फिर हम तीनो रसोई से अपने-अपने कमरो मे चले गये ऑर कमरे मे जाते हुए फ़िज़ा बार-बार मुझे पलटकर देखती रही ऑर मैं बस उसको देखकर मुस्कुराता रहा. फिर मैं भी अपने कमरे मे आके अपने बिस्तर पर लेट गया उस रात चुदाई वाला काम तो हो नही सकता था इसलिए मैं भी करवट बदलता हुआ आख़िर सो ही गया. सुबह मैं ऑर नाज़ी तेयार होके खेत चले गये ऑर अपने-अपने कामो मे फ़िज़ा वाले काम भी शामिल करके अपना काम बाँट लिया. दोपहर को मैं ऑर नाज़ी खाना खा रहे थे तभी हीना भी वहाँ आ गई.
हीना : सलाम जनाब....लगता है मैं ग़लत वक़्त पर आ गई (मुस्कुराते हुए)
मैं : वालेकुम.सलाम छोटी मालकिन (खाने से उठते हुए)
हीना : अर्रे उठो मत बैठे रहो खाना खाते हुए उठना नही चाहिए पहले खाना खा लो मैं बाहर इंतज़ार कर रही हूँ
मैं : बाहर क्यो यहीं आ जाइए....आप भी आइए ना हमारे साथ ही खाना खा लीजिए.
हीना : नही शुक्रिया मैं खा कर आई हूँ आप लोग खाओ
मैं हीना की वजह से जल्दी-जल्दी खाना ख़तम करने लगा कि तभी नाज़ी मुझे धीमी आवाज़ मे बोली....
नाज़ी : ये चुड़ैल यहाँ क्यो आई है.
मैं : मुझे क्या पता मैने थोड़ी बुलाया है तुम्हारे सामने तो बात हुई है अभी जाके देखते हूँ
नाज़ी : मुझे इसकी शक़ल पसंद नही है जल्दी दफ्फा करो इसे यहाँ से चैन से खाना भी नही खाने देती (मुँह बनाते हुए)
मैं : अर्रे तो क्या हो गया अब आ गई है तो उसको धक्का मारकर तो नही निकाल सकते ना.
नाज़ी : (हवा मे सिर झटकते हुए) हहुूहह...
मैं खाना खाने के बाद बाहर चला गया ऑर बाहर आके सामने देखने लगा तो मुझे हीना नज़र नही आई तभी मुझे बाई ऑर से किसी ने पुकारा तो मेरा ध्यान उस तरफ गया जब मैने देखा तो हीना पानी के नाले के पास मे बैठी हुई दूर से मुझे हाथ हिला रही थी. मैं भी उस तरफ ही चला गया. जब जाके देखा तो वो अपनी सलवार घुटनो तक उपर किए हुए ठंडे पानी मे पैर डूबाए बैठी थी ऑर मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी. मैं भी उसके पास ही चला गया.
हीना : हंजी हो गया आपका खाना.
मैं : मालिक के करम से हो ही गया जी आप बताओ यहाँ कैसे आना हुआ कोई काम था तो मुझे बुला लेती.
हीना : जैसे मेरे बुलाने से तुम आ जाओगे ना (मुस्कुराते हुए)
मैं : (अपना सिर खुजाते हुए) अब एक बार मशरूफ था तो इसका मतलब ये थोड़ी कि हर बार मसरूफ़ रहूँगा. फरमाइए क्या कर सकता हूँ मैं आपके लिए.
हीना : पहले ये बताओ दवाई ली या नही.
मैं : कौनसी दवाई
हीना : अर्रे बाबा जो कल तुमको डॉक्टर ने दी थी वो वाली दवाई ऑर कौनसी तुम भी ना....
मैं : अच्छा वो तो मैं भूल ही गया (मुस्कुरा कर नज़रें नीचे करते हुए)
हीना : बहुत खूब शाबाश.... फिर मेरा यहाँ रुकना ही बेकार है मैं चलती हूँ फिर.
मैं : अर्रे नाराज़ क्यो होती हो मैं आज से ही दवाई लेनी शुरू कर दूँगा पक्का.
हीना : (अपना हाथ आगे करते हुए) वादा करो.
मैं : वादा (सिर हाँ मे हिलाते हुए)
हीना : ऐसे नही मेरे हाथ पर अपना हाथ रखो फिर पक्का वाला वादा करो तब मानूँगी.
मैं : अच्छा ये लो अब ठीक है (उसके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए)
हीना : हमम्म अब ठीक है. (मुस्कुराते हुए)
उसका हाथ जैसे ही मैने अपने हाथ मे लिया दिल मे एक अजीब सी झुरजुरी सी पैदा हो गई. उसका हाथ बेहद कोमल ऑर मुलायम था जबकि मेरे हाथ खेत मे काम करने की वजह से कुछ सख़्त हो गये थे उन चन्द पलों मे जब मैने उससे छुड़वाया तो दिल मे ख्याल आया कि इसका हाथ इतना नाज़ुक है काश कि मैं इससे एक बार गले से लगा सकता. अभी मैं अपनी सोचो मे ही गुम था कि हीना ने मुझे दूसरे हाथ से कंधे से पकड़कर हिलाया.....
हीना : कहाँ खो गये जनाब.
मैं : कहीं नही वो मैं बस ऐसे ही....
हीना : लगता है मेरा हाथ आपको काफ़ी पसंद आया है (शरारती हँसी के साथ)
मैं : जी.... मैं समझा नही.
हीना : नही मैं देख रही हूँ काफ़ी देर से हाथ छुड़ाने की कोशिश कर रही हूँ आप छोड़ ही नही रहे.... हाहहहहहहाहा
मैं : (शर्मिंदा होते हुए) ओह्ह माफ़ करना मुझे ख्याल ही नही रहा
हीना : कोई बात नही... अच्छा मुझे आपसे एक काम था
मैं : हंजी बोलिए क्या कर सकता हूँ मैं आपके लिए
हीना : वो मुझे भी गाड़ी सीखनी थी अगर आपको कोई तक़लीफ़ ना हो तो सिखा देंगे मैं पैसे भी देने को तेयार हूँ.
मैं : बात पैसे की नही है हीना जी.... लेकिन मैं ही क्यो आपके अब्बू के पास तो बहुत सारे लोग है जो आपको कार चलानी सिखा सकते हैं आप मुझसे ही क्यो सीखना चाहती है.
हीना : अब्बू के लोग मुझे गाड़ी चलानी सिखा सकते हैं लेकिन मुझे चलानी नही उड़ानी सीखनी है उस दिन जैसे.
मैं : देखिए सिखाने मे मुझे कोई तक़लीफ़ नही लेकिन वो बाबा ने सारे खेत की ज़िम्मेदारी मुझे दे रखी है तो ऐसे मैं काम छोड़कर आपको गाड़ी चलानी कैसे सीखा सकता हूँ देखिए बुरा मत मानियेगा लेकिन मैं बाबा के हुकुम की ना-फरमानी नही कर सकता.
हीना : एम्म्म (कुछ सोचते हुए) तो फिर आप मुझे शाम को सिखा सकते हैं खेत के काम से फारिग होने के बाद.
मैं : सिखा तो सकता हूँ लेकिन बाबा से पुच्छना पड़ेगा.
हीना : (चिड़ते हुए) क्या तुम भी... 20-20 लोगो को एक झटके मे गिरा देते हो 5-5 आदमियो का काम अकेले कर लेते हो लेकिन अभी भी हर काम बाबा से पूछ-पूछ के करते हो तुम अब बड़े हो गये हो बच्चे थोड़ी ना हो.
मैं : वो बात नही है लेकिन मुझे अच्छा लगता है बाबा से ऑर फ़िज़ा जी ऑर नाज़ी से हर काम पूछ कर करना. (मुस्कुराते हुए)
हीना : ठीक है जैसे तुम्हारी मर्ज़ी..... अच्छा फिर मैं चलती हूँ
मैं : (मुझे भी समझ नही आ रहा था क्या कहूँ उसको) हमम्म...
हीना : दवाई वक़्त पर लेते रहना ऑर अगले हफ्ते एक बार फिर मेरे साथ तुमको शहर चलना है भूलना मत ठीक है.
मैं: नही हीना जी यहाँ खेतो मे बहुत काम है मैं ऐसे शहर नही जा पाउन्गा मैं तो बस अगर कुछ समान लेना हो या फिर कोई काम हो तभी जाता हूँ
हीना : हाँ तो मैं कौनसा तुमको घुमाने लेके जा रही हूँ तुमको डॉक्टर के पास ही लेके जाना है बस ऑर कुछ नही फिर वापिस आ जाएँगे.
मैं : अच्छा फिर मैं आपको सोच कर बताउन्गा
हीना : ठीक है अच्छा अब काफ़ी वक़्त हो गया मैं चलती हूँ घर मे किसी को बोलकर भी नही आई.
मैं : अकेली आई हो तो मैं घर तक छोड़ आउ..?
हीना : नही रहने दो आप अपना काम करो मैं चली जाउन्गी. कोई सॉफ कपड़ा मिलेगा पैर पोंच्छने है.
मैं : ये लो (मैने अपने गले का साफ़ा उसको दे दिया)
हीना : अर्रे ये नही कोई ओर कपड़ा दो इस कपड़े से तुम अपना मुँह सॉफ करते हो मैं इससे अपने पैर थोड़ी ना सॉफ करूँगी
मैं : कोई बात नही वैसे भी आपके पैर सॉफ है इससे पोंछ लीजिए ऑर कोई कपड़ा इस वक़्त है नही मेरे पास.
हीना : (मुस्कुरा कर मेरे हाथ से साफ़ा लेते हुए) शुक्रिया.
फिर उसको मैं खेत के फाटक तक छोड़ आया ऑर पिछे नाज़ी खड़ी हम दोनो को घूर-घूर कर देखती रही जब उसको मैं छोड़कर वापिस आया तब भी नाज़ी मुझे घूर-घूर कर देख रही थी लेकिन बोल कुछ नही रही थी अचानक मेरी उस पर नज़र पड़ी....
मैं: क्या हुआ मुझे ऐसे खा जाने वाली नज़रों से क्यो देख रही हो.
नाज़ी : तुम इस सरपंच की लड़की पर कुछ ज़्यादा ही मेहरबान नही हो रहे
मैं : अर्रे क्या हुआ मिलने आई थी तो साथ बैठकर बात करने से कौनसा गुनाह हो गया मुझसे.
नाज़ी : अपना साफा क्यो दिया उसको (गुस्से से मुझे देखते हुए)
मैं : उसके पैर गीले हो गये थे इसलिए पोंच्छने के लिए
नाज़ी : मुझे तो कभी अपना रुमाल भी नही दिया उसके लिए गले का साफा उतारके दे दिया...वैसे पैर गीले क्यो हो गये थे महारानी के?
मैं : वो नाले मे पैर डालकर बैठी थी इसलिए....
नाज़ी : (गुस्से से) पैर नही इसका गला डुबोना चाहिए था पानी मे.
मैं : (हँसते हुए) तुम इससे इतना जलती क्यों हो.
नाज़ी : जले मेरी जुत्ति....मैं क्यो जलने लगी बस मुझे ये ऐसे ही पसंद नही. वैसे ये क्या काम से आई थी यहाँ मैं भी तो सुनू.
मैं : (सोचते हुए) कुछ नही वो बस कह रही थी कि मैं उसको कार चलानी सिखाऊ ऑर कुछ नही.
नाज़ी : तुमने क्या कहा.... ऑर तुमने कार चलानी कब सीख ली ऑर जो उसको सीख़ाओगे?
मैं : (परेशान होते हुए) अर्रे उस दिन शहर गया था ना रास्ते मे ये मिली थी इसकी कार खराब हो गई थी तो मैने ठीक करदी थी (मैने नाज़ी को हीना के साथ जाने वाली बात नही बताई) इसलिए वो साथ मे शुक्रिया करने आई थी ऑर बोल रही थी कि मैं उसको भी कार चलानी सिखाऊ लेकिन मैने मना कर दिया.
नाज़ी : अच्छा किया जो मना कर दिया इसका कोई भरोसा नही. (खुश होते हुए)
मैं : अच्छा चलो अब काम कर लेते हैं बाते घर जाके कर लेंगे.
नाज़ी : ठीक है
फिर हम दोनो दिन भर खेतो के काम निबटाने मे लगे रहे शाम को जब घर आए तो सरपंच के कुछ लोग घर के बाहर खड़े थे. जिन्हे मैने ऑर नाज़ी दोनो ने दूर से ही देख लिया था
नाज़ी : ये तो सरपंच के लोग है यहाँ क्या कर रहे हैं.
मैं : क्या पता चलो चलकर देखते हैं अब ये यहाँ क्या लेने आया है.
मैं ऑर नाज़ी तेज़ कदमो के साथ घर आ गये अंदर देखा तो बाबा ऑर सरपंच बैठे बाते कर रहे थे. मैने दोनो को जाके सलाम किया जबकि नाज़ी सीधा रसोई मे फ़िज़ा के पास चली गई ऑर मैं भी बाबा के पास ही कुर्सी पर बैठ गया.
बाबा : आ गये बेटा
मैं : जी बाबा
बाबा : बेटा सरपंच साब तुमसे कुछ बात करना चाहते हैं.
मैं : जी फरमाइए.... क्या कर सकता हूँ मैं
सरपंच : बेटा तुमसे एक काम था वो मेरी बेटी चाहती है कि तुम उसको गाड़ी चलाना सिख़ाओ.
मैं : जी... मैं ही क्यो आपके पास तो इतने सारे लोग है किसी को भी बोल दीजिए वैसे भी मेरे पास इतना वक़्त नही है मुझे खेत भी संभालना होता है.
सरपंच : मैने तो बहुत समझाया अपनी बच्ची को लेकिन वो बचपन से थोड़ी ज़िद्दी है एक बार कुछ फरमाइश कर दे फिर सुनती नही है किसी की. मैं तुम्हारा क़र्ज़ माफ़ करने को तेयार हूँ बस तुम उसको कार चलानी सीखा दो
मैं : (बाबा की तरफ सवालिया नज़रों से देखते हुए) जी आप बाबा से पुछिये
बाबा : बेटा मैं क्या कहूँ तुम देख लो अगर तुम्हारे पास फारिग वक़्त होता है तो सिखा देना
सरपंच : ये हुई ना बात बहुत अच्छे तो फिर मैं अगले हफ्ते ही मेरी बेटी को नयी कार खरीद दूँगा तब तक तुम मेरी कार पर ही उसको कार चलानी सिखा देना फिर कल से सिखा दोगे ना.
मैं : दिन-भर तो मैं खेत मे उलझा रहता हूँ शाम को ही वक़्त निकाल पाउन्गा उससे पहले नही
सरपंच : ठीक है मुझे कोई ऐतराज़ नही. ये कुछ पैसे हैं तुम्हारा मेहनताना (1 नोटो का बंडल टेबल पर रखते हुए)
बाबा : सरपंच साब इसकी कोई ज़रूरत नही आपने क़ासिम का क़र्ज़ माफ़ कर दिया यही बहुत है ये पैसे हमें नही चाहिए आप वापिस रख लीजिए.
सरपंच : ठीक है तो फिर मैं चलता हूँ (पैसे जेब मे वापिस डालते हुए).
फिर सरपंच वहाँ से चला गया ऑर फ़िज़ा ऑर नाज़ी दोनो मुझे रसोई से घूर-घूर कर देखे जा रही थी लेकिन बाबा के पास बैठे होने की वजह से दोनो ना तो रसोई से बाहर आई ना ही मुझसे कोई बात की मैं भी चुप-चाप नज़ारे झुकाए बैठा रहा.
Update-18
Fir hum teeno rasoyi se apne-apne kamro me chale gaye or kamre me jate hue fiza bar-bar mujhe palatkar dekhti rahi or main bas usko dekhkar muskurata raha. fir main bhi apne kamre me aake apne bistar par let gaya uss raat chudayi wala kaam to ho nahi sakta tha isliye main bhi karwat badalta hua akhir so hi gaya. Subah main or nazi teiyaar hoke khet chale gaye or apne-apne kaamo me fiza wale kaam bhi shamil karke apna kaam baant liya. Dupehar ko main or nazi khana khaa rahe the tabhi Heena bhi wahan aa gai.
Heena : Salaam janab....lagta hai main galat waqt par aa gai (muskurate hue)
Main : W.Salaam chhoti malkin (khane se uthte hue)
Heena : arre utho mat baithe raho khana khate hue uthna nahi chahiye pehle khana khaa lo main bahar intzaar kar rahi hun
Main : bahar kyo yhi aa jayiye....aap bhi aayiye naa hmare sath hi khana khaa lijiye.
Heena : nahi shukriya main khaa kar aayi hun aap log khao
Main heena ki wajah se jaldi-jaldi khana khatam karne laga ki tabhi nazi mujhe dheemi awaaz me boli....
Nazi : ye chudail yahan kyo aayi hai.
Main : mujhe kya pata maine thodi bulaya hai tumhare samne to baat hui hai abhi jake dekhte hun
Nazi : mujhe iski shaqal pasand nahi hai jaldi daffa karo isse yahan se chain se khana bhi nahi khane deti (munh banate hue)
Main : arre to kya ho gaya ab aa gai hai to usko dhakka maarkar to nahi nikaal sakte na.
Nazi : (Hawa me sir jhatkate hue) hhuuuhhh...
Main khana khane ke baad bahar chala gaya or bahar aake samne dekhne laga to mujhe heena nazar nahi aayi tabhi mujhe baayi or se kisi ne pukara to mera dhyaan uss taraf gaya jab maine dekha to heena paani ke naale ke pass me baithi hui door se mujhe haath hila rahi thi. main bhi uss taraf hi chala gaya. jab jake dekha to wo apni salwar ghutno tak upar kiye hue thande paani me pair doobaye baithi thi or mujhe dekhkar muskura rahi thi. main bhi uske pass hi chala gaya.
Heena : hanji ho gaya aapka khana.
Main : malik ke karam se ho hi gaya ji aap bataao yahan kaise aana hua koi kaam tha to mujhe bula leti.
Heena : jaise mere bulane se tum aa jaoge naa (muskurate hue)
Main : (Apna sir khujate hue) Ab ek baar mashroof tha to iska matlab ye thodi ki har bar masroof rahunga. Farmayiye kya kar sakta hun main aapke liye.
Heena : pehle ye bataao dawayi lee ya nahi.
Main : kounsi dawayi
Heena : arre baba jo kal tumko doctor ne di thi wo wali dawayi or kounsi tum bhi naaa....
Main : achha wo to main bhul hi gaya (muskurake nazare niche karte hue)
Heena : bahut khunb shaabash.... fir mera yahan rukna hi bekaar hai main chalti hun fir.
Main : arre naraz kyo hoti ho main aaj se hi dawayi leni shuru kar dunga pakka.
Heena : (apna hath aagey karte hue) Vaada karo.
Main : Vaada (sir haa me hilate hue)
Heena : aise nahi mere hath par apna hath rakho fir pakka wala vaada karo tab manungi.
Main : achha ye lo ab thik hai (uske hath par apna hath rakhte hue)
Heena : Hhhmmm ab thik hai. (muskurate hue)
Uska hath jaise hi maine apne hath me liye dil me ek ajeeb si jhurjhuri si paida ho gai. uska hath behad komal or mulayam tha jabki mere hath khet me kaam karne ki wajah se kuch sakht ho gaye the unn chand palo me jab maine usse chhuwa to dil me khyaal aaya ki iska hath itna nazuk hai kaash ki main isse ek baar gale se laga sakta. abhi main apni socho me hi gumm tha ki heena ne mujhe dusre hath se kandhe se pakadkar hilaya.....
Heena : kaha kho gaye janab.
Main : kahi nahi wo main bas aise hi....
Heena : lagta hai mera hath aapko kaafi pasand aaya hai (shararti hassi ke sath)
Main : ji.... main samjha nahi.
Heena : nahi main dekh rahi hun kaafi der se hath chhudane ki koshish kar rahi hun aap chod hi nahi rahe.... hahahahahahahaha
Main : (sharminda hote hue) ohh maaf karna mujhe khyaal hi nahi raha
Heena : koi baat nahi... achha mujhe aapse ek kaam tha
Main : hanji boliye kya kar sakta hun main aapke liye
Heena : wo mujhe bhi gaadi sikhni thi agar aapko koi taqleef na ho to seekha denge main paise bhi dene ko teiyaar hun.
Main : baat paise ki nahi hai heena ji.... lekin main hi kyo aapke abbu ke pass to bahut sare log hai jo aapko car chalani seekha sakte hain aap mujhse hi kyo seekhna chahti hai.
Heena : abbu ke log mujhe gaadi chalani seekha sakte hain lekin mujhe chalani nahi udaani seekhni hai uss din jaise.
Main : dekhiye sikhane me mujhe koi taqleef nahi lekin wo baba ne sare khet ki jimmedari mujhe de rakhi hai to aise main kaam chodkar aapko gaadi chalani kaise seekha sakta hun dekhiye bura mat maniyega lekin main baba ke hukum ki naa-farmani nahi kar sakta.
Heena : mmmm (kuch sochte hue) to fir aap mujhe shaam ko seekha sakte hain khet ke kaam se farig hone ke baad.
Main : seekha to sakta hun lekin baba se puchhna padega.
Heena : (chidte hue) kya tum bhi... 20-20 logo ko ek jhatke me gira dete hun 5-5 aadmiyo ka kaam akele kar lete ho lekin abhi bhi har kaam baba se puch-puch ke karte ho tum ab bade ho gaye ho bache thodi na ho.
Main : wo bat nahi hai lekin mujhe achha lagta hai baba se or fiza ji or nazi se har kaam puch kar karna. (muskurate hue)
Heena : thik hai jaise tumhari marzi..... achha fir main chalti hun
Main : (mujhe bhi samajh nahi aa raha tha kya kahu usko) Hhhhmmm...
Heena : dawayi waqt par lete rehna or agle hafte ek baar fir mere sath tumko shehar chalna hai bhulna mat thik hai.
Main: nahi heena ji yahan kheto me bahut kaam hai main aise shehar nahi jata main to bas agar kuch samaan lena ho ya fir koi kaam ho tabhi jata hun
Heena : haa to main kounsa tumko ghumane leke jaa rahi hun tumko doctor ke pass hi leke jana hai bas or kuch nahi fir wapis aa jayenge.
Main : achha fir main aapko soch kar bataunga
Heena : thik hai achha ab kaafi waqt ho gaya main chalti hun ghar me kisi ko bolkar bhi nahi aayi.
Main : akeli aayi ho to main ghar tak chod aau..?
Heena : nahi rehne do aap apna kaam karo main chali jaungi. koi saaf kapda milega pair ponchhne hai.
Main : ye lo (maine apne gale ka saafa usko de diya)
Heena : arre ye nahi koi or kapda do iss kapde se tum apna munh saaf karte ho main isse apne pair thodi na saaf karungi
Main : koi baat nahi waise bhi aapke pair saaf hai isse ponch lijiye or koi kapda iss waqt hai nahi mere pass.
Heena : (muskura kar mere hath se saafa lete hue) shukriya.
Fir usko main khet ke faatak tak chod aaya or pichhe nazi khadi hum dono ko ghur-ghur kar dekhti rahi jab usko main chodkar wapis aaya tab bhi nazi mujhe ghur-ghur kar dekh rahi thi lekin bol kuch nahi rahi thi achanak meri uss par nazar padi....
Main: kya hua mujhe aise kha jane wali nazaro se kyo dekh rahi ho.
Nazi : tum iss sarpanch ki ladki par kuch jyaadaa hi meharbaan nahi ho rahe
Main : arre kya hua milne aayi thi to sath baithkar baat karne se kounsa gunah ho gaya mujhse.
Nazi : apna saffa kyo diya usko (gusse se mujhe dekhte hue)
Main : uske pair geele ho gaye the isliye ponchhne ke liye
Nazi : mujhe to kabhi apna rumaal bhi nahi diya uske liye gale ka saffa utaarke de diya...waise pair geele kyo ho gaye the maharani ke?
Main : wo naale me pair daalkar baithi thi isliye....
Nazi : (gusse se) pair nahi iska gala dubona chahiye tha pani me.
Main : (hansate hue) tum isse itna jalti kyo ho.
Nazi : jale meri jutti....main kyo jalne lagi bas mujhe ye aise hi pasand nahi. Waise ye kya kaam se aayi thi yahan main bhi to sunoo.
Main : (sochte hue) kuch nahi wo bas keh rahi thi ki main usko car chalani sikhau or kuch nahi.
Nazi : tumne kya kaha.... or tumne car chalani kab seekh lee or jo usko seekhaoge?
Main : (pareshaan hote hue) arre uss din shehar gaya tha naa raste me ye mili thi iski car kharab ho gai thi to maine thik kardi thi (maine nazi ko heena ke sath jane wali baat nahi batayi) isliye wo sath me shukriya karne aayi thi or bol rahi thi ki main usko bhi car chalani sikhau lekin maine mana kar diya.
Nazi : achha kiya jo mana kar diya iska koi bharosa nahi. (khush hote hue)
Main : achha chalo ab kaam kar lete hain baate ghar jake kar lenge.
Nazi : thik hai
Fir hum dono din bhar kheto ke kaam nibatane me lage rahe shaam ko jab ghar aaye to sarpanch ke kuch log ghar ke bahar khade the. jinhe maine or nazi dono ne door se hi dekh liye
Nazi : ye to sarpanch ke log hai yahan kya kar rahe hain.
Main : kya pata chalo chalkar dekhte hain ab ye yahan kya lene aaya hai.
Main or nazi tez kadmo ke sath ghar aa gaye andar dekha to baba or sarpanch baithe baate kar rahe the. maine dono ko jake salaam kiya jabki nazi seedha rasoyi me fiza ke pass chali gai or main bhi baba ke pass hi kursi par baith gaya.
Baba : aa gaye beta
Main : ji baba
Baba : beta sarpanch saab tumse kuch baat karna chahte hain.
Main : ji farmayiye.... kya kar sakta hun main
Sarpanch : beta tumse ek kaam tha wo meri beti chahti hai ki tum usko gaadi chalana sikhao.
Main : ji... main hi kyo aapke pass to itne sare log hai kisi ko bhi bol dijiye waise bhi mere pass itna waqt nahi hai mujhe khet bhi sambhalna hota hai.
Sarpanch : maine to bahut samjhaya apni bachi ko lekin wo bachpan se thodi ziddi hai ek baar kuch farmayish kar de fir sunti nahi hai kisi ki. main tumhara karz maaf karne ko teiyaar ho bas tum usko car chalani seekha do
Main : (baba ki taraf sawaliya nazaro se dekhte hue) ji aap baba se puchhiye
Baba : beta main kya kahu tum dekh lo agar tumhare pass farig waqt hota hai to seekha dena
Sarpanch : ye hui naa baat bahut achhe to fir main agle hafte hi meri beti ko nayi car khareed dunga tab tak tum meri car par hi usko car chalani seekha dena fir kal se seekha doge na.
Main : din-bhar to main khet me uljha rehta hun shaam ko hi waqt nikaal paunga usse pehle nahi
Sarpanch : thik hai mujhe koi aitraaz nahi. ye kuch paise hain tumhara mehntana (1 noto ka bundel table par rakhte hue)
Baba : sarpanch saab iski koi jarurat nahi aapne qasim ka karz maaf kar diya yhi bahut hai ye paise hume nahi chahiye aap wapis rakh lijiye.
Sarpanch : thik hai to fir main chalta hun (paise jeb me wapis dalte hue).
Fir sarpanch wahan se chala gaya or fiza or nazi dono mujhe rasoyi se ghur-ghur kar dekhe jaa rahi thi lekin baba ke pass baithe hone ki wajah se dono na to rasoyi se bahar aayi naa hi mujhse koi baat ki main bhi chup-chap nazare jhukaye baitha raha.
मैं : जी बाबा वो जिस दिन मैं शहर गया था तब रास्ते मे सरपंच की बेटी की कार खराब हो गई थी तो मैने उसकी कार ठीक कर दी थी फिर काफ़ी दूर तक चला कर भी दी थी शायद इसलिए वो मुझसे कार सीखना चाहती है (मैं ये सब फ़िज़ा को सुनाने के लिए कह रहा था)
बाबा : ओह्हो मैं क्या पूछ रहा हूँ तुम क्या जवाब दे रहे हो... मैने पूछा तुमको कार चलानी कहाँ से आई?
मैं : पता नही बाबा याद नही
बाबा : अच्छा चलो कोई बात नही... अब तुम आराम करो थके हुए होगे मैं भी ज़रा बाहर सैर कर लूँ....खाना बन जाए तो आवाज़ लगा देना मैं पड़ोस मे हैदर साब के साथ ज़रा सैर कर रहा हूँ यही पास मे.
मैं : अच्छा बाबा.
बाबा के घर से निकलते ही फ़िज़ा ऑर नाज़ी दोनो मेरे पास आके खड़ी हो गई ऑर गुस्से से मुझे घूर्ने लगी.
फ़िज़ा : अच्छा तो इसलिए जल्दी आ गये थे उस दिन शहर से.
मैं : अर्रे क्या हुआ क्यो गुस्सा कर रही हो बेकार मे
फ़िज़ा : मुझे बताया क्यो नही कि हीना के साथ आए थे तुम
मैं : यार मैं आना नही चाहता था लेकिन वो ज़बरदस्ती साथ ले आई (मैने फ़िज़ा को ये नही बताया कि मैं गया भी हीना के साथ ही था)
फ़िज़ा : मैने सोचा नही था कि तुम मुझसे भी झूठ बोल सकते हो
मैं : बेकार मे झगड़ा ना करो छोटी सी बात थी नही बताया तो क्या हुआ यार
नाज़ी : हाँ भाभी आज दिन मे भी वो चुड़ैल मिलने आई थी
मैं : तो मैने तो उसको मना किया ही था ना यार अब मुझे क्या पता था वो अपने बाप को भेज देगी. ठीक है अगर तुमको नही पसंद तो नही सिखाउन्गा उसको कार चलानी....अब तो खुश हो दोनो.
फ़िज़ा : अब बाबा ने हाँ बोल दिया है तो सिखा देना (मुँह दूसरी तरफ करके बोलती हुई)
ऐसे ही हम तीनो काफ़ी देर लड़ाई करते रहे फिर वो दोनो रसोई मे चली गई ऑर मैं कुर्सी पर बैठा दिन भर के बारे मे सोचने लगा जाने क्यो मुझे बार-बार अपने हाथो मे हीना का वही कोमल अहसास बार-बार हो रहा था. थोड़ी देर बाद फ़िज़ा ऑर नाज़ी ने खाना बना लिया ऑर बाबा को बुलाने के लिए बाहर आ गई. लेकिन अब वो मेरी तरफ देख भी नही रही थी जबकि मैं उसके पास ही खड़ा था.
मैं : अब तक नाराज़ हो.
फ़िज़ा : मैं कौन होती हूँ नाराज़ होने वाली जो तुम्हारा दिल करे वो करो
मैं : ऐसे क्यो बात कर रही हो यार आगे कोई काम बिना तुमसे पुच्छे कभी किया है जो अब करूँगा. यकीन करो मैं सच मे नही जानता था कि वो सरपंच को घर भेज देगी आज दिन मे भी मैने उसको मना कर दिया था.
फ़िज़ा बिना मेरी बात का जवाब दिए बाबा को 2-3 बार आवाज़ लगाके अंदर चली गई. मुझे उसका इस तरह का बर्ताव मेरे साथ बहुत बुरा लगा. लेकिन मैं चुप रहा पर उसको मनाने के लिए कोई ऑर तरीका सोचने लगा.
रात को हमने तीनो ने मिलकर ही खाना खाया लेकिन दोनो आज एक दम खामोश थी ऑर चुप-चाप खाना खा रही थी मैं जानता था कि दोनो मुझसे नाराज़ है इसलिए मुझसे बात नही कर रही है. मैने फ़िज़ा को मनाने के लिए खाना खाते हुए ही एक तरीका सोचा मैने जान-बूझकर चम्मच नीचे गिरा दिया ऑर टेबल से नीचे झुक गया ऑर चम्मच उठाने के बहाने फ़िज़ा की जाँघो पर हाथ रख दिए ऑर सहलाने लगा उसने अपना घुटना झटक दिया मैने फिर से उसके घुटने पर हाथ रख दिया ऑर फिर से अपना हाथ फेरने लगा उसने फिर से मेरा हाथ झटकने के लिए अपनी टाँग हिलाई लेकिन इस बार मैने अपना हाथ झटकने नही दिया बल्कि सीधा हाथ उसकी चूत पर रख दिया उसने दोनो टांगे एक दम से बंद कर ली ऑर मेरा हाथ अपनी टाँगो के बीच मे दबा लिया. अब मैं अपना हाथ हिला भी नही पा रहा था तभी मुझे फ़िज़ा की आवाज़ आई नीचे जाके सो गये हो क्या उपर आओ जाने दो दूसरा चम्मच लेलो ऑर उसने अपनी टांगे खोल दी ताकि मैं अपना हाथ बाहर निकाल सकूँ लेकिन मैने हाथ निकलने से पहले अपनी उंगलियो से उसकी चूत को अच्छे से मरोड़ दिया ऑर फिर उपर आके अपनी कुर्सी पर बैठ गया. जब उपर आया तो मेरे चेहरे पर एक मुस्कान थी ऑर उसके चेहरे पर मुस्कान ऑर दर्द दोनो थे जैसे वो इशारे से कह रही हो कि मुझे नीचे दर्द हो रहा है.
मैने उसकी तरफ मुस्कुरा कर देखा ऑर फिर से खाना खाने लग गया हालाकी उस वक़्त हमारे साथ नाज़ी भी बैठी थी लेकिन मैने अभी फ़िज़ा के साथ क्या किया ये सिर्फ़ मैं ओर फ़िज़ा ही जानते थे नाज़ी को इस बारे मे कोई खबर नही थी क्योंकि वो तो मज़े से अपना खाना खा रही थी.थोड़ी देर बाद मैने नीचे से पैर लंबा किया ऑर उसके पैर पर रख दिया उसने एक पल के लिए मेरी तरफ देखा ऑर फिर खामोशी से खाना खाने लगी मैने थोड़ी देर अपने पैर से उसके पैर को सहलाया ऑर फिर अपना पैर उपर की तरफ ले जाने लगा वो मुझे इशारे से नही कहने लगी लेकिन मेरा पैर धीरे-धीरे उपर की तरफ जा रहा था ऑर उसकी टाँगो के बीच मे ले जाके मैने अपना पैर रोक दिया अब मेरे पैर के अंगूठे का निशाना उसकी चूत पर था मैं धीरे-धीरे खाना भी खा रहा था ऑर साथ मे पैर के अंगूठे से उसकी चूत को मस्सल रहा था. फ़िज़ा की ना चाहते हुए भी मज़े से बार-बार आँखें बंद हो रही थी ऑर वो मुझे बार-बार सिर नही मे हिलाकर ना का इशारा कर रही थी ऑर मैं बस उसको देखता हुआ मुस्कुरा रहा था. उसकी चूत अब पानी छोड़ने लगी थी जिससे उसकी सलवार भी गीली होने लगी थी ऑर मुझे भी उसकी चूत का गीलापन अपने पैर के अंगूठे पर महसूस हो रहा था. मैं लगातार उसकी चूत के दाने को मसलता जा रहा था अब फ़िज़ा ने भी अपनी दोनो टांगे पूरी तरह से खोल दी थी.
कुछ देर की रगड़ाई के बाद वो फारिग हो गई जिससे उसके मुँह से एक ज़ोर से सस्सिईईईईई की आवाज़ निकल गई. मैने जल्दी से अपना पैर हटा लिया ऑर नीचे रख लिया ताकि मेरे पैर पर नाज़ी की नज़र ना पड़ जाए.
नाज़ी : क्या हुआ भाभी ठीक तो हो.
फ़िज़ा : हाँ ठीक हूँ वो बस मिर्ची खा ली थी तो मुँह जल रहा है
नाज़ी : अच्छा... लो पानी पी लो.
मैं : (मुस्कुराते हुए) पानी नही इनको कुछ मीठा खिलाओ ताकि मीठा बोल सकें
फ़िज़ा : मुझे तो आपका ही मीठा पसंद है आप ने मुँह मीठा नही करवाया इसलिए पानी से काम चलना पड़ रहा है(मुस्कुरा कर देखते हुए)
मैं : खाने के बाद मीठा खाना अच्छा होता है मुँह से कड़वाहट निकल जाती है.
फ़िज़ा : आज तो खाने के बाद मुँह मीठा कर ही लूँगी (शरारती हँसी के साथ)
नाज़ी : तुम दोनो ये क्या मीठा-मीठा कर रहे हो मुझे तो कुछ समझ नही आ रहा चलो दोनो चुप-चाप खाना खाओ
मैं : अच्छा ठीक है.
फिर हम तीनो ने मिलकर खाना खाया ऑर खाने खाते हुए फ़िज़ा मुझे बार-बार बस मुस्कुरा कर देखती रही मुझे यक़ीन ही नही हो रहा था कि जो फ़िज़ा थोड़ी देर पहले मुझे ढंग से देख भी नही रही थी वो अब मुझे बार-बार मुस्कुरा कर पहले की तरह बड़े प्यार से देख रही है अब उसकी आँखो मे मेरे लिए प्यार ही प्यार था. खाने के बाद मैं बाबा के पैर दबाने चला गया ऑर फ़िज़ा ऑर नाज़ी रसोई के कामों मे लग गई थोड़ी देर बाद नाज़ी मेरा बिस्तर करने आ गई तो मैने अच्छा मोक़ा देखकर फ़िज़ा के पास जाने का सोचा ऑर मैं तेज़ कदमो के साथ फ़िज़ा के पास चला गया.
मैं : हंजी अब भी नाराज़ हो.
फ़िज़ा : (पलट कर) नीर मैं तुमको बहुत मारूँगी फिर से ऐसा किया तो.
मैं : (हँसते हुए) क्या किया मैने
फ़िज़ा : अच्छा बताऊ क्या किया (मेरे लंड को पकड़ते हुए)
मैं : आहह दर्द हो रहा है छोड़ो ना (हँसते हुए)
फ़िज़ा : (लंड को छोड़कर मेरे गले मे अपनी दोनो बाहे हार की तरह डालकर ) नही छोड़ती क्या कर लोगे
मैं : नाज़ी आ जाएगी (मुस्कुराते हुए)
फ़िज़ा : नही आएगी मैने ही उसको तुम्हारा बिस्तर करने भेजा है.
मैं : अच्छा... फिर एक पप्पी दो ना...
फ़िज़ा : (मुस्कुराते हुए) ना दूं तो....
मैं : (सलवार के उपर से ही उसकी चूत पर हाथ रखते हुए) ले तो मैं ये भी लूँगा ऑर तुम मुझे रोक नही सकती जानती हो ना
फ़िज़ा : सस्सस्स जान ना करो ना हाथ हटाओ पहले वहाँ से फिर जो मर्ज़ी ले लेना
मैं : (हाथ को चूत पर ही रखे हुए) ये भी ले सकता हूँ
फ़िज़ा : क्या बात है आज जनाब की नियत ठीक नही लग रही (मुस्कुराते हुए)
मैं : तुमको देखते ही नियत खराब हो जाती है क्या करू.
फ़िज़ा : एम्म्म ठीक है आज फिर करे?
मैं : लेकिन कैसे नाज़ी साथ होगी ना तुम्हारे
फ़िज़ा : उसकी फिकर तुम ना करो तुम बस रात को कोठरी मे आ जाना ऑर सो मत जाना ठीक है
मैं : ठीक है आ जाउन्गा लेकिन तुम वहाँ आओगी कैसे
फ़िज़ा : उसकी फिकर तुम ना करो मैं आ जाउन्गी उसके सो जाने के बाद वैसे भी वो बहुत गहरी नींद मे सोती है तो सुबह से पहले नही उठेगी
मैं : हमम्म्म चलो ठीक है फिर अब जल्दी से पप्पी दो.
फ़िज़ा : मैं भी तुम्हारी मेरा सब कुछ तुम्हारा जहाँ चाहे वहाँ पप्पी ले लो मैने मना थोड़ी किया है.
मैं : नही आज तुम करो पहले फिर मैं करूँगा
फ़िज़ा : ठीक है थोड़ा नीचे तो झुको
मैं : नही आज एक नये तरीके से करेंगे
फ़िज़ा : कैसे?
मैं : (फ़िज़ा की कमर को दोनो बाजुओ से पकड़कर हवा मे उठाते हुए) ऐसे.... अब देखो तुम्हारा चेहरा मेरे चेहरे के बराबर हो गया है
फ़िज़ा : हमम्म (ऑर फिर फ़िज़ा ने खुद ही अपने रसीले होंठ मेरे होंठों पर रख दिए ऑर अपनी आँखें बंद कर ली)
थोड़ी देर मैं ऑर फ़िज़ा एक दूसरे के होंठ चूस्ते रहे फिर मैने फ़िज़ा को नीचे उतरा तो उसकी साँस बहुत तेज़-तेज़ चल रही थी शायद वो गरम हो गई थी फिर उसने मुझे बाहर जाने को कहा ऑर खुद रसोई के बाकी कामो मे लग गई. मैं बाहर खुली हवा मे बैठा खुले आसमान मे टिम-टिमाते तारो निहारने लगा थोड़ी देर मे नाज़ी भी कमरे से बाहर आ गई ऑर सीधा रसोई मे फ़िज़ा के पास चली गई फिर मैं भी अपने कमरे मे आके बिस्तर पर लेटा सबके सो जाने का इंतज़ार करता रहा कि कब रात हो ऑर कब मैं फ़िज़ा के साथ मज़े की वादियो की सैर करूँ नींद तो मेरी आँखो से क़ोस्सो दूर थी लेकिन फिर भी नाज़ी को दिखाने के लिए मैं बस चुप-चाप आँखें बंद किए हुए अपने बिस्तर पर पड़ा रहा. कुछ देर बाद फ़िज़ा ऑर नाज़ी भी अपने कमरे मे सोने के लिए चली गई ऑर मैं आधी रात का इंतज़ार करने लगा.
मुझे इंतज़ार करते हुए काफ़ी देर हो गई थी इसलिए मैं बस अपने बिस्तर पर पड़ा फ़िज़ा के आने का इंतज़ार कर रहा था क्योंकि उसकी आदत थी वो हमेशा मुझे खुद बुलाने आती थी. मेरी नज़र दरवाज़े पर टिकी हुई थी लेकिन ज़हन मे बार-बार हीना का ख्याल आ रहा था. मैं अपने आप से ही कई सवाल पूछ रहा था ऑर फिर खुद से ही जवाब तलाशने की कोशिश कर रहा था. इस वक़्त मुझे फ़िज़ा के बारे मे सोचना चाहिए था लेकिन जाने क्यो मुझे हीना याद आ रही थी. इस वक़्त मैं दो तरफ़ा सोच मे फँसा हुआ था आँखें बाहर दरवाज़े पर फ़िज़ा को तलाश रही थी ऑर ज़हन हीना को.
अभी मैं अपनी सोचो मे ही गुम था कि दरवाज़े पर मुझे एक साया नज़र आया अंधेरा होने की वजह से मैं चेहरा ठीक से देख नही पा रहा था. मैं बस दरवाजे की तरफ नज़र टिकाए उस साए को ही देख रहा था कि कब वो मुझे बुलाए ऑर मैं उसके पास जाउ. लेकिन एक अजीब बात हुई उस लड़की ने पहले सिर घूमके दाए-बाए देखा फिर कमरे के अंदर आ गई जबकि फ़िज़ा कभी भी अंदर नही आती थी वो तो बाहर खड़ी हुई ही इशारा करके मुझे बुलाती थी. ये जानने के लिए कि ये कौन है ऑर यहाँ इस वक़्त क्यो आई है मैने फॉरन उसको अपने पास आता देखकर अपनी आँखें बंद कर ली जैसे मैं गहरी नींद मे सो रहा हूँ. जब वो लड़की थोड़ा ऑर करीब आई तो मुझे हल्का-हल्का चेहरा नज़र आने लगा ये तो नाज़ी थी. मैं सोच मे पड़ गया कि इस वक़्त ये यहाँ कैसे आ गई ओर फ़िज़ा ने तो मुझे कहा था कि वो इसके सो जाने के बाद आ जाएगी. अब मैं ये सोचकर परेशान था कि कही इस वक़्त फ़िज़ा यहाँ आ गई ऑर उसने नाज़ी को यहाँ देख लिया तो वो क्या सोचेगी मेरे बारे मे. लेकिन फिर भी मैं सोने का नाटक करते हुए वहाँ पड़ा रहा. कुछ देर नाज़ी ने बाबा को देखा जो गहरी नींद मे सो रहे थे ऑर खर्राटे मार रहे थे फिर वो पलट कर गई ऑर धीरे से दरवाज़ा बंद कर दिया ऑर कुण्डी लगाके मेरी तरफ आई ऑर मुझे गौर से देखने लगी मैं आँखें बंद किए हुए लेटा रहा फिर वो धीरे से मेरे बिस्तर पर बैठ गई ऑर कुछ देर मुझे देखती रही फिर जो साइड मे थोड़ी सी जगह थी वहाँ मेरे साथ ही करवट लेके लेट गई क्योंकि उसके जगह कम थी ऑर अब उसके होते हुए मैं थोड़ा पिछे सरक कर जगह भी नही बना सकता था.
कुछ देर वो ऐसे ही लेटी थी ऑर फिर अपना एक हाथ मेरी छाती पर रख लिया ऑर दूसरे हाथ की उंगलियो से मेरे गाल सहलाने लगी फिर धीरे से अपनी एक टाँग मेरी जाँघ के उपर रख ली ऑर अपनी बाजू को मेरे पेट से गुज़ार लिया जैसे वो लेटे हुए को ही मुझे साइड से गले लगा रही हो. इससे उसके मम्मे मुझे अपने कंधो पर महसूस होने लगे. मैं फिर भी वैसे ही लेटा रहा असल मे मैं ये देखना चाहता था कि जो मुझसे अंधेरे मे ग़लती हुई थी उसका उस पर क्या असर हुआ है ऑर वो किस हद तक जाती है.
Update-19
Baba : beta tum car chalani jante ho?
Main : ji baba wo jis din main shehar gaya tha tab raste me sarpanch ki beti ki car kharab ho gai thi to maine uski car thik kar di thi fir kaafi door tak chalake bhi di thi shayad isliye wo mujhse car seekhna chahti hai (main ye sab fiza ko sunane ke liye keh raha tha)
Baba : ohho main kya puch raha hun tum kya jawab de rahe ho... maine puchaa tumko car chalani kaha se aayi?
Main : pata nahi baba yaad nahi
Baba : achha chalo koi baat nahi... ab tum araam karo thake hue hoge main bhi zra bahar sair kar loo....khane ban jaye to awaz laga dena main pados me haidar saab ke sath zra sair kar raha hun yhi pass me.
Main : achha baba.
Baba ke ghar se nikalte hi fiza or nazi dono mere pass ake khadi ho gai or gusse se mujhe ghurne lagi.
Fiza : achha to isliye jaldi aa gaye the uss din shehar se.
Main : arre kya hua kyo gussa kar rahi ho bekaar me
Fiza : mujhe bataayaa kyo nahi ki heena ke sath aaye the tum
Main : yaar main aana nahi chahta tha lekin wo jabardasti sath le aayi (maine fiza ko ye nahi bataayaa ki main gaya bhi heena ke sath hi tha)
Fiza : maine socha nahi tha ki tum mujhse bhi jhooth bol sakte ho
Main : bekaar me jhagda na karo chhoti si baat thi nahi bataayaa to kya hua yaar
Nazi : haa bhabhi aaj din me bhi wo chudail milne aayi thi
Main : to maine to usko mana kiya hi tha naa yaar ab mujhe kya pata tha wo apne baap ko bhej degi. thik hai agar tumko nahi pasand to nahi sikhaunga usko car chalni....ab to khush ho dono.
Fiza : Ab baba ne haa bol diya hai to seekha dena (munh dusri taraf karke bolti hui)
Aise hi hum teeno kaafi der ladayi karte rahe fir wo dono rasoyi me chali gai or main kursi par baitha din bhar ke bare me sochne laga jane kyo mujhe bar-bar apne hatho me heena ka wahi komal ahsaas bar-bar ho raha tha. Thodi der baad fiza or nazi ne khana bana liya or baba ko bulane ke liye bahar aa gai. lekin ab wo meri taraf dekh bhi nahi rahi thi jabki main uske pass hi khada tha.
Main : ab tak naraz ho.
Fiza : main kaun hoti hun naraz hone wali jo tumhara dil kare wo karo
Main : aise kyo baat kar rahi ho yaar aagey koi kaam bina tumse puchhe kabhi kiya hai jo ab karunga. yeqeen karo main sach me nahi janta tha ki wo sarpanch ko ghar bhej degi aaj din me bhi maine usko mana kar diya tha.
Fiza bina meri baat ka jawab diya baba ko 2-3 baar awaaz lagake andar chali gai. mujhe uska iss tarah ka bartaav mere sath bahut bura loga. lekin main chup raha par usko manane ke liye koi or tareeka sochne laga.
Raat ko hamane teeno ne milkar hi khana khaya lekin dono aaj ek dam khamosh thi or chup-chap khana khaa rahi thi main janta tha ki dono mujhse naraz hai isliye mujhse baat nahi kar rahi hai. maine fiza ko manane ke liye khana khate hue hi ek tareeka socha maine jaan-bujhkar chamach niche gira diya or table se niche jhuk gaya or chamach uthane ke bahane fiza ki rano par hath rakh diye or sehlane laga usne apna ghutna jhatak diya maine fir se uske ghutne par hath rakh diya or fir se apna hath ferne laga usne fir se mera hath jhatakne ke liye apni taang hilayi lekin iss baar maine apna hath jhatakne nahi diya balki seedha hath uski chut par rakh diya usne dono taangey ek dam se band kar lee or mera hath apni taango ke bich me daba liya. ab main apna hath hila bhi nahi paa raha tha tabhi mujhe fiza ki awaz aayi niche jake so gaye ho kya upar aao jane do dusra chamach lelo or usne apni taangey khol di taaki main apna hath bahar nikaal saku lekin maine hath nikalne se pehle apni ungaliyo se uski chut ko achhe se marod diya or fir upar aake apni kursi par baith gaya. jab upar aaya to mere chehre par ek muskaan thi or uske chehre par muskaan or dard dono the jaise wo ishare se keh rahi ho ki mujhe niche dard ho raha hai. maine uski taraf muskurakar dekha or fir se khana khane lag gaya halaki uss waqt hmare sath nazi bhi baithi thi lekin maine abhi fiza ke sath kya kiya ye sirf main or fiza hi jante the nazi ko iss bare me koi khabar nahi thi kyonki wo to maze se apna khana khaa rahi thi.Thodi der baad maine niche se pair lamba kiya or uske pair par rakh diya usne ek pal ke liye meri taraf dekha or fir khamoshi se khana khane lagi maine thodi der apne pair se uske pair ko sehlaya or fir apna pair upar ki taraf le jane laga wo mujhe ishare se nahi kehne lagi lekin mera pair dheere-dheere upar ki taraf jaa raha tha or uski taango ke bich me le jake maine apna pair rok diya ab mere pair ka anguthe ka nishana uski chut par tha maine dheere-dheere khana bhi khaa raha tha or sath me pair ke anguthe se uski chut ko massal raha tha. fiza ki na chahte hue bhi maze se bar-bar aankhen band ho rahi thi or wo mujhe bar-bar sir nahi me hilakar naa ka ishara kar rahi thi or main bas usko dekhta hua muskura raha tha. uski chut ab paani chodne lagi thi jisse uski salwar bhi gili hone lagi thi or mujhe bhi uski chut ka geelapan apne pair ke anguthe par mehsoos ho raha tha. maine lagatar uski chut ke dane ko masalta jaa raha tha ab fiza ne bhi apni dono taangey poori tarah se khol di thi.
Kuch der ki ragdayi ke baad wo farig ho gai jisse uske munh se ek jor se sssiiiiiii ki awaz nikal gai. maine jaldi se apna pair hata liya or niche rakh liya taki mere pair par nazi ki nazar na pad jaye.
Nazi : kya hua bhabhi thik to ho.
Fiza : haa thik hun wo bas mirchi khaa lee thi to munh jal raha hai
Nazi : achha... loh paani pee lo.
Main : (muskurate hue) Pani nahi inko kuch mitha khilao taaki mitha bol sake
Fiza : mujhe to apka hi mitha pasand hai aap ne munh mitha nahi karwaya isliye pani se kaam chalana pad raha hai(muskurakar dekhte hue)
Main : khane ke baad meetha khana achha hota hai munh se kadwahant nikal jati hai.
Fiza : aaj to khane ke baad munh mitha kar hi lungi (shararati hassi ke sath)
Nazi : tum dono ye kya mitha-mitha kar rahe ho mujhe to kuch samajh nahi aa raha chalo dono chup-chap khana khao
Main : achha thik hai.
Fir hum teeno ne milkar khana khaya or khane khate hue fiza mujhe bar-bar bas muskurakar dekhti rahi mujhe yaqeen hi nahi ho raha tha ki jo fiza thodi der pehle mujhe dhang se dekh bhi nahi rahi thi wo ab mujhe bar-bar muskura kar pehle ki tarah bade pyaar se dekh rahi hai ab uski aankho me mere liye pyaar hi pyaar tha. khane ke baad main baba ke pair dabane chala gaya or fiza or nazi rasoyi ke kaamo me lag gai thodi der baad naazi mera bistar karne aa gai to maine achha moqa dekhkar fiza ke pass jane ka socha or main tez kadmo ke sath fiza ke pass chala gaya.
Main : hanji ab bhi naraz ho.
Fiza : (palat kar) Neer main tumko bahut marungi fir se aisa kiya to.
Main : aahhh dard ho rahi hai chodo naa (hansate hue)
Fiza : (lund ko chodkar mere gale me apni dono baahe haar ki tarah daalkar ) nahi chodti kya kar loge
Main : nazi aa jayegi (muskurate hue)
Fiza : nahi aayegi maine hi usko tumhara bistar karne bheja hai.
Main : Achha... fir ek pappi do naa...
Fiza : (muskurate hue) naa doo to....
Main : (salwar ke upar se hi uski chut par hath rakhte hue) le to main ye bhi lunga or tum mujhe rok nahi sakti janti ho naa
Fiza : sssss jaan naa karo naa hath hatao pehle wahan se fir jo marzi le lena
Main : (hath ko chut par hi rakhe hue) ye bhi le sakta hun
Fiza : kya baat hai aaj janab ki niyat thik nahi lag rahi (muskurate hue)
Main : tumko dekhte hi niyat kharab ho jati hai kya karu.
Fiza : mmmm thik hai aaj fir kare?
Main : lekin kaise nazi sath hogi na tumhare
Fiza : uski fikar tum na karo tum bas raat ko kothari me aa jana or so mat jana thik hai
Main : thik hai aa jaunga lekin tum wahan aaogi kaise
Fiza : uski fikar tum na karo main aa jaungi uske so jane ke baad waise bhi wo bahut gehri neend me soti hai to subah se pehle nahi uthegi
Main : hhhmmmm chalo thik hai fir ab jaldi se pappi do.
Fiza : main bhi tumhari mera sab kuch tumhara jahan chahe wahan pappi le lo maine mana thodi kiya hai.
Main : nahi aaj tum karo pehle fir main karunga
Fiza : thik hai thoda niche to jhuko
Main : nahi aaj ek naye tareeke se karenge
Fiza : kaise?
Main : (fiza ki kamar ko dono bajuwo se pakadkar hawa me uthate hue) aise.... ab dekho tumhara chehra mere chehre ke barabar ho gaya hai
Fiza : hhhmmm (or fir fiza ne khud hi apne raseele honth mere honthon par rakh diye or apni aankhen band kar lee)
Thodi der main or fiza ek dusre ke honth chuste rahe fir maine fiza ko niche utara to uski saans bahut tez-tez chal rahi thi shayad wo garam ho gai thi fir usne mujhe bahar jane ko kaha or khud rasoyi ke baki kaamo me lag gai. main bahar khuli hawa me baitha khule asmaan me tim-timate taaro niharne laga thodi der me nazi bhi kamre se bahar aa gai or seedha rasoyi me fiza ke pass chali gai fir main bhi apne kamre me aake bistar par leta sabke so jane ka intzaar karta raha ki kab raat ho or kab main fiza ke sath maze ki wadiyo ki sair karu neend to meri aankho se kosso door thi lekin fir bhi nazi ko dikhane ke liye main bas chup-chap aankhen band kiye hue apne bistar par pada raha. kuch der baad fiza or nazi bhi apne kamre me sone ke liye chali gai or main aadhi raat ka intzaar karne laga.
Mujhe intzaar karte hue kaafi der ho gai thi isliye main bas apne bistar par pada fiza ke aane ka intzaar kar raha tha kyonki uski aadat thi wo hamesha mujhe khud bulane aati thi. Meri nazar darwaze par tiki hui thi lekin zehan me bar-bar heena ka khyaal aa raha tha. Main apne aap se hi kai sawaal puch raha tha or fir khud se hi jawaab talaashne ki koshish kar raha tha. Iss waqt mujhe fiza ke bare me sochna chahiye tha lekin jane kyo mujhe heena yaad aa rahi thi. iss waqt main do taraffa soch me phasa hua tha aankhen bahar darwaze par fiza ko talash rahi thi or zehan heena ko.
Abhi main apni socho me hi gum tha ki darwaze par mujhe ek saya nazar aaya andhera hone ki wajahan se main chehra thik se dekh nahi paa raha tha. Main bas tarwaze ki taraf nazar tikaye uss saaye ko hi dekh raha tha ki kab wo mujhe bulaye or main uske pass jau. Lekin ek ajeeb baat hui uss ladki ne pehle sir ghumake Daaye-baaye dekha fir kamre ke andar aa gai jabki fiza kabhi bhi andar nahi aati thi wo to bahar khadi hui hi ishara karke mujhe bulati thi. ye janne ke liye ki ye kaun hai or yahan iss waqt kyo aayi hai maine foran usko apne pass aata dekhkar apni aankhen band kar li jaise main gehri neend me so raha hun. Jab wo ladki thoda or kareeb aayi to mujhe halka-hakla chehra nazar aane laga ye to nazi thi. Main soch me pad gaya ki iss waqt ye yahan kaise aa gai or fiza ne to mujhe kaha tha ki wo iske so jane ke baad aa jayegi. Ab main ye sochkar pareshaan tha ki kahi iss waqt fiza yahan aa gai or usne nazi ko yahan dekh liya to wo kya sochegi mere bare me. Lekin fir bhi main sone ka naatak karte hue wahan pada raha. kuch der nazi ne baba ko dekha jo gehri neend me so rahe the or kharate maar rahe the fir wo palat kar gai or dheere se darwaza band kar diya or kundi lagake meri taraf aayi or mujhe gaur se dekhne lagi main aankhen band kiye hue leta raha fir wo dheere se mere bistar par baith gai or kuch der mujhe dekhti rahi fir jo side me thodi si jagah thi wahan mere sath hi karwat leke let gai kyonki uske jagah kam thi or ab uske hote hue main thoda pichhe sarakar jagah bhi nahi bana sakta tha.
Kuch der wo aise hi leti thi or fir apna ek hath meri chaatee par rakh liya or dusre hath ki ungaliyo se mere gaal sehlane lagi fir dheere se apni ek taang meri jaangh ke upar rakh lee or apni baaju ko mere pet se guzaar liya jaise wo lete hue ko hi mujhe side se gale laga rahi ho. Isse uske mamme mujhe apne kandho par mehsoos hone lage. Main fir bhi waise hi leta raha asal me main ye dekhna chahta tha ki jo mujhse andhere me galati hui thi uska uss par kya asar hua hai or wo kiss hadd tak jati hai.
कुछ देर वो मेरे साथ ऐसे ही पड़ी रही फिर थोड़ा उपर को होते हुए मेरी गाल पर अपनी उंगलियों की मदद से मेरे चेहरे को अपनी तरफ किया ऑर कुछ देर मुझे देखती रही उसकी साँस तेज़ चल रही थी जो मुझे अपने चेहरे पर भी महसूस हो रही थी. फिर उसने धीरे से मेरे कान मे कहा
नाज़ी : जाग रहे हो क्या
मैं खामोश होके लेटा रहा जब उससे यक़ीन हो गया कि मैं सोया पड़ा हूँ तो उसने मेरी गाल पर हल्के से चूम लिया उसने मेरा चेहरा अपनी उंगलियो की मदद से अपनी तरफ किया हुआ था ऑर मुझे चूमने के बाद जैसे उसकी उंगलियो से जान ही ख़तम हो गई हो उसकी साँस भी बहुत तेज़ चल रही जो मुझे अपने चेहरे पर मेसूस हो रही थी. उसके हाथ ओर उंगालियन काँप रही थी कुछ देर वो ऐसे ही मेरे कंधे पर अपना सिर रखकर मेरे साथ लेती रही ओर अपने काँपते हाथो से मेरी छाती पर अपना हाथ फेरती रही फिर वो उठी ओर हल्के से मेरे कान मे बोली....
नाज़ी : जो तुमने माँगा था मैने दे दिया है अगली बार तुमको माँगने की ज़रूरत नही है.
उसने फिर एक बार मेरी गाल पर चूम लिया ऑर इस बार उसने हल्के-हल्के से 15-16 बार मेरे गाल को लगातार चूमा. मुझसे अब ऑर सबर नही हो रहा था मेरा लंड भी खड़ा होके पाजामे मे टेंट बना चुका था इसलिए मैने करवट ले ली ऑर उसके चेहरे के सामने अपना चेहरा कर दिया साथ ही उसकी कमर मे अपने हाथ डाल लिया जैसे लेटे हुए ही उसको गले से लगा रहा हूँ. अब वो पूरी तरह मेरी बाहो मे थी ऑर मेरा लंड उसकी टाँगो के बीच फसा हुआ था मेरी इस हरकत से वो एक दम डर गई ऑर वही सुन्न हो गई जैसे जम गई हो. मुझे अपनी ग़लती का अहसास हो गया था कि वो मुझे सोता हुआ समझकर ही ये सब कर रही थी ये मैने क्या किया इसलिए फिर से बिना कोई हरकत किए वैसे ही लेटा रहा ताकि उसको यही लगे कि मैने नींद मे ही करवट ली है. कुछ देर मैं वैसे ही उसको अपनी बाहो मे लिए पड़ा रहा उसका सिर मेरी नीचे वाली बाजू पर था जो मैने घुमा कर उसकी पीठ के पिछे रखा हुआ था ऑर दूसरे हाथ मैने उसकी कमर पर रखा हुआ था ऑर मेरी एक टाँग अब उसके उपर थी. कुछ देर वो ऐसे ही बिना कोई हरकत किए मेरे साथ लेटी रही जब उसे यक़ीन हो गया कि मैं सोया हुआ हूँ तो उसने फिर से एक बार मेरा नाम पुकारा ऑर वही जुमला फिर से दोहराया...
नाज़ी : नीर जाग रहे हो क्या....
जब मेरी तरफ से कोई जवाब नही आया तो उसे यक़ीन हो गया कि मैने नींद मे ही करवट ली है अब वो मुझसे ऑर चिपक गई ऑर अपनी एक बाजू मेरी कमर मे डाल कर मेरे ऑर करीब हो गई उसकी छातीया अब मुझे अपने सीने पर महसूस हो रही थी ऑर उसकी गरम साँसे मुझे अपने गले पर महसूस हो रही थी उसने हल्का सा अपना चेहरा उठाया ऑर फिर से मेरी गाल पर एक बार फिर चूम लिया अब उसने मेरा एक बाजू जो उसकी कमर पर था उसको एक हाथ से उठाया ऑर उसको अपने हाथो मे थाम लिया फिर धीरे-धीरे मेरे हाथ पर ऑर मेरे हाथ की उंगलियो पर चूमने लगी. फिर खुद ही मेरा हाथ अपनी गाल पर रखकर अपने गाल सहलाने लगी उसके गाल बहुत नाज़ुक थे जिनका अहसास मुझे बहुत अच्छा लग रहा था. फिर उसने हल्के से मेरी टाँग जो मैने उसके उपर रख दी थी उसको धीरे से नीचे की ओर धकेला ताकि वो अपने उपर से मेरी टाँग हटा सके. अब सिर्फ़ मेरा नीचे वाला बाजू ही उसके सिर के नीचे था जिस पर वो सिर रखे हुए लेटी रही. काफ़ी वक़्त गुज़र गया लेकिन अब उसने कोई हरकत नही की ओर वो ऐसे ही मेरे कंधे पर अपने सिर रखकर लेती रही शायद वो मुझे देख रही थी.
थोड़ी देर लेटे रहने के बाद वो उठी ऑर धीरे से बिस्तर पर पहले बैठी ऑर फिर मेरे चेहरे पर 2-3 बार चूम लिया ऑर फिर वो खड़ी होके चली गई फिर मुझे दरवाज़ा खुलता हुआ दिखाई दिया ऑर वो बाहर को निकल गई. मैं बस उसको जाते हुए देखता रहा. मुझे अब ये समझ नही आ रहा था कि ये नया किस्सा कौनसा खुल गया ये कहाँ से आ गई मैं तो फ़िज़ा का इंतज़ार कर रहा था. काफ़ी देर मैं ऐसे ही लेटा रहा लेकिन फ़िज़ा नही आई मैने सोचा चलकर देखता हूँ कि क्या हुआ है आना तो फ़िज़ा को चाहिए था ये नाज़ी कहाँ से आ गई इसलिए मैं बिस्तर से उठा ऑर दबे कदमो के साथ फ़िज़ा के कमरे की तरफ बढ़ने लगा वहाँ जाके देखा तो फ़िज़ा ऑर नाज़ी की आवाज़ आ रही थी.
फ़िज़ा : नाज़ी कब तक बैठी रहोगी आधी रात हो गई है अब तुम भी सो जाओ
नाज़ी : भाभी आप सो जाओ मुझे अभी नींद नही आ रही जब नींद आएगी तो सो जाउन्गी
फ़िज़ा : जैसी तुम्हारी मर्ज़ी मुझे तो बहुत नींद आ रही है मैं सोने जा रही हूँ.
नाज़ी : अच्छा भाभी आप सो जाओ मैं भी थोड़ी देर मे सो जाउन्गी
मैं बाहर खड़ा उन दोनो की बाते सुन रहा था अब मुझे समझ आ गया कि फ़िज़ा क्यो नही आ सकी क्योंकि नाज़ी जाग रही थी. मैं वापिस अपने कमरे मे आके अपने बिस्तर पर लेट गया अब मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था कि इतना अच्छा मोक़ा था मैं नाज़ी को चोद सकता था लेकिन मैने उसको जाने क्यो दिया अब ना मुझे फ़िज़ा मिली ना ही नाज़ी यही सब बाते मे सोच रहा था कुछ देर मे मुझे नींद ने अपनी आगोश मे भी ले लिया. सुबह जब मेरी नींद खुली तो मैं अपने रोज़ के कामो से फारिग होके तैयार हो गया सुबह नाश्ते पर मैं ओर नाज़ी साथ मे बैठे नाश्ता कर रहे थे ऑर फ़िज़ा अंदर रसोई मे थी. जैसे ही फ़िज़ा मुझे नाश्ता देने आई तो मैने गुस्से से उसकी तरफ देखा जिस पर उसने गंदा सा मुँह बना लिया ऑर नाज़ी की तरफ इशारा किया फिर मेरा ऑर नाज़ी का नाश्ता रखकर वापिस रसोई मे चली गई. नाज़ी मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी ऑर नाश्ता कर रही थी.
मैं : क्या बात है आज बड़े दाँत निकल रहे हैं तुम्हारे.
नाज़ी : लो जी अब मैं हँस भी नही सकती
मैं : तुम्हारे दाँत है जीतने चाहे दिखाओ
नाज़ी : हमम्म.... आज तुम बड़ी देर तक सोते रहे
मैं : पता नही रात को नींद बहुत अच्छी आई.
ये सुनकर नाज़ी शर्मा सी गई ऑर मुँह नीचे कर लिया ऑर मुझसे पूछा...
नाज़ी : क्यो रात को क्या खास था
मैं : पता नही लेकिन बहुत अच्छी नींद आई (ज़ोर से बोलते हुए...क्योंकि मैं फ़िज़ा को ये सब सुना रहा था)
नाज़ी : ज़ोर से क्यो बोल रहे हो मैं बहरी नही हूँ धीरे भी तो बोल सकते हो ना
मैं : अच्छा...अच्छा बाते ख़तम करो ऑर जल्दी से नाश्ता खाओ फिर खेत भी जाना है.
उसके बाद हम दोनो खामोश होके नाश्ता करते रहे ऑर फ़िज़ा बार-बार रसोई मे से चेहरा निकालकर मुझे देख रही थी ऑर अपने कानो पर हाथ लगा रही थी मैने चेहरा घुमा लिया ऑर अपना नाश्ता ख़तम करने लगा. नाश्ता करके हम उठे तो फ़िज़ा फॉरन मेरे पास आई
फ़िज़ा : कितने बजे तक वापिस आओगे
मैं : जितने बजे रोज़ आता हूँ आज क्यो पूछ रही हो
फ़िज़ा : नही कुछ नही वैसे ही बस
मैं : (नाज़ी की तरफ देखते हुए) चले नाज़ी
नाज़ी : हाँ चलो (मुस्कुराते हुए)
फ़िज़ा बार-बार नाज़ी के पीछे खड़ी अपने कानो पर हाथ लगा रही थी ऑर मुझसे रात के लिए माफी माँग रही थी लेकिन मैं उसकी तरफ ध्यान नही दे रहा था. फिर मैं ऑर नाज़ी खेत के लिए निकल गये ऑर दिन भर काम मे लगे रहे. शाम को नाज़ी सब समान समेट रही थी ऑर उनकी मुकम्मल जगह पर सारा समान रख रही थी. मैं दिन भर के काम ऑर खेतो की मिट्टी से काफ़ी गंदा हुआ पड़ा था इसलिए नाले मे अपने हाथ पैर अच्छे से धो रहा था मेरे साथ नाज़ी भी अपने हाथ पैर धोने के लिए आ गई ऑर मेरे पास ही बैठ गई. नाज़ी के हाथ-पैर धोने के बाद मैने उसकी तरफ मुस्कुरा कर देखा ऑर उसकी तरफ अपने साफ़ा कर दिया जिसे उसने हँस कर पकड़ लिया ऑर अपने हाथ ऑर बाजू पोंच्छने लगी. अभी उसने अपनी बाजू ही पोन्छि थी कि मैने उससे अपना साफा वापिस खींच लिया वो सवालिया नज़रों से मेरी तरफ देखने लगी मैं नीचे बैठा ऑर खुद उसके पैर ऑर टांगे पोंच्छने लगा ऑर उसकी तरफ एक बार नज़र उठाके देखा वो मुझे ही देखकर मुस्कुरा रही थी. हम दोनो मे कोई बात नही हो रही थी बस एक दूसरे से मुस्कुरा कर आँखो ही आँखो मे बात कर रहे थे.
उसके हाथ पैर सॉफ करने के बाद मैं अपने पैर पोंछ रहा था कि उसने मेरा साफा खींच लिया ऑर गर्दन से नही मे इशारा किया ऑर खुद मेरे पैर पोंछने लगी मुझे उसकी ये अदा बहुत अच्छी लगी ऑर मैं प्यार भरी नज़रों से उसकी तरफ देखने लगा वो बस मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी ऑर अपने काम मे लगी हुई थी मैने उसको उसकी दोनो बाजू से पकड़ा तो वो मुझे देखने लगी.
मैं : पास आओ
नाज़ी : (नज़रे झुकाकर) पास ही तो हूँ
मैं : और पास आओ
नाज़ी : (थोड़ा ऑर नज़दीक आते हुए) अब ठीक है.
मैं : और पास
नाज़ी : क्या है क्यो तंग कर रहे हो
मैं : सुना नही क्या कहा मैने
नाज़ी : (ना मे सिर हिलाते हुए)
मैने उसे कंधे से पकड़ा ऑर अपने सीने से लगा लिया.
नाज़ी : (तेज़-तेज़ साँस लेते हुए) छोड़ो ना कोई आ जाएगा
मैं : कोई नही आएगा
नाज़ी : (खामोशी से मेरे सीने से लगी रही) हमम्म
मैं : एक पप्पी दो ना
नाज़ी : थप्पड़ खाना है (हँसते हुए)
मैं : क्यो
नाज़ी : उउउहहुउऊ (ना मे सिर हिलाते हुए)
मैने अपने दोनो हाथो से उसके चेहरे को पकड़ा ऑर उसकी आँखो मे देखने लगा. वो खामोश होके कुछ देर मेरी आँखों मे देखती रही ऑर फिर अपनी आँखें बंद कर ली. शायद वो भी यही चाहती थी मैं धीरे-धीरे अपना चेहरा उसके चेहरे के करीब ले गया उस वक़्त उसकी साँस बहुत तेज़ चल रही थी.
मैं : आँखें खोलो
नाज़ी : (आँखें खोलते हुए) हमम्म
मैं : नही.....(मुस्कुराते हुए)
नाज़ी : (मुस्कुराते हुए ना मे सिर हिलाते हुए)
मैं : ठीक है फिर थप्पड़ ही मार दो मैं तो करने जा रहा हूँ
नाज़ी : (फिर से आँखें बंद करते हुए)
Update-20
Kuch der wo mere sath aise hi padi rahi fir thoda upar ko hote hue meri gaal par apni ungaaliyan ki madad se mere chehre ko apni taraf kiya or kuch der mujhe dekhti rahi uski saans tez chal rahi thi jo mujhe apne chehre par bhi mehsoos ho rahi thi. Fir usne dheere se mere kaan me kaha
Nazi : jaag rahe ho kya
Main khamosh hoke leta raha jab usse yaqeen ho gaya ki main soya pada hun to usne meri gaal par halke se chum liya usne mera chehra apni ungaliyo ki madad se apni taraf kiya hua tha or mujhe chumne ke baad jaise uski ungaliyo se jaan hi khatam ho gai ho uski saans bhi bahut tez chal rahi jo mujhe apne chehre par mesoos ho rahi thi. uske hath or ungaaliyan kaamp rahi thi kuch der wo aise hi mere kandhe par apna sir rakhkar mere sath leti rahi or apne kampte hatho se meri chaatee par apna hath ferti rahi fir wo uthi or halke se mere kaan me boli....
Nazi : jo tumne manga tha maine de diya hai agli baar tumko mangne ki jarurat nahi hai.
Usne fir ek baar meri gaal par chum liya or iss baar usne halke-halke se 15-16 bar mere gaal ko lagatar chuma. Mujhse ab or sabar nahi ho raha tha mera lund bhi khada hoke pajame me tent bana chuka tha isliye maine karwat le lee or uske chehre ke samne apna chehra kar diya sath hi uski kamar me apne hath daal liya jaise lete hue hi usko gale se laga raha hun. Ab wo poori tarah meri baaho me thi or mera lund uski taango ke bich phasa hua tha meri iss harkat se wo ek dam darr gai or wahi sunn ho gai jaise jamm gai ho. Mujhe apni galati ka ahsaas ho gaya tha ki wo mujhe sota hua samajhkar hi ye sab kar rahi thi ye maine kya kiya isliye fir se bina koi harkat kiye waise hi leta raha taaki usko yhi lage ki maine neend me hi karwat lee hai. kuch der main waise hi usko apni baaho me liye pada raha uska sir meri niche wali baaju par tha jo maine ghuma kar uski peeth ke pichhe rakha hua tha or dusre hath maine uski kamar par rakha hua tha or meri ek taang ab uske upar thi. Kuch der wo aise hi bina koi harkat kiye mere sath leti rahi jab usse yaqeen ho gaya ki main soya hua hun to usne fir se ek baar mera naam pukara or wahi jumla fir se dohraya...
Nazi : Neer jaag rahe ho kya....
Jab meri taraf se koi jawab nahi aaya to usse yaqeen ho gaya ki maine neend me hi karwat lee hai ab wo mujhse or chipak gai or apni ek baaju meri kamar me daal kar mere or kareeb ho gai uski chaateeya ab mujhe apne seene par mehsoos ho rahi thi or uski garam saanse mujhe apne gale par mehsoos ho rahi thi usne halka sa apni chehra uthaya or fir se meri gaal par ek baar fir chum liya ab usne mera ek baaju jo uski kamar par tha usko ek hath se uthaya or usko apne hatho me thaam liya fir dheere-dheere mere hath par or mere hath ki ungaliyo par chumne lagi. fir khud hi mera hath apni gaal par rakhkar apne gaal sehlane lagi uske gaal bahut nazuk the jinka ahsaas mujhe bahut achha lag raha tha. fir usne halke se meri taang jo maine uske upar rakhdi thi usko dheere se niche ki or dhakela taki wo apne upar se meri taang hata sake. ab sirf mera niche wala baju hi uske sir ke niche tha jis par wo sir rakhe hue leti rahi. Kaafi waqt guzar gaya lekin ab usne koi harkat nahi ki or wo aise hi mere kandhe par apne sir rakhkar leti rahi shayad wo mujhe dekh rahi thi.
Thodi der lete rehne ke baad wo uthi or dheere se bistar par pehle baithi or fir mere chehre par 2-3 bar chum liya or fir wo khadi hoke chali gai fir mujhe darwaza khulta hua dikhayi diya or wo bahar ko nikal gai. Main bas usko jate hue dekhta raha. Mujhe ab ye samajh nahi aa raha tha ki ye naya kissa kounsa khul gaya ye kaha se aagai main to fiza ka intzaar kar raha tha. kaafi der main aise hi leta raha lekin fiza nahi aayi maine socha chalkar dekhta hun ki kya hua hai aana to fiza ko chahiye the ye naazi kaha se aa gai isliye main bistar se utha or dabe kadmo ke sath fiza ke kamre ki taraf badhne laga wahan jake dekha to fiza or nazi ki awaaz aa rahi thi.
Fiza : nazi kab tak baithi rahogi aadhi raat ho gai hai ab tum bhi so jao
Nazi : bhabhi aap so jao mujhe abhi neend nahi aa rahi jab neend aayegi to so jaungi
Fiza : jaisi tumhari marzi mujhe to bahut neend aa rahi hai main sone lagi hun.
Nazi : achha bhabhi aap so jao main bhi thodi der me so jaungi
Main bahar khada unn dono ki baate sunn raha tha ab mujhe samajh aa gaya ki fiza kyo nahi aa saki kyonki nazi jaag rahi thi. Main wapis apne kamre me aake apne bistar par let gaya ab mujhe khud par gussa aa raha tha ki itna achha moqa tha main nazi ko chod sakta tha lekin maine usko jane kyo diya ab na mujhe fiza mili naa hi nazi yhi sab baate me soch raha tha kuch der me mujhe neend ne apni aagosh me bhi le liya. Subah jab meri jaagh khuli to main apne roz ke kaamo se farig hoke teiyaar ho gaya subah nashte par main or nazi sath me baithe nashta kar rahe the or fiza andar rasoyi me thi. jaise hi fiza mujhe nashta dene aayi to maine gusse se uski taraf dekha jis par usne ganda sa munh bana liya or nazi ki taraf ishara kiya fir mera or nazi ka nashta rakhkar wapis rasoyi me chali gai. naazi mujhe dekhkar muskura rahi thi or nashta kar rahi thi.
Main : kya baat hai aaj bade daant nikal rahe hain tumhare.
Nazi : loh ji ab main hass bhi nahi sakti
Main : tumhare daant hai jitne chahe dikhao
Nazi : Hhhmmm.... aaj tum badi der tak sote rahe
Main : pata nahi raat ko neend bahut achhi aayi.
Ye sunkar naazi sharma si gai or munh niche kar liya or mujhse puchaa...
Nazi : kyo raat ko kya khas tha
Main : pata nahi lekin bahut achhi neend aayi (zor se bolte hue...kyonki main fiza ko ye sab suna raha tha)
Nazi : Zor se kyo bol rahe ho main behri nahi hun dheere bhi to bol sakte ho naa
Main : achha...achha baate khatam karo or jaldi se nashta khao fir khet bhi jana hai.
Uske baad hum dono khamosh hoke nashta karte rahe or fiza bar-bar rasoyi me se chehra nikaalkar mujhe dekh rahi thi or apne kaano par hath laga rahi thi maine chehra ghuma liya or apna nashta khatam karne laga. nashta karke hum uthe to fiza foran mere pass aayi
Fiza : kitne baje tak wapis aaoge
Main : jitne baje roz aata hun aaj kyo puch rahi ho
Fiza : nahi kuch nahi waise hi bas
Main : (nazi ki taraf dekhte hue) chale nazi
Nazi : haa chalo (muskurate hue)
Fiza bar-bar nazi ke piche khadi apne kaano par hath laga rahi thi or mujhse raat ke liye maafi maang rahi thi lekin main uski taraf dhyaan nahi de raha tha. fir main or nazi khet ke liye nikal gaye or din bhar kaam me lage rahe. Shaam ko naazi sab samaan samet rahi thi or unki mukammal jagah par sara samaan rakh rahi thi. Main din bhar ke kaam or kheto ki mitti se kaafi ganda hua pada tha isliye naale me apne hath pair achhe se dho raha tha mere sath nazi bhi apne hath pair dhone ke liye aa gai or mere pass hi baith gai. Nazi ke Hath-pair dhone ke baad maine uski taraf muskurake dekha or uski taraf apne Safaa kar diya jise usne hass kar pakad liya or apne hath or baaju ponchhne lagi. abhi usne apni baaju hi ponchi thi ki maine usse apna saffa wapis khinch liya wo sawaliya nazaro se meri taraf dekhne lagi main niche baitha or khud uske pair or taangey ponchhne laga or uski taraf ek bar nazar uthake dekha wo mujhe hi dekhkar muskura rahi thi. Hum dono me koi baat nahi ho rahi thi bas ek dusre se muskurakar aankho hi aankho me baat kar rahe the.
Uske hath pair saaf karne ke baad main apne pair ponch raha tha ki usne mera saffa khinch liya or gardan se nahi me ishara kiya or khud mere pair ponchne lagi mujhe uski ye adaa bahut achhi lagi or main pyaar bhari nazaro se uski taraf dekhne laga wo bas mujhe dekhkar muskura rahi thi or apne kaam me lagi hui thi maine usko uski dono baaju se pakda to wo mujhe dekhne lagi.
Main : pass aao
Nazi : (nazre jhukakar) pass hi to hun
Main : Aur pass aao
Nazi : (thoda or nazdeek aate hue) ab thik hai.
Main : aur pass
Nazi : kya hai kyo tang kar rahe ho
Main : suna nahi kya kaha maine
Nazi : (naa me sir hilate hue)
Maine usse kandhe se pakda or apne seene se laga liya.
Nazi : (tez-tez saans lete hue) chodo na koi aa jayega
Main : koi nahi aayega
Nazi : (khamoshi se mere seene se lagi rahi) Hhhmmm
Main : ek pappi do na
Nazi : Thappad khana hai (hansate hue)
Main : kyo
Nazi : Uuuhhhuuu (naa me sir hilate hue)
Maine apne dono hatho se uske chehre ko pakda or uski aankho me dekhne laga. wo khamosh hoke kuch der meri aankhon me dekhti rahi or fir apni aankhen band kar lee. Shayad wo bhi yhi chahti thi main dheere-dheere apna chehra uske chehre ke kareeb le gaya uss waqt uski saans bahut tez chal rahi thi.
Main : aankhen kholo
Nazi : (aankhen kholte hue) Hhhmmm
Main : nahi.....(muskurate hue)
Nazi : (muskurate hue naa me sir hilate hue)
Main : thik hai fir thappad hi maar do main to karne laga hun
मैने अपने होंठ नाज़ी के नरम ऑर रसीले होंठों पर रख दिए जिससे उसे एक झटका सा लगा. कुछ देर उसने अपने होंठों को सख्ती से बंद करे रखा ऑर मेरे हाथो को पकड़े रखा जिससे मैने उसके चेहरे को पकड़ा था. कुछ देर उसके होंठों के साथ अपने होंठ जोड़े रखे अब धीरे धीरे उसके होंठ जो सख्ती से एक दूसरे से जुड़े हुए थे अब कुछ ढीले महसूस होने लगे मैने सबसे पहले उसके नीचे वाले होंठ को चूसना शुरू कर दिया वो मेरा साथ नही दे रही थी लेकिन मना भी नही कर रही थी मैं लगातार उसके नीचे वाले होंठ को चूस रहा था अब धीरे-धीरे उसने भी मेरे उपर वाले होंठ को चूसना शुरू कर दिया मैने अपने दोनो हाथो से उसका चेहरा आज़ाद कर दिया लेकिन वो अब भी मेरे होंठों से होंठ जोड़े बैठी थी ऑर अपनी दोनो आँखें बंद किए बैठी थी अब हम दोनो एक दूसरे को शिद्दत से चूम ऑर चूस रहे थे. हम दोनो की आँखें बंद थी ऑर हम एक दूसरे मे खोए हुए थे मुझे नही पता कब उसने मुझे गले से लगाया ऑर कब मैं ज़मीन पर लेट गया ऑर वो मेरे उपर आके लेट गई हम दोनो किसी अजीब से मज़े के नशे मे मदहोश थे मेरे दोनो हाथ उसकी कमर पर लिपटे थे ऑर उसने अपनी दोनो बाजू मेरे गले मे किसी हार की तरह डाल रखी थी ऑर मेरे उपर लेटी हुई थी. हमें दुनिया को कोई होश नही था हम दोनो बस एक दूसरे मे ही गुम्म थे.
तभी मुझे एक कार का हॉर्न सुनाई दिया जिससे हम दोनो की एक दम आँख खुल गई नाज़ी खुद को इस तरह मेरे उपर लेटा देखकर घबरा सी गई ऑर जल्दी से मुझसे अलग होके मेरे उपर से उठ गई उसके दोनो हाथ बुरी तरह काँप रहे थे. उसका ऑर मेरा मुँह हम दोनो की थूक से बुरी तरह गीला हुआ पड़ा था मैं ज़मीन पर पड़ा उसको देख रहा था वो नज़ारे झुकाए खड़ी थी ऑर एक दम खामोश थी.
मैं : क्या हुआ
नाज़ी : (ना में सिर हिलाते हुए) देर हो रही है घर चले..... (अपना मुँह अपनी चुन्नि से सॉफ करते हुए)
मैं : हां चलो
हम दोनो को ही समझ नही आ रहा था कि एक दूसरे को अब क्या कहे. तभी उस कार का हॉर्न एक बार फिर से सुनाई दिया. हालाकी जहाँ हम दोनो थे वहाँ अंधेरा था इसलिए हम को कोई देख नही सकता था मैने जल्दी से खड़े होके अपने कपड़े झाड़े जिस पर मिट्टी लग गई थी ओर फिर मैं ऑर नाज़ी खेत के फाटक की तरफ बढ़ने लगे. वहाँ हमे एक कार नज़र आई जिसके पास एक लड़की खड़ी थी. मैने पास जाके देखा तो ये हीना थी जो मुझे देख कर हाथ हिला रही थी ऑर मुस्कुरा रही थी.
नाज़ी : आप उससे बात करो मैं खेत का बाकी समान सही से रखकर आती हूँ.
मैं : अच्छा
नाज़ी वापिस चली गई ओर मैं कार की तरफ बढ़ने लगा मुझे देखते ही हीना के चेहरे पर मुस्कान आ गई ऑर मुझे डोर से देखकर ही बोली....
हीना : आ गये जनाब...वक़्त मिल गया हमारे लिए
मैं : जी वो मैं काम मे मसरूफ़ था...कहिए कैसे आना हुआ
हीना : कल अब्बू आपके घर आए थे ना कुछ वादा किया था आपने उनके साथ याद आया.
मैं : अच्छा हाँ याद आ गया.... गाड़ी चलानी सीखनी है तुमको.
हीना : जी हुज़ूर बड़ी मेहरबानी याद करने के लिए
मैं : (मुस्कुराते हुए) यार ज़रूरी है क्या आपके साथ ये ड्राइवर तो आया ही है इसी से सीख लो ना.
हीना : जी नही.... मुझे आपसे ही सीखनी है ऑर आप ही सिख़ाओगे. ये तो बस मुझे यहाँ तक छोड़ने के लिए आया है.
मैं : ऊहह अच्छा....
इतने मे नाज़ी भी वहाँ आ गई...
नाज़ी : (मुझे मुस्कुरा कर देखते हुए)सब काम हो गया अब घर चलें...
मैं : हमम्म चलते हैं (मुस्कुरा कर नाज़ी को देखते हुए)
हीना : ओह्ह्ह मेडम.... आपको जाना है तो जाओ नीर नही जाएँगे
नाज़ी : (गुस्से से हीना को देखते हुए) क्यों.... तुम होती कौन हो इनको रोकने वाली ये मेरे साथ ही जाएँगे समझी सरपंच की बेटी हो इसका मतलब ये नही कि सारा गाँव तुम्हारा गुलाम है.
हीना : औकात मे रहकर बात करो समझी....
नाज़ी गुस्से मे उसको कुछ बोलने वाली थी तभी मुझे बीच मे बोलना पड़ा दोनो को शांत करने के लिए क्योंकि दोनो ही झगड़े पर उतारू थी जिसको मुझे रोकना था......
मैं : यार दोनो चुप हो जाओ क्यो लड़ाई कर रही हो. नाज़ी तुम हीना को ग़लत मत समझो ये सिर्फ़ कार चलानी सीखने आई है ऑर कुछ नही इसलिए घर जाने के लिए मना कर रही थी.
नाज़ी : तो हर बात कहने का तरीका होता है ये क्या बात हुई
हीना : तो मैने क्या ग़लत बोला जो तुम मुझसे लड़ाई करने पर आमादा हो गई.
मैं : दोनो एक दम चुप हो जाओ अब कोई नही बोलेगा नही तो ना मैं तुम्हारे साथ जाउन्गा ना तुम्हारे समझी..... (दोनो की तरफ उंगली करते हुए)
हीना और नाज़ी : (दोनो हाँ मे सिर हिलाते हुए)
मैं : नाज़ी कल बाबा ने वादा किया था सरपंच जी को इसलिए मुझे जाना होगा लेकिन पहले मैं तुमको घर छोड़ देता हूँ ठीक है.
नाज़ी : नही मैं चली जाउन्गी आप जाओ इनके साथ
हीना : चलो नीर चलें
मैं : नही.... नाज़ी मेरे साथ आई थी मेरे साथ ही जाएगी रात होने वाली है इस वक़्त इसका अकेले जाना ठीक नही.
हीना : अर्रे तुम तो बेकार मे ही घबरा रहे हो ये कोई बच्ची थोड़ी है चलो एक काम करते हैं इसको मेरा ड्राइवर घर छोड़ आएगा फिर तो ठीक है.
मैं : मैने बोला ना मेरे साथ ही जाएगी तुम कार मे हमारे घर की तरफ चलो हम पैदल आ रहे हैं.
हीना : जब कार है तो पैदल क्यो जाओगे चलो पहले इसको कार मे घर छोड़ देते हैं फिर हम कार सीखने चलेंगे.
मैं : (नाज़ी की तरफ सवालिया नज़रों से देखते हुए) ठीक है.
नाज़ी : (हाँ मे सिर हिलाके मुझे मुस्कुरकर देखते हुए) हमम्म ठीक है....
हीना : (अपने ड्राइवर से) बशीर तुम जाओ मुझे नीर घर छोड़ देंगे अब्बू पुच्छे तो कह देना मैं 2-3 घंटे तक घर आ जाउन्गी. (मुझे देखते हुए) इतना वक़्त काफ़ी होगा ना
मैं : हमम्म काफ़ी है.
नाज़ी : (हैरान होते हुए) 2-3 घंटे.... तो फिर नीर खाना कब खाएँगे.
मैं : अर्रे फिकर मत करो मैं जल्दी ही वापिस आ जाउन्गा तब साथ मे ही खाएँगे रोज़ जैसे ठीक है (मुस्कुरा कर नाज़ी को देखते हुए)
नाज़ी : अच्छा... लेकिन ज़्यादा देर मत करना ऑर अपना ख्याल रखना.
हीना : अब चलें या सारी रात यही खड़े रहना है
मैं : हाँ... हाँ... चलो
अब हीना का ड्राइवर चला गया ऑर मैं ड्राइविंग सीट पर बैठ गया ऑर मेरे साथ हीना बैठ गई ऑर पिछे नाज़ी बैठी थी. मैने कार मे बैठ ते ही कार के तमाम हिस्सो के बारे मे हीना को बताना शुरू कर दिया ऑर वो बड़े ध्यान से बैठी सुन रही थी साथ मे नाज़ी भी मुँह आगे करके बड़े गौर से मेरी बाते सुन रही थी. फिर मैने कार स्टार्ट की ऑर स्टारिंग को संभालने के बारे मे हीना को बताने लगा....
हीना : थोडा सा मैं भी चलाऊ
मैं : हां ज़रूर ये लो अब तुम सम्भालो ऑर कार संभालने की कोशिश करो.
नाज़ी : तुम सच मे कार बहुत अच्छी चला लेते हो
मैं : शुक्रिया (मुस्कुराते हुए)
तभी हीना अपनी सीट पर बैठी हुई ही टेढ़ी सी होके स्टारिंग संभालने लगी जिससे गाड़ी एक तरफ को जाने लगी इसलिए मैने फॉरन स्टारिंग खुद संभाल लिया ऑर गाड़ी को सही तरफ चलाने लगा मैने फिर से हीना को संभालने के लिए कहा तो वो फिर से नही संभाल पाई ऑर उसने कार को एक तरफ घुमा दिया जिससे कार सड़क से नीचे उतरने ही वाली थी मैने फिर से स्टारिंग संभाला ऑर कार को वापिस रोड पर ले आया.
हीना : (झल्लाकर) नही संभाला जा रहा
मैं : अर्रे अभी तो पहला दिन है पहले दिन नही संभाल पाओगी कुछ दिन कोशिश करो फिर सीख जाओगी फिकर मत करो.
कुछ देर मैं ऐसे ही हीना को कार चलानी सीखाता रहा फिर ह्मारा घर आ गया तो मैने घर के सामने कार रोकदी. नाज़ी कार से उतरी ऑर मेरे पास आके खड़ी हो गई मैने कार का शीशा नीचे किया तो नाज़ी ने खिड़की मे से मुँह अंदर किया ऑर बोली...
नाज़ी : जल्दी आ जाना ज़्यादा दूर मत जाना मैं खाने पर तुम्हारा इंतज़ार करूँगी (मुस्कुराते हुए)
मैं : हाँ बस थोड़ी देर मे आ जाउन्गा फिर खाना साथ मे ही खाएँगे
हीना : आपकी बाते हो गई हो तो चलें.
मैं : हाँ..हाँ.. ज़रूर...
नाज़ी : अंदर भी नही आओगे
मैं : बस थोड़ी देर मे ही आ रहा हूँ तुम जाओ ऑर बाबा को बता देना नही तो फिकर करेंगे ठीक है
नाज़ी : हमम्म.....अच्छा...
नाज़ी मुस्कुराते हुए अंदर चली गई ऑर मैने कार फिर से स्टार्ट की ऑर हीना की तरफ देखते हुए...
मैं : हंजी हीना जी अब कहाँ चलें बताइए...
हीना : मुझे क्या पता आप बताओ कहाँ सिख़ाओगे
मैं : कोई खुला मैदान है आस-पास
हीना : हाँ है ना गाँव के बाहर जहाँ अक्सर बच्चे खेलने जाते हैं इस वक़्त वहाँ कोई नही होगा वहाँ मैं आराम से सीख सकती हूँ (मुस्कुराते हुए)
मैं : ठीक है फिर वही चलते हैं.
कुछ ही देर मे कार गाँव के बाहर आ गई ऑर वहाँ से दो रास्ते निकलते थे एक पतला रास्ता जो आगे जाके पक्की सड़क से मिलता था ऑर दूसरा रास्ता काफ़ी उबड़-खाबड़ सा था जो आगे जाके मैदान मे खुलता था. मुझे हीना ने बताया कि मुझे इसी टूटे रास्ते पर कार लेके जानी है फिर मैदान आ जाएगा तो मैने उसके कहने के मुताबिक कार उसी रास्ते पर दौड़ा दी. रास्ता टूटा होने की वजह से हम दोनो कार के साथ अपनी सीट पर बैठे उछल रहे थे कुछ सामने अंधेरा होने की वजह से मुझे आगे का कोई भी खड्डाे दिखाई नही दे रहा था बस हेड लाइट की रोशनी से थोड़ा बहुत दिखाई दे रहा था. झटको की वजह से से हीना के गोल-गोल मम्मे भी उछल रहे थे जिस पर बार-बार मेरी नज़र पड़ रही थी हीना ने मुझे कंधे से पकड़ रखा था ताकि वो सामने शीशे से ना टकरा जाए. कुछ ही देर मे हम मैदान मे आ गये....
मैं : लो जी आपका मैदान आ गया अब आप मेरी सीट पर आके बैठो ओर मैं आपकी सीट पर बैठूँगा फिर आप कार चलाना ऑर मैं देखूँगा.
हीना : मैं कैसे चलाऊ मुझे तो आती ही नही कुछ गड़-बॅड हो गई तो....
मैं : अर्रे डरती क्यो हो मैं हूँ ना संभाल लूँगा वैसे भी तुम चलाओगी नही तो सीखोगी कैसे.
हीना : अच्छा ठीक है.
मैं : अब तुम मेरी सीट पर आके बैठो फिर मैं जैसे-जैसे तुमको बताउन्गा तुम वैसे-वैसे चलाना ठीक है.
हीना : हमम्म
Update-21
Maine apne honthon nazi ke naram or raseeley honthon par rakh diye jisse usse ek jhatka sa laga. kuch der usne apne honthon ko sakhti se band kare rakha or mere hatho ko pakde rakha jisse maine uske chehre ko pakda tha. kuch der uske honthon ke sath apne honth jode rakhe ab dheere dheere uske honth jo sakhti se ek dusre se jude hue the ab kuch dheele mehsoos hone lage maine sabse pehle uske niche wale honth ko chusna shuru kar diya wo mera sath nahi de rahi thi lekin mana bhi nahi kar rahi thi main lagatar uske niche wale honth ko chus raha tha ab dheere-dheere usne bhi mere upar wale honth ko chusna shuru kar diya maine apne dono hatho se uska chehra azaad kar diya lekin wo ab bhi mere honthon se honth jode baithi thi or apni dono aankhen band kiye baithi thi ab hum dono ek dusre ko shiddat se chum or chus rahe the. Hum dono ki aankhen band thi or hum ek dusre me khoye hue the mujhe nahi pata kab usne mujhe gale se lagaya or kab main zameen par let gaye or wo mere upar aake let gai hum dono kisi ajeeb se maze ke nashe me madhosh the mere dono hath uski kamar par lipte the or usne apni dono baaju mere gale me kisi haar ki taraf daal rakhi thi or mere upar leti hui thi. Hume duniya ko koi hosh nahi tha hum dono bas ek dusre me hi gumm the.
Tabhi mujhe ek car ka horn sunayi diya jisse hum dono ki ek dam aankh khul gai nazi khud ko iss tarah mere upar leta dekhkar ghabra si gai or jaldi se mujhse alag hoke mere upar se uth gai uske dono hath buri tarah kaamp rahe the. Uska or mera munh hum dono ki thook se buri tarah geela hua pada tha main zameen par pada usko dekh raha tha wo nazare jhukaye khadi thi or ek dam khamosh thi.
Main : kya hua
Nazi : (naa me sire hilate hue) der ho rahi hai ghar chale..... (apna munh apni chunni se saaf karte hue)
Main : haa chalo
Hum dono ko hi samajh nahi aa raha tha ki ek dusre ko ab kya kahe. tabhi uss car ka horn ek bar fir se sunayi diya. halaki jahan hum dono the wahan andhera tha isliye ham ko koi dekh nahi sakta tha maine jaldi se khade hoke apne kapde jhaade jis par mitti lag gai thi or fir main or nazi khet ke faatak ki taraf badhne lage. Wahan hume ek car nazar aayi jiske pass ek ladki khadi thi. maine pass jake dekha to ye Heena thi jo mujhe dekh kar hath hila rahi thi or muskura rahi thi.
Nazi : aap usse baat karo main khet ka baki samaan sahi se rakhkar aati hun.
Main : achha
Nazi wapis chali gai or main car ki taraf badhne laga mujhe dekhte hi heena ke chehre par muskaan aa gai or mujhe door se dekhkar hi boli....
Heena : aa gaye janab...waqt mil gaya hamare liye
Main : ji wo main kaam me masroof tha...kahiye kaise aana hua
Heena : kal abbu aapke ghar aaye the naa kuch vaada kiya tha aapne unke sath yaad aaya.
Main : achha haa yaad aa gaya.... Gaadi chalaani seekhani hai tumko.
Heena : ji huzoor badi mehrabani yaad karne ke liye
Main : (muskurate hue) yaar jaruri hai kya aapke sath ye driver to aaya hi hai isi se seekh lo na.
Heena : ji nahi.... mujhe aapse hi seekhni hai or aap hi sikhaoge. ye to bas mujhe yahan tak chodne ke liye aaya hai.
Main : oohhh achha....
Itne me naazi bhi wahan aa gai...
Nazi : (mujhe muskura kar dekhte hue)sab kaam ho gaya ab ghar chalen...
Main : Hhhmmm chalte hain (muskurakar nazi ko dekhte hue)
Heena : Ohhh madam.... aapko jana hai to jao Neer nahi jayenge
Nazi : (gusse se heena ko dekhte hue) kyo.... tum hoti kaun ho inko rokne wali ye mere sath hi jayenge samjhi sarpanch ki beti ho iska matlab ye nahi ki sara gaav tumhara gulaam hai.
Heena : Aukaat me rehkar baat karo samjhi....
Nazi gusse me usko kuch bolne wali thi tabhi mujhe bich me bolna pada dono ko shaant karne ke liye kyonki dono hi jhagde par utaru thi jisko mujhe rokna tha......
Main : yaar dono chup ho jao kyo ladayi kar rahi ho. Nazi tum heena ko galat mat samjho ye sirf car chalani seekhne aayi hai or kuch nahi isliye ghar jane ke liye mana kar rahi thi.
Nazi : to har baat kehne ka tareeka hota hai ye kya baat hui
Heena : to maine kya galat bola jo tum mujhse ladayi karne par amaada ho gai.
Main : dono ek dam chup ho jao ab koi nahi bolega nahi to naa main tumhare sath jaunga na tumhare samjhi..... (dono ki taraf ungali karte hue)
Heena aur Nazi : (dono haa me sir hilate hue)
Main : nazi kal baba ne vaada kiya tha sarpanch ji ko isliye mujhe jana hoga lekin pehle main tumko ghar chod deta hun thik hai.
Nazi : nahi main chali jaungi aap jao inke sath
Heena : chalo Neer chalen
Main : nahi.... nazi mere sath aayi thi mere sath hi jayegi raat hone wali hai iss waqt iska akele jana thik nahi.
Heena : Arre tum to bekaar me hi gabhra rahe ho ye koi bachi thodi hai chalo ek kam karte hain isko mera driver ghar chod aayega fir to thik hai.
Main : maine bola naa mere sath hi jayegi tum Car me hmare ghar ki taraf chalo hum paidal aa rahe hain.
Heena : jab car hai to paidal kyo jaoge chalo pehle isko car me ghar chod dete hain fir hum car seekhne chalenge.
Main : (nazi ki taraf sawaliya nazaro se dekhte hue) Thik hai.
Nazi : (haa me sir hilake mujhe muskurakar dekhte hue) Hhhmmm thik hai....
Heena : (apne driver se) Bashir tum jao mujhe Neer ghar chod denge abbu puchhe to keh dena main 2-3 ghante tak ghar aa jaungi. (mujhe dekhte hue) Itna waqt kafi hoga na
Main : Hhhmmm kaafi hai.
Nazi : (hairaan hote hue) 2-3 ghante.... to fir Neer khana kab khayenge.
Main : arre fikar mat karo main jaldi hi wapis aa jaunga tab sath me hi khayenge roz jaise thik hai (muskurakar nazi ko dekhte hue)
Nazi : achhaa... lekin jyaadaa der mat karna or apna khyaal rakhna.
Heena : ab chalen ya sari raat yhi khade rehna hai
Main : haa... haa... chalo
Ab Heena ka driver chala gaya or main Driving seat par baith gaya or mere sath heena baith gai or pichhe nazi baithi thi. maine car me baith te hi car ke tamaam hisso ke bare me heena ko batana shuru kar diya or wo bade dhyaan se baithi sunn rahi thi sath me nazi bhi munh aagey karke bade gaur se meri baate sunn rahi thi. fir maine car start ki or stairing ko sambhalne ke bare me heena ko batane laga....
Heena : thoda sa main bhi chalau
Main : haa jarur ye lo ab tum sambhalo or car sambhalne ki koshish karo.
Nazi : tum sach me car bahut achhi chala lete ho
Main : shukriya (muskurate hue)
Tabhi heena apni seat par baithi hui hi tedhi si hoke stairing sambhalne lagi jisse gaadi ek taraf ko jaane lagi isliye maine foran stairing khud sambhaal liya or gaadi ko sahi taraf chalane laga maine fir se heena ko sambhalne ke liye kaha to wo fir se nahi sambhaal payi or usne car ko ek taraf ghuma diya jisse car sadak se niche utarne hi wali thi maine fir se stairing sambhala or car ko wapis road par le aaya.
Heena : (jhallakar) nahi sambhala jaa raha
Main : arre abhi to pehla din hai pehle din nahi sambhaal paogi kuch din koshish karo fir seekh jaogi fikar mat karo.
Kuch der main aise hi heena ko car chalani seekhata raha fir hmara ghar aa gaya to maine ghar ke samne car rokdi. Nazi car se utari or mere pass aake khadi ho gai maine car ka sheesha niche kiya to nazi ne khidki me se munh andar kiya or boli...
Nazi : jaldi aa jana jyaadaa door mat jana main khane par tumhara intzaar karungi (muskurate hue)
Main : haa bas thodi der me aa jaunga fir khana sath me hi khayenge
Heena : aapki baate ho gai ho to chalen.
Main : ha..ha.. jarur...
Nazi : andar bhi nahi aaoge
Main : bas thodi der me hi aa raha hun tum jao or baba ko bata dena nahi to fikar karenge thik hai
Nazi : hhhmmm.....achha...
Nazi muskurate hue andar chali gai or maine car fir se start ki or Heena ki taraf dekhte hue...
Main : Hanji heena ji ab kaha chalen batayiye...
Heena : mujhe kya pata aap bataao kaha sikhaoge
Main : koi khula maidaan hai aas-pass
Heena : ha hai na gaav ke bahar jahan aksar bache khelne jate hain iss waqt wahan koi nahi hoga wahan main araam se seekh sakti hun (muskurate hue)
Main : thik hai fir wahi chalte hain.
Kuch hi der me Car gaav ke bahar aa gai or wahan se do raste nikalte the ek patla rasta jo aagey jake pakki sadak se milta tha or dusra rasta kaafi ubad-khaabad sa tha jo aagey jake maidaan me khulta tha. Mujhe heena ne bataayaa ki mujhe isi toote raste par car leke jani hai fir maidaan aa jayega to maine uske kehne ke mutabik car usi raste par dauda di. Rasta toota hone ki wajah se hum dono car ke sath apni seat par baithe uchhal rahe the kuch samne andhera hone ki wajah se mujhe aagey ka koi bhi khadda dikhayi nahi de raha tha bas head light ki roshni se thoda bahut dikhayi de raha tha. Jhatko ki wajahan se Heena ke gol-gol mamme bhi uchhal rahe the jis par bar-bar meri nazar pad rahi thi heena ne mujhe kandhe se pakad rakha tha taaki wo samne sheeshe se naa takra jaye. kuch hi der me hum maidaan me aa gaye....
Main : loh ji aapka maidaan aa gaya ab aap meri seat par aake baitho or main aapki seat par baithunga fir aap car chalana or main dekhunga.
Heena : main kaise chalau mujhe to aati hi nahi kuch gad-bad ho gai to....
Main : Arre darti kyo ho main hun naa sambhaal lunga waise bhi tum chalaogi nahi to sikhogi kaise.
Heena : achha thik hai.
Main : ab tum meri seat par aake baitho fir main jaise-jaise tumko bataunga tum waise-waise chalana thik hai.
अब हम दोनो ने अपनी सीट बदल ली ऑर एक दूसरे की जगह पर आ गये मैने दुबारा उसको गाड़ी के तमाम पुरज़ो के बारे मे बताया फिर हीना को कार चलाने को कहा. हीना ने कार चलानी शुरू की अब उसने सिर्फ़ स्टारिंग पकड़ा था बाकी नीचे का सारा कंट्रोल मेरे हाथ मे था मैने अपना एक पैर ब्रेक पर रखा हुआ था अहतियात के लिए. लेकिन उसने जैसे ही कार चलानी शुरू की उसने एक दम क्लच छोड़ दिया जिससे गाड़ी झटके से बंद हो गई. काफ़ी बार उसने ट्राइ किया लेकिन हर बार गाड़ी झटके से बंद हो रही थी क्योंकि कभी वो झटके से क्लच छोड़ देती थी कभी रेस नही देती थी. अब वो भी परेशान होने लगी थी.
हीना : मुझे लगता है मैं कभी नही सीख पाउन्गी (रोने जैसा मुँह बनाके)
मैं : फिकर मत करो आज तो पहला ही दिन है कुछ वक़्त लगेगा लेकिन सीख जाओगी
हीना : कैसे सीखूँगी गाड़ी तो शुरू होती नही मुझसे.... पता नही अब्बू ने भी कैसी खटारा गाड़ी दी है कहा भी था नयी गाड़ी खरीद दो.
मैं : अर्रे कुछ नही होता गाड़ी एकदम ठीक है... चलो एक काम करो मैं ड्राइवर सीट पर बैठ जाता हूँ तुम मेरी गोद मे बैठकर चलाओ फिर नीचे पैर से मैं तुमको क्लच छोड़ना सिखाता हूँ पहले.
हीना परेशान होके) ठीक है
अब मैं ड्राइविंग सीट पर बैठा था ऑर हीना आके मेरी गोद मे बैठ गई. उसके मेरी गोद मे बैठते ही मुझे एक झटका सा लगा उसका बदन बहुत नाज़ुक ऑर कोमल था उसकी कमर एक दम सुरहीदार थी एक दम पतली सी जबकि उसकी गान्ड काफ़ी चौड़ी थी ऑर बाहर को निकली हुई थी साइड से लेकिन बेहद नाज़ुक थी. मैने उसकी कमर के साइड से अपने दोनो हाथ निकाले ऑर स्टारिंग थाम लिया जिस पर उसने पहले से हाथ रखे हुए थे. अब हम दोनो की टांगे एक दम जुड़ी हुई थी ऑर मैने अपने हाथ उसके हाथो पर रखे हुए थे मैने अपने मुँह उसके कंधे पर रखा हुआ था.हमने फिर से कार स्टार्ट की ऑर इस बार कार सही चलने लगी. अब वो बड़े आराम से बैठी कार चला रही थी ऑर खुश हो रही थी....
हीना: (खुश होके हँसते हुए) देखो नीर मैं कार चला रही हूँ
मैं : देखा मैने कहा था ना तुम बेकार मे उदास हो रही थी.
हीना : लेकिन ये हॅंडेल मुझसे सीधा क्यो नही चलता
मैं : धीरे-धीरे ये भी संभालना आ जाएगा. वैसे मेडम इसे हॅंडेल नही स्टारिंग कहते हैं (हँसते हुए)
हीना : अच्छा मुझे पता नही था.
फिर वो ऐसे ही बैठी कार चलाती रही ऑर मैं उसके नाज़ुक बदन ऑर उसके बदन की खुश्बू मे खोया रहा नीचे से मेरे लंड ने भी सिर उठाना शुरू कर दिया था जिसको शायद चूत की खुश्बू मिल गई. कुछ देर बाद हीना को शायद गान्ड के नीचे मेरा लंड चुभने लग गया इसलिए वो अपनी गान्ड को इधर-उधर हिलाने लगी जिससे मेरे लंड को बे-इंतेहा मज़ा आया ऑर वो एक दम लोहे की तरह सख़्त होके खड़ा हो गया लेकिन क्योंकि उपर हीना बैठी थी इसलिए वो सीधा नही खड़ा हो सका ऑर आगे की तरफ मूड गया ऑर चूत की छेद पर दस्तक देने लग गया. जैसे-जैसे लंड नीचे झटका ख़ाता वो सीधा चूत पर ठोकर मारता जिससे हीना को एक झटका सा लगता ऑर वो थोड़ा उपर को हो जाती ऑर फिर बैठ जाती. हम दोनो ही खामोश थे ऑर कार चला रहे थे ऑर हीना चुप-चाप मेरी गोद मे बैठी थी ऑर नीचे से मेरा लंड अपने ही काम मे लगा था क्योंकि कुछ दिन से उसे भी उसकी खुराक नही मिली थी. थोड़ी देर ऐसे ही बैठे रहने के बाद हीना ने खुद अपनी गान्ड को मेरे लंड पर मसलना शुरू कर दिया शायद अब उसको भी मज़ा आने लगा था.
हीना : अब तुम चलाओ मुझसे नही चलाई जा रही अब मैं देखूँगी.
मैं : ठीक है
वो अब भी मेरी गोद मे बैठी थी ऑर नीचे देख रही थी लेकिन उसकी आँखें बंद थी उसने अपने दोनो हाथ मेरे हाथो पर रखे हुए थे मैं काफ़ी देर ऐसे ही कार चलाता रहा ऑर वो बस मेरी गोद मे बैठी रही बीच-बीच मे उसकी साँस तेज़ हो जाती ऑर वो गान्ड को हिलाने लगती जैसे उसको अंदर से झटके लग रहे हो ऑर फिर शांत होके बैठ जाती लेकिन ज़ुबान से वो एक दम खामोश थी. अब मेरा लंड भी दर्द करने लग गया था क्योंकि वो हीना की गान्ड के नीचे मुड़ा पड़ा था इसलिए उसको अपनी गोद से उठाने के लिए मैने उससे पूछा...
मैं : अब काफ़ी वक़्त हो गया है बाकी कल सीख लेना अब घर चलें.
हीना : हमम्म (वो अब भी मुँह नीचे किए ऑर नज़रें झुकाए बैठी थी)
हीना अब भी मेरी गोद मे ही बैठी थी शायद वो उठना नही चाहती थी इसलिए मैने भी उससे उठने के लिए नही कहा ऑर ऐसे ही गाड़ी घुमा दी. अब गाड़ी मैदान से निकलकर उसी उबड़-खाबड़ कच्चे रास्ते पर थी जहाँ से हम आए थे. मैं सोच रहा था कि यहाँ शायद हीना मुझे उतरने के लिए कहेगी इसलिए कुछ पल के लिए कार रोकदी ऑर उसके जवाब का इंतज़ार करने लगा लेकिन वो कुछ नही बोली ऑर ऐसे ही मुँह नीचे किए हुए बैठी रही इसलिए मैने भी बिना कुछ बोले उस रास्ते की तरफ गाड़ी बढ़ा दी. रास्ता कच्चा होने से गाड़ी फिर से उछल्ने लगी ऑर साथ ही हिना भी उच्छलने लगी एक जगह ऐसी आई जहाँ कार ज़ोर से उच्छली साथ ही हीना भी काफ़ी उपर को उछल गई जिसको मैने कमर मे हाथ डालकर पकड़ लिया ऑर सिर पर छत लगने से बचाया. लेकिन उसके उच्छलने से मेरे लंड को खड़े होके अपना सिर उठाने की जगह मिल गई वो किसी डंडे की तरह कार की छत की तरफ मुँह किए खड़ा हो गया जिस पर हीना बैठ गई ऑर एक तेज़ सस्स्सस्स के साथ उसने सामने देखा ऑर मेरे हाथो पर अपनी उंगलियो के नाख़ून गढ़ा दिए जिससे मुझे भी दर्द हुआ ऑर मेरा हाथ छिल गया शायद मेरा लंड उसकी गान्ड की छेद पर चुभा था जिसकी वजह से उससे बेहद दर्द हुआ अगर हम दोनो की सलवार बीच मे ना होती तो मेरा लंड सीधा उसकी गान्ड मे ही घुस जाता अभी मैं अपने ख्यालो मे ही था कि मुझे हीना की आवाज़ आई
हीना : रोको....रोको....कार रोको...ससस्स आई....मेरे सिर मे लगी बहुत दर्द हो रहा है (मैं जानता था वो झूठ बोल रही है क्योंकि छत तक उसके सिर को मैने पहुँचने ही नही दिया था तो लगती कैसे)
मैं : क्या हुआ ठीक तो हो.
हीना : कुछ नही मुझे उधर बैठने दो नही तो फिर से च्चत सिर मे लग जाएगी रास्ता खराब है इसलिए अब आप ही चलाओ बाकी मैं कल सीख लूँगी
मैं : ठीक है
मैने कार रोकी ऑर वो बाहर निकलकर साथ वाली सीट पर आके बैठ गई मैं लगातार उसके चेहरे को ही देख रहा था लेकिन उसकी नज़र एक दम सामने थी उसके चेहरे पर अब भी दर्द महसूस हो रहा था हालाकी वो अपने दर्द ज़ाहिर नही कर रही थी फिर भी उसके चेहरे से सॉफ पता चल रहा था कि उसको अब भी तक़लीफ़ हो रही है. उसकी तक़लीफ़ मेरे लंड से भी देखी नही गई ऑर वो भी बैठने लगा मैं मन ही मन अपने लंड को गालियाँ दे रहा था कि साले इतनी ज़ोर से घुसने की क्या ज़रूरत थी हल्के-फुल्के मज़े भी तो ले सकता था. ऐसे ही खुद से बाते करते हुए मैं कार चलाने लगा सारे रास्ते हम खामोश रहे हम दोनो मे उसके बाद कोई बात नही हुई. थोड़ी देर मे हवेली भी आ गई ऑर कार को देखते ही सरपंच के आदमियो ने बड़ा गेट खोल दिया जिससे कार अंदर आ सके. सामने सरपंच बाग मे टहल रहा था शायद वो हीना का ही इंतज़ार कर रहा था हमें देखकर सरपंच भी तेज़ कदमो के साथ हमारी तरफ आने लगा. मैने कार खड़ी की ऑर चाबी निकालकर सरपंच की तरफ बढ़ने लगा मेरे साथ ही हीना भी सरपंच के पास आ गई.
मैं : ये लीजिए सरपंच जी आपकी अमानत (कार की चाबी सरपंच को देते हुए)
सरपंच : कैसा रहा पहला दिन (मुस्कुराते हुए)
मैं : जी ये तो हीना जी ही बता सकती है
हीना : बहुत अच्छा था अब्बू अब तो मुझे स्टारिंग संभालना भी आ गया है थोड़ा-थोड़ा. (मुस्कुराते हुए)
सरपंच : अर्रे आएगा कैसे नही तुम तो मेरी बहुत होशियार बेटी हो (हीना के सिर पर हाथ रखते हुए)
मैं : अच्छा जी अब इजाज़त दीजिए घर मे सब इंतज़ार कर रहे होंगे
सरपंच: अर्रे ऐसे कैसे नही-नही खाना यही ख़ाके जाना
हीना : हाँ नीर जी खाना यहीं ख़ाके जाना
मैं : जी आज नही फिर कभी आज मैं घर बोलकर आया हूँ इसलिए सब लोग मेरा खाने पर इंतज़ार कर रहे होंगे.
सरपंच : अर्रे बचा-खुचा तो रोज़ खाते हो आज हमारे यहाँ शाही खाना भी खा के देखो तुमने जिंदगी मे कभी नही खाया होगा.
हीना : (बीच मे बोलते हुए) अब्बू आप फिर शुरू हो गये...मैने आपको कुछ समझाया था अगर याद हो तो...
सरपंच : अच्छा ठीक है नही बोलता बस अब तो खुश (इतना कहकर सरपंच अंदर चला गया)
मैं : ठीक है हीना जी कल मुलाक़ात होगी अब इजाज़त दीजिए.
हीना : अब्बू के इस तरह के बर्ताव के लिए माफी चाहती हूँ
मैं : अर्रे कोई बात नही आप माफी मत मांगिए....
हीना : वैसे अगर यहाँ खाना खा जाते तो बेहतर होता (मुस्कुराते हुए)
मैं : आज नही फिर कभी आपकी रोटी उधार रही हम पर (मुस्कुराते हुए) अच्छा अब इजाज़त दीजिए.
हीना : अच्छा जी कल मिलेंगे फिर.... (हाथ हिलाते हुए मुस्कुराकर)
इतना कहकर मैं गेट की तरफ बढ़ गया ऑर हीना वही खड़ी मुझे देखती रही. गेट पर खड़े मुलाज़िम ने छोटा दरवाज़ा मेरे जाने के लिए खोल दिया ऑर मैं हवेली से बाहर निकल गया मैं अपनी सोचो मे गुम था ऑर मेरे कदम घर की तरफ बढ़ रहे थे. मेरे दिमाग़ मे इस वक़्त कई सवाल थे जिनके जवाब मुझे जानने थे. कहाँ मैं फ़िज़ा के साथ था ऑर बीच मे ये नाज़ी ऑर हीना कहा से टपक पड़ी ऑर अब ना तो मैं पूरी तरह नाज़ी के साथ था ना ही फ़िज़ा के साथ ऑर ना ही हीना के साथ ये तीनो ही मुझे एक जैसी लगने लगी थी. तीनो मेरे लिए फ़िकरमंद रहती थी ओर मेरा ख्याल रखने की पूरी कोशिश करती थी मुझे समझ नही आ रहा था कि तीनो मे किसको अपना कहूँ ऑर किसको बेगाना समझकर भूल जाउ.
अपनी ही सोचो मे गुम कब मैं घर पहुंच गया मुझे पता ही नही चला. जब घर आया तो नाज़ी ऑर फ़िज़ा घर के बाहर ही खड़ी थी शायद वो मेरा ही इंतज़ार कर रही थी. उनको मैने एक नज़र देखा तो दोनो ने ही अपनी सदाबहार मुस्कान के साथ मेरा स्वागत किया.
नाज़ी : ये क्या तुम पैदल आए हो तुम तो कार पर गये थे ना.
मैं : अर्रे हीना जी को छोड़कर भी तो आना था इसलिए कार भी वापिस वही दे आया
फ़िज़ा : ये सरपंच ने तुमको पैदल ही भेज दिया उससे इतना भी नही हुआ कि किसी मुलाज़िम को कहकर तुमको घर तक कार पर छोड़ जाए उसकी साहबज़ादी को मुफ़्त मे कार चलानी सीखा रहे हो.
मैं : अर्रे कोई बात नही पैदल आ गया तो क्या हो गया.
नाज़ी : बाप-बेटी दोनो एक जैसे हैं अहसान-फारमोश कही के.
मैं : अर्रे तुम दोनो के सवाल-जवाब ख़तम हो गये हो तो मुझे अंदर जाने दो यार भूख लगी है.
नाज़ी : हमम्म चलो हमने भी तुम्हारी वजह से खाना नही खाया. (मुस्कुराते हुए)
फ़िज़ा : चलो पहले तुम नहा लो फिर हम खाना खा लेंगे तब तक मैं खाना गरम करती हूँ
कुछ देर बाद मे मैं नहा लिया ऑर फ़िज़ा ऑर नाज़ी ने मिलकर खाना भी गरम कर दिया ऑर सब खाना टेबल पर लगा दिया था. हम तीनो खाना खाने बैठ गये.
नाज़ी : तो क्या सिखाया उस हेरोयिन को मास्टर जी ने (मुस्कुराते हुए)
मैं : कार ही सिखानी थी वही सिखाई ऑर क्या
फ़िज़ा : फिर सीख गई ना वो कार चलानी
मैं : अभी इतनी जल्दी कहा अभी तो कुछ दिन लगेंगे
नाज़ी : हाए तो क्या रोज़ा जाओगे उस भूंतनी को सिखाने के लिए?
मैं : हमम्म अब तो रोज़ इसी वक़्त ही घर आउन्गा कुछ दिन.
फ़िज़ा : ये बाबा भी ना इतना नही देखते कि एक अकेला इंसान सारा दिन खेत मे काम करके आया है अब उसको एक नये कम पर और लगा दिया है.
मैं : अर्रे तो क्या हो गया मैने कभी तुमको शिकायत तो नही की ना...
फ़िज़ा : यही तो रोना है तुम कभी शिकायत नही करते. लेकिन हमें तो दिखता है ना तुम हमारे लिए कितनी मेहनत करते हो जो काम किसी ओर इंसान के थे वो काम तुमको करने पड़ रहे हैं.
मैं : (मुस्कुराते हुए) कोई बात नही... मैं बहुत खुश-नसीब समझता हूँ खुद को जो मुझे इतने अच्छे घरवाले मिले तुम लोगो के लिए तो कुछ भी कर सकता हूँ.
नाज़ी : किस्मत तो हमारी अच्छी है जो हम को तुम मिल गये
मैं : अच्छा-अच्छा अब ज़्यादा बाते ना बनाओ ऑर चुप करके खाना खाओ.
Update-22
Ab hum dono ne apni seat badal lee or ek dusre ki jagah par aa gaye maine dubara usko gaadi ke tamaam purzo ke bare me bataayaa fir heena ko car chalane ko kaha. Heena ne car chalani shuru ki ab usne sirf stairing pakda tha baki niche ka sara control mere hath me tha maine apna ek pair break par rakha hua tha ahtiyaat ke liye. lekin usne jaise hi car chalani shuru ki usne ek dam clutch chod diya jisse gaadi jhatke se band ho gai. kaafi baar usne try kiya lekin har baar gaadi jhatke se band ho rahi thi kyonki kabhi wo jhatke se clutch chod deti thi kabhi race nahi deti thi. Ab wo bhi pareshaan hone lagi thi.
Heena : mujhe lagta hai main kabhi nahi seekh paungi (rone jaisa munh banake)
Main : fikar mat karo aaj to pehla hi din hai kuch waqt lagega lekin seekh jaogi
Heena : kaise sikhungi gaadi to shuru hoti nahi mujhse.... pata nahi abbu ne bhi kaisi khataara gaadi di hai kaha bhi tha nayi gaadi khareed do.
Main : arre kuch nahi hota gaadi ekdam thik hai... chalo ek kam karo main driver seat par baith jata hun tum meri god me baithkar chalao fir niche pair se main tumko clutch chodna sikhata hun pehle.
Heena pareshan hoke) thik hai
Ab main driving seat par baitha tha or heena aake meri god me baith gai. uske meri god me baithte hi mujhe ek jhatka sa laga uska badan bahut nazuk or komal tha uski kamar ek dam surahidaar thi ek dam patli si jabki uski gand kaafi choudi thi or bahar ko nikali hui thi side se lekin behad nazuk thi. maine uski kamar ke side se apne dono hath nikale or stairing thaam liya jis par usne pehle se hath rakhe hue the. Ab hum dono ki taangey ek dam judi hui thi or maine apne hath uske hatho par rakhe hue the maine apne munh uske kandhe par rakha hua tha.hamane fir se car start ki or iss baar car sahi chalne lagi. Ab wo bade araam se baithi car chala rahi thi or khush ho rahi thi....
Heena: (khush hoke hansate hue) dekho Neer main car chala rahi hun
Main : dekha maine kaha tha naa tum bekaar me udaas ho rahi thi.
Heena : lekin ye handel mujhse seedha kyo nahi chalta
Main : dheere-dheere ye bhi sambhalna aa jayega. waise madam isse handel nahi stairing kehte hain (hansate hue)
Heena : achha mujhe pata nahi tha.
Fir wo aise hi baithi car chalati rahi or main uske nazuk badan or uske badan ki khushbu me khoya raha niche se mere lund ne bhi sir uthana shuru kar diya tha jisko shayad chut ki khushboo mil gai. kuch der baad heena ko shayad gaanD ke niche mera lund chubhne lag gaya isliye wo apni gaanD ko idhar-udhar hilane lagi jisse mere lund ko be-intehaa maza aaya or wo ek dam lohe ki tarah sakht hoke khada ho gaya lekin kyonki upar heena baithi thi isliye wo seedha nahi khada ho saka or aagey ki taraf mud gaya or chut ki ched par dastak dene lag gaya. jaise-jaise lund niche jhatka khata wo seedha chut par thokar marta jisse heena ko ek jhatka sa lagta or wo thoda upar ko ho jati or fir baith jati. hum dono hi khamosh the or car chala rahe the or heena chup-chap meri god me baithi thi or niche se mera lund apne hi kaam me laga tha kyonki kuch din se usse bhi uski khuraak nahi mili thi. thodi der aise hi baithe rehne ke baad heena ne khud apni gaanD ko mere lund par masalna shuru kar diya shayad ab usko bhi maza aane laga tha.
Heena : ab tum chalao mujhse nahi chalayi jaa rahi ab main dekhungi.
Main : thik hai
Wo ab bhi meri god me baithi thi or niche dekh rahi thi lekin uski aankhen band thi usne apne dono hath mere hatho par rakhe hue the main kaafi der aise hi car chalata raha or wo bas meri god me baithi rahi bich-bich me uski saans tez ho jati or wo gaanD ko hilane lagti jaise usko andar se jhatke lag rahe ho or fir shaant hoke baith jati lekin zubaan se wo ek dam khamosh thi. Ab mera lund bhi dard karne lag gaya tha kyonki wo heena ki gaanD ke niche muda pada tha isliye usko apni god se uthane ke liye maine usse puchaa...
Main : ab kaafi waqt ho gaya hai baki kal seekh lena ab ghar chalen.
Heena : hhhmmm (wo ab bhi munh niche kiye or nazare jhukaye baithi thi)
Heena ab bhi meri god me hi baithi thi shayad wo uthna nahi chahti thi isliye maine bhi usse uthne ke liye nahi kaha or aise hi gaadi ghuma di. Ab gaadi maidaan se nikalkar usi ubad-khaabad kache raste par thi jahan se hum aaye the. main soch raha tha ki yahan shayad heena mujhe utarne ke liye kahegi isliye kuch pal ke liye car rokdi or uske jawab ka intzaar karne laga lekin wo kuch nahi boli or aise hi munh niche kiye hue baithi rahi isliye maine bhi bina kuch bole uss raste ki taraf gaadi badha di. Rasta kacha hone se gaadi fir se uchhalne lagi or sath hi nazi bhi uchhalne lagi ek jagah aisi aayi jahan car jor se uchhali sath hi heena bhi kafi upar ko uchhal gai jisko maine kamar me hath daalkar pakad liya or sir par chhat lagne se bachaya. lekin uske uchhalne se mere lund ko khade hoke apna sir uthane ki jagah mil gai wo kisi dande ki tarah car ki chhat ki taraf munh kiye khada ho gaya jis par heena baith gai or ek tez ssssss ke sath usne samne dekha or mere hatho par apni ungaliyo ke nakhun gadaa diye jisse mujhe bhi dard hua or mera hath chill gaya shayad mera lund uski gaanD ki ched par chubha tha jiski wajah se usse behad dard hua agar hum dono ki salwar bich me naa hoti to mera lund seedha uski gaanD me hi ghus jata abhi main apne khyaalo me hi tha ki mujhe heena ki awaaz aayi
Heena : roko....roko....car roko...ssss aayi....mere sir me lagi bahut dard ho raha hai (main janta tha wo jhooth bol rahi hai kyonki chhat tak uske sir ko maine pohonchne hi nahi diya tha to lagti kaise)
Main : kya hua thik to ho.
Heena : kuch nahi mujhe udhar baithne do nahi to fir se chhat sir me lag jayegi rasta kharab hai isliye ab aap hi chalao baki main kal seekh lungi
Main : thik hai
Maine car roki or wo bahar nikalar sath wali seat par aake baith gai main lagaatar uske chehre ko hi dekh raha tha lekin uski nazar ek dam samne thi uske chehre par ab bhi dard mehsoos ho raha tha halaki wo apne dard zahir nahi kar rahi thi fir bhi uske chehre se saaf pata chal raha tha ki usko ab bhi taqleef ho rahi hai. Uski taqleef mere lund se bhi dekhi nahi gai or wo bhi baithne laga main mann hi mann apne lund ko gaaliyan de raha tha ki sale itni jor se ghusne ki kya jarurat thi halke-phulke maze bhi to le sakta tha. aise hi khud se baate karte hue main car chalane laga saare raste hum khamosh rahe hum dono me uske baad koi baat nahi hui. thodi der me haveli bhi aa gai or car ko dekhte hi sarpanch ke aadmiyo ne bada gate khol diya jisse car andar aa sake. samne sarpanch baagh me tehal raha tha shayad wo heena ka hi intzaar kar raha tha hume dekhkar sarpanch bhi tez kadmo ke sath hamaari taraf aane laga. maine car khadi ki or chaabi nikalkar sarpanch ki taraf badhne laga mere sath hi heena bhi sarpanch ke pass aa gai.
Main : ye lijiye sarpanch ji aapki amaanat (car ki chaabi sarpanch ko dete hue)
Sarpanch : kaisa raha pehla din (muskurate hue)
Main : ji ye to heena ji hi bata sakti hai
Heena : bahut achha tha abbu ab to mujhe stairing sambhalna bhi aa gaya hai thoda-thoda. (muskurate hue)
Sarpanch : arre aayega kaise nahi tum to meri bahut hoshiyar beti ho (heena ke sir par hath rakhte hue)
Main : achha ji ab ijajat dijiye ghar me sab intzaar kar rehe honge
Sarpanch: arre aise kaise nahi-nahi khana yhi khake jana
Heena : haa Neer ji khana yhi khake jana
Main : ji aaj nahi fir kabhi aaj main ghar bolkar aaya hun isliye sab log mera khane par intzaar kar rahe honge.
Sarpanch : arre bacha-khucha to roz khate ho aaj hmare yahan shahi khana bhi khaa ke dekho tumne jindagi me kabhi nahi khaya hoga.
Heena : (bich me bolte hue) abbu aap fir shuru ho gaye...maine aapko kuch samjhaya tha agar yaad ho to...
Sarpanch : achha thik hai nahi bolta bas ab to khush (itna kehkar sarpanch andar chala gaya)
Main : thik hai heena ji kal mulaqat hogi ab ijajat dijiye.
Heena : abbu ke iss tarah ke bartaav ke liye maafi chahti hun
Main : arre koi baat nahi aap maafi mat mangiye....
Heena : waise agar yahan khana khaa jate to behtar hota (muskurate hue)
Main : aaj nahi fir kabhi aapki roti udhaar rahi hum par (muskurate hue) achha ab ijajat dijiye.
Itna kehkar main gate ki taraf badh gaya or heena wahi khadi mujhe dekhti rahi. gate par khade mulazim ne chhota darwaza mere jane ke liye khol diya or main haveli se bahar nikal gaya main apni socho me gum tha or mere kadam ghar ki taraf badh rahe the. mere dimaag me iss waqt kai sawaal the jinke jawab mujhe janne the. kaha main fiza ke sath tha or bich me ye nazi or heena kaha se tapak padi or ab na to main poori tarah nazi ke sath tha na hi fiza ke sath or na hi heena ke sath ye teeno hi mujhe ek jaisi lagne lagi thi. teeno mere liye fikarmand rehti thi or mera khyaal rakhne ki poori koshish karti thi mujhe samajh nahi aa raha tha ki teeno me kisko apna kahu or kisko begana samajhkar bhul jau.
Apni hi socho me gum kab main ghar pohonch gaya mujhe pata hi nahi chala. Jab ghar aya to nazi or fiza ghar ke bahar hi khadi thi shayad wo mera hi intzaar kar rahi thi. unko maine ek nazar dekha to dono ne hi apni sadabahaar muskaan ke sath mera swaagat kiya.
Nazi : ye kya tum paidal aaye ho tum to car par gaye the naa.
Main : arre heena ji ko chodkar bhi to aana tha isliye car bhi wapis wahi de aaya
Fiza : ye sarpanch ne tumko paidal hi bhej diya usse itna bhi nahi hua ki kisi mulazim ko kehkar tumko ghar tak car par chod jaye uski sahabzadi ko muft me car chalani seekha rahe ho.
Main : arre koi baat nahi paidal aa gaya to kya ho gaya.
Nazi : baap-beti dono ek jaise hain ahsaan-faramosh kahi ke.
Main : arre tum dono ke sawaal-jawab khatam ho gaye ho to mujhe andar jane do yaar bhukh lagi hai.
Nazi : Hhhmmm chalo hamane bhi tumhari wajah se khana nahi khaya. (muskurate hue)
Fiza : chalo pehle tum naha lo fir hum khana kha lenge tab tak main khana garam karti hun
Kuch der baad me main naha liya or fiza or nazi ne milkar khana bhi garam kar diya or sab khana table par laga diya tha. hum teeno khana khane baith gaye.
Nazi : to kya sikhaya uss heroine ko master ji ne (muskurate hue)
Main : car hi seekhani thi wahi sikhayi or kya
Fiza : fir seekh gai naa wo car chalani
Main : abhi itni jaldi kaha abhi to kuch din lagenge
Nazi : haaye to kya roza jaoge uss bhuntni ko sikhane ke liye?
Main : Hhhmmm ab to roz isi waqt hi ghar aaunga kuch din.
Fiza : ye baba bhi na itna nahi dekhte ki ek akela insaan sara din khet me kam karke aaya hai ab usko ek naye kam par aur laga diya hai.
Main : arre to kya ho gaya maine kabhi tumko shikayat to nahi ki naa...
Fiza : yhi to rona hai tum kabhi shikayat nahi karte. Lekin hume to dikhta hai naa tum hmare liye kitni mehnat karte ho jo kaam kisi or insaan ke the wo kaam tumko karne pad rahe hain.
Main : (muskurate hue) koi baat nahi... main bahut khush-naseeb samajhta hun khud ko jo mujhe itne achhe gharwale mile tum logo ke liye to kuch bhi kar sakta hun.
Nazi : kismat to hamaari achhi hai jo ham ko tum mil gaye
Main : achha-achha ab jyaadaa baate na banao or chup karke khana khao.
फिर हम तीनो खामोश हो गये ऑर चुप-चाप खाना खाने लगे. तभी मुझे कुछ रेंगता हुआ अपने लंड पर चढ़ता महसूस हुआ मेरी फॉरन नज़र नीचे चली गई तो एक गोरा सा पैर मुझे अपने लंड पर पड़ा हुआ महसूस हुआ जो मेरे लंड को दबा रहा था मेरी नज़र फॉरन उपर को गई तो फ़िज़ा खाना खा रही थी ऑर साथ मे मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी. मैं समझ गया कि ये पैर फ़िज़ा का ही है जो मेरी ही हरकत मुझ पर दोहरा रही है. कुछ देर बाद मुझे उसका दूसरे पर भी अपने उपर महसूस हुआ अब वो दोनो पैर से मेरे लंड को रगड़ रही थी ऑर दबा रही थी. मुझे मज़ा भी आ रहा था ऑर दर्द भी हो रहा था क्योंकि हीना काफ़ी देर लंड पर गान्ड रखकर बैठी रही थी अब फ़िज़ा भी लंड को दबा रही थी इसलिए मैने उसके दोनो पैर वहाँ से हटा दिए ऑर उसकी तरफ देखकर नही मे सिर हिलाया. उसको लगा शायद मैं अब तक रात को उसके ना आने की वजह से नाराज़ हूँ इसलिए उसने फिर से अपने एक कान पर हाथ लगाए ऑर मिन्नत भरी नज़रों से मुझे देखा जिसका मैने बिना कोई जवाब दिए नज़रें खाने की प्लेट पर कर ली ऑर खाना खाने लगा. थोड़ी देर हम ऐसे ही खाना खा रहे थे कि फ़िज़ा ने चमच नीचे गिरा दिया...
फ़िज़ा : नीर मेरा चमच गिर गया ज़रा उठाके देना
मैं : अच्छा रूको देता हूँ.
मैं जैसे ही नीचे झुका मुझे फ़िज़ा का हाथ नज़र आया जो उसने अपनी गोद मे रखा हुआ था उसने मेरे नीचे झुकते ही कमीज़ को एक तरफ किया ऑर अपनी दोनो टांगे चौड़ी कर ली ऑर मुझे उंगली से पास बुलाने लगी मैं जैसे ही पास गया तो उसने मेरे बालो को पकड़ लिया ऑर मेरा मुँह अपनी चूत पर दबा दिया ऑर अपनी दोनो टांगे बंद कर ली. उसकी चूत की खुश्बू मुझे मेरी सांसो मे जाती महसूस हुई ऑर मैं मदहोश होने लगा मेरा लंड एक बार फिर से सिर उठाने लगा लेकिन तभी उसने मेरा मुँह हटा दिया ऑर मेरे बाल छोड़ दिए. मैने उसका गिराया हुआ चमच उठाया ओर वापिस उपर आके बैठ गया.
मैं : ये लो तुम्हारा चम्मच
फ़िज़ा : मिल गया था ना (मुस्कुराते हुए आँख मार कर)
मैं : हमम्म
मैं वापिस खाना खाने मे लग गया तभी फ़िज़ा ने फिर से मेरे आधे खड़े लंड पर अपने दोनो पैर रख दिए ऑर पैरो से मेरे लंड को पकड़ लिया ऑर उपर नीचे करने लगी ये मज़ा मेरे लिए एक दम नया था इसलिए मेरा लंड उसके इस तरह करने से एक दम खड़ा हो गया जिससे फ़िज़ा अपने पैरो की मदद से बार-बार उपर नीचे कर रही थी. मुझे बहुत मज़ा आ रहा था इसलिए मैं मुस्कुरा कर फ़िज़ा को देख रहा था साथ मे खाना खा रहा था इस पूरे अमल मे हम तीनो खामोश थे तभी नाज़ी बोली...
नाज़ी : भाभी मैं सोच रही थी क्यो ना मेरा कमरा हम नीर को दे-दें वैसे भी मैं तो आपके पास सोती हूँ रात को.
फ़िज़ा : (एक दम अपने पैर मेरे लंड से हटाते हुए) हम्म ठीक है... तुमको कोई ऐतराज़ तो नही (मेरी तरफ सवालिया नज़रों से देखते हुए)
मैं : नही जैसा आप दोनो ठीक समझो मुझे तो सोना है कही भी सो जाउन्गा मेरे लिए तो ये कोठरी भी अच्छी थी. (मुस्कुराते हुए)
फ़िज़ा : ठीक है कल फिर जब तुम खेत चले जाओगे तो मैं तुम्हारे लिए नाज़ी वाला कमरा तेयार कर दूँगी.
नाज़ी : मैं अभी कर देती हूँ ना खाना खाने के बाद वैसे भी मेरे पास काम ही क्या है.
फ़िज़ा : नही अभी बहुत रात हो गई है कल मैं तुम्हारे पिछे से सब कर दूँगी.
नाज़ी : ठीक है जैसे आपकी मर्ज़ी. (मुस्कुराते हुए)
उसके बाद हम तीनो ने अपना खाना ख़तम किया ऑर फ़िज़ा ने भी कोई हरकत नही की मेरे साथ शायद वो नाज़ी के एक दम बोलने से डर गई थी. खाने के बाद मैं बाबा के पास चला गया ऑर उसके पैर दबाने लगा ऑर नाज़ी ऑर फ़िज़ा रसोई मे अपना बाकी काम ख़तम करने लग गई. थोड़ी देर बाद नाज़ी कमरे मे आ गई मेरा बिस्तर करने के लिए तब तक बाबा भी सो चुके थे ऑर मैने भी कमरे से बाहर निकलने की सोची आज मेरा लंड मुझे काफ़ी परेशान कर रहा था इसलिए मैने सोचा क्यो ना जब तक नाज़ी मेरा बिस्तर करती है थोड़े से फ़िज़ा के साथ मज़े लिए जाए इसलिए वहाँ से मैं जाने लगा तो नाज़ी ने मुझे रोक लिया....
नाज़ी : कहाँ जा रहे हो
मैं : ऐसे ही कहीं नही ज़रा बाहर टहलने जा रहा था
नाज़ी : मेरे पास ही बैठो ना बाते करते हैं
मैं : हमम्म ठीक है (मैं फ़िज़ा के पास जाना चाहता था लेकिन नाज़ी ने मुझे वही बिठा लिया इसलिए मैं बाहर नही जा सका.)
नाज़ी : जानते हो तुम बहुत अच्छे हो सबके बारे मे सोचते हो.
मैं : तुम भी बहुत अच्छी हो....
नाज़ी : अच्छा जी मुझे तो पता ही नही था. (हँसते हुए)
मैं : तुमको बुरा तो नही लगा आज (मैं खेत मे चूमने के बारे मे पूछ रहा था)
नाज़ी : (ना मे सिर हिलाते हुए) उउउहहुउ....
मैं : फिर से कर लूँ (हँसते हुए)
नाज़ी : थप्पड़ खाना है...(मुस्कुराते हुए)
मैं : (हाँ मे सिर हिलाते हुए) हमम्म
नाज़ी : (सिर हिलाके पास आने का इशारा करते हुए)
मैं नाज़ी के सामने जाके खड़ा हो गया ऑर उसका एक हाथ खुद ही पकड़ कर अपने गाल पर मारने लगा जिसे नाज़ी ने दूसरे हाथ से पकड़ लिया ऑर ना मे सिर हिलाया फिर मेरा मुँह एक हाथ से पकड़कर मेरी गाल को चूम लिया लेकिन बहुत हल्के से.
नाज़ी : अब खुश...
मैं : मज़ा नही आया (अपने गाल को सहला कर ना मे सिर हिलाते हुए)
नाज़ी : बाकी कल... ठीक है (मुस्कुराते हुए)
मैं : और आज का क्या....
नाज़ी : आज का हो चुका है अगर याद हो तो... (मुस्कुराते हुए) चलो अब बाहर जाओ मुझे काम करने दो कब्से तंग कर रहे हो.
मैं : तुमने ही कहा था मेरे पास बैठो बातें करते हैं.
नाज़ी : तो मैने बात करने का बोला था वो सब नही..... गंदे (मुँह बनाते हुए)
ऐसे ही हँसता हुआ मैं बाहर आया ऑर सीधा फ़िज़ा के पास चला गया जो बर्तन धो रही थी. मैं चुपके से पिछे से गया ऑर उसको पिछे से पकड़ लिया जिससे वो एक दम डर गई ऑर हाथ मे पकड़ी हुई थाली ज़मीन पर गिरा दी. तभी नाज़ी की आवाज़ आई...
नाज़ी : (कमरे मे से ही आवाज़ लगाके ) क्या हुआ भाभी...
फ़िज़ा : (चिल्लाती हुई) कुछ नही नाज़ी एक मोटा सा चूहा चढ़ गया था मुझपर ( मेरे गाल पकड़ते हुए) मैं डर गई तो थाली गिर गई हाथ से.
नाज़ी : अच्छा....
फ़िज़ा : (धीमी आवाज़ मे) ये कोई तरीका है किसी को प्यार करने का डरा दिया मुझे.
मैं : (हँसते हुए) ठीक है अगली बार आवाज़ लगाता हुआ आउन्गा कि फ़िज़ा मैं आ रहा हूँ.
फ़िज़ा : जी नही ढिंढोरा पीटने को तो नही कहा मैने बस ऐसे अचानक ना पकड़ा करो मैं डर जाती हूँ.
मैने तमाम बात-चीत के दौरान फ़िज़ा को पिछे से पकड़ा हुआ था ऑर वो साथ-साथ बर्तन धो रही थी साथ मे मुझसे बातें भी कर रही थी.
मैं : जान कल आई नही तुम सारी रात मैं तुम्हारा इंतज़ार करता था (रोने जैसी शक़ल बनाके)
फ़िज़ा : हाए....(मेरी गाल को चूमते हुए) मेरी जान मेरा इंतज़ार कर रहे थे. मैने तो सुना था बहुत मज़े से सोए रात को. (हँसते हुए)
मैं : मज़ाक ना करो यार बताओ क्यो नही आई
फ़िज़ा : मैं क्या करती रात को नाज़ी सोने का नाम ही नही ले रही थी कैसे आती... आधी रात को इसको नहाना याद आ गया... जानते हो सारी रात मैं बस इसके सोने का ही इंतज़ार करती रही.
मैं : खैर जाने दो कोई बात नही.
फ़िज़ा : अच्छा सुनो मैने हमारे मिलने के बारे मे कुछ सोचा है.
मैं : क्या सोचा है.
फ़िज़ा : मेरी एक सहेली है फ़ातिमा नाम की उसकी सास ये नींद की दवाई खाती है (मुझे एक दवाई का पत्ता दिखाते हुए)
मैं : तो इस दवाई का हम क्या करेंगे.
फ़िज़ा : रात को मैं एक गोली नाज़ी को दूध मे मिलाके सुला दूँगी फिर वो सुबह से पहले नही उठेगी ऑर हम रात भर मज़े करेंगे (मुस्कुरकर मेरी गाल चूमते हुए)
मैं : कुछ गड़-बॅड तो नही होगी
फ़िज़ा : कुछ नही होगा फिकर मत करो मैने अपनी सहेली से सब पूछ लिया है.
मैं : क्या पूछा अपनी सहेली से ऑर क्या कहा तुम्हारी सहेली ने?
फ़िज़ा : उसकी सास ये दवाई इसलिए खाती है क्योंकि उसको नींद ना आने की बीमारी है ऑर मैने ये बोलकर ये दवाई ली है कि हमारे बाबा को भी नींद बहुत कम आती है तो उसने खुद ही मुझे ये पत्ता दे दिया ऑर कहा कि जब बाबा को नींद ना आए तो उनको 1 गोली दूध के साथ दे देना वो सो जाएँगे आराम से.
मैं : तुम्हारी सहेली को हम पर शक़ तो नही हुआ?
फ़िज़ा : (ना मे सिर हिलाते हुए) तुम अपनी फ़िज़ा को इतनी पागल समझते हो
मैं : अच्छा ठीक है जैसा तुम ठीक समझो (फ़िज़ा का गाल चूमते हुए)
फ़िज़ा : चलो अब तुम बाहर जाओ नाज़ी आने वाली होगी हम रात को मिलेंगे ठीक है
मैं : अच्छा जाता हूँ (जाते हुए फ़िज़ा के दोनो मम्मों को दबाते हुए)
फ़िज़ा : (दर्द से) सस्स्स्सस्स रात को आना फिर बताउन्गी (हँसते हुए)
मैं रसोई से बाहर निकल गया ऑर वापिस अपने कमरे मे आ गया नाज़ी अभी तक मेरे कमरे मे ही थी ऑर अलमारी से मेरे कपड़े निकाल रही थी...
मैं : ये क्या कर रही हो नाज़ी
नाज़ी : कुछ नही....तुमको कल मेरे वाला कमरा देना है तो तुम्हारे कपड़े मेरे कमरे मे रखने जा रही हूँ.
मैं : अच्छा...लेकिन ये काम तो फ़िज़ा भी कर सकती थी.
नाज़ी : हर काम भाभी को बोलते हो अगर कोई काम मैं कर दूँगी तो क्या हो जाएगा.
मैं : तुमसे तो बहस करना ही बेकार है जो दिल मे आए वो करो बस्स्स्स
नाज़ी : हमम्म जब जीत नही सकते तो लड़ते क्यो हो. (मुस्कुराते हुए)
मैं : अच्छा अब जल्दी-जल्दी ये सब ख़तम करो फिर मुझे सोना है बहुत थक गया हूँ इसलिए नींद आ रही है
नाज़ी : अच्छा मैं बस जा रही हूँ तुम सो जाओ आराम से.
थोड़ी देर मे नाज़ी मेरे सारे कपड़े लेके चली गई ऑर मैं बिस्तर पर लेटा फ़िज़ा का इंतज़ार करने लगा साथ ही दिन भर जो कुछ हुआ उसके बारे मे सोचकर मुस्कुरा रहा था. मेरा दिमाग़ कभी नाज़ी के बारे मे सोच रहा था कभी फ़िज़ा के बारे मे तो कभी हीना के बारे मे क्योंकि ये तीनो ही मेरी जिंदगी मे एक अजीब सी खुशी लेके आई थी तीनो ही अपनी-अपनी जगह पर कमाल-धमाल थी खूबसूरती मे कोई किसी से कम नही थी. इन्ही तीनो के बारे मे सोचते हुए जाने कब मैं सच मे सो गया मुझे पता ही नही चला.
मुझे लेटे हुए काफ़ी देर हो गई थी ऑर मुझे पता नही चला कि कितनी देर से मैं सो रहा था लेकिन अचानक किसी के गाल थप-थपाने से मेरी आँख खुल गई अंधेरा होने की वजह से मैं देख नही पा रहा था कि ये कौन है तभी मुझे एक मीठी सी आवाज़ आई...
फ़िज़ा : जान सो गये थे क्या
मैं : हाँ आँख लग गई थी शायद नाज़ी सो गई क्या
फ़िज़ा : हाँ आज तो सुला ही दिया उसको... मुझे लग ही रहा था तुम सो गये होगे क्योंकि मैं कितनी देर से खड़ी तुमको बाहर से बुलाने की कोशिश कर रही थी लेकिन तुम कोई जवाब ही नही दे रहे थे... खैर जाने दो ये बताओ नींद आई है क्या?
मैं : नही अब तो मैं जाग गया हूँ...तुम खड़ी क्यो हो बैठो ना
फ़िज़ा : उऊहहुउ मैं बैठने नही आई चलो बाहर कहीं बाबा भी ना जाग जाए.
मैं : रुक जाओ पहले अपनी जान को गले तो लगा लून (फ़िज़ा की बाजू पकड़कर ज़ोर से अपनी तरफ खींचा जिससे वो मेरे उपर धडाम से गिर गई)
फ़िज़ा : ऑह्हूनो जान मैं मना तो नही कर रही हूँ...लेकिन यहाँ नही बाहर चलो ना...(मेरी गाल को सहलाते हुए)
मैं : अच्छा चलो....
हम दोनो एक दूसरे का हाथ पकड़कर बाहर आ गये लेकिन फिर फ़िज़ा ने कमरे से बाहर आके मुझे हाथ से रुकने का इशारा किया ऑर वापिस कमरे मे अंदर चली गई ऑर बाबा के बिस्तर के पास खड़ी होके उनको देखने लगी शायद वो ये तसल्ली कर रही थी कि बाबा सोए या नही फिर वो मुझे लेके अपने कमरे की तरफ गई ऑर मुझे बाहर खड़ा करके अंदर चली गई ऑर नाज़ी जो उसके ही बेड पर सोई हुई थी उसको अच्छे से देखकर आई फिर वापिस आके अपने कमरे को बाहर से बंद किया ऑर कुण्डी लगा दी ऑर मेरी तरफ पलटकर मुस्कुराने लगी साथ ही अपनी दोनो बाजू हवा मे उठा दी. मैने भी आगे बढ़कर उसको अपने गले से लगा लिया ऑर हमेशा की तरह उसको गले से लगाकर सीधा खड़ा हो गया जिससे उसके पैर हवा मे झूल गये उसने भी अपनी दोनो बाजू मेरे गले हार की तरह डाल रखी थी ऑर मेरी गर्दन पर लटकी सी हुई थी मैने उसको उसकी कमर से पकड़ रखा था ऑर हम ऐसे ही चल भी रहे थे ऑर एक दूसरे के गाल भी चूम रहे थे. पहले मैने उससे हमारे खाना खाने वाली टेबल पर बिठा दिया वो अब भी मुझे वैसे ही पकड़ी हुई थी ऑर बार-बार मेरे दोनो गालो को चूम रही थी.
Update-23
Fir hum teeno khamosh ho gaye or chup-chap khana khane lage. tabhi mujhe kuch rengta hua apne lund par chadhta mehsoos hua meri foran nazar niche chali gai to ek gora sa pair mujhe apne lund par pada hua mehsoos hua jo mere lund ko daba raha tha meri nazar foran upar ko gai to fiza khana khaa rahi thi or sath me mujhe dekhkar muskura rahi thi. Main samajh gaya ki ye pair fiza ka hi hai jo meri hi harkat mujh par dohraa rahi hai. kuch der baad mujhe uska dusre par bhi apne upar mehsoos hua ab wo dono pair se mere lund ko ragad rahi thi or daba rahi thi. mujhe maza bhi aa raha tha or dard bhi ho raha tha kyonki heena kaafi der lund par gaanD rakhkar baithi rahi thi ab fiza bhi lund ko daba rahi thi isliye maine uske dono pair wahan se hath diye or uski taraf dekhkar nahi me sir hilaya. usko laga shayd main ab tak raat ko uske naa aane ki wajah se naraz hun isliye usne fir se apne ek kaan par hath lagaye or minnat bhari nazaro se mujhe dekha jiska maine bina koi jawab diye nazare khane ki plate par kar lee or khana khane laga. Thodi der hum aise hi khana khaa rahe the ki fiza ne chamach niche gira diya...
Fiza : Neer mera chamach gir gaya zra uthake dena
Main : achha ruko deta hun.
Main jaise hi niche jhuka mujhe fiza ka hath nazar aaya jo usne apni god me rakha hua tha usne mere niche jhukte hi kameez ko ek taraf kiya or apni dono taangey chodi kar lee or mujhe ungali se pass bulane lagi main jaise hi pass gaya to usne mere baalo ko pakad liya or mera munh apni chut par daba diya or apni dono taangey band kar lee. uski chut ki khushbu mujhe meri saanso me jaati mehsoos hui or main madhosh hone laga mera lund ek bar fir se sir uthane laga lekin tabhi usne mera munh hata diya or mere baal chod diye. Maine uska giraya hua chamach uthaya or wapis upar aake baith gaya.
Main : ye lo tumhara chamach
Fiza : mil gaya tha naa (muskurate hue aankh maar kar)
Main : Hhhmmm
Main wapis khana khane me lag gaya tabhi fiza ne fir se mere adhe khade lund par apne dono pair rakh diye or pairo se mere lund ko pakad liya or upar niche karne lagi ye maza mere liye ek dam naya tha isliye mera lund uske iss tarah karne se ek dam khada ho gaya jisse fiza apne pairo ki madad se bar-bar upar niche kar rahi thi. mujhe bahut maza aa raha tha isliye main muskura kar fiza ko dekh raha tha sath me khana khaa raha tha iss poore amal me hum teeno khamosh the tabhi nazi boli...
Nazi : bhabhi main soch rahi thi kyo na mera kamra hum Neer ko de-de waise bhi main to aapke pass soti hun raat ko.
Fiza : (ek dam apne pair mere lund se hatate hue) hhhmm thik hai... tumko koi aitraaz to nahi (meri taraf sawaliya nazaro se dekhte hue)
Main : nahi jaisa aap dono thik samjho mujhe to sona hai kahi bhi so jaunga mere liye to ye kothari bhi achhi thi. (muskurate hue)
Fiza : thik hai kal fir jab tum khet chale jaoge to main tumhare liye nazi wala kamra teiyaar kar dungi.
Nazi : main abhi kar deti hun naa khana khane ke baad waise bhi mere pass kaam hi kya hai.
Fiza : nahi abhi bahut raat ho gai hai kal main tumhare pichhe se sab kar dungi.
Nazi : thik hai jaise aapki marzi. (muskurate hue)
Uske baad hum teeno ne apna khana khatam kiya or fiza ne bhi koi harkat nahi ki mere sath shayad wo nazi ke ek dam bolne se darr gai thi. khane ke baad main baba ke pass chala gaya or uske pair dabane laga or nazi or fiza rasoyi me apna baaki kaam khatam karne lag gai. Thodi der baad nazi kamre me aa gai mera bistar karne ke liye tab tak baba bhi so chuke the or main bhi kamre se bahar nikalane ki sochi aaj mera lund mujhe kaafi pareshaan kar raha tha isliye maine socha kyo na jab tak nazi mera bistar karti hai thode se fiza ke sath maze liye jaye isliye wahan se main jane laga to nazi ne mujhe rok liya....
Nazi : kaha jaa rahe ho
Main : aise hi kahi nahi zra bahar tehalne jaa raha tha
Nazi : mere pass hi baitho naa baate karte hain
Main : hhhmmm thik hai (main fiza ke pass jana chahta tha lekin nazi ne mujhe wahi bitha liya isliye main bahar nahi jaa saka.)
Nazi : jante ho tum bahut achhe ho sabke bare me sochte ho.
Main : tum bhi bahut achhi ho....
Nazi : achha ji mujhe to pata hi nahi tha. (hansate hue)
Main : tumko bura to nahi laga Aaj (maine khet me chumne ke bare me puch raha tha)
Nazi : (naa me sir hilate hue) uuuhhhuu....
Main : Fir se kar loo (hansate hue)
Nazi : Thappad khana hai...(muskurate hue)
Main : (haa me sir hilate hue) Hhhmmm
Nazi : (sir hilake pass aane ka ishara karte hue)
Main nazi ke samne jake khada ho gaya or uska ek hath khud hi pakad kar apne gaal par maarne laga jise nazi ne dusre hath se pakad liya or naa me sir hilaya fir mera munh ek hath se pakadkar meri gaal ko chum liya lekin bahut halke se.
Nazi : ab khush...
Main : maza nahi aaya (apne gaal ko sehlakar naa me sir hilate hue)
Nazi : baki kal... thik hai (muskurate hue)
Main : Aur aaj ka kya....
Nazi : aaj ka ho chuka hai agar yaad ho to... (muskurate hue) chalo ab bahar jao mujhe kaam karne do kabse tang kar rahe ho.
Main : tumne hi kaha tha mere pass baitho baaten karte hain.
Nazi : to maine baat karne ka bola tha wo sab nahi..... gande (munh banate hue)
Aise hi hasta hua main bahar aaya or seedha fiza ke pass chala gaya jo bartan dho rahi thi. main chupke se pichhe se gaya or usko pichhe se pakad liya jisse wo ek dam darr gai or hath me pakadi hui thaali zameen par gira di. Tabhi nazi ki awaaz aayi...
Nazi : (kamre me se hi awaaz lagake ) kya hua bhabhi...
Fiza : (chillati hui) kuch nahi nazi ek mota sa chunha chadh gaya tha mujhpar ( mere gaal pakadte hue) main darr gai to thaali gir gai hath se.
Nazi : achha....
Fiza : (dheemi awaz me) ye koi tareeka hai kisi ko pyaar karne ka dara diya mujhe.
Main : (hansate hue) Thik hai agli baar awaaz lagata hua aaunga ki fiza main aa raha hun.
Fiza : ji nahi dhindhora peetne ko to nahi kaha maine bas aise achanak naa pakda karo main darr jati hun.
Maine tamaam bat-cheet ke dauraan fiza ko pichhe se pakada hua tha or wo sath-sath bartan dho rahi thi sath me mujhse baaten bhi kar rahi thi.
Main : jaan kal aayi nahi tum saari raat main tumhara intzaar karta tha (rone jaisi shaqal banake)
Fiza : haaye....(meri gaal ko chumte hue) meri jaan mera intzaar kar rahe the. maine to suna tha bahut maze se soye raat ko. (hansate hue)
Main : Mazaak na karo yaar bataao kyo nahi aayi
Fiza : main kya karti raat ko naazi sone ka naam hi nahi le rahi thi kaise aati... Aadhi raat ko isko nahana yaad aa gaya... jante ho saari raat main bas iske sone ka hi intzaar karti rahi.
Main : khair jane do koi baat nahi.
Fiza : achha suno maine hmare milne ke bare me kuch socha hai.
Main : kya socha hai.
Fiza : meri ek saheli hai Fatima naam ki uski saas ye neend ki dawayi khati hai (mujhe ek dawayi ka patta dikhate hue)
Main : to iss dawayi ka hum kya karenge.
Fiza : raat ko main ek goli nazi ko doodh me milake sula dungi fir wo subah se pehle nahi uthegi or hum raat bhar maze karenge (muskurakar meri gaal chumte hue)
Main : kuch gad-bad to nahi hogi
Fiza : kuch nahi hoga fikar mat karo maine apni saheli se sab puch liya hai.
Main : kya puchaa apni saheli se or kya kaha tumhari saheli ne?
Fiza : uski saas ye dawayi isliye khati hai kyonki usko neend naa aane ki bimari hai or maine ye bolkar ye dawayi lee hai ki hmare baba ko bhi neend bahut kam aati hai to usne khud hi mujhe ye ptta de diya or kaha ki jaba baba ko neend naa aaye to unko 1 goli doodh ke sath de dena wo so jayenge araam se.
Main : tumhari saheli ko hum par shaq to nahi hua?
Fiza : (naa me sir hilate hue) tum apni fiza ko itni pagal samjhte ho
Main : achha thik hai jaisa tum thik samjho (fiza ki gaal chumte hue)
Fiza : chalo ab tum bahar jao nazi aane wali hogi hum raat ko milenge thik hai
Main : achha jata hun (jate hue fiza ke dono mummo ko dabate hue)
Fiza : (dard se) sssssss raat ko aana fir bataungi (hansate hue)
Main rasoyi se bahar nikal gaya or wapis apne kamre me aa gaya nazi abhi tak mere kamre me hi thi or almari se mere kapde nikaal rahi thi...
Main : ye kya kar rahi ho nazi
Nazi : kuch nahi....tumko kal mere wala kamra dena hai to tumhare kapde mere kamre me rakhne jaa rahi hun.
Main : achha...lekin ye kaam to fiza bhi kar sakti thi.
Nazi : har kaam bhabhi ko bolte ho agar koi kaam main kar dungi to kya ho jayega.
Main : tumse to behas karna hi bekaar hai jo dil me aaye wo karo bassss
Nazi : Hhhmmm jab jeet nahi sakte to ladte kyo ho. (muskurate hue)
Main : achha ab jaldi-jaldi ye sab khatam karo fir mujhe sona hai bahut thakk gaya hun isliye neend aayi hai
Nazi : achha main bas jaa rahi hun tum so jao aaram se.
Thodi der me nazi mere sare kapde leke chali gai or main bistar par leta fiza ka intzaar karne laga sath hi din bhar jo kuch hua uske bare me sochkar muskura raha tha. Mera dimag kabhi nazi ke bare me soch raha tha kabhi fiza ke bare me to kabhi heena ke bare me kyonki ye teeno hi meri jingadi me ek ajeeb si khushi leke aayi thi teeno hi apni-apni jagah par kamaal-dhamaal thi khubsurati me koi kisi se kam nahi thi. Inhi teeno ke bare me sochte hue jane kab main sach me so gaya mujhe pata hi nahi chala.
Mujhe lete hue kaafi der ho gai thi or mujhe pata nahi chala ki kitni der se main so raha tha lekin achanak kisi ke gaal thap-thapane se meri jaag khul gai andhera hone ki wajah se main dekh nahi paa raha tha ki ye kaun hai tabhi mujhe ek meethi si awaaz aayi...
Fiza : jaan so gaye the kya
Main : haa aankh lag gai thi shayad nazi so gai kya
Fiza : haa aaj to sula hi diya usko... mujhe lag hi raha tha tum so gaye hoge kyonki main kitni der se khadi tumko bahar se bulane ki koshish kar rahi thi lekin tum koi jawaab hi nahi de rahe the... khair jane do ye bataao neend aayi hai kya?
Main : nahi ab to main jaag gaya hun...tum khadi kyo ho baitho naa
Fiza : uuhhuu main baithne nahi aayi chalo bahar kahi baba hi naa jaag jaye.
Main : ruk jao pehle apni jaan ko gale to laga loo (fiza ki baaju pakadkar jor se apni taraf khincha jisse wo mere upar dhadaam se gir gai)
Fiza : ohhuno jaan main mana to nahi kar rahi hun...lekin yahan nahi bahar chalo naa...(meri gaal ko sehlate hue)
Main : achha chalo....
Hum dono ek dusre ka hath pakadkar bahar aa gaye lekin fir fiza ne kamre se bahar aake mujhe hath se rukne ka ishara kiya or wapis kamre me andar chali gai or baba ke bistar ke pass khadi hoke unko dekhne lagi shayad wo ye tasalli kar rahi thi ki baba soye ya nahi fir wo mujhe leke apne kamre ke taraf gai or mujhe bahar khada karke andar chali gai or nazi jo uske hi bed par soyi hui thi usko achhe se dekhkar aayi fir wapis aake apne kamre ko bahar se band kiya or kundi laga di or meri taraf palatkar muskurane lagi sath hi apni dono baaju hawa me utha di. Maine bhi aagey badhkar usko apne gale se laga liya or hamesha ki tarah usko gale se lagakar seedha khada ho gaya jisse uske pair hawa me jhul gaye usne bhi apni dono baaju mere gale haar ki tarah daal rakhi thi or meri gardan par latki si hui thi maine usko uski kamar se pakad rakha tha or hum aise hi chal bhi rahe the or ek dusre ke gaal bhi chum rahe the. Pehle maine usse hmare khana khane wali table par bitha diya wo ab bhi mujhe waise hi pakdi hui thi or bar-bar mere dono gaalo ko chum rahi thi.
फ़िज़ा : जान तुम्हारे बिना अब एक पल भी चैन नही आता मुझसे नाराज़ ना हुआ करो
मैं : मैं कब नाराज़ हुआ तुमसे?
फ़िज़ा : (मेरे दोनो गाल पकड़कर) अच्छा...सुबह जब मैं कान पकड़ कर माफियाँ माँग रही थी तब मेरी तरफ कौन नही देख रहा था बताओ ज़रा.
मैं : अच्छा...वो मैं तो ऐसे ही तुमको तंग कर रहा था
फ़िज़ा : जान बहुत मुश्किल से तुम मुझे मिले हो तुम नाराज़ होते हो तो दिल करता है सारी दुनिया ने मुझसे मुँह मोड़ लिया है तुम नही जानते मैं तुमको कितना प्यार करती हूँ तुम तो मेरे सब कुछ हो.
मैं : अच्छा.... बताओ कितना प्यार करती हो (मुस्कुराते हुए)
फ़िज़ा : प्यार बताया नही करके दिखाया जाता है (मुस्कुरकर मेरे होंठों को चूमते हुए)
मैं : तो करके ही दिखा दो वैसे भी अब तो तुम्हारा ही हूँ मैं.
फ़िज़ा : जान यहाँ नही उपर कोठरी मे चलते हैं ना
मैं : ठीक है फिर मैं लेके जाउन्गा तुमको....मंज़ूर है
फ़िज़ा : (कुछ ना समझने जैसा चेहरा बनाते हुए) क्या.....
मैं : (फ़िज़ा को गोद मे उठाते हुए) ऐसे.....
फ़िज़ा : (डर कर चोन्क्ते हुए) जाआंणन्न्.......
मैं : क्या है डर क्यो रही हो..... गिरोगी नही
फ़िज़ा : (मुस्कुराकर अपनी दोनो बाजू मेरे गले मे डालते हुए) एम्म्म जानती हूँ.... तुमने एक दम उठाया तो डर गई थी. जानते हो मुझे आज तक किसी ने भी ऐसे नही उठाया.
मैं फ़िज़ा को गोद मे उठाके सीढ़िया चढ़ते हुए) किसी ने भी नही...
फ़िज़ा : (ना मे सिर हिलाते हुए)
मैं : चलो अब से हम जब भी कोठरी मे जाएँगे ऐसे ही जाएँगे....
फ़िज़ा : जो हुकुम मेरी सरकार का..... (हँसते हुए)
मैं : (अपना जुमला फ़िज़ा के मुँह से सुनकर हँसते हुए) मेरी बिल्ली मुझे ही मियउूओ....
फ़िज़ा : हमम्म जान भी मेरा.... मेरी जान के जुमले भी मेरे (मुस्कुराते हुए)
मैं : जान कोठरी का दरवाज़ा खोलो
फ़िज़ा : पहले मुझे नीचे तो उतारो फिर खोलती हूँ
मैं : उउउहहुउऊ ऐसे ही खोलो
फ़िज़ा : (अजीब सा मुँह बनके कोठारी की कुण्डी खोलते हुए) जान आप भी ना.....
हम दोनो अब कोठरी मे आ गये थे ऑर फ़िज़ा अब भी मेरी गोद मे ही थी. मैं चारो तरफ नज़र घुमा रहा था ताकि फ़िज़ा को लिटा सकूँ लेकिन वहाँ लेटने की कोई भी जगह नही थी ऑर ज़मीन भी मिट्टी से गंदी हुई पड़ी थी.
फ़िज़ा : क्या हुआ जान
मैं : जान लेटेंगे कहाँ यहाँ तो बिस्तर भी नही है
फ़िज़ा : जान वो जिस दिन तुम शहर से आए थे, तब नाज़ी उपर आई थी ना तो उसने यहाँ बिस्तर पड़ा देखा था जो उसने रात को उठाके नीचे रख दिया था क्योंकि अब तुम भी नीचे ही सोते हो
मैं : तो मैं अपनी जान को प्यार कहाँ करूँ फिर...
फ़िज़ा : आप मुझे नीचे उतारो मैं नीचे से जाके बिस्तर ले आती हूँ जल्दी से
मैं : म्म्म्ममम (कुछ सोचते हुए) रहने दो ऐसे ही कर लेंगे
फ़िज़ा : जान जिस्म ऑर कपड़े गंदे हो जाएँगे ऐसे तो...देख नही रहे यहाँ कितनी धूल है.
फ़िज़ा : अच्छा मुझे नीचे तो उतारो....जान ऐसे मज़ा नही आएगा.... बस 2 मिंट लगेंगे मैं बिस्तर ले आती हूँ ना...
मैं : अच्छा ठीक है ये लो... (गोदी से फ़िज़ा को उतारकर ज़मीन पर खड़ी करते हुए)
फ़िज़ा तेज़ कदमो के साथ वापिस नीचे चली गई ऑर मैं कोठारी का उपर वाला गेट खोल कर बाहर की ठंडी हवा का मज़ा लेने लगा अभी कुछ ही देर हुई थी कि मुझे किसी की सीढ़ियाँ चढ़ने की आवाज़ आई मैने एक बार मुड़कर देखा तो ये फ़िज़ा थी जिसके हाथ मे एक गद्दा ऑर एक चद्दर ऑर एक तकिया था. आते ही उसने एक प्यार भरी मुस्कान के साथ मुझे देखा ऑर आँखों के इशारे से मुझे बिस्तर दिखाया.
मैं : लाओ मैं बिछा देता हूँ
फ़िज़ा : जान आप रहने दो मैं कर लूँगी.
मैं : कोई बात नही दोनो करेंगे तो जल्दी हो जाएगा
फिर हम दोनो मिलकर जल्दी से बिस्तर बिच्छाने लगे बिस्तर के होते ही फ़िज़ा जल्दी से खड़ी हो गई ऑर अपना दुपट्टा साइड पर रख दिया जो अब भी उसके गले मे लटक रहा था फिर हम दोनो जल्दी से बिस्तर पर बैठ गये तो उसने मुझे धक्का देकर बिस्तर पर लिटा दिया ऑर खुद मेरे उपर आ गई.
मैं : आज क्या बात है बहुत जल्दी मे हो.
फ़िज़ा : मुझसे ऑर इंतज़ार नही हो रहा (मेरा चेहरा चूमते हुए)
मेरा चेहरा चूमते हुए फ़िज़ा सीधा मेरे होंठों पर आई ऑर उसने जल्दी से अपना मुँह खोल कर मेरे दोनो होंठ अपने मुँह मे क़ैद कर लिए ऑर बुरी तरह चूसने लगी उसकी साँस लगातार तेज़ हो रही थी ऑर उसके चूमने मे शिद्दत सी आती जा रही थी अब वो बहुत प्यार से मेरे होंठों को चूस रही थी साथ ही अपनी ज़ुबान मेरे दोनो होंठ पर फेर रही थी हम दोनो की मज़े से आँखें बंद थी कुछ देर मेरे होंठ चूसने के बाद उसने मेरे मुँह के अंदर अपनी रसीली ज़ुबान दाखिल कर दी जिसे मैने मुँह खोलकर अपने मुँह मे जाने का रास्ता दे दिया ऑर मज़े से उसकी ज़ुबान चूसने लगा बहुत मीठा-मीठा सा ज़ाएका था उसकी ज़ुबान का. ज़ुबान चूस्ते हुए उसने मेरे दोनो हाथ अपने हाथ मे पकड़े ऑर अपनी कमर पर रख दिए. मैं कभी उसकी ज़ुबान चूस रहा था कभी उसके रस से भरे हुए होंठ ऑर साथ ही उसकी कमर पर अपने दोनो हाथ फेर रहा था लेकिन आज मुझे उसकी कमीज़ के बीच मे कुछ चुभ रहा था....
मैं : (अपना मुँह उसके मुँह से अलग करते हुए) जान ये क्या है हाथ पर चुभ रहा है
फ़िज़ा : ज़िप्प है जान आज मैने आपके लिए नया सूट पहना है (मुस्कुराते हुए) खोल दो परेशानी हो रही है तो... (वापिस मेरे होंठों पर अपने होंठ रखते हुए)
हम फिर से एक दूसरे के होंठ चूसने लगे मैं अपना हाथ लगातार उपर की तरफ ले जा रहा था ताकि मुझे ज़िप्प का जोड़ मिल सके तभी मेरा हाथ फ़िज़ा के गले पर पहुँचा तो मुझे उसका जोड़ मिल गया जिसको मैं खींचता हुआ नीचे तक ले गया अब उसकी पूरी पीठ एक दम बे-परदा थी ऑर मेरे हाथो का अहसास उसे अपनी नंगी पीठ पर होते ही उसने एक ठंडी आअहह भारी ऑर फिर से मेरे मुँह से अपना मुँह जोड़ दिया मैं अब लगातार उसकी पीठ पर हाथ फेर रहा था लेकिन बार-बार उसकी ब्रा का स्टाप मेरे हाथो से टकरा रहा था इसलिए मैने उसको भी खोल दिया अब फ़िज़ा की पीठ एक दम नंगी थी जो एक दम चिकनी थी उस पर अपने हाथ ऑर अपनी उंगालिया फेरते हुए ऐसे लग रहा था जैसे किसी मखमल पर हाथ फेर रहा हूँ. उसको गले लगाते हुए मेरी उंगालिया उसके जिस्म मे धँस रही थी जिससे उससे इंतहाई मज़ा आ रहा था.
फ़िज़ा : जान जब आप मेरी पीठ पर उंगालिया गढ़ाते हो तो इंतहाई मज़ा आता है ऑर करो...
मैं : हमम्म ऐसा करो तुम उल्टी होके लेट जाओ आज मैं तुमको प्यार करूँगा तुम बस लेटी देखती रहना ठीक है
फ़िज़ा : (मेरे उपर से हटकर मेरे साथ उल्टी होके लेट ती हुई) हमम्म
अब वो उल्टी होके लेटी थी ऑर मेरे सामने उसकी दूध जैसी नरम ऑर नाज़ुक पीठ थी. मैं उसके उपर आके लेट गया ऑर उसके गले के पीछे चूमने लगा वो बस आँखें बंद किए लेटी थी मैं कभी उसके गले पर चूस रहा था कभी काट रहा था मेरे बार-बार काटने पर वो ससस्स ससस्स कर रही थी लेकिन उसने मुझे एक बार भी काटने से नही रोका शायद उसको भी मेरे इस तरह करने से मज़ा आ रहा था फिर मैं धीरे-धीरे नीचे आने लगा ऑर उसकी पीठ को चूस-चूस कर काटने लगा उसकी पूरी पीठ मेरी थूक से गीली हो गई थी लेकिन वो बस खामोश होके लेटी थी ओर मज़े से आंखँ बंद किए.
फ़िज़ा : जान अपनी ऑर मेरी कमीज़ उतार दो ना मुझे इनसे उलझल हो रही है मैं आपका जिस्म अपने जिस्म के साथ जुड़ा हुआ महसूस करना चाहती हूँ.
मैं : ठीक है रूको (मैं जल्दी से खड़ा हुआ ऑर अपने सारे कपड़े जल्दी से उतारने लगा)
फ़िज़ा : (गर्दन पीछे करके मुझे कपड़े उतारता हुआ देखती हुई) जान तुम्हारा बदन दिनो-दिन ओर भी सख़्त होता जा रहा है. (मुस्कुराते हुए)
मैं : वो खेत मे काम करता हूँ ना इसलिए....
फ़िज़ा : जानते हो अब पहले से भी ज़्यादा मज़ा आता है (मुस्कुरकर आँखें दुबारा बंद करते हुए)
मैने जैसे ही अपने सारे कपड़े उतारे ऑर फ़िज़ा के उपर लेटा तो फ़िज़ा बोली....
फ़िज़ा : जान मेरे भी आप ही उतार दो ना मुझमे अब हिम्मत नही है
मैने जल्दी से उसको सीधा करके बिस्तर पर ही उठाके बिठाया ऑर उसकी कमीज़ उतारने लगा उसने भी मेरी मदद के लिए अपनी दोनो बाहें हवा मे उठा दी. क्योंकि मैने पहले ही उसकी ब्रा का स्ट्रॅप खोल दिया था इसलिए उसकी कमीज़ के साथ उसकी ब्रा भी उतर गई ऑर उसके बड़े-बड़े ओर सख़्त मम्मे उछल्कर बाहर आ गये उसके निपल अंगूर की तरह एक दम सख़्त ऑर खड़े थे. जिसे मैं घूर-घूर कर देखने लगा मुझे इस तरफ घूरता देखकर उसके अपने दोनो हाथ अपने मम्मों पर रख लिए.
फ़िज़ा : जान ऐसे मत देखा करो मुझे शरम आती है (मुँह नीचे करके मुस्कुराते हुए)
मैं : कमाल है... मुझसे भी शरम आती है (गौर से उसका चेहरा देखते हुए)
फ़िज़ा : अच्छा लो बसस्स खुश (अपने दोनो हाथ हवा मे उठाकर)
मैं : हमम्म चलो अब लेट जाओ
फ़िज़ा : जान ये भी उतार दो ना तंग कर रही है (बच्चों जैसी मुस्कान के साथ अपनी सलवार की तरफ इशारा करते हुए)
मैने जल्दी से उसकी सलवार भी उतार दी ऑर वो जल्दी से वापिस उल्टी होके लेट गई शायद वो फिर से वही से शुरू करवाना चाहती थी जहाँ से मैने बंद किया था. इसलिए मैं भी बिना कुछ बोले उसके उपर ऐसे ही लेट गया. इस तरह बिना कपड़े के एक दूसरे के साथ जुड़ते ही हम दोनो के बदन को एक झटका सा लगा जिससे हम दोनो के मुँह से एक साथ आअहह निकल गई उसकी गान्ड बेहद नाज़ुक ऑर मुलायम थी जिसका मुझे पहली बार अहसास हुआ था. क्योंकि पहले मैं हमेशा उसके उपर की तरफ ही लेट ता था जब वो सीधी होके लेटी हुई होती थी इसलिए ये अहसास मेरे लिए नया था.
मैं : तुम्हारी गान्ड बहुत मुलायम है किसी गद्दे की तरह
फ़िज़ा : (आँखें बंद किए ही हँसते हुए) मेरा सब कुछ ही आपका है जान जो चाहे करो.
मैं वापिस थोड़ा नीचे को हुआ ऑर फिर से उसकी पीठ को चूसने चाटने ऑर काटने लगा जिससे फिर से उसके मुँह से ससस्स ससस्स निकल रहा था. अब मैं साइड से हाथ नीचे ले जाकर उसके मम्मों को भी दबा रहा था ऑर उसकी कमर पर अपने होंठ उपर नीचे फिरा रहा था साथ ही अब मैं नीचे की तरफ जा रहा था जिससे शायद उसका मज़ा बढ़ता जा रहा था इसलिए वो बार-बार अपनी गान्ड की पहाड़ियो को कभी सख़्त कर रही थी कभी उपर को उठा रही थी. तभी मैने सोचा क्यो ना इसकी गान्ड पर चूम कर देखूं मैं एक बार उसकी गान्ड पर चूम लिया जिससे उसे एक झटका सा लगा ऑर उसके मुँह तेज़ सस्स्स्सस्स निकल गया उसने पलटकर एक बार मुझे देखा फिर बिना कुछ बोले वापिस तकिये पर सिर रख दिया ऑर आँखें बंद कर ली शायद वो भी देखना चाहती थी कि मैं आगे क्या करता हूँ कुछ देर मैं ऐसे ही उसकी गान्ड को चूमता रहा फिर अचानक मैने अपना मुँह खोल कर एक बार हल्के से उसकी गान्ड की पहाड़ी को हल्का सा चूस कर काट लिया जिससे उसको इंतहाई मज़ा आया ओर उसने अपने दोनो हाथ पीछे ले-जाकर मेरा चेहरा पकड़ लिया.
फ़िज़ा : आआहह...जाअंणन्न्....
मैं : क्या हुआ अच्छा नही लगा
फ़िज़ा : बहुत अच्छा लगा तभी तो बर्दाश्त नही कर पाई.
मैं : फिर हाथ हटाओ अपने
फ़िज़ा बिना कुछ बोला उसने मेरे चेहरे के आगे से अपने हाथ हटा दिए ऑर मैं वापिस उसकी गान्ड की पहाड़ियो की चूसने ऑर काटने लगा वो बस मज़े से अपना सिर बार-बार तकिये पर मार रही थी ऑर मज़े से ऊओ....आआहह......सस्स्स्स्सस्स.....सस्स्स्स्स्सस्स..... कर रही थी. अचानक मैने उसकी दोनो गान्ड की पहाड़ियो को खोला ऑर उसमे अपना मुँह डालकर उसकी गान्ड की छेद पर अपनी ज़ुबान की नोक लगाई ऑर फॉरन सस्स्स्स्सस्स आआअहह करते हुए पलट गई ऑर मेरा चेहरा अपने हाथो से पकड़ लिया...
Update-24
Fiza : jaan tumhare bina ab ek pal bhi chain nahi aata mujhse naraz naa hua karo
Main : main kab naraz hua tumse?
Fiza : (mere dono gaal pakadkar) achha...subah jab main kaan pakad kar maafiyan maang rahi thi tab meri taraf kaun nahi dekh raha tha bataao zra.
Main : Achha...wo main to aise hi tumko tang kar raha tha
Fiza : jaan bahut mushkil se tum mujhe mile ho tum naraz hote ho to dil karta hai sarri duniya ne mujhse munh mod liya hai tum nahi jante main tumko kitna pyaar karti hun tum to mere sab kuch ho.
Main : achha.... bataao kitna pyaar karti ho (muskurate hue)
Fiza : pyaar bataayaa nahi karke dikhaya jata hai (muskurakar mere honthon ko chumte hue)
Main : to karke hi dikha do waise bhi ab to tumhara hi hun main.
Fiza : jaan yahan nahi upar kothari me chalte hain naa
Main : thik hai fir main leke jaunga tumko....manzoor hai
Fiza : (muskurakar apni dono baaju mere gale me daalte hue) mmmm jaanti hun.... tumne ek dam uthaya to darr gai thi. Jante ho mujhe aaj tak kisi ne bhi aise nahi uthaya.
Main fiza ko god me uthake sidhiya chadhte hue) kisi ne bhi nahi...
Fiza : (naa me sir hilate hue)
Main : chalo ab se hum jab bhi kothari me jayenge aise hi jayenge....
Fiza : jo hukum meri sarkaar ka..... (hansate hue)
Main : (apna jumla fiza ke munh se sunkar hansate hue) meri billi mujhe hi miyawooo....
Fiza : Hhhmmm jaan bhi mera.... meri jaan ke jumle bhi mere (muskurate hue)
Main : jaan kothari ka darwaza kholo
Fiza : pehle mujhe niche to utaro fir kholti hun
Main : uuuhhuuu aise hi kholo
Fiza : (ajeeb sa munh banake kothari ki kundi kholte hue) jaan aap bhi naa.....
Hum dono ab kothari me aa gaye the or fiza ab bhi meri god me hi thi. main charo taraf nazar ghuma raha tha taaki fiza ko lita saku lekin wahan letne ki koi bhi jagah nahi thi or zameen bhi mitti se gandi hui padi thi.
Fiza : kya hua jaan
Main : jaan letenge kaha yahan to bistar bhi nahi hai
Fiza : jaan wo jis din tum shehar se aaye the, tab nazi upar aayi thi naa to usne yahan bistar pada dekha tha jo usne raat ko uthake niche rakh diya tha kyonki ab tum bhi niche hi sote ho
Main : to main apni jaan ko pyaar kaha karu fir...
Fiza : aap mujhe niche utaaro main niche se jake bistar le aati hun jaldi se
Main : mmmmm (kuch sochte hue) rehne do aise hi kar lenge
Fiza : jaan jism or kapde gande ho jayenge aise to...dekh nahi rahe yahan kitni dhunl hai.
Fiza : Achha mujhe niche to utaaro....jaan aise maza nahi aayega.... bas 2 mint lagenge main bistar le aati hun naa...
Main : achha thik hai ye lo... (godi se fiza ko utarkar zameen par khadi karte hue)
Fiza Tez kadmo ke sath wapis niche chali gai or main kothari ka upar wala gate khol kar bahar ki thandi hawa ka maza lene laga abhi kuch hi der hui thi ki mujhe kisi ki sidhiyaan chadhne ki awaaz aayi maine ek baar mudkar dekha to ye fiza thi jiske hath me ek gadda or ek chaddar or ek takiya tha. aate hi usne ek pyaar bhari muskaan ke sath mujhe dekha or aankhon ke ishare se mujhe bistar dikhaya.
Main : lao main bicha deta hun
Fiza : jaan aap rehne do main kar lungi.
Main : koi baat nahi dono karenge to jaldi ho jayega
Fir hum dono milkar jaldi se bistar bichhane lage bistar ke hote hi fiza jaldi se khadi ho gai or apna dupatta side par rakh diya jo ab bhi uske gale me latak raha tha fir hum dono jaldi se bistar par baith gaye to usne mujhe dhakka dekar bistar par lita dia or khud mere upar aa gai.
Main : aaj kya baat hai bahut jaldi me ho.
Fiza : mujhse or intzaar nahi ho raha (mera chehra chumte hue)
Mera chehra chumte hue fiza sidha mere honthon par aayi or usne jaldi se apna munh khol kar mere dono honth apne munh me qaid kar liye or buri tarah chusne lagi uski saans lagatar tez ho rahi thi or uske chumne me shiddat si aati jaa rahi thi ab wo bahut pyaar se mere honthon ko chus rahi thi sath hi apni zubaan mere dono honth par fer rahi thi hum dono ki maze se aankhen band thi kuch der mere honth chusne ke baad usne mere munh ke andar apni raseeli zubaan dakhil kar di jise maine munh kholkar apne munh me jane ka rasta de diya or maze se uski zubaan chusne laga bahut meetha-meetha sa zayeka tha uski zubaan ka. zubaan chuste hue usne mere dono haath apne hath me pakde or apni kamar par rakh diye. main kabhi uski zubaan chus raha tha kabhi uske ras se bhare hue honth or sath hi uski kamar par apne dono hath fer raha tha lekin aaj mujhe uski kameez ke bich me kuch chubh raha tha....
Main : (apna munh uske munh se alag karte hue) jaan ye kya hai hath par chubh raha hai
Fiza : zipp hai jaan aaj maine aapke liye naya suit pehna hai (muskurate hue) khol do pareshani ho rahi hai to... (wapis mere honthon par apne honth rakhte hue)
Hum fir se ek dusre ke honth chusne lage main apna hath lagatar upar ki taraf le jaa raha tha taaki mujhe zipp ka jod mil sake tabhi mera hath fiza ke gale par pohoncha to mujhe uska jod mil gaya jisko main khinchta hua niche tak le gaya ab uski poori peeth ek dam be-parda thi or mere hatho ka lamz usse apni nangi peeth par hote hi usne ek thandi aaahhhh bhari or fir se mere munh se apna munh jod diya main ab lagatar uski peeth par hath fer raha tha lekin bar-bar uski bra ka stap mere hatho se takra raha tha isliye maine usko bhi khol diya ab fiza ki peeth ek dam nangi thi jo ek dam chikni thi uss par apne hath or apni ungaaliyan ferte hue aise lag raha ha jaise kisi makhmal par hath fer raha hun. usko gale lagate hue meri ungaaliyan uske jism me dhans rahi thi jisse usse intehaa mazaa aa raha tha.
Fiza : jaan jab aap meri peeth par ungaaliyan gadaate ho to intehaa maza aata hai or karo...
Main : Hhhmmm aisa karo tum ulti hoke let jao aaj main tumko pyaar karunga tum bas leti dekhti rehna thik hai
Fiza : (mere upar se hatkar mere sath ulti hoke let ti hui) hhhmmm
ab wo ulti hoke leti thi or mere samne uski doodh jaisi naram or nazuk peeth thi. main uske upar aake let gaya or uske gale ke piche chumne laga wo bas aankhen band kiye leti thi main kabhi uske gale par chus raha tha kabhi kaat raha tha mere baar-baar kaatne par wo ssss ssss kar rahi thi lekin usne mujhe ek baar bhi kaatne se nahi roka shayad usko bhi mere iss tarah karne se maza aa raha tha fir main dheere-dheere niche aane laga or uski peeth ko chus-chus kar kaatne laga uski poori peeth meri thook se gili ho gai thi lekin wo bas khamosh hoke leti thi or maze se aankhan band kiye.
Fiza : jaan apni or meri kameez utaar do naa mujhe inse uljhal ho rahi hai main aapka jism apne jism ke sath juda hua mehsoos karna chahti hun.
Main : thik hai ruko (main jaldi se khada hua or apne sare kapde jaldi se utarne laga)
Fiza : (garden piche karke mujhe kapde utarta hua dekhti hui) jaan tumhara badan dino-din or bhi sakht hota jaa raha hai. (muskurate hue)
Main : wo khet me kaam karta hun naa isliye....
Fiza : Janate ho ab pehle se bhi jyaadaa maza aata hai (muskurakar aankhen dubara band karte hue)
Maine jaise hi apne sare kapde utaare or fiza ke upar leta to fiza boli....
Fiza : jaan mere bhi aap hi utaar do naa mujhme ab himmat nahi hai
Maine jaldi se usko seedha karke bistar par hi uthake bithaya or uski kameez utarne laga usne bhi meri madad ke liye apni dono baahen hawa me utha di. kyonki maine pehle hi uski bra ka strap khol diya tha isliye uski kameez ke sath uski bra bhi utar gai or uske bade-bade or sakht mamme uchhalkar bahar aa gaye uske nipple angoor ki tarah ek dam sakht or khade the. jise main ghur-ghur kar dekhne laga mujhe iss taraf ghurta dekhkar uske apne dono hath apne mummo par rakh liye.
Fiza : jaan aise mat dekha karo mujhe sharam aati hai (munh niche karke muskurate hue)
Main : kamaal hai... mujhse bhi sharam aati hai (gaur se uska chehra dekhte hue)
Fiza : achha lo basss khush (apne dono hath hawa me uthakar)
Main : hhhmmm chalo ab let jao
Fiza : jaan ye bhi utaar do naa tang kar rahi hai (bacho jaisi muskaan ke sath apni salwar ki taraf ishara karte hue)
Maine jaldi se uski salwaar bhi utaar di or wo jaldi se wapis ulti hoke let gai shayad wo fir se wahi se shuru karwana chahti thi jahan se maine band kiya tha. isliye main bhi bina kuch bole uske upar aise hi let gaya. iss tarah bina kapde ke ek dusre ke sath judte hi hum dono ke badan ko ek jhatka sa laga jisse hum dono ke munh se ek saath aaahhhh nikal gai uski gaanD behad nazuk or mulayam thi jiska mujhe pehli baar ahsaas hua tha. kyonki pehle main hamesha uske upar tab hi let ta tha jab wo seedhi hoke leti hui hoti thi isliye ye ahsaas mere liye naya tha.
Main : tumhari gaanD bahut mulayam hai kisi gadde ki tarah
Fiza : (aankhen band kiye hi hansate hue) mera sab kuch hi aapka hai jaan jo chahe karo.
main wapis thoda niche ko hua or fir se uski peeth ko chusne chatne or kaatne laga jisse fir se uske munh se ssss ssss nikal raha tha. Ab main side se hath niche le jakar uske mummo ko bhi daba raha tha or uski kamar par apne honth upar niche fira raha tha sath hi ab main niche ki taraf jaa raha tha jisse shayad uska maza badta jaa raha tha isliye wo bar-bar apni gaanD ki pahadiyo ko kabhi sakht kar rahi thi kabhi upar ko utha rahi thi. Tabhi maine socha kyo naa iski gaanD par chum kar dekhu main ek bar uski gand par chum liya jisse usse ek jhatka sa laga or uske munh tez sssssss nikal gaya usne palatkar ek bar mujhe dekha fir bina kuch bole wapis takiye par sir rakh diya or aankhen band kar lee shayd wo bhi dekhna chahti thi ki main aagey kya karta hun kuch der main aise hi uski gaanD ko chumta raha fir achanak main apna munh khol kar ek baar halke se uski gaanD ki pahadi ko halka sa chus kar kaat liya jisse usko intehaa maza aaya or usne apne dono hath piche le-jakar mera chehra pakad liya.
Fiza : Aaaahhh...jaaannnn....
Main : kya hua achha nahi laga
Fiza : bahut achha laga tabhi toi bardasht nahi kar paayi.
Main : fir hath hatao apne
Fiza bina kuch bola usne mere chehre ke aagey se apne hath hata diye or main wapis uski gaanD ki pahadiyo ki chusne or kaatne laga wo bas maze se apna sir bar-bar takiye par maar rahi thi or maze se ooohhh....aaaahhhhh......ssssssss.....sssssssss..... kar rahi thi. Achanak maine uski dono gaanD ki pahadiyo ko khola or usme apna munh daalkar uski gaanD ki ched par apni zubaan ki nok lagayi or foran ssssssss aaaaahhhhh karte hue palat gai or mere chehra apne hatho se pakad liya...
फ़िज़ा : जान क्या कर रहे थे पागल हो गये हो वो गंदी जगह होती है
मैं : तुमको मज़ा नही आया
फ़िज़ा : बात मज़े की नही है लेकिन सिर्फ़ मेरे मज़े के लिए तुम ऐसी जगह मुझे प्यार करो तो मुझे आपके लिए बुरा लगेगा
मैं : मैने क्या पूछा है तुमको मज़ा आया या नही....सिर्फ़ हाँ या ना मे जवाब दो
फ़िज़ा : (हाँ मे सिर हिलाते हुए)
मैं : बस फिर वापिस उल्टी होके लेट जाओ
फ़िज़ा : ठीक है अच्छा आप उंगली से कर लो बॅस लेकिन ज़ुबान नही डालना वहाँ वो गंदी जगह है आपको मेरी कसम है.
मैं : अच्छा ठीक है अब लेट तो जाओ ना...
फ़िज़ा बिना कुछ बोले वापिस उल्टी होके लेट गई ऑर मैं अपनी उंगली को अपने मुँह मे डालकर गीली करके वापिस उसकी गान्ड को खोल कर अपनी उंगली उसके छेद पर उपर नीचे घुमाने लगा जिससे उसको फिर से मज़ा आने लगा.
मैं : जान अच्छा लग रहा है?
फ़िज़ा : हमम्म्म
मैं ऐसे ही काफ़ी देर फ़िज़ा की गान्ड के छेद पर उंगली फेरता रहा ऑर उसकी गान्ड के मोटे-मोटे पहाड़ो को उपर से चूमता रहा जिसके लिए फ़िज़ा ने भी मुझे मना नही किया वो अपनी आँखें बंद किए बस ससस्स ससस्स ऑर आहह ऊओ कर रही थी. ये मज़ा हम दोनो के लिए एक दम नया था. मैं जब भी फ़िज़ा की गान्ड के छेद पर अपनी उंगली फेरता तो कभी वो अपने छेद को सख्ती से बंद कर लेती कभी खोल देती जिसको देखकर मुझे भी अच्छा लग रहा था तभी मैने सोचा क्यो ना इसके अंदर उंगली डाल दूँ इसलिए मैने छेद के खुलने का इंतज़ार किया ऑर जैसे ही उसने अपने छेद को थोड़ा सा ढीला किया तो मैने अपने नाख़ून तक उंगली उसकी गान्ड के छेद मे डाल दी जिससे शायद उससे भी मज़ा आया था उसने ज़ोर आआहह किया ऑर फिर तेज़-तेज़ साँस लेने लगी.
मैं : जान दर्द तो नही हो रही
फ़िज़ा : बहुत मज़ा आ रहा है जान उंगली को हल्का-हल्का दबाओ अच्छा लगता है ऐसे करते हो तो.
मैं उसके बोले मुताबिक अपनी उंगली को हल्के-हल्के दबाने लगा जिससे मेरी उंगली ऑर अंदर तक जाने लगी गीली होने की वजह से मेरी आधी उंगली उसकी गान्ड के अंदर थी जिसको मैं बार-बार अंदर बाहर कर रहा था तभी मुझे लगा जैसे वो नीचे अपना हाथ लेजा कर अपनी चूत मस्सल रही है शायद इसलिए उसको मज़ा आ रहा था. फिर मैं वापिस उसके उपर लेट गया ऑर उसकी गान्ड से अपनी उंगली बाहर निकाल ली. मैने सोचा क्यो ना इसकी गान्ड मे अपना लंड डाल कर देखु कि कैसा लगता है इसलिए मैने ढेर सारा थूक अपने लंड पर लगाया ऑर थोड़ा थूक ऑर उसकी गान्ड पर लगाया ऑर लंड को मैने जैसे ही गान्ड की छेद के निशाने पर रखा फ़िज़ा को एक दम झटका सा लगा ऑर वो फॉरन पलट गई.
फ़िज़ा : क्या कर रहे थे.
मैं : कुछ नही लंड डाल कर देख रहा था अंदर.
फ़िज़ा : पागल हो गये हो ये इतना बड़ा अंदर नही जाएगा
मैं : अर्रे कोशिश तो करने दो पक्का अगर नही जाएगा तो मैं नही डालूँगा ऑर वैसे भी तुमको उंगली से मज़ा आ रहा था ना तो इसलिए (लंड) से भी मज़ा आएगा.
फ़िज़ा : नही जान ये बहुत बड़ा है अव्वल तो अंदर जाएगा नही अगर ज़बरदस्ती करोगे तो मुझे बहुत दर्द होगा मैने पहले कभी पिछे लिया नही.
मैं : बस एक बार कोशिश करने दो पक्का अगर दर्द होगा तो नही करूँगा
फ़िज़ा : वादा करो जब मैं रोकूंगी तो रुक जाओगे.
मैं : वादा (मुस्कुराते हुए)
फ़िज़ा : (बिना कुछ बोले वापिस उल्टी होके लेट ते हुए) हमम्म जान आराम से करना मुझे डर लग रहा है याद रखना आपको कसम दी है
मैं : हाँ हाँ याद है धीरे ही करूँगा
फ़िज़ा : अच्छा करो लेकिन बहुत आराम से
उसका सिग्नल मिलते ही मैने अपने घुटनो पर बैठकर फिर से अपने लंड को निशाने पर रखा ऑर थोड़ा सा लंड पर दबाव दिया लंड फिसल कर उपर को चला गया. शायद फ़िज़ा सच कह रही थी क्योंकि छेद सही मे बहुत तंग था. मैने फिर से लंड को निशाने पर रख कर थोड़ा ज़ोर से दबाव दिया लेकिन छेद बिल्कुल भी नही खुल रहा था. मैं वापिस फ़िज़ा के उपर लेट गया ऑर फ़िज़ा से छेद थोड़ा ढीला करने को कहा उसने हाँ मे सिर हिलाया तो मैं वापिस अपनी जगह पर आके बैठ गया इस बार मैने सोचा क्यो ना झटका लगाया जाए इसलिए मैने फिर से लंड को निशाने पर रखा ऑर गान्ड को अच्छे से दोनो हाथ से फैला दिया अब मैं एक हल्का सा झटका मारा जिससे आधी टोपी लंड की अंदर चली गई ऑर फ़िज़ा को शायद दर्द हुआ जिससे उसके मुँह से एक हल्की सी सस्स्सस्स निकल गई मगर वो फिर भी खामोश रही. अब मैं धीरे-धीरे झटके मारने लगा ऑर लंड का दबाव छेद पर डालने लगा मगर जब भी मैं दबाव छेद पर डालता तो फ़िज़ा छेद को टाइट कर लेती थी जिससे मुझे अंदर डालने मे परेशानी हो रही थी मैं वापिस फ़िज़ा पर लेटा ऑर फ़िज़ा से कहा...
मैं : जान ऐसे तो नही जा रहा तुम थोड़ा ढीला करो छेद को ऑर अब मैं हल्के से झटका दूँगा तुम चिल्लाना मत नही तो सब उठ जाएँगे.
फ़िज़ा : (हाँ मेर सिर हिलाते हुए पास पड़ा अपना दुपट्टा अपने मुँह के पास रख लिया) हमम्म करो लेकिन जान ज़्यादा ज़ोर से झटका ना देना वरना दर्द होगा मुझे.
मैं : अच्छा फिकर मत करो.
मैं अब वापिस अपनी जगह पर आया ऑर लंड पर फिर से ढेर सारा थूक लगाया ऑर लंड को छेद पर रखा फ़िज़ा ने भी इश्स बार छेद को ढीला छोड़ा हुआ था मैने फिर से गान्ड की पहाड़ियो को दोनो तरफ फैलाया ऑर लंड को इस बार ज़रा ज़ोर से झटका दिया जिससे लंड की टोपी अंदर चली गई ऑर फ़िज़ा को एक झटका सा लगा जिससे वो थोड़ा उपर को हो गई ऑर उसने अपना दुपट्टा अपने मुँह पर ज़ोर से दबा लिया उसने अपना हाथ पिछे करके मुझे रुकने का इशारा किया. मैं वैसे ही लंड गान्ड मे डाले कुछ देर के लिए रुक गया ऑर फ़िज़ा के अगले इशारे का इंतज़ार करने लगा. जब उसका दर्द कम हो गया तो उसने अपना मुँह दुपट्टे मे छिपाये ही हाँ मे सिर हिलाया मैने फिर से लंड बाहर निकाला ऑर उस पर थूक लगाके अंदर कर दिया ऑर फिर धीरे-धीरे मैं झटके लगाने लगा फ़िज़ा का मुझे चेहरा नही दिख रहा था लेकिन शायद उसको दर्द हो रहा था क्योंकि वो बार-बार अपना सिर तकिये पर दाए-बाए मार रही थी ऑर चेहरा दुपट्टे से छिपा रखा था इधर मेरा भी आधा लंड उसकी गान्ड मे जा चुका था ऑर मैं अपने आधे लंड को ही फ़िज़ा की गान्ड मे अंदर-बाहर कर रहा था. कुछ देर बाद फ़िज़ा की आवाज़ आई...
फ़िज़ा : जान रूको... अब मैं आपके उपर आती हूँ ऐसे करने मे मुझे बहुत दर्द हो रहा है.
मैं बिना कुछ बोले उसके उपर से हट गया ऑर मेरा लंड पक्क की आवाज़ के साथ उसकी गान्ड से बाहर आ गया. अब मैं नीचे लेट गया ओर फ़िज़ा मेरे उपर आ गई उसका पूरा चेहरा पसीना से गीला हुआ पड़ा था ऑर एक दम लाल हुआ पड़ा था. उसके उपर आते ही हम दोनो ने एक दूसरे को देखा ऑर दोनो ही मुस्कुरा दिया फिर उसने मेरे लंड को पकड़ा जो छत की तरफ मुँह किए पूरी तरह खड़ा था जिसको उसने हाथ से पकड़ कर पहले देखा फिर एक धीरे से थप्पड़ मेरे लंड पर मार दिया ऑर मेरी तरफ मुस्कुराकर देखने लगी. अब उसने मेरे लंड को मुँह मे लेके अच्छे से चूसा ऑर ढेर सारा थूक मेरे लंड पर लगाया ऑर कुछ थूक उसने खुद अपनी गान्ड मे भी लगाया फिर आँखें बंद करके धीरे-धीरे मेरे लंड पर बैठने लगी
उसके चेहरे से सॉफ पता चल रहा था कि उसको बहुत दर्द हो रहा है लेकिन फिर भी वो लंड को धीरे - धीरे अंदर लेने लगी ऑर जब आधे से थोड़ा सा ज़्यादा लंड अंदर चला गया तो उसने एक बार नीचे मुँह करके लंड को देखा ऑर फिर मेरी छाती पर अपने दोनो हाथ रख कर उपर-नीचे होने लगी मुझे उसके ऐसा करने से बे-इंतेहा मज़ा मिल रहा था ऑर मैने मज़े से आँखें बंद की हुई थी तभी कुछ झटको के बाद वो एक दम से मेरे उपर लेट गई ऑर अपने रसीले होंठ फिर से मेरे होंठ पर रख कर चूसने लगी मैं आँखें बंद किए लेटा रहा ओर वो मेरे होंठ चुस्ती रही तभी उसने ज़ोर दार थप्प के साथ अपनी गान्ड को मेरे लंड पर दबाया ऑर वो मेरे लंड पर बैठ गई. जिससे मेरा पूरा लंड उसकी गान्ड मे एक दम से चला गया.
कुछ देर वो ऐसे ही पूरा लंड अपनी गान्ड मे लिए मेरे उपर लेटी रही ऑर मेरे होंठ चुस्ती रही फिर धीरे-धीरे उसने हिलना शुरू किया ऑर अब वो मेरे लंड को टोपी तक बाहर निकालती ऑर फिर से पूरा एक ही बार मे अंदर डाल लेती काफ़ी देर तक वो ऐसे ही करती रही फिर उसकी शायद टांगे तक गये थी इसलिए उसने अपने होंठ मेरे होंठों से हटा कर मुझे उपर आने को कहा तो मैं बिना कुछ बोले उसको कमर से पकड़ कर बैठ गया ऑर फिर उसको ऐसे ही पलट दिया लंड जैसे अंदर था वैसे ही रहा अब मैं उपर था ऑर वो नीचे. अब मैने धीरे -धीरे झटके देने शुरू कर दिए कुछ देर वो झटके बर्दाश्त करती रही फिर शायद उसको दर्द होने लगा था इसलिए उसने खुद ही हाथ नीचे ले-जाकर लंड को गान्ड से बाहर निकाला ऑर अपनी चूत मे डाल दिया. अब उसका इशारा समझते हुए मैने उसकी चूत मे झटके लगाने शुरू कर दिए उसने अपनी दोनो बाजू मेरी गर्दन पर लपेट ली ऑर अपनी दोनो टांगे मेरी कमर पर रख ली जिससे हम दोनो एक दूसरे से चिपक से गये थे कुछ देर बाद ही मेरे झटको मे खुद ही तेज़ी आ गई ऑर उसके मुँह से सस्सस्स सस्सस्स ऊहह आआहह जैसे लफ्ज़ निकलने लग गये कुछ तेज़ झटको के साथ पहले वो फारिग हुई ऑर उसके कुछ ही देर बाद मैं भी उसके अंदर ही फारिग हो गया ऑर उसके उपर ही लेता साँस लेने लगा हम दोनो पसीने से बुरी तरह नहाए हुए थे ऑर दोनो की साँसे बहुत तेज़ चल रही थी. कुछ देर हम ऐसे ही एक दूसरे की आँखो मे देखते रहे फ़िज़ा बार - बार मुझे देखते हुए मेरे होंठों को चूम रही थी.
मैं : जान मज़ा आया...
फ़िज़ा (बिना कुछ बोले आँखें बंद करके मेरे होंठ चूमते हुए) पुच्छने की ज़रूरत है
मैं : बताओ ना पिछे वाले मे आया कि नही...
फ़िज़ा : (अपनी आँखें खोलकर मेरा चेहरा अपने दोनो हाथो से पकड़ते हुए) मज़ाअ....मेरी जान निकल गई थी तुमको मज़े की पड़ी है जानते हो कितना दर्द हुआ था.... अब फिर से करने को कभी मत कहना....जाने कहाँ से ऐसे उल्टे ख्याल तुमको आते है ऑर तुम्हारी फरमाइश पूरी करने के चक्कर मे मेरी जान निकलने को हो जाती है.
मैं : जान हम करते हैं तो ऑर लोग भी तो करते होंगे ना
फ़िज़ा : करते होंगे उनको मरने दो पर हम नही करेंगे.
मैं : (रोने जैसा मुँह बनाते हुए) लेकिन क्यूँ....
फ़िज़ा : (अपना हाथ नीचे ले जा कर मेरा लंड पकड़ते हुए) इसका साइज़ देखा है जो लोग पिछे करते हैं उनके शोहर का ये इतना बड़ा नही होता समझे...
मैं : (उदास मुँह बनके) ठीक है नही करेंगे
फ़िज़ा : (चिड़ते हुए ) जान तुम्हारी यही आदत मुझे पसंद नही या तो तुम्हारी हाँ मे हाँ मिलाओ... अगर ना बोलती हूँ तो गंदा सा मुँह बना लेते हो
मैं : हाँ तो मैने क्या कहा है ठीक है नही करेंगे ना बस बात ख़तम. (गुस्से जैसा मुँह बनाके उठ कर बैठ ते हुए)
फ़िज़ा : (उठ कर मेरी टाँग पर बैठ ते हुए मेरे चेहरा अपनी तरफ करके) मेरी जान मुझसे नाराज़ है
मैं : (ना मे सिर हिलाते हुए) नही....
फ़िज़ा : अच्छा कर लेना जब दिल करे नही रोकूंगी. अब तो हँस कर दिखाओ तुम जानते हो तुम हँसते हुए ही अच्छे लगते हो (मुस्कुराकर)
मैं : (मुस्कुराकर फ़िज़ा के होंठ चूमते हुए) तुम भी हँसती हुई बहुत अच्छी लगती हो.
फ़िज़ा : जान चलो अब बहुत देर हो गई है नीचे चलते हैं.
मैं : रूको ना जान एक बार ऑर करेंगे ना
फ़िज़ा : पागल हो गये हो आज नही...... वैसे भी हम बहुत देर से यहाँ है. जान बात को समझो ना मैं मना थोड़ी करती हूँ बस अब काफ़ी वक़्त हो गया है ऑर वैसे भी तुमने भी तो सुबह खेत पर जाना है ना अगर सोओगे नही तो बीमार पड़ जाओगे इसलिए अब हम दोनो जाके बस सोएंगे ठीक है. (मुस्कुराकर)
मैं : हमम्म ठीक है चलो कपड़े पहन लेते हैं ऑर नीचे चलते हैं.....
उसके बाद हम दोनो ने कपड़े पहने ओर अपने-अपने कमरे मे आ गये फ़िज़ा ने अपने कमरे की कुण्डी खोली ऑर मैं बस उसको अंदर जाते हुए देख रहा था उसने भी एक बार पलटकर मुझे देखा ऑर एक प्यारी सी मुस्कान के साथ अपने होंठों को चूमने जैसे किया जैसे वो मुझे चूम रही हो ऑर फिर जल्दी से अंदर चली गई मैं भी चुप-चाप अपने कमरे मे आया तो बाबा को सोता हुआ देखकर चुप चाप अपने बिस्तर पर आके लेट गया ऑर जल्दी ही मुझे नींद ने अपनी आगोश मे ले लिया.
अगली सुबह मैं उठा ओर रोज़ की तरह तैयार होके खेत चला गया आज मैं अकेला ही खेत मे था क्योंकि नाज़ी की नींद देर से खुली थी रात की दवाई की वजह से इसलिए मैने उसे अपना साथ खेत पर लाना मुनासिब नही समझा ऑर उसको घर पर ही छोड़ आया ताकि वो ऑर फ़िज़ा मिलकर मेरा कमरा तैयार कर सके ऑर नाज़ी भी घर मे रहकर फ़िज़ा के कामो मे मदद कर सके. आज खेत मे मुझे भी कोई खास काम नही था बस नयी फसल उगाने के लिए खेत को पानी लगाने का काम था जो मैने दुपेहर तक मुकम्मल पूरा कर दिया ऑर अब मैं खाली बैठा था इसलिए मैने भी घर वापिस जाने का मन बना लिया ऑर मैं भी जल्दी ही घर आ गया. अभी मैं घर आ ही रहा था कि मुझे दूर से घर के बाहर कुछ गाड़िया खड़ी नज़र आई. जाने क्यो लेकिन उन गाडियो का काफिला देखकर मुझे एक अजीब सी बेचैनी होने लगी ऑर मैं तेज़ कदमो के साथ घर की तरफ बढ़ गया. घर मे जाते ही मुझे कुर्सी पर कुछ लोग बैठे नज़र आए.
(दोस्तो यहाँ से मैं एक न्यू कॅरक्टर का थोड़ा सा इंट्रोडक्षन आप सब से करवाना चाहूँगा ताकि आपको कहानी मुकम्मल तोर पर समझ आती रहे.)
एक ईमानदार पोलीस वाला जो ज़ुर्म ऑर मुजरिम से सख़्त नफ़रत करता है इसकी जिंदगी का मकसद सिर्फ़ ऑर सिर्फ़ ज़ुर्म को ख़तम करना है.
ख़ान : (मुझे देखकर) आइए जनाब हमारी तो आँखें तरस गई आपके दीदार के लिए ऑर आप यहाँ डेरा डाले बैठे हैं.
मैं : (कुछ ना समझने वाले अंदाज़ मे) जी आप लोग कौन है ऑर यहाँ क्या कर रहे हैं.
ख़ान : (कुर्सी से खड़े होते हुए) अर्रे क्या यार शेरा अपने पुराने दोस्त को इतनी जल्दी भूल गये ऑर ये क्या मूछे क्यो सॉफ करदी तुमने.... चलो अच्छा है ऐसे भी अच्छे दिखते हो. (मुस्कुराते हुए आँख मारकर)
मैं : जी कौन शेरा किसका दोस्त मैं तो आपको नही जानता
ख़ान : हमम्म तो तुम शेरा नही हो फिर ये कौन है.(टेबल पर पड़ी तस्वीरो की तरफ इशारा करते हुए)
मैं : (बिना कुछ बोले तस्वीरे उठाके देखते हुए) ये तो एक दम मेरे जैसा दिखता है (हैरान होते हुए ऑर अपने चेहरे पर हाथ फेरते हुए)
ख़ान : अच्छा ये नया नाटक शुरू कर दिया. ये तुम जैसा नही दिखता तुम ही हो समझे अब अपना ड्रामा बंद करो.
बाबा : साहब जी मैने कहा ना ये मेरा बेटा नीर है कोई शेरा नही है आपने जो तस्वीरे दिखाई है वो बस मेरे बेटे का हम शक़ल है ऑर कुछ नही ये मासूम बहुत सीधा-साधा हैं कोई अपराधी नही है ये.
मैं : (ख़ान का कलर पकड़ते हुए)ओये तमीज़ से बात कर समझा.... अगली बार मेरे बाबा को उंगली दिखाई तो हाथ तोड़ दूँगा तेरा.
ख़ान : (हँसते हुए)अर्रे इतना गुस्सा अच्छा भाई नही कहते कुछ आपके बाबा को..... देखो फ़ारूख़ तेवर देखो इसके वही गुस्सा वही नशीली आँखें.... ऑर ये लोग कहते हैं ये शेरा नही है
बाबा : नीर हाथ नीचे करो ये बड़े साहब है तमीज़ से पेश आओ (गुस्से से)
मैं : जी माफ़ कर दीजिए (नज़रे झुका कर हाथ कॉलर से हटा ते हुए)
ख़ान कभी बाबा को ऑर कभी मुझे बड़ी हैरानी से बार-बार देख रहा था ऑर मुस्कुरा रहा था. लेकिन मुझे कुछ भी समझ नही आ रहा था.
Update-25
Fiza : jaan kya kar rahe the pagal ho gaye ho wo gandi jagah hoti hai
Main : tumko maza nahi aya
Fiza : baat maze ki nahi hai lekin sirf mere maze ke liye tum aisi jagah mujhe pyaar karo to mujhe aapke liye bura lagega
Main : maine kya puchaa hai tumko maza aaya ya nahi....sirf haa ya naa me jawab do
Fiza : (haa me sir hilate hue)
Main : bas fir wapis ulti hoke let jao
Fiza : thik hai achha aap ungali se kar lo bass lekin zubaan nahi dalna wahan wo gandi jagah hai aapko meri kasam hai.
Main : achha thik hai ab let to jao naa...
Fiza bina kuch bole wapis ulti hoke let gai or main apni ungali ko apne munh me daalkar gili karke wapis uski gaanD ko khol kar apni gaanD ki ungali uski ched par upar niche ghumane laga jisse usko fir se maza aane laga.
Main : jaan achha lag raha hai?
Fiza : hhhhmmmm
Main aise hi kaafi der fiza ki gaanD ki ched par ungali ferta raha or uski gaanD ke mote-mote pahado ko upar se chumta raha jiske liye fiza ne bhi mujhe mana nahi kiya wo apni aankhen banda kiye bas ssss ssss or aahhhh ooohhh kar rahi thi. ye maza hum dono ke liye ek dam naya tha. main jab bhi fiza ki gaanD ki ched par apni ungali ferta to kabhi wo apni ched ko sakhti se band kar leti kabhi khol deti jisko dekhkar mujhe bhi achha lag raha tha tabhi maine socha kyo naa iske andar ungali daal doo isliye maine ched ke khulna ka intzaar kiya or jaise hi usne apni ched ko thoda sa dheela kiya to maine apne nakhun tak ungali uski gaanD ki ched me dal di jisse shayad usse bhi maza aaya tha usne jor aaaahhhh kiya or fir tez-tez saans lene lagi.
Main : jaan dard to nahi ho rahi
Fiza : bahut maza aa raha hai jaan ungali ko halka-halka dabao achha lagta hai aise karte ho to.
Main uske bole mutebiq apni ungali ko halke-halke dabane laga jisse meri ungali or andar tak jane lagi gili hone ki wajah se meri adha ungali uski gaanD ke andar thi jisko main bar-bar andar bahar kar raha tha tabhi mujhe laga jaise wo niche apna hath lejakar apni chut massal rahi hai shayad isliye usko maza aa raha tha. Fir main wapis uske upar let gaya or uski gaanD se apni ungali bahar nikaal lee. maine socha kyo naa iski gaanD me apna lund daal kar dekhu ki kaisa lagta hai isliye maine dher sara thook apne lund par lagaya or thoda thook or uski gaanD par lagaya or lund ko maine jaise hi gaanD ki ched ke nishane par rakha fiza ko ek dam jhatka sa laga or wo foran palat gai.
Fiza : kya kar rahe the.
Main : kuch nahi lund daal kar dekh raha tha andar.
Fiza : pagal ho gaye ho ye itna bada andar nahi jayega
Main : arre koshish to karne do pakka agar nahi jayega to main nahi dalunga or waise bhi tumko ungali se maza aa raha tha naa to isse (lund) se bhi maza aayega.
Fiza : nahi jaan ye bahut bada hai awwal to andar jayega nahi agar jabardasti karoge to mujhe bahut dard hoga maine pehle kabhi pichhe liya nahi.
Main : bas ek baar koshish karne do pakka agar dard hoga to nahi karunga
Fiza : vaada karo jab main rokungi to ruk jaoge.
Main : vaada (muskurate hue)
Fiza : (bina kuch bole wapis ulti hoke let te hue) Hhhmmm jaan aram se karna mujhe darr lag raha hai yaad rakhna aapko kasam di hai
Main : ha ha yaad hai dheere hi karunga
Fiza : achha karo lekin bahut araam se
Uska signal milte hi maine apne ghutno par baithkar fir se apne lund ko nishane par rakha or thoda sa lund par dabav diya lund fisal kar upar ko chala gaya. shayad fiza sach keh rahi thi kyonki ched sahi me bahut tang thi. Maine fir se lund ko nishane par rakh kar thoda jor se dabav diya lekin ched bilkul bhi nahi khul rahi thi. main wapis fiza ke upar let gaya or fiza se ched thodi dheele karne ko kha usne haa me sir hilaya to main wapis apni jagah par aake baith gaya iss baar maine socha kyo naa jhatka lagaya jaye isliye maine fir se lund ko nishane par rakha or gand ko achhe se dono hath se faila diya ab main ek halka sa jhatka maara jisse adha topi lund ki andar chali gai or fiza ko shayad dard hua jisse uske munh se ek halki si ssssss nikal gai magar wo fir bhi khamosh rahi. ab main dheere-dheere jhatke marne laga or lund ka dabaav ched par dalne laga magar jab bhi main dabav ched par dalta to fiza ched ko tight kar leti thi jisse mujhe andar daalne me pareshaani ho rahi thi main wapis fiza par leta or fiza se kaha...
Main : jaan aise to nahi jaa raha tum thoda dheela karo ched ko or ab main halke se jhatka dunga tum chillna mat nahi to sab uth jayenge.
Fiza : (haa mer sir hilate hue pass pada apna dupatta apne munh ke pass rakh liya) Hhhmmm karo lekin jaan jyaadaa jor se jhatka naa dena warna dard hoga mujhe.
Main : achha fikar mat karo.
Main ab wapis apni jagah par aaya or lund par fir se dher sara thook lagaya or lund ko ched par rakha fiza ne bhi iss baar ched ko dheela choda hua tha maine fir se gaanD ki pahadiyo ko dono taraf failaya or lund ko iss baar zra jor se jhatka diya jisse lund ki topi andar chali gai or fiza ko ek jhatka sa laga jisse wo thoda upar ko ho gai or usne apna dupatta apne munh par jor se daba liya usne apna hath pichhe karke mujhe rukne ka ishara kiya. main waise hi lund gaanD me daale kuch der ke liye ruk gaya or fiza ke agle ishare ka intzaar karne laga. jab uska dard kam ho gaya to usne apna munh dupatte me chhipaye hi haa me sir hilaya maine fir se lund bahar nikala or uss par thook lagake andar kar diya or fir dheere-dheere main jhatke lagane laga fiza ka mujhe chehra nahi dikh raha tha lekin shayad usko dard ho raha tha kyonki wo bar-bar apna sir takiye par daye-baye maar rahi thi or chehra dupatte se chhipa rakha tha idhar mera bhi adha lund uski gaanD me jaa chuka tha or main apne adha lund ko hi fiza ki gaanD me andar-bahar kar raha tha. kuch der baad fiza ki awaz aayi...
Fiza : jaan ruko... ab main aapke upar aati hun aise karne me mujhe bahut dard ho raha hai.
Main bina kuch bole uske upar se hatt gaya or mera lund Pukkk ki awaz ke sath uski gaanD se bahar aa gaya. ab main niche let gaya or fiza mere upar aa gai uska poora chehra paseena se gila hua pada tha or ek dam laal hua pada tha. uske upar aate hi hum dono ne ek dusre ko dekha or dono hi muskura diya fir usne mere lund ko pakda jo chhat ki taraf munh kiye poori tarah khada jisko usne hath se pakad kar pehle dekha fir ek dheere se thappad mere lund par maar diya or meri taraf muskurakar dekhne lagi. Ab usne mere lund ko munh me leke achhe se chusa or dher sara thook mere lund par lagaya or kuch thook usne khud apni gaanD me bhi lagaya fir aankhen band karke dheere-dheere mere lund par baithne lagi uske chehre se saaf pata chal raha tha ki usko bahut dard ho raha hai lekin fir bhi wo lund ko dheere - dheere andar lene lagi or jab adha se thoda sa jyaadaa lund andar chala gaya to usne ek baar niche munh karke lund ko dekha or fir meri chaatee par apne dono haath rakh kar upar-niche hone lagi mujhe uske aisa karne se be-intehaa maza mil raha tha or maine maze se aankhen band ki hui thi tabhi kuch jhatko ke baad wo ek dam se mere upar let gai or apne raseele honth fir se mere honth par rakh kar chusne lagi main aankhen band kiye leta raha or wo mere honth chusti rahi tabhi usne jor daar thapp ke sath apni gaanD ko mere lund par dabaya or wo mere lund par baith gai. jisse mera poora lund uski gaanD me ek dam se chala gaya.
kuch der wo aise hi poora lund apni gaanD me liye mere upar leti rahi or mere honth chusti rahi fir dheere-dheere usne hilna shuru kiya or ab wo mere lund ko topi tak bahar nikalti or fir se poora ek hi baar me andar daal leti kaafi der tak wo aise hi karti rahi fir uski shayad taangey thakk gaye thi isliye usne apne honth mere honthon se hata kar mujhe upar aane ko kaha to main bina kuch bole usko kamar se pakad kar baith gaya or fir usko aise hi palat diya lund jaise andar tha waise hi raha ab main upar tha or wo niche. ab maine dheere -dheere jhatke dene shuru kar diye kuch der wo jhatke bardasht karti rahi fir shayd usko dard hone laga tha isliye usne khud hi hath niche le-jakar lund ko gaanD se bahar nikala or apni chut me daal diya. ab uska ishara samjhte hue maine uski chut me jhatke lagane shuru kar diye usne apni dono baaju mere garden par lapet lee or apni dono taangey meri kamar par rakh lee jisse hum dono ek dusre se chipak se gaye the kuch der baad hi mere jhatko me khud hi tezi aa gai or uske munh se sssss sssss oohhhh aaaahhhhh jaise lafz nikalne lag gaye kuch tez jhatko ke sath pehle wo farig hui or uske kuch hi der baad main bhi uske andar hi farig ho gaya or uske upar hi leta saans lene laga hum dono paseene se buri tarah nahaye hue the or dono ki saanse bahut tez chal rahi thi. kuch der hum aise hi ek dusre ki aankho me dekhte rahe fiza bar - bar mujhe dekhte hue mere honthon ko chum rahi thi.
Main : jaan maza aaya...
Fiza (bina kuch bole aankhen band karke mere honth chumte hue) puchhne ki jarurat hai
Main : bataao naa pichhe wale me aaya ki nahi...
Fiza : (apni aankhen kholkar mera chehra apne dono hatho se pakdte hue) mazaaa....meri jaan nikal gai thi tumko maze ki padi hai jante ho kitna dard hua tha.... ab fir se karne ko kabhi mat kehna....jane kaha se aise ulte khyaal tumko aate hai or tumhari farmayish poori karne ke chakkar me meri jaan nikalne ko ho jati hai.
Main : jaan hum karte hain to or log bhi to karte honge naa
Fiza : karte honge unko marne do par hum nahi karenge.
Main : (rone jaisa munh banate hue) Lekin kyooo....
Fiza : (apna hath niche le ja kar mera lund pakadte hue) iska Size dekha hai jo log pichhe karte hain unke shohar ka ye itna bada nahi hota samjhe...
Main : (udaas munh banake) thik hai nahi karenge
Fiza : (chidhte hue ) jaan tumhari yhi aadat mujhe pasand nahi yaa to tumhari haa me haa milao... agar naa bolti hun to ganda sa munh bana lete ho
Main : haa to maine kya kaha hai thik hai nahi karenge naa bas baat khatam. (gusse jaisa munh banake uth kar baith te hue)
Fiza : (uth kar meri taang par baith te hue mere chehra apni taraf karke) Meri jaan mujhse naraz hai
Main : (naa me sir hilate hue) Nahi....
Fiza : achha kar lena jab dil kare nahi rokungi. ab to hass kar dikhao tum jante ho tum hansate hue hi achhe lagte ho (muskurakar)
Main : (muskurakar fiza ke honth chumte hue) tum bhi hansatee hui bahut achhi lagti ho.
Fiza : jaan chalo ab bahut der ho gai hai niche chalte hain.
Main : ruko naa jaan ek baar or karenge naa
Fiza : pagal ho gaye ho aaj nahi...... waise bhi hum bahut der se yahan hai. Jaan bat ko samjho na main mana thodi karti hun bas ab kaafi waqt ho gaya hai or waise bhi tumne bhi to subah khet jana hai na agar sowoge nahi to bimaar pad jaoge isliye ab hum dono jake bas soyenge thik hai. (muskurakar)
Main : Hhhmmm thik hai chalo kapde pehan lete hain or niche chalte hain.....
Uske baad hum dono ne kapde pehne or apne-apne kamre me aa gaye fiza ne apne kamre ki kundi kholi or main bas usko andar jate hue dekh raha tha usne bhi ek baar palatkar mujhe dekha or ek pyari si muskaan ke sath apne honthon ko chumne jaise kiya jaise wo mujhe chum rahi ho or fir jaldi se andar chali gai main bhi chup-chap apne kamre me aaya to baba ko sota hua dekhkar chup chap apne bistar par aake let gaya or jaldi hi mujhe neend ne apni aagosh me le liya.
Agli subah main utha or roz ki tarah teiyaar hoke khet chala gaya aaj main akela hi khet me tha kyonki nazi ki jaag der se khuli thi raat ki dawayi ki wajah se isliye maine usse apna sath khet par lana munasib nahi samjha or usko ghar par hi chod aaya taki wo or fiza milkar mera kamra teiyaar kar sake or nazi bhi ghar me rehkar fiza ke kamo me madad kar sake. Aaj khet me mujhe bhi koi khas kaam nahi tha bas nayi fasal ugane ke liye khet ko paani lagane ka kaam tha jo maine dupehar tak mukammal poora kar diya or ab main khali baitha tha isliye maine bhi ghar wapis jane ka mann bana liya or main bhi jaldi hi ghar aa gaya. Abhi main ghar aa hi raha tha ki mujhe door se ghar ke bahar kuch gaadiya khadi nazar aayi. Jane kyo lekin unn gadiyo ka kaafila dekhkar mujhe ek ajeeb si bachaini hone lagi or main tez kadmo ke sath ghar ki taraf badh gaya. Ghar me jaate hi mujhe kursi par kuch log baithe nazar aaye.
(Dosto yahan se main ek new charactor ka thoda sa introduction aap sab se karwana chahunga taaki aapko kahani mukammal tor par samajh aati rahe.)
Naam : Inspector. Wahid khan (khan) Age : 43 saal, Height : 5.11
Ek imaandar policewala jo zurm or mujrim se sakht nafrat karta hai iski jindagi ka maksad sirf or sirf zurm ko khatam karna hai.
Khan : (mujhe dekhkar) Aayiye janab hamaari to aankhen taras gai aapke deedar ke liye or aap yahan dera daale baithe hain.
Main : (kuch na samjhne wale andaaz me) ji ap log kaun hai or yahan kya kar rahe hain.
Khan : (kursi se khade hote hue) arre kya yaar shera apne purane dost ko itni jaldi bhul gaye or ye kya mooche kyo saaf kardi tumne.... chalo achha hai esse bhi achhe dikhte ho. (muskurate hue aankh maarkar)
Main : ji kaun shera kiska dost main to apko nahi janta
Khan : Hhhmmm to tum shera nahi ho fir ye kaun hai.(table par padi tasveero ki taraf ishara karte hue)
Main : (bina kuch bole tasveere uthake dekhte hue) ye to ek dam mere jaisa dikhta hai (hairaan hote hue or apne chehre par hath ferte hue)
Khan : Achha ye naya naatak shuru kar diya. ye tum jaisa nahi dikhta tum hi ho samjhe ab apna drama band karo.
Baba : sahab ji maine kaha na ye mera beta Neer hai koi shera nahi hai aapne jo tasveere dikhayi hai wo bas mere bete ka hum shaqal hai or kuch nahi ye masoom bahut seedha-sadha hain koi apradhi nahi hai ye.
khan : aap chup rahiye (ungali dikhate hue) maine aapse nahi puchaa
Main : (khan ka color pakadte hue)Oye tameez se baat kar samjhaa.... agli baar mere baba ko ungali dikhayi to hath tod dunga tera.
Khan : (hansate hue)Arre itna gussa achha bhai nahi kehte kuch aapke baba ko..... dekho farookh tevar dekho iske wahi gussa wahi nasheeli aankhen.... or ye log kehte hain ye shera nahi hai
Baba : Neer hath niche karo ye bade sahab hai tameez se pesh aao (gusse se)
Main : ji maaf kar dijiye (nazre jhuka kar hath color se hata te hue)
Khan kabhi baba ko or kabhi mujhe badi hairani se bar-bar dekh raha tha or muskura raha tha. lekin mujhe kuch bhi samajh nahi aa raha tha.