाकुओं ने देख लिया तो बगैर जान से मारे न रहेंगे। इसलिए किसी तरह कपड़ों की पट्टी फाड़कर अपने घाव बाँधे और एक ओर को चल दिया। शाम को एक पहाड़ की गुफा के पास पहुँचा और रात उसी गुफा में बिताई। सुबह को उठा, जंगली फल खाकर भूख मिटाई और चल पड़ा। कई दिन तक इसी तरह भटकता रहा। फिर एक बड़े नगर में पहुँच गया जो बड़ा सुशोभित लग रहा था। वहाँ एक नदी भी बहती थी जिससे वह प्रदेश हरा-भरा और धन- धान्य से पूर्ण था। मैं नंगे और बिवाइयों से फटे पाँव, बढ़े बालों और दाढ़ी तथा गंदे फटे वस्त्रों के साथ उस नगर में गया कि मालूम करूँ यह कौन-सा देश है और यहाँ से मेरा देश कितना दूर है।

यह सोचकर मैं एक आदमी के पास, जो सरकारी लिपिक था और शहर में आने-जाने वालों का हिसाब रखता था गया। उसने मेरा वृत्तांत पूछा और मैंने सब कुछ जो मुझ पर बीता था उसे बताया। उसने धैर्यपूर्वक मेरी बातें सुनीं किंतु फिर उसने जो कुछ कहा उससे मेरे हृदय में शांति आने की जगह भय भर गया। उसने कहा कि तुमने मुझे अपना पूरा हाल बता दिया है सो तो ठीक है लेकिन यहाँ के किसी और व्यक्ति को कुछ न बताना क्योंकि यहाँ का बादशाह तुम्हारे पिता का शत्रु है और उसे तुम्हारा पता चला तो तुम्हारे साथ बुरी बीतेगी।

मैंने उस बूढ़े लिपिक को बहुत धन्यवाद दिया कि उसने मुझ पर दया दिखाई और मुझे खतरे से चेतावनी दे दी। मैंने उससे वादा किया, अब मैं यहाँ के किसी आदमी को अपनी सच्ची कहानी नहीं बताऊँगा। वह लिपिक यह सुनकर प्रसन्न हुआ। मेरा भूख से बुरा हाल हो रहा था इसलिए उसने अपने घर से खाना लाकर मुझे खिलाया और वहीं एक कोने में लेटकर थकावट दूर करने को कहा। मैंने ऐसा ही किया। जब मेरे शरीर में शक्ति और स्फूर्ति आ गई तो मैं फिर उसके पास गया। उसने पूछा कि तुम्हें कोई हुनर ऐसा आता है जिससे तुम अपनी जीविका चला सको। मैंने साहित्य, काव्य, कला, व्याकरण, सुलेखन आदि की निपुणता की बात कही तो उसने कहा, यह सब यहाँ बेकार है, यहाँ विद्या की कोई पूछ नहीं, तुम्हें इस विद्या से एक पैसा भी यहाँ नहीं मिलेगा।

उसने कहा कि तुम शरीर से तगड़े हो, तुम्हें चाहिए कि एक जाँघिया पहन कर जंगल में चले जाओ और लकड़ियाँ काट कर शहर में लाकर बेचा करो। उससे तुम्हें इतनी आय तो हो ही जाएगी कि किसी का आश्रय लिए बगैर अपना खर्च चला लो। कुछ दिन इसी प्रकार दुख उठाकर मेहनत करके समय बिताओ। आशा है कि इसके बाद भगवान तुम पर कृपा करेगा और तुम फिर सुख-समृद्धि प्राप्त करोगे। मैं तुम्हारी इतनी सहायता कर दूँगा कि तुम्हें एक कुल्हाड़ी और एक रस्सी दे दूँ।

मरता क्या न करता। यद्यपि यह कार्य मेरे योग्य किसी प्रकार नहीं था फिर भी मैंने यह करना स्वीकार कर लिया क्योंकि कोई और रास्ता नही था। दूसरे दिन लिपिक ने मुझे एक जाँघिया, एक कुल्हाड़ी और एक रस्सा लाकर दे दिया और मेरा परिचय थोड़े- से लकड़हारों से करा दिया और कहा कि इस आदमी को भी लकड़ी काटने के लिए साथ ले जाया करो। मैं लकड़हारों के साथ जंगल में जाता और लकड़ियाँ काटकर उनका गट्ठा बना कर शहर में ला बेचने लगा। मुझे एक गट्ठे का मूल्य एक स्वर्ण मुद्रा मिलती थी। यद्यपि जंगल उस शहर से दूर था तथापि नगर निवासी बड़े आलसी थे और श्रम करने के अभ्यस्त न थे इसलिए लकड़ी शहर में बहुत महँगी मिलती थी। कुछ ही दिनों में मेरे पास काफी स्वर्ण मुद्राएँ हो गईं जिनमें से कुछ अपने उपकारी लिपिक को मैंने दे दीं।

इसी प्रकार मेरा एक वर्ष व्यतीत हो गया। एक दिन लकड़ी काटते-काटते अपने साधारण स्थान से आगे बढ़ गया। आगे का जंगल मुझे और अच्छा लगा। मैंने एक वृक्ष काटा। जब उसकी डालें और तना काट चुका तो मैंने उसकी जड़ भी काट कर ले जानी चाही। कुल्हाड़ी चलाते-चलाते मुझे एक लोहे का कड़ा दिखाई दिया। और मिट्टी हटाई तो देखा कि कड़ा लोहे के दरवाजे में लगा है।

मैंने जोर लगा कर उसे ऊपर उठाया तो नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ दिखाई दीं। मैं रस्सा और कुल्हाड़ी सहित नीचे उतर गया। नीचे एक बड़ा मकान था जिसमें ऐसा प्रकाश हो रहा था जैसे वह धरती के ऊपर बना हो। मैं आगे बढ़ता गया तो देखा कि सामने एक बारादरी है जिसके पाए संगे-मूसा के बने हुए हैं और खंभे नीचे से ऊपर तक खालिस सोने के बने हैं। बारादरी में एक अत्यंत रूपवती स्त्री बैठी थी। मैंने उसे देखा तो ठगा-सा रह गया। मैंने उसके निकट जाकर अभिवादन किया।

स्त्री ने मुझ से पूछा, 'तुम कौन हो, मनुष्य या जिन्न?' मैंने सिर उठा कर कहा, 'हे सुंदरी, मैं मनुष्य हूँ, जिन्न नहीं हूँ।' वह स्त्री शोकयुक्त स्वर में बोली, 'तुम मनुष्य हो तो यहाँ मरने के लिए क्यों आए हो; मैं यहाँ पच्चीस वर्षों से रह रही हूँ और इस काल में तुम्हारे सिवाय और कोई मनुष्य नहीं देख सकी हूँ।' उस स्त्री के अनुपम रूप के साथ ही उसके स्वर की मधुरता का मुझ पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि कुछ देर तक मेरे मुँह से कोई बात नहीं निकली।

कुछ देर में स्वस्थ हो कर मैंने उस स्त्री से कहा, 'सुंदरी, मुझे तुम्हारा कुछ हाल नहीं मालूम किंतु तुम्हारे दर्शन मात्र से मुझे अतीव सुख मिला है और मैं अपना सारा दुख-दर्द भूल गया हूँ। मेरी अतीव इच्छा है कि तुम्हें यहाँ से छुड़ा दूँ क्योंकि यह स्पष्ट है कि तुम यहाँ सुखी नहीं हो।' और मैंने अपना सारा जीवन वृत्त उस स्त्री के समक्ष वर्णन किया। मेरा पूरा हाल सुनने के बाद वह स्त्री ठंडी साँस भर कर बोली, 'शहजादे, तुम ठीक कहते हो। यह मकान जादू का है और यहाँ प्रचुर धन और समस्त सुविधाएँ उपलब्ध हैं फिर भी मुझे यहाँ रहना तनिक भी पसंद नही। तुमने आबनूस के द्वीपों के बादशाह अबू तैमुरस का नाम सुना होगा। मैं उसकी बेटी हूँ। मेरे पिता ने मेरा विवाह अपने भतीजे के साथ कर दिया। जब मैं शादी के बाद अपने पति के घर जाने लगी तो रास्ते में मुझे एक दुष्ट जिन्न ने उड़ा लिया। मैं भय के कारण लगभग तीन पहर तक अचेत रही। जब मुझे होश आया तो मैंने अपने को इस मकान में पाया। अब केवल उसी जिन्न के साथ मेरा उठना-बैठना है। यह सारा धन और सुख-सामग्री जो यहाँ दिखाई देती है मुझे कुछ भी संतोष नहीं दे पाती। हर दसवें दिन जिन्न यहाँ आता है और मेरे साथ रात बिताता है। उसका विवाह पहले तो उसी की जाति की एक स्त्री से हो चुका है और वह अपनी स्त्री के भय से मेरे पास इससे अधिक नहीं रह पाता। दस दिन के अंदर यदि किसी दिन मैं उसे बुलाना चाहूँ तो उसका भी प्रबंध उसने कर दिया है। यदि मैं यह इधर रखा हुआ जादू का यंत्र छू दूँ तो उसे खबर हो जाती है और वह आ जाता है।'

स्त्री ने आगे कहा, 'उस जिन्न को यहाँ से गए चार दिन हो गए है। वह छह दिन बाद फिर यहाँ आएगा। यदि तुम्हें यहाँ की सुख-सुविधाएँ और मेरा साथ पसंद है तो पाँच दिनों तक यहाँ आराम से रह सकते हो, मैं तुम्हारा हर प्रकार से आदर-सत्कार करूँगी और तुम्हे सुख पहुँचाऊँगी।'

मैं उसकी बातें सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ। मुझे इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी कि ऐसी सुंदरी के साथ रहूँ। मैंने बड़ी प्रसन्नता से यह बात स्वीकार कर ली। वह मुझे एक स्नानागार तक ले गई। मैंने अंदर जाकर अच्छी तरह स्नान किया और बाहर निकला। वह मेरे पहनने के लिए जरी के वस्त्र ले आई। मैंने वह शाही पोशाक पहनी तो वह मुझे देखकर मुझ पर और भी कृपालु हो गई। फिर एक सजे हुए दालान में उसने मुझे एक सुनहरे कमख्वाब की मसनद पर बिठाया। फिर वह नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन लाई और हम दोनों ने साथ बैठकर भोजन किया। दिन भर हम लोग इधर-उधर की बातें करते रहे। रात के भोजन के बाद उसने अपने साथ मुझे सुलाया। सुबह होने पर उसने और भी स्वादिष्ट व्यंजन बनाए और मेरे विशेष सत्कार के लिए पुरानी शराब की बोतलें ले आई। मैं बहुत-सी शराब पीकर मदमस्त हो गया।

मैंने उससे कहा, 'प्रिये, तुम पच्चीस वर्षों से इस मकान में जिसे कब्र कहना चाहिए बंद हो। यह बात ठीक नहीं है। तुम मेरे साथ यहाँ से निकल चलो और बाहर की ताजा हवा खाओ। इस दिखावे के ऐश-आराम को छोड़ो क्योंकि यह जादू से अधिक कुछ नहीं है। तुम मेरे साथ चलो।'

वह सुंदरी बोली, 'ऐसी बातें जिह्वा पर भी न लाना। तुम जिसे सूर्य का प्रकाश कहते हो वह मैं भूल चुकी हूँ। मुझे यहीं रहने की आदत पड़ गई है, मुझे यहीं रहने दो। एक दिन छोड़कर जबकि वह जिन्न यहाँ आता है, तुम बाकी नौ दिन यहाँ आराम से रह सकते हो।'

मुझे नशा चढ़ गया था। मैंने कहा, 'तुम उस जिन्न से इतना क्यों डरती हो। मैं तुम्हारे लिए अपनी जान भी दे सकता हूँ। मैं इस जादू के यंत्र को मय उसकी जादुई लिखावट के तोड़-फोड़ कर बराबर कर दूँगा। अपने जिन्न को आने दो। मैं भी तो देखूँ उसमें कितनी ताकत हैं। मैंने निश्चय कर लिया है कि संसार के सारे जिन्नों का अंत कर दूँगा और सबसे पहले इसी जिन्न को मारूँगा जिसने तुम्हें कैद कर रखा है।'

वह स्त्री भली भाँति जानती थी कि मेरी मूर्खता का क्या फल होगा। उसने मुझे बहुत समझाया, हर तरह रोका, कसमें दीं कि यंत्र को छुआ तो हम दोनों मारे जाएँगे क्योंकि उस जिन्न की शक्ति को मैं जानती हूँ, तुम नहीं जानते।

मैं नशे में धुत था इसलिए मैंने उसकी चेतावनी को अनसुना कर दिया और ठोकर मार कर जादू के यंत्र को तोड़ डाला। यकायक ही सारा मकान काँपने लगा और एक महाभयानक शब्द हुआ। सारी रोशनियाँ बुझ गईं और अंधकार छा गया जिसमें रह-रह कर बिजली चमकने लगती थी। यह हाल देखकर मेरा नशा हिरन हो गया। मैंने सोचा कि वास्तव में मुझसे भयानक भूल हो गई। मैंने अब उस सुंदरी से पूछा कि क्या करना चाहिए। उसने कहा कि मुझे अपने प्राण जाने का भय नहीं, मैं तो वैसे ही दुखी थी। तुम्हारी जान को जरूर खतरा है और इसी से मैं अत्यंत व्याकुल हूँ। तुमने खुद ही अपनी जान के लिए यह आफत मोल ली। अब यहाँ से तुरंत भाग कर जान बचाओ।

यह सुनकर मैं ऐसा बेतहाशा भागा कि अपनी कुल्हाड़ी और रस्सा भी वहीं भूल गया और गिरते-पड़ते उस सीढ़ी तक आया जिससे उतर कर उस मकान में गया था। इतने में वह जिन्न भी अत्यंत क्रुद्ध होकर वहाँ आ पहुँचा और गरज कर स्त्री से पूछने लगा कि तूने मुझे क्यों बुलाया है। वह डर के मारे पत्ते की तरह काँपने लगी और बोली, मैंने तुम्हें बुलाया नहीं है। मैंने इस बोतल से थोड़ी-सी मदिरा पी ली थी। मुझ पर ऐसा नशा चढ़ा कि हाथ-पाँव काबू में न रहे। नशे की हालत में मैंने इस यंत्र पर पाँव रख दिया जिससे यह टूट गया। जिन्न यह सुनकर और भी कुपित हुआ और बोला, तू झूठी, मक्कार और दुराचारिणी है। इस कुल्हाड़ी और रस्से को यहाँ कौन लाया है? स्त्री बोली, मैंने तो इन्हें अभी-अभी देखा है। तुम भागते-दौड़ते आए हो, इसीलिए तुम्हारे साथ लगी हुई यह चीजें आ गई होंगी। तुमने अपनी जल्दी में ध्यान न रखा होगा कि तुम्हारे पास कुल्हाड़ी और रस्सा भी है।

इस पर जिन्न का क्रोध और भी बढ़ा। उसने स्त्री को भूमि पर पटक दिया और उसे निर्दयता से पीटने लगा और साथ में गालियाँ भी देने लगा। स्त्री तड़पने और रोने- चिल्लाने लगी। उसका करुण क्रंदन मुझसे नहीं सुना जाता था। लेकिन मैं कुछ कर भी नहीं सकता था। मैंने स्त्री के दिए वस्त्र उतारे और वही फटे-पुराने लकड़हारों के वस्त्र पहन लिए जिन्हें पहन कर मैं पिछले दिन आया था। फिर मैं सीढ़ी से चढ़कर ऊपर आ गया। मैं अपने का बराबर कोसता जा रहा था कि मेरी मूर्खता और जिद्दीपन के कारण उसे बेचारी स्त्री पर ऐसा अत्याचार हो रहा है। बाहर आकर मैंने फिर सीढ़ी के मुँह पर लोहे का दरवाजा रखा और उस पर मिट्टी डाल कर उसे छुपा दिया।

फिर मैंने पिछले दिन की जमा की हुई लकड़ियाँ किसी तरह बाँधीं और नगर में आकर लकड़ी का गट्ठा बेच दिया। फिर भी मैं बराबर सोच रहा था कि न जाने उस सुंदर स्त्री पर क्या बीत रही होगी। लकड़ी बेचकर जब मैं अपने निवास स्थान पर आया तो लिपिक मुझे देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने कहा कि तुम कल नहीं आए तो मुझे बड़ी चिंता हो गई थी, मैंने सोचा कि कहीं ऐसा तो नही है कि यहाँ के बादशाह को तुम्हारे यहाँ पर रहने की बात मालूम हो गई हो और उसने तुम्हें पकड़वा मँगाया हो, भगवान का लाख-लाख धन्यवाद है कि तुम सकुशल वापस गए हो।

मैंने उसकी बातों पर उसे हृदय से धन्यवाद दिया किंतु यह न बताया कि कल मेरे साथ क्या बीती थी। मैं अपने कमरे में चला गया और फिर उसी शोक में निमग्न हो गया कि मैंने अपने दुराग्रह से अपनी उपकारिणी स्त्री को कैसा दुख पहुँचाया और अगर मैं वह यंत्र न तोड़ डालता तो उस राजकुमारी पर भी दुख न पड़ता और मैं पाँच दिन बड़े सुख से रहता। मैं यह सोच ही रहा था कि लिपिक मेरे पास आकर कहने लगा कि एक बूढ़ा एक कुल्हाड़ी और रस्सा लेकर आया है और कहता है कि तुम शायद इन्हें जंगल में भूल आए थे। लेकिन वह इन चीजों को तभी वापस करेगा जब तुम बाहर चलकर उसे इनकी पहचान बताओंगे।

यह सुनकर मेरा चेहरा पीला पड़ गया और मैं भय के कारण सिर से पाँव तक थर-थर काँपने लगा। लिपिक ने मुझ से पूछा, यह तुम्हें क्या हो रहा है। मैं अभी उसे उत्तर भी नहीं दे सका था कि कमरे की धरती फट गई और बूढ़ा जिन्न मेरे बाहर आने की राह न देखकर कुल्हाड़ी और रस्सी लिए वहीं आ गया। उसने मुझ से कहा, 'तू जानता है मैं कौन हूँ? मैं ऐसा-वैसा जिन्न नहीं हूँ, स्वयं इबलीस (शैतान) का दौहित्र हूँ। तू जानता है कि इबलीस सारे जिन्नों और दैत्यों का सरताज है। बोल, यह कुल्हाड़ी और यह रस्सा तेरे है या नहीं?

मैं उसे देखकर ऐसा भयभीत हुआ कि मेरी वाक शक्ति ही समाप्त-सी हो गई और मैं अचेत होकर गिरने लगा। जिन्न ने मेरे होश में आने की प्रतीक्षा नहीं की। वह मुझे कमर से पकड़ कर ले उड़ा और दो क्षण में ही मैं इतने ऊँचे पर्वत पर ले जा कर रख दिया जिस पर चढ़ने में महीनों लगते। फिर उसने पहाड़ की चोटी पर पाँव पटका। इससे धरती फट गई। जिन्न मुझे लेकर उस गड्ढे में उतर गया और पलक झपकते ही मुझे उठाए हुए उस मकान में आ गया जहाँ मैंने राजकुमारी के साथ पिछला दिन बिताया था।

यह देख कर मेरे दुख का पाराबार न रहा कि राजकुमारी अब भी जमीन पर पड़ी तड़प रही थी और अधमरी-सी अवस्था में चीख-पुकार कर रही थी। उस जिन्न ने कहा, देख, यह कुलटा तुझ पर मोहित है। स्त्री ने मुझ पर सरसरी निगाह डालकर कहा कि मैं इसे बिल्कुल नहीं जानती, इससे पहले मैंने कभी इसे देखा ही नहीं। जिन्न बोला, तू झूठी है जो कहती है इसे कभी नहीं देखा, इसी आदमी के कारण तेरी जान जाएगी। स्त्री ने कहा कि तुम किसी न किसी बहाने से इसे मार डालना चाहते हो, इसी से मुझ से झूठ कहलवा रहे हो।

जिन्न ने कहा कि अगर तू वास्तव में इससे अपरिचित है तो तलवार उठा और इसका सिर काट दे। राजकुमारी ने कहा, मुझ से तलवार कहाँ उठेगी, इसक अतिरिक्त यह कैसे हो सकता है कि मैं किसी निर्दोष व्यक्ति के प्राण लूँ। जिन्न ने कहा कि ऐसी हालत में भी तू इसे मारने से इनकार करती है, इसी बात से तेरा पापाचार सिद्ध हो जाता है। फिर जिन्न ने मुझ से पूछा कि तू इस स्त्री को जानता है या नहीं। मैंने जी में सोचा कि राजकुमारी स्त्री होकर भी इतना साहस दिखा रही है, मैं मर्द होकर यदि इसका भेद खोलूँ तो इससे अधिक अशोभनीय क्या होगा। इसलिए मैंने भी कहा कि मैंने इससे पहले इस स्त्री को कभी नहीं देखा है। जिन्न बोला, अगर तू सच कहता है तो उठा तलवार और काट दे इसका सिर।

मैं मन में सोचने लगा कि यह तो अत्यंत अनुचित बात होगी कि उस स्त्री को जो मेरे कारण इस दुख में पड़ी थी अपने हाथ से मारूँ। स्त्री ने मुझ से संकेत से कहा कि तुम सोच-विचार न करो, मेरी जान बचने ही की नहीं है, तुम अपने हाथ से मुझे मार डालो, और इस प्रकार अपनी जान बचाओ, मुझे इसी में संतोष मिलेगा। किंतु मैं ऐसा न कर सका। मैं दो पग पीछे हट गया और तलवार हाथ से फेंक कर जिन्न से बोला, तुमने मुझे बिल्कुल कायर पुरुष समझ लिया है कि तुम्हारे कहने भर से किसी अपरिचिता को मार डालूँ। फिर इस सुंदरी की तो तुमने वैसे ही दुर्दशा कर रखी है, मैं इस पर क्या हाथ उठाऊँ। तुम्हें अधिकार है कि जो चाहो वह करो किंतु इस प्रकार का काम मुझसे न होगा।

जिन्न ने कहा, तुम दोनों ही मेरे क्रोध को निरंतर बढ़ा रहे हो। तुम शायद यह नहीं जानते कि मुझ में कितनी शक्ति है।' यह कहकर उस अत्याचारी ने स्त्री के दोनों हाथ काट डाले। वह अधमरी तो पहले ही से हो रही थी, यह चोट खाकर तुरंत मर गई। मैं यह देखकर मूर्छित हो गया। कुछ होश आया तो मैंने जिन्न से कहा कि अब तुम मुझे भी मार डालो और अपना क्रोध शांत करो।

जिन्न ने कहा, हम लोगों का नियम है कि जब किसी को व्यभिचार का दोषी पाते हैं तो उसका वध कर देते हैं। तुम पर मुझे व्यभिचार का संदेह भर है। इसलिए तुझे मारूँगा नहीं, किंतु मानव नहीं रहने दूँगा। अब तू कुत्ता, गधा, सूअर या जो भी पशु-पक्षी बनना चाहे बता दे, मैं तुझे वही बना दूँगा। मैंने उसका क्रोध कुछ कम देखा तो बोला, 'जिन्नों के सरताज, मेरी प्रार्थना है कि एक भले आदमी ने अपने बुरा करने वाले के साथ जैसे उपकार किया था वैसे ही तू मुझे क्षमा कर दे और मुझे आदमी ही रहने दे।' जिन्न ने कहा, यह भले आदमी का क्या किस्सा है। मैंने बताना शुरू किया।
 
किस्सा भले आदमी और ईर्ष्यालु पुरुष का

किसी नगर में दो आदमियों का घर एक दूसरे से लगा हुआ था। उनमें से एक पड़ोसी दूसरे के प्रति ईर्ष्या और द्वेष रखता था। भले मानस ने सोचा कि मकान छोड़कर कहीं जा बसूँ क्योंकि मैं इस आदमी के प्रति उपकार करता हूँ और यह मुझ से वैर ही रखे जाता है। अतएव वह वहाँ से कुछ दूर पर बसे दूसरे नगर में एक अच्छा मकान खरीद कर जिसमें एक अंधा कुआँ भी था, रहने लगा। उसने फकीरों का बाना भी ओढ़ लिया और रात-दिन भगवान के भजन में समय बिताने लगा। उसने अपने मकान में कई कक्ष बनवाए जिनमें वह साधु-संतों को ठहराता और भोजन दिया करता था। इससे वह नगर में बहुत प्रसिद्ध हो गया और लोग उससे मिलने को आने लगे।

उसकी प्रसिद्धि शीघ्र ही बढ़ गई। दूर-दूर से लोग आते और अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए भगवान से प्रार्थना करने के लिए उससे निवेदन करते। उसके चमत्कारों की ख्याति उस नगर में भी पहुँची जहाँ वह पहले रहा करता था। उसके पुराने पड़ोसी को यह सुनकर और भी ईर्ष्या हुई। उसने निश्चय किया कि उसी के मकान में जाकर उसे मार डालूँ। वह जाकर उसके घर पर मिला। संत पुरुष ने अपने पुराने पड़ोसी की बड़ी अभ्यर्थना की। ईर्ष्यालु व्यक्ति ने यह झूठ कहा कि मुझ पर एक विपत्ति पड़ी है जिसके निवारण के लिए मैं तुम से प्रार्थना करने आया हूँ, किंतु मैं इस कठिनाई को गुप्त रखना चाहता हूँ और तुम अपने चेलों तथा अन्य साधुओं से कह देना कि जिस समय मैं और तुम बातें कर रहे हो कोई अन्य व्यक्ति पास में भी न आए। संत पुरुष ने ऐसा ही आदेश दे दिया।

अब उस दुष्ट आदमी ने एक झूठ-मूठ का लंबा किस्सा बनाया और संत पुरुष से कहने लगा। फिर उसने कहा कि हम लोग टहलते हुए ही इस किस्से का कहना-सुनना पूरा करें। संत ने वह भी मान लिया। बात करते-करते जब वे कुएँ के पास आए तो दुष्ट मनुष्य ने संत को अचानक धक्का देकर कुएँ में गिरा दिया और स्वयं चुपके से मकान से चलकर भाग खड़ा हुआ। वह अपने जी में बड़ा प्रसन्न था कि यह आदमी जिसकी प्रसिद्धि ने मुझे जला रखा है खत्म हो गया।

किंतु उस संत पुरुष का भाग्य अच्छा था। उस कुएँ में परियाँ रहती थीं जिन्होंने उसके गिरने पर उसे हाथों-हाथ उठा लिया और सुविधापूर्वक एक जगह बिठा दिया। उसे चोट नहीं आई लेकिन परियाँ उसकी दृष्टि से ओझल ही रहीं। वह संत पुरुष सोचने लगा कि इस दशा में मुझे लाने में भगवान की कुछ कृपा ही होगी। थोड़ी देर में उसे ऐसी आवाजें सुनाई देने लगीं जैसे दो आदमी आपस में बातें करते हो। एक ने कहा, 'तुम्हें मालूम है कि यह आदमी कौन है?' दूसरे ने कहा, 'मुझे नहीं मालूम।' पहले ने कहा, 'मैं तुम्हें इसका हाल बताता हूँ। यह अत्यंत सच्चरित्र और शीलवान व्यक्ति है। इसने अपना नगर छोड़कर यहाँ रहना इसलिए शुरू किया कि इसे वहाँ अपने पड़ोसी से जो इससे जलता था उलझना न पड़े। इस नगर में ईश्वर की दया से इसकी ख्याति बहुत बढ़ गई। इस ख्याति के कारण इसका पुराना पड़ोसी और भी जला और उसने इसे मार डालने का इरादा कर लिया। वह इसके घर आया और इसे बहाने से यहाँ लाकर कुएँ में गिरा दिया। यदि हम लोग इसकी सहायता न करते तो यह मर ही जाता।

पहले ने कहा, 'अब इसका क्या होगा?' दूसरा बोला, 'सब अच्छा होगा। कल इस नगर का बादशाह इसके पास आकर इससे निवेदन करेगा कि यह उस बादशाह की पुत्री के स्वास्थ्य के लिए भगवान से प्रार्थना करे।' पहले ने कहा, 'राजकुमारी को क्या रोग है?' दूसरे ने कहा, 'राजकुमारी पर मैमून नामक जिन्न का पुत्र दिमदिम आसक्त है और वही उसके सिर पर चढ़ा रहता है जिससे राजकुमारी हमेशा बीमार और बदहवास रहती है। उसके हटाने का उपाय बड़ा सरल है। इस संत के घर में एक काली बिल्ली है जिसकी पूँछ की जड़ के पास एक श्वेत हिस्सा है। इस संत को चाहिए कि उस श्वेत भाग से सात बाल उखाड़ कर अपने पास रखे। जब शहजादी इसके पास लाई जाए तो इसे चाहिए कि वे बाल आग में जलाकर उनका धुआँ शहजादी की नाक में पहुँचा दे। इससे वह नीरोग हो जाएगी और आगे भी दिमदिम कभी उनके पास नहीं फटकेगा।'

संत पुरुष ने परियों और उनके साथियों को यह बातचीत सुन कर भली प्रकार याद रखी। रात भर वह कुएँ में रहा। सवेरे जब उजाला हुआ तो उसने देखा कि कुएँ की दीवार में ऊपर से नीचे तक मोखे बने हुए हैं। वह उनके सहारे थोड़ी ही देर में ऊपर आ गया। उसके शिष्य और भक्त जो रात भर उसे खोजते रहे थे उसे देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उसने उनसे कहा कि मैं संयोगवश कुएँ में गिर गया था लेकिन मुझे चोट नहीं आई।

फिर वह अपने घर में आकर बैठ गया। थोड़ी ही देर में काली बिल्ली घूमती-फिरती उसके पास से निकली। संत पुरुष को कुएँ में सुनी बातें याद थीं। इसलिए उसने बिल्ली को पकड़ कर उसकी खाल के श्वेत भाग से सात बाल उखाड़ लिए और अपने पास रखे। कुछ काल के पश्चात नगर का बादशाह वहाँ आया। उसने अपनी सैनिक टुकड़ी बाहर छोड़ी और कुछ सरदारों के साथ मकान के अंदर आ गया। संत पुरुष ने आदरपूर्वक उसका स्वागत किया।

बादशाह ने कहा, 'हे योगीराज, आप तो सबके दिलों का हाल जानते हैं। आप तो समझ ही गए होंगे कि मैं क्यों यहाँ आया हूँ।' संत पुरुष ने कहा, 'शायद आपकी बेटी अस्वस्थ है और उसके स्वास्थ्य लाभ की आशा ही से आपने मुझ अकिंचन की कुटिया को पवित्र किया है।' बादशाह ने कहा, 'आपने बिल्कुल ठीक कहा, मैं इसी कारण यहाँ आया हूँ। अगर आपके आशीर्वाद से मेरी बेटी स्वस्थ हो जाए तो मेरी सबसे बड़ी चिंता दूर हो जाए।'

संत पुरुष ने उत्तर दिया, 'आप अपनी बेटी को यहीं बुलवा लें। मैं भगवान से प्रार्थना करूँगा कि वह स्वस्थ हो जाए और आशा है कि मेरी प्रार्थना स्वीकार होगी।' बादशाह यह सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसके आदेश पर राजकुमारी को उसकी सेविकाओं के साथ वहाँ ले आया गया। शहजादी का चेहरा चादर से अच्छी तरह ढँका हुआ था ताकि उसे कोई देख न सकें। संत पुरुष ने नीचे से चादर का इतना भाग उठाया कि नीचे रखी हुई अँगीठी से उठने वाला धुआँ बाहर न जाए। फिर उसने सात बाल अँगीठी में डाले। धुएँ का राजकुमारी की नाक में पहुँचना था कि मैमून जिन्न का बेटा दिमदिम बड़े जोर से चिल्लाया और तुरंत भाग गया।

जिन्न के जाते ही शहजादी होश में आ गई। वहाँ सँभल कर बैठ गई और अपने को भली-भाँति छिपा कर पूछने लगी कि मैं कहाँ हूँ और यहाँ मुझे कौन लाया है। बादशाह खुशी से फूला न समाया। उसने अपनी बेटी को छाती से लगा लिया और उसकी आँखें चूमने लगा। फिर उसने सम्मानस्वरूप संत पुरुष के हाथ चूमे और अपने सभासदों से राय ली कि इस संत पुरुष के उपकार का बदला किस प्रकार चुकाऊँ। सभासदों ने एकमत होकर कहा कि राजकुमारी का विवाह इसी संतपुरुष के साथ कर देना चाहिए। बादशाह को सभासदों की सलाह पसंद आई और उसने शहजादी का विवाह उसके उपकार कर्ता के साथ कर दिया।

कुछ दिनों बाद बादशाह का प्रमुख अंग मंत्री मर गया और बादशाह ने उसकी जगह अपने दामाद को नियुक्त कर दिया। इसके कुछ समय बाद बादशाह मर गया और चूँकि उस राजकुमारी के अतिरिक्त बादशाह के और कोई संतान नहीं थी अतएव सभी सभासदों और सामंतों की सहमति से उसका दामाद ही राज्य का अधिकारी और नया बादशाह बन गया।

एक दिन वह अपने सरदारों के साथ कहीं जा रहा था कि कुछ दूरी पर उसे अपना पुराना शत्रु दिखाई दिया। नए बादशाह ने अपने मंत्री से चुपके से कहा कि उस आदमी को सहजतापूर्वक मेरे पास ले आओ ताकि वह भयभीत न हो। बादशाह ने उससे कहा, 'मेरे मित्र, तुम्हें इतने दिनों बाद देखकर प्रसन्न हुआ हूँ, तुमने मुझे पहचाना?' वह दुष्ट उसे पहचान कर थर-थर काँपने लगा किंतु बादशाह तो संत पुरुष ही था, उसने उसे एक हजार अशर्फियाँ और कीमती कपड़ों की बीस गाँठें भेंट में देकर उसे सुरक्षापूर्वक उसके घर पहुँचा दिया।

मैंने अपनी कहानी पूरी करके जिन्न से कहा कि उस नेक बादशाह ने तो अपने जानी दुश्मन के साथ यह सलूक किया और तुम मुझ पर तनिक भी दया नहीं करते। किंतु मेरी अनुनय का उस पर कोई प्रभाव न हुआ। उसने कहा मैं तुझे जान से नहीं मार रहा हूँ लेकिन दंड दिए बगैर नहीं छोड़ूँगा, अब मेरा जादू का खेल देख। यह कहकर उसने मुझे पकड़ा और मुझे लेकर आकाश में इतना ऊँचा उड़ गया कि वहाँ से पृथ्वी एक बादल के टुकड़े जैसी लगती थी। फिर एक क्षण ही में मुझे एक ऊँचे पर्वत के शिखर पर ले गया। वहाँ उसने एक मुट्ठी मिट्टी उठाकर उस पर कोई मंत्र पढ़ा और 'बंदर हो जा' कह कर वह मिट्टी मेरे ऊपर छिड़क दी और गायब हो गया।

मैं अपने को बंदर के रूप में पाकर अत्यंत दुखित हुआ। मुझे यह भी मालूम न था कि मैं कहाँ हूँ और वहाँ से मेरा देश किस दिशा में और कितनी दूर है। खैर मैं धीरे-धीरे पहाड़ से उतर कर मैदान में आया और वहाँ भी मैंने सारा प्रदेश निर्जन देखा। अटकल से एक ओर को चलने लगा। एक मास के अंत में मैं समुद्र तट पर पहुँच गया। समुद्र बिल्कुल शांत था और तट से कुछ दूरी पर एक जहाज लंगर डाले खड़ा था।

मैंने जहाज पर जाना ही उचित समझा। किनारे के एक पेड़ से दो टहनियाँ तोड़ीं और उन्हीं के सहारे तैरता हुआ जहाज पर पहुँच गया। जहाज की रस्सी के सहारे मैं जहाज के अंदर पहुँच गया।

जहाज में सवार लोग मुझे देखकर बड़े आश्चर्य में पड़े कि जहाज में बंदर कैसे आ गया। वे लोग मेरे आगमन को अपशकुन समझे और मेरा वध करने की बात करने लगे। एक ने कहा, अभी लट्ठ ला कर इसका सर फोड़ देता हूँ। दूसरे ने कहा, नहीं, यह ऐसे नहीं मरेगा, मैं अभी तीर छोड़कर इनका अंत किए देता हूँ। तीसरे ने मुझे समुद्र में डुबो देने की सलाह दी। मैं उन्हें कैसे बताता कि मैं कौन हूँ, जान बचा कर इधर-उधर भागने लगा।

अंत में सब ओर से निराश होकर जहाज के कप्तान के पास गया और उसके पाँवों पर लौटने लगा। मैंने उसका दामन पकड़ लिया और आँखों में आँसू भर कर चिंचियाने लगा जैसे उससे प्राण रक्षा की भीख माँग रहा हूँ। उसे मुझ पर दया आई और उसने मेरे त्रासदाताओं को डाँट कर भगा दिया और कठोर चेतावनी दी कि इस बंदर को न तो कोई दुख दे और न कोई इसके साथ छेड़छाड़ करे। उसने मुझे ऐसी सुरक्षा प्रदान की कि मुझे जहाज पर कोई दुख न हुआ। मैं यद्यपि बोल नहीं पाता था तथापि समझता तो सब कुछ था और उसकी बातें समझ कर ऐसे संकेत करता था कि उसका बड़ा मनोरंजन होता था। धीरे-धीरे जहाज पर सवार सभी लोग मुझ पर कृपालु हो गए और मुझे प्यार करने लगे।

पचास दिन की यात्रा के बाद जहाज एक बड़े व्यापार केंद्र में पहुँचा। यह बहुत बड़ा नगर था। उसमें बड़े-बड़े मकान थे। जहाज ने मल्लाहों ने जहाज को बंदरगाह में ठहराया। कुछ समय में ही नगर के बड़े-बड़े व्यापारी जहाज को देखकर व्यापार की आशा में उस पर पहुँच गए। जहाज पर उनके कई मित्र व्यापारी थे। यह मित्र आपस की बातें करने लगे और यात्रा का हाल कहने-सुनने लगे क्योंकि जहाज बहुत से देशों से घूमता हुआ आया था।

नगर के व्यापारियों में कई ऐसे भी थे जो वहाँ के ऐश्वर्यवान बादशाह के दरबार में आते-जाते थे। उन्होंने कहा कि हमारा बादशाह तुम्हारे जहाज के यहाँ आने से बड़ा प्रसन्न हुआ है। इसका कारण यह है कि उसे आशा है कि तुम लोगों में कोई सुलेखक भी होगा। बात यह है कि हमारा मंत्री हाल ही में मर गया है। वह अत्यंत निपुण सुलेखकर्ता था। बादशाह गुणियों का बड़ा सम्मान करता है और चाहता है कि उस मंत्री जैसा सुलेखक उसे मिले, इसी चिंता में वह हमेशा रहता है। इसलिए उसने यह कागज भेजा है जिस पर सुलेखन के लिए रेखाएँ खिंची हैं। बादशाह चाहता है कि अगर कोई आदमी तुममें से काफी पढ़ा-लिखा हो तो वह इस पर कुछ इबारत लिखे। उसने कसम खाई है कि वह उसी व्यक्ति को दिवंगत मंत्री का पद देगा जो उसकी भाँति सुलेखन कर सकेगा। और अभी तक बहुत ढूँढ़ने पर भी उसे अपने देश में कोई ऐसा गुणी व्यक्ति नहीं मिल पाया है।

यह सुनकर मैंने बादशाह के सरदार के हाथ से झपटकर वह कागज ले लिया। इस पर जहाज के सभी लोग, विशेषतः पढ़े-लिखे व्यापारी चीख-पुकार करने लगे कि यह बंदर अभी इस कागज को चीर-फाड़ कर समुद्र में फेंक देगा। किंतु जब उन्होंने देखा कि मैंने कागज बड़े ढंग से पकड़ा है तो सब चुप होकर देखने लगे। मैंने संकेत से कहा कि मैं इस पर लेखन कर सकता हूँ। उन लोगों को मेरी बात पर क्या विश्वास होता और सब प्रयत्न करने लगे कि मुझे पकड़ कर मेरे हाथ से कागज ले लें।

किंतु जहाज के कप्तान ने उन्हें रोका और कहा, 'हमें इसकी परीक्षा लेनी चाहिए। अगर इसने कागज को खराब किया तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इसे कड़ा दंड दूँगा। अगर उसने लिख लिया तो मैं अपने पुत्र की भाँति इसे रखूँगा। मुझे मालूम है कि यह कागज को खराब नहीं करेगा। मैंने बराबर देखा कि यह दूसरे बंदरों जैसा नहीं है अपितु अत्यंत बुद्धिमान है।' कप्तान की इस बात पर सब लोग रुक गए और मैंने कलम लेकर चार कविता पंक्तियाँ इतने सुंदर ढंग से लिखीं जैसे कोई व्यापारी या अन्य नागरिक न लिख पाता।

सरदार मेरा लिखा कागज बादशाह के पास ले गया। बादशाह ने मेरे सुलेख को भी पसंद किया और मेरी कविता को भी। उसने सरदारों से कहा कि एक भारी खिलअत (सम्मान परिधान) ले जाओ और उस आदमी को पहनाओ जिसने यह लिखा है और एक बढ़िया घोड़ा भी घुड़साल से ले जाओ और उसे सम्मानपूर्वक सवार कराकर यहाँ ले आओ। सरदार यह आज्ञा सुन कर हँस पड़ा। बादशाह को बड़ा क्रोध आया। उसने कड़क कर कहा, 'यह क्या बदतमीजी है, तुम्हें दंड का भय नहीं है?' सरदार हाथ जोड़कर बोला, 'महाराज, क्षमा करें। यह लेख किसी मनुष्य ने नहीं लिखा। एक बंदर ने इसे लिखा है।'

बादशाह ने कहा, 'क्या बक रहे हो? बंदर भी कहीं लिखता है?' सरदार ने अपने साथियों की ओर देखा। उन्होंने भी हाथ जोड़ कर कहा, 'जहाँपनाह, हम सबने अपनी आँखों से देखा है कि इस कागज पर एक बंदर ही ने लिखा है।' बादशाह का आश्चर्य और बढ़ा और उसने आज्ञा दी, 'मैंने ऐसा बंदर देखा क्या, सुना भी नहीं था। तुम लोग फौरन जाओ और उस बंदर को सम्मानपूर्वक सवार कराकर ले आओ।' चुनांचे सरदार और राज सेवक फिर जहाज पर गए और कप्तान को उन्होंने राजा की आज्ञा सुनाई। कप्तान मुझे भेजने को सहर्ष तैयार हो गया। उसने मुझे जरी के वस्त्र पहनाए और किनारे पर ले आया। वहाँ से घोड़े पर बैठकर राज महल को चल दिया। महल में न केवल बादशाह ही मेरी प्रतीक्षा कर रहा था अपितु नागरिकों की बड़ी भीड़ भी सुलेखन करने वाले बंदर को देखने आई हुई थी।

रास्ते में भी बड़ी भीड़ जमा थी और लोग कोठों और छतों से झाँक-झाँक कर भी मेरी सवारी देख रहे थे। सब लोग आश्चर्य कर रहे थे कि बादशाह ने एक बंदर को मंत्रिपद सँभालने को बुलाया है। कुछ लोग इस बात पर हँस रहे थे और बादशाह का मजाक भी उड़ा रहे थे।

मैं दरबार में पहुँचा तो देखा कि बादशाह सिंहासन पर बैठा है और सभासद और सरदार अपनी-अपनी जगह खड़े हैं। मैंने दरबार के शिष्टाचार के अनुसार तीन बार कोरनिश (भूमि तक हाथ ले जाकर प्रणाम करना) की और एक ओर अदब से खड़ा हो गया। सभी उपस्थित जन मेरे इस व्यवहार को देखकर आश्चर्य में पड़ गए कि बंदर ऐसा शिष्टाचार कैसे कर रहा है। खुद बादशाह को भी मेरी चाल-ढाल देखकर बड़ा आश्चर्य हो रहा था।

कुछ देर में दरबार बर्खास्त हुआ। बादशाह के पास केवल मैं और उसका एक वृद्ध अधिकारी रह गए। हम दोनों बादशाह के आदेश पर उसके साथ महल के अंदर गए। बादशाह ने शाही भोजन मँगवाया और मुझे खाने का इशारा किया। मैं बड़ी तमीज के साथ खाना खाने लगा। जब भोजन समाप्त हुआ और बर्तन उठा लिए गए तो मैंने कलमदान की ओर संकेत किया। कलमदान मेरे पास लाया गया तो मैंने कुछ काव्य पंक्तियाँ बादशाह को धन्यवाद देते हुए रचीं और उन्हें सुंदर ढंग से कागज पर लिख दिया। बादशाह को यह देखकर आश्चर्य और प्रसन्नता और अधिक हुई। उसने मुझे एक पात्र मदिरा से भरकर दिलवाया। उसे पीकर मैंने एक और कविता अपने दुर्भाग्य के बाद मिलने वाले सौभाग्य के संबंध में लिख दी।

अब बादशाह ने शतरंज मँगाई और इशारे से पूछा कि क्या इसे खेल सकते हो। मैंने स्वीकारात्मक रूप से अपने सिर पर हाथ रखा। पहली बाजी बादशाह ने जीती और दूसरी और तीसरी मैंने जीत ली। बादशाह को इस पर झुँझलाहट होने लगी कि वह एक बंदर से हार गया। मैंने फिर एक काव्य रचकर कागज पर लिख दिया जिसका आशय था कि दो योद्धा दिन भर आपस में युद्ध करके शाम को मित्र बन जाते हैं और रात को युद्ध भूमि में सोते रहते हैं।

इस बात से बादशाह का आश्चर्य अत्यधिक बढ़ गया। उसने सोचा कि ऐसा बंदर जो मनुष्य से बढ़कर बुद्धिमत्ता और हाजिरजवाबी प्रदर्शित करे कभी देखा-सुना नहीं गया। उसने यह बात अपने सभासदों से कही तो उन्होंने उसका समर्थन किया। अब बादशाह ने चाहा कि मुझे अपनी रानी और अपनी पुत्री को भी दिखा दे। उसने खोजों के सरदार को आज्ञा दी कि आदमियों को हटाकर बेगम साहबा और शहजादी को यहाँ ले आओ। बेगम तो साधारण रूप से आई लेकिन शहजादी ने जो मुँह खोले आई थी, मुझे देखकर नकाब डाल लिया और बाप से बिगड़ कर बोली कि आपको क्या हो गया है कि अपरिचित पुरुष के सामने मुझे मुँह खोले हुए बुला लिया।

बादशाह ने कहा, 'तुम्हारे होश-हवास तो ठिकाने हैं? यहाँ कौन मर्द है सिवाय मेरे? और मैं तुम्हारा बाप हूँ, मेरे सामने तो तुम्हें मुँह खोल कर आना चाहिए। और तुम हो कि खुद गलती पर हो और मुझे दोष देती हो।' शहजादी ने हाथ जोड़ कर कहा, 'अब्बा हुजूर, मेरी कोई गलती नहीं है। यह एक बड़े बादशाह का पुत्र है और जादू के कारण इस दशा को पहुँचा है। इबलीस के धेवते ने, जो एक शक्तिशाली जिन्न है, पहले आबनूस के द्वीप के बादशाह अबू तैमुरस की बेटी की हत्या कर दी फिर इस शहजादे को अपने जादू से बंदर बना दिया।'

बादशाह को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने मुझ से पूछा कि क्या यह बात ठीक है। मैंने सर पर हाथ रख कर इशारे से कहा कि शहजादी ने जो कुछ कहा है बिल्कुल ठीक कहा है। अब बादशाह ने शहजादी से पूछा कि तुम्हें यह सब किस्सा कैसे मालूम हुआ। उसने कहा, 'आपको याद होगा कि जब मेरा दूध छुड़ाया गया था तो मेरी देख-रेख और पालन-पोषण के लिए एक बुढ़िया रखी गई थी। वह जादू-टोनों में पारंगत थी। उसने मुझे इस विद्या के सत्तर अंग सिखा दिए। अब मुझ में इतनी शक्ति है कि चाहूँ तो आपका सारा देश उठाकर समुद्र में फेंक दूँ। जो व्यक्ति जादू के जोर से मनुष्य के बजाय किसी अन्य जीव को देह धारण कर लेते हैं मैं उन्हें तुरंत पहचान लेती हूँ और मुझे यह भी मालूम हो जाता है कि किसके जादू से यह हुआ है। इसीलिए मैंने इसे पहली ही नजर में पहचान लिया कि यह बंदर नहीं है बल्कि राजकुमार है।'

बादशाह ने कहा, 'बेटी, तुम इतनी गुणी हो, यह मुझे मालूम ही नहीं था। लेकिन क्या तुम में इतनी शक्ति भी है कि इसे अपनी पहली देह में दोबारा पहुँचा दो?' राजकुमारी ने, जिसका नाम मलिका हसन था, कहा, 'निःसंदेह मुझ में ऐसी शक्ति है।' बादशाह ने कहा, 'अगर तुमने ऐसा किया तो मैं तुम्हारा बड़ा आभार मानूँगा और इस राजकुमार को अपना मंत्री बनाकर तुम्हारे साथ इसका विवाह कर दूँगा।'

शहजादी ने पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर अपने सामान में से एक छड़ी मँगवाई जिस पर हिब्रू और मिस्री भाषा में कुछ अक्षर खुदे थे। फिर उसने अपने पिता से कहा कि आप लोग कुछ दूरी पर सुरक्षापूर्वक बैठें। हम लोगों ने ऐसा किया तो शहजादी ने कक्ष की भूमि पर छड़ी से एक बड़ा गोला खींचा और हिब्रू और मिस्री भाषाओं के कुछ मंत्र पढ़ने लगी। इसके पश्चात वह घेरे के अंदर चली गई और कुरान शरीफ की कुछ आयतों का पाठ आरंभ कर दिया।

कुछ ही देर में घटाटोप अँधेरा छा गया। हमें मालूम हो रहा था जैसे प्रलय काल ही आ गया है। हम लोग क्षण-प्रतिक्षण भयभीत होते जा रहे थे। इतने में हमने देखा कि इब्लीस का धेवता जिन्न एक शेर के रूप में गरजता हुआ आ गया। शहजादी ने कहा, 'दुष्ट, तुझे चाहिए था कि मेरे बुलाने पर मेरे पास विनयपूर्वक आता। तेरी यह हिम्मत कि मुझे डराने को यह रूप रख कर आया है।' शेर बोला, 'मनुष्यों और जिन्नों में समझौता हुआ था कि एक दूसरे के मामलों में दखल न देंगे, तूने उस समझौते को तोड़ा है।' शहजादी बोली, 'तूने पहले वह समझौता तोड़ा है।' शेर ने गरज के कहा कि तेरी इस गुस्ताखी का मजा चखाता हूँ जो तूने मुझे यहाँ आने की तकलीफ देकर की है।

यह कहकर वह मुँह फाड़ कर शहजादी की ओर झपटा। वह होशियार थी, उछल कर पीछे हट गई और अपने सिर से एक बाल उखाड़ा और उसे मंत्र करके फेंक दिया। वह बाल तलवार बन गया और उसने शेर के धड़ के दो टुकड़े कर दिए। लेकिन यह टुकड़े गायब हो गए और सिर्फ सिर रह गया जो बिच्छू बन गया। अब शहजादी ने साँप का रूप धारण किया और उस पर टूट पड़ी।

बिच्छू थोड़ी ही देर में घबरा कर पक्षी बन गया और आसमान में उड़ गया। शहजादी भी उकाब बन कर उसके पीछे पड़ गई। उड़ते-उड़ते दोनों हमारी दृष्टि से छुप गए।

कुछ ही देर में हमारे सामने की भूमि फट गई और उसमें से दो बिल्लियाँ लड़ती हुई निकलीं, एक काली थी दूसरी सफेद। कुछ देर तक वे दुम खड़ी करके चीखती रहीं फिर काली बिल्ली भेड़िया बन कर सफेद बिल्ली पर झपटी। सफेद बिल्ली कोई उपाय न देखकर कीड़ा बन गई। और तुरंत एक पेड़ पर चढ़कर उसमें लटके अनार के अंदर घुस गई। वह अनार बढ़ने लगा और बढ़ते-बढ़ते एक घड़े का आकार का हो गया। फिर वह पेड़ से अलग हो गया और हवा में इधर-उधर लहराने लगा।

कुछ देर में वह अनार जमीन पर गिरकर फट गया और उसके टुकड़े इधर-उधर बिखर गए। उसमें से सैकड़ों दाने पृथ्वी पर गिर कर फैल गए। अब वह भेड़िया तुरंत एक मुर्गा बन गया और उसने अनार के बिखरे हुए दानों को जल्दी-जल्दी चुनना शुरू कर दिया। जब वह सारे दाने खा चुका तो हम लोगों के पास आया और जोर से बाँग देने लगा जैसे पूछता हो कि कोई दाना रह तो नहीं गया। वह स्वयं भी इधर-उधर दौड़कर देखने लगा। एक दाना नहर के किनारे पड़ा था। मुर्गा दौड़ा कि उसे भी खा ले लेकिन वह दाना लुढ़कता हुआ नहर में गिर गया।

नहर में गिर कर वह दाना मछली बन गया। मुर्गा भी उसके पीछे नहर में कूद गया। कुछ देर तक दोनों आँखों से ओझल रहे फिर बड़े जोर की चीख-पुकार हुई जिससे हम लोग बहुत डर गए। फिर देखा कि जिन्न और शहजादी दोनों अग्निपुंज हो गए हैं और एक दूसरे की ओर लपटें फेंक रहे हैं जैसे कि आपस में लड़ाई कर रहे हों। ऐसा मालूम होता था कि हर तरफ आग ही आग फैली है। हम इस डर से काँपने लगे कि यह आग हमें तो क्या सारे देश को भूनकर रख देगी। इससे भी भयानक एक समय आया जब जिन्न शहजादी से लड़ना छोड़कर हमारी ओर झपटा और हमारी ओर लपटें फेंकने लगा। लेकिन शहजादी भी झपट कर आई। उसने जिन्न को दूर हटा दिया और हमें और सुरक्षित स्थान पर कर दिया। फिर भी इतनी देर में खोजा जल कर भस्म हो गया, बादशाह का मुँह झुलस गया और मेरी दाईं आँख में एक चिनगारी पड़ गई जिससे मेरी वह आँख फूट गई।

इतने में हम लोगों ने बड़ी जोर का जयघोष सुना। शहजारी मलिका हसन अपने साधारण शरीर में आ गई और जिन्न राख का ढेर होकर दिखाई देने लगा। फिर शहजादी ने एक गुलाम से पानी मँगवाया और उसे अभिमंत्रित कर मुझ पर छिड़का और बोली, 'अगर तू जादू के जोर से बंदर बना है तो फिर से अपनी पहली काया में आ जा ओर पहले की तरह मनुष्य बन जा।' उसके इतना कहते ही मैं पहले जैसा बन गया। सिवाय दाईं आँख फूटने के मुझे और कोई हानि नहीं हुई। मैंने चाहा कि शहजादी को इस उपकार पर धन्यवाद दूँ किंतु शहजादी ने इसका अवसर नहीं दिया। वह बादशाह की तरफ मुँह करके बोली, 'यद्यपि मैंने जिन्न को भस्म कर दिया है लेकिन मैं भी बच नहीं सकूँगी।'

हमारी समझ में कुछ नहीं आया तो उसने बताया, यह अग्नि युद्ध बड़ा भयानक होता है। इसकी आग कुछ क्षणों में मुझे भस्म कर देगी। जब मैं मुर्गा बनी थी उस समय अगर अनार का आखिरी दाना, जिसमें जिन्न ने स्वयं को छुपा रखा था, मेरे अंदर पहुँच जाता तो जिन्न उसी समय खत्म हो जाता और मुझे कोई हानि न पहुँचती। किंतु वह बचकर फिर मुझसे युद्ध करने के योग्य हो गया। अब विवश होकर मुझे अग्नि युद्ध पर उतरना पड़ा। जिन्न ने यह तो समझ लिया कि मैं जादू में निपुण हूँ और उस पर भारी पड़ती हूँ, फिर भी वह अंत समय तक प्राणपण से युद्ध करता रहा। मैंने उसे जलाकर भस्म तो कर दिया लेकिन इस आग से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाऊँगी।'

बादशाह ने रोकर कहा, 'बेटी, तुम कैसी बातें करती हो। तुम्हारे बगैर हम लोग क्या करेंगे। देखती नहीं कि खोजा मर गया है, मेरा मुँह झुलस गया है और यह शहजादा जिसका तुमने इतना उपकार किया है दाईं आँख से काना हो गया है?' बादशाह इस तरह सिर धुन रहा था और मैं भी रो-पीट रहा था कि शहजादी ने चिल्लाना शुरू किया, 'हाय जली, हाय मरी।' और देखते ही देखते वह भी जल कर जिन्न की तरह राख का ढेर हो गई।

दूसरे फकीर ने आँसू बहाते हुए जुबैदा से कहा कि हे सुंदरी, उस समय मुझे जितना दुख हुआ वह वर्णन के बाहर है। मैं सोच रहा था कि अगर मैं बंदर तो क्या कुत्ता भी हो जाता और आजीवन वैसा ही रहता तो भी इस बात से अच्छी बात होती कि ऐसी गुणवती राजकुमारी, जिसने मुझ पर इतना एहसान किया, इस तरह जान से हाथ धोए। बादशाह भी अपनी बेटी के दुख में इतना रोया-पीटा कि बेहोश हो गया। मुझे भय लगने लगा कि ऐसा न हो कि इस दारुण दुख से उसकी जान चली जाए। चारों और हाहाकार होने लगा और राजमहल में प्रलय का-सा दृश्य उपस्थित हो गया।

राजमहल के सारे सेवक और बादशाह के सरदार दौड़े आए और भाँति-भाँति के यत्न करके उसे होश में लाए। मैंने सभी लोगों के आगे पूरा वृत्तांत रखा। फिर राज सेवक बादशाह को उठाकर उसके शयन कक्ष में ले गए। सारे नगर में यह समाचार फैल गया और हर जगह रोना-पीटना मच गया और हाहाकार के सिवाय कुछ नहीं सुनाई दिया। उन लोगों ने सात दिन तक शहजादी के लिए शोक किया और उनके देश में मातम की जो जो रस्में होती थीं सभी पूरी कीं। अंत में जिन्न की राख के ढेर को हवा में उड़ा दिया गया। शहजादी की भस्म को एक बहुमूल्य रेशमी थैले में भर कर दफन कर दिया गया और उस पर समाधि बना दी गई।

बादशाह शहजादी के दुख में बीमार पड़ गया। एक महीने में वह स्वस्थ हुआ। फिर उसने मुझे बुलाया और कहा, 'शहजादे, तेरे कारण मुझ पर असहनीय दुख पड़े हैं। मेरी प्यारी बेटी तेरे ही कारण भस्म हो गई, मेरा विश्वासी खोजों का सरदार जल कर मर गया और मैं भी मरते-मरते बचा। तेरा स्वयं इसमें कोई दोष नहीं है इसलिए मैं तुझे दंड नहीं देता। किंतु तेरा आगमन दुर्भाग्यपूर्ण रहा है और तू जहाँ रहेगा मुसीबत आएगी। इसलिए मैं तुझे यहाँ रहने की अनुमति नहीं दे सकता। तू तुरंत यहाँ से मुँह काला कर। अगर तू यहाँ थोड़ी देर तक भी दिखाई दिया तो मैं स्वयं को न सँभाल सकूँगा और तुझे कठोर दंड दूँगा।' इसी प्रकार वह बहुत देर तक बकता-झकता रहा।

मैं सिर झुका कर सब कुछ सुनता रहा। मैं कह भी क्या सकता था? बादशाह के चुप होते ही मैं उसके सामने से हट आया और महल से बाहर निकल गया। नगर में भी मुझे चैन न मिला। नगर निवासी शहजादी के शोक में विह्वल थे और मुझे ही उसकी मृत्यु का कारण समझ कर जहाँ मुझे पहचानते मुझे मारने के लिए झपटते थे। मैंने विवश होकर अपनी जान बचाने के लिए दाढ़ी, मूँछें और भवें मुँड़वा डालीं और फकीरों के- से वस्त्र पहन लिए और वहाँ से चल दिया। नगर से बाहर आकर भी मैं पश्चात्ताप की आग में बराबर जलता रहा और अपने जीवन को धिक्कारता रहा जिसके कारण दो-दो रूपसी राजकुमारियाँ काल कवलित हुईं। इसी दशा में मैं बहुत समय तक देश-देश फिरता रहा लेकिन मेरा ठिकाना कहीं न लगा।

अंत में मैंने सोचा कि बगदाद नगर में जाऊँ और अति दयाशील खलीफा हारूँ रशीद से अपनी व्यथा गाथा का वर्णन करूँ, संभव है वे मुझ पर दया करके मेरे लिए कोई उचित प्रबंध कर दें। मैं आज शाम ही को इस नगर में पहुँचा। सबसे पहले इस फकीर से, जिसने अभी-अभी अपना हाल कहा है, मेरी भेंट हुई। आपके यहाँ हम कैसे आए यह बताना मुझे जरूरी नहीं है क्योंकि वह पहला फकीर बता ही चुका है।

जब दूसरे फकीर ने अपना वृत्तांत पूरा कर लिया तो जुबैदा ने उससे कहा कि हमने तुझे भी क्षमा किया, तू जहाँ चाहे वहाँ जाने के लिए स्वतंत्र है। अब दूसरे फकीर ने भी इच्छा प्रकट की कि अपने तीसरे साथी को जीवन गाथा भी सुनना चाहता हूँ। इस पर जुबैदा ने कहा, अच्छा, तुम भी मजदूर और पहले फकीर के पास जाकर चुपचाप बैठ जाओ। उसने ऐसा ही किया। जुबैदा ने अब तीसरे फकीर से अपनी कहानी सुनाने को कहा और उसने जुबैदा के सामने बैठ कर कहना आरंभ किया।
 
किस्सा तीसरे फकीर का

हे दयालु सुंदरी, मेरी कहानी बहुत ही आश्चर्यकारी है। इन दोनों शहजादों की दाहिनी आँखें परिस्थितिवश गईं किंतु मेरी आँख मेरी ही मूर्खता और मेरे ही अपराध के कारण फूटी। मैं इसका विस्तृत वर्णन करता हूँ। मेरा नाम अजब है और मैं महा ऐश्वर्यशाली बादशाह किसब का बेटा हूँ। पिता के स्वर्गवास के बाद मैं सिंहासनारूढ़ हुआ और उसी नगर में रहने लगा जिसे मेरे पिता ने अपनी राजधानी बनाया था। मेरी राजधानी समुद्र के किनारे बसी थी। उसकी रक्षा के लिए डेढ़ सौ युद्ध पोत तैयार रहते थे। इसके अलावा दूरस्थ व्यापार के लिए पचास जहाज थे और बहुत-से दूसरे जहाज भी लंगर डाले रहते थे कि लोग उन पर बैठकर समुद्र में सैर-सपाटा किया करें। मेरे राज्य में कई अन्य नगर और द्वीप भी थे।

एक बार मेरी इच्छा हुई कि मैं अपने राज्य के नगरों और द्वीपों को जाकर देखूँ, वहाँ के निवासियों को, जो मेरे पिता की मृत्यु से शोकाकुल थे, सांत्वना दूँ और उन्हें आदेश दूँ कि वे नागरिक कार्यों और व्यापार में तत्परता से लगे रहें। साथ ही मुझे यह शौक हुआ कि मैं जहाज चलाना सीखूँ। इस उद्देश्य से मैं एक बड़े जहाज पर सवार होकर चला। मेरे जहाज के साथ दस जहाज और चल रहे थे। चालीस दिन तक वायु हमारे अनुकूल रही किंतु फिर ऐसा तूफान आया कि हम जीवन की आशा खो बैठे। दूसरे दिन आकाश साफ हो गया। हम लोग एक द्वीप पर उतर पड़े। दो दिन आराम करने और जहाज के भंडार भरने के बाद हम फिर चले। आशा थी कि दस दिन में हम अपने देश को वापस पहुँच जाएँगे। किंतु ऐसा न हुआ। कारण यह था कि जहाज एक अन्य तूफान में रास्ते से भटक गए थे। हमारे कप्तान ने एक आदमी को मस्तूल पर चढ़ाया कि शायद कहीं जमीन दिखाई दे। उसने बताया कि दाईं तरफ कोई काली-सी वस्तु दिखाई दे रही है, शायद भूमि हो। लेकिन यह सुनकर कप्तान सिर पीटने और बाल नोचने लगा और बोला, 'हे स्वामी, अब हम सब खत्म हो जाएँगे। हमारे बचने का कोई उपाय नहीं है।' यह कहकर वह और बुरी तरह रोने-पीटने लगा। उसकी यह दशा देखकर अन्य माँझी भी घबरा गए।

मैंने हैरान होकर कप्तान से पूछा कि हम क्यों समाप्त हो जाएँगे। उसने बताया कि 'तूफान के कारण हमें दिशा ज्ञान नहीं रहा और हम मार्ग से भटक गए और अब हवा के कारण हमारा जहाज उस काली वस्तु के पास जा पहुँचेगा। वह एक चुंबक का पहाड़ है। जहाज वहाँ पहुँचेगा तो उसकी सारी कीलें और लौह पट्टिकाएँ लकड़ी से अलग होकर उससे जा चिपकेंगी और जहाज टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। चुंबक पत्थर में यह गुण होता है कि वह लोहे को आकृष्ट करता है और जैसे-जैसे लोहा उसके समीप आता है कि चुंबक की आकर्षण शक्ति बढ़ जाती है। सैकड़ों जहाजों के लोहे के टुकड़े इस पर्वत में जा चिपके हैं जिनके कारण वह ऊपर से नीचे तक लोहे के टुकड़ों से ढँक गया है और रंग में काला दिखाई देता है। कहते हैं यह पहाड़ बहुत ऊँचा है। उसके सभी किनारे ढलवाँ हैं। उसकी चोटी पर एक बहुत बड़ी पीतल की गोल और मोटी चादर है जो पीतल के खंभों पर टिकी हुई है। उस चादर पर एक घुड़सवार की मूर्ति पीतल की बनी हुई है। सवार की छाती पर एक सीसे की तख्ती लगी है जिस पर कुछ जादू के अक्षर खुदे हैं। कहते हैं कि पहाड़ की आकर्षण शक्ति का कारण वही मूर्ति है।'

यह कहकर कप्तान फिर रोने-पीटने लगा और उसके साथ जहाज के दूसरे माँझी भी रोने-चिल्लाने लगे। मुझे भी लगने लगा कि मेरी उम्र अब खत्म होने को है और मेरी मौत मुझे खींच कर यहाँ लाई है। सभी लोग इस चिंता में पड़े कि कैसे अपने प्राणों की रक्षा करें। वह लोग यह भी कहने लगे कि जो कोई हमारे प्राण बचाए हम सदा के लिए उसके गुलाम हो जाएँगे। सब ने कोई न कोई उपाय सोच लिया। सुबह को हमारा जहाज उस काले पहाड़ के सामने जा पहुँचा। उसे देखकर सबके छक्के छूट गए और जो उपाय लोगों ने बचाव के लिए सोचे थे सब भूल गए और जहाज में ऐसा करुण क्रंदन होने लगा जिसका ठिकाना न था।

दोपहर को वही हुआ जो अनुभवी कप्तान ने कहा था यानी पहाड़ ने जहाजों को इतनी जोर से खींचा कि उनकी कीलें और लोहे की दूसरी चीजें उड़-उड़ कर पहाड़ से चिपकने लगीं। जहाजों के टूटने से महा भयानक शब्द होने लगा और कुछ ही क्षणों में ग्यारहों जहाज सागर तल में समा गए। उन जहाजों की किसी वस्तु और किसी मनुष्य का पता न लगा। एक मैं ही भगवान की दया से जीता रहा। संयोग से एक जहाज का टुकड़ा मेरे हाथ आ गया और मैं उसी के सहारे तैरने लगा। कुछ ही देर में मैं किनारे पर पहाड़ के नीचे पहुँचा। मैं पहाड़ पर चढ़कर सुरक्षित होना चाहता था लेकिन वह ऐसी खड़ी ढलान का पहाड़ था कि कहीं ऊपर जाने की गुंजाइश ही नहीं मालूम होती थी।

अचानक मुझे एक ओर नीचे से ऊपर जाते हुए मानव पदचिह्न गहरे खुदे हुए दिखाई दिए जिनसे ऊपर तक सीढ़ियाँ-सी बन गई थीं। मैंने भगवान का नाम लेकर चढ़ना शुरू किया। चढ़ने की जगह बड़ी तंग थी और कहीं भी दूसरा मार्ग नहीं दिखाई देता था। साथ ही हवा इतने वेग से चल रही थी कि प्रतिक्षण गिरने का भय था। लेकिन भगवान की कृपा से मैं धीरे-धीरे ऊपर तक जा पहुँचा और पीतल के गोले के अंदर जाकर भगवान को धन्यवाद देने लगा कि उसने इतनी कठिन परिस्थितियों में भी मुझे जीवित रखा। रात हो गई थी इसलिए उसी वृत्त के अंदर लेट कर सो गया।

स्वप्न में देखा, मुझ से एक बूढ़ा कह रहा है, 'ऐ अजब, जागने पर अपने पाँवों के नीचे की भूमि खोदना। तुम्हें एक पीतल का धनुष और सीसे के तीन बाण मिलेंगे। वे तीनों तीर घोड़े पर सवार मूर्ति को मारना, इससे मूर्ति समुद्र में जा गिरेगी और घोड़ा तेरे पैरों के पास आ गिरेगा। तुम घोड़े को वहीं भूमि में गाड़ देना। इसके बाद समुद्र में तूफान आएगा और वह चढ़ने लगेगा - यहाँ तक कि तुम्हारे पास आ जाएगा और एक छोटी नाव से तुम एक अन्य समुद्र में पहुँच जाओगे और फिर अपने नगर को पहुँच जाओगे। लेकिन खबरदार, इस सारे समय में भगवान का नाम बिल्कुल नहीं लेना।'

इसके बाद मेरी आँख खुल गई। मैं अपने छुटकारे का उपाय जान कर अति प्रसन्न हुआ। बूढ़े के कहने के अनुसार धरती को खोदा तो उसमें से तीन बाण और धनुष निकले। मैंने कमान से तीनों तीर पीतल के घुड़सवार पर छोड़े। तीसरे तीर के लगते ही सवार की मूर्ति समुद्र में गिर गई और घोड़े की मूर्ति मेरे पाँवों के पास आ गिरी। मैंने उसे उसी जमीन में गाड़ दिया जहाँ से धनुष और बाण निकाले थे। अब समुद्र चढ़ने लगा और चढ़ते-चढ़ते पीतल के घेरे के पास आ गया। जहाँ मैं था वहाँ एक नाव भी आ लगी जिसमें पीतल का माँझी बैठा था। मैं नाव पर बैठ गया।

वृद्ध पुरुष की हिदायत को ध्यान में रखकर मैंने भगवान का नाम न लिया, बल्कि अपना मुँह बंद ही रखा। पीतल का माँझी नौ दिन तक नाव चलाता रहा और ऐसी जगह पहुँच गया जहाँ आसपास कई द्वीप दिखाई दे रहे थे। मैं बहुत खुश हुआ कि अब कठिनाइयों से उबर जाऊँगा और इसी दशा में भगवान को धन्यवाद दे बैठा। तुरंत ही माँझी समेत वह नाव समुद्र में डूब गई।

अब मैं फिर तैरने लगा और एक द्वीप की ओर जाने लगा। कई घंटे तक तैरता रहा। यहाँ तक कि शाम होने लगी और मेरे हाथ-पाँव भी थकन से ऐसे भारी हो गए कि तैरा ही नहीं जाता था। ऐसे ही में एक बड़ी भारी लहर आई और उसने मुझे तट पर ला फेंका। मैं दौड़कर आगे चला गया कि कहीं दूसरी लहर आकर मुझे वापस समुद्र में न खींच ले जाए। मैंने अपने कपड़े उतार कर निचोड़ा और हवा में हिलाकर सुखाए। फिर मैं इधर-उधर घूमकर देखने लगा। कई फल वाले पेड़ दिखाई दिए लेकिन वहाँ आदमी कोई नहीं दिखाई दिया। मैंने कई फल खाए और इस तरह अपनी भूख और थकान दूर की। इसके बाद मैंने अपनी चिंता छोड़ दी और सोचा कि जो भगवान करेगा ठीक ही होगा।

थोड़ी देर बाद देखा कि एक छोटा-सा जहाज पाल उड़ाता हुआ उस द्वीप की ओर आ रहा है। पहले मैंने सोचा कि वह तट पर आए तो मैं उसके पास जाऊँ। फिर सोचा कि अच्छी तरह देख लेना चाहिए, ऐसा तो नहीं कि उसमे लुटेरे हों या मेरे शत्रु हों। इसलिए मैं एक घने और ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया और छुपकर बैठ गया और ध्यानपूर्वक देखने लगा कि जहाज के लोग क्या करते हैं।

कुछ ही देर में जहाज किनारे पर रुका और उसमें से बहुत-से आदमी फावड़े और दूसरे औजार लेकर निकले। फिर वे कुछ दूर जाकर भूमि खोदने लगे। खोदते-खोदते वे एक दरवाजे तक पहुँच गए। फिर वे जहाज में वापस गए और उसमें से बहुत-सी खाद्य वस्तुएँ और बिस्तर, फर्श आदि के बोझों को लादे हुए उसी दरवाजे को उठाकर नीचे चले गए। फिर वे लोग जो नौकर-चाकर ज्ञात होते थे जहाज में जाकर एक वृद्ध पुरुष और चौदह पंद्रह वर्ष के अति सुंदर बालक को लाए और सब के सब दरवाजे से नीचे उतर गए जहाँ स्पष्टतः ही कोई मकान बना हुआ था। वहाँ से लौटकर उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया और उस पर मिट्टी डाल कर बराबर कर दी। लेकिन वे वापस हुए तो वह सुंदर बालक उनके साथ नहीं था।

मुझे यह सब बातें देखकर अत्यंत आश्चर्य हुआ। मैं कुछ देर और देखता रहा। वह जहाज फिर चल पड़ा और जब मैंने देखा कि वहाँ कोई नहीं है तो पेड़ से उतर कर उस स्थान पर गया जहाँ पर उन्होंने भूमि खोदी थी। मैंने वहाँ की मिट्टी हटाई तो देखा कि एक बड़ा चौकोर पत्थर रखा है। उसे उठाया तो दिखाई दिया कि नीचे तक सीढ़ियाँ गई हैं। मैं उतरकर नीचे गया तो देखा कि बहुत बड़ा मकान है जहाँ हर तरफ कालीन बिछे हैं। दालान में कालीन पर सुंदर गद्दे पड़े हैं जिन पर सुनहरे गिलाफ चढ़े हैं। वहाँ पर बालक बैठा था। वह एक हलका-सा पंखा झल रहा था, उसके पास दो बड़ी मोमबत्तियाँ जल रही थीं, कई गुलदस्ते और खाने-पीने की बहुत-सी चीजें उसके पास रखी थीं।

मुझे वहाँ देखकर वह बालक घबरा गया। मैंने उसे तसल्ली देते हुए कहा कि 'तुम मुझसे डरो नहीं। तुम तो राजकुमारों जैसे लगते हो। मैं तुम्हारे जैसे बच्चों को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाना चाहता। मुझे यह देखकर दुख हुआ कि तुम्हारे साथी तुम्हें जीते जी ही इस कब्र में गाड़ गए हैं। खैर, अब तुम चिंता न करो, मैं तुम्हें इस कब्र से निकाल दूँगा। लेकिन पहले तुम अपना किस्सा तो बताओ कि वे लोग तुम्हें यहाँ क्यों गाड़ गए हैं। देखो, सब कुछ निडर होकर सच-सच बताना। कुछ छुपाना नहीं। यह तो मैं देख चुका हूँ कि उन सब लोगों ने मिलकर तुम्हें यहाँ दफन किया है और शायद तुम यहाँ पर जबर्दस्ती लाए गए हो। लेकिन मैं यह जानना चाहता हूँ कि उन लोगों ने ऐसा क्यों किया।'

मेरी बातों से लड़के को तसल्ली हुई। उसने मुझे अपने पास बैठने को कहा और जब मैं बैठ गया तो उसे अपना वृत्तांत आरंभ किया, 'हे महानुभाव, मेरी कहानी बड़ी आश्चर्यजनक है, आप उसे सुनकर स्तंभित रह जाएँगे। मेरा पिता एक जौहरी है। उसने अपनी लगन और बुद्धिमानी से बहुत साधन एकत्रित किया है। उसके सैकड़ों नौकर-चाकर और बहुत-सी कोठियाँ हैं। वह अपने जहाजों पर सवार होकर देश-देश घूमता है। हर स्थान पर उसके गुमाश्ते हैं जो उसकी ओर से रत्नों का क्रय-विक्रय करते हैं।

'इतना प्रचुर धन होने पर भी मेरे पिता के यहाँ बहुत दिनों तक कोई संतान नहीं हुई। एक रात उसने स्वप्न में देखा, कोई कह रहा है कि तुम्हारे यहाँ एक पुत्र होगा किंतु उसकी आयु बहुत कम होगी। यह स्वप्न देख कर मेरे पिता को बड़ा दुख और चिंता व्याप्त हुई। उसके कुछ दिनों बाद मेरी माता ने मेरे पिता को बताया कि मुझे गर्भ रह गया है। उसके नौ महीने बाद मैं पैदा हुआ। मेरे जन्म पर सारे परिवार वालों और नातेदारों को अतीव प्रसन्नता हुई किंतु मेरे पिता को अपना स्वप्न याद करके दुख ही बना रहता था। अतएव उसने ज्योतिषी लोगों से सलाह ली। उन्होंने कहा, इस बालक को चौदहवें वर्ष में मृत्यु का भय है। अगर उस समय बच गया तो फिर यह बहुत दिन जिएगा और इसकी आयु काफी लंबी होगी।

'उन्होंने कहा कि हमें ग्रहों से यह भी ज्ञात हुआ है कि अजब नाम का बादशाह एक पीतल के घुड़सवार को, जो एक चुंबक के पर्वत की चोटी पर मौजूद हैं, समुद्र में गिरा देगा, उसके पचास दिन के बाद अजब बादशाह इस लड़के को मार डालेगा। मेरा पिता तो पहले ही से स्वप्न देखकर दुखी था, अब ज्योतिषियों से यह सुनकर और भी चिंता में पड़ गया और रात-दिन यह सोचता रहता कि इस लड़के की जान कैसे बचाई जाए। इसीलिए उसने यह तहखाने का मकान बनवाया। मुझे चौदहवाँ वर्ष लगा तो दूसरे ही दिन ज्योतिषियों ने आकर कहा कि दस दिन हुए बादशाह अजब ने पीतल के घुड़सवार को समुद्र में गिरा दिया है। यह सोचकर मेरे पिता की चिंता और बढ़ी और वह घंटों तक सोचता रहा कि मेरे सर से ग्रह कैसे टले। अंततः उसने इस निर्जन द्वीप में पहले से बनाए हुए भूमिगत आवास में मुझे बंद करने का निश्चय किया। उसने सोचा कि बादशाह अजब जैसा शक्तिशाली इस निर्जन द्वीप में क्यों आएगा और आएगा भी तो यह तहखाना कैसे पाएगा। इसलिए चालीस दिन तक मुझे इस मकान में बंद कर दिया जाए जिससे न मैं किसी को देखूँ न कोई मुझे देखे। यही कारण है मेरे इस स्थान पर लाए जाने का।'

जब वह बालक अपनी बात कह चुका तो मैं मन ही मन ज्योतिषियों को त्रिकालदर्शी होने के दावे पर हँसने लगा। मैं सोचने लगा ऐसे प्यारे निर्दोष बालक की मैं क्यों हत्या करने लगा। उसे दिलासा देने के खयाल से मैंने उसे अपना नाम तो न बताया किंतु उससे कहा, 'तुम्हें अब डरने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है, मैं तुम्हारी रक्षा के लिए यहाँ आ गया हूँ। यह संयोग ही है कि तुम्हारा रक्षक मैं बना क्योंकि आज ही तट के निकट मेरा जहाज डूबा और मैं अकेला उसमें से बचा और तैरता हुआ इस द्वीप पर आया जहाँ पर मैंने तुम्हारा हाल देखा। तुम भगवान पर भरोसा रखो, किसी प्रकार की चिंता अपने मन में न लाओ। ज्योतिषियों की भविष्यवाणी कभी सच्ची नहीं होगी। मैं यहाँ रह कर चालीस दिन तक तुम्हारी सेवा और रक्षा करूँगा और भगवान की दया से यह चालीस दिन की अवधि भी कुशलतापूर्वक बीत जाएगी। जब तुम्हारा पिता तुम्हें लेने के लिए आएगा तो मैं भी तुम्हारे साथ तुम्हारे देश चला जाऊँगा। और वहाँ से किसी जहाज पर अपने देश के लिए रवाना हो जाऊँगा। मैं आजीवन तुम्हारा उपकार न भूलूँगा।'

मैंने इस प्रकार उससे धैर्य देने वाली बहुत-सी बातें कीं। मैंने ध्यान रखा कि भूल से भी मेरी जिह्वा पर मेरा या मेरे पिता का नाम न आए क्योंकि इससे उस बालक के मन में अकारण भय उत्पन्न हो जाता। उसका जी बहलाने के लिए मैं तरह-तरह की कहानियाँ और अन्य प्रकार के वृत्तांत सुनाता रहा। वह बालक अत्यंत कुशाग्र-बुद्धि जान पड़ता था और इतने दिनों तक चुपचाप रहने के बाद मुझे उससे वार्तालाप कर के बड़ी प्रसन्नता हो रही थी। रात हुई तो हम दोनों ने मिलकर भोजन किया। उसका पिता इतनी खाद्य सामग्री रख गया था कि दो क्या तीन आदमियों तक को चालीस-इकतालीस दिन तक काफी होती।

रात होने पर हम लोग भोजन करने के उपरांत सो गए। दूसरे दिन सुबह जागने पर मैं उसके हाथ-मुँह धोने के लिए उसके पास जल ले गया, फिर हम लोगों ने स्वादिष्ट व्यंजनों का नाश्ता किया। दिन भर उसके साथ शतरंज और चौपड़ खेलकर उसका जी बहलाता रहा। रात को भोजन करके हम लोग फिर सो रहे। हम लोग इसी प्रकार दिन व्यतीत करने लगे और इसके कारण हम दोनों में एक-दूसरे के प्रति स्नेह बहुत बढ़ गया। विशेषतः मुझे तो वह बालक प्राणों से भी प्यारा लगने लगा।

मुझे विश्वास हो गया कि ज्योतिषियों का यह कथन सिर्फ बकवास था कि बालक अजब बादशाह के हाथ से मारा जाएगा क्योंकि अजब बादशाह को - यानी मुझे - तो यह जान से प्यारा है। मैं इसकी हत्या क्यों करूँगा।

इसी प्रकार उनतालीस दिन तक हम दोनों हँसी-खुशी उस घर में रहे। चालीसवें दिन वह सवेरे जागा तो बड़ा खुश था। कहने लगा, 'देखिए महोदय, आज चालीसवाँ दिन है। भगवान की दया से और आपके अनुग्रह से मैं सही-सलामत हूँ। मेरा पिता जब सुनेगा कि आपने इस अवधि में मेरी कितनी सेवा की है और मेरा कितना उपकार किया है तो वह आपका अत्यंत कृतज्ञ होगा और आपको सुरक्षापूर्वक आपके देश में पहुँचा देगा।'

फिर उस लड़के ने मुझसे कहा कि मेरे लिए कुछ जल गर्म कर दीजिए ताकि मैं अच्छी तरह नहाकर नए कपड़े पहनूँ क्योंकि मेरा पिता आज मुझे लेने के लिए आएगा। मैंने पानी गर्म करके उसके नहाने-धोने का प्रबंध कर दिया। नहाने के बाद वह बिस्तर में आ लेटा। मैंने उसे लिहाफ उढ़ा दिया और वह कुछ देर के लिए सो गया। सोकर उठने पर उसने कहा कि महोदय, मेरा जी करता है कि खरबूजा खाऊँ, आप एक खरबूजा और थोड़ी-सी मिश्री मेरे लिए ले आइए। मैंने जाकर खरबूजों के ढेर में से एक अच्छा खरबूजा छाँटा और उसे चीनी की तश्तरी में रखकर उसके पास लाया। फिर मैंने उससे पूछा कि इसे काटने के लिए छुरी चाहिए, छुरी कहाँ है। उसने कहा, मेरे सिरहाने की तरफ जो आला है उसमें छुरी रखी है।

ताक ऊँचा था, मैं उस तक नहीं पहुँच सका। इसलिए मैंने उछलकर छुरी उठाना चाहा। फिर भी यह न हो सका। इसलिए मैं एक मोखे का सहारा लेकर ऊँचा हुआ और छुरी मेरे हाथ में आ गई। मैं चाहता था कि धीरे से उतर जाऊँ लेकिन संयोग से मेरा पाँव फिसल गया और मैं सँभल ही न सका। मैं उस जौहरी के बेटे के ऊपर ही गिरा और मेरे हाथ की छुरी उसके हृदय में घुस गई और वह तड़प कर वहीं ठंडा हो गया।

मुझे अत्यंत शोक हुआ। मैंने अपने कपड़े फाड़ डाले और सिर और छाती पीटने लगा और पछाड़ें खाकर जमीन पर गिरने लगा। मैं बराबर रो-रोकर कहता था कि इस अभागे दिन में कुछ घड़ियाँ रह गई थीं। यह समय भी टल जाता तो लड़के की जान बच जाती। ज्योतिषियों का कहना ठीक ही निकला और मैं अभागा ही इस प्यारे बच्चे की मृत्यु का कारण बना। मैंने आकाश की ओर मुख किया और दोनों हाथ उठाकर कहने लगा कि हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, तू सब कुछ देख रहा हे और तू सब कुछ जानता है। तुझे ज्ञात है कि इस बालक को मैंने जानबूझकर नहीं मारा है, यदि इसकी मृत्यु में मेरा तनिक भी दोष हो तो तू इसी समय मेरे प्राण ले ले। इसी प्रकार मैं बहुत देर तक जौहरी के पुत्र की लाश के पास बैठकर रोता-कलपता रहा।
 
जब दिन थोड़ा-सा ही बाकी रहा तो मैंने सोचा कि अब इसका बाप इसे लेने को आता होगा। मेरी इतने दिनों की सेवा व्यर्थ गई। अब मैं क्या मुँह लेकर उससे मिलूँ। अब मेरा यहाँ ठहरना ठीक नहीं। यह सोचकर मैं मकान से निकला और जीने पर पत्थर रखकर उस पर मिट्टी डालकर बराबर कर दी। बाहर निकल कर देखा तो जौहरी का जहाज पाल उड़ाए चला आता है। मैंने सोचा जौहरी मुझे देखेगा तो अपने बेटे का हत्यारा समझ कर मुझे अपने नौकरों से मरवा डालेगा। कारण यह है कि मैं झूठ नहीं बोलता। इसलिए मैं एक ऊँचे और घने पेड़ पर चढ़ गया और देखने लगा।

जहाज ने किनारे पर लंगर डाला और उसमें से बूढ़ा जौहरी अपने नौकरों के साथ निकल कर हँसी-खुशी किनारे पर आया। तहखाने के पास जाकर उन लोगों ने पत्थर हटा कर जीने का रास्ता खोला लेकिन अब बूढ़े की प्रसन्नता गायब हो गई और उसके मुँह पर झाईं-सी फिर गई। कारण यह था कि उसने अपने पुत्र का नाम लेकर पुकारा तो अंदर से कोई उत्तर न आया। जब वे लोग अंदर गए तो देखा कि लड़का मरा पड़ा है और उसके हृदय में छुरी घुसी है, क्योंकि मुझे छुरी निकालने का ध्यान नहीं रहा। लाश को देखकर उन लोगों में अचानक रोना-चिल्लाना शुरू हो गया।

उन लोगों का विलाप और मृत बालक का उनके मुँह से गुणानुवाद सुनकर मुझे भी रोना आ रहा था। बूढ़ा जौहरी तो बेचारा अपने पुत्र का शव देखकर अचेत ही हो गया। उसके सेवकों ने उसे तहखाने से बाहर निकाल कर उसी पेड़ के नीचे बिठाया जिसके ऊपर मैं छुपा बैठा था। फिर वे लड़के की लाश को बाहर लाए, उसे नहलाया और सफेद कफन पहनाया और कब्र खोदकर उसमें लाश उतार दी। लड़के के पिता ने जो इस बीच बराबर रोता रहा था तीन बार कब्र में मिट्टी डाली और फिर उसके सेवकों ने कब्र को मिट्टी से ऊपर तक भर के बराबर कर दिया।

इसके बाद वे लोग तहखाने में गए और वहाँ से बची हुई खाद्य वस्तुएँ और वस्त्र बाहर लाकर जहाज पर ले गए। कुछ ही देर में उनका जहाज उन सबको लेकर देश को चल दिया। उसके बाद देर बाद मैं पेड़ से उतरा और उसी तहखाने में चला गया। अब मेरा नियम यह हो गया था कि रात मैं उसी घर में रहता और दिन में इधर-उधर घूमकर वहाँ से निकलने के लिए रास्ते की खोज करता रहता। भूख लगने पर जंगली फलों आदि से पेट भरता रहता। इसी प्रकार लगभग एक महीना और बीत गया।

फिर मैंने देखा कि समुद्र का जल धीरे-धीरे घट रहा है। समुद्र के घटने से द्वीप का विस्तार बहुत बढ़ गया। समुद्र इतना घटा कि जहाँ सब से गहरा था वहाँ भी कमर के बराबर पानी रह गया और किनारे से दूसरी ओर की भूमि दिखाई देने लगी। कुछ समय के बाद पानी और घटा और पिंडलियों के बराबर हो गया। अब मैंने उसे पार करने की सोची। समुद्र सूखने से मीलों तक बालू निकल आई थी। बड़ी कठिनाई से वह बालू भूमि पार करके समुद्र तट पर पहुँचा और पानी लाँघ करके दूसरी भूमि पर पहुँचा। वहाँ दूर पर आग जलती दिखाई दी। मैंने सोचा यहाँ पर मनुष्य रहते होंगे क्योंकि बगैर मनुष्यों के आग कैसे जलेगी। पास जाने पर पता चला कि वह आग नहीं है बल्कि ताँबे का बना एक घर है जिस पर सूर्य की किरणें पड़ रही हैं। मैं सोच ही रहा था कि यह मकान किसका हो सकता है कि उसमें से दस नौजवान बाहर निकले और उनके साथ लंबे कद का एक वृद्ध मनुष्य भी था। सारे जवान दाहिनी आँख से काने थे। मैं सोच ही रहा था कि ये लोग कौन हैं, इतने में उन्होंने स्वयं ही आकर मुझ से नम्रतापूर्वक पूछा कि आप कौन हैं और कहाँ से आए हैं।

मैंने कहा कि मेरी कहानी बड़ी विचित्र और बड़ी लंबी है। यदि आप धैर्यपूर्वक सुन सकें तो मैं सुनाऊँ। वे सब सुनने को बैठ गए और मैंने अपना वृत्तांत आद्योपांत सुना दिया। उन्हें यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। फिर वे लोग मुझे उस मकान के अंदर ले गए। उस मकान में कई बड़ी-बड़ी दालानें और बारह दरियाँ पार करके फिर एक बड़ा-सा नीला घर दिखाई दिया। उसके चारों ओर दस कमरे नीले रंग के बने हुए थे जिनमें एक- एक मनुष्य आराम से रह सकता था। कमरों के घेरे के बीच में एक दालान था जो उससे कुछ ऊँचा था। वृद्ध मनुष्य दालान में जा बैठा और चारों ओर के कमरों में दसों जवान कालीनों पर बैठ गए। एक जवान ने मुझ से कहा, 'हे मित्र, तुम भी घर के बीच में बिछे हुए कालीन पर बैठ जाओ लेकिन हम कुछ भी करें उसका कारण न पूछना, न यह पूछना कि तुम लोग दाहिनी आँख से काने क्यों हो।'

कुछ देर में वह बूढ़ा उठा और दसों काने जवानों के लिए खाना लाया। उसने हर एक को खाने में से उसका भाग दिया और एक भाग मुझे भी दिया जिसे मैंने खा लिया। भोजनोपरांत वृद्ध पुरुष ने हम लोगों को एक-एक प्याला सुगंधित मदिरा का दिया। फिर उन लोगों ने मेरे वृत्तांत को जो उन्हें अद्भुत और रोचक लगा था दुबारा सुना। इसके बाद हम इधर-उधर की बहुत-सी बातें करते रहे।

जब काफी रात बीत गई तो एक जवान ने बूढ़े से कहा कि हमारे सोने का समय हो गया है, अभी तुम हमारे दैनिक नियम की चीजें नहीं लाए। बूढ़ा एक कोठरी के अंदर जाकर वहाँ से दस थाल नीले ढक्कनों से ढके हुए लाया और हर जवान के सामने उसने एक-एक थाल रख दिया। ढक्कन खोलने पर हर थाल में राख और काली स्याही थी। उन्होंने राख और स्याही को मिलाकर अपने-अपने चेहरे पर मल लिया जिससे वे सब कुरूप ही नहीं भयानक भी दिखाई देने लगें। फिर वे सब चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगे और मुँह और सीना पीट-पीट कर कहने लगे कि हाय, हमने कैसी भयानक मूर्खता की है और उसका हमें कैसा कुफल मिला है। बहुत देर तक वे जवान इसी प्रकार रोते-पीटते रहे। जब उन्होंने विलाप बंद किया तो वही बूढ़ा एक-एक करके सभी के पास पानी और चिलमची ले गया। सभी ने अपना मुँह धोया और जो कपड़े फाड़ डाले थे उन्हें उतार कर बदला और अपने-अपने कक्ष में जाकर सो रहे।

उन लोगों की यह दशा देखकर मैं अत्यंत उत्कंठित हुआ। मैंने वचन दिया था कि उनसे कुछ न पूछूँगा किंतु मुझे उत्सुकता के कारण रात भर नींद न आई। दूसरे दिन सुबह हम सभी लोग सैर के लिए बाहर निकले तो मैंने उनसे कहा, 'सज्जनो, आप लोग हर तरह ज्ञानवान और बुद्धिमान हैं किंतु कल रात आप लोगों ने जो कुछ किया वह उन्मत्तों के अलावा कोई भी नहीं करेगा। मैं बड़ा परेशान हूँ। मैंने आपको वचन दिया है कि मैं आपके कार्य कलाप के बारे में या आपके काने होने का कारण न पूछूँगा किंतु यह भी सत्य है कि अब यह बातें पूछे बगैर मुझसे रहा नहीं जाता है। इसलिए मैं आप से पूछता हूँ कि आप लोगों ने अपना मुँह क्यों काला किया और क्यों मातम किया और यह भी कि आप सभी दाहिनी आँख से काने क्यों हैं। किंतु उन्होंने कहा कि हम तुम्हें यह सब बातें नहीं बता सकते, अगर तुम्हें हमारे साथ रहना हो तो इन प्रश्नों को भूल जाओ।

वह दिन भी बीता। रात को हम लोगों ने फिर अलग-अलग भोजन किया। उसके बाद बूढ़े ने फिर उन लोगों के सामने स्याही और राख से भरे थाल रखे और उन्होंने रोज की रस्म के तौर पर अपने मुँह काले किए और वही रोना-पीटना शुरू किया। दूसरी बार यह सब देखकर मेरी उत्सुकता और बढ़ गई। अगले दिन मैंने उनसे कहा, 'हे मित्रो, अब मुझे आप लोगों की यह दशा चुपचाप बैठकर नहीं देखी जाती। आप कृपया अपनी बातें मुझे बताएँ और कोई ऐसा भी उपाय बताएँ जिससे मैं अपने देश में पहुँच जाऊँ।'

उनमें से एक जवान ने मुझ से कहा, 'तुम हमारी दशा देखकर दुखी न हो। हम लोग तुम्हारे मित्र और हितचिंतक हैं इसीलिए हम तुम्हें यह बातें नहीं बताते, कही ऐसा न हो कि तुम्हारी दशा भी हम लोगों जैसी हो जाए। वैसे तुम बहुत जोर देते हो तो हम बता भी सकते हैं किंतु उसका फल अच्छा नहीं होगा।' मैंने कहा, मैं यह सब जानना चाहता हूँ, फल चाहे जो कुछ हो। वह जवान बोला, 'देखो, हम तुम्हें एक बार फिर समझाते हैं कि इन बातों को जानने की जिद छोड़ दो। हमारा कहना मानो और इस बारे में कुछ न पूछो वरना हमारी तरह तुम भी काने हो जाओगे।' मैंने कहा, इस बात के फलस्वरूप मुझे जो भी दुख पहुँचे मैं उसे सहने के लिए तैयार हूँ, मैं इसे अपना ही दुर्भाग्य समझूँगा और आप लोगों में से किसी को इसके लिए दोष नहीं दूँगा। उस जवान ने कहा, 'देखो, अगर किसी कारणवश तुम्हारी दाहिनी आँख फूटी और तुम हमारे पास वापस आए तो तुम हमारे साथ नहीं रह पाओगे। तुम देख रहे हो कि यहाँ दस ही कक्ष हैं और दसों भरे हुए हैं। यहाँ अब ग्यारहवें आदमी के रहने की गुंजाइश नहीं है।' मैंने कहा, मुझे यह भी स्वीकार है कि आप मुझे यहाँ न रहने दें, लेकिन अपना भेद जरूर बताएँ।

जब उन दस जवानों ने देखा कि मैं अपनी बात पर अड़ा हुआ हूँ तो उन्होंने एक भेड़ का वध किया और उसकी खाल उतारी। फिर छुरी मुझे दे दी और कहा, 'इसे होशियारी से रखो, यह तुम्हारे बहुत काम आएगी। हम लोग तुम्हें इस भेड़ की खाल में सी देंगे और यहाँ से हट जाएँगे। फिर यहाँ एक अति विशालकाय पक्षी जिसे रुख कहते हैं आएगा और तुम्हें भेड़ समझ कर झपट्टा मार कर उठा लेगा और एक बहुत ऊँचे पहाड़ की चोटी पर रखकर तुम्हें खाना चाहेगा। हम पहले से होशियार किए देते हैं। ज्यों ही तुम्हें मालूम हो कि जमीन पर रखे गए हो, इसी छुरी से खाल को चीरकर बाहर निकल आना और जोर से चीखना। रुख पक्षी इससे डरकर भाग जाएगा।

'इसके बाद तुम निर्भय होकर आगे बढ़ जाना। कुछ दूर चल कर तुम्हें आलीशान महल मिलेगा। उस महल पर ऊपर से नीचे तक हर जगह सोने के पत्तर मढ़े हैं और जगह-जगह पर बड़े सुंदर ढंग से हीरे और दूसरे रत्न जड़े हुए हैं। तुम निर्द्वंद्व रूप से मकान के दरवाजे से, जो हमेशा खुला रहता है, अंदर चले जाना। हम सभी एक-एक करके उस मकान में रहे हैं किंतु उसमें क्या होगा यह बताने की जरूरत हम नहीं समझते और जो कुछ हमारे साथ हुआ वह भी नहीं बताएँगे क्योंकि हमारी दशा ऐसी नहीं है कि उसके कहने-सुनने से खुशी हो। तुम स्वयं ही वह सब देख-सुन लोगे। यह जरूर कहते हैं कि हमारी तरह तुम भी दाहिनी आँख से काने हो जाओगे। वैसे तो तुम पर जो अभी तक बीता है और जो आगे बीतेगा वह सब लिखो तो पूरी पुस्तक तैयार हो जाएगी किंतु हम इससे अधिक कुछ न कहेंगे।'

जब जवान अपनी बात समाप्त कर चुका तो मैंने भेड़ की खाल को अपने चारों ओर लपेट लिया उन लोगों ने कुशलतापूर्वक मुझे इस तरह से सी दिया कि मेरे साँस लेने के लिए जगह रहे। मुझे इस प्रकार सीकर और जंगल में रख कर वे घर के अंदर चले गए। थोड़ी ही देर में रुख नामक विशाल पक्षी आया और भेड़ समझ कर मुझे झपट्टा मारकर पंजों में दबाकर ले उड़ा और एक ऊँचे पहाड़ की चोटी पर ले जाकर रख दिया। नीचे जमीन लगते ही मैं छुरी से खाल फाड़ कर बाहर आ गया और चीख मारी। पक्षी यह देखकर डरकर उड़ गया।

मैं वहाँ से बताए हुए मार्ग पर चल दिया और तीसरे पहर के लगभग महल तक पहुँच गया। जैसा सुना था उससे भी अधिक अच्छा उसे पाया। खुले दरवाजे से अंदर पहुँचा तो अंदर एक और शानदार चौकोर मकान देखा जिसके चारों ओर सौ द्वार थे, एक द्वार स्वर्ण का था और निन्यानबे चंदन की लकड़ी के थे। अंदर कई सुसज्जित वाटिकाएँ और गृह थे। सामने एक बड़ी बारहदरी थी जिसमें चालीस सुंदरी नवयौवनाएँ उत्तमोत्तम वस्त्रालंकारों से सुसज्जित बैठी थीं। मुझे देखकर वे उठ खड़ी हुई। उन्होंने हँस कर मेरा स्वागत किया और कहने लगीं कि हम बहुत देर से आप की प्रतीक्षा में थे। फिर मुझे उन्होंने कुछ ऊँचे स्थान पर बिठाया। मैंने बहुत कहा कि मैं आप लोगों से ऊँचे पर बैठने का अधिकारी नहीं हूँ किंतु वे नहीं मानीं। वे बोलीं, 'आप हम सभी के पति और स्वामी हैं और हम सब आपकी पत्नियाँ और दासियाँ हैं।'

उन्हें देखकर और उनकी बातें सुनकर जो प्रसन्नता मुझे हुई उसका वर्णन संभव नहीं है। कोई सुंदरी मेरे पाँव धोने को गरम पानी लाई, किसी ने सुगंधित जल से मेरे हाथ धुलाए, किसी ने बहुमूल्य वस्त्र लाकर मुझे पहनाए, कोई नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन मेरे सामने ले आई और उन्हें मेरे सामने सजा दिया। कोई नवयौवना सुगंधित मदिरा की सुराही और प्याला लेकर मुझे पिलाने के लिए आ गई। इसी प्रकार वे देर तक हँसी-खुशी तरह-तरह से मेरी सेवा करती रहीं। मैं यह सब देखकर इतना अभिभूत हुआ कि अब तक के अपने सारे दुख-दर्द भूल गया और स्वयं को सारे संसार का अधिपति समझने लगा।

मैंने उन सभी सुंदरियों के साथ बैठकर भोजन और मदिरा पान किया। भोजन के बाद वे मेरे चारों ओर बैठ गईं और उन्होंने मुझ से मेरी यात्रा का वृत्तांत पूछना आरंभ किया और मैंने बताना। इतने में रात हो गई। उन स्त्रियों ने मकान में बड़ी सुंदर रोशनी की और कुछ स्त्रियों ने मुझसे मनोहर ढंग से बातचीत करनी शुरू कर दी ।

फिर उन्होंने भोजन के पात्र हटाकर फल, मिठाई, शर्बत आदि शीशे के सुंदर पात्रों में लेकर सामने रख दिए और मुझे ऊँचे आसान पर बिठाकर मेरे चारों तरफ बैठ कर गाने-बजाने लगीं और उनमें जो नृत्य में प्रवीण थीं वे नृत्य भी करने लगीं। इसी में आधी रात बीत गई। फिर उनमें से एक ने कहा कि आज आप बहुत दूर से आए हैं, अब आराम करें। उसने कहा कि शयन कक्ष तैयार हैं, और सोने से पहले आप हममें से एक को चुन लें तो वह आपके साथ सो रहे। मैंने कहा, 'यह काम तो बड़ा कठिन और अनुचित होगा क्योंकि सौंदर्य में तुम लोग एक से एक बढ़कर हो, मैं किसे चुनूँ। फिर जिसे चुनूँगा उसके अलावा क्या दूसरों को बुरा नहीं लगेगा और क्या वे मेरी धृष्टता पर क्रुद्ध नहीं होगी?' उस सुंदरी ने कहा, 'यह बात नहीं है। हम सब की हार्दिक इच्छा है कि आप को प्रसन्न करें। हममें परस्पर ईर्ष्या नहीं है। आप हम में से जिसका चाहे हाथ पकड़ कर ले जाएँ, कोई दूसरा बुरा नहीं मानेगा क्योंकि हम सभी चाहते हैं कि आप एक-एक करके हम सभी का भोग करें। आप हमसे प्रत्येक का आनंद उड़ाएँगे ही, किसी का आज तो किसी का कल। इसलिए हमें बुरा लगने का प्रश्न ही नहीं है। अब आप बगैर झिझक हम में से जिसे चाहें उसे अपने साथ ले जाएँ। हम सब शहजादियाँ हैं किंतु आपकी सेवा के लिए हैं।'

यह सुनकर मैंने उसी सुंदरी की ओर हाथ बढ़ाया जिसने मुझसे ऐसी बुद्धिमानी की बातें की थीं। उसने तुरंत अपना हाथ मेरे हाथ में दे दिया। मैं उसके साथ अपने शयन कक्ष में आ गया और अन्य उनतालिस स्त्रियाँ अपने-अपने शयनगार में चली गईं। दूसरे दिन सवेरे मैं अच्छी तरह उठ भी नहीं पाया था कि शेष उनतालिस स्त्रियों ने मेरे पास आकर अभिवादन किया और पूछा कि रात को आराम से तो सोए। हाँ, उनके आने के पहले मैंने वे सुंदर वस्त्र और रत्न पहन लिए थे जो मेरे सिरहाने रख दिए गए थे। कुछ देर बातचीत करने के बाद वे स्त्रियाँ मुझे स्नानागार में ले गईं और तरह-तरह की मालिश करके मुझे स्नान कराया। मेरे नहा चुकने के बाद उन्होंने दूसरे वस्त्राभूषण जो पहले वस्त्र आदि से भी उत्तम थे मुझे पहनाया। इसके बाद सारे दिन, बल्कि आधी रात तक पहले दिन की तरह हास-परिहास, किस्सा-कहानी, खाना-पीना और राग-रंग चलता रहा। आधी रात हुई तो उन्होंने कहा कि आप हममें से जिसे चाहें चुन लें कि वह आपके साथ जाकर सो जाए। मैंने एक और सुंदरी का हाथ पकड़ा और उसे लेकर अपने शयन कक्ष में चला गया। सुबह उठकर फिर उन लोगों के साथ स्नानागार में चला गया।

फकीर ने जुबैदा से कहा कि हे सुंदरी, मैं तुमसे किस प्रकार और कहाँ तक बताऊँ कि कैसे आनंद और संतोष में मेरा समय बीतता रहा। दिन भर नाना प्रकार की खाने- पीने और अन्य विलास सामग्री का उपभोग करता और रात को उन चालीस में से किसी एक सुंदरी को अपने शयन कक्ष में ले जाता। इसी प्रकार लगभग एक वर्ष आनंदपूर्वक उस राजमहल में बीत गया। जब वर्ष पूरा होने में एक दिन रह गया तो सुबह को वे सुंदरियाँ जो हमेशा प्रसन्नवदन होकर मुझसे मेरा रात का हाल पूछने आया करती थीं, आँखों में आँसू भरे हुए आईं और कहने लगी कि ऐ शहजादे, हम सब आपसे विदा होने के लिए आए हैं, आपको हम भगवान को सौंपते हैं, वही आपकी रक्षा करेगा।

मुझे उनकी इस बात से बड़ा आश्चर्य और दुख हुआ। मैंने उनसे पूछा, 'ऐसा क्या हो गया कि तुम लोग इतनी दुखी हो और यहाँ से विदा होने की बात क्यों कर रही हो? तुम्हें कहाँ जाना है और क्यों जाना है? भगवान के लिए मुझ से सारी बातें कहो। अगर तुम किसी संकट में हो और तुम्हें मेरी सहायता की आवश्यकता हो तो मुझ से जो भी सहायता बन पड़ेगी वह मैं करूँगा।' उन्होंने कहा, 'कुछ नहीं हो सकता। भगवान की यही इच्छा है कि हम लोग हमेशा के लिए अलग हो जाएँ और आज के बाद न आप कभी हमें देखें न हम आपको देखें। आपकी तरह पहले भी यहाँ कई लोग आए और फिर ऐसे अलग हुए कि हमें आज तक उनका कोई हाल मालूम नहीं हुआ। वही बात आपके साथ होने वाली है।'
 
यह कहने के बाद उन सभी ने विलाप करना आरंभ कर दिया। मैं और घबरा उठा और मैंने उनसे कहा कि तुम लोग साफ-साफ बताती क्यों नहीं कि तुम्हारे दुख-संताप का कारण क्या है। उन्होंने कहा कि हम आप को क्या बताएँ क्यों दुखी हैं। यह समय हमारे आप से सदा के लिए बिछुड़ने का है, हाँ एक बात है कि अगर आपको हमसे मिलने की उत्कट इच्छा हो और उसके लिए जो प्रतिज्ञा करें उस पर दृढ़ रहें तो हम लोगों का आपसे फिर मिलन हो भी सकता है।

मैंने कहा, 'मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया कि तुम्हारी बातों का क्या अर्थ है। मैं तुम्हें ईश्वर की सौगंध दिलाता हूँ कि सारी बात को साफ समझा कर कहो।' अब उनमें से एक ने कहा, 'सबसे पहले तो आप यह समझ लीजिए कि हम चालीसों शहजादियाँ हैं। हम लोग इस स्थान पर एक वर्ष तक आमोद-प्रमोद के लिए आया करते हैं। इसके बाद चालीस दिन के लिए अपने आवश्यक कार्यों के लिए अपने-अपने देश चले जाते हैं। चालीस दिन बाद फिर एक वर्ष के लिए इस महल में आ जाते हैं। कल हमारा यह वर्ष पूरा हो गया इसलिए आज हम लोग आपसे विदा ले रहे हैं। यही कारण है हमारे शोक और विलाप का। हम यहाँ से जाने के पहले आपको यहाँ के सौ कोठों की कुंजियाँ सौंप जाएँगे। हमारे पीछे आप सभी में घूम-फिर कर अपना जी बहलाएँ। लेकिन हम आपको अपनी सौगंध देते हैं कि इस स्वर्णद्वार को न खोलना। अगर आपने इसे खोला तो हमारा-आपका मिलन फिर कभी न हो सकेगा। लेकिन हमें मालूम है कि आप में इतना आत्मसंयम नहीं है कि उस द्वार को न खोलें। आप उसे जरूर खोलेगें और हमेशा के लिए हमसे बिछुड़ जाएँगे। यही कारण है कि हम सारी शहजादियाँ दुखी हैं। अगर भगवान ने आपको सद्बुद्धि दी और आपने उस स्वर्णद्वार को न खोला तो आपको कभी कोई दुख न होगा, आप संपूर्ण आयु चैन से बिताएँगे और हमारे साथ हमेशा आनंद करेंगे। लेकिन अगर आपने हमारे कहने के विपरीत किया तो आपको बहुत अधिक शोक और कष्ट होगा और आपके कष्ट से हमें भी दुख और कष्ट होगा। हम फिर आप से सौगंध देकर कहते हैं कि इस स्वर्णद्वार को न खोलना। हमसे वादा कीजिए कि आप ऐसा नहीं करेंगे कि आप हमसे हमेशा के लिए बिछुड़ जाएँ।

'हम वैसे इस स्वर्णद्वार की चाबी अपने साथ भी ले जा सकते हैं किंतु यह अच्छा नहीं मालूम होता कि आप जैसे जिम्मेदार और बड़े आदमी पर अविश्वास करें और चाबी आपके हाथ में न दें। हाँ एक बार फिर यह कहते हैं कि अगर आपने यह स्वर्णद्वार खोला तो हमें और आपको अतीव कष्ट होगा।'

उनकी बातें सुनकर मैं भी दुखी हुआ। मैंने उनसे कहा, 'मुझे तुम लोगों से अलग होने का अत्यंत दुख है। खैर, किसी प्रकार यह चालीस दिन काटूँगा।तुम्हारी इस नसीहत को हमेशा याद रखूँगा कि यह स्वर्णद्वार न खोलूँ। मुझे तो नहीं मालूम होता कि मुझ में इतना अधैर्य है कि तुम से किया हुआ वादा तोड़ दूँ। इससे अधिक साधारण बात क्या होगी कि मैं सौ दरवाजों को खोल कर घूमूँ-फिरूँ और एक को खोलने से बाज रहूँ। अगर तुम लोग इससे कठिन काम करने को कहती हो उसे भी मैं स्वीकार कर लेता। तुम्हारी बात मानने में तो मेरा ही लाभ है। मैं भला ऐसी बात क्यों करूँगा जिससे मेरी गहरी हानि हो और तुम लोगों से भी हमेशा के लिए अलग होना पड़ जाए। मैं ऐसी बात कभी नहीं करूँगा।'

यह कहकर मैंने उन सभी को एक-एक करके गले लगाया। इसके बाद वे सब चली गईं और मैं उस लंबे-चौड़े राजमहल में अकेला ही रह गया। मुझे अत्यंत शोक हो रहा था। यद्यपि वे केवल चालीस दिन बाद आने वाली थीं तथापि उनके वियोग में मुझे एक-एक घड़ी भारी पड़ रही थी। फिर मैंने अपना जी बहलाने को सोचा कि जिन दरवाजों की चाबियाँ मेरे पास हैं उन्हें खोल कर देखूँ। मैंने सोचा कि निषेध तो केवल एक द्वार के खोलने का है, सो उसे नहीं खोलूँगा।

इसलिए मैंने पहला दरवाजा खोला। अंदर गया तो देखा कि एक बड़ा भारी फलों का बाग है। ऐसा शानदार फलों का बाग संसार में शायद ही कोई और हो। उसमें सहस्रों सघन और सुंदर वृक्ष उचित दूरियों पर लगे थे। उनमें नाना प्रकार के सुस्वादु और आकर्षक रंगों के फल लगे हुए थे। उनमें से बहुत-से फल ऐसे थे जिनका मैं नाम भी नहीं जानता था। उन वृक्षों में सिंचाई का प्रबंध इस प्रकार किया गया था कि एक बड़ी और पक्की नहर से काट काटकर छोटी-छोटी नहरें इस कारीगरी से निकाली गई थीं कि प्रत्येक वृक्ष की जड़ में पानी पहुँचता था। उसके लिए किसी आदमी की जरूरत न थी कि पेड़ों की जड़ों में पानी पहुँचाए। इससे हर पेड़ हरा-भरा रहता था। कई वृक्ष तो इतने अधिक फलों से लदे थे कि उनकी डालियाँ झुक गई थीं। कुछ वृक्षों में केवल इतना पानी पहुँचा था कि उनमें फल पकी हुई हालत ही में रहें। बाग को ऐसे बुद्धिमानों ने लगाया था कि प्रत्येक वृक्ष को केवल उतना पानी पहुँचने का प्रबंध था जिससे वे सदैव हरे-भरे रहें और ऐसा न हो कि सड़ गल जाएँ।

मैं बहुत देर तक उस बाग में घूमता-फिरता रहा। वहाँ बहुत-सी वस्तुएँ थीं जिन्हें देख कर मुझे आश्चर्य होता और मैं प्रत्येक वस्तु को ध्यानपूर्वक देखता। फिर मैं उस बाग में वापस आया और उसके दरवाजे में ताला लगा दिया। फिर मैंने दूसरा दरवाजा खोला। इसके अंदर एक फूलों का बाग था। पहले बाग की जैसी कारीगरी ही से इस बाग के हर पौधे में उचित मात्रा में पानी पहुँचाने का प्रबंध किया गया था। संसार में कोई ऐसा फूल नहीं होगा जो उस वाटिका में न हो। गुलाब, चमेली, नरगिस, बनफ्शा, सौसन, चंपा, बेला, मोतिया आदि नाना प्रकार के फूल वहाँ पर खिले हुए थे। उनकी सुगंध हवा में भरी हुई थी और उसके कारण मस्तिष्क को बड़ा सुख मिल रहा था। मैं सुध-बुध खोकर घंटो वहाँ घूमता रहा।

फिर मैंने उस बाग का दरवाजा भी बंद किया और तीसरा दरवाजा खोला। उसके अंदर एक पक्षीगृह था। उसमें सारा फर्श संगमरमर का था और ऊँचाई से चंदन आबनूस की लकड़ियों से बने पिंजरे लटक रहे थे जिनमें तोता, मैना, बुलबुल, लाल इत्यादि भाँति-भाँति के पक्षी थे। वे अपनी मीठी बोलियों से चित्त प्रसन्न कर रहे थे। उन पिंजरों में दाने और पानी की कुल्हियाँ बहुमूल्य पत्थरों की बनी थीं। इतना बड़ा पक्षी गृह था कि कम से कम आदमी उसकी सँभाल के लिए जरूरी थे लेकिन वहाँ एक भी आदमी दिखाई नहीं देता था। साथ ही इतनी सफाई भी थी कि एक तिनका इधर-उधर पड़ा दिखाई नहीं देता था।

शाम हुई तो सारे पक्षी अपने-अपने पंखों में चोंच डाल कर सो गए और मैं भी पक्षीगृह का ताला लगा कर अपने शयन कक्ष में आ गया और सो रहा। दूसरे दिन सुबह एक और द्वार खोला तो उसमें एक बड़ा महल देखा। उसमें चालीस प्रकोष्ठ बने थे किंतु सभी के दरवाजे खुले थे। एक कोठे में सिर्फ मोती भरे थे। मोतियों के विभिन्न आकारों के हिसाब से ढेर लगे थे। एक ढेर में कबूतर के अंडे जितने बड़े मोती थे। फिर उनसे छोटे मोतियों के कई ढेर थे। दूसरे कोठे में नीलम भरे थे, चौथे में सोने की ईंटें, पाँचवें में अशर्फियाँ, छठे में चाँदी की ईंटें, सातवें में मुद्रा की ढेरियाँ थीं। इसी प्रकार अन्य कोठों में किसी में पुखराज, किसी में पन्ना, किसी में मूँगा आदि रत्न भरे हुए थे। मैं इस असीम रत्नागार को देखकर आश्चर्यान्वित हुआ और सोचने लगा कि मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि इतने खजाने और चालीस सुंदर शहजादियों का स्वामी हूँ।

फकीर ने जुबैदा से कहा कि हे सुंदरी, मैं उस ऐश्वर्य का उल्लेख करने में असमर्थ हूँ जो मैंने वहाँ देखा। उनतालीस दिनों तक मैं विभिन्न द्वारों में जाकर वहाँ की आश्चर्यप्रद वस्तुएँ देखता रहा। चालीसवें दिन मेरे देखने के लिए सिर्फ एक दरवाजा रह गया। यह वही दरवाजा था जिसे खोलने को मुझ से मना किया गया था। मुझे शैतान ने बहका दिया और मैंने अपनी कसमें और वादे तोड़कर उस दरवाजे को भी खोल डाला। दरवाजा खोलते ही उससे बड़ी तेज सुगंध आई जिससे मैं सुध-बुध खो बैठा। होश में आया तो अंदर गया और ठहर कर उस गंध के कम होने की प्रतीक्षा करने लगा। फिर अंदर जाकर देखा तो बहुत बड़ा महल है जिसके फर्श पर केसर बिछी है और सोने की तिपाइयों पर चाँदी के दीपक जल रहे हैं जिनमें इत्र के जैसे सुगंधित तेल भरे थे। इसी से वहाँ तेज सुगंध हो रही थी। और भी कई आश्चर्य की चीजें मैंने वहाँ पर देखीं।

मैंने देखा कि एक ओर बहुत उम्दा मुश्की घोड़ा बँधा है। उसके सामने जो जल पात्र था उसमें गुलाब जल भरा हुआ था और खाने की नाँद में तिल और जौर भरे थे। उस घोड़े की लगाम में सोने के पत्तर लगे थे। मैंने उस घोड़े की लगाम पकड़ कर उसे बाहर निकाला कि बाहर के प्रकाश में उसे भली प्रकार देख लूँ। बाहर लाकर मैं उस पर सवार हो गया और उसे चलने का इशारा दिया। लेकिन वह न चला। फिर मैंने उसे एक चाबुक मारा। चाबुक लगते ही घोड़ा भयानक रूप से हिनहिनाया और अपने पंखों से -जिन्हें मैंने पहले नहीं देखा था - उड़ चला। मैं घबराकर उसकी अयाल पकड़ कर लटक गया। घोड़ा मुझे लेकर इतना ऊँचा उड़ा कि वहाँ से पृथ्वी बहुत छोटी दिखाई देती थी। फिर वह उतर कर उसी ताँबे के मकान की छत पर पहुँच गया जहाँ पर मैं पहले पहुँचा था। वहाँ उसने अपने शरीर को इतने जोर का झटका दिया कि मैं पीठ के बल जमीन पर गिरा। घोड़े ने अपनी पूँछ मेरी दाहिनी आँख में मारी जिससे वह फूट गई। फिर घोड़ा उड़ गया।

मैं किसी तरह गिरता-पड़ता नीचे आया। नीचे बारहदरी और उसके इर्दगिर्द बने हुए दस कमरों को देखकर मुझे विश्वास हो गया कि यह वही महल है जहाँ मैं पहले आया था। उस समय वे दस जवान वहाँ नहीं थे। मैं उनकी प्रतीक्षा करने लगा। कुछ देर में वे लोग बूढ़े आदमी के साथ वहाँ आए। उन्होंने न मेरी ओर कुछ ध्यान दिया न मेरी आँख फूटने पर सहानुभूति प्रकट की। उन्होंने कहा, 'देखो भाई, हम लोग तो तुम्हारे दुर्भाग्य का कारण नहीं सिद्ध हुए।' मैंने कहा, 'आप लोग ठीक कहते हैं। मुझ पर जो मुसीबत पड़ी वह अपनी ही मूर्खता के कारण पड़ी किंतु मैं जानना चाहता हूँ कि इस मुसीबत को दूर करने का भी उपाय है या नहीं।'

उन्होंने कहा, 'अगर हम ऐसा उपाय जानते तो अपनी मुसीबत को दूर न कर लेते? तुम्हारी तरह हम लोग भी एक-एक वर्ष तक उन शहजादियों के साथ आनंदपूर्वक रहे। अगर हम वह स्वर्णद्वार न खोलते तो हम उनके साथ आनंदपूर्वक रहते। तुम हम लोगो से अधिक बुद्धिमान दिखाई देते थे फिर भी तुम वह सोने का दरवाजा खोलने से बाज न आ सके और अपने को ऐसी मुसीबत में डाल बैठे। अच्छा; यह तो हम तुम्हें पहले ही बता चुके हैं कि अब यहाँ ग्यारहवें आदमी के रहने के लिए स्थान नहीं है। तुम्हारे लिए यही उचित होगा कि तुम यहाँ से बगदाद जाओ जहाँ का रास्ता हम बता देंगे। वहाँ तुम्हें ऐसा व्यक्ति मिलेगा जो तुम्हारे दुख दूर करेगा।' उनकी सलाह मानकर मैं बगदाद पहुँचा। रास्ते में दाढ़ी-मूँछ और भवें मुँडवा दीं और फकीरों के वस्त्र पहन लिए। चलते-चलते बहुत दिन बाद आज शाम को बगदाद पहुँचा। परकोटे पर इन दोनों साथियों से भेंट हुई। फिर तुम्हारे घर आए जहाँ तुमने हमारा बड़ा सत्कार किया।

जब तीसरा फकीर अपना हाल कह चुका तो जुबैदा ने उससे और उसके दोनों साथियों से कहा कि मैंने तुम तीनों का अपराध क्षमा किया, अब तुम लोग यहाँ से चले जाओ। एक फकीर ने कहा कि आप कृपा करके हमे इतनी अनुमति दें कि हम यहाँ रुक कर इन बाकी तीन आदमियों की कहानी भी सुन लें। जुबैदा ने खलीफा, जाफर और मसरूर की ओर देखकर अपना-अपना हाल कहने का इशारा किया। वह यह तो जानती ही न थी कि यह लोग कितने उच्च पद के हैं, इसीलिए उसने उन्हें अपना-अपना हाल सुनाने की आज्ञा दी।

खलीफा के मंत्री जाफर ने निवेदन किया, 'हे सुंदरी, हम लोग इस महल में प्रवेश करने के समय ही अपना-अपना हाल कह चुके हैं। अब तुमने फिर पूछा है तो कहते हैं कि हम लोग मोसिल से आए हुए व्यापारी हैं। हम अपनी व्यापार की वस्तुएँ बेचने यहाँ आए थे और एक सराय में उतरे थे। आज रात के लिए एक व्यापारी ने हमें खाने का निमंत्रण दिया। जब हम उसके घर पहुँचे तो उसने हम लोगों को अत्यंत स्वादिष्ट भोजन कराया और बढ़िया शराब पिलाई। फिर देर तक उसके यहाँ संगीत और नृत्य का कार्यक्रम चला। वहाँ का शोर इतना बढ़ा कि गश्त पर निकले सिपाही आ गए। उन्होंने कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया। हम लोग भाग्यशाली थे कि किसी प्रकार बचकर निकल आए। लेकिन रात अधिक बीत जाने के कारण हमारी सराय का द्वार बंद हो गया था। हम लोग परेशान थे कि रात कहाँ बिताएँ। इधर-उधर भटकते हुए तुम्हारी गली में आ गए। तुम्हारे घर में हँसने-बोलने और गाने-बजाने की आवाजें आ रही थीं। इसीलिए हमने दरवाजा खुलवाया। तुमने कृपा कर हम लोगों का आदर-सत्कार किया। यही हमारी कहानी है।

मंत्री ने यह बात इतने आत्मविश्वास और इतनी कुशलता से कही कि जुबैदा को उसकी सत्यता में विश्वास हो गया। उसने कहा, 'अच्छा, हमने तुम्हारा भी अपराध क्षमा किया और अब तुम सब यहाँ से चले जाओ।' वे लोग उठने में झिझके तो जुबैदा ने क्रोध में भर कर कहा, 'जाते हो या जान देना चाहते हो?' उसकी डाँट सुनकर वे सातों व्यक्ति मजदूर, तीनों फकीर, खलीफा और उसके दोनों साथी - चुपचाप उठकर बाहर आ गए क्योंकि सात हब्शी नंगी तलवारें लिए उनके सर पर खड़े थे। सातों व्यक्तियों के घर से निकलते ही स्त्रियों ने घर का दरवाजा बंद कर लिया।

बाहर आकर खलीफा ने इन फकीरों से कहा कि इतनी रात बीत गई है, अब तुम लोग कहाँ जाओगे क्योंकि तुम इस नगर से परिचित भी नहीं हो। उन तीनों ने कहा कि हम लोग भी इसी चिंता में हैं। खलीफा ने कहा, तुम लोग हमारे साथ आओ, हम तुम्हारी सहायता करेंगे। यह कह कर खलीफा ने मंत्री के कान में कहा कि इन तीनों को अपने घर ले जाकर ठहराओ और कल मेरे दरबार में हाजिर करो। अतएव मंत्री जाफर उन तीनों फकीरों को अपने घर ले गया और इधर मसरूर सहित खलीफा भी अपने महल में आ गया।

खलीफा शयन कक्ष में जाकर अपनी शय्या पर लेट गया किंतु उसे सारी रात नींद नहीं आई। उसने जो कुछ देखा-सुना था उस का वैचित्र्य उसके चित्त से उतरता ही नहीं था। वह इसी चिंता में था कि यह बात जान ले कि जुबैदा कौन है और उसने दोनों कुतियों को क्यों मारा और फिर क्यों प्यार किया, साथ ही उसे यह जानने की भी बड़ी इच्छा थी कि अमीना के शरीर पर जो काले निशान पड़े हैं उनका क्या भेद है।

सुबह वह नित्य कर्म, नाश्ता आदि से निश्चिंत होकर दरबार में गया और सिंहासन पर बैठ गया। कुछ देर में मंत्री ने आकर उसे प्रणाम किया। खलीफा ने मंत्री से कहा, 'जब तक मैं उन तीनों स्त्रियों और दोनों काली कुतियों का पूरा हाल न जान लूँगा मुझे चैन न मिलेगा। इसी कारण मुझे रात भर नींद नहीं आई है। तुम तुरंत जाओ और उन तीनों फकीरों और तीनों स्त्रियों को मेरे सन्मुख उपस्थित करो।' मंत्री ने उस मकान में जाकर पिछली रात की बातों का उल्लेख किए बगैर उन तीनों स्त्रियों से कहा कि खलीफा तुम लोगों से कुछ बात करना चाहते हैं, तुम दरबार में चलो। अतएव वे तीनों अपने ऊपर बुरका डाल कर मंत्री के साथ चल दीं। रास्ते में मंत्री ने अपने घर होते हुए तीनों फकीरों को भी बगैर उन्हें कुछ बताए अपने साथ ले लिया।

खलीफा उन स्त्रियों और फकीरों को देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने तीनों स्त्रियों को अपने पीछे की ओर परदे के पीछे बिठाया ताकि दरबारियों और सेवकों पर प्रकट हो जाए कि ये सम्मानीय महिलाएँ हैं। फिर उसने उन तीनों फकीरों को जो दरअसल राजा और राजकुमार थे, उनकी प्रतिष्ठा के अनुसार अपने समीप आसन दिए। स्त्रियों के आसन ग्रहण करने के बाद खलीफा ने उनकी ओर मुँह करके कहा, 'कल रात मैंने मोसिल के व्यापारी के रूप में तुमसे भेंट की थी। हमारी बातों से तुम लोगों को कुछ दुख हुआ था और इसीलिए तुम हम लोगों से नाराज हुई थीं। मैंने आज जो तुम्हें बुलाया है वह इसलिए नहीं कि मैं तुम लोगों को कोई दंड देना चाहता हूँ। मैंने वह बात तो भुला दी है। मैं तुम्हारे आने से बड़ा प्रसन्न हूँ। तुममें जो सद्बुद्धि है वह यदि बगदाद की सारी स्त्रियों में आ जाए तो कितना अच्छा हो। यद्यपि हमने अपना वादा तोड़ कर तुम्हें दुख पहुँचाया किंतु फिर भी तुमने हम लोगों पर कृपा करके हमें छोड़ दिया।'

खलीफा ने आगे कहा, 'कल रात में मोसिल का व्यापारी था और तुम्हारे आदेश में था। इस समय मैं हारूँ रशीद, अब्बास वंश का सातवाँ खलीफा और हजरत मुहम्मद का वंशज हूँ। मैंने तुम्हें इसलिए बुलाया है कि मैं जानूँ कि तुम कौन हो और तुम तीनों में से एक स्त्री के कंधों पर काले निशान किसलिए हैं।' यद्यपि खलीफा ने यह सब स्पष्ट शब्दों में उनसे कहा था तथापि मंत्री ने एक बार फिर इन बातों को दुहरा दिया। यह सुनकर जुबैदा ने आप बीती आरंभ कर दी।
 
किस्सा जुबैदा का

जुबैदा ने खलीफा के सामने सर झुका कर निवेदन किया है राजाधिराज, मेरी कहानी बड़ी ही विचित्र है, आपने इस प्रकार की कोई कहानी नहीं सुनी होगी। मैं और वे दोनों काली कुतियाँ तीनों सगी बहिनें हैं और यह दो स्त्रियाँ जो मेरे साथ बैठी हैं मेरी सौतेली बहनें हैं। जिस स्त्री के कंधों पर काले निशान हैं उसका नाम अमीना है, जो अन्य स्त्री मेरे साथ है उसका नाम साफी है और मेरा नाम जुबैदा है। अब मैं आपको बताती हूँ कि मेरी सगी बहनें कुतिया किस तरह से बन गईं।

जुबैदा ने कहा कि पिता के मरने के बाद हम पाँचों बहनों ने उनकी संपत्ति को आपस में बाँट लिया। मेरी सौतेली बहनें अपना-अपना भाग लेकर अपनी माता के साथ रहने लगीं और हम तीनों अपनी माता के पास रहने लगीं, क्योंकि उस समय हमारी माता जीवित थी। मेरी दोनों बहनें मुझ से बड़ी थीं। उन्होंने विवाह कर लिए और अपने-अपने पतियों के घर जाकर रहने लगीं और मैं अकेली रहने लगी।

कुछ समय के पश्चात मेरी बड़ी बहन के पति ने अपना सारा माल बेच डाला और मेरी बहन का रुपया भी उस रुपए में मिलाकर व्यापार के इरादे से वह अफ्रीका को चला गया और मेरी बहन को भी ले गया। किंतु वहाँ जाकर उसने व्यापार के बजाय भोग- विलास आरंभ किया और कुछ ही दिनों में अपना और मेरी बहन का सारा धन उड़ा डाला बल्कि उसके वस्त्राभूषण आदि भी बेच खाए। फिर उसने किसी बहाने से मेरी बहन को तलाक दे दिया और घर से भी निकाल दिया। वह अत्यंत दीन-हीन अवस्था में हजार दुख उठाती हुई बगदाद पहुँची और चूँकि उसके लिए और कोई स्थान नहीं था अतएव मेरे घर आई।

मैंने उसका बड़ा स्वागत-सत्कार किया और उससे पूछा कि तुम्हारी यह दुर्दशा कैसे हुई। उसने अपनी करुण कथा सुनाई जिसे सुनकर मैं बहुत रोई। फिर मैंने उसे स्नान कराया और अपने वस्त्रों के भंडार से अच्छे कपड़े निकाल कर उसे पहनाए। मैंने उससे कहा, 'अब तुम आराम से यहाँ रहो। तुम मेरी माँ की जगह हो। भगवान ने मुझ पर बड़ी दया की है कि तुम्हारे जाने के बाद मैंने रेशमी वस्त्रों का व्यापार किया जिससे मुझे बहुत लाभ हुआ है। अब जो कुछ मेरे पास है वह भी अपना समझो और तुम भी मेरे साथ मिलकर यही व्यापार करो।'

नितांत उसके बाद से हम दोनों बहनें संतोष और सुख के साथ रहने लगीं। अकसर ही हम लोग अपनी तीसरी बहन को याद करते कि वह न जाने कहाँ होगी। बहुत दिनों तक हमें उसका कोई समाचार नहीं मिला कि वह कहाँ है और किस दिशा में है किंतु अचानक एक दिन वह मँझली बहन भी बड़ी बहन के समान दीन-हीन अवस्था में मेरे पास आई क्योंकि उसके पति ने भी उसकी संपूर्ण संपत्ति को उड़ा डाला था और फिर उसे तलाक देकर अपने घर से निकाल दिया था ओर वह भी गिरती-पड़ती बगदाद पहुँच कर मेरे घर में शरण लेने के लिए आई थी।

मैंने उसका भी बड़ी बहन की भाँति स्वागत-सत्कार किया और उसे बड़ा दिलासा दिया। वह भी आराम से रहने लगी। लेकिन कुछ दिनों बाद इन दोनों ने मुझसे कहा कि हमारे रहने से तुम्हें कष्ट भी होता है और हम पर तुम्हारा पैसा भी खर्च होता है इसलिए हम लोग फिर से विवाह करेंगे। मैंने कहा, 'यदि मेरी असुविधा भर से तुम्हें यह खयाल पैदा हुआ कि विवाह कर लेना चाहिए तो यह बेकार बात है क्योंकि भगवान की दया से व्यापार में मुझे इतना लाभ हो रहा है कि हम तीनों बहनें जीवनपर्यंत आनंद और सुख-सुविधा से रह सकती हैं। तुम्हें मेरे पास कोई कष्ट न होगा। तुम्हारे विवाह करने की इच्छा को सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य है। तुम लोगों ने अपने-अपने पतियों के हाथों इतने कष्ट उठाए हैं। फिर भी मुसीबत में पड़ना चाहती हो। अच्छे पतियों का मिलना अत्यंत दुष्कर है। इसलिए तुम विवाह का विचार छोड़ दो।'

इस प्रकार मैंने उन्हें बहुत समझाया। लेकिन वे दोनों अपनी बात पर दृढ़ रहीं। वे मुझसे कहने लगीं, 'तू हमसे अवस्था में कम है किंतु बुद्धि में अधिक है। किंतु जितने दिन रह लिया उससे अधिक हम तेरे घर में न रहेंगे क्योंकि आखिर तू हमें अपनी आश्रिता ही समझती होगी और अपने हृदय में हमारा सम्मान दासियों से अधिक नहीं करती होगी।' मैंने कहा, 'यह तुम लोग क्या कह रही हो? मैं तो तुम्हें वैसा ही अपने से ज्येष्ठ और सम्मानीय समझती हूँ जैसा पहले जमाने में समझती थी। मेरे पास जो भी धन-संपत्ति है वह तुम्हारी ही है।' यह कह कर मैंने उनको गले लगाया और बहुत दिलासा दिया। और हम तीनों मिल कर पहले की तरह रहने लगे।

एक वर्ष के पश्चात भगवान की दया से मेरा व्यापार ऐसा चमका कि मेरी इच्छा हुई कि उसे अन्य नगरों तक बढ़ाऊँ। अतएव मैंने जहाज पर सामान लाद कर किसी अन्य देश में भी व्यापार जमाने की सोची। मैं व्यापार की वस्तुओं और अपनी दोनों बहनों को लेकर बगदाद से बूशहर में आई और एक छोटा-सा जहाज खरीद कर मैंने अपनी व्यापार की वस्तुओं को उस पर लाद दिया और चल पड़ी। वायु हमारे अनुकूल थी इसीलिए हम लोग फारस की खाड़ी में पहुँच गए और वहाँ से हमारा जहाज हिंदोस्तान के लिए चल पड़ा। बीस दिन बाद हम लोग एक टापू पर पहुँचे जिसके पिछले भाग में एक बहुत ऊँचा पर्वत था। द्वीप में समुद्र के किनारे ही एक बड़ा और सुंदर नगर बसा था।

मैं जहाज पर बैठे-बैठे बहुत ऊब गई थी इसलिए अपनी बहनों को जहाज ही पर छोड़कर एक डोंगी पर बैठ कर तट पर गई। नगर के द्वार पर काफी संख्या में सेना रक्षा के लिए नियुक्त थी और कई सिपाही चुस्ती से अपनी जगहों पर खड़े थे। उनका रूप बड़ा भयोत्पादक था। मैं कुछ डरी किंतु मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनके हाथ-पाँव में कोई हरकत नहीं होती थी बल्कि उनकी पलकें भी नहीं झपकती थीं। मैं पास पहुँची तो देखा कि सारे सैनिक पत्थर के बने हैं। मैं नगर के भीतर चली गई। वहाँ भी देखा कि हर चीज पत्थर की है। बाजार की दुकानें बंद थीं। भाड़ों में से भी धुआँ नहीं निकल रहा था और न घरों से। चुनांचे मैं समझ गई कि यहाँ भी सब लोग पत्थर के हो गए होंगे।

मैंने नगर के एक ओर एक बड़ा मैदान देखा जिसके एक ओर एक बड़ा फाटक था और उसमें सोने के पत्तर लगे थे। खुले फाटक के अंदर गई तो एक बड़ा दरवाजा देखा जिस पर रेशमी परदा लटक रहा था। स्पष्टता ही वह राजमहल लगता था। मैं परदा उठाकर अंदर गई तो देखा कि कई चोबदार वहाँ मौजूद हैं - कुछ खड़े हैं कुछ बैठे हैं - किंतु वे सबके सब पत्थर के बने हुए थे। मैं और अंदर गई फिर वहाँ से तीसरे भवन में प्रविष्ट हुई। सभी जगह देखा कि जीता-जागता कोई मनुष्य नहीं है, जो भी है वह पत्थर का बना हुआ है। चौथा मकान अत्यंत सुंदर बना था, उसके द्वार और जंजीरें सभी सोने के बने हुए थे। मैंने समझ लिया कि यह कक्ष रानी का निवास स्थान होगा। अंदर जाकर देखा कि एक दालान में बहुत-से हब्शी काले संगमरमर के बने हुए हैं। दालान के अंदर एक सजा हुआ कमरा था जिसमें एक पत्थर की स्त्री सिर पर रत्नजड़ित मुकुट पहने बैठी है। मैंने समझ लिया कि यह रानी होगी। उसके गले में एक नीलम का हार पड़ा था जिसका हर एक दाना सुपारी के बराबर था। मैंने पास जाकर देखा कि इतने बड़े होने पर भी वे रत्न बिल्कुल गोल और चिकने थे। वहाँ के बहुमूल्य रत्नों और वस्त्रों को देखकर मुसे आश्चर्य हुआ। वहाँ फर्श पर गलीचे बिछे हुए थे और मसनद और गद्दे आदि अलस कमरव्वाब आदि बहुमूल्य वस्त्रों के बने हुए थे।

मैं वहाँ से और अंदर गई। कई मकान बड़े सुंदर दिखाई दिए। उन सब से होती हुई एक विशाल भवन में गई जहाँ एक सोने का सिंहासन पृथ्वी से काफी ऊँचा रखा था और उसके चारों ओर मोतियों की झालरें लटक रही थीं। एक अजीब बात यह थी कि उस सिंहासन के ऊपर से प्रकाश की लपटें जैसी निकल रही थीं। मुझे कौतूहल हुआ और मैंने ऊपर चढ़कर देखा कि एक छोटी तिपाई पर एक हीरा रखा है जिसका आकार शतुरमुर्ग के अंडे जैसा है और उसमें ऐसी चमक थी कि निगाहें उस पर नहीं ठहरती थीं। प्रकाश की लपटें उसी विशालकाय हीरे से निकल रही थीं। फर्श पर चारों ओर तकिए रखे थे और एक मोम का दीया जल रहा था। उसे देखकर मैंने जाना कि वहाँ कोई जीवित मनुष्य होगा क्योंकि दिया बगैर जलाए नहीं जलता।

मैं घूमते-घामते दफ्तरखानों और गोदामों में गई जिनमें बड़ी मूल्यवान वस्तुएँ रखी थीं। इस सब को देखकर मुझे ऐसा आश्चर्य हुआ कि मैं जहाज और अपनी बहनों को भूल गई और इस रहस्य को जानने के लिए उत्सुक हुई कि इस जगह के सारे लोग पत्थर के क्यों बन गए।

इसी तरह घूमने-फिरने में मुझे समय का खयाल न रहा और रात हो गई। मैं परेशान हुई कि अँधेरे में कहाँ जाऊँगी। अतएव जिस कक्ष में हीरा रखा था मैं उसी में चली गई। वहाँ जाकर लेटी रही और सोचा कि सुबह होने पर अपने जहाज पर चली जाऊँगी। किंतु वह अद्भुत और निर्जन स्थान था इसलिए मुझे नींद न आई। आधी रात को मुझे कुछ ऐसी आवाज आई जैसे कोई मधुर स्वर से कुरान का पाठ कर रहा हो। मैं यह जानने को उत्सुक हुई कि यह जीवित मनुष्य कौन है। मोम का एक दीपक उठाकर चल दी और कई कमरों को लाँघने के बाद उस कमरे में पहुँची जहाँ से कुरान पाठ की ध्वनि आ रही थी।

वहाँ जाकर देखा कि एक छोटी-सी मसजिद बनी है। इससे मुझे याद आया कि परमेश्वर के धन्यवाद के स्वरूप मुझे नमाज पढ़नी जरूरी है। वहाँ मैंने देखा कि दो बड़े-बड़े मोम के दीए जल रहे हैं और वहाँ एक अत्यंत रूपवान नवयुवक बैठा हुआ कुरान पाठ कर रहा है और पूरा ध्यान उसमें लगाए है। मुझे उस युवक को देखकर अतीव प्रसन्नता हुई क्योंकि पत्थर के मनुष्यों की भीड़ देखने के बाद वह अकेला आदमी देखा था जो जीता-जागता था। मैंने मसजिद में जाकर नमाज पढ़ी फिर स्पष्ट ध्वनि में वजीफा पढ़ने लगी और भगवान को धन्यवाद देने लगी कि हमारी समुद्र यात्रा कुशलपूर्वक बीती और इसी प्रकार आशा है कि दैवी कृपा से मैं कुशलपूर्वक अपने देश वापस पहुँच जाऊँगी।

उस नवयुवक ने मेरी आवाज सुनकर मेरी ओर देखा और कहा, 'हे सुंदरी, मुझे बताओ कि तुम कौन हो और इस सुनसान नगर और महल में कैसे आ गई हो। इसके बाद में तुम्हें अपनी बात बताऊँगा कि मैं कौन हूँ और यह भी बताऊँगा कि इस नगर के निवासी पत्थर के क्यों हो गए।'

मैंने उसे अपना हाल बताया कि किस तरह मेरा जहाज बीस दिन की यात्रा के बाद यहाँ के तट पर पहुँचा और वहाँ से अकेली उतर कर मैं किस तरह इस महल में आई और यहाँ क्या-क्या देखा। मैंने उससे कहा कि आप, जैसा आपने अभी वादा किया है, मुझे अपना हाल बताएँ और यहाँ की अद्भुत बातों का भी रहस्योद्घाटन करें।

उस युवक ने मुझे कुछ देर प्रतीक्षा करने को कहा। फिर उसने कुरान का निर्धारित पाठ भाग पढ़ना खत्म करके कुरान को एक जरी के वस्त्र में लपेटा और उसे एक आले में रख दिया। इस बीच मैं उस जवान को देखती रही और उसका सुंदर रूप देखकर उस पर मोहित हो गई। उसने मुझे अपने पास बिठाया और कहा, 'तुम्हारी नमाज से ज्ञात होता है कि तुम हमारे सच्चे धर्म पर पूर्णतः विश्वास करती हो। अब मैं तुम्हें अपना पूरा हाल सुनाता हूँ।'

'इस नगर का बादशाह मेरा पिता था। उसका राज्य बड़ा विस्तृत था। किंतु बादशाह और उसके सभी अधीनस्थ लोग अग्निपूजक थे। यही नहीं, वे नारदीन की उपासना भी किया करते थे जो प्राचीन काल में जिन्नों का सरदार था। यद्यपि मेरा पिता और उसके साथी अग्निपूजक थे किंतु मैं बचपन से ही मुसलमान था। कारण यह था कि मेरे लालन-पालन के लिए जो दाई रखी गई थी वह मुसलमान थी। उसने मुझे सारा कुरान कंठाग्र करा दिया। उसने मुझे शिक्षा दी कि केवल एक ईश्वर ही पूज्य है, तुम उसे छोड़कर किसी और को न पूजना। उसने मुझे अरबी भी पढ़ाई और तफ्सीर (कुरान की व्याख्या) की भी शिक्षा दी। यह सारा काम उसने दूसरों से छुपाकर किया।

'कुछ दिन बाद दाई तो मर गई किंतु मैं उसके बताए हुए धर्म पर दृढ़ रहा। मुझे इस बात का बड़ा दुख होता है कि मेरे सारे देशवासी अग्निपूजक और जिन्न के उपासक हैं। दाई की मृत्यु के कई मास बीत जाने पर आकाशवाणी हुई कि हे नगरवासियो, तुम लोग नारदीन और आग की पूजा छोड़ दो और एकमात्र सर्व शक्तिमान परमेश्वर की पूजा करो। यह आकाशवाणी तीन वर्षों तक निरंतर होती रही किंतु न बादशाह ने न किसी अन्य नगर निवासी ने उस पर ध्यान दिया। वे अपने झूठे धर्म पर दृढ़ रहे। तीन वर्षों बाद इस नगर पर ईश्वरीय प्रकोप हुआ और जो व्यक्ति जिस स्थान और जिस दशा में था, वैसे ही पत्थर बन गया। मेरा पिता ही काले संगमरमर का बन गया और मेरी माँ सिंहासन पर बैठी-बैठी ही पत्थर बन गई जैसा तुमने देखा है। एक मैं ही मुसलमान होने के कारण इस दंड से बचा रहा। उस समय से और भी निष्ठापूर्वक मैं इस्लाम को मानने लगा। हे सुंदरी, मैं जानता हूँ कि भगवान ने तुम्हें मुझ पर कृपा करके यहाँ भेजा है क्योंकि मैं यहाँ अकेलेपन से बहुत ऊबा करता था।'

मुझे उसकी बातें सुनकर उससे और प्रेम बढ़ गया। मैंने कहा, 'मैं बगदाद की निवासिनी हूँ। यहाँ किनारे पर बहुत-से माल-असबाब से लदा मेरा जहाज खड़ा है। जितना माल इसमें है उतना ही बगदाद में अपने घर छोड़ आई हूँ। मैं आपको यहाँ से ले चलूँगी और अपने घर में आराम से रखूँगी।

'बगदाद में खलीफा बड़े न्यायप्रिय हैं। वे आपके सम्मान योग्य कोई पदवी आपको जरूर देंगे। मेरा जहाज आपकी सेवा में है। आप इस स्थान को छोड़िए और मेरे साथ चलिए।'

नौजवान ने मेरा प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया। मैं सारी रात उस आकर्षक युवक से बातें करती रही। दूसरे दिन सुबह उसे लेकर अपने जहाज पर पहुँची। मेरी बहिनें मेरी चिंता में दुखी थीं। मैंने अपने पिछले दिन के अनुभव सुनाए और उस नौजवान की कहानी भी बताई। फिर मेरी आज्ञा से जहाज के माँझियों ने जहाज से व्यापार वस्तुएँ उतार लीं और उनकी जहाज वे अमूल्य रत्न आदि भर लिए जो मुझे महल में मिले थे। महल का सारा सामान तो एक जहाज में आ नहीं सकता था इसलिए मैंने चुनी-चुनी बहुमूल्य वस्तुएँ ही भरीं और खाने-पीने का सामान भी महल से लेकर जहाज पर लाद लिया। साथ ही शहजादे को भी जहाज पर चढ़ा लिया। इसके बाद, असंख्य धन की स्वामिनी होने के साथ अपने प्रिय शहजादे के सान्निध्य का सुख पाते हुए मैंने स्वदेश की ओर यात्रा आरंभ कर दी।

किंतु मेरी बहनों को प्रसन्नता न हुई। शहजादा अत्यंत रूपवान और मिष्टभाषी था। वे मुझसे ईर्ष्या करने लगीं। एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम इस शहजादे को ले जाकर कहाँ रखोगी और इसके साथ क्या करोगी। मुझे उनकी दशा देखकर हँसी आई और मैंने उन्हें चिढ़ाने के लिए कहा कि मैं बगदाद में इसके साथ विवाह करूँगी। मैंने शहजादे से कहा कि मैं चाहती हूँ कि आपकी दासियों में हो जाऊँ और जी-जान से आपकी सेवा करूँ। शहजादा भी मेरे परिहास को समझ गया और हँसकर बोला, 'तुम्हारी जो इच्छा हो वह करो। मैं तुम्हारी बहनों के समक्ष प्रतिज्ञा करता हूँ कि तुम्हारी प्रसन्नता के लिए तुम्हें अपनी पत्नी बनाऊँगा। दासी होने की बात न करो, मैं तो स्वयं तुम्हारा दास बन जाऊँगा।'

यह सुनकर मेरी बहनों के चेहरे का रंग उड़ गया और उनके हृदय में मेरे लिए घोर शत्रुता जागृत हो गई। सारी यात्रा उनकी यही दशा रही बल्कि उनका वैर भाव बढ़ता ही गया। जब हमारा जहाज बूशहर के इतना समीप आ गया कि अनुकूल वायु होने पर वहाँ एक दिन में पहुँच जाता तो रात को जब मैं गहरी नींद सो रही थी, मुझे और शहजादे को उठाकर समुद्र में फेंक दिया।

शहजादा बेचारा तो उसी समय डूब गया क्योंकि तैरना नहीं जानता था लेकिन मैंने पानी में गिरते ही उछाल मारी और तैरने लगी। मेरी आयु पूरी नहीं हुई थी इसलिए मैं अँधेरे में भी संयोग से ठीक दिशा में बढ़ने लगी और कुछ घंटों में एक उजाड़ द्वीप के तट पर जा लगी। बूशहर का बंदरगाह उस स्थान से दस कोस दूर था।

मैंने अपने कपड़े उतारकर सुखाए और फिर उन्हें पहन लिया। इधर-उधर घूमकर देखा तो कुछ फलों के वृक्ष दिखाई दिए। मैंने पेट भर फल खाए फिर एक मीठे पानी के स्रोत से जल पीकर अपनी थकान दूर की थी। फिर एक पेड़ के साए में जाकर लेट गई। कुछ देर बाद मुझे एक लंबा साँप दिखाई दिया जिसके शरीर में दोनों ओर पंख भी लगे हुए थे। वह साँप पहले मेरी दाहिनी ओर आया और फिर बाईं ओर और इस सारे समय अपनी जीभ लपलपाता रहा। मैंने इससे जाना कि इसे कुछ कष्ट है और यह मेरी सहायता चाहता है। मैंने उठकर चारों ओर दृष्टिपात किया। मुझे दिखाई दिया कि एक दूसरा साँप उसके पीछे पड़ा है और उसे खाना चाहता है। मैंने पहले साँप को बचाने के लिए एक बड़ा पत्थर उठाकर बड़े साँप के सिर पर मारा जिससे उसका सिर फट गया और वह वहीं मर गया।

पहला साँप अब पंख खोलकर आसमान में उड़ गया। मुझे यह सब देखकर आश्चर्य हुआ किंतु मैं बहुत थकी थी इसलिए वहाँ से कुछ दूर एक सुरक्षित स्थान पर जाकर सो रही। जागने पर देखा कि एक हरितवसना सुंदरी मेरे सिरहाने दो काली कुतियाँ लिए बैठी है। मैं उसे देखकर खड़ी हो गई और उससे पूछा कि तुम कौन हो। उसने कहा, मैं वही साँप हूँ जिसकी जान उसके दुश्मन से तुमने बचाई थी, अब मैं चाहती हूँ कि जो उपकार तुमने मेरे साथ किया है उसका बदला तुम्हें दूँ। उसने कहा कि मैं वास्तव में एक परी हूँ, यहाँ से जाने के बाद मैं अपनी जाति बहनों यानी परियों को साथ में लेकर तुम्हारे जहाज पर गई जहाँ हम लोगों ने तुम्हारी बहनों को - जिन्होंने तुम्हारे उपकार का बदला तुम्हारी जान लेने का प्रयत्न करके दिया था - कुतियाँ बना डाला, तुम्हारे जहाज का सारा माल उठा कर बगदाद में तुम्हारे घर पहुँचा दिया और जहाज को वहीं डुबो दिया। यह कहने के बाद उस परी ने एक हाथ से मुझे उठाया और दूसरे से दोनों कुतियों को और उड़कर हम सब को बगदाद में मेरे मकान के अंदर पहुँचा दिया।

वहाँ पर परी ने मुझ से कहा कि मैं ईश्वर की सौंगंध खाकर कहती हूँ कि तुम्हारी बहनों की सजा पूरी नहीं हुई है, मेरी आज्ञा है कि तुम हर रात उन्हें सौ कोड़े लगाना और तुमने यह बात न मानी तो तुम्हारा सब कुछ बरबाद हो जाएगा। वैसे हम परियाँ तुम्हारी मित्र हो गई हैं और तुम जब भी हमें बुलाओगी हम आ जाएँगे। जुबैदा ने कहा कि मैं उस परी की आज्ञानुसार हर रात को अपनी बहनों को, जो कुतियाँ बनी हुई हैं, सौ-सौ कोड़े मारती हूँ लेकिन खून का जोश भी काम करता है इसलिए रोती हूँ और उनके आँसू पोंछती हूँ। अब अमीना की कहानी उसके मुँह से सुनिए।

खलीफा को यह वृत्तांत सुन कर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने अमीना से पूछा कि तुम्हारे कंधों और सीनों पर काले निशान क्यों है। उसने यह बताया।
 
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